Friday, January 09, 2009

एत’ आ ओत’- अनलकान्त




आइ-काल्हि नाट प्लेस मे चलैत-चलैत हमरा लगैत अछि, अपना गाम दशहरा·मेला मे घूमि रहल छी। नइँ, ओत मेला मे रंग-बिरही चीज कीनि पबैत रही, नइँ एत शो-रूम मे ढुकि पयब साहस क’ पबै छी। किलोक किलो रसगुल्ला-जिलेबी तौलबैत आकि मारते रास खिलौना ल’क’ जाइत लोककेँ  डराइत-ललचाइत देखैत रही ओत आ एत’ विशाल-भव्य मॉल आ नेरुलाज-मैडोनाल्ड सँ चहकै फुदकैत बहराइत अर्द्धनग्न अप्सरा केँ इन्द्र-बेर संग रभसैत, डेटिंग फिक्रैत र्ष्या क्रोध सँ देखै छी।

राष्ट्रपति भवन पिछुआड जंगल मे ए दिन ए टा बेल गाछ लग
नेकाल ठमल रही। ओरा जडि़ मे किछु माटिक महादेव फेल छल, किछु
निर्माल्य आ कातक झोंझि मे कोनो साँप छोड़ल केंचुआ पुरबा सिहकीमे डोलि रहल छल। हमर आँखि क्षणभरिक लेल मुना गेल। ओत एहने सन एटा बेल गाछ तर हमर बालपन प्रियाक गर्दनि भूत मचोडऩे छलै। ओरा मौनी मे कामधचूड़ा ओहिना नजरि पड़ै अछि!... मुदा हम तहुँ हेरायल-भोतिआयल नइँ रही।हम राष्ट्रपति भवन पिछुआडि़ जंगल मे ओही बेल गाछ लग ठाढ़ रही। हमराओही आसपास मे ए टा अस्तबल रिपोर्टिंग बाक छल जत सँ रिया घोड़ानाल स्मगलिंग होइत छलै। से ओहि बेरहट-बेरा मे भुखायल सन हम अपन रिपोर्ट पूरा बाक ओरिआओन क’ रहल छलहुँ कि अचान टा गम हमरा विचलित
देल। गाम मे नवका धान-चूड़ा कुटैकाल जे गम बहराइत छल, दम वैह गम छल! आसिन बसात अगहनी भ' गेल छलै।... मुदा हमर मन बताह हेबाक सीमा धरि अवसादग्रस्त भ' गेल।

ओहिना ए साँझ कुतुब मीनार लग सँ गुजरि रहल छलहुँ। ए टा छौंड़ी अपन संगी छौंड़ा केँ जोर-जोर सँ बता रहल छलै जे ओर सपना मीनारदम ऊपर सँ दिल्ली देखैत रहबाक छै। हम सर्दिआयल भुइँ पर लगाओल पुआर सेजौट पर सपना मन पाडय़ लगलहुँ कि तखने हमरा मोबाइल पर बीड़ी साँग बाजल। छोटकी माम फोन छल। ओ नैत-नैत बाजलि, ''देखियौ यौ भागिन बाबू, आब हम की रबै!... बैमनमा सब हुनका सी.बी.आई. सँ पड़ा देलनि। फुसियेपाइ लेबाक नाट मे ओझराक'...।" हमर मामा इनम टैकस मीशनर। हम -दू बेर गेल छी हुनका 'रेजीडेंस' पर, मुदा हमरा डेरा मोबाइल पर हुनका लोनि सर्दिआयल स्वर आ किछु एसएमएस टा आयल अछि। तखन अपना
भीतर भाव नुबैत हम कीकोना बाजल, से मन नइँ अछि। हमर अदना-सन पत्रकाकाज नइँ अयलनि, अपने पाइ वा जे थुबाल!... से बात जे-से। मोबाइल स्वीच-ऑफ क' हम जेब मे रखनहि रही कि हमर मन-प्राण ए टा टटका गम सँ सराबोर भ' गेल। धनिया, सरिसो सभ देलाक बाद झोर मे टभकै माछ तीमन सँ घर-आँगन मे जे गम पसरि जाइत छै, सैह गम हमरा मतौने जा रहल छल। हम अगल-बगल हियासल जे तहु ककरो घर वा झुग्गी मे रन्हा रहल होयतै, मुदा ओहि झोलअन्हारी मे हमरा चारूभर जंगल-झाड़ आ म्बार छाडि़, किछु तेहन नइँ देखा पड़ल जत' ओहि गमकक स्रोत ठेकानि सकितहुँ। अंतत: हम अपन जेब मे हथोडिय़ा देब' लगलहुँ जे माछइंतजाम भ'कै छै वा नहि!...

हाले मे हम अपन सेठक कृपा सँ महीनबारी गुलामी सँ मुक्त यल गेल छलहुँ। आब हम तथाथित 'स्वतंत्र' दिहाड़ी मजदूर छी। आ दिहाड़ी पर खट'वलक कपार मे जे बौअयनी लिखल रहै छै, से हमरो संग छल। आ तेँ ओत' सँ एत' आयल मैथिल लोनि सँ भेंटघाट सेहो किछु बेसी भ' रहल छल। से ए टा एहने भेंट मे हमर ए ग्रामीण हलनि, ''बाउ, ई नगर तेजाब नदी थि जाहि मे अपन मैथिले टा नहि, कोनो मनुक्ख बाढि़ मे भसिआइत माल-जाल, घर-द्वार आ लोवेद जकाँ निरुपाय अछि।"

कि मधेपुरा-सिंहेश्वर दिस सँ आयल ए टा युव बाजल, ''हौ भैया!,बाजार, मशीन आ सीमेंट तर दबैत-मरैत लोकक नगर छियह ई।"

''हँ, भाइ, ठीक कहलह! मुदा ओत' दलदलो मे जरा जगह नइँ भेटलै, ओ एत', बारूद ढेरी पर सही, ए टा नव मिथिला तँ बसबै छै!..." बजैत-बजैत हम ह' लागल रही आ भीतर पसेना-पसेना भ' गेल रहय।

से लगातार एहने सन मन:स्थिति सँ गुजरि रहल छलहुँ हम। आ, यैह पछिला पखप्प थि। ए साँझ विद्यापति बाबा बरखीकार पूर' हम नोएडा गेलहुँ। ओत' बहुत दिन पर भेटलाह, बतौर लाकार दरभंगा सँ आयल मिथिला नरेश अंतिम पुरोहित परपौत्र महानंद झा। आयोज सँ पूरापूरी विदाइ
असूलि अटैची डोलबैत फरा भेले छलाह कि हम नमस्का यलियनि। बहुत बरख भेंट बादो चिन्हलनि आ ए कात ल' जाक' हाल-चाल पूछ' लगलाह।
प्पक क्रम मे ओ बेर-बेर एम्हर-ओम्हर ताथि। कि हम पुछलियनि, ''किनको तकै छी की?"

''हँ यौ! दरभंगक कमीशनर साहेबबेटा एत' प्रोफेसर छथि। ओ हमरा अपना ओत'' जाइवला छलाह। देखियौ ने, हुनर आग्रह देखि हम अपन सभ प्रशंसककेँ निराश क' देलियनि। सांसद जी धरि सँ लाथ क' लेलहुँ। असल मे होटल मे हमरा जहिना जेल बुझाइ अछि, तहिना नेता सभ ठाम मेला बुझाइछ। ते हम तहु जाइ छी तँ अपने कोनो समाँग घर रहै छी।" चेहराक बेचैनी बादहु महानंद जी स्वर समधानल छलनि।

''से तँ नीके करै छी!" हुन बेचैनी बाक लेल हम आश्वस्त कयलियनि, ''हने छथि, तँ अबिते हेताह!"


''से आब नइँ लगै अछि। चारिए बजेक टाइम देने रहथि। कोनो मीटिंग मे फँसि गेल हेताह। ...देखियौ ने, हम ने पते लेने छी, ने फोन नंबर। आब तँ अवग्रहमे पडि़ गेलहुँ।" हुन परेशानी आब सभ तरहेँ प्रट भ' रहल छल।"

हमरा साफ लागि रहल छल जे ओ होटल खर्च बचब' लेल ठहार ताकि रहल छथि। एम्हर हमरा ई डर किछु बजबा सँ रोकै छल जे नइँ जानि ते दिन धरि मेहमानी डटाओताह। अंतत: पुछलियनि, ''हिया वापसी अछि?"

''परसू साँझ स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस पड़बा अछि। टिटो आर.ए.सी.
27 सँ न्फर्म भेल वा नइँ, मालूम रबा अछि।" आ हमरा हाथ मे मोबाइल देखि झट जेब सँ टिट बहार यलनि, ''देखियौ तँ मोबाइल सँ, टि स्टेटस
की छै?

दुइए दिन बात निश्चित जानि हम हिम्मत यलहुँ, ''ई कोना देखै छै, से हमरा नइँ पता! हमर नियाँ देखि सकै छथि। आ से तखने हैत जँ अहाँ हमरो अपने समाँग बुझी आ हमरे घर दू दिन लेल चली।"

''आ से की है छिये! अहाँ तँ अपनो सँ अपन समाँग छी। हम तँ घरेक लो बुझै छी अहाँ केँ। ठी छै, अहीं घर जायब। ओ प्रोफेसर आब आबियो जयताह तँ हम नइँ जायब हुनका ओतय। ओ तँ मीशनर साहेब अपनहि फोन क' कहलनि चलै काल तेँ सोचल!!... धौर, छोड़ू आब ओहि गप्प केँ। आ ओ हमरा संग चलबा लेल अगुआयले सन छलाह।

हम नइँ चाहैतो अपना परतारि रहल छलहुँ जे एत पैघ लाकार दू दिन हमरा घर रहताह। से बस भीड़ो मे ठाढ़ हम हुनके स्वागत-सत्कार मादे सोचि
रहल रही।

किछु काल बाद हम सब यमुना विहार स्टैण्ड पर बस सँ उतरलहुँ। मेन रोड छोडि़ अपना गली मे ढुले रही कि गल ओहि छोर पर चाह दोकानवला छौंड़ा गणेश पाछाँ सँ चिरिक' सोर पाड़ल। ओरा दोकान मे हमर अबरजात किछु बेसी छल। अपन भाषा भाषीवला लगाव सेहो रहय। आ ओ छौंड़ा ए तरहेँ हमर मुँहलगुआ जकाँ भ' गेल रहय। हम ओरा गाम-घर सँ भले परिचित रही, मुदा हमरा मादे ओ नइँ जानि सल रहय। मुदा तखन हमरा पाछाँ घुरिते ओ पुछल, ''अहाँ घर सहरसा लग, बिहरा छी ने!"

''से के कहलकौ?" हम अकाइत पुछलिऐ।

''अहीं गाम भोला कामति। ओ हमर मामा छिये।" गणेश बिहुँसि रहल छल, जेना ओ कोनो बडका जानकारी हासिल क' लेने छल।

''' छौ भोला?"

''भोर मे आयल रहै। दुपहरिया मे चलि गेलै। भोरे अहाँ केँ बस पड़ैत अचानके देखलकै ने तँ बाजल, ''ई तँ धीरू भैया लागै छौ रे गणेसबा!"  हमहलिऐ, ''हँ, धीरजी...बड़का पत्रकार छिये! तों कोना चिन्है छ?... " आ तखन ओ मारते सब टा हल।... आगाँक बात ओ छौंड़ा हमरा संग मे अपरिचित देखि नइँ बाजल।

''गेलौ ' भोला?"  हम बात केँ भोला दिस मोड़लहुँ।

''ओ बदरपुर मे रहै छै। काल्हि-परसू धरि फेर अयतै। एत्तै दोकान शुरू रैवला छै! "

एते काल मे हम ओरा दोका भीतर राखल बेंच पर बैसि चुल रही।महानंद जी सेहो। गणेस चाह बनब' लागल छल।

सहसा महानंद जी बजलाह, ''एत' तँ डेग-डेग पर अपन मैथिल भेटि रहलाह अछि आ से मैथिली मे बजैतो छथि। अपना दरभंगा-मधुबनी मे चाह-पानवलाक कोथा, रिक्सावला धरि केओ मैथिली मे जवाब नइँ देत।

हमरा किछु बाजब जरूरी नइँ बुझायल। चाह पानि एखन खदकिए रहल छलै कि गणेश पुछल, ''किछु खयबो रबै, सर? "

''हँ! हि हम महानंद जी दिस तलहुँ, ''अंडा लैत छी की?... लैत होइ तँ आमलेट-टोस्ट बनबा ली!"

''हँ, लिय!"  क्षणभरि बिलमक' ओ बजलाह, ''यौ धीरजी, आब दूध-दही लोक केँ भेटै नइँ छै। सागो-पात दाम नइँ पुछू, आगि लागि गेल छै।तिलकोड़ तरुआ ते साल भ' गेल, जीह पर नइँ गेल। तखन ईहो सब नइँ खाइ
तँ जीबी कोना? फेर विज्ञानो है छै जे ई पोष्टि चीज छिये।"

हमरा हँसी जकाँ लागि गेल। तत्काकिछु बाजल नइँ। चलै काल गणेश केँ लग बजा किछु तिलकोड़ पात पार्ककक कात सँ आनि देब' कहलहुँ। महानंद जी उछलि गेलाह, ''अयँ! एत तिलकोड़ पात! आब तँ दरभंगो मे नइँ देखाइ छै!"

आ तहिना हमरा नियाँ हाथ दर्जन सँ बेसी तरुआ चट क' बजलाह,
''असली मिथिला तँ आब दिल्ली आबि गेल। दरभंगा मे आब हाँ छै ओ बात,
हाँ छै ओत' ई मैथिलानीवला हाथ!..."

हम सभ दू दिन हुन खूब स्वागत-सत्कार कयल। ओ ओहि अंतराल मे
अने बेर, अनेक तरहेँ, एहन-एहन अनेक बात बजलाह। हमसभ कृत-कृत!
जयबा काल हमर निया हुन आर.ए.सी. वला आधा बर्थ नंबर सेहो पता क'
देलनि आ बाट मे खयबा लेल पराठा-भुजिय टा पैकेट पड़ौलनि। ओ
खूब-खूब आशीष दैत बहार भेलाह।

हुनका अरियातैत हम गली सँ गुजरि रहल छलहुँ। गणेश दोकान लग
एखन पहुँचले रही कि भोला पर हमर नजरि गेल। तखने ओहो हमरा देखल बाढि़सोझाँ आयल। हम दुनू गोटे ए-दोसरा सँ लिपटि गेलहुँ।

कि तखने ओरा पाछाँ लागलि ए स्त्री सेहो मुस्किआइत लग आयलि।अबिते ओ हमर पयर छूबि लेल। हम तुरत चिन्हि नइँ सलहुँ। हमरा अकायल देखि वैह बाजलि, ''हमरा नइँ चिन्हलहक कका!... हम मीरा!"

''ओ!... सैह तँ हम अँखियासै रही।.. " हमरा सोझाँ ओर अठारहबयस वला विधवा-जीवन नाचि गेल छल।

आगाँ भोला बाजल, ''हमरा दुनू आब संगे छियह। कयाह तँ सिंहेसरे मे
केलिऐ, लेकिन गाम जाइ के हिम्मत नइँ भेलह।"

हमरा अतिशय प्रसन्नता भेल। मुदा तरा व्यक्त रबा लेल शब्द नइँ भेटि रहल छल, ''बड़ बढिय़ाँ! चलह दुनू गोटे पहिने डेरा। बगले मे छै।... हम झट हिनका बस मे बैसा केँ अबै छियह।"

कि भोला पनबट्टी खोलि अपना हाथ लगाओल पान देल। महानंद जी
सेहो खयलनि। फेर महानंद जी संग मेन रोड दिस बढ़लहुँ।

बस· प्रतीक्षा मे ठाढ़ महानंद जी सँ हम हलहुँ, ''ई मीरा हमर पितिऔतबेटी छी। बचपने मे विधवा भ' गेल छलि।... आइ तरा सोहागिनि देखि मन पुलकित भ' गेल।"

सहसा महानंद झा पुछलनि, ''ई भोला कोन जात थि?"

हमरा नपट्टी पर जेना चटाक' बजरल! ''कीयट"...

''अयँ यौ, ओत'क सब टा गौरव-गाथा बिसरा गेल? बाप-दाद नाँ-गाँ...पाग-पाँजि-जनेउ सब? ...ब्राह्मण विधवा बेटी कीयट संग! ...दुर्र छी!" महानंद झा भोल देल पान बगल नाली मे थुडि़ देलनि।

हमर मन घिना गेल। हम नहुँए, मुदा ठोर स्वर मे बजलहुँ, ''अहाँ केँ पता अछि हमर नियाँ कोन जात थिकी? ...जरा अहाँ सभ मलेछ है छिऐ!..."

महानंद झा मुँह लाल भ' गेलनि, मुदा बकार नइँ फुटलनि। तखने बगल मे आबिक' रुल ए टा ऑटो मे झट द' बैसैत 'स्टेशन'ब् उच्चारण रै संग मुँह घुमा लेलनि। ऑटो आगाँ बढि़ गेल।

हमर मन हल, ''ओ तत्काल एत' सँ भागबकक· लेल हवाइ जहाज पडि़ लेथि, मुदा हमर नियाँ देलहा पराठा-भुजिया नइँ फेकिताह।

सहसा दुर्गंध तेज भभक्का लागल। जेना ओत'क कोनो सड़ल पानिवला
पोखरि गन्हा रहल हो!... 

'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...