Tuesday, December 15, 2009

'विदेह' ४८ म अंक १५ दिसम्बर २००९ (वर्ष २ मास २४ अंक ४८) PART I

'विदेह' ४८ म अंक १५ दिसम्बर २००९ (वर्ष २ मास २४ अंक ४८)

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एहि अंकमे अछि:-
१. संपादकीय संदेश

२. गद्य
२.१. प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी-मिथिलाक इतिहास (आगाँ)

२.२.उपन्यास- जगदीश प्रसाद मंडल-उपन्यास-जिनगीक जीत

२.३. सुजीतकुमार झा-६अम शताब्दीथक लोक नायक वृतचित्रमे
२.४. बिपिन झा-॥ कथं ’संस्कृतं’ संस्कृतम् ॥
२.५. अनमोल झा--रिलेशन-१

२.६. जितेन्द्र झा-जनकपुरमे चक्काजाम कवि गोष्ठी

२.७.मैथिलीक युगद्रष्टाद- निमिष झा
२.८.१. कुमार मनोज कश्यप २. राजदेव मंडल-कथा


३. पद्य


३.१. गुंजनजीक राधा- १६म खेप
३.२. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ

३.३.उमेश मंडल (लोकगीत-संकलन)- आगाँ

३.४.१. रघुनाथ मुखिया २.कल्पना शरण-क्षितिजक साक्षात दर्शन

३.५.१. सतीश २.रूपेश ३. सुबोध
३.६. शेफालिका- तीनटा पद्य

३.७.१. महाकान्त ठाकुर २.शिव कुमार झा-दू टा गीत

३.८.१. निमिष २.धर्मेन्द्र

४. बालानां कृते-१.जगदीश प्रसाद मंडल-लघुकथा२. देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स)३.कल्पना शरण:देवीजी.

5.VIDEHA FOR NON RESIDENTS
5.1.Original Maithili Poem by Smt.Shefalika Varma,Translated into English byAnulina mallik.
5.2. Short Story by Ilarani Singh

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भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।



गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'


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१. संपादकीय
श्री उमानाथ झाक (1923-2009)निधन 07-12-2009 केँ भऽ गेलन्हि। जन्म:-01-01-1923, मृत्यु07-12-2009 महरैल, भधुबनी ।भूतपूर्व अङरेजी विभागाध्यक्ष एवं प्रति-कुलपति मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा । रचना:-रेखाचित्न, अतीत (कथा संग्रह); मैथिली नवीन साहित्य, इन्द्र धनुष, विद्यापति गीतशती (सम्पादन)।
28 दिसम्बर, 2009 केँ नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, नई दिल्ली क सम्मुख प्रेक्षागृह मे मैलोरंग आयोजित कऽ रहल अछि :मैथिलोत्सव - 09 समय : 10 बजे दिन सँ सेमिनार : सांस्कृतिक आदान-प्रदान में अनुवाद साहित्य की भूमिका प्रस्तुति : पाँच पत्र ( नाटक ) ; समय साँझक 6.00 बजे सँ।

रंगकर्मी प्रमीला झा नाट्यवृत्ति - 09क वितरण ।
मैथिली समीक्षा: शिक्षित मध्यवर्गमे मैथिली भाषा नवम वर्गसँ स्नातक-स्नातकोत्तर धरि मैथिलीकेँ भाषा वा मातृभाषाक रूपमे लेनिहार एहिसँ स्नेह करै छथि। अन्तर्जालपर मैथिलीक आगमनसँ सेहो मातृभाषासँ स्नेह फेरसँ जागल। मैथिलीक पोथीक सुगमतासँ नहि भेटब जाहिमे सरकारी संस्थाक मैथिली पाठ्यपुस्तक सम्मिलित अछि। एहिमे अन्तर्जाल द्वारा सीमित रूपमे हस्तक्षेप भेल अछि। आ एहि सभक परिणामक रूपमे मैथिली लेखकक भीतर हीन भावना (सुपीरियोरिटी कॉम्प्लेक्स सेहो हीन भावनाक रूप अछि) पैसि गेल आ साहित्य सोंगरपर ठाढ़ कएल जाए लागल। वाद-विवाद उत्पन्न कऽ आरोप-प्रत्यारोप आधारित साहित्यक चर्चा प्रारम्भ भेल। पति-पत्नी, जिला-जबार आ पिता-पुत्रक अपन पक्षमे वातावरण तैयार करब आरम्भ भेल। माने ब्लैकमेलिंग आ ब्लैक-मार्केटिंग द्वारा कथा-कविताक पुरस्कार लेल लिखल जाएब। मुदा बुकर आ नोबल साहित्य पुरस्कार प्राप्त साहित्य सेहो कालातीत नहि रहि पबैत अछि, बहुत रासकेँ तँ लोक मोन रखैत अछि मुदा ढेर रास विस्मृत भऽ जाइत छथि आ पाठक ओकर मूल्यांकन कऽ दैत छथि। मुदा मैथिलीमे खाढ़ीक-खाढ़ी बीति जाइत अछि मुदा पाठकक अभावमे पति-पत्नी, पिता-पुत्र, जिला-जबार आ आब कथाकार-कविक बनल गोल सभ एकर ब्लैकमेलिंगक आधारपर मूल्यांकन करैत अछि। अन्तर्जालक हस्तक्षेप सीमित रहलाक कारण नीक साहित्य, सृजनात्मक साहित्य आ कल्याणकारी साहित्य सोझाँ नहि आबि पाबि रहल अछि, नहि सृजित कएल जा रहल अछि। विवाद कऽ समाचारमे रहएबला कवि-कथाकारकेँ अहाँ प्रश्रय देब कारण ओ ब्लैकमेलिंग कऽ रहल छथि वा धूरा-गर्दामे रहनिहार मानवतावादी कवि-कथाकारकेँ। आ जखन से करब तखने निरर्थक देखाएबला मैथिली साहित्यमे प्राणवायु भरि पाएब।

एहि लेल मैथिली कथा-कविताक समीक्षाक आवश्यक तत्वपर विचार करए पड़त।

१. नव वातावरणमे अवस्थित नव समस्याकेँ चिन्हित करब,
२. व्यक्तिगत अनुभवकेँ सार्वजनिक जीवनसँ जोड़बाक प्रयासकेँ चिन्हित करब,
३. सूत्रबद्धता अछि वा नहि, कारण विवादित वस्तुकेँ घोसिआएब, वादक प्रतीक-चिन्हकेँ ठूसि कऽ साहित्यमे देबाक प्रवृत्तिक आधारपर ब्लैकमेलर साहित्यकेँ चिन्हित करब,
४. अपन व्यक्तिगत प्रशंसा आ दोसराक प्रति आक्षेपक कथा-कवितामे ब्लैकमेलर साहित्यकार द्वारा प्रयोग करबाक गुंजाइश रहैत अछि। मुदा तथ्यपूर्ण मूल्यांकन एहि प्रवृत्तिकेँ चिन्हित करत।
५. हीन भावनासँ ग्रस्त साहित्य कल्याणकारी कोना भऽ सकत?
६. बदलैत सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक-धार्मिक समीकरणक परिप्रेक्ष्यमे एकभग्गू प्रस्तुतिक रेखांकन
७. कथाकार-कविक व्यक्तिगत जिनगीक अदृढ़ता, चाहे ओ वादक प्रति होअए वा जाति-धर्मक प्रति, साहित्यमे देखार भइए जाइत छैक। आ एहने साहित्य बेर-बेर अपनाकेँ परिमार्जित-परिवर्धित करितो मूल दोषसँ दूर नहि भऽ पबैत अछि। जातिवाद-सांप्रदायिकतावाद आबिये जाइत छैक, तकरा चिन्हित करब।
८. गपाष्टक आ समीक्षाक अंतरकेँ चिन्हित करब। एकर मुख्य लक्षण –
“कियो हुनका कहियो पुछलकन्हि, सुनैत छिऐ जे ओ ई करए चाहैत रहथि ..” आ एहि तरहक आर गप सभ। संगहि हिनकर रचनाकेँ पाठक नहि बूझि पबैए- समीक्षक सेहो नहि बूझि पबैए- मुदा हिनकामे असली गप ई छन्हि। ई फलनाक बेटा छथि तेँ नीक आकि अधलाह लिखै छथि, ई एहि पदपर छथि तेँ नीक आकि अधलाह लिखै छथि। ई पाइबला छथि, होटल छन्हि तेँ साहित्यकार नहि छथि आ ई पर्चा फेकै छथि, पत्रकार छथि तेँ महान साहित्यकार छथि। ई सहरसा-सुपौलक छथि तेँ नीक आकि अधलाह आ ई दरभंगाक सोति आकि ब्राह्मण-कायस्थ तेँ नीक आकि अधलाह लिखै छथि।

९. एक पाँतिक वक्तव्य- एहि रचनाक हम विरोध आकि समर्थन करै छी। ई हमरा लेल नीक लोक छथि तेँ नीक लिखै छथि। ई हमर जातिक छथि वा हमरा भविष्यमे फाएदा पहुँचेताह तेँ अद्भुत लिखै छथि। हिनकर हम प्रशंसा करबन्हि तँ ईहो हमर प्रशंसा करताह। एहि सभ प्रवृत्तिकेँ चिन्हित करब।
१०. मूल्यांकनमे ककरो प्रति पूर्वाग्रह वा घृणा राखब। ओकर सम्पूर्ण गप बुझबासँ पूर्वे निर्णय सुनाएब। एहिकेँ चिन्हित करब।
११. मैथिली साहित्य, जतए पाठकक संख्या शून्य छैक, एक साहित्यकार दोसराक समीक्षा करैत अछि आ एतए व्यक्तिगत अहम् आ ब्लैकमेलिंगक पूर्ण गुंजाइश छैक। अहाँ दू-चारिटा कवि-कथाकार सम्मेलनमे चलि जाऊ, उद्घोषकक उद्घोषणा आ थोपड़ी उद्घोषकक आ साहित्यकारक पूर्वाग्रहकेँ चिन्हित कऽ देत। जेना गौरीनाथ लिखै छथि जे हिन्दीयोमे -प्रेमचन्द, मोहन राकेश आ उत्तराखण्डी- एना कऽ कए संग्रह अबैत अछि जेना उत्तराखण्डी प्रेमचन्द आ मोहन राकेशक कोटिक हिथि। तहिना मैथिलीमे कुलानन्द मिश्र-हरेकृष्ण झा आ ई; वा यात्री-राजकमल आ ओ, वा राजकमल-ललित आ ई , मात्र यैह कवि कथाकार छथि एहन सन वक्तव्य अबैत अछि आ एहि मे ई आ ओ क प्रति देखाओल पूर्वाग्रहकयुक्त दुटप्पी चिन्हित भए जाएत। खूब साहित्य पढ़ू- भारतक अ नेपालक दुनू दिसुका मैथिली साहित्य। आ एहि क्रममे जे रचना आ जे रचनाकार नीक लागथि आ जे तथाकथित स्थापित रचनाकार वा रचना अधलाह लागए तकरा चिन्हित करू, विसंगतिकेकेँ सेहो। आ से बिना भएक, कारण ब्लैकमेलर आ गोल बना कऽ कविता-कथा रचनिहारक दिन खतम करबाक लेल साहस जरूरी अछि। बिना पाठकक ई लोकनि मैथिली साहित्यकेँ सोंगरपर रखने छथि, एकटा छद्म वातावरण बना कऽ।
(क्रमशः)


संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १४ दिसम्बर २००९) ९० देशक १,००९ ठामसँ ३४,८१८ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ २,१४,०४२ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।


गजेन्द्र ठाकुर
नई दिल्ली। फोन-09911382078
ggajendra@videha.co.in
ggajendra@yahoo.co.in
२. गद्य
२.१. प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी-मिथिलाक इतिहास (आगाँ)

२.२.उपन्यास- जगदीश प्रसाद मंडल-उपन्यास-जिनगीक जीत

२.३. सुजीतकुमार झा-६अम शताब्दीथक लोक नायक वृतचित्रमे
२.४. बिपिन झा-॥ कथं ’संस्कृतं’ संस्कृतम् ॥
२.५. अनमोल झा--रिलेशन-१

२.६. जितेन्द्र झा-जनकपुरमे चक्काजाम कवि गोष्ठी

२.७.मैथिलीक युगद्रष्टाद- निमिष झा
२.८.१. कुमार मनोज कश्यप २. राजदेव मंडल-कथा


प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी (१५ फरबरी १९२१- १५ मार्च १९८५) अपन सम्पूर्ण जीवन बिहारक इतिहासक सामान्य रूपमे आ मिथिलाक इतिहासक विशिष्ट रूपमे अध्ययनमे बितेलन्हि। प्रोफेसर चौधरी गणेश दत्त कॉलेज, बेगुसरायमे अध्यापन केलन्हि आ ओ भारतीय इतिहास कांग्रेसक प्राचीन भारतीय इतिहास शाखाक अध्यक्ष रहल छथि। हुनकर लेखनीमे जे प्रवाह छै से प्रचंड विद्वताक कारणसँ। हुनकर लेखनीमे मिथिलाक आ मैथिलक (मैथिल ब्राह्मण वा कर्ण/ मैथिल कायस्थसँ जे एकर तादात्म्य होअए) अनर्गल महिमामंडन नहि भेटत। हुनकर विवेचन मौलिक आ टटका अछि आ हुनकर शैली आ कथ्य कौशलसँ पूर्ण। एतुक्का भाषाक कोमल आरोह-अवरोह, एतुक्का सर्वहारा वर्गक सर्वगुणसंपन्नता, संगहि एतुक्का रहन-सहन आ संस्कृतिक कट्टरता ई सभटा मिथिलाक इतिहासक अंग अछि। एहिमे सम्मिलित अछि राजनीति, दिनचर्या, सामाजिक मान्यता, आर्थिक स्थिति, नैतिकता, धर्म, दर्शन आ साहित्य सेहो। ई इतिहास साहित्य आ पुरातत्वक प्रमाणक आधारपर रचित भेल अछि, दंतकथापर नहि आ आह मिथिला! बाह मिथिला! बला इतिहाससँ फराक अछि। ओ चर्च करैत छथि जे एतए विद्यापति सन लोक भेलाह जे समाजक विभिन्न वर्गकेँ समेटि कऽ राखलन्हि तँ संगहि एतए कट्टर तत्त्व सेहो रहल। हुनकर लेखनमे मानवता आ धर्मनिरपेक्षता भेटत जे आइ काल्हिक साहित्यक लेल सेहो एकटा नूतन वस्तु थिक ! सर्वहारा मैथिल संस्कृतिक एहि इतिहासक प्रस्तुतिकरण, संगहि हुनकर सभटा अप्रकाशित साहित्यक विदेह द्वारा अंकन (हुनकर हाथक २५-३० साल पूर्वक पाण्डुलिपिक आधारपर) आ ई-प्रकाशन कट्टरवादी संस्था सभ जेना चित्रगुप्त समिति (कर्ण/ मैथिल कायस्थ) आ मैथिल (ब्राह्मण) सभा द्वारा प्रायोजित इतिहास आ साहित्येतिहास पर आ ओहि तरहक मानसिकतापर अंतिम मारक प्रहार सिद्ध हएत, ताहि आशाक संग।-सम्पादक
मिथिलाक इतिहास
तिब्बत आर नेपाल सँ सेना आनि दूतमण्डलक दोसर प्रमुख पदाधिकारी, सियांग-चेन-जेनक नेतृत्व मे तीन धरि युद्ध भेल आर अंत मे अरूणाश्व पराजित भेलाह। वाँग जखन बन्दीक रूप मे अरूणाश्व केँ लकए चीन पहुँचलाह तखन वाँग केँ प्रोन्नत कओल गेलन्हि। उपरोक्त विवरण ताँग वंशक पुरना इतिहास मे भेटैत अछि।
ताँग वंशक नवका इतिहास मे सेहो अहि घटनाक विवरण एवं प्रकारे भेटैत अछि। ६४८ मे वाँग केँ जखन भारत दूतमण्डलक नेता बनाके पढ़ाओल गेलन्हि तखन हर्षक अवसान भ चुकल छल आर अरूणाश्व राज्यक अधिकारी भ चुकल छलाह। वो तीरभुक्तिक शासक छलाह। तिब्बत आर नेपाल सँ साहायता लए वाँग अपन वेइज्जतीक बदला लेबाक हेतु तिरहुत पर आक्रमण केलन्हि। वो अपन सेना केँ कैक भाग मे विभक्त कए अपन तेसर दिन चा-पुओ-हो-लो नामक स्थान पर पहुँचलाह आर ओहि पर अपन आधिपत्य कायम केलन्हि। अहिक्रम मे ३००० व्यक्तिक हत्या भेल आर १०००० व्यक्ति केँ नदी मे डुबाओल गेल। अर्जुन भागि केँ पुनः अपन शक्ति संचय केलन्हि आर फेर वाँगक संग युद्ध शुरू केलन्हि मुदा हुनका कोनो सफलता नहि भेटलन्हि। राजाक जनानखानाक प्रधान दुश्मनक बाट रोकबाक हेतु किएन-तो-वाइनामक नदीक मार्ग अवरूद्ध कए देलन्हि तथापि चीनी दूतमण्डल हिनका लोकनि केँ पराजित केलन्हि आर अरूणाश्वक पत्नी समूह एवं पुत्रादि केँ गिरफ्त कए माल असवविसब लूटि लेलन्हि। चीनी सेना नायक उपरोक्त चेन-जेनक समक्ष ५८०टा नगर आत्म समर्पण केलक। पूर्वी भारतक राजा ची-कीउ-मो (श्री कुमार) अथवा भास्करवर्मन चीनी दूतमण्डलक बड्ड साहायता केलथिन्ह आर हुनका लोकनि केँ घोड़ा, बड़द, अस्त्र, शस्त्र, तीर धनुष आदि बहुत रास सामान उपहार मे देलथिन्ह। चीनी सम्राटक हेतु वो एकटा भारतक मानचित्र सेहो उपहार मे देलथिन्ह। दूतमण्डल सँ वो आग्रह केलथिन्ह जे ओतए सँ वो लाओ- जेक एकटा चित्र पठा दैथ। अरूणाश्व वन्दीक रूप चीन मे रहलाह आर ओतहि हुनक मृत्यु भेलैन्ह।
मात्वालिन सेहो अहि घटनाक विवरण उपस्थित कएने छथि आर हुनक विवरण उपस्थित कएने छथि आर हुनक विवरण ताँग वंशक नवका इतिहास सँ मिलैत–जुलैत अछि। मात्वालिन क अनुसार चीनी सम्राट ६४६ ई. मे मगध सम्राटक ओतए एकटा दूतमण्डल पठौने छलाह। अर्जुन अथवा अरूणाश्व केँ चीनी श्रोत मे तिरहुतक शासक मानल गेल छैक आर दुनुक बीच जे युद्ध भेलैक से कतहु अहि क्षेत्र मे भेल हेतैक। वाँग कन्नौज धरि गेल होएताह ओहि मे संदेह बुझना जाइत अछि। तिरहुतक राज्यपाल अरूणाश्व हर्षक परोक्ष भेला पर तिरहुतहिं सँ अपना केँ साम्राज्यक अधिकारी घोषित कएने होथि से संभव। चीन मे जाहिठाम अर्जुनक शव अछि ताहिठाम एकटा जे स्मारक पर लेख छैक ताहि मे लिखल छैक “तीरभुक्तिक हिन्दूराजा अरूणाश्व”। अहुँ सँ ई स्पष्ट होइछ जे अर्जुन अथवा अरूणाश्व तीरभुक्तिक शासक छलाह आर वाँगक युद्ध तीरभुक्तिक सीमे धरि सीमित रहल होएत। अहि घटनाक विवरण चीनक करीब २५ टा सँ वेसी ग्रंथ मे भेटैत आर आधुनिक शोध एवं अहि २५ सो ग्रंथक उपयुक्त अंशक अनुवादक अध्ययन सँ एतवा धरि स्पष्ट होइत अछि जे हर्षक परोक्ष भेला पर अर्जुन तीरभुक्तिक शासक छलाह। चीनी दूतमण्डल आर हुनका बीच संघर्ष भेल छल जाहि मे वो पराजित भेल छलाह आर अहि युद्धक कार्यस्थल छल गण्डकी, वाग्मती, बलान आर गंगाक बीचक भूमि। युद्धक वास्तविक स्थान कोन छल से निर्णय करब अद्यतन कठिन समस्या बनल अछि। वृज्जि क्षेत्र सँ अंगुतराय क्षेत्रक वीच ई लड़ाई भेल छल से धरि निश्चित आर वाँगक शक्तिशाली सैनिकक समक्ष जँ तत्काल छोट-पैघ सहर सब आत्मसमर्पणक देने हुए तँ अहि मे कोनो आश्चर्यक गप्प नहि।
किछु दृष्टिदोष अथवा विचार दोष सँ ई आक्रमण भेल हुए सेहो संभव। वाँग केँ अर्जुन दुश्मन बुझि विरोध केने हेथिन्ह आर वो अखन साहायतार्थ तिब्बत पहुँचलाह तखन ओहिठामक शासक श्रोंग सेहो एकटा महत्वाकाँक्षी व्यक्ति रहैथ आर विचार सँ साम्राज्यवादी सेहो। वो एहि अवसर केँ अपन साम्राज्य विस्तारक अवसरक रूप मे देखने होथि तँ कोनो आश्चर्य नहि कारण ताहि दिन मे हुनक प्रभुत्वक धाख चीन आर नेपाल धरि पसरल छलैन्ह। वाँगक माध्यम सँ वो तिब्बती प्रभाव भारत पर बढ़वे चाहैत छलाह परञ्च से संभव नहि भ सकलन्हि कारण ई युद्ध तिरहुत धरि सीमित रहि गेल आर ४०–५० वर्षक बाद ओहि विदेशीसत्ता उखारि केँ फेक देल गेल। एकर कोनो स्थायी प्रभाव भारतक इतिहास पर नहि पड़ल। अहु मे संदेह अछि जे श्रोंग स्वयं भारत पर आक्रमण केने होथि कारण श्रोंगक विजयक विवरण जाहि तिब्बती परम्परा मे सुरक्षित अछि ताहि मे कतहु भारतक नाम नहि अछि। केवल मात्वालिन अहि बातक उल्लेख केने छथि। दोसर बात जे महत्व रखैत अछि से भेल ई जे नेपाली परम्परा मे अहि घटनाक विधिवत उल्लेख कतहु नहि अवइयै। पूर्वी भारत पर हर्षक शासन ६४१ मे भेल छल। चीनी परम्परा मे अर्जुन केँ पूर्वी भारतक शासक (तीरभुक्तिक) कहल गेल छैक आर तैं संभव जे हर्षक परोक्ष भेला पर वो (पूर्वी भारत) पुनः अपना केँ कन्नौजक नियंत्रण सँ मुक्त कलेने हो आर अर्जुन गवर्नरक हिसाबे ओहि पर अपन अधिकार कलेने होथि। अहि घटनाक एत्तेक विस्तार सँ चीनी परम्परा मे वर्णन कैल गेल हो से संभव। एतवा धरि तँ निश्चित रूपे माने पड़त जे अर्जुन आर चीनी दूत वाँगक वीच खटपट अवश्य भेलैक आर अहि क्रम मे तीरभुक्ति पर आक्रमण सेहो। एकर स्थान एवं अन्यान्य बातक विश्लेषण अखन आर शोधक अपेक्षा रखइयै।
हम पहिने कहि चुकल छी जे कामरूपक भास्करवर्मनक पूर्वजक समय मे बहुत रास मैथिल साम्प्रदायिक ब्राह्मण कामरूप गेल रहैथ आर ओतुका शासकक अनुग्रह प्राप्त केने रहैथ। हर्षक पूर्वहिं निर्धनपुर ताम्रलेख सँ ई ज्ञात होइछ जे वर्मन वंशक सीमा पुरैनियाक कोशी धरि छलैन्ह आर तकर पश्चिम मे तिरहुतक राज्य छल जाहि पर हर्षक अधिकार छल। जाधरि हर्ष जीवित रहलाह ताधरि कामरूपक शासक हुनक मित्र बनल रहलथिन्ह मुदा हर्षक परोक्ष भेला उत्तर भास्करवर्मन चीनी दूतमण्डलक साहायता केने छलथिन्ह से उपरोक्त विवरण सँ स्पष्ट अछि– एकर कि कारण से नहि कहि। संभवतः अर्जुनक प्रभुत्व देखि आर तीरभुक्ति राज्यक विस्तार सँ वो घबड़ा कए चीनी दूतमण्डलक समर्थन केने होथि से संभव। दोसर बात इहो भ सकइयै जे चीनक डर सँ वो एना केने होथि। ऐहेनो बुझि पड़इयै जे जखन वाँगक आक्रमणक समय मे मौरवरी, उत्तर गुप्त आर नेपालक लिच्छवी शासकक वीच संभवतः कोनो प्रकारक समझौता भेल छल आर वो लोकनि तिब्बती साम्राज्यवादी प्रसारक विरोध मे संगठित छलाह। अदु शक्तिशाली संगठन सँ भयभीत भए भास्करवर्मन वाँगक साहायता केने होथि तँ कोनो आश्चर्यक गप्प नहि। भास्करवर्मन सेहो महत्वाकाँक्षी छलाह आर तैं हुबक आंतरिक इच्छा ई अवश्य रहल हेतैन्ह जो कामरूप राज्यक प्रसार हो। कामरूप आर मिथिलाक सीमा सेहो मिलैत जुलैत छल। हर्षक मृत्युक उपरांत वो कन्नौज सँ अपन सम्बन्ध विच्छेद कए कर्ण सुवर्ण केँ अपना राज्य मे मिला लेने छलाह आर अपन चारूकातक छोट छीन क्षेत्र सब केँ सेहो। निर्धनपुर ताम्रलेखक आधार ई कहल जा सकइयै जे वो मिथिलाक पूर्वी भागक किछु हिस्सा पर अपन अधिकार जमा लेने छलाह आर ओतहि सँ संभवतः वो वाँगक साहायता केने छलाह।
६४८ सँ ७०३ ई. धरि मिथिला पर तिब्बती आधिपत्य बनल रहल। अहि वीचक इतिहास अंधकारमय अछि। मिथिला पर बहुत दिन धरि तिब्बती प्रभाव नहि रहि सकलैक आर उत्तरगुप्त शासक लोकनि अपन परिश्रम सँ पुनः सम्पूर्ण बिहार केँ जीति अपना अधीन केलन्हि आर मिथिला केँ तिब्बती आक्रमण सँ मुक्त सेहो। कटरा (मुजफ्फरपुर) सँ प्राप्त अभिलेख (ताम्रलेख) सँ ज्ञात होइछ जे जीवगुप्त नामक कोनो व्यक्ति ओहिक्षेत्र पर शासन करैत छलाह। तिथिक अभाव मे किछु असंभव अछि मुदा अंदाजन इएह कहल जा सकइयै जे ई संभवतः उत्तरगुप्त वंशक केयो रहल हेताह आर तिब्बती आक्रमण सँ मुक्त भेला पर अहि क्षेत्रक शासनाधिकारी भेल होयताह। गुप्तवंशक परम्पराक पुनर्स्थापना मे व्यस्त जे सर्व प्रसिद्ध व्यक्ति भेलाह अहि वंशमे हुनक नाम छलैन्ह आदित्य सेन। महासेन गुप्तक शासन कालहि सँ मिथिला पर हिनका लोकनिक प्रभुत्व छलन्हि आर आदित्यसेनक समय धरि तँ उत्तरगुप्त लोकनि पूर्वी भारतक एकटा प्रसिद्ध राजवंश घोषित भचुकल छलाह। अफशड़, मंदार आर शाहपुअर सँ प्राप्त अभिलेखक आधार ई निश्चित रूपें कहल जा सकइत अछि जे आदित्यसेन समस्त विहार पर अपन आधिपत्य कायम केलन्हि आर वृहत्तर मगध राज्यक संस्थापकक नाम सँ बहु चर्चित भेलाह। हुनका परममहारक-महाराजाधिराजक पदवी छलैन्ह आर वो गंगा सागर धरि अपन राज्य बढ़ा अश्वमेघ यज्ञ सेहो केने छलाह। ताँग वंशक इतिहासे सँ हमरा ई ज्ञात होइत अछि जे मिथिला आर नेपाल ७०३ धरि विदेशी नियंत्रण सँ मुक्त भगेल छल। सिल्वोलेदीक अनुसार ७०२ मे मिथिला मे उत्तर गुप्तक शासनक स्थापना एकटा महत्वपूर्ण घटना मानल गेल अछि। नेपाली अभिलेख मे सेहो आदित्य सेन केँ मगधक महत्वपूर्ण शासकक रूप मे वर्णन कैल गेल छैक। नेपालक शिवदेव मौरवरी भोगवर्मनक जमाय छलाह आर भोगवर्मन आदित्य सेनक बेटी सँ विवाह केने छलाह। एवं प्रकार तीनू राज्य एक दोसरा सँ सम्बन्धित छल। आदित्य सेनक वादो हुनका लोकनिक केँ प्रभाव बनल रहल आर जीवित गुप्त द्वितीय धरि वो लोकनिउतरापथनाथ कहबैत रहलाह।
मिथिलाक इतिहास मे बुझु जे वारी-वारीक कए उत्तर भारतक सब छोट-छीन राज्य कोनो ने कोनो रूपे राज्य केलन्हि आर मिथिला मे कोनो स्थायी राज्यक स्थापना १०९४ क पूर्व नहि भसकल। उत्तर गुप्तक बाद मिथिलाक इतिहासक कि स्थिति छल से ठीक सँ हमरा लोकनि केँ ज्ञातव्य नहि अछि। उत्तरगुप्तक राज्यक अंत केलन्हि कन्नौजक यशोवर्मनक। गौड़वहीक कवि वाक्पतिक अनुसार यशोवर्मन गुप्त लोकनि केँ पराजित केलन्हि आर हिमालय प्रदेश केँ जीति अपना राज्य मे मिलौलन्हि। आर अहि क्रम मे जँ वो तिरहुत केँ जीतने होथि तँ कोनो असंभव बात नहि। कश्मीर सेहो अपन प्रभाव बढ़ा रहल छल आर पूर्व मे सेहो पूण्ड्रवर्द्धन मुक्तिक दिसि कश्मीरक प्रभाव क वृद्धि देखबा मे आवे लगैत अछि। ललितादित्य मुक्तपीड़ अहि क्षेत्र मे यशोवर्मन केँ पराजित कए अपन प्रभाव क्षेत्र बढा लेने छलाह। लामा तारनाथक अनुसार मिथिला मे चन्द्रवंशक शासन छल जकर सम्बन्ध पश्चिम मे राजा भतृहरि सँ छलैक। चन्द्रवंशक राज्य वर्मा आर पूर्वी बंगाल मे सेहो छलैक। वर्माक चन्द्रवंशक शासक लोकनि‘वेथाली’ (वैशाली) नामक एक गोट शहर बसौने छलाह। चन्द्रवंशक पछाति मिथिला मे पालवंशक स्थापना भेल छल। उत्तरपूर्वी भारतक विभिन्न प्रदेशक कोनो श्रृंखलाबद्ध एवं साधनयुक्त इतिहास नहि अछि। आर मिथिलाक अहोधरि प्रश्न अछि से तँ सर्वथा अपूर्णे अछि। लामा तारनाथ जकर वर्णन कएने छथि तकर समर्थन कोनो आन साधन सँ नहि भऽ रहल अछि तैं एकरा अखन संदिग्धे मानल जाएत। चन्द्रवंशक प्रश्न विवादास्पद अछि। जँ अहि वंशक राज्य रहलो हैत तँ पूर्वी मिथिले पर रहल होएत कारण उएह स्थान वंगक समीप अछि।
किछु गोटए अहुमतक छथि जे यशोवर्मनक आक्रमणक उपरांते तिब्बती प्रभाव तीरभुक्ति क्षेत्र पर सँ घटल होएत। यशोवर्मन मालदह राजशाही आर पुर्णियाँ धरि बढ़ल छलाह आर तत्पश्चात कश्मीरक शासक सेहो “पंच गौड़” (मिथिला जकर एकटा प्रमुख अंश छल) पर अपन विजय प्राप्त केने छलाह। हियुएन-संग द्वारा वर्णित “पाँच भारत” वाद मे “पंच गौड़” क नाम सँ प्रसिद्ध भेल आर पाल काल मे अहि ‘पंच गौड़’ केँ विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त भेलैक। तारनाथक अनुसार अहि ‘पंच गौड़’ मे चन्द्रवंशक पछाति अराजकता पसरि गेल छल आर ओहि क्षेत्र मे कोनो प्रकारक राज्य नहि रहि गेल छल। चारूकात मत्सन्याय क प्रधानता छल आर कोनो व्यवस्था नहि रहि गेल छल। चन्द्रवंश (सिंह चन्द्रक पुत्र)क बलिचन्द्र केँ भंगल सँ भगा देल गेल छलैन्ह। लिच्छवीपंचभासिंह (जनिक राज्य ताहि दिन मे तिब्बत सँ त्रिलिङु आर बनारस सँ समुद्र धरि रहैन्ह) बाल चन्द्र केँ पराजित केने रहथिन्ह आर वो भंगल सँ भागि केँ तिरहुत मे आवि केँ राज्य शुरू केने छलाह। बलिचन्द्रक पुत्र विमल चन्द्र अपन पिताक पराज्यक बदला लेलन्हि आर अपन राज्यक विस्तार बंगाल आर असम धरि केलन्हि। हुनक पुत्र छलाह गोविन्द्र चन्द्र आर गोविन्द्र चन्द्रक पुत्र भेलाह ललित चन्द्र। ई दुनु गोटए सिद्धि प्राप्त कए राज्य सँ विमुख भ गेलाह आर तत्पश्चात् राज्य मे अराजका पसरि गेल आरमत्सत्यायक स्थिति उत्पन्न भेल।
पाल वंश:- अहि मत्सत्यायक स्थिति सँ उबारबाक हेतु ओहिठामक लोग गोपाल नामक एक व्यक्ति केँ अपन शासक चुनलक आर उएह पाल वंशक संस्थापक भेलाह। मत्सत्याय आर अराजकताक स्थिति समाप्त कए गोपाल चन्द्रवंशक समस्त राज्य क्षेत्र व्यवस्थाक स्थापना केलन्हि आर तखन लकए (७५०–१०००) लगभग २५० वर्ष धरि समस्त पूर्वी भारत मे एक प्रकारक शांति बनल रहल। पाल युगक इतिहास भारतीय इतिहास मे महत्वपूर्ण स्थान रखइयै आर मिथिलाक इतिहासक हेतु सेहो ई काल महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। गोपाल चूंकि चन्द्रवंशक उत्तराधिकारीक रूप मे शासक भेल छलाह तैं ई अनुमान लगाएव स्वाभाविक जे वो तीरभुक्तिक शासक सेहो अवश्य रहल होयताह कारण तीरभुक्तियो पर चन्द्रवंशक शासन रहल छल। गोपालक बाद हुनक पुत्र धर्मपाल शासक भेलाह। पाल साम्राज्यक वास्तविक संस्थापक धर्मपाले छलाह अहि मे संदेह नहि। उत्तर भारत पर आर खास ककए कन्नौज पर आधिपत्य प्राप्त करबाक हेतु हुनका राष्ट्रकूट आर प्रतिहार वंश सँ युद्ध मोल लेवए पड़लन्हि जे हुनका बादो चलैत रहलैन्ह। खलीमपुर अभिलेख एवं तारनाथक विवरण सँ ज्ञात होइछ जे तिरहुत हुनक राज्यक अंतर्गत छल आर पूव मे कामरूप धरि अपन राज्यक सीमा बढ़ौने छलाह। मूंगेरक समीप वो प्रतिहार शासक नागभट्ट द्वितीय केँ हरौने छलाह। राज्यक प्रसारक क्रम मे वो हिमालय धरि गेल छलाह आर वागमती नदी पर अवस्थित गोकर्ण धरि अपन राज्य केँ बढ़ौने छलाह। गोकर्ण एकटा प्रसिद्ध धार्मिक स्थल छल तैं संभव जे ओतए धरि वो धर्म करबाक हेतु गेल होथि मुदा वास्तविक कारण ई छल जे ओहि क्षेत्र मे किरातक राज्य छल आर तैं हिनका डर छलैन्ह जे किरात लोकनि तिरहुतक क्षेत्र मे किछु उत्पात मचा सकैत छथि तैं हेतु किरात लोकनि केँ पराजित करब आवश्यक छल। पशुपतिनाथ मंदित केँ उत्तर पूब मे गोकर्णक जंगल मे किरात लोकनिक केँ राजधानी छलैन्ह आर तैं वो ओतए दूर धरि जाकए किरात लोकनि केँ पराजित केलन्हि। स्वयंभु पुराण मे कहल गेल अछि जे धर्मपाल नेपालक राजगद्दी पर अधिकार प्राप्त केलन्हि। ई गप्प संभवतः गोकर्ण पर धर्मपालक आक्रमण केँ प्रमाणित करैत अछि। नेपाल पर हुनक अधिकार भेल हो अथवा नहि परञ्च किरात केँ आवश्यक छल आर धर्मपाल अहिबात केँ साम्राज्यवादी हिसाबें नीक जकाँ बुझैत छलाह। मूंगेर ताम्रलेख मे ‘गंगा समेतं बुद्धि’क जे उल्लेख अछि से गोकर्ण सँ सर्वथा भिन्न स्थान भेल आर तैं दुनु केँ मिलाएब अचित नहि बुझना जाइत अछि। मूगेर ताम्रलेखो सँ ई ज्ञात होइत अछि जे धर्मपाल हिमालयक तराई मे आक्रमण कएने छलाह। मूंगेर जे लड़ाई भेल छल ताहु मे तीरभुक्तिक योगदान रहल होएत सँ निश्चिते।
धर्मपाल समस्त उत्तरी भारत मे अपन ढाख जमौने छलाह एकर प्रमाण हमरा कैकटा श्रोत सँ भेटैत अछि:- केशव प्रशस्ति, खालिमपुर अभिलेख एवं भागलपुर ताम्रलेख। गुजराती कवि सोढ़्ढ़ल अपन उदय सुन्दरी कथा मे देवपाल केँ उत्तरा पथ स्वामी कहने छथि। ‘पंच गौड़’ हुनक साम्राज्य सीमाक बोध दैत अछि। ‘पंच गौड़’शब्द केँ प्रसिद्ध केँ निहार भेलाह कल्हण जे अपन राज तरंगिणी मे एकर विवरण देने छथि मुदा एकर राजनैतिक स्वरूपक वास्तविक जन्मदाता धर्मपाले रहब हेताह जनिक साम्राज्य पंजाब सँ बंगाल आर हिमालय सँ मध्य भारत धरि पसरल छल। मिथिला नेपाल पर सेहो हुनक प्रभुत्व छल। धर्मपालक पछाति हुनक पुत्र देवपाल राजा भेलाह आर हुनक साम्राज्य हिमालय सँ विन्ध्य पर्वत धरि पसरल छल। उहो प्रतिहार राजा मिहिर भेज केँ हरौलन्हि। हुनकहि समय मे पाल साम्राज्य अपन चरमोत्कर्ष पर पहुँचल।
वाचस्पति आर राजा नृग:- अहिठाम एक प्रश्न पर विचार कलेब आवश्यक बुझना जाइत अछि। स्वर्गीय महामहोपाध्याय उमेश मिश्र राजा नृगक चर्च कए एकटा समस्या उपस्थित क देने छथि जाहि लकए इतिहासकार मे विवाद हैव स्वाभाविके। ओकर नृग नामक एक राजाक नामक उल्लेख पुराण मे अछि मुदा ओहि सँ वाचस्पति कालीन नृगक तुलना नहि भसकइयै। वाचस्पति (९ म शताब्दी) अपन भामती मे नृग नामक महत्वपूर्ण राजाक उल्लेख कएने छथि। उमेश्र मिश्रक अनुसार नृग किरात लोकनिक राजाक ओतए बैसि कए लोखने छलाह। नृग वाचस्पति केँ सम्मानित केने छथिन्ह।‘नव्व-न्यायक इतिहास’क रचयिता अहि नृग केँ बंगालक आदिसूर सँ मिलबैत छथि। अहिठाम स्मरणीय जे वाचस्पति अपन न्याय कणिका मे सेहो आदिसूरक फरा केँ वर्णन कएने छथि।
नृगक सम्बन्ध मे वाचस्पति अपन भामती क अंत मे लिखैत छथि–
“ नृपांतराणां मनसाप्यगम्यां
भूक्षेपमात्रेण चकार कीर्तिम् ,
कार्त्तस्वरासारसुपूरितार्थ सार्थः
स्वयं शास्त्रविचक्षणश्च,
नरेश्वरा यच्चरितानुकारमिच्छंति
कर्त्तुं नच पारयंति
तस्मिन्महीये महनीय कीर्तौ
श्रीमन्नृगेडकारि मया निबन्धः॥
दोसर स्थान पर एवं प्रकारे वर्णन अछि–
“नचायापि न दृश्यंते लीलामात्र
विनिर्मितानि महाप्रसाद प्रमदवनानि
श्रीमन्नृगनरेन्द्राणाम न्येशां
मनसापि दुष्करानि नरेश्वराणाम्”॥
‘नृग’क ‘महीप’ एवं नरेन्द्र कहल गेल छन्हि आर अहि सँ ई अनुमान लगाओल जाइत अछि जे वो मिथिलाक कोन भाग मे ताहि दिन मे राज्य करैत हेताह। ‘नृग’आर “आदिसूर” दुनु दु व्यक्ति छलाह अहि मे सेहो कोनो सन्देह नहि। ‘नृग’ किरात लोकनिक शासक होथि से संभव कारण ताहि दिन मे किरात आर पाल लोकनिक वीच बरोबरि खटपट होइत रहैन्ह आर एकर उल्लेख हम धर्मपालक समय मे क आएल छी। आदिसूर पूर्वी मिथिलाक शासक छलाह जकर सीमा बंगाल सँ मिलैत छल आर वाचस्पति सन विद्वान केँ दुनु राजाक दरबार सँ सम्बन्ध हैव कोनो आश्चर्यक विषय नहि। नृग सँ ‘नरवाहन’क बोध सेहो होइयै आर किरात लोकनिक बीच ई वेश प्रचलित छल– अहु किरात लोकनि क्षेत्र मिथिलाक उत्तरी पूर्वी भाग मे छल।
’नृग’ एकटा समस्या मूलक नाम भगेल अछि अहिठाम अमलानंद सरस्वती अपन भामतीक हीरा वेदांत कल्पतरू मे लिखने छथि–
“तथाविधःसार्थोयस्यप्रक्रतत्वेनवर्त्ततेस नृगस्तथेत्यपरः। नृग इति राज्ञ आख्या. . .”
‘नृग’ एकटा परम्पराक द्धोतक सेहो मानल गेल छथि आर वो परम्परा भेल दयालु हैव। दानी हेव आर सब तरहें परोपकारी हैव। अहि परम्पराक एकटा उल्लेख गुप्तकालीन अभिलेखो मे अछि–
___ “ भूमि प्रदानान्न परं प्रदानं
दानाद्विशिष्टं परिपालनञ्च।
सर्वेडतिसृष्टा परिपाल्य भूमिं
नृपा नृगाधास्त्रिदियं प्रपन्नाः॥
अहि अभिलेख मे महाराज्य संक्षोभ्यक तुलना परम्परागत दानी नृग सँ कैल गेल अछि। अमलानंद सरस्वती सेहो अपन टीका मे ताहिकालक शासकक तुलना राजा नृग सँ करबाक चेष्टा कएने छथि। जेना कि हम उपर कहि चुकल छी राजा नृग पौराणिक राजा नृगक संकेत मात्र छथि आर वो दान शीलता आर जनप्रियताक हेतु प्रसिद्ध छथि। १४ शताब्दीक सारंग धरक रचना मे सेहो नृगक उल्लेख भेटइयै। अहुठाम परम्परागत रूपे मे। उपेन्द्र ठाकुर सब तथ्यक परीक्षण केला उत्तर ई निर्णय दैत छथि जे ‘नृग’ शब्द सँ अहिठाम पाल राजा देवपालक तुलना कैल गेल अछि आर वाचस्पति अपन भामती मे देवपाल केँ नृग कहलन्हि अछि। तिथि सम्बन्धी जे झंझटि अछि ताहि संदर्भ मे अखन अहुमत केँ संदिग्धे कहल जाएत। उमेश मिश्रक अनुसार नृग कर्नाट सँ आदि मिथिला मे राज्य स्थापित केने छलाह परञ्च ई मत तर्कपूर्ण नहि अछि कियैक नान्यदेव सँ पूर्व एकर कोनो प्रमाण नहि भेटइयै।
हमरा बुझने ‘नृग’ आर आदिसूर दुनु दुव्यक्ति छलाह आर मिथिला प्रांतक उत्तरी पूर्वी एव पूर्वी भागक क्रमशः शासक छलाह। वाकह्स्पतिक समय धरि मिथिला आर उत्तर भारत मे सामंतवादी प्रथाक विकास भचुकल छल आर अभिलेख,साहित्य एवं विदेशी यात्रीक विवरण अहिबात केँ पुष्ट करैत अछि। पालवंशक स्थापना संगहि उत्तर पूर्वी भारत मे एकटा स्थायित्व एलैक आर पाल साम्राज्यक विस्तार सँ नेपाल धरिक क्षेत्र तक एकटा सुव्यवस्थित राज्यक स्थापना भेलैक। ताहि दिन मे आवागमन एवं यातायातक सुविधाक अभाव रहलाक कारणे ई शासक लोकनि विभिन्न क्षेत्र केँ जीति केँ ओहिठाम अधिकारी केँ सुपुर्द करैत छलाह आर हुनका सामंतक स्थिति मे राखि अपन शासन सुव्यवस्था केँ चलबैत छलाह। जँ वाचस्पति मिश्र देवपालक ओतए अपनभामती ग्रंथ लिखतैथ तँ वो देवपालक नामक स्थान पर ‘नृग’क नाम कियैक लिखतैथ? देवपाल अपने बड्ड पैघ लोक छलाह आर वाचस्पति सन विद्वानक हाथे अपन नाम उल्लिखित करेबा मे अपना केँ गौरवांवित बुझितैथ। वाचस्पतियो के अहि मे कोनो आपत्ति नहि होइतैन्ह कारण देवपालक शासन धरि एकटा व्यवस्थित व्यवस्थाक स्थापना भचुकल छल। दोसर बात ईहो जे वाचस्पति जहिना आदिसूरक नामक उल्लेख केने छथि ठीक तहिना नृगक नाम। तैं ई माने पड़त जे ई दुनु व्यक्ति अलग अलग राजा छलाह आर दुनुक दरबार मे रहि केँ वो दुनु ग्रंथक निर्माण केने छलाह। प्रथम किरात सामंत छलाह आर दोसर पूर्वी मिथिलाक सामंत– जे दुनु पालेक अंतर्गत हेताह। जाधरि आर साधन उपलब्ध नहि होइयै ताधरि नृगक समस्या अहिना बनल रहत। नृग राजा सहरसा जिलांतर्गत बड़गामक रहनिहार छलाह। एहनो एकटा मत अछि।
देवपालक बाद पाल साम्राज्यक स्थिति मे डावाँडोल शुरू भेल आर चारूकात सँ पुनः आक्रमण–प्रत्याक्रमण होमए लागल। नारायण–पालक भागलपुर अभिलेख सँ ई ज्ञात होइत अछि जे तीरभुक्तिक कक्ष विषय (जकर तुलना कौशिकी कक्ष सँ कैल जा सकइयै) मे पाल शासक पशुपताचार्य परिषद एवं शिवभद्दारक लोकनिक हेतु किछु दान देने छलाह। ८६६ ई. क आसपास राष्ट्रकूट शासक अमोधवर्ष अंग, वंग आर मगध धरि अपन अधिकार बढ़ा लेने छलाह। कृष्ण द्वितीय राष्ट्रकूटक समक्ष सैह स्थिति छल। ओम्हर सँ प्रतिहार भोज आर महेन्द्रपाल सेहो पाल साम्राज्यक सीमा मे अपन अधिकार बढ़ा चुकल छलाह। प्रतिहार लोकनि तिरहुत धरि अपन अधिकार बढ़ौने छलाह। महेन्द्रपाल प्रतिहार तँ बंगाल मे पहाड़पुर धरि पहुँचि गेल छलाह। पाल साम्राज्य बिहारक किछु भाग धरि सीमित रहि गेल छल। मिथिला पाल–प्रतिहार साम्राज्यक वीच मे बत्तीस दाँतक वीच मे जीभक स्थिति मे छल कखनो प्रतिहार लोकनि बढ़ैथ आर कखनो पाल लोकनि। अहि काल मिथिलाक कोनो प्रामाणिक इतिहास भेटतो नहि अछि आर हम देखैत इएह छी जे पश्चिम आर पूब दुनु दिसि सँ जे आक्रमण होइत छल, मिथिला ओकर शिकार भजाइत छल। पाल लोकनि कोनो रूपें अपन अस्तित्व केँ ढ़ौने जाइत छलाह अहि मे संदेह नहि यद्धपि हुनक प्रभुत्व बहुत घटि गेल छलैन्ह।
९५३–५४ ई. मे जेजामुक्तिक चन्देल लोकनि मिथिला पर आक्रमण केलन्हि। यशोवर्मन आर हुनक पुत्र धंग मिथिला पर आक्रमण केलन्हि आर गुर्जर प्रतिहारक निमंत्रण सँ ओकरा मुक्त कए अपना अधीन मे केलन्हि मुदा वो लोकनि बहुत दिन धरि अहि क्षेत्र पर राज्य नहि क सकलाह। चन्देल आक्रमण सँ समस्त उत्तरी भारत पराजित भेल आर आक्रान्त सेहो आर पाल साम्राज्य केँ अहि सँ वेस धक्का लगलैक। अहि सँ पूर्वहिं प्रतिहार आर राष्ट्रकूट लोकनिक आक्रमण सँ पाल साम्राज्य शिथिल भइयै चुकल छल आर चन्देल आक्रमण ओकरा आर तहस नहस क देलकै। नवम–दशम शताब्दी मे गण्डक आर शोण नदी सब प्रतिहार आर पाल राज्यक सीमा छलैक। चन्देलक प्रभाव पूर्णियाँ धरि पसरल छल आर ओहि काल मे चारूकात अस्तव्यस्तता बढ़ि गेल छल।
महिपाल प्रथम एक वेर पुनः पाल साम्राज्य केँ श्रृंखलाबद्ध करबाक प्रयास केलन्हि आर पाल साम्राज्य फेर संगठित भए अपना पैर पर ठाढ़ भेल। महिपाल प्रथमक अभिलेख मुजफ्फरपुर जिलाक इमादपुर गाम मे भेटल अछि आर अहि सँ ई सिद्ध होइत अछि जे महिपाल उत्तर आर दक्षिण दुनु बिहारक शासक छलाह। हुनक राज्यक सीमा बनारस धरि छलैन्ह। परञ्च हुनको शासन काल सुखद एवं शांतिपूर्ण नहि रहलाह। विभिन्न साधन ई ज्ञात होइछ जेचेदि–कलचुरी लोकनि सेहो मिथिला पर अपन जाल फेरने छलाह आर हाथ पैर पसारने छलाह। महिपाल आर कलव्हुरी मे संघर्ष भेल छलैन्ह अथवा नहि से ज्ञातव्य नहि अछि तखन एतवा जरूर अछि ११ म शताब्दी मे चोल लोकनिक संग दक्षिण सँ बहुत रास कर्णाट लोकनि एम्हर आवि केँ बैसि गेल छलाह।प्राकृतपैगलमु सँ सेहो ज्ञात होइत अछि जे ताहि दिन मे चम्पारण बाटे सेहो ओम्हर गोरखपुर दिसि किछु आक्रमन भेल छल। मिथिलाक इतिहासक कोनो स्पष्ट तस्वीर हमरा लोकनिक केँ अहि युगक उपलब्ध नहि होइत अछि।
पाल लोकनि येन केन प्रकारेण अपन अस्तित्व बनौने रखलन्हि आर विहार–बंगालक विभिन्न भाग पर छिटपुट ढ़ंगे शासन करैत रहलाह। नौलागढ़ आर वनगाँव सँ जे विग्रटपाल तृतीयक अभिलेख भेटत अछि ताहि सँ ई स्पष्ट होइछ जे पाल लोकनि अपन अंतिम काल मे तीरभुक्ति मे अपना केँ बचौलन्हि कारण ताहि दिन मे कलचुरी कर्णक आक्रमण सँ बंगाल अक्रांत छल और विग्राटपाल तृतीय आर कलचुरीक वीच जे मनमुटाव चल अवैत छल तकरा अतीश दीपंकरक प्रयासे मेटाओल गेल आर दुनुक वीच एकटा वैवाहिक संधि भेल। विग्रटपाल तृतीय यौवनश्री सँ विवाह केलन्हि आर हुनका दुनुक वीच जे संधि भेलन्हि तकरा दुनुक वीच जे संधि भेलन्हि तकरा कपाल संधि कहल गेल अछि। नौलागढ़ आर वनगामक अभिलेख केँ देखला सँ ई प्रतीत होइछ जे मिथिला कलचुरीक आक्रमण सँ वचल छल आर मिथिला पर पास लोकनिक शासन चल अवैत छल। अपन ह्रासकाल मे पाल लोकनि तीरभुक्ति केँ अपन ओहिठाम सँ शासन केनाई प्रारंभ केलन्हि।
विग्रटपाल तृतीयक समय मे पालवंशक सूर्यास्त भरहल छलैक। प्राकृत पैगलम् आर अन्य साधन सब सँ ई ज्ञात होइछ जे गण्डक क्षेत्र धरि कलचुरी वंशक लोक अपन प्रभुत्व ब बढ़ा लेने छलाह। पाल लोकनि सँ हुनक संघर्ष बढ़ि रहल छलैन्ह। संध्या कर नन्दीक ‘राम चरित’ मे ताहि दिनक राजनैतिक स्थितिक बढ़िया विवरण अछि। नेपालक हस्तलिखित पोथी मे रामायणक एक गोट पोथी उपलब्ध भेल अछि जकरा अनुसार संवत १०७६ मे तीरभुक्ति मे एकटा सोमवंशोद्भव महाराजाधिराज गाँगेयदेवक शासन छल। ओहि रामायणक किष्किन्धा काण्ड केँ अंत मे लिखल अछि–“सम्वत् १०७६ आषाढ़ वदी४ महाराजाधिराज पुण्यावलोक सोमवंशोद्भव गौड़ध्वज श्रीमद् गांगेयदेव भुज्यमान तीरभुक्तौ कल्याण विजयराज्ये नेपाल देशीय श्री भंक्षुशालिक श्री आनन्दास्य पाटकावस्थित (कायस्थ) पंडित श्रीकुरस्यात्मज गोपतिमा लेखिदम्”–१९४० मे एकर दोसर प्रति भेटलैक जाहि मे “गौड़ध्वज”क स्थान पर “गरूड़ध्वज” छैक। अहि पुष्पिकाक अध्ययन असँ मिथिलाक इतिहासक वस्तुस्थिति पर विद्वानक वीच पूर्ण मतभेद छन्हि। किछु गोटए एकरा कलचुरी गांगेयदेव मनैत छथि आर किछु गोटए कर्णाट गांगेयदेव। हमरा बुझने ई कर्णाट गांगेयदेव छलाह। एकर कारण ई अछि जे मिथिला मे अद्यावधि कलचुरी शासनक प्रमाण उपलब्ध नहि दोसर बात ई जे कलचुरी शासकक संग विग्रटपाल तृतीय कपाल संधि आर वैवाहिक संधि कए अपन अस्तित्व केँ सुरक्षित रखने छलाह। तेसर बात ई जे कोनो उल्लेख नहि पाओल जाइत अछि आर ने अप्रत्यक्षे रूप सँ एकर कोनो विवरण कलचुरी साधन मे भेटइयै। चारिमबात ई जे महिपालक ४८म वर्ष धरि तिरहुत हुनका अधीन मे छलैन्ह तखन ओहिठाम गांगेयदेव कलचुरीक राज्य कोना भसकइयै। महिपालक बादो रामपाल धरि मिथिला मे पालवंशक राज्य बनल रहल आर पालवंशक अंत भेला पर कर्णाट लोकनिक शासन प्रारंभ भगेल। मिथिलाक समस्त क्षेत्र मे पालकालीन अवशेष भेटैत अछि जखन कि एम्हर कलचुरीक कोनोटा अवशेष मिथिला मे नहि भेटैछ। अहि प्रश्न पर विस्तृत रूपें विचार हमरा लोकनि कर्णाट कालक अध्ययन क्रम मे करब। जखन पालवंशक सूर्यास्त भरहल छल तखन दक्षिणक षष्ठम विक्रमादित्य उत्तर मे अपन भाग्य अजमेबाक हेतु आगाँ बढ़ि रहल छलाह।
अध्याय–7
कर्णाटवंशक इतिहास
(१६४ सँ २०८)
ग्यारम शताब्दीक अंतिम चरण मे मिथिलाक अबस्था अत्यंत दयनीय आर सोचनीय भगेल छल कारण अहिठाम कोनो प्रकारक केन्द्रीय सत्ता नहि रहि गेल छल आर चारूकात सँ महत्वाकाँक्षी शासक लोकनि अहि पर अपन गिद्ध-दृष्टि लगौने छलाह। पाल लोकनिक शासन डगमगा गेल छल। कलचुरी लोकनि पश्चिम सँ हिनका सबके ठेलैत–ठेलैत मिथिलाक एक कोन मे पहुँचा देने छल। १०७७ एवं १०७९ क वीच कलचुरी शोढ़देव गण्डकी मे स्नान कए दान कएने छलाह तकर प्रमाण एकटा शिलालेख सँ भेटैत अछि। अहि सँ ई नहि बुझबाक अछि जे कलचुरी लोकनिक शासन स्थायी रूपे मिथिला पर छ्ल। अहि सँ तात्पर्य एतवे बहराइत अछि जे मिथिलाक दुर्मल राजनैतिक स्थिति सँ लाभ उठाकए विभिन्न राज्य अहि पर अपन सत्ता स्थापित करए चाहैत छलाह। सन्ध्या कर नन्दीक रामचरित मे तत्कालीन राजनीतिक विशद विश्लेषण अछि आर ओहि सँ इहो ज्ञात होइछ जे विग्रटपाल तृतीय कर्न केँ हरौने छलाह। हुनक नौलागढ़ आर बनगामक शिलालेखक उल्लेख हम पूर्वहि कचुकल छी। पाल लोकनि सेहो अहिकाल मे सबठाम सँ सिकुरि केँ मिथिले मे आवि गेल छलाह। कुब्जिकामतम्क एकटा तालपत्र पोथी मे ई लिखल अछि जे रामपालदेव नेपालक शासक जाहि सँ स्पष्ट होइछ जे विग्रटपाल तृतीय सँ रामपाल धरि मिथिला आर नेपाल पाल साम्राज्यक मुख्य केन्द्र छल।
एहि अनिश्चित स्थिति सँ जखन सब दिशक महत्वाकाँक्षी शासक लाभांवित होइत छलाह तखन दक्षिणक महत्वाकाँक्षी लोकनि कियैक मुँह तकैत रहितैथ? हमरा लोकनि केँ विल्हणक विक्रमाँकदेव चरित सँ ज्ञात होइछ जे चालुक्य सोमेश्वर (१०४०–१०६९) मालवाक परमारक राजधानी धार केँ जीतलैन्ह आर भोजक भोज केँ ओतए सँ पगार पड़लन्हि आर डाहलक राजा कलचुरि कर्णक शक्ति केँ सेहो नष्ट केलन्हि। हुनक पुत्र विक्रमादित्य षष्ठम अपन बापो सँ एक डेग आगाँ बढ़लाह आर गौड़ कामरूप पर दूवेर विजय प्राप्त केलन्हि। बाप–बेटाक लगातार उत्तर भारतीय विजयक फलस्वरूप उत्तर विहार, बंगाल आर कन्नौजक राजनीति मे क्रांतिकारी परिवर्तन भेल। वो लोकनि नेपाल धरि आक्रमण केने छलाह। विक्रमादित्य षष्ठमक पुत्र सोमेश्वर तृतीय अपन एक शिलालेख मे कहने छथि जे आन्ध्र, दर्विङ, मगध आर नेपालक शासक लोकनि हुनका पैर पर अपन माथ टेकने छलाह।
___ चालुक्य आक्रमण अहि बात केँ सिद्ध करइयै जे उत्तर भारत मे ताधरि परमार आर कलचुरि वंशक पतन प्रारंभ भगेल होएत। जँ से नहि होएत तँ एहि वेर चालुक्य लोकनि आन्हर विहाड़ि जँका समस्त उत्तर भारत एवं नेपाल केँ कोनो आक्रांत केने रहितैथ? विरोधक संभावना नहि रहला संता वो लोकनि प्रोत्साहित भए अहि सब क्षेत्र पर अपन प्रभुत्व जमौने हेताह। हिनकहि सब संग दक्षिण सँ बहुत रास कर्णाट सेनापति लोकनि उत्तर भारत मे मिथिला नेपाल मे कर्णाट नान्यदेवक, बंगाल विजय सेनक आर कन्नौज मे चन्द्रदेव गढ़वालक उत्थान संभव भेल। गढ़वाल लोकनि बढ़ैत–बढ़ैत गंगाक दक्षिण मे मूंगेर धरि पहुँच चुकल छलाह।
कर्णाट लोकनिक उत्पत्ति:- जनक वंशक परोक्ष भेला पर मिथिलाक अपन कोनो राजवंशक राज्य मिथिला मे नहि भेल छलैक। १०९७ मे मिथिला मे कर्णाट वंशक स्थापना ताहि हिसाबे एकटा महत्वपूर्ण घटना मानल जा जासकइयै। मुदा ई कर्णाट लोकनि केँ छलाह आर कोना मिथिला मे आवि केँ बसलाह आर शासक भेलाह से पूर्ण रूपेण अखनो धरि ज्ञात नहि अछि आर हमरा लोकनि निश्चित रूपे ई नहि कहि सकैछी जे कर्णाट लोकनि अमूक वा अमूक छलाह। जेना कि हम पहिने देखि चुकल छी कि ग्यारहम शताब्दीक अंतिम चरण मे मिथिला, कन्नौज आर बंगाल मे करीब करीब एक्के समय तीनटा स्वतंत्र राज्यक स्थापना भेल छल आर वो तीनू राज्य तत्कालीन राजनीति मे महत्वपूर्ण भूमिका अदा केने छल। मिथिलाक व्यक्तित्वक पूर्ण विकास अहिवंशक शासन काल मे भेल आर ताहिये सँ मिथिलाक प्रसिद्धि बढ़लैक।
कर्णाट लोकनि अपना केँ कर्णाट क्षत्रिय कहित छलाह। सेनवंश शासक सेहो अपना के कर्णाट क्षत्रिय कहैत छलाह। हिनका लोकनिक सम्बन्ध मे विद्वानक वीच मे पूर्न मतभेद अछि। ई लोकनि कर्णाट छलाह एतवा धरि निश्चित अछि कारण नान्यदेव अपना केँ कर्णाट कुल भूषण कहने छथि आर सामंत सेन अपना केँ कर्नाट क्षत्रियक कुल शिरोमणि। हेमचन्द्र राय चौधरीक मत छन्हि जे देवपालक मूंगेर ताम्रलेख मे जाहि कर्णाट लोकनिक उल्लेख अछि सम्भवतः उएह कर्णाट लोकनि बाद मे चलिके अलग–अलग राज्यक स्थापना केलन्हि। अहिमतक समर्थन केनिहार एक गोटएक कथन ई अछि जे जखन मगध – मिथिला मे पालवंशक ह्रास प्रारंभ भेल तखन उएह कर्णाट लोकनि (जे अखन धरि अहि क्षेत्र मे चुप्पी साधने छलाह) ओहि स्थिति सँ लाभ उठाके विस्तार केलन्हि आर कर्णाट सत्ताक स्थापना सेहो। एकमत इहो अछि जे राजेन्द्र चोलक आक्रमणक समय मे बहुत रास कर्णाट सैनिक एम्हर आएल छलाह आर राजेन्द्र चोलक घुरि जेबाक वाद अहिठाम रहि गेलाह आर एम्हुरका राजनीति मे सक्रिय भाग लेवए लगलाह। राजेन्द्र चोल अपना गंगाईकोण्ड सेहो कहने छथि जाहि सँ प्रमाणित होइछ जे विजयामियानक क्रम मे ई गंगा धरि आएल छलाह। परंतु सब साधनक सामान्य अध्ययन केला उत्तर ई प्रतीत होइछ जे राजेन्द्र चोलक अभियानक विशेष प्रभाव तत्कालीन उत्तर भारतक राजनीति पर नहि पड़ल छल। तैं ई कहब जे हुनका संगे आएल कर्णाट लोकनि एतए वसलाह से वैज्ञानिक केँ नहि बुझि पड़इयै। देवपाल सँ मदनपाल धरि जतवा जे पाल अभिलेख अछि ताहि सब मे गौड़, मालव, खस, हूण, कुलिक, कर्णाट, लाड़, चाट, भाट, आदि शब्दक मात्र औपचारिक व्यवहार अछि आर अहि शब्द सँ मिथिला अथवा बंगालक कर्णाट केँ जोड़ब समीचीन नहि बुझइत अछि।
कर्णाट शासक लोकनि कर्णाट सँ आवि मिथिला मे बसल छलाह ई सर्व सम्मति सँ स्वीकृत अछि–विवाद एतवे अछि जे वो लोकनि कखन, कहिआ आर कोना एतए आवि के रहलाह आर कोन रूपे सत्ता हथिऔलन्हि। नेपाली परम्परा आर वंशावलि मे सेहो मिथिलाक नान्यदेवक वंश केँ कर्णाट क्षत्रिय कहल गेल छैक। तान्यदेव भरतक नाट्यशास्त्र पर एकटा टीका लिखने छलाह जे सर्व प्रसिद्ध अछि आर ओहिक्रम मे वो अपना सम्बन्ध मे निम्नलिखित पदवी सबहिक प्रयोग कएने छथि–नान्यपति, नान्य, महासामंताधिपति धर्मावलोक, धर्माधारभूपतिस, मिथिलेश, एवं कर्णाटकुल भूषण। नान्य शब्दक व्यवहार हमरा लोकनि अन्हराठाढ़ी अभिलेख मे सेहो भेटैत अछि। नान्य शब्दक उत्पत्ति द्रविड़ शब्द ‘नन्नीय’ सँ भेल अछि। नान्यदेव अपन टीका मे जतवा देशी रागक उल्लेख केने छथि से सब कर्णाट शैलीक राग थिक आर ओहु सँ ई सिद्ध होइत अछि जे नान्यदेव कर्णाटक सँ हुनक सम्बन्ध कोनो ने कोनो रूपे अवश्य रहल हेतन्हि। चाहे कारण जे भी रहल हो, एतवा धरि निश्चित अछि जे ग्यारहम शताब्दीक अंतिम चरण मे कर्णाट लोकनि उत्तर भारतक राजनीति मे सक्रिय रूप सँ भाग लेमए लागल छलाह।
एक मत इहो अछि जे कलचुरि गांगेयदेवक संग जे कर्णाट लोकनि सैनिकक रूप मे एतए आएल छलाह उएह एक बाद मे चलि केँ शासक भगेलाह परञ्च इहो मत नेऽ सर्वमान्य भसकइयै। अहिठाम केवल एतवे स्मरण राखब आवश्यक अछि जे जँ गांगेय देवक आक्रमण मिथिला पर भेवे कैल होन्हि तँ से नान्यदेवक प्रादूर्भाव सँ ६०–७० वर्ष पूर्वे भेल हेतैन्ह आर ओहना स्थिति हुनक (गांगेयदेव) सैनिक मिथिला पर अधिपत्य स्थापित केने हेथिन्ह से संभव नहि बुझाइत अछि। तैं अहि तर्क केँ मानब असंभव।
रामकृष्ण कविक अनुसार राष्ट्रकूट लोकनि सेहो कर्नाट कहबैत छलाह आर जखन दक्षिण मे हुनक अवसान समीप एलन्हि तखन वो लोकनि ओहिठाम सँ हँटि उत्तर दिसि बढ़लाह आर कन्नौज, मिथिला आर बंगाल मे अपन शासन स्थापित केलन्हि। अहि कथनक कोनो शुद्ध ऐतिहासिक अथवा परम्परागत आधार नहि अछि। राष्ट्रकूट इतिहासक मर्मज्ञ स्वर्गीय सदाशिव अनंत अल्तेकर सँ हम अहि सम्बन्ध जखन विचार विमर्श कैल तखन वो कहने छलाह जे मिथिला मे कहियो कोनो रूपे राष्ट्रकूट लोकनिक शासन नेऽ छल आर नेऽ ओकर कोनो प्रमाणे अछि। तैं राष्ट्रकूट केँ अहिठाम कर्णाट सँ मिलाएब उचित नहि बुझना जाइत अछि।
सुप्रसिद्ध फ्रेंच विद्वान सिल्वाँलेवीक अनुसार मिथिला मे कर्णाट वंशक उत्पत्तिक सम्बन्ध सोमेश्वर चालुक्य एवं ओकर वंशजक उत्तर भारत पर आक्रमण सँ छैक आर इएह सब सँ समीचीन तर्क बुझियो पड़ैत अछि। विल्हणक विक्रमाँक देव चरित मे अहि आक्रमणक विवरण भेटइयै आर पिता–पुत्र–पौत्रक अभियानक समय सेहो एहन अछि जे मिथिलाक तत्कालीन राजनैतिक स्थिति सँ मिलैत–जुलैत अछि।अहि आक्रमणक फलस्वरूपे बहुत रास कर्णाट वीर, सैनिक एवं सामान्य लोक सब एम्हर आवि केँ मिथिला, मगध, वंग, कन्नौज आदि स्थान मे वसि गेल छलाह अहि आक्रमणक फले उत्तर भारतक परमार आर कलचुरि राजवंशक पराभव सेहो भेल छल। सोमेश्वरकचण्डकौशिक मे एकटा कथा अछि जाहि सँ भान (ज्ञात) होइछ जे पालवंश महिपाल कोनो कर्णाटराज केँ हरौने छलाह–
____ “ य संश्रित्य प्रकृति गहनामार्य्या चाणक्यनीति
हत्वानंदान् कुसुमनगरं चन्द्रगुप्तो जिणाय
कर्णाटत्वं धुवमुपगतानत्व तानेव हंतुं
दादैपोघः स पुनरभवत् श्री महीपाल देवः ”॥
आव ई कर्णाट राज के छलाह से अखुनका स्थिति मे कहब कठिन। संभवतः कर्णाट केन्दु विक्रमादित्य षष्ठम गौड़ पर आक्रमण केने होथि। विक्रमादित्यक नागपुर प्रशस्ति सँ त एतवा स्पष्ट अछि जे कर्णाट लोकनिक सम्पर्क चेदिराज कर्ण सँ सेहो छलैन्ह आर वो हिनके लोकनिक मदति सँ मालवा केँ पराजित केने छलाह। मुदा ई कहब अहि सहयोगक फले मिथिला मे कर्णाट नान्यदेव केँ राज्य स्थापित करबा मे सुविधा भेलैन्ह से तर्क संगत नहि बुझि पड़इयै कारण अहि दुनु घटना मे तिथिक जे अंतर अछि से ततेक व्यापक जे दुनु केँ जोड़ब असंभव। सोमेश्वर एवं विक्रमादित्य षष्ठमक आक्रमणक फले जे कर्णाट सैनिक एवं सेनापति लोकनि एमहर एलहि सैह राज्यक स्थापना मे समर्थ भेल छलाह कारण एम्हर आएल सेनापति लोकनि एमुरका स्थिति देखि एम्हरे रहि जाएब अचित बुझलैन्ह कारण एम्हर रहबा मे दुनु हाथ मे लड्डुये–लड्डु छल। सेन वंशक संस्थापक अपना केँ कर्णाट कुल लक्ष्मीक संरक्षक कहने छथि। विक्रमादित्य षष्ठम आर सोमेश्वर तृतीय अपन प्रभाव नेपाल धरि बढ़ौने छलाह। एकर बाद सँ विभिन्न भारतीय राजा लोकनि नेपाल पर अपन प्रभाव बढ़ेबाक प्रयास केलन्हि।
पाल लोकनि जखन कलचुरिक संग लटपटाएल छलाह तखने चालुक्य लोकनिक आक्रमण केँ फले उत्तर भारतक कैक स्थान पर कर्णाट लोकनि पसरि चुकल छलाह आर ओहिठामक राजनीति मे हस्तक्षेप करब शुरू कदेने छलाह। अहि तथ्यक प्रमाण हमरा विक्रमाँकदेव चरित सँ भेटित अछि। १०५३ ई. क आसपास सँ चालुक्य लोकनि एम्हर सक्रिय रूपें हुलकी–बुलकी देमए लागल छलाह। १०५३ क केलावाड़ी अभिलेख सँ ई ज्ञात होइछ जे सेनानायक भोगरस वंग केँ जीति लेने छलाह। ई सोमेश्वर प्रथमक सेनानायक छलाह। चालुक्यक एकटा सामंत, जकर नाम आच छलैक, सेहो विक्रमादित्य षष्ठमक समय मे वंग धरि आक्रमण केने छलाह। अहि दुनु घटना सँ ई स्पष्ट भजाइत अछि जे हिनके लोकनिक संग आएल सेनापति, सेनानायक, सामन्त, सिपाही आदि व्यक्ति एम्हुरका स्थिति देखि एम्हरे रहि जाइजाएत गेलाह। नान्य अथवा हुनक पूर्वज एहने एकटा सामंत–सेनापति रहल हेताह जे नेपालक तलहट्टी मिथिला केँ उपयुक्त बुझि ओहिठाम वसि गेल हेताह आर चालुक्य वंश क वापस भेलाह अपन स्वतंत्र सत्ता घोषित कए मिथिला आर नेपालक शासक बनि गेल हेताह। शासक भेला उत्तरो वो अपना केँ महा सामंताधिपति कहिते रहलाह से अहिबातक द्धोतक थिक जे राजा हेवाक पूर्व हुनक कि स्थिति छल।
नान्यदेव (१०९७–११४७):- हम उपर देखि चुकल छी जे चालुक्य आक्रमणक समय सँ चालुक्य सेनाक विशेष भाग मिथिला आर बंगाल मे वसि गेल छल। नान्यदेव मिथिला मे कर्णाट वंशक संस्थापक भेलाह। अहिठाम ई स्मरण राखब आवश्यक जे अहि वंशक तत्वावधान मे समस्त पूर्वी भारत मिथिले एक गोट एहेन राज्य छल जाहिठाम २२७ वर्ष धरि (१०९७–११४७) मुसलमान लोकनिक कोनो राजनीतिक एवं साँस्कृतिक दृष्टिकोण सँ नान्यदेवक शासन काल तँ महत्वपूर्ण अछिये परञ्च कर्णाटवंशक शासन केँ स्वर्णयुग कहल गेल छैक कियैक तँ अहि युग मे मिथिला मे लगभग १४००–१५०० वर्षक वाद स्वतंत्र संगठित राज्य एवं शासन प्रणालीक स्थापना भेलैक आर कला, साहित्यक संगहि संग मैथिली भाषाक विकास सेहो भेलैक। नान्यदेव अपन दीर्घ राजकाल मे पाल, कलचुरि, सेन आर गढ़वालक पारस्परिक संघर्षक मध्य अपन दूरदर्शिता, नीतिकुशलता, एवं वीरता सँ अपन राज्यक स्थापना केलन्हि आर उत्तरोत्तर ओकरा शक्तिशाली बनौलन्हि। वो अपना वंशक संस्थापक संगहि संग एकटा सर्वश्रेष्ठ शासक सेहो छलाह जनिक स्थान तत्कालीन भारतीय राजा सबहिक मध्य महत्वपूर्ण छल। नान्यदेव १०९७ ई. मे सिमरौनगढ़ मे राजगद्दी पर वैसलाह आर कर्णाट वंशक स्थापना केलन्हि। निम्नलिखित श्लोक सँ उपरोक्त तिथिक मान होइयै आर कहल गेल अछि जे ई लेख सिमरौनगढ़ (जे सम्प्रति नेपाल मे अछि) सँ प्राप्त भेल अछि।
“ नन्देन्दु विन्दु विधु समितशाकवर्षे
सच्छ्रविणे सितदले मुनिसिद्धितिथ्याम्।
स्वा(ती) तौ शनैश्चर दिन करिवैर लग्ने
श्री नान्यदेव नृपतिर्व्यदधीत वास्तुम्”
शक् १०९७ (=१०९७ ई.)क स्वाती नक्षत्र मे शनि दिन(श्रावण सप्तमी) केँ नान्यदेव राजा भेला–याने मिथिला राज्यक स्थापना केलन्हि।
१६२७ ई. भतगाँवक राजा जगज्योतिमल्ल रचित मुदितकुवलयाश्व सँ सेहो ज्ञात होइछ जे नान्यदेवक १७ जुलाई १०९७ केँ मिथिला राज्यक स्थापना केलन्हि। मिथिला राज्यक स्थापनाक क्रम मे नान्यदेवक स्थान सर्वप्रथम छन्हि आर तकर प्रमाण हमरा नेपालक परम्परा एवं वंशावली आर शिलालेख सँ भेटैत अछि। प्रतापमल्लक शिलालेख मे सेहो अहि क्रमे नाम अछि। नान्यदेव मिथिला राज्यक स्थापना मिथिला–नेपालक सिमान पर सिमरौनगढ़ मे केने छलाह आर ओहिठाम सँ चारूकात पसरल छलाह।
मैथिल परम्परा मे एकटा कथा सुरक्षित अछि जे एवं प्रकारे अछि। कहल गेल अछि जे प्रारंभ मे नान्यदेव निलगिरी प्रांत (दक्षिण भारत) मे राज्य करैत छलाह आर ओतहि सँ वो मिथिला प्रांत आएल छलाह। घुमैत–फिरैत वो सीतामढ़ी जिलांतर्गत नान्यपुर परगंतास्य पुपरी ग्रामक समीप कोइली ग्राम मे विश्राम केलन्हि। एकदिन वो अपन खेमाक कात सँ एकटा विषधर सर्प केँ जाइत देखलन्हि जाहि पर निम्नलिखित श्लोक लिखल छल–
“ रामोवेत्ति नलोकेत्ति वेत्ति राजा पुरूखाः
अलर्कस्य धनं प्राप्य नान्यो राजाभविष्यति ”।
___ परम्परा केकटा जँ देखल जाईक तँ अहि सँ इएह सिद्ध होइछ जे अलक्षित धनक प्राप्ति कए नान्यदेव मिथिलाक राजा हेताह। कहल जाइत अछि जेहुनका राज्यशक्ति अर्जन करबा मे साहायता भेटल छलैन्ह। वो दक्षिण मे नीलगिरी मे राजा छलाह अथवा नहि से कहब तँ कठिन अछि मुदा एतवा धरि ज्ञातव्य जे मिथिला पहुँचलाह पर हुनका किछु अलक्षित धनक ज्ञात अवश्य भेलन्हि आर वो ओहि सँ लाभांवित भए मिथिला राज्य प्राप्त करबा मे अग्रसर भेलाह। तखन मिथिला मे कोनो प्रकारक विरोधक संभावना नहि रहि गेल छल।
नान्यदेव केँ कामरूपक धर्मपालक समकालीन कहल छन्हि। धर्मपालक शासनकाल मेकालिका पुराणक संकलन भेल छल आर ओहि कालिका पुराण मे सब सँ प्राचीन उल्लेख भरत भाष्यक अछि जकर लेखक नान्यदेव छलाह। ओहि काल मे मिथिला सँ बासतरिया ब्राह्म लोकनिक परिवार असम गेल छल। मिथिला ताहि दिन धरि तंत्रक प्रमुख केन्द्र बनि चुकल छल आर कालिका पुराणक संकलनक मूल उद्धेश्य छल मिथिला आर असमक वीच एक प्रकारक साँस्कृतिक सम्पर्क स्थापित करब। नान्यदेव जे कि अभिनव गुप्तक नामे सेहो प्रसिद्ध छलाह, क प्रसंग के.सी.पाण्डेयक विचार छन्हि जे वो १०१४–१५ ई.मे भेल होयताह मुदा से कोनो रूपे मान्य नहि भसकइयै आर अहि प्रसंगक तर्क हम आनठाम उपस्थितक चुकल छी (द्रष्टव्य–काशी प्रसाद जायसवाल संस्थान द्वारा प्रकाशित बिहारक बृहत् इतिहास–अंग्रेजी मे)।
सिमरौनगढ़ शिलालेख मे नान्यदेवक तिथि स्पष्ट अछि जकर संकेत हम पूर्वहिं द चुकल छी। नान्यदेवक मंत्री श्रीधर दासक एकटा बिनु तिथिक शिलालेख, जे अन्हराठाढ़ी गाम मे अछि, क पाठ निम्नलिखित अछि–
___ “ ॐ श्रीमन्नान्य पतिर्जेता गुणरत्न महार्णवः
यत्कीर्त्यां जनितम् विश्वे द्वितीय क्षीर सागर।
मंत्रिणा तस्यन्नान्यस्य क्षत्र वंशाब्ज भावुना
दवोयकारित श्रीधरः श्रीधरेणच
यस्यास्य बाल्मीकेर विजयो प्रबन्ध गलधौ
व्यासस्य चात्यद् भुत्ते वाधैरण वद्ध गद्ध
चतुरैन्यैश्च विस्तारिते अस्माकम्
क्वर्पुन ग्गिरामवसरः
कोवाकारोत्यादर यद्वालबचोप्य ”।
१६४८क प्रताप मल्लक शिलालेख मे नान्यदेवक वंशक क्रम एवं प्रकारे अछि–
“ आसीत् श्री सूर्यवंशे रघुकुल न्रपजो रामचन्द्रो
नृपेशः तदूंशो नान्यदेवोऽवनि पतिरभवत सुतः
गंगदेवः। तत्पुत्रोऽभून्नृसिंहो नरपतिरतुलस्तत्सुतो
रामसिंहः तज्जः श्री शक्तिसिंहो धरनिपतिरभत्
भूप भूपालसिंह तस्मात्कर्णाट चूड़ामनि
विहरियुत्सिंह देवास्यवंशे ”।
ओहिकाल राजनीतिक परिस्थितिक अध्ययन सँ हमरा लोकनि नान्यदेवक उचित मूल्याँकन क सकैत छी। बंगाल मे सेन वंशक स्थापना भचुकल छल आर कन्नौज मे गहढ़वाल राज्य सेहो जमि रहल छल। मूंगेरक क्षेत्र पाल लोकनि सिमैटि केँ आवि गेल छलाह। जखन पाल, सेन आर गहढ़वाल अपने–अपने मे बाँझल छलाह तखन नान्यदेव मिथिला सँ नेपाल पर आक्रमण केलन्हि आर ओकरा अपन राज्य मे मिला लेलन्हि। सेन सब केँ हरेबाक हेतु नान्यदेव गहढ़वाल सँ बढ़िया सम्बन्ध रखैत छलाह आर एकर प्रमाण हमरा विद्यापतिक पुरूष परीक्षा सँ सेहो भेटैत अछि जाहि मे लिखल अछि नान्यदेवक पुत्र मल्लदेव राजा जयचन्द्रक ओतए सम्मानित भावें रहैत छलाह। विजयसेनक देवपाड़ा शिलालेख सँ ई ज्ञात होइछ जे नान्य केँ पराजित कए विजयसेन गिरफ्तार क लेने छलन्हि। सेन आर कर्णाट वंशक वीच बरोबरि खटपट होइते रहैत छल आर पूर्वी मिथिला (सहरसा–पूर्णियाँ)क क्षेत्र मे दुनु केँ कोनो ने कोनो रूपें झंझटि चलते रहैन्ह। एहि हेतु नान्यदेव गहढवाल लोकनिक संग नीक सम्बन्ध रखैत छलाह। नान्यदेव मिथिला मे मात्र कर्णाटवंशक स्थापनेटा धरि नहि केलन्हि अपितु एकरा दृढ़ सेहो केलन्हि आर समस्त मिथिला पर अपन एकक्षत्र शासन काएम केलन्हि। गण्डकी सँ कौशिकी धरि आर हिमालय सँ गंगाधरि अपन राज्यक विस्तार करबा मे वो सक्षम भेला। मिथिलाक इतिहासक संदर्भ मे नान्यदेव केँ उएह स्थान प्राप्त छैन्ह जे समस्त भारतक इतिहासकसंदर्भ मे चन्द्रगुप्त मौर्य केँ जनक वंशक पश्चात् एहन प्रशस्त राज्य मिथिला मे आर कहिओ नहि बनल। ओहि समय मे मिथिलाक जे राजनैतिक स्थिति छलैक ताहि मे नान्यदेव अहि सँ वेसी किछु कइयो नहि सकैत छलाह। राज्यक स्थापनाक संगहि संग ओकरा सुदृढ़ बनेबाक हेतु वो संगठित शासन विधानक जन्म सेहो देलन्हि।
नान्य अपना केँ श्रीमहासामंताधिपति, श्रीमन्नान्यपति, कर्णाटकुलभूषण, धर्माधर भूपति, राजनारायण, नृपमल्ल मोहन मुरारी, प्रत्ययग्रवानिपति, मिथिलेश्वर, सामंतधिपति आदि–कहने छथि। अन्हराठाढ़ी अभिलेख मे हुनका ‘श्रीमान’ कहल गेल छन्हि। अहि सब सँ हुनक पूर्वक स्थितिक भान होइयै आर बुझि पड़इयै वो पूर्व मे सामंत रहल होएताह आर बाद मे शासक भेल होएताह आर बाद मे शासक भेल होएताह। ताहि दिनक अनिश्चित राजनैतिक स्थिति मे वो मिथिलाक व्यक्तित्व विकास केलन्हि आर मिथिलाकेँ एकटा रूप देलन्हि। मिथिलाक चौहद्दीक परिभाषा जे हमरा लोकनि देखैत छी तकरा राज्यक रूप मे चरितार्थ उएह केलन्हि आर तै वो प्रशंसनीय छथि। वो स्वयं एक पैघ कूटनीतिज्ञ एवं सफल योद्धा छलाह। चम्पारण मे राजधानीक स्थापना करब (सिमरौनगढ़) हुनक कूटनीतिज्ञताक परिचय देने छथि। ताहि दिन मेदरद–गण्डकी क्षेत्र धरि पश्चिमक राज्य छल आर मिथिलाक सीमा ओहि राज्य सँ मिलैत छल आर ओम्हर यशः कर्णक नजरि सेहो अहि दिसि लगले छल तैं नान्यदेव ओहि खतरा सँ अपन राज्यक रक्षार्थ ओम्हरे अपन राजधानी बनौलन्हि जाहि सँ पश्चिम आर उत्तर दुनुक सुरक्षा हो। अहि विचार सँ वो अपन राज्यक राजनीति केँ सेहो संचालित करैत छलाह।
नान्य जे टीका लिखने छथि ताहि मे वो अपना केँ सौवीर आर मालवक विजेता घोषित कएने छथि–
____ “जित सौवीर वीरेण सौवीरक उदहृतः”
____ “लुप्तमालव भूपाल कीर्तिर्मालव पञ्चमीम्”
____ “बाँगालि केति कथिता मिथिलेश्वरेण”।
____ “श्री रागस्यैक भूमिर्ललित मधुर वाग्भिंत
बंगाल–गौड़, प्रोढ़ प्राग्मारसारः
कुकुभमुभ यथा साधय न्विश्रमुच्चैः।
संग्रामे भैरवोयः प्रबिल सति
मुहु र्धूर्जरीयस्य कण्ठे, सौवीरो
ध्यायमोनं व्यधित कृतमतिर्भूपति नान्यदेवः”॥
सौवीर, मालव, बंगाल आर गौड़ केँ पराजित करबाक श्रेय वो अपना पर लैत छथि–सौवीर मालवा पर संभवतः वो मिथिलेश्वर होयबाक पूर्वहिं विजय प्राप्त केने होयताह। बंगालक प्रश्न लकए हुनका सेन वंश सँ झंझटि भेलन्हि तकर वर्णन उपर क चुकल छी आर संभव जे अंततोगत्वा हुनका बंगाल–गौड़ पर विजय प्राप्त भेलहोति। बंगाल आर गौड़क प्रश्न पर नान्यदेव आर विजयसेनक वीच मनोमालिन्य भेलहोति अथवा रहैत होति से संभव। दिनेश चन्द्र सरकार सेनवंश आर कर्णाटवंशक सब तथ्यक अध्ययन केलाक पछाति अहि निर्णय पर पहुँचल छथि जे विजयसेन केँ नान्यदेवक विरूद्ध कोनो खास सफलता नहि भेटल छलैन्ह। गिरीन्द्र मोहन सरकार सेहो अहिबात सँ हमरा लोकनि केँ अवगत करौने छथि जे सेनक मिथिला मे शासन अथवा राज्य हेबाक कोनो ठोस प्रमाण नहि अछि। देवपाड़ा शिलालेखक अध्ययन सँ एतवे प्रमाणित होइछ जे विजयसेन नान्यदेव आर राघवक घमण्ड केँ चूर केलन्हि।
मिथिला मे अपन अस्तित्व केँ सुदृढ़ कए आर अपन चारूकात विस्तारक कोनो आशा नहि देखि नान्यदेव नेपाल दिसि अपन ध्यान लगौलन्हि। ताहि दिन मे नेपालो मे कैक गोट राज्य छल आर ओहि मे आपस मे आधिपत्यक हेतु संघर्ष होइत रहैत छल। नान्यदेव अहि संघर्ष होइत रहैत छल। नान्यदेव अहि स्थिति सँ लाभ उठौलन्हि आर नेपालक राजनीति मे हस्तक्षेप करब प्रारंभ केलन्हि। नेपाल परम्पराक अनुसार वो समस्त नेपाल केँ अपना अधीन मे केलन्हि आर नेपालक स्थानीय शासक, पाटन आर काठमाण्डुक जयदेव मल्ल आर भात गाँवक आनंद मल्ल केँ गद्दी सँ उतार लन्हि। नेपाली परंपराक अनुसार नेपालक राजवंश केँ नान्यदेव समाप्त नहि केलन्हि–बुझि पड़इयै जे जखन वो लोकनि नान्यदेवक सत्ता केँ स्वीकार क लेलथिन्ह तखन नान्यदेव हुनका लोकनि केँ अपन अधीनस्थ शासक बना केँ छोड़ि देलथिन्ह। सामंतवादी व्यवस्थाक ई एकटा प्रमुख बात छल। नेपालक इतिहास दिल्ली रमण रेगरीक अनुसार नान्यदेव सम्पूर्ण नेपाल केँ नहि जीतने छलाह आर हुनका ११४१ मे फेर दोसर वेर नेपाल पर आक्रमण करए पड़ल छलैन्ह। नान्यक परोक्ष भेला पर पुनः ठाकुरी वंशक लोग अपन आधिपत्य बना लेने छलाह। नेपाल पर नान्यदेव जे कर्णाट वंशक स्थापना केलन्हि तकरा हुनक वंशज हरिसिंह देव बाद मे दृढ़
केलथिन्ह।
विजेता, राज्यनिर्माता, कुशल प्रशासक एवं संगठन कर्ताक अतिरिक्त नान्यदेव स्वयं एक बहुत पैघ विद्वान छलाह आर भरतक नाट्यशास्त्र पर एक गोट टीका सेहो लोखने छलाह। श्रीधर दास एवं रत्नदेव नान्यदेवक प्रधान मंत्री छलथिन्ह। श्रीधर दासक पिता बटुदास सेनक महा सामंत छलाह आर श्रीधर दास सेहो महामाण्डलिक छलाह। हिनक मूल राजधानी सिमरौनगढ़ (नेपाल) मे छलैन्ह आर दोसर राजधानी नान्यपुर मे। नान्यदेव ५० वर्ष धरि राज्य केलन्हि आर सब किछु सफलतापूर्वक उपलब्ध कए मिथिला राज्य केँ एकटा स्वरूप प्रदान केलथि। मिथिला तहिया सँ आई धरि संस्कृतिक एकटा प्रधान केन्द्र बनल अछि। राजनैतिक इतिहासक महत्वक लोप भेलो उत्तर सांस्कृतिक दृष्टिकोण सँ नान्यदेवक शासन अपन अलग महत्व अछि।
मल्ल देव:- विद्यापति अपन पुरूष परीक्षा मे मल्लदेव केँ युवराज कहने छथि परञ्च मिथिला मे कर्णाट वंशक शासन श्रृंखला मे नान्यदेवक बाद गंगदेवक नाम अवइयै तैं मल्लदेवक युवराजक संज्ञा एकटा समस्या बनिगेल अछि। सभ साधनक अध्ययन केला पर ई प्रतीत होइछ जे नान्यदेवक बाद मिथिला राज्य संभवतः दुनु भाई मे बहि गेल छल आर दुनु गोटए अपन–अपन क्षेत्र पर शासन करैत हेताह। पुरूष परीक्षाक अनुसार नान्यदेवक पुत्र मल्लदेव बड्ड साहसी आर स्वाभिमानी छलाह। वो किछु दिन धरि कन्नौजक जयचन्द्रक ओतए छलाह आर फेर ओहिठाम सँ चिक्कौर राजाक ओतए आवि के रहला। मैथिली अनुश्रति ई कहल जाइत अछि जे दुनु भाई मे पटैत नहि छलैन्ह आर तैं जखन मल्लदेव हुनक मदैति नहि केने छलथिन्ह। जयचन्द्र मल्लदेवक वीरता सँ बड्ड प्रभावित छलाह। सहरसा जिला मे मलडीहा आर मल्हनी गोपाल मल्लदेवक नाम पर बसल अछि। भीठ भगवानपुर मे मंदिर मे एकटा अभिलेख अछि जाहि मे लिखल अछि– “ॐ श्री मल्लदेवस्य”। कि वदंती अछि जे भीठ भगवानपुर मल्लदेवक राजधानी छल। भीठ भगवानपुर गंधवरिया राजपूतक केन्द्र सेहो मानल गेल अछि आर गंधवरिया परम्परा मे सेहो एकटा मल्लदेवक नाम अवइयै। तैं ई कोन मल्लदेवक शिलालेख थिक से कहब असंभव।
विभिन्न तथ्यक परीक्षणक बाद हम अहि निर्णय पर पहुँचल छी जे नान्य देवक पछाति मिथिला राज्यक विभाजन भेलैक आर ओकर पूर्वी भाग पर मल्लदेवक आधिपत्य रहलैक। पश्चात मल्लदेवक वंशज सेहो अहि क्षेत्र पर शासन केलन्हि जकर अप्रत्यक्ष रूपें कनेको प्रमाण भेटैत अछि। राज्यक बटबारा भगेल सँ कर्णाट वंशक प्रभाव किछु घटि अवश्य गेल होयतैक आर तैं नान्यदेवक पछाति हमरा लोकनि केँ कर्णाट राज्यक विशेष विस्तार देखबा मे नहि अवइयै।
स्वर्गीय कालिकारज्जन कानूनगोय एकठाम लिखने छथि जे १२१३–१२२७क वीच मिथिला मे कोनो कर्णाट अरिमल्लदेवक शासन छल मुदा अहिठाम स्मरणीय जे अहिनामक कोनो शासक मिथिला मे नहि भेल छथि। नेपाल मे अहिनामक शासक भेलहि अवश्य परञ्च वो कर्णाटवंशक नहि छलाह आर ने ताहि दिन मे नेपालक कोनो प्रभाव मिथिलाक कोनो भाग पर छल। इहो संभव अछि जे कानूनगोय महोदय मल्लदेव केँ अरिमल्लदेव बुझि लेने होथि। एकर कारण हमरा बुझने ई अछि जे मिथिला परम्परा मे कहल गेल छैक जे नान्यक एकटा पुत्र नेपाल मे शासन करैत रहथिन्ह आर चूंकि नान्यक एकटा पुत्रक नाम मल्लदेव छलैन्ह तैं कानूनगोय साहेब ओहि नाम केँ अरिमल्लदेवक संगे मिझ्झारक देने होथि। तैं हम अपन एक लेख मे (जे आनठाम प्रकाशित अछि) मल्लदेव केँ मिथिलाक एकटा विसरल राजाक संज्ञा देने छी। मल्लदेव पूर्वी मिथिला पर तँ राज्य करिते छलाहे आर संगहि नेपालक किछु भाग पर सेहो भीठ भगवानपुर एकटा केन्द्रीय स्थल छल तैं ओकरा वो अपन राजधानी बनौलन्हि कारण ओहिठाम सँ वो अपन शासन बढ़िया जकाँ दुनुठाम चला सकैत छलाह। कहल जाइत अछि जे हुनके दरबार मे स्मृतिकार वर्द्धमान उपाध्याय सेहो रहैत छलाह जनिक एकटा शिलालेख आसी (मटिआरी) (हाटी परगन्ना) सँ उपलब्ध अछि। वो मल्लदेवक समय मे धर्माधिकरणक पद पर नियुक्त छलाह। शिलालेख एवं प्रकारे अछि–
___ “ जातो वंशे बिल्व पंचाभिधाने
धमाध्यक्षो वर्द्धमानो भवेशात्।
देवस्याग्रे देवयष्टि ध्वजाग्रा
रूढ़ कृत्वाऽस्थापद्वैन तेयम् ” ॥
भीठ भगवानपुरक मंदिर आर पोखरि सँ बहराएल बहुत रास बस्तुजात अहि बात केँ प्रमाणित करैत अछि जे प्राचीन काल मे ई एकटा महत्वपूर्ण स्थान रहल होएत। कलात्मक वस्तुजात जे कर्णाटकालीन बुझि पड़ैत अछि से ओतए प्रचुर मात्रा मे बहराएल अछि आर किछु वस्तु तँ एहनो अछि जकरा अपूर्व कहल जा सकइयै। एकर विस्तृत विवरण कतेक ठाम हम कैल अछि। कर्णाट कालीन पुरातात्विक महत्वक बहुत रास वस्तु बहेड़ा सँ सेहो बाहर भेल अछि। भगवानपुरक डीह, डाबर, पोखरि आर मंदिर विस्तार देखला आर सामरिक दृष्टिकोण सँ ओहिगामक चौहद्दीक अध्ययन केला सँ ई बुझना जाइत अछि जे मल्लदेव ओहि स्थान केँ अपन राजधानी बनौने हेतहि आर ओतहि सँ वो नेपाल आर सहरसा–पूर्णियाँ क्षेत्र धरि अपन राज्यक नियंत्रण करैत हेताह। प्राचीन काल मे सहरसा–पूर्णियाँ जेवाक रास्ता, बाट–घाट, सबटा अहि दके छल आर नेपालो जेबा मे हुनका अहिठाम सँ सुभीता होइत हेतैन्ह। ओहि स्थानक उत्खनन भेला सँ ओहि पर आर प्रकाश पड़बाक संभावना अछि। जा धरि आर कोनो नवीम तथ्य हमरा लोकनिक समक्ष नहि अवइयै ताधरि मल्लदेवक ऐतिहासिकता संदिग्धे मानल जाएत। मल्लदेवक सम्बन्ध अखन आर शोधक अपेक्षा अछि।
गंगदेव:- ११४६ ई. मे नान्यदेवक मृत्युक अरांत आर पारिवारिक कलह एवं उपरोक्तक पछाति गंगदेव मिथिलाक राजगद्दी पर आसीन भेलाह। वो बंगालक वल्लालसेनक समकालीन छलाह आर स्वयं एक महत्वाकाँक्षी शासक सेहो। विजय सेनक हाथे अपन पिता नान्यदेवक वेइज्जतीक बात वो विसरल नहि छलाह आर वो अवसरक खोज मे छलाह जाहि सँ एकर बदला ल सकैथ। गंगदेव आर गाँगेयदेवक प्रश्न पर इतिहासकारक मध्य जे एकटा विवाद चलि रहल अछि ताहि दिस हम पाठकक ध्यान पूर्वहिं आकृष्ट कए चुकल छी। रामायणक पुष्पिका मे जे एकटा गाँगेय देवक विश्लेषण भेल अछि ताहि प्रसंग मे मिथिलाक इतिहासकार उपेन्द्र ठाकुरक विचार छन्हि जे वो गाँगेयदेव कलचुरि वंशक छलाह आर हुनका महिपाल सँ संघर्ष भेल छलैन्ह। परञ्च हमरा अहिठाम अहि प्रश्न पर विचार करबाक हेतु निम्नलिखित बात केँ ध्यान मे राखए पड़त।
___रामायणक एक पोथी मे छैक–‘गौड़ध्वज’ श्रीमद गांगेयदेव–अहि मे पुण्याव लोक शवक व्यवहार अछि आर विनु कोनो संकेत संवत् १०७६क–दोसर पाठ मे ‘गौड़ध्वज’क स्थान पर “गरूड़ध्वज” छैक। उपेन्द्र ठाकुर महामहोपाध्याय मिराशीक मत सँ सहमति प्रगट कएने छथि। मुदा अहिठाम विचारणीय विषय ई. अछि जे १०७६–शक छलअथवा विक्रम आर दोसर बात ई जे महिपाल प्रथमक समय मे पाल वंशक पुनरूद्धार भेल छल आर तैं ओहि काल मे कलचुरि लोकनि केँ ‘गौड़ध्वज’क उपाधि सँ विभूषित हेवाक कोनो संभावना नहि बुझाइत अछि। महिपाल प्रथम अपन साम्राज्यक सीमा बनारस धरि बढ़ौने रहैथ आर जँ कलचुरि गांगेयदेव केँ से शक्ति रहितैन्ह तँ वो अवश्ये बंगालक महिपालक प्रगति केँ रोकितैथ परञ्च से कहाँ हमरा लोकनिक देखबा मे अवइयै। दोसर बात इहो जे मिथिला सँ महिपालक काल अभिलेखो भेटल अछि। संवतक संकेत नहि रहब सेहो एकटा दिग्भ्रमक जन्म दैत अछि। पोथीक लोखनिहार श्रीकरक आत्मज कायस्थ मिथिलाक नरंगवाली मूलक एकटा प्रमुख व्यक्ति छलाह आर अहुँ ई प्रमाणित होइछ जे अपन तीरभुक्तिक महाराजाधिराज पुण्यावलोक श्री गंगदेवक प्रसंगहि मे लिखने हेताह।
तत्कालीन राजनैतिक अवस्था केँ ध्यान मे राखि जखन हम अहि साधनक अधययन करैत छी तखन ई स्पष्ट भ जाइत अछि जे बारहम शताबदी उतरार्द्ध मे बंगाल मे पालवंशक ह्रास भरहल छल आर बंगालक सेनवंश आर मिथिलाक कर्णाट लोकनि ओहि पाल साम्राज्य पर अपन गिद्ध दृष्टि लगौने छलाह। एहेन बुझि पड़इयै जे प्रारंभ मे मिथिलाक कर्णाट आर बंगालक सेन संगहि मिलि पाल केँ परास्त कए ओतए सँ भगौलन्हि आर जखन आपसी बटबाराक प्रश्न उठल तखन दुनु मे संभवतः विवाद भेलन्हि आर सेन आर कर्णाट वंश मे झगड़ा भेल। पाल लोकनि केँ पराजित करबाक श्रेयक कारणें मिथिला का गाँगेय देव “गौड़ध्वज”क उपाधि सँ विभूषित भेलाह। तैं रामायणक पुष्पिका मे उल्लिखित ‘गांगेय देव’ मिथिलाक गंगदेव थिकाह जे मिथिला सँ बंगाल धरि अपन शासनक प्रचार केने छलाह आर बल्लालसेन मिथिलाक बढ़ैत शक्ति सँ सशंकित भए भागलपुर धरि गंगाक दक्षिण मे अपन सत्ता बढ़ा लेने छलाह।
बल्लालसेनक एकटा अभिलेख धातु सनोखर (भागलपुर) सँ प्राप्त भेल अछि जे अहिबात के सिद्ध करइयै। बल्लाल चरित मे कहल गेल अछि जे बल्लालसेन पंचगौड़ (वंग, वागड़ी, वरेन्द्र, राढ़ आर मिथिला)क शासक छलाह परञ्च हमरा बुझने पहिल चारि पर हुनक शासन छलैन्ह आर पाँचम के वो अपन बापक अमलक प्रतिष्ठाक रूप मे जोड़ने छलाह। पूर्वहिं ई देखाओल जा चुकल अछि कि मिथिला पर सेन राज्यक कोनो स्पष्ट प्रमाण नहि छल तैं आव ई निर्विवाद रूपें कहल जा सकइयै जे गंगदेवक शासन काल मे मिथिला पूर्ण रूपेण स्वतंत्र छल आर कर्णाट लोकनि अक्षुण्ण भावें अहिठाम राज्य करैत छलाह। दुनु राज्यक सीमा मिलैत जुलैत छल तैं यदा कदा टंटा भजाएब स्वाभाविके छल। लक्षमण संवत प्रचलनक साक्ष्य दकेऽ ई कहब जे मिथिला मे सेन वंशक राज्य छल से समीचीन प्रतीत नहि होइछ आर नेऽ एकरा सिद्ध करबाक हेतु कोनो ठोस प्रमाणे अछि।
गंगदेव अपन मंत्री श्रीधर दासक साहायता सँ उत्तमोतम रीति सँ अपन राज काज चलबैत रहलाह। हुनका समय मे कर्णाट शासन प्रणाली केँ दृढ़ बनाओल गेलैक। राज्य केँ परगन्ना मे विभाजित केलन्हि आर प्रत्येक परगन्ना मे मुखिया अथवा प्रधान नियुक्त भेलाह जे ‘चौधरी’ कहबैत गेलाह। न्याय प्रशासनक हेतु पंचायती व्यवस्थाक स्थापना भेल। जन कल्याण आर कृषिक उन्नतिक हेतु वो अपना राज्य मे अनेका नेक पोखरि एवं जलाशयक व्यवस्था केलन्हि। अपन राज्य केँ वो अपना शासन काल मे सुरक्षित रखबा मे समर्थ भेलाह। पश्चिम मे गहढ़वाल, पूर्व मे सेन आर दक्षिण मे पाल लोकनि सँ अपन साम्राज्यक सुरक्षा रखैत वो नेपालो पर अपन अधिकारक दावी देनहि रहलाह आर एवं प्रकारे नान्यदेव द्वारा स्थापित राज्य केँ गंगदेव आर दृढ़ बनौलन्हि जाहि सँ मिथिलाक प्रतिष्ठा चारूकात बढ़ल। गंगदेवक समय मे मिथिला मे शांति आर सुव्यवस्था बनल रहल आर कोम्हरो सँ कोनो आक्रमण नहि भेल। इएह कारण छल जे वो शासन संगठन आर प्रशासनिक सुधार दिसि अपन ध्यान देबा मे समर्थ भेलाह। नान्यदेव तँ विजय प्राप्त कैक राज्यक जन्म देलन्हि आर शांति प्रदान केलन्हि। ई एकटा अजीव संयोग थिक जे पिता पुत्र दुनु एक्के रंग कूटनीतिज्ञ, दूरदर्शी आर कुशल विजेता आर प्रशासक बहरेलाह।
बारहम शताबदीक श्रीवल्लभाचार्य (न्याय–लीलावतीक लेखक) निम्नलिखित वाक्य एकटा तत्कालीन कर्णाट शासक उल्लेख करैत छथि–
____ “ यदि च गगन मात्मा वान्य धर्मणान्यम वच्छिन्धात्
काश्मीर वर्त्तिना कुङ्कुम रागेण कर्णाट चक्रवर्त्ति (ललना)
करकमवच्छिन्धात्–”
आब ई कर्णाटचक्रवर्त्ति (ललना) के छलाह से कहब असंभव। नान्यदेव, मल्लदेव आर गंगदेव–सब भसकैत छथि। ‘ललना’ शब्द मैथिली मे छोट वच्चाक हेतु प्रयोग होइत छैक तैं हमरा बुझने अहि सँ नान्यदेवक कोनो पुत्रक संकेत होइयै, आव वो मल्लदेव हेताह अथवा गाँगदेव से कहब कठिन।
श्री वलवभाचार्य–एकटा शासन करैत राजाक नाम सेहो लिखैत छथि–“श्री शालि वाहनो नृपति”– अहु राजाक पहचान असंभव अछि=मिथिला सँ प्राप्त मैथिलीक पाण्डुलिपि सब से एहेन बहुत रास राजा सबहक नाम भेटैत अछि जकरा कोनो राजवंश सँ मिलाएब अथवा जोड़ब असंभव भजाइत अछि। मिथिलाक इतिहासक साधनो अखन धरि इएह सब रहल अछि तैं एकरा तिरस्कारो करब असंभव।
नरसिंह देव–(११८७–१२२७)– गंगदेवक परोक्ष भेला पर मिथिलाक राजगद्दी पर नरसिंह देव वैसलाह। हुनका समय मे मिथिला आर नेपालक मध्य किछु खट पट भेल छल आर एकर नतीजा ई भेल जे नेपाल मिथिला सँ फराक भगेल। रामदत्त अपन दान पद्धति मे नरसिंह देव केँ कर्णाटात्वय भूषणः- कहने छथि। रामदत्त हुनक मंत्री छलाह आर रामदत्तक अनुसार नरसिंह देव मिथिलाक अक्षुण्ण शासक छलाह। विद्यापतिक पुरूष परीक्षा सँ ज्ञात होइछ जे नरसिंह देव अपन पिती मल्लदेवक संग कन्नौज गेल छलैथ। ओतए सँ वो दिल्ली सेहो गेल छलाह आर शहाबुद्दीन गौरीक सेना मे सेनानायक काज कएने छलाह जाहि सँ गोरी हिनका सँ प्रसन्न भए हिनका मिथिला मे अक्षुण्ण करबाक हेतु छोड़ि देवाक आश्वासन देने रहथिन्ह। ई चाचिक देव चौहानक परम मित्र छलाह। कहल जाइत जे इहो एक कुशल शासक छलाह मुदा राजनैतिक दृष्टिकोण सँ हम देखैत छी जे हिनका राज्य मे नेपाल हिनका हाथ सँ बाहर भगेल आर ताधरि बाहर रहल जाधरि हरिसिंह देव पुनः ओकरा नहि जीतलैन्ह। दोसर बात इहो जे मुसल मान लोकनि पश्चिम आर पूब सँ मिथिला राज्य केँ दबबे लागल छलाह आर आक्रमण श्री गणेश सेहो हिनके समय मे प्रारंभ भगेल छल। मिथिला राज्य केँ मुसलमान लोकनि अपन आँखि मे काँट जकाँ बुझैत छलाह आर तैं वो लोकनि एम्हर–ओम्हर सँ हुलकी–बुलकी दने आरंभ कदेने छलाह। नरसिंह देव अपना भरि मिथिला राज्य केँ चारूकात सँ सुरक्षित रखबाक यथेष्ट प्रयास केलन्हि आर अहि क्रम मे हुनका बहुत किछु सफलता भेटलन्हि।
रामसिंह देव–(१२२७–१२८५)– रामसिंह देव कर्णाट वंशक एक सफल आर कुशल शासक छलाह जनिक महिमाक गुनगान तिब्बती यात्री धर्मस्वामी सेहो कएने छथि। कर्मादित्य ठाकुर रामसिंह देवक मंत्री छलथिन्ह आर कर्मादित्यक एकटा अभिलेख ल.सं.२१२क सेहो उपलब्ध अछि। हिनका समय मे समस्त उत्तर भारत मे मुसलमानी सत्ताक प्रसार भचुकल छल आर मिथिलाक चारूकात मुसलमानी आक्रमणक संभावना बढ़ि गेल छल। वैशाली मे मुसलमानी आक्रमणक स्वरूपक विवरण धर्मस्वामी उपस्थित कएने छथि। लखनौतीक हिसामुद्दिनइवाज मिथिलो सँ कर प्राप्त केने छल आर तिरहुत मे पूर्व–पश्चिम दुनु दिसि सँ आक्रमण होइत रहैत छल। रामसिंह देवक पदवी मे‘भुजबलभीम’ आर ‘भीमपराक्रम’क विशेष महत्व रखइयै। हिनक सान्धि विग्रहिक छलाह देवादित्य ठाकुर जिनका वंश मे बड्ड पैघ–पैघ विद्वान आर पराक्रमी लोक सब भेल छलाह। धनवान होयबाक कारणे वो लोकनि महलक (महथा) सेहो कहबैत छलाह।
रामसिंह देव विद्या आर धर्मक समर्थक आर प्रवर्त्तक छलाह। हुनके समय मे मिथिला मे वैदिक टीका लिखल गेलैक। ओहिकाल मे सामाजिक एवं धार्मिक नियमक प्रतिपादन भेल आर शासन विधान मे सेहो वेस सुधार भेलैक। प्रत्येक गामक हेतु कोतवालक नियुक्ति भेल। गामक प्रत्येक समाचार चौधरी कोतवाल केँ दैत छलैक आर ओहि ठाम सँ वो समाचार राजा धरि पहुँचैत छ्ल। ओहि समय मे पटवारी प्रथाक विकास भेल। रामसिंह देव पैघ विद्या प्रेमी छलाह आर हुनके समय मे श्रीधर आचार्य अमरकोश पर अपन टीका लिखलैन्ह।
रामसिंह देवक समय मे प्रसिद्ध तिब्बती यात्री धर्मस्वामी एम्हर आएल छलाह आर रामसिंह देवक संग हुनक सम्बन्ध मधुर छलैन्ह। वो आती–जाती दुनु वेर रामसिंह देवक संगे रहलो छलाह। फि समय मे मिथिला मे मुसलमान लोकनिक प्रकोप बढ़ल जाइत छल। रामसिंह राजधानी ‘प’ट’ (सिमरौनगढ़)क सुन्दर विश्लेषण धर्मस्वामी कएने छथि। ‘प’ट’ बड्ड पैघ आर उन्नत नगर छल आर चारूकात सँ दुर्ग आर खाधि सँ घेरल–वेढ़ल छल। सब तरहे एकर सुरक्षाक प्रबंध कैल गेल छल। ई नगर उत्तर मे छल। अहिठाम वो ज्वर सँ पीड़ित सेहो भेल छलाह। नेपाल सँ अहिठाम एवा मे हुनका तीन मास लागल छलैन्ह। रोग सँ मुक्त भेला पर जखन वो अपन देश जेबाक हेतुतैयार भेला पर तखन रामसिंह हुनका किछु दिन आर रहबाक हेतु आग्रह केलथिन्ह। एतवे नहि रामसिंह हुनका किछु दिन आर रहबाक हेतु आग्रह केलथिन्ह। एतबे नहि रामसिंह हुनका अपन प्रधान पुरोहितक पद पर नियुक्त करबाक आश्वासन सेहो देलथिन्ह मुदा तइयो वो एतए रहबा लेल तैयार नहि भेलाह आर घुरबाक हेतु तत्पर भगेलाह। रामसिंह हुनका बहुत रास वस्तुजात उपहार मे देलथिन्ह। धर्मस्वामीक विवरण ई स्पष्ट होइछ जे मुसलमान लोकनिक प्रभाव बड्ड बढ़ि गेल छल आर रामसिंह किलाबंदी पर विशेष बल देने छलाह। रामसिंह किलाबंदी पर विशेष बल देने छलाह। रामसिंहक अपन राजभवन सात गोट भीत आर २१ गोट खाधि सँ घेरल छल। वैशालीक निवासी लोकनि मुसलमानी आक्रमण सँ हड़कम्पित छलाह। वैशाली मे एकटा प्रसिद्ध ताराक मूर्त्ति छल।
धर्मस्वामीक मुसलमानी आक्रमण सम्बन्धी मतक समर्थन परम्परागत साहित्य एवं साधन सँ सेहो होइत अछि जाहि मे ई कहल गेल अछि जे रामसिंह केँ मुसलमान सँ लड़ए पड़ल छलैन्ह। मुसलमान लोकनि गंगाक दक्षिण मे मूंगेर, भागलपुर, पटना, आदि स्थान मे पसरि चुकल छलाह आर ओम्हर बंगालक शासक सेहो पश्चिम दिसि अपन शक्ति केँ बढ़ेबा मे लागल छलाह। ओहि दुनु मे बरोबरि संघर्ष चलैत रहैन्ह आर मिथिलाक शासक अपन ‘वेतसिवृति’क पालन कए अपन स्वतंत्रता केँ सुरक्षित रखबा मे व्यस्त छलाह। रामसिंह देव अहि हेतु कत्तेक प्रयत्नशील छलाह तकर प्रमाण तँ एतवे अछि जे वो जँ अपन राज्यक विस्तार नहि केलन्हि तँ हुनका समय मे हुनक राज्य एक्को इंच घटल नहि आर साँस्कृतिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि बनौलन्हि तकरे आधार पर बाद मे हरिसिंह देवी पंजी प्रथा ठाढ़ भेल।
शक्ति सिंह:-(शक्र सिंह)–(1285–95)– रामसिंहक पछाति शक्तिसिंह अथवा शक्रसिंह मिथिलाक राजा भेलाह। वो महा पडिंत, प्रतापी एवं पराक्रमी शासक छलाह आर दिल्लीक शासकक संग हुनक सम्बन्ध बरोबरि बनल रहलैन्ह–ई सम्बन्ध विरोध आर मित्रता दुनुक छलैन्ह। हम्मीरक विरूद्धक अभियान शक्तिसिंह अलाउद्दीन खलजीक संग रहैथ आर हुनका संग हुनक मंत्री देवादित्य आर हुनक आत्मज वीरेश्वर सेहो रहथिन्ह। अपन मंत्रीक स्वामी द्रोहक कारणे (रायमल्ल आर रामपाल) हमीर पराजित भेलाह। अलाउद्दीन देवादित्य केँ ‘मंत्रिरत्नाकर’ पदवी सँ विभूषित केलथिन्ह। शक्तिसिंहक संग खलजी सम्राटक मित्रता बनल रहल आर मिथिलाक स्वतंत्रता सेहो वचल रहल।
शक्तिसिंह अत्याचारी शासक छलाह। हुनक निरंकुश शासन केँ रोकबाक हेतु वृद्ध केँ चुनि केँ एकटा ‘वृद्ध–परिषद’क निर्माण कएने छलाह। हुनक अत्याचारी शासन सँ हुनक दरबारी आर मंत्री लोकनि कूपित भए गेल छलाह। राजाक निरंकुशताक विरोध मे सर्व प्रथम अवाज उठौलनि चण्डेश्वर ठाकुर जे अपना युगक एकटा प्रसिद्ध विद्वान आर राजनीतिज्ञ छलाह। हुनके प्रयासे राजाक निरंकुशता पर रोक लागि सकल। दरभंगाक अनंदवागक पश्चिम ‘सुखीदिग्घी’ पोखरि हिनके खुनाओल थिक आर आधुनिक सकुरीक बसौनिहार शक्तिसिंहें थिकाह। शक्तिसिंहक बाद एकटा भूपाल सिंहक नाम भेटइयै मुदा वो शासक भेलाह अथवा नहि से कहब असंभव।
हरिसिंह देव:-(१२९५–१३२४-?)– नान्य देवक पश्चात् कर्णाटवंशक सब सँ प्रसिद्ध एवं महान शासक हरिसिंह देव भेलाह जे मिथिला आर नेपालक इतिहास मे कैक दृष्टिये विख्यात छथि आर जनिक शासन काल पूर्वी भारतक इतिहास मे महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। हिनक जन्म, राज्यारोहण, मृत्यु इत्यादिक वास्तविकताक सम्बन्ध मे हमरा लोकनिक ज्ञान अपूर्ण अछि अथवा इहो कहि सकैत छी जे हिनका सम्बन्ध सबटा एतिहासिक तथ्य अद्यावधि अनिश्चितता एवं सन्दिग्धक गर्भे मे अछि। एकर मूल कारण ई अछि जे मिथिलाक अहिकालक इतिहासक अध्ययनक हेतु जे प्रामाणिक साधन चाही तकर सर्वथा अभाव अछि। तथापि जतवे जे साधन उपलब्ध अछि ताहि आधार पर हमरा लोकनि हरिसिंह देवक शासन एकटा वस्तुनिष्ठ अध्ययन प्रस्तुत करबाक प्रयास करबा नेऽ राजनीतिक इतिहासक हिसाबे आर साँस्कृतिक इतिहासक हिसाबे हरिसिंह देव केँ विसरल जा सकइयै। जँ नान्यदेव अहिवंशक संस्थापकक हिसाबे स्मरणीय छथि तँ हरिसिंह अपन नेपाल विजय एवं पंजी–प्रथाक संस्थापकक रूपें मिथिलाक इतिहासक महत्व दिसि पौवात्य–पाश्चात्य विद्वानक ध्यान आकृष्ट भेल छन्हि आर एकर प्रमाण भेल लुसिआनो पेतेकक ‘मिडिभल हिस्ट्री आफ नेपाल’ तथा भारतीय विद्या भवन द्वारा प्रकाशित “दिल्ली सल्तनत” (खण्ड 6) मे विवेचित मिथिलाक इतिहासक अंश। आव मिथिलाक इतिहासक अहिकाल केँ उपेक्षित करब कठिन अछि कारण अहि सम्बन्ध मे जे अद्यावधि एकटा भ्रांति पसरल छल से दूर भगेल अछि आर सामाजिक इतिहासक अध्ययनार्थ हरिसिंह देवक पंजी प्रथा एकटा प्रमुख विषय बनल अछि।
कहिआ, कोना आर कोन रूपें वो मिथिलाक शासन भार ग्रहण केलन्हि तकर कोनो ठोस प्रमाण हमरा लग नहि अछि मुदा हुनका सम्बन्ध मे प्रचलित किंवा व्यवहृत शब्दावली अहि बातक प्रमाण अछि जे वो शक्तिशाली शासक छलाह अपना काल धरि वो कहियो ककरो समक्ष ने अपन माथ झुकौने छलाह आर नेऽ टेकने छलाह। अपना केँ स्वाभिमानी स्वतंत्र आर निर्भीक बुझैत छलाह आर अहिबातक प्रमाण हमरावसातिनुलउन्स सँ भेटैत अछि। पुरूष परीक्षा मे विद्यापति हुनका‘कर्णाट–कुल–सम्भव’ कहने छथिन्ह; चण्डेश्वरक कृत्यरत्नाकर मे हुनका ‘कर्णाट वंशोद्भव’ कहल गेल छैन्ह। ज्योतिरीश्वर ठाकुर धूर्त समागम मे कर्णाट चूड़ामणिक संज्ञा हिनका देल गेल छन्हि।
कर्णाटवंशोद्भव शत्रुजेता हरिसिंह देव मिथिला मे अपन एकटा नव कीर्तिमान स्थापित केने छलाह। हुनक सान्धिविग्रहिक मंत्री देवादित्य ठाकुर छलथिन्ह। देवादित्य यशस्वी, बुद्धिमान एवं दानी छलाह। हुनक पश्चात् हुनक पुत्र वीरेश्वर ठाकुर मंत्री भेलाह। उहो महा दानी छलाह आर समुद्र सन गहिर पोखरि दहिभत गाम मे खुनौने छलाह। वो श्रौतकर्मानुष्ठाता ब्राह्मण लोकनि केँ उदारता पूर्वक दान देने छलाह आर गामक गाम दान मे सेहो हुनका लोकनि के देने छलाह। उहो एकटा पोखरि खुनौने छलाह जकर नाम छल ‘वीरसायर’ पड़ल। वीरेश्वर ठाकुर केँ ‘महावर्तिक नैबन्धिक’ सेहो कहल जाइत छलन्हि। वीरेश्वर ठाकुरक बाद हुनक पुत्र चण्डेश्वर ठाकुर महामत्तक सांधि विग्रहिक भेलाह। उहो प्रतापी, साहसी, उदार एवं दानी छलाह आर हरिसिंह देवक मित्र, सलाहकार एवं दार्शनिक सेहो छलाह। हरिसिंह देव हिनक समय मे व्यस्क भचुकल छलाह आर राज काज सम्हारि लेने छलाह। इहो हावी परगन्नाक सिमराम ग्राम मे एकटा पोखरि खुनौने छलाह जे “सुरवय” कहबैत अछि। नाबालिक अवस्था मे राजगद्दी पर बैसलाक कारणे हरिसिंहक देखरेख सुयोग्य मंत्रिगणक हाथ मे छल आर राजाक दिसि इएह मंत्री लोकनि सब काज करैत छलाह। हरिसिंह देव जखन जवान भेलाह तखन चण्डेश्वर ठाकुर हुनक मंत्री छलथिन्ह। ब्राह्मणक एकवंश सँ कर्णाट राजदरबार मे तीन पीढ़ी धरि बरोबरि मंत्री होइत रहलाह–ताहि सँ ई सिद्ध होइत जे अहि काल मे सामंतवादी व्यवस्थाक विकासक कारणे मंत्रीपद वंशानुगत भए चुकल छल आर राजा पर हुनका लोकनिक विशेष नियंत्रण रहैत छलैन्ह। हम उपर देखि चुकल छी जे शक्ति सिंह जखन निरकुंश बनबाक चेष्टा केलन्हि तखन इएह सामंत लोकनि हुनक ओहि चेष्टा केँ विफल कैल आर हरिसिंह देवक नावालिग रहबाक कारणे हुनका लोकनिक अधिकार मे अत्यधिक बृद्धि भेल। विद्यापतिक पुरूष परीक्षा सँ इहो ज्ञान होइछ जे हरिसिंह देव यादव राजा देवगिरिक रामदेवक समकालीन छलाह आर गोरखपुरक राज दरबार मे हुनक कला–प्रेमी होयबाक चर्च बरोबरि होइत छलैन्ह। हरिसिंह देवक नाम सँ समकालीन राजा लोकनि नीक जकाँ परिचित छलाह। हरिसिंह देवक मंत्री चण्डेश्वर अपना कालक प्रसिद्ध विद्वान छलाह आर तैं हिनक नाम सँ मिथिला राज्योक नामक प्रसार होइत छल।
हरिसिंह देवक समय मे चण्डेश्वर ठाकुर नेपाल अभियानक नेतृत्व केलन्हि। ओतए ई किरात राजा सन केँ एवं सूर्यवंशी क्षत्रिय राजा गण केँ पराजित कए सम्पूर्ण नेपाल राज्य पर मिथिलाक आधिपत्य जमौलन्हि। अहि सँ ई तँ स्पष्ट भजाइछ जे नरसिंह देवक समय मे नेपाल सँ खट–पट भेलाक बाद नेपाल अपना केँ मिथिलाक नियंत्रण सँ मुक्त क लेने छल कारण जँ से बात नहि रहैत तँ चण्डेश्वर ठाकुर केँ हरिसिंह देवक शासन काल मे पुनः नेपाल पर आक्रमण करबाक आवश्यकता कियैक भेलैन्ह। दोसर बात इहो जे हरिसिंह देवक प्रभाव जखन नेपाल पुनः स्थापित भेल तँ मिथिलाक प्रतिष्ठा सेहो बढ़ल आर अहि हिसाबे हरिसिंह देव तुगलक सँ पराजित भेलाक बाद भागि केँ नेपाले गेल छलाह। चण्डेश्वर ठाकुर वाग्मतीक नदीक तट पर स्वर्ण तुलापुरूषमहादान कयने छलाह आर उएह प्रथम व्यक्ति छला जे पशुपति नाथ धरि पहुँचल छलाह। चण्डेश्वर ठाकुर अधीन हरिब्रह्म नामक एक सामंतक चर्च प्राकृत–पैंगलम् मे भेल अछि।
हरिसिंह देवक समय मे मिथिलाक राज्य सुरक्षित रहल यद्धपि ताहि समय तक पश्चमी आर पूर्वी राज्य सँ मिथिला पर बरोबरि प्रहार भरहल छल। नेपाल धरि अपन राज्यक सीमा केँ पुनः बढ़ेबाक श्रेय हरिसिंह देव केँ छन्हि। नेहरा मे हरिसिंह देव सेहो अपन एकटा मुख्यालय रखने छलाह आर ओहिठाम एकटा गढ़ सेहो छल। ज्योतिरीश्वर ठाकुरक ‘धूर्त समागम नाटक’ सँ ज्ञात होइछ जे हरिसिंह देव केँ कोनो सुरत्राण सँ झगड़ा भेल छलैन्ह जकर परिणाम अनिर्णीत बुझना जाइत अछि। हरिसिंह देवक पादपद्म पर कतेको प्रतापी राजा अपन–अपन माथ नमवैत छलाह।
____ “ नानायोध निरूद्ध निर्जित सुरत्राणात्र सद्धाहिनी
नृत्यद्भीमकबन्ध मेलक दलद् भुमि भ्रमद् मुधरः॥
अस्ति श्री हरिसिंह देव नृपतिः कर्णाट् चूड़ामणिः
दृप्यत्पार्थिव सार्थ मौलिमुकुटन्यस्ताङघ्र पंकेरूहः”॥
उमापतिक परिजात हरण सँ सेहो ई स्पष्ट होइछ जे हरिसिंह द्व आर कोनो मुसलमान शासकक बीच संघर्ष भेल छल मुदा ज्योतिरीश्वर आर उमापतिक विवरण मे कोनो मुसलमान शासकक नाम नहि रहला सँ कठिनताक अनुभव हैव स्वाभाविके। ओहि सब सँ केवल एतवे ज्ञान होइछ जे हरिसिंह देव कें बरोबरि मुसलमान शासक लोकनि सँ टंटा होइत रहैन्ह आर ओहि सभहिक वावजूदो वो मिथिला केँ राज्य सुरक्षित रखैत अपन प्रजाक कल्याण मे लागल रहैथ। हमरा बुझि पड़इयै जे मिथिलाक राज्यक भविष्यक सम्बन्ध हुनका पूर्वाभास भगेल छलैन्ह आर तैं वो नेपाल पर पुनः अपन आधिपत्य कायम करबाक प्रयास मे लागल छलाह। मिथिला मे चारूकात सँ तंगी देखि वो अपना हेतु नेपाल राज्य केँ सुरक्षित राखए जाहि सँ किवो मुसलमानी आक्रमण सँ आक्रांत भेला पर ओतए जाए केँ रहि सकैथ। इएह कारण थिक जे हुनक मंत्री नेपाल पर पूर्ण आधिपत्य कायम केने छलाह। तुगलक आक्रमणक बाद वो भागि केँ ओम्हरे गेवो केलाह। कहल जाइत अछि जे मिथिला छोड़बाक पूर्व वो नेहरा पोखरि पर विश्वचक्र महादान यज्ञ कयने छलाह।
१३२३–२४ ई. मे मिथिला पर गयासुद्दीन तुगलकक आक्रमण भेल। कहल जाइत अछि जे बंगाल आर मिथिलाक शासकक संग एक प्रकार गुप्त समझौता छल आर दुनु अपन–अपन स्वतंत्रता केँ सुरक्षित रखबाक लेल प्रयत्नशील छलाह। गयासुद्दीन तुगलक अहि दुनु राज्य केँ अपना आँखिक काँट बुझैत छल आर तैं बंगाल पर आक्रमण केलाक बाद वो मिथिले बाटे घुरल आर अहिठाम शासक केँ अपना अधीन करबाक प्रयास केलक। फरिस्ताक अनुसार तिरहुतक राजा संघर्षक हेतु आगाँ बढ़लाह परञ्च हुनका खेहारि केँ जंगल मे ठेल देल गेलैन्ह। तुगलक राजा जंगल केँ अपने हाथ सँ कटलन्हि आर जखन जंगल साफ भेल तखन वो देखलन्हि जे तिरहुत राजाक एकटा बड़का किला अछि जे चारूकात बड़का–बड़का खाधि सँ घेरल अछि। उच्च उच्च भीति आर सातटा खाधि सँ घेरल किला देखि तुगलक शासक थोड़ेक कालक हेतु धतमतेलाह आर तत्पश्चात् सातोटा खाधि केँ भरि वो किलाक भीत आर देवाल केँ नष्ट केलन्हि। अहि सब काज मे हुनका तीन हफ्ता लगलन्हि। राजा सपरिवार गिरफ्त भेलाह आर तिरहुतक शासन भार मलिक तबलिगाक पुत्र अहमद खाँक हाथ मे देल गेल। तकर बाद तुगलक राजा दिल्ली दिसि प्रस्थान केलन्हि। वरनीक अनुसार जखन गयासुद्दीन तुगलक तिरहुत पहुँचलाह तखन सब राजा लोकनि आत्म समर्पण केँ देलन्हि।वसातिनुलउंसक अनुसार तिरहुतक राजा पड़ा केँ नेपाल चल गेलाह आर तिरहुत पर तुगलक शासन स्थापित भगेल। (विशद् विश्लेषणक हेतु देखु हमर लिखल पोथी –“हिस्ट्री आफ मुस्लिम रूल इन तिरहुत”)
चण्डेश्वर ठाकुरक दान रत्नाकर आर ज्योतिरीश्वर ठाकुरक धूर्तसमागम नाटक तथा उमापतिक परिजात हरण नाटक सँ एतवा धरि स्पष्ट होइयै जे i) हरिसिंह देव म्लेच्छ सँ आप्लावित पृथ्वी केँ मुक्त कएने छलाह आर, ii) वो कोनो सुरत्राण केँ पराजित कएने छलाह आर iii) पृथ्वी पर जे म्लेच्छ लोकनि भार स्वरूप छथि तकरा सँ वो पृथ्वी केँ हलुक केने छलाह। फरिस्ताक कथन जे हरिसिंह देव सपरिवार गिरफ्त भेलाह से मान्य नहि अछि कारण आँखिक देखल हाल लिखनिहार वसातिनुलउंस मे एकर समर्थन नहि केने छथि। ओहि मे ई स्पष्ट लिखल अछि जे राजा भागि केँ नेपाल चल गेलाह आर ओतहि बसि गेलाह। परिस्थिति सँ वाध्य भए भागि जेबाक कथा आर पहाड़ मे घुसिया जेवाक बात मैथिली परम्परा मे निम्नलिखित श्लोक मे सुरक्षित अछि।
“वाणाब्धि बाहु सम्मित शाकवर्षे
पौषस्य शुक्ल दशमी क्षितिसूनुवारे
यकत्वा स्व–पट्टन पुरी हरिसिंह देवो
दुर्दैव दिशित पथे गिरिमाविवेश”–
मिथिला सँ निराश्रित भेला पर हरिसिंह देव पड़ा केँ नेपाल गेला जतए १० वर्ष पूर्व चण्डेश्वर ठाकुर किरात आर क्षत्रिय शासक लोकनि केँ हराके मिथिलाक प्रभुत्व स्थापित कएने छलाह। हरिसिंह देव नेपाल पहुँचि सूर्यवंशी राज्यक स्थापना केलन्हि से कहल जाइत अछि। वो भात गाँव मे अपन केन्द्र बनौलन्हि। नेपाल पर मिथिलाक आक्रमणक तिथि लकए इतिहासकार मे मतभेद छन्हि। दिलीरमण रेग्मी १३१४ (चण्डेश्वर द्वारा आक्रमणक तिथि) केँ नेपाल पर आक्रमणक तिथि मनैत छथि परञ्च भगवान लाल इन्द्र जी आर राइट महोदय १३२४ ई. केँ (जखन हरिसिंह देव मिथिला सँ पड़ाय ओतए पहुँचलाह)। अहि दुनु तिथि मे कोनो संघर्षक गुंजाइश नहि अछि यदि हमरा लोकनि एकरा अहि ढ़ँगे देखी–चण्डेश्वर मिथिला राज्यक मंत्री हिसाबे नेपाल केँ जीतने छलाह आर तहिया सँ पुनः नेपाल मिथिलाक अधीन भगेल छल। हरिसिंह देव जखन ओतए पहुँचलाह तखन वो विधिवत अपना केँ ओतुका शासक घोषित केलन्हि आर भातगाँव मे अपन प्रधान कार्यालयक स्थापना केलन्हि। अहि दुनु मे विशेष साम्य अछि। १३१४ सँ १३२४ धरि वो मिथिला सँ नेपाल पर राज्य करैत छलाह मुदा १३२४ क पछाति मुख्यरूपेण नेपालक एकमात्र शासक भगेलाह। १३१४ क बादहि सँ नेपाल मे मैथिल लोकनिक आवागमन शुरू भगेलन्हि। मिथिला मे मुसलमानक प्रकोप बढ़ल आर नेपाल मे मल्ल लोकनिक मुदा हरिसिंह देव बड्ड चतुर व्यक्ति छलाह आर वो ओतुक्का मल्ल लोकनिक संग वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित क लेलन्हि।
नेपालक वंशावली आर शिलालेख अहिबातक सबूत अति जे हरिसिंह देव नेपाल मे जाकए नीक जकाँ जमि गेल छलाह आर हुनक प्रभुत्व ओहिठाम नीक जकाँ स्वीकृत भगेल छलैन्ह। काठमाण्डुक एकटा शिलालेख मे हरिसिंह देव केँ कर्णाट वंशोद्भव आरकर्णाट चूड़ामणि कहल गेल छन्हि।-
__ “जातः श्री हरिसिंह देव नृपतिः प्रोढ़ प्रतापोदयः
तद्वंशे विमले महारिपुहरे गाम्भीर्य रत्नाकरः
कर्त्तायः सरसामूपेत्य मिथिलां संलक्ष्य लक्षप्रियो
नेपाले पुनराधाइभव युते स्थैर्यः चिरम्विद्यते”।
हरिसिंह देवक उत्तराधिकारी केँ चीनी सम्राट नेपालक कानूनी शासक मानैत रहथिन्ह।
कर्णाट वंशक पतन:- हरिसिंह देवक बाद मिथिला मे कर्णाट वंशक पतन भगेल। बहुत रास साहित्यिक साधनक अध्ययन केला संता एवं पाण्डुलिपिक पुष्पिका सब केँ देखला सँ ई प्रतीत होइछ जे हरिसिंह देवक नेपाल पड़ैला उत्तरो मिथिला मे वचल कर्णाट लोकनि मिथिलाक स्वतंत्रताक हेतु संघर्ष करैत रहलाह आर मुसलमान लोकनिक पैर केँ नहि जमे देल गेल। कर्णाट वंशक अंतो भेला पर मिथिलाक किछु क्षेत्र सब मे कर्णाट शासन विद्यमान छल आर एकर प्रमाण भेटैत अछि। श्रीवल्लभाचार्य कर्णाट राजवंशक उल्लेख कएने छथि। वो अपन सम्बन्ध मे सब सँ महत्वपूर्ण अछि। मधुसूदन ठाकुरक ‘कण्टकोद्धार’ पुस्तकक पुष्पिका। मधुसुदन ठाकुर कर्णाट चक्रवती महाराजाधिराज रामराजक अधीन रहि केँ लिखने छलाह। पुष्पिका मे लिखल अछि–“इति महाराजाधिराज कर्णाट चक्रवति भुजबल भीम समस्त दिग्विजयार्जित समस्त संतोष निखिल भूमण्डल श्री रामराज कारितायां महामहो पाध्याय समृपकुर श्री मधुसुदन कृता वनुमान लोक कण्टकोद्धारः सम्पूर्ण मिति। लं.सं.५२९ फाल्गुन शुक्लाष्टम्याँ मध्ययन शालिना श्री भवदेव शर्मणा भौरग्रामेऽपूरीय मिति”। अहि सँ स्पष्ट होइछ जे कर्णाटवंशक किछु लोकनि हरिसिंह देवक वादो मिथिला मे शासन करैत रहलाह भनेऽ हुनक क्षेत्र सीमित आर छोट रहल हो। ओइनवार वंशक बादो वो लोकनि मिथिलाक विभिन्न क्षेत्र मे शासन करिते रहि गेला। ओइनवार वंशक समाप्त भेलो पर जे अराजकताक स्थिति उत्पन्न भेल छल ताहु सँ लाभ उठाकय कर्णाट रामराज अपन प्रभाव क्षेत्रक विस्तार केने होथि से संभव। सकरपुरा ड्योढ़ी (राजपुतक जमीन्दारी) सेहो नान्यदेवक वंशजक अंग छथि आर मिथिलाक राजपुत लोकनि सेहो नान्यदेवक वंशजक अंग छथि आर मिथिलाक राजपुत लोकनि सेहो कर्णाट कुल सँ अपन सम्बन्ध जोड़बा मे गौरवांवित बुझैत छथि।
मुसलमानी आक्रमणक चलते मिथिला मे कर्णाट वंशक अंत भेल। हरिसिंह देवक बाद केओ योग्य शासक नहि रहि गेलाह जे अहिठाम कर्णाटवंश केँ दृढ़ करितैथ आर ओम्हर तुगलक लोकनि जखन अहिठामक शासन भार अपना हाथ मे लेलन्हि आर देखलन्हि जे चलाएब असंभव अछि तखन वो लोकनि एहेन व्यक्तिक खोज करए लगलाह जिनका पर हुनका विश्वास हटि चुकल छलैन्ह तैं वो लोकनि सुगौनाक राजपंडित कामेश्वरक वंशज केँ अपन प्रतिनिधि चुनलैन्ह आर मिथिलाक शासन वागडोर हुनके लोकनिक हाथ मे देलन्हि। फिरोजशाह शाह तुगलक भोगीश्वर केँ प्रियसरवा कहि केँ संबोधित कयने छथि। १०९७ सँ १३२५ धति कर्णाट लोकनि मिथिला पर शासन कए एकटा अमिट छाप छोड़ने छथि जाहि सँ मिथिलाक निजी व्यक्तित्व विकास भेल आर मैथिली संस्कृतिक पृष्ट पोषण सेहो। परञ्च ऐतिहासिक नियमक अनुसार सामंतवादी व्यवस्थाक गुण–दोषक चलते जेना सब राज्यक पराभव भेल छैक तहिना मिथिलाक कर्णाट राज्य अपन अवधिक पूर्ण कए लुप्तप्राय भेल आर मिथिला मे मुसलमानी शक्तिक प्रादुर्भावक संगहि ओइनवारक स्थापना कर्णाट वंशक अवशेष पर भेल।
परिशिष्ट

चण्डेशवर ठाकुरक कृत्य रत्नाकरक किछु आवश्यक श्लोक–
_ अस्ति श्री हरिसिंह देव नृपतिर्निः शेष विद्वोषिणां
निर्माथी मिथिलां प्रशासदखिलाँ कर्णाटवंशोद्भवः।
आशाः सिञ्चति यो यशोभिरमलैः पीयूष धारा द्रवैर्देवः
सारद शर्वरी पति रिवाशेष प्रिवंभावुकः॥
आस्मिन्दिग्विज योद्यते बलभरा त्कुब्जी भवद्भिः फणै
रन्योन्यं निविङं मिलद्भिरभितः शेषः सहस्रेणसः
गच्छत्यम्बुजबान्धवे दिन पतौ प्रत्यक् पयोधेरधः
सधः सङ्कुचदब्जकोरक वपुः सादृश्यमालम्बते॥
मा माखेदं भजध्वं जलधिमुपगतेबान्ध्वे पंकजाना
मंतः पञ्चेपुरोष व्यसन भयजुषाश्चक्र वाकावराकाः।
श्रीमत्कर्णाट भूमीपति मुकुट मणिः प्रीणयन्नध लोका–
नेष प्रौढ़ प्रतापद्युमणिरूदयिनी संपदं संतनोति॥
एतस्याद्भुत संधि विग्रह धुरां वोढ़ा पाविवीकृत–
क्ष्मालोका शरदिन्दु सुन्दर यशः संदोदृगंगाम्बुभिः॥
आसीन्मंत्र मयधुति प्रतिहता मित्रान्धकारोदयो
देवादित्य इतिप्रसन्नहृदयो देवद्रुमोजङ्गुमः॥ -

यः संधि विग्रह विधौ विवि धातुभावः
शौर्योदयेन मिथिलाधिपराज्यभारम्।
निर्मत्सरं सुनयसाञ्चित कोषजातम्
सप्तांग रूंघटन सम्मृत मेव चक्रे॥
प्रज्ञावताँ सदसि संसरि वाक्पटूनां
राज्ञांसभासु परिषत्स्वपि मंत्र भाजाम्।
चितऽर्विनाञ्च कविताश्व पिसत्कवीनां
वीरेश्वरः स्फुरति विश्व विलासि कीर्तिः
श्रीमान मुष्यतनयो नवचन्द्र चारू
राचारवन्धविग्रह धुरौण पदालम्ब–
श्चण्डेश्वरो विजयते सचितावतंसः।

उन्मूल्याद्रि नितम्बमम्बर मणिं कृत्वापताकाऽऽवृतं,
सेनोद्धू तरजोभरेरेनिनभृतं भित्वा महाकर्डमम्।
दुर्गसत्पथ मातनोद् दृढ़मथो निर्मायदुर्गसमंतादयम्–
र्नेपाल क्षितिपालवर्गमनयद् दुर्ग समंतादयम्।
आलीनं गिरिकन्दरासु विपनेलंतर्हितं निर्झरे,
गंभीरे चिरंमग्नमद्रि शिखर प्राग् भारमाप्य स्थितम्॥
नेपाले विजिते बलेन सुतरां भीता त्मेभिर्भमियै–,
र्विस्मृत्यधुमणेः कुले भगवतः स्वंजन्मतत्ततकृतम्॥

एषमैथिल मही भुजा भुज द्वन्द वारित समस्त वैरिणा
श्री विद्याविनि कुलक्रमागते संधिविग्रह पदेनियोजितेः॥

गणेश्वर ठाकुरक सुगति सोपानक आरंभक श्लोक–
__अभू द्देवादित्यः सचिव तिलको मैथिल पते–
र्निज प्रज्ञा ज्योतिर्द्धलित रिपु चक्रान्ध तमसः।,
समंताद श्रांतोल्लसित सुहृद केपिल ममौ
समुद भुते यास्मिन द्विज कुल सरोजैर्विकसितम्।
अस्मान्महादान तड़ागयाग भूदान देवा लय पूत विश्वः।
वीरेश्वरोऽजायत मंत्रिराजः क्ष्मापालचूड़ामणि चुम्बितांङ्घ्रः।
लसन्मही पाल किरीट रत्न रोचि छ्रय राज्जतपाद पद्मः।
अस्यानुजन्मा गुणगौरवेण गणेश्वरो मंत्रिमणिश्चकास्ति।
संशोष यन्ननिश मौर्व (मैर्ष) निभ प्रतापै–
र्गौड़ावनी परिवृढ़ं सुरतान सिन्धुम्
धर्मा वलम्बनकरः करूणार्दचेता–
यस्तीर भुक्ति मतुलामतुलः प्रशास्ति॥
श्रीमानेषु महामत्तक महाराजा धिराजोमहा–
सामंतधि पतिर्विक स्वर यशः पुष्पस्यकल्पद्रुमः।
चक्रे मैथिलनाथ भूमि पतिभिः सप्तांग राज्यास्थिति–
प्रौढ़ानेक वंशव्वेदैहक हृदयो दोः स्तम्भ सम्भावितः॥

वेदस्मृति पुराणादि दृष्ट्वा लोकहितैषिणा
कृतं सुगति सोपानं श्रीगणेश्वर मंत्रिणा॥

गणेश्वरक पुत्र रामदत्त–
_संधि विग्रह मंत्रीन्द्र देवादित्य ननुद्भवः।
भूमिपाल शिरिरत्न रज्जिताङघ्रस रोरूह।
सान्धि विग्रहिकः श्रीमद्वीरेश्वर सहोदरः
महामत्तकः श्रीमान विराजति गणेश्वरः।
श्रीमता रामदत्तेन मंत्रिणा तस्य सुनुना।
पद्दतिः क्रयते रम्या धर्म्या वाज सेनयियाम्॥

उपर्युक्त श्लोक सब सँ कर्णाट कालीन मिथिलाक इतिहासक विविधयक्ष पर यथेष्ट प्रकाश पड़इयै तैं अहिठाम ओहिसब केँ परिशिष्टक रूप मे जोड़ि देल अछि। तिथि आर तथ्यक सम्बन्ध अद्यपर्यंत विवाद बनले अछि तैं ओहि सम्बन्ध मे कोनो निर्नय देव असंभव। (विशेष विवरणक हेतु हमर निबन्ध– ‘द कर्णाट्ज आफ मिथिला’)













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अध्याय–८
ओइनवार वंशक इतिहास
(२०९–२४३)
कर्णाट वंशक परोक्ष भेला पर मिथिला मे ओइनवार वंशक राज्य प्रारंभ भेल। ओइनवार वंश केँ ‘कामेश्वर वंश’ तथा ‘सुगौना वंश’ सेहो कहल गेल छैक। ‘कामेश्वर वंश’अहि कारणे कि राज पंडित कामेश्वर अहि वंशक संस्थापक छलाह और ‘सुगौना वंश’अहि कारणे कि सुगौना मे अहि वंशक राजधानी छल। ओइनवार लोकनि ‘खौआड़े जगत्पुर’ मूलक काश्यप गोत्र मैथिल ब्राह्मण रहैथ। हिनक पूर्वज मे जयपति, हुनक पुत्र हिङ्गु आर हुनक पुत्र ओएन ठाकुर छलाह। वो अत्यंत विद्वान आर परम तपस्वी छलाह आअ हुनके कोनो कर्णाट राजा सँ ‘ओइनि’ गाम दान मे भेटल छलैन्ह। अहि कारणे अहि वंशक नाम ओइनवार वंश पड़ल। ओएन ठाकुरक पुत्र भेला अतिरूप, अतिरूपक पुत्र विश्वरूप, हुनक पुत्र गोविन्द, हुनक पुत्र लक्ष्मण आर लक्ष्मण ठाकुरक छटा पुत्र छलथिन्ह–यथा
i) राज पण्डित कामेश्वर, ठाम–ठाम एकटा सातम पुत्रक उल्लेख अवइयै जकर नाम रामेश्वर छल। अहि छः मे सँ एक गोटएक वंश अहुखन मालदह जिला मे विराजमान छथि।
ii) हर्षण,
iii) त्रिपुरे,
iv) तेवाड़ी,
v) सलखन,
vi) गौड़
एहेन बुझनाजाइत अछि जे कर्णाट शासक हरिसिंह देवक पड़ैलाक बाद मिथिला मे कर्णाट लोकनिक सत्ताक ह्रास भेल आर शासनक उलट–फेर बरोबरि होइत रहल। गयासुद्दीन तुगलक शासनक हेतु अपन प्रबन्ध केलन्हि आर हुनक पुत्र मुहम्मद तुगलकक समय मे मिथिला तुगलक साम्राज्यक एकटा प्रांत बनि चुकल आर एकरा तुगलक पुर अथवा तिरहूत सेहो कहल जाइत छलैक। १३२३–२४ सँ करीब ३० वर्ष धरि एक प्रकारक अव्यवस्था बनल रहलैक। कर्णाट लोकनि अपन सत्ता केँ पुनः स्थापित करबाक हेतु प्रयत्नशील एवं संघर्षशील बनल रहलाह मुदा हुनका लोकनि केँ कोनो सफलता हाथ नहि लगलन्हि आर छिट–पुट भए एम्हर–ओम्हर मे विखैर गेलाह आर यत्र तत्र अपन क्षेत्र बना केँ रहए लगलाह। ओम्हर दिल्ली सँ तिरहूतक शासन करब कोनो आसान काज नहि छल कारण पूव सँ बंगालक गिद्ध दृष्टि सेहो मिथिला पर लगले रहैत छलैक आर जहाँ दिल्लीक दिसि सँ कनिओ ढ़िलाई भेलैक कि बंगाल बाला सब घर मिथिला पर चढ़ि वैसैत छल। ई एकटा एहेन कटु सत्य छल जकरा दिल्ली नकारि नहि सकैत छल। दिल्लीक हक मे मिथिलाक दिल्लीक अंग बनल रहब सामरिक दृष्टियें महत्वपूर्ण छलैक कारण तखन दिल्ली मिथिला केँ अड्डा बनाए बंगालक हक मे मिथिला केँ बंगालक पक्ष मे रहब उचित बुझना जाइत छलैक आर तैं बंगाल आर दिल्ली तथा पश्चिमक आन राज्य अहि दृष्टियें मिथिला केँ देखैत छल। मिथिलाक शासक लोकनि अहि अवसर सँ लाभ उठाय अपन स्वतंत्रताक सुरक्षार्थ ताक मे रहैथ छलाह परञ्च ओइनवार वंश मे कर्णाट शासक नान्यदेव अथवा हरिसिंह देव सन केओ योग्य आर कुशल शासक नहि भेला तैं अहि मौकाक लाभ उठेबा मे असमर्थ रहलाह। शिवसिंह सब सँ योग्य, कर्मठ, एवं स्वतंत्र प्रेमी व्यक्ति छलाह आर तँ मिथिलाक स्वतंत्रताक रक्षार्थ अपन प्राणक बाजी लगौलन्हि। ओइनवार वंश मे शिवसिंह आर भैरवसिंहक नाम चिर स्मरणीय रहल कारण वो दुनु गोटए अपना–अपना ढ़ँगे मिथिलाक स्वतंत्रताक रक्षार्थ किछु उठानहि रखने छलाह।
१३२४ आर १३५५क मध्य मिथिलाक श्रृंखलावद्ध इतिहासक अभाव अछि। तुगलक काल मे मिथिला दिल्लीक प्रांत छल आर एकर उल्लेख हम पूर्वहिं कचुकल छी। बंगाल केँ ई बात पसिन्न नहि छलैक आर बंगालक शासक हाजी इलियास शाह सेहो एकटा महत्वाकाँक्षी शासक छल। तिरहूत पर आक्रमण करबाक ओकर मूल उद्देश्य ई छलैक जे ओहि बाटे वो नेपाल पर आक्रमण कए हाजीपुर धरि पहुँचि गेल आर हाजीपुरक स्थापना अपना नाम पर केलक जकर प्रमाण नेपाल सँ प्राप्त एकटा शिलालेख अछि। तुगलक लोकनि केँ ई बात सहाय्य नहि भेलैन्ह आर फिरोज तुगलक तुरंत एकर बदला लेबाक हेतु मिथिला बाटे बंगाल पर आक्रमणक योजना बनौलन्हि। बरनीक विवरण सँ स्पष्ट अछि जे फिरोज गोरखपुर, खरोसा आर तिरहूतक बाटे बंगाल दिसि गेल छलाह आर संभवतः राजविराज लग कोशी नदी केँ टपने छलाह। मधुबनी जिला मे अखनो एकटा पिरूजगढ़ नामक स्थान अछि जे फिरोज तुगलकक बाटक संकेत दइयै। १३५५क आसपास ई घटना घटल छल। फिरोज शाह सब स्थिति केँ देखि अहि निर्णय पर पहुँचल हेताह जे मिथिलाक आंतिरिक स्वतंत्रता केँ सुरक्षित राखिये केँ वो मिथिला केँ दिल्लीक मित्र बना केँ राखि सकैत छथि। अहि तथ्य केँ स्वीकार कए वो एकटा दूरदर्शिता आर कूटनीतिज्ञाताक परिचय देलन्हि। मिथिलाक स्वतंत्रताक स्वीकृति दए वो ओइनवार लोकनिक अधीन मिथिलाक शासन भार छोड़लन्हि आर ओहि क्रम वो ओइनवार वंशीय ‘भोगिसराय’ केँ अपन प्रियसखा कहि केँ संबोधित केलन्हि। मिथिला पुनः स्वतंत्र रूपें अपन शासन प्रारंभ केलक परञ्च ताहि दिनक समय एहेन छल कि चारूकात दिन राति खट–पट होइते रहैत छल। मैथिली परम्पराक अनुसार फिरोज तुगलक राज पण्डित कामेश्वर केँ मिथिलाक राज्य देने छलाह आर हुनक पुत्र भोगीश्वर केँ ‘प्रियसखा’ कहि सम्मान केलन्हि। राजपण्डित कामेश्वर ‘ठाकुर’ ठाकुर कहबैत छलाह तैं किछु गोटए अहिवंश केँ ‘ठाकुर वंश’ सेहो कहैत छथि। वर्धमानक गंगकृत्य विवेक मे कहल गेल अछि “कामेशो मिथिला मासत”।कामेश्वर स्वयं सिद्धपुरूष एवं योगी होयबाक कारणे मिथिलाक राज्य गछवा लेल तैयार नहि छलाह तथापि भोगीश्वरक आग्रह वो गछलन्हि आर किछु दिन शासन केलन्हि। कामेश्वर केँ ‘राय आर ‘राजपण्डित’ दुनु कहल गेल छन्हि। कामेश्वरक बाद भोगीश्वर राजा भेलाह। हुनको ‘राय’ कहल जाइत छलैन्ह आर कीर्तिलता सँ ज्ञात होइछ जे वो फिरोज शाहक परम मित्र छलाह। भोगीश्वरक बाद गणेश्वर शासक भेलाह। हुनक समय मे ओइनवार वंश मे बटवारा हेतु संघर्ष भेल जाहि मे लोग दू दल मे बटि गेलाह–एक दल भोगीश्वरक छोट भाई भवासिंहक समर्थक छल आर दोसर दल गणेश्वर। जे भेल हो मुदा हम देखैत छी जे गणेश्वर राजा भेलाह। भवेशक पुत्र द्वय कुमर हरसिंह आर कुमर त्रिपुर सिंह केँ ई बात अप्रिय बुझि पड़लैन्ह आर वो लोकनि अरजुन राय आर कुमार रत्नाकरक मदति सँ गणेश्वरक वध केलन्हि। तत्पश्चात भवेश राजा भेलाह। भवेशक दरबारे मे चण्डेश्वर ठाकुर अपन ‘रत्नाकर’– विशेष कए राजनीति रत्नाकरक रचना केने छलाह।
विद्यापतिक कीर्तिलता मे अहि घटनाक विवरण दोसरा ढ़ंगे अछि। विद्यापतिक अनुसार गणेश्वरक हत्या अर्सलान नामक एक मुसलमानक हाथें भेल छल जे मिथिलाक तत्कालीन अराजक स्थिति सँ लाभ उठा केँ मिथिलाक राज्य केँ हथिया लेने छल। मैथिली परम्परा मे सेहो अहि प्रश्न पर मतैक्य नहि अछि मुदा सब साधनक वैज्ञानिक अध्ययन केला संता ई स्पष्ट होइछ जे मिथिला मे ताहि दिन मे गद्दीक हेतु गृहयुद्धक स्थिति विराजमान छल। गणेश्वरक दुनु पुत्र कीर्तिसिंह आर वीरसिंह बालिग भेला पर अपन पितामह भ्राता भवसिंह सँ राज्यक हेतु प्रार्थना केलन्हि परञ्च से नहि भेटलन्हि। अपन पिताक हत्याक प्रतिशोध लेबाक हेतु ई दुनु भाई जौनपुर राजा इब्राहिम शाहक ओतए साहाय्यक हेतु पहुँचलाह। महामहोपाध्याय परमेश्वर झा लिखैत छथि जे कीर्तिसिंह वीरसिंह फिरोज शाहक ओतए नालिस कएल आर फिरोज शाह मिथिला पर चढ़ाइ कए हरसिंह त्रिपुर सिंह केँ मारि राज्य कीर्तिसिंह केँ फिरौलन्हि। मुदा विद्यापतिक कीर्तिलता सँ अहि बातक समर्थन नहि होइछ।
बायक वैरि केँ कीर्तिसिंह सधौलन्हि से बात ठीक अछि मुदा अहि हेतु फिरोजशाह मिथिला पर आक्रमण केने छलाह तकर कोनो प्रमाण नहि आछि। अहि गृहयुद्धक क्रम मे दुनु पक्ष तत्कालीन मुसलमानी प्रतिनिधि सँ साहाय्यक अपेक्षा रखने होथि तँ कोनो आश्चर्यक बात नहि आर अहिक्रम मे गणेश्वर केँ अपने सँ नहि मारि कोनो मुसलमानक हाथे मरबौने होथि सेहो संभव कारण जखन लोक ज्ञान आर तर्क केँ स्वार्थ वश तिलांजलि दैत अछि तखन वो कोनो प्रकारक काज (नैतिक–अनैतिक)क वैसइयै। भैय्यारी मे जखन अहि प्रकारक झगड़ा होइत तखन तँ दुश्मन लाभ उठवे करइयै। विद्यापति ओइनवार वंश सँ एत्तेक घनिष्ट छलाह कि वो अहि घिनौना बात केँ दावि देलैन्ह आर एकर कतहु चर्चौ धरि नहि केलन्हि आर गणेश्वरक हत्याक उत्तरदायित्व अर्सलान पर देलन्हि। मुदा विद्यापतिक विवरण सँ एतवा धरि नहि केलन्हि आर गणेश्वरक हत्याक उत्तरदायित्व अर्सलान पर देलन्हि। मुदा विद्यापतिक विवरण सँ एतवा धरि तैं स्पष्ट अछिये जेनाहि दिन मे मिथिला मे चारूकात अराजकता पसरल छल आर केओ ककरो कहब मे नहि छल। ‘अर्सलान’ अर्थ होइछ ‘वीर’ ‘बहादुर’, ‘जमामर्द’ इत्यादि। वीर अफगान नामक पदाधिकारी ताहि दिन तिरहूत मे छल आर इहो संभव अछि जे गृहयुद्धक स्थिति केँ देखि वो एक पक्षक भगेल हुए आर स्वयं मिथिलाक राज्य हथिया लेने हुए। गणेश्वरक मृत्युक कारण अखनो धरि मिथिलाक इतिहास मे एकटा समस्या मूलक प्रश्न बनल अछि आर विद्यापति ओकरा झँपबाक हेतु सब प्रयास कएने छथि कारण गणेश्वरक पुत्रक प्रति विद्यापति सहानुभूति रखैत छलाह आर हुनक अधिकारक स्थापनाक हेतु हुनका लकए जौनपुर सेहो गेल छलाह। वो कीर्तिसिंह केँ ‘पुरूष श्रेष्ठ’ क कोटि मे रखने छथि आर मैथिल कवि दामोदर मिश्र अपन छन्द ग्रंथ “वाणी भूषण” मे सेहो कीर्ति सिंहक सम्बन्ध मे निम्नालिखित उद्गम प्रगट केने छथि।
___ “कीर्ति सिंह नृपजीव यावद मृत धुति–तरणी”
___ “त्वयि चलति चलति वसुधा वसुधा धिप कीर्तिसिंह धरणी रमणे”।
कीर्तिलता मध्यक विवरण एतवा धरि अवश्य स्पष्ट कदैत अछि जे तत्कालीन स्थिति गंभीर छल आर जौनपुरक शासक मिथिलाक राजकुमारक सहायता केने छ्लथिन्ह। उपेन्द्र ठाकुरक मत छैन्ह जे गणेश्वरक समय मे मिथिलाक बटबारा भगेल छल आर ओइनवार वंश दू भाग मे बटि केँ शासन करैत छल। भवसिंहक शासक हैव तैं चण्डेश्वरक राजनीति रत्नाकर सँ प्रमानित अछि। परञ्च गणेश्वरक पुत्र स्थिति कि छल से कहब असंभव। उपेन्द्र ठाकुर मिथिला केँ जौनपुरक सामंत राज्य हौयबाक बात कहने छथि मुदा एकर कोनो प्रमाण वो नहि देने छथि आर कीर्ति सिंहक सम्बन्ध मे जे तिथि देल गेल अछि सेहो गलती अछि। भवेशक दुर्दशा केँ समस्त मिथिला केँ एक रखबाक यथेष्ट प्रयास केने छलाह। कन्दाहा अभिलेख मे हुनका ‘पृथ्वी पति द्विजवरो’ भवसिंह कहल गेल छन्हि आर विद्यापति अपन शैव सर्वस्वसार मे हुनक वैभवक वर्णन करैत लिखैत छथि–
___ “गंगोहुंग तरंगिता मललसत् कीर्तिच्छटाक्षालित
क्षोणिक्ष्मातल सर्वपर्वत वरो वीरट्रतालंकृत. . .“
भवसिंह एतेक प्रतापी शासक छलाह जे छोट–छोट सामंत शासक हुनका डरे थर–थर कंपैत छल। वो सब सतत अपन माथ हिनका पैर टेकने रहैत छल। भवसिंह प्रतापी राजा छलाह आर दानी सेहो। वाग्मतीक तट पर वो अपन पार्थिव शरीर केँ त्यागलन्हि आर ओहिठाम हुनक दुनु पत्नी सेहो सती भेलथिन्ह। भवसिंहक बाद देवसिंह राजा भेलाह। परमेश्वर झाक अनुसार ओइनि मे कीर्ति सिंहक राज्य भेने राति दिन खट पट होइतैन्ह तैं महाराज भवसिंह अपन अंतिम समय मे ओहि स्थान केँ त्यागि दरभंगा सँ दक्षिन वाग्मती तट पर अपन स्कन्धावार बनौने छलाह। देवसिंह जखन राजा भेलाह देकुली मे अपन राजधानी बनौलन्हि जाहिठाम अखनो स्मार्त निबन्धकर्ता धर्माधिकारी अभिनव वर्धमान उपाध्यायक स्थापित“वर्धमानेश्वर” नामक महादेवक मंदिर अछि। देवसिंहक विरूद्ध ‘गरूड़नारायण‘छलैन्ह। हुनक पत्नीक नाम छलिन्ह हासिनी देवी। पुरूष परीक्षा आर शैवसर्व स्वासारक अनुसार देवसिंह एक कुशल प्रशासक आर सफल विजेता छलाह। मिथिलाक एक उदारशासकक रूप मे वो सेहो प्रसिद्ध छथि कारण वो ‘तुला पुरूषदान’ सेहो करौने छलाह। कृषि आर जनकल्याणक हेतु वो अपना राज्य मे बड्ड पैघ–पैघ पोखरि सेहो खुनौने छलाह। एक पोखरिक नाम देवसागर छल आर ओहि सँ सटल वस्तीक नाम सगरपुर छल। वो विद्या आर संस्कृतिक समर्थक सेहो छलाह आर विद्यापतिक अनुसार वो “वीरेषु मान्याः सुधियाँ वरेण्योः” छलाह। हुनके कहला पर विद्यापति “भूपरिक्रमा” लिखने छलाह जाहि मे नैमिष्य जंगल सँ मिथिला धरिक बलदेवक यात्रा विवरणक उल्लेख अछि। संगहि अहि मे नीतिपरक कथा सेहो कहल गेल अछि। देवसिंहक अनुअमति सँ श्रीदत्त एकाग्निदान पद्धतिक रचना केलन्हि। हुनके समय मे मुरारिक पितामह हरिहर प्रधान न्यायाधीश छलाह। हिनके दरबार मे स्मृति तत्वामृतक रचयिता अभिनव वर्द्धमान रहैत छलाह आर वो धर्माधिकारी सेहो छलाह।
देवसिंहक समय मे आवि केँ मिथिलाक दुर्व्यवस्था मे थोड़–बहुत सुधार भेल आर आव वो लोकनि अहि बात केँ बुझए लगलाह जे जाधरि ओइनवार वंश पुनः एकजूट भए प्रयत्नशील नहि रहत ताधरि मिथिलाक दुर्व्यवस्था बनले रहतैक। देवसिंह अहि दिशा मे विशेष प्रयास केने छलाह आर अपना चारूकातक क्षेत्र पर अपन प्रभाव केँ दृढ़ करबा मे किछु उठा नहि रखने छलाह। कीर्तिसिंहक ओहिठाम सँ देवसिंहक दरबार मे विद्यापतिक आएब एकटा विचारणीय विषय अछि। विद्यापति ओइनवार कुलक सब किछु छलाह आर ओइनवारक नेतृत्व मे मिथिलाक स्वतंत्रता केँ सुरक्षित देखए चाहैत छलाह। तैं जखन देवसिंहक प्रयास सँ विद्यापति केँ ई विश्वास भेलैन्ह जे ई समस्त मिथिलाक एकता एवं स्वतंत्रताक हेतु प्रयत्नशील छथि तखन वो कीर्तिसिंहक संग छोड़ि देवसिंहक ओतए एतए आर तहिया सँ यावज्जीवन हुनके वंशजक संग रहलाह। जे विद्यापति गणेश्वरक हत्याक वाद कीर्तिसिंहक हकक हेतु सब किछु केने रहैथ सैह विद्यापति जखन देखलन्हि जे कीर्तिसिंहक नेतृत्व मे मिथिलाक एकता संभव नहि वांचत तखन वो अपन निर्णय बदलि देलन्हि आर देवसिंहक प्रयास मे सहयोग देलन्हि आर देवसिंहक प्रयास मे सहयोग देलन्हि। ‘घर फुटे गँवार लूटे’क कहावत मिथिला मे चरितार्थ भचुकल छल आर एकर कि परिणाम होइछ से विद्यापति देखि चुकल छलाह तैं वो देवसिंहक वंशजक संग अपन मृत्यु धरि वो मिथिलाक एकता एवं स्वतंत्रताक हेतु तल्लीन रहलाह आर स्वयं युद्ध एवं शांति मे एक रंग बहादुर जकाँ ठाढ़ रहलाह। देवसिंहक ज्येष्ठ पुत्र शिवसिंह विद्यापतिक अभिन्न छलथिन्ह आर शिवसिंह मिथिलाक इतिहास पर जे अमिट छाप छोड़ने छथि तकरा विद्यापति अपन लेखनी आर अमर बना देने छलथिन्ह।
शिवसिंह:- ओइनवार वंशक सर्वश्रेष्ठ, सर्वप्रसिद्ध आर एतिहासिक दृष्टिकोण सँ सब सँ महत्वपूर्ण शासक छलाह शिवसिंह। हिनक विरूद्ध छलन्हि रूपनारायण। ई दुनु भाई छलाह अपने आर पदमसिंह। बाल्य कालहि सँ ई राजदरबार मे रहैत छलाह आर बालिग भेला पर अपन पिताक सबटा राज्यक कार्य करैत छलाह। ई बड्ड तीक्ष्ण बुद्धिक लोक छलाह आर राजनीति मे सर्वथा निपुण सेहो। योग्य राजकुमार बनेबाक विचारे हिनक पिता देवसिंह हिनका विद्यापतिक संग लगौने रहथिन्ह आर नीति मे निपुणता प्राप्त करेबाक हेतु विद्यापति शिवसिंहक आदेशानुसार ‘पुरूष परीक्षा’क रचना केने छलाह। विद्यापतिक गीत मे १२९ पद मे (११२+१७) शिवसिंहक नाम अछि।
१५ वर्षक अवस्थहिं सँ ई राज्यक प्रशासन मे हाथ बटबैत छलाह। जखन वो राजा भेलाह तखन वो देकुली (देवकुली) सँ अपन राजधानी हटा केँ गजरथपुर अनलन्हि। ओकरा शिवसिंहपुर सेहो कहल जाइत छैक। अहिठाम गजरथपुर सँ शिवसिंह विद्यापति केँ दान देने छ्लथिन्ह। राज्य प्रशासन मे हाथ बटेबा काल हुनका अपन परम मित्र एवं अभिन्न विद्यापति सँ सेहो सहयोग भेटैत रहैन्ह। शिवसिंह परम विद्वान, उदार, सुन्दर, तथा प्रतापी छलाह। हुनक खुनाओल पोखरि वारि भड़ौरा मे रजोखरि नाम सँ प्रसिद्ध अछि आर हुनक बनाओल सड़क सब रजबान्ह (राजबन्ध) शिवसिंहपुर सँ राजवाड़ा घोड़ दौड़ धरि हुनक गजरथक सड़क अत्यंत सुदृढ़ आर चाकर अछि। पोखरि आर सड़क वो प्रजाक कल्याणार्थ बनौने छलाह। एहि प्रसंग मे हुनका सम्बन्ध मे एकटा लोकोक्ति निम्नांकित अछि–
___ “पोखरि रजोखरि आर सब पोखरा, राजा शिवसिंह आर सब छोकड़ा।
तालते भूपाल ताल आरो सब तलैया, राजा ते शिवसिंह आरो सब रजैया”॥
शिवसिंहक समय मे तिरहूतक राज्य शक्तिशाली भगेल छल। अपना चारूकातक परिस्थिति केँ ध्यान मे राखि वो अपन राजधानी गजरथपुर मे अनने छलाह आर राज्यक विभिन्न भाग सँ सड़क द्वारा ओकरा जोड़ने छलाह। गौड़ आर गज्जनक विरूद्ध वो संघर्ष केने छलाह जकर प्रमाण हमरा पुरूष परीक्षा सँ भेटइयै। देवसिंहक समय मे सेहो मिथिला मे मुसलमानी प्रकोप छल। परम्पराक अनुसार अपन पिताक शासनकाल मे मुसलमानी सेना सँ लड़बाक हेतु वो पठाओल गेल छलाह आर ओहि मे पराजित भेलाक कारणे गिरफ्त भेल छलाह। हुनके छोड़ेबाक हेतु विद्यापति गेल छलथिन्ह आर मुसलमानी शासक विद्यापतिक काव्य प्रतिभा सँ प्रभावित भए शिवसिंह केँ छोड़ि देने रहैन्ह आर विद्यापतिक बहुत सम्मान केने रहैन्ह। राजा भेलाह शिवसिंह अहि अपमान केँ बिसरल नहि छलाह आर तैं अपन स्वाभिमान आर मिथिलाक स्वतंत्रताक रक्षार्थ हुनका कतेको मुसलमान शासक सँ संघर्ष करए पड़लन्हि।
जेना कि हम पूर्वहिं कहि चुकल छी जे मध्य युग मे मिथिला पर पश्चिम आर पूव दुनु दिसि सँ दबाब पड़ैत छल आर मिथिला ‘वेत्तसिवृत्ति’क नियम पालन करैत छल। दिल्ली, जौनपुर, बंगाल, सभहिक नजरि मिथिला पर छलैक। शिवसिंहक पूर्ण इच्छा छलैन्ह जे मिथिला केँ पूर्ण रूपेण स्वतंत्र राज्यक रूप मे राखल जाए आर ताहि प्रयास मे वो कोनो कसैरि उठा नहि रखलन्हि। अपन कम दिनक शासन मे वो जाहि निपुणताक परिचय देने छथि से कोनो देशक राजाक हेतु एकटा गौरवक विषय। शिवसिंह केँ पँचगौड़ेश्वर सेहो कहल गेल छन्हि। बंगालो मे मिथिला जकाँ अराजक स्थिति छल आर ओतहु शिवसिंह जकाँ राजा गणेश ओहि स्थिति सँ लाभ उठा केँ ओतए अपन शासन स्थापित क लेने छलाह। हुनक पुत्र जदुसेन मुसलमान भगेलाह आर जलालुद्दीनक नामे ओतुका राजा बनलाह। वो शिवसिंहक समकालीन छलाह। शिवसिंह हिनका विरूद्ध अभियान शुरू केलन्हि आर हिनका पराजित केलन्हि आर हिनक राज्यक किछु अंश केँ अपना राज्य मे मिलौलन्हि। बंगाल पर विजय प्राप्त करबाक हेतु ई पंचगौड़ेश्वर कहाओल गेल हेताह से संभव ताहि काल मे पश्चिम मे जौनपुर इब्राहिम शर्कीक बड्ड प्रभाव छलैक आर बंगाल मे जखन मुसलमानी शासनक पराभव भेल तखन ओतए गणेशक उत्थान भेल। मिथिला मे शिवसिंह आर बंगाल मे गणेशक प्रादुर्भाव सँ पश्चिमक मुसलमान शासनक कान ठाढ़ भेल आर बंगालक मुसलमान संत लोकनि इब्राहिम शर्की केँ अहि बातक हेतु चेतौलन्हि। बंगालक निमंत्रण पर इब्राहिम शर्की बढ़लाह जहि सँ ओहिठाम पुनः मुसलमानी शासनक पुनर्स्थापित भसकए।
एहिक्रम मे मिथिला मे हुनका शिवसिंह अंझट हैव स्वाभाविक कैयैक तँ शिवसिंह बंगालक जलालुद्दीन केँ पराजित कए ओतए धरि अपन राज्यक विस्तार क लेने छलाह आर संगहि मिथिला केँ पूर्ण रूपेण स्वतंत्र सेहो। इब्राहिम केँ अहि दू मे सँ कोनो बात पसिन्न नहिये पड़ल होएतैन्ह आर तैं मिथिला पर आक्रमण करब हुनक बंगाल नीतिक एकटा प्रमुख अंग रहल होएत। शर्की कालीन अभिलेख तिरहूत मे मुल्ला तकिया देखने छलाह आर ताहि सँ ई बुझना जाइत अछि जे शिवसिंह के परास्त करबाक हेतु अथवा बदला लेबाक हेतु इब्राहिम शाह तिरहूत पर आक्रमण केने हेताह। हुनक समर्थक कीर्तिसिंहक प्रताप आव मिथिला मे नहि छलैक आर स्वाभिमानी एवं स्वतंत्रता प्रेमी शिवसिंहक शासन पूव–पश्चिम दुनु केँ चैलेंज करहल छलैक। एहना स्थिति मे इब्राहिम शर्की चुप्प वैसनिहार नहि छलाह। दुनुक बीच संघर्ष भेल जकर परिणाम हमरा लोकनि केँ ज्ञात नहि अछि आर एकर बादे वो वंगाल दिसि बढ़ल होएताह। एहो संभव जे बंगाल सँ घुरबो काल (जतए वो शिवसिंहक महत्वाकाँक्षाक विषय मे सुनने होथि) वो मिथिला पर आक्रमण कए गेल होथि। मुदा तत्कालीन साधनक आधार पर अहि सम्बन्ध मे कोनो ठोस निर्णय देव असंभव अछि।
शिवसिंह स्वतंत्र रूपें लगभग ३–४ वर्ष धरि शासन केलन्हि परञ्च कहियो वो निश्चिंत भए सुति नहि सकलाह कारण सब दिन हुनका कोनो समस्या लगले रहैन्ह। दिल्ली आर जौनपुर हुनका बरोबरि तंग करैत् रहैन्ह जो वो पसिन्न नहि करैत छलाह। मुसलमान शासक केँ जे तिरहूत सँ कर भेटैत रहैक से देव वो वंद क देलैन्ह आर वो अपना केँ पूर्ण रूपेण स्वतंत्र घोषित क देलैन्ह। ई शासक के छलाह से सम्प्रति कहब असंभव मुदा कर बन्द केलाक बाद वो खिसिया गेलाह आर शिवसिंहक संगहि युद्ध बजरब स्वाभाविक भगेल। एतवे नहि अपन स्वतंत्रता केँ व्यापक बनेबाक हेतु शिवसिंह अपना नामे सोनाक सिक्का बहार केलन्हि आर अहिक्रम मे वो ई सिद्ध क देलैन्ह जे मिथिलाक कोनो दोसर महाप्रभु शिवसिंह छोड़ि के आर केओ नहि छल। एहि सँ मिथिलाक गौरव मे वृद्धि भेल आर शिवसिंह नान्यदेवक परम्परा मे आवि गेला। शिवसिंहक अहि काज सँ तत्कालीन छोट–छोट राजा केँ प्रेरणा भेटलैक आर शिवसिंहक शासन काल धरि मिथिलाक स्वतंत्रता सेहो अक्षुण्ण रहलैक। ई मिथिलाक इतिहासक हेतु एकटा गौरवक विषय मानल जाइत अछि।
मुसलमानं सुल्तान शिवसिंहक एहेन विद्रोही रूप देखि आश्चर्य चकित भए गेलाह। शिवसिंह सेहो अपन गिरफ्त होएबाक अनुमान केँ विसरने नहि छलाह। दुनु अपन–अपन जिद्द पर छलाह जकर नतीजा ई भेल जे दुनुक वीच युद्ध अवश्यम्भावी भगेल। अहि युद्धक परिणाम तँ बुझल नहि अछि परञ्च एकर बाद शिवसिंह हारि गेला, अथवा मारल गेलाह या लापता भगेलाह से बुझल नहि अछि। मारलो गेल होथि से असंभव बात नहि। किछु गोटएक मत छैन्ह जे शिवसिंह नेपालक जंगल मे भागि गेलाह अथवा ओम्हरे लापता भगेलाह। एकर अर्थ किछु लेल जा सकइयै। अहि पराजयक बाद लखिमा देवी विद्यापतिक संगे द्रोणवार राजा पुरादित्यक ओतए सप्तरी परगन्ना मे चल गेला। नेपाल मे सेहो एकटा शिवराजगढ़ अछि जकरा लोक शिवसिंह सँ जोड़ैत अछि आर किछु गोटएक विचार छैन्ह जे रानी लखिमा अपन पतिक स्मारक स्वरूप अहि गढ़क निर्माण करौने छलाह। विद्यापति अहि युद्धक वर्णन जाहि रूपें केने छथि ताहि सँ बुझना जाइत अछि ई भयंकर युद्ध छल। विद्यापति सेहो शिवसिंहक संगे युद्ध मे शरीक भेल छलाह। युद्धक स्वरूप विद्यापतिक निम्नलिखित कविता सँ स्पष्ट होएतः–
“दूर दुग्गमदमसि भज्जे,
ओगाढ़ गड़ गूठीअ गण्ज़ेओ।
पातिसाह ससीम सीमा समदरसे ओरे।
ढोलतरल निसान सद्दहि भेरि काटल संखनद्दहि।
तीन भूअन निकेत केतकि सनभरि ओरे॥
कोहे नीरे पयान चलियो वायुमध्य सयगरूओ।
तराणि तेअ तुलाधार परताप गहि ओरे॥
मेरू कनक सुभेरू कम्पिय धरणि पूरिय गगन झम्पिय।
हाति तुरय पदाति पयभर कमन सहि ओरे॥
तरल तर तखारि रङ्ग़े विज्जुदाम छटा तरंगे,
घोरघन संघातवारिस काल दरस ओरे॥
तुरय कोटी चाप चूरिय चारदिस चौविदिशपूरिय।
विषम सार असारधारा घोरनी भरि ओरे॥
अन्धकुअ कबन्ध लाइअ फेखी फफफरिस गाइअ।
रूहिरमत्त परेत भूत वेताल विछलि ओरे॥
पारभए परिपत्य गज्जिय भूमि मण्डल मुण्डे मण्डिअ।
चारू चन्द्रकलेब कीर्तिसुकेत की तुलि ओरे।
रामरूपे स्वधरम राखिअ दान दप्पे दधीचि खीखिअ।
सुकवि नव जयदेव भनि ओरे॥
देवसिंह नरेन्द्र नन्दन शत्रु नखइ कुल निकन्दन, सिंह
समशिवसिंह मया सकल गुणक निधान गणि ओरे”॥
शिवसिंह मात्र एक विजेतेटा नहि अपितु कला, संस्कृति आर साहित्यक संरक्षक सेहो छलाह। हुनक दरबार विद्वान, पण्डित, कवि, दार्शनिक एवं चिंतक लोकनि सँ भरल रहैत छल आर अहि माने मे वो राजा विक्रमादित्य आर भोज सँ एक्को परिक्रम नहि छलाह। विद्यापति, वाचस्पति, अमृतकर, जयंत, लखिमा आदिक नाम सँ सब केओ परिचित छथिओ। विद्यापति तँ हुनक सब किछु छलथिन्ह आरपदावलीक रचना शिवसिंहक्ल दरबार मे भेल। शिवसिंहक मंत्रीगण छलाह अच्युत, महेश (महेश्वर) आर रतिधर। शंकर नामक एकटा प्रमुख अधिकारी सेहो हुनका दरबार मे रहैत छलाह। तरौनीक एक पोखरिक अंगनाई मे शिवसिंह कालीन एतिहासिक अवशेष सब सुरक्षित अछि। ओहि समयक एकटा पोखरि ‘भटोखरि’क नाम सँ प्रसिद्ध अछि। मिथिला मे वो प्रथम राजा छलाह जे स्वर्ण मुद्राक प्रचलन चलौने छलाह आर जकर दूटा अवशेष अखनो प्राप्य अछि। शिवसिंहक सम्बन्ध मे कहल गेल अछि जे वो अपना समयक समकालीन राजा सभहिक मध्य एकटा अद्वितीय प्रतिभाक व्यक्ति छलाह जे एतवे कम दिन मे समस्त उत्तरी भारत मे अपन धाक जमा लेने छलाह। परञ्च सबहिक दिन सबखन एक्के रंग नहि रहैत अछि तैं शिवसिंह एकर अपवाद कोना होइतैथ। शिवसिंहक परोक्ष भेलाह पर पद्मसिंह मिथिलाक शासक भेला आर मैथिल परम्पराक अनुसार वो दिल्ली सुल्तान केँ कर देव स्वीकार केलन्हि। हुनका काल मे विद्यापति ठाकुर केँ मंत्री सेहो कहल गेल छन्हि। वो पद्मा, पद्मौलि आदिक स्थापना केलन्हि आर चम्पारण मे पद्मकेलि नामक स्थानक सेहो। विद्यापति हिनका नृपति पद्मसिंह भीम जकाँ बहादुर छलाह आर दानीक हिसाबे कल्पवृक्षे बुझल जाइछ। शैव सर्वस्व सार मे विद्यापति लिखने छथि– “संग्रामांगन सीम भीम सदृश .... दाने स्वल्पित कल्पवृक्ष”।
पद्मसिंह केँ कोनो पुत्र नहि छलन्हि। पद्मसिंहक बाद महारानी लखिमा मिथिला राज्यक भार अपना हाथ मे लेलन्हि। उपेन्द्र ठाकुर लिखने छथि जे शिवसिंहक पछाति लखिमा उत्तराधिकारिणी भेलीह मुदा से बात विश्वास करबा योग्य नहि अछि कारण हम देखि चुकल छी जे विद्यापतिक संग लखिमा द्रोणवार पुरादित्यक दरबार मे चल गेल छलीहे आर मिथिला मे बसि गेल छलाह पद्मसिंह जे मुसलमानी महाप्रभु केँ कर देबाक वचन दए मिथिला राज्यक आंतरिक स्वतंत्रता सुरक्षित रखबा मे समर्थ भेल छलाह। मैथिली परम्परा मे एकटा कथा सुरक्षित अछि जाहि सँ अहि बात पर प्रकाश पड़इयै। शिवसिंहक लापता भेला पर कायस्थ चन्द्रकरक पुत्र एवं शिवसिंहक मंत्री अमृतकर पटना गेला आर ओतए जाए सुल्तानक प्रतिनिधि सँ भेट कए मिथिलाक स्वतंत्रताक भीख मंगलन्हि। तखन जे समझौता भेल तदनुसार पद्मसिंह राजगद्दी पर बैसलाह। पद्मसिंह बछौड़ परगन्ना मे पदुमा नामक स्थान पर अपन राजधानी बनौलन्हि। अहि परम्परा केँ ध्यान मे राखिक स्पष्ट होइछ जे शिवसिंहक बाद मिथिलाक गद्दी पर पद्मसिंह बैसलाह आर तत्पश्चात लखिमा रानी।
लखिमा रानी केँ गद्दी पर बैसबाक मूल कारण ई छल जे पद्मसिंह सेहो अपुत्रे मरल छलाह। बारह वर्ष धरि वो शिवसिंहक प्रतीक्षा नियमानुसार केलन्हि आर तदुपरांत शिवसिंहक श्राद्धादि कए विद्यापतिक विचार सँ वो राजगद्दी पर बैसलीह। लखिमा देवी नीति, धर्मनिष्ठा, उदारता, एवं विद्वता आदि मे निपुण छलीहे आर विद्यापतिक सहयोग सँ नीक जकाँ करीब नौ वर्ष धरि राज्य केलन्हि। एकर बाद पद्मसिंहक पत्नी विश्वास देवीक शासन भेलैन्ह। वो विसौली गाम मे अपन राजधानी बनौलनि आर बहुत रास धार्मिक कृत्य केलन्हि। विद्यापति हिनका समय मे बहुत रास पोथी लिखलैन्ह।
देवसिंहक वंशज अंत अहिठाम भगेल आर तत्पश्चात हुनक वैमात्रैय भाय कुमर हरसिंहक शाखाक शासन पुनः प्रारंभ भेल। ई बहुत कम दिन धरि शासन केलन्हि आर हिनका समय मे कोनो खास घटनो नहि घटल। विभागसार (विद्यापति), कृत महार्णव एवं महादान निर्णय (वाचस्पति), विवाद चन्द्र (मिसारमिश्र) तथागंगकृत्य विवेक (वर्द्धमान) आदि पोथी सब मे हिनक नामक उल्लेख भेटइयै। कन्दाहा अभिलेख मे सेहो हिनक उल्लेख अछि। वो विद्वान उदार एवं योद्धा छलाह।
हिनक वाद हिनक पुत्र रत्न सिंह प्रसिद्ध नरसिंह अत्यंत प्रतापी राजा छलाह आर तैं हिनका दर्पनारायणक विरूद्ध मंत्री लोकनि देने रहथिन्ह। कहल जाइत अछि जे वो अपने मंत्री विद्यापति ठाकुर सँ विभागसागर नामक कानूनी ग्रंथक निर्माण करौने छलाह आर तदनुसार न्यायालय मे कार्य करबाक आरया देने छलाह। कन्दाहा (सहरसा)क सूर्य मन्दिर पर एखनो लिखाओल उपलब्ध अछि आर ओकर तिथि देल अछि शक १३७५ (–१४५३–४ ई.) ओहि शिलालेखक पाठ एवं प्रकारे अछि–
__ “पृथ्वीपति द्विजवरो भव (सिंह) आसी दाशी विषेन्द्र वपुरूज्जवल कीर्तिराशिः।
तस्यात्मजः सकल कृत्य विचार धीरो वीरो वभूव वि (हरसिंह देवः)॥
(दोः ?) स्तंभद्वय निर्जि नाहिततप श्रेणी किरीटोपल ज्योत्सना वर्द्धित पाद पल्लव नख श्रेणी मयुखा वलिः॥
दाता ततनयो मयोक्त विधिना भूमण्डलं पालयत् धीरः श्री नरसिंह भूपतिलकः कांतोधुना राजते।
विदेशतो स्यायतनं खेरिदम चीकरत्। विल्व पंचकुलोद भुतः श्रमद वंशधरे कृती ....“॥ अहिलेख मे नरसिंहक पूर्वज उल्लेख अछि आर इहो कहल गेल जे वो अपन दुनु शक्तिशाली भुजा सँ अपन दुश्मन केँ दवौने छलाह आर सब हुनके पर पर लोट पोट करैत छल। कामन्द कीय नीर्तिसारक अनुसार वो अपन राज्य केँ रक्षा करैत छलाह। अहि मे हुनका ‘भूपति तिलक’ सेहो कहल गेल छन्हि। दुर्गा भक्ति तरंगिनी मे विद्यापति हिनका योद्धा कहने छथिन्ह। ई अपने आर हिनक पत्नी धीरमति एक्के रंग उदार छलाह। कहल जाइत अछि जे धीरमतिक आदेशानुसार काशी मे एकटा वापी खुनाओल गेल छल आर धर्मात्माक हेतु एकटा धर्मशालाक निर्माण सेहो कैल गेल छल। हिनके आदेश पर विद्यापति दानवाम्यावली ग्रंथक निर्माण कएने छलाह। अहि मे नरसिंह देवक हेतु निम्नलिखित वाक्यक प्रयोग भेल अछि।
_ “श्री कामेश्वर राज पण्डित कुलालंकार सारः श्रिया
मावासो नरसिंह देव मिथिला भूमण्डला खण्डलः।
दृव्यद दुर्ध खौरिदर्पदलनोऽ भूद्दर्प नारायणो।
विख्यातः शरदिन्दु कुन्द धवल भ्राम्यधशो मण्डलः।
तस्योदार गुणाश्रस्य मिथिला क्ष्मापाल चूड़ामणेः॥
हिनके समय मे विद्यापति व्याढ़िभक्तितरंगिणी सेहो बनौने छलाह।व्याढ़िभक्तितरंगणी आर विभागसारक मूल अपन पोथी ‘मिथिला इन द एज ऑफ विद्यापति’क परिशिष्ट मे छपने छी। हिनका समय मे बहुत रास विभिन्नविषयक ग्रंथक रचना सेहो भेल। नरसिंहक बाद धीरसिंह राजा भेलाह। नरसिंह केँ चारिटा पुत्र छलथिन्ह–
i) धीरसिंह हृदय नारायण (प्रथम पत्नी सँ)
ii) भैरवसिंह रूपनारायण
iii) चन्द्र सिंह (द्वितीय पत्नी सँ)
iv) दुर्लभ सिंह (रण सिंह)
धीरसिंह अपने पिता जकाँ एकटा योग्य शासक छलाह। ई, १४६० क आसपास गद्दी पर बैसलाह आर विद्यापति हिनको हेतु प्रशंसाक पुल बान्हने छथि। मर्यादा, पराक्रम आर प्रज्ञा तीनु मे ई अपूर्व छलाह। हिनको दरबार मे बहुत रास विद्वान रहैथ छलथिन्ह। हिनके छोट भाई चन्द्रसिंह चनौर (चन्द्रपुर)क निर्माता छलाह। चन्द्र सिंहक आदेश पर क्रष्ण मिश्रक प्रवोध चन्द्रोदय नाटक पर रूचिशर्मा अपन टीका लिखने छलाह। धीरसिंहक कंसनारायण सेहो कहल जाइत छलैन्ह।
भैरवसिंह देव:- मिथिला मे शिवसिंहक बाद ओइनवार वंश मे सब सँ प्रसिद्ध शासक भेलाह भैरव सिंह देव जे पुनः एकवेर शिवसिंह जका समस्त मिथिलाक एकीकरण केलन्हि आर मिथिला केँ पूर्ण स्वतंत्र घोषित केलन्हि। उहो शिवसिंह जकाँ अपन चानीक सिक्का चलौने छलाह आर ओहि सिक्काक आधार पर ई निर्विवाद रूपें कहल जाइत अछि जे वो १४७५ ई. मिथिलाक गद्दी पर वैसलाह। हुनक स्त्री जयाक अनुरोध पर वास्तपति मिश्र द्वैत निर्णयक रचना कएने छलाह। शिवसिंह जकाँ इहो पंचगौड़ेश्वरक उपाधि सँ विभूषित छलाह। हिनका सम्बन्ध मे निम्नलिखित शब्दावली ध्यान देवाक योग्य अछि।
विद्यापति:-
शौयावर्जित पंचगौड़घरणी नाथोप नम्रीकृता–
नेको तुङ्ग तुरंग संग सहित च्छत्रायि रामोदयः
श्रीमद भैरव सिंह देव नृपतिर्यस्यानुजन्मा जय
त्याचन्द्रा केमरण्ड कीर्ति सहितः श्री रूपनारायणः।
रूचिशर्मा (प्रबोधचन्दोदय कटीका मे):-
न्याये नावति तीरभुक्ति वसुधां श्री धीरसिंह नृपे
श्री मद भैरव सिंह भूमि पतिना भ्रात्रानु जेनांविते।
वर्द्धमान (दण्डाविवेक):-
गौड़ेश्वर प्रति सरीर मति प्रतापः
केदार राय मवगच्छति दार तुत्यम्॥
संभवतः शिवसिंह जकाँ भैरवसिंह सेहो अपन पिताक समय सँ शासन मे हाथ बटबैत छलाह। हिनका समयक सब सँ मुख्य घटना ई अछि जे ई बंगाल सुल्तान द्वारा कैल गेल मिथिलाक अप्राकृतिक बटवारा कँ तोड़लन्हि आर पुनः समस्त मिथिला केँ एक कए ओहि पर अपन एक क्षत्र राज्यक स्थापना केलन्हि। बछौड़ परगन्नाक बरूआर ग्राम मे वो अपन राजधानी बनौलन्हि कारण इएह सब सँ सुरक्षित स्थान हिनका बुझि पड़लन्हि।
एतए ई स्मरण रखबाक अछि जे हाजी इलियास १३४६ ई. मे मिथिला पर आक्रमणक क्रम मे हाजीपुर तक बढ़ल छल आर मिथिलाक ओइनवार राजा केँ बाँटि देने छल। गंडकक दक्षिणी भाग समस्तीपुर, बेगुसराय, बछवाड़ा, महनार, हाजीपुर आदि क्षेत्र केँ वो अपना अधीन रखलक। गण्डक पर अपना दिसि वो समस्तीपुर (शमसुद्दीन पुर) नामक नगरक स्थापना केलक। तिरहूतक ओइनवार शासक के ई सब दिन खटकैत रहैन्ह। अहि आप्राकृतिक बटबारा केँ किछु दिनक हेतु शिवसिंहक परोक्ष भेला पर पुनः यथास्थितिक स्थापना भेल आर केओ मैथिल शासक अहि दिसि ध्यान नहि देलन्हि। भैरव सिंह एक महत्वाकाँक्षी व्यक्ति छलाह आर मिथिलाक अप्राकृतिक बटवारा हुनका बरोबरि खटकैत रहैन्ह तैं वो राजगद्दी पर एला उत्तर सब सँ पहिने अहि दिसि ध्यान देलन्हि आर अहि मे सफल सेहो भेला।
धीरसिंहक समय सँ बंगाल सँ खटपट होइत छल आर ई बात भैरवसिंह देखैत छलाह। वेर–कुवेर मे हुनके बंगालक विरूद्ध अभियान मे जाइयो पड़ैत छलैन्ह तैं जखन वो शासक भेलाह तखन वो अहि दिसि अपन ध्यान देलन्हि। हुनका समय बंगाल सुल्तानक प्रतिनिधि केदार राय हाजीपुर मे रहैत छल। भैरव सिंह केदार राय केँ पराजित कए ओहि क्षेत्र पर अपन आधिपत्य स्थापित केलन्हि आर समस्त मिथिलाक एकीकरण करबा मे समर्थ भेला।
वो सौ सँ उपर पोखरि खुनौलन्हि। अहि मे जरहटिया गामक पोखरि सब सँ पैघ छल। हिनका दरबार मे चौहान केसरी सिंह आर संग्राम सिंह प्रसिद्ध सिपाही छलथिन्ह आर परम्परा कथाक अनुसार वो एहि दुनु सिपाही लंका पठौने छलाह। जरहटिया पोखरिक यज्ञोत्सव बड्ड पैघ भेल छल आर ओहि क्रम मे उपरोक्त दुनु दूत केँ लंको पठाओल गेल छलैन्ह। ताहि दिन मे बंगाली विद्वान रघुनाथ शिरोमणि सेहो अहिठाम पढ़ि रहल छलाह आर अहि यज्ञ मे गलती मंत्र पढ़ल जा रहल छल आर से हुनका नहि रहल गेलन्हि तो वो बाजि उठलाह–“साखती” कथिता कवितापण्डित राज (रत्न) शिरो मणिना–अहि सँ लोग हुनका चिन्ह लेलक।
पोखरिक अतिरिक्त भैरवसिंहक समय मे बहुत रास नगर पट्टनक स्थापना सेहो भेल छल। ‘तुला पुरूष दान’क चर्च सेहो भेटैत अछि। संस्कृत साहित्य मे बहुत रास ग्रंथक रचना अहि काल मे भेल। विद्यापति, वाचस्पति, पक्षधर आदि सन पुरन्धर विद्वान हुनका दरबार मे छलथिन्ह आर राजा स्वयं संस्कृत साहित्यक बड्ड पैघ पृष्टपोषक छलाह। हुनका दरबार मे वाचस्पति ‘परिषद’ रहथिन्ह, आर वर्द्धमानधर्माधिकरणीक रहथिन्ह। हिनक विरूद्ध छलन्हि ‘रूपनारायण’
भैरवसिंहक वाद रामभद्र शासक भेला आर हिनको विरूद्ध रूपनारायणे छलैन्ह। इहो अपन राजधानी रामभद्रपुर नामक गाम मे बनौलन्हि। कहल जाइत अछि जे हिनका पटना मे सिकन्दर लोदी संगे भेट भेल छलैन्ह आर दुनु मे वेस दोस्ती सेहो छलैन्ह। ई हुनका संग सतरंज इत्यादि सेहो खेलाइत छलाह। सुल्तान रहस्य नृत्य देखबाकाल हुनकहुँ अपना समीप मे स्थान देथिन्ह। गौड़, बंगाल, मालदह, मुर्शीदाबाद आदि स्थान केँ वो जीतने छलाह। सिकन्दर लोदी बंगाल केँ ध्यान मे राखि मिथिलाक शासक केँ अपना दिसि पटिया केँ रखने होथि से संभव। विभाकरद्वैतविवेक नामक ग्रंथ सँ निम्न लिखित वाक्य स्पष्ट अछि।
__ “सिकन्दर पुअरन्दरो गुरूदुरोदाक्रीड़या
दिनं गमयति ध्रुवं विविध नागरी विभ्रम्ऐः।
पचण्ड रिपुमण्डली मुकुट कोटि प्रभा।
समाजित पदाम्बुजं यमिह मित्र भावंनयन्॥
येना खानि समुद्र खात सदृशं वापीगतं तिजेले।
येना दायिचतानि तान्यथ महादानानि पुण्यत्मना।
जागेत्येद्भुत विक्रमः सजगती कन्याकर ग्राहको।
गौड़ो वीकलयेन्द्रदविदहनः श्री रामभद्रो नृपः ॥
रामभद्र अत्यंत विद्याप्रिय छलाह। वाचस्पति हिनको समय मे जीवित छलाह। सिकन्दर लोदी केँ रामभद्र पर बड्ड विश्वास छलैन्ह आर तैं आवश्यकता पड़ला पर हिनक व्रजाहरि होइत रहैन्ह। रामभद्र उदार, दानी आर विद्याप्रेमी छलाह आर ओइनवार परम्पराक अनुसार इहो बहुत रास पोखरि इत्यादि खुनौने छलाह। हिनका समय मे भट्ट श्री राम नामक एक यात्री गया सँ तीरभुक्ति तीर्थ करबाक हेतु आयल छलाह आर वो रामभद्रक दानप्रियता एवं उदारता सँ बड्ड प्रभावित भेल छलाह। मिथिला होइत वो प्रयाग घुरल छलाह। वो तीरभुक्तिक विद्वत समाज सँ एत्तेक प्रभावित भेल छलाह जे अहि बातक उल्लेख वो अपन पोथी ‘विद्वत प्रवोधिनी’ मे सेहो केने छथि–
__ “गयाया निर्गता रामस्तीर्भूक्यारण्य देशपम्।
रूपनारायणं विप्रं संतुष्टं स्वागिराक रोत्॥
रूपनारायणाद् भूपा दाज्ञां प्राप्य सुतात्वितः।
तीरभूकत्याख्य देशाश्च प्रयागं समुपागतः”॥
अहिवंशक सब सँ अंतिम शासक छलाह लक्ष्मी नाथ देव कंशनारायण जनिका समयक अभिलेख भगीरथपुर सँ प्राप्त भेल अछि। १५१३ ई. मे मिथिला मे शासन करैत छलाह। १५१० ई मे गद्दी पर वैसल होथि से संभव कारण ओहि वर्ष मे हिनके शासन काल मे देवी माहात्म्यक एकटा पाण्डुलिपि तैयार भेल छल।
भगीरथपुर अभिलेख मे हिनका ‘राजाधिराज’ कहल गेल छैन्ह– “यवन पति भया–धायक स्तीरभुक्तौ राजा राजाधिराजः समर–सः कंसनारायणो सौ”। हिनका डरे यवन चरित्र संदेहास्पद छल आर ई अपन कोनो मंत्री श्री धरक पत्नी सँ सम्बन्ध रखैत छलाह। हिनका समय मे मिथिला पर मुसलमानी आक्रमण भेल। १५२६ ई. मे हिनक मृत्यु भेल जेना कि निम्नलिखित श्लोक सँ स्पष्ट अछि–“अंकाब्धिवेद शशि (१४४९) सम्मित शाकवर्षे, भाद्रेसिते, प्रतिपदिं, क्षिति सुनुवारं हा हा निहाय इव कंसनारायणौऽसौ, त्याज्य देवसरसीनिकहे शरीरम्”– १४४९ शाक अथवा १५२६ ई. मे अपन पार्थिव शरीर त्यागलन्हि। संभवतः बंगालक नशरत शाहक हाथें ई पराजित भेल छलाह कियैक तँ नशरत शाहक एकटा अभिलेख बेगुसरायक मटिहानी अंचल सँ प्राप्त भेल अछि। नशरत दिल्लीक सुल्तान संग भेल संधि केँ नहि मानि मिथिला पर आक्रमण केलन्हि आर लक्ष्मीनाथ कंसनारायण केँ पराजित कए अपन जमाए अलाउद्दीन केँ अहिठामक राज्यपाल नियुक्त केलन्हि।
एकर बादक इतिहास पूर्णरूपेण ज्ञाति नहि अछि। ओइनवारक शक्तिक ह्रास भगेलैक। तथापि ओइनवार वंशक लोग यत्र तत्र मिथिला मे राज्य करैत रहलाह आर एम्हर अराजकता सेहो बढ़े लागल। केन्द्रीय सत्ता टुटि गेला सँ चारूकातक राजा–सामंत अपन स्वतंत्रता घोषित क लेलन्हि आर मुसलमान लोकनि सेहो अहिक्षेत्र मे अपन अधिकार बढ़ेबा मे प्रयत्नशील भगेलाह। ओइनवार वंशक एकटा इन्द्रसेन शालिहोत्रसार संग्रहक लेखकक नाम भेटइत अछि जकरा सम्बन्ध मे हमरा लोकनि केँ कोनो विशेष ज्ञान नहि अछि। १४३४–३५ मे चम्पारण मे राजा पृथ्वीनारायण सिंह देवक राज्य छल (महाराज पृथ्वीनारायण सिंह देव भुज्यमान राज्ये चम्पकारण्यनगरे)। हिनक उत्तराधिकारी छलथिन्ह शक्तिसिंह आर तकर बाद हुनक पुत्र मदन सिंह। मदन सिंह मदन–रत्न–प्रदीपक लेखक छलाह। ई सब राजा अपन सिक्का सेहो चलौने रहैथ जाहि पर लिखल अछि– “गोविन्द चरण प्रणत–चम्पकाररण्ये” हिनक मुद्रा हिमालय तराई सँ दिल्ली धरि भेटैत अछि। मदन सिंहक राज्य गोरखपुर धरि छलैन्ह। नरसिंह पुराणक पाण्डुलिपिक पुष्पिका मे एकर प्रमाण अछि– “.... महाराजाधिराज श्री मन्मदन सिंह देवानम् विजयिनाम् शासति गोरक्षपुरे .....” चम्पारणक लौरिया नंदनगढ़ मे अशोकक स्तंभ पर एकटा लेख अछि– “नृपनारायण सुत नृप अमरसिंह”। ई के छलाह आर कतुका राजा छलाह से कहब असंभव।
महाराज लक्ष्मीनाथ अपुत्र छलाह तैं हुनक बाद हुनक कायस्थ मंत्री केशव मजुमदार राजक भार सम्हारलैन्ह आर उएह राजा भेला। ओइनवारक परंपराक निर्वाह करैत उहो जन–कल्याणक हेतु पोखरि खुनौलन्हि आर दानादिक नीक व्यवस्था केलन्हि। मजलिश खाँ नामक व्यक्ति सेहो अहि स्थिति सँ लाभ उठाए किछु दिन मिथिला पर शासन केलन्हि। केशव मजुमदार कुशल व्यक्ति छलाह आर ओइनवार शासन सब बात सँ अवगत रहबाक कारणे वो मिथिला केँ अपना शासन काल मे यथासाध्य स्वतंत्र रखलन्हि आर मैथिल परम्परा निर्वाह करैत जन कल्याणार्थ बहुत किछु केलन्हि। ओइनवार वंश आपसी कलह आर भय सँ खण्डित भए चुकल छल। राजकुलक सम्बन्ध सँ ओइनवार मूलक ब्राह्मण लोकनि “कुमार” पदवी धारण करए लगलाह आर ‘कुमार’ पदवी धारी ओइनवार ब्राह्मण लोकनिक एक शाखा अहुखन मालदह जिलाक अराइदंगा गाम मे छथिन्ह। ओइनवार वंशक अनेक शिलालेख आर किछु मुद्रा सेहो अछि जाहि पर हमरा सब ई कहि सकैत छी जे ओइनवार लोकनि कर्णाट वंश जकाँ मिथिलाक स्वतंत्रताक सुरक्षाक हेतु किछु उठा नहि रखलन्हि आर हुनका शासन काल मैथिलक प्रसार चारूकात भेल। एहि वंशक तत्वाधान मे साहित्य, कला, व्याकरण, स्मृति, निबंध, दर्शन, इत्यादिक विकास भेल। महाकवि विद्यापति देवसिंहक समय सँ भैरव सिंहक शासन काल धरि ओइनवार राजनीतिक एकटा प्रमुख स्तंभ छलाह। राजकाज मे एतवा व्यस्त रहितो वो अपन लिखब–पढ़ब नहि छोड़लन्हि आर मातृभाषा केँ सेहो नहि विसरलाह। एहिवंशक समय मे गोनु झा सेहो भेल छलाह। एहिवंशक परोक्ष भेला पर मिथिला मे मुसलमानी प्रभावक वृद्धि भेल। (अहि प्रसंग मे हमर “हिस्ट्री ऑफ मुस्लिम रूल इन तिरहूत” देखल जा सकइयै आर देखु हमर निबन्ध–“द ओइनवारज ऑफ मिथिला”)

अध्याय–९
खण्डवला वंशक इतिहास
(२४४ सँ २६५)

ओइनवार वंशक अंत भेला पर मिथिला मे केशव मजुमदार आर मजलिश खाँक शासन रहल। केन्द्रीय सत्ताक समाप्त भगेला प्र आर मुसलमान लोकनिक केँ लगातार आक्रमण सँ मिथिला छिन्न भिन्न भगेल छल आर चारूकात अराजकता पसैरि गेल छल। जे जेम्हरे पेलक से तेम्हरे अपन आधिपत्य कायम कैलेलक आर अहियुग मे मिथिला वेसी बावू बवुआन लोकनि बढ़ती भेलैन्ह। किछु राजपूत लोकनि सेहो अहि सँ लाभ उठौलन्हि आर कैक ठाम अपन स्वतंत्र राज्य कायम करबा मे सफल भेलाह। समस्त मिथिला मे हाजीपुर सँ बंगालक सीमा धरि मुसलमानी प्रभाव बढ़ि चुकल छल आर मुगल साम्राज्यक स्थापना करीब–करीब इएह स्थिति बनल रहल। अहिठाम मुगल साम्राज्यक स्थापना हम बाबरक समय सँ नहि लकए १५५६ यानि अकबरक समय सँ लैत छी कारण बाबर द्वारा स्थापित राज्य तँ राज्ये मात्र रहल आर हुनक पुत्र ओहि राज्य केँ जोगा नहि सकलाह। नतीजा भेल जे बिहारेक शेरशाह मुगल साम्राज्य केँ नस्त नाबूद केलन्हि आर अपन सत्ता स्थापित करबा मे समर्थ भेलाह। शेरशाहक एकटा उत्तराधिकारी सिक्का तिरहूत भेटल अछि आर एकटा मैथिली लिपिक अभिलेख सूर्यगढ़ा (मूंगेर) सँ। अकबरक शासन भेलाक बाद जे परिवर्त्तन भेल तकर मिथिला पर स्वाभाविक रूपें पड़ल।
खण्डवला वंशक सम्बन्ध मे कहल जाइत अछि जे हिनका लोकनि केँ मुगल सम्राट अकबर सँ समस्त मिथिलाक राज्य भेटल छलैन्ह। दरभंगा राजक इतिहास विस्तृत रूपे डा. जटाशंकर झा शोध कएने छथि आर अहि दृष्टिकोणें हुनक “हिस्ट्री ऑफ दरभंगा राज” आर “महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह” पठनीय ग्रंथ अछि। खण्डवला वंशक संस्थापक छलाह महामहो पाध्याय महेश ठाकुर। हिनक पूर्वज मिथिलेक रहथिन्ह आर ओहि मे एक गोटए शंकर्रान उपाध्याय केँ किछु दान खण्डवा मे भेटबाक ओम्हरे जाके वसि गेल छलाह। महेश ठाकुर हुनके वंशज छलाह (दशम पीढ़ी) आर जमीन जायदाद वाला रहबाक कारणे ई लोकनि उपाध्याय सँ ठाकुर (सामंती पदवी) कहबे लागल छलाह। १६म शताब्दी मे इ लोकनि मण्डला (गढ़ मण्डल–वस्तर) सँ पुनः एलाह। हिनक पितामह श्री पति ठाकुर भर राजपुत केँ किछु दान दकए भौर गाम बसौने छलथिन्ह। अहिठाम स्मरणीय जे ओइनवार वंशक पतनक बाद जे अराजक स्थिति शुरू भेल छल ताहि सँ लाभ उठा केँ भर राजपूत लोकनि सेहो अपन स्वतंत्र राज्य स्थापित क लेने छलाह। भौर मे आवि केँ वसला कारणे खण्डवला लोकनि ‘खरौरे भौर’ कहौलथि। अहिवंशमे विद्वानक जे एकटा परम्परा चलि आवि रहल छल तकरा अनुरूपें ई लोकनि भौर मे एकटा संस्कृत विद्या केन्द्रक स्थापना केने छलाह जत्तेऽ देशक विभिन्न भाग सँ विद्यार्थी लोकनि पढ़बालेल अवैत छलाह। महेश ठाकुरक ज्येष्ठ भाई भगीरथक कारणे भौरक प्रतिष्ठा बड्ड बढ़ि गेल छल–
__ “पद्म पत्र मपि यत्र दुर्लभम्,
रन्धनं भवति नेन्धनं बिना।
श्री भगीरथ गुणेन केवलम्,
भौर गौरव कथा गरीयेसी”॥
गढ़ेश–नृप–वर्णन–संग्रह श्लोकक पाण्डुलिपिक अध्ययन सँ मैथिल विद्वानक जे विवरण भेटैत अछि ताहि मे महेश ठाकुरक प्रशंसनीय उल्लेख अछि। रूपनाथ मैथिलक पाण्डुलिपि गढ़ेश–नृप–वर्णनम् क उपरोक्त पाण्डुलिपि पूरक थीक आर ओहि पाण्डुलिपि मे गढ़मण्डल राज्यक विवरण भेटैत अछि। रूपनाथक अनुसार महेश ठाकुर भौर ठक्कुर लोकनिक वंशजक रूप मे वर्णित छथि आर संगहि यादोरायक धार्मिक गुरूक रूप मे सेहो। महेश दलपत शाह आर रानी दुर्गावतीक समकालीन छलाह। खण्डवा, मण्डला, रतनपुर आर वासर मे हिनक वेस इज्जति रहैन्ह। महेश ठाकुर दुर्गावती केँ पुराण सुनवैत छलाह। एक दिन कोनो कारणे वो ओतए अपन प्रिय शिष्य रघुनंदन केँ पढ़ौलन्हि परञ्च रघुनन्दन केँ ओतए किछु खटपट भ गेलैन्ह आर ओतहि सँ गुरू शिष्य दुनु गोटए दिल्ली दिस विदा भेलाह। ओहिठाम मुगल दरबार मे ई लोकनि अपन विद्वता सँ सम्राट केँ प्रभावित केलन्हि आर रघुनन्दन जे फरमान प्राप्त केलन्हि से दक्षिणा स्वरूप अपन गुरूदेव महेश ठाकुर केँ ददेलन्हि। महेश ठाकुरक आर तीनू भाई दिल्ली सँ घुरि केँ वस्तर, रतनपुर आर मण्डला दिसि चल गेला कियैक तँ ओहिठाम हुनका लोकनि केँ जागीर छलैन्ह आर महेश ठाकुर असगरे फरमानक संग घुरला। मण्डला अखनो धरिमहेशपुर आर तिरहूतिया टोल अछि। मैथिल परम्परा मे सेहो महेश ठाकुरक राज्य प्राप्तिक उल्लेख भेटैत अछि–
“नवग्रह वेद वसुन्धरा शक मे अकबर शाह
पंडित सुबुध महेश को किन्हो मिथिलानाह”॥
_ “आसीत पण्डित मण्डलाग्र गणिता भूमण्डला खण्डला।
जाता खण्डवाल कुले गिरि सुता भक्तो महेशः कृति।
शाकेरण्ध्र तुरंग श्रुतिमही (१४४८)=??) लक्षिते
हविनेवाग्देवी कृप्या सुयेन मिथिला देशंसमस्तोऽर्जितः”॥
“अति पवित्र मंगल करण राम जनम केदिय।
अक्सर तुषित महेश को तिरहुति राजा करन॥
जेना कि पूर्वहिं कहल जा चुकल अछि जे महेश ठाकुर जखन फरमान लकए मिथिला मे राज्य करबाक हेतु पहुँचलाह तखन हुनका विरोधक सामना करए पड़लन्हि कारण अहिठामक स्वतंत्र राजपूत राजा लोकनि ताधरि स्वतंत्रताक स्वाद ललेने छलाह। ओइनवारक वाद जे स्थिति उत्पन्न भेलैक तकर विवरण हम प्रस्तुत क चुकल छी इहो कहि चुकल छी जे राजपूत लोकनि अपन प्रभाव बढ़ा लेने छलाह। तथा सरौंजा आर पररी मे पहिने हिन्दु राजा चुनचुनक राज्य छल परञ्च चुनचुनक परोक्ष भेला पर लक्ष्मी सिंह नामक एकटा राजपुत राजा ओहि क्षेत्र पर शासन करए लगलाह। ओइनवारक ववुआन लोकनि सेहो ठाम–ठाम अपन अधिकार जमौने छलाह आर १७ म शताब्दी मे औरंगजेबक शासन काल धरि मिथिला मे एकटा ओइनवार शासकक विवरण (तलवार–अभिलेख–जे मिथिला मण्डल मे प्रकाशित भेल अछि) भेटल अछि। अहि सँ तँ सामान्यतः इएह स्पष्ट होइछ जे महेश ठाकुर केँ प्रारंभ मे काफी मुश्किल भेल होएतन्हि। ताहि दिन मे मिथिला छोट–छोट खण्ड मे बटल छल। भौर प्रधान प्रशासनिक केन्द्र छल। महेश ठाकुरक समय मिथिलाक स्थिति वर्णन निम्नाकिंत अछि–
__ “रहै भौर क्षत्री प्रबल, वसत भौर निज ठौर
सूर समर विजयी वड़े, सब क्षत्री सिरमौर॥
अच्युत मेघ गोपाल मिलि, मारौ क्षत्री राज
निज सुत लैभागी तबै रानी नैहर राज
बहुत दिवस केँ वाद सौ सजि आये पम्मार
युद्ध करण मिथिलेश सँ सेना अपरेपार”॥
महेश ठाकुर सब प्रकारक विरोध केँ दबेबा मे सफल भेला। अहिठाम प्रश्न ई उठइयै जे राज्य गुरू दक्षिणा मे भेटल छलैन्ह अथवा वो स्वयं ओकरा प्राप्त केने छलाह। अहि पर विद्वानक बीच मतभेद अछि आर एक सिद्धांत इहो अछि जे वो अपन विद्वता सँ मानसिंह केँ प्रभावित कए राज्य प्राप्त केने छलाह। अकबर सेहो अहि पक्ष मे छल जे कहुना चारूकात शांति बनल रहए जाहि सँ वो अपन राज्य विस्तार कसके आर तैं मिथिलाक भार महेश ठाकुर केँ सुपुर्द कए वो निश्चिंत होभए चाहैत छल। तिरहूतक कलक्टरक १७८९ क एक पत्र सँ ई ज्ञात होइछ जे महेश ठाकुर ओइनवार वंशक पुरोहित छलाह आर ओइनवार वंशक अंत भेला पर वो स्वयं दिल्ली जाए ओतुक्का शासक केँ सब स्थिति सँ अवगत कराए अपना हेतु राज्य प्राप्त कके अनलन्हि। एक आर दिवदंती बुकानन पुर्णियाँ रिपोर्ट मे सुरक्षित अछि। प्रिंसेपक अनुसार खण्डवला वंश मुगल साम्राज्यक अंतर्गत एक स्वतंत्र राज्य छल आर ओहि राज्यक अधीन कतैको सामंत लोकनि रहैत छलाह। गोपाल ठाकुरक देन अकबरक फरमान सँ ई स्पष्ट अछि जे आंतरिक मामला मिथिला पूर्णरूपेण स्वतंत्र छल–चौधराई आर कानून गोई समस्त तिरहूतक हिनका लोकनि केँ प्राप्त छलन्हि। १६५२ ई. क मजहरनामा सँ सेहो स्पष्ट होइछ जे महेश ठाकुर अहिवंशक संस्थापक छलाह। औरंगजेबक समय मे अहिवंश बिहार आर बंगालक ११० परगन्ना दानस्वरूप भेटल रहैक आर संगहि खिलत आर महिमरेतिव (माँछक चेन्ह–जे दरभंगा राज्यक राजकीय चेन्ह छल)। अहि सँ स्पष्ट भजाइछ जे समस्त तिरहूत पर अहिवंशक प्रभाव महेश ठाकुरक समय सँ चलल अवैत छल।
महेश थाकुर मिथिला मे खण्डवला कुलक संस्थापक छलाह अहि मे आव सन्देह नहि रहि गेल अछि। अपन राजा हेवाक अवसर केँ चिरस्मरणीय बनेबाक हेतु वोधौत परीक्षाक प्रथा चलौलन्हि। महेश ठाकुर मात्र एक शासकेय नहि अपितु एकपैघ विद्वानो छलाह आर बहुत रास पोथी सेहो लिखने छलाह। कहल जाइत अछि जे मिथिला मे राज्य प्राप्त भेलाक बाद वो गढ़ मण्डला सँ अपन देवी (कंकाली देवी) केँ सेहो ओतए सँ अनलन्हि। वो अकबरनामाक एकटा संक्षिप्त संस्कृत संस्करण बाहर केलन्हि जे सर्वदेश वृतांत संग्रहक नाम सँ प्रसिद्ध अछि। कहल जाइत अछि जे महेश ठाकुर अकबरक शासनक ३४म वर्ष अहि ग्रंथक अनुवाद कएने छलाह। बीरबलक आदेश पर ई अनुवाद भेल छल। किनको–किनको इहो मत छैन्ह जे अहि अनुवादक बाद महेश ठाकुर केँ मिथिलाक राज भेटलन्हि। सुभद्र झाक संपादकत्व मे ई पोथी प्रकाशित अछि। अहि ग्रंथ सँ ई ज्ञात होइत अछि जे हिमायुँ नरहन आएल छलाह आर तिरहूत आर पूर्णियाँ मे वोजागीर सेहो देने छलथिन्ह। ई दुनु स्थानक जागीर वो अपन भाई हिन्दाल केँ देने छलाह आर हुनका अपन जागीर ठीक ककए बंगाल दिसि बढ़बाक आदेश देने छलाह। मैथिली शब्दक सेहो अहि संस्कृत पोथी मे वेस व्यवहार अछि। उदाहरणार्थ–
__ i) सभ्यक्तया
ii) गल्ली
iii) असुस्थ
iv) तखारि
v) सुस्थ
vi) ढ़व्य=ढ़ौआ
vii) विचीय–विचीय (बीछि–बीछि)
viii) वस्तु जातानि–
ix) हत्था जोरी–
आर एहेन बहुत शब्द ओहि संकलन मे अछि।
महेश ठाकुरक बाद हुनका द्वितीय पुत्र गोपाल ठाकुर गद्दी पर बैसलाह। कहल जाइत अछि जे वो विद्रोही राजपूत प्रधान लोकनि केँ दबौलन्हि। हिनके समय मे टोडरमलक राजस्व व्यवस्था लागू भेल छल। हिनका समय मे भेटल फरमानक उल्लेख हम पूर्वहिं कचुकल छी। मिथिलाक आंतरिक झंझट मे ई ततेक वाझल छलाह जे जखन दिल्ली सँ हिनका बजाहटि एलन्हि तँ अपने नहि जाकए वो अपन पुत्र हेमांगद ठाकुर केँ पठौलन्हि जे ओतए कोनो कारण वश गिरफ्त भए गेलाह आर ओहि गिरफ्तावस्था मे अपन सुप्रसिद्ध एवं अद्वितीय ज्योतिष शास्त्रक पोथी लिखलन्हि। कागज कलमक अभाव मे ओतए वो माँटि पर लिखैत छलाह आर जखन राजा केँ एकर सूचना भेटलन्हि तँ राजाक पूछला पर वो कहल थिन्ह जे एक हजार वर्ष धरि कहिया–कहिया ग्रहण लागत तकरे हिसाब वो लिखि रहल छथि। ‘राहू पराग पंजी’ नामे ई ग्रंथ प्रचलित अछि–
_ “खण्डवला कुल तरणे गोपाला दापयं गौरी
हेमाङ्गद सतनुते पंजी (!) राहू परागस्थ”।
राजा हिनका सँ प्रसन्न भए हिनका मुक्त कए देल आर तिरहूत राज्यक जे बकिऔता छल सेहो माफ कदेलक। हेमाङ्गद तकर बाद सँ पढ़वे–लिखबे मे अपन समय व्यतीत करेऽ लगलाह। गोपालक बाद शुभंकर ठाकुर शासक भेलाह। शुभंकर ठाकुरक नाम पर दरभंगा लग अखनो शुभकंर पुर अछि। ई एक पैघ विद्वान आर लेखक सेहो छलाह। ओ भौर मे अपन राजधानी स्थापित केलन्हि कियैक तँ अहिठाम पहिने भर राजपूत लोकनिक प्रधानता छल। हुनका बाद हुनक पुत्र पुरूषोत्तम ठाकुर शासक भेला। हिनक बजाहटि मुगल राजस्व पदाधिकारी दरभंगाक किला घाट मे ठहरल छलाह। ओहि पदाधिकारी केँ मुगलशासकक हाथे सजा भेटलैकि। हिनकहि शासनकाल मे तिरहूतक दूटा ब्राह्मण केँ मुगल दरबार मे पुरष्कार भेटल छलैक। पुरूषोत्तमक बाद हुनक सतभाय नारायण ठाकुर राजा भेलाह। नारायण ठाकुरक समय मे दू फरमान भेटल छ्लैक जाहि सँ दूटा गामक न ननकार प्राप्त भेल छ्लैन्ह–सरसो (परगन्ना भौर) आर बिजिलपुर (परगन्ना वेराय)। भखारा परगन्नाक स्थिति केँ सुधारबा मे हिनक विशेष हाथ छलैन्ह आर १६४५ तक वो राज्य करैत रहलाह। तकर बाद सुन्दर ठाकुर राजा भेलाह। राज्यक बटबाराक संकेत भेटैत अछि। अहिकाल मे शाहजहाँक शासन छल आर हकीकत अली नामक एक व्यक्ति दरभंगाक नवाब छलाह।
__ “ल सं ५०९ श्रावणवदि १४ खौ पुनः परमभद्दारकाश्व
पति गजपति नरपति राज्य त्रया धिपति
सुरत्राण शासत शाहजहाँ सम्मानित नओवाव
हकीकत खाण संभुज्यमान तीर भुक्त्यंतरित, स्स्
तीसाठतया संलग्न झोरिया ग्रामे . . . .।
हिनके शासन काल मे मैथिल रघुदेव शाहजहाँक विरूदावली बनौने छलाह। सुन्दर ठाकुरक बाद महिनाथ ठाकुर राजा भेलाह। वो पलामू आर मोरंग मे मुगल सम्राटक सहायता केने छलथिन्ह जकर सबूत उपलब्ध अछि। सुन्दर ठाकुर सुन्दर पुर मोहल्ला बसौलन्हि आर भाल पट्टी मे सुन्दर सागर पोखरि खुनौलन्हि। अहि पोखरिक नाम रामकविक आनन्द विजय नाटिका मे भेटैत अछि। सुन्दर ठाकुर देखबा मे बड्ड सुन्दर छलाह–
__ “अरविन्द विनान्दित सुन्दर लोचन
सुन्दर ठक्कुर सुन्दरता।
मदनेन समं विधिना तुलिता
कलिता मिथिलैक पुरन्दरता।
तव खण्डवला कुल मण्डन भूप।
सदा मति रस्तु मुकुन्द रता
नैने नगरे निले कमला पर
वारिधि मंथन मन्दरता”–
महिनाथ ठाकुरक समयक एकटा औरंगजेबक फरमान सेहो उपलब्ध अछि। महिनाथ ठाकुरक काज सँ प्रसन्न भए मुगल सम्राट हिनका आर राज्य देलथिन्ह–
__ सदर जमीन्दारी सरकार तिरहूत (तराईक संग १०२ परगन्ना)
__ परगन्ना धरमपुरक जमीन्दारी
__ सरकार मूंगेर–एक परगन्ना–
बंगाल सँ सेहो निम्नलिखित इलाम भेटलन्हि– माछक निसानी सेहो–
__ सरकार पूर्णियाँ–५ परगन्ना–
__ सरकार ताजपुर–२ परगन्ना–
महिनाथ ठाकुर केँ बेतियाक राजा गजसिंह सँ सेहो झंझटि भेलन्हि। मिरजा, फिदाई आर जीवन हिनका समय मे तिरहूत मे मुगल फौजदार छल। महिनाथ ठाकुरक शासन काल मे खण्डवला कुल अपन चरमोत्कर्ष पर पहुँचल छल। महिनाथ ठाकुर बेतिया (सिमरॉन)क राजा गजसिंह केँ पछाड़लन्हि जे सुगौना पहुँचि केँ सुगौना किला मे आराम करैत छलाह।
__ “धाय मिथिला केँ महिनाथ सिंह महाराज
बाज केँ झपटते सुगाओ पर चढ़ि गयौ।
घेराकरि दौड़ि दरवाजे मे दरेरा लगेगी धरव,
लागै मुचित्यौ आगे आग सी लहरि गयो।
दौड़–दौड़ पैदल कंगुरन मे चढ़ि लागै।
लेहुकी लहरि सो सोति ताल भरि गयौ।
कहु ढ़ाल कहु तरकस तलवार डारि तौलौ।
गज सिंह खोलि खिड़की दै निकल गयो।
महिनाथ ठाकुर मैथिली साहित्यक सेहो संरक्षक छलाह। हिनके समय मे लोचनक राजतंरगिणी आर नैषध काव्यक रचना भेल छल। हिनकहि समय मे इहो निर्णय भेल जे दरभंगा राज्य भविष्य मे बटत नहि आर ओहि हिसाबे उत्तराधिकारक नियम सेहो बना देल गेल।
एकर बाद नरपति ठाकुर शासक भेलाह। दुनु भाई (महिनाथ आर नरपति)क सम्बन्ध केहेन छल से निम्नलिखित काव्य सँ स्पष्ट होएत। कालीक पूजक छलाह–
__ “वदन भयान कानशब कुण्डल विकट दशन धन पाँती।
फूजल केश वेश तुअ केँ कहजनि नवजलधर काँती॥
काटल माथ हाथ अति शोभित तीक्ष्ण खङ्गकर लाई।
भय निर्भय वर दहिन हाथ कए रहिअ दिगम्बर भाई॥
पीन पर्याधर उपर राजित रूधिर स्त्रवित मुण्ड हारा।
कटि किङ्किणि शब कर करू मंडित सृक बहु शोणित धारा॥
वसिअ मशान ध्यान शब उपर योगिनि गणरहु साथे।
नरपति पति राखिअ जग ईश्वरि करू महिनाथ सतार्थ॥
नरपति ठाकुर कुशल योद्धा छलाह आर तलवार भजबा मे वेस कुशल। पलामू आर मोरंग मेजे महिनाथ ठाकुर मुगलक सहाय्यक हेतु सेना पठौने छलाह ताहि मे वो ओहि सेनाक नेतृत्व नरपति ठाकुरक हाथ मे देने छलथिन्ह। हुनक बहादुरी सँ सम्राट सेहो बड्ड प्रसन्न छलाह। एकर विवरण कतेको ठाम भेटैत अछि। उपरला पद सँ सेहो एकर मान होइयै। नेपाल तराई सँ एकटा मकवान पुर राज्य छल। ओइनवार वंशक अंत भेला ई राजा लोकनि तिरहूत राज्यक किछु हिस्सा केँ हड़पि लेने छलाह। नरपति ठाकुर हिनका विरूद्ध पटनाक सूबेदारक आश्वासन भेटला पर वो आन जमीन्दार लोकनि केँ संग लए शिकार खेलबाक बहाना सँ मकवान पुर राज्य पर आक्रमण केलन्हि आर ओतुका राजा केँ गिरफ्तार कलेलन्हि। ओहि राजा केँ पकड़ि केँ दरभंगाक फौजदारक ओतए आनल गेल। वो मिथिलाक राजा केँ सलाना 1200 टाका आर हाथी नजराना देव स्वीकार कैलक। मुगल सम्राटक संग हिनक सम्बन्ध बढ़िया छलैन्ह आर तैं हिनका समय मे खण्डवला कुलक प्रतिष्ठा बढ़ल।
नरपति ठाकुरक बाद हुनक पुत्र राघव सिंह राजा भेला। ‘ठाकुर’क स्थान वो‘सिंह’ पदवी लेलन्हि। उहो अपन पिता जकाँ एकटा प्रतापी शासक छलाह आर हुनका मिथिला पति सेहो कहल गेल छन्हि। बेतियाक राजा ध्रुवसिंह सँ हुनका खटपट भेलैन्ह आर संघर्ष सेहो–
“नगहु खङ्ग ध्रुवसिंह तोहि उपर यम चढ़ौ।
मिथिला पति सौवेर दिन–दिन तोहि बढ़ौ॥
तेकयत कुलवधिक एतो राघव नृप राजा।
अहि दल दलन सम्मथ भीम भारत जिमि गाजा॥
कवि कहत रामरे मूढ़ सुनु जेहि दल प्रचण्ड भैरो रहत।
ठहरे बनाया फौजजाथ इति कोजब सरदार खाँ तेगा गहत”॥
प्रसिद्ध अफगान लड़ाकू सरदार खाँ हिनका दरबार मे छल। बिहारी लाल अपन‘आयनी तिरहूत’ मे लिखने छथि जे औरंगजेब हिनको राजाक उपाधि देने छलैंन्ह। किछु गोटएक मत छैन्ह जे ई पदवी हुनका अलीवर्दी सँ भेटल छलैन्ह। एक लाख टाका जमाक हिसाब ई तिरहूत राज्यक मुकर्ररी लेने छलाह। नवावक दिवान धरणिधर के सेहो ५०,००० टाका नजराना दैत छलथिन्ह। मकवानीक राजा जखन वार्षिक नजराना देव बन्द क देलन्हि तखन हुनका मकवान पुरक खिलाफ सेहो आक्रमण करए पड़लैन्ह। युद्धक घोषणा होइतहुँ मकवानीक राजा हिनका सँ मेल मिलाप कलेलथिन्ह आर वेसी नजराना देवाक प्रतिज्ञा केलथिन्ह। हिनका समय मे एक आर प्रसिद्ध घटना भेल। बीरू कुरमी जे पहिन का ओतए रहैन्ह तकरा वो राजस्व पदाधिकारी बना केँ धर्मपुर परगन्ना पठौलन्हि। बीरू ओतए अपन एकटा किला बना लेलक आर ओहि सँ राज केँ राजस्व पठाएब बन्द क देलक। ओकरा विरूद्ध सेना पठाओल गेल आर ओहि मे वीरूक बेटा मारल गेल आर वीरू पराजित भेल। ओकरा सम्बन्ध मे निम्नलिखित कहावत अछि–
__ “वीरनगर वीर साह का बसे कौशिका तीर
का पति राखे कौशिका का राखे रघुवीर”।
बुकाननक पुर्णियाँ रिपोर्ट मे लिखल अछि जे वीरूक हाल सुनि सरमस्त अली खाँक नेतृत्व मे दिल्ली सँ सेना पठाओल गेल। पहिलवेर तँ वो सेना पराजित भ गेल मुदा दोसर वेर राघव सिंहक मदति सँ वीरू पराजित भेल। राघव सिंहक अधिकार पुनः समस्त परगन्ना पर भेलैन्ह परञ्च नाथपुर आर गोराड़ी हुनका सँ लकए पुर्णियाँक राजा के ददेल गेलैन्ह। राघव सिंह दानी आर उदार व्यक्ति छलाह आर बहुत रास मन्दिर इत्यादिक निर्माण सेहो करौने छलाह। हुनक दूटा शिलालेख उपलब्ध अछि–
मधुरवाणी श्वर (परगन्ना हाटी)क शिलालेख–
__ ॐ नमः शिवाय।
आसीन्नासीर दासी भवदरि निवह(:) क्ष्मा भृताँकोऽपि धन्यः
पुण्य(:) श्री शालिखण्डोरय (मल) कव रसमाहुति वंशाग्र गण्यः॥
समस्तो यावदात स्फुरदम लयशोरा सिरस्वती कृतान्य–
स्त्रीकः श्री कण्ठ भक्तिस्फुट घटितमति स्तीरभुक्तिश्वरोयः॥
तस्य श्रीमन्नरातिसिंह स्यासन् सुताः फलतपसः
श्रीमद् राघव सिंहो येषां ज्यायान्महाराजः॥
श्रीनन्द नन्दन इति प्रथितः पृथिव्यां।
सवस्वदोऽस्य नृप तेरभवतक नीयन्।
श्री भानु दग्र गुण ठाकुर सिंह नामा।
कामारिसक्त हृदयोऽवरजस्तदीयः॥
एतेषांतु विशेषज्ञा प्रज्ञा वज्ञात धीरधीः।
स्वसामधुरवाणीति नाम तोऽप्यर्थ तोऽप्यभूतः॥
नखन वंशकवीर श्रीमद्धरि जीव शर्मणः कृतिनः।
कल्पमहीरूहदान प्रभृति महादान यायिनी दयिता॥
शाके लोचन वाण (१६५२) भूपति मते मास शुभे माघवे।
पक्षे स्वच्छ तरेऽधि पंचभि तिथौवा चस्पतेवसिरे॥
उन्मीलन्मदगण्ड मण्ड लवल द्वेतण्ड वृन्दे श्वरे।
श्रीमद् राघव सिंह नाम्नि मिथिला नाथे महीशासति॥
हुनकर दोसर शिलालेख लोहना गाम सँ भेटल अछि–
ॐ स्वस्ति। श्रीमद् राघव सिंह वाहु विलंस ज्जेत्रास्त विक्षोयित–
प्रोधद्धरै महीप संभव यशः शुभ्रीभवद् भुतले।
प्राज्ञ श्री बलभद्र वलितो यत्नेन शम्योरिदं गर्भागारम कारयद् दृढ़तरं निर्वाण सं प्राप्तये॥
शाके वारण वेदराज कमिते राकेश्वरे भास्वरे पौषे मासि विलासि मोद रच्ते कामात्वितायांति थौ।
शाके १६४८
राघव सिंहक वाद विष्णु सिंह शासक भेलाह। आर चार वर्ष धरि शासन कए वो मरि गेलाह। हुनका बाद राजा नरेन्द्र सिंह राजा भेलाह। नरेन्द्र सिंहक शासन काल मे मिथिला मे बड्ड महत्व पूर्ण मानल गेल अछि। वो बड्ड वीर छलाह। हुनका सम्बन्ध मे चन्दा झा लिखने छथि–
“नृपति नरेन्द्र सिंह भेल जखन।
अरिधर कानन पसरल तखन॥
ताकि ताकि शत्रुक संघार।
कैलन्हि बहुत छात्र व्यवहार॥
कतहु जुद्धि नहि एला हारि।
अतिशय तेज तनिक तरू आरि”॥
मुसलमान सँ जखन हिनका संघर्ष भेल छलन्हि तखन नरहनक बबुआन हिनका मदति केने छलथिन्ह। नरेन्द्र सिंह आर नरहनक बबुआनक बहादुरी देखि नवाव आश्चर्यचकित रहि गेल छलाह जकर स्पष्टीकरण निम्नलिखित पद्ध सँ होइछ–
“ऐसो महाथोर जोर जंग सुल्तानी
बीच झुकत बबरजंग संगर करीन्द्र हैं।
औलिया नवाव नामदार पूछै बार–बार।
ये दोनो कौन लड़त अरिवारण परीन्द्र हैं।
साहेब सुजान जैनुद्दिन अहमद खाँ सामनेयय
अजैकरत कहत कवि चन्द्र हैं।
ये तो द्रोणवार केशो साह केँ अजीत साह
आगे राघो सिंह जी केँ नवल नरेन्द्र हैं।
हुनका समय मे बछौर परगन्ना लकए पुनः झंझट ठाढ़ भेल। बछौरक रूपनारायण ई झंझट केने छलाह। नरेन्द्र सिंह नवाव महावत जंगक ओतए जाय मुर्शिदावाद मे अपन दावी रखलन्हि परञ्च नवाव हुनका सँ अनुरोध केलथिन्ह जे वो बछौर परगन्ना रूपनारायण केँ ददेथुन्ह। राजमहल धरि सब गोटए संगहि अवैत गेलाह आर ओतए पुनः बवाव हुनका सँ आगेअह केलथिन्ह तखन नरेन्द्र सिंह अहि शर्त्त पर देवा लेल तैयार भेलाह जे वो हुनका (नरेन्द्र सिंहक) प्रति राजभक्त रहताह आर करहिया, चिचरी आर जयनगर पर वो कोनो प्रकारक दावा नहि करताह कारण ई सब तिरहूत राजाक सम्पत्ति छल। राजा आर नवाव मे बढ़िया सम्बन्ध छलैन्ह। नरेन्द्र सिंह केँ जे सुविधा सरकार द्वारा भेटलैक तकर विवरण कम्पनीक कागज सब मे सेहो भेटैत अछि। कन्दर्यी घाटक लड़ाईक विवरण जे लाल कवि कएने छथि ताहि सँ ताहि दिनक मिथिला दरबारक ज्ञान होइछ। नरेन्द्र सिंह अपन पिताक स्मारक केँ चिरस्थायी बनेबाक कारणे सहरसा जिला मे राघवपुर (राघोपुर) नामक स्थानक स्थापना केलन्हि। मठक स्थापनाक हेतु कैक व्यक्ति केँ दान देलन्हि। हुनक एकटा पत्नी महिषिक छलथिन्ह आर तिनके आग्रह पर वो महिषि मे उग्रताराक मन्दिरक जीर्णोद्धार केलन्हि। हुनक दरवार विद्वानक हेतु एकटा बड़का आश्रय छल।
नरेन्द्र सिंहक पछाति प्रताप सिंह राजा भेलाह। वो भनवारा सँ राजधानी हटाके झंझारपुर अनलन्हि आर फेर ओतए सँ दरभंगा। स्थानीय परम्परा मे हुनका“मिथिलेश” कहल गेल छन्हि। ताहि काल मे तिरहूत सँ बंगाल धरि चोर–डकैतक प्रभाव बढ़ि गेल छल आर कम्पनीक रेकार्ड मे कहल गेल अछि जे प्रताप सिंह हिनका सजा देबाक बात पर सेहो विचार कैल गेल छल। दान देवा मे इहो बड्ड उदार आर हिनक दानक कैकटा कागज सेहो भेटल अछि। हिनका समय मे फ्रान्सिस ग्रांड दरभंगा (तिरहूत)क कलक्टर छलाह। १७७४ मे तिरहूत केँ पटना प्रोविनासि. . . . कौंसिलक अंतर्गतक देल गेल।
१७७१ मे नेपालक पृथ्वीसिंह जे भारत सरकार सँ समझौता कए कर देवाक प्रतिज्ञा केलन्हि से कर भारत सरकार केँ राजा प्रताप सिंहक माध्यमे पठाओल जाइत छलन्हि। १७७० मे राजा प्रताप सिंह केँ वंसीटटि आर राजा सितावराय सँ तिरहूतक राज्य मुकर्ररी पद्धा पर भेटल छलैन्ह। ओहि वर्ष तिरहूतक हेतु इस्ट इण्डिया कम्पनी एकटा सुपर भाइजर सेहो बहाल केने छल। कर देवा मे विलंभ भेलाक कारण हिनका झंझटक सामना करए पड़लैन्ह। खेआली राम आर हिम्मत अली केँ तिरहूतक आर्थिक हालात जाँच करबाक हेतु पठाओल गेलन्हि।
दरभंगाक राजधानी अनबाक सम्बन्ध मे निम्नलिखित आक्य उल्लेखनीय अछि–
दोहा– “नृत्यत फणिन फणानं पर खंजन पाँखि पसारि
सोलाखि सब पूछत भये अदभूत बात निहारि॥
पूछत भये नेरश तब सुनु सोति सब लोग
खंजन फणि पर शोभहि थाको कौन संयोग”॥
कवित– कहत लगे है तब मंत्री प्रबल लोग सुनियं मिथिलेश जे ज्योतिष मे प्रमाण है। सरस है भूमि याको जीतिनसकत कोउवास करिबे केँ यह विधि केँ निशानि है॥ सुनि केँ आनन्द आर उमंगे छलाह बढ़ि बोले महाराज ने सरस भरिवाषी है। हुकुम हमारी यह जाहिर जहान करो भौरा को छाड़ि यहाँ दरभंगा राजधानी है।
दोहा– राजधानी दरभंगा भय सकल गुणान खानि भौरा छड़ि भूप तब सम्मत सबके जानि”॥
विद्या प्रेमी हेवाक कारणे महाराज प्रताप सिंह आलापुर परगन्नाक जगत पुर ग्राम वो पंडित भवानी नाथ शर्मा केँ दान मे ददेलैन्ह जाहि सँ वो आन आर विद्यार्थीक खर्च चला सकैथ।
_ “महाराजाधिराज श्रीमत प्रताप बहादुरः–
वंग देशाय्नांत राभेक भूपाले दत्तानेक
वृत्तितरा स्वीकारक स्मार्ता धर्मज्ञ तर्क
मीमाँसा वेदांता लंकार कानन पञ्चानन
धर्मधीर श्री भवानीनाथ शर्मषु वृत्तिपत्रम
ददाति सकल छात्राध्ययन निर्वाहाय
सूर्य विहार सरकार पटनाभ्यांतर्गत
तीरभुक्त देशांतर्गत परगन्ना आलापुर
अंतर्गत जगतपुर सारैण्यक ससीमक
सकाननक ग्रामस्य श्री विष्णु प्रीति
सम्पादनायच यवनायवन साधारण
स्वसपथपूर्वक वृत्ति रक्ष णामेव करिष्यति ...”
हुनका वाद राजा माधव सिंह गद्दी पर बैसलाह। वो स्थायी रूपेण दरभंगा केँ अपन राजधानी बनौलन्हि। १७८५ सँ अद्यावधि हिनका लोकनिक राजधानी दरभंगा रहल अछि। खण्डवला कुलक इतिहास मे माधव सिंहक शासन केँ बड्ड महत्वपूर्ण मानल गेल अछि। वो अपन प्राचीन परम्पराक अनुसार समस्त तिरहूत पर प्रभुत्वक माँग अंग्रेजक समक्ष रखने छलाह आर चिरस्थायी बन्दोबस्त केँ मनबा लेल तैयार नहि छलाह। अहि हेतु वो सम्राट शाह आलम द्वितीयक दरबार मे सेहो दरखास्त देने छलाह आर शाह आलम सँ १८०० ई. मे एकर स्वीकृति सेहो भेट गेल छलन्हि। परञ्च कम्पनीक अधिकारी लोकनि हिनक बात नहि सुनल कैन्ह आर शाह आलमक स्वीकृतिये केँ मानल कैन्ह आर हिनका लोकनि केँ जमीन्दारक दर्जा ददेल कैन्ह आर तहिये ई राजा दरभंगाक जमीन्दारी कहबे लागल जे १९४७ तक रहल।
१७८१ खेआली राम राजा कल्याण सिंहक डिप्टी बहाल भेलाह। राजा कल्याण सिंह सँ राजा माधव सिंह केँ सेहो मतभेद भेल छ्लैन्ह। एम्हर जखन कल्याण सिंह से झंझटि चलिते छ्लैन्ह कि तामे हुनका दरभंगा सदर दिवानीक अदालतक हाकिम सँ सेहो मतभेद शुरू भगेलन्हि। हुनक आदमी सब केँ गिरफ्तार कलेल गेलन्हि। राय मोहन लाल आर माधव सिंहक बीच तँ झंझट आर हुनका शासन काल मे उत्पन्न भेल। सरदार खान अफगानक बेटाक राम अली अपन मृत्यु सँ पूर्व अपन सब सम्पत्ति राजा माधव सिंह केँ दान मे लिखि देने छ्लथिन्ह। १७९५ मे दरभंगाक कलक्टर, दरभंगाक तहसिलदार केँ आदेश देलथिन्ह जे वो करीम अलीक सम्पत्ति केँ जप्त कलौथ। राजा माधव सिंह एकर विरोध केलन्हि आर ओम्हर कराम अलीक भगिना सेहो एकटा दरखास्त देलक जे कराम अलीक दानपत्र जाली थिक। अंत मे माधव सिंहक जीत भेल आर वो सम्पत्ति हुनका भेटलन्हि। माधव सिंह उदार आर दानी छ्लाहे आर बहुत रास मन्दिरक निर्माता सेहो।
१८म शताब्दीक उत्तरार्द्ध मे समस्त पूर्वी भारतक स्थिति चिंतनीय भगेल छल आर समस्त क्षेत्र मे सन्यासी फकीरक वगे बना केँ चौर–डकैत चारूकात उपद्रव करैत छलाह। हिनका सब केँ संरक्षण आर प्रोत्साहन मोरंगक राजा सँ भेटैत छलैन्ह। मोरंग आर तिरहूतक सीमा मिलैत–जुलैत छल। सन्यासी–फकीरक नेता छलाह खुर्रम शाह आर वो ताहि दिन नेपाल सँ मुक्त भए मोरंगक एकटा गाम मटिहानी मे रहैत छलाह। तिरहूतक सीमा पर ई लोकनि आतंक मचौने छलाह।
१८०४ मे परगन्ना छै आर फरकीयाक तिरहूत सँ अलग ककए भागलपुर मे मिला देल गेलैक। माधव सिंहक समय धरि तिरहूत एक स्वायत्त हिन्दू राज्य छल जकर अपन न्यायालय छलैक आर अपन न्यायाधीश होइत छलैक। एकर सब सँ पैघ प्रमाण ई अछि १७९४ ई. क एकटा न्यायाधीशक निर्णय संस्कृति मे भेटल अछि जाहि मे गुलामकन्याक उपर स्वत्वाधिकारक प्रश्न पर निर्णय अछि। अहि निर्णय केँ बड़ा महत्वपूर्ण मानल गेल आर अठारहम शताब्दीक अन्तिम चरण धरि न्यायालयक निर्णय संस्कृत मे लिखल जाइत छल तकर ई प्रमाण थिक आर गुलामक स्थिति पर सेहो प्रकाश पड़ैत अछि।
माधव सिंहक समय सँ दरभंगा राजक स्थिति पूर्ण रूपेण जमीन्दारक स्थिति मे परिवर्तित भगेल। माधव सिंहक पछाति छत्रसिंह महाराज भेलाह। १८१२क बाद जखन अंग्रेज केँ नेपाल संग झंझटि भेलन्हि तखन वो लोकनि बेतिया, पुर्णियाँ आर दरभंगाक राजा लोकनि केँ आदेश देलन्हि जे अपन–अपन सीमाक सुरक्षार्थ वो लोकनि प्रयत्नशील रहौथ। अहि अवसर पर छत्रसिंह अंग्रेज लोकनि केँ साहाय्य देने छलथिन्ह। एकर कारण ई छल जे नेपाली सब तिरहूत क्षेत्र मे सेहो हुलकी–बुलकी दैत छल आर एम्हर–आम्हर सँ लूट पाट सेहो करैत छल १८१५ मे हुनका महाराज बहादुरक पदवी भेटलन्हि। छत्रसिंहक समय मे बेतिया राज आर तिरहूत राजक बीचक सम्बन्ध बढ़िया भगेल छल। दुनु गोटे केँ पटनाक पाटन देवीक मन्दिर मे भेट भेला पर स्थिति मे सुधार भेलैक। सौराठक मन्दिर केँ छत्र सिंह पूरा करौलन्हि आर ओहि मे माध्वेश्वर महादेवक स्थापना सेहो। सौराठ मे वो एकटा धर्मशाला सेहो वो बनबौलन्हि।
हुनका बाद महाराज रूद्र सिंह गद्दी पर बैसलाह। हुनका बाद राजा महेश्वर सिंह गद्दी पर बैसलाह। हुनके समय मे सिपाही विद्रोह भेल छल। अंग्रेजक निगरानी हिनका पर शक बनल रहैत छलैन्ह। अंग्रेजक निगरानी हिनका पर रहैत रहैन्ह। नाथपुर आर पुर्णियाँक बीच डाकक व्यवस्थाक हेतु ई अंग्रेजी सरकार केँ १६टा घोड़ सवार सेहो देने रहैथ। संताल विद्रोह केँ दवेवा मे सेहो ई अंग्रेजक मदति केने रहैथ मुदा तैइयो अंग्रेज केँ हिनका पर विश्वास नहि होइत छलैन्ह। १८६० मे हिनका मरलाक बाद दरभंगा १८७८ धरि कोर्ट आफ वार्डसक अधीन रहल। ओकर बाद महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह राजगद्दी पर बैसलाह। वो एक सफल शासक, कुशल प्रशासक, विद्या प्रेमी, विधायक आर राजनीतिज्ञ छलाह। हुनका समय मे दरभंगा राज्यक उत्तरोत्तर विकास भेला। दरभंगा मे लेडीऽफरिन अस्पतालक स्थापना आर खड़गपुर (मूंगेर) मे सेहो एकटा अस्पतालक स्थापना केलन्हि। काँग्रेस केँ बरोबरि चन्दा दैत रहलाह। कलकत्ता विश्वविद्यालय केँ वो हृदय खोलि केँ दान देलन्हि आर दरभंगा मे राज स्कूलक स्थापना केलन्हि। ताहि दिन मे ऐहेन कोनो शिक्षण संस्था नहि छल जहि मे मंगला पर अथवा बिनु मंगनो ई सहायता नहि देने होथि। १८८८ मे काँग्रेस केँ अधिवेशन करबा लेल ई ‘लाउ पर कास्ल’ प्रयाग मे कीनि केँ देने छलथिन्ह आर सालाना १०,००० टाका चंदा तँ दैते रहथिन्ह। महात्मा गाँधी सँ सेहो हिनका पत्राचार छलैन्ह।

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