Tuesday, December 15, 2009

'विदेह' ४७ म अंक ०१ दिसम्बर २००९ (वर्ष २ मास २४ अंक ४७)- PART II

३. पद्य

३.१. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009

३.२. राजदेव मंडल-बाढ़िक चित्र

३.३.उमेश मंडल (लोकगीत-संकलन)- आगाँ

३.४.कल्पना शरण-शीतल बयार

३.५.१. बिनीत ठाकुर-गीत आ २.मनीष ठाकुर, ३.चन्द्रकान्त मिश्र
३.६.कुसुम ठाकुर
३.७. शिव कुमार झा
३.८.१.कामिनी २.धर्मेन्द्र



कालीकांत झा "बुच" 1934-2009
हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे1934 ई0 मे भेलनि । पिता स्व0 पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक
प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह । माता स्व0 कला देवी गृहिणी छलीह । अंतरस्नातक समस्तीपुर काॅलेज,समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंडकर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभकयलनि । बालहिं कालसँ कविता लेखनमे
विषेश रूचि छल । मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि, भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि । साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादकडाॅ0 बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे डाॅ0 विद्यापति झा हिनक रचना
‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि ।
डाॅ0 दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि |

!! मुन्ना कक्का सासुर चलला !!

कच्छी कऽसि - कऽसि तहिपर धोती रऽचि दृ रऽचि कऽ ।
मुन्ना कक्का सासुर चलला, पूरा सजि-धजि कऽ ।।

सबसॅ पहिने पोखरि धॅसला,
चढिते काठ उनटि कऽ खसला ।
मललनि माथ माॅटि करिऔटी,
ऊपर अयला झारि लंगोटी ।।

अधमानी झामा सॅ गत्तर - गत्तर मलि-मलि कऽ,
मुन्ना कक्का सासुर चलला, पूरा सजि-धजि कऽ ।।

एते किएक बेकल हौ मुन्ना,
तेरे एकटा सासुर की ?
ज्तरा करऽ दिन देखबा कऽ,
बाबा जी कहि देलनि ई ।

अधपहरा जखने हेतै, दू मिनट हेतै दस बजि कऽ,
मुन्ना कक्का सासुर चलला, पूरा सजि-धजि कऽ ।।

ताबरतोर चलल जा रहला,
जेठक तेज बिहाडि जकाॅ ।
रैन कतहु ने, पडे बाट मे,
साॅझ लगए मुनहारि जकाॅ ।

हुलसल डेग बढाबथि आगाॅ हुमचि - हुमचि कऽ,
मुन्ना कक्का सासुर चलला, पूरा सजि-धजि कऽ ।।

झाॅपल मुँहें सासु कहलथिन,
झा दृ हमरा बड मानै छथि ।
जखन - तखन हमरो खातिर,
गरमे रसगुल्ला आनै छथि ।

अझुका सबटा गुलगुल्ला थिक झा बजला हॅसि-हॅसि कऽ,
मुन्ना कक्का सासुर चलला, पूरा सजि-धजि कऽ ।।



!! नोतक प्रेमी !!

धैन हमर छी कक्का औ,
‘‘नोतक प्रेमी‘‘ पक्का औ ।
पेट बांगला देषक पोरवरि,
दाँते बान्ह फरक्का औ ।।

भरलो तौला लेल सुरूक्का,
धोधि बनल तरभुजिआ फुक्का ।
काकी बाजथि रौ रोग ढुक्का,
बाबी मारथि छाती मुक्का ।।

कसमकष गंजी पर परलै बिता भऽरि दरक्का औ ।
धैन......................................................।।

भरि कठौत एकसरे चाही,
सद्यः हुरने अछि दू - गाही ।
सून कऽ रहल भऽरल भनसा,
हा ! भगवान कतऽ ई मनसा?

उसनल अल्हुआ खाइत काल ईं छोडा दैत अछि छक्का औ ।
धैन......................................................।।

चिब बऽ काल सोहारी सुक्खा,
ठोर बनल सकरीक दुरुक्खा ।
पाकल दू किलो धरि आटा,
बट्टा भरि तरकारी भाटा ।।

सभटा खाकऽ परसन लऽ मॅुहबेने अछि दू फक्खा औ ।
धैन......................................................।।

एहि परेत केॅ कहू ने पित्ती,
ई षमसान घाट केर लुत्ती ।
सतत् रहै अछि दाॅत चियारल,
मुँह लगैए कनसारल भारल ।।

सुनिते लोट-पोट हँसि - हँसि कऽ खसला ‘बूच‘ तरक्का औ ।
धैन......................................................।।

काकी केर आदेष निकललनि,
कक्का जी जजिमनिका चललनि ।
आगाॅ लऽ अंगोक अॅधमोनी,
अगवे मोटा - चोटा तौनी ।।

ठिकम ठिक दुपहरिया ठहठह जेठक रौद कडक्का औ ।
धैन......................................................।।

!! अप्पन मिथिला !!

ज्ञान विचार भक्ति भावक भंडार अप्पन मिथिला ।
भोग बीच योगक निरमल संसार अप्पन मिथिला ।।
ई एहनोटा बेटा पौलनि,
जे त्रिभुवन मे पिता कहौलनि ।
अंग्मेदिनी अपरा माया,
कोर आबि कऽ बनली जाया ।
ब्रह्याण्डक ई अद्भुत् चमत्कार अपन मिथिला ।
भोग ............................................... ।।

षुकदेवो ई महिमा जनलनि,
परमगुरू जनक केॅ मनलनि ।
भोगी केॅ देहाक मोह नहि,
योगी तमकथि तुम्मा रहि रहि ।
धरती की आकाषे केर घर-द्वार अप्पन मिथिला ।
भोग.................................................. ।।

जे सदैव सभ केॅ नचवै छथि,
आदि षक्ति माया कहवै छथि ।
सुऽखे से बनली तिरहुतनी,
भूमि लोटि कऽ भेली भुतनी ।
त्निके केलनि रचि-रचि कऽ श्रृंगार अप्पन मिथिला ।
भोग...................................................... ।।

गौतम - कपिल - कणदि - अयाची,
उदयन सन आचार्य भेल छथि ।
मंडित हमरा कर्मषक्ति लग,
ज्ञानक पंडित हारि गेल छथि ।
न्याय दर्षनक सम सॅ पैघ टघार अप्पन मिथिला ।
भोग.................................................. ।।

षास्त्र वैह‘ - हमज े सुनवै छी,
‘‘काव्य वैह‘‘ - हम जैह गवै छी ।
परम सोहनगर मैथिल अंगना,
सभ सॅ मिठगर देसिल बयना ।
कवि कोकिल विद्यापति कंठक हार अप्पन मिथिला ।
भोग..................................................... ।।

आइ गरीब - मुदा फकने‘ छी,
पथिया भरल मखानक लावा ।
बासमती चूडा सानल -
मिट्ठूर अमौट गलि औलनि बाबा ।
भरल चडेरा, चूडा दहीक भार अप्पन मिथिला ।
भोग .............................................. ।।

ग्ंागो दीदी चाह बनावथि,
कमला बेटी पान लगावथि ।
कोषी बहिना धान कुटै छथि,
बागमती सिरहा फअकै छथि ।
धऽरक लक्ष्मी विहुंसथि माॅझ ओसार अप्पन मिथिला ।
भोग......................................................... ।।

!!अय काकी!!

अय काकी, अय काकी बड़ कमाल कयलहुॅ अय काकी ।

छथि सुधबौक हमर ई कक्का,
ऐठल देह अचारक फक्का,
बनल रहय छथि सपरतीभ ई,
तैयो केहेन अपरतीभ ई,
उनटलहो इंजिन पर सिंगनल लाल कयलहुँ अय काकी ।
अय.............................................................................................. ।।

पितरलोक धरि डाकनि दै छी,
सातो पुरूखा के उकटै छी,
फीमेल भोटर क्यू मे लागल,
आई अहाॅक घोघ अछि काढ़ल,
पतिक नाम कहबाक काल रंगताल कयलहुँ अय काकी ।
अय............................................................................................. ।।

जखने अहाॅ दाॅत केॅ जाॅती,
तखने हुुनका लागनि दाॅती,
स्वर्ग कतऽ नरको नसीब नहि,
लाश बनल घूमथि गंजन सहि,
कक्का कफन के फाड़ि - चीड़ रूमाल कयलहुँ अय काकी ।
अय..................................................................................................... ।।

कक्का जी मरला आसाम मे,
झुट्ठे हल्ला भेल गाम मे,
स्ुनिते कोठी सान्हि नुकयलहुॅ,
पहिने बासि भात लऽ खयलहुॅ,
सिनुर पोछि कऽ कक्का केॅ नेहाल कयलहुॅ अय काकी।
अय............................................................................................।।


!! संशय !!

भरल भवधार छै सजनी कोना पदवार हम करबै,
पडल सब भार छै सजनी, कोना पतवार हम धरबै ।।1।।

बनलि हम रूप करे रानी, मुदापंथक भिखारिन छी,
जडल घटवार छै सजनी, कोना इजहार हम करबै ।।2।।

सुभावक नाव पर हमरा जखन धऽकऽ चढा देतै‘,
अडल इकरार छै सजनी, कोना इनकार हम करबै ।।3।।

लगै छै मारि के दोमऽ जुआनी मारि केॅ के बीच बनिवीचे,
मुदैं सुकुमार छै, सजनी कोना तकरार हम करबै ।।4।।

कहाँ धरिआर हम खसल करूआरि ओ नीचाँ,
गहन अनहार छै सजनी, कोना भऽठाढ हम रहबै ।।5।।


!! युग परिवर्तन !!

चिडै चित्त आब अंडे उडैए,
गोनु मौन भोनुए केॅ फुडैए,
बुचना घऽर पकडलक बुचनी बनि गेलै बहरैया ।

औ बाबू औ भैया की भऽ गेलै ले बलैया ।।

चोकटलि करिअम्मा सन कनिया,
सासु सुपक्क सिनुरिया ।
बेटा पडले गाम बाप छथि,
खुट्टा ठोकि खगडिया ।।

लाजो लगैए कहय पडैए अनसोहात सम सहऽ पडैये
मोछ उट्ठा अधपै पौआ केषपकुआ सेर सवैया

औ बाबू औ भैया की भऽ गेलै ले बलैया ।।

एक्के धोती अहिरन पहिरन,
सएह पुरूश कहवै छथि ।
अझुका नेता खादी तर,
अंडरवीयर पहिरै छथि ।।
एक परिए में ई अकरहरि,
दुहू जीव एक्के रिक्षा पर
पिक्चर देखऽ चलला लऽ कऽ चानी केर रूपैया,

औ बाबू औ भैया की भऽ गेलै ले बलैया ।।

सोझ साझ सभ संचमंच छथि,
नेंगडे खूब नचैए ।
पी0 एच0 डी0 सुनथि अवाक,
मुरखहवे थैसिस दैए ।
लाल डोमघर कंठी बाना,
पंडित जी चलला पसिखाना
बूढी माघ नहाथि जुआन केॅ जेठो मे जडैया ।।

औ बाबू औ भैया की भऽ गेलै ले बलैया ।।


!! वसन्ते - बिरहिनी !!

नव - नव पप्पल मे हॅसलै पुरनी कचनार गय ,
बूढ़ी महुओ तर लगलै - रऽसक पथार गय ।

मलय वसातक मंतर पड़लै,
विपटल हो ई आम मजड़लै,
चैबट्टी पड़का जुग जुगहा
पीपड़ नव पनकी सॅ भड़ल,ै
पिंकी केॅ पिक् कऽ रहलै, निमकी दुलार गय ।
बूढ़ी महुओ तर ................................................... ।।

बेली पॅजियाबय कनैल केॅ,
बेल नुकावय रसक घैल केॅ,
सरियाबय नव गठित गात केॅ,
गड़ियाबय पछबा बसात केॅ,
कदली कनिया कऽ रहलें घोघे उघार गय ।
बूढ़ी महुओ तर ................................................... ।।

शूल - शूल पर फूल बनौलनि,
खूब मालती मोन मनौलनि,
गम-गम कऽ उठलीह चमेली,
रूसलि चम्पा सासुर गेली,
विधवो सिम्मर पर लगलै सिनुरी बजार गय ।
बूढ़ी महुओ तर ................................................... ।।

मंगल कुशल कहू की वेशी ?
सपने में अयला परदेशी,
चिर - पिपास पर छल - छल प्याली,
भागऽ लागल क्षुधा अकाली,
ओरक उस्सर पर खसलै रसवन्ती धार गय ।
बूढ़ी महुओ तर ................................................... ।।

रहलहुॅ शेष राति भरि जागलि,
हुनक दोष की ? हऽम अभागलि,
रसक अथाह सिन्धु छल उछलल,
प्राण मुदा बुन्ने ले विद्वल,
लग - लग अकाशे चन्ना धरती अन्हार गय ।
बूढ़ी महुओ तर ................................................... ।।


!! दीनक नेना !!

देखहीं रौ बौआ, ई कौआ गवै छौ ।
सुनहीं रौ तोरे, कुचरि सुनवै छौ ।।

एम्हर तोॅ सूतल छे माॅझे ओसार पर,
ओम्हर ओ नाॅचै पुवरिया मोहार पर,
पुरबा वसात बॅसुरी बजवै छौ............... ।
सुनहीं रौ ................................................ ।।

तोरा लय बनलौ ने बिस्कुट आ चाॅकलेट,
नोनो रोटी सॅ ने भरतौ ई गोल पेट,
बातक मधुर स्वरलहरी अबै छौ................. ।
सुनहीं रौ ..................................................... ।।

बापे तोहर बनलौ परदेशी,
चिट्ठी ने एलौं भेलौ दिन वेशी,
माँ केर निनायल व्यथा जगबै छौ ।
सुनही रौ ......................................... ।।

की बुझबेॅं ककरा कहै छै गरीबी,
सपनो मे सुख नहिं जतऽ श्रमजीवी,
लुत्ती लगाकऽ नगर बसवै छौ ......... ।
सुनहीं रौ ............................................. ।।

कोरा मे तोरा सुताबै छौ बिनियाॅ
झटकल औ अविहेॅ रौ, नूनूक निनिया,
तोहर उपास हमरा लजबै छौ,
सुनहीं रौ ...................................... ।।

स्वः काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘



!! पतनी व्रता !!

तेरा सुक्खक खातिर हम की - की नेॅ करबौ गय ।
बिना जान केॅ जीवौ प्राण अछैतो मरवो गय ।।

तोहर नैहर घऽर बनायब,
कमर सारि सॅ हऽर मंगायव,
बापक चैड़ी लेबौ बटैया,
देखि लिहैं तोहर ई कोठी मुनहर भरवौ गय ।
तोरा ....................................................................... ।।

बैंक लोन सॅ गाय अनायब,
तकरा पोसब खूब चरायव,
अपने हाथे दूहब भोरे,
चाह बनाकऽ देबौं तोरे,
तोॅ पड़ले - पड़ले पिबिहै हम प्याली भरबौ गय ।
तोरा ............................................................................ ।।

जल्दी ए दडिभंगा जएबौ,
रंग - विरंगक अभरन लयबौ,
तैयो जॅ समधान ने हेबेॅ,
यैह ने हमरा पूब भगेबेॅ,
बिनु टीकट पकड़ा कऽ अलिपुर जेहल पडबौ गय ।
तोरा. .............................................................................. ।।



!! अन्हर मारि !!

नक फकरो तऽ व्याहलि गेली,
मृगनयनी कुमारि छै ।
देखि लियऽ औ नगरक लीला,
भारी अन्हर मारि छै ।।

गाम - गाम मे लगनक मेला,
बऽर वरद बाछा बनिगेला ।
अपने बाबा करथि दलाली,
बाप डोलाबथि बटुआ खाली ।
जकरा जतेक अधिक छै पूजी, तकरे ततेक पुछारि छै ।
देखि......................................................................................... ।।

मेडिकल इंजीनियर बालक,
छथिन महग सम सॅ बेशी।
बान्हल छनि गरदाम गऽर मे,
देखाबथि अपन शान शेखी ।
टुटपुजियों काॅलेजियो सबहक ऊँचे - ऊँचे आड़ि छै ।
देखि......................................................................................... ।।

धऽनक महिमा कते कहू औ,
ब्हुत लोक पाईक जनमल ।
ज्ञान विवेकक बात कतऽ छै,
ज्करे टका सैह निरमल ।
सासु छुलाछनि बऽहु हिरोइन, शहर घुमक्करि सारि छै ।
देखि......................................................................................... ।।

अपने भऽल पुरूष छी कतवो,
सुन्दरि गुनगरियो बेटी ।
नहि मानत ई बऽर पक्ष जॅ,
खाली अछि द्रव्यक पेटी ।
केबर गेलि बिलाड़ि मोंख पर रूपवती सुकुमारि छै ।
देखि......................................................................................... ।।

आदर्शक सभ बात करै छथि,
अपना बेर कात ससरै छथि ।
गनबऽ काल गरीबो मनगर,
गनऽ काल सेठ पछडै छथि ।
जाहि घऽर ‘‘मैथिली‘‘ जनमलि मरघट्टी तकर दुआरि छै ।
देखि......................................................................................... ।।

नैहर सासुर केर डगरा मे,
बेटी भाटा बनि गुडकै ।
उपरागक रोटी क संग,
अपना नोरक तीमन सुड़कै ।
सासुर सॅ नैहर धारि नितः सुनिते अयलि गारि छै ।
देखि................................................................................. ।।


!! उद्यनाचार्य !!

अभिनव अबध ललाम,
जतऽ उदयनक घरारी।
पावन करियन गाम,
जतऽ उदयनक घरारी ।। सिंहमात्र पशु आरो किछु नहि,
हम मनुष्य छी उदयन ई कहि ।
पौलनि विजय विराम,
जतऽ उदयनक घरारी ।।
वर्णित अछि भावी पुराण मे,
परिशिष्टां के अछि प्रमाण मे ।
उतरल छल गोधाम,
जतऽ उदयनक घरारी ।। हीर गर्व के कयल विखंडित,
जे छल बौद्धक उद्भट पंडित ।
पसरल सगरो नाम,
जतऽ उदयनक घरारी ।।
भक्ति भावना मूक बनल छल,
नास्तिकता बन्दूक बनल छल ।
थर - थर लोक तमाम,
जतऽ उदयनक घरारी ।। भेल सनातन पुर्नस्थापित,
हत् उत्साह बौद्ध अभिशापित ।
निर्भय चारू धाम,
जतऽ उदयनक घरारी ।।
आओल माधव चमत्कार लऽ,
आचार्यक अंशावतार लऽ ।
पसरल ख्याति तमाम,
जतऽ उदयनक घरारी ।। आक्रोशित भऽ जगन्नाथ पर,
पौलनि हत्या दोष मुक्तिवर ।
भेटल यश विश्राम,
जतऽ उदयनक घरारी ।।
एक हाथ मे ज्ञान सुदर्शन,
तर्क गदा दोसर मे सदिखन ।
वाक्युद्ध अविराम,
जतऽ उदयनक घरारी ।। सूर्य पूब अगथि असत्य अछि,
उदयाधरित दिशा तथ्य अछि ।
नवदृष्टिक आयाम
जतऽ उदयनक घरारी ।।
तेसर कर कमलक कुसुमांजलि,
चरिम मे शंखक किरणावलि ।
नर भऽ प्रगटल श्याम,
जतऽ उदयनक घरारी ।। आइ जतऽ अछि तरूवर पीपर,
छल एहीं ठाॅ आचार्यक घर ।
पर्णकुटी विच गाम,
जतऽ उदयनक घरारी ।।
हंस भट्ट वेदान्त अरण्यक,
सिंहबनल पहुँचल मिथिला तक ।
छूटल सभ केॅ घाम,
जतऽ उदयनक घरारी ।। आगाॅ पूजा पुष्पक बारी,
पाछाॅ साग पात तरकारी ।
जीवन क्रम निष्काम,
जतऽ उदयनक घरारी ।।
ओ बौद्धक विद्वान धुरंधर,
वैदिक केॅ ललकारि घरे घर ।
भेल जयी सभ ठाम,
जतऽ उदयनक घरारी ।। अर्थाभाव आत्मसम्मानी,
घर अन्हार किरणा बलिदानी ।
सम - चम नियम विराम,
जतऽ उदयनक घरारी ।।
आबि गेल उदयन सॅ भीरऽ,
लागल ज्ञानक गुद्दी तीरऽ ।
जहिना कुकुरक चाम,
जतऽ उदयनक घरारी ।। सकशास्त्र मे ई अजेय छथि,
दर्शन मे तॅ अपरिमेय छथि ।
गर्वित ध्वनित खराम,
जतऽ उदयनक घरारी ।।
तर्क - वितर्कक गोला छूटल,
प्रतिमा पुंजक ज्वाला फूटल ।
अविरल आठोधाम,
जतऽ उदयनक घरारी ।। एखनहुॅ आस्तिकता उत्साहित,
कयलनि भगवत् भक्ति प्रवाहित ।
अनिरूद्ध उगन्त, बलराम,
जतऽ उदयनक घरारी ।।



अपना केॅ ओ सिंह मानि कऽ,
लागल गरजऽ फानि फानि कऽ ।
निर्भय वारे आम,
जतऽ उदयनक घरारी ।। डीहक पाॅजरि सुमन फुलओल,
ब्ुद्धिनाथ आ आरसी आओल ।
मणिपाठक केल ठाम,
जतऽ उदयनक घरारी ।।
अरूण, तरूण, चन्द्रभानु, प्रवासी,
नमथि डीह लग मिथिला वासी ।
विकल जपै छथि नाम ,
जतऽ उदयनक घरारी ।। पीपर तर आचार्य गुप्त छथि,
तेज प्रखार यद्यपि शुशुप्त छथि ।
शतशः हमर प्रणाम,
जतऽ उदयनक घरारी ।।

!! एना जुनि नहाइ!!
दाइ अय पोखरि एना जुनि नहाइ ।।
अहाॅ छोट सारि हमर,
अयलहुॅ दुआरि हमर,
उचिते तेॅ कहि दै छी आइ ।
दाइ ................................................. ।।

काछु जकाॅ पुनटै छी,
माॅछ गकाॅ उनटै छी,
साॅप जकाॅ जुट्टी दहाइ ।
दाइ ................................................. ।।
आॅचर घननी पत्ता,
तानल दू-दू छत्ता,
मंगनी मे भीजै छथि भाइ ।
दाइ ................................................. ।।

बौआ केॅ टकटकी,
बच्चा केॅ फकफक्की,
कक्का केॅ भऽ गेलेनि बाइ ।
दाइ ................................................. ।।

भैया बान्हि कऽ बाना,
बनल छथि दीवाना
धपचट मे करता सगाइ ।
दाइ ................................................. ।।


!! काटरक परिणाम !!

रहतऽ की तिलकक ई पाय हौ,
कऽ लय बरू फुटानी ।
तोरो कुमारि चारि दाय हौ,
मेान पडि. जयतह नानी ।।

बेटा आ बहु केयो काजो ने देतऽ,
कुन्हरालि पुतोहु सभ कुन्नह सधेतऽ,
पिविहऽ मिरचाई देल चाय हौ,
कऽ लय बरू फुटानी ।

तोरो............................... ।

ज्हिया सॅ सेज तेजि उठलो ने जेतऽ,
पोते तोहर नाचि - नाचि खिसियेतऽ,
ढेपा दऽ कहतऽ ई लाय हौ,
कऽ लय बरू फुटानी ।

तोरो............................... ।

टूअर कुकुर बूझि कौरा पठेतऽ,
तऽर तेल ऊपर सॅ नोनों ने देतऽ,
दाँत च्यारि मरि जयवह भाय हौ,
कऽ लय बरू फुटानी ।

तोरो............................... ।

बेटा बिकायल छह पिण्ड कोना देतऽ,
देबऽ जौं करतऽ तऽ पैठे ने हेतऽ
प्रेते बनि रहिहऽ ढोरहाई हौ,
कऽ लय बरू फुटानी ।

तोरो............................... ।

छोटका छह बाँचल हौ आबो तऽ चेतऽ,
एहि पापे लोक परलोक दुहु जेतऽ,
समधिन सॅ प्रेमक सगाय हौ,
कऽ लय बरू फुटानी ।

तोरो............................... ।

!! कवि कोकिल - विद्यापति !!

जनिका सॅ देसिल वयना, पौलनि परान गय ।
क्वि कोकिल नामे तनिका, जानय जहान गय ।।
मिथिलांचल मे अभिनव आशा,
पसरल घर - घर अप्पन भाषा ।
भाव करूण विचार श्रृंगारी,
प्रगटौलनि आॅचर तर सॅ शंकर भगवान गय ।
कवि....................................................................... ।।

मोॅज सेज पर योगक छाया,
बर अथाह व्यक्तित्वक माया ।
उदर भिवलि पर बनल त्रिवेणी,
रूपवती लग तीर्थक श्रेणी ।
श्रीतिक कालरात्रि मे चमकल श्रृष्टिक दिनमान गय ।
कवि ................................................................................... ।।

बैन बसंत नैन मे भादो,
धार पवित्र कात मे कादो ।
जल मे रहितहुॅ पुरनि पात सन,
मरूस्थली मे रसस्नान सन ।
गाबथि राधापर लेकिन, माधव पर ध्यान गय ।
कवि कोकिल..........................................................।।

धन्य - धन्य विद्यापतिनगरम्,
विस्फीसुत सत् शिवम् सुन्दरम् ।
जड़ियो कऽ अवशेष बनल छथि,
मरि कऽ अमर महेश बनल छथि ।
देहरि श्रृंगारक कांचन मंदिर मसान गय ।
कवि ............................................................. ।।

!! रौ घुरना !!

बात असले ई कहियौ, सुनेॅ रौ घुरना ।
हऽम विद्यापति तोॅहीं हमर उगना ।।

पानि कतवो चढेलियौ -
छेॅ पनिमऽरू ।
रऽस कतबो चटेलियौ -
छेॅ दिनजऽरू ।
आब छुटतौ की, तोहर ई चालि पुरना ।
हऽम .......................................................... ।।

आइ बुलिबुलि कऽ बहुतो -
हम थाकि गेलियौ ।
लावेॅ चैकी उतारेॅ -
आबेॅ रे एलियौ ।
देह दाबेॅ, लगावेॅ रे जोड़ दुगुना ।
हऽम .............................................. ।।

मालिकिनी अनेरे -
खेहाड़ि देलखुन ।
दुःख हमरो अछि -
तोरा जे गाड़ि देलखुन ।
आंगनक कारकौआ, बनक सुगना ।
हऽम ................................................. ।।

काल्हि ‘‘बूचो‘‘ देखलकौ -
तोहर चमकी ।
हमरो पर चलौले -
ऐहेन बमकी ।
देख अयना मे लटकल केहेन घुघना ।
हऽम ....................................................... ।।

!! एक पर सॅ एक !!

ककरो सॅ क्यो कम की गय,
सबहक बडके बमकी गय ।
भुट्टी पहिने टीक पकडलक,
गरदनि दबलक नमकी गय ।।

बेटा करय एक सिरसासन,
जानै बाप बेरासी आसन ।
पुतहुक हाथ कौर अरगासन,
सासुक मुॅह कथौती वासन,
सोझकी ठोकय ताल ताहि पर
नेड़री झाड़ै झमकी गय ।।

एक टका केर मड़ुओ चिक्कस,
बान्हि पतौरा रखलहुॅ जेबी,
गहुम प्रसाद तेल चरणोदक,
विष्णुरूप डीलर केॅ सेवी,
परूॅका जे भेलै से भेलै -
हेतै असली एमकी गय ।।

परजा प्राण तेयागल नेता,
कहै जीवनक स्तर बढ़लै,
परसन दैत - दैत भनसीए,
अपने आब चूल्हि पर चढ़लै,
बुरिबक बुझौ विकास मुदा ई -
थिकै बुखारक चमकी गय ।।

जोन महग मालिक छै सस्ता,
भोजन बन्न जिलेबी नस्ता,
आगाॅ सॅ भऽ रहलै पक्का,
पाछा टाट टुटल चैफक्का,
मालकिनी मटकी मारै तऽ,
रहसै नौरिन छमकी गय ।।

पोता हाथ सुपक्क सिनुरिया,
बाबा माॅगथि रऽसक गाड़ा,
मोन पड़नि कोबरक खीर औ,
पड़तनि पिण्ड लहरतनि सारा,
बूढ़ी केॅ लटकनि दू जुट्टी,
कटलै केश जुअनकी गय ।।

!! अजुकी दाइ !!

अजुकी हम दाइ छी,
अधिक अगुताइ छी,
अहाॅ बाट ताकू हमहीं विदेश जाइ छी ।
राखि लियऽ अपन चूल्हि खपड़ि ई घऽर द्वारि ।
साॅझ दियऽ अपने सॅ आंगन मे दीप बारि ।
अहॅक चार खड्ड़ल हम लहरल सलाई छी ।।
अजुकी ....................................................................

व्यर्थ भेल सिनुरदान कोबर घर सूनसान ।
टूटि गेल पिंजर पट्ट पंछी भड़लक उड़ान ।
टपना पाॅखिक कमाइ गाछ चढ़लि खाई छी ।।
अजुकी ....................................................................

प्रिय वा प्रियतर कहाऊ, प्रियतम तऽ पाइ भेल ।
सर्वोपरि टका तकर, दिव्यज्ञान आइ भेल ।
तेॅ ने हम एक सिरये , अपने अघाइ छी ।
अजुकी ....................................................................

बेबी भऽ हेतै तऽ अपने केॅ लऽ आनव ।
ताहि कालक हेल्पिंग केॅ बड़का टा गुण मानव ।
पातिव्रत्य रहल कऽ रवा कऽ नहाइ छी ।
अजुकी ....................................................................



!! श्री राम केवट संवाद !!

हम सभ कते काल सॅ नदी कात छी ठाढ़ औ,
पहुॅचाबू ओहि पर औ ना ।।

संगहि नव - नौतून परिवार,
कलकल गंगा जी केर धार,
केवट पकड़ू - पकड़ू अपने सॅ पतवार औ,
पहुॅचाबू ........................................ ।।

चिन्हलहुँ - चिन्हलहुँ औ सरकार,
थिकियै अवधक राजकुमार,
सुन्हलहुॅ चरण कमल मकरंदक चमत्कार औ,
नहिं पहुॅचायब पार औ ना ।।

लागल फेर चरण मे धूरि,
छुविते नैयो जेतै ऊड़ि
पोसब कहू कोन कोन तखन सकल परिवार औ,
नहिं पहुॅचायब पार औ ना ।।

पहिने तरबा अपन धोआऊ,
तकवा बाद नाव पर जाऊ,
अपने जौं चाहै छी उतरऽ दिन - देखार औ,
पहुॅचाबू ओहि पर औ ना ।।

सुनिते प्रेमक अटपट बात,
प्रभुकेर सिहरऽ लागल गात,
पसरल मुॅह पर मुश्की मन मे भरल दुलार औ,
पहुॅचाबू ओहि पर औ ना ।।

हुलसल मन उमड़ल आनंद,
धोलक पद कमलक मकरंद
अमृत - ओदक पिविते भेल सकुल उद्धर औ,
रघुवर भेलेनि पार औ ना ।।

!! राधा विरह !!

श्याम होइछ परक प्रेम अधलाह हे,
तेॅ बिसरि जाह हमरा बिसरि जाह हे ।

दीप बुझि रूप केॅ जुनि हृदय मे धरह,
मोहवाती जरा तेल नेहक भरह ।

कऽ देतऽ जिन्दगी केॅ ई सुड्डाह हे,
तेॅ बिसरि जाह हमरा विसरि जाह हे ।

हऽम मधुबन मे साॅझक पहिल तारिका,
तोॅ फराके बनावह अपन द्वारिका ।

उठि रहल अछि अनेरेक अफवाह हे,
तेॅ.......................................................... ।

हम विमल राश केर खास संयोजिका,
छी प्रवल गोप केर प्रेयसी गोपिका,
घाट सॅ खुलि चुकल अछि हमर नाह हे,
तेॅ ................................................................ ।

मोन मे उत्तरी सागरक जल भरह,
लाख चुचुकारी बर्फक महल मे धरह,
हम तहू ठाम बरबानलक धाह हे,
तेॅ ............................................................. ।



!! विरक्ति !!

क्षण भंगुर संसार सजनि गय एहि ठाॅ दुःखक पहाड़ भरल अछि,
नेरक निरझर धार सजनि गय उमड़ल बनल दहाड़ चलल अछि ।

बचा सकब कहू कोना आन केॅ,
हम तऽ अपने डूबि रहल छी ।
हॅसा सकब कहू कोना आन केॅ,
सिंगड़हार भऽ चूबि रहल छी ।
सजनि गय हिस्सक सागर खार बनल अछि,
नोरक..................................................................... ।।

मृगी जकाॅ हम काॅपि रहल छी,
झाॅखुर सऽ तन झाॅपि रहल छी ।
देखि - देखि संधान सायकक,
आयुक छाॅटी मापि रहल छी ।
करब कोना पथपार सजनि गय ठाम - ठाम सौतार भरल अछि,
नोरक ................................................................................................... ।।

विरहक शून्य सुदूर देश मे,
दिवसक कठिन करेज जड़ल अछि ।
रजनी अछि जोगिनीक वेष मे,
आंचर तर लुत्ती पसरल अछि ।
चिर - वियोग केर भार सजनि गय लऽ कऽ कहार चलल अछि,
नोरक .................................................................................................. ।।
विशेष:-

स्व0 कवि अहि कविताक रचना सन् 1990 ई0 अप्पन अर्धागिंनीक मृत्युक वियोग मे कयलनि ।


!! कमौतिन भौजी !!

भौजी नव सलवार सियौलनि - भैया पुरने साॅची मे ।
मियाॅ रहला गामे बीबी सर्विस पौलनि राॅची मे ।।

भोरे आंगन कुचरल कौआ,
भैया पड़ल माथ तर पौआ,
सपने मे भौजी के पौलनि,
प्रेमे पासी पाॅज लगौलनि,
प्यासल - प्यासल आॅखि सटल सूखल खरकट्टल काॅची मे ।
मियाॅ रहला गामे बीबी सर्विस पौलनि राॅची मे ।।

करथि आंगनक चैकीदारी,
काज भानसक लागनि भारी,
दहिना अंग जखन कऽ फड़कनि,
अभिलाषा मे छाती धड़कनि,
मनक व्यथा केॅ कखनहुॅ - कखनहुॅ गावथि गीतक पाॅती मे ।
मियाॅ रहला गामे बीबी सर्विस पौलनि राॅची मे ।।

रोटी नहिएॅ बेलऽ आयल,
बना लैत छी दलिपिट्ठी,
एहि जीवन सॅ मरने पक्का
ई हम्मर अंतिम चिट्ठी,
मिलनक लेल प्राण अछि अटकल लटकल विरहक फाॅसी मे ।
मियाॅ रहला गामे बीबी सर्विस पौलनि राॅची मे ।।

भौजी साॅझे आबि गेली हे,
दूहल देह गुहल छनि जुट्टी,
भैया केर सौभाग्य सुशीतल,
बनि जायत ई गरमी छुट्टी,
रूसल पति केॅ कनियाॅ बौंसथि गम - गम लौंग अराॅची मे ।
मियाॅ रहला गामे बीबी सर्विस पौलनि राॅची मे ।।


!! कन्यादान !!

आब बनवह विरान हय बेटी,
चूबि जयतह ई नोर,
डूबि जयतह ई ठोर,
त्यागि थीर मुसुकान हय बेटी ।।

बेटे जकाॅ तोॅ जनमलह आ बढ़लह,
बेटो सॅ बढ़िकऽ माईक मन भरलह,
काका आ काकी लगक दुलरैतिन तोॅ,
अपना स्वभावे सभक मन हरलह,
बाबा ध्यान तोॅ बाबी क जान तोॅ,
बापक परान हय बेटी ।।

तोरा जनमिते परायल अन्हरिया,
पाॅजे समटलहुॅ हम पसरल इजारिया,
घऽरक कुमुदिनियाॅ हम परक चननियाॅ तोॅ
ई कहऽ आयल कहौतियाक भरिया,
आई धरिक पूनम तोॅ काल्हिए सॅ बनि जयवह,
दुतियाक चान हय बेटी ।।

लैह अशीरवाद करह अचले श्रृंगार तोॅ,
बनल रहह हुनक मुग्धमनक शुद्ध हार तोॅ
आशुतोष, मृत्युंजय शंकरे जमाइ हमर,
जानि गेलहुॅ पुत्री नहिं गौरी अवतार तोॅ,
हम कऽ देलहुॅ दान,
आइ भऽ रहलै ज्ञान,
अहाॅ बनि गेलहुॅ हय बेटी ।।


!! पोताक अट्ठहास !!

पोता - खेत टी खरिहान टी
आंगन टी दलान टी
बाबा आब अहींक कान मे,
टिटही टहकै टी टी टी ।।

बाबा - प्याली पी भरि चुक्का पी,
घट घट पी सूरूक्का पी,
रौ कुलबोरन गाम घिनौले,
लाते, जुत्ता, मुक्का पी ।।

पोता - लत्ती कू बा झब्बा कू,
अब्बा कू बा बब्बा कू,
आगाॅ पाछाॅ डोरा डोरि मे
डोलय दू - दू डिब्बा कू ।।

बाबा - जऽर छू जमौरा छू,
नीपल पोतल दौरा छू,
मुतिते घऽरक सीरा चढ़ले,
हगिते तुलसी चैड़ा छू ।।

पोता - लोक कहैए बाटो पर सॅ,
टीली लीली फट्ट औ
भेल अहाॅ केॅ खाटो पर
उतरब दुरू घट्ट औ

आब अहाॅ सॅ डऽर कथी केल
कतबो हुआ हुआ भूकू
हुआ - हुआ की - की हुआ,
मांगय विधकरी नूआ,
मैया - धीया साड़ी चाही
पुरहित केॅ धोती धूआ
काॅच बाॅस केर नऽव पालकी आबय चारि कहरिया जू,
काशी ............................ ।

बाबा - कूथि - कूथि कठगील अुगै छी,
देखे टन दऽ चलि जेबे
तोरे हम बरखी कऽ देबौ
हमर श्राद्ध तोॅ की करबैं
सभ अपना नेना केॅ बरजू चेता दैत छी औ बाबू
जऽर छू ............................................ ।।


राजदेव मंडल

शिक्षा- एम.ए.द्वय, एल एल बी.,पता- ग्राम-मुसहरनियाँ, रतनसारा(निर्मली),जिला-मधुबनी,प्रकाशित कृति- हिन्दी ,नाम-राजदेव प्रियंकर,उपन्यास- जिन्दगी और नाव,पिजरें के पंछी,दरका हुआ दरपन।आबैबला मैथिली कविता संग्रह- अम्बरा।

बाढ़िक चित्र- पहिल
2008 ई0 मे कुसहा -कुसहाक निकट टूटल कोसी बाँध ताहि कारणें आएल प्रलयंकारी बाढ़िक चित्र-

(सघन अन्हार। भयंकर विस्फोटक। चिचिआइत लोकवेद।)

कुसहा कोसीकेँ बाँध टूटि गेल
लोक सबहक भाग्य फूटि गेल
क्रुद्ध कोसी तोड़य ताल
गरजि रहल अछि जेना काल
भासि रहल अछि
घर-दुआरि, जान-माल
रूत्री-पुरुष, बाल-गोपाल
कल-कल, छल-छल
अगाध जलराशि
बढ़ि रहल पल-पल
डुबबैत, भसबैत करैत एकटार
आबि रहल गरजैत कोसीक धार
हे रौ जाग-जाग
जल्दी भाग
तँ बचतहु जान
वैह महरानी बचा सकैत छउ प्राण
बाढ़ि नहि ई अछि महाविनाष
भासि रहल
असंख्य लहास।

(दोसर चित्र- सम्पूर्ण शरीर जलमे डूबल। सिरिफ हजारो हाथ पानिकेँ उपर भसि रहल अछि।)

दुइ बरखक शिशु
मायकेँ लहास पर चढ़ल
जा रहल अछि बढ़ल दूध पिबैत
खेल रहल अछि
झिलहरि
कोसीक भरल धार मे
चिलहौड़ आ कौआ केँ झपट सँ
कखनहुँकाल
विकराल
करुण गीत
फूटि पड़ैत अछि
ओकरा कंठ सँ
केनाक बाँचत एहि चंठ सँ?

तेसर चित्र- (साँझक आगमन। चारुभर करिया जल पसरल।)

मोंटगर गाछ पर
बूढ़ बकोली मड़र
लटकल अछि
डर सँ सटकल अछि
नहि बाँचल एकोटा माल-जाल
आयल ऐहन काल
नहि बाँचल एको घरक चार
डूबि गेल पूरा परिवार
बाँचल अछि वंशक टीका एकमात्र
तीन बरखक पोता
ओकरो कोना बचेताह
नीचा अछि तेज जलधार
ऊपर अछि फणिधर तैयार
शख्त शाखा पर पाइर सम्हारि
एक हाथ सँ धेने डारि
दोसर हाथ सँ पोता केँ बाँहि
कपार पर बाजय कौआ काँय-काँय
गाछक पत्ती सभ साँय-साँय
साँप ससरल बकोली दिश
ओकरा आँखि मे भरल अछि रिस
ओ ताकि रहल अछि बाढ़ि दिश
सर्प निकट फोंफकारि रहल अछि
बकोली थर-थर काँपि रहल अछि
हड़बड़ी मे हाथ ढील भऽ गेल
डूब्बा पानि मे पोता गिर गेल
बकोली केँ भाग्य फूटि गेल
आब ओ कोना जीअत
फाटल मन केँ कोना सीअत
बाढ़िक पानि गोंगिया रहल अछि
बिरिछ पर बकोली बोमिया रहल अछि।

चारिम चित्र- (जनशून्य मे मुईल- माल-जाल, जीव-जन्तुक लहासक ढेरी।)

एकसरि
अर्धनग्न स्त्री
परिश्रान्त
मुख क्लांत
बैसल अछि धारक कात
देह स्नात
जिअत अछि कि मुइल
साइत सोचि रहल अछि इएह बात
एखनहि निकलल अछि
संघर्ष कऽ बाढ़िक धारा सँ
बहराएल हो जेना कठिन कारा सँ
नहि अछि सुधि अपन देह केँ
न गेह केँ
अर्ध चेतन मे डूबल
कि बाजि रहल अछि से नहि जानि
टप-टप
देह सँ चूबि रहल अछि पानि
दूई गोट भक्षक जेकाँ जेकाँ रक्षक
पहुँचि गेल अछि पास
देह सँ चुबैत जल देखि
ओकर बढ़ल जा रहल पियास।

पाँचम चित्र- (कतौ-कतौ उँचगर ढूह पर बाढि सँ बचल लोक सभ बताह जेँका एक दोसर दिष तकैत।)

उँचगर बाँध पर
बाढ़ि सँ बाँचल लोक
सभकेँ माथपर नाचैत शोक
आठ बरखक छौंड़ी
धेने अछि एक गोटेक गोड़
आँखि सँ बहैत अछि नोर
‘‘हमर माय-बाप हेरा गेल
भैया पानि मे घेरा गेल
हओ बाप कतऽ जाएब
कतऽ रहब आब कि खायब’’
आँखि गुआरि बाजल ओ
‘‘हमर परिवारक तँ अछिए न कोनो ठेकान
ऊपर सँ कऽ रहल छँ तु छान बान्ह
धीरज धर गे अभागल
नऽ तऽ भऽ जेबें निष्चय पागल।’’

छठम चित्र- (राहत शिविर। कात-करोटमे ठाढ़ लोक सभ जेना प्राणविहीन भेल।)

ओ स्त्री अछि
कि अस्थिपंजर मात्र
शिशु केँ सटौने अपनहि गात
बड़-बड़ा रहल अछि कात हिं-कात
राहत कर्मचारी कऽ रहल काम
आॅफिसर पुछैत अछि कि भेल नाम
ओ कहैत अछि-
हमर बच्चा बेराम
करम भेल बाम
गिलासक घोरल सतुआ चाटि
लेलहुँ काटि
हम तीन दिन
गिन-गिन
नहि अएलाह कोनो सरकार
केकर करब हम जय-जयकार
हमरा पूरा अछि-षक
तू छहक असली ठक
कियक कहैत छहक
खा ले सबटा सतुआ एकेबेर
साँझ मे आबि जेतौ राहत
सेरक-सेर
एखनहि खा ‘केँ’ जान बचा
सरकारक मान बचा
खा ले भरिपेट प्राण बचा
तिन दिन नहि आयल
आब कि आयत
अपन पेट भरत कि हमरा खिआयत
हेओ सरकार अपरम्पार
हम ओहिना नहि फानैत छी
सब किछु जानैत छी
जखन तक सतुआ, तखन तक आस
सधि जाइत सतुआ तँ भऽ जाइत विनाष।

(अन्तमे)

जीनगी जीनगीक कथा बाँचि रहल अछि
भूत भविष्यक छाँह नाचि रहल अछि
काल इतिहास केँ बाँचि रहल अछि
अवगुण आब गुणकेँ झाँपि रहल अछि
सरकार दुःखकेँ नापि रहल अछि।
उमेश मंडल

परिछनक गीत
(1)
षिव छथि जागल लागल दुआरी हे बहिना, षिव छथि लागल दुआरी।
इन्द्र चन्द्र दिक्पाल वरुण सभ, चढ़िश्चढ़ि निज असबारी।
साजि बरात हेमन्त घर आयल, नगर शोर भेल भारी। श् षिव...
पुरहित ब्रह्मा चारु मुख लय, वेद ऋृचा उचारी।
दाढ़ी झुलबैत अगुआ नारद, ब्राह्मण वीणा धारी। श् षिव...
परिछय चलली माय मनाइनि,लय कंचन दुइ थारी। श् षिव...
पटकि आरती घर के पड़ली, नाग छोड़ल फुफकारी। श् षिव...
योगन गण मण्डप बीच आयल, भरि गहना पेटारी।
तखन ससरि मण्डप दिषि आयल, देखल सब नरश्नारी। श् षिव...
हरहारा के काड़ा, पहुँची पनिया दरारी।
ढ़ोढ़क जोसन सुगबा के मुनरी, मनटीका मनिहारी।
ढ़ोरक करेत आ अजगर, अधसर के पटसारी।
धामन करधन गेड़ुली गहुमन, नागक नथिया भारी। श् षिव...
जेहने बर तेहने बरियाती, तेहने गहना सारी।
षिव छथि लागल दुआरी, हे बहिना षिव छथि लागल दुआरी।




(2)
चलु सखि सब देहरि पर साजू डाला पान हे।
आनि ठक बक दीप लेसू परिछु सीताराम हे।
हरखि चलू बरियात बरियात आयल राज भवन समीप हे।
आइ अछि बड़ भाग हे सखि राम दरषन देल हे।
(3)
सीता करथि बिलाप तन थरश्थर काँप।
धनुषा केओ नहि तोरल जनकपुर मे।
आब हम रहब कुमारि घर बैसल हिय हारि,
बिनु पुरषक नारि जनकपुर मे।
घर मे बैसब आब जाय, अपन वयस गमाय।
मरब जहरश्बिख खाय, जनकपुर मे।
(4)
घीरेश्घीरे चलियौ दुलहा अंगना हमार हे।
अंगना मे होयत दुलहा विधि व्यवहार हे।
सरहोजि दाइ लेती नाक पकरि हे।
लग कनी अबियौ दुलहा लाज बिसारि हे।
धुनेष के झाँपल मुँह करियौ उधार हे।
सिताजी के माय सुनयना आरती उतारु हे।
कपड़ा उतारै कालक गीतश्
माइ हे नाक दबाय वरके जाँचू बहिना।
दाइ हे योगी छथि कि भोगी से बुझबनि कोना?
कपड़ा निकालि बनी देखियनु बहिना।
दाइ हे रोगी छथि कि भोगी से बुझवनि कोना?
माइ हे हाथ पैर नीक जकाँ जाँचू बहिना।
हाथ पैर ठीक छनि कि नहि से बुझवनि कोना?
घुमाय फिराय वर के देखियनु बहिना।
माइ हे नांगर छथि कि ठीक से वुझबनि कोना?
दाइ हे बजाय झुकाय बरके देखियनु बहिना।
पण्डित छथि कि मूर्ख से वुझबनि कोना?



पाग उतारै कालक गीतश्
जे एहि बर के आंगन अनलनि हुनका देवनि गारि हे।
धोती पहिरक लूरि ने हिनका पाग खसल जाय हे।
देह परहक वस्त्रो जे छनि सेहो अनलनि माँगि हे।
ठक बक किछुओ नहि चिन्हथि हिनका देबनि फेरि हे।
अक्षरक ज्ञान कनियो ने हिनका नित करथि चरबाहि हे।
मूसे कवि इहो पद गेलनि गौड़ीक बड़ दिअमान हे।
चतुर घटक इहो वर अनलनि हिनके दियनु वियाहि हे।
नाक धरक गीतश्
सिर स पाग उतारल काँख दबाओल हे।
लय डोपटा गिरमोहार नाक धय आनल हे।
दुधहि चरण परवारल निहुरि निहारल हे।
हिनको परिछि घर आनल परिछि देखओल हे।
ठक बक चीन्हक गीतश्
चलूश्चलू दुलहा अंगना हमार यो।
अंगना मे होयत दुलहा विधि व्यवहार यो।
ठक के कहलनि दुलहा माटिक मुरुत यो।
दुलहाक माय केहन छिनारि इहो ने सिखेलखिन हे।
हुनकर काकी केहन छिनारि इहो ने सिखेलखिन हे।
बेसन के कहलनि दुलहा घाटि यो।
दुलहाक पीसी केहन छिनारि इहो ने सिखेलखिन यो।
भालरि के कहलनि दुलहा केरा के पात यो।
दुलहाक बहिन केहन खेलारि इहो ने सिखेलखिन यो।
मूज के कहलनि दुलहा इ थीक कोर यो।
हिनकर पितामही केहन खेलारि इहो ने सिखेलखिन यो।
आंगन जायकालक गीतश्
चलु घीरे धीरे ललन ललीक अँगना
ई अंगना नहि बुझब अवध के
दौड़ल चलब मन मानत जेना। चलु.....
गमकैत फूल कियारी लागल
हीरा पन्ना गमला साजल
बेली चमेली गुलाब दोना। चलू....
एहिना फुल रहय मिथिला मे
बारहो मास ओ तीसो दिना। चलू....
देखथि दुलहा ठाढ़ अँगना। चलु....
अठोंगर कुटै कालक गीतश्
हम धनमा कुटैब एहि बरबा से।
घुरि फिरि आयल अवधबा से।
की बहिया की नृपति बालक।
बुझबनि उखरि मूसरबा से।
घुमि घुमि धान कुटै छथि बालक।
विवष भेल बेवहरबा से।
चैदह भुवन ई अनका बन्है छथि।
आइ बन्हियनु काँच डोरबा से।
स्नेहलता ई गाओल अठोंगर।
रानी बिलोकति घरबा से।
नैनाश् योगिनिक गीतश्
पहिल योगिनिया तोहे अपन सासु हे।
आब दुलहा भेलहा योगिनिया बसी हे।
आलरिश् झालरि कन्ह कारु सिर बेनिया हे।
गीत स पहिनक फकड़ा
थिकौ बंगालिनि बसी, बंगला सुरपुर स आयल छी
सूखल नदिया नाव चलाबे, बिन लेसन के दधि जनमाबे।
चुलहिक पुत्ता सारि उपजाबे, कोठी पर जे बड़द नचाबे।
कन्या निरीक्षण कालक गीतश्
देल आमक पल्लव आमक पल्लव हे।
चिन्हू बाबू चिन्हू घनि, अपन चिन्हि जुनि भूलव हे।
रघुकूल के एक रीति, तकर सुधि राखब हे।
आहे! हेरथि नहि परनारि, से तखनहि जानब हे।
चारु ललन चित्त चंचल करे डगमग हिय हे।
आहे! आजु असल थिक जाँच नृपति घर आयल हे।
यद्यपि चारु कुमार कुलक पति(पैत) राखल हे।
सब सखि देल हकार ललन कहि राखल हे।


एहि अवसरक फकड़ाश्
काँच बाँस काटि के, बंगला घर छाड़ि के, दहिन लट झाड़ि के.
वाम छथि कनियाँ दहिन छथि सारि, उठाउ प्रथम वर हृदय विचारि।
जौं नहि चिन्हब अप्पन नारि, हँसती सखी सब थपड़ी पाड़ि।
आम महु विवाहक गीतश्
उठु उठु कामिनि छोड़ह लाज,
द्वार लागल छथि पाहुन समाज।
आयल दषरथ साजि बरियात,
फुलह फलह सखि नव जल जात।
मन जे आँकल गेल तुलाय,
सुनतहि सीता गेली फुलाय।
गद्गद स्वर बड़ होइछ लाज,
आजु देखत मोहि ससुर समाज।
धोबिनक सोहागश्
धोविनक बेटी झट दहिन सोहाग गे
राजा जनकजी के एक गोट बेटी।
सिन्दुर पिठार लय मुँगरी पुजबही,
लय धो दहिन सोहाग गे। धोबिन...
गुर चााउर लऽ मुँह मे खुअबही
कोचा धो दहिन सोहाग गे। धोविन....
सुकुमारि धिया के सोहाग दही ने,
खय के देबौ चूड़ा दही।
पहिरय के देबौ सायाश्साड़ी
जेवर देबौ लटकाय। सुकुमारी....
देबौ मे देबौ गाय महिसबा,
जोड़ा बड़द देबौ हकाय। सुकुमारी....
बेदी घुमय कालक गीतश्
(1)
गरदनि बान्हल चदरिया आगूश्आगू सिया माई।
करथिन मण्डप परिकर्मा हे दुलहा और भाई।
बसहा जकाँ सभ घुमथिन हे न चलय प्रभुताई।
गाबथि मंगल गाइनि हे सब मंगल छाई।
हँसी अली मुसकाथि छनहि देथि पीहकारी।
से सुनि हँसि कऽ जमाय हे देल परिक्रमा सारी।
(2)
नहु नहु दुलहा चलै छथि कोना।
जेना कल्हुआ के बरदा घुमै जेना।
बड़द के उपमा हुनका देलियनि कोना।
माई हे चैरासीक फन्दा मे पड़लनि जेना।
डेग नमहर कऽ दुलहा चलै छथि कोना।
माई हे खुट्टा स बड़दा खुजै जेना।
बरदाक उपमा हुनका देलियनि कोना।
माई गे चैड़ासीक फन्दा मे पड़लनि जेना।
अंगना मे ठाढ़ दुलहा लगै छथि कोना।
जेना अंगना मे मेह गाड़ल हो जेना।
मेहक उपमा हुनका देलियनि कोना।
जेना चोरासीक फन्दा मे पड़ला जेना।
कहथि सिनेहलता चलब कोना।
माई गे आंगुरक इसारा देब जेनाश्जेना।
कन्यादान कालक गीतश्
कोनहि कुल मे सीता जनम लेल, कौनहि कुल श्रीराम हे।
कौनहि आगे माइ वेद उचारल कौनहि कैल कन्यादान हे।
राजा जनक घर सीता जनम लेल दषरथ घर श्रीराम हे।
नारद ब्राह्मण वेद उचारल जनक कयल कन्यादान हे।
राजा जनक देल हीरा मोती सोनमा आओर देलनि धेनु गाय हे।
रानी सुनयना देल सीता सन बेटी राम लेल अंगुरी लगाय हे।
कहमा छुटल सुपति मौनियाँ कहमा जनक ऋृषि बाप हे।
कहमा छुटल माय सुनैना जिनका झहरनि नोर हे।
अंगनहि छुटल सुपति मौनियाँ दुआरे जनक ऋृषि बाप हे।
मंदिर छुटल माय सुनैना जनिका नैन नोर हे।
सिनुरदान गीतश्
पाहुन सिन्दुर लिय हाथ, सर सुपारीक साथ।
सिता उधारल माथ सिन्दुर लिय अय।
सुन्दर बितै अछि लगन, अहाँ धनुष कयल भगन।
सब आनन्द मगन, आषिष दिय अय।
रघुबर सिर शोभनि मौर, सीता नित पूजथि गौर।
आइ पूरल मनोरथ नरपति होय लय।
महिमा दुनूक अनूप, सब आनन्दित भूप।
आइ पूरल मनोरथ आनन्दित होय लय।

लावा छिटबा कालक गीतश्
मैना देखहुँ जाय,
त्रिभुवन पति भेल अहाँक जमाय।
षिव गौरी मिलि लावा छिड़िआय।
भूखल वासुकि बिछिश् बिछि खाय।
सोनाक बट्टा भरि घोरल कसाय।
उमत सदाषिव भसम लोटाय।
जटा मे देल अंकुसी लगाय।
झिकतहि सुरसरि गेलि बहराय।

विआहक गीतश्
मचिया बैसल तोहे राजा हेमन्त ऋृषि, सुनू अहाँ बचन हमार यो।
गौरी कुमारि कते दिन रहती, ई नहि उचित विचार यो।
एतबा वचन जब सुनल हेमन्त ऋृषि, पंडित अनलनि बजाय यो।
आबथु पंडित बैसथु पलंग चढ़ि, मुनि देथु धीया के विआह हे।
एक पोथी तकलनि दोसर पोथी तकलनि, तेसर मोथी तकलनि पुरान यो।
ओहि रे जंगल मे योगी एक वसै छथि, तनिके संग धिया के विआह यो।
अरही वन के खड़ही कटाओल, वृन्दावन बिट बाँस यो।
देव पितर मिलि माड़व ठानल, होबय लागल धिया के विआह यो।
एक दिस बैसला नारद ब्राह्मण, दोसर दिषि गौरीक बाप यो।
बाघक छाल पर वैसला महादेव, होअय लागल धिया के विआह यो।
कन्यादान कय उठला हेमंत ऋृषि, मोती जेंका झहरनि नोर यो।
किए जे खेलौ बेटी किए पहिरलौ, कथी ले भेलहुँ वीरान यो।
खीर जे खेलौ बाबा चीर पहिरलौ, सिन्दुर लै भेलहुँ वीरान यो।


देहरि छेकक गीतश्
छोड़ब नहि दुआरि सुनियौ रघुनन्दन।
जौं रघुनन्दन चलला कोवर घर सरहोजि छेकल दुआरि।
नेग बिना दय पैर बढ़ायब देब गारि हजार यौ, सुनियौ रघुनन्दन ...
पाँच पदारथ हरि जीक संग मे एक सरहोजि एक सारि यौ, सुनियौ...
जौं नहि देता सात पदारथ बेचता बहिन भाय यौ। सुनियौ....(अगिला अंकमे)
कल्पना शरण

शीतल बयार
शीतल बयार बहैत हरदम
दिनक गर्मी मन्द पड़ल.
गाछक जीवन केहेन विचित्र
खाइत झपेड़ माटिमे गड़ल
एकटा पक्षीक आवास देवाक
सामर्थ्य नहिं शेष रहल
परन्तु. हवाक लय मे नृत्यक
शैली जरूर विशेष रहल।
एकटा पातक दर्श नहिं.
डारिक बोन विरान पड़ल
किछो जँ अलग बुझायत
अछि पतंग जे कटिकऽ खसल.
विश्रामक समय अछि सभ लेल
जाबे सूर्यदेव छथि सुस्तायल
मुदा. अहिके बादक रौद
सोचिये कऽ मोन मुस्कायल.
गाछो सबमे ओहि के आस
छल उन्माद के बजायल।


१.बिनीत ठाकुर, २.मनीष ठाकुर, ३.चन्द्रकान्त मिश्र
१.बिनीत ठाकुर


गीत

अएनाके की मोल

अएनाके की मोल आन्हरके शहरमें
लागे उल्टा मुँह सुल्टा अपने नजरमें
ज्ञानक शुरमा लगाकऽ जे बजबैय गाल
व्यवहारमें देखल ओकरो उहे ताल

मोन भितरके दर्पण सेहो चुर–चुर
एतऽसँ मानवता भागल अछि कोशो दुर
घुमें दिनमें दरिन्दा ओढी सज्जनके खोल
कतहुँ देखल मातम कतहुँ बाजे ढोल
अएनाके की मोल आन्हरके शहरमें
लागे उल्टा मुँह सुल्टा अपने नजरमें

जे समाज सुधारक ओ करैय किशुनकेर
ओकरे पाछु मुसना कहबैय शवा–शेर
जा धैर नहि हाएत मोन सँ मद–पन नाश
करत लोक कोनाकऽ विनीत भावक आश
अएनाके की मोल आन्हरके शहरमें
लागे उल्टा मुँह सुल्टा अपने नजरमें





२.मनीष ठाकुर
विरह गीत
चेहरा पर नूर छन्हि,
आँखि कऽ झील सन गहराई मे, किछ त जरूर छन्हि,
विरह कऽ पीर छन्हि, वेदना गंभीर छन्हि
स्पष्टतः हुनकर आंखि, केकरो प्रतीक्षा मे, अतीव अधीर छन्हि,
चेहरा पर उदासी कऽ स्पष्ट कईक चिन्ह छन्हि
किन्तु नहिं ; ई त कोनो आम वेदना सऽ पूर्णतया भिन्न छन्हि,
साडी छन्हि अस्त व्यस्त
देखियौ त! ओहो व्यस्त, बैसल छथि चिन्तन मे;
गहीर कोनो सोच मे अपने ओ डूबल छथि।
बात मुदा कहत के? कियाक ओ मौन छथि ?
मोन मे विचार के ई, केहेन छन्हि सतत प्रवाह?
लगैय ब्रह्मों नहिं, पाबि सकता मनक थाह
के छथि ? कतय के?कोन गाम सं आयल छथि?
मन्दिर क आंगन मे , एहि पवित्र प्रांगण मे, भगवन के पूजा ले उद्यत की बैसल छैथ?
दिव्य रूप शोभित ई रमणी जे बैसल छथि,
देव पूजा हुनकर तऽ, मात्र एक बहाना छन्हि।
मन्दिर मे आबय के, अश्रु के बहाबय के, प्रियतम जे हुनकर परदेस जा क बैसल छथि-
भगवन के नाम पर हुनका बजावय के
बैसल ओ सोचय छथि - प्रियतम के गप सब,
पूछय छथि मने मन-
“हमरा बतबियौ न - सजा ई केहेन ऐह?
कियाक ई विरक्ति ऐह, दाम्पत्य जीवन सँ ?
अपन एहि दासी के कियाक बिसरने छी?”
किछो नहिं भेटय छन्हि, हुनका जबाब कतहु।
ई सब त गप्प मुदा मनक भुलाबा छै, मात्र बहलावा छै ।
मेनको त जिनकर सौन्दर्य सँ जरय छथि,
पारलौकिक सुन्दरि के, छोडि के बैसल ओ-
केहेन मनुख छथि, निर्दय आ निष्ठुर छथि।
पैसा कमाबय ले, प्रतिष्ठा पाबय ले,
जे किछ काज संभव छन्हि, करय लेल आतुर छथि।
किन्तु ओ ई बिसरल छथि जे-
पत्नी आ अपन सुपुत्र, हुनके पर निर्भर छैथ।
मात पिता क प्रति हुनक कर्तव्य की?
मात्र अधिकारे टा ! हुनकर मन्तव्य छन्हि!!
मानल अपन भविष्य, हुनके बनेवाक छनिन्हि
प्रतिष्ठा जे पयबाक छन्हि - मेहनत जरूरी छै।
अपने छथि दूर मुदा दिल सँ कियाक दूरी छै।
हुनक एही मे मान, यैह मात्र छै निदान- पैसा रहय गुलाम;
इंसां तऽ मालिक छै- भौतिक हर वस्तु के।
भौतिकता इंसा पर, शासन जे करतै तऽ
ई त हेबाके छै-
भौतिकता हंसैत छै
मानवता कनै छै।
३.चन्द्रकान्त मिश्र, पिता- श्री जनार्दन मिश्र, ग्राम-महथौर गोठ
पो-महादेवमठ ,थाना-अन्धामठ ,जिला-मधुबनी, जन्म-30,12,1968
खाथि साग-भात हगैथ पड़ोर
पेटमे अन्न नहि,
मुँहमे पान रहवाके चाही।
कुरता भले ही मैल रहैन,
चप्पल मुदा चमकैते चाही।।
बात करैथ लाख आ कड़ोड़।
खाइथ साग भात हगैथ पड़ोर।।
तरकारीमे तेल नहि खेताह,
माथमे धृत कुमारी लगेवाके चाही।
राशन भले ही नहि खरिदब,
सिनेमा मुदा देखवाके चाही।।
भात पर चाहियैन धरि तिलकोर।
खाइथ साग-भात हगैथ पड़ोर।।
साबुनक सेहन्ता लागले रहतैन,
सेन्ट लगेनाय हिनका सँ सीखू।
वीड़ी कहियो पिलैथ नहि,
वील्सक पाॅकेट जेवी मे देखू।।
कपड़ा तऽ भेटैन नहि पहिरता मुदा पटोर।
खाइथ साग-भात हगैथि पड़ोर।।
मण्डुलवा सन मूँह लगैत छन्हि,
कनिया मुदा गोरिकिये चाही।
घर पर खड़ नहि छन्हि,
टाका मुदा एक मुट्ठा चाही।।
कनिया वाप वेचैथ वाड़ी आ खड़होर।
खाइथ साग-भात हगैथ पड़ोर।।
बापके पादय नहि आवैन,
अपना भरि दिन बंदूके चलेता।
भरि साल करैथ गप्पक खेती
बखार मुदा बनेवे करता।।
हिनकर नहि जोर-वेजोड़।
खाइथ साग-भात हगैथ पड़ोर।।
डिबिया जलवै के सामथ्र्य नहि,
सौंसे गाम धरि आगि लगेताह।
कविरकाने कहियो नहि पढ़लैथ,
सास्त्री मुदा संगीत सुनताह।।
बात तेहेन जेना खौलति इन्होर।
खाइथ साग-भात हगथि पड़ोर।।

(2) जागु-जागु मैथिल

कुम्भकर्णी नीन्न तोड़ु,
आपस मे आपक्ता जोड़ु।
साधनहीन जर्जर समाज मे,
विकाशक नव मन्त्र फूँकू।।
आवो वदलू अपन मिजाज।
जागु-जागु मैथिल समाज।।
कतय गेल शान मिथिला के?
कतय गेल दूधक बहैत धार?
सोना उगलैत माटि कतय गेल,
कतय गेल ओ वात-विचार?
समझु आइ एकर राज।
जागु-जागु मैथिल समाज।।
सपटा विकाश मंत्री जीके घरमे।
वचल लोक हकन्न कनै अए।
एयर कंडीशनक नाम सुनै छी,
रौद मे केहेन देह जरै अए।।
सुखायल सोणित करव कोन काज।
जागु-जागु मैथिल समाज।।
टूटल सड़क अन्हार गाम,
भेटय नहि ककरो कोनो काम।
मुलूक छोड़ि के भागए पड़ल,
एलहुँ बड़ दूर आन ठाम।।
रक्षक पहिरने छथि भक्षक ताज।
जागु-जागु मैथिल समाज।।
चारा खाय छथि तेल पिवै छथि,
अलकतरा सँ मोंछ टेरै छथि।
सबहक हिस्सा खायवाक किस्सा,
मंत्रीजी क्षणहि मे गढ़ै छथि।
शर्म विवलथि वेचलथि लाज।
जागु-जागु मैथिल समाज।।
मैथिल आइ उपेक्षित वनलथि,
मिथिला के अछि हाल-वेहाल।
भासए हेंजक हेज माल-जाल।।
मंत्री करैथ तइयो पाज।
जागु-जागु मैथिल समाज।।
(3) पी-पी-पी दारु पी
पी-पी-पी दारु पी,
जी-जान छोड़ि केँ दिन राति पी,
मरि जेमें त किछु नहि जेतौ
दूध-दही या घी
पी-पी-पी दारु पी......।
एक घूॅट दारु दवाये जानु
सौंसे बोतल हाल वेहाल
कूकर मूॅति के मूॅह मे जेतौ
जखने दारु लगतौ जी...
पी-पी-पी-दारु पी।
चाउर वेचलें आॅटा वेचले,
वीवी के सभ गहना वेचलें।
सभटा विकायै गेलौ,
अनकर लेवे की।
पी-पी-पी-दारु पी।


कुसुम ठाकुर
"चुल बुली कन्या बनि गेलहुँ "


बिसरल छलहुँ हम कतेक बरिस सँ ,
अपन सभ अरमान आ सपना ।
कोना लोक हँसय कोना हँसाबय ,
आ कि हँसी मे सामिल होमय ।
आइ अकस्मात अपन बदलल ,
स्वभाव देखि हम स्वयं अचंभित ।
दिन भरि हम सोचिते रहि गेलहुँ ,
मुदा जवाब हमरा नहि भेंटल ।
एक दिन हम छलहुँ हेरायल ,
ध्यान कतय छल से नहि जानि ।
अकस्मात मोन भेल प्रफुल्लित ,
सोचि आयल हमर मुँह पर मुस्की ।
हम बुझि गेलहुँ आजु कियैक ,
हमर स्वभाव एतेक बदलि गेल ।
किन्कहु पर विश्वास एतेक जे ,
फेर सँ चंचल , चुलबुली कन्या बनि गेलहुँ ।।



"अभिलाषा"


अभिलाषा छलs हमर एक ,
करितौंह हम धिया सँ स्नेह ।
हुनक नखरा पूरा करय मे ,
रहितौंह हम तत्पर सदिखन ।
सोचैत छलहुँ हम दिन राति ,
की परिछ्ब जमाय लगायब सचार ।
धीया तs होइत छथि नैहरक श्रृंगार ,
हँसैत धीया रोएत देखब हम कोना ।
कोना निहारब हम सून घर ,
बाट ताकब हम कोना पाबनि दिन ।
सोचैत छलहुँ जे सभ सपना अछि ,
ओ सभ आजु पूरा भs गेल।
घर मे आबि तs गेलिह धीया ,
बिदा नहि केलहुँ , नय सुन अछि घर ।
एक मात्र कमी रहि गेल ,
सचार लगायल नहिये भेल।।


शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू‘‘,नाम ः शिव कुमार झा,पिताक नाम ः स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘,माताक नाम ः स्व0 चन्द्रकला देवी,जन्म तिथि ः 11-12-1973,शिक्षा ः स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम $ पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर,पिन: 848101,संप्रति ः प्रबंधक, संग्रहण,जे0 एम0 ए0 स्टोर्स लि0,मेन रोड, बिस्टुपुर
जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि ः वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार - प्रसार हेतु डाॅ0 नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चैधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्व मे संलग्न

!! कोप भवन मे कनियाॅ !!

रूसलि किए सूतलि छी बनबू ने कनेक चाय अय ।
मिथिला हम चललहुॅ , टाटानगरी सॅ आइ अय ।।

अहाॅ जौ एना रहब तऽ हम कोना जीअब,
सदिखन कनिते - कनिते व्यथे जहर पीअब ।
एना अहाॅ रूसब तऽ हम कऽ लेब दोसर सगाइ अय,
मिथिला ............................................................................. ।।

अहाॅ केर रूप देखिते कामदेवो कानैत छथि,
‘‘मृगनयनी‘‘ केॅ ओ उर्वशी मानैत छथि ।
बिहुॅसल मादक घुघना लागै लौंगिया मिरचाइ अय,
मिथिला ............................................................................. ।।

छगनलाल ज्वेलरी सॅ कनकहार लायव,
आजुरैन पूनम केॅ, पार्क मे घुमायव ।
हहरल मनक तृष्णा, नहि बनू हरजाइ अय,
मिथिला ............................................................................. ।।

ऊठू प्रिये, अहाॅ जल्दी नहाबू,
कोप भवन सॅ उठि कऽ लऽग मे आबू ।
मंदहि मुस्की मारू, हऽम अनिलहुॅ अछि मलाइ अय,
मिथिला ............................................................................. ।।



!! प्रेयसीक विलाप !!

लागै बरखा इन्होर,
मारै बयसक जोर,
मिलनक आशा मे बैसलि -
छी आबू ने चकोर ।

बाटे तऽ तकिते तकिये,
नयन सूखि गेलै,
पे्रयसीक विलाप पर नहि -
अहॅक ध्यान एलै ।

ठनका गर्जय मांचल शोर,
तिरपित नृत्य मोरनी मोर ।
मिलनक आशा मे वैसलि,-
छी आबू ने चकोर ।

बेदर्दी जुनि बऽनू,
मोन टूटि गेलै ।
पावसक शीतलता -
आतप्त भेलै ।

लुप्त भगजोगिनी दर्शय भोर,
लटकल मेघ गगन घनघोर,
किएक हृदय तोड़ि रहलहुॅ ।

हा ! हम्मर मन चित चोर ।

१.कामिनी २.धर्मेन्द्र

१.कामिनी कामायिनी
भटकैत स्वप्न
बड़का... .अजोध. . . अजगर.. . .
ससरति.. ससरति .. . .
गिड़ने जा रहल अछि . .. .
सब किछु .. .
अप्प्न मान. . . मर्यादा
अप्पन खेत पथार. . .
अप्प्न. . .संस्कार विचार.. .
नहि रहलै आब. . .
कत्तो संझिया चुल्हि
नहि बॉचल चुल्हिक छौड़ .. ।
आब त’ .. .गैस प’ बनै छै
परसौती के दबाय
घरक काज धंधा सॅ निफिकिर ...
कन्या सब देखैत अछि टीवी. .
के सिरियल .. . .’ बड़का बड़का विज्ञापन
आ’ हेरायल अछि स्वप्नक दुनिया मे
जतय बड़का गाङी मे. . .
बढिया सूट पहिरने
सदिखन मुस्कैत .. .सुन्नर राजकुॅमर .
घुमाबैत अछि स्टियरिंग

आ’ गाबै अछि सुहनगर प्रेमक
मधुर मधुर गीत . .. .
कात मे बैसल . । . .अर्धनग्न . . ..केश छिड़कोने
सुनै अछि .. भाव मे ... डूबल ई प्रीत ...
मधुर मधुर गीत.. ..वा जीवन संगीत ...
मुदा गामक कन्या के
नहि छै ई भान
जे अहि सूटिंग के बाद
नै ओ राजकुमर .. .नै ओ सुन्नरि. ..आ’ नहि ओ बड़का गाड़ी..माया जाल छै सब . .।
सब अपन काज सम्पन्न करि .. .
आओत अपन औकात प’ . .. .
गाङी जेतय गाङी वाला लग़ ..
दुनु के भेटतै पारिश्रमिक . . नाटक करबा लेल .
आ’ फेर . . .ओ सब . .. कोनो
ऐडक’ लेल. .. . ताकैत रहतै बाट ...
मुदा बजारक .. .चलाकी
बूझतै .. कोना कन्या. . . .. .ओ बेच की रहल अछि
ओ त’ एकरा .. सत्त्य मानि ..
टुटि रहल अछि . .अपना सॅ . .. अपन घर सॅ.. .अपन जड़ि सॅ .
ई चमकैत अजगर. . .
चुसि रहल छै. ..
लोकक निर्दोष स्वप्न के
आ’ भरि रहल अछि ।
ओहि मे ..कुंठा .. .मोहभंग .. . आ’ अंगोर. ।..
कामिनी कामायनी
24।011 ।09
२.धर्मेन्द्र विह्वल
ओकरासभक अन्त होबाक चाही


काल्हिधरि उजाड रहल गाछमे
छोट छोट पल्लवसभ
अंकुरित भेल अछि
ओ सभ तोहर अनुमतिएबिना
अंकुरित भ’गेल
आब सौंसे गाछ पसरिरहल अछि
ओ सभ सामन्त अछि
सामन्तक अन्त करबाक चाही
सभ गाछके
जडिसँ काटि देबाक चाही ।
नदीसभमे
वर्सोसँ पानि बहिरहल अछि
बहैत बहैत एक ठामसँ
दोसर ठाम जाइत अछि
ओ सभ तोहर अनुमतिएबिना
बहैत अछि
ओ सभ साम्राज्यवादी अछि
साम्राज्यवादीक अन्त करबाक चाही
सभ नदीक
जलप्रवाहके रोकि देबाक चाही ।
चहुदिसक वातावरण
वयारयुक्त अछि
वयारो अनेरे बहैत अछि
एकर कोनो सीमा नहि छैक
कतहुसँ कतहु पहुँच जाइए
ओ सभ तोहर अनुमतिएबिना बहैत अछि
ओ सभ विस्तारवादी अछि
विस्तारवादीक समूल नष्ट होबाक चाही
वयारके बहवासँ रोकबाक चाही ।
ओ सभ साँच बजैए
ओकरासभके झूठ बाज’ नहि अबै छै
जे देखैए से कहैए
ओ सभ तोहर अनुमतिएबिना
निरन्तर बजिते जा रहल अछि
ओ सभ युगविरोधी अछि
युगविरोधीसभक अन्त करबाक चाही
ओकरासभके बजबासँ रोकबाक चाही
ओकरासभके
सभ दिनक लेल चूप क’ देल जेबाक चाही ।

बालानां कृते-
१.जगदीश प्रसाद मंडल-लघुकथा २.देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स)
२.कल्पना शरण: देवीजी
१.जगदीश प्रसाद मंडल
लघुकथा
(1) उत्थान-पतन
एकटा शिष्य गुरु स पुछल- ‘मनुष्य शक्तिक भंडार छी, फेरि ओ किऐक डूबैत-गिरैत अछि?’
शिष्यक प्रश्न सुनि गुरु कने काल सोचि अपन कमंडल पानि मे फेकि देलखिन। कमंडल तैरैय (हेलए) लगल। कने कालक बाद कमंडल निकालि पेन (पेंदी) मे भूर कऽ देलखिन। भूर केला बाद फेरि कमंडल कऽ पानि मे फेकलखिन। कमंडल डुबि गेल। डूबल कमंडल कऽ देखबैत गुरु कहलखिन- ‘जहिना छेद भेलि कमंडल पानि मे डूबि गेल मुदा बिनु छेद भेलि कमंडल नहि डूबल, तहिना मनुक्खोक अछि। जहि मनुष्य मे संयम छैक ओ एहि संसाररुपी पोखरि मे नहि डूबैत अछि मुदा जे असंयमी अछि, ओ ओहि छेद भेलि कमंडल जेँका, डूबि जायत अछि। गाय कऽ अगर चालनि मे दुहल जाय त दूध धरती पर गिरत मुदा जँ सौंस बर्तन मे दुहल जायत त वरतन मे रहत। तहिना इन्द्रियशक्ति जँ मानसिक शक्ति कऽ कुमार्ग दिशि लऽ जायत त ओ ओही चालनि जेँका भऽ जायत। मुदा जँ सुमार्ग (सही रास्ता) दिस बढ़त त ओ जरुर शक्तिशाली मनुष्य बनत।’
(2) प्रतिभा
डाॅक्टर राममनोहर लोहिया जेहने विद्वान तेहने देशभक्त रहथि। देशप्रेमक विचार पिता स विरासत मे भेटल रहनि। ततबे नहि ओहने मस्त-मौला सेहो रहथि। सदिखन चिन्तन आ आनन्द मे जिनगी वितवथि रहथि। विदेश स अबै काल मद्रास बन्दरगाह पर जहाज स उतड़िलथि। कलकत्ता जेबाक छलनि। मुदा संग मे टिकटोक पाइ नहि। बिना भाड़ा देने कोना जइतथि। बंदरगाह स उतरि सोझे ‘हिन्दू’ अखबारक कार्यालय मे जा सम्पादक केँ कहलखिन- अहाँक पत्रिकाक लेल हम दू टा लेख देव।’
सम्पादक पूछलखिन- ‘लाऊ कहाँ अछि।’
‘लिख क दऽ दइ छी’
लेख तँ लिखल छलनि नहि, कहलखिन- ‘कागज-कलम दिअ, अखने लिखि क दइ छी।’
लोहिया जीक जबाव सुनि सम्पादक बकर-बकर मुह देखै लगलनि। तखन डाॅक्टर लोहिया अपन वास्तविक कारण बता देलखिन। कारण बुझलाक बाद सम्पादक जी बैसबोक आ लिखबोक ओरियान कऽ देलखिन। किछु घंटाक उपरान्त दुनू लेख तैयार क लोहिया जी द देलखिन।
दुनू लेख पढ़ि सम्पादक गुम्म भ मने-मन हुनक प्रतिभाक प्रशंसा करै लगलखिन। ज्ञानक महत्ता सर्वोपरि अछि। ई बुझि एक्को क्षण व्यर्थ गमेबाक चेष्टा नहि करक चाही। सदिखन अपना कऽ नीक काज मे लगौने रहक चाही।
(3) मर्म
एकटा स्कूल। जहि मे हेलब सिखाओल जायत। नव-नव विद्यार्थी प्रवेश लइत आ हेलैक कला सीखि-सिखि वाहर निकलैक। स्कूलेक आगू मे खूब नमगर चैड़गर पोखरि। जेकरा कात मे त कम पानि मुदा बीच मे अगम पानि।
शिक्षक घाट पर ठाढ़ भऽ देखए लगलथि। विद्यार्थी सब पानि मे धँसल। विद्यार्थी सब केँ आगू मुहे (अगम पानि दिशि) बढ़ल जाइत देखि शिक्षक कहै लगलखिन- ‘बाउ, अखन अहाँ सब अनजान छी। हेलब नइ जनैत छी। तेँ अखन अधिक गहीर दिस नै जाउ। नइ त डूबि जायब। जखन हेलब सीखि लेब तखन पाइनिक उपर मे रहैक ढ़ंग भऽ जायत। जखन पाइनिक उपर मे रहैक ढ़ंग (कला) सीखि लेब, तखन ओकर लाभ अपनो हैत (होयत) आ दोसरो कऽ डूबै स बचा सकब। एहिना संसार मे वैभवोक अछि। अनाड़ी ओहि मे डूबि जायत अछि, जबकि विवेकवान ओहि पर शासन करैत अछि। जहि स अपनो आ दोसरोक भलाई होइत छैक।’
वैभवक स्थिति मे व्यक्ति अपने कुसंस्कार स गहीर खाइ खुनि स्वयं डूबि जाइत अछि।
(4) अधखड़ुआ
दू टा चेलाक संग गुरु घूमै ले विदा भेला। गाम स निकलि पाँतर मे प्रवेश करितहि बाध दिशि नजरि पड़लनि। सगरे बाध खेत सब मे माटिक ढ़िमका देखलखिन। तीनू गोटे रस्ते पर स हियासि-हियासि देखऽ लगलथि, जे ऐना किऐक छै? किछु काल गुनधुन क दुनू चेला गुरु केँ कहलकनि- ‘अपने एतै छाहरि मे बैसियौक, हम दुनू भाइ देखने अबै छी।’
‘बड़बढ़िया’ कहि गुरु बैसि रहलथि। दुनू चेला विदा भेल। कातेक खेत स ढ़िमका देखैत दुनू गोटे सौंसे बाधक ढ़िमका देखि, घुरि गेल। सब ढ़िमकाक बगल मे कूप खुनल छलैक। मुदा कोनो कूप मे पानि नहि छलैक। सिर्फ एक्केटा कूप मे पानिओ छलैक आ ढ़ेकुलो गारल छलैक। ओना त सौंसे बाधे खीराक खेती भेलि छल मुदा सब खेतक लत्ती पाइनिक दुआरे जरि गेल छलै। सिर्फ एक्केटा खेत मे झमटगर लत्तिओ छल आ सोहरी लागल फड़लो छल।
गुरु लग आबि चेला बाजल- ‘सब ढ़िमकाक बगल मे कूप खुनल छैक मुदा पानि नहि छैक, सिर्फ एक्केटा टा कूप मे पानियो छैक, ढ़ेकुलो गारल छैक आ खेत मे सोहरी लागल खीरो फड़ल छैक।’
चेलाक बात ध्यान स सुनि गुरु पूछलखिन- ‘ऐना किऐक छै?’
दुनू चेला चुप्पे रहल। चेला के चुप देखि गुरु कहै लगलखिन- ‘ऐहन लोक गामो सब मे ढ़ेरिआइल अछि जे चट मंगनी पट विआह करै चाहैत आछि। जते उथ्थर कूप छैक, जहि मे पानि नहि छैक, ओ खुननिहारो सब ओहने उथ्थर अछि। कोनो काज-चाहे आर्थिक होय वा बौद्धिक वा सामाजिक- अगर ढ़ंग स नहि कयल जयतैक त ओहने हेतैक। बीच मे जे एकटा कूप देखलिऐक, ओ खुननिहार किसान मेहनती अछि। अपन धैर्य आ श्रम स माटिक तरक पानि निकालि खीरा उपजौने अछि। तेँ ओकरा मेहनतक फल भेटिलैक। बाकी सब कामचोर अछि तेँ आशा पर पानि फेरा गेलैक।’
(5) समयक बरबादी
एकटा व्यवसायी किस्सा सुनलक जे राजा परीक्षित एक्के सप्ताह भागवत सुनि ज्ञानवान भऽ गेल छलाह। तेँ हमहू किऐक ने भऽ सकै छी। ओ कथावाचक भजिअबै लगल। कथावाचक भेटलैक। दुनू गोटे (कथोवाचक आ व्यवसायियो) अपन-अपन लाभक फेरि मे। कथावाचक सोचैत जे मालदार सुनिनिहार भेटल आ व्यवसायी सोचैत जे जिनगी भरि बईमानी क बहुत धन अरजलौ आबो मरै बेरि किछु ज्ञान अरजि ली,जहि स मुक्ति हैत।
कथा शुरु भेल। सप्ताह भरि कथा चलल। सप्ताह बीतला पर व्यवसायी व्यास जी (कथावाचक) कऽ कहलकनि- ‘अहाँ नीक-नहाँति कथा नहि सुनेलहुँ, हमरा ज्ञान कहाँ भेल?’ दछिना नहि देव।’
व्यवसायीक बात सुनि व्यासजी कहलखिन- ‘अहाँक ध्यान सदिखन पाइ कमाइ दिस रहै अए ते ज्ञान कोना हेत?’
दुनू एक-दोसर कऽ दोख लगबै लगल। केयो अपन गल्ती मानै ले तैयारे नहि। दुनूक बीच पकड़ा-पकड़ी होयत पटका-पटकी हुअए लगल। ओहि समय एकटा विचारबान व्यक्ति रास्ता स गुजरैत रहथि। ओ देखलखिन। लग मे जा दुनू गोटे कऽ झगड़ा छोड़बति पूछलखिन। दुनू गोटे अपन-अपन बात ओहि व्यक्ति कऽ कहलक। दुनूक बात सुनि ओ व्यक्ति दुनूक हाथ-पाएर बान्हि कहलखिन- ‘आब अहाँ दुनू गोटे एक-दोसरक बान्ह खोलू।’
बान्हल हाथ स कोना खुजैत? बंधन नहि खुजल। तखन ओ निर्णय दैत कहलखिन- ‘दुनू गोटेक मन कतौ आओर छल तेँ सफल नहि भेलहुँ। सप्ताह भरिक समय दुनूक गेल तेँ अपन-अपन घाटा उठा घर जाउ। एकात्म भेने बिना आध्यात्मिक उद्देश्यक पूर्ति नहि होइत छैक।’
(6) पहिने तप तखन ढ़लिहें।
एक दिन एकटा कुम्हार माटिक ढ़ेरी लग बैसि, माटि स ल कऽ पकाओल बरतन धरिक विचार मने-मन करैत छल। कुम्हार कऽ चिन्तामग्न देखि माटि कहलकै- ‘भाइ! तोँ हमर ऐहन बरतन बनावह जहि मे शीतल पानि भरि क राखी आ प्रियतमक हृदय जुरा सकी।’
माटिक सवाल सुनि, कने काल गुम्म भऽ कुम्हार माटि केँ कहलक- ‘तोहर बिचार तखने संभव भऽ सकै छउ, जखन तोरा कोदारिक चोट, गधा पर चढ़ैक, मुंगरीक मारि खाइक, पाएर स गंजन सहैक आ आगि मे पकैक साहस हेतउ। एहि स कम गंजन भेने पवित्र पात्र नहि बनि सकै छेँ।’
7 खलीफा उमरक स्नेह।
खलीफा उमर गुलामक संग घूमै ले देहात दिशि जाइत रहथि। किछु दूर गेला पर देखलखिन जे एकटा बुढ़िया जोर-जोर स अंगन मे बैसि कानि रहल अछि। रास्ता स ससरि ओ डेढ़िया पर जा ओहि बुढ़िया स कनैक कारण पूछलखिन। हिचुकैत बुढ़िया कहै लगलनि- ‘हमर जुआन बेटा लड़ाई मे मारल गेल। हम भूखे मरै छी मुदा एकोदिन खलीफा उमर खोजोखबरि लइ ले नै आयल।’
बुढ़ियाक बात सुनि उमर चोट्टे घुरि, घर पर आबि, एक बोरी गहूम अपने माथ पर ल बुढ़िया ऐठाम विदा भेला। माथ पर गहूमक बोरी देखि गुलाम कहलकनि- ‘अपने बोरी नहि उठबियहुँ। हमरा दिअ नेने चलै छी।’
गुलाम केँ उमर जबाव देलखिन- ‘हम अपन पापक बोझ उठा खुदाक घर नहि जायब त पाप कोना कटत? अहाँ त हमरा पापक भागी नहि हैब।’
गहूमक बोरी बुढ़ियाक घर उमर पहुँचा देलखिन। गहूम देखि बुढ़िया नाम पूछलकनि। मुस्कुराइत उमर जबाव देलखिन- ‘हमरे नाओ उमर छी।’
असिरवाद दैत बुढ़िया कहलकनि- ‘अपन परजाक दुख-दरद क अपन परिवारक दुख-दरद जेँका बुझि क चलब तखने आदर्श बनि सकब। जखन आदर्श बनब तखने हजारो-लाखो लोकक दुआ भेटत आ अमर हैब।’
8 जखने जागी तखने परात
प्रसिद्ध उपनयासकार डाॅक्टर क्रोनिन बड़ गरीब रहथि। मुदा जखन पी.एच.डी. केलनि आ किताब सब बिकै लगलनि तखन धीरे-धीरे सुभ्यस्त होअए लगलथि। धन कऽ अबैत देखि मनो बढ़ै लगलनि। क्रिया-कलाप सेहो बदलै लगलनि। क्रिया-कलाप कऽ बदलैत देखि पत्नी कहलकनि- ‘जखन हम सब गरीब छलौ तखने नीक छलौ जे कम स कम हृदय मे दयो त छल। मुदा आब ओ (दया) समाप्त भेल जा रहल अछि।’
पत्नीक बात सुनि क्रोनिन महसूस करैत कहलखिन- ‘ठीके कहलहुँ। धनीक धन स नहि होइत बल्कि मन (हृदय) स होइत अछि। हम अपन रास्ता स भटकि गेल छी। जँ अहाँ नहि चेतबितहुँ त हम आरो आगू बढ़ि ओहि जगह पर पहुँच जइतहुँ जत्ते एक्कोटा मनुक्खक बास नहि होइत छैक।’
9 अस्तित्वक समाप्ति
एक ठाम, कने हटि-हटि कऽ, तीनि टा पहाड़ छलैक। पहाड़क पँजरे मे नमगर आ गँहीर खाधियो छलैक। जहि स लोकक आवाजाही नहि छलैक। एक दिन एकटा देवता ओहि दिशा स होइत गुजरति रहथि। तीनू पहाड़ कऽ देखि पूछलखिन- ‘एहि क्षेत्रक नामकरण करैक अछि से ककरा नाम स करी? संगहि अपन कल्याणक लेल की चहैत छ?’
पहिल पहाड़ कहलकनि- ‘हम सबसँ उँच भऽ जाय, जहि स दूर-दूर देखि पड़िऐक।’
दोसर बाजल- ‘हमरा खूब हरियर-हरियर प्रकृतिक सम्पदा स भरि दिअ। जइ स लोक हमरा दिशि आकर्षित हुअए।’
तेसर कहलक- ‘हमर उँचाई कऽ छीलि एहि खादि कऽ भरि दिऔक, जहि स ई सैाँसे क्षेत्र उपजाउ बनि जाय। लोकोक आबाजाही भऽ जयतैक।’
तीनू जोगार लगा देवता विदा भऽ गेला। एक बर्खक उपरान्त तीनूक परिणाम देखैक लेल पुनः अयलाह। पहिल पहाड़ खूब उँचगर भऽ गेल छल। मुदा क्यो ओमहर जेबे ने करैत। पानि-पाथर, बिहाड़ि, रौद आ जाड़क मारि सबसँ बेसी ओकरे सहै पड़ैक। दोसर तत्ते प्रकृतिक सम्पदा स भरि गेल जे बोनाह भऽ गेल। बनैया जानबरक डरे क्यो ऐबे ने करैत। तेसर पहाड़ स खाधियो भरि गेलैक आ अपनो समतल भऽ गेल। खाधि स ल कऽ पहाड़ धरिक जगह उपजाउ बनि गेलैक। खेती-बाड़ी करै ले लोकक आवाजाही दिन-राति भऽ गेलैक।
तेसर पहाड़क नाम पर क्षेत्रक नामकरण करैत देवता कहलखिन- ‘यैह पहाड़ अपन अस्तित्व समाप्त कऽ खाधियो क अपना हृदय मे लगौलक। जहि स ई क्षेत्र उपजाउ बनि गेल। तेँ एहिक नाम पर एहि क्षेत्रक नाम राखब उचित थिक।’
10 खजाना
एकटा इलाका मे रोैदी भऽ गेलै। सब तरहक परिवार कऽ सब तरहक जीबैक रास्ता छलैक। मुदा एकटा दशे कट्ठावला किसान मजदूर छल। जे अपने खेत मे मेहनत कऽ गुजर करैत छल। रौदी देखि वेचारा सोचै लगल जे जाबे पाइन नहि हैत, ताबे खेती कोना करब? जाबे खेती नइ करब ताबे खाइब की?तेँ अनतै चलि जाय, जे काज लागत ते गुजरो चलत। जब बरखा हेतै त, धुरि क चलि आयब आ खेती करब। ई सोचि सब तूर, नुआऽ वस्तु ल विदा भऽ गेल।
जाइत-जाइत दुपहर भऽ गेलै। भूखे-पियासे बच्चा सब लटुआय लगलै। छोटका बच्चा ठोहि फाड़ि-फाड़ि कानै लगलै। रास्ता कात मे एकटा झमटगर गाछ देखि सब केँ छाहरिक आशा भेलै। सब तूर गाछ तर पड़ि रहल। छोटका बेटा माए कऽ कहलक- ‘माए! भूखे परान निकलै अए, कुछो खाइ ले दे।’
बेटाक बात सुनि माएक करेज पघिलए लगलै मुदा करैत की? खाइ ले ते किछु रहबे ने करै। मुदा तइयो बेचारी कहलकै- ‘बौआ, कने काल बरदास करु। खाइक जोगार करै छी।’
सब तुर जोगार मे जुटि गेल। क्यो माटिक गोला क चुल्हि बनवै लगल, ते क्यो जारन आनै गेल। क्यो पानि अनै इनार दिशि विदा भेल। गाछक उपर स एकटा चिड़ै कहलकै- ‘ऐ मूर्ख! पकबैक (भोजन बनवैक) त सब जोगार सब करै छह मुदा पकेवह की? जखन पकबैक कोनो चीज छहे नहि त छुछे चुल्हि जरेबह।’
बड़का बेटा यैह सोचैत छल जे कतौ स किछु कन्द-मूल आनि, उसनि क खायव। मुदा तेहि बीच चिड़ैक मजाक सुनि खिसिया के कहलकै- ‘तोरे सब परिवार क पकड़ि आनि पका कऽ खेबौ।’
चिड़ैक मुखिया डरि गेल। मने-मन सोचै लगल जे परस्पर सहयोगक पुरुषार्थ किछु क सकैत अछि। तेँ झगड़ब उचित नहि। मिलान स्वर मे बाजल- ‘भाई! हमरा परिवार कऽ किऐक नाश करवह। तोरा गारल खजाना देखा दइ छिअह। ओकरा ल आबह आ चैन स जिनगी बितविहह।’
ओ (चिड़ै) खजाना देखा देलकै। सब मिलि ओहि खजाना के ल घर दिशि घुरि गेल।
ओकरा घरक बगले मे दोसरो ओहने परिवार छलै। जकरा सब बात ओ कहि देलकै। मुदा ओहि परिवारक सब कोइढ़ आ झगड़ाउ। खजानाक लोभे ओहो सब तूर विदा भेल। जाइत-जाइत ओहि गाछ तर पहुँचल। पहिलुके जेँका भानस करैक नाटक सब करै लगल। गारजन जकरा जे अढ़बै से करैक बदला झगड़े करै लगै। गाछ पर स ओइह चिड़ै कहलकै- ‘भोजनक जोगारे करै मे ते सब कटौज करै छह, तखन पकेवह की?’
पहिलुके जेँका परिवारक मुखिया कहलकै- ‘तोरे पकड़ि क पकेवह?’
हँसैत चिड़ै उत्तर देलकै- ‘हमरा पकड़ैवला क्यो आओर छल जे सब धन ल चलि गेल। तोरा बुत्ते किछु ने हेतह?’


२.देवांशु वत्स, जन्म- तुलापट्टी, सुपौल। मास कम्युनिकेशनमे एम.ए., हिन्दी, अंग्रेजी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे कथा, लघुकथा, विज्ञान-कथा, चित्र-कथा, कार्टून, चित्र-प्रहेलिका इत्यादिक प्रकाशन।
विशेष: गुजरात राज्य शाला पाठ्य-पुस्तक मंडल द्वारा आठम कक्षाक लेल विज्ञान कथा “जंग” प्रकाशित (2004 ई.)

नताशा:
(नीचाँक कार्टूनकेँ क्लिक करू आ पढ़ू)
नताशा बत्तीस

नताशा तैंतीस

२.कल्पना शरण: देवीजी
भारतक न्यायपालिका व्यवस्था

देशके प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसादक जन्मदिवसकेँ भारतमे वकील दिवसक रूपमे मनाओल जाइत अछि। अहि अवसर पर देवीजी सबके भारतक न्यायपालिका व्यवस्थाक जानकारी देबक विचार बनौली।फेर की छल बच्चा सबके परीक्षा समाप्त भऽ गेल छलै तैं ओकरे सबहक मददि सऽ गौंवा सबहक मेला लगौली।तखन देवीजी अपन भाषण गॉंधीजीक ग्राम स्वराज्यक विचारधारा सऽ केली ।
ओ कहलखिन जे गामक पॉंचटा विद्वान् बुजुर्ग व्यंिक्त ग्राम सभा लगाबै छैथ आ व्यक्ति विशेष अथवा ग्राम विशेष के समस्या के समाधान करै छैथ तकरा ग्राम पंचायत कहल गेल छै।पञ्चके निर्वाचन प्रजातांत्रिकताक अव्हेलनाक बगैर होयत अछि। ताहि सऽ उपरके व्यवस्था अछि पंचायत समिति जाहिमे कएक गामक समूहके अर्थात् तहसिलके. जाहिके कुल जनसंख्या 20 लाख सऽ बेसी अछि पंचायत बैसायल जायत अछि।तकर बादक स्तर अछि जिला परिषद् जाहिमे जिला स्तरके प्रशासनक व्यवस्था होयत अछि। पंचायती राज अपनाबै वला राज्यके प्रत्येक जिलामे एक जिला परिषद् होयत अछि। देवीजी कहलखिनजे भारतके सब राज्यमे पंचायती राजक व्यवस्था नहिं अछि।यद्यपि ई पूर्णतः कानूनन अछि।
फेर देवीजी कहलखिन जे एक सर्वव्यापी न्यायपालिका व्यवस्था अछि जाहिके अन्तर्गत सामान्य जनता अपन समस्या पुलिस थानामे दर्ज करा सकै छैथ। जँ पुलिसक हस्तक्षेप सऽ हुन्का संतुष्टि नहि होयत छैन तऽ अपन अपील जिलान्यायालय अर्थात् डिस्ट्रिक्ट कोर्ट तक जा सकैत छैथ। प्रत्येक जिला अथवा किछु जिलाक समूहमे एक जिला न्यायालय होयत अछि।जँ जिलान्यायालयक निर्णय सऽ कियो असंतुष्ट छैथ तऽ आगॉं उच्च न्यायालय अर्थात् हाईकोर्ट मे याचिका दऽ सकै छैथ।ताहि सऽ ऊपर उच्चतम् न्यायालय छै।देशके प्रत्येक राज्यमे एर्कएक उच्च न्यायालय अछि आ देशक एकमात्र उच्चतम् न्यायालय दिल्लीमे अछि।देशक राष्ट्रपतिके उच्चतम् न्यायालयके फैसलाके विरूद्ध फैसला देबाक अधिकार छैन ताहिके अतिरिक्त राज्यसभा तथा लोकसभामे कानूनके संशोधनक कार्य निरन्तर चलैत रहैत छै।भारतके कानून व्यवस्था बहुत उच्च कोटिके अछि जाहिमे धर्म. जाति. रंग़ लिंग़ प्रदेशके आधारपर कोनो भेदभाव नहिं अछि आ संगे कोनो धार्मिक मान्यताक अव्हेलना नहिं होय तकरो ध्यान राखल गेल अछि। भारतक अहि उदारताक कारण दलाई लामा आ अनेको तिब्बती चीन सऽ निष्काषित भेलाक बाद 50 सालसऽ भारतमे शरणार्थी छैथ।
देवीजी कहलखिनजे अपनासबके कानूनक जानकारी आ ओकरा पाबक माध्यम बूझल रहबाक चाही।गरीब आ असहाय के लेल अनेको आर्थिक सहायता उपलब्ध अछि।जाहिसऽ लोक वकीलक सहयोग पाबि सकैत छैथ।कतेको महिला आ रिटायर्ड वकील अवैतनिक वकालत करैत छैथ। तैं भारतवासीके न्यायक सम्मान करैत कोनो अन्यायके नहिं बर्दास्त करक प्रतिज्ञा लेबाक चाही।भारतीय गणराज्यक पहिल राष्ट्रपतिके श्रद्धांजली देबाक आ वकील दिवस मनाबक अहिसऽ बढ़िया तरीका आर की भऽ सकैत अछि।

विशेष धन्यवादक पात्र : सुश्री नवीन कुमारी.
बी ए., एल एल बी ऑनर्स., मैनेजर.
ए डी सी टेलीकम्युनिकेशन्स यू एस लीमिटेड, बेंगलूर

बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
Input: (कोष्ठकमे देवनागरी, मिथिलाक्षर किंवा फोनेटिक-रोमनमे टाइप करू। Input in Devanagari, Mithilakshara or Phonetic-Roman.)
Output: (परिणाम देवनागरी, मिथिलाक्षर आ फोनेटिक-रोमन/ रोमनमे। Result in Devanagari, Mithilakshara and Phonetic-Roman/ Roman.)
इंग्लिश-मैथिली-कोष / मैथिली-इंग्लिश-कोष प्रोजेक्टकेँ आगू बढ़ाऊ, अपन सुझाव आ योगदानई-मेल द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।
विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.
नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली
1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली
(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)
मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश,बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश,वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी,जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत,योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु,तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले,चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन),पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए।
-(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)

2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर,तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठिमा,ठिना,ठमा
जेकर, तेकर
तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६



VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS(Festivals of Mithila date-list)

8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS
8.1.Original Maithili Story by Smt.Shefalika Varma,Translated into English by DR. RAJIV KUMAR VERMA.
8.2.Original poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy from New York


DATE-LIST (year- 2009-10)

(१४१७ साल)

Marriage Days:

Nov.2009- 19, 22, 23, 27

May 2010- 28, 30

June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30

July 2010- 1, 8, 9, 14

Upanayana Days: June 2010- 21,22

Dviragaman Din:

November 2009- 18, 19, 23, 27, 29

December 2009- 2, 4, 6

Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25

March 2010- 1, 4, 5

Mundan Din:

November 2009- 18, 19, 23

December 2009- 3

Jan 2010- 18, 22

Feb 2010- 3, 15, 25, 26

March 2010- 3, 5

June 2010- 2, 21

July 2010- 1

FESTIVALS OF MITHILA

Mauna Panchami-12 July

Madhushravani-24 July

Nag Panchami-26 Jul

Raksha Bandhan-5 Aug

Krishnastami-13-14 Aug

Kushi Amavasya- 20 August

Hartalika Teej- 23 Aug

ChauthChandra-23 Aug

Karma Dharma Ekadashi-31 August

Indra Pooja Aarambh- 1 September

Anant Caturdashi- 3 Sep

Pitri Paksha begins- 5 Sep

Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep

Matri Navami- 13 Sep

Vishwakarma Pooja-17Sep

Kalashsthapan-19 Sep

Belnauti- 24 September

Mahastami- 26 Sep

Maha Navami - 27 September

Vijaya Dashami- 28 September

Kojagara- 3 Oct

Dhanteras- 15 Oct

Chaturdashi-27 Oct

Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct

Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct

Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct

Chhathi- -24 Oct

Akshyay Navami- 27 Oct

Devotthan Ekadashi- 29 Oct

Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov

Somvari Amavasya Vrata-16 Nov

Vivaha Panchami- 21 Nov

Ravi vrat arambh-22 Nov

Navanna Parvana-25 Nov

Naraknivaran chaturdashi-13 Jan

Makara/ Teela Sankranti-14 Jan

Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan

Mahashivaratri-12 Feb

Fagua-28 Feb

Holi-1 Mar

Ram Navami-24 March

Mesha Sankranti-Satuani-14 April

Jurishital-15 April

Ravi Brat Ant-25 April

Akshaya Tritiya-16 May

Janaki Navami- 22 May

Vat Savitri-barasait-12 June

Ganga Dashhara-21 June

Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul
Guru Poornima-25 Jul

Original Maithili Story by Smt.Shefalika Varma,Translated into English by DR. RAJIV KUMAR VERMA.
Shefalika Verma has written two outstanding books in Maithili; one a book of poems titled “BHAVANJALI”, and the other, a book of short stories titled “YAYAVARI”. Her Maithili Books have been translated into many languages including Hindi, English, Oriya, Gujarati, Dogri and others. She is frequently invited to the India Poetry Recital Festivals as her fans and friends are important people. I do not have to give more introduction of her as her achievements speak for themselves.
TRANSLATED BY -DR. RAJIV KUMAR VERMAASSOCIATE PROFESSOR OF HISTORY AT SATYAWATI COLLEGE [EVE.] UNIVERSITY OF DELHI, DELHI
THE. CORPSE OF BOLDNESS
PROF. [DR.] SHEFALIKA VERMA
Dear Parijat,
The overcast cloudy sky made my inner self wet with your thoughts and memory. Do you know it seems if I do not think, it is all right, if I do not need, it is all right. But now it is too late.
You always think that Upasana is very happy, leading a free life like waves on the currents of freedom. Yes, it was the encouragement given by you people that made me feel empowered. It was indeed the result of that empowerment I was able to open my mouth before Babuji.
Remember, next day we all were full of high spirits when we met in the college. It seemed as if we had conquered the Mount Everest or had crossed the English Channel laughingly.
I remember the off periods in the college when we used to make countless Plans sitting under the trees laden with beautiful enchanting flowers. We used to think that girls must be bold , they must exhibit BOLDNESS . We used to laugh at the fact that marriage is settled by the parents and girls follow their choice as tamed sheep and she goats and
begin to serve their husbands . Do you remember Parijat , we always used to laugh loudly
The Boldness of our laughter rocked and thundered the sky. We used to debate on the topics from the pages of history how Sanyogita chose Prithviraj as her husband in spite of opposition from her father ; how Krishna eloped with Rukmani and how Draupadi married Arjuna .
Really Parijat, all these talks appeared absolutely true those days . In our inner core a kind of revolt surfaced against this society. The main issue behind this tendency to revolt was the fact that the women should not consider themselves helpless, hapless and dependent on others. You already know that it was me who first took this daring step. Yes, I raised the first slogan of freedom in opposition to my parents and to the norms and values of society.
This slogan of freedom was not only imbued with the feelings of revolt, but I had the inner feeling that my husband should be equally educated, cultured and capable. And it was not an unjust craving which could not have been satiated.

Parijat , it is also not true that before revolting against my Babuji , I had to forget the techings and lessons from the great works of Shelley , Keats , Prasad , Mahadevi , Mir, Ghalib and others.

Presently, I am a Professor in a local college. No doubt my craving for education is achieved but craving for a suitable life partner is lost like a dead body in a cemetery. Even if that desire still persists, what can be done now? Already thirty-two spring seasons of my life is converted into barrenness. What should I think now? There remain only some counted days in my life. I am earning well, eating and dressing well. I am no longer the daughter of a poor father.
Perhaps fault lies with my fate. My fate was always accompanied by poverty, not of mine but my father's . Paro, do you remember Divya ? Daughter of a colonel, her parents bought a doctor for her. Paro, do you remember Sipi whose both parents were principals? They bought an engineer for her in fifteen thousand rupees. Not to talk of doctors and engineers, even a mere inter pass or graduade boy fetched a market price of Rs. Ten thousand. I am really angry aith those girls who married those money - takers. I wish if all those girls joined their hands together in a bold manner and qustioned the authority and domination of their Purchased husbands, it could have perhaps changed the
conservative attitudes of their respective husbands in a gradual manner. Nevertheless, Parijat forget it.
My father was not able to buy an educated match for me. At the same time, my literate background did not prove a blessing but a curse for my parents and me. I remember my parents satisfied my craving for education almost remaining hungry. I was educated to such a level where there was no match available for me. That is why when
my father wanted me to marry Satish, a matriculate coal dealer, I flatly and Boldly refused . For this behaviour my father used to rebuke and scold me day and night. I patiently tolerated all this, but was not able to find any way.

Paro , I no more want to journey through my memory - lane , but at the same time
my inner feelings make me guilty . Perhaps I chose the wrong path, Ideviated from the right path . I should not have Boldly refused my negotiation with Satish . Ishould not have reacted against Satish Babu. After all I was the daughter of a poor father. My condition was entirely different from those of Divya and Sipi .

The boldness and happiness of those days really deviated me from the right path. Nevertheless , neither I was at fault nor you or our friends . It was the fault of our tender age which ultimately has plucked the dream flower of so many happiness. Paro, that was not real . But this is reality. During those days we shared happiness together but presently I am alone suffering and this suffering is thousand times more than our shared happiness.

Yes Paro, your Upasana had tried to build a dream castle with seven colours , but now that is in shambles . Till date I never allowed myself to be imbued with any kind of emotion such as kindness, care for others and love. Now I realise that it was caring attitude for others, which catapults a man to the cloudy heights or takes him to the seabed. Paro, there are persons who belong neither to heaven nor to hell. They try to belong to both. In this process, they become devoid of feelings such as care, love and
kindness. Their lives remain full of void and perenially thirsty. Paro, I belong to same category, undoubtedly lam a thirsty soul.

Paro, our college life will never come back. But I must tell you that all girls should not think in the same manner, behave in the same way. Today's age is entirely different from those of earlier age. In today's materialistic society why all girls will think about Sanyogita and Draupadi . In these days the choice or liking of a girl is of no significance.

Really Paro, woman loses_ her meaning and existence without a man. Woman can never be independent. Her only fate is to serve as a wife. If she tries to be--independent, she meets the same fate; like me the dark sea submerges her. Emotions are not permanent, but being a wife is permanent. She is queen of her home. Paro, you cannot imagine my longing for a permanent home. After leading the life of a free and independent bird , I must get a strong shoulder where I can lie my head and seek for eternal bliss . But fate has ruined my life. My all golden dreams are shattered now.

Paro , like me you have also made your life miserable , deplorable and pitiable . I request you to build a happy nest, a permanent home. You are younger to me. You should not deliberately ruin your own life.

For me, my pain is my life. Happiness for me is pain as well as sorrow.

Original poem in Maithili by Gajendra Thakur
Translated into English by Lucy Gracy from New York

Gajendra Thakur (b. 1971) is the editor of Maithili ejournal “Videha” that can be viewed at http://www.videha.co.in/ . His poem, story, novel, research articles, epic – all in Maithili language are lying scattered and is in print in single volume by the title “KurukShetram.” He can be reached at his email: ggajendra@airtelmail.in


The Sculptor

The sculptor of Balrajgarh
Belonging to the pond of Harari
The Buddhist caves of
Pastan Akaur and Naahar Bhagwatipur
The statue of Uchchaith,
Another form of Avalokiteshwar Tara
The goddess of Kali activated there
By hearing the melody of prayer sung by women
For thousands of years
The rise of Vaijayantipur-Janakpur
And the city of Mithilanagar
A land of defeating enemies
Where rivals were destroyed
The kingdom of general people
Land of the King Janak
The artworks of a lower caste
But who will appraise them now
Just worship their feet
Who kept on serving their motherland
With all dedication
After having such a bitter experience
Walked around Janakpur
Being a devotee of Kamala
A round tour of the great Mithila
Joined the group of untouchable
Established the gohbar for the community
Who sent them out of the village
But the sculptor of cuture
Made the cave of Buddha
Buddha is yours
Shiva, Ram, Krishan are yours
Since entry to temple was not banned
So didn’t quit the place
Bearing the discrimination of
Religion and caste
We must worship them
The sculpt of the statue of Buddha
Base of Brahma and Vishnu’s statues
When the construction collapsed
We all united to give them exile
Then prayer started to
The Deen Bhadari Chhechhan Maharaj
The Gareeban baba and the Lalmain baba
Amar baba, Moti bai, Gango devi
Krishana Ram Sahlesan and more
Made statues of them
The are respectful !




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महत्त्वपूर्ण सूचना (२):सूचना: विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary. विदेहक भाषापाक- रचनालेखन स्तंभमे।
कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक- गजेन्द्र ठाकुर

गजेन्द्र ठाकुरक निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक(संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बालमंडली-किशोरजगत विदेहमे संपूर्ण ई-प्रकाशनक बाद प्रिंट फॉर्ममे। कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक, खण्ड-१ सँ ७
Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding:
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विदेह: सदेह : १ : तिरहुता : देवनागरी
"विदेह" क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित।

विदेह: प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/
विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:१)
सम्पादक: गजेन्द्र ठाकुर; सहायक-सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा
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मोनालीसा हँस रही थी : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु.100.00

कहानी-संग्रह

रेल की बात : हरिमोहन झा प्रकाशन वर्ष 2007मूल्य रु. 70.00
छछिया भर छाछ : महेश कटारे प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00
कोहरे में कंदील : अवधेश प्रीत प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 100.00
शहर की आखिरी चिडिय़ा : प्रकाश कान्त प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
पीले कागज़ की उजली इबारत : कैलाश बनवासी प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
नाच के बाहर : गौरीनाथ प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00
आइस-पाइस : अशोक भौमिक प्रकाशन वर्ष 2008मूल्य रु. 90.00
कुछ भी तो रूमानी नहीं : मनीषा कुलश्रेष्ठ प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 100.00
भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान : सत्यनारायण पटेल प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 90.00
मैथिली पोथी

विकास ओ अर्थतंत्र (विचार) : नरेन्द्र झा प्रकाशन वर्ष 2008 मूल्य रु. 250.00
संग समय के (कविता-संग्रह) : महाप्रकाश प्रकाशन वर्ष 2007 मूल्य रु. 100.00
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दकचल देबाल (कथा-संग्रह) : बलराम प्रकाशन वर्ष2000 मूल्य रु. 40.00
सम्बन्ध (कथा-संग्रह) : मानेश्वर मनुज प्रकाशन वर्ष2007 मूल्य रु. 165.00 शीघ्र प्रकाश्य

आलोचना

इतिहास : संयोग और सार्थकता : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

हिंदी कहानी : रचना और परिस्थिति : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

साधारण की प्रतिज्ञा : अंधेरे से साक्षात्कार : सुरेन्द्र चौधरी
संपादक : उदयशंकर

बादल सरकार : जीवन और रंगमंच : अशोक भौमिक

बालकृष्ण भट्ïट और आधुनिक हिंदी आलोचना का आरंभ : अभिषेक रौशन

सामाजिक चिंतन

किसान और किसानी : अनिल चमडिय़ा

शिक्षक की डायरी : योगेन्द्र

उपन्यास

माइक्रोस्कोप : राजेन्द्र कुमार कनौजिया
पृथ्वीपुत्र : ललित अनुवाद : महाप्रकाश
मोड़ पर : धूमकेतु अनुवाद : स्वर्णा
मोलारूज़ : पियैर ला मूर अनुवाद : सुनीता जैन

कहानी-संग्रह

धूँधली यादें और सिसकते ज़ख्म : निसार अहमद
जगधर की प्रेम कथा : हरिओम

अंतिका, मैथिली त्रैमासिक, सम्पादक- अनलकांत
अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023,
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बया, हिन्दी तिमाही पत्रिका, सम्पादक- गौरीनाथ
संपर्क- अंतिका प्रकाशन,सी-56/यूजीएफ-4,शालीमारगार्डन,एकसटेंशन-II,गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.),फोन : 0120-6475212,मोबाइल नं.9868380797,9891245023,
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श्रुति प्रकाशनसँ

१.बनैत-बिगड़ैत (कथा-गल्प संग्रह)-सुभाषचन्द्र यादवमूल्य: भा.रु.१००/-

२.कुरुक्षेत्रम्–अन्तर्मनक (लेखकक छिड़िआयल पद्य, उपन्यास, गल्प-कथा, नाटक-एकाङ्की, बालानां कृते, महाकाव्य, शोध-निबन्ध आदिक समग्र संकलनखण्ड-१ प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना
खण्ड-२ उपन्यास-(सहस्रबाढ़नि)
खण्ड-३ पद्य-संग्रह-(सहस्त्राब्दीक चौपड़पर)
खण्ड-४ कथा-गल्प संग्रह (गल्प गुच्छ)
खण्ड-५ नाटक-(संकर्षण)
खण्ड-६ महाकाव्य- (१. त्वञ्चाहञ्च आ २. असञ्जाति मन )
खण्ड-७ बालमंडली किशोर-जगत)- गजेन्द्र ठाकुर मूल्य भा.रु.१००/-(सामान्य) आ $४० विदेश आ पुस्तकालय हेतु।

३.विलम्बित कइक युगमे निबद्ध (पद्य-संग्रह)- पंकज पराशरमूल्य भा.रु.१००/-

४. नो एण्ट्री: मा प्रविश- डॉ. उदय नारायण सिंह “नचिकेता”प्रिंट रूप हार्डबाउन्ड (मूल्य भा.रु.१२५/- US$ डॉलर ४०) आ पेपरबैक (भा.रु. ७५/- US$ २५/-)

५/६. विदेह:सदेह:१: देवनागरी आ मिथिला़क्षर स‍ंस्करण:Tirhuta : 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: तिरहुता : मूल्य भा.रु.200/-
Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु. 100/-

७. गामक जिनगी (कथा स‍ंग्रह)- जगदीश प्रसाद म‍ंडल): मूल्य भा.रु. ५०/- (सामान्य), $२०/- पुस्तकालय आ विदेश हेतु)

८/९/१०.a.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश; b.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आ c.जीनोम मैपिंग ४५० ए.डी. सँ २००९ ए.डी.- मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध-सम्पादन-लेखन-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा

P.S. Maithili-English Dictionary Vol.I & II ; English-Maithili Dictionary Vol.I (Price Rs.500/-per volume and $160 for overseas buyers) and Genome Mapping 450AD-2009 AD- Mithilak Panji Prabandh (Price Rs.5000/- and $1600 for overseas buyers. TIRHUTA MANUSCRIPT IMAGE DVD AVAILABLE SEPARATELY FOR RS.1000/-US$320) have currently been made available for sale.

११.सहस्रबाढ़नि (मैथिलीक पहिल ब्रेल पुस्तक)-ISBN:978-93-80538-00-6 Price Rs.100/-(for individual buyers) US$40 (Library/ Institution- Indian & abroad)

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I.गजेन्द्र ठाकुरक शीघ्र प्रकाश्य रचना सभ:-

१.कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्डक बाद गजेन्द्र ठाकुरक
कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-२
खण्ड-८
(प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना-२) क संग

२.सहस्रबाढ़नि क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर उपन्यास
स॒हस्र॑ शीर्षा॒
३.सहस्राब्दीक चौपड़पर क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर पद्य-संग्रह
स॑हस्रजित्
४.गल्प गुच्छ क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर कथा-गल्प संग्रह
शब्दशास्त्रम्
५.संकर्षण क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर नाटक
उल्कामुख
६. त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन क बाद गजेन्द्र ठाकुरक तेसर गीत-प्रबन्ध

नाराश‍ं॒सी

७. नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक तीनटा नाटक
जलोदीप
८.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक पद्य संग्रह
बाङक बङौरा
९.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक खिस्सा-पिहानी संग्रह
अक्षरमुष्टिका

II.जगदीश प्रसाद म‍ंडल-
कथा-संग्रह- गामक जिनगी
नाटक- मिथिलाक बेटी
उपन्यास- मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत
III.मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार गीत आ गीतनाद -संकलन उमेश मंडल- आइ धरि प्रकाशित मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद मिथिलाक नहि वरन मैथिल ब्राह्मणक आ कर्ण कायस्थक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद छल। पहिल बेर जनमानसक मिथिला लोक गीत प्रस्तुत भय रहल अछि।
IV.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन

V.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह

VI.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन

VII.विभारानीक दू टा नाटक: "भाग रौ" आ "बलचन्दा"

VIII.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल

IX.मिथिलाक जन साहित्य- अनुवादिका श्रीमती रेवती मिश्र (Maithili Translation of Late Jayakanta Mishra’s Introduction to Folk Literature of Mithila Vol.I & II)
X.मिथिलाक इतिहास – स्वर्गीय प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी

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(ग्राहकक हस्ताक्षर)


२. संदेश-

[ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा, उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ]

१.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत।
२.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी।
३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"कँध अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल,तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत।
४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन।
५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथीकुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी।
६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि।
७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू।
८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।
९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना।
१०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।
११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।
१२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।
१३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।
१४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी।
१५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी।
१६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाई। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। ..सुभाष चन्द्र यादवक कथापर अहाँक आमुखक पहिल दस पंलक्तिमे आ आगाँ हिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेजी शब्द अछि (बेबाक, आद्योपान्त, फोकलोर..)..लोक नहि कहत जे चालनि दुशलनि बाढ़निकेँ जिनका अपना बहत्तरि टा भूर!..( स्पष्टीकरण- दास जी द्वारा उद्घृत अंश यादवजीक कथा संग्रह बनैत-बिगड़ैतक आमुख १ जे कैलास कुमार मिश्रजी द्वारा लिखल गेल अछि-हमरा द्वारा नहि- केँ संबोधित करैत अछि। मैथिलीमे उपरझपकी पढ़ि लिखबाक जे परम्परा रहल अछि तकर ई एकटा उदाहरण अछि। कैलासजीक सम्पूर्ण आमुख हम पढ़ने छी आ ओ अपन विषयक विशेषज्ञ छथि आ हुनका प्रति कएल अपशब्दक प्रयोगक हम भर्त्सना करैत छी-गजेन्द्र ठाकुर)...अहाँक मंतव्य क्यो चित्रगुप्त सभा खोलि मणिपद्मकेँ बेचि रहल छथि तँ क्यो मैथिल (ब्राह्मण) सभा खोलि सुमनजीक व्यापारमे लागल छथि-मणिपद्म आ सुमनजीक आरिमे अपन धंधा चमका रहल छथि आ मणिपद्म आ सुमनजीकेँ अपमानित कए रहल छथि।..तखन लोक तँ कहबे करत जेअपन घेघ नहि सुझैत छन्हि, लोकक टेटर आ से बिना देखनहि, अधलाह लागैत छनि..(स्पष्टीकरण-क्यो नाटक लिखथि आ ओहि नाटकक खलनायकसँ क्यो अपनाकेँ चिन्हित कए नाटककारकेँ गारि पढ़थि तँ तकरा की कहब। जे क्यो मराठीमे चितपावन ब्राह्मण समितिक पत्रिकामे-जकर भाषा अवश्ये मराठी रहत- ई लिखए जे ओ एहि पत्रिकाक माध्यमसँ मराठी भाषाक सेवा कए रहल छथि तँ ओ अपनाकेँ मराठीभाषी पाठक मध्य अपनाकेँ हास्यास्पदे बना लेत- कारण सभकेँ बुझल छैक जे ओ मुखपत्र एकटा वर्गक सेवाक लेल अछि। ओना मैथिलीमे एहि तरहक मैथिली सेवक लोकनिक अभाव नहि ओ लोकनि २१म शताब्दीमे रहितो एहि तरहक विचारधारासँ ग्रस्त छथि आ उनटे दोसराक मादेँ अपशब्दक प्रयोग करैत छथि-सम्पादक)...ओना अहाँ तँ अपनहुँ बड़ पैघ धंधा कऽ रहल छी। मात्र सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक।( स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ- विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे http://www.videha.co.in/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि आ किएक रखने छथि वा आगाँसँ दाम नहि राखथु- ई सभटा परामर्श अहाँ प्रकाशककेँ पत्र/ ई-पत्र द्वारा पठा सकै छियन्हि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग।
१७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल।
१८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई।
१९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत।
२०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ।
२१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ।
२२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य।
२३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई।
२४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि।
२५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक हमर उपन्यास स्त्रीधनक विरोधक हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए। ओना अहाँक मंत्रपुत्र हिन्दीसँ मैथिलीमे अनूदित भेल, जे जीवकांत जी अपन आलेखमे कहै छथि। एहि अनूदित मंत्रपुत्रकेँ साहित्य अकादमी पुरस्कार देल गेल, सेहो अनुवाद पुरस्कार नहि मूल पुरस्कार, जे साहित्य अकादमीक निअमक विरुद्ध रहए। ओना मैथिली लेल ई एकमात्र उदाहरण नहि अछि। एकर अहाँ कोन रूपमे विरोध करब?)
२६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक।
२७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत।
२८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी।
२९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना।
३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी।
३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि।
३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई।
३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई।
३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई।
३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक।
३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ।
३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम।
३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना।
३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ।
४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल।
४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई।
४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य।
४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना।
४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि।
४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक।
४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत।
४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि।
४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंकसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत।
४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना।
५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना।
५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना।
५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल।
५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना।
५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल।
५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना।
५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल।
५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई।
५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि।
५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी।
६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि।
६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब।
६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी।
६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही।
६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय।
६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना।
६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय।
६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह।
६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना ।
६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ।
७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक)
७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनकसेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि।

विदेह

मैथिली साहित्य आन्दोलन

(c)२००८-०९. सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन। विदेह (पाक्षिक) संपादक- गजेन्द्र ठाकुर। सहायक सम्पादक: श्रीमती रश्मि रेखा सिन्हा, श्री उमेश मंडल। एतय प्रकाशित रचना सभक कॉपीराइट लेखक लोकनिक लगमे रहतन्हि, मात्र एकर प्रथम प्रकाशनक/ आर्काइवक/ अंग्रेजी-संस्कृत अनुवादक ई-प्रकाशन/ आर्काइवक अधिकार एहि ई पत्रिकाकेँ छैक। रचनाकार अपन मौलिक आ अप्रकाशित रचना (जकर मौलिकताक संपूर्ण उत्तरदायित्व लेखक गणक मध्य छन्हि) ggajendra@yahoo.co.in आकि ggajendra@videha.com केँ मेल अटैचमेण्टक रूपमेँ .doc, .docx, .rtf वा .txt फॉर्मेटमे पठा सकैत छथि। रचनाक संग रचनाकार अपन संक्षिप्त परिचय आ अपन स्कैन कएल गेल फोटो पठेताह, से आशा करैत छी। रचनाक अंतमे टाइप रहय, जे ई रचना मौलिक अछि, आ पहिल प्रकाशनक हेतु विदेह (पाक्षिक) ई पत्रिकाकेँ देल जा रहल अछि। मेल प्राप्त होयबाक बाद यथासंभव शीघ्र ( सात दिनक भीतर) एकर प्रकाशनक अंकक सूचना देल जायत। एहि ई पत्रिकाकेँ श्रीमति लक्ष्मी ठाकुर द्वारा मासक 1 आ 15 तिथिकेँ ई प्रकाशित कएल जाइत अछि।
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"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...