Wednesday, November 18, 2009

जिनगीक जीत- जगदीश प्रसाद मंडल PART III

रिक्सावला
ओ रिक्शा, ओ रिक्शा।’ कने फड़िक्के स जीबछ जोर स बाजल।
हाथ मे बम्बैया बैग, जिन्स पेन्ट आ शर्ट पहीरिने, दहिना हाथ मे चैड़गर घड़ी। फुल जुत्ता, मौजा सेहो लगौने। बम्बैये हिप्पी कट केश, बुच्चा मौछ आ आखि पर चश्मा। बचनू (रिक्शावला) अपन संगीक (ताशक संगी) संग ताश खेलाइत। ताशो वहिना नहि खेलैत, एक सेठ पर, चारु गोटेक चाह-पान खर्च, हरलाहा पार्टी कऽ देमए पड़ैत। पाँच टा लाल बचनूक जोड़ा कऽ। तेँ एक्के टा सेठ होइ मे बाकी। एकटा लाल हैत, चाह-पानक जोगार लगत। तेँ एकाग्र भऽ बचनू लालक पाछु दिमाग लगौने। ताशक चैखड़ी लग आबि जीवछ दुइभे पर बैग रखि रुमाल स मुह लग हौंकए लगल। कने काल हौंकि रिक्शावला कऽ चड़िअबैत कहलक- ‘हौ भाइ, हमरा बहुत दूर जाइक अछि, झब दे चलह?’
ताश पर स नजरि उठा, जीबछ दिशि देखि, बचनू बाजल- ‘भाइ, केहेन सुन्दर ठंढ़ा छै, कनी सुसता लाय। तोरो देखइ छिअह जे पसीना से तड़-बत्तर भेलि छह। हमरो एक्के टा लाल बाकी अछि, दू-तीन खेप मे भइये जायत। अगर जँ अपन लाल नहियो हैत आ विरोधिये (दोसर पार्टीक) के दू टा कारी भऽ जेतइ, तइओ जीत हेबे करत।
बचनूक बात सुनि जीबछ शर्टो आ गंजिओ निकालि कऽ रौद मे पसारि देलक। आसीन मास। तीख रौद। तइ पर स गुमकी सेहो। रेलबे स्टेशन सऽ जीबछ पाएरे आयल। किऐक त स्टेशनक बगले मे तेहेन खच्चा, बाढ़ि मे, बनि गेल जे रिक्शो आ टमटमोक रास्ता बन्न भऽ गेलई पाएरे लोक कहुना कऽ
थाल-पानि मे टपैत। बाढ़ि त तेहेन आयल छल जे जँ स्टेशन ऊँचगर जमीन पर नहि रहैत त ओहो भसि कऽ कतऽ-कहाँ चलि जायत। मुदा तइओ स्टेशनक पूबरिया गुमती, पुल आ आध किलोमीटर रेलबे लाइन दहाइये गेल। रेलवेक दछिन तेहेन मोइन फोड़ि देलक जे गाड़िओ बन्न भऽ गेल। डेढ़ मास मे पुलो बनल आ गाड़ियो चलब शुरु भेल।
गाम मे रिक्शा बचनुए टा कऽ। जहि स कोनो तरहक प्रतियोगिता नहि। प्रतियोगिता त शहर-बजार मे होइत, जहि ठाम सैकड़ो-हजारो रिक्शा रहैत। अनेरो रिक्शाबला सब रिक्शा पर बैसि, इमहर स उमहर (ओमहर) घुमबैत आ बजैत- ‘कोट-कचहरी......बैंक.......पोस्ट आॅफिस.......कओलेज....स्कूल.....स्टेशन.....बस स्टेण्ड......अस्पताल....बड़ा बजार.....सिनेमा चैक......डाकबंगला.....भगतसिंह चैक.....आजाद चैक।’
मुदा से त गाम मे नहि। मुदा तेँ कि गामक रिक्शावला कऽ कमाइ नहि होइत। खूब होइत। एक त गामक कच्ची रास्ता, तइ पर स जहाँ-तहाँ टूटलो आ गहूम पटौनिहार सब कटनौ। ऐहेन सड़क मे दोसर कोन इंजनवला सवारी सकत। तेँ गामक सवारी रिक्शा। जहि स गामक बेटी-पुतोहूक विदागरी निमहैत। धन्यवाद त रिक्शेवला कऽ दी जे वेचारा छाती पर भार उठा, कखनो चढ़ि कऽ त कखनो उतड़ि कऽ पार लगबैत। कठिन मेहनतक पाइ कमाइत।
अखन धरि ताशक खेल नहि फड़िआइल। किऐक त कखनो लाल कमि जाय त कखनो कारी। अगुताइत जीबछ बाजल- ‘भाइ, ताश नै फड़िऐतह। बहुत दुरस्त जाइ के अछि। झब दे चलह। नइ ते अन्हार भेने तोरो दिक्कत हेतह आ हमरो अबेर भऽ
जायत। कहुना-कहुना तेऐठाम से सुग्गापट्टी पाँच कोस हैत।’
बचनू- ‘हँ, से ते पाँच कोस से कम नहिये हैत। मुदा तइ से की? इ की कोनो शहर-बजार छियै जे राइतिक कोन बात जे दिने देखार पौकेटमारी, डकैती, अपहरण होइ छै। ने रस्ता मे भीड़-भड़क्का आ ने कोनो चीजक डर। निचेन से जायब।’
गामक बीच मे चैबट्टी। जहि ठाम पान-सात टा छोट-छोट दोकान। जहि स गामोक आ आनो गामक लोक चैक कहै लगल। चैकक पछबरिया कोन पर एकटा खूब झमटगर पाखरिक गाछ। जहि पर हजारो चिड़ैक खेंता। दिन भरि चिड़ै सब चराउर करै बाहर जाइत आ गोसाइ निच्चा होइतहि पतिआनी लगा-लगा गाछ पर अबै लगैत। कतेको रंगक चिड़ै, तेँ सब जातिक चिड़ै अपन-अपन संगोर बना-बना अबैत। ततबे नहि, गाछक डारियो बाँटि नेने अछि। एक जाइतिक चिड़ै एक डरि पर खेंता बनौने अछि। तेँ एक जाइतिक चिड़ै स दोसर जाइतिक चिड़ैक बीच ने कहा-कही होइत आ ने झगड़ा-झंझट। मुदा अपना मे (एक जाइतिक बीच) नीक-अधलाक गप-सप जरुर होइत। कथा-कुटुमैती स ल कऽ रामायण-महाभारतक किस्सा-पिहानी जरुर होइत। पान-पुनक चरचा सेहो करैत। अधला काज केनिहार कऽ डाँटो-फटकार दइत आ जुरिमनो करैत। ओहि गाछक निच्चा मे बाटो-बटोही, रौद मे, ठंढ़ाइत आ पाइन-बुनी मे सेहो जान बँचबैत। ताशक चैखड़ी सेहो जमैत।
बचनुक बात सुनि जीबछ पेन्टक पैछला पौकेट स सिगरेटक डिब्बा आ सलाइ निकाललक। एकटा सिगरेट अपनो लेलक आ एकटा बचनुओ कऽ देलक। दुनू गोटे सिगरेट लगा, रिक्शा पर चढ़ि विदा भेल। कनिये आगू बढ़ल कि बचनू जीबछ कऽ पूछलक- ‘भाइ तू बम्बै मे रहै छह?’
‘हँ’
‘मन ते हमरो बहु दिन से होइ अए मुदा पलखतिये ने होइ अए जे जायब।’
ओइ ठीन मन त खूब लगैत हेतह?’
‘एँेह, भाइ मन। की कहबह? जखैनिये डेरा से निकलबह कि रंग-बिरंगक छौड़ी सब के’ देखबहक। उमेरगरो सब जे कपड़ा लगौने रहतह से देखबहक ते बुझि पड़तह जे कुमारिये अछि। मुदा छउरो सब कि ओइ से कम अछि। एक त वहिना जे, छउरी सब दामी-दामी कपड़ा पीहीनने अछि आ सैाँसे देह झक-झक करै छै। तइ पर से छउरो सब करिक्का चश्मा पीहीन लेतह आ निग्हारि-निग्हारि देखैत रहतह। चश्मो कि कोनो एक्की-दुक्की रहै छै। जखैनिये आखि मे लगेबह कि देह पर कपड़ा बुझिये ने पड़तह।’
‘ओहन चश्मा हमरा सब दिशि कहाँ छै, हौ।’
‘ऐँह, ओइ ठीन विदेशी चश्मा सब बिकाइ छै कि ने। देहात मे ओहन चश्मा के कीनत।’
चैक स कनिये उत्तर एकटा ताड़ी दोकान। चारि-पाँच कट्ठाक खजुर बोनी। बीच-बीच मे ताड़क गाछ सेहो। उत्तर-दछिने रास्ता। पछबारि भाग ताड़ीक दोकान। ताड़ीक दोकान देखि जीबछ बचनुक पीठि मे आगुर स इशारा करैत रोकै ले कहलक। बचनुक मन मे भेलइ जे भरिसक पेशाब करत। रिक्शा रोकि उतड़ि गेल। जीबछ बाजल- ‘भाइ, ताड़ी दोकान देखै छियै। चलह दू घोट पीबि लेब, तखन चलब। हमही पाइयो देबइ।’
ताड़ीक नाम सुनि बचनू कहलक- ‘ओना ताड़ी हमहूँ पीबै छी, मुदा ताड़ी पीबि के ने रिक्शा चलबै छी आ ने ताड़ी पीनिहार के रिक्शा पर चढ़बै छी। तेँ अखैन ताड़ी-दारु बन्न करह। जखैन घर पर पहुँचबह तखैन जे मन हुअह से करिहह।’
‘भाइ, ओत’ भेटत की नै भेटत, अखैन ते आगू मे अछि।’
‘तब अखैन नै जाह। ताड़ी कीनि क नेने चलह। गामे पर दुनू गोटे पीबि लेब आ राइत मे रहि जइहह।’
‘अइठीन कत-अ रहब?’
‘से की हमरा घर-दुआर नै अछि। ओतइ रहि कऽ राति बीता लिहह। भोरे पहुँचादेबह।’
‘अच्छा, ठीक छै, चहल।’
दुनू गोटे ताड़ी दोकान दिशि बढ़ल। दोकान लग पहुँचते जीबछ घैलक-घैल ताड़ी फेनाइत देखलक। घैलक पतिआनी देखि मने-मन सोचै लगल जे हमरा होइ छले जे शहरे-बजारक लोक ताड़ी पीबै अए। मुदा से नहि गामो-घरक लोक खूब पीबै अए। पच्चीस-तीस गोटे दोकानक भीतरो आ बाहरो ताड़क पातक चटाई पर बैसि ताड़िओ पीबैत आ चखनो खाइत। कियो-कियो असकरे पीबैत त कियो-कियो दू-दू, तीनि-तीनि, चारि-चारि गोटेक संगोर मे। कियो खिस्सा कहैत त कियो गीति गबैत। कियो अन्हागाहिस गारियो पढ़ैत। सब उमंग मे। जहिना ताड़ीक फेन उधिआइत तहिना सबहक मन। ताड़ीक खटाइन गंध लगिते जीबछ के होय जे कखैन दू गिलास चढ़ा दिअइ।
ताड़ी दोकान स कने हटि दू टा बुढ़िया चखनाक दोकान पसारने। एकटा दोकान मे मुरही, घुघनी (बदामक) कचड़ी आ दोसर मे चारि पाँच रंगक माछक तरुआ। आंगुरक (ओग्रिक) इशारा स मझोलका घैल (डाबा) देखबैत जीबछ बचनू कऽ कहलक- ‘भाइ, दुइये गोरे पीनिहार छी, तेँ ओइह डाबा लऽ लाय।’
बचनू- ‘पहिने दाम पूछि लहक?’
डाबाक कान पकड़ि जीबछ पासी (दोकानदार) कऽ दाम पूछलक। तोड़-जोड़ करैत पेंइतीस रुपैया मे पटि गेलइ। पेन्टक जेबी स नमरी निकालि ओ (जीबछ) दोकानदार कऽ देलक। नमरी पकड़ैत दोकानदार कहलकै- ‘तड़िये टा कऽ दाम कटै छिअह। डाबा घुरा दिहह।’
‘बड़बढ़ियाँ’ कहि बचनू डाबा उठा लेलक। डाबा कऽ चखना दोकानक आगू मे रखि बचनू मने-मन सोचै लगल जे औझुका त कमाइओ ने भेल। धिया-पूता की खायत? से नइ त तना कऽ मुरही-कचड़ी कीनि ली जे सब तुर खायब। जेहने झुर क कऽ कचड़ी बनौने तेहने माछक कुट्टिया। एकदम लाल-बून्द। माछक कुट्टिया देखि जीबछ क मुह मे पानि अबै लगल। मन चट-पट करै लगलै। बचनू कऽ कहलक- ‘भाइ, कते चखना लेबह?’
मने-मन बचनू हिसाब जोड़ै लगल। दू-दू टा कचड़ी आ दू-दू टा माछ दुनू बच्चा ले आ अपना सब ले चारि-चारि टा। किऐक त गरम चीज होइ छै, तेँ बेसी खराब करतै। बाजल- ‘भाइ, एक किलो मुरही, एक किलो घुघनी, सोलह टा कचड़ी आ सोलह टा माछक कुट्टिया लऽ लाय।
सैह केलक। ताड़ीक डाबा उठा जीबछ विदा भेल। रिक्शाा लग आबि बचनू चखनाक मोटरी सेहो जीबछे कऽ दऽ देलक।
चैकक रस्ता छोड़ि बचनू घर परक रस्ता धेलक। लगे मे घर। दुइये टा घर बचनू कऽ। रिक्शा रखै ले एकचारी भनसेघरक पँजरा मे देने। एकटा घर मे भानसो करै आ जरनो-काठी रखै। दोसर मे सबतुर सुतबो करै आ चीजो-बौस रखै। अपना दरबज्जा नहि। मुदा घरक आगू मे धुर दसेक परती, जइ पर सरकारी चबूतरा बनल। घर लग अबिते बचनू रिक्शा ठाढ़ कऽ आंगन बारहनि (बाढ़नि) अनै गेल। बचनू कऽ देखि घरवाली कहलकै- ‘आइ जे भाड़ा नै कमेलौ, ते राइत खैब की? अपने दुनू गोरे ते ओहुना सुति रहब मुदा बच्चा सब कना रहत?’
बिना किछु उत्तर देनहि बचनू बारहनि लऽ अंगना स निकलि गेल। चबुतरा कऽ देहरा कऽ बहारलक। चबुतराक बनाबट सुन्दर, तेँ बहारितहि चमकै लगल। चबुतराक चमकी देखि जीबछ बाजल- ‘भाइ, जेहने
मजगूत चबुतरा छह तेहने सुन्दर। संगमरमर जेँका चमकै छह।’
जीबछक बात सुनि बचनुकऽ ओ दिन मन पड़लै जइ दिन ओ ठीकेदार कऽ गरिऔने रहए। मुस्कुराइत कहलकै- ‘भाइ, ओहिना ऐहेन सुन्दर बनल अछि। जे ठीकेदार बनबाबैक ठीकेदारी नेने रहए ओ नमरी चोर। तीन नम्बर ईंटा आ कोसीकातक बाउल स बनवै चहैत रहए। हम गाम पर नै रही। जखैन एलौ ते देखलियै। देखिते सौँसे देह आगि लगि गेल। मुदा ऐठाम रहए क्यो ने। दोसर दिन नाओ कोडै़ ठीकेदारो आ जनो एलै। हमरा त गरमी चढ़ले रहै। जखने कोदारि लगौलक कि जनक हाथ से कोदरि छीनि ठीकेदार के गरिअबै लगलौ। जहाँ गारि पढ़लियै कि ठीकेदारो गहूमन साप जेँका हुहुआ कऽ उठल। जहाँ ओ जोर स बाजल कि हमहूँ गरिअबिते दुनू हाथे कोदारिक बेंट पकड़ि कहलियै, सार नाओ (नौ) लइ से पहिने तोरे काटि देबह। मुदा सब पकड़ि लेलक। डरे ठीकेदारो थर-थर कपै लगल। तखन जा कऽ एक नम्मर सब कुछ (ईंटा, सीमटी, बालु) आनि बनौलक।
‘जीबछ- ‘बाह।’
बचनू- ‘कनी उपर आबि कऽ देखहक जे की सब बनबौने छी। देखहक इ पच्चीसी घर (खेलाइ ले) छी, कौड़ी से खेलाइल जाइ अए। मुदा इ खेल समैया छी। एकर चलती सिर्फ आसिने टा मे रहै अए। कोजगरा दिन त लोक भरि राइत खेलते रहै अए। (दोसर कऽ देखबैत) इ मुगल पैठानक घर छी। हमरा गाम (अइ गाम) मे लोक एकरा मुगल-पैठान कहै छै मुदा आन-आन गाम मे एकरा कौआ-ठुट्ठी कहै छै। गोटी से खेलाइल जाइ अए। (तेसर घर देखबैत) इ बच्चा सभक छियै। एकरा चैरखी-चैरखी घर कहै अए। झुटका से खेलल जाइ अए।’
जीबछ- हौ भाइ, तू ते बड़ खेलौड़िया बुझि पड़ै छह।’
बचनू- ‘हौ, जिनगी मे आउर छै की? खाइत-पीबैत, हँसी-चैल करैत बीता ली। सब दिन कमेनाइ, सब दिन खेनाइ। कोनो हर-हर, खट-खट नै। धिया-पूता ले ते हम अपने इस्कूल खोलि देने छियै। खेती-पथारीक काज स ल कऽ रिक्शा चलौनाइ, ईंटा बनौनाइ सब लूरि हमरा अछि। धिया-पूता ते देखिये के सीखि लेत।’
ओना जीबछ बचनुक गप सुनैत, मुदा मन ताड़ीक खटाइन गंध पर अँटकल। होइ जे कखन दू गिलास चढ़ाएब। नै त कम स कम आंगुर मे भीरा (भिड़ा) नाकोक दुनू पूरा मे लगा ली। जीबछ कऽ बचनू कहलक- ‘भाइ, ताबे तू सब कुछ सरिआबह, हम घर मे रिक्शा रखि दइ छियै। काज से निचेन भऽ जायब।’
जीबछ सब समान सरिअबै लगल। रिक्शा कऽ गुरुकौने बचनु एकचारी मे रखि आंगन जा दुनू बच्चो आ पत्नियो कऽ कहलक- ‘दुनू बाटिओ आ दुनू छिपलियो नेने चलू।’
कहि बचनू आगू बढ़ि गेल। पत्निक मन खुशी स झुमि उठल। दुनू बच्चा दुनू बाटी नेने आगू बढ़ल। दुनू छिपली नेने पत्नी डेढ़िया लग ठाढ़ भऽ, मुह पर नुआ (साड़ी) नेने कनडेरिये आखिये दुनू कऽ देखैत। अपना दुनू गोटे ले बचनू चारि-चारि पीस माछ, चारि-चारि कचड़ी आ अधा किलो करीब मुरही-घुघनी मिला कऽ रखि दुनू बच्चा क एक-एक कचड़ी, एक-एक माछक कुट्टिया आ दू-दू मुट्ठी मुरही-घुघनी मिला कऽ देलक।दुनू बच्चा देखि कऽ चपचपा गेल। अपन-अपन बाटी वामा हाथे उठा दहिना होथे खाइत विदा भेल। माए लग पहुँच दुनू बच्चा अपन-अपन बाटी देखए देलक। बाटी मे घुघनीक मिरचाइक टुकड़ी आ कचड़ी मे सटल मिरचाइ कऽ देखि माए कहलक- ‘बौआ, मिरचाइ बीछि कऽ रखि दिहए। तोरा सब के करु लगतौ।’
तहि बीच बचनू गमछाक एक भाग मुरही-घुघनी कऽ मिला, चारि-चारि टा कचड़ी आ चारि-चारि टा माछक कुट्टिया फुटा दुनू गोटे ले रखलक। चबुतरे पर स बचनू घरवाली कऽ सोर पाड़ि कहलक- ‘इ सब लऽ जाउ।’
अदहा मुह झपने सरधा (बचनुक पत्नी) चबुतरा पर पहुँच दुनू छिपली बचनुक आगू मे रखि देलक। एकटा छिपली मे मुरही कचड़ी आ दोसर मे घुघनी-माछ बचनू दऽ देलक। झुर माछक तरुआ देखि सरधाक मन हँसै लगल। मन मे एलै जे कल्हुका जलखै तकक ओरियान भऽ गेल। दुनू छिपली तरा-उपरी रखि दुनू हाथ सऽ पकड़ि आंगन विदा भेलि।
दुनू गोटे (जीबछ आ बचनू) दुनू भाग बैसि बीच मे ताड़ीक डाबा, गिलास आ चखना रखलक। दुनू गिलास मे जीबछ ताड़ी ढ़ारि, आगू मे रखि आखि मुनि, ठोर पट-पटबैत मंत्र पढ़ै लगल। कनी काल मंत्र पढ़ि, आखि खोलि तीनि बेरि ताड़ी मे आंगुर डूबा निच्चा मे झाड़ि, बाजल- ‘हुअह भाइ, आब पीबह।’
छगाएल दुनू। तेँ एक लगाइते तीनि-तीनि गिलास पीबि लेलक। मन शान्त भेलइ। मन शान्त होइतहि जीबछ सिगरेट निकालि एकटा अपनो लेलक आ एकटा बचनुओक हाथ मे देलक। दुनू गोटे सिगरेट धरा पीबै लगल। बचनुओ लेलक सिगरेट पीबैत-पीबैत दुनू कऽ नशा (निसां) चढ़ै लगल। निसां चढ़िते गप-सप करैक मन दुन गोटे कऽ हुअए लगलै। एक मुट्ठी मुरही आ एक टुकड़ी माछ तोड़ि जीबछ मुह मे लेलक। बचनुओ लेलक। मुह महक घांेटि जीबछ बाजल- ‘भाइ, तोरा रिक्शा चला कऽ परिवार चलि जाइ छह?’
कचड़ी तोड़ि मुह मे लइत बचनू उत्तर देलक- ‘किअए ने चलत। हमरा कि कोनो कोठा बनबैक अछि जे गुजर नै चलत। तहू मे कि हम रिक्शा बारहो मास थोड़वे चलबै छी। भरि बरसात चलबै छी। जहाँ बरखा बन्न भेलइ कि महाकान्त भाइयक चिमनी मे काज करै छी।’
‘नोकरियो करै छह?’
‘ऐहेन नोकरी ते भगवान सब के देथुन।’
अलबेला लोक छथि महाकान्त भाय। हुनकर सिर्फ पूँजी टा छिअनि। असली कारबारी हम दू गोटे छी। सरुप मुनसी आ हम। पजेबाक खरीद-बिकरी स ल कऽ कोयला मंगौनाइ, ओकर हिसाब बारी केनाइ, हुनकर काज छिअनि। आ हमर काज छी, पथेरीक देखभाल केनाइ, समय पर ओकरा दमकल चला, खाधि मे पाइन देनाइ स ल कऽ बजार से समान कीनि के अननाइ, आ चिमनी पर स घर-परक दौड़-बरहा केनाइ रहै अए।’
‘तब ते खूब कमाइ होइत हेतह?’
‘कमाइ जँ करै चाही ते ठीके खूब हैत। मुदा से नै करै छी। एक सय रुपैया रोज होइ अए। ओ घरवालीक हाथ मे दऽ दइ छियै। बाकी सिर्फ खेलौं-पीलांै। किऐक त नजाइज पाइ जँ घर मे देबइ ते ओइ से भाभन्स नै हैत।’
दुनू गोटे डबो भरि ताड़िओ आ चखनो खा-पीबि गेल। एक दिशि निसां स दुनूक देह भसिआइत दोसर दिस जोर स पेशाब लगि गेलइ। उठैक मने ने होय। मुदा पेशाबो जोेरे होइत जाइत। दुनू गोटे उठि कऽ पेशाब करै गेल। जाबे पेशाब करै बइसै ताबे बुझि पडै़ जे कपड़े मे भऽ जायत। मुदा कहुना-कहुना कऽ सम्हारि पेशाब करै बैसल। पेशाब बन्ने ने होय। बाड़ी कालक बाद पेशाबो बन्न भेलइ आ भक्को खुजलै।
चबुतरा पर दुनू गोटे आबि कऽ बैसल। जीबछ कहलकै- ‘भाइ, हमरा डान्स करैक मन होइ अए।’
जीबछक बात सुनि बचनू पल्था मारि बैसि, ठेहुन पर दुनू हाथ स बजबै लगल। मुदा ओहि स अबाज नै निकलै। अबाज निकलै मुह स। जहिना-जहिना मुह स बोल निकले तहिना-तहिना दुनू ठेहुन पर हाथ चलबै। तहि बीच दुनू बच्चो चबुतरा पर आबि थोपड़ी बजबै लगल। अंगनाक मुहथरि पर सरधा बैसि देखै लगली। जीबछ डान्स करै लगल। थोड़े कालक बाद बचनुक मुह दुखा गेलइ। मुदा जीबछ डान्स करिते। दुनू बच्चो थोपड़ी बजबिते। जहिना बाइढ़िक रेत पर हेलिनिहार चीत गरे सुइत कतौ स कतौ भसिया कऽ चलि जाइत तहिना बैसलि बैसलि सरधाक मन भसिआइत। तहि बीच बचनु उठि क आंगन गेल। घैलची परक घैल स पाइन फेकि नेने आयल। उल्टा क घैल रखि, हाथ मे ओंठी रहबे करै, दुनू हाथे घैलक पेन पर बजबै लगल। लाजबाब बाजा। नचैत-बजबैत दुनू गोटे थाकि गेल। सुति रहल।
भोर होइते दुनू गोटे उठि, मुह-हाथ धोय चलि देलक।
अइबेरि आसीन अपन चालि बदलि लेलक। किऐक त आन साल अधहा आसिनक उपरान्त हथिया नक्षत्र अबैत छल। से अइबेरि नइ भेलइ। पहिने हथिये चढ़ल। दू दिन हथिया बीतलाक बाद आसिन चढ़ल। ओना बूढ़-बुढ़ानुस क कहब छनि जे दुर्गापूजा मे हथिया पड़िते अछि, मुदा से नइ भेलइ। आसिनक इजोरिया पखक परीब कऽ दुर्गा पूजा शुरु होइत। अइबेरि अमबसिये दिन हथिया चलि गेल। तहिना बरखोक भेल। जइ दिन आसिन चढ़ल ओहि दिन घनघनौआ बरखा भेल आ तेकर बाद फुहियो ने पड़ल। झाँटक कोन गप। हथियाक लेल ओरिआओल (ओरिऔल) जरनो-काठी आ अन्नो-पानि सबहक घर मे रहिये गेल। मुदा तइओ किसान सबहक मन मे खुशी नै कमल। किऐक त जँ हथिया मे धानक खेत मे ठेंगाक हूर गरत त धान हेबे करत। मुदा किछु गोटेक मन मे शंका जरुर होय जे नीचला खेत मे ने पानि लगल अछि मुदा उपरका खेतक धान कोना फुटत? किऐक त उपरका खेतक पानि टघरि कऽ नीचला खेत मे चलि गेल। किछु खेतक पानि काकोड़क बोहरि देने, त किछु खेतक पानि मूसक बिल देने बहि गेल। जहि स बरखाक तेसरे दिन उपरका खेत सब सुखि गेल। ओना दसमीक मेलो दखिनिहारक आ मेला मे दोकानो-केनिहारक मन मे खुशी। किऐक त रुख-सुख मे नाचो-तमाशा जमत आ देखिनिहारो कऽ भीड़ जुटत। ओना पैछला सालक सब छगाएल। किऐक त जइ दिन (सतमी) मेला शुरु भेलि ओहि दिन तेहेन झाँट आ पानि भेल जे मेलाक चुहचुहिये चलि गेलइ।
सुखाड़ समय रहने महाकान्त ओछाइने पर पड़ल-पड़ल सोचै लगल। जहिया स चिमनी शुरु केलहुँ तहिया स ऐहेन समय नहि पकड़ाएल छल। आन साल दिआरीक पछाति चिमनीक काज मे हाथ लगबै छलहुँ, से अइबेरि भगवान तकलनि। कहुना-कहुना त दिआरी अबैत-अबैत दू खेप भट्ठा जरुर लगि जायत। सरकारोक योजना नीक पकड़ायल। एक दिशि खरन्जाक स्कीम त दोसर दिशि इन्दिरा आबासक घर। ततबे नहि स्कूल आ अस्पताल सेहो बनत। इ सब त अपने गाम टा मे बनत से नहि आनो-आन गाम मे बनत। सालो भरि ईंटाक महगीये रहत। ओते पुराइये ने पाएब। एते बात मन मे अबिते मुह स हँसी निकलल। तहि काल रागिनी (पत्नी) चाह (बेड टी) नेने आबि चुप-चाप (सिरमादिशि) ठाढ़ भऽ, पतिकेँ (महाकान्त) मुस्कुराइत देखलनि। पतिक मुस्की देखि रागिनी मने-मन सोचै लागलि जे की बात छियै जे ओछाइने पर पड़ल-पड़ल मुस्करा रहल छथि। मुदा बिना किछु बजनहि टेबुल पर चाह रखि, ओरिया कऽ नाक पकड़ि डोला देलक। नाक डोलबितहि महाकान्त उठि कऽ बैसि रहल। आगू मे रागिनी कऽ ठाढ़ देखि चैबन्निया मुस्की दइत आखिक इशारा स पलंग पर बैइसै ले रागिनी कऽ कहलक। पतिक मूड देखि रागिनी ससरिये जायब नीक बुझलक।
महाकान्त आ रागिनी, संगे-संग कओलेज मे पढ़ने। जखन (जहिये) दुनू गोटे बी.ए. मे पढ़ैत छल तहिये दुनूक बीच प्रेम भऽ गेल। दुनू सम्पन्न परिवारक। ओना पढ़ै मे दुनू ओते नीक नहि जते दुनूक रिजल्ट नीक होय। दुनू केँ मैट्रिको आ इन्टरो मे फस्ट डिविजन भेल रहए। तेकर कारण मेहनत नहि पैरबी रहए। नीक रिजल्टक दुआरे संगियो-साथीक बीच आ शिक्षकोक बीच आदर दुनूक होय। दुनूक बीच संबंध बी.ए. आनर्सक क्लास मे भेलइ। किऐक त आनर्स मे कम विद्यार्थी रहने गप-सप करैक अधिक समय भेटइ। दुनूक बीच संबंध गप-सप स शुरु भेल। तेकर बाद किताबक लाथे डेरो मे ऐनाइ-गेनाइ शुरु भेल। संबंध बढ़िते गेलइ। संगे बजार बुलनाइ, किताब-कापी खरीदनाइ स ल कऽ कपड़ा, जुत्ता-चप्पल खरीदनाइ धरि संगे हुअए लगलै। सिनेमा त मेटनियो शो मे देखै लगल। जहि स आंगिक संबंध सेहो शुरुह भऽ गेलइ। एकटा डबल रुम लऽ दुनू गोटे डेरो एकठाम कऽ लेलक। दुनूक बीचक संबंधक चरचा सिर्फ विद्यार्थिये आ शिक्षके धरि नहि रहि दुनूक पिता धरि पहुँच गेलइ। मुदा दुनूक पिताक दू विचार। तेँ बुझियो कऽ दुनू अनठा देलक। सुधीर (महाकान्तक पिता) जुआन-जहानक खेल बुझैत त रमानन्द (रागिनीक पिता) सम्पन्न परिवार आ पढ़ल-लिखल लड़का बुझि बेटीक भार उतड़ब वुझैत।
एम. ए. पास केला पर दुनू क विबाह भऽ गेलइ। सुधीरक परिवार एक पुरिखियाह।
अपनो भैयारी मे असकरे आ बेटो तहिना। ओना बेटी चारि टा, जे सासुर बसैत। परिवारक काज स महाकान्त कऽ कम्मे सरोकार। तेँ भरि-भरि दिन चैखड़ी लगा जुओ खेलैत आ शराबो पीबैत। जे पितो बुझैत। महाजनीक कारोबार, तेँ भरि दिन सुधीर रुपैयेक हिसाब-बारी आ धानेक लेन-देन मे व्यस्त रहैत। महाकान्तक क्रिया-कलाप देखि एक दिन खिसिया कऽ सुधीर कहलखिन- ‘बौआ, बड़ कठिन स धन होइ छै। एना जे भरि-भरि दिन बौआइल घुमै छह, तइ से कैक दिन लछमी रहतुहुन। तेँ किछु उद्यम करह।’
पिताक बात महाकान्त चुपचाप सुनि लेलक। किछु बाजल नहि। बेटा कऽ चुप देखि फेरि कहलखिन- ‘पाँच लाख रुपैया दइ छिअह, चिमनी चलाबह। उत्तरबरिया बाध मे अपने बीस बीघा ऊँच जमीन छह ओहि मे चिमनी बना लाय।’
‘बड़बढ़ियाँ’ कहि महाकान्तो चुप भ गेल। पिताक मन मे जे जखने काज मे लगि जायत तखने चालि-ढ़ालि बदलि जेतइ। किऐक त काज ओहन कारखाना होइत जहि मे मनुष्य पैदा लइत।
आने साल जेँका अपन काज बचनू करै लगल। पथेरीक देखभाल स ल कऽ हाट-बजार आ घर पर (महाकान्तक) जा रागिनी कऽ ब्राण्डीक बोतल पहुँचबै धरि। महाकान्तो अपन नियमित काज (आने साल जेँका) करै लगल। सबेरे आठ बजे मे जलखै खा मोटर साइकिल स चिमनी पर चलि अबैत। चिमनी पर आबि तीनू गोटे (महाकान्त, सरुप, बचनू) भरि मन गाँजा पीबि महाकान्त अॅाफिसे (चिमनीक कार्यालय) मे सुति रहैत। बारह बजे मे बचनू उठा दइत। उठितहि महाकान्त मुनसी स रुपैया मांगि बचनुए कऽ ब्राण्डी कीनैक लेल बजार पठा दइत आ अपने मुह-हाथ धोय खाइ ले घर पर विदा होइत। घर पर पहुँच धड़-फड़ क खाइत आ चोट्टे घुरि क चिमनी पर आबि सुइत रहैत, जे चारि बजे उठैत। बचनुओ बजार स शराब खरीद घर पर (महाकान्तक घर पर) जा रागिनी कऽ दऽ दइत। कओलेजे जिनगी स दुनू गोटे (महाकान्तो आ रागिनियो) शराब पीबैत। ओना रागिनी ब्राण्डीये टा पीबैत मुदा महाकान्त सब कुछ खाइत-पीबैत। गाँजा, भाँग, इंग्लीस, पोलीथिन, अफीम, ताड़ी सब कुछ। जखन जे भेटल तखन सैह।
आइ जखन बचनू ब्राण्डीक बोतल लऽ रागिनी लग पहुँचल त रागिनीक नजरि मे नव विचार उपकलै। आन दिन रागिनी बचनू स बोतल लऽ रखि लइत। मुदा आइ आदर स बचनू कऽ हाथक इशारा स पलंग पर बैइसैक इशारा केलनि। दुनू गोटे, पलंग पर, आमने-सामने बैसि गेल।
रागिनी- ‘बहुत दिन से मन मे छल जे अहाँ स भरि मन गप करितहुँ। मुदा अहाँ तते धड़फड़ाएल अबै छी जे किछु कहैक मौके ने भेटै अए।’
बचनू- ‘गिरहतनी, हम ते मूर्ख छी। अहाँ पढ़ल-लिखल छी। अहाँ गप्पक जबाव हमरा बुते थोड़े देल हैत।
रागिनी- ‘कोनो की हम अहाँ स शास्त्रार्थ करब जे जबाव देल नइ होएत। अपन मनक व्यथा कहब। जे सबकेँ होइ छै।
मनक व्यथा सुनि बचनू मने-मन सोचै लगल जे हम सब गरीब छी, हरदम (सदिखन) एकटा नै एकटा भूर फूटले रहै अए। मुदा इ (रागिनी) त सब तरहे सम्पन्न छथि। नीक भोजन, दुनू परानी पढल-लिखल। तखन की मन मे बेथा छनि जे हमरा कहती। मुदा तइओ मन कऽ असथिर कऽ रागिनी दिशि देखै लगल। मन उत्सुकता बढै़। मुदा रागिनी चेहरा मे, डूबैत सूर्य जेँका, मलिनता बढ़ैत।
रागिनी- ‘हमरा स अहाँ बहुत नीक जिनगी
जीवै छी।’
अपन प्रशंसा सुनि बचनू गद-गद भऽ गेल। आखि चैकन्ना हुअए लगलै। मन मे ओहन-ओहन विचार सेहो उपकै लगलै जेहेन आइ धरि मन मे नहि आयल छलै। मुदा किछु बाजे नहि। बचनू कऽ चैकन्ना होइत देखि रागिनी कहै लागलि- ‘जहिना अकास मे चिड़ै कऽ उड़ैत देखइ छियै, तहिना अहूँ छी। मुदा हम पिजरा मे बन्न चिड़ै जेँका छी। जखन पढ़ै छलहुँ तखन यैह सोचै छलहुँ जे कोनो कओलेज मे प्रोफेसर बनि जिनगी बिताएव। से सब मने मे रहि गेल। भरि दिन अंगना मे घेराएल रहै छी। ने ककरो से कोनो गप-सप होइ अए आ ने अंगना स निकलि कतौ जा सकै छी। तहू मे असकरुआ परिवार अछि। लऽ दऽ कऽ एकटा सासु छथि। ने दोसर दियादनी आ ने कियो दोसर। भरि दिन पलंग पर पड़ल-पड़ल देह-हाथ दुखा जाइ अए। जाधरि पढ़ै छलहुँ ताधरि दुनिया किछु आरो बुझाइत छल। मुदा आब किछु आर बुझाइत अछि। कखनो मन होइ अए ते किछु पढ़ै छी नै त टी.बी. देखै छी। पिढ़ये कऽ की हैत। ने दोसर के बुझा सकै छी आ ने अपना कोनो काज अछि जहि ले सीखब। जानवरो स बत्तर जिनगी बनि गेल अछि। जहिना गाय-महीस भरि पेट खेलक आ खूँटा पर बान्हल रहल तहिना भऽ गेल छी। मुदा मनुक्ख त मनुख छी। जाधरि अपना मनक बात दोसर कऽ नहि कहबै आ दोसरक पेटक बात नहि सुनबै, ताधरि नीक लागत। अनेरे लोक किअए पढ़ै अए। जँ लकीर कऽ फकीरे बनि जीबैक छैक।
बचनू- सुखल मुस्की दइत बाजल- ‘गिरहतनी, अहाँ के कोन चीजक कमी अछि जे कोनो तरहक दुख हैत?’
रागिनी- ‘अहाँ जे कहलहुँ ओ ठीके कहलौ। किऐक त ऐहनो बुझिनिहारक कमी नइ अछि। ऐहेनो बहुत लोक अछि जे धने कऽ
सब कुछ बुझै छै। मुदा धन त सिर्फ शरीरक भरण-पोषण कऽ सकैत अछि, मनक त नहि। तीनि साल स बेसी ऐठाम ऐला भऽ गेल मुदा ने एक्को टा सिनेमा देखलहुँ आ ने एक्को दिन कतौ घुमै-फिरै ले गेलहुँ। जाधरि बेटी माए-बाप (नैहर) लग रहै अए ताधरि सब कुछ (धन-सम्पत्ति कुटुम्ब-परिवार) अपन बुझि पड़ै छै, मुदा सासुर पाएर दइतहि सब बीरान भऽ जाइ छै। तहिना माए-बापक बीच जे आजादी बेटीक रहै छै ओ सासुर ऐला पर एकाएक बन्न भऽ जाइ छै।
बचनू- ‘जँ कतौ जाइक मन होइ अए वा देखैक मन होइ अए ते नैहर किअए ने चलि जाइ छी?’
रागिनी- ‘जहिना सासुर तहिना नैहरो भऽ गेल। जहिना सासुर मे पुतोहू बनि जीबैत छी तहिना नैइहरो मे पाहुन बनि जाइ छी। जना हम्मर किछु एहि घर मे अछिये नहि। जे घर अप्पन नइ रहत ओहि घर मे ककरा कहबै जे हम फल्लाँ ठीन जायब। जन्म देनिहारि माइयो आने बुझै अए। तइ पर स भाइ-भौजाइक जुइत। इ त नइहरक गप कहलौ आ अहिठामक जे होइ अए से हमहीं बुझै छी। बुरहा (ससुर) जखन आंगन औताह ते बुझि पड़त जे जना अस्सी मन पानि पड़ल छनि। बुढ़ी (सासु) से तऽ कने हँसियो कऽ गप्प करताह मुदा हमरा देखिते कऽ झड़कबाहि उठि जाइत छनि। जँ कहियो माथ पर नुआ (साड़ी) नहि देखलनि त बुढ़ी कऽ अगुआ कऽ की कहताह की नहि, तेकर कोनो ठेकान नहि। भरि-भरि दिन, पहाड़ी झरना जेँका, आखि स नोर झहरैत रहै अए। कियो पोछिनिहार नहि।’
बचनू- ‘गिरहतनी, हमरा बड़ देरी भ गेल। महाकान्त भाइ बिगड़ताह।’
रागिनी- ‘अच्छा, चलि जायब। कहै छलौ जे सदिखन तरे-तर मन औंढ़ (अउढ़) मारैत रहै अए जे लछमी बाई जेँका तलवार उठा परदा-पौस कऽ तोड़ि दी, मुदा साहस नै होइ अए। केरा भालरि जेँका करेज डोलए लगै अए। आइ जखन अपन मनक बात अहाँ कऽ कहलौ ते मन कने हल्लुक बुझि पडै़ अए।’
बचनू- ‘तखन त गिरहतनी हमहीं नीक छी।’
रागिनी- ‘बहुत नीक। बहुत नीक। एते काल जे अहाँ से गप केलहुँ से जना बुझि पड़ै अए जे जना पाकल पीज (घाबक) निकलला पर जे सुआस पड़ै छै तहिना भऽ रहल अछि। आब सब दिन एक घंटा गप्प कएल करब अहाँ कियो आन छी। घरेक लोक छी की ने।’
एक टक स बचनू रागिनीक आखि पर आखि दऽ हृदय देखए लगल। तहिना रागिनियो बचनुक हृदय पढ़ै लगल।

डाक्टर हेमन्त
सब दिन चारि बजे मे उठैबला डाॅक्टर हेमन्त आइ छअ बजे मे उठल। अबेरे कऽ नीनो टुटलनि। ऐना किअए भेलनि? ऐना अइ दुआरे भेलनि जे आन दिन परिवार स लऽ कऽ अस्पताल धरिक चिन्ता दवने रहैत छलनि। तेँ, कहियो भरि-भरि राति जगले रहि जाइत त कहियो-कहियो लगले-लगले निन्न टुटि जाइन। कोनो-कोनो राति अनहोनी-अनहोनी सपना देखि चहा-चहा कऽ उठैत त कोनो-कोनो राति पत्नी स झगड़ैत रहि जाइत। छअ बजे नीन टुटिते हेमन्त घड़ी देखलनि। मुदा अबेरो कऽ निन्न टुटिने मन मे एक्को मिसिया चिन्ता नहि। मन हल्लुक। एकदम फुहराम। जना मन मे चिन्ताक दरस नहि। आन दिन ओछाइने पर ढ़ेरो चिन्ता घेरि लनि। आनेको समस्या, अनेको उलझन मन कऽ गछारि दनि। केसक की हाल अछि, बेटा कऽ नोकरी हैत की नहि। क्लीनिक मे कप्पाउण्डरक चलैत रोगी पतरा रहल अछि। चोट्टा सब दारु पीबि-पीबि अन्ट-सन्ट करैत रहैत अछि आ पाइयेक भँाज मे पड़ल रहैत अछि। जहि स मुह-दुबर रोगी सबहक कुभेला होइ छै। अस्पतालो स बेरि-बेरि सूचना भेटैत अछि जे ड्यूटी मे लापरवाही करै छियै। बातो सत्य छै, मुदा की करब? केस छोड़ि देब त पिताक अरजल सम्पत्ति बहि जायत। क्लीनिक मे कम्पाउण्डर सब कऽ जँ किछु कहबै त क्लीनिके बन्न भऽ जायत। जइ स जेहो आमदनी अछि सेहो चलि जायत। पुरान कम्पाउण्डर सब अछि। सब दिन छोट भाइ जेँका मानैत एलिएै, तेकरा किछु कहबै सेहो उचित नहि। मुदा हमही टा त डाॅक्टर नहि छी, बहुतो छथि। रोगी कऽ की, जैठाम नीक सुविधा हेतइ तइ ठाम जायत। ओझड़ायल जिनगी हेमन्तक। तेँ, सोझ-साझ बिचार मन मे अबिते नहि। मुदा आइ अबेर कऽ उठनहुँ मन मे कोनो ओझरी नहि। किऐक त काल्हिये कोर्ट मे लिखि कऽ दऽ देलखिन जे हमरा अइ (पिताक सम्पति) स कोनो मतलब नहि अछि, तेँ केस स अलग कएल जाय। दोसर बेटो कऽ नोकरी भऽ गेलनि जे ज्वाइन करै काल्हिये माए आ स्त्रीक संग गेल। पिताक देल सम्पत्तिक लड़ाई मे अपनो बीस बर्खक कमाई गेल रहनि। मुदा प्राप्तिक नाम पर जान बचा लड़ाई स अलग भेलाह। मन मे (हेमन्तक) उठलनि जे जहिना पिताक सम्पत्ति मे किछु नहि प्राप्त भेलि तहिना त रमेशो (बेटा) कऽ हमरा अरजल सम्पति मे नहि हेतइ। मुदा हमरा आ रमेश मे अन्तर अछि। हम तीनि भइ छी, जहिक बीच बिवाद भेलि मुदा रमेश त असकरे अछि। ओना हेमन्तक मनक चिन्ता काल्हिये समाप्त भऽ गेलि रहनि, मुदा काजक व्यस्तता मन कऽ असथिर हुअए नहि देलकनि। एक्के बेरि आठ बजे राति मे असथिर भेलाह। तेकर बाद पर-पखाना करैत, हाथ-पाएर धोइत, खाइत नअ बजि गेलनि। भरि दिनक झमारल तेँ ओछाइन पर पहुँचते, नीन अबै लगलनि। रेडियो खोलि समाचार सुनै चाहलनि, सेहो नहि भेलनि। रेडियो बजिते अपने सुति रहलाह।
नीन टुटिते डाॅक्टर हेमन्त कऽ चाहक तृष्णा एलनि। मुदा घर मे कियो नहि। असकरे। नोकर अइ दुआरे नहि रखने जे काल्हि धरि पत्नी, बेटा-पुतोहू सब रहनि। जे सब घरक काज सम्हारैत। ओना चाहक सब समचा घरे मे, मुदा बनौनिहारे नहि। बिछान पर स उठि, नित्य-कर्म केलनि। मन मे एलनि जे चाह पीबि। मुदा चाह आओत कतऽ स। से नइ त पहिने दाढ़िये बना लइ छी, आ क्लीनिक जाय लगब तऽ रस्ते मे चाह पीबि लेब। मुदा भोरे-भोर चाहक दोकान पर त ओ जाइत, जकरा घर-परिवार नइ रहै छै। हमरा त सब कुछ अछि। ओह, से नइ त अपने चाह बना लेब। चाह बना, कुरसी पर बैसि चाह पीबै लगलाह। फाटक पर स आवाज आयल- ‘डाॅक्टर सहाएब, डाॅक्टर सहाएब।’
टेबुल पर कप रखि, फाटक दिशि बढ़ैत डाॅ. हेमन्त कहलखिन- ‘हँ, अबै छी।’
फाटकक बाहर डाकिया (प्यून) कन्हा मे झोरा लटकौने हाथ मे दू टा लिफाफ आ रसीद नेने ठाढ़। डाकिया कऽ ,देखि, मुस्की दइत हेमन्त पूछलखिन- ‘भोरे-भोर कोन शुभ-सन्देश अनलहुँ हेँ?’
मुदा डाकिया किछु बाजल नहि। खाँखी शर्टक उपरका जेबी स पेन निकालि, रसीदो आ पेनो बढ़ा देलकनि। दुनू रसीद पर हस्ताक्षर कऽ दुनू लिफाफ नेने फेरि कुरसी पर बैसि चाहक चुस्की लेलक। एकटा लिफाफ क टेबुल पर रखि, दोसर कऽ खोलि पढै़ लगलाह। सरकारी पत्र मे लिखल- ‘पत्र देखितहि डेरा छोड़ि दिअ। बाढ़ि स बहुत अधिक जान-मालक नोकसान भेलि अछि, तेँ आइये लछमीपुर पहुँच जायब अछि। तहि मे ज कोनो तरहक आनाकानी करब त पुलिसक हाथे पठाओल जायब। एक काॅपी पुलिसोक थाना मे भेजि देल गेल अछि।’
पत्र पढ़ितहि हेमन्त कऽ ठकमूड़ी लगि गेलनि। मने-मन सोचै लगलाह जे घर मे असकरे छी। कोना छोड़ि कऽ जायब। समय-साल तेहेन भऽ गेल अछि जे दिनो-देखार डकैती होइत अछि। कतौ डकैती त कतौ चोइर, कतौ अपहरण त कतौ हत्या सदिखन होइते रहै अए। एहना स्थिति मे घर छोड़ब उचित हैत। मुदा जखन नोकरी करै छी त आदेश मानै पड़त। जँ से नहि मानब त जहिना बीस बर्खक कमाइ कोट-कचहरीक ईंटा गनै मे गेल तहिना जे पाँच बरख नोकरी बचल अछि ओहो ससपेंड, डिस्चार्ज मे जायत। कहियो जिनगी मे चैन नहि। घोर-घोर मन होइत जाइत। चाहो सरा क पाइन भ गेल। गुन-धुन करैत दोसर पत्र खोललनि। पत्र मे लिखल- ‘डाॅक्टर हेमन्त। काल्हि चारि बजे, पछबरिया पोखरिक पछबरिया महार मे जे पीपरक गाछ अछि, ओहि गाछ लग पहुँच हमरा आदमी कऽ दू लाख रुपैया दऽ देवइ। नइ त परसू एहि दुनिया कऽ नहि देखि सकब।’
पत्र पढ़िते केराक भालरि जेँका हेमन्तक करेज डोलै लगलनि। सौँसे देह स पसीना निकलै लगलनि। थरथराइत हाथ स पत्र खसि पड़लनि। मनक बिचार विवेक दिशि बढ़ै लगलनि। जहिना कियो सघन बन मे पहुँच जाइत आ एक दिशि बाघ-सिंहक गर्जन सुनैत त दोसर दिशि सुरुजक रोशनी कम भेने अन्हार बढ़ैत जायत, तहिना हेमन्त कऽ हुअए लगलनि। खाली मन छटपटा गेलनि। की करब, की नै करब, बुझबे ने करथि। जहिना भोथहा कोदारि स सक्कत माटि नहि खुनाइत तहिना हेमन्तोक विचार समस्या कऽ समाधान नहि कऽ पबैत। रस्ते मे विलीन भऽ जायत। कियो दोसर नहि! जे मनक बात सुनैत, जहि स मन हल्लुक होइतनि। तहि काल एकटा कम्पाउण्डर (अस्पतालक) रिक्शा स आबि गेट पर पहुँच, बाजल- ‘डाॅक्टर सहाएब....।
कम्पाउण्डरक अवाज सुनि, धरफड़ा कऽ उठि ,हेमन्त गेट दिशि बढ़लाह। गेट पर रिक्शा लागल। रिक्शा पर दू टा कार्टून लादल। कम्पाउण्डरो आ रिक्शोवला, रिक्शा स हटि, बीड़ी पीवैत। डाॅक्टर हेमन्त पर नजरि पड़ितहि कम्पाउण्डर हाथक बीड़ी फेकि, आगू बढ़ि प्रणाम करैत कहलकनि- ‘लगले तैयार भऽ चलू, नइ ते पुलिस आबि कऽ बेइज्जत करत। बेइज्जत तऽ हमरो करैत मुदा पुलिस अबै स पहिने हम कार्टून रिक्शा पर चढ़बैत रही। तेँ किछु ने कहलक। रस्ता मे अबै छलौं ते मोहनबाबू कऽ गरिअबैत सुनलियनि। तेँ, देरी नइ करु। नबे बजे गाड़ी अछि। सवा आठ बजै अए। अपना दुनू गोटे एक टीम मे छी।’
जहिना जूरशीतल मे मुइलो नढ़िया पर लाठी पटकैत तहिना कम्पाउण्डरक बात सुनि हेमन्त कऽ होइन। मिरमिराइत स्वर मे बजलाह- ‘दिनेश, हमरा त राइतिये से तते मन खराब अछि जे किछु नीके ने लगै अए। एक्को मिसिया देह मे लज्जतिये ने अछि। होइ अए जे तिलमिला कऽ खसि पड़ब।’
कम्पाउण्डर- ‘दवाइ खा लिअ। थोड़बे काल मे ठीक भऽ जायब।’
हेमन्त- ‘देहक दुख रहैत तखन ने, मनक दुख अछि। ओ कोना दवाइ स छुटत।’
हेमन्तक मन आगू-पाछू करैत देखि कम्पाउण्डर कहलकनि- ‘एक त ओहिना मन खराब अछि, तइ पर स पुलिसक गारि आ मारि लागत तखन बुझवै।’
कम्पाउण्डरक बात सुनि हेमन्तक मन आरो मौला गेलनि। मन मे अनेको प्रश्न उठै लगलनि। देरी हैत त पुलिसक डंटा खायब। मुदा घरो छोड़ब त नीक नहि हैत। जखने घर छोड़ब तखने उचक्का सब सबटा लुटि-ढ़गेरि कऽ लऽ जायत। अपने नै रहने क्लीनिको नहिये चलत। अखन ज रमेशो कऽ अबै ले कहबै, सेहो कोना हैत? काल्हिये त ओहो ज्वाइन केलक हेँ। अगर ज ओकरा माइये (पत्नी) कऽ अबै ले कहबनि त ओहो जपाले। किऐक त रोज देखै छियै अपहरणक घटना। हड़बड़बैत कम्पाउण्डर कहलकनि- ‘अहाँ दुआरे हमहूँ नै मारि खायब। हम जाइ छी।’
अधमड़ू भेलि हेमन्त- ‘दू मिनट रुकह। कपड़ा बदलै छी।’
हाँइ-हाँइ कऽ हेमन्त कपड़ा बदलि, बैग मे लूँगी, गमछा, शर्ट, पेन्ट, गंजी रखि विदा भेलाह। रिक्शा पर चढ़िते रहति कि पुलिसक गाड़ी पहुँच गेल। तते हड़बड़ा कऽ विदा भेलि रहति जे मोबाइल, घड़ी, दाढ़ी बनबैक वस्तु छुटिये गेलनि। पुलिसक गाड़ी देखि जे हड़बड़ा कऽ रिक्शा पर चढ़ति रहति कि चश्मा गिरि पड़लनि। जेकर एकटा शीशो आ फ्रेमो टूटि गेलनि। पुलिसक गाड़ी कऽ घुमैत देखि मन मे शान्ति एलनि। रिक्शा पर चढ़ि थोड़े आगू बढ़ला कि डाॅक्टर सुनील कऽ बच्चा सबहक संग बजार स डेरा जाइत देखलखिन। सुनील बावू कऽ देखि कम्पाउण्डर से पूछलखिन- ‘सुनीलबाबू सभ कऽ ड्यूटी नहि भेटिलनि अछि, की?’
कने काल चुप रहि कम्पाउण्डर कहलकनि- ‘नीक-नहाँति त नइ बुझल अछि, मुदा बुझि पड़ै अए जे जे सब अस्पताल मे बेसी समय दइ छथिन, हुनका सब केँ छोड़ि देल गेलनि अछि।’
कम्पाउण्डरक बात सुनि डाॅ. हेमन्त कऽ अपना पर ग्लानि भेलनि। मन पड़लनि सुनील बावूक परिवार आ जिनगी। सुनील बावू सेहो डाॅक्टर। दू भाइक भैयारी। पितो जीविते। चारि बहीनि। जे सब सासुर बसैत। बहीनि सबहक सासुर देहाते मे। जइ ठाम पढ़ै-लिखैक नीक बेबस्था नहि। ओना अपनो सुनीलबाबू गामे मे रहि पढ़ने रहथि। डाॅक्टरी पास केला पर गाम छोड़लनि। भाइयो, दरभंगेक हाई स्कूल मे शिक्षक। परिवारो नमहर। किऐक त माए-बापक संग दुनू भाइक पत्नी आ बच्चा। तइ पर स चारु बहीनिक पढ़ै-लिखैवला बच्चा सब। सुनीलबावूक जिनगी आन डाॅक्टर स भिन्न। मात्र दू घंटा अपन क्लीनिक चलबैत। आठ घंटा समय अस्पताल मे दथि। अपना क्लीनिक मे चारि टा कम्पाउण्डर आ जाँच करैक सब यंत्र रखने। जाँच करैक पाइ मे सब कम्पाउण्डर कऽ परसेनटेज दथि। जहि से काजो अधिक होइत। कम्पाउण्डरो कऽ नीक कमाइ भऽ जायत तेँ इमानदारी स श्रम करैत। ओना सब काज कम्पाउण्डरे कऽ लइत, मुदा हिसाब-बाड़ी आ जाँचक चेक अपने स करैत। जहि स अस्पतालोक जाँच करौनिहार दोहरा क अबैत। आ आन-आन प्राइवेट (खानगी) जाँच घरक काज सेहो पतरायल। ततबे नहि, डाॅ. सुनीलक चरचा सीतामढ़ी, दरभंगा, सुपौल आ समस्तीपुर जिलाक गाम-गामक लोकक बीच होइत। जहिना नदीक (धारक) पानि शान्ति आ अनबरत चलैत रहैत तहिना सुनीलक परिवार। कोनो तरहक हड़-हड़ खट-खट परिवार मे कहियो ने होइत। डाॅक्टर सुनीलक परिवारक संबंध मे सोचैत-सोचैत डाॅक्टर हेमन्त अपनो परिवारक संबंध मे सोचै लगलाह। मन पड़लनि पिता। जे बंगाल स डाॅक्टरी पढ़ि गामे मे प्रेक्टीश शुरु केलनि। किऐक त सरकारी अस्पताल गनल-गूथल। मुदा रोगीक कमी नहि। कमी इलाज आ इलाज कर्ताक। नमहर इलाका। दोसर डाॅक्टर नहि। (गाम-घर मे ओझा-गुनी, झाँड़-फूँक, जड़ी-बुट्टी स इलाज चलैत) ओना डाॅक्टर दयाकान्त (हेमन्तक पिता) सब रोगक जानकार, मुदा तीनिये तरहक रोगक (टूटल हाथ-पाएरक पलस्तर, सापक बीख उताड़ब आ बतहपन्नीक) इलाज स पलखति नहि। तेँ ओझो-गुनीक चलती पूर्ववते। कमाइयो नीक। जहि स दू महला मकानो आ पचास बीघा खेतो किनलनि। तीनू बेटो कऽ खूब पढ़ौलनि। जेठका वकील, मझिला डाॅक्टर आ छोटका प्रोफेसर। जाधरि दयाकान्त जीवैत रहलखिन ताधरि गामो आ इलक्को मे सुसभ्य आ पढ़ल लिखल परिबारक गिनती मे परिबार कऽ होइन। तीनू भाइयोक बीच अगाध स्नेह। जेठ-छोटक विचार सबहक मन मे। जहि स माइयो-बाप खुशी। ओना माए पढ़ल-लिखल नहि मुदा परम्परा स सब बुझैत। जबकि पिता आधुनिक शिक्षा पाबि आधुनिक नजरि स सोचैत। तीनू भाइक (बेटाक) मेहनत देखि पिता केँ इ खुशी होइत जे परिवारक गाड़ी आगू मुहे नीक जेँका ससरत। बेटा सबहक विआह इलाकाक नीक-नीक परिवार मे पढ़ल-लिखल लड़कीक संग केलनि। दहेजो नीक भेटिलनि।
दयाकान्त मरि गेलखिन मुदा स्त्री (हेमन्तक माए) जीविते। तीनू भाइ अपन-अपन जिनगी मे ओझरायल। अपन-अपन परिवारक संग रहैत, घर पर सिर्फ माइये टा। तीनू भाइक परिवारक गारजनी स्त्रीक हाथ मे। एक-दोसर स आगू बढ़ैक सदिखन प्रयास करैत। जहि स गामक संपत्ति पर नजरि जाइ लगलनि। गामक सम्पत्ति अधिक स अधिक हाथ लगे, एहि भाँज मे बौद्धिक व्यायाम नीक-नहाँति करैत। मुकदमा बाजी शुरु भेल। एकटा कोठरी आ दू बीघा खेत माए कऽ कोट स भेटिलनि। बाकी घरो आ खेतो जब्त भ गेल। एक सय चैवालीस लगि गेलइ। पुलिसक ड्यूटी भऽ गेलइ। बीस बर्खक बाद डाॅक्टर हेमन्त लिखि कऽ कोर्ट मे दऽ देलखिन जे हमरा एहि सम्पत्ति स कोनो मतलब नहि।
दरभंगा प्लेटफार्म पर डाॅ. हेमन्त देखलनि ज े दर्जनो डाॅक्टर जाइ रहल छी। दरजनो कम्पाउण्डरो छै। मुदा सबहक मुह लटकल। एक्को मिसिया मुह मे हँसी नहि। जहिना ठनका ठनकला पर सब अपने-अपने माथ पर हाथ रखि साहोर-साहोर करैत तहिना बाइढ़िक इलाकाक ड्यूटी स सबहक मन पर भारी बोझ, जहि स सब मने-मन कबुला-पाती करैत। हे भगबान, हे भगबान करैत। कियो-ककरो टोकथि नहि। आखि उठा कऽ देखि फेरि निच्चा कऽ लथि।
निरमली जाइ बाली गाड़ी पहुँचल। गाड़ी पहुँचते सब, हड़बड़ करैत, अपनो आ समानो सब उठा-उठा गाड़ी मे चढ़ौलनि। हेमन्तो चढ़लाह। कम्पाउण्डर कऽ बीड़ीक तृष्णा लगलै। ओ समान (दुनू कार्टून) चढ़ा उतड़ि क पानक दोकान दिशि बढ़ल। तहि काल पनरह-बीस टा तरकारीबाली आबि, डिब्बा मे कियो छिट्टा चढ़बैत त कियो मोटा। तेसर यात्री सब, तरकारीबालीक काँई-कच्चर सुनि-सुनि, आगू बढ़ि जाइत। कम्पाउण्डरो हाँइ-हाँइ क चारि दम बीड़ी पीबि, दौड़ल आबि बोगीक आगू मे ठाढ़ भऽ गेल। तरकारीबाली सबहक झुण्ड देखि कम्पाउण्डर कऽ मन मे हुअए लगलै जे हमरा चढ़िये ने हैत। चुपचाप निच्चा मे ठाढ़। गाड़ीक भीतर बैसल एकटा पसिन्जर उठि कऽ आबि एकटा मोटा कऽ निच्चा धकेल देलक। जइ तरकारीबालीक मोटा खसल रहै ओ ओहि आदमी (पसिन्जर) क गट्टा पकड़ि निच्चा उताड़ल। निच्चा उतड़ितहि, घोरन जेँका, सब तरकारीबाली लुधकि गेल। गारियो खूब पढ़लक आ मारबो केलक। बोगीक मुह खाली देखि कम्पाउण्डर चढ़ि गेल। गाड़ी कऽ पुक्की दइतहि सब हाँइ-हाँइ कऽ चढ़ै लगल मुदा झगड़ा नै छुटलै। गारि-गरौबलि होइते रहल। जते हल्ला सैाँसे गाड़ी मे, लोकक बजला स होय, ओते सिर्फ ओहि एक्के डिब्बा मे होय। अकछि क, डाॅक्टर हेमन्त सीट पर स उठि उपरका (समान रखैवला) पर जा कऽ बैग क सिरमा मे रखि सुति रहलाह। ओघराइते अपना जिनगी पर नजरि गेलनि। मने-मन सोचै लगलाह जे पिताजी त हमरे सबहक सुख ले ने ओते सम्पत्ति अरजलनि। मुदा, की हमरा सब कऽ ओहि सम्पत्ति स सुख होइ अए? अपनो कमाइ त कम नहि अछि। मुदा चैबीस घंटाक दिन-राति मे चैन स कते समय बीतैत अछि? जहिना खाइ काल फोन अबै अए तहिना सुतै काल। की यैह छी सुख स जिनगी बिताएव? मुदा एहि प्रश्नक उत्तर सोच मे ऐबे ने करनि। फेरि मन उनटि क जिनगीक पाछु मुहे घुरलनि। मन मे एलनि जे जे माए, धाकड़ सन-सन तीनि बेटाक छी, बेचारी कऽ कियो एक लोटा पानि देनिहार नहि। किऐक नहि बेचारीक मन मे उठैत हेतनि जे एहि बेटा स बिनु बेटे नीक? हमरो ऐना नै हैत, तेकर कोन गारंटी।
गाड़ी घोघरडिहा पहुँचल। यात्री सब उतड़बो करए आ बजबो करए जे किसनीपट्टी स आगू लाइन डूबि गेल छै, तेँ गाड़ी आगू नै बढ़त। कम्पाउण्डर उठि क हेमन्तक पाएर डोलबैत बाजल- ‘डाॅक्टर सहाएव, नीन छियै।’
‘नै’
‘सब उतड़ि रहल अछि। गाड़ी आगू (निरमली) नइ बढ़त। उतड़ि जाउ?’
कम्पाउण्डर बात सुनि हेमन्तक मन मे अस्सी मन पानि पड़ि गेलनि। मुदा उपाय की? अधमड़ू जेँका उतड़लथि। प्लेटफार्म पर रिक्शावला, टमटमवला हल्ला करैत जे कोसीक पछबरिया बान्ह पर जायब।’
एकटा रिक्शावला कऽ, हाथक इशारा स कम्पाउण्डर सोर पाड़ि पूछलक- ‘हम सब लछमीपुर जायब। तोरा बुझल छह?’
रिक्शावला- ‘हमरो घर लछमियेपुर छी। बाइढ़िक दुआरे ऐठाम रिक्शा चलबै छी।’
कम्पाउण्डर- ‘अइ ठीन स कना-कना रस्ता हेतइ?
रिक्शावला - ‘अइ ठीन से हम बान्ह पर दऽ आयब। ओइ ठीन से नौ भेटत, जे लछमीपुर पहुँचा देत। अइ ठीन से हम नेने जायब आ अपने भाइयक नौ पर चढ़ा देब।’
कम्पाउण्डर- ‘बड़बढ़िया, कार्टून चढ़ाबह।’
सब कियो रिक्शा पर चढ़ि विदा भेल। पूबरिया गुमती लग, जहिठाम चाउरक बड़का मिलक खंडहर अछि, पहुँच रिक्शावला कऽ हेमन्त पूछलखिन- ‘लछमीपुर केहेन गाम अछि?’
रिक्शावला- ‘बड़ सुन्दर गाम अछि। सन्मुख कोसी से मील भरि पछिमे अछि। गामक सब मेहनती। बाइढ़िक समय मे हम सब रिक्शा चलबै छी आ जखैन पाइन सटकि जाइ छै तखैन जा कऽ खेती करै छी। गाइयो-महीसि पोसने छी। कते गोरे नौ चलबै अए आ कते गोरे मछबारि करै अए। हमरा गामक लोक पंजाब, डिल्ली नइ जाइ अए। आन-आन गाम मे ते पंजाब, डिल्लीक धरोहि लागि जाइ छै। से हमरा गाम मे नइ अए। माछक नाम सुनिते कम्पाउण्डर पूछलक- ‘तब ते माछ खूब सस्ता हेतह?’
‘हँ, कोनो कि जीरा रहै छै। सब अनेरुआ। ऐहेन सुअदगर माछ शहर-बजार मे थोड़े भेटत। शहर-बजारक माछ त सड़ल-सुड़ल पाइनिक डबरा महक रहै अए।’
कोसीक पछबरिया बान्ह पर पहुँचते रिक्शावला अपन भाइयक घाट पर रिक्शा लऽ गेल। भाइयक रिक्शा देखितहि भागेसर नाव पर स बान्ह पर आयल। दुनू भाइ दुनू कार्टून नाव पर रखलक। अधा नाव पर तख्ता विछौने आ अधा ओहिना। तख्ता पर पटेरक पटिया विछाओल। नाव पर बैसि हेमन्त पूब मुहे तकलनि ते बुझि पड़लनि जे समुद्र मे जा रहल छी। सौंसे देह सर्द भऽ गेलनि। मन मे डर पैसि गेलनि जे कोना अइ पाइन मे जायब। मन पड़लनि दरभंगाक पीच परक कार। मुदा एक्सिडेंट त ओतउ होइ छै। ओतउ लोक मरैत अछि। फेरि मन मे एलनि जे महेन्द्रूक नाव जेँका नाव मे इंजनो ने छै। जँ कहीं बीच मे लग्गी छुटि-टुटि जेतइ त भसिये जायब। कतऽ जायब कतऽ नहि। अनायास मन मे एलनि जे अखन धरि कम्पाउण्डर कऽ नोकर जेँका बुझै छेलियै ओ उचित नहि। इ त छोट भाइक तुल्य अछि। नव विचार मन मे उठितहि कम्पाउण्डर कऽ कहलखिन- ‘बौआ, धन्य अछि ऐठामक लोक। जे सचमुच देवीक पूजो करैत अछि आ लड़बो करैत अछि। किऐक ने जिबठगर हैत।’
नौ खुगलै। मांगि सोझ कऽ नइया (नाविक) कमलेसरीक गीति उठौलक। नइयाक लग्गी उठबैत आ पाइन मे रखैत देखि हेमन्त मने-मन सोचै लगलाह जे ऐहन मेहनत केनिहार केँ, कोन जरुरत दवाइ आ व्यायामक छैक। मन पड़लनि रामेश्वरम। समुद्रक झलकैत पानि। जहि मे लहरि सेहो उठैत। तहिना त ओहूठाम पाइनिक लहरि अछि। फेरि मन पड़लनि जेसलमेरक बौल। एहिना उज्जर धप-धप कतौ स कतौ बौल। कमलेसरीक गीत समाप्त होइतहि नाविक कोसीक गीति उठौलक। अजीब साजो। जहिना नाव मे खट-खटक अवाज तहिना लग्गीक। लग्गीक पाइन देहो पर खसै मुदा तेँ कि ओकर पसीना निकलब रुकलै।
डाॅ. हेमन्तक मन फेरि उनटलनि। मिलबै लगलाह समुद्रक लहरि आ कोसीक धाराक। समुद्र रुपी समाज मे सेहो लहरियो (समुद्रजेँका) उठैत अछि आ धारक बेग जेँका सेहो रहैत अछि। कहियो काल समुद्रक लहरि जेँका सेहो लहरि समाज मे उठैत अछि, मुदा ओ धीरे-धीरे असथिर भऽ जाइत अछि। मुदा कोसीक धार जेँका जे बेग चलैत ओ पैघ स पैघ पहाड़ कऽ तोड़ि धारो बना दइत आ समतल खेतो। पुरान स पुरान गामक (अधला परम्परा) परम्परा कऽ तोड़ि नव मे बदलि दइत। जहिना मौसम बदलला पर गाछक पुरान पात झड़ि नव पात स पुनः लदि जाइत, तहिना। असीम विचार मे डूबल हेमन्तक मुह अनायास नाविक कऽ पूछलक- ‘कते दूर अहाँक गाम अछि?’
नइया- ‘छअ कोस।
‘कते समय जाइ मे लागत?
‘भट्ठा दिस जायब (जैब)। तेँ जलदिये पहुँच जैब।’
जल्दीक नाम सुनि हेमन्तक मन मे आशा जगल। मुदा ओ आशा लगले मेटा गेलनि। किऐक त सैाँसे पाइनिये देखथि, गाम-घरक कतौ पता नहि। चिन्तित भऽ चुपचाप भऽ गेलाह। अपना सुइढ़ मे नइया गीत गबैत। मन मे कोनो विकारे नहि। मुदा हेमन्त कऽ कखनो गीत नीको लगनि आ कखनो झड़कबाहियो उठनि। तहि काल एकटा मुरदा भसल जाइत। सबहक नजरि ओहि मुरदा पर पड़ल। मुरदा देखि हेमन्तक नजरि अस्पतालक मुरदा पर गेलनि। मुदा दुनूक दू कारण। एकक जिनगीक अंत रोग स त दोसराक बाढ़ि स। नब-नब समस्या उठि-उठि हेमन्तक मन कऽ घोर-मट्ठा कऽ देलकनि। मनक सब विचार हराइ लगलनि। तहि बीच एकटा किलो चारिऐक रौह माछ कुदि कऽ नाव मे खसल। माछ देखि हेमन्तोक आ कम्पाउण्डरोक मन चट-पट करै लगलनि। लग्गी कऽ मांगि पर राखि भागेसर माछ कऽ पकड़ि, पानि उपछैबला टीन मे रखलक। माछ कऽ टीन मे रखि नइया बाजल- ‘अहाँ सबहक जतरा बनि गेल।’
नइयाक शुभ बात सुनि हेमन्तक मन फेरि ओझरा गेलनि। मन मे उठै लगलनि जे यात्रा ककरा कहबै। घर स विदा भेलहुँ, तकरा कहियै आ कि कार्यस्थल तक पहुँचैक कहियै आ कि काज सम्पन्न कऽ घर पहुँचला पर, तकरा। तहू स आगू जे काजक बीचो मे नव काज उत्पन्न भऽ जाइत। फेरि नइया कऽ पूछलखिन- ‘आब कते दूर अछि?’
हाथ उठा आंगुर स दछिन दिस देखबैत कहलकनि- ‘वैह, हमर गाम छी। गोटे-गोटे जमुनीक गाछ देखै छियै। अधा कोस करीब हैत।
अधा कोस सुनि कम्पाउण्डर चहकि क बाजल- ‘डाॅक्टर सहाएब, पाँच बजै अए। अधा घंटा आरो लागत। साढ़े पाँच बजे तक पहुँच जायब।’ भने सबेरे-सकाल पहुँच जायब। मुदा अकास मे चिड़ै सब नहि उड़ैत। किऐक त चिड़ै ओहि ठाम उड़ैत जहि ठाम रहैक ठौर होइत। मुदा से त नहि। सैाँसे बाढ़िये पसरल। मुदा तइओ गोटे-गोटे मछखौका चिड़ै जरुर उड़ैत। लछमीपुर दिशि अबैत नाव कऽ देखि गामक धियो-पूतो, स्त्रीगणो आ गोटे-गोटे पुरुखो घाट पर ठाढ़ भऽ एक दोसर स कहैत।
‘चाउर-आँटाबला छियै।’
‘नुओ-बसतर हेतइ।’
‘तिरपालो (पोलीथीन) हेतइ।’
‘बड़का हाकीम सब छियै।’
घाट पर आबि नाव रुकल। मुदा पेंट-शर्ट पहिरने डाॅक्टर आ कम्पाउण्डर कऽ देखि जनिजाति सब मुह झपै लागलि। मरद सब सहमि गेल। घीया-पूता डरा गेल। नाव कऽ बान्हि नइया सुलोचना कऽ कहलक- ‘गै सुलोचना डाकडर सैब सब छथिन। बक्सा मे दवाइ छियै। हम दवाइ उताड़ै छी तू टीन उताड़। टीन मे एकटा नमहर माछ छौ। खूब नीक जेँका माछ के तड़ि डाकडर सहैब के खुआ दहुन।’
माछ उताड़ि सुलोचना अंगना लऽ गेल। टीन रखि बाड़ीक कल पर आबि हाथ धोय, आँचर स हाथ पोछि, स्कूलक ओछाइन झाड़ि बिछबै लागलि। बिछान बीछा, दौड़ि कऽ आंगन स बड़का जाजीम आ दू टा सिरमा आनि लगौलक। हेमन्तो आ दिनेशो आगू मे ठाढ़। मुदा ओते लोकक बीच हेमन्तोक आ दिनेशोक नजरि सुलोचनेक देह आ काज पर नचैत। बिछान बीछा सुलोचना हेमन्त कऽ कहलकनि- ‘डाॅक्टर सहाएव, बिछान बिछा देलहुँ, आब आराम करु।’
दिनेश चुप्पे। मुदा हेमन्त बजलाह- ‘बुच्ची, देह भारी लगै अए। ओना नाव पर आरामे से एलहुँ। मुदा तइओ देह भरिआयल लगै अए। पहिने नहाएब।’
‘बड़बढ़िया’ कहि सुलोचना आंगन बाल्टी-लोटा अनै गेलि। आंगन सऽ बाल्टी-लोटा नेने कल पर पहुँचल। दुनू क माटि स माँजि, बाल्टी मे लोटा रखि, पाइन भरि, हेमन्त कऽ कहलक- ‘डाॅक्टर सहाएव, नहा लिअ।’
चहार देबाली स घेरल टंकी पर नहाइवला डाॅक्टर हेमन्त खुला धरती-अकासक बीच नहाइ ले जयताह। तेँ किछु सोचै-बिचारैक प्रश्न मन मे उठि गेलनि। मुदा बहुत सोचैक जरुरत नहि पड़लनि। अपना-अपना उमरवला सब कऽ डोरीबला पेंट आ तइ पर स ककरो लूंगी त ककरो चारि हत्थी तौनी पहिरने देखलखिन। ओहो सैह केलनि। मुदा बारह बर्खक सुलोचना कल पर स हटल नहि। मातृत्वक दुआरि पर पहुँचल सुलोचना मे फुलक टूस्सी जरुर अबि गेल छलै। मुदा हेमन्तोक मन मे डाॅक्टरक विचार। ओना डाॅक्टर हेमन्त शरीरक सब अंगक गुण-धर्म बुझैत मुदा ऐहनो त वस्तु अछि जे गर्म हवाक रुप मे रहैत। जहि मे आनन्द आ सृजनक गुण होइत। सुलोचनो मे फूलक कोढ़ीक, जे सुगंधक वाल्यावस्था मे प्रस्फुटित होइत, महमही हवा मे। एक लोटा माथ पर पानि ढ़ारलाक वाद हेमन्तक मन मे आयल जे अखन हम दुनियाक ओहि धरती पर छी जहि ठाम जीवन-मरण संगे रहैत अछि। मुदा तहिठाम ऐहेन सौम्य, सुशील अल्हड़ बाला कते खुशी स चहचहा रहल अछि।
तीनि साल पहिलुका बात छियै। जहि बाढ़ि मे कतेक गाम, कतेको मनुष्य आ कतेको सम्पत्ति नष्ट भेलि छल। तेँ कि? जे बचल अछि ओ ओहि गाम कऽ छोड़ि
देत। कथपपि नहि। मुदा बाढ़ि अनहोनी नै रहै। बरेजक फाटक खोलल गेलइ। फाटको खोलैक मजबुरी रहै। किऐक त बरेजक उत्तर तते पाइनिक आमदनी भऽ गेलइ जे दुर्दशाक अंतिम शिखर पर पहुँच सकैत छलै। मुदा, सुदूर गाम मे जानकारीक साधन नहि। ने बँचैक उपाय। दुनू बान्हक (कोसीक) बीच समुद्र जेँका पानि पसरि गेलइ। थाह स अथाह धरि। कुनौली स दछिन, कोसी धारक कात मे एकटा गाम। ओहि गामक सुलोचना। जेकर सब कुछ (मनुख स घर धरि) दहा गेलइ। मुदा सुलोचना जे बँचल से पढ़ै ले कुनौली गेलि छल। स्कूल स घर जाइ काल बाइढ़िक दृश्य देखलक। दृश्य देखि, बान्हे पर बपहारि कटै लागलि। तहि काल लछमीपुरक चारि गोटे, बजार स समान खरीद नाव लग अबैत रहए। सुलोचना कऽ कनैत देखि जीयालाल पूछलकै- ‘बुच्ची, किअए कनै छेँ?’
कनैत सुलोचना- ‘बाबा, हम पढ़ै ले गेल छेलौ। तै बीच हमर गामे दहा गेल। आब हम कत-अ रहब?’
जीयालाल- -‘हमरा संगे चल। जहिना बारह टा पोता-पोती कऽ पोसै छी तहिना तोरो पोसबौ।’
जीयालालक विचार सुनि सुलोचलाक हृदय मे जीवैक आशा जगल। कानब रुकि गेलइ। मुदा कखनो-काल हिचकी होइते। नाव पर सब समान रखि चारु गोटे बान्ह पर आबि चीलम पीबैक सुर-सार करै लगल। एक भाग मे सुलोचनो किताव नेने बैसलि। बटुआ खोलि रघुनी चीलम, कंकड़क डिव्वा आ सलाइ निकालि बीच मे रखलक। एक गोटे चीलमक ठेकी निकालि, चीलमो आ ठेकियो कऽ साफ करै लगल। दोसर गोटे डिब्बा स कंकड़ निकालि तरहत्थी पर औंठा स मलै लगल। चीलम साफ भेलइ। ओहि मे ठेकी द, कंकड़वलाक हाथ मे देलक। कंकड़वला चीलम मे कंकड़ बोझि दुनू हाथ स चीलमक पैछला भाग पकड़ि मुह मे भिरौलक। मुह मे भिरबितहि रघुनी सलाइ खररि कंकड़ मे लगबै लगल। दू-चारि बेरि मुहक इंजन स प्रेशर दइते चीलम सुनगि गेल। चीलम कऽ सुनगितहि तते जोर से दम मारलक जे धुआँक संग-संग धधरो उठि गेलइ। मुदा चीलमक दुषित हवा स धधरा मिझा गेल। बेरा-बेरी चारु चीलम पीवि, मस्त भ नाव दिशि विदा भेलि। साँझू पहर क जहिना गाय-महीसि बाध स घर दिशि अबैत। जकरा पाछु-पाछु छोट-छोट नेरु (लेरु) पड़ड़ू झुमैत, लुदुर-लुदुर मगन भऽ चलैत, तहिना सुलोचना लछमीपुरवला सबहक संगे पाछु-पाछु नाव पर पहुँचल। नाव पर चढ़िते लग्गा चलौनिहार कोसी महरानीक दुहाई देलक। सुलोचनो बाजलि- ‘जय।’
नाव खुगल। लछमीपुरक चारु गोटेक मन सुलोचनाक जिनगी पर। मुदा सुलोचनाक परिवारक विछोह दुख स सुख दिशि जाय लगल। जे सुलोचना गाम आ परिवार क कतौ अता-पता नइ देखलक, ओहि सुलोचनाक मन मे उठै लगल जे गाम-घर भलेही दहा गेल मुदा माए-बाप जरुर जीवैत हैत। किऐक त मनुक्ख निर्जीव (निरजीव) नहि सजीव होइत। बुद्धि-विवेक होइत। तेँ, ओ दुनू गोटे जरुर कतौ जीवैत हैत। जे आइ नै काल्हि जरुर मिलवे करत। तेँ मन मे जिनगी भरिक दुख नहि, किछु दिनक दुख अछि। जे कहुना नहि कहुना कटिये जायत। नाव लछमीपुर पहुँचल। जीयालालक बारहो टा पोता-पोती दौड़ि कऽ नाव लग आइल। पोता-पोती कऽ देखि जीयालाल कहलक- ‘बाउ, तोरा सब ले एकटा बहीनि नेने ऐलियह। सुलोचना सबहक (पोता-पोतीक) पहुन भऽ गेलि। दोसर दिन जीयालाल एकटा घर बना, सुलोचना कऽ गामक बच्चा सभकेँ पढ़बै ले कहलक। गामक बच्चा सब केँ सुलोचना पढ़बै लागलि। वैह सुलोचना।
हेमन्तो दिनेशो नहायल। नहा कऽ, जाबे हेमन्त कपड़ा बदलि, केश सरिया, तैयार भेलाह ताबे सुलोचनो आ कमलियो (जीयालालक जेठकी पोती) चूड़ा भूजि, माछ तड़ि लेलक। दू टा थारी मे चूड़ाक भुजा आ तड़ल माछ साँठि दुनू बहीनि दुनू थारी नेने हेमन्त लग पहुँच आगू मे रखि देलक। बड़का फुलही थारी तइ मे चूड़ाक उपर मे माछक नमहर-नमहर तड़ल कुट्टिया पसारल। थारी रखि कमली पाइन अनै गेलि। सुलोचना आगू मे बैसि गेलि। दुनू गोटे खाइत-खाइत दसो माछक कुट्टिया आ थारियो भरि चूड़ा खा लेलनि। शुद्ध आ मस्त भोजन। पानि पीबि ढ़कार करैत दिनेश बाजल- ‘डाॅक्टर सहाएव, आइ धरि हम एते नइ खेने छलौ।’
हेमन्त- ‘से त हमरो बुझि पड़ै अए।’
सुलोचना- ‘डाॅक्टर सहाएव चाहो पीबै?’
हेमन्त- ‘पीबै त जरुर, मुदा दू घंटाक बाद। ताबे किछ काज करब। ओना साँझ पड़ि गेल मुदा जाबे फरिच (फरिच्छ) छै ताबे दसो-पाँच टा रोगी जरुर देखि लेब।’
सुलोचना- ‘अच्छा, अहाँ तैयार होउ, हम लोक सब (रोगी) कऽ बजौने अबै छी।’
कम्पाउण्डर कार्टून खोलि, दवाइ निकालि पसारि देलक। रोगी अबै लगल। रोगी देखि-देखि हेमन्त कम्पाउण्डर कऽ कहति जाथिन आ कम्पाउण्डर दबाइ दइत जाए। अस्पताल जेँका त सब रंगक रोगी नहि। किऐक त बाइढ़िक इलाका तेँ गनल-गूथल रोग। दवाइयो तेहने। तीनिये दिन मे सौँसे गामक रोगी कऽ देखि डाॅक्टर हेमन्त निचेन भऽ गेलाह। मुदा सात दिनक डयूटी। तहू मे कठिन रास्ता। मुदा पाइन टूटै लगलै। पाँचम दिन जाइत-जाइत रास्ता सूखि गेल। मुदा थाल-खिचार रहबे करै।
आठम दिन भोरे हेमन्त सुलोचना कऽ कहलखिन- ‘बुच्ची, आइ हम चलि जायब।’
सुलोचना- ‘इ त मिथिला छियै डाॅक्टर सहाएव, बिना किछु खेने-पीने कना जायब?’
कहि सुलोचना चाह बनवै गेलि। एकटा दोस्त स भेेटि करए कम्पाउण्डर गेल। असकरे हेमन्त। मने-मन सोचै लगलथि जे सात दिनक समय जिनगीक सबसँ कठिन आ आनन्दक रहल। इ कहियो नै बिसरि सकै छी। बिसरैवला अछियो नहि। आइ धरि ऐहेन जिनगीक कल्पनो नइ केने छलहुँ, जे बीतल। ऐहेन मनुक्खक सेवो करैक मौका पहिल बेरि भेटल। मौके नहि भेटलि, बहुत किछु देखैक, भोगैक आ सीखैक सेहो भेटल। आइ धरि हम रोगीक (सचमुच जकरा जरुरत छै) सेवा नइ केने छलहुँ, सिर्फ पाइ कमेने छलहुँ। गाम-घर मे जकरा पाइ छै वैह ने दरभंगा इलाज करबै जाइत अछि। जकरा पाइ नइ छै ओ त गामे मे छड़पटा (छटपटा) कऽ मरैत अछि।
तहि बीच सुलोचना चाह नेने आइलि। कप बढ़बैत बाजलि- ‘मन बड़ खसल देखै छी, डाॅक्टर सहाएव।’
हेमन्त- ‘नहि! कहाँ। एकटा बात मन मे आबि गेल तेँ किछु सोचै लगलहुँ।’
सुलोचना- ‘अइ ठीन केहेन लगै अए डाॅक्टर सहाएव?’
सुलोचनाक प्रश्नक उत्तर नहि दऽ हेमन्त चुप्प रहलाह।
हेमन्त कऽ चुप देखि सुलोचना बाजलि- ‘हम त बच्चा छी डाॅक्टर सहाएव, तेँ बहुत नै बुझै छी। मुदा तइयो एकटा बात कहै छी। जहिना चीनी मीठ होइत अछि आ मिरचाइ कड़ू। दुनू मे कीड़ा (पिल्लु) फड़ै छै आ ओहि मे जीवन-यापन करैत अछि। मुदा चीनीक कीड़ा के जँ मिरचाइ मे दऽ देल जाय त एको क्षण नइ जीबित रहत। उचितो भेलइ। मुदा की मिरचाइक कीड़ा चीनी मे देलाक बाद जीवित रहत? एकदम नइ रहत। तहिना गाम आ बाजारक जिनगी होइत।’
सुलोचनाक बात सुनि डाॅक्टर हेमन्त मने-मन सोचै लगलथि जे बात ठीके कहलक। अहिना त मनुक्खो मे अछि। मुदा ओ हैत कना । जाधरि (जाबे) समाजिक जीबन मे समरसता नइ आओत ताधरि (ताबे) एहिना होइत रहत।
दस बजे भोजन कऽ दुनू गोटे (हेमन्त आ दिनेश) लूँगी, गंजी पहीरि, सब कपड़ो आ जूत्तो कऽ बैग मे रखि, पाएरे विदा भेलाह। हेमन्तक बैग सुलोचना आ दिनेशक बैग कमली लऽ पाछु-पाछु चललि। किछु दूर गेला पर हेमन्त कहलखिन- ‘बुच्ची, आब तों सब घुरि जा।’
हेमन्तक बात सुनि सुलोचनाक आखि नोरा गेल। डाॅक्टर हेमन्त कऽ बैग पकड़बैत बाजलि- ‘अंतिम प्रणाम, डाॅक्टर सहाएब।’
एकाएक हेमन्तक हृदय स प्रेमक अश्रुधारा प्रवाहित हुअए लगलनि। मुह स प्रणामक उत्तर नइ निकललनि। मूड़ी निच्चा केने आगू बढ़ि गेलाह। मुदा किछुए दूर आगू बढ़ला पर बुझि पड़लनि जे चारि टा तीर (सुलोचना आ कमलीक आखि) पाछु स बेधि रहल अछि। पाछु उनटि कऽ तकलनि त देखलखिन जे दुनू गोरे ठाढे़ अछि। मन भेलनि जे हाथक इशारा स जाइ ले कहि दिअए मुदा अपना रुप पर नजरि पड़ि गेलनि। खाली पाएर, जाँध तक समटल (उलटा कऽ मोड़ल) लूँगी, देह मे सेन्डो गंजी, माथक केश फहराइत। तइ पर स थालक छिटका घुट्ठी स ल कऽ माथ धरि पड़ल। हाथक इशारा स सुलोचना कऽ सोर पाड़लखिन। दुनू (सुलोचनो आ कमलियो) हँसैत आगू बढ़ल। लग मे देखि हेमन्तोक हृदय मे हँसी उपकल। मुस्की दइत हेमन्त- ‘बुच्ची, हम अपन दरभंगाक पता कहि दइ छिअह। अविहह।’
सुलोचना- ‘हम त शहर-बजार मे हराइये जायब डाॅक्टर
सहाएव। अहाँ जावे हमरा गाम मे छेलौ ताबे बुझि पड़ैत छल जे दरभंगा अस्पताल गामे मे अछि।’ कहि पाएर छुबि घुरि गेल।
बान्ह पर आबि दुनू गोरे थाल-कादो धोय, पेन्ट-शर्ट पहीरि स्टेशन दिशि बढ़लाह। गाड़ी पकड़ि दरभंगा पहुँच गेलथि।

अपराजित

अन्हरगरे करियाकाका लोटा नेनहि मैदान दिशि स आबि रस्ते पर स बोली देलखिन.......।
हमहूँ मैट्रिकक परीक्षा दइ ले जाइक ओरियान करैत रही। ओना हमर नीन बड़ मोट अछि मुदा खाइये बेरि (राति मे) मे माए कऽ कहि देने रहियै जे कने तड़गरे उठा दिहें नइ त गाड़ी छुटि जायत। किऐक त साढ़े पाँचे बजे गाड़ीक समय अछि। आध घंटा स्टेशन जाइयो मे लगैत अछि। तेँ, पौने पाँच बजे घर स विदा होएव तखने गाड़ी पकड़ाएत। जँ इ गाड़ी छुटि जायत त भरि दिन रस्ते मे रहब। निरमली स जयनगरक लेल एक्के टा डायरेक्ट गाड़ी अछि। नहि त सब गाड़ी सकरी मे बदलै पड़ैत अछि। तहू मे बसवला सब तेहेन चालाकी केने अछि जे एक्को टा गाड़ीक मेलि नहि रहए देने अछि। तीनि-चारि घंटा सकरीक प्लेटफार्म पर बैसू तखन दरभंगा दिशि स गाड़ी आओत। तहू मे तेहेन लोक कोंचल रहत जे चढ़बो मुश्किल। तेँ इ गाड़ी पकड़़ब जरुरी अछि। ततबे नहि, अपन स्कूलक विद्यार्थियो सब यैह (अइह) गाड़ी पकड़त। अनभुआर इलाका, तेँ असगर-दुसगर जाइबो ठीक नहि। सुनै छी जे ओहि इलाका मे उचक्को बेसी अछि। जँ कहीं कोनो समान उड़ौलक त आरो पहपटि मे पड़ि जायब। करिया कक्काक बोली सुनि चिन्है मे देरी नइ भेलि। किऐक त हुनकर अबाज तेहेन मेही छनि जे आन ककरोक बोली स नहि मिलैत। बोली अकानि हम दरबज्जेक कोठरी स कहलिएनि- ‘कक्का, आउ-आउ। हमहूँ जगले छी। पँचबजिया गाड़ी पकड़ैक अछि तेँ समान सब सरिअबै छी।’
रस्ता पर स ससरि काका दरवज्जाक आगू मे आबि कहलनि- ‘कने हाथ मट्टिया लइ छी। तखन निचेन स बैसवो करब आ गप्पो करब ।’
कहि पूब मुहे कल दिशि बढ़लाह। हमहूँ हाँइ-हाँइ समान सरिअबै लगलौ। कल पर स आबि काका ओसारक चैकी तर मे लोटा रखि अपने चैकी पर बैसलाह। चैकी पर वैसितहि गोलगोलाक (गोल गलाक) जेबी स बिलेती तमाकुलक पात निकालि तोड़ैत बजलाह- ‘भाय सहाएब कहाँ छथुन?’
‘ओ काल्हिये बेरु पहर नेवानी (नवानी) गेला, से अखन धरि कहाँ ऐलाह हेन।’
‘हमर बात सुनि, करिया काका चुनौटी स चून निकालि तरहस्थी पर लइत बजलाह- ‘अखन जाइ छी, हैत (होएत) त ओइ बोरि मे फेरि आयब।’
काकाक वापस हैब (होएव) हमरा नीक नहि लागल। किऐक त लगले ऐलाह आ चोट्टे घुरि जेताह। तेँ बैइसै दुआरे बजलहुँ- ‘अहाँ त कक्का गाम मे दगबिज्जो कऽ देलियैक। एत्ते खर्च कऽ कऽ कियो कन्यादान नहि केने छलाह। अहाँ रेकर्ड बना लेलियैक।’
अपन प्रशंसा सुनि करिया काका मुस्कुराइत बजलाह- ‘ बौआ, युग बदलि रहलि अछि। तेँ, सोचलहुँ जे नीक पढ़ल-लिखल बड़क संग बेटीक विआह करब। हमरो बेटी त बड़ पढ़ल-लिखल नहिये अछि। मुदा रामायण, महाभारत त धुरझार पढ़ि लइत अछि। चिट्ठियो-पुरजी लिखिये-पढ़ि लइत अछि। घर-आश्रम जोकर त ओहो पढ़नहि अछि। ओकरा कि कोनो नोकरी-चाकरी करैक छैक जे स्कूल-कओलेजक सर्टिफिकेट चाहियैक। अपना सब गिरहस्त परिवार मे छी तेँ बेटी कऽ बेसी पढ़ाएव नीक नहि।’
‘किअए?’
अपना सबहक परिवर मे गोंत-गोबर स लऽ कऽ थाल-कादो धरिक काज अछि। ओ त घरेक लोक करत। तइ मे देखवहक जे जे स्त्रीगण पढ़ल-लिखल अछि ओ ओहि काजक भीड़ि नहि जाय चाहतह। आब तोंही कहह जे तखन गिरहस्ती चलतै कोना?’
काकाक तर्कक जबाव हमरा नहि फुड़ल। मुदा चुप्पो रहब उचित नहि बुझि कहलिएनि- ‘जखन युग बदलि रहल अछि तखन त सबकेँ शिक्षित होएव जरुरी अछि की न?’ सब पढ़त सब नोकरी करत। नीक तलब उठाओत। जहि स घरक उन्नति आरो तेजी स होएत। तहू मे महिला आरक्षण भेने नोकरियो मे बेसी दिक्कत नहिये होएत।’
करियाकाका- ‘कहलह त बड़ सुन्दर बात, मुदा एकटा बात कहह जे दुनू गोटे (मर्द-औरत) एक्के स्कूल वा आॅफिस मे नोकरी करत तखन ने एकठाम डेरा रखि परिवार चलौत। मुदा जखन पुरुष दोसर राज्य वा दोसर जिला वा दस कोस हटि क नोकरी करत तखन कोना चलतै। परिवार त पुरुष-नारीक योग स चलैत अछि की ने। परिवार मे अनेको ऐहेन काज अछि जे दुनूक मेल (सहयोग) स होएत। मनुष्य त गाछ-विरीछ नहि ने छी जे फलक बीआ (आँठी) कतौ फेकि देवइ त गाछ जनमि जायत। आब त तोहूँ कोनो बच्चा नहिये छह जे नै बुझबहक। मनुष्यक बच्चा नअ मास (270 दिन) माइक पेट मे रहैत अछि। चारि-पाँच मासक उपरान्त माइक देह मे (बच्चाक चलैत) कते रंगक रोग-व्याधिक प्रवेश भऽ जाइत छैक। किऐक त माइक संग-संग बच्चोक विकासक लेल अनुकूल भेजन, आराम आ सेवाक आवश्यकता होइत। तखन (माए) असकरे की करत? नोकरी करत आ कि पालन करत? एहि लेल त दोसरेक मदतिक जरुरत होइत।’
‘आन-आन देश मे त मर्द-औरत सब नोकरी करैत अछि आ ठाठ स जिनगी वितबैत अछि।’
करियाकाका- ‘आन देशक माने इ बुझै छहक जे जत्ते दोसर देश अछि सबहक रीति-नीति जीवन शैली एक्के रंग छैक? नहि। एकदम नहि। किछु देशक एक रंगाहो अछि। मुदा फराक-फराक सेहो अछि। हँ, किछु ऐहन अछि जहि ठाम मनुष्य सार्वजनिक सम्पत्ति वुझल जाइत छैक। ओहि देशक व्यवस्थो दोसर रंगक अछि। सब तरहक सुविधा सबहक लेल अछि। तहि ठामक लेल ठीक अछि। मुदा अपना ऐठाम (अपना देश) त से नहि अछि। तेँ, एहिठामक लेल ओते नीक नहि अछि जते अधलाह।’
अपना कऽ निरुत्तर होइत देखि बात कऽ विराम दइक विचार मन मे उठै लगल। तहि बीच आंगन स माए आबि गेलीह। माए कऽ देखितहि हम अपन समान सरिअबै कोठरी दिशि बढ़ि गेलहुँ।
करिया काका कऽ देखि माए कहलकनि- ‘बौआ अहाँ त गाम मे सब केँ उन्नैस कऽ देलियै। आइ धरि, गाम मे, बेटी विआह मे एते खर्च कियो ने केने छलाह।’
अपन बहादुरी सुनि मुस्कुराइत करिया काका कहलखिन- ‘भौजी अपराजित कऽ असिरवाद दिऔ जे नीक जेँका सासुर बसे।’
माए- ‘भगवान हमरो औरुदा ओकरे देथुन जे हँसी-खुशी स परिवार बनावे। पाहुन-परक त सब चलि गेल हेताह?’
करियाकाका- ‘हँ भौजी। कल्हि सत्यनारायण भगवानक पूजा कऽ हमहूँ निचेन भऽ गेलहुँ। पाहुन मे पाहुन आब एक्के टा सरहोजि टा रहि गेल अछि। ओहो जाइ ले छड़पटाइ अए। मुदा ओकरा पाँच दिन आरो रखै चाहै छी।’
माए- ‘जहिना एकटा काज कऽ (बेटीक विआह) खेलौना जेँका गुड़केलहुँ तहिना दोसर (सरहोजि) कऽ आब गुड़कबैत रहू।’
सरहोजि दिशि इशारा होइत देखि कक्का बुझि गेलखिन। मकैक लावा जेँका बत्तीसो दाँत छिटकबैत- ‘धरमागती पूछी त भौजी एते भारी काज-जे ने खाइक पलखति होइत छल आ ने पानि पीबैक। तीनि राति एक्को बेरि आखि नहि मुनलौ। मुदा ओकरो (सरहोजि) धन्यवाद दिअए जे धिरनी जेँका दिन-राति नचैत रहलि। ओते फ्रीसानी रहए तइओ कखनो मुह मलिन नहि। सदिखन मुह स लबे छिटकैत। तेँ सोचे छी जे पाँच दिन पहुनाइ करा दिअए।’
माए- ‘बच्चा कइ-ए टा छैक?’
‘एक्को टा नहि। तीनिये साल स सासुर बसै अए। उमेरो बीस-बाइस बर्ख सऽ बेसी नहिये हेतइ।’
‘आब त लोक कऽ बिआहे साल बच्चा होइ छै आ अहाँ कहै छी जे तीनि साल स सासुर बसै अए।’
‘ऐँह, हमरा त अपने पान सालक बाद भेलि आ अहाँ तीनिये साल मे हदिआइ छी। अच्छा एकटा बात हमहीं पूछै छी जे भैया ने हमरा से साल भरि जेठ छथि मुदा अहाँ त साल छौ मास छोटे होएब। अहों कोन-कोन गहबर, आ ओझा-गुनी लग गेलि रही।’
अपना क हारैत देखि, बात (विषय) बदलैत माए बाजलि- ‘सब मिला कऽ कते खर्च भेल?’
करियाकाका- ‘धरमागती पूछी त भौजी हमहूँ कंजुआइ केलियै। मुदा तइओ पाँच लाख स उपरे खर्च भेल। तीनि लाख त नगदे गनि कऽ देने छलिऐक। तइ पर स डेढ़ लाखक समान (गहना, बरतन, लकड़ीक समान, कपड़ा) देलियै। पचास हजार स उपरे बरिआतीक सुआगत मे लागल। तइ पर स झूूठ-फूस मे सेहो खर्च भेल।’
‘एते खर्च केलियै तखन किअए कहै छिअए जे हमहूँ कंजुआइ केलियै?’
‘देखिओ भौजी, हमरा दस बीधा खेत अछि। तेकर बादो कते रंगक सम्पत्ति अछि। गाछ-बाँस, घर-दुआर, माल-जाल। अइ सब कऽ छोड़ि दइ छी। सिर्फ खेतेक हिसाब करै छी। अपना गाम मे दस हजार रुपये कट्ठा स लऽ कऽ साठि हजार रुपये कट्ठा जमीन अछि। ओना सहरगंजा जोड़बै त पेंइतीस हजार रुपये कट्ठा भेलि। मुदा हम्मर एक्कोटा खेत ओहन नहि अछि जेकर दाम चालीस हजार रुपये कट्ठा स कम अछि। बेसियोक अछि। मुदा चालिसे हजारक हिसाव स जोड़ै छी त आठ लाख रुपये बीधा भेलि। दस बीधाक दाम अस्सी लाख भेलि। तीनि भाइ-बहीनि अछि। हमरा लिये त जेहने बेटा तेहने बेटी। अनका जेँका त मन मे दुजा-भाव नै अछि। आब अहीं कहू जे कोन बेसी खर्च केलियै।’
बातक गंभीरता कऽ अंकैत माए- ‘अहाँ विचारे बेटीक विआह मे कते खर्च बाप कऽ करै चाहियैक?’
करियाकाका- ‘देखियौ भौजी, जे बात अहाँ पुछलहुँ ओकर जबाव सोझ-साझ नहि अछि। किऐक त जते रंगक लोक आ परिवार अछि तते रंगक जिनगी छैक। मुदा अनका जे होउ, हमरा मन मे इ अछि जे बेटा-बेटी एक-रंग जिनगी जीवए। मुदा समस्यो गंभीर अछि। धाँइ दे किछु कहि देने नहि हेतइ।’
‘एते लोक सोचै छै?’
‘से ज नहि सोचै छै तेँ ने एना होइ छै। जँ अपने कोनो बात नहि बुझियै त दोसर स पूछैइयो मे नहि हिचकिचेवाक चाही।’
अपराजितक विआह कन्हैयाक संग भेलि। जेहने रिष्ट (हिरिष्ट) पुष्ट शरीर अपराजितक तेहने कन्हैयाक। दुनूक रंग मे कने अन्तर। जहिठाम कन्हैया लाल गोर तहिठाम अपराजित पिंडश्याम। (ने अधिक कारी आ ने अधिक गोर) जहि स दाय-माएक अनुमान जे किछु दिनक उपरान्त दुनूक रंग मिलि जायत। अर्थात् एकरंग भऽ जायत।
विआहक तीनि मास बाद कन्हैयाक बहाली कओलेजक डिमोसट्रेटरक पद पर भेल। नोकरी पबितहि सासुरेक रुपैया (दहेजवला) स दरभंगा मे डेढ़कट्ठा जमीन कीनि घर बना लेलक। गाम स शहर दिशि बढ़ल। जहि स जिनगी मे बदलाव हुअए लगल। एक दिशि आधुनिकता (बजारु आधुनिकता) जोर पकड़ै लगलै त दोसर दिशि ग्रामीण जिनगीक रुप टूटै लगलै। रंग-विरंगक भोग-विलाशक वस्तु स घर सजवै लगल। पाइयक अभावे ने बुझि पड़ैत। किऐक त भैयारी मे असकरे। तेँ गामक सब सम्पति (जमीन) बेचि-बेचि आनए आ मौज करए। मिथिला कन्या अपराजित। तेँ पतिक काज मे हस्तक्षेप नहि करै चाहैत। पति-पत्नीक बीच ओहने संबंध जेहेन अधिकांशक।
शिक्षाक स्तर गिरल। अजाति सब सरस्वतीक मंदिर मे प्रवेश केलक। जहिठाम टयूशन (प्राइवेट) पढ़ाएव अधलाह काज बुझल जाइत छल, से प्रतिष्ठित भऽ गेल। परिणाम भेल जे टयूशन कऽ अधलाह (पाप) वुझनिहार शिक्षक स्वयं मूर्खक प्रतीक बनि गेलाह। अवसरक लाभ अज्ञानी कऽ बेसी भेलइ। पाइ-कौड़ीवला कन्हैया कोना नै अवसरक लाभ उठबैत। बीसे हजार मे एम.ए. सी. (फिजिक्स) क सर्टिफिकेट कीनि लेलक। विश्वविद्यालयो कानून पास केने जे नवशिक्षकक बहाली मे कओलेजक डिमोसट्रेटर कऽ प्राथमिक देल जायत। कन्हैयो फिजिक्सक प्रोफेसर बनि गेल। हाइ स्कूल वा सरकारी आॅफिस जेँका प्रोफेसर कऽ ड्यूटियो नहि। साल मे कओलेज छह मास बन्ने रहत बाकी समय मे कहियो ड्यूटी (क्लास) होएत कहियो नहि होएत। तइ पर स अपन सी.एल. आ मेडिकल पछुआइले।
पाँच बर्ख बीतैत-बीतैत कन्हैयाक माए-बाप मरि गेल। मरने लाभे। धरारी धरि बेचि कऽ बैंक मे कन्हैया जमा कऽ लेलक। मुदा एकटा बात जरुर केलक। ओ इ जे घरारीक रुपैआ (घरारीक दाम अखनो मिथिलांचल मे अधिक होइत। कारण नइ बुझै छी) स पाँच टा आलमारी आ जते किताव स आलमारी भरल, ओते किताव जरुर कीनि लेलक। एक त पाइक गर्मी दोसर किताबक गर्मी (अध्ययनक गर्मी नहि देखलाहा गर्मी) स कन्हैयाक मति ऐहेन बदलि गेल जेहेन ठंढ़ा पानि आ ठंढ़ा दूध स चाह बनैत। अखन धरि (छह बर्ख) दू टा सन्तान सेहो भेल। अपन दुनियाँक बीच0 अपराजित नचैत तेँ कन्हैयाक जिनगी कोना देखैत? दोसर उचितो नहि किऐक त हर युवा आदमी कऽ अपन जिनगीक बाट पर नजरि राखक चाहियैक।
साँझू पहर कन्हैया होटल स सीधे आबि कोठरी मे कपड़ा बदलै लगल। देहक सब कपड़ा उताड़ि लेलक। उपर स ल कऽ भीतर धरि शरीर मे आगिक ताव जेँका लहकैत। पंखाक बटन दबलक। मुदा भगवानक मूर्तिक आगूक (जे कोठरीक दिवारक खोलिया मे रखने छल) बौल (बल्व) जरौने बिना अपन कोठरीक बौल कोना जरवैत। तेँ पहिने ओ बौल जरौलक। मुदा मूर्तिक आगू बौल जरौला बाद अपन कोठरीक बौल जरौनाइ बिसरि गेल। पियास स कंठ सुखैत। मुदा टंकी पर जाइक डेगे ने उठैत। लटपटाइत। कहुना कऽ कुरसी पर बैसल कि टेवुल तरक जग पर नजरि पड़लै। दिनुके पानि। जग उठा पानि पीलक। जग रखि कुरसी पर अंगोठि मने-मन अकासक चिड़ै हियासय लगल। उड़ैत मृगनयनी पर नजरि गेलइ। (कओलेजक छात्रा) किछु देरि मृगनयनी कऽ देखि अपराजित (पत्नी) पर नजरि देलक। मन मे उठलै दू बेटिक जिनगी। फेरि मन देखलकैक चहकैत मृगनयनी। निर्णय केलक जे अपना घर मृगनयनी कऽ जरुर आनब। रसे-रसे मन शान्त हुअए लगलै।
दोसर दिन कोर्ट होइत कन्हैया मृगनयनीक संग घर पहुँचल। मृगनयनी कऽ देखि अपराजित घबड़यल नहि। मन पड़लै दादी मुहक सुनल खिस्सा। तेँ पुरुखक लेल दू टा पत्नी होएव कोनो अधलाह नहि। अपन दुनियाँ मे मस्त। काजक कोनो घटती नहि, कनी-मनी बढ़तिये। तेँ, जुआनीक आनन्द अपराजित मे।
आठ बर्ख वाद (विआहक) जे कन्हैया डिमोसट्रेटर से प्रोफेसर बनल। ओ आइ स्त्रीक खिलौना बनि गेल। ऐहन-ऐहन लोकक कते आशा। आठ बजे साँझ। बजार स दुनू परानी (मृगनयनी आ कन्हैया) मोटर साइकिल स उतड़ि कोठरी मे पहुँचल। अगल-बगलक कुरसी पर बैसि ब्राण्डीक बोतल निकालि टेबुल पर रखलक। मुदा टेवुल कहै चाहै जे भाइ सोझा-सोझी बेइज्जत नइ करह, हम किताव रखै वला छी नइ कि बोतल। मुदा वेचाराक विचार, मिथिलाक कन्या जेँका, तेँ सब कुछ सहि लइत। जहिना राज-दरवार मे, मिथिलाक राजा जनक केँ जननिहार पंडित सहि लइत।
असेरी गिलास स दुनू बेकती एक-एक गिलास ब्राण्डी चढ़ा, अपन दुनियाँ मे विचरण करै लगल। प्रश्न उठल अपराजितक।
मृगनयनी- ‘हम्मर एकटा विचार सुनू।’
‘बाजू।’
‘पत्नीक सब सुख जँ एक पत्नी स पूर्ति हुअए तखन दोसर रखबाक की जरुरी?’
‘कोनो नहि।’
‘तखन अपराजित (सौतीन) कऽ रखि की फयदा?
कने गुम्म भ कन्हैया सोचै लगल। मन पड़लै अपराजित। निस्सकलंक, कारी, कोमल-कोमल पंखुड़ी, गंध विहीन अपराजित।
दोहरा कऽ मृगनयनी- ‘बस, यैह (अइह) पुरुखक कलेजा छी। अपराजित कऽ रस्ता स हटायव हम्मर जिम्मा भेल।
मृगनयनीक रुप देखि विधात्तो अपन गल्ती पर सोचितथि। जे नारी-पुरुषक बीच जेहेन थलथलाह पुल बनोलिएै तेहेन नारी-नारीक बीच किअए ने बनोलियै। दुनू गोटेक (मृगनयनी आ कन्हैयाक) बीचक बात अपराजितो सुनैत। जहिना मृगनयनीक करेज मे अपराजितक प्रति आगि धधकैत तहिना मृगनयनियोक प्रति अपराजितक करेज मे आगि पजरि गेल। मुदा अपना कऽ सम्हारैत ओ (अपराजित) घर स निकलि जायब नीक बुझलक। किऐक त तीनि जिनगी प्रश्न आगू मे आबि ठाढ़ भऽ गेलइ। तहू मे दू टा ओहन जिनगी जे दुनिया मे अखन पाइरे रखलक अछि। चुपचाप अपराजित अपन कोठरी (रहैवला) आबि दुनू बच्चा (बेटी) क एक टक देखि, छह वर्खक रीता कऽ पाएरे आ तीनि वर्खक सीता कऽ कोरा मे नेने घर स निकलि गेलि। मन मे आगि लगल तेँ कोनो सुधि-बुधि नहि।
स्टेशन आबि अपराजित गाड़ीक (ट्रेन) पता लगौलक। चारि घंटाक बाद गाड़ी। दुनू बच्चाक सेग ओ प्लेटफार्म पर, गाड़ीक प्रतिक्षा मे बैसि रहलि। मन मे अनेको रंगक प्रश्न उठै लगलैक। मुदा सब प्रश्न कऽ मन स हटबैत एहि प्रश्न पर अॅटकल जे जे माए-बाप जन्म देलक ओ जरुर गरा लगौत। जँ नहि लगौत (लगाओत) त बड़ी टा दुनियाँ छैक, वुझल जेतैक। तेँ सबसँ पहिने माए-बाप लग जायब। डेढ़ बजे राति मे गाड़ी पकड़ि, दुनू बच्चाक संग भोर मे अपना नैहरक स्टेशन उतड़ल। भुखे तीनू लहालोट होइत। मुदा ऐठामक नारी मे त सबसँ पैघ इ गुण होइत जे धरती जेँका सब दुख कऽ सहि लइत। मुदा दुनू बच्चाक (बेटीक) मुह देखि चिन्ताक समुद्र मे डूबै लगल। की ककरो स भीखि मांगि बच्चा कऽ खुआबी? कथमपि नहि। की बच्चा जिनगी क एतइ अन्त हुअए दिअए? अपन साध कोन। मुदा नाना ऐठाम तक पहुँचत कोना? जी जाँति कऽ एकटा मुरही (मूढ़ी) कचड़ीक दोकान पर अपराजित पहुँच मुरही बेचइ वाली बुढ़िया कऽ कहलक- ‘दीदी, हमर नैहर दुखपुर छी। ओतइ जाइ छी। दुनू बच्चा राति मे खेलक नहि, तेँ भुखे लहालोट होए अए। दू रुपैआ कऽ मुरही-कचड़ी उधार दिअ। काल्हि पाइ दऽ देव।’ बिना किछु सोचनहि-विचारने बुढ़िया बाजलि- ‘बुच्ची, तोरा पाइ नइ छह ते की हेतइ। हमरो ऐहेन-ऐहेन चारि गो पोता-पोती अछि। हम बच्चाक भुख बुझै छियै।’
कहि दुनू बच्चा कऽ मुरही-कचड़ी देलक। तीनू खा कऽ विदा भेलि।
अपराजित कऽ नैहर पहुँचैत-पहुँचैत सूर्य एक बाँस उपर चढ़ि गेलि। दुखपुरक दछिनवरिया सीमा पर एकटा पाखरिक गाछ। पखरिक गाछ स आगू बढ़ैक साहसे ने अपराजित केँ होय। गाछक निच्चा मे बैसि ठोह फाड़ि कनै लगल। गामक (दुखपुरक) सइओ ढ़ेरबा बच्चिया घास छिलैत बाध मे। अपराजितक कानब सुनि सब पथिया-खुरपी नेनहि पहुँच गेलि। दुनू बच्चा कऽ दू गोटे कोरा मे लऽ अपराजित केँ संग केने घर पर आइलि।

बिसाँढ़
पछिला चारि-सालक रौदी भेने गामक सुरखिये बेदरंग भऽ गेल। जे गाम हरियर-हरियर गाछ-बिरीछ, बन्न स लहलहाइत खेत, पानि स इनार-पोखरि, सैकड़ो रंगक चिड़ै-चुनमुनी, हजारो रंगक कीट-पतंग स लऽ कऽ गाय, महीसि, बकरी स भरल रहैत छल ओ मरनासन्न भऽ गेल। सुन-मसान जेँका। बीरान। सबहक (गामक लोकक) मन मे एक्के टा विचार अबैत जे आब इ गाम नै रहत। जँ रहबो करत त सिर्फ माटिये टा। किऐक त जहि गाम मे खाइक लेल अन्न नहि उपजत, पीवैक लेल पानि नहि रहत, तहि गामक लोक कि हवा पीबि कऽ रहत। जहि मातृभूमिक महिमा अदौ स सब गबैत अएलाह ओ भूमि चारिये सालक रौदी म पेटकान लाधि देलक। मुदा तइओ लोकक टूटैत आशाक वृक्ष मे नव-नव फुलक कोढ़ी टुस्साक संग जरुर निकलि रहल अछि। किऐक त आखिर जनकक राज मिथिला छिअए की ने। जहि राज्य मे बाहर-बर्खक रौदीक फल सीता सन भेटल तहि राज मे, हो न हो, जँ कहीं ओहने फल फेरि भेटए। एक दिशि रौदीक (अकालक) सघन मृत्युवाण चलैत त दोसर दिशि स आशाक प्रज्वलित वाण सेहो ओकर मुकावला करैत। जेकर हसेरियो नमहर। ऐहनो स्थिति मे दुनू परानी डोमनक मन मे जीबैक ओहने आशा बनल रहल जेहने सुभ्यस्त समय मे। कान्ह पर कोदारि नेने आगू-आगू डोमन आ माथ पर सिंही माछ आ बिसाँढ़ स भरल पथिया नेने पाछु-पाछु सुगिया, बड़की पोखरि स आंगन, जिनगीक गप-सप करैत अबैत। चाइनिक पसीना दहिना हाथ स पोछि, मुस्कुराइत सुगिया बाजलि- ‘जकरा खाइ-पीबैक ओरियान करैक लूरि बुझल छैक ओ कथीक चिन्ता करत?’
पत्नीक बात सुनि डोमन पाछु घुरि सुगियाक चेहरा देखि बिनु किछु बजनहि, नजरि निच्चा कऽ आगू डेग बढ़बै लगल। किऐक त खाइक ओते चिन्ता मन म नहि, जते पीबैक पाइनिक।
डोमन कऽ अपन खेत-पथार नहि मुदा दुनू बेकती तेहन मेहनती जे नहियो किछु रहने नीक-नहाँति गुजर करैत। गिरहस्तीक सब काजक लूरि रहितहुँ ओ कोनो गिरहस्त स बन्हायल नहि ओना समय-कुसमय, अपना काज नहि रहने, बोइनो कऽ लइत। अपना खेत नहि रहने खेती त नहिये करैत मुदा दस कट्ठा मड़ुआ, सब साल बटाइ रोपि लइत। जहि स पाँच मन अन्नो घर लऽ अबैत। मड़ुआ बीआ उपजबै मे बेसी मिहनत होइत अछि किऐक त सब दिन बीआ पटबै पड़ैत अछि। शुरुहे रोहणि मे बड़की पोखरिक किनछरि मे डोमन बीआ पाड़ि लइत। लग मे पानि रहने पटबैयोक सुविधा। आरु बीरार, तेँ बीओ नीक उमझैत। पनरहे दिन मे बीआ रोपाउ भऽ जायत। मिरगिसिया मे पानि होइतहि अगते मड़ुआ रोपि लइत। मुदा अहि (एहि) बेरि से नइ भेलइ। बरखा नहि भेने बीआ बीरारे मे बुढ़हा गेल। एक्को धुर मड़ुआक खेती गाम मे नहि भेलइ। आने कियो अखन धरि धानक बीरार क खेत जोतलक आ ने बीआ वाओग केलक। रौदीक आगम सबहक मन मे हुअए लगल। मुदा तइओ ककरो मन मे अन्देशा नहि! किऐक त ढ़ेनुआर नक्षत्र सब पछुआइले अछि।
जहिना रोहणि-मिरगिसिया फांेक गेल तहिना अद्रो। समय सेहो खूब तबि गेलइ। दस बजे स पहिनहि सब बाध स आंगन आबि जायत। किऐक त लू लगैक डर सबहक मनमे। मड़ुआ खेती नहि भेने दुनू परानी डोमनक मन मे चिन्ता पैइसै लगल। बड़की। पोखरि स दुनू परानी पुरैनिक पातक बोझ माथ पर नेने अंगना अबैत। बाट मे सुगिया बाजलि- ‘अइ बेरि एक्को कनमा मड़ुआ नइ भेल। बटाइयो केने आन साल ओते भऽ जायत छल जे सालो भरि जलखै चलि जाय छल। अइबेरि ते जलखइओ बेसाहिये कऽ चलत।’ माथ परक पुरैनिक पातक बोझ स पानि चुवैत। जे डोमनो आ सुगियो कऽ अधभिज्जु कऽ देने। नाक परक पानि पोछैत डोमन उत्तर देलक- ‘कोनो कि हमरे टा नइ भेल आ कि गामे मे ककरो नै भेलइ। अनका होइतइ आ अपना नै होइत तखन ने दुख होइत। मुदा जब ककरो नै भेलइ तऽ हमरे किअए दुख हैत। जे दसक गति हेतइ से हमरो हैत। अपना त रोजगारो (पुरैन-पातक विक्री) अछि आ जेकरा इहो ने छै?’
डोमनक उत्तर सुनि मिरमिरा कऽ सुगिया बाजलि- ‘हँ, से त ठीके। मुदा ठनका ठनकै छै ते कियो अपने माथ पर ने हाथ दइ अए। तखन तऽ इ (रौदी) इसरक (ईश्वरक) डाँग छी, लोकक कोन साध।’
अखन धरिक समय कऽ कियो रौदी नहि बुझलक। किऐक त सबहक मन मे यैह (अइह) होइत जे इ त भगवानक लीले छिअनि। जे कोनो साल अगते स पानि (बरखा) हुअए लगैत त कोनो साल अंत मे होइत। कोनो साल बेसिओ होइत त कोनो साल कम्मो। कोनो-कोनो साल नहिये होइत। जहि साल अगते बिहरिया हाल भऽ जायत ओहि साल समय पर गिरहस्ती चलैत मुदा जहि साल पचता पाइन होइत तहि साल अधखड़ू खेती भऽ जायत। मुदा जखन हथिया नक्षत्र धरि पानि नहि भेलि, तखन सबहक मन मे अबै लगल जे अइबेरि रौदी भऽ गेल। ओहिना जोतल-बिनुजोतल खेत स गरदा उड़ैत। घास-पातक कतौ दरस नहि। मुदा तेँ कि लोक हारि मानि लेत। कथमपि नहि। सब दिन स गामक लोक मे सीना तानि कऽ जीबैक अभ्यास बनल अछि ओ पीठि कोना देखाओत? भऽ सकैत अछि जे भगवान (दन्द्र) कोनो चीजक दुख भऽ गेल हेतनि। जहि स बिगड़ि कऽ ऐना केलनि। तेँ हुनका वौंसब (बओसबे) जरुरी अछि। जखने फेरि सुधरि जेताह तखने स सब काज सुढ़िया जायत। अइह (यैह) सोचि कियो अन्न दान (भुखल दुखल कऽ खुऔनाइ) त कियो कीर्तन (अष्टयाम, नवाह) त कियो यज्ञ-जप (चंडी, विष्णु) त कियो महादेव पूजा (लिंग) इत्यादि अनेको रंगक वौंसैक ओरियान शुरु केलक। जनिजाति सब कमला-कोशी कऽ छागर-पाठी कवुला सेहो करै लगलीह। किऐक त जँ हुनकर महिमा जगतनि त बिनु बरखोक बाढ़ि अनतीह। बाढ़ि आओत पोखड़ि-झाखड़ि स लऽ कऽ चर-चैरी, डोह-डावर सब भरत। रौदी कमत। अधा-छिधा उपजो हेबे करत।
बरखाक मकमकी देखि नेंगरा काका महाजनी बन्न कऽ लेलनि। किऐक त ओ बुझि गेलखिन जे अइ बेरक रौदी अगिला साल विसाइत। मुदा सोझ मतिया बौकी काकीक सब चाउर सठि गेलनि। ओना बौकी काकीक लहनो छोट। सिर्फ चाउरेक। सेहो पावनिये-तिहार धरि समटल। हुनकर महाजनी मातृ-नवमी, पितृपक्ष (खाइन-पीउन) स शुरु होइत। पाहुन-परकक लेल दुर्गापूजा, कोजगरा होइत दिवाली परवेब (गोवर्धनपूजा) भरदुतिया, छठि होइत सामा धरि अबैत-अबैत सम्पन्न भऽ जायत छलनि। किऐक त सामा केँ सब नवका चूड़ा खुआबैत। खुऐबे टा नहि करैत संग भारो दइत। ताधरि कोला-कोली धानो पकि जायत। मुदा से बात बौकि काकी वुझवे ने केलखिन जे अइबेर रौदी भऽ गेल। तेँ अपनो खाई ले किछु नहि रखलथि। जहिना बोनिहार, किसान तहिना महाजन वौकियो काकी भऽ गेलीह।
अगहन अबैत-अबैत सबकेँ बुझि पड़ै लगलैक जे अपने की खायब आ माल-जाल कऽ की खुआएब। किऐक त कातिक तकक ओरियान (अपनो आ मालो-जालक लेल) त अधिकांश लोक पहिनहि स कऽ कऽ रखैत। जे नेंगरा काका छोड़ि सबहक सठि गेलनि। धानोक बीआ सब कुटि-छाँटि कऽ खा गेल। धानक कोन गप जे हालक दुआरे रब्वियो-राई हैब, कठिन। सभहक भक्क खुजल। भक्क खुजितहि मन मे चिन्ता समाइ लगल। जना-जना समय बीतैत तना-तना चिन्तो फौदाइत। एक त ओहिना चुल्हि सब बन्न हुअए लगल तइ पर स सुरसा जेँका समय मुह बाँबि आगू मे ठाढ़। चिन्ता स लोक रोगाइ लगल। भोर होइतहि धिया-पूताक बाजा सौंसे गाम बजै लगैत। मौगी पुरुख कऽ करमघट्टू त पुरुख मौगी कऽ राक्षसनी कहै लगल। जहि स धिया-पूताक बाजाक संग दुनू परानीक (पति-पत्नीक) नाच शुरु भऽ जायत। मुदा ऐहन समय भेलो पर दुनू परानी डोमनक मन मे एक्को मिसिया चिन्ता नहि। किऐक त जूरे-शीतल स पुरैनिक पातक कोरोवार शुरु केलक। कोरोबार नमहर। बावन बीधाक बड़की पोखिरि। जहि मे सापर-पिट्टा पुरैनिक गाछ। बजारो नमहर। निरमली, घोघरडिहा, झंझारपुर स्टेशनो आ पुरनो बजार। असकरे सुगिया कते बेचत। किऐक त पुरैनिक पात कीनिनिहार हलुआइ स लऽ कऽ मुरही-कचड़ी वाली धरि। तइ पर स भोज-काज मे सेहो विकायत। तेँ आठ दिन पर पार लगौने रहए। भरि दिन डोमन पत्ता तोड़ि-तोड़ि जमा करैत। एक दिन कऽ सुगिया पत्ता सरिअवैत (गनि-गनि) तेसरा दिन भोरुके गाड़ी स वेचइ ले जायत। जे पात उगड़ि जाय ओकरा डोमन सुखा-सुखा रखैत। किऐक त सुखेलहो पातक बिक्री होइत।
निरमली स पात बेचि क सुगिया आबि पति (डोमन) कऽ कहलक- ‘रौदी भेने अपन चलती आबि गेल।’
चलतीक नाम सुनि मुस्की दइत डोमन पुछलक- ‘से की?’
‘सब बेपारी (पात बेचिनिहार) थस ल लेलक। सब गामक पोखरि सुखि गेलइ जहि (जइ) स सबहक कारे-बार बन्न भऽ गेलइ। अपने टा पात बजार पहुँचै अए। आइ त जहाँ गाड़ी स उतड़लहुँ कि दोकानदार सब सब पात छानि लेलक। टीशने पर छुह्हका उड़ि गेलि।’
डोमन- ‘अहाँ कऽ लूरि नइ छले जे दाम बढ़ा दीतिऐ एक क दू होइत।’
सुगिया- ‘अगिला खेप स सैह करब।’ आब त बड़िड़्यो जुआइत हैत की ने?’
डोमन- ‘गोटे-गोटे जुआइल हेँ। मुदा बीछि-बीछि तोड़ै पड़त। तेँ पाँच दिन आरो छोड़ि दइ छिअए।’
तेसर साल चढ़ैत-चढ़ैत गामक एकटा बड़की पोखरि आ पाँच टा इनार छोड़ि सब सुखि गेल। नमहर आँट-पेटक बड़की पोखरि। किऐक त दइतक (दैतक) खुनल छी कीने? लोकक खुनल थोड़े छिअए। देव अंश अछि। तेँ ने गामक सब अपन बेटा कऽ उपनयनो आ विआहो मे ओही पोखरि मे नहबै अए। ततबे नहि, छठि मे हाथो उठबै अए। हमरा इलाकाक पृथ्वियोक (धरतियोक) बनाबटि अजीव अछि। बुझू ते माइटिक पहाड़। पाँच स फुट निच्चा धरि ने बाउल (बौल) अछि आ ने पानि। शुद्ध माटि। जहि स ने एक्कोटा चापाकल आ ने बोरिंग गाम (इलाका) मे। पाइनिक दुआरे गामक-गाम लोक कऽ पराइन लगि गेल। माल-जाल उपटि गेल। चाहे त लोक बेचि लेलक वा खढ़ पाइनिक दुआरे मरि गेल। अधा स बेसी गाछो-विरीछ सुखि गेल। चिड़ै-चुनमुनी इलाका छोड़ि देलक। जे मूस अगहन मे अंग्रेजी बाजा बजा सत-सत टा विआह करैत छल, ओ या त बिले मे मरि गेल वा कतऽ पड़ा गेल तेकर ठेकान नहि। अधा स बेसिये लोक हमरो गामक पड़ा गेल। मुदा तइओ जिबठगर लोक गाम छोड़ै ले तैयार नहि। पुरुख सब गाम छोड़ि परदेश खटै ले चलि गेल। मुदा बालो-बच्चा आ जनि-जातियो गामे मे रहल। पोखरि-इनार कऽ सुखैत देखि, पानि पीवैक लेल बड़किये पोखरिक कतबाहि मे कुप खुनि-खुनि लेलक। अपन-अपन कुप सभकेँ। पाइनिक कमी नहि। तीनि सालक जे रौदी इलाकाक (परोपट्टाक) लेल वाम भऽ गेल ओइह डोमनक लेल दहिन भऽ गेल। काज त आने साल जेँका मुदा आमदनी दोबर-तेबर भऽ गेलइ। गामक जमीनोक दर घटल। जहि स डोमन खेत कीनए लगल। ओना सुगियाक इच्छा खेत (जमीन) कीनैक नहि। किऐक त मन मे होय जे एहिना रौदी रहत आ खेत सब पड़ता रहत। तेँ, अनेरे खेत ल कऽ की करब। मुदा मालो-जाल त, घास-पाइनिक दुआरे, नहिये लेब नीक हैत। मुदा डोमनक मन मे आशा रहए जे जहिना लुल्हियो कनियाँ बेटा जनमा कऽ गिरथाइन बनि जायत, तहिना त पानि भेने परतियो खेत हैत की ने।
योगी-तपस्वीक भूमि मिथिला, अदौ स रहल। जे अपन देह जीवि-जन्तुक कल्याणक लेल गला लेलनि। ओ कि एहि बात कऽ नहि जनैत छलथिन। जनैत छलथिन। तेँ ने गाम मे अट्ठारह गण्डा (72) पोखरि, सत्ताइस गण्डा (108) इनार क संग-संग चैरी मे सैकड़ो (सइओ) कोचाढ़ि (बिरइ) खुनि पाइनिक बखारी बनौने छलाह। सोलहो आना बरखे भरोसे नहि, अपनो जोगार केने छलाह।
तीनि साल त दुनू परानी डोमन चैन स बितौलक। मुदा चारिम साल अबैत-अबैत बेचैन हुअए लगल। किऐक त गामक सब पोखरि-इनार त पहिनहि सुखि गेलि छल। ल दऽ कऽ बड़की पोखरि टा बँचल। तहू मे सुखैत-सुखैत मात्र कठ्ठा पाँचे मे पानि बचल। सुखल दिशि पुरैनियो उपटि गेल। बीच मे जे पानि, ओही मे पुरैनिक गाछ रहए, मुदा जाँध भरि स उपरे गादि। पैसब महा-मोसकिल। किऐक त पाएर दइते सर-सरा कऽ जाँघ भरि गड़ि जायत। के जान गमबै पैसत। निराशाक जंगल मे डोमन वौआ गेल। मन मे हुअए लगलै जे जहिना गामक लोक चलि गेल तहिना हमहूँ चलि जायब। जानि कऽ परानो गमाएव नीक नहि। जिनगी बचत, समय-साल बदलतै त फेरि घुरि कऽ आयब नहि त कतौ मरि जायब। जहिना गामक सब कुछ बिलटि गेल, समाजक लोक बिलटि गेल, तहिना हमहूँ बिलटि जायब।
पति कऽ चिन्तित देखि सुगिया- ‘किछु होय अए? ऐना किअए मन खसल अछि?’
पत्निक प्रश्न सुनि डोमन आंखि उठा कऽ देखि पुनः आंखि निच्चा कऽ लेलक। आंखि निच्चा करितहि सुगिया दोहरा कऽ पुछलक- ‘मन-तन खराब अछि?’
नजरि उठा डोमन उत्तर देलक- ‘तन त नहि खराब अछि, मुदा तनेक दुख देखि मन सोगायल अछि। जइ (जहि) आशा पर अखन धरि खेपलहुँ ओ त चलिये गेल। जे अगिलोक कोनो आशा नहि देखै छी। की करब आब?
सुगिया- ‘अपना केने किछु ने होइ छै। जे भगवान जन्म देलनि, मुह चीड़ने छथि अहारो त वैह ने देताह। तइ ले एत्ते चिन्ता किअए करै छी?’
डोमन- ‘गामक सब कुछ बिलटि गेल। ऐहेन सुन्दर गाम छल, सोहो उपटि रहलअछि। सिर्फ माटि टा बँचल अछि। की माटि खुनि-खुनि खायब? बिना अन्न-पानिक कइ-अ दिन ठाढ़ रहब?’
‘चिन्ता छोड़ू। जहिया जे हेवाक हेतइ से हेतइ। अखन त पानियो अछिये आ अन्नो अछिये। जाधरि एहि (अइ) धरती पर दाना-पानी लिखल हैत ताधरि भेटबे करत। जहिया उठि जायत तहिया ककरो रोकने रोकेबै (रोकेवइ)। तइ ले एत्ते चिन्ता किअए करै छी।’
कहि सुगिया भानसक ओरियान करै लागलि। पत्नीक बात सुनि डोमन मने-मन सोचै लगल जे हमरा त मरैयोक डर होय अए मुदा ओकरा (पत्नी) कहाँ होइ छै। ओ त मरैइयो ले तैयारे अछि। फेरि मन मे उठलै जे जीवन-मृत्युक (जिनगी-मौतक) बीच सदा स संघर्ष होइत आयल अछि आ होइत रहत। तहि स पाछु हटब कायरता छी। जे मनुष्य कायर अछि ओ कोन जिनगीक आशा मे अनेरे दुनियाँ कऽ अजबारने अछि। पुनः अपना दिशि तकलक। अपना दिशि तकितहि मन मे एलै जे जीबैक बाट हरा गेल अछि। तेँ एते चिन्ता दबने अछि। तमाकुल चुना कऽ खेलक। तमाकुल मुह मे लइते अपन माए-बाप स लऽ कऽ पैछला पुरखा (जते जनैत) दिशि घोड़ा जेँका नजरि दौड़लै। मुदा कतौ रुकलै नहि। जाइत-जाइत मनुष्यक जड़ि धरि पहुँच गेल। पुनः घुमि कऽ आबि नजरि माय लग अटकि गेल। मन पड़लै माएक संग बितौलहा जिनगी। मन पड़लै माइयक ओ बात जे दस वर्खक अवस्था मे रौदी बीतौने छल। रौदी मन पड़ितहि बड़की पोखरिक बिसाँढ़ आ अन्है माछ आंखिक सोझ मे आबि गेलइ। कने काल गुम्म भऽ मन पाड़ै लगल।
मन पड़लै, अही पुरैनिक (जे सुखि गेल अछि) जड़ि मे त बिसाँढ़ो फड़ैत अछि। अल्हुए जेँका। जहिना माइटिक तर मे अल्हुआक सिरो आ अल्हुओ (फड़) रहै छै तहिना पुरैनिक जड़ि मे सिरो आ बिसाँढ़ो रहैत अछि। अनायास मुह स निकललै- ‘बाप रे, बाबन बीघाक पोखरि मे कते बिसाँढ़ हेतइ। ओकरे खुनै मे माछो भेटत। खाधि बना-बना सिंही-मांगुर रहै अए। एक पथ दू काज। मन खुशी अविते पत्नी कऽ सोर पाड़ि कहलक- ‘भगवान बड़ी टा छथिन। जहिना अरबो-खरबो जीवि-जंतु केँ जन्म देने छथिन तहिना ओकर अहारोक जोगार केने छथिन।’
पतिक बात सुनि सुगिया अकबका गेलि। बुझबे ने केलक। मुह बाबि पति दिशि देखैत रहलीह। पुनः डोमन कहलक- ‘चुल्हि मिझा दिऔ। घुरि कऽ आयब तखन भानस करब।’
पतिक उत्साह देखि सुगिया मने-मन सोचए लगली जे मन ने ते सनकि गेलनि हेँ। अखने मुरदा जेँका पनि-मरु (पनिमरु) छलाह। आ लगले कि भऽ गेलनि। दोसर बात परखैक खियाल स चुप-चाप ठाढ़ रहली।
डोमन- ‘की कहलौ? पहिने आँच मिझा दिऔ। फटक लगा छिट्टा लऽ कऽ संगे चलू।’
सुगिया- ‘कत्तऽ।’
‘बड़की पोखरि।’
‘किअए?’
‘ऐहन-ऐहन सइओ रौदी कटैक खेनाइ (भोजन) पोखरि मे दाबल अछि। आनै ले चलू।’
सवाल-जबाव नहि कऽ सुगिया आगि पझा, फटक लगा छिट्टा लऽ तैयार भेलि। घर स कोदारि निकालि डोमन विदा भेल। आगू-आगू डोमन आ पाछु-पाछु सुगिया।
बड़की पोखरिक महार पर पहुँच डोमन हाथक इशारा स पत्नी कऽ देखवैत बाजल- ‘जते पोखरिक पेट सुखल अछि, ओहि मे तते खाइक वस्तु (भोज्य पदार्थ) गड़ायल अछि जे ने खाइक कमी रहत आ ने पीवैक पाइनिक। जना-जना पानि सुखैत जेतइ तना-तना कुप कऽ गहीर करैत जायब। जते पुरैनिक गाछ सुखायल अछि ओहि मे घुरछा जेँका बिसाँढ़ फड़ल हैत।’
पोखरि धँसि डोमन तीनि डेग उत्तरे-दछिन आ तीनि डेग पूवे पछिमे नापि कोदारि स चेन्ह देलक। एक घुर। उत्तर बरिया पूबरिया कोन पर कोदारि मारलक। माटि तते सक्कत जे कोदारि धँसवे ने कयल। दोहरा कऽ फेरि जोर स कोदारि मारलक। फेरि नै कोदारि धँसल। आगू दिशि देखि हियाबै लगल जे किछु दूर आगूक माटि नरम हैत। खुनै मे असान हैत। मनक खुशी उफनि कऽ आगू खसल- ‘अई ढ़ोरबा माए, हम पुरुख नइ छी। देखियौ हमरा माटि गुदानबे ने करै अए। अहाँ हमरा स पनिगर छी, दू छअ मारि कऽ देखियौ।’
सुगिया- ‘हमर चूड़ी-साड़ी पहीरि लिअ, आ हमरा धोती दिअ। तखन कोदारि पाड़ि कऽ देखा दइ छी।’
मुस्की दइत दुनू आगू मुहे ससरल। एक लग्गा आगू बढ़ला पर माटि नरम बुझि पड़लै। कोदारि मारि कऽ देखलक तऽ माटि सहगर लगलै। एक घुर नापि डोमन खुनै लगल। पहिले छअ मे एकटा विसाँढ़क लोली जगलै। लोल देखितहि उछलि कऽ बाजल- ‘हे देखियौ। यैह छी बिसाँढ़।’
सुगिया- ‘लोल देखने नइ बुझब। सौंसे खुनि कऽ देखा दिअ।’
पत्नीक बात सुनि डोमन कऽ हुअए लगल जे हो न हो कहीं अधे पर स ने कटि जाय। से नहि त लोल पकड़ि डोला कऽ उखाड़ि लइ छी। मुदा नै उखड़ल। कने हटि दमसा कऽ दोसर छअ मारलक। छअ मारितहि एक बीतक देखलाहा आ चरि-चरि ओंगरीक दू टा आरो देखलक। तीनू कऽ खुनि, दुनू परानी निग्हारि-निग्हारि देखए लगल।
उज्जर-उज्जर। नाम-नाम। लठिआहा बाँस जेँका गोल-गोल, मोट। हाथी दाँत जेँका चिक्कन (प्लेन) बीत भरि स हाथ भरिक। पाव भरि स आध सेर धरिक।
सुगिया दिशि नजरि उठा कऽ डोमन देखलक त पचास वर्षक आगूक जिनगी बुझि पड़लै। पति दिशि नजरि उठा कऽ सुगिया देखलक त चूड़ीक मधुर स्वर आ चमकैत मांगक सिनदुर देखलक।’
छिट्टा भरि विसाँढ़ आ सेर चारिऐक सिंही माछ नेने दुनू परानी विदा भेल।


चुनवाली
नीन्न टुटितहि मखनी मोथीक विछान समेटि ओसारक उत्तर-पूब कोन मे ठाढ़ कऽ निच्चा उतड़ै लागलि कि सीढ़ी पर पिछड़ि गेलि। पाएर पिछड़ितहि हाथ स ओसार पकड़ै चाहलक। मुदा जाबे सरिया क ओसार पकड़ै-पकड़ै ताबे ओलती मे खसि पड़लि। झलफल रहने कियो दोसर उठल नहि। थोड़बे पहिने एकटा छोटकी अछार भेल। घरक चार स ठोपे-ठोप पानि चुबतहि। सीढ़ी पर स खसितहि मखनीक दहिना ठेहुनक जोड़ छिटकि गेलि। तत्काल छीटिकब नहि बुझलक। एतबे बुझलक जे ठेहुन कट दऽ उठल हेँ। मन मे एलै जे कियो देखलक त नहि तेँ हाँइ-हाँइ उठै लागलि। जोश मे उठि त गेलि मुदा ठेहुनक कचकब स फेरि ओसार पकड़ि सीढ़िये पर बैसि गेलि। बैसितहि मन मे बिचार उठै लागलि कोना मटकुरियाक (बेटा) परबरिस चलतै....ढ़ेरबा बेटी छै विआह कन्ना करत.... अपना कमाइक कोनो लुरि नहि छैक.... बहुओ धमधुसरिये छै.... अपना खेत-पथार नहि छै.... गामक लोको तेहेन अछि जे ककरो कियो नीक नहि करैत.... हे भगवान कोन बिपत्ति दऽ देलह। कने काल गुम्म रहि बेटा (मटकुरिया) कऽ जोर स सोर पाड़ि कहलक- ‘मटकुरिया, रौ मटकुरिया?
दुनू परानियो आ दुनू धियो-पूतो निन्न भेड़ि। तेँ ने मटकुरिया उठल आ ने कियो दोसर। पुनः दोहरा क मखनी जोर स बाजलि- ‘रौ बौआ, बौआ रौ। हम पिछड़ि कऽ खसि पड़लौ से उठिये ने होइ अए।’
धड़फड़ा कऽ उठैत मटकुरिया बाजल- ‘माए-माए, अबै छी।’
ताधरि फुलियो, कबुतरियो आ बेटोक नीन टुटल। कहि केवाड़ खोलि मटकुरिया दौड़ैत माए लग आबि, पुछलक- ‘कोना कऽ खसलै?’
पाछु स स्त्रियो, बेटो-बेटी पहुँचल। बेटा त पाँचे वर्खक मुदा तइओ माए-बापक देखा-देखी करैत दादी क पकड़लक। चारु गोटे उठा मखनी कऽ ओसार पर ल गेल। बिछान बिछा सुता देलक। कनी-कनी ठेहुन फुलए लगल। फुलब देखि फुलिया पति कऽ कहलक- ‘अहाँ पहिने डाकडर बजा लाउ। हम ताबे कड़ू तेल से ससैर (ससारि) दइ छिअनि।’ ‘बुच्ची घर से तेलक शीशी नेने आ।’
मटकुरिया डाॅक्टर ऐठाम विदा भेल। तेलक शीशी अनै कबुतरी घर गेलि। तहि बीच मंगनिया दादी कऽ कहै लगल- ‘आँइ गै बुढ़िया, एतने उपर से....।’
बेटा मुह पर फुलिया हाथ दऽ आगू बाजब रोकि देलक। मुदा पोताक बात स मखनी कऽ एक्को मिसिया दुख नहि भेलि। मुस्की दइत बाजलि- ‘बिलाइ खसा देलक।’
शीशीक मुन्ना खोलितहि कवुतरी आयल। दुनू माए-धी तरहत्थी पर तेल लऽ लऽ, दुनू हाथ मे मिला, दहिना पाएर (जाँध सहित) मे ओंसइ लागलि। ठेहुनक दर्द मखनी कऽ बढ़िते जाइत। जहि स दुनू गोटे कऽ ससारब छोड़ि दइ ले कहलक। ताबत डाॅक्टरक संग मटकुरियो पहुँचल। मखनीक ठेहुन देखितहि डाॅक्टर कहलखिन- ‘हिनका ठेहुनक जोड़ छिटकि गेलि छन्हि। पलस्तर करबै पड़त। ताबत दर्द कम होइ ले इन्जेक्शन दऽ दइ छिअनि। किऐक त पलस्तरक समान सब मंगबै पड़त।’
एक्के-दुइये गामक जनिजाति पहुँचै लागलि। जनिजातिक संग धियो-पूता। लोक स मटकुरियाक आंगन भरि गेल। पलस्तरक समान मंगा डाॅक्टर पलस्तर करैत कहलखिन- ‘चिन्ता करैक बात नहि अछि। पनरह दिन मे ठीक भऽ जेतनि।’ कहि अपन फीस लऽ चलि गेलाह। मुदा लोकक आवा-जाही लगले। रंग-विरंगक गप स अंगना गनगनाइत।
भरि दिन सब तुर मटकुरिया भुखले रहि गेल। ने भानस पर ध्यान गेलइ आ ने ककरो भूखे बुझि पड़लै। घर मे चूड़ा रहए। जे मंगनिया खेलक। बेर झुकैत-झुकैत अंगना खाली भेलइ। सिर्फ अपने पाँचो गोटे अंगना मे रहल। सबहक मनो असथिर भेलइ। सब (मटकुरियो, फुलियो आ कबुतरियो) अपना-अपना ढ़ंग स सोचै लगल।
ओना कहियो-काल, सासु कऽ मन खराब भेने वा कतौ गाम-गमायत गेने, फुलिये चून बेचए जाइत। सब काज बुझले तेँ मन मे वेसी चिन्ता नहि। चिन्ता सिर्फ एतवे जे कहुना माएक (सासुक) परान बचि जाइन। मुदा खुशी बेसी। किऐक त सोलह बर्ख स सासुर बसै छी मुदा अखन धरि घरक गारजन नहि बनलहुँ। लोक कऽ देखै छियै जे सासुर अवितहि अपन जुइत लगबै लगैत अछि। भगवान हमरो दहिन भेलाह। आब हमहूँ गार्जन बनब। घरक गारजन त वैह ने होइत जे कमाइत अछि। जे उपारजने (कमेबे) नै करत ओ घरक जुतिये-भाँति की लगौत। अगर जँ लगेबो करत त चलतै कोना? किऐक त छुछ हाथ थोड़े मुंह मे जाइत छैक। काजक अपन रस्ता होइत अछि। जे केनिहारे बुझैत। बिनु केनिहार जँ जुतिये लगौत त ओ या त दुरि हेतइ वा गरे ने लगतै। ओना अखन फुलियाक घरोवला आ सासुओ जीविते, तेँ गारजनियो हाथ मे आयब कठिन। मुदा तइओ आशा। किऐक त अखन धरि सिन्नुरो-टिकुली ले खुशामदे करै छलि, से आब नहि करै पड़तै। तेँ खुशी।
कबुतरीक मन मे एहि दुआरे खुशी होइत जे जते लूरि दादी कऽ अछि ओते लूरि गाम मे ककरो नहि अछि। मुदा कमाइक तेहेन भुत लगि गेल छै जे जइ दिन मरत तही दिन छोड़तै। सब लूरि संगे चलि जेतइ। तेँ नीक भेलइ जे अवाह भऽ गेल। आब त अंगना मे रहत। जखने अंगना मे रहै लगत तखने एका-एकी सब लूरि सीखै लगब। मुदा ओही (दादी) बेचारी कऽ की दोख देबइ। भरि दिन दस सेरक छिट्टा माथपर नेने बुलैत अछि त देह-हाथ दुखेबे करतै। साँझखिन के थाकल-ठहिआयल अबै अए असुआ कऽ पड़ि रहै अए। से आब नइ हेतइ। निचेन से पावनियो-तिहारक विधि-विधान आ गीतो-नाद सीखब। एत्ते टा भऽ गेलौ हेँ, ने अखैन तक एक्कोटा गीति अबै अए आ ने विआह-दुरागमनक अड़िपन बनौल होइ अए। कइ-अ दिन मन मे अबै अए जे मालतिये जेँका हमहूँ अपन गोसाई (गोसांई) घरक ओसार मे पुरैनिक लत्ती, कदमक गाछ लिखी। से लुरियो रहत तब ने। साँझू पहर के जते खान जतै छियै तते खान समयो भेटै अए ते नहिये होइ अए। किऐक त बिछान पर पड़िते ओंघा जाइ अए। जँ पुछबो करै छियै त अइ गीतक पाँति ओइ गीति मे आ अइ गीतक भास ओइ गीत मे कहै लगैत अछि। जहि स किछु सीखि नहि पबैत छी।
मटुकलाल केँ एहि दुआरे खुशी होइत जे बेटा-पुतोहू कऽ रहैत बूढ़ि माए एते खटे से उचित नहि। मुदा कहबो ककरा कहबै। हमरा कोनो मोजर दइ अए। दू टा धिया-पूता भेल। बेटिओ विआह करै जोकर भऽ गेलि मुदा हमरा बच्चे बुझै अए। हम की करु। तेँ भगवान जे करै छथिन से नीके करै छथिन। भने आब भारी काज करै जोकर नहि रहलि। जे अपनो बुझत आ मनाही करबै ते मानियो जायत। किऐक त मरैक डर ककरा नै होइ छै। तहू मे बूढ़ि-बुढ़ानुस क। तेँ मने-मन खुश। लोक हमरा तड़िपीबा वुझि बुड़िबक बुझै अए। तेँ कि हम बुड़िवक छी। कियो वुझै अए ते बुझह। जहिया बावू मुइलाह तहिया जते भार कपार पर आयल, से कियो आन सम्हारि दइ अए। कि अपने करै छी। पसिखन्ने जाइ छी ते कि लुच्चा -लम्पटक संग बैसि पीबै छी जे चोरी-छिनरपन्नी सीखब। या त असकरे बैसि कऽ पीबै छी या बड़का लोक लग बैसि कऽ पीबै छी। बड़का लोेकक मुह मे सदिखन अमृत रहैत छैक। रमानन्द बाबू स गियनगर लोक अइ इलाका मे दोसर के अछि। तिनका स हमरा दोस्ती अछि। हुनकर ओ बात हम गिरह बान्हि नेने छी जे जहिना कियो जनमै अए, बढ़ि क जुआन होइ अए। जुआन स बूढ़ भऽ मरि जाइत अछि। इ त दुनियाँक नियमे छिअए। सबकेँ होएत। जे नहि बुझत ओ नहि बुझह। मुदा हम त ओइह मानै छी। फेरि माए दिशि नजरि घुरलै। मने-मन सोचए लगल जे माइयक पाएर टुटब कोनो अनहोनी थोड़े भेलइ। इ त भगवानक लीले छिअनि। ओ (भगवान) कखनो अपना सिर अजस लेताह। कोनो ने कोनो कारण भइये जाइत छैक। तइ ले हमरा दुखे किअए हैत। जहिना एते दिन बीतल तहिना आगुओ बीतत। एते दिन जहिना माय कऽ, बेचि क घुमैत काल, आगू स पथिया आनि दइ छेलिये तहिना आब घरोवाली कऽ आनि देवइ। कियो हमरा देखा दिअ ते जे एक्को दिन हमरा काज मे नागा भेल। गोसांई डूबै बेरि, कतौ रही, कतवो पीवि कऽ बुत्त रही मुदा तेँ कि अपन काज कहियो छोड़ैत छी।
मटकुरिया परिवारक खानदानी जीविका चूनक। महिला प्रधान रोजगार। किऐक त चूनक विक्री अंगने-अंगने होइत। शुद्ध गमैआ व्यवसाय। किऐक त ने चून बनवैक समान बाहर स अनै पड़ैत आ ने बेचैक असुविधा। गामक अधिकांश परिवार मे चूनक खर्च। कियो पान खाइत त कियो तमाकुल। दुनू मे चूनक जरुरत। चून बनाइबो कठिन नहि। डोका जरा कऽ बनैत। अन्नेक कोठी जेँका डोको जरबैक कोठी होइत। मुदा अन्नक कोठी मे उपर छोट मुह, अन्न ढ़ारैक लेल, बनाओल जाइत जबकि चूनक कोठीक उपरका भाग खुलल रहैत। निच्चाक मुह दुनूक एक्के रंग। कच्चो मालक कमी नहिये। किऐक त गरीब-गुरबा लोक डोकाक मांस खाइत। मांसो पवित्र। किऐक त डोका माटि खा जीवन-वसर करैत। डोकेक उपरका भाग स चून बनैत।
चूनक बजारो गामे-घर। बिरले गोटे घर मे चूनक खर्च नहि होइत, नहि त सबहक घर मे होइत। पहिने मटकुरियाक दादी-परदादी चून बेचैत छलि, मुइलाक पछाति माए बेचए लागलि। सात दिनक सप्ताह मे पाँच दिन मखनी भौरी (गामे-गामे) करैत। एक-एक गाम मे एक-एक दिनक बीट (पार) बनौने। आठ दिन खर्चक हिसाब स सब कियो चून कीनैत। सब काज अन्दाजे स। अन्दाजे स चूनो दइत आ अन्दाजे स बेचो (धान-मड़ूआ) लइत। कोनो हरहर-खटखट नहि। किऐक त मनक उड़ान छोट। ने कोठा-कोठीक इच्छा, ने सुख-भोगक। बान्हल मन तेँ मात्र मनुक्ख बनि जीबै टाक इच्छा।
बजारोक प्रतियोगिता नहि। कारो-वार मे छीना-झपटी नहि। किऐक रहतै। जहिना जाइतिक शासन तहिना समाजक दंडात्मक रुखि। समाज मे निश्चित जाति निश्चित काज स बान्हल। एकक काज दोसर नहि करैत। तेँ लक्कड़-झक्कड़ कम। जना डोम, नौआ, धोबि, बढ़ी (बरही) कुम्हार इत्यादिक अपन-अपन जीविकाक धंघा। जे कराई स पालन होइत। दुनू विन्दु पर। कराओलो जाइत आ करबो करैत। सीमित क्षेत्रक बीच कारोवार। कियो अतिक्रमण नहि करैत। जँ कही-कतौ अतिक्रमण होइत त जाइतिक बीच ओकर फरिछौट होइत। तेँ सब अपन-अपन सीमाक भीतर रहैत। हँ, इ बात जरुर होइत जे सीमाक भीतर भैयारीक बँटबारा स विभाजित होइत। मुदा मटकुरिया परिवार एक पुरिखियाह, तेँ ऐहेन प्रश्ने नहि। रोजगारोक (व्यवसाइयोक) लेल तहिना। सवकेँ अपन-अपन सीमित क्षेत्र। एक क्षेत्र मे दोसरक प्रवेश बर्जित। मुदा बेरि-बेगरता मे एक-दोसरा कऽ भार दऽ समाजक काज मे बाधा उपस्थिति नहि हुअए दइत।
चून बेचि मखनी सिर्फ परिवारे नहि चलबैत। महाजनियो करैत। किऐक त सोलहो आना श्रमे पूँजी। मेहनत कऽ डोका एकत्रित करैत। डोका जरा कऽ चून बनवैत। आ अन्न स चून बदलैत। चूनक कीमतो (किमतो) अलग-अलग (भिन्न-भिन्न)। जहिठाम गरीब लोक चुनक कम कीमत दैत तहिठाम सुभ्यस्त किछु बेशिये दइत। पाँचे गोटेक परिवार मखनी कऽ। कते खायत। तेँ फजिलाहा अन्न सवाई पर लगबैत। सेहो बिना लिखा-पढ़ीक। मुह जवानी। जहि स किछु उपरो होइत किछु बुड़ियो जाइत। पाँच गाम मे मखनीक कारोवार। अगर जँ एहि स आगू कारोवार बढ़बै चाहत त सम्हारले ने हेतइ। किऐक त डोका जमा करै स चून बनबै धरि, दू दिन समय लगि जायत। आठे दिन पर विक्रीक पार (बीट) घुमैत। तेँ पाँच गाम स बेशी गाम सम्हारब कठिन।
टाँग अवाह होइतहि मखनी चून बेचब छोड़ि देलक। मुदा परिवारक रोजगार बन्न नहि भेलइ। आब फुलिया बेचए लागलि। चिन्हार गाम चिन्हार गहिकी। तेँ कतौ बाधा नहि। मुदा मखनीक महाजनी बुड़ि गेल। किऐक त पाँचो गाम मे पाँच गोटे ऐठाम अपन धान -मड़ुआ रखैत छलि। ओहि ठाम स ओहि गाम मे सवाइ लगबैत छलि। अपन आवाजाही बन्न भेने विसरि गेलि। लेनिहारो विसरि गेल। मुदा तइ ले मखनीक मन मे दुख नहि भेलइ। खुशिये भेलइ। खुशी एहि दुआरे भेलइ जे जावत देह मे ताकत छलि, ताबत अपनो, परिवारो आ दोसरो कऽ खुऔलौ। जिनगीक सार्थकता एहि(अइ) स बेशी की हैत। यैह ने धर्म छी। धर्ममय जिनगी बना बुढ़ाढ़ी धरि जीवि लेब, अइ स वेशी की चाही। तेँ मने-मन खुशी।
समय आगू बढ़ल। कारोबारक रुपो बदलल। कोना नहि बदलैत? समयोक त कोनो ठेकान नहि। कोनो साल अधिक बर्षा (बरखा) होइत त कोनो साल रौदी। अधिक वर्षा भेने त अधिक डोकाक वृद्धि होइत। मुदा रौदी मे कमि जायत। बिसबासु कारोबारक लेल वस्तुक उपलब्धि अनिवार्य। जे आब नहि भऽ पबैत। मुदा समयो त पाछु मुहे नहि आगू मुहे ससरत। पत्थर-चून बजार मे आबि गेल। पर्याप्त वस्तुक उपलब्धि भऽ गेल। बाजारो बढ़ल। जहिठाम उमरदार लोक तमाकुल-पान सेवन करैत छलाह तहिठाम आब स्कूल-कओलेजक विद्यार्थी सेहो करै लगल। ततबे नहि बाल-श्रमिक (बाल-मजदूर) सेहो करै लगल। गामे-गाम चैक-चैराहा बनि गेल। जहि स चाह-पान खेनिहारो बढल़। ओना तमाकुल-पानक अतिरिक्त पान-पराग, शिखर, रंग-विरंगक गुटका सेहो बढ़ि गेल। तेकर अतिरिक्त सार्वजनिक उत्सब सेहो बढ़ल। परिवारक मांगलिक काज (विवाह, मूड़न, सराध) सेहो नमहर भेल। जहि स पान-तमाकुलक खर्च बढ़ल। जहि स चुनोक खर्च कते गुणा बढ़ि गेल।
मखनीक जगह फुलिया लेलक। ओना घरक रोजगार
तेँ फुलियो कऽ किछु सीखैक जरुरत नहि। सब बुझले। सासु कऽ रहितहुँ, कहियो-काल, फुलियो बेचए जाइत छलि। किऐक त जहि दिन मखनी नैहर जायत तहि दिन फुलिये बेचइओ जायत आ डोका आनि-आनि चूनो बनवैत। मुदा आब चून बनवैक रुपे बदलि गेल। लोको डोकाक चूनक बदला पत्थर-चून खाय लगल। ओना अखनो वूढ़-पुरान सब पत्थरक चून कऽ घटिया बुझैत। जे तेजी डोकाक चून मे होइत ओ पत्थरक चून मे नहि। मुदा हारल नटुआ की करत।
चून बेचैक रुपो बदलल। अखन धरि जे अंदाज स बिक्री होइत छल ओ आब तौल कऽ हुअए लगल। बेचक (अन्नक) जगह पाइ लेलक। ओना अन्नोक चलनि सोलहन्नी समाप्त नहिये भेल हेँ। आब ओतबे अन्न पड़ैत जे आन ठाम रखैक जरुरत फुलिया कऽ नहि होइत। पाइ बौगली मे रखैत आ अन्न पथिया मे। ओना कर्ज खौक सेहो कमल। किऐक त समय कऽ आगू बढ़ने खाइ-पीबैक उपाय सेहो लोक कऽ भेल। बोइन (मजदुरी) सेहो सुधरल। पाइक आमदनी किसानो कऽ हुअए लगल। लोकक पीढ़ियो बदलल। जहि स विचारो मे बदलाव आयल।
समय कऽ आगू बढ़ने कारोवार असान भेल। जहि स मटकुरियाक परिवार सेहो आगू मुहे ससरल। मुदा मटकुरिया जहिना क तहिना रहि गेल। पहिने जे मटकुरिया माएक संग डोका अनैत छल ओ आब एक्के ठाम बजार स चून कीनि कऽ ल अबैत अछि। सुखल चून। सुखल चून कऽ गील बनवै मे सेहो अधिक (फ्रीसानी) फीरिसानी नहिये।
फागुन मास। शिवरातिक तीनि दिन पछाति। धुर -झार लगन चलैत। मेला जेँका वरिआती चलैत। अंग्रेजीबाजा, लाउडस्पीकरक अवाज स वायुमंडल दलमलित। आइ सबेरे (आन दिन चारि बजे) मटकुरिया पसिखाना विदा भेल। समयो सोहनगर। झिहिर-झीहिर हवा चलैत। अकास मे जहिना चिड़ै गीति गबैत तहिना हवा मे गाछ-विरीछ नचैत। पसिखाना पहुँचते मटकुरिया कऽ पासी कहलक- ‘भैया, आइ निम्मन बसन्ती माल अछि। खजुरिया नहि ताड़क।’
पासीक बात सुनि मटकुरियाक मन मे खुशी उपकल। मने-मन सोचलक जे दू गिलास आरो बेसी चढ़ा देबइ बाजल- ‘तब त आइ यात्रा (जतरा) नीक बनल अछि।’
पासी- ‘अहाँ त हमर पुरान अपेछित छी भैया तेँ दू गिलास ओहिना (मंगनिये) पिआएब।’
दू गिलास मंगनी सुनि मटकुरिया सोचलक जे पहिल दिन छिअए तेँ आन दिन स कम कोना लेब? यात्रा त पहिलुके दिन नीक होइ छै। वेचारा कऽ सगुन कोना दुइर करबै। मुस्की दइत कहलक- ‘बड़बढ़ियाँ। अपनो मिला कऽ नेने आबह।’
वसन्ती ताड़ी, पीबिते मटकुरिया केँ रंग चढै़ लगल। ताड़ी पीबि मटकुरिया सोझे, पसिखन्ने स, पत्नीकऽ माथ परक पथिया अनै दछिनमुहे विदा भेल। गामक दछिनवरिया सीमा पर ठाढ़ भऽ आगू तकलक। जते दूर नजरि गेलइ तहि बीच कतौ पत्नी कऽ अबैत नहि देखलक। कनी-काल पाखरिक गाछ लग ठाढ़ भऽ सोचै लगला जे आगू बढ़ी वा एतइ रुकि जाय। अंग्रेजी वाजा आ लाउडस्पीकरक फिल्मी गीत कान मे पैसि-पैसि मन कऽ डोलबैत। मन पड़लै अपन विआह। बिआह मन पड़िते फुलियाक रुप आगू मे ठाढ़ भऽ गेलइ। गुनधुन करैत सोचलक जे ऐठाम ठाढ़ भ कऽ समय बिताएब, तहि स नीक जे आरो थोड़े बढ़ि जाय। आगू बढ़ल। किछु दूर आगू बढ़ला पर पत्नी कऽ अगिला गाम टपि अबैत देखलक। बाधो कोनो नमहर नहि। फुलियाक नजरि सेहो मटकुरिया पर पड़ल। दुनूक डेग तेज भेल। तेज होइक दुनूक दू कारण। मटकुरियाक मन मे जे जते जल्दी लग मे पहुँचब तते जल्दी भार उतड़तै। जबकि पसीना स नहाएल फुलियाक मन शान्ति। शान्ति अबितहि पथिया हल्लुक लगै लगलै। दुनूक मन मे कतेको नव-नव विचार अबै लगलै।
लग अबितहि मटकुरिया धोतीक ढ़ट्ठा सरिऔलक। किएक त माथ पर भारी ऐला स डाँड़क धोती डाँड़ मे वैसि जायत। ढ़ट्ठा सरिया गमछाक मुरेठा बान्हि दुनू हाथ स पकड़ि फुलियाक माथ परक पथिया अपना माथ पर लेलक। माथ पर लइते किछु कहैक (बजैक) मन मटकुरिया कऽ भेल। मुदा किछु बाजल नहि। किऐक त फेरि मन मे एलै जे वेचारी थाकल अछि, तेँ मन अगिआइल (तमसायल) होएत। हो न हो किछु करुआइल बात बाजि दिअए। जबकि एकाएक माथ परक भार उतड़ला स फुलियाक मन हल्लुक भेलि। मुदा ओहो किछु बाजलि नहि। ओहिना देह कठिआयल। आगू-पाछू दुनू बेकती घर दिशि विदा भेल। जते आूग बढ़ैत तते फुलियाक मन हल्लुक होइत आ मटकुरियाक मन भारी। पत्नी स किछु कहैक विचार मटकुरियाक मे कमै लगल। जना मुह खोलला स भारी बढ़त। मुदा जना-जना आगू बढ़ैत तना-तना फुलियाक देहो-हाथ सोझ होइत आ पति कऽ किछु कहैक मन सेहो होयत। मुदा किछु बजैत नहि। किऐक त पति-पत्नीक बीच गप्पक आनंद तखन होइत जखन दुनूक मन सम (ने बेसी सुख आ ने बेसी दुख) होयत। से अखन धरि दुनूक (मटकुरिया- फुलियाक) बीच नहि भेल। एते काल फुलियाक माथ पर पथिया रहने मन पीताएल त आब मटकुरियाक हुअए लगल। ने फुलिया पति कऽ किछु कहैत आ ने मटकुरिया पत्नी कऽ। मुदा बीच रस्ता (बाध) अबैत-अबैत दुनू मुह स हँसी निकलल। पथिया नेनहि मटकुरिया पाछु घुमि कऽ तकलक त देखलक जे फुलिया मुस्किया रहल अछि। फुलियोक नजरि (आखि) मटकुरिया कऽ मुस्किआइत देखलक। एक टक स एक-दोसर पर आंखि गरौने अपन जिनगी देखए लगल।

बाबी
दुर्गापूजा शुरु होइ स’ एक दिन पहिने, घर छछाड़ै आ दियारी बनवै ले सिरखरियावाली बुढ़िया गाछीक मटि-खोभ स’ मनही छिट्टामे चिक्कनि माटि नेने अंगना अबैत छलीह। रस्ते कातक चैमासक टाट पर बाबी करैला तोड़ैत रहथि, कि सिरखरियावालीक नजरि पड़लै। नजरि पड़ितहि ओ एक हाथे छिट्टा पकड़ने आ दोसर हाथे चाइनिक घाम आंगुर स’ काछि कऽ फेकि बाबी के कहलनि-‘‘बाबी, छठिके कते दिन छै?’’
बाबीक नजरि जुआइल आ सड़ल करैला पर छलनि। किऐक त’ अजोह करैला तीतो बेसी आ सुअदगरो कम होइछै। ततबे नहि, पकैयोक डर। सड़ल करैला एहि दुआरे लत्ती क’ बिहिया-बिहिया तकैत जे जँ ओकरा तोड़ि नहि लेब त’ दोसरो के सड़ाओत। सिरखरियावालीक अवाज सुनि बाबी रस्ता दिशि देखि पुनः करैला तकै लगलीह। किऐक त’ माथ पर भारी देखि गप-सप करब उचित नहि बुझलनि। एक त’ भरल छिट्टा माटि तइ पर खुरपी गाड़ल देखलखिन। मने-मन सोचलनि जे छठि के एखन मासो स’ बेसिये हेतइ तखन एहेन कोन हलतलबी बेगरता भ’ गेलइ। जँ महीना, परव (पक्ष) तीथि जोड़ि क’ कहै लगव त’ अनेरे देरी हेतइ। जते देरी लगतै तते भारियो लगतै। तेँ बावी आखि उठा कऽ देखि, बिना किछु कहनहि, नजरि निच्चा कऽ लेलनि। मुदा ओहो रगड़ी। मन मे होइ जे एखन नहि बुझि लेब त’ फेरि बिसरि जायब। जँ बिसरि जायब त’ किछु नहि किछु छुटिये जायत। एखन त’ मटि खोभा मे मन पड़ल जे पौरुका दशमियेक मेला मे तीनि टा कोनिया, एकटा सूप आ एकटा छिट्टा कीनि नेने रही। जहि स’ छठि पावनि केलहुँ। बाबीक नजरि निच्चा केने देखि सिरखरियावाली दोहरा कऽ बाजलि- ‘गरीब-दुखियाक बात आब थोड़े बाबी सुनै छथिन, जे सुनतिहीन।’
सिरखरियावालीक बात बाबीक करेज कऽ छुबि देलकनि। मुदा क्रोध नहि भेलनि सिनेह उमड़ि गेलनि। एकाएक बाबी अपन बोली बदलि लेलनि। चैवन्निया मुस्की दैत कहलखिन- ‘कनियाँ, मन मे आयल जे चारि टा करैला तोरो तरकारी ले दिअह। तेँ हाँइ-हाँइ करैला ताकै लगलहुँ। कनिये ठाढ़े रहह?’
सिरखरियावाली- ‘जे पुछलिएनि से कहबे ने करै छथि आ करैला दऽ कऽ फुसलबै छथि।’
विचित्र अन्तद्र्वन्द बाबीक मनके घोर-मट्ठा करै लगलनि। एक दिशि माथ पर भारी देखथिन आ दोसर दिशि आइ स’ छठि धरि जोडै़क समय। तहू स’ उकड़ू बुझि पड़ैन जे सोझ मासक सवाल नहि अछि। दू मास बीचक बात छी। सेहो एहेन मास जे लुंगिया मिरचाइक घौंदा जेँका पावनिक घौंदा अछि। जाधरि सभ सोझरा कऽ नहि कहबै ताधरि अपनो मन नहि मानत आ ओहो नहि बूझत। ताल-मेल बैसबैत कहलखिन- ‘कनियाँ, एखन जाउ। हमहूँ तीमनक ओरियान मे लगल छी आ अहूँ कऽ माथ पर भारी अछि।’
सिरखरियावालीक मन मे होइ जे छठि सन पावनि, जे हिसाब स’ ओरियान नहि करैत जायब त’ कैकटा चीज छुटिये जायत। आन पावनि जेँका त छठि हल्लुक नहि अछि। बड़ ओरियान बड़ खर्च। बाजलि- ‘दसमी मेला मे जे कोनिया, सूप छिट्टा कीनि नेने रहै छी, त बुझै छियै जे एते काज अगुआयल रहैए।’
बाबी- ‘कनियाँ, एकटा काज करु। छिट्टा कऽ निच्चा मे राखि दिऔ जे अहूँ कऽ देह हल्लुक भऽ जायत आ हमरो हिसाब जोड़ि-जोड़ि बुझबै मे नीक हैत।’
सिरखरयावाली- ‘बाबी, भारी उठवैत-उठवैत त माथ सुन्न भऽ गेल अछि। ई माटि कते भारिये अछि।’
बाबी- ‘कनियाँ, बहुत हिसाब जोड़ि कऽ बुझबै पड़त।’
सिरखरियावाली- ‘ओते अखन नै कहथु। खाली छठिये टा कहि देथु। गोटे दिन निचेन स’ आबि कऽ सब बुझि लेब।’
आंगुर पर बाबी हिसाबो जोड़ति आ ठोर पटपटा कऽ बजवो करथि- ‘आइ आसिनक अमवसिये छी। आइये भगवती कऽ हकारो पड़तनि आ बघा-सँपहाक निमित्ते खाइयो ले देल जेतइ। काल्हि कलशस्थापन स’ दुर्गा पूजा शुरु हैत। जे नओ-दस दिन धरि चलत। दसमी तिथि के यात्रा हैत। तेकर पाँचे दिन उत्तर कोजगरा हैत। कोजगरा परात स’ कातिक चढ़त। कातिक अमावाश्या कऽ दियावती.... लक्ष्मी पूजा.... कालीपूजा। परात भने गोधन पूजा, दोसर दिन भरदुतिये आ चित्रगुप्तो पूजा। भरदुतिये परात स छठिक विधि शुरु भऽ जायत। पहिल दिन माछ-मड़ुआ बारल जायत.... दोसर दिन नहा क खायल जायत.... तेसर दिन खरना.... चारिम दिन छठिक सौंझुका अर्घ। पाँचम दिन भिनसुरका अर्घ भेला पर उसरि जायत। आंगुर पर गनैत-गनैत बाबी बजलीह- ‘कनियाँ, सवा मास करीब छठि कऽ अछि।’
सिरखरियावाली- ‘सवा मास कते भेलई, बाबी?’
‘दू बीस मे तीनि दिन कम।’
‘हम त सब बेरि दशमिये मेला मे कोनिया, सूप, छिट्टा कीनि लइ छी। तकरा कए-अ दिन छै?’
‘सात पूजा के भगवतीकेँ आँखि (डिम्भा) पड़ला पर मेला शुरु भऽ जायत छै। जेकरा आठ दिन छै। मुदा एकटा बात पूछै छिअह जे एते अगता किअए कीनै छह? ताबे अइ पाइ सऽ दोसर-दोसर काज करबह से नै। जखन पावनि लगिचा जेतइ तखन कीनि लेबह?’
‘पहिने कीनिला स दू-पाइ सस्तो होइए आ एकटा चीजो स’ निचेन भऽ जाइ छी। एक बेरि एहिना नइ कीनलौ त’ भेवे ने कयल। आब की करितौ तेँ पुरने कोनियो-सूपो आ छिट्टो के चिक्कन से धो दलियै आ ओही से पावनि कऽ लेलौ।’
सिरखरियावालीक बात सुनि बाबी व्यवहार दिशि बढ़लीह। मने-मन वुदवुदेलीह- छठि पावनिक महात्म्य बहुत बेसी अछि। खास कऽ किसानक लेल। एक दिशि पूर्वजक मिठाइ-पकवान त दोसर दिशि डोमक बनाओल कोनिया, सूप, छिट्टा। तेसर दिशि कुम्हारक बनाओल कूड़ (बिनु मोड़ल कान। पनिभरा घैल मे मे मोड़ल कान होइत) जहि मे चैमुखी दीप जरैत। ढ़कना, सरबा। त चारिम दिस अपन उपजाओल फल-फलहरी, तीमन-तरकारीक वस्तुक संग मसल्लो क वस्तु। बहुतो अछि। तइ पर स डूबैत सूर्यक पहिल अर्घ। मने-मन बिचारि बाबी चुप्पे रहलीह। मन मे भेलनि जे इ त ओहि इलाकाक छी जहि इलाकाक स्त्रीगण रौद-बसात कऽ गुदानिते ने अछि। खेतक काज करै मे भुते। भगवानो केँ हारि मनबै वाली। बाँबी कऽ मन मे होइन जे चुप भऽ गेलहुँ तेँ बेचारी चलि जायत।
मुदा ले बलैया, इ त काग-भुसुण्डी जेँका डूबि गेल। भानसक अबेर होइत जाइत देखि बाबी कऽ अकच्छ लगनि। जबकि हेजाक मरीज जेँ सिरखरिया बाली कऽ पियास बढ़ले जाइत। अचता-पचता कऽ बाबी पुछलखिन- ‘कनियाँ, बेटी सबहक हालत की छह?’
बेटी नाम सुनितहि सिरखरियावाली किछु मन पाड़ि बाजलि-‘बाबी हिनका स लाथ कोन। तीनूक हालत हमरा स नीक छै। भगवान गरदनि कट्टी केलनि तेँ ने, ने ते कि हमही एहिना रहितौ।’
बाबी- ‘भगवान ककरो अधला थोड़े करै छथिन जे तोरा केलखुन?’
सिरखरियाबाली- (मूड़ि डोलबैत) ते केलनि नै। हमरा पँच-पँच बरीस पर बच्चा देलनि। पाँच वरिस पर देलनि से नीके केलनि जे जखैन एकटा छँटि जाइत छल तखन दोसर होइत छल। मुदा अगता तीनू बेटिये जे देलनि से गरदनि कट्टी नै केलनि। जँ अगता तीनिू बेटा रहैत, नइ त मेलो-पाँच कऽ, त अखैन इ भारी काज अपने करितौ कि पुतोहू करिते। पचता बेटा भेल, जे अखैन लिधुरिये अछि।’
बाबी- ‘जेठकी बेटीक सासुर कतऽ छह?’
सिरखरियाबाली- ‘उत्तर भर। खुटौना टीशन लग। बेचारी कऽ खेत त कम्मे छै, मुदा सब तुर मेहनतीया अछि। एक जोड़ा बड़द रखने अछि। दू टा महीसि लधैर खुट्टा पर छै आ तीनि टा पोसियो लगौने अछि। अन्नो-पानि तते उपजा लइ अए जे साल-माल लगिये जाइ छै।’
बाबी- ‘नाति-नातिन छह की ने?
सिरखरियावाली- ‘हँ, तीनि टा अछि। तीनू लिधुरिये अछि। तंग-तंग बेटी रहै अए। तीनूक नेकरम करैत-करैत तबाह रहै अए। तइ पर से घर-गिरहस्तीक काज।’
बाबी- ‘दोसर बेटीक सासुर कत्तऽ छह?’
सिरखरियावाली- ‘पू भर। कोशी कात। (कोशिकन्हा)
बाबी- ‘कोशी कात किअए केलह?’
सिरखरियावाली- ‘बाबी जानि कऽ कहाँ केलियै। गाम ते नीके रहए मुदा कत्तऽ से ने कत्तऽ से कोशी चलि एलै। कोशियो एलै ते अन्न-पाइनिक कोनो दुख नै होइ छै। मुदा अपना सब जेँका चिष्टा नहि। गाम मे महीसि बेसी छै, जइ से रस्ता-पेरा हेँक-हेँक भलि रहै छै। बाबी- ‘छोटकी?’
सिरखरियावाली- ‘पछिमभर, पाही। इ हम्मर रानी बेटी छी। जते दिन ऐठाम रहै अए रं-विरंगक तीमन-तरकारी खुआवै अए। भानस करैक ऐहेन लूरि दुनू मे ककरो ने छै। जहिना भानस-भात करै मे, तहिना बोली वाणी। गीतो-नाद जे गबै अए, से होइत रहतनि जे सुनिते रही। तहिना चिष्टो चर्या ओढ़वो-पहिरब।’
बाबी- ‘बड़ बेर उठलै। आब तोहू जा।’
सिरखरियावाली- ‘आइ हमरा गंजन लिखल अछि। विचारने छलौ जे जे माटि आनि कऽ धान काटि आनव। (गरमा धान) से नहिये भेल। काल्हि फेरि घरे-अंगना नीपै मे लगि जायब।’
गामक सब बाबी कऽ मेह बुझैत। छथियो। जँ ककरो मन खराब वा कोनो आफत-असमानी होइत त बाबी सबसँ पहिने आबि सेवा-टहल मे लगि जाइत। तहिना जँ कहियो बाबीक मन खराब होइत त गामक लोक जी-जान स लगि जायत। किऐक त सबहक मन मे इ अंदेशा बनल जे बाबीक मुइने गामक बहुत विधि-व्यवहार समाप्त भऽ जायत। ओन बाबी पढ़ल- लिखल नहि, चिट्ठिओ पुरजी नहि पढ़ल होइत छनि। जरुरतो नहि। किऐक त सालो भरिक पावनि आ ओकर विधि, मांगलिक काजक (उपनयन, विवाह इत्यादि) विधि कंठस्थ। कोन गीति कोन अवसर पर गाओल जायत, सब जीभि पर राखल। तहिना पूजाक आराधना स ल कऽ आरती धरिक।
सब कुछ रहितहुँ बाबीक मन मे एकटा कचोट समरथाइये स लगल रहि गेलनि। ओ इ जे एकटा बेटा भेलाक बाद दोसर सन्ताने नहि भेलनि। अपन इच्छा रहनि जे एकटा बेटा, एकटा बेटी हुअए। मुदा बेटा त भेलनि बेटी नहि। जे कचोट सभकेँ कहबो करथिन। कहथिन जे सृष्टिक विकास लेल पुरुष नारी दुनूक जरुरत अछि। नहि त विकास रुकि जायत। ने एकछाहा पुरुषे स काज चलत आ ने एकछाहा नारिये स।
भरदुतियाक परात बाबी माछ-मड़ुआ बाड़लनि। काल्हि नहा कऽ खेतीह। परसू खरना करतीह। खरना दिन ले बाबी सतरिया धानक अरबा चाउर सब साल रखैत छथि। किऐक त टोलक (पनरहे घरक) खरना स लऽ कऽ घाट पर हाथ उठबै धरिक काज बाबीऐक जिम्मा। मुदा दिन गज-पट भऽ जाइत छनि। किऐक त कियो मेहीका धानक अरबा चाउर आ गुड़ दइत छनि त कियो मोटका धानक अरबा चाउर आ गुड़। अरबा त अरबे छी। मोटका-मेहीकाक भेद नहि। तेँ बाबी कऽ खीर रन्है मे पहपटि भऽ जाइत छनि। फुटा-फुटा कऽ कोना करतीह। तेँ सबहक अरबा चाउर कऽ खाइ ले रखि लइ छथि आ अपन सतरिया चाउरक खरना करै छथि। सिर्फ खरने नहि करै छथि, मन मे इहो रहै छनि जे परिवारक हिसाव स एत्ते खीर घुमा दिअए जे घर मे चुल्हि नै चढै़।
षष्ठी। आइ सौझुका अर्घ होयत। तड़गरे बाबी सुति उठि कऽ पावनिक ओरियान मे लगि गेलीह। बहुत चीज भेवो कयल आ बहुत बाकियो अछि। मुदा भरि दिन त ओरिअवैक समय अछि। तहि बीच डेढ़िया पर सऽ बाबी, बाबी ‘सुनलनि। मुदा टाटक अढ़ रहने बोली नहि चीन्हि सकलीह। मन मे भेलनि जे आइ पावनि छी तेँ कियो किछु पुछै ले आयल होयत। ओसारे पर स कहलखिन- ‘के छिअहुँ। अंगने आउ।’
पथिया मे दू टा नारियल, पान (पाँच) छीमी केरा, दू टा टाभ नेबो, दू टा दारीम, दू टा ओल, दू टा अड़ूआ, दू टा टौकुना, दू टा सजमनि, एक मुट्ठी गाछ लागल हरदी, एक मुट्ठी आदी नेने रहमतक (मुसलमान) माए आंगन पहुँच बाबीक आगुु मे रखि बाजलि- ‘बाबी, अपनो डाली ले आ हिनको ले नेने एलिएनि हेँ।’
पथिया स सब वस्तु निकालि ओसार पर रखि निग्हारि-निग्हारि बाबी देखए लगलीह। बच्चे मे रहमत बीमार पड़ल ओकरे कबुला माए केने रहति। तेँ पान साल स ओहो छठि पावनि करैत। जे बात बाबियो केँ बुझल। ओना बाबी अपने आंगन मे भुसबा, ठकुआ बनवैत। मुदा तेकर दाम रहमतक माए दऽ दन्हि। पथिया लऽ रहमतक माए विदा हुअए लगली कि बाबी कहलखिन- ‘कनियाँ, कनी ठाढ़ रहू। रौतुका (खरनाक) नेवैद्य नेने जाउ।’
घर स केरा पात पर खीर आनि रहमतक माए कऽ दऽ देलखिन। हाथ मे नेवैद्य अबितहि रहमतक माएक मन खुशी स नाचि उठल। बेटा कऽ निरोग जिनगी जीबैक आशा सेहो भऽ गेलनि। मने-मन दिनकर कऽ गोड़ लागि विदा भेलि। अंगना स निकलितहि छलि कि एक पाँज कुसियारक टोनी नेने परीछन पहुँच गेल। एक
टोनी बाबी कऽ आ एक टोनी रहमतक माए कऽ दइत सुरसुराइले निकलि गेल। किऐक त अंगने मे सब (सभ) ले टोनी बना नेने छल। बाबी कऽ कुसियारक टोनी दइत रहमतक पाए कहलकनि- ‘हमरा आइ हाट छी बाबी, तेँ कनी देरी से घाट पर आयब।’
बाबी- ‘हम त छीहे कनियाँ, तइ ले तोरा किअए चिन्ता होइ छह। दिनकर-दीनानाथ ककरो अधलाह करै छथिन जे तोरा करथुन। अपन भरि नियम-निष्ठा रखैक चाही।’
रहमतक माए चलि गेल। बाबी फुटा-फुटा सब वस्तु रखै लगलीह। तहि काल दछिनबरिया अंगना मे हल्ला सुनलखिन। ओसार पर स उठि डेढ़िया पर ऐली कि सुनलखिन जे खुशिया बेटा केराक घौड़ स एकटा छीमी तोड़ि कऽ खा गेलइ तइ ले माए चारि-पाँच खोरना मरलकै। बेटा कऽ कनैत देखि खुशिया घरवाली पर बिगड़ै लगल। तेकरे हल्ला। अपने डेढ़िया पर स बाबी कहलखिन- ‘पावनिक दिन छिअए। तखन तू सब भोरे-भोर हल्ला करै छह। दुधमुहा बच्चा ज एक छीमी केरा तोड़ि कऽ खाइये गेलइ तइ ले एते हल्ला किअए करै छह।’
बाबीक बात सुनि दुनू बेकती खुशिया त चुप भेल मुदा छैाँड़ा हिचुकि-हिचुकि कनिते रहल। तहि बीच सोनरेबाली आबि बाबी कऽ कहलकनि- ‘बाबी, नीक की अधला त हिनके कहवनि की ने। देखथुन जे पाइक दुआरे ने छिट्टा भेल ने कोनियाँ।’
सोनरेवालीक बात सुनि बाबी गुम्म भऽ गेलीह। कने काल गुम्म रहि कहलखिन- ‘नै पान त पानक डंटियो सऽ काज चलैत अछि। जकरा छै ओ सोना-चानीक कोनियाँ मे हाथ उठबै अए आ जकरा नइ छै ओ त बाँसेक सुपती स काज चलबै अए। तइ ले मन किअए ओछ केने छह। सबके कि सब कुछ होइते छै। जेकरा जते विभव होइ अए ओ ओते लऽ कऽ पावनि करै अए। तेँ कि दिनकर ककरो कुभेला करै छथिन।’
तहि बीच दीपवाली पाँच बर्खक बेटा कऽ हाथ पकड़ने धिसिअबैत पहुँच कहलकनि- ‘बाबी, देखथुन जे इ छैाँड़ा तेहेन अगिलह अछि जे हाथी कऽ पटकि देलकै। इ त गुण भेलि जे एक्के टा टाँग टुटलै, नै ते टुकड़ी-टुकड़ी भऽ जायत।’
मुस्की दइत बाबी कहलखिन- ‘देखहक कनियाँ, इ सब दिखाबटी छिअए। मनुक्ख केँ मन मे श्रद्धा हेवाक चाही।
अइ ले बच्चा कऽ किअए दमसवै छहक। छोड़ि दहक।’
सूर्य उगले सब घाट पर पहुँच डाली पसारलक। नवयुवती सब गीति गवै लगलीह। हाथ उठौनिहारि पानि मे दुनू हाथ जोड़ि ठाढ़ भेलीह। एक्के ताल मे ढ़ोलिया ढ़ोल बजबै लगल। पोखरिक चारु महार दीप स जगमगा गेल। परदेशियो सब छठि पावनि करै गाम आयल। एक गोटे कऽ नाच कवुला रहै ओ नाच करबै लगल। ताबे दू टा छैाँड़ा दारु पीबि फटाका फोेेड़ै लगल। दुनू बेमत। एक गोटेक फटाका मे कम अवाज भेलइ कि दोसर पीहकारी मारि देलक। अपन डूबैत प्रतिष्ठा क जाइत देखि ओ ओकरा (पीहकारी देनिहार कऽ) कालर पकड़लक। दुनू अपन-अपन परदेशिया भाषा मे गारि-गरौबलि शुरु केलक। गारि-गरौबलि स मारि फँसि गेलइ। दुनू दुनू कऽ खूब मारलक।
दोसर दिन भिनसुरका अर्घ। खुब अन्हरगरे सब घाट पर पहुँचल हाथ उठौनिहारि पानि मे पैसिलीह। चैमुखी दीप स सैाँसे प्रकाश पसरि गेल। सूर्योदय होइतहि दीपक ज्योति मलिन हुअए लगल। हाथ उठै लगल।
बच्चा-बुच्चीक संग रहमतक माए पोखरिक मोहार पर आँचर नेने दुनू हाथ जोड़ि बाबी पर आंखि गड़ौने। तहि काल मुसबा गिलास मे दूध नेने पहुँचल। किनछरि मे पैसि एक ठोप, दू ठोप दूध सब डाली (कोनियाँ) मे दिअए लगल।
हाथ उठा बाबी पानि स निकलि, साड़ी बदलि, छठिक कथा कहै लगलखिन। कथा कहि अकुड़ी छीटि पावनिक विसर्जन केलनि।
अखन धरि जे ढ़ोलिया एक ताल मे ढ़ोल बजवैत छल ओ समदाउनिक ताल धेलक। नटुओ समदाउन गबै लगल।
सब अपन-अपन कोनियाँ समेटि छिट्टा मे रखि, ढ़ोलिया कऽ एकटा ठकुआ एक छीमी केरा दऽ दऽ, विदा भेलि।

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'विदेह' २२५ म अंक ०१ मई २०१७ (वर्ष १० मास ११३ अंक २२५)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. १. राजदेव मण्‍डल -  दूटा बीहैन क था २. रबीन्‍द्र नारायण मिश...