Tuesday, December 01, 2009

'विदेह' ४६ म अंक १५ नवम्बर २००९ (वर्ष २ मास २३ अंक ४६)-PART IV

सुजीत कुमार झा
-कथाकार सुजीतजी जनकपुरसँ प्रकाशित होएबला दैनिक मैथिली समाचारपत्र मिथिला डट कम क सम्पादक छथि।
कथा
धधकैत आगि ः फुटैत कनोजरि
अन्हरिया राति सुनसान जंगल । बीच पक्की सड़क पर रातुक नरवताकेँ चीरैत ट्रकक अवाज गूँजि रहल छल । ड्राइवर ओहि सुनसान सड़क पर तीव्र गति सँ ट्रक आगा दौड़ा रहल छल ।
ड्राइवरक बगलमे बैसल खलासीकेँ दूर सँ ओहि सुनसान निर्वाध जंगलमे कोनो परछाँही ट्रक दिस अबैत बुझएलै । खलासी भयसँ कम्पित स्वरमे बाजल— “गूरुजी...................... देखियौ आगाँ सँ कियो आबि रहल अछि ।”
ड्राइवर ट्रकक प्रकाशमे दूर स्पष्ट होइत महिला आकृतीक ध्यान सँ देखय लगैत अछि ।
“गुरुजी, एहि सुनसान जंगलमे एतेक रातिमे महिला ? खलासी घबराइत बाजल ।
ड्राइवर गम्भीर भऽ गेल । क्षण—क्षण समीप अबैत आकृति पर नजरि स्थिर कएलक । टांग ओकर ब्रेक दिस बढल ।
“गूरु.............. रुकू नहि, अवश्य कोनो गड़बड़ अछि ...............गति बढ़ा कऽ बढ़ि जाउ ।”
ड्राइवर सोचमे पड़ि गेल । राजमार्ग ...... कोसो तक कोनो घर नहि ...........चारु दिस बड़का—बड़का गाछ आ बोन—झांखुर । एम्हर तँ केओ दिनोमे नहि पयरे निकलैत अछि । एहनमे ई युवती........ । सलवार समीज सँ करोड़ी सेहो नहि लगैत अछि । लगपासक करोडी सेहो रातिमे जंगली जानवरक डर सँ असगर नहि निकलैत अछि । तहन ई अछि के ? एतऽ एतेक रातिमे कोना ? कतऽ सँ आयल आ कतय जा रहल अछि ? कोन समस्यामे अछि ?
ई सभ सोचिते—सोचिते ड्राइवर ट्रकक गति कम कऽ देलक ।
ओम्हर खलासीक डर आओर बढ़ि गेल छल । ओ डर सँ कापय लागल छल । आ आतंकित स्वरमे पुनः ड्राइवर सँ कहलक जे ‘नहि रुकू, भागि चलू ।’
मुदा ड्राइवर खलासीक गप्प पर ध्यान नहि दऽ ई निश्चय कएलक जे एहि युवतीक मदत करब । अतः ओ एकदम युवतीक लग आबि ट्रक रोकलक । किछु क्षण युवतीकेँ गौर सँ देखलक । युवती कम उमेरक छल । कम्पित स्वरमे युवती सँ पुछलक— “ तोँ के छेँ आ कतय जाए चाहैत छेँ ? ”
युवती किछु सोच ऽ लागल कि ओ केना आबि गेल एहि सुनसान जंगलमे...................... अमावश्यमे..............ओकर कण्ठ अवरुद्ध भऽ गेलै । ओकरा बुझएलै अवश्य ई सपना अछि । आ कोना एतऽ आबि सकैत अछि । एते रातिमे.............अहि स्थानमे ..........अवश्य ई सपने अछि । आ ई विचार अबिते ओकरा भीतर अदभूत रोमाञ्च भरि गेलै ।
कहियो काल एना होइत छैक । सुतैत—सुतैत सपनाक अवस्थामे अचानक व्यक्ति एतेक जागरुक भऽ जाइत अछि की ओकरा ज्ञान भऽ जाइत छैक की ओ जखन चाहय, आँखी खोलि दुःखद स्थिति सँ दूर जा’ सकैत अछि । आ जखन ओकरा विश्वास भऽ जाइत छैक, आँखि खोलब आ दुखक स्थिति सँ दूर हएब ओकरा अपना हाथमे छैक, तखन ओकरा अपना शक्तिक अभास होइत छैक जे हम जे चाही कऽ सकैत छी ।
जखनकी अवस्था अे करा अधीनमे छैक तखन ओ किए नहि मनमानी करए ? अपन ईच्छाक पूर्ति करय । ककरो की विगड़तै ? ककरो पतो नहि चलतै ई सपने तऽ छैक ।
तहन किएक नहि अपन उत्सुकता शान्त कऽ लिए ? एहि सँ बढ़ियाँ अवसर आब कहिया भेटत ? बाबुजी हरेक समय कहैत छथि जे हमर बुद्धि बड़ तेज अछि । हमरा चिकित्सक बनएबाक इच्छा छन्हि हुनक । एखने सँ एकर घरमे तैयारी भऽ रहल छैक । घरमे माय नहि अछि तऽ की
बाबूजी आ भैया तऽ छथि घरमे पुस्तकालय अछि । सिनेमा देखबाक, उपन्यास पढ़यक छूट नहि अछि । टीभी कार्यक्रम सेहो गिनल—चुनल देखबाक अवसर भेटैत अछि ।
आगाँ बढ़क अछि तऽ एकाग्रचित भऽ उद्देश्य पूर्तीक हेतु लगबाक अछि । हुनका सभकेँ अहि सँ बेसी अपेक्षा नहि अछि । ओ अपनामे मस्त किताब सँ सटल रहैत अछि ।
किछु दिन सँ एकटा शब्द बेर बेर ओकर मस्तिष्कमे हथौड़ी जकाँ बजैर रहल अछि — “की होइत छैक बलात्कार ?” किए बलात्कारक बाद लड़कीक आत्महत्या करय पडैÞत छैक, परिवार जन मुह नुकबैत रहैत अछि । एतेक सोचि ओकर बुद्धि हारि जाइत अछि । शब्दकोष छानि मारलौं, मुदा अर्थ नहि भेटल ,एहन कोन जबरदस्ती एहन कोन बल—प्रयोग ? किछु बुझबामे नहि आबि रहल छल । ई की छैक । ओकर उत्सुकताक अन्त नहि छलै । किए नहि आई सपना पूरा कऽ लिय ? ज्ञानो भेटि जाएत आ आत्महत्या सेहो नहि करय पड़त ।
तीन वर्ष पूर्व पड़ोसक रितू आन्टी ओकरा अपना घर लऽ गेल छल आ बहुत बैज्ञानिक ढंग सँ ओ ओकरा ‘फैक्ट टच लाईफ’ के विषयमे बतौने छलै । अचानक ओकरा सभकिछु नव लागि रहल छल जेना ओ जागि गेल हो । ओकरा किछु बेसी देखाई देबय लगल हो, किछु आवाज सुनाय लागल छल । किछु स्पष्ट बुझयमे आबय लागल छलै । मुदा बलात्कार शब्द मात्र एक रहस्य बनल रहल । से एकरा जानय—बुझयकें एहि सँ बढ़िया अवसर अओर की भऽ सकैत अछि ?
ड्राइवर उत्साह बढ़बैत पूछलक, “ कतय जाएक अछि बेटी ? आउ, बसि जाउ । आगा शहरमे छोड़ि देब । एतय कोसो तक कियो लोक नहि रहैत छैक ।
बहुत मुश्किल सँ जयन्ती किछु हिम्मत जुटा पौलक । ओ सोचय लागल किछु बाजय पड़त तऽ झूठ किए नहि .............। से बाजल— ‘बाट भुतिया गेल छी लिफ्ट दऽ दीअ ?’
“मुदा अहाँ एलौं कतय सँ ?”, घर सँ भागि कऽ एलौं । बिना किछु सोचने उतर देलक । फेर देखलक दूनु व्यक्तिक उत्सकुकता किछु शान्त भऽ गेल छल । से आगाँ बाजल— “ दिनभरि एहि सड़कपर चलैत रहल छलौं । जखन थाकि गेलौं तऽ एकटा गाछक जाड़िमे सूति रहलौं । एखन निन्न टुटल... बहुत डर... लागि रहल अछि । ”
“ से त ठीक अछि मुदा जएबाक कतय अछि ?” ड्राइवर पूछलक । एकर उत्तर ओकरा लग नहि छल । ओ चुप्प रहल । “ ठिक छै चलू, बैसू । शहर तक छोड़ि देब । ”
ओ सोचय लागल कि दूनु बीचमे बैसाक’ .... बाटभरि ओ हमरा सँ मजाक करत..... बलात्कार करत आ हमरा बलात्कार केना होइत छैक की होइत छैक, तकर जानकारी भेटि जाएत, मुदा से भेल नहि । दूनु सकुचि गेल आ ओकरा खिड़की लग बैसा देलक जयन्तीक डर भगावय के लेल ड्राइवर एकटा अभिभावक जकाँ ओकरा उपदेश देबय लागल । शहर पहुँचला पर पुलिस चौकी लग उतारैत ओकरा माथ पर हाथ फेरैत कहलक— घर चलि जाएब.... वैह अहांक अपन अछि..... अहाँकें नीक देखय वाला वैह सभ छथि..... ” कहि ट्रकमे सवार भऽ चलि गेल ।
पुलिसक विषयमे जयन्ती सेहो बहुत किछु सुनने आ पढ़ने छल । ओ सोचय लागल की एखनो किछु नहि विगड़ल । एखनो एतय काम बनि सकैत अछि । मुदा दूटा पुलिसकेँ देखि ओकर करेजक धुक धुक्की बढ़ि गेल, हाथ पाएर ठण्ढ़ा होबय लागल ।
“के छेँ.... की काम छौं ? ” “हम बाटे बिसरि गेलौं हएँ.... एतऽ बसि जाउ ?
दूनु पुलिस एक दोसर दिस देखय लागल ।
जयन्तीक हृदय धुक—धुक करय लागल
की शायद आब ओकर उत्कण्ठाक अन्त होबय लागल अछि । ओ भय सँ काँपय लागल ।
“ की नाम छौ तोहर ?
“रुना” बुद्धि एतेक सजग छलैक कि ओ अपन सही नाम तक नहि बतौलक ।
बापकेँ, नाम की छौ ? कतय रहैत छें ? की सोचै छें ? ओ ई सोचि कऽ एक के बाद दोसर फूसि बजैत गेल कि पता ई सपना नहि होअय...... सत्य मिलत ? ओ अपन प्रियजनक लेल कतेक लज्जाक कारण बनि जाएत । नहि—नहि स्वयं मरि जाएत, मुदा अपन परिवारजन्यकें कोनो हालतमे बेइज्जति नहि होबए देत ।
“ लगैत अछि कोनो अपराधी अछि”, एकटा पुलिस बाजल ।
एखने बन्द कऽ दू डण्डा पड़तै तँ सत्य अपने उगिल देत ।
“ नहि—नहि” डरे जयन्तीक कण्ठ अवरुद्ध भऽ गेलैक । किछु क्षण अपनाकें नियन्त्रित करैत बाजल, “ अपराधी होइतौं तँ स्वयं एतय अबितौ ? ९ कक्षाक विद्यार्थी छी । काका वकील छथि । हड़बड़ाहटमे एतेक सत्य ओकरा सँ बजा गेल छलै ।
“ लगैत अछि घर सँ भागि कऽ आएल अछि, “ दोसर पुलिस बाजल, “नवालिग अछि एतय बैसय देब ठीक नहि अछि । बिना बातक बतंगड़ भऽ सकैत अछि ।”
जयन्ती थकमकाइत नहुँए सँ बाजल— “हम घर नहि जायब” , कहऽ चाहि रहल छल हमरा सँग जे चाहैत छें से कऽ ले..... बलात्कार कऽ ले, मुदा नहि जानि ओकरा कोन संस्कार आबि कऽ ओकर मुह बन्न कऽ देलक ।
“राति कऽ हम तोरा एतय बिना महिला पुलिसके नहि राखि सकैत छियौ । या तऽ तोरा चौकी जाए पड़तौक वा फेर नजदीकक धर्मशालामे ।
बाँकी काल्हि देखबै । आगाँ की करबाक छैक”— एक पुलिस बाजल ।
जयन्ती चुपचाप धर्मशालामे आबि गेल । दोसर दिन कोनो तरहे जयन्ती धर्मशाला सँ निकलि आएल । जयन्ती आब एक साइकल लग ठाढ़ तीन युवक सँग गप्प कऽ रहल छल । तीनू ओकरा ललायित नजरि सँ घुरि रहल छल ।
जयन्ती सोझे प्रस्ताव रखलक, “हमरा अहाँ सिनेमा देखाएब?” ओ सभ किछु सोचैत एक दोसर दिस देखऽ लागल । ” कि वस्तु छैक?”
“विलाड़िक भागे सीक टूटल” दोसर हँसल ।
“ककरा सँग देखब” तेसर पुछलक । अहाँ तीनू के सँग” ओकर उत्तर छलैक ।
आउ हमरा साइकल पर बैसि रहु, ओहिमे सँ एक गोटे बाजल
जयन्ती कने झिझकैत संकोच सँ बाजल, ” जी नहि हम पयरे चलब, आ ओ सभ सिनेमा हाँल दिस बढ़ि गेल ।’
जखन तक सिनेमा शुरु नई भेल ताबत धरि शान्ति रहल । सिनेमा शुरु होइते मानू बिहारि आबि गेल । छीना झपटी शुरु भऽ गेल । ओ क्रमशः घबराहटिमे कखनो एकर तऽ कखनो ओकर हाथ हटबैत रहल । मुदा, अवस्था ओकर नियन्त्रण सँ बाहर होइत जा रहल छल । जखन एक हाथ ओकर सलवार दिस आ दोसर छाती दिस सरकय लागल तँ झट सँ ठाढ भऽ गेल । फेर ट्वाइलेट जएबाक अछि कहि, जल्दी सँ बाहर निकलि आएल । दूटा युवक सेहो पाछु लागि गेल । किछु देरक बाद बाहर निकलल आगाँ दूनु युवककेँ ठाढ़ देखलक । झट सँ फेर ट्वाइलेटमे घुसि गेल ।
आ सिनेमा समाप्त होएबाक प्रतिक्षा करय लागल । सिनेमा समाप्त होइते भीड़क लाभ उठा कोनो तरहे ओतय सँ भागि गेल । आब ओ घर घुमैत भीड़मे सँ एक छल । ओकरा पता छलै, कियो ओकरा ताकि रहल छै । भीड़मे अपनाकेँे नुकबैत अनजाने बाटमे ओ आगाँ बढैेत रहल । एखन तक ओ एक विचित्र भय सँ काँपि रहल छल, जेना कोनो चोरी कएने हो वा कोनो बड़का अपराध ।
सपना शायद सत्य भऽ गेल छल । ओ पूर्णरुपमे सत्यकेंँ झेलि रहल छल । स्वप्नक सुरक्षा नहि जानि कतय हेरा गेल छलैं । देखलक समीप मन्दिरमे आरती भऽ रहल छै । मन्दिरमे प्रवेश कएलक ओतय भीड़ छलै । ओहिमे ओ सम्मिलित भऽ गेल । भय सँ शरीर सुन्न भेल जाइत रहैक तएँ एकटा पायामे सटि कऽ आँखि बन्न कऽ लेलक ।
कखन आरती समाप्त भेल आ लोक चलि गेल जयन्तीकेँ पतो नहि चललै । आँखि खुजलै तऽ एकटा साधुकें अपना दिस घुरैत देखलक । कोनो स्वचालित यन्त्र जकाँ आगाँ बढ़ल आ हुनकर चरण स्पर्श कएलक । ओकर गरा अवरुद्ध भऽ गेल छलैक । किछु बाजब ओकरा बसक बात नहि छलैक ।
“ तोहर मनकाना पूरा हेतौ.............उठ धैर्य सँ काम ले” जयन्ती उठि कऽ ठाढ़ भेल । ओ साधुक आँखि दिस देखलक । एकटा विचित्र ज्वाला धधकि रहल छलै ओहि साधुक आँखिमे । साधु ओकरा अपना पाछा अएबाक हेतु कहलक आ यन्त्रवत् हुनकर पाछु—पाछु जाय लागल । हुनक पाछु चलि मन्दिरक प्राङ्गण पार करैत ओ एकटा कोठरीमे प्रवेश कएलक । भितर घुसिते’ द्वार अपने धड़ सँ बन्द भऽ गेल । ओ बन्न द्वारकेँ देखैत थकमका कऽ ठाढ़ भऽ गेल ।
“ चलि आ’ “ पलटि कऽ देखलक तँ भीतरक दोसर प्रवेश द्वार पर ठाढ़ साधु ओकरा कहि रहल छल । झिझकैत मोन सँ ओ दोसर द्वार पार कएलक तऽ ओहो धड़ाक दऽ अपने बन्न भऽ गेल । ओ डेरा कऽ, बन्न द्वार केँ देखय लागल ।
साधुक पुनः आदेशात्मक स्वर ओकरा कान सँ टकरएलै— “चलि आ” देखलक ओ आब भितर तेसर द्वार पर ठाढ़ छल । किछु क्षण ठाढ़ रहल ।
भक्तिपूर्ण विश्वास सँ पुनः ओ आगा बढ़ल । धड़ाक दऽ तेसरो द्वार बन्न भऽ गेल । आब साधु चारिम द्वार पर ठाढ़ ओकर प्रतीक्षा कऽ रहल छल । जयन्तीक डर सँ हृदय धड़कय लगलै, गर सुखि गेलै । पैर काँपय लगलै । ओ सिनेह सँ भरि गेल की साधुक भेषमे कतेको राक्षस घुमैत अछि, मुदा की करत..... बेसी सँ बेसी ओतबे करत ने, जकर जिज्ञासा सँ एतय धरि आएल छी ।से अपनाकेँ मजगुत कऽ द्वार पार कऽ गेल । । देखलक आगाँ एकटा आओर द्वार छल, जतय साधु ठाढ़ छल । केबाड़ लग सँ धूप जड़बाक सुगन्ध ओकर तनमनमे व्याप्त होबय लागल । एकटा छोटका दीप सेहो जरैत देखि रहल छल । मदहोश वातावरणमे ओकर तनमन शिथिल होइत बुझेलै ओतय ओकर बुद्धि सजग होइत जा रहल छल । ओकरा विश्वास होइत जा रहल छल कि एहि पाँचम द्वार केँ पार कएलाक बाद बाँकी सभद्वार ओकरा लेल सभदिनक लेल बन्द भऽ जाएत ।
“ आ तखन साधुक फेर ओहने आदेशात्मक स्वर सुनाए देलक । जयन्ती हुनकर बात जेना नई सुनने हो । ओकर प्रज्ञा ओतय सँ भगवाक आदेश दैत हो एहन अनुभूति होइते घुमल आ जाही बाटे’ आएल छल ओम्हरे भागय लागल ।”
ओ भगैत जा रहल छल अज्ञान सँ ज्ञान दिस ? शून्य दिस चेतना दिस ? जागरण दिस ? शायद ओकरा एकटा जानकारी भेट गेल छलै । नइ ई ठीक नई अछि ।
अचेतन मनमे सेहो किछु जन्मजात संस्कार एहन होइत अछि, जकर सीमाकेँं उल्लंघन स्वप्नमे सेहो सम्भव नहि अछि । शायद ओकरा जानकारी भऽ गेल छलै की स्वप्न अपन अनुभवक आधारभूत घटना पर केन्द्रित रहैत अछि । स्वप्न सँ अज्ञानताक नाश नहि होइत अछि, ज्ञान नहि भेटैत छैक ।


बिपिन झा
स्वातन्त्रोत्तरयुगीन संस्कृत साहित्यक संवर्द्धन मे मिथिलाक भूमिका।
भक्तत्राण परायणा भवभयाभावं समातन्वती, या देवीह सुदर्शनं नृपमणिं संरक्ष्य युद्दे खरे।
या चास्मै समुदात् स्वराज्यमखिलं स्वीयं हृतं शत्रुभिः, पायात् सा भुवनेश्वरी भगवती मां सर्वदा शर्मदा।
भारतीय ज्ञान परंपरा विचारक, ग्रन्थक आओर चिन्तकक निरन्तर अविच्छिन्न प्रवाहमयी धारा अछि जे दर्शन, साहित्य, तर्क, विज्ञान, धर्मशास्त्र आओर अन्यान्य ज्ञान-विधा से निर्मित होइत रहल अछि। एहि ज्ञान परंपरा कऽ समुन्नयन मे संस्कृत साहित्य आओर मैथिली साहित्य कऽ योगदान नितान्त महनीय अछि।
एहि लेख मे संस्कृत साहित्यक संवर्द्धन मऽ मिथिलाक की भूमिका रहल अछि एकर दिग्दर्शन करबाक प्रयास कयल जा रहल अछि। तहू मे मूलतः स्वातंत्रोत्तर युगीन संस्कृत साहित्यक संवर्द्धन मऽ मिथिलाक की भूमिका रहल अछि एकर विश्लेषण कयल जा रहल अछि। वस्तुतः एकटा लेखक माध्यम सँ सम्पूर्ण तथ्यक प्राकाशन सर्वथा कठिन अछि, अस्तु प्रतिनिधि अंश द्वारा कथनक पुष्टि करवाक प्रयास रहत। संस्कृतक की स्थिति छल प्राचीन मिथिला म ई त्ऽ एकटा उद्धरण सँ स्पषट भय जाइत अछि-
जगद्ध्रुवं स्याजगध्रुवं वा, कीडांगना यत्र गिरोगिरन्ति।
द्वारस्थ नीडाग्ङ्गसन्निरुद्ध, यानीहि तं मण्डन मिश्र धाम॥
संस्कृत साहित्यक समुन्नयन मे प्राचीन काल सँ मिथिला कऽ सहस्रशः मनीषि समर्पित रहल छथि । एहि मे- व्याकरणक क्षेत्र मे वार्त्तिककार वरुरुचि, भाषाविद् आओर साक्षात शेषावतार भगवान पतंजलि, दर्शनक क्षेत्र मे गौतम, कपिल, वाचस्पति मिश्र, ईश्वरक अस्तित्त्वप्रतिष्ठापक रूप मे प्रथित उदयनाचार्य, नव्यन्यायक प्रतिष्ठापक गंगेश उपाध्याय, उद्योतकर, पक्षधर मिश्र, अद्वैत वेदान्ती मण्डन मिश्र, विदुषी गार्गी, मैत्रेयी, भारती, धर्मशास्त्रक क्षेत्र मे लक्ष्मीधर, श्रीकर, हलायुध, भवदेव, श्रीधर,अनिरुद्ध, हरिहर, चन्द्रशेखर प्रभृति विसेश रूप सँ प्रथित छथि। काव्यक क्षेत्र मे विद्यापति जयदेव,मुरारि, भानुदत्त, शकर महनीय छथि।
अन्य विद्वान में महावैयाकरण पं० दीनबन्धु झा, पं० श्यामसुन्दर झा, पं० देवानन्द् झा, पं० तुलानन्द झा, पं०बुद्धिनाथ झा, पं०राधाकान्त झा, पं०वामदेव झा, पं० कामेश्वर झा, पं० वी० एन० झा, पं० शशिनाथ झा प्रभृति केँ नाम लेल जा सकैत अछि।
स्वातन्त्रोत्तर युग मे अनेकशः कवि अपन कृतिक माध्यम स्ँ संस्कृत साहित्य सुषमाक संवर्द्धन कयलथि। कतिपय कवि आओर हुनक कृति द्रष्टव्य अछि-
महाकाव्य :-
• पं० भवानीदत्त शर्मा सुरथचरितम्
• पं० रामचन्द्रमिश्र वैदेहीचरितम्
• पं० पशुपति झा नेपालसाम्राज्योदयम्
• पं० मतिनाथ मिश्र भार्गवविक्रमम्
• पं० कृपाकान्त ठाकुर आंजनेयचरितम्
• पं० रामकुमार सर्मा भरतचरितम्
खण्डकाव्य :-
• पं० जीवनाथ झा महेन्द्रप्रतापोदयम्
• पं० श्यामसुन्दर झा राजलक्ष्मीचरितम्
• पं० विष्णुकान्त झा राजेन्द्रवंशप्रशस्ति
• पं० रामचन्द्र मिश्र याज्ञासेनी
• पं० काशीनाथ मिश्र स्मरदहनमंजरी
• पं० रामजी ठाकुर वैदेहीपदांकनम्
• पं० हरिकान्त झा जम्मूकाश्मीरसुषमारत्नम्
अन्य प्रमुख काव्य:-
• पं० कविशेखर बद्रीनाथ झा काव्यकल्लोलिनी
• पं० आनन्द झा आनन्दमधुमन्दाकिनी
दृश्यकाव्य:-
• पं० तेजनाथ झा अयाचीनाटक
• पं० अच्युतानन्द झा विज्ञानमहिमा
• डा० नोदनाथ मिश्र मधुमालती
उक्त विवरण एकटा झलकमात्र अछि वस्तुतः तऽ एहि तरहें असंख्य रचना भेल अछि। अही संग संग ई कहब जरूरी अछि जे बहुतो विद्वान एहनो छलाह जे संस्कृत सं मैथिली पद्यानुवाद कय संस्कृतक संग संग मैथिली साहित्य कें समृद्द करबाक प्रयास मे आजीवन लागल रहला। अहे तरहक एकटा उदाहरण प्रस्तुत अछि पं० तुलानन्द झा कृत दुर्गासप्तशती चतुर्थ अध्यायक १ टा पद्या।
इन्द्रादि देव सभ मिलि करैछ हर्षें, रोमांच सुन्दर शरीर नुतो स्ववाक्यें।
दुर्गा प्रणाम-रत मस्तक नींक भावें, देवी कऽ मारल महिषासुर नाश भेनें॥
देवी जनीक सुबलें सभ व्याप्त विश्वे, सम्पूर्ण देवबल संघक कैल देहे।
अम्बा थिकीह सब देव महर्षि पूज्ये, प्रेमे नमी, सुभद ओ हमरा सभैकेँ
एवं प्रकारेण कहल जा सकैत अछि जे मिथिला सर्वथा सारस्वत साधना मे लीन रहैत संस्कृतक साहित्य सम्वर्द्धन में सतत योगदान दैत रहल अछि।

१.कुसुम ठाकुर- प्रत्यावर्तन आ २.हेमचन्द्र झा-साढ़े तीनो लाख

१.कुसुम ठाकुर
प्रत्यावर्तन (आगाँ)
ओना त एकटा कहबी छैक "जाबैत साँस ताबैत धरि आस " मुदा हमरा तs पूर्ण विश्वास छल जे लल्लन जी के किछु नहि होयतैन्ह मात्र किछु दिनक ग्रहक चक्कर छैक, तथापि चिन्ता तs होइते छल । हम इ कोना कही जे चिन्ता नहि होइत छल । हमारा सब केर वेल्लोर सs अयालक किछु मास बाद दादा जी (हमर ससुर) अयलाह। एक दिन दादा जी लल्लन जी सs गप्प करैत छलाह, हम दोसर कोठरी मे छलहुँ मुदा हुनकर सबहक गप्प ओहिना स्पष्ट सुनाई परैत छल । जहिना हम हिनक बिमारी के विषय मे गप्प करैत सुनालियैक ओहि घर मे रुकि गेलहुँ आ दादा जी आ लल्लन जी केर गप्प सुनय लगलहुँ । दादा जी हिनका सs कहैत छलाह "अहाँ चिंता जुनि करू अहाँ केर मात्र ग्रहक चक्कर अछि , हम बेबी बाबु सs अहाँक आ अपन टिपनि देखेलियैक अछि अहाँके किछु कष्ट अवश्य अछि मुदा हमरा पुत्र शोक नहि अछि "। इ सुनी लल्लन जी आ दादा जी केर मुख मंडल पर आबय वाला भाव तs हम नहि देखी सकलियैक मुदा कल्पना अवश्य केलहुँ । खास कs लल्लन जी केर जिनका हम खूब नीक सs चिन्हैत छलियैक । हम आगू नहि सुनी सकलियैक आ ओहि ठाम सs चलि गेलहुँ । मनुष्य कतेक विवश होइत छैक ?


दादा जी अपन इच्छा हिनका लग व्यक्त कयने रहथि जे हुनक इच्छा छलैन्ह जे हुनक बेटा सब सेहो मधुबनी मे घर बनाबथि , हमरा एक बेर लल्लन जी इ बात कहने छलाह । दादा जी जमशेदपुर सँ गेलाक किछुए दिन बाद एकटा चिट्ठी पठौलथि जाहि मे लिखने छलाह जे ओ मधुबनी मे मकानक लेल जमीन देखि रहल छथि संगहि गाम पर सेहो एकटा जमीन छैक आ हुनक इच्छा छैन्ह जे ओ जमीन लल्लन जी लs लेथि । चिट्ठी अयलाक किछुए दिन बाद दादा जी केर दोसर चिट्ठी अयलैन्ह जाहि मे ओ लल्लन जी के पाई लs कs गाम वाला जमीन रजिस्ट्री कराबय लेल आबय के लेल लिखने छलाह संगहि एकटा मधुबनी मे मकान लेल नीक जमीन छलैक सेहो लिखने छलाह । लल्लन जी मधुबनी गेलाह आ गामक जमीन रजिस्ट्री करा लेलथि संगहि हुनका मधुबनी वाला जमीन सेहो पसीन आबि गेलैन्ह आ ओहि जमीन वाला सँ सेहो गप्प करि कs आबि गेलाह । किछु दिन बाद पाई केर इंतजाम करि कs दादा जी केर पठा देलथिन्ह आ दादा जी केर जमीन रजिस्ट्री कराबय लेल कहि देलथिन्ह । हमरा कहलाह "ओना तs हमरो इच्छा नहि छल मधुबनी मे मकान बनेबाक, मुदा दादा कहि देलाह तs हुनकर इ इच्छा अवश्य पूरा होयतैन्ह "।


लल्लन जी केर सोचब सच मे ठीक छलैन्ह, जमीन किनला के बाद सs दादा जी बड खुश रहैत छलाह । Tisco सँ घर बनेबाक लेल क़र्ज़ (loan) भेटय मे किछु समय लागि गेलैक । ता धरि दादा जी नींव दियेबाक सबटा दिन देखवा लेलाह । नींव देलाक सँग घर बनय लगलैक हम दुनु गोटे सँग मे पंडित जी सेहो मधुबनी घर बनेबाक लेल गेल छलहुँ । पता नहि कोन धुन छलैन्ह आ की सोचय छलाह मुदा हम सब जे सोचि कs घर बनाबय लेल गेल रही ताहि सँ बेसी नीक घर बनि गेलैक । एक तs अपने" सिविल इंजिनियर " मकानक सबटा नक्सा अपने बनने छलाह आ दुनु गोटे ठाढ़ रहैत छलहुँ तs किछु नय किछु अपन सुविधाक ध्यान आबिये जाइत छल । मिला जुला कs हमरा सबहक हिसाबे जतबा मकान मद मे लगबाक चाहि ओहि सँ बहुत बेसी भs गेलैक मुदा कोनो वस्तु मे हम सब कटौती नहि केलियैक सब सामन नीके लगायल गेलैक। बेसी सामन तs जमशेदपुर सँ ट्रक सs किनि कs पठायल गेल छलैक । मकान बनैत छल ओहि समय मे कखनहु कs हमरा मोन मे होइत छल जे बेकार मे एतेक खर्च कs रहल छियैक मकान केर पाछू मुदा हिनका नहि कहि पाबियैन्ह । मकान बनय मे तs ओना छौ मास लागि गेलैक मुदा दो मास लगातार हम , लल्लन जी आ पंडित जी (जे हमर बेटे सन छथि ) तीनू गोटे छलहुँ ओहि केर बाद बीच बीच मे हम आ लल्लन जी अबियैक आ किछु दिन रहि चलि जाइत छलियैक मुदा पंडित जी छौ मास धरि लगातार रहलाह आ मकान बनि गेलाक बादे जमशेदपुर आपस गेलाह ।


खैर छौ मास मे मकान बनि कs तैयार भs गेलैक । गृह प्रवेशक दिन देखा कs गृह प्रवेश सेहो खूब धूम धाम सँ भेलैक । गृह प्रवेशक किछुए दिन बाद हमर देवर केर विवाह छलैन्ह जाहि मे लल्लन जी बड उत्साहित छलाह आ विवाह सेहो नीक सँ संपन्न भेलैक । गृह प्रवेश सँ विवाह धरि ओहि बेर हम सब करीब एक मास मधुबनी मे रही आ अपन ओहि मकान मे छलहुँ मुदा एकटा प्रसन्नता होइत छैक, से पता नहि कियैक हमरा भीतर सँ नहि होइत छल। इ भावी दुखक संकेत छल कि की, नहि जानि ।
लल्लन जी हमरा सs किछु नहि नुकाबय छलाह आ नहि हम हुनका कोनो काज मे बाधा दियैन्ह आ कि मना करियैन्ह। हुनका मोन मे अपन माँ पिता जी भाई बहिन के प्रति अपार स्नेह छलैन्ह । माँ केर तs ओ परम भक्त छलाह , माँ किछु कहि देथिन्ह तs हुनकर प्रयास रहैत छलैन्ह जे ओ ओकरा अवश्य पूरा करैथ मुदा एहेन विडम्बना जे हुनकर बीमारी के विषय मे हम माँ के नहि कहि सकलियैन्ह। माँ के मात्र एतवा बुझल छलैन्ह जे लल्लन जी केर बेर बेर बुखार भs जाइत छैन्ह ।

मनुष्य जखैन्ह दुःख मे रहैत अछि तs ओकरा भगवान छोरि और किछु मोन नहि रहैत छैक । ओ अपन दुःख मे ततेक नहि ओझरायल रहैत छैक जे आन किछु सोचबाक ओकरा फुर्सत नहि भेंटैत छैक । लल्लन जी सन व्यक्तित्व केर बाते किछु आओर होइत छैक । अपने बीमार छलाह मुदा दोसर केर विषय मे सदिखैन सोचैत रहैत छलाह । कखनहु कs हुनक एहि तरहक सोच देखि हमहु बिसरि जायत छलहुँ जे ओ बीमार छथि मुदा एहेन कोनो दिन नहि होइत छलैक जे हम राति मे हुनका विषय मे नहि सोचैत छलहुँ । हमर तs जेना नींद उरि गेल छल , राति या तs टक टकी लगा कs बितैत छल या नहि तs नोर बहा कs । दोसर तरफ़ मुँह कs हम भरि राति कानैत रहि जाइत छलहुँ। एक तs लल्लन जी बीमार छलाह दोसर हम एहि विषय मे किनको सs नहि कहने रहियैन्ह आ नहि हम ओकर चर्च करैत छलहुँ खास कs बच्चा सब लग तs एकदम नहि । सब सs कष्टप्रद छलs जे हमरा दुनु गोटे के सबटा बुझल छल मुदा हम सब एक दुसरा संग सेहो कखनो एहि विषय पर गप्प नहीं करैत छलियैक । की गप्प करितियैक , कोना करितियैक मुदा एक दिन लल्लन जी केर मुँह सs निकलिए गेलैन्ह आ हमरा पुछि देलाह ।


हमरा ओहिना मोन अछि, हमर मंगल व्रत छल साँझ मे खेलाक बाद हमर माथ घुमय छल हम बिछौना पर आबि कs परल रही लल्लन जी टीवी देखय छलाह किछुए समय बाद ओहो आबि कs हमरा बगल मे परि रहलाह । इ देखि पता नहि हमर मोन आओर बेचैन भs गेल हम मुँह झाँपि कs दोसर दिस घुमि गेलहुँ । ओहि घर मे मात्र हम दुनु गोटे छलहुँ । अचानक लल्लन जीक आवाज कान मे आयल "किछु होइत अछि की , आकि फेर माथ घूमि रहल अछि" । हम किछु नहि बजलियैन्ह , हम ऐना परल छलहुँ जेना हम सुतल रहि , मुदा ओ तs हमर एक एक टा मोनक गप्प बुझैत छलाह तुरन्त कहलाह हम सब बुझैत छी अहाँक मोनक गप्प , मुदा हमरा बाद अहाँ की करब"? बस एतबहि बजलाह आ चुप भs गेलाह । इ सुनतहि हमर माथ जेना सुन्न भs गेल , हमरा किछु नहि फुरायल आ नहि किछु बाजि भेल मुदा हमर आँखि सs नोर ढब ढब खसय लागल आ ओ रुकय के नाम नहि लैत छल । ओहि राति हम पहिल बेर लल्लन जी के सोंझाँ मे हुनका बीमार भेलाक बाद कानल छलहुँ आ भरि राति कानैत रहि गेलहुँ । लल्लन जी केर सेहो एतबा हिम्मत नहि छलैन्ह जे हमरा चुप्प करबितथि ।

२.हेमचन्द्र झा
कथा

साढ़े तीनो लाख


“ अपने तीन भाई छी, तँ कम सँ कम साढ़े तीनो लाख तँ गनबै"विदेसर बाबूक ई वाक्य जेना रमणक हदय पर ब्रजाघात के देलक । हुनक मूँहक बकार बन्नँ भऽ गेलनि । पछिला छह महीना तँ जाहि कथाक पाछू पड़ल छलाह, तकर आश ई पाँती तोड़ि देलकनि । एहूठाम कुटमैती नहि भऽ पेबाक पीड़ा हुनका चेहरा पर साफ देखाई दऽ रहल छलनि । आब रमणक लेल एहिठाम एको मिनट काटब पहाड़ छलनि । जेना-तेना आगूक कपमे बाँचल चाह ओ समाप्त केलनि आ ओहिठाम सँ चलबाक उपक्रम करय लगलाह । हुनक मोन मे झंझावातक प्रवाह चलिये रहल छल । बेर-बेर ओ झंझावात जेना जीह धरि आबि के रूकि जाईत छल । रमण बाबू कन्यागत छलाह] रें प्राय: बजबाक हक नहि छलनि हुनका । किछु बाजि ओ अपन-अपन मोन हल्लुक करय चाहैत छलाह । तथापि बात जेना मोन सँ जीह पर आबि अटकि जाईत छलनि ।
तथापि एहि झंझवात मे मोन तँ ई कहिये देखकनि जे काज तँ नहिये भेलौ,तहन चुप्प किएक छें ? जे बजबाक छौ से बाजि दही आ मोनक भरास निकालि ले । एहि उहापोह मे ५-१० मिनट आर बीति गेल । तथापि अंततः चुप्पी के तोड़ैत रमण बजलाह “ हमरा पहिने सँ शंका छल जे अपने दहेज वला गप्प उठेबे करबै आ तें हम पहिनहि अहाँ ओहिठाम नहि आबय चाहैत छलहुँ । हमरा अपन आर्थिक सीमा ज्ञात अछि आ हम बुझैत छलहुँ जे अहाँ एहिठाम कुटमैती मे नहि सकब । तथापि अपने के हमर बचिया पसिन छल आ अहीं काज पर विशेष जोर द’ क’ हमरा बजौने छलहुँ । आ तें हम आयल रही । तथापि पाईवला गप्प अपने उठाइये देलियैक । एहि संबंध मे हम एतबे कहब जे धरौआ गनबाक सामर्थ्य हमरा मे नहि अछि । तथापि अपन बेटीक बियाह मे जतय धरि भऽ सकत करब । ताहि शर्त पर जँ अपने कें कथा मंजूर हो तँ बेस, नहि तँ आज्ञा देल जाऊ । ”
रमणक बातक तत्काल कोनो जवाब नहि द’ सकलाह विदेसर बाबू । हुनक माथ झुकि गेलनि । एकबेर फेर वातावरण मे चुप्पी पसरि गेल । एही चुप्पीक मध्य रमण बाबू नमस्कार पातीक बाद ओहिठाम सँ विदा भ’ गेलाह ।
रमण दिल्ली महानगर मे एकाउन्टेन्टक एकटा छोट-छीन नोकरी करैत छला । पाँच गोटाक परिवार छलैक । दूटा जेठ बचिया आ सभ सँ छोट बचवा । पहिल कन्यादानक चक्कबर मे साल भरि सँ घूमि रहल छला । कतहु बर पसंद होई तँ घर नहि । जतय दुनू पसंद होई ततय नकदी सुनि चुप्पे वापिस भ’ जाय । तथापि एहिठाम उम्मीद रहैक जे काज पटि जायत । कारण काजक शुभारंभ विदेसर बाबू स्वयं कयने रहथि ।
विदेसर बाबू सेनाक सिविल ड्‌यूटी मे अधिकारी वर्ग सँ इलाहाबाद सँ रिटायर भेल छलाह । अपन दू पुत्रक संग दिल्लीए मे निवास करैत छलाह । गाम-घरक सम्पन्न लोक छलाह । गाम पर खेत-पथार सहित घर-आँगन सभ किछु व्यवस्थित छलनि । जेठ पुत्र निजी क्षेत्रक कोनो कंपनी मे नीक पद पर कार्यरत छलनि आ छोट पुत्र स्व-रोजगार मे लागल छलनि । घरे लग एकटा कॉस्मेटिक्सक दोकान खोलने छलाह । वस्तुतः हिनके बियाहक लेल एकटा नीक पारिवारिक लड़कीक तलाश छलनि विदेसर बाबू कें ।
प्रभात रमणक ममियौत विदेसर बाबूक पड़ोस मे रहैत छलाह । प्रभात एखन अध्ययनरत छलाह आ यदा-कदा विदेसर बाबू ओहिठाम गेल करथि । गप्प-शप्पक क्रम मे विदेसर बाबू हुनका सँ अपन पुत्रक बियाहक बात कहलथि । विदेसर बाबू कहलाह जे हमरा घरेलू काज मे दक्ष, सुन्नबर आ कनेक पढ़ल-लिखल कन्या चाही । प्रभातक ध्यान तत्काल रमणक जेठकी बचिया पर गेल आ ओ बिदेसर बाबू कें एहि संबंध मे विस्तार सँ बता देलनि । संगहि प्रभात ईहो स्पष्ट क’ देलक जे हमर पिसियौत रमण बाबू अहाँ मे सकताह नहि आ तें यदि पाई-कैड़ी वला गप्प रखबैक तँ ओ काज नहि क’ सकताह ।
प्रभात अगिला रवि के रमणक डेरा पर पहुँचलाह आ प्रस्तावक संबंध मे रमण कें कहलनि । रमण के प्रस्ताव नीक लगलनि आ तें ओ अपन बचियाक फोटो आदि प्रभात के द’ देलनि । संगहि रमण ईहो कहलाह जे हमरा जहाँ धरि होयत हम गानब, तथापि हुनका हैसियतक अनुसार हम नहिं सकब से स्पष्ट कहि दैत छियह । तें पहिने हुनका सँ पाईवला गप्प खुलबा लीह आ तखने गप्प आगू बढ़बियबह ।
रमणक गप्प मे अपन स्वीकारोक्तिा दैत प्रभात फोटो आहि लेलक आ अपन डेरा पर वापस आबि गेल । किछु दिनक बाद बिदेसर बाबू सँ फेर ओकर भेंट भेलैक आ बिदेसर बाबू फेर पूछि देलथिन्ह कथाक प्रसंग । एहि बेर प्रभात स्पष्ट कहलकनि जे हम कथाक प्रसंग अपन पिसियौत सँ गप्प केलहुँ अछि, परन्तु चूँकि ओ अहाँक हैसियत मे नहि सकताह, तें कहलनि अछि जे अहाँ अपन डिमांड स्पष्ट रूप सँ बता दियौ, ताकि तदनुसार ओ आगू विचार करताह ।
“ डिमांडक कोनो एहन बात नहि छैक । हुनका चिंता नहि करय कहियौन । हमरा हुनक बचिया पसंद अछि । हुनका कहियौन जे हमरा भेंट करथि ।” - विदेसर बाबू कहलाह । तत्पश्चाहत प्रभात शीघ्रे रमण कें फोन केलकनि आ अगिले रवि दिन विदेसर बाबू ओहिठाम जेबाक प्रोग्राम तय भ’ गेल । चूँकि रमण एहि बेर आशान्वित छल, तें संग मे अपन जेठ भाय विनोद या छोट भाय महेश के सेहो ल’ लेलक । अपने तीनू भाई रमण आ प्रभात सहित चारि गोटा कोना जाईत तें रमण अपन पितियौत विनय के सेहो संग क’ लेलनि आ दू बजे दिन धरि विदेसर बाबू ओहिठाम पहुँचि गेलाह ।
तथापि विदेसर बाबू ओहिठाम पहुँचबा सँ पूर्व सभ कियो प्रभातक डेरा पर जमा भेलाह आ पहिने अपना मे विचार-विमर्श केलाह । विनोद रमण सँ पुछलनि जे एहि कनेदान मे तोहर कतेक बजट छौक । रमण कहलाह जे हम एक सँ सवा लाख गानब आ आगू बरियाती खर्च, दुरागमन आदि सभ तें छैके । विचार-विमर्शक बाद सभ कियो विदेसर बाबू ओहिठाम हाजिर भेलाह ।
मिथिलाक पारंपरिक रीतिए विदेसर बाबू सभक स्वागत केलनि । नमस्कार पाती समाप्त भेलाक बाद परिचय पात भेल । दुनू पक्ष एक-दोसर के विस्तार सँ अपन परिचय देलनि । फेर गाम घरक स्था-पातक गप्प भेल । किछु इलाहाबादक नोकरीक गप्प सेहो भेल आ पटना मे जमीन लेबाक गप्प सेहो उठल । गोत्र-मूल आदि सहित वर्तमान मँहगाई, नोकरिहाराक समस्या मिथिलाक बाढ़ि, राजनीतिक घटना-चक्र आ गाम-घर मे दिन-दिन घटल जाईत धान-पानिक मुद्दा पर सेहो विचारक आदान-प्रदान भेल । कन्यागत दिस सँ लारव निवेदनक बादो बिदेसर बाबू-पाईवाला गप्प ओहू दिन नहि बजबाह । एवं-क्रमेण चारि बाजि गेल । सभा-तोड़बाक समय सेहो भेल । अपन पाईवला गप्प तँ बिदेसर बाबू नहिये बजलाह, तथापि कन्यागत सँ जरूर खुलाबय चाहलाह । आखिर दुनू पक्ष दिस सँ पाईवला गप्प नहि निकलल ।
अंत मे सभा के समाप्ति दिस ल’ जाईत विदेसर बाबू बजलाह-‘तहन अहाँ लोकनिक की विचार भेल । चूँकि पाईवला गप्प एखनहुँ अस्पष्ट छल तें विनोद ई कहैत सभा समाप्त केलाह जे हम सभ पहिने लड़का देखि लैत छियैक आ तत्पश्चापत्‌ विचार-विमर्शक उपरांत अपने सँ फेर भेंट हेतैक ।
पाँचो गोटा कन्यागत विदेसर बाबू आ हुनक जेठ बालकक संग लड़का कें देखबाक लेल दोकान पर पहुँचलाह । लड़का के देखि हुनका सँ कनेक काल गप्प केलाक बाद सभ गोटे ओतय सँ चलि देलाह । बस स्टेण्ड धरि विदेसर बाबू अरियातय एलाह । नमस्कार-पातीक औपचारिकताक बाद विदेसर बाबू वापस भेलाह आ फेर सभ कियो प्रभातक डेरा पर जमा भेलाह ।
तीनू भाई रमं अपन पितिऔत आ ममिऔतक संग एहि पर फेर विचार केलनि । अंततः इ निर्णय भेल जे प्रभात भौजी के आनि कें लड़का देखा देथुन, एहि रूपें जे एहिठामक लोक वा लड़का नहि बूझि सकथि । जँ भौजी (लड़कीक माय) कें लड़का पसन्द हेतैन तँ अगिला रवि दिन रमण स्वयं असगरे विदेसर बाबू सँ भेंट करथि आ हुनका समक्ष आदर्श कथा कऽ लेबाक प्रस्ताव राखथि । आ तत्पश्चा त्‌ जँ पाई-कौड़ीक गप्प उठैक तँ अपन अधिकतम सामर्थ्य एक-सवा लाख बता देथि ।
तदनुसार बीच्चे मे एक दिन प्रभात आयल आ भौजी के ल’ क’ लड़का देखेबाक लेल गेल । भौजी कें लड़का पसन्द पड़लनि आ तें रमण अपन पूर्व निर्धारित कार्यक्रमक अनुसार अगिला रवि कें विदेसर बाबू ओहिठाम पहुँचलाह । थोड़े काल एम्हर-ओम्हर के गप्प भेलैक आ एही क्रम मे रमण आदर्श कथा क’ लेबाक प्रस्ताव विदेसर बाबु लग रखलनि । संगहि इहो कहलनि जे हमर बेटीक वियाह थिक, तें अपन सामर्थ्यक अनुसार गोर लगाई कहि जहाँ धरि भ’ सकत नगदीक व्यवस्था करब ।
रमणक एहि प्रस्तावक तत्काल उत्तर नहि द’ सकलाह विदेसर बाबू । नगद टाका छुटैत देखि हुनक पहिलुका सभटा आदर्श धयले रहि गेल । अपन कहलाहा सभटा गप्प जेना विदेसर बाबू के मोन पड़ि गेलनि । हुनक वाक्‌ बन्न। भ’ गेलनि । कन्यागत सँ एहन आशा नहि रहनि । हुनका मोन मे वस्तुतः की रहनि से सँ ओएह बुझथि,परंतु चेहराक भाव बता रहल छलनि जे ओ एहन भारी घाटा नहि सहि सकैत छथि । वातावरण मे कनेक कालक लेल चुप्पी पसरि गेल ।
रमण सँ ५ मिनटक समय ल’ क’ विदेसर बाबू घरक भीतर गेलाह । ता धरि रमण शांत-चित्त बैसस रहल । विदेसर बाबू कनिये काल मे वापस भेलाह आ बजलाह - “अपने तीन भाई छी नोकरी मे, कम सँ कम साढ़े तीनों लाख तँ गनबे करबैक” । बिदेसर बाबूक ई वाक्य पछिला छह महीना सँ जोड़ल गेल कथा-सूत्र कें समाप्त क’देलक ।

१.अमन कुमार झा , २. मनोज झा मुक्ति
आ ३.३.-गोपाल प्रसाद -हिंदी ,मैथिली , मिथिला , बिहार ओ मैथिल लोकनि सं अपेक्षा

१.अमन कुमार झा - काठमाण्डू

२०६६।०७।१४गते शनिदिन, काठमाण्डूै । आइ तराइ रिर्पोटर क्ल वक आयोजनामे एक“संचार सहकार्य तथा बिकासको निम्तिम संचार सम्बाेद” नामक बिचार गोष्ठिइक आयोजना कएल गेल । जाहिकें आयोजक युनिर्भसल टाइम्सो रहल एहि कार्यक्रक सभापत्तिक आशन ग्रहन तराइ रिर्पोटर क्लावक अध्यठक्ष ई. कामेश्वयर प्रसाद शाह आ अतिथी युनिर्भसल टाइम्सरके सम्पा दक श्री राम मनोहर पन्थ‍ छलैथ । डा. रपोवर्ट टितलक प्रमुख आतिथ्यीके भेल एहि कार्यक्रममे ओ समाजिक आ मानवीय सम्बोन्ध‍पर जोर देने छलाह । बिभिन्न वक्ता सभ संचार क्षेत्रमे भऽरहल अपराध तथा मधेशक मुदा पर जोर देने छलाह । एहि क्रमे मैथिली साहित्यरकार श्री सन्तो ष कुमार मिश्र झूठ समाचार लिखनिहार पत्रकारके सजायक ब्य्वस्थाि होवाक चाहि कहलनि ।

२. — मनोज झा मुक्ति
महोत्तरीक मालपोतमे कर्मचारी मालामाल( के करत कारवाही ?)

देश पूर्णतया भ्रष्टामचारक दलदलमे जकड़ागेल अछि । नेपालकलेल भ्रष्टायचार कोनो नयाँ बात नहिं अछि, मुदा जन आन्दोालन दूक बाद देशमे भ्रष्टा चारक बाढ़िए जकाँ आबिगेल अछि । भ्रष्टा चारक एहि बाढ़िमे कर्मचारीसब मालामाल भऽ रहल अछि । ओना व्या पारी, पत्रकार, नेता आ देशक प्रायः निकाय एहि सँ अछुत नहिं रहल अछि,जेकरा जतऽ भेटैत अछि ओतहि लुटऽमे लागल अछि । भ्रष्टााचारक एहि बाढ़िमे बहुत मुश्किहलसँ एकाध गोटे इमान्दा र मनुख्खट भेटत, जकरा आजुक भ्रष्टाढचारक माहौलमे बुड़िबकके संज्ञा भेटैत अछि ।
मधेश आन्दो लनकबाद मधेशमे जौं सभसँ बेसी फाइदा भेटल अछि त मधेशी कर्मचारीके । मधेशीक नामपर ओसब ब्रम्हेलुट मचौने अछि । मधेश आन्दो लन आ तकराबादसँ दिनदुगुन्ना आ राति चौगुन्ना क हिंसावसँ खुजल शसस्त्र समूहक डरसँ मधेशक कार्यालयमे रहल अधिकांश पहाड़ी मूलक कर्मचारी अपन अपन सरुवा कराबिलेलक आ मधेशक कार्यालय सबमे स्था निय मधेशी मूलक कर्मचारीके भ्रष्टाीचारक नदि समुद्रमे परिणत भऽगेल । मधेशक कार्यालय सबहक हालति एतेक नाजुक भऽगेल अछि कि कर्मचारी खुलेआम घुस माँगिरहल अछि आ केओ किछु कहऽ नहि सकैया । कोनो जनता जौं किछु कहओ त कोनो ने कोनो दलक नेता आ ओहि कर्मचारीक अपन जातिपातिक लोक लाठी उठालैत अछि, जे भ्रष्टादचारक खेतीमे मलजलक काज कऽ रहल अछि । किछु जनता त घुस द कऽ आओर एकरा बढावा दऽ रहल अछि जल्दीे जल्दीट काज करेबाकलेल/अनैतिक काज करेबाकलेल, त अधिकांश जनता घुस देबाकलेल बाध्या भऽगेल अछि ।
भ्रष्टाछचार कतेक चरम सीमापर पहुँच गेल अछि आ कोना खुलेआम भऽ रहल अछि तकर एकगोट उदाहरण महोत्तरी जिल्लारक जलेश्वपर स्थि त मालपोत कार्यालयक रवैयासँ देखल जाऽसकैय ।
मधेशमे रहल महोत्तरी जिल्लाकक मालपोत कार्यालय सेहो मधेश आन्दोयलनकवाद मधेशी कर्मचारीद्वारा खुलेआम लुटारहल अछि । मधेश आन्दोहलन पश्चाेत महोत्तरीक मालपोत कार्यालय कामचलाउ रुपमे एकटा सुव्बाचके सहारे चलि रहल अछि, ओहिना जेना ‘राम भरोसे हिन्दू होटल’ । अखन महोत्तरी मालपोतक हाकिम बनल छथि मधेशीक नामपर मधेशीके लुटनिहार, कानूनी ज्ञानसँ अनभिज्ञ, कहुनाक सुव्बाक बनल लाल देव राय । जे जनता पाइ नहि दैत अछि तकरा एतेक ने नियम कानून देखवऽ लगैत छथिन्हि जे जनता परेशान भऽजाइत अछि । कहबी जे छैक ‘बन्दू क पकड़ा देलापर हवल्दाजर बनि जाइत छै’ सैह बातक प्रत्यदक्ष उदाहरण बनल छथि —लाल देव राय । मधेशीक नामपर हाकिम बनल कानूनक ‘क’ अक्षर नईं जनने आ पैघ कानुञ्चीवके दावा कएनिहार लाल देव रायके कानूनी सल्लाीहकार बनल अछि महोत्तरी मालपोतक खरिदार.......।
महोत्तरी जिल्लाी मालपोतमे घुसक वर्णन करैत गा.वि.स. हाथीलेटके युवा पिताम्व र महतो कहलनि,‘हम काज कराबऽ मालपोतमे गेलहु त काज एकदिनमे नहिं भेल । दोसर दिन जहन ११/१२ बजे गेलहुँ त काज भेलाकवाद कार्यालयक खरिदार पदमे कार्यरत कर्मचारी सुशील ठाकुर ‘ भोरे भेलाक नाते नीकेसँ बोहनी करेबाक लेल कहलथि ।’ एक्करहिटा सुशिल ठाकुर नहिं प्राय ः सब कर्मचारिक इहे रबैया ओतऽ देखवामे आओत ।
पंक्ति कार स्वकयं एकटा काज लऽ कऽ एभिन्यू ज महोत्तरी सम्वाेददाता कमलेश मण्डरलक संग महोत्तरीक मालपोतमे पहुँचल छल, एकटा कागज लेवाक छल हमरा सबके । जहन कागज भेटिगेल त ओतहिके कर्मचारी तेजनारायण झा अखनधरि बोहनी नहि भेल बात कहैत पाई मांगि बैसलाह । एतवे नहिं प्रायः सब टेबुलपर बिना बोहनी आ दक्षिणा देने कोनहुँ काज नहिं भऽ सकैय । कर्मचारीसब एनाकऽ पाइ मंगैत अछि जेना हूनक बाबु/बाबा पूँजी फँसाबिकऽ कोनो व्या पार/व्यइवसाय कऽदेने होय । किछु कर्मचारी त ‘हे एतवा कममे घाटा लागि जेतैक’ सन बात कहऽमे सेहो पाछा नई हटैत अछि । ई सऽब किछु जनितो सरकारी संयन्त्रे मौन अछि, किया त ओहो भ्रष्टामचारमे लिप्तत अछि ।
जखन एहि घुसक सन्दोर्भमे कार्यालयक प्रमुख बनल सुव्वाछ लाल देव राय सँ पुछलगेल त ओ कहलथि ‘ ई घुसक बात सर्वथा मिथ्यास अछि, अखनधरि केओ सिकायत नहिं केलक अछि । हम अपने सँ भरिदिनमे २ बेर निचा सँ उपर अनुगमन करैत छी । जौं घुस लैत देखि लेलियैक त हम अवश्यि कारवाही करबैक ।’ हूनका जहन हमसब अपनासबसँ माँगल बात कहलियैन त कहलथि,‘आहाँके तखने ने कहबाक चाही, अखन किया कहैत छी ।’
जलेश्वनर स्थिीत महोत्तरी मालपोतक प्राँगणमे एकगोट पागलसन भेषमे टहलैत मनुख्खाके देखवैत एकगोट लेखनदास नामनई लिखवाक शर्तपर कहलथि जे ‘काल्हित सातबजे रातिमे एहि पागलके जमिन हाकिमके पाइ खुवाबिकऽ दोसरगोटे अपना नामपर लिखबा लेलकैक ।’ ओ ई कहलथि जे लाल देव जी ठीके कहलथि जे हम २ बेर अपने नीचा उपर जाकऽ निरीक्षण करैत छी । ओ दूइए बेर नहि ५/७ वेर नीचा सँ उपर सभ रुममे चक्ककर लगवैत रहैत छथि जे साँझमे कोनो कर्मचारी ई नहि कहए जे हमरा आई कमे पाई भेल । ओ ई देखवालेल जाइत रहैत छथि जे ककरा टेवुलपर कतेक पाई झरि रहल अछि । कतौ हमरासँ बेइमानी त नहि भऽ रहल अछि ?
मधेशक कार्यालयसबमे मधेशी कर्मचारीके खुलेआम भ्रष्टाअचार रोकबाकलेल केओ तैयार नहि अछि । जे एक/दू गोटा एकर विरोध करैत अछि तकर काज नहिं भऽ सकैय । कानून निरीह बनल अछि, जौं आक्रोशित किछु युवा अधैर्य भऽकऽ ओहन कर्मचारीके पिटैत अछि त सम्पूार्ण कार्यालयक कर्मचारी लगायत देशव्यातपी रुपमे कर्मचारी सबहक आन्दोीलन शुरु भऽ जाइत अछि । कर्मचारी जाहि जातिक अछि ओ जातिक व्यवक्तिर/सँघ संस्थाप/नेता ओकरा पक्ष लऽ कऽ बाजब/नारा जुलुश करबाक शुरु कऽ दैत अछि ।
घुसक खेती कतेक बढ़ल अछि एकर अन्दााजा एकटा खरिदार/मुखिया/सुव्वार सनसन कर्मचारीके आलिशान महल देखिकऽ लगाओल जाऽसकैय । जहन कि मात्र नोकरीक भरोसे इमान्दाारिताक पाईसँ अपना सम्पूसर्ण जीवनक कमाईसँ एकटा अधिकृत या फस्टिक्लाकश अफिसर नीक दूतल्लाप घर अपना तलवसँ नहि बनावऽ सकैय । मुदा बाजत के ? आब देखबाक ई अछि जे के नेपाल मायक कोन बेटा आगा बढैत अछि भ्रष्टासचार आ भ्रष्टादचारीके समाप्ती क रास्तािपर....।

३.-गोपाल प्रसाद -हिंदी ,मैथिली , मिथिला , बिहार ओ मैथिल लोकनि सं अपेक्षा

हिंदी केर प्रचार - प्रसार ओ विकासक लेल केंद्रीय हिन्दी निदेशालय निरंतर प्रयासरत अछि| अपन विभिन्न महत्वपूर्ण योजना सभ आ कार्यक्रम सं हिन्दी कें वैश्विक धरातल पर प्रतिष्ठा दिलयबाक दिशामे सार्थक प्रयास क रहल अछि| निदेशालय द्वारा द्विभाषी,त्रिभाषी आ बहुभाषी कोष आ वार्तालाप पुस्तिका सभकें सीडी रूपमे पाठक लोकनि कें उपलब्ध कराओल गेल अछि |
अष्टम अनुसूचीमे शामिल प्रमुख भारतीय भाषा मैथिली सं सम्बंधित कोनो कार्यक्रम , मैथिली भाषी लोकनि कें हिन्दी सं जोड़वाक प्रक्रिया ,हिन्दी-मैथिली-अंग्रेजी कोष वा हिन्दी मैथिली वार्तालाप पुस्तिका केर प्रकाशनक हमारा एखन धरि जानकारी नहि अछि| केंद्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा कोनो संविधान प्रदत्त भारतीय भाषाक प्रति सौतेला व्यवहार की न्यायोचित अछि?
हम माय सीताक जन्मभूमि मिथिला क्षेत्रक दरभंगा जिलाक निवासी छी| दिल्ली मे विगत १२ वर्ष सं बेसी काल सं पत्रकारिता ओ साहित्य सृजनक संगहि संग एकटा आईटी कम्पनी ''नर्मदा क्रिएटिव प्रा. लि. द्वारा प्रकाशित ऑनलाइन हिन्दी मासिक पत्रिका "समय दर्पण " केर संपादकक रूपमे कार्यरत छी|पटना सं प्रकाशित मैथिली त्रैमासिक पत्रिका ' मिथिला महान " केर प्रबंध संपादकक रूप में सेहो योगदान देने छलहुँ | ओहि कालक्रम में प्रमुख लेखक/ कवि लोकनिक रचनाक संग -संग भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् सं प्रकाशित पत्रिका " गगनांचल" केर छ्टा आलेखक मैथिली अनुवाद सेहो कयलहुं |
" मिशन मिथिला " केर संयोजक केर रूप मे मिथिलाक सांस्कृतिक विरासतक संरक्षण -संवर्धन ओ मैथिली अस्मिताक भान करेनाई ओ जागरूकताक अभियान में प्रयासरत छी| किछु काल पूर्व मिशन मिथिलाक दिस सं केंद्रीय हिन्दी निदेशालय (दिल्ली ) , भारतीय भाषा संस्थान ( मैसूर), साहित्य अकादेमी आ मैथिली -भोजपुरी अकादेमी कें कएकटा मांग पत्र पठाओल गेल | मीडिया में सेहो काले काल मैथिली ओ मिथिलाक विकासक लेल प्रखर स्वर अनुगूंजित कयल गेल |
बिहार सरकार मैथिली क विकासमे बाधा उत्पन्न क रहल अछि | इंटरमीडीएटमे पहिने अनिवार्य भाषा क रूप मे मैथिली कें स्थान नहि भेटल मुदा बाद मे ऐच्छिक बिषय केर रूप मे शामिलकय एकर महत्त्व के समाप्त करबाक कुचक्र रचल गेल, जाहि सं अधिकांश छात्र मैथिली क पढाई सं बिमुख भ गेल| ग्याराहमक लेल सरकार द्वारा निर्धारित पोथीक जे नाम देल गेल ओकर प्रकाशन परीक्षा होयबाक मात्र तीन दिन पहिने बाजार मे उपलब्ध भेल जाहि सं बेसी कठिनाई भेल आ मैथिली विषय के घोर आघात लागल | बारहवीं क लेल "तिलकोर भाग-२" केर प्रकाशन सेहो बड्ड बाद मे भेल |इ पोथी नहि त छात्र लोकनि देखलक आ नहि त शिक्षक लोकनि देखलनि कियक त पोथी छपले नहि छल | फरवरी मे एकर परीक्षा भेल आ तखन इ पोथी बाजार मे उपलब्ध भेल | सम्पूर्ण बर्ष बीत गेल , फॉर्म भरल जा चुकल छल मुदा पोथी नहि रहबाक कारणे महाविद्यालय मे एकर पढौनी नहि भेल| एकरा संगे दोसरो पोथी जुडल अछि | बी. पी. एस. सी. पाठ्यक्रम सेहो मैथिलीक लेल उपयुक्त नहि अछि, जाहि मादे प्रश्नकर्ता आ छात्र दुनू के असुविधा भ रहल अछि | राजकमल चौधरी क " ललका पाग " छात्र लोकनि मात्र एकटा कथा ललका पाग पढ़य वा सम्पूर्ण पोथी पढ़य , एकर जिक्र कतहु नहि अछि | पोथीक उपलब्धताक कमी पूर्ण करबामे मैथिली अकादेमी ,साहित्य अकादेमी सक्षम नहि अछि |
यू. पी. एस . सी सेहो उटपटंगे अछि | महाकाव्य सम्पूर्ण होयबाक चाही | मात्र दत्तवती क दू टा सर्ग देबाक की तुक अछि ? जखन की एकर पाठ्यक्रम स्नातकोत्तर स्तरक होयबाक चाही , तीन चारिटा महाकाव्यक नाम होयबाक चाही , जाहि सं विद्यार्थी लोकनि कें छूट भेटय| बड्ड रास उच्च स्तरीय रचनाकार लोकनि कें स्थान नहि भेटल अछि , जकर पुर्नावलोकन अत्यावश्यक अछि |
यू.जी.सी., यू.पी.एस.सी. कें चाही जे सभ विश्वविद्यालय सभ सं मैथिली क शिक्षकक सूची उपलब्ध होबय जाहि सं बिषय सं सम्बंधित समस्या सभक त्वरित निदान भ सकय | स्नातक प्रथम सत्र मे कला, विज्ञान, वाणिज्य संकाय मे नीता झा केर कथा "बाय -बाय अंकल " कें स्थान द क देवशंकर नवीनक संपादकत्व मे एन.बी.टी. द्वारा प्रकाशित एक सय पचीस टाकाक दू टा पोथी पचास अंकक पढाई लेल बोझ डालल गेल एकर कियो विकल्प नहि देल गेल| प्रतिष्ठाक स्तर पर स्नातकोत्तर स्तरक पोथी राखल गेल अछि जखन की अन्य लेखक लोकनिक उच्च कोटिक पोथी उपलब्ध छल |
इग्नू, बी.पी.एस.सी., यू.पी.एस.सी., साहित्य अकादेमी , भारतीय भाषा संस्थान आ यू.जी.सी. केर मैथिलीक कमिटीमे एकटा विशेष कॉकस हाबी अछि | नाम गिनल चुनल अछि - भीमनाथ झा ,नीता झा , अमरजी, रामदेव झा , विद्यानाथ झा विदित,वीणा ठाकुर, अमरनाथ, विभूति आनंद, रमण झा | की ब्रह्मण वर्ग के अतिरिक्त मैथिली मे विद्वान् नहि अछि? दिल्ली केर मैथिली - भोजपुरी अकादेमी सेहो काईस्तवाद मे जकरल अछि| की ऐना मे मैथिली केर सर्वांगीण विकास होयत? प्रश्न इ अछि जे एकरामे कालक्रम अनुसार परिवर्तन कियक नहीं होयत अछि ? एहि लेल मैथिली सं जुडल सभ लोकनि कें जागय पडत |सभ सं नीक होयत जे मैथिलीक शिक्षा देनिहार वा जुडल सभ टा सरकारी वा गैरसरकारी संस्था ऑनलाइन भ जाय , कियक त जखन धरि मैथिली ,नव तकनीक इन्टरनेट सं नहीं जुड़त ओकर चुनौती बढ़बे करत |एहि लेल मैथिल संस्था सभ कें पुरान शैलीक स्थान पर नव राह पर चलय पडत|
(लेखक "मिशन मिथिला " केर संयोजक आ ऑनलाइन हिंदी मासिक पत्रिका "समय दर्पण " केर संपादक छथि)

१.कामिनी कामायनी- कथा समय कालआ २.अनमोल झा-लघुकथा- अधिकार

१. कामिनी कामायनी
कथा
समय काल
अईठ्ठ बासन . . .सब ओहिना बरांडा सए ल’क’ भनसा घर धरि पसरल छल । कुरसी इम्हर घूमल .टेबुल उम्हर घसकल. . . . बिछौन स’ ल’क’ बाहरि आंगन के मंडवा धरि नूआ फट्टा छिडिआएल. . . महाजुद्व के बाद रणभूमि क’ स्थिति सन दृश्य. . . . ।काकी क़त्तो नजरि नहि अयलीह. . . ।घरे घर . .. बाङी झाङी ताकि औला सत्तू भाय . .. . मुदा एकदम सूुन . .. . .कियो कत्तो नै .. . . . ।कनिए काल में गौरी बहरेली .. .पङोसिया के घर स’ । ‘दाय. . .काकी कत्त ्र. .? .।’ सत्तू भाए के देखि ओ कनि सकपका जेका गेल ।दङिभंगा मेडिकल कालेज में पढै छथि . . .कहियो काल क’ गाम आबि जायत छथि . . ..।अपन माय बाबूजी त’ हैदराबाद में रहैत छथिन . ..मझिला कका गामे में रहि गेलखिन्ह. . . ।काकी बङ सिनेह सॅ खुआबए पियाबए छथिन्ह . .आ’ जौं कियो बगलक शहरि लहेरियासराय जाए त’ एक दिन पहिने हुनका समाद द’ दैन्ह. . .आ’ ओ सत्तु के पसिन्न के खेनाय . . .कखनो रोहु माछ. . . कखनो मखानक खीर. ..कखनो टिकरी . . .पिङकिया ..बना बना क’ पठा दैथ ।. . . .. . . गौरी बेसी काल धकमकायल नहिं रहल. . .आ’ ऑखि सॅ भटभट नोर खसबैत पूबरिया टोल दिस हाथ उठा क’ बाजल ‘मॉ. ्््. .. हौआ .. .नैहर जा रहल अछि तमसा क’।’ रिक्शा दूरे सॅ देखाय पङि रहल छल ।सत्तू भायके गप्प बूझवा में विलंब नहि भेलन्हि . .. . .।ओ तीव्र गति सॅ दरवज्जा प’ अयला आ’ दूरखा मे लागल मंटुआ के सायकिल खींचैत रिक्शा के पछोङ धेला । ताबङतोङ पैडिल मारैत दुइए डेग प’ पकङि लेलखिन्ह रिक्शा के . . . ।काकी सन्न. .. ..ऑखि कानि कानि क’ अङहुल फूल सन लाल भेल . .. ।सत्तू काकी के किछु नहि कहि . . . रिक्शा बला के घुरौलथि . .. ।अपना खिङकी दरवज्जा सॅ हुलकी मारैत लोक़ . . ।
दलान .. .आंगन . . .टपैत . . .काकी चुपचाप सत्तू के पाछॉ चलैत . .. अपन कोठरी में आबि
पलंग प’ बैस रहली. . . .।गौरी के दू गिलास नेबो के शरबत बनाबय लेल कहि ओ काकी के पलंग ल’ग राखल एक गोट कुरसी के सोझ करैत बैस रहला “कत्तए जाए छलौं एना. ? . .बताहि भ’ गेलौं की . . .. .।
शरबत पीबि क’ काकी के शरीर में किछु जान सन बूझैलैन्ह. . . ..।ओ’ किछु बाजय चाहली . . .मुदा फेर कंठ अवरूद्व होमय लगलै आ आखर के स्थान प’ दुनु ऑखि सॅ नोर कोशकी के उन्मत्त धार सन फुटि पङलै. . . . .।आ’ ओ’ अपन ऑचरि सॅ मूॅह झापि करूण स्वर में क्रंदन करय लगली ।. .सत्तू किछु काल धरि हुनका ओहिना कानय देलथि. . . . . ।मोनक सबटा गर्द गुबार ....धुरि . . .माटि. . . मवाद बहि जाए लेल ।
ई परम सहिष्णु. . खटनिहारि स्त्री. . . कोनो लिख लोढा पढि पाथरि’ . . . गमार अठाहरम सदी के नहि छली .. . . जनक आर्मी सॅ रिटायर्ड. . ..अपन धीया पुता के नीक स्कूल देने छलथि . . ..।मुदा भाग्यक सोझा त’ विधाता सेहो नतमस्तक . .. ।विवाह एहेन पुरूष सॅ भेलन्हि . . ..जे प्राचीन कालक चारित्रिक दृष्टिकोण सॅ त’ बङ उत्तम . .. नहि चोर बनोङ . . .नहि लबरा लुच्चा . . .नहि कोनो जन्नी जाति के ताकब झॉकब
ने दारू . .. नै सिकरेट. . .. . म्ुादा. अपने दुनिया में ंमगन घर पेलवारक कोनो चिंता नै . ... .. छै. . सब किछु .. . पाय कौङी में कत्तय कोताहि करैत छथि. . . . .।हुनक परम यशस्वी पिता के ई फरमान . . ..जे आय धरि हुनक कुलक स्त्रीगण बाहरि नौकरी करय नहि गेली .. ओ कोना जेतीह .. . . ।एतेक दुरदिन त’ हमर नहि आबि गेल जे स्त्री के कमाई सॅ पेट भरल जेतैक़ . .. .त’ काकीके पढेबाक शौख मोनक कोनो कोन में दाबल रहि गेलन्हि ।
घर वर देख क’ . .. . नीक जकॉ पता लगा क’ विवाह भेल छलै .. . बेस व्यवस्था गिन क’ .. .खानदानी छलैथ. .. जमीन जायदाद छलैन्ह भाई सब आफीसर. . वर.. .
लग’क कओलेज में लेक्चरर छलाह. . .।देखबा में स्वस्थ. . . सुदर्शन . . .।आर कि देखैत छै कन्यागत. . .।
काकी एकटा बुधियारि . ..कमासुत आ’ आज्ञाकारी पुतौहक रूप में बङ प्रतिष्ठित भेल छलीह ।शनैः शनै कालक्रम में पेलवारक रूप बदलए लगलै . . .वृद्वजन अपन अंतहीन यात्र्रा के यात्रिक होईत गेलाह . .. ननदि . ..दियर सबहक अपन गिरहस्थी . . .. ।हुनक अपनो पेलवार में चारि टा धिया पुत्ता अवतीर्ण भ’ गेलखिन्ह. . . । म्ुादा पति ओहिना विरक्त. . .अहू जुग में भरि चुरू कङू तेल .. . माथ में चुभ चुभ करैत. . . . . धोती . . .मोटका खद्दरि के कुरता पहिरने . . .कॉख तरि छाता दबने अपन फटफटी सॅ कओलेज जायथि .. . ।आ’ बाकी समय अपन पढाय लिखाय पूजा पाठ . . .।
अहिना चलैत रहि जैते. . . जीवन त’ कोन खराप. . . . मुदा धिया पुत्ता लग पास क’ इसकूल ..कओलेज सॅ पढि जुवावस्था के दरवज्जा प ढाढ होमए के कोरसिस करैत. . . .बङ बङ स्वप्न ऑखि में नेने ..... ..अपन हिस्सा के अधिकार मांगय लेल पॉखि फङफङाबए .. .लगलै. . . तखन एक गोट धर्म संकट. .ठाढ़ . .. ।
कन्याक’ माय. . .कतेक रास .. .स्वप्न. . .संजोगने. बेटी के सिनुरदानक प्रतीक्षा में. . .देवता पितर के नौतनाए आरंभ करि देने छलीह।
पैघक विवाह हेतय तखन नै दोसरक बान्ह खुजतै . .. ।आ’ मोनक गप्प करए लेल बेकल . भ’ क’ पति ल’ग बैसथि त’ ओ मरखाह बरद जकॉ बिदकि जाथि .. ‘एखन कोन प्रलय होमए जा रहल छै. . . .हेतय सब किछु समय प’ . . . . ।’चिंतन मनन में डूबल . .. तत्व मीमांसा बॉचए वला . . . पिता कत्तो जेबाके नामे प’ चीज बोस्त ..फेंकनाए. . .शुरू क’ दैथ. ।. .अहंकार अपना सॅ सहस्त्र गुण भारी . . . .परदादा के गजराज त’ चलि गेलन्हि मुदा ओकर स्र्वण घंटी नेने ई बुलि रहल छथि ।महानंद बाबू के पङपोता . . . . . .भलमानुष लोक आब बचले कत्त छै. . . . .जै छै हमहीं छी बस. . . . ।
काकी अपना भरिसक प्रयत्न करिए रहल छलीह. . . ।पंजीयार के बजा कए. . .गोतिया दियाद . . . सर कुटुम लगुआ भिरूआ में तरे तर. .
कतेक पाय कौङी खरचैत. . . .तरूआ तीमन .. . खेनाय पिनाय ।जखन कियो कोनो नीक कथा के संदर्भ में किछु खबरि दैक . . . दौङ क’ .. . .भरल उत्साह सॅ . . .घरबला ल’ग जायथि. . . . ‘अहॉ एक बेर देख लैतियै नै . . ..अपन ऑखि सॅ .. .बङका गामक लङका छै. . . डाक्टर छै कलुआही में .. ।’
घरबला सुनिते भङैक जायथ. . ‘हे सुनियौन. . . .हिनक गप्प. . . अपने रहली बङौदा आ’ अहमदा बाद में. . .. आ’ हमर बेटी रहत कलुआही में. . . . .।अहॉ के दिमाग त नै खराब भ’ गेल अछि . .. . .।ओकरा लेल भोले नाथ नीक सॅ नीक ‘बर’ पठौता. . ।’
कतेक बरख सॅ अहिना चलि रहल छल ।कतेक सुद्व बीतैत रहलै . . . .कतेक सभा लगैत रहलै .. बागमती हिमालयक पघिलल बरफ सम्ुान्दर में पठबैत रहल छल. । कन्या पिता के कओलेज सॅ एम ए .करि दू बरख बैसला के पश्चात .. . बी. एड सेहो करि नेने छल. . . ।वएस त’ ढाढ नै रहतै ... ... . दिन प’ दिन बीतल चलल जा रहल छल. . . ।
पोरकॉ सत्तुए एक गोट कथा देने छलै .. ।दङिभंगे मेडिकल सॅ पास. . . एखन नौकरी नै छलै .. . .एम डी के तैयारी करैत छल .. . घरक बङ सुखीतगर. . . ।मुदा कका खिसियानि बिलाङि सन धुरखुन्ह नोंचय लगलखिन्ह .. .जे सत्तू के मूॅह अप्पन सन . .। ‘बेरोजगार डाक्टर गरा में बॉधि दियै . . . .जा धरि नौकरी चाकरी नै हेतै .. . . गाम में बैस बेटी उसीनिया कुटिया करत. . . जन मजूरक जलखई पनपियाई . .बनौत .. . . खबासिन बनि क’ रहि जायत भरि जीनगी. . ।’.
‘त उठियौ नै अपने. . . .सर्वगुण संपन्न वर .. . ताकए लेल . .जखन पाए कौङी गिनबे करबै. . . .त’ ई
मूरूछा किएक मारने रहैत अछि सदिखन .. . .कि घरे में बैसा क’ रखने रखने बूढ करि देबै बेटी के ।’ काकी के हिब कतेक बेर फाटि चुकल छलैन्ह. . . ओ कानि खींझ क’ बाजि भुकि क’ रहि जाय छली . . . की करितथि. . . . . उपै की .. . .।ई उचित अनुचितक गहीङ सोच. . . घरक मालिक सॅ विद्रोह केनाय हुनका उचित नहिं
लगैत छल ।ओना त’ हुनका पीठ प’ बङ लोक .. . गोतिया दियाद सॅ ल’क अपन भाय बंधु धरि हुनका एक सॅ एक कथा पठबैथ. . . . अमेरिका वाला भाय त’ पाए पठाबए लेल सेहो तैयार बैसल .. . .मुदा प्रोफेसर साहब के की कहल जाओ .. . . ओ त’ मददिगार के’ शत्रु बुझि ऑखि लाल पियर केने घर में कूदय लागैथ. . . ‘हे .. . हम मूईल नहि छी. . . जे लोक हमर बेटी प’ दया करत. . . ।बेसी दिक करब त’ हम गरा में ससरफानी लगा क’ मरि जायब. . .लईत रहब तखन .. . ।’ ‘बीस लाख में ओ कारी धुत्थुर. .. . . .अपन खानदान में पहिल पढल. . . .डिबिया. .के ईजोत में पढि पढि क’ इंजीनियर बनल .. .’ ‘ओहने हमर समधि .. . .कांध प’ अंगोछा. . . रखने . .. तरहत्थी प’ आंगुर सॅ तमाकू चुनबैत. . ।’
जखन शुद्वक समय आबै. . . घर में कलेस बढि जाए. . . आ’ परिणाम काकी आठ आठ सांझ उपासल रहि जायथ. . . .स्वास्थ सेहो खराप भ’ गेलन्हि . . .सदिखन ढैकरैत. . . . गैस सॅ पेट फूलल. . . ब्लडप्रेशर . .आ’ हार्ट क’ बीमारी सेहो कसि क’ गहिया लेलकन्हि. . .।मानसिक
तनाव से फराक़ . ।
सत्तु के आश्चर्य होय. . . एतेक ओरियानी..... .. . . . एतेक बुधिमति. स््रत्री. . . मुदा प्रतिकूल पति के सोझॉ कतेक बन्हैल. . .।
ई मिथिले अछि जतय अनमेल विवाह धङल्ले सॅ चलि आयल रहल अछि। गिरहस्थी क’ गाङी के दुनू पहिया. . . . .दू दिस. . .भेलोपरांत. .गाङी पटरी प’ ससरैत. रहैत छै .. .
.।कखनो काल लगैत अछि जे आब उनार हैत .. . . आब हैत. . .. मुदा फेर कोना नै कोना ससरए लगैत छै .. ।
बतीस बरक वैबाहिक जीनगी में काकी के कियो भागैत . .पङैत. . वा मर्यादाविहिन वा’उच्श्रृकल होइत नहि देखने छल .. . ।मुदा आब सहनशक्ति जेना दम तोङि देने होए. . . ।
इम्हर राज्य मे सरकार बदललै . . .आ’ कहिया कत्तय के बिझाएल . . .घुनाएल बेकार सङैत बीएड़ .डिग्री वला सब के किस्मतक ताला
खुजि गेलए .. . ।पिता कोना नै कोना ढरि गेलखिन्ह .. . . गौरी के सेहो लघीचक इसकूल में नौकरी लागि गेलए. . . ।माएक’ करेज जुङैलन्हि. . .. पढै लिखै वाला काज में धीया के मोन बहटरेतैन्ह. . . ।आ’ सुयोग्य वर सेहो. . . .. . ।
घरक माहौल में त’ विधाते जे परिवत्र्तन आनए चाहितथिन्ह तखने संभव छल. . .।पुत्र दुनु कत्तो बाहरे पढाई करि रहल छल. . . छोटकी सेहो बीएड करि नौकरि पकङि नेने छलै. . .।
कतेक बरख बाद भगवतिक किरपा सॅ प्रोफेसर साहबक मोन डोललैन्ह . . .. एक गोट कथा पसिन्न पङलैन्ह. .. . .।मुदा ओ अगिला वैसाख में विवाह करता. . . ।बेस. . ..हुनके कोन हङबङी छलेन्ह .. . जे हङबङी आ’ धुकधुकी छलैन्ह. .. . . .से त’ कन्या वा’ हुन माएके ..।अगिला वैसाख मे एखन एगारह मास विलंब छल । .. .आब जे छल . . पसिन त’ वएह कथा. . . कि मूल गोत्र .. . टक्कर के . .. पेलवार नीक़ . .समधि सेहो उच्चस्तरीय अधिकारी .. . . .शहरि में मकान. . . ।
काकी के चोटकल मुॅह प’ जेना किछु हरियरी आबए लगलै. . . .।भगवतीक’ चिनवाङ प’ बैस गोहराबए लगलीह. . .’अहींक़ . असरा मैया . . .जौ
ई कथा भ’ जायत जोङा छागर चढैब. . . ।’गौरी के मलिन झमैल मुॅह प’ सेहो किछु चुहचुही आबए लागल. . .स्वप्न त’ सबके देखबाक अधिकार छै. . .
ओहो अहि पृथ्वी के प्राणी . . . ओकरो सहस्त्रों स्वप्न दूरे सॅ ऑखि में हिलकोर मारैत देखार होमए लगलै. . ।
अपन पुस्तैनी बङका घरक मरम्मति करबा ओकरा रंगबा ढोरबा क’ एक गोट भव्य हवेली क’ आभास दय देल गेलै. . . ।डयोढी के गेट बङ चाव सॅ अपने ठाढ भ’ क’ काकी लाल रंग सॅ. . रंगबेलन्हि .. ‘अहि गेट सॅ हमर बेटी मॅहफा सॅ विदा हैत. ।विवाह राति बिजली के लङी
आ’ लाईट सॅ सजल ई कतेक दिव्य लगतैक . .।’ बजैत बजैत हुनक ऑखि में इन्द्रधनुषी स्वप्न जेना झलकि उठै ।
वर पक्षक इच्छानुसारे दुरागमन चतुर्थीक पराते भ’ जेबाक निर्धारित भेलै. . ।ताहि लेल . .. दान दहेजक चीज वोस्तक ओरियान होमए लागल छल. . ।
देखैत देखैत फागुनो आबि गेलए. . .।चारोकात मॅह मॅह करैत फगुनाहट .. . .लोकक शरीर ’सॅ भरिगर वस्त्र उतरि क’ हल्लुक वस्त्र स्थान ग्रहण करि नेने छल .. ।वातावरण किछु सोहनगर भ’ गेल छलै .. .।घर सॅ ल’क’ अङोस पङोस धरि के नवतुरिया सब में गौरी दीदी के विवाहक उत्साह किछु विशेषे रूप सॅ छल .. . ‘बरियाती सॅ से परीच्छा लेब हम सब कि ओ सार सब त्र्राही त्राही करता ।’ माय पितियानि सब मिलजुलि क’ कहिया कत्तए नै अदौङी दनौङी खोईट क’ राखि नेने रहथि . . ।लकङी के सर समान . . . ओहि लेल त’ खेतक आरिए आरि बङ शीसो. . . .किछु बङ
पुरान सीसो काटि क’ दलानक’ पछबरिया ओसारा प’ गेटिआयल .. ।तैं छोटका कका फर्निचर सब बनबए लेल . . .बढीबा के कातिके सॅ अपन दरवज्जा प’ बैसा नेने तहथि . . .।बचलै .. . वर कनिया आ’ समधियाना के नूआ फट्टा .. . त’ ओ आब कि लोक जोगा क’ राखत . . .शहरि बजार
में तुरते भेंट जाईत छै. . . . .. सबटा काज प इत्मीनान सॅ नजरि फेरि काकी सरिपहॅु बङ प्रसन्न छलीह . . .।
ओ दिन भरिसक रबि छल. .. .प्रोफेसर साहब अपन दलान प’ अराम कुरसीप’ बैसि एकबार पढि रहल छला. .
.।तखने पोस्ट मैन पहुॅचलै. .. .गामक पोस्टमैन . .. अराम सॅ अपन घरक काज .. न्योता. पिहानी निबटा क’ छुट्टिए दिन बचलाहा डाक बॉटेत छल .. ।चिठ्ठी पढलोपरांत हुनक नजैर . . .एखबार सॅ उठि क’ आकास में अटकि गेलन्हि . . .।
लिखल त’ किछु विशेख नहि . . .एतबे छल दू पॉति ‘ हमरा माफ कएल जाओ. . .हमर बालक अपन औफिसे के एक गोट सहकर्मी सॅ
विवाह करि लेलथि. . .।’ ंमुदा ई दू पॉति ओहि घरक लेल केहेन पैघ हङहङी बज्र साबित से वर्णनातीत . .. .अपन कोठरी में पलंग प’ बैसल काकी
बरक ललका पाग में सुईया ताग ल’क’ घुनेस लगा रहल छलीह . .. .हाथ कॉपि कॉपि क’ जेना फङफङेलन्हि. . . . आ’ धुकचुके में हुनक प्राणपखेरू संसारक सब बंधन तोङैत एकदम फुर्र सॅ उङि गेलए. . . . ।बौराएल सन धीया .. . .माएक छाति प’ माथ पटकि पटैक क’ बिलखए लगलै .. . . ‘हमरौ किएक नहि अपने संग ल’ गेलहूॅ. . . ।’बेटी के ह्दयक भाव माय सॅ बेसी आर के जानि सकैत अछि. . . . बिन मोलक ओकिल. . . पैरोकार ।
दिन केहनो प्रलयंकारी होय .. .बीतिए जाईत छैक़ . . .मनुक्ख सन जीवट परानी . .. . जहॉ अन्न आ’ पानि शरीर में गेल .. ..काया उठि
पुठि क’ ठाढ भ’ जाए छै. . .।
जे हो . . . पहिने जकॉ त’ नहि मुदा ओहि घर में फेर सॅ गति विधि त सुरूए भ’ गेल छल . .।रोज रोज ऑच पजरै. . .सोहारी . ..भात . . .तरकारी .. .दालि .. .रान्हले जाए . .प्रोफेसर साहब अपन कओलेज़ . .बेटी. . दूनू अपन अपन इसकुल. . .. . नौकरी प .. ।
ओहि अन्हङ. . पानि बाढि वला समय में .. . . .सतू के खबरि भेटलै. . .ओ. . .कहुना करि छाति भरि पानि के चीरैत पहूचल छल. . .।
भेलए कि जे जखन मुनहरि सांझ बीत गेलए .. . भदवारि के घनघोर धार धार बहैर रातियो में जखन गौरी अपन इसकूल सॅ नहि घुरली. . .
तहन पिता के करेज लोहरबा के धुकनी सन धुक धुक करए लागलै. . .भरि रात पिता आ’ छोटकी बेटी. . .अनदेसा क’ बङका बोझ क’ नीचा छटपटैत . . .जागल. . .. सगरे राति बाढि क’ घों . .. घों करैत. . . सोर .. .चारों कात बेंग झींगुरक . .. .कुकुर .. . .नढिया के डरोन स्वर .. . नदी के बॉध सेहो टुटि
गेल छलै . . .. यातायत ठप्प. . . ट्रेन . .बस. स्थगित . . .जे जत्त छल. . .तत्ते घेरोल. . . .कत्तेको लोक पानि में दहिया भसिया गेलए .. . ।
ई समाचार रेडियो प’ भोरे भोर आबि रहल छल . .।
जखन सूरजोदय भेलै .. . प्रोफेसर साहब अपन छोटका भातीज सॅ कनि निहौरे करैत सन कहलखिन्ह. ‘कनि गौरी के इसकूल जा क’ खबरि आनए लेल ।ओकर माए अपना घर मे अलगे कूदय लगलि पॉच पॉच हाथ .. ‘अहि दाहङ में कत्तए जायत हमर पूत भसियाबए लेल. . . ।’मुदा भातिज गौरी शंकर माए के परतारैथ. . .बङ हिम्मत करैत भरि भरि ठेहुन पाानि में कहुना क’ सायकिल खीचैत निकलल।
रोड प’ त कनि कम पानि रहै. . .उचगर सङक छल .. .मुदा कत्तो कत्तो त’ मत पूछु. . . .सायकिल सॅ उतैर उतैर क’ चलए पङ..ै. . . . ..कखनो काल त’ साुयकिल माथ प’ सेहो उठा लैक़ . . चारो कात प्रलयंकारी दृश्य . . .. जतय धरि नजरि जाए. . . पानिए पानि. . . .।पानि में ठाढ गाछ .बिरीछ .. .
ओना त’ बङ नीक लगै .. .मुदा गाछ सॅ बान्हल झ्ुाला जकॉ खाट. . ओहि प राखल चीज वोस्त .. . गाछ प बैसल घरबैया. .. .सब देखि ह्दय टूक टूक होमए लागै. . दोसर दिस जीनगी सॅ भरल .. .धिया पुत्ता. . . पानि में उमकैत .. . ।
तीन चारि गाम टॅपि क’ रोडे प’ ओकर इसकूल उम्हर बाढिक प्रकोप न्ै.ा . . हैडमास्टरक गप्प सुनि गौरी शंकरक हाथ सॅ जेना तोता उङि गेलन्हि .. . ।केहेन
जाचना के काल .. . .कोन पापक सजा द’ रहल छथि विधाता . .. ।
टुटल मन. . . असोथकित .. .भेल दरवज्जा प’ राखल चौकी प’ प्रोफेसर साहब पसैर गेल छला .. . ।
सत्तु आबि चुकल छलाह .. .मुईलो परांत मायक साध अधुरे रहि गेल . .ओहि बङका गेट सॅ बेटी के विदा करबा के .. . गौरी अपन एक गोट सहकर्मी संग विवाह करि कत्तो आओर चलि गेल छल. . ।कका के बोल भरोस दैत सत्तु एतबे बाजल छल ‘ई त अवश्यंभाबी छल .. .इएह छैे समयकाल।’

9।11।09

२.अनमोल झा
अनमोल झा (1970- )

गाम नरुआर, जिला मधुबनी। एक दर्जनसँ बेशी कथा, लगभग सए लघुकथा, तीन दर्जनसँ बेशी कविता, किछु गीत, बाल गीत आ रिपोर्ताज आदि विभिन्न पत्रिका, स्मारिका आ विभिन्न संग्रह यथा- “कथा-दिशा”-महाविशेषांक, “श्वेतपत्र”, आ “एक्कैसम शताब्दीक घोषणापत्र” (दुनू संग्रह कथागोष्ठीमे पठित कथाक संग्रह), “प्रभात”-अंक २ (विराटनगरसँ प्रकाशित कथा विशेषांक) आदिमे संग्रहित।
अधिकार

-एकटा बात ध्यानसँ सुनि ले लखना, जँ बेगारी नै खटमे हमर आ अबाज ऊँच कके बजमे तऽ बासडीह जे छउ तकरा खाली करऽ पड़तउ। हमर पुरखा तोरा बाप-पुरखाक रैयतमे अपना जमीनपर बसेने छला एहि उपकार ले जे तू हमरा मूँह लागल जबाब देमे।
-तकर माने की अहाँ हमर उपजल बोनि नै देब आ अहाँक बेटा-भातिज हमर इज्जति दिस आँखि उठायत। हाथ-पैर तऽ तोड़ि देबै तकर। हँ रहल बासडीह बला सवाल से एते सस्ता नै छैक जे खाली करबा देब अहाँ। दस-बीस साल जे बटाइयो खेती करै छै तऽ सरकार कहै छै जे खेत ओकरे छियै आ दू पाँच पुरखा सऽ जाहि डीहपर बसल छी हम सब से हम्मर नै! हाकिमक देल बासगीत परचा सेहो अछि हमरा लग।
रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’-साझा प्रकाशनमे विद्यापति

राम भरोस कापड़ि भ्रमर, धनुषा, नेपाल 1951-

जन्म-बघचौरा, जिला धनुषा (नेपाल)।बन्नकोठरी: औनाइत धुँआ (कविता संग्रह), नहि, आब नहि (दीर्घ कविता), तोरा संगे जएबौ रे कुजबा (कथा संग्रह, मैथिली अकादमी पटना, १९८४), मोमक पघलैत अधर (गीत, गजल संग्रह, १९८३), अप्पन अनचिन्हार (कविता संग्रह, १९९० ई.), रानी चन्द्रावती (नाटक), एकटा आओर बसन्त (नाटक), महिषासुर मुर्दाबाद एवं अन्य नाटक (नाटक संग्रह), अन्ततः (कथा-संग्रह), मैथिली संस्कृति बीच रमाउंदा (सांस्कृतिक निबन्ध सभक संग्रह), बिसरल-बिसरल सन (कविता-संग्रह), जनकपुर लोक चित्र (मिथिला पेंटिङ्गस), लोक नाट्य: जट-जटिन (अनुसन्धान)।


साझा प्रकाशनमे विद्यापति
रामभरोस कापड़ि ‘भ्रमर’
हम २०६५ साल पुस २ गते साझा प्रकाशनमे अध्यक्षक रुपमे नेपाल सरकार सं नियुक्त भेलहुं । साझा प्रकाशन सरकार आ किछु निजी क्षेत्रक शेयर होल्डर सभक राष्ट्रिय प्रतिष्ठान अछि जे अपन पुस्तक आ पत्रिका तं छपिते अछि नेपाल अधिराज्य भरि एक कक्षासं लऽ दश कक्षा धरिक सरकारी विद्यालयक पाठ्य पुस्तक वितरण आ विक्री करैत आएल अछि ।
लगभग ९० करोडक कारोबार कर’ बला आ तीन सयसं उपर कर्मचारीक संलग्नतामे देशभरिमे २८ गोट शाखा, उप–शाखा, क्षेत्रिय शाखा सभक संजाल कार्यरत् अछि । एकर स्थापना २०२१ सालमे भेल अछि आ एखन धरि नेपाली साहित्यकार वाहेक केओ एकर अध्यक्ष आ महाप्रबन्धक नहि बनाओल गेल छलाह । देशमे बदलैत राजनीतिक अवस्था आ समावेशी लोकतंत्रक प्रादुर्भाव भेलापर मंत्रालयमे मधेशक मंत्री लोकनिक प्रवेश भेल आ तखन खूजल ४५ वर्षक बाद बज्जर केबार । हम पहिल मधेशी, मैथिली साहित्य प्रेमी एहि गरिमामय पदपर बैसाओल गेलहुं ।
ई संस्था सालमे ३०–४० गोट साहित्यिक पुस्तक प्रकाशित करैत अछि । ईसभ साहित्यिक कृतिक सभा भाषा मात्र नेपाली । ई नेपाली भाषा वाहेक आन भाषामे पुस्तक नहि छपैत छल । हमरा गेलाक बाद माहौल बनओलहुं आ तखन निर्णय भेल जे नेपाली वाहेकके भाषामे सेहो पुस्तक छापल जाए ।
बड़ कुहरि कऽ भेलो निर्णयकें कार्यान्वयनमे काज बढाओल गेल । जाहिमे सर्वप्रथम विद्यापति’क पोस्टर चित्र बहार करबाक निर्णय कराओल । विद्यापतिक प्रचलित चित्रकें साझा प्रकाशनक कलाकारकें देखा बनएबाक कतेको आग्रह ओ पुरा नहि कऽ सकल । कारण छलै तत्काल उपलव्ध छोटचित्रमे देखाओल विद्यापतिक पागक गणित ओकरा समझसं बाहरक होएब । नेपालक चर्चित कलाकार छथि टेकवीर मुखिया साझाक प्रत्येक पुस्तक पर हुनके डिजाइन रहैत छनि । हमरा जनकपुर अएबाक रहए आ ताहिसं पूर्व चित्रकें सार्वजनिक करबाक हमर इच्छा । बड़ मुश्किलसं हम पाग खोजलहुं । साझा प्रकाशनक एकटा कर्मचारीकें पाग पहिरा बुझा कलाकार लग पठएलहुं, तखन ओ पागकें देखि स्केच कएलक आ तैयार भेल कलर विद्यापतिक चित्र, जे मिथिलाञ्चलक विक्री कक्षसं किछु मासमे विक्री भऽ चुकल छैक । दोसर खेप छापबाक तैयारी चलि रहल छैक, एहिमे कागजमे सुधार कऽ विद्यापतिक चित्रकें आर निखारल जएबाक योजना छैक । ई चित्र हम पटनामे जा जवावदेह व्यक्तित्व सभकें दऽ आएल छीयनि, मुदा ओ लोकनि एकटा समाचारो पत्रिकामे देबाक जरुरति नहि बुझलनि ।
एमहर भाद्र मसान्तमे मैथिली भाषाक पहिल पुस्तक वालकथाक बहार भऽ गेल अछि । “बगियाक गाछ” नामसं छपल ई पुस्तक साझा प्रकाशनक इतिहासमे नेपाली वाहेकक प्रथम मैथिली पुस्तक भऽ गेल अछि । राजविराजक देवेन्द्र मिश्रक संकलनमे १५ गोट वालकथाक एहि संग्रहमे कथा सम्वन्धित चित्र सभ सेहो मिथिला लोकचित्रमे अछि । आब साझा प्रकाशनक दरबज्जा खुजि गेलैए, आनो साहित्यकार ओ मैथिली, भोजपुरी, अबधी, थारु, गुरुङ, आदि भाषाक किएक ने हो अपन अधिकारक हेतु लड़ि सकैत छथि ।
मैथिली व्याकरण लिखबाक काज प्रारंभ भऽ गेल अछि – भाषाविद् डा. योगेन्द्र प्र. यादवक नेतृत्वमे । मैथिली कथा संग्रह, भोजपुरी कथा संग्रहक प्रकाशन योजना प्रगतिपर अछि । साझा प्रकाशनक नेपाली भाषाक स्तरीय पत्रिका ‘गरिमा’ मे आब मैथिली, भोजपुरी, अबधी भाषा साहित्य सम्वन्धी समालोचना, निबन्ध आब’ लागल छैक । ई सभ परिवर्तनक संकेत अछि ।
दुनू देशमे मैथिली गतिविधिक जे किछु घटना होइत अछि, तकरा सूचना प्रवाहक संकट छैक । भारतीय क्षेत्रक लेखक अपनामे सिमित भऽ गेने नेपालक गतिविधि पर नजरि राखब जरुरी नहि बुझैत छथि । परिणामतः बहुतो सूचना अपूर्ण रहल अछि । ने प्रयास कएल जाइछ, ने जरुरीए बूझल जाइछ ।
नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान विगत चारि वर्षसं राजनीतिक शिकार भेल अछि । गठन नहि भेने बहुतो काज रुकल पड़ल छैक । पंक्ति लेखकक प्रधान सम्पादकत्वमे निकलल ‘आंगन’ पत्रिका (जकर चर्च भारतीय पत्र–पत्रिका मे कहियो ने भेल) ठमकल अछि, कतेको मैथिली परियोजना अपूर्ण राखल छैक । तहिना एहि विच दर्जन भरि मैथिली पुस्तक छपल रहैत, से नहि भऽ सकल अछि । आ ई तखने आबो संभव हयत जं प्रज्ञाक गठन होइक । पा्रज्ञ लोकनिक ई पद राजनीतिक कार्यकर्ता सभ हथिअएबा मे जुटि गेलासं ई निष्प्रभावी बनल निरिह पड़ल अछि । एकरा राजनीतिसं मुक्त जं कऽ देल जाए तं अवश्य इहो मैथिली समेतकें नीक सहयोग त पहुंचा सकैत अछि ।
‘गोरखापत्र’ दैनिक एक पृष्ट मैथिलीमे दैत छैक, मुदा ओहो पृष्ट मैथिलीकें कतेक उपकार करैत अछि से देखले पर पता चलत । तखन मैथिली भाषामे छैक ई सन्तोषक बात ।
निजी चैनल सभ सेहो मैथिलीमे समाचार शुरु कएलक अछि । माहौल बनि रहल छैक । उपराष्ट्रपतिक हिन्दी शपथ विवादसं मैथिली प्रति जनमत वृद्धि भेलैए, ई उपलव्धिए मानल जएबाक चाही । जे से मैथिलीक नीक संभावना छै नेपालमे–संघीय सम्विधान बनलाक वाद तं आओर । जं कि हम साझा प्रकाशनमे छी ओत्तसं नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहासक प्रकाशनक योजना बनाओल गेल अछि । नेपालक मै.सा.क इतिहास लिखनिहार डा. प्रफुल्ल कुमार सिंह मौनकें हम पत्रद्वारा आग्रह कऽ चुकल छीयनि जे आधुनिक कालकें कनेक अपडेट कऽ देथि । हुनक स्वीकृति आ पाण्डुलिपिक प्रतिज्ञा अछि ।
एम्हर पुस्तक सभ सेहो खुबे आएल अछि । ‘भ्रमर’क नेपाली भाषामे “मैथिली लोक संस्कृति” काठमाण्डूसं छपि कऽ बाजारमे अछि । धीरेन्द्र प्रेमर्षिक गजल संग्रह (नेपालीमे) बाजारमे अछि । रमेश रंजनक कविता संगह आबि रहल छैक तं रामानन्द युवाक्लव द्वारा कथा संग्रह बहार भऽ रहलैक अछि । हिमांशु चौधरीक कविता संग्रह आएल अछि । रेवती रमणक नाटक संग्रह अएलनि अछि तं ‘भ्रमर’क सम्पादनमे नाटक संग्रह जल्दीए प्रेससं बहार हयत ।
आवश्यकता छैक छपल पुस्तक सभकें उचित प्रचार प्रसार आ समालोचना समीक्षा । जे आन भाषा जकां मैथिलीमे दुर्लभ अछि । कनेक उदार होब’ पड़त तखने पुस्तक प्रकाशनक सोकाज लगतै लोककें । संभव थिक आब’ बला काल्हि खुशनामा होइक मैथिली प्रकाशनक लेल ।

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साझा प्रकाशन
पुलचौक, ललितपुर, काठमाण्डू
नेपाल


३. पद्य

३.१. गुंजन जीक राधा-पन्द्रहम खेप

३.२.१. राजदेव मंडल-सीमा परक झूला आ चीड़ीक जाति २. विनीत उत्पल-मन परैत अछि

३.३.उमेश मंडल (लोकगीत-संकलन)- आगाँ

३.४.कल्पना शरण-इण्टरनेट स्वयंवर
३.५.१. सतीश चन्द्र झा-भाषा आ राजनीति आ २. सुबोध कुमार ठाकुर-जुग बदलि गेल
३.६.१. श्यामल सुमन-मैथिली दोहा २. अजित कुमार मिश्र-अप्पन माटि
३.७.१. बिनीत ठाकुर-गीत आ २. दयाकान्त मिश्र-हे मैथिल आबो जागु
३.८. शेफालिका वर्मा-बाजी


गंगेश गुंजन
जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी।श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।
गुंजन जीक राधा- पन्द्रहम खेप

बुझायल ता एतबे जे अयलौं माएक गर्भ मे नौ मास अपनहि निर्माणक नरक सहैत,
माइयो के सहबैत प्रतिपल भरि जीवनक पीड़ा माएक एक-एक साँस दुर्घट करैत
करैत ह अपनहि जन्म सँ कएल विकट पराभव ओकरा लेल। ओ यद्यपि कहैत
छैक- सन्तानक जन्म महासुख ! हम तं सन्तान, की बुझी तकरा कही की ?
...मुदा पुनः-पुनः माएक गर्भ मे के रखलक हमरा ? भरिसक पिता...वैह हुनके
राखल जे, होइत गेल विकसित बनैत गेल रधिया ! एक दिन...सुनै छी एहि गामक
धरती पर ......खसल चेहों-चेहों करैत, यैह झरकलही देह। सेहो सुनै छी, माए
तँ हर्षित किन्तु भेला बहुत सुख-चिन्तित पिता। भेलियनि जे बेटी, ककर दोख
यदि दोखे त ? जेना देलनि हमरा माएक गर्भ तेना देने रहितथि कोनो बेटा ।
बाधा की ? तें अपन काज केर फल सँ असंतुष्ट माय पर थोपल दोख किएक, कथीक?
ओना, जे हो आबि त गेबे केलियनि मायक कोरा- एहि छोटोछिन घर-असोरा-आङन मे,
बाड़ीक ओलक गाछ जकाँ अपनहि टोंटी सँ विकसित होइत, सौंसे चतरल गेल हरियर
गाछ समान। भ त गेवे कएलौं। जेहने भेलौं आब एतेक वर्ख धरिक भ गेलौं बेसी
बेटी त ओहिनो ओले बुझल-कहल जाइए-कबकब, समाज । राधाक मन बड़े बौआइत छैक।
एक क्षण एत, दोसरे क्षण नइं जानि कत ? मन खौंझाइत बड़ छैक जे ओ एहन आ
एहने भेलि कियेक ? अपने भेल कि बना देल गेलि एना ? की ? दुनू मे की ? बा
एहू दुनू कारण सँ फराक किछु कारण ? बा एहि दुनूक मिज्झर एकटा तेसर परिणाम
थिक ओ ? बड़ व्याकुल होइत अछि- किये रूसल छथि कृष्ण ? आ कि हमहीं छियनि
रूसलि हुनका सँ ! की ? के करओ पुरबा साही एकर- यदि रुसले अछि त ककरा सँ
के ?... राधाक कंठ सुखाएल- ओह,जल पीबितौं दू घोंट ! पियास आकुल घैलची सँ
ढारऽ गेली- घैल रिक्त ढन ढन करैत...!
दिवस कही बा राति कही, हमरा कहला सँ की जीवन व्यर्थ कही सार्थक, हमरा
कहला सँ की विषयो कहाँ हमर हमर सन लोकक ई सब यदि अनुभव किछु कहय त कहलो
सँ की एहि समाज मे मोजर त छुच्छे पुरूख कें भने लुल्ह-नाङर बहीर बताह
कनाहो कोतर पुरुखे हाँकत ई समाज निश्चयो करत दिशा केर एहना मे किछु
उचित-अपेक्षित, हो आवश्यक आबय कोनो विचारो त हमरा कहला सँ की? अनठा देत
अपनहुँ संगी-सखि-संबन्धी धरि करत अनेक उपहास सेहो सब सहला सँ की मन मे
बड़ अन्हर-बिहाड़ि, पानि आ पाथर ...एखनहि ठाठ भेलय तैयार ऊठलय घर
देखिते-देखैत दू पल मे ढनमना खसैये कम्मे लोक बचाबए दौड़ल लोक कहाँ अबैये
! इहो स्वभाव मनुक्ख-समाजक केहन विचित्र जे छल रहैत ठाढ़ विपति मे से छथि
आइ तटस्थ ।
आब त लोकक दुःख अनठएबा मे भेल लोक अभ्यस्त तकर दुःख बूझी, क्लेश सही
परन्तु यदि चर्चा चाही ककरो हेतैक ध्यान,हएत गंभीर कनिक एक रती अनुभव आ
वातावरणक जे रूप अछि पसरल कतबो केहनो हो आवश्यक विषय आ अनुभव,चिन्ता
ककरा कहबै ? कोन भाषा केहन बानी मे ? सबके अपने तेहन धरफरी पैसल छैक जे
एक दिस सुनितो रहत, पड़ाएलो जायत अपन गन्तव्यक दिशा ! कतबो करबै सोर ।
अहाँक आत्मीय चिन्ता सँ कम रहलै लोक कें संपर्क-संवाद । सबके अपने स्वयं
ततेक दाबी, संसारक अनुभव आ व्यवहारक, धर्म-शास्त्र सब सब कें जेना हो
घोंटल । ज्ञान त यमुनेक जल जकाँ- भरि लेलहुँ घैल,तमघैल कि बड़का कलगोइयाँ
लोटा । जत भेल इच्छा क लेलहुँ व्यवहार सहज-सुसके। बीच बाटहु पर हरा देने
हो नहि एको मिसिया खेद, बाट के पिच्छड़ बना क लोक के पिछड़ि-पिछड़ि खसबाक
दिक्कैत तैयार क देबाक। लोक के भरिसक्के होइत छैक भान--ओ की क रहलए, की क
गेल ओ लोकविरुद्ध ज्ञान हेरायल बाट!-घाट भेटब केहन सहज भेल ! मनुक्ख सँ
मनुक्खक परस्परक भाव, जानि नहि कत गेल ? पुछलिअनि एक दिन यैह प्रश्न त
कृष्ण बिहुँसलाह तेना जेना ओ त अपने परम बूढ़-पुरान आ हम रही सोझाँ मे
कोनो ! नेना

नहि ध्यान देलनि हमर एहि जिज्ञासा पर त सहजहि भेल हएत हमर मुँह उदास,
कनेक आहत सेहो। से अपन सधल बुधियारी आ कौशल सँ करैत तकर सम्हार कहए
लगलाह-"बड़ बताहि छें! ई सब काज तोहर नहि।सोचब जीवन, एकर नित्य
बदलैत-बढ़ैत-घटैत व्यवहार,तकर गूढ़ प्रक्रिया विषय होइत छैक जे छथि पंडित
जन हुनकहि बुद्धि-व्यवसाय। तों किएक करैत रहैत छें विकल अपन ई सुन्दर मन
? हमरे देख कोना रहैत छी हिनका लोकनि सँ बाँचल-छिटकल, कए काल तं लैत
पतनुकान, अपना तरहें अपन जीवन जीयैत। सत्त पूछ तं कतेक रहैए चिन्ता हमरो
हिनका सभक ? हम तं रहैत छी तोरे मे लेपटायल, तों ही ने हमर प्रिय
प्राण!"
हुनक ई कहब बुझाएल सद्यः काकु उक्ति। कृष्णक ई सब कहि जाएब धर-धर। अति
विशेष क अंत मे हमरा जोड़ि क कहब जे बात छल हुनकर।तें उचिते
कहलिअनि-"जाउ-जाउ, बड़ हमरे मे लेपटाएल रहै वला अयलौंहें।आ हमरे मे
रखनाहर ध्यान। अपने हुलकी द क देखियौ भरि आँगन-, बैसल आकुल उत्सुक के अछि
अभागलि से मन ! जुनि परतारू,ठकू नहि हमरा एना। हम तं ऑहिनो अहाँक बिना
कोनो कार्यक किछु नहि।"
-" सैह तं कहलियौ बताहि, हमहूँ बिन तोरे कोनो कार्यक कहाँ छी? प्राणहीन
देह आ तें गति-स्पन्दनहीन अस्तित्व भ जाइत, तोरा बूझल छौ।तथापि एना रूसै
छें।किएक एना रूसि जाइ छें, मीत ?"
कएलनि उन्टे अपने विलाप सेहो।-"वाह रे निसाफ । रूसल निपत्ता भ जाइ अपने आ
दोख हम्मर। कहलिअनि हम तं उदास भ गेला-अनचिन्हार उदास ! संच मंच बैसल
असकर एकटा बगड़ा जकाँ अनमन। निःशब्द।"...
(अगिला अंकमे...)
१.राजदेव मंडल-सीमा परक झूला आ चीड़ीक जाति २.विनीत उत्पल-मन परैत अछि

राजदेव मंडल

शिक्षा- एम.ए.द्वय, एल एल बी.,पता- ग्राम-मुसहरनियाँ, रतनसारा(निर्मली),जिला-मधुबनी,प्रकाशित कृति- हिन्दी ,नाम-राजदेव प्रियंकर,उपन्यास- जिन्दगी और नाव,पिजरें के पंछी,दरका हुआ दरपन।
(1)सीमा परक झूला
ई जर्जर झूला
लगैत अछि जेना तुला
सीमा पर लटकल अछि
पुरान डारि पर अटलक अछि
पेंगा पर झूलि रहल छी
आव स्वंय केँ भूलि रहल छी
अन्तिम छोर सँ
अपन बाँहिक जोर सँ
लगा रहल छी आस
नहि छी निराष
आस-पास
प्रभातक उजास
कखनहुँ एहिपार
कखनहुँ ओहिपार
बारम्बार
दोहराबैत छी कार्य ब्यापार
कट-कट-कट-कट
टूटि रहल डरि
दैत गारि
तइयो सम्हारि
धरती सँ नाता जुटि रहल अछि
गाछ सँ झूला छूटि रहल अछि
एम्हर कि ओम्हर खसब
रहब स्वछन्द कि जाल मे फँसब
जीयब वा मरब
फेर कियक डरब
चाहे खसब एहिपार
चाहे खसब ओहिपार
रहत इएह धरती
इएह भाव आर विचार
सुख हो वा दुख
रहब अन्ततः मनुक्ख।

(2)चीड़ीक जाति
धायल पाँखि पर
लटकल लहाष
लऽक पहुँचल
नीड़क पास
ओ जे ओकर नहि
किन्तु ओकरे छल
लहू सँ भीजल तन
कण-कण
सषंकित अछि चीड़ी केँ मन
तइयो
मातृत्व सिनेह
पियाबए चाहैत अछि
खियाबए चाहैत अछि
लोल मे राखल अहराक दाना
अनजान बच्चा गाबि रहल गाना
पाछू लागल षिकारी
बनल अछि अधिकारी
जेकरा भूखल आँखि मे
तरजू अछि लटकल
स्वादक बैटखारा
अछि मन मे अटकल
एकटा पलड़ा मे प्रौढ़गात
दोसर मे अछि नवजात
घायल देह
टुटैत नेह
टप-टप चुबैत खूनक बून सँ
धरती भऽ रहल स्नात
पूछि रहल अछि चिड़ई
अपना मन सँ ई बात
आबऽ बाला ई कारी आ भारी राति
कि नहि बाँचत हमर जाति...?
२.विनीत उत्पल
आनंदपुरा, मधेपुरा। प्रारंभिक शिक्षासँ इंटर धरि मुंगेर जिला अंतर्गत रणगांव आs तारापुरमे। तिलकामांझी भागलपुर, विश्वविद्यालयसँ गणितमे बीएससी (आनर्स)। गुरू जम्भेश्वर विश्वविद्यालयसँ जनसंचारमे मास्टर डिग्री। भारतीय विद्या भवन, नई दिल्लीसँ अंगरेजी पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्लीसँ जनसंचार आऽ रचनात्मक लेखनमे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कनफ्लिक्ट रिजोल्यूशन, जामिया मिलिया इस्लामियाक पहिल बैचक छात्र भs सर्टिफिकेट प्राप्त। भारतीय विद्या भवनक फ्रेंच कोर्सक छात्र।
आकाशवाणी भागलपुरसँ कविता पाठ, परिचर्चा आदि प्रसारित। देशक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे विभिन्न विषयपर स्वतंत्र लेखन। पत्रकारिता कैरियर- दैनिक भास्कर, इंदौर, रायपुर, दिल्ली प्रेस, दैनिक हिंदुस्तान, नई दिल्ली, फरीदाबाद, अकिंचन भारत, आगरा, देशबंधु, दिल्ली मे। एखन राष्ट्रीय सहारा, नोएडा मे वरिष्ट उपसंपादक।
मन परैत अछि

कतेक दिन बाद आय
मन परैत अछि रामप्रसाद
आ॓ रामप्रसाद
जेकर पिता आ पितामह
हमर पितामहक हरवाहा छल

मन परैत अछि
हुनकर हर
जकरा सं खेत जोतैक छल
भोर आ॓ सांझ
ताहि दिन कतेक
मन लगैत रहैक गाम मे

आ॓हि हर मे जोतैत छल
दू टा बरद
बरद के घंटी
आबो बाजैत अछि कान मे

मन परैत अछि
जखन धान काटि कऽ
बोझ राखल रहै आंगन
आ दुआरि पर

मुदा, समय बीतल
नहि रहल आब रामप्रसाद
नहि रहल आब पितामह
नहि रहल आब दुआरि पर हर आ बरद

गाम मे ट्रक्टर आबि गेल
थ्रेसर सऽ आबि काज होइत अछि
ताहि सं नहि नींद टूटैत अछि घंटी सं
आ नहि बोझ रखाइत अछि आंगन मे।


उमेश मंडल
गनियारि पिसबाक गीत

कहमा केर जड़िया कहमा सिलौटिया रे।
ललना रे कओन मुँह भय पीसब, कौषिल्या पीआयब रे।
दछिन के इहो जड़िया, पछिम सिलौटिया रे।
ललना रे पूब मुँह भय पीसब, कौषिल्या पीयाअब रे।
पहिने जे पीलनि कौषिल्या रानी, सुमित्रा रानी रे।
ललना रे सिल धोइ पीयल कैकेयी रानी तीनू गरभ सँओ रे।
कौषिल्या के जनमत राम, सुमित्रा के लछमन रे।
ललना रे कैकेयी के भरत, शत्रुघन, तीनू घर सोहर रे।

तेलश्कसाय लगवैक गीत

(1)
कौने बाबा हरबा जोताओल, मेथिया उपजाओल हे।
कौने बाबी पीसल कसाय, जे कि बरुआ ओंगारल हे।
बड़का बाबा हरबा जोताओल, कि सरसो उपजाओल हे।
ऐहब बाबी तेल पेरौलीह, बरुआ ओंगारथि हे।


(2)
काँचहि बाँस के मलिया हे,
आकि ताहि मलिया तेल फूलेल हे।
कौने बाबी लगेतीह तेल फूलेल,
आकि कौन बाबी लगेती उबटन हे।
आकि फल्लाँ बाबी लगेती तेल फुलेल,
आकि फल्लाँ बाबी लगेती उबटन हे।

मूड़न

गोसाउनि नोतक गीत
जँ हम जनितौं काली मैया औती
अगर चानन मंगबितौ हे।
गंगा सँ मैया चिकनी मंगबितौ
ऊँच के पीड़िया बनबितौ हे।
नीर गंगाजल सँ पीड़िया निपबितौ
अड़हुल फूल चढ़बितौ हे।
पीअर पीताम्बर माँ के आँचर दीतौं
सोन रुपे घूघरु लगाय हे।
जोड़ा छागर धूर बन्हबितौ
करिया दीतौं बलिदान हे।
भनहि विद्यापति सुनु देबि काली
सदा रहब सहाय हे।

पितर नोतक गीत
कौन बाबा आओत गजन हाथी
ओ जे कौने बाबा लिल घोड़ा हे।
कौने बाबी अओती दोलियहि
कि बरुआ आषीष देती हे।
बड़का बाबा आओता गजन हाथी
छोटका बाबा लिल घोड़ा हे।
ऐहब बाबी अओती दोलियही
कि बरुआ आषीष देती हे।

मुड़न बेरक गीत

समुआ बैसल तोहे बाबा कि बरुआ अरजि करु हे।
लपटि झापय ललाट करह जगमूड़न हे।
रहु बाबू रहु बाबू बरुआ कि होयत सुदिन दिन हे।
नोतब सकल परिवार करब जगमूड़न हे।
मूड़न करैत बरुआ क बाबा सँ अरजि करु हे।
आनहु पीसि बोलाय कि अउरी पसारल हे।
औती पीसी सोहागिन बैसति चैक चढ़ि हे।
पीअर वस्त्र पहिरती केष परिछति हे।

केष कटबै कालक गीत

कौने बाबा छुरिया गढ़ाओल सोने मढ़ाओल हे।
कौने अम्मा लेल जन्म केष कि शुभश्शुभ होयत हे।
बड़का बाबा छुरिया गढ़ाओल रतने मढ़ओल हे।
बड़की बाबी लेल जनमकेष कि शुभश्शुभ होयत हे।
देब हे नौआ भैया लाल धोतिया सोनक कैंचिया हे।
शुभ कऽ उतारऽ बाबाक केष बबुआ जीक मूड़न हे।

नौआक गीत

धीरेश्धीरे कटिहह नौआ केष, कि बौआ बड़ दुलारु छइ हौ।
बौआक मामी नौआ तौरे देवह, कि बौआ छै बड़ दुलारु हौ।
बौआक मामी भार पठौलखिन, ठकुआ तोरे देबह केरा तोरे देवह हौ।
बौआक नाना घोती पठेलखिन, पीअर मे रंगि के तोरे देवह हौ।
धीरेश्धीरे कटिहह केष, कि बौआ छै बड़ दुलारु हौ।

नहेबा कालक गीत

कोने बाबा पोखरि खुनाओल, कि घाट बनाओल हे।
कोने बाबा भरथि जूड़ी पानि, कि बरुआ नहाबथि हे।
अपन बाबा पोखरि खुनाओल, घाट बनाओल हे।
ऐहब बाबी भरु जुड़ि पानि, कि बरुआ नहावथि हे।

चुमाओन गीत

आजु माइ शोभा श्री रघुवर के
मातु कौषल्या हकार पठाओल
गाइन जतेक नगर के।
कैकेयी आयलि सुमित्रा आयलि
गाइनि सगर नगर के।
दुबि अछत लय देवलोक आयल
चर डोलय रघुवर के।
तुलसीदास प्रभु तुम्हरे दरस के
जीवन सफल दरस के।
आजु माइ शेभा श्री रघुवर के।

भगवतीक विनती

अयलहुँ सरन तोहर हे जगतारनि माता। अयलहु.....
लाले मन्दिरिया के लाले केबरिया।
लाले घ्वजा फहराय हे जगतारनि माता।
लाले चुनरिया के लाले किनरिया,
लाले सिनुर कपार हे जगतारनि माता।।
राखि लिऔ मुखलाली हमरो।
हम लेब अचरा पसारि हे जगतारनि माता।।
अयलहुँ सरन तोहार...

गाम देवताक गीत

बेरिश्बेरि बर बरजौं मालिनि बेटिया,
बाट घाट जुनि रोपु फूल हे।
एहि बाटे औता ब्राह्मण दुलरुआ,
घोड़ टाप तोड़ि देत फूल हे।
कानै लगली खीजै लगली मालिनि बेटी,
आखि स बहै लागलि नोर हे।
के निरमोहिया फूल गाछ तोड़त,
के रे देत वरदान हे।
जुनि कानू जुनि खीजू मालिनि बेटिया,
हमरा स लीअ वरदान हे।
पहिल जे मंगलौ ब्रह्मण सिर के सिनुरबा,
तखन कोर भरि पुत्र हे।
जे पुत्र दीह ब्राह्मण हरि नहि लीह,
बाँझी पद छूटत गोर हे।

साँझ

साँझ दिय यसुमति मइया हे साँझ बीतल जाइये।
जैता कन्हैया खिसिआय, हे साँझ बीतल जाइये।
कथी केर दीप कथी केर बाती, हे साँझ बीतल जाइये।
सोना केर दीप पाट सूत बाती, हे साँझ बीतल जाइये।
सरसो तेल जरय सारी राती, हे साँझ बीतल जाइये।
जरय लागल दीप चमकि गेल बाती, हे साँझ बीतल जाइये।
खेलय लगलै साँझ मइया, हे साँझ बीतल जाइये।



उपनयनक गीत
(उद्योग गीत)
गोसाउनिक नोतक गीत
अढ़ुल फूल देखि अयली गोसाउनि, दूधहि चरण पखारब हे।
छुट्टा पान गोटा सुपारी, माँ काली नोतल जाथि हे।
बरुआक माय बाप गोचर करै अछि, सुनु माता विनती हमार हे।
सेबक बालक स्तुति नहि जानय, छमा करब सब अपराध हे।

पीतर नोतक गीत
दुअरहि बाजन बाजय स्वर्ग आवाज गेल हे।
स्वर्ग मे पुछथिन बड़का बाबा कतय बाजन बाजू हे।
अहाँ कुल जनमल फल्लाँ बरुआ ओतहि बाजन बाजू हे।
स्वर्गहि पितर आनन्द भेल कि आब वंष बाढ़ल हे।
स्वर्ग सँ आबि पितर बरुआ के आषीष देल हे।

बँसकट्टीक गीत
वृन्दावन बाँस कटायब कि मड़बा बनायब हे।
पहिने बाँस के पूजब तखन छऽ लगायब हे।
आहे ई थिक काठ सुकाठ एही सँ मारब बान्हव हे।
आकि वृन्दावन बाँस कटायब कि मड़बा बनायब हे।

मड़ठट्ठीक गीत
जन्म सुफल आइ भेल की आंगन माड़ब भेल हे।
जन्म सुफल ओहि बाबाक जिनका आंगन माड़ब हे।
जन्म सुफल ओहि बाबीक जनिका कुल पुत्र भेल हे।
पीयरहि खड़ छरायब कि लाल झालरि लगायब हे।
ताहि माड़व बैसत फल्लाँ बरुआ जिनकर जनउ हैत हे।
चहुदिस रहतनि सर सम्बन्धी की माड़ब सोहाओन हे।




मड़वा छारैक गीत
बाबा हे फल्लाँ बाबा मड़वा छारि मोहि दैह।
बरिसत हे नन्हबुनिया मेघ,
भाीजत हे मोरा बालक बरुआ,
पीताम्बर ओढ़न को दैह। बाबा हे....
बाबी हे फल्लाँ बाबी आँचर झाँपि मोहि लैह।
बरिसत हे नन्हबुनिया मेघ,
भीजत हे मोरा बालक बरुआ,
आँचर झाँपि मोहि लैह। बाबा हे....
मड़बा नीपक गीत
बाबा दान दीअ यौ, मटिया कोड़ैक इनाम दीअ यौ।
बाबा दान दीअ यौ, मड़बा नीपैक इनाम दीअ यौ।
गइया जे देलौ बछिया लगाय,
आर किछु दान बेटी आमा सँ लीअ?
आमा दान दीअ यै, मड़बा नीतैक इनाम दीअ यौ।
बाली जे देलौ बेटी झुमका लगाय,
आर किछु दान बेटी भैया सँ लीअ।
भैया दान दीअ यौ, मड़वा नीपैक इनाम दीअ यौ।
कंगना जे देल खीलन लगाय,
आर किछु दान बहिन काकी सँ लीअ।

बलिप्रदान कालक भगवती गीत
बदन भयावन कान बीच कुण्डल विकट दषन घन पाँती।
फूजल केष वेष तुअ के कह जनि नव जलधर काँती।
काटल माथ हाथ अति शोभित तीक्ष्ण खड़ग्कर लाई।
भय निर्भय बर दहिन हाथ लय रहिअ दिगम्बरि माई।
पीन पयोधर ऊपर राजित लिधुर स्रावित मुण्डहारा।
कटि किंकणि शब कर मण्डित सिक बह शोणित धरा।
बसिय मसान ध्यान सब ऊपर योगिन गण रहु साथे।
नरपति पति राखिअ जग ईष्वरि करु महिनाथ सनाथे।

बेटा विवाह
कुमरमक गीत
(1)
हम ते पोखरि खुनबै तेइ के घाट मढ़ैबै।
छिनारो आयल करिहें ओहि रे पोखरिया मे।
रसिया बात बाजू सम्हारि, छोड़ू हमरा से अरारि।
हम त झुलफी धय घिसिआयब पोखरिया मे।
हम त कोठवा उठैब तेइ मे खिड़की लगैब।
छिनरो अबायल करिहें ओहि रे कोठरिया मे।
रसिया बात बाजू सम्हारि छोड़ू हमरा से अरारि,
हम त झुलफी धय घिसिआयब कोठरिया मे।
हम त पलंगा लगैब तेइ मे तोसक ओछायब।
छिनरो आयल करिहें ओहि रे पलंगिया मे।
रसिया बात बाजू सम्हारि छोड़ू हमरा से अरारि।
हम त झुलफी घय घिसिआयब पलंगिया मे।
(2)
रिमझिम रिमझिम बुन्दे बरसि गेल, अंगना मे पड़ल कजरिया।
थरिया धोबै गेलि फल्लाँ छिनरिया, खसली टांग अलगइया।
घेड़बा चड़ल एलखिन फल्लाँ रसिया उठ गै छिनो हरजैया।
हम कोना उठबौ रसिया, तोहर बचनिया डरबा मे पड़लैमचकिया।
डरबा मचकिया के की की दबैया, सोठि पीपरि मरचइया।
सोठि पीपरि के बड़ रे जहरिया, अतर गुलाब ठंदैइया।

जुटिका बन्धनक गीत

कोने बाबा केरा गाछ रोपल, केरा कोसाय गेल हे।
कोने बाबीक बरुआ उमत भेल राति शहर बसु हे।
फल्लाँ बाबा केरा गाछ रोपल केरा कोसाय गेल हे।
फल्लाँ बाबी बरुआ उमत भेल राति शहर बसु हे।
मड़बहि घीव ढ़रकि गेल स्वर्ग इजोत भेल हे।
स्वर्गक पितर आनन्द भेल आब कुल रहत हे।

आमश्महु विआहय लेल जयबा कालक गीत

जाइत देखल पथ नागरि सजनी गे,आगरि सुबुधि सयानि।
कनकलता सन सुन्दरि सजनीगे, विधि निरमाओल आनि।
चलैत हस्ति गमन सन सजनी गे, देखैत राजदुलारि।
जनिकर ऐहन सोहागिनि सजनी गे, पाओल पदारथ चारि।
निल वसन तन घेरल सजनी गे, सिर लेल चिकुर सम्हारि।
ओहि भ्रमर रस पीबह सजनी गे, बैसल पंख पसारि।

आमश्महु विआहक गीत
(1)
आम बीछै गेली छिनरो, आँठी विछि लैली हे।
पचास बेर मना देलियह, तैयो ने तो मानली हे।
आम महु बिआहै छलै, तही से भुलेलियै हे।
हजार बेर मना देलियह, तैयो ने तो मानली हे।
(2)
अमुआ मजरि गेल जमुआ मजरि गेल चम्पाकली
ताहि तर छिनरो ठाढ़ि नयना सँ नीरे ढरी।
घोड़बा चढ़ल एलखिन फल्लाँ रसिया
किए अकेली ठाढ़ं, नयना सँ नीरे ढरी।
सासु मोर बुढ़िया हे ननदी ससुररिया
मोर पिया गेलै परदेष, नयना सँ नीरे ढ़री।
छाड़ि दीअ आ गे छिनरो घरबा दुअरबा
सुख सम्पति सगरी।
छोड़ि दैह बिअहुआ के आष चल हमरो नगरी
अगिया लगेबै रसिया के घरबा दुअरबा, सुख सम्पति सगरी।
बज्र खसेबै तोरे माथ मोर पिया आते रही।

उपनयन कालक गीत
(1)
चैतहि बरुआ विजय भेल बैषाख पाहुन भेल हे।
घर पछुआर केबटा बसु पार उतारि देहु हे।
जौं हम पार उतारब जायब कओन देष हे।
जायब हम जाहि देष जहाँ अपन बाबी हे।
बाबी के चरण पखारब लाल जनउआ देती हे।
(2)
काषी मे जाय बरुआ ठाढ़ भेल जनऊ पुकारय हे।
आहे के थिका काषी के वासी जनऊ मोहि चाहिय हे।
सुतल छला बाबा कवष्वनाथ सेहो उठि बैसला हे।
आहे हम थिकौं काषी के वासी जनऊआ पहिरायब हे।
झारिखंड जाय वरुआ ठाढ़ भेल जनऊआ माँगय हे।
आहे के थिका झारिखंड वासी जनऊ मोहि चाहिय हे।
हम थिकौं झारिखण्ड वासी जनऊआ पहिरायब हे।
आंगन आबि ठाढ़ि भेल भिखि मांगय हे।
हम थिकौं अहाँ के बाबी झोरी भरिय देव हे।

भीख कालक गीत

मिथिलाक रुसल बरुआ काषी कथि लेल जाय।
आगे दाय कियो नहि हित बन्धु जे बरुआ लेल बिलमाय।
आगे दाय बाबा से बड़का बाबा बरुआ लेल विलमाय।
बाबी से अइहब बाबी भीख नेने ठाढ़ि।
आगे माइ भिखो ने लियै बरुआ मुँहो सँ ने बजाय।
पहिरय लय पीयर धोती ओढ़य लेल मांगल चादर।
आगे माय हाथ दुनु मंट्ठा माँगे कान दुनु सोन।
आगे माइ मिथिलाक रुसल बरुआ काषी कियै जाय।

पुरोहित के गारि

बकलेल बभना चूड़ा दही चाटय ऐला हमर अंगना।
चाउर देलियनि दालि दलियनि धेलनि अंगना।
एक रती नोन लय करै छथि खेखना।
धेती देलियनि तौनी देलियनि धेलनि अंगना।
एकटा गमछा ले करै छथि खेखना।
सोन देलियनि चानी देलियनि धेलनि अंगना।
एकटा पाइ ले कोना करै छथि खेखना।





जनउ कालक गीत
लाल पीयर अछि माड़ब पाने पात छारल हे।
ताहि माड़ब बैसलाह बाबा से फल्लाँ बाबा हे।
बगल भए बैसलखिन बाबी से ऐहब बाबी हे।
कोरा बैसौलनि बरुआ से फल्लाँ बरुआ हे।
बरुआ जे मँगै बाबी लाल पीयर जनऊ दिय हे।
रहुश्रहु बाबू आइ अहाँ ब्राह्मण होएव हे।
कि लाल जनऊआ देब हक कि पियर जनऊआ हक।

चुमाओन कालक गीत
आइ षिवक चुमाओन हेमन्त घर मे।
सखि सब गाबै मंगलाचार हेमन्त घर मे।
आंगन चानन निपू मनाइन गजमोती चैक पुराइ।
काँचहि बाँस के डलबाँ बुनाओल।
ताहि राखब दूभि धान हेमन्त घर मे।
चुमबै बैसली सासु मनाइनि।
गौरी सहित त्रिपुरारी हेमन्त घर मे।
दुबि अक्षत लय मुनि सब आयल।
जय जय शब्द सुनाय हेमन्त घर मे।

दनही आ बिलौकी कालक गीत
(1)
अमुआ मजरि गौले महुआ मजरि गेलै।
ताहि तर फल्लाँ छिनरो ठाढ़ि नयना सँ नीर झरे।
घोड़बा चढ़ल एलखिन फल्लाँ रसिलवा, कियै छिनरो एकसरि ठाढ़ि।
सासु मोरा आन्हर ननदि गेल निज घर, मोर पिया गेल परदेष।
नयना......
छोड़ि दिहो छिनरो घरबा दुअरबा, छोर विहुआ के आस।
नयना........

(2)
नामि नामि कोसिया मे जुटिया गूथविह लटका के चलिहह ना।
छिनरो गोरी बदन बिछा के चलिहह ना।
पतरी कमरिया मे डरकस पहिरि लचका के चलिहह ना।
गोरे कलइया मे घड़ी पहिरि देखा के चलिहह ना।
गोरेश्गोरे अखिया मे सुरमा लगाबिह मचका के चलिहह ना।

बेटा विवाह
विवाहक लेल जाय कालक गीत (कुमार)
(1)
जहि दिन आहे बाबू तोरो जनम भेल, अन्न पानि किछु ने सोहाय हे।,
सेहो बाबू चलला गौरी विआहन, दुधबाक दाम दहु ने चुकाय हे।
दूधक दाम अम्मा सधियो ने सकइछ, पोसाइक दाम दै देव हे।
जाबत जीव अम्मा सध्यिो ने सकइछ, धनी हेती नौरी तोहार हे।
नित दिन आहे अम्मा चरण दबेती, भोरे उटि करती प्रणाम हे।
(2)
पाकल पान के बिड़िया लगाओल
नगर मे पड़ल हकार।
आबथु देवलोक बैसथु माड़ब चढ़ि,
सब मिलि साजु बरियात हे।
कौने बाबा साजल आजनश्बाजन
कौने बाबा साजु बरियात हे।
कौने बाबी साजल दुलहा दुलरुआ,
झलकैत जायत बरियात हे।
(3)
साँठह आहे आमा सिन्दुरक पुरिया, नगर मे पड़ल हकार हे।
साजह आहो बाबा दुलहा दुलरुआ, दूर जायत बरियात हे।
जखनहि रामजी कोबर बिच आयल, सरहोजि छेकल दुबारि हे।
हमरा के दान दीअ ननदोसिया, तखन कोबर देव पैर हे।
मोरा कुल आहे सरहोजि बहिनी ने जनमल, राम लखन दुहु भाइ हे।
सेहो भाइ मोर संगहि अयलाह, सरहोजि मांगथि दहेज हे।
बरियातीक गीत
(1)
ऊँची महलिया मालिनि के घर, नीचा लागल फुलवारी हे।
ले गे मालिनि सोनाक सूइया, बाबू के गूँथि दे मौरि हे।
मौरि लय आयल मालिन, कहलक के देत मौरक दाम हे।
घर सँ बाहर भेला फल्लाँ बाबा, हम देब मौरक दाम हे।
(2)
कौने बाबा सजल घोड़ हाथी कौने बाबा साजु बरियात हे।
कौने दुलहा साजथु रहिमल घोड़ा साजि चलल बरियात हे।
तिल एक आहे बाबू घोड़ा विलमाव अमा गोर लागि लिय हे।
जुरहि जैहह बाबू जुरहि अबिह जुरहि होयत विवाह हे।
रहमल घोड़ा सलामति रहतै शुभ2 होयत विवाह हे।
नगहर भरबाक गीत
भरय चलली सखि सिरहर नव कलष मँगाइ।
चानन सिरहर उर लय शुभ सिन्दुर लगाइ।
सागर तट जब महुँचल सब नारी।
सिर सँ कलष उतारल देल आमक डारी।
लोचन प्रीत जुड़ायल सब मिलि मंगल गावे।
सब के ई दिन होय विधाता लिखथि भागे।

शुभ कार्य मे विदा होयबा कालक गीत
शुभे ल बहार भेलि बेटीक माय,
काहु हाथ नारियल काहू दूबि धान,
काहू खोंइछा साँठल पाकल पान
भैया हाथ नारियल भौजी दूबि धान।
अमा खोंइछा साँठल पाकल पान।
आजू मोरा आजू मोरा उचित कल्याण,
बीलहह हे तरुणी सिनुर पिठार।

बेटीक विआह (कुमारि गीत)
(1)
कौने बन बोले कारी कोइलिया
कौने बन बोले मयूर हे।
कौने घर बोले सीता हे दुलारी
आब सीता रहति कुमारि हे।
आनन्द बन बोले कारी कोइलिया
निकुंज बन बोले मयूर हे।
राजा जनक घर सीता बेटी बोले
आब सीता व्याहन जोग हे।
जाहक आहो बाबा राज अयोध्या
जहाँ बसै दषरथ राज हे।
राजा दषरथ के चारि पुत्र छनि
राम लखन दुइ वीर हे।
गोरहि देखि जनु भुलहि हो बाबा
श्यामहि तिलक चढ़ैब हे।
अपन जोग बाबा समधि जोहब
नगर जोकर बरिआत हे।
सीता जोकर बाबा लायब जमैया
देखत जनकपुरक लोक हे।
(2)
जहि दिन आहे बेटी तोहरो जनम भेल से दिन कहलो ने जाय।
चिन्ता निन्द हरित भेल बेटी थीर नहि रहल गेयान।
कथी लय आहे सियाक जन्म भेल से भेल व्याहन योग
से सुनि बाबा उढ़ला चेहाय चलि भेला ताकयं जमाय।
बाँध बनबिहह बाबा पोखरि खुनबिहह लगबिहह आमक गाछ।
हँस जुटत आ कमल फुलायत जल मारत हिलकोर।
ई सरोवर जैतुक नहि माँगत भैया होयता वेहाल।


दरबाजा पर वरियाती ऐला पर
(1)
आउ आउ आहे बहिना सखिया हमार हे।
रतन पलकिया चढ़ि आयल चारु दुलहा।
हाथी घनेरो आबे घोड़ा हजार हे।
कतेक वरियाती आबे पाबी न पारे हे।
जेहने कुमारि तेहने चारु कुमार हे।
तिरहुत के नर नारी देखय मुँह उघारि हे।
लग भऽ जाऊ बहिनि लाज बिसारि हे।
गाओल सिनेहलता मन के उसारि हे।

(अगिला अंकमे)
कल्पना शरण

इण्टरनेट स्वयंवर

इण्टरनेटके अद्भुत तकनीक
खोलने छल सब बन्द द्वार
चैटक सुविधा पाबि कऽ
ललायित मोन बार्रबार

घरमे बैसले बैसल घूमै छलहुँ
हम विश्व के कोर्नाकोना
अपने नामकरणमे लीन भेलहुँ
अलीसा नोरा केली आ कि वैह मैडोना

जखन शुरू होय छल असल बात
हम नहिं किछु नुकेलहुँ डर सऽ
हमरा आनो स यैह अपेक्षा रहल
जे कहै अपना दऽ निर्भीक भऽ

विचारक आदान प्रदान सऽ
कतेको संगे असफल रहलहुँ
दोस्ती सऽ प््रोमक शुरूआत करैके
अपन प्रयास अनवरत रखलहुँ

एक जगह मोनलायक बात बनल
सोचलहुँ अपन असली नाम कही
ताहि सऽ पहिने भेद खुजल
ओ स्त्री छल जकरा पुरूष बुझने रही


१.सतीश चन्द्र झा-भाषा आ राजनीति आ २.सुबोध कुमार ठाकुर-जुग बदलि गेल
१.सतीश चन्द्र झा
भाषा आ राजनीति

अछि घातक आतंकबाद सँ
बढ़ि क‘ ई भाषा के झगड़ा।
कखन कतय ई आगि लगायत
कोना एकर पहिचानब चेहरा।

अछि रहस्यमय राजनीति के
क्रिया कलाप कर्म मन वाणी।
छापि रहल अछि पत्र पत्रिका
प्रतिदिन एकरे एक कहानी।

कखनो बाँटत जाति जाति कें
कखनो सीमा शरहद भारी।
कखनो बात धर्म के कहि क’
लगा देत सौंसे चिनगारी।

कतेक होइत दै चेहरा एकरो
जानि सकल नहि कियो एखन धरि।
सपथ लैत अछि ’सेवा धर्मक’
समटि लेत धन आँजुर भरि भरि।

स्वार्थ कते धरि खसत खाधि मे
कते आओर लज्जित क्षण आयत।
हिन्दी पर लागल कलंक जे
कोना एकर इतिहास मेटायब।

सीखि लेथु सभ भूखल जन जन
अलग अलग सभ प्रांतक भाषा।
तखने भरतनि पेट आब नहि
रहलै हिन्दी देशक भाषा।

जतय देश मे छै एखनो धरि
लाखो लोकक रोटी सपना।
सड़क कात छतहीन जिन्दगी
कंकर पाथर घास बिझौना।
की मतलब छै एकरा की छै
भाषा,भेष कतय की बान्हल।
बिना परिश्रम सँ नहि औतै
भात दालि थारी मे सानल।

जनहित के कल्याण आब नहि
राजनीति के बनतै भाषा।
छल प्रपंच के अस्त्र सस्त्र सँ
सत्ता सुख सबकें अभिलाषा।

भले लेथु ई शपथ मंच पर
विश्वक प्रचलित सभ भाषा मे।
बदलि सकत नहि हुनक आचरण
जनता ठाढ़ रहत आशा मे।


२.सुबोध कुमार ठाकुर
जुग बदलि गेल
जुग बदलि गेल,
मन बदलि गेल,
जकरे देखू से सनकि गेल
नहि जानि किए, एक दोसरसँ सभ दूर सड़कि गेल,

नहि माइ बाप नहि भाइ-बहिन,
सभ अछि जेना संबंध विहीन,
स्वच्छन्द रमए, स्वच्छन्द विचार लए,
जीबए जिनगी सभ ऐंठ-खिचार भए,
सम्बन्धक माने बदलि गेल
सभकेँ नहि जानि ई की भेल,


क्रोधी कामी अति लालची सभ
अछि दुर्भावनासँ ग्रसित सभ
सभ दिशाविहीन दिगभ्रमित भेल,
जकरे देखू से सनकि गेल,

आजुक परिदृश्यमे,
नारिक जीवन अही सृष्टिमे,
अछि दर्दनाक अतृप्त भेल
तोड़ि लाज सभ नारी परोसी रहल लाजक श्रिंगार,
देखिते जकरा मर्द भुकए बनि के सियार
नारीक परिभाषा बदलि गेल
जकरा देखिते क्षण ठिठकि गेल,
जुग बदलि गेल।


जकरे देखू से जुगल बनल
होइतए नेना जेना जुवान बनल,
हम जा रहल छलहुँ सड़कपर
देखलहुँ नेनाकेँ बालिका प्रति व्यवहार
सहजहि मनमे उठल विचार,
गर्लफ्रेंडक संग प्रेमक परिभाषा बदलि गेल
जुग बदलि गेल, मन भटकि गेल


नहि अछि भेष-भूषा नारीक समान,
नहि जानि कतएसँ आएल ई परिधान
चूड़ी, लहठी आ साड़ीकेँ छोड़ि
नारी आब जीन्स अधकट्टी स्कॉट संग भेल,
जुग बदलि गेल, मन भटकि गेल,

सभ भागि रहल फुसियाहींक आडम्बरपर,
सभ नाचि रहल बिन बाजनपर
नमस्कार अभिवादन छोड़ि,
आब हाए-बाय आबि गेल,
जुग बदलि गेल।

चाही सभकेँ खूब विलाश,
सभकेँ खजानाक छै तलाश
जिनगीक फुसियाही साधन जुटबैक लेल,
जिनगीयेकेँ सभ बिसरि गेल,
जुग बदलि गेल

सभ अछि अशान्त, अछि लोक कालहंत,
पाश्चात्य सभ्यता केलक सभकेँ परेशान
जे ग्रह बनि शान्तिकेँ निगलि गेल
पुछै अपन संस्कृति कतए सभक सुबोध गेल,
जग बदलि गेल,
सभ भटकि गेल।
१.श्यामल सुमन-मैथिली दोहा २.अजित कुमार मिश्र-अप्पन माटि
१.श्यामल सुमन
मैथिली दोहा
प्रश्न सोझाँ मे ठाढ़ अछि अप्पन की पहचान।
ताकि रहल छी आय धरि भेटल कहाँ निदान।।
ककरा सँ हम की कहू अपना मे सब मस्त।
समाचार पूछल जखन कहता दुख सँ त्रस्त।।
पँसल व्यूह मे स्वार्थ केर सब देखू बेहोश।
झूठ मूठ मुखिया बनथि खूब बघारथि जोश।।
हम देखलहुँ नहि आय धरि मैथिल सनक विवाह।
दान दहेजक चक्र मे बहुतो लोक तबाह।।
बरियाती केँ नीक नहि लागल माछक झोर।
साँझ शुरू भोजन करत उठैत काल तक भोर।।
रसगुल्ला, गुल्ला बनाऽ खाओत रस निचोड़ि।
खाय सँ बेसी ऐंठ कऽ देता पात मे छोड़ि।।
मैथिलजन सज्जन बहुत लोक बहुत विद्वान।
निज-भाषा, निज-लोक पर कनिको नहि छन्हि ध्यान।।
चोरि, छिनरपन छोड़ि कय करू अहाँ सब काज।
मैथिलजन तखने बचब बाँचत सकल समाज।।
जाति-पाति केँ छोड़िकऽ बनू एक परिवार।
मिथिला के उत्थान हित कोशिश करू हजार।।
अपन लोक बेसी जुटय बाजू मिठका बोल।
सुमन टूटल जौं गाछ सँ तखन ओकर की मोल।।

२.अजित कुमार मिश्र




अप्पन माटि


दूर देशमे अहाँ बसै छी
मन अछि हमर घोर यौ ,
चिट्ठी-पतरी किछु नहि पठबी
हम कोनाकेँ जीबि यौ ।।1।।
छोड़ि गाम जे शहर भगलिऐ
लए आसक सब पोटरी यौ ,
आस बदलि निराश भेल अछि
आबहुँ तँ घूमि अबियौ यौ ।।2।।
चिट्ठी पबितहिं पकड़ू गाड़ी
तेजू शहरक पानि यौ ,
पानिक बदला शोणित पीबी
तकरो नै भेल ज्ञान यौ ।।3।।
चिट्ठी नै हम सप्पत दै छी
जँ मानी अप्पन यौ ,
घुरती बेरक गाड़ी पकड़ू
पहुँचू गाम- सिमान यौ ।।4।।
आब गाम ओ गाम नै रहलै
जत्तए दर-दर ठोकर यौ ,
लूरि जेहन अछि तेहने काजो
गाम-गाममे पसरल यौ ।।5।।
गाम गाम नै धाम बनल छै
चहु दिस नव वितान यौ ,
गाम पहुँचिकेँ नाम करू अहँ
फेर नै शहरक नाम यौ ।।6।।
अप्पन गामक अलगे गुण छै
नै छै दोसर ठाम यौ ,
घुरि फीरिकेँ सब अबैऐ
राखू हमरो मान यौ ।।7।।

१.बिनीत ठाकुर-गीत आ २. दयाकान्त मिश्र-हे मैथिल आबो जागु

विनीत ठाकुर


गीत


ठकन काका हो कलयुगमे देखल बड़ अजगुत
मनुषक भेषमें घुमे सबतैर आब यमके दुत

आबनै चानमें ओ शितलता मलिनभेल सुरुजक लाली
स्वार्थक बसमें पैर मनुष सब करैय काज बेताली
भरल बसन्तमे कुहके कोयलिया पुत भेल कपुत

नोर बैन हिमालयसँ निकले कमला, कोशीके पानी
हिचुके गंगोत्रीसँ गंगा सबके भेल एक कहानी
नव दुलहिन धर्ती माताके छिन्न भेल सारीके सुत

जे कहाबे अपनाके ज्ञानी उहे करे खिचातानी
के नव बाट देखा मिथिलाके लिखत सुन्दर कहानी
कहिया धैर जाल सोझराक मैथिल हायत मजगुत
२. दयाकान्त मिश्र

हे मैथिल आबो जागु

बितल राईत भऽ गेल भोर
चिडे-चुनमुनी करैया सोर
सुरजक ललिमा भू पर पसरल
दैत अछि एकटा नव सनेश
हम जग्लहु अंहु जागु
अधिकारक लेल आगू आबू
हे मैथिल आबो जागु

कालि राज आई शिवराज
किया करैया अहांक कात
कखनो गोवा कखनो असम
कखनो पंजाब कखनो गुजरात
कि अहाँ नहि छी भारतवासी ?
गर्व सऽ अपन अधिकार जताबु
हे मैथिल आबो जागु

जागु जनक धिया वैदेही
जागु बुढ, नैना, जुआन
जात धरम सब ताक़ राखी कऽ
सबमिली कऽ करू संग्राम
छोरु पार्टी स्वार्थ अपन सब
आई माय के लाज बचाबू
हे मैथिल आबो जागु

आई अहाँ नहि आगू आयब तऽ
पढ़त गाईर इतिहास
आई अहाँ नहि एक होयब तऽ
होयत अहिना उपहास
सरशताक अहि धरती सऽ
कर्कश्ताक बिगुल बजाबू
हे मैथिल आबो जागु

शेफालिका वर्मा
जन्म:९ अगस्त, १९४३,जन्म स्थान : बंगाली टोला, भागलपुर । शिक्षा:एम., पी-एच.डी. (पटना विश्वविद्यालय),सम्प्रति: ए. एन. कालेज मे हिन्दीक प्राध्यापिका ।प्रकाशित रचना:झहरैत नोर, बिजुकैत ठोर । नारी मनक ग्रन्थिकेँ खोलि:करुण रससँ भरल अधिकतर रचना। प्रकाशित कृति :विप्रलब्धा कविता संग्रह,स्मृति रेखा संस्मरण संग्रह,एकटा आकाश कथा संग्रह, यायावरी यात्रावृत्तान्त, भावाञ्जलि काव्यप्रगीत । ठहरे हुए पल हिन्दीसंग्रह ।

बाजी


ई हमर देश थीक

एहिठाम मानव की मानवकेँ चीन्हि सकल?
तरहत्थापर टघरैत पारा सन मानवक मोन
स्थिरता नहि।

आदमीक जंगल बढ़ि रहल
गाछ बृच्छ कटि रहल
कोनो बाट घाट, कोनो राह हाट
मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारा
वा कि
चर्चक हो वोसारा
भीड़क अन्त नहि...
की पएरे की रिक्शा
की कार की स्कूटर
तरह्हक सवारीपर भगैत
उजहिया चढ़ल मानवक अन्त नहि...
ई दिशाहीन भीड़:

भूत भविष्यक चिन्ता नहि
वर्तमानसँ संतुष्टो नहि
भागि रहल निरन्तर
भागि रहल जन प्रवाह...


संवेदना तितीक्षा
नहि भेटत शब्दकोशोमे जल्दी

मानवक आवश्यक आवश्यकता सन
शब्दकोशो आकार पाबि रहल
निरर्थक शब्द संसारक प्रयोजने की?
कागदोक दाम तँ बढ़ि गेल
पत्र-पत्रिका छापत कोना
प्रदूषणक हल होयत कोना
जे एकटा गाछ रोपल जाइत अछि तँ
सए नेना जनम लए लैत अछि
ऑक्सीजन पाओत कत्तऽ मेनिंजाइटिस
एड्स स्पोंडीलाइटिस सन अनचिन्हार बीमारी लोककेँ मारए लागल
एतबहि नहि
दहेजक बढ़ैत रोग बेटीक बापकेँ
ढाहए लागल
ओ दिन दूर नहि अछि जखन
मानव मानवकेँ मारि खाए लागत
आ एकटा प्रश्न तखनो समस्या बनल रहि जाइत अछि
मानवक बेशी वृद्धि की
मँहगी केर..?
बाजी दुनूमे लागल अछि
के कतेक आगू
केकर कतेक जोर...????
राम कतए चलि गेल...

बालानां कृते-
१.देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स)
२.कल्पना शरण: देवीजी

देवांशु वत्स, जन्म- तुलापट्टी, सुपौल। मास कम्युनिकेशनमे एम.ए., हिन्दी, अंग्रेजी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे कथा, लघुकथा, विज्ञान-कथा, चित्र-कथा, कार्टून, चित्र-प्रहेलिका इत्यादिक प्रकाशन।
विशेष: गुजरात राज्य शाला पाठ्य-पुस्तक मंडल द्वारा आठम कक्षाक लेल विज्ञान कथा “जंग” प्रकाशित (2004 ई.)

नताशा:
(नीचाँक कार्टूनकेँ क्लिक करू आ पढ़ू)
नताशा तीस

नताशा एकतिस

२.कल्पना शरण: देवीज
देवीजी : बिहारक नृत्य शैली

बच्चा के भगवानक रूप मानैवाली देवीजी 14 नवम्बर के बाल दिवस समारोह केना बिसरि सकैत छली।अहि बेर ओ बच्चा सबके बिहार के विभिन्न प्रकारक नृत्य देखाबैक विचार बनेने छली। कार्यक्रममे बाहर सऽ कलाकार के बजाओल गेल छल जे बच्चा सबके प्रत्येक प्रकारक नृत्यके प्रस्तुति के पहिने ओकर विवरण सेहो दैत छल।अहि कार्यक्रममे निम्नलिखित नृत्य देखाओल गेलः

1 झिझियन नृत्यः अहि नृत्यके इन्द्र देव के प्रसन्न करैलेल कैल जायत छै।आन नृत्य सऽ अलग अहि नृत्यके बरसातमे नहि वरन् सूखा के समय मे कैल जायत छै जाहि सऽ अकालक समस्या दूर होई आ बढ़िया फसल होय।अहि नृत्यमे जे गीत गायल जायत छै तकर अर्थ इन्द्रदेवक प््राार्थना होयत छै।बाजा सबमे हारमोनियम बांसुरी ढ़ोलक नगाड़ा इत्यादि पारम्परिक उपकरणके उपयोग होयत छै।

2 सोहर खिलौनाः अहि गीत के बिहारमे विशेषतः मैथिल सबमे बच्चाके जन्ममे गायल जायत छै जाहिमे बच्चाके प्रशंसा भगवान राम आ भगवान कृष्ण स तुलना कऽ कैल जायत छै।अहिमे स्त्री सब गीत नाद सहित भाव भंगिमा सेहो दैत छथिन जाहि लेल अकरा नृत्य के श्रेणीमे राखल गेल छै।

3 जट जटिनः जट जटिन दऽ बड खिस्सा छै मुदा अकर मुख्य पर्याय छै बरसातक समयमे स्त्री सबमे आपसी मनोरंजन।नियम छै जे ब्याहक पहिल बरसातमे कनिया नईहर जायत छैथ आ बेसी के पति सब कमाई लेल बाहर गेल रहैत छथिन। तऽ सब सखी सब मिलिकऽ पति पत्नीक बीच हुअ बला नोक झोंकक खेल खेलाई छथि।अहिमे किछु मनोवाञ्छित उपहार पत्नी मांगने रहैत छथिन आ से नहिं भेटला पर पत्नी उपराग दैत छथिन।किछु लोक नाचै छैथ आ बॉंकि सब देखै छैथ।

4 धामर नृत्य : धामर गीत होली के उपलक्ष्यमे गायल जायत छै जाहिमे लोक सब नृत्य सेहो करैत छथि।मिथिलांचलमे अकरा होरी कहैत छै आ भारतीय संगीतमे धामर राग बहुत प्रसिद्ध अछि।

5 झूमरी नृत्य : झूमरी नृत्य शैली गुजरात के गरवा सऽ मेल खाइत छै।परन्तु बिहार मे ई नृत्य कार्तिक मासके राति मे होयत छै जखन आकाश मेघरहित होयत छै आ पूर्णिमाके चॉंद अपन चॉंदनीसऽ राति जगमगेने रहै छै।

6 मोर मोरनी : ई नाच सेहो बरसातमे होयत छै जाहिमे स्त्रीसब मोर जकॉं नाचऽ लागै छैथ। उत्तरप्रदेशमे अहि तरहक नाचके कजरी कहल जायत छै।

7 विद्यापति नृत्य (बिदापत) : बंगालक रवीन्द्र संगीत जकॉं मिथिलांचलमे विद्यापति गीतके अपन अलग पहचान छै आ ताहि पर ताल मिलाबैत विशेष नृत्य शैली सामान्य वर्गमे बहुत प्रचलित छै। अहि प्रकारक नृत्य के मंचन आ उपर्युक्त प्रोत्साहन भेटने बिहारक संस्कृति के एक विशिष्ट रूप विश्व लग परिलक्षित भऽ सकैत छैै।
अहिके अतिरिक्त जितिया नाच. माझी नाच. नटुआ नाच. आदि सेहो बिहारमे प्रचलित छै तकर जानकारी देल गेल।बच्चा सबके अहिसऽ खूब मनोरंजन भेल।जानकारीपूर्ण हुअक अतिरिक्त परीक्षाके तनावपूर्ण समयमे एहेन मनोरंजन बहुत सहायक साबित भेल।
बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.)
Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.)
इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।
विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.
नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली
(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)
मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश,बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश,वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी,जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत,योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु,तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले,चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन),पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए।
-(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)

2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर,तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठिमा,ठिना,ठमा
जेकर, तेकर
तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६



VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS(Festivals of Mithila date-list)

8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS
8.1.Original Maithili Poem by Smt.Shefalika Varma,Translated into English by Lalan
8.2.Original poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy from New York

DATE-LIST (year- 2009-10)

(१४१७ साल)

Marriage Days:

Nov.2009- 19, 22, 23, 27

May 2010- 28, 30

June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30

July 2010- 1, 8, 9, 14

Upanayana Days: June 2010- 21,22

Dviragaman Din:

November 2009- 18, 19, 23, 27, 29

December 2009- 2, 4, 6

Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25

March 2010- 1, 4, 5

Mundan Din:

November 2009- 18, 19, 23

December 2009- 3

Jan 2010- 18, 22

Feb 2010- 3, 15, 25, 26

March 2010- 3, 5

June 2010- 2, 21

July 2010- 1

FESTIVALS OF MITHILA

Mauna Panchami-12 July

Madhushravani-24 July

Nag Panchami-26 Jul

Raksha Bandhan-5 Aug

Krishnastami-13-14 Aug

Kushi Amavasya- 20 August

Hartalika Teej- 23 Aug

ChauthChandra-23 Aug

Karma Dharma Ekadashi-31 August

Indra Pooja Aarambh- 1 September

Anant Caturdashi- 3 Sep

Pitri Paksha begins- 5 Sep

Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep

Matri Navami- 13 Sep

Vishwakarma Pooja-17Sep

Kalashsthapan-19 Sep

Belnauti- 24 September

Mahastami- 26 Sep

Maha Navami - 27 September

Vijaya Dashami- 28 September

Kojagara- 3 Oct

Dhanteras- 15 Oct

Chaturdashi-27 Oct

Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct

Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct

Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct

Chhathi- -24 Oct

Akshyay Navami- 27 Oct

Devotthan Ekadashi- 29 Oct

Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov

Somvari Amavasya Vrata-16 Nov

Vivaha Panchami- 21 Nov

Ravi vrat arambh-22 Nov

Navanna Parvana-25 Nov

Naraknivaran chaturdashi-13 Jan

Makara/ Teela Sankranti-14 Jan

Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan

Mahashivaratri-12 Feb

Fagua-28 Feb

Holi-1 Mar

Ram Navami-24 March

Mesha Sankranti-Satuani-14 April

Jurishital-15 April

Ravi Brat Ant-25 April

Akshaya Tritiya-16 May

Janaki Navami- 22 May

Vat Savitri-barasait-12 June

Ganga Dashhara-21 June

Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul
Guru Poornima-25 Jul

Original Maithili Poem by Smt.Shefalika Varma,Translated into English by Lalan
Shefalika Verma has written two outstanding books in Maithili; one a book of poems titled “BHAVANJALI”, and the other, a book of short stories titled “YAYAVARI”. Her Maithili Books have been translated into many languages including Hindi, English, Oriya, Gujarati, Dogri and others. She is frequently invited to the India Poetry Recital Festivals as her fans and friends are important people. I do not have to give more introduction of her as her achievements speak for themselves.

As and when lonliness of graveyard
gets down in my eyes
blood of heart solidify into Ahilya
in the jungle of hunger
lotus bismeared with blood smiles
my inner becomes injured
with so called civilization and culture
then
a question ariss in my mind
only a question
to be asked from Janak
why did you send so much gifts
with Sita
you threw away the women folk
into burnning fire of dowry
by even presenting several kingdoms
why did you give birth to dowry system ??

My mind haunts
with a question
again to be asked from Sita...
Sita
why did you agree to undergo
agnipariksha praposed by Ram
being yourself possessed with power
got exploited
by accepting banishment to forest
thus giving birth to silence system
why did you put female life
under pains and sorrow ??
but
see the drama of RAMRAJ
today
dhobi is present in every house
and Ravan in every street
but not visible is RAM
now a days dont know
where Ram has gone
where Ram has gone.........................


Original poem in Maithili by Gajendra Thakur
Translated into English by Lucy Gracy from New York

Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in


Abhinav Bhatkhande
The theft of the eternity of Bhatkhande
The conspiracy of the western music
Seizing the freedom of the Indian music
An abduction of Indian creativity
Because of lack of vision
The politics was fail
The freedom was theft
But the character of Bhatkhande
Set the Indian music free
Dear Ramrang! I read your new Geetanjali
I read that thoroughly
You are truely a new Bhatkhande
The precious treasure of India
You don’t need any name
Your asceticism of fifty year
The vocal definition of freedom
Oh devotee of Hanumaan
Your music was filled with melody of Ramayana
I recalled Tulasidas
His irrespective manner to women and shudra
Your music is victory of Ramayana
New version of freedom
Raag vaidehi, Bhairav raag
Teer Bhukti
Raag vidyapati came from Maithili
You created lyrics filled with words of maithili
In raag Bhupali and raag Bilawal
The fast and slow style of
Raag Vidyapati Kalyan
Your music gave a new recognition
To the Mithila Dhwaj Geet
A new experience
The flying flag denotes
Mental freedom
Standing up after falling down
Leaving the support
Oh Son of Sukhdev Jha
People of Khajura will be said
If we see them
To establish your statue in the village
It is hard to pay off what you did to your kins
The freedom movement should be continued
At the bank of the Ganges in Varanasi
The sage has practices his free style music
An age is ended with him
Whether you recall his name or not
But remember his free style
May be physically handicapped but
Set your mind free
Let your confidence come out with faith
Don’t let your mind over ruled.
(Classical Music theorist and vocalist Shri Ramashray Jha "Ramrang" expired on 1st January 2009, he was music composer of my "Mithilak Dhwaj Geet"- in his memory.)




१.विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions
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३.मैथिली ऑडियो संकलन Maithili Audio Downloads,
४.मैथिली वीडियोक संकलन Maithili Videos
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६.विदेह मैथिली क्विज :
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१८. 'विदेह' प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका मिथिला चित्रकला, आधुनिक कला आ चित्रकला
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१९. मैथिल आर मिथिला (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त)
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२०.श्रुति प्रकाशन
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२१.विदेह- सोशल नेटवर्किंग साइट
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२५.विदेह रेडियो:मैथिली कथा-कविता आदिक पहिल पोडकास्ट साइटhttp://videha123radio.wordpress.com/

२६. नेना भुटका
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महत्त्वपूर्ण सूचना:(१) 'विदेह' द्वारा धारावाहिक रूपे ई-प्रकाशित कएल गेल गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प-गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-किशोर साहित्य विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक खण्ड-१ सँ ७ Combined ISBN No.978-81-907729-7-6 विवरण एहि पृष्ठपर नीचाँमे आ प्रकाशकक साइटhttp://www.shruti-publication.com/ पर।

महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे।
कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर

गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७
Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding:
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६९२ पृष्ठ : मूल्य भा. रु. 100/-(for individual buyers inside india)
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विदेह: सदेह : १ : तिरहुता : देवनागरी
"विदेह" क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित।

विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/
विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:१)
सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर; सहायक-सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा
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"मिथिला दर्शन"

मैथिली द्विमासिक पत्रिका

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कार्यकारी सम्पादक- रामलोचन ठाकुर। प्रतिष्ठाता
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कब लौटेगा नदी के उस पार गया आदमी : भोलानाथ कुशवाहा प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु.225.00
लाल रिब्बन का फुलबा : सुनीता जैन प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु.190.00
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कुर्आन कविताएँ : मनोज कुमार श्रीवास्तव प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 150.00
पेपरबैक संस्करण

उपन्यास

मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007मूल्य रु. 70.00
छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00
कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00
शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00
आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 90.00
कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00
मैथिली पोथी

विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00
संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00
एक टा हेरायल दुनिया (कविता-संग्रह) : कृष्णमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 60.00
दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष2000 मूल्य रु. 40.00
सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 165.00 शीघ्र प्रकाश्य

आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया
पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश
मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा
मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद
जगधर की प्रेम कथा : हरिओम

अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत
अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023,
आजीवन सदस्यता शुल्क भा.रु.2100/-चेक/ ड्राफ्ट द्वारा “अंतिका प्रकाशन” क नाम सँ पठाऊ। दिल्लीक बाहरक चेक मे भा.रु. 30/- अतिरिक्त जोड़ू।
बया, हिन्दी तिमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ
संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023,
आजीवन सदस्यता शुल्क रु.5000/- चेक/ ड्राफ्ट/ मनीआर्डर द्वारा “ अंतिका प्रकाशन” के नाम भेजें। दिल्ली से बाहर के चेक में 30 रुपया अतिरिक्त जोड़ें।
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अंतिका प्रकाशन
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ई-मेल: antika1999@yahoo.co.in,
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श्रुति प्रकाशनसँ

१.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादवमूल्य: भा.रु.१००/-

२.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलन)- गजेन्द्र ठाकुर मूल्य भा.रु.१००/-(सामान्य) आ $४० विदेश आ पुस्तकालय हेतु।

३.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशरमूल्य भा.रु.१००/-

४. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (मूल्य भा.रु.१२५/- US$ डॉलर ४०) आ पेपरबैक (भा.रु. ७५/- US$ २५/-)

५/६. विदेह:सदेह:१: देवनागरी आ मिथिला़क्षर स‍ंस्करण:Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/-
Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु. 100/-

७. गामक जिनगी (कथा स‍ंग्रह)- जगदीश प्रसाद म‍ंडल): मूल्य भा.रु. ५०/- (सामान्य), $२०/- पुस्तकालय आ विदेश हेतु)

८/९/१०.a.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश; b.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आ c.जीनोम मैपिंग ४५० ए.डी. सँ २००९ ए.डी.- मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध-सम्पादन-लेखन-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा

P.S. Maithili-English Dictionary Vol.I & II ; English-Maithili Dictionary Vol.I (Price Rs.500/-per volume and $160 for overseas buyers) and Genome Mapping 450AD-2009 AD- Mithilak Panji Prabandh (Price Rs.5000/- and $1600 for overseas buyers. TIRHUTA MANUSCRIPT IMAGE DVD AVAILABLE SEPARATELY FOR RS.1000/-US$320) have currently been made available for sale.

COMING SOON:

गजेन्द्र ठाकुरक शीघ्र प्रकाश्य रचना सभ:-

१.कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्डक बाद गजेन्द्र ठाकुरक

कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-२

खण्ड-८ क संग

२.सहस्रबाढ़नि क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर उपन्यास

स॒हस्र॑ शीर्षा॒

३.सहस्राब्दीक चौपड़पर क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर पद्य-संग्रह

स॑हस्रजित्

४.गल्प गुच्छ क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर कथा-गल्प संग्रह

शब्दशास्त्रम्

५.संकर्षण क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर नाटक

उल्कामुख


१.जगदीश प्रसाद म‍ंडल-
कथा-संग्रह- गामक जिनगी
नाटक- मिथिलाक बेटी
उपन्यास- मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत
२.मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार गीत आ गीतनाद -संकलन उमेश मंडल- आइ धरि प्रकाशित मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद मिथिलाक नहि वरन मैथिल ब्राह्मणक आ कर्ण कायस्थक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद छल। पहिल बेर जनमानसक मिथिला लोक गीत प्रस्तुत भय रहल अछि।
३.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन

४.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह

५.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन

६.विभारानीक दू टा नाटक: "भाग रौ" आ "बलचन्दा"

७.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल

८.मिथिलाक जन साहित्य- अनुवादिका श्रीमती रेवती मिश्र (Maithili Translation of Late Jayakanta Mishra’s Introduction to Folk Literature of Mithila Vol.I & II)
९.मिथिलाक इतिहास – स्वर्गीय प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी

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विदेह:सदेह:१ (तिरहुता/ देवनागरी)क अपार सफलताक बाद विदेह:सदेह:२ आ आगाँक अंक लेल वार्षिक/ द्विवार्षिक/ त्रिवार्षिक/ पंचवार्षिक/ आजीवन सद्स्यता अभियान।
ओहि बर्खमे प्रकाशित विदेह:सदेहक सभ अंक/ पुस्तिका पठाओल जाएत।
नीचाँक फॉर्म भरू:-
विदेह:सदेहक देवनागरी/ वा तिरहुताक सदस्यता चाही: देवनागरी/ तिरहुता
सदस्यता चाही: ग्राहक बनू (कूरियर/ रजिस्टर्ड डाक खर्च सहित):-
एक बर्ख(२०१०ई.)::INDIAरु.२००/-NEPAL-(INR 600), Abroad-(US$25)
दू बर्ख(२०१०-११ ई.):: INDIA रु.३५०/- NEPAL-(INR 1050), Abroad-(US$50)
तीन बर्ख(२०१०-१२ ई.)::INDIA रु.५००/- NEPAL-(INR 1500), Abroad-(US$75)
पाँच बर्ख(२०१०-१३ ई.)::७५०/- NEPAL-(INR 2250), Abroad-(US$125)
आजीवन(२००९ आ ओहिसँ आगाँक अंक)::रु.५०००/- NEPAL-(INR 15000), Abroad-(US$750)
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(ग्राहकक हस्ताक्षर)


२. संदेश-

[ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ]

१.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत।
२.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी।
३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"कँु अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल,तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत।
४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन।
५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथीकुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी।
६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि।
७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू।
८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।
९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना।
१०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।
११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।
१२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।
१३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।
१४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी।
१५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी।
१६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाई। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। ..सुभाष चन्द्र यादवक कथापर अहाँक आमुखक पहिल दस पंछक्तिमे आ आगाँ हिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेजी शब्द अछि (बेबाक, आद्योपान्त, फोकलोर..)..लोक नहि कहत जे चालनि दुशलनि बाढ़निकेँ जिनका अपना बहत्तरि टा भूर!..( स्पष्टीकरण- दास जी द्वारा उद्घृत अंश यादवजीक कथा संग्रह बनैत-बिगड़ैतक आमुख १ जे कैलास कुमार मिश्रजी द्वारा लिखल गेल अछि-हमरा द्वारा नहि- केँ संबोधित करैत अछि। मैथिलीमे उपरझपकी पढ़ि लिखबाक जे परम्परा रहल अछि तकर ई एकटा उदाहरण अछि। कैलासजीक सम्पूर्ण आमुख हम पढ़ने छी आ ओ अपन विषयक विशेषज्ञ छथि आ हुनका प्रति कएल अपशब्दक प्रयोगक हम भर्त्सना करैत छी-गजेन्द्र ठाकुर)...अहाँक मंतव्य क्यो चित्रगुप्त सभा खोलि मणिपद्मकेँ बेचि रहल छथि तँ क्यो मैथिल (ब्राह्मण) सभा खोलि सुमनजीक व्यापारमे लागल छथि-मणिपद्म आ सुमनजीक आरिमे अपन धंधा चमका रहल छथि आ मणिपद्म आ सुमनजीकेँ अपमानित कए रहल छथि।..तखन लोक तँ कहबे करत जेअपन घेघ नहि सुझैत छन्हि, लोकक टेटर आ से बिना देखनहि, अधलाह लागैत छनि..(स्पष्टीकरण-क्यो नाटक लिखथि आ ओहि नाटकक खलनायकसँ क्यो अपनाकेँ चिन्हित कए नाटककारकेँ गारि पढ़थि तँ तकरा की कहब। जे क्यो मराठीमे चितपावन ब्राह्मण समितिक पत्रिकामे-जकर भाषा अवश्ये मराठी रहत- ई लिखए जे ओ एहि पत्रिकाक माध्यमसँ मराठी भाषाक सेवा कए रहल छथि तँ ओ अपनाकेँ मराठीभाषी पाठक मध्य अपनाकेँ हास्यास्पदे बना लेत- कारण सभकेँ बुझल छैक जे ओ मुखपत्र एकटा वर्गक सेवाक लेल अछि। ओना मैथिलीमे एहि तरहक मैथिली सेवक लोकनिक अभाव नहि ओ लोकनि २१म शताब्दीमे रहितो एहि तरहक विचारधारासँ ग्रस्त छथि आ उनटे दोसराक मादेँ अपशब्दक प्रयोग करैत छथि-सम्पादक)...ओना अहाँ तँ अपनहुँ बड़ पैघ धंधा कऽ रहल छी। मात्र सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक।( स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ- विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे http://www.videha.co.in/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि आ किएक रखने छथि वा आगाँसँ दाम नहि राखथु- ई सभटा परामर्श अहाँ प्रकाशककेँ पत्र/ ई-पत्र द्वारा पठा सकै छियन्हि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग।
१७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल।
१८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई।
१९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत।
२०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ।
२१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ।
२२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य।
२३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई।
२४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि।
२५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक हमर उपन्यास स्त्रीधनक विरोधक हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए। ओना अहाँक मंत्रपुत्र हिन्दीसँ मैथिलीमे अनूदित भेल, जे जीवकांत जी अपन आलेखमे कहै छथि। एहि अनूदित मंत्रपुत्रकेँ साहित्य अकादमी पुरस्कार देल गेल, सेहो अनुवाद पुरस्कार नहि मूल पुरस्कार, जे साहित्य अकादमीक निअमक विरुद्ध रहए। ओना मैथिली लेल ई एकमात्र उदाहरण नहि अछि। एकर अहाँ कोन रूपमे विरोध करब?)
२६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक।
२७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत।
२८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी।
२९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना।
३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी।
३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि।
३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई।
३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई।
३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई।
३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक।
३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ।
३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम।
३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना।
३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ।
४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल।
४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई।
४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य।
४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना।
४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि।
४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक।
४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत।
४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि।
४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंकसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत।
४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना।
५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना।
५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना।
५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल।
५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना।
५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल।
५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना।
५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल।
५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई।
५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि।
५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी।
६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि।
६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब।
६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी।
६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही।
६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय।
६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना।
६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय।
६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह।
६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना ।
६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ।
७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक)
७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनकसेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि।

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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...