Wednesday, November 18, 2009

जिनगीक जीत- जगदीश प्रसाद मंडल PART II

घरदेखिया
नीन्न टुटितहि लुखियाक नजरि दिन भरिक काज पर पड़लै। काज देखि मन मे अबूह लाग’ लगलनि। असकता गेलीह। मुदा तइओ हूबा क’ क’ उठ’ चाहलनि कि आंखि पूबरिया घरक छप्पर पर गेलनि। बिहाड़ि मे मठौठपरक खढ़ उड़िया गेल छलैक। हड्डी जेँका बाती झक-झक करैत। मन मे एयलनि जे ‘‘की कहत ब’रतुहार?’’ कहत जे मसोमातक घर छियै, तेँ मठौठ उजड़ल छैक। खौंझ उठलनि। ठोर पटपटबैत- ‘‘जेहने नाशी डकूबा बिहाड़ि तेहने झड़कलहा कारकौआ। जुट बान्हि-बान्हि आओत आ लोल स खढ़ उजाड़ि-उजाड़ि छिड़िऔत’।’’
नजरि निच्चा होइतहि दछिनबरिया टाट पर पड़लनि। बरसातमे टाटक आलन गलि क’ झड़ि गेल छलैक। मात्र कड़ची-बत्ती टा झक-झक करैत। जहि स’ ओहिना दछिनबरिया बँसबिट्टी देखि पड़ैत। बेपर्द आंगन। मन खिन्न होवय लगलनि। मनमे एयलनि जे पुरना साड़ी टाटमे टांगि देबइ। मुदा ब’रतुहारक आंखिमे की कोनो गेजर भेलि रहतइ जे नहि देखत। तहूमे साड़ी स’ कते अन्हरायत। ओहिना सब किछु देखत। आरो मन निच्चा खसैत जायत। बाप रे की कहत ब’रतुहार? नागेसर(दिओर) पर तामस उठै लगलनि। कोन जरुरी छलनि जे कौल्हुके दिन द’ देलखिन। घर-अंगना चिक्कन क’ लैतहुँ तहन अबैक दिन दैत’थिन। कोनो की हमर बेटा बाढ़ि मे दहाइल जाइत छलैक। पाँच दिन आगुएक दिन भेने की होइतै? तामस बढ़लनि। तहि बीच आंखि टाट पर स’ निच्चा उतड़लनि। नजरि पड़लनि अंगनाक पनिबट पर। झक-झक करैत झुटका। उबड़-खाबड़ सौँसे आंगन। तहूमे जे झुटका सरिआम मे अछि ओ त’ नहि, मुदा जे अलगल अछि ओ त’ चुभ-चुभ गरैत अछि। सौँसे अंगना सरिअबैमे, कम स’ कम, दस छिट्टा माटि लागत। दस छिट्टा माटि उघि, ढ़ेपा फोड़ि, सरिया क’ पटबै मे त भरि दिन लगि जायत। तखन आन काज कोना हएत? काजक तर मे दबा लगलीह। तामस आरो लहरै लगलनि। अबूहो लगनि। ओछाइने पर पड़ल-पड़ल भार स’ दबैत जायत। दुइये माय-पूत की सब करब? तहू मे आइ अइ छौड़ा केँ कोना किछु करै ले कहबै। ओकरे देखैले ने घरदेखिया आओत। छौँड़ा केँ ते अपने मारिते रास काज हेतै। कानी छटौत। अंगा-घोती खीचत। आइरन करबैले गंज पर जायत। गमकौआ साबुन स’ नहायत। तेल लेत। बाबरी सीटत। तेहेन ठाम कोदारि-खुरपी चलबै ले कोना कहबै। लोहे छिअए, जँ किनसाइत लागिये जाय। तखन त’ आरो पहपटि हैत। कथकिया जे हाथ-पाएर मे पट्टी बान्हल देखितै, तँ की कहत? मनक तामस निच्चा मुहे ससरै लगलनि। तामस उतड़ितहि नजरि घरदेखियाक खेनाइ-पीनाइ पर पहुँचलनि। आन काज त रहियो-सहि क’ भए सकैत अछि मुदा दूध त एक दिन पहिने पौड़ल जायत। जँ से नहि पौड़ब त दही कोना हएत। शुभ काज मे ज दहिये नहि होएत त काजक कोन भरोस। एक त महीसिबला सब तेहेन अछि जे दूध से बेसी पानिये मिला दइत छैक। नबका मटकुरियो ने अछि, जे पानियो सोखि लइतैक। मन मे खौंझ उठै लगलनि। मुदा नजरि चाउर-दालि दिशि बढितहि तामस दबलनि। बेटाक घरदेखिया आओत, हुनका कोना खेसारी दालि आ मोटका चाउरक भात खाइ ले देबनि। लोको दुसत आ अपनो मन की कहत। कियो किछु कह’ वा नहि मुदा कुल-खानदानक त नाक नहि ने कटा लेब। जँ इज्जतिऐ नहि त जिनगिये की? मन पड़लनि घैल मे राखल कनकजीर चाउर। कनकजीर चाउरक भात आ नवका कुटुम मन मे अबितहि लुखिययाक हृदय पघिलल केरा जेँका पलड़ै लगलनि। मने-मन भातक प्रेमी दालिक मिलान करै लगलीह। मेही भात मे मेही दालिक मिलान नीक हएत। मुदा खेरही-मसुरी दालि त भोज-काज मे नहि होइत। होइत त बदाम-राहड़िक। मुदा राहड़ि त घर मे अछि नहि। बांेग्मरना बाढ़ियो तेना दू साल स अबैत अछि जे एक्को डाॅट राहड़ि नहि होइत अछि। तत्-मत् करैत फेरि मन झुझुआ गेलनि। बिना आमिले राहड़िक दालि केहेन हएत? आमक मास रहैत त चारि फाँक कँचके आम द’ दीतिऐ। सेहो नहि अछि। फेरि मन आगू बढ़लनि, पहिल-पहिल समैध-समधीन बनब आ एगारहो टा तरकारी खाइ ले नहि देबनि, से केहेन हएत। गुन-धुन करै लागलीह। गुन- धुन करितहि बर-बरी-अदौरी मन पड़लै। एक्के दिन मे कोना ओरियान हएत? घाटिये-बेसन बनवै मे त तीनि दिन लागत। तखन कोना होयत? फेरि तामस पजरै लगलनि। मन फेरि खौंझा गेलनि। बजै लागलीह-‘‘इ सबटा आगि लगौल नगेसराक छी। जाबे ओकरा छितनी स चानि नहि तोड़ब ताबे ओकरा बुद्धि नहि हेतइ। तमसाइले नागेसरक आंगन दिशि बजैत बढ़लीह। पुरुख छी कि पुरुखक झड़। जहि पुरुख केँ काजक हिसाबे नहि जोड़’ आओत ओहो कोनो पुरुखे छी। ओहि स नीक त मौगी।
नागेसर नदी दिशि गेल छल। नागेसरकेँ नहि देखि लुखिया डेढ़िये पर अनधुन बजै लागलि। मुदा भुरकुरिया(नागेसरक पत्नी) चुप-चाप सुनैत। किछु बजैत नहि। किऐक त मने-मन सोचैत जे दिओर-भौजाइ बीचक बात छी, तहि बीच हम किऐक मुंह लगबी। बजैत-बजैत लुखियाक पेटक बात सठल। बात सठितहि तामसो उतड़ल। बोलीक गरमी क’ कमैत देखि भुरकुरिया बाजलि- ‘‘अंगना चलथु दीदी। बीड़ी पीबि लेथु, तखन जइहथि।’’
घर स बीड़ी-सलाइ निकालि दुनू गोटे ओसार पर बैसि गप-सप करै लागलि। सलाइ खरड़ैत भुरकुरिया बाजलि- ‘दीदी, आब पीहुओ केँ जुआन होइ मे देरी नइं लगतनि। कंठ फुटि गेलै।’
भुरकुरियाक बात सुनि लुखिया हरा गेलीह। जुआन बेटाक सुख मन मे नचै लगलनि। लुखिया क’ आनन्दित होइत देखि पुनः भुरकुरिया बाजलि- ‘‘भइयो स बेसी भीहिगर जवान पीहुआ हेथिन।’’
खुशी स लुखियाक हृदय बमकि गेलनि बजलीह- ‘‘कनि॰ााँ, खाइ-पीबैमे की कोनो कोताही छौँड़ा केँ करै छियै। एक त’ भगवान नउऐं-कउऐं क’ एकटा बेटा देलनि। तेकरो ज’ सुख नै होय त’ एते खटबे ककरा ले करै छी। बापक मन त’ परुँके वियाह करैके रहै मुदा तइ बीच अपने चलि गेल। आब साल लगलै तेँ अइ बेरि जेना-तेना वियाह कइये देबइ।’
कहि आंगन दिशि विदा भेलि। अंगना स निकलितहि मन नागेसर पर गेलनि। सोचै लागलीह, ओहि(नागेसरक) बेचाराक कोन दोख छैक। ओहो की कोनो अधलाह केलक। हुनको मनमे ने होइत हेतनि जे झब दे पुतोहू घर आबै। एखन त वैह ने बाप बनि ठाढ़ छथिन। मुदा काज अगुताइल केलनि। गरीब छी, तेकर माने ई नहि ने जे इज्जति नहि अछि। इज्जति केँ त’ बचा क’ राखै पड़ैत छैक। नव कुटुमैती भ’ रहल अछि। नव कुटुम्ब दुआर पर औताह। हुनका जँ पाँच कौर खाइयो ले नहि देबनि, से केहेन हएत। स्वागत की कोनो धोतिये-टाका टा स’ होइत छैक? आ कि दू टा बोल आ दू कौर अन्नो स होइत छैक। जेहेन पाहुन रहताह तेहने ने बेबहारो(व्यवहारो) करै पड़त। फेरि मन मे तामस उठै लगलनि। ऐहेन पुरुखे की जिनका धियो-पूतोक वियाह करैक लूरि नहि होइन। तहि बीच मन पड़लनि चाह-पान। चाहो-पानक ओरियान त करै पड़त। ऐहन नहि ने हुअए जे एक दिशि करी आ दोसर दिशि छुटि जाय। चाहे-पान टा किअए, बीड़ीओ-तमाकुलक ओरियान करै पड़त ने। ईं की कोनो शहर-बजार छिअए जे लोक एक्के- आधे टा अम्मल रखैत अछि। ई त गाम छियैक, एहिठाम त एक-एक आदमी पनरह-पनरह टा अमल डेबैत अछि। अपनहि विचार मे लुखिया ओझरा गेलीह। किछु फुड़बे ने करै। बुकौर लगै लगलनि। आंखि मे नोर ढ़बढ़वा गेलनि। मन मे उठै लगलनि जे घर त पुरुखेक होइत छैक। एते बात मन मे अवितहि लुखिया बाट पर आबि नागेसरक बाट देखए लगलीह। नदी दिशि स अवैत नागेसर पर नजरि पड़लनि। नजरि पड़ितहि बजलीह- ‘‘काल्हि घरदेखिया औताह आ अहाँ निचेन स टहलान मारै छी।’’
नागेसर- ‘‘अच्छा चलू। बैसि केँ सब विचारि लइत छी।’’
दुनू गोटे आंगन दिस बढ़ल। ओचाओन खरड़ैत पीहुआ क’ देखि नागेसर कहलखिन- ‘‘एखन तू ऐंठार चिक्कन करै छेँ की जा क’ बाबरी छँटा अयमे? काजक अंगना छिऔ, तेँ पहिने बाहरक काज समेटि लेमे की घरे-अंगनाक काज करै छेँ। जो, जल्दी जो।’’
खरड़ा राखि पीहुआ विदा भेेेेेेेेेेेेेेेेेेल। लुखियाक नजरि बदलल। जहिना चश्माक शीशाक रंग दुनियाँक रंग क बदलि दै छै, तहिना लुखियाक नजरि नागेसरक बदलल रुप कें देखलनि। बदलल रुप देखितहि सिनेह उमड़ि पड़लनि। सिनेह स बजलीह- ‘एते लगक दिन किअए देलियै? चारि दिन आगूक दीतिएनि। भरिये दिन मे सब काज सम्हारल हैत?’’
लुखियाक समस्या कें हल्लुक बनबैत नागेसर कहलखिन- ‘‘आइ पहिल दिन घरदेखिया घर-बर देखै औत आ कि खाइन-पीउन करै ले? पसिन्न हेतनि त’ खेता-पीताह, नहि त’ अपना घरक रस्ता धरताह। एखन ओ बटोही बनि औताह। तेँ हमरो ओते सुआगतक जरुरत नहि। जखन पीहुआ पसिन हेतनि, बियाह करब गछताह, तखन ने किछु, आ कि समधीन बनै ले बड़ अगुताइल छी? होइए जे कखैन समैधिक संग होरी खेलाइ?’’
समधिक संग होरी खेलाएव सुनि लुखियाक मन उड़िया लगलनि। बजलीह- ‘‘हम कि कोनो समैधिये भरोसे फगुआ रखने छी, दिअर कोन दिन ले रहत?’’
लुखियाक मन स’ चिन्ता पड़ा गेलनि। मुस्की दैत बजलीह-‘‘ बाटो-वटोही ज’ दुआर पर औताह त’ एक लोटा पानियो नहि देबनि?’’
नागेसर- ‘‘से त देबे करवनि। यैह इज्जति त’ हमरा सभक बाप-दादाक देल अमोल धरोहर छी।
खुशी स भसिआयत लुखिया कहलनि- ‘‘पुरुषक थाह हम नहि पाएब।’’
नागेसर- ‘‘कनी कालमे बजार जायब। जे सब जरुरीक बस्तु अछि से सब कीनि आनब। तइ ले एते माथा-पच्ची करैक कोन जरुरी। अतिथिक सुआगत मात्र नीक-निकुति खुऔनहि होइत? आ कि प्रेम-पूर्वक समय(तुक) पर खुऔने होइत। बैसैक (बैसिबाक) लेल चद्दरि साफ केलहुँ? सिरमो खोल खीचि लेब।’’
‘‘सिरमामे खोल कहाँ अछि? ओहिना पुरना साड़ीक बनौने छी।’ ‘ओहू ले दू टा खोल कीनने आयब।’’
‘‘बड़बढ़ियाँ।’’
दोसरि साँझि, आंगन मे बैसि नागेसर पीहुआ केँ पुछलक- ‘‘तोरा जे नाम पुछथुन्ह त’ की कहबुहुन?’’
पीहुआ- ‘‘से कि हमरा नाम नइं बुझल अछि। बउओक, माइयोक आ गामोक नाम बुझल अछि।’’
‘‘ओते नै पुछै छिऔ। अपने टा नाम बाज?’’
‘‘पीहुआ’’
‘‘धुर बुड़िबक। पीहुआ नहि पुहुपलाल कहिहनु।’’
‘‘से हमर नाम पुहुपलाल कहाँ छी। पहिने सब कहैत रहए आब त सब पीहुऐ कहैत अछि। एहिना ने लोकक नाम बदली होइत रहै छै।’’
मुह विजकबैत लुखिया कहलक- ‘‘हँसी-चैल मे लोक तोरा पीहुआ कहै छौ आ कि जनमौटी नाओ छिऔ।’’
छठियार राति, दाय-माय पुहुपलाल नामकरण केलखिन। जखन ओ आठ-दस बर्खक भेल, तखन जाड़क मास बाध मे फानी लगबै लगल। गहीर खेत सब मे सिल्लियो आ पीहुओ आबि-आबि धान चभैत। जकरा ओ फानी लगा-लगा फँसवैत। अपनो खाइत आ बेचवो करैत।
किछु दिनक बाद स्त्रीगण सभ पीहुआवला कहै लगलैक। फेरि किछु दिनक पछति(भौजाइ सभ) पीहुआ कहै लगलैक। मुदा तेकर एक्को मिसिया दुख ने पीहुऐ केँ होयत आ ने पीहुआ माये-बापकेँ। तेँ पुहुपलाल बदलि पीहुआ भए गेल।
मने-मन नागेसर बिचारलक जे ई(पीहुआ) ऐना नहि सुधड़त। अखन सिखाइयो देबइ तइओ बजै काल मे बजिये देत। से नहि त दोसर गरे काज लिअए पड़त। लुखिया क’ कहलक- ‘‘मोटरी खोलि सब सामान मिला लिअ।’’
दुनू दिओर-भौजाइ सब समान मिलबै लगल। धोती देखि दुनूक बीच मतभेद भए गेल। कन्यागतक विदाइक लेल एक्के जोड़ धोती नागेसर कीनि क’ अनने छले। किएक त’ बुझलक जे बेटीवला धोती नहि पहिरैत अछि। मुदा से बात लुखिया बिसरि गेलि छलीह। तेँ बजलीह- ‘‘दू गोटे औताह, तखन एक जोड़ धोती स की हएत? कम से कम तँ जोड़ो क’ केँ करबनि। जकरा बेसी रहै छैक ओ पाँचो टूक कपड़ा विदाइ करैत अछि।’’
सामंजस्य करैत नागेसर- ‘‘हमरो सासुरक धोती रखले अछि। काज पड़त त’ द’ देबनि।’’
‘‘गुलाबिये रंग मे रंगल अछि। एकरो गुलाबिये मे रंगि लेब। रंगो कीनि क’ नेनहि आयल छी।’’
दोसर दिन, सवेरे सात बजे कन्यागत दुनू बापूत पहुँचल। कन्यागत क’ अबै स पहिनहि नागेसर एकचारी मे बिछान बिछा, तैयार छल। नबका खोलक सिरमो सिरा दिशि देने। कन्यागत केँ अबितहि नागेसर ठेेंगा-छत्ता रखि पैर
धोय ले लोटा बढ़ौलकनि। चाह-पान आनै लुखिया पछुआरे बाटे लफड़ल चैक दिशि विदा भेलि। जाधरि दुनू बापूत डोमन हाथ-पाएर धोय, कुशल-क्षेम करैत, विछान पर बैसिलाह ताधरि लुखियो चैक पर स चाह-पान कीनि अनलक। नागेसरक दुनू आँखि दुनू दिस। तँ देखि लेलक जे चाह आबि गेल। पीहुआ के कहलक- ‘‘बौआ, चाह नेने आबह?’
पीहुआ- ‘‘पानो।’’
‘‘पहिने चाह लाबह। पछाति पान अनिहह।’’
पीहुआक बोली डोमन सुनि लेलनि। तेँ नाम-गाम पूछैत जरुरते नहि रहलनि। दोहारा, नमगर देह। मने-मन डोमन लड़िका पसन्द क’ लेलनि। आंखिक इशारा स’ डोमन बेटा बुचन के पुछलखिन। आंखिऐक इशारा स वुचन सेहो स्वीकृति द’ देलकनि। दुनू बापूतक मुह मे हँसी नाचि गेलनि। मुदा लगले डोमनक मन मे एकटा शंका पैसि गेलनि। शंका ई जे मरदा-मरदी परिवार नहि अछि तेँ हो ने हो कोनो छोट-छीन बाधा ने बीच मे आबि भंगठा दिअए। चाह पीवि पान खा डोमन नागेसर के कहलथिन- ‘‘समैध, जाबे भानस होइत अछि ताबे बाध दिशि स घुमि अबै ले चलु। हँ, एकटा बात त कहबे ने केलौ, तीमन-तरकारी बेसी नै करब। किऐक त सात-आठ दिन से लगातार माछ खेलहुँ, पेट गड़बड़ भ’ गेल अछि। गाम मे रहितहुँ त मड़बज्झू भात आ केेरा चाहे भांटाक सन्ना संगे खइतहुँ। मुदा से त ऐठाम नहि हएत। तेँ दालि-भात एकटा तरकारी(सजमनि चाहे झिंगुनीक) बना लेब। तहू मे बेसी मसल्ला नै देबैक।’’
बीड़ी, सलाइ गोलगलाक जेबीमे रखि नागेसर लुखिया केँ कहै आंगन गेल। ओना टाटक अढ़ स लुखियो सुनि लेने छलीह। तेँ जबाव दइ ले मन उबिआयत रहनि। अवसर पाबि लुखिया बजलीह- ‘‘एते रास जे तीमन-तरकारीक ओरिआन केने छी से की हएत। अपने नै खेताह त’ आंगनवाली ले मोटरी बान्हि देवनि।’’
अपिआरी मे फँसैत माछ जेँका लड़िकाक माय केँ फँसैत देखि डोमन बजलाह- ‘‘तइ ले की हेतैक, हिनको मोटरी बान्हि कन्हा पर नेने जेबनि।’’
आँखि दाबि नागेसर लुखिया क’ बोली(बाजव) रोकै चाहलक। मुदा लुखिया मुहक बात बरतुहार दिशि नहि बढ़ि नागेसरे दिशि खसल- ‘‘बड़ वुद्धियार छथि। बुझव जे बेटाक विआह केलहुँ त’ गामो-घर आ समधियो नीक भेटिलाह। तेँ जेना-तेना कुटमैती कइये लेब।’’
लुखियाक बात सुनि नागेसरक मन हल्लुक भेलनि। किऐक त लुखिया अपन भार द’ बाधा हटौलक। नहि त बेरि-बेरि बाता-बाती होइत। समय पाबि डोमन जोर स बजलाह- ‘‘अहाँ, समधीने लग नुड़िआइल रहब कि चलबो करब?’’
लुखियाक मन भीतर स चप-चप। बजैक लेल लुस-फुस करैत। डोमनक बात सुनि बजलीह- ‘‘हिनके टा समधीन लगड़गर छन्हि। आन केँ कि किछु छैक?’’
मुस्की दइत नागेसर आंगन स निकलि बाध दिशि विदा भेल। आँखि उठा-उठा डोमन गाम-घर देखैत जायत। टोल स निकलि पछिम मुहेक एक पेड़िया धेलनि। गाछी टपि हाथक इशारा स पच्छिम मुहे देखबैत नागेसर कहलकनि- ‘‘पछबारि भाग जे चतड़लाहा गाछ देखै छियैक ओइह गामक सीमा छी।’’
दुनू बापूत देखि डोमन पुछलखिन- ‘‘उत्तरबरिया सीमा?’’
ओंगरी स देखबैत नागेसर- ‘‘ओ ढ़िमका जे देखै छियै, सएह छी।’’
‘‘दछिनबरिया।’’
‘‘तीनि चारि टा जे छोटका गाछ एक ठाम देखै छियै, ओ सीमे पर अछि। पीरारक गाछ छियैक।’’
बाध क’ हियासि डोमन आंखिक इशारा वुचन केँ देलक। दुनू गोटे मने-मन अन्दाजलनि जे दू सय बीघा स उपरेक बाध अछि। तहि बीच नागेसर बाजल- ‘‘बुझलहुँ, बाबूक अमलदारी मे त’ सम्मिलिते छल मुदा हमरा दुनू भाइ मे बँटबारा भए गेल। उत्तर स’ हमर छी आ दछिन स भातिजक।’’
डोमन- ‘‘खोपड़ी कत’ बनौने छी?’’
नागेसर क’ पैछला घटना मन पड़लनि। ओंगरी स’ देखबैत कहै लगलखिन- ‘‘ओहि बँसबाड़ि आ गाछीक बीच एकटा खाधि छैक। जहि मे बिसनारिक गाछ सब छैक। भदवारि मे पानि भरि जाइत छैक। बाँसोक पात आ गाछो सबहक पात ओहि मे खसि-खसि सड़ैत अछि। बिसनारियोक गाछ सब सड़ि जायत छैक। जहि स कारी खट-खट पानि भ’ जायत छैक। ढ़ाँकीक-ढ़ाँकी मच्छर फड़ि जायत अछि। ओहि खाधि मे भैया केँ कालाज्वरक मच्छर काटि लेलकनि। कतबो दवाई-बिरो भेलनि, मुदा नहि ठहड़लखिन।’’
डोमन पुछलथिन- ‘‘अहाँ सभ केँ सरकारी अस्पताल मे दवाइ नहि(नै) दइए?’’
नागेसर कहलथिन- ‘‘से ज दैतैक त’ एत्ते लोक मरबै करैत। बीस आदमी से उपरे हमरा गाममे कालाजार से मरलहेँ। अस्पतालमेँ किछु छैक थोड़े, ओहिना ईंटाक घर टा ठाढ़ अछि। दवाइके के कहे जे कुरसियो-टेबुल बेचि नेने अछि।’’
बजैत-बजैत नागेसरक आँखि नोरा गेल। गमछा स आँखि पोछि आगू बढ़ि गेल। तीनू गोटे खोपड़ी लग पहुँचलाह। बाधक बीच मे कट्ठा दुऐक(दुइऐक) परती, परतिये पर दुनू फरीकक खोपड़ियो आ पाँच टा अनेरुआ गाछो। दू टा साहोरक, दू-टा पितोझिया आ एकटा बज्र-केराइक। साहोरक गाछ सबसँ पुरान मुदा देखै मे सबसँ छोट। ब्रज-केराइ सबसँ कम दिनक, मुदा सबसँ नमहर। पितोझिया गाछक निच्चा मे तीनू गोटे दुबि पर बैसि, गप-सप करै लगलाह।
डोमन पुछलथिन- ‘‘रखबाड़ि(राखी) कोना गिरहत सब दइत अछि?’’
नागेसर बजलाह- ‘‘बीधा मे पाँच घुर घानो आ गहूमो।’’
‘‘रब्बी(दलिहन)-राइ(तेलहन)?’’
‘‘अंदाजे स देलक। अपनो सब उखाड़ि दइ छिअए। जहि स बोइनो भेलि आ राखियो।’’
दुनू बापूत डोमन मने-मन हिसाब जोड़ै लगलाह। अगर कट्ठा मे एक क्बीन्टल उपजत त पच्चीस किलो बीघा मे भेल। जँ से नहि पचासो किलोक कट्ठा हैत, तइयो साढ़े बारह किलो बीघा भेल। सय बीघा स’ उपरेक बाध अछि। तहि स’ या त’ पच्चीस क्वीन्टल, नहि त साढ़े बारह क्वीन्टल राखी (धान) सालमे, जरुर होइतहि हेतनि। तेकर बाद गहूम भेल, मड़ूआ भेल आरो-आरो दलिहन-तेलहन भेल। दुइये माय-पूत कते खायत? हमरो बेटी केँ अन्नक दुख नहि हेतइ। मुस्की दैत डोमन बेटा दिशि तकलक। बेटो बाप दिशि ताकि आंखिये स’ गप-सप क-ए लेलक। कनी काल चुप रहि डोमन नागेसरकेँ पुछलथिन- ‘‘कथी-कथीक खेती बाध मे होइत अछि?’’
नागेसर बजलाह- ‘‘पान साल पहिने तक त अन्ने टाक खेती होइत छल। टो-टा क’ सेरसो-तोड़ीक खेती। मुदा आब खेती बदलि रहल अछि। (मुस्की दैत) की कहब, बुझू त राजा छी। दू सय बीघा क’ अपन बपौती सम्पत्ति बुझैत छी। दुनू सय बीघा के मालिक छी। एक बेरि टाँहि दैत छलियैक त जुआन-जुआन घसवहिनी सब नांगरि सुटुका क’ पड़ा जाइत छलि। मुदा आब से नहि करैत छी। खसल-पड़ल खेत, आड़ि पड़क घास कटै ले ककरो मनाही नहि करैत छिअए। किछु मन पाड़ि- हँ त’ कहै छलौ जे जहि दिन स’ लोक बोरिंग गरौलक आ कोशियो नहरि एलैक तहि दिन स’ त बुझि पड़ैत अछि जे घर स’ बाध धरि लक्ष्मी(लछमी) सदिकाल नचितहि रहैत छथि। ककरो देखबै धानक बीआ पाड़ैत अछि ते कियो रोपए ले बीआ उखाड़ैत अछि। कियो कमठौैन करैत अछि त कियो(धान) कटैत अछि, ते कियो बोझ उघैत अछि। कियो दाउन(दौन) करैत अछि। ते कियो धान ओसबैत अछि। ते कियो अँगो रखैत अछि। कियो धान उसनियो करैत अछि त’ कियो पथार सुखवैत अछि। कियो मिल पर धान कुटबैत अछि त’ कियो चाउर फटकैत अछि। कत कहब।’’
डोमन बजलाह- ‘‘आनो-आनो चीजक खेती हुअए लागल होइत हएत?’’
नागेसर बजलाह- ‘‘ऐँह की कहब! पचासो किस्मक त धानेक खेती हुअए लगल अछि। ओते धानक की नामो मन अछि। धानक संग-संग खाद-पानि द’ क’ गहूम, दलिहनक खेती सेहो होअए लगल अछि। एते दिन त सरिसोए-तोड़क खेती होइत छल। आब सूर्यमुखीक खेती सेहो होइत अछि। राशि-राशिक तीमन-तरकारी सेहो हुअए लगल अछि। बीघा दसेक मे पनरह-बीस गोटे नवका आमक कलम सेहो लगौलक अछि। ऐँह, की कहब, आन्ध्राक आम, मद्रासी आम सब सेहो लोक लगौलक हेन। अजीब-अजीब आमो सब अछि। अइवेरि रोपू त पौरुकेँ स फड़ै लगत। जेहने देखै मे लहटगर लागत तेहने खाइयो मे।’’
डोमन पुछलथिन- ‘‘आमक ओगरबाहि कोना दइत अछि?’’
नागेसर कहलथिन- ‘‘तीनि आम मे एक आम सरही आ चारि आम मे एक आम कलमी। से जहि दिन तोड़ल जायत तहि(तइ) दिनक कहलौ, तहि बीच खसल-पड़ल आमक हिसाब नहि। तेहेन आम सब अछि जे टुकले स’ धिया-पूता खाइ लगैत अदि। खटहो आम केँ चून लगा क’ मीठ बना लैत अछि। धियो-पूतो तते बुद्धियार भ’ गेल अछि जे अंगने से चून नेने जायत आ आम मे लगा क’ खायत।’’
डोमन पुछलथिन- ‘‘आरो की सब आमदनी बाध स’ अछि?’’
नागेसर बजलाह- ‘‘सबटा कि मनो अछि। (ओंगरी स देखबैत) दछिनबारि भाग बीधा बीसेक गहीर खेत छल। चैरी। गोटे साल नहि ने ते पहिने सब साल धान दहाइये जाइत छलैक। मुदा आब, जहिया स पानिक सुविधा भेल, सब गिरहत अपन-अपन खेत क’ आरो खुनि क, पोखरि जेँका बना-बना माछ पोसए लगल हेँ। आन्ध्र प्रदेशक एकटा माछ छै ‘इलिस’। ऐँह, की कहब, (मुह चटपटबैत) अपना सब कहै छिअए रौह, मुदा ओइ(इलिस) आगू मे किछु नहि(ने)। जहिना बढै़ मे तहिना सुआद। हमरा कि कोनो रोक अछि, हमही ओगड़ै छिअए ने, जहिया मन भेलि तहिया बन्सी मे दू टा मारि लेलहुँ। आ सब खेलहुँ। सबसँ मुश्किल आब बनौनाइ भ’ गेल। काजे से ने छुट्टी। के ओते मेठैन(मेंठनि) क’ क’ खायत। आब सुर्ज, माथ पर आबि गेल। चलू। भानसो भ’ गेल हएत। गरमे-गरम खाइ मे नीक होइ छै।’’
तीनू गोटे बाध स घर दिसक रास्ता धेलक। थोडे़ आगू बढ़ल त बँसवारि मे एकटा चिड़ै बजैत। बाजबो अजीब ढ़ंगक। मुस्की दइत नागेसर डोमन क’ पुछलथिन- ‘‘कहू त’ ई चिड़ै की बजैत अछि?’’
कने अकानि क’ डोमन बजलाह- ‘‘ई त’ पान-बीड़ी सिगरेट बजैत अछि।’’
बात सुनि नागेसर ठहाका द’ हँसल। कने काल हँसि, बजलाह- ‘‘ई चिड़ै अहाँ गाम सब दिशि नहि अछि। जहिया कोशीक बाढ़ि अबैत छलैक तहिये स ई चिड़ै हमरा गाम मे अछि। ई बजैत अछि, बढ़मा(ब्रह्मा) विसुन(विष्णु) महेश।’’
विचारक भिन्नताक कारणे डोमन पुनः चिड़ैकबोली अकानए लगल। वुचन सेहो अकानए लगल। अपना बात मे मजबूती अनैक लेल नागेेसर सेहो अकानए लगल। दुनू चुप। दुनू अपन-अपन दुविधा(द्वन्द) मे। डोमन वुचन क’ पुछलक- ‘‘बौआ, तू त’ इसकुलो देखने छहक, तांेही कहह?’’
मामूली सवाल मे हारि मानव, ककरा पसिन्न हैत। डोमनक मन विचार क’ मथैत। डोमनक बात सुनि वुचन बाजल- ‘‘बाबू, हमरा बुझि पड़ैत अछि जे ‘तुलसी, सूर, कबीर’ कहैत अछि।’’
तीनूक तीनि मत। तेँ विवादक प्रश्ने नहि। तीनू अपन-अपन रमझौआ मे ओझड़ाएल(ओझड़ायल)। तेँ तीनू चुपचाप आगू-पाछू घर दिशि विदा भेल।
घर पर अबितहि डोमन बाजल- ‘‘लोटा नेने आउ। कनी डोल-डाल दिशि स’ भए अबैत छी।’’
नागेसर आंगन जा दू लोटा पानि आनि केँ देलकनि। लोटा मे पानि देखि वुचन बाजल- ‘‘बाबू, आगू मे कल-तल नै छैक?’’
डोमन बजलाह- ‘‘एखन तू बच्चा छह, नहि बुझल छह?’’ कहि आगू मुहे गाछी दिशि विदाह भेल। गाछी पहुँच एकटा सरही आमक गाछक निच्चा मे दुनू बापूत बैसि विचार-विमर्श करै लगल। वुचन- ‘‘बाबू, कुटुमैती करै जोकर परिवार अछि। समलाइके मे वियाह, दुश्मनी आ दोस्ती छजैत छैक। लड़िका क’ बाप नहि छैक, त’ की हेतइ। गाम-घर मे लोक मइटुगर के अधलाह बुझैत छैक।’’
डोमन, वुचनक बातो सुनैत आ मूड़ियो डोलबैत, मुदा मने- मन परिवारक आमदनी आ ओहि आमदनीकेँ समटैक लूरि सोचैत। जहि हिसाब स’ आमदनीक जड़ि देखि रहल छी ओहि हिसाब स’ सम्हारैक लुरि नहि छैक। जँ दुनू एक सतह पर आबि जाय त परिवार केँ आगू मुहै ससरै मे बेसी समय नहि लगत। एतेटा बाध छैक। अलेल धास सब दिन रहतै। बाध ओगड़ै मे की लगैत छैक? एक-दू बेरि अइ भाग स’ ओइ भाग घुमब मात्र छैक। अगर जँ अपनो काज ठाढ़ कए लिअए त बैसारियो नहि रहतैक आ आमदनियो बढ़ि जयतैक। हमरा बेटी के एहि घर अयला स’ एकटा काजूल आ बुद्धियार समांग बढ़ि जेतइ। जानकी(बेटी) केँ सब हिसाब- कनमा, अधपेइ, पौवा, असेरा, सेर, अढ़ैया, पसेरी, धारा, मन स ल’क’ बोरा-क्वीनटल धरि, जोड़ैक लूरि छै। तहिना कोड़ी (बीस वस्तु) सोरे(सोलह) सोरहा(सोलह सोरे) दर्जन(बारह) ग्रुस(बारह दर्जन) जोड़ा
(धानक आँटी) (दस), गाही(पाँच) गंडा(चारि) जोड़ा(दू) पल्ला(एक) सब बुझैत अछि। मन मे खुशी एलै। बाजल- ‘‘बौआ, ओना जानकी(बेटी) गिरहस्तीक काज सम्हारि दू टा गाइयोक सेवा क’ लेत। मुदा तहि स’ दूधे टाक आमदनी बढ़त। जरुरत छैक खेतिओ बढ़बैक। तेँ, नीक हएत जे एकटा गाय आ एकटा वड़द द’ दियैक। एकटा बड़द आ एकटा हरबाह भेने दू समांग अपन भ’ जेतइ। जहि स बीघा दू बीघा खेतियो क’ सकैत अछि।’’
वुचन पुछलथिन- ‘‘अपना खेत जे नहि छैक?’’
वुचनक बात सुनि डोमन हँसल। हँसैत बजलाह- ‘‘बौआ, समय ऐहन आबि गेल अछि जे खेतोवला सब खेती छोड़ि नोकरियेक पाछु बोआ रहल अछि। जहि स’ खेती केनिहारक अभाव भ’ रहल छैक। गिरहस्तीक हाल विगड़ि गेल छैक। जबकि जरुरत छैक खेत मे मेहनतक। जे सभ(किसान) नहि बुझि रहलाह अछि।’’
वुचन पुछलथिन- ‘‘कोना बुझत?’’
डोमन बजलाह- ‘‘बौआ खेती मे बड़ बुद्धिक काज छै, मुदा खेती दिन-दिन मूर्खेक हाथमे पड़ल जाँइ छै, से सोचलहक हेँ?’’
तर्क-वितर्क कए दुनू बापूत तय कए लेलक जे कुटुमैती करबे करब। मुदा एकटा जटिल प्रश्न अबि क’ आगू मे ठाढ़ भ’ गेल। ओ ई जे विआह उट-पटाँग ढ़ंग स नहि होय? रस्ता स’ पाइक उपयोग होअय। गुन-धुन करैत दुनू बापूत घर दिशि विदा भेल।
जाधरि डोमन पैखाना दिशि स अबैत-अबैत ताधरि लुखिया चारि-पाँच बेरि(खेपि) दौड़ि-दौड़ि आंगन स बान्ह पर जा-जा देखलक। मन मे उड़ी-बीड़ी लागल छलै जेना। जे कुटमैतीमे कोनो तरहक गड़बड़-सड़बड़ नहि हुअए। नहि त लोक पीकी मारत। कहत जे मौगीक मुख्तिआरी छी ने। बिनु मरदक मौगी बेलगामक होइते अछि। कहलो गेल छै -‘‘राँड़ मौगी साँढ़।’’ फेरि मन मे उठल जे किछु होउ वियाह त’ हमरे बेटाक होएत। तेँ ककरो ओंगरी बतवैक रस्ता नहि रहै देवैक। जहिना बड़तुहार कहताह तहिना हमहू करब। जँ दुनू गोटेक मिलान रहत त’ किअए कोइ आँखि उठाओत। एते बात मन मे अबितहि बड़तुहार क’ लुखिया अबैत देखलक। वान्ह पर स दौड़ले आंगन आबि हाँइ-हाँइ क’ थारी साँठै लगल।
हाथ-पाएर धोइतहि नागेसर डोमन के कहलक- ‘‘आव। पहिने भोजने क’ लिअ।
आगू-आगू लोटा नेने नागेसर आ पाछु-पाछु दुनू बापूत डोमन आंगन गेल। पीढ़ी पर बैसितहि नागेसर थारी आनि आगू मे देलकनि। आंखि घुमा क’ देखि डोमन बजलाह- ‘‘समैध, समधीनियो क’ अढ़ मे बजालिअनु। विआहक सब गप पक्का-पक्की कइये लेब। बैसार पर जखने गप उठाएब कि चारु दिस स लोक आबि अन्टक-सन्ट गप चालि देत।’’
आंखिक इशारा स नागेसर भौजाइ के सोर पाड़ि बैसै ले कहलक। तहिबीच डोमन कहलनि- ‘‘समैध, समधीन के पुछिअनु जे कोना बेटाक बिआह करतीह?’’
नागेसर क’ अगुआ लुखिया बजलीह- ‘‘अहाँ सभ मरदा-मरदी गप करु। हमरा कोनो चीजक लोभ नहि अछि। नीक मनुक्ख घर आबए, बस एतबे लोभ अछि।’’
मने-मन नागेसर सोचैत जे हमरा कतबो मोजर अछि, तइ स’ की? कोनो की हमरा बेटा-बेटीक विआह हएत? तेँ, हम अनेरे मुँह दुरि किअए करब। बाजल- ‘‘समैध, अहाँ अपने मुह स’ बजियौक जे कोना करब?’’
नागेसर टाटक अ’ढ़ मे बैसलि भौज दिशि तकैत बाजल- ‘‘खर्च-वर्च करै लेल किछुत’ चाहबे करी....।’’
नागेसरक बातके कटैत लुखिया बजलीह- ‘‘नै! हम ककरो बेटी क’ पाइ ल’ क’ अपना घर नै आनब।’’
नागेसर भौजक गप्प सुनि चुप भ’ गेल।
भात-दालि सनैत डोमन बजलाह- ‘‘समैध, जहिना अहाँक भातिजक विआह हएत तहिना त हमरो बेटीक हएत। (लुखिया क’ खुश करै दुआरे) हमर बेटी साक्षात् लछमी छी। साल भरि कि दसोसाल घुमि क’ लड़की ताकब त ओहन नहि भेटत। तहू मे आब? आब त लोक मनुक्ख थोड़े घर अनैत अछि, अनैत अछि रुपैआ।’’
मुस्की दइत लुखिया बजलीह- ‘‘जखन दुआर पर आबि बेटा मंगलनि त’ हम द’ देलिएनि। आब हमरा की अछि। दू कौर अन्न आ दू बीत कपड़ा टा चाही। घर त आब ओकरे सवहक(बेटे-पुतोहूक) हेतइ।’’
डोमन बजलाह- ‘‘समैध, पाँच गोटे जे बरिआती चलब, हुनकर सुआगत हम नीक जेँका करबनि। बड़-कनियाँकेँ, जे नव घर ठाढ़ करैक वस्तु अछि, से त देबे करब। तेकर अतिरक्ति एकटा बड़द आ एकटा लगहरि गाय सेहो देब।’’
सबहक मुह स हँसी निकलक। बिआहक दिन तय भ’ गेल। मुस्की दइत लुखिया बाजलि- ‘‘आब की हम कहबनि जे समधीनो हमरे द’ दोथु।’’
ठहाका दइत डोमन उत्तर देलकनि- ‘‘बाह-वाह, तब त दुनू रोटी चाउरे क’।’’
चारि बजे, सुति-उठि चाह पीबि, पान खा डोमन नागेसर केँ कहलखिन- ‘‘समैध, सब बात त तइये भए गेल। आब चलब।’’
दुनू जोड़ धोती नागेसर आंगन स आनि आगू मे रखि देलकनि। धोती देखि डोमन बजलाह- ‘‘समैध, कतबो गरीब छी तेँ कि मुदा इज्जति बचा क’ रखने छी। बेटीक दुआर पर कोना धोती पहिरब?’’
टाटक भुरकी देने लुखिया देखैत रहथि। डोमनक बात सुनि दोग स बाजलीह- ‘‘समैधकेँ कहिअनु जे जखन बेटी आओत तखन ने बेटीक घर हेतनि, ताबे त हमर छी कीने। हम दैत छिअनि।’’
ठहाका दइत डोमन बजलाह- ‘‘जखन हमर बेटी एहि घर आओत तखन ने ओ (ई) समधीन हेतीह आकि अखने?’’
तहिबीच पीहुआ सभकेँ गोड़ लगलक। एक्कैस रुपैआ डोमन पीहुआ हाथ मे देलखिन।
थोड़े दूर अरिआति नागेसर घुमैत बाजल- ‘‘समैध, आब बढ़िऔक। नवम् दिनक दिन भेल। अहाँ काज मे लगि जाउ आ हमहूँ लगि जाइ छी।’’
डोमन दूनू बापुत विदा भेलाह। आगू बेटीक वियाहक ओरिआओन रहनि किन्तु मन पर नचैत रहनि लुखियाक गप्प- ‘‘ककरो बेटी के पाइ ल’ क’ अपन घर नै आनब।’’ देह सिहरि गेलनि बेटा दिश तकलनि। ओहो आब वियाह जोगर भ’ गेल रहय।
14.08.2009

हारि-जीत
चारिमे दिन दुनू प्राणी सोमन विचारलक जे आब एहि गाम मे जीयब कठिन अछि, तेँ गाम स’ चलिये जायब नीक हैत। दुनियाँ बड़ी टा छैक। जतय जीबैक जोगार लागत ततय रहब। सामान सब बान्हि, करेज पर पाथर राखि गाम स’ जेबाक लेल दुनू प्राणी तैयार भ’ गेल। भुखल पेट! सुखायल मुँह! निराश मन! ओसार पर बैसल दुनू प्राणी क’ आँखि सँ दहो-बहो नोर टघरैत रहै! दुनियाँ अन्हार देखि, उठैक साहसे नहि होइत छलै। सोमनक मनमे होइत जे कि छलहुँ आइ की भय गेलहुँ? रंग-बिरंगक विचार, पानिक बुलबुला जेँका, दुनूक मनमे उठैत आ विलीन भ’ जायत! आगूमे मोटरी राखल रहै। जहिना सीमा परहक सिपाही, छाती मे गोली लगला सँ घायल भ’ जमीन पर खसि, छटपटायत, तहिना दुनू प्राणी सोमन, दुखक अथाह समुद्र मे डुबैत-उगैत। भिनसर स’ बारह बजि गेलैक।
सहरसा जिलाक गाम मैरचा। पूब स’ कोशी आबि गाम क’ कटनिया करै लागल। गर लगा-लगा गामक लोक जहाँ-तहाँ पड़ाय लगलाह। ओना सरकार पूबरिया बान्हक बाहर पुनर्वासक व्यवस्था सेहो करैत रहय, मुदा ओहि स’ बोनिहार केँ की सुख हैत? ओकरा सभहक त’ रोजगारो छिना गेल रहै।
पत्नी, बेटा-पुतोहूक संग फुलचनो पंडित गाम छोड़ि पछिम मुहे विदा भेलाह। घरारी छोड़ि अपना एक्को बीत जमीन-जायदाद नहि छलनि। मुदा अपन व्यवसायिक सभ लूरि छलनि तेँ मनमे चिन्तो ओतेक नहि रहनि। चिन्ता मात्र रहनि ठ’रक भेटबाक। कखनो-कखनो मन मे होइन जे अपन गाम त’ बुझल- गमल अछि, आन गाम केहन होयत केहन नहि? मुदा उपाये की? जीबैक लेल त’ मनुष्य सभ किछु करैत अछि। पछबरिया बान्ह स’ मील भरि पाछुये रहथि कि बान्ह पर नजरि पड़लनि। बान्ह देखितहि आशा जगलनि। किएक त’ ओइ बान्हक पछिम कोनो धार-धुर नहि अछि। मुस्कुराइत फुलचन पत्नी सँ पुछलक- ‘‘भगवान रामक खिस्सा बुझल अछि?’’
फुलचनक मुँह दिशि देखि मुनिया बजलीह- ‘‘बहु दिन पहिने सुनने रहियै, आब ओते धियान नै अइ।’’
‘‘जहिना अपना सभ गाम छोड़ि क’ जा रहल छी तहिना ओहो सभ गेल रहथि। अपना सभ के ते बटखरचो अछि, हुनका सभके ते सेहो नै रहनि।’’
तहि बीच फुलचनक पुतोहू, कपली सासुक बाँहि पकड़ि पाछु मुहे घुमा कहलक- ‘‘ऐँड़ीके डोका काटि देलक। खुन बहैए। कनी कतौ बैसथु जे लत्ता बान्हि देबै।’’
ऐँड़ी देखि मुनिया कहलथिन- ‘‘कनियाँ, कतौ गाछो ने देखै छियै जे कनी सुस्ताइयो लैतौ। हमरो पियासे कंठ सुखै अए।’’
सासु-पुतोहूक बात सुनि फुलचन बाजल- ‘‘कनियाँ, जानिये के ते दैवक डाँग लागल अछि, तखन तँ कहुनाके बान्ह धरि चलू। एक त’ रौदायल छी तइ पर स’ जत्ते काल अँटकब तते रौदो बेसिये लागत।’’
बान्ह पर पहुँचतहि सभ निसाँस छोड़लनि। बान्हक पछिम स’ एकटा आमक गाछ रहै। छाहरि देखि सभ केओ गाछ तर पहुँचै गेलाह। एकटा बटोही पहिनहि स’ तौनी बिछा पड़ल छल। कने काल सुस्तेलाक बाद बटोहीकेँ फुलचन पुछलखिन- ‘‘भाइ, तमाकू खाइ छह?’’
जेबी स’ चुनौटी निकालि फुलचनक आगू मे फेकैत, ओ बटोही बाजल- ‘‘कोन गाम जेबह?’’
कोन गामक नाओ सुनितहि फुलचनक हृदय सिहरि गेलनि। मिरमिरा क’ कहलथिन- ‘‘भाइ, कोन गाम जायब तेकर त’ ठेकान नहि अछि। मुदा मैरचा से एलौ हेँ। धार मे गाम कटि रहल अछि। तेँ गाम छोड़ि जा रहल छी। जइ गाम मे कुम्हार नइ हैत तइ गाम मे बसि जायब।’’
कुम्हारक नाओ सुनितहि बटोही उठि क’ बैसैत, कहलखिन- ‘‘हमरो गाम मे कुम्हार नै अछि। चलह, हमरे गाम मे रहि जइए’।’’
आशा देखि सोमन पुछलकनि- ‘‘ऐठाम स’ कत्ते दूर अहाँक गाम अछि?’’
‘‘अढ़ाइ कोस। हमहूँ बहीनिये अइठीन स’ अबै छी। गामे जायब।’’
बेर झुकैत पाँचो गोटे विदा भेलाह। लछमीपुर पहुँचतहि बटोही-रतीलाल फुलचन केँ कहलक- ‘‘भाइ, यैह हमर गाम छी।’’
गाछी, बँसबाड़ि देखि फुलचन पंडित मने-मन खुश! मने मन आकलन कयलनि जे जारनक अभाव कहियो नहि हैत। गाम मे प्रवेश करितहि बीघा दुइयेक पोखरि देख फुलचन मने-मन ताय कयलनि जे नहि कतहुँ रहैक ठ’र भेटत त’ पोखरिक मोहार त’ अछि। पोखरिक बगले मे सभ क्यो रुकि जाइ गेलाह। रत्तीलाल आगू बढ़ि गेलाह।
जहिना गाम मे नट-किच्चक केँ आबितहि धिया-पूता देखै अबैत तहिना फुलचनो सभ तुर केँ देखए गामक धिया-पूता आबै लागल। गाम मे कुम्हार आयलाक समाचार पसरल। थोड़े कालक बाद फुलचन पंडित बेटा सोमन केँ हाथ पकड़ि कहलथिन- ‘‘बौआ, तू सब एतै बैसह। हम कने गामक बावू-भैया सब स भेटि केने अबै छी।’’
कहि फुलचन गाम दिशि विदा भेलाह। इजोरिया पख रहै तेँ सूर्यास्त भेलो पर दिने जेँका लगै। जाधरि फुलचन घुरि केँ अयबो नहि कयलाह तहि सँ पहिनहि गामक पनरह-बीस टा नवयुवक पहुँच गेल। सभहक मन मे नव उत्साह रहै। किएक त’ एखन धरि जे अभाव कुम्हारक गाम मे रहल ओ पूर्ति भए रहल अछि। जहिना आवश्यकताक वस्तु पूर्ति भेला स’ किनको मन मे खुशी होइछै, तहिना फुलचनक अयला सँ गामक लोकक मन मे खुषी रहै। पोखरि स’ थोड़े हटि कट्ठा तीनियेक परती छलै। सब युवक विचारलक जे ओहि परती पर बसाओल जाय। ताधरि गाम फुलचनो घुरि क’ आयलाह। फुलचन दुनू बापूत परती देखलनि। परती देखि सोमन पिता दिषि धुमि बाजल- ‘‘कुम्हारक बसै जोकर परती अछि मात्र पियैवला पानिक दिक्कत अछि।’’
तइ पर पिता फुलचन पंडित जबाव देलनि- ‘‘एखन ने पानिक दिक्कत अछि, मुदा जखन अपने इनार खुनैयोक आ पाटो बनबैक लूरि अछि तखन दिक्कत किए रहत?’’
घरारी पसन्द होयतहि हो-हा करैत युवक सभ बाँस काटै विदा भेलाह। जे-जेहन बाँसवाला तिनका मे तहि हिसाब सँ बाँस काटि पच्चीस टा बाँस जमा केलनि। इहो दुनू बापूत संग दैत रहथिन। हाथे-पाथे सभ घरक काज मे जुटि गेलाह। रातिक बारह बजै-बजैत तेरह हाथक घर ठाढ़ भ’ गेलैक।
प्रात भने दुनू बापूत विचारलनि जे एक त नव गाम, तहू मे नव बास तेँ काज त बहुत अछि। तेँ काज क’ सोझरा केँ चलै परत। रहै जोकर घर भलेही ही नहि भेलि मुदा दिन कटै जोकर त भइये गेल। घर-आंगन बनबै स’ ल’ क’ कारोवार धरिक काज मे हाथ लगबै पड़त। फुलचन सोमन सँ पुछलखिन- ‘‘बौआ, मैरचा स कोन-कोन समान अनने छह?’’
सोमन बाजल- ‘‘बावू, सोचलहुँ जे आन गाम मे लगले सब कुछ थोड़े भ’ जायत। तेँ चाक बनबैक शिला, तख्ता, फट्ठा, जौर, बेलक कील सभ किछु अनने छी।’’
खुशी स’ गद-गद होयत फुलचनक मुँ स’ निकलल- ‘‘बाह-बाह। चाकक ओरियान त’ भइये गेलह। आरो की सभ अनने छह?’’
चकैठ, हथमैन, पीटना, पीरहुर, मजनी, छन्ना सेहो अनने छी।’’
मुस्कुराइत फुलचन बाजल- ‘‘काजक त’ सब किछु अछिए। आइए चाको बनवैमे हाथ लगा दहक। एक गोरे पात खरड़ि अनिहह। एक गोरे घरक लेबिया-मुनिया मे हाथ लगा दहक। हमरा त’ समचे सब ओड़िअबै मे समय बीति जेतह।’’
दस दिनक मेहनति स’ रहै जोकर एकटा घर बनि गेलै। चाको सुखा गेलै। जारनोक ओरियान भ’ गेलैक। चाक गारि, माटि बना सोमन चाक लग बैसल। जहिना उद्योगपति केँ नव कारखानाक उद्घाटन दिन मन मे खुशी रहैछै, आइ तहिना सभ प्राणी फुलचनो केँ रहनि। हँसैत फुलचन पंडित बेटा दिषि देखैत बजलाह- ‘‘ बौआ, जते सामान बनवैक लूरि अछि सब सामान बना, पका केँ खरिहान मे पसारि, सैाँसे गौवाँ केँ हकार दए देखा देबनि। जिनगीक परीक्षा छी।’’
आबा उघारि चारु गोटे खल लगा-लगा सब वस्तु- कूड़, हाथी, ढकना, कोशिया, दीप, पाण्डव, गणेश, लक्ष्मी, मटकूर छाँछी डाबा, घैल, सामा-चकेबा, पुरहर, अहिवात, कोहा, फुच्ची, सरबा, सीरी, भरहर, आहूत, धुपदानी, पातिल, तौला, मलसी, बसनी, उन्नेैसमासी कोही, लाबनि, कलश, कराही, रोटिपक्का, अथरा, कसतारा, लग्जोरी, धिया-पूता खेलैक जाँत, नादि, लोइट, मांट, टारा, टारी, बधना इत्यादि। चारि-चारि खल पावनिक, वियाहक, उपनयनक, श्राद्धक, पोखरिक यज्ञ-कीर्तनक आ घरैलू काजक वस्तु सभ अलग-अलग सजा क’ राखि। फुलचन दुनू बापूत जा’ गौवाँ केँ देखैक हकार देलनि।
चारु प्राणी फुलचनके अपना लूरिक ठेकान नहि छलन्हि किन्तु सभ काजक लेल एकबेर सभ समान कहियो नहि बनौने छलाह। किन्तु आइ सभटा बना सभकेँ ई विश्वास भए गेलनि जे जहिना बड़का व्यापारिक दोकान मे अनेको किस्मक सौदा रहैछै तहिना त’ हमरो अछि!
समय बीतैत गेल। अधिक बयस भेने दुनू प्राणी फुलचन शरीर सँ कमजोर हुअए लगलाह। सोमनो केँ एकटा बेटा एकटा बेटी भेलै। परिवार बढ़लै। खरचो बढ़लै।
समय आगू मुहे ससरैत गेल। दुनू प्राणी फुलचन मरि गेलाह। ....बेटीक वियाह सेहो सोमन कए लेलक। सोमनक बेटा रामदत दुर्गापूजा देखय मात्रिक गेल। ओतहि स’ बौर गेल। माटिक बरतनक जगह द्रव्यक बर्तन सभ परिवार मे धीरे-धीरे बढ़ै लगलै। जहि स’ माटिक बर्तनक मांग कमै लागल। घटैत-घटैत माटिक बरतन परिवार छोड़ि देलक। रहि गेल मात्र पावनि, उपनयन, वियाह आ श्राद्ध धरि।
अपन घटैत कारोबार आ टूटैत परिवार स’ दुनू प्राणी सोमन चिन्तित होअए लागल। आगूक जिनगी अन्हार लाग’ लगलै। कोनो रस्ते नहि देखइ। सोचैत-बिचारैत सोमनक नजरि एकटा काज पर पड़लै। खपड़ा बनौनाइ। खपड़ा पर नजरि पहुँचतहि मुस्कुराइत सोमन पत्नी केँ कहलक- ‘‘एकटा बड़ सुन्दर काज अछि। कमाइयो नीक आ काजो माटियेक।’’
अकचकाइत कपली(पत्नी) पुछलकनि- ‘‘कोन काज?’’
सोमन- ‘‘खपड़ा बनौनाइ।’’
कने काल गुम रहि कपली बाजलि- ‘‘थोपुआ खपड़ा त’ हमहूँ बना सकै छी मुदा नड़िया नै हैत।’’
जोर दैत सोमन बाजल- ‘‘हँ, हैत! चाक परक भलेही नइ हूअए मगर मुंगरी परक किअए नै हैत।’’
‘‘हँ, से त’ हैत।’’
दुनू प्राणी खपड़ा बनवै लागल। लोक केँ बुझल नहि रहै तेँ अगुुरबार क्यो खोज नहि केलक। मुदा जखन एकटा भट्ठा लगौलनि तखन गामक लोक देखलखिन। खपड़ो नीक पाको बढ़ियाँ। गिनतियेक हिसाब स’ खपड़ा बेचए लागल। बढ़िया आमदनी हुअए लागलनि।
बढ़िया कारोबार चलल। मुदा सिमटिक एस्वेस्ट्स केँ अबितहि खपड़ाक मांग कमै लागल। खपड़ा बनौनिहार केँ मंदी आबि गेलनि। ओना सोमनक परिवारो छोट रहै। मात्र दुइये गोटे परिवार मे रहै। मुदा तइयो गुजर मे कटमटी हुअए लगलै। फेर जिनगी भारी हुअए लगलै।
हँसी-खुशी स’ जीवन-यापन करय बला परिवारक एहन स्थिति मे पहुँच गेल जे साँझक-साँझ चुल्हि नहि पजरैत रहै। दोसर कोनो लूरि नहि रहै। अपन खसैत जिनगी देखि कपली पतिकेँ मुँह दिषि तकैत बाजलि- ‘‘ऐना कते दिन दुख काटब? जखन हाथ-पाएर तना-उताड़ अछि आ काज करै चाहै छी तखन की एही गाम केँ सीमा-नाङरि छैक? चलू एहि गाम स’।’’
पत्नीक विचार सुनि सोमनक आँखि नोरा गेलै। किछु बजैक हिम्मते नहि होइ। मने-मन सोचै लागल जे जाहि लूरिक चलते एखन धरि जीअलहुँ ओ लूरि आब मरि रहल अछि। दोसर लूरि त’ अछि नहि। की करब? असमंजस मे पड़ल पति केँ देखि कपली बजलीह- ‘‘दुनियाँ बड़की टा छै। जतै पेट भरत ततै रहब। जहिना मैरचा से आबि लछमीपुर मे एते दिन रहलौं तहिना अइ गाम छोड़ि दोसर गाम मे रहब।’’
पत्नीक विचार स’ सहमत होयत सोमन बाजल- ‘‘अहाँक विचार मानि लेलौ। अइ गाम स’ चारिम दिन चलि जायब। बीचमे जे दू दिन बाँचल अछि तइ मे अहूँ आ हमहूँ गाम मे टहलि क’ सभकेँ जना दिअनु जे जहिना एक दिन हँसी-खुशी स’ छाती लगेलहुँ तहिना आब जा रहल छी। चुपचाप गाम स’ चलि जायब नीक ने हैत। गाम से ते चुपचाप ओ भगैत अछि जे अधलाह काज केने रहैत अछि।’’
दुआरिए-दुआरिए दूनू प्राणी गाममे घुरि सभकेँ कहि देलकै- ‘‘गाम स’ चलि जायब।’’
प्रात होइतहि दुनू प्राणी घरक सभ सामानकेँ मोटरी बान्हि ओसार पर रखलक। भुखल पेट! सुखायल मँुह! निराश मन! तेँ आगू बढ़ैक डेगे नै उठैत रहै।
ओसारा पर बैसल एक-दोसराक मँुहो देखैत आ कनबो करैत रहय। दुनूक करेज छहोछीति भ’ गेल रहै।
सबा बारह बजैत। टहटहौआ रौद। हवा शान्त। साफ मेघ। घाम सँ तर-बत्तर माथ पर मोटरी हाथ मे वी. आइ. पी. वैग नेने रामदत(सोमनक बेटा) आंगन पहुँचल। माय-बापक दशा देखि छाती कपै लगलैक। मेह जेँका आगू मे ठाढ़। सोगे दुनूक आॅखि बन्न। बन्न आँखि सँ नोर टघरैत! दुनू अधीर। करेज क’ थीर करैत रामदत बाजल- ‘‘बाबू।’’
बाबू शब्द कान मे पड़ितहि दुनू बेकतीक आँखि खुजलै। मुदा नोर टघरितहि रहै। किन्तु आब नोरक रुप बदल’ लगलनि। एखन धरि जे नोर सोग स’ खसैत ओ स्नेह मे बदलि गेलै। अकचकाइत सोमनके मुँह स’ निकलल- ‘‘बौआ।’’
बिचहि मे झपटि कपली बाजलि- ‘‘बे ट-ट-अ-आ।’’
ओसारा पर बैग-मोटरी राखि रामदत पिताकेँ गोड़ लाग’ झुकल कि तहि बीच कपली उठि क’ दुनू हाथे पजिया क’ पकड़ि चुम्मा लैत पुनः बाजलि- ‘‘भाग नीक छेलौ बेटा, जे हमसब भेटि भेलियौ, नइ ते तोँ कत’ रहितेँ आ हम सभ कत’ रहितौं.......!’’
मायकेँ गोड़ लागि रामदत मोटरी खोलि दू किलो भरिक रसगुल्लाक पोलीथिन, किलो भरि कटलेट, किलो भरिक बीकानेरी भूजियाक झोरा निकालि, घुसुका क’ रखलक। दुनू प्राणी क’ भुख स’ जरल मन रहै। जहिना गायक गौजुरा बच्चा मायक थन दिशि आखि गड़ा देखैत रहैत, तहिना रसगुल्ला, भुजिया दिशि दुनूक नजरि एकाग्र भ’ गेलै। दुनूक लेल नव वस्त्र निकालि फुटा-फुटा रखलक। चमकैत स्टीलक थारी, लोटा, गिलास, बाटी एक भाग मे रखलक। चाह बनवैक केटली, कप, छन्ना, आयरन, नारियल तेलक डिब्वा आरो-आरो सामान निकालि चद्दरि केँ झाड़लक। जहिना चुल्हिक आगि मे उपर स थोड़बो पानि पड़ला स’ उपर ठंढ़ापन अबै लगैत तहिना दुनूक नजरि चीज-वस्तु देखि शीतल हुअए लगलै। एकदम स्नानोपरान्तक षीतलता जकाँ! सोमनक षीतल मन सँ मधुर षब्द निकललै- ‘‘बच्चा गरमायल छह। पहिने नहा लाय। तखन मन चैन हेतह।’’
माय-बापक मँुह देखि रामदत बाजल- ‘‘बावू हमरो भुख लागल अछि। पहिने कनी-कनी खा लिअ’। पछाति नहाएव।’’
कहि रसगुल्लाक पोलीथिनक गिरह खोलि दू बाकुट सोमनक आगू स्टीलक थारी मे आ दू बाकुट कपलीक थारी मे दए कटलेट, भुजियाक गिरह खोलि बाजल- ‘‘जते मन हुअए तते खाउ। नहायक कोनो धड़फड़ी थोड़े अछि?’’
अपनो मँुहमे रसगुल्ला दैत, बैग खोलि, मनी बैग निकालि, रामदत सोमनक आगू मे देलकनि। रुपैआ देखि कपलीक मन, टिकुली जेँका, पहाड़ पर चढ़ि गेल। धरतीके गोड़ लगलनि।
खायत-नहाइत बेेर टगि गेलै। पछवरिया घरक छाहरि अधा आंगन पसरि गेल छलै। घरक कोन मे जहिना मोथीक पुरना बिछान बिछौल छल तहिना बिछौले रहै। घर स’ बिछान निकालि कपली पछबरिया ओसार लगा बिछौलक। उपर सँ नवका जाजीम बिछौलक। नवका सिरमा रखलक। तीनू गोटे बैसि गप-सप करै लगलाह। सोमन- ‘‘बौआ, तू बौर कोना गेलहक?’’
मन पाड़ैत रामदत बाजल- ‘‘बाबू, हम बौरुलहुँ कहाँ! मामा गाम मे मुजफ्फरपुरक छलगोरिया दुर्गाक मुरती बनबै आयल रहै। ओहो कुम्हारे रहए। तीन गोरे रहै। ओकर छोटका बेटा हमरे एते टा रहै। ओकरा स’ हमरा दोस्ती भ’ गेल। ओकरे संगे चलि गेलियह।’’
बिचहि मे कपली टपकलीह- ‘‘रौ डकूबा, तोरा चिठियो-पुरजी नइ पठौल भेलौ।’’
अपना के स्मरण करैत रामदत बाजल- ‘‘माय काज सिखै मे’ सभ किछु बिसरि गेल रहियौ। तोरो सभहक हालत त’ बॅढ़िये रहौ। तखन चिन्ते कथीक करितहुँ।’’
सामंजस्य करैते सोमनके मुँह स’ निकलल- ‘‘जहिया जे दुख लिखल छल से भोगलहुँ। यैह त भगवानक लीला छिअनि। कखनो दुख त’ कखनो सुख।’’
रामदत- ‘‘बाबू, एहन दशा भेलह कोना?’’
बेटाक बात सुनि सोमनक आँखि भरि गेलनि उत्तर देलखिन- ‘‘बौआ, अखन धरिक जते लूरि-बुद्धि छलै, से सभ पुरान भ’ गेल। नवका सिखलौ नै।’’
पिताक बात सुनि रामदत नमहर साँस छोड़ि मुस्कुराइत कहलक- ‘‘बाबू, हमरा ते छुट्टिये नै दैत रहए। बीस-बीस हजार रुपैआ महीना मे कमाइ छी। तइ पर से मूर्ति बनबौनिहारक कतार लागल रहैए।’’
बिचहि मे कपली टोकलकनि- ‘‘बेटा, की सब लूरि छौ?’’
मुस्कुराइत रामदत कहै लगलनि- ‘‘माय, माटि स’ ल क’ सिमटी धरिक मुरती, नाच-तमाशाक परदा, घर सब मे चित्र सब बनबैक लूरि अछि।’’
बेटाक बात सुनि सोमनक अहं जागलै। बाजल- ‘‘बौआ, जहन एते कमाइक लूरि छह, तहन नोकरी किए करै छह?’’
मुस्कुराइत रामदत कहलकनि- ‘‘एते दिन जे नोकरी केलौ ओ नोकरी नइ भेल। साल भरि त’ माटिये सनै मे लागि गेल। साल भरि खढ़ बन्हैमे आ पहिल माटि लगबैमे चलि गेल। तेसर साल मुरती बनवैमे लागल। चारिम साल मुरतीक आँखि बनबै मे लागल। एहि साल, पाँचम बर्ख, गुरु दैछना चुका अयलहुँए हन। आब अपन कारोबार करब। जखने अपन कारोबार हैत, तखने ने, दू-चारि गोटे सीखबो करत!’’
अपन मजबूरी देखबैत सोमन बजलथि- ‘‘बौआ, अपन चिन्ता जते शरीर के नै खेलक तइ से बेसी तोहर चिन्ता खेलक। किअए त’ हरदम मन मे नचैत रहय जे वंश अंत भ’ गेल। जाबे दुनू परानी छी ताबे धरि....। मुदा आइ सबुर भ’ गेल जे जाबे बीट मे बाँसक चढ़न्त रहैछ,ै ताबे उन्नैस से बीस होइत जाइछै, मुदा निच्चा मुहे होइते सरसरा क’ कोपरो सुखै लगैछै। आशा भ’ गेल जे हमरो वंश एक सय एक्कैस हैत!’’
बेटाकेँ आधुनिक मुर्तिकार पाबि, सोमन गद्-गद् भ’ गेल। हृदय अह्लादस’ भरि गेलै! नजरि, सहजहि बेटाकेँ नजरि मे गड़ि गेलै। ध्यान, बढ़ंत बाँसक बीट मे बिचरण कर’ लगलै...! मनमे भेलै जे बेटा सँ इहो नव गुण सीखत। एखनो ई दुनू व्यक्ति बहुतो काज क’ सकैए।

रुपैआक ढेरी
फुदकैत फुलिया किताब-कापीक बस्ता माटिक रैक पर राखि माय केँ ताकै लगलीह। माय आंगन मे नहि रहै। पछुआर मे गोरहा पाथैत रहै। ओना गोरहा पाथैक समय नहि छल तेँ फुलियाक मन मे गोरहा पाथैक बात ऐबे नहि कयल छल। मुदा तकबो करैत आ षोरो पाड़ैत रहथि। आंगन सँ निकलि जखने फुलिया डेढ़िया लग आइलि कि गोरहा मचान लग स’ मायक बाजब सुनलक। गोरहा मचान लग पहुँचते फुलिया देखलनि जे माय गोरहा पाथि रहली हेन। मन मे तामस उठै लगलनि जे एक त कातिक मास तहू मे सूर्यास्तक समय, इ कोन समय भेल। अनेरे ठंढ़ लगतनि। मन खराब हेतनि। मुदा किछु बाजलि नहि। अप्पन बात बाजलि- ‘‘माय, परसू मधुबनी जायब। लड़की(छात्रा) सबहक बीच ‘‘महिला सषक्तीकरण’’ बिपयक प्रतियोगिता छी। सैाँसे जिलाक छात्रा सभ रहत। हमहूँ जायब। तहि ले कम सँ कम पच्चीस टा रुपैआक ओरियान कए दे।’’
मधुबनीक नाम सुनि माय अपन सभ सुधि-बुद्धि बिसरि गेलीह। हाथ गोबर पर रहनि, आँखि बेटी बेटी आँखि पर आ मन अकास मे कटल धागाक गुड्डी जेँका उड़ै लगलनि। पँजरा मे बैसि फुलिया कहै लगलनि- ‘‘माय, हमरा जरुर इनाम भेटत।’’
अकास स मायक मन धरती पर खसि सोचए लगलीह जे पच्चीस रुपैआ कत’ स’ आनब? कहलखिन- ‘‘बुच्ची, ताबे ककरो से पैंइच ल’ लेह किएक त जुग-जमाना बदलि रहल अछि, बिनु पढ़ल-लिखल लोककेँ कोनो मोजर रहतै? तेँ कोनो धरानी रुपैआक ओरियान क’ लेह। गाय बिआयत त’ दूध बेचि क’ द’ देबैक।’’
मायक बात सुनि फुलिया मुस्कुराइत कहलकनि- ‘‘धुर बुढ़िया नहितन, तीनि रुपैये गोरहा बिकाइछै, दसे टा बेचि लेब तेहिमे त’ तीस रुपैआ भ’ जायत। तइ ले ककरो स’ मुह छोहनि किएक करब। ई त’ रुपैआक ढेरी छिअउ। जखैन जत्ते रुपैआक काज हेतउ, तखैन तते बेचि लिहें। तोरा कि कोनो हेलीकेप्टर कीनैक छओ?’’

पचताबा
इंजीनियरिंगक रिजल्ट निकलितहि रघुनाथ संगी-साथीक संग नोकरी करै अमेरिका जेबाक तैयारी कए नेने छल। सासुर सँ गाम आबि पिताकेँ कहलनि- ‘‘बावू, आइये रौतुका गाड़ी पकड़ि चलि जायब। परसू दस बजे, सुभाशचन्द्र एयर पोर्ट सँ, जहाज फ्लाइ करत।’’
जहिना पाकल आम तोड़ै कियो गाछ पर पर चढ़ैत आ आम तोड़ै सँ पहिनहि खसि पड़ैत अछि, तहिना षिवनाथोकेँ भेलनि। अचंभित होइत कहलखिन- ‘‘किअए? तोरा जोकर काज अपना ऐठाम नहि अछि?’’
पिताक बात सुनि कनेकाल गुम्म भए रघुनाथ बाजल- ‘‘ओहिठाम अधिक दरमाहा दइत अछि। संगहि अपना ऐठामक रुपैआ सँ ओतुका रुपैइयो महग ;टंसनंइसमद्ध छैक।’’
अमेरिकाक संबंध मे षिवनाथ किछु नहि जनैत, सिर्फ एतबे जनैत जे ओहो एकटा देष छी। किछु काल गुम्म रहि कहलखिन- ‘‘तइ सँ की? हम ओहि वंषक छी जे देषक गुलामी मेटबै(मेटबए) गोली खाय स्वतंत्र देषक भार देलनि। तोरा सन-सन पढ़ल-लिखल जँ देष सँ चलि जायत त तोहर सनक काज कोना हएत?’’
पिताक बात केँ अनसून करैत गोड़ लागि, बैग ल’ चुपचाप विदा भ’ गेल। दुनू परानी षिवनाथक नजरि ताधरि रघुनाथक पीठि पर रहलनि जाधरि ओ गाछीक अढ़ नहि भ’ गेल। अढ़ होइतहि दुनूक मन एहि रुपे चूर-चूर भ’ गेलनि जहिना अयना पर लोढ़ी(पाथरक) खसला सँ होयत। अखन धरि दुनूक मनमे पैघ-पैघ अरमान पैघ-पैघ सपना छलनि जे एकाएक फुटल बैलूनक हवा जेँका, बायुमंडलमे मिलि गेलनि। बाढ़िक पानिमे डूबल खेतमे जहिना पानि सुखितहि नव-नव पौधाक अंकुर उगै लगैत अछि, तहिना षिवनाथोक मनमे नव-नव विचार उगै लगलनि। अखन दुनियाँ भलेही गाम-घरक रुपमे किऐक नहि बुझि पडै़त हुअए मुदा बापो बेटाक दूरी हजारो कोस हटि रहल अछि। कि हम सभ फेरि गुलामीक रास्ता पकड़ि रहल छी आ कि आजादीक रास्ता धए चलि रहल छी। एक दिषि मातष्भूमिक लेल पिताक त्याग आ दोसर दिषि बेटाक भटकल रास्ता अछि। भलही बेटाक आषा हुअए मुदा एहनो लोक तँ छथि जनिका बेटा नहि छन्हि। मन पड़लनि पिताक ओ बात जे मष्त्यु सँ चैबीस घंटा पहिने मष्त्यु सय्या पर कहने रहथिन- ‘‘बाउ, हमर खून वीरक खून छी, जे भारतमाता केँ चढ़ौलिएनि। भले ही अखन लड़ाइक दौड़ अछि मुदा ओ खून स्वतंत्रता लइयेकेँ छोड़त। तों सभ स्वतंत्र देषक स्वतंत्र(मनुश्य) हेबह। तेँ, अपन देषकेँ परिवार बुझि सभकेँ भाय-बहीनि जेँका इमानदारी सँ सेवा करैत रहिह। जाहि सँ हमर आत्मा अनबरत प्रसन्न रहत। सेवा क मतलब सिर्फ एतवे नहि होयत जे देषक सीमाक रक्षा करैत अछि, बल्कि इहो होयत जे माथ पर ईंटा उघि सड़क बनबैत आ हर-कोदारि सँ अन्न उपजबैत अछि।’’
पिताक बात मन पड़ितहि षिवनाथक हष्दय तरल(पानि) स ठोस(पाथर) बनै लगलनि। नब-नव विचार मनमे जगै लगलनि। पत्नीक खसल मन देखि कहलखिन- ‘‘अहाँ, एते सोगायल किअए छी?’’
आँचरक खूँट सँ दुनू आखिक नोर पोछि रुक्मिणी कपैत अवाजमे बजलीह- ‘‘की सपना मनमे रहए आ कि देखि रहल छी। जँ से बुझितियेक ते एत्ते देहकेँ किअए धौजनि करितहुँ। नढ़िया-कुकुड़ जेँका अनेर छोड़ि दैतिऐक।’’
पत्नीक व्यथा सुनि षिवनाथक हष्दय पसीज गेलनि। मुदा अपन व्यथाकेँ मनमे दबैत मुस्कुराइत कहलखिन- ‘‘अखन धरिक जे जिनगी रहल ओ कर्तव्यनिश्ठ रहल। अपन कर्तव्य इमानदारी सँ निमाहलहुँ। सभकेँ अपना-अपना आषा पर अपन जिनगी ठाढ़ कए जीवाक चाही। जहिना बरखाक एक-एक बुन्न रास्ता धए चलैत-चलैत अथाह समुद्र मे पहुँच जायत अछि तहिना त अपनो सभ अपन काजकेँ परिवार सँ आगू बढ़ा समाज रुपी समुद्रमे फेटि दिऔक। बेटा अछि, तेँ बेटा पर अपन भार देमए चाहैत छलहुँ, मुदा जनिका अपना बेटा नहि छन्हि ओ ककरा पर अपन भार देथिन। तेँ अपनो सभ ओइह बुझू! बावूजी एते अरजिकेँ दए गेलथि जे इज्जतक संग हॅसैत-खेलैत जिनगी जीवैत रहब।’’
सन् 1942 ईंस्वीक असहयोग आन्दोलन सुनगति-सुनगति सैाँसे देष पजरि गेल। जहि मे मिथिलांचलोक योगदान ककरो सँ कम नहि अछि। दसकोसी लोकक मन एत्ते उत्साहित भए गेलनि जे चान-सूर्ज मे आजादीक झंडा फहराइत देखथि। सुतलीराति मे ओछाइन पर सँ चहा क’ उठि नारा लगवैत सड़क पर आबि जायत छलाह। जे मिथिला यागवल्क्य, गौतम, नारद सन-सन ऋष्शि पैदा केलक ओ पंचाननझा आ पुरन मंडल सन वीर अभिमन्यु सेहो पैदा केने अछि। दसकोसीक वीर सिपाही सिपाही माथ मे कफन बान्हि, लाठी मे झंडा फहरा झंझारपुर सर्कल, रेलवे स्टेषन आ पोस्ट आफिस मे आगि लगवैक- संग-संग रेल-लाइन तौड़ै ले सर्कलक मैदानमे एकत्रित भेलाह। अंग्रेज पलटनक केन्द्र सर्कल छलैक। आन्दोलनकारी केँ एकत्रित होइत देखि ओहो सभ अपन बन्दुकमे गोली भरि-भरि तैयार भ’ गेल। आन्दोलनकारी भारत माताक जय नारा जगबैत आगू बढ़ल। अनधुन गोली पलटन चलबै लगल। एक नहि अनेक गोली पंचानन आ पुरनक छातीमे लगलनि। दुनू गोटे नारा लगवैत दम तोड़ि देलनि। सिर्फ दुइये गोटे टा केँ गोली नहि लागल छलनि अनेको गोटे गोली सँ घायल भेलाह। ओहि घायल मे देवनाथो(षिवनाथक पिता) छलाह। दहिना जाँघमे गोली लागल छलनि। गोली तँ जाँघक माँस, चमरा केँ कटैत हड्डी तोड़ैत निकलि गेलनि। मुदा घायल भए ओहो खसि पड़लाह। पितिओत भाय हुनकर जाँघक लटकल माँस के तौनी स बान्हि, पीठि पर उठा घर पर अनलकनि। चिकित्साक समुचित व्यवस्था नहि, ताहि पर गामे-गाम सिपाही दमन षुरु केलक। गामक-गाम आगि लगौलक। मर्द-औरत केँ पकड़ि-पकड़ि बन्दुकक कुन्दा आ पाएरक बूट स मारि-मारि बेहोष केलकनि। ओछाइन पर पड़ल देवनाथक हष्दय मे आगि धधकैत रहनि मुदा किछु करैक त षक्ति नहि रहि गेलनि। जीवन-मष्त्युक बीच लटकल रहथि। तीसम दिन प्राण छूटि गेलनि।
दस बर्खक षिवनाथ आजादीक समय(15 अगस्त 1947 ई0) पनहर बर्खक भ’ गेल। पतिक मुइने राधाक(षिवनाथक माय) मन टूटलनि नहि बल्कि आगि मे तपल सोना जेँका आरो चमकै लगलनि। पाकल आमक आँठी जेँका करेज आरो सक्कत भ’ गेलनि। गुलामी सँ मिझायल दीप केँ आजादीक नव तेल-बत्ती भेटिलैक। जहि स नव-ज्योति प्रज्वलित भेल। अखन धरिक अव्यवस्थित परिवारकेँ दुनू माय-बेटा मिलि व्यवस्थित(सुढ़िअबै) बनबै लगलथि। अढ़ाइ बीघा खेत केँ अपन दुनियाँ आ कर्मक्षेत्र बुझि दुनू माय बेटा जी-जान सँ मेहनत करै लगलथि। जाहि पर परिवार नीक-नाहाँति ठाढ़ भए गेलनि। ओना षिवनाथक विआह बच्चे मे भ’ गेल छलैक मुदा दुरागमन पछुआयल रहैक। परिवारक बढ़ैक काज देखि बेटाक दुरागमन माय करा लेलनि।
देष आजाद होइतहि गामे-गाम स्कूल बनै लगल। ओना पढ़लो-लिखल लोक कम छलाह मुदा जतबे छलाह ओ ओहि रुपे विद्या-दान मे भीड़ि गेलाह। जाहि स सभ गाममे त नहि मुदा अधिकांष गाम लोअर प्राइमरी स्कूल ठाढ़ भए गेल। कतौ-कतौ मिड्लो स्कूल आ हाइयो स्कूल बनल। कतौ-कतौ कओलेजो ठाढ़ भए गेल। अखन धरि जे स्कूल ठाढ़ भेल ओ सामाजिके स्तर पर, सरकारी स्तर पर बहुत कम बनल। स्कूल खोलैक पाछु लोकक मनमे धर्मस्थान बुझब छलैक। गुरुओजी ओहने रहथि जे मात्र भोजन पर सेवा करैत रहथि। षनीचरा मात्र जीविकाक आधार छलनि। पाइ ल’ क’ पढ़ायब पाप बुझल जायत छलैक। ओना मिड्ल स्कूल, हाइ स्कूल आ कओलेज मे फीस(महीनावारी) लगैत छल, जे संस्थागत सहयोग छल। स्कूल-कओलेज खुजने विद्याक ज्योति प्रज्वलित भेल मुदा अंडी तेल मे जरैत डिवियाक इजोत जेँका, जबकि जरुरी अछि हजार वोल्ट बौलक इजोत जेँका। ओना ठाम-ठीम संस्कृत विद्यालय सेहो अछि,
मुदाकृकृ।
दुरागमनक तीन साल बाद षिवनाथकेँ बेटा भेलनि। रघुनाथक जन्म होइतहि राधाक हष्दय खुषी स सूप सन भ’ गेलनि। मनमे नचै लगलनि बाँसक ओ बीट जाहि मे दिनानुदिन बेसी बाँसोक जन्म होइत आ नमगर, मोटगर सुन्दर-सुडौलौ होयत। मनक खुषी सँ दुनियाँ फुलवारी सदष्ष्य बुझि पड़ैलगलनि। बाधक-
बाध धानक फूल, गाछीक-गाछी आमक मंजर, जामुन, लताम इत्यादिक फूल सँ सजल इ दुनियाँ सोहनगर लगै लगलनि। मुदा जहिना आसीन मास अकाष के करिया मेघ झॅपने रहैत अछि आ कतौ-कतौ मेघक फाट सँ सूर्यक इजोत निकलैत अछि आ सेहो गाछे-बिरीछ पर अँटकि जायत अछि, तहिना। धरती(जमीन) ओहिना केँ ओहिना अन्हार रहि जाइत अछि।
छबे मासक रघुनाथकेँ राधा अपन मुँह चमका-चमका दाकृ दा-दाकृ सिखबै लगलीह। दादा मे देवनाथ्क ओ रुप देखैत छलीह जे माथ पर वीरक मुरेठा बान्हि, हरोथिया लाठी मे लाल झंडा टांगि, हँसैत गोली, खेने रहथि।
चारि बर्ख टपितहि रघुनाथक नाओ षिवनाथ गामक स्कूल मे लिखा देलखिन साले-साल टपैत रघुनाथ गामक स्कूल टपि गेल। मिड्ल स्कूल टपि साइंस राखि रघुनाथ केजरीवाल हाई स्कूल झंझारपुर मे नाओ लिखौलक। जहिना विज्ञान विशय पढ़ै मे नीक लगै तहिना अंग्रेजिओ मे। जहि स ठाकूर बावू आ लत्ती बावू वेसी मानथिन। चारि वर्खक बाद प्रथम श्रेणी मे ओ मैट्रिक पास केलक। बाढ़ि रोदिक द्वारे उपजो-बाड़ी नीक नहि होय जहि स परिवारो लड़खड़ाइते चलैत। बाहर जा क’ आगू पढ़ब असंभव जेँका रहैक। मुदा संयोग नीक रहलैक जनतो काओलेज मे साइंसक पढ़ाई षुरु भेलैक। रघुनाथो कओलेज मे नाओ लिखौलक।
रघुनाथकेँ कओलेज मे नाओ लिखेलाक सालभरि उत्तर राधा(दादी) मरि गेलीह। पिताक श्राद्ध त षिवनाथ केनहि नहि रहथि मुदा माएक श्राद्ध नीक जेँका केलनि। जहि सँ पाँच कट्ठा खेतो बिका गेलनि। तहि लेल मन मलिन नहि भेलनि। किएक त भोज मे खूब जस भेलनि। दू सालक बाद रघुनाथ फस्ट डिविजन स आइ.एस.सी. पास केलक। सत्तरि प्रतिषत सँ उपरे नम्बर रहैक। आइ.एस.सीक रिजल्ट सुनि षिवनाक बेटाकेँ पढ़वैक उत्साह जगलनि। खेत बेचव अधलाह नहि वुझलनि। मन मे एलनि जे रघुनाथ पढ़ि क’ नोकरी करत आ कि खेती करत। तखन खेतक जरुरते की रहतैक। संगहि हमहूँ समाज केँ एकटा सक्षम मनुश्य देबैक।
इंजीनियरिंग, डाॅक्टरी पढ़वै मे केहेन खर्च होयत छैक, से त नीक जेँका बुझथि नहि। मनमे होइन जे पाँच-दस कट्ठा जमीन बेचि बेटा क’ पढ़ा देबैक। मनमे उत्साह रहवे करनि तेँ महग बुझि घरारिये मे से दू कट्ठा बेचि इंजीनियरिंग कओलेज मे बेटाक नाओ लिखा देलनि। नाओ लिखौलाक डेढ़ बर्ख बीतैत-बीतैत अधा जमीन बिका गेलनि। आगूक अढ़ाई बर्ख बाकी देखि चिन्ता घेड़ए लगलनि। मन मानि गेलनि जे सब खेत बेचिनहुँ पार नहि लागत। सोचैत-बिचारैत तय केलनि जे पढ़ैक खर्च पर रघुनाथकेँ विआह करा देबइ। विआह भेनहुँ ओकरा पढ़ै मे बाधा थोड़े हेतैक, पाँच बर्खक बादे दुरागमन करायब। समस्याक समाधान होइत देखि मनमे खुषी एलनि। फेरि मनमे उठलनि जे समयो बदलि रहल अछि। पहिने माय-बाप बेटा-बेटीक विआहकेँ अपन कर्तव्य बुझैत छलाह तेँ पुछब जरुरी नहि बुझैत छलाह। मुदा आब पूछब जरुरी भ’ गेल अछि। परिस्थिति देखि रघुनाथो विवाह करब, मानि लेलक मुदा षत्र्त एकटा लगौलकनि जे लड़की सुन्दर(रंग-रुप) हुअए। जँ गुणवानक षत्र्त रहितनि तहन ते उलझि जयतथि। मुदा से नहि भेलनि। बिवाहक चर्चा षिवनाथ चला देलखिन।
इंजीनियर बर तेँ कथकियाक ढबाहि लागि गेलनि। मुदा कोनो गाम अधलाह वुझि पड़नि त कोनो परिबारक कुल-गोत्र। कतहुँ लड़की दब त कतौ उमरगर लड़की भाँज लगनि। होइत-हबाइत एकठाम कथा पटि गेलनि। गाम त नीक नहि मुदा लड़कीयो गोर आ पढ़ैक खर्चो गछि लेलकनि। विवाह भए गेलैक। विवाहक बाद दुनू समधि बिचारि लेलनि जे सालो भरि जे भार-दौड़क फेरि मे पड़ब, से नीक नहि। तेँ भार-दौड़क वेवहार छोड़िये दियौक। दुनू गोटे सैह केलनि।
इंजीनियरिंगक अंतिम परीक्षा दए रघुनाथ सब सामान लए सासुर आबि गेल। ओना दुरागमन बाकिये मुदा सासुर त सासुरे छी, तेँ चलि आयल। रिजल्ट निकलै मे तीनि मास। काजो त अखन किछु नहिये अछि, तेँ निष्चिन्त से सासुर मे रहैक विचार रघुनाथ कए लेलक। एसे दिनक बाद इंजीनियरक भेकेन्सी विदेष मे खूब भेलैक। सबसँ बेसी अमेरिका मे भेलैक। नव टेकनोलौजी ऐने नव युगक आगमन भेल। नव मषीन नव इंजीनियरक जन्म देलक। मुदा पुरना तकनीको आ इंजीनियरो, अछैते औरदे फाँसी पर लटकै लगल। जहिना गामक-गाम हैजा सँ मरैत अछि तहिना इंजीनियरक जमात पट-पटाय लगल। मुदा दवाइक करखन्ने नहि जे दवाइ बनौत।
परीक्षाक पेपर रघुनाथक नीक भेल तेँ फेल करैक अन्देषे नहि रहैक। हाइये स्कूल स अमेरिकाक उन्नतिक, सुख-मौजक संबंध मे किताबो-पत्रिका मे पढ़ने आ लोकोक मुहे सुनने रहए। तेँ मनमे गुदगुदी लगैत रहए। इ भिन्न बात जे आठ मास मे अस्सी टा बैंक अमेरिकामे दिवालिया भेल।
रघुनाथ फस्ट डिवीजन सँ पास केलक। एक तँ फस्ट डिवीजन रिजल्ट ताहि पर अमेरिकाक नौकरी। खुषी स रघुनाथक मन उड़िया गेल। आवेदन केलक आठे दिन पछाति चिट्ठी भेटिलैक। स्त्रीक गहना बेचि दुनू परानीक टिकट बनबौलक। ससुर पढै़ धरिक खर्चा गछने तेँ टिकटक खर्च दइ से इन्कार केलकनि।
मिषिगन राज्यक राजधानीक षहर लानसिंग। ठंढ़ इलाका। ने अपना सभ जेँका छह ऋृतुक मौसम बनैत आ ने ओकर हास-परिहास होयत। ने रंग-विरंगक गाछ-विरीछ अपना सभ जेँका होयत। लानसिगंगक सत्तरह तल्लाक छोट-छोट तीन कोठरीक आंगन। जहि मे ने सब दिन सूर्यक रोषनी अबैत आ ने भोरे कौआ आबि ओसार पर बैसि सारि-सरहोजिक समाचार सुनवैत अछि। रहैत-रहैत दुनू परानी रघुनाथ केँ पनरह वर्ख बीति गेलनि। जवानीक सभ सपना मने मन गुमसड़ि रहल छलनि।
रघुनाथकेँ अमेरिका गेने षिवनाथक जिनगीक गाछ मौलायल नहि चतड़ि क पाखरिक गाछ जेँका झमटगर भ’ गेलनि। दुनू बेकतियोक विचार सुधरलनि। वंषगत संबंध क्षीण होइत-होइत सुखि गेलनि, सामाजिक संबंध मोटाकेँ जुआयल गाछक सील जेँका बनि गेलनि। जहिना कोनो सवांग केँ मुइला पर परिवार लोक घीरे-घीरे बिसरि जायत, तहिना रघुनाथो केँ दुनू प्राणी षिवनाथ सोलहन्नी बिसरि गेलाह। साल भरिक छाया आ सैयक-सय बरिसक बरखी(वर्शी) करैक जरुरते नहि रहलनि। वंष अंत होयत सदः आँखि सँ षिवनाथ देखैत छलाह। स्वतंत्र देषक गुलाम बुद्धि(ज्ञान)। कोना नहि बिसरितथि? कहियो एक्कोटा पत्र लिखि मन राखे चाहलनि आ ने कोनो मनोरथ मनमे संयोगि केँ रखने रहथि। पढ़ल-लिखल त षिवनाथ नहि मुदा ‘हरिवंष पुराणक’ कथा, गप-सपक क्रम मे बेषी काल दोसराक मुहे सुनैत छलाह।
स्वतंत्रताक उपरान्त विकासपुरक लोकोक विचार सुधरलनि। कोना नहि
सुधरितनि? बूढ़-बच्चा छोड़ि गामक सभ लाठी-झंडा लए झंझारपुर सर्कल आगि लगवै जे गेल रहथि। आँखि सँ सभ किछु देखने रहथि। ओना हजार बीघा रकबाक गाम विकासपुर, जाहि मे साढ़े चारि सय परिबार हँसी-खुषी स कताक पुस्त सँ एकठाम रहैत आयल छलाह। स्वतंत्राक पूर्ब मलिकाना(जमीनदारक) गाम रहए। मालगुजारीक लेन-देन मे सभहक जमीन निलाम भए जमीनदारक हाथ मे चलि गेल छलैक। मुदा कियो अपन खेतक दखल त हुनका नहि देलकनि, मुदा बटेदार बनि उपजा बाँटि-बाँटि दिअए लगलनि। जागल गामक लोक देखि जतबे-तेतबे दाम लय मालिक खेत घुमा देलकनि। अपन खेत केँ स्थायी पूँजी बुझि श्रमक पूँजी जोड़ि जिनगी केँ ठाढ़ करै लगलथि। बाढ़ि-रौदीक प्रकोप सालो-साल होइतहि रहैत छलैक, मुदा विचार आ कर्म बदलने, ओहो अभिषाप नहि बरदान बनि गेलैक। बाढ़ि देखि माथ पर हाथ लय नहि बैसि, ओकर प्रतिकार करैक रास्ता अपनौलनि। तहिना रौदियोक प्रति केलनि। जाहि सँ बाढ़ि-रौदी सँ बचैक अपाय कए लेलनि। ऐहन सभहक धारणा बनि गेलनि। जे बाढ़िक उपद्रव मात्र चारि मास(साओन स कातिक) होइत अछि बाकी बारह मासक सालमे आठ मास त बँचैत अछि। अगर आठ मास जमिकेँ मेहनत कयल जाय तँ बारहो मास हँसी-खुषी सँ गुजर चलि सकैत अछि। ततबे नहि, पानियो त आगि नहि छी जे सभ किछु केँ जरा देत। पानियो त उत्पादित पूँजी छी, तेँ जरुरत अछि ओकर उपयोग करैक। तहिना रौदियोक संबंध मे धारणा बनौने रहथि। खेत मे रंग-बिरंगक अन्न, फल, तरकारी अछि। ने सभ अन्नेक लेल एक रंग पानिक जरुरत होइत आ ने फले-तरकारीक लेल। अधिक वर्शा भेने अधिक पनिसहू फसल होयत अछि आ कम वर्शा भेने कम पनिसहू हएत। ताहि पर थोड़ेक सुविधा सरकारो देलक। नब्बे प्रतिषत अनुदान मे बोरिंग आ पचास प्रतिषत अनुदान मे पम्पसेट देलक। जाहि सँ बोरिंग-पम्पसेट पर्याप्त गाम मे भए गेलैक। किसानक हाथ मे पानि चलि आयल। समाजक किसान कान्ह मे कान्ह मिला षिवनाथो चलए लगलाह। कम खेत रहितहुँ हुनका अन्न-पानि उगड़िये जाइत छलनि।
छह बजे भोर रघुनाथ धीपल-सरायल पानि मिला अधा-छिधा नहा, कपड़ा पहीरि, चाह-बिस्कुट खा ड्यूटी चलि जाइत। असकरे ष्यामा डेरा मे रहि जायत छलीह। ने अंग्रेजी भाशाक बोध छलनि जे दोकानो-दौरीक काज कए सकितथि आ दोसरो सँ गप-सप करैत समय वितबितथि। ओना बगलेक फ्लेट मे आरो-ओरो भारतीय(इंडियन) सभ रहैत छलाह। मुदा ओहो कियो केरल केँ त कियो मद्रासक छलाह। भाशाक दूरी देखि ष्यामा मने-मन सोचै लगलीह जे मनुश्य सँ नीक पषु होइत, जे अपन स्वभाव स एक-दोसरा स मेलो रखैत अछि। मनुक्ख त मनुक्खे छी जे बोले सँ राजा बनि जायत अछि। जहिना पिजराक सुग्गा अकास मे उड़ैत सुग्गा देखि कनैत अछि तहिना कोठरी मे बैसलि ष्यामा मने-मन कुही होइत छलीह। मन मे होइत छलनि कोन जनमक पाप कयल अछि जे ऐहन गति भ’ गेल अछि। नैहर स सासुर धरिक सभ किछु हरा गेल।
भिनसरे डेरा सँ निकलि रघुनाथ कार्यालय पहुँच जायत छथि। कार्यालये मे खाइ-पीवैक व्यवस्था सेहो छैक। मषीनेक संग-संग रघुनाथो बारह घंटा बितबैत छथि। बुद्धि सँ ल’ क’ हाथ धरि मषीनेक संग भरि दिन रहैत-रहैत मषीन बनि गेलनि। संवेदनषून्य मनुश्य। जाहि मे दया, श्रद्धा, प्रेमक कतौ जगह नहि। मुदा आइ रघुनथकेँ कार्यालय पहुँचतहि मनमे उड़ी-बीड़ी लगि गेलनि। काजक दिषि एको-मिसिया ध्याने नहि जायत छलनि। छुट्टीक दरखास्त दए कार्यालय सँ डेरा विदा भेलाह डेरा आबि, देहक कपड़ा आ जूत्ता बिनु खोलनहि पलंग पर, चारु नाल चीत भ’ ओंघरा गेला। जहिना जेठ मासक तबल धरती पर बिहरिया बरखाक बुन्न खसितहि गरमी-सरदीक(गर्म-ठंढ़क) बीच घनघोर लड़ाइ षुरु भ’ जायत अछि तहिना रघुनाथ क मनमे वैचारिक संघर्श हुअए लगलनि। ऐहन जोर बैचारिक बिहारि मनमे उठि गेलनि जे बुद्धि(ब्रेन) चहकै लगलनि। चहकैत बुद्धि सँ अनायास निकलै लगलनि- ‘‘हमरा स सइओ गुना ओ नीक छथि जे अपना माथ पर पानिक घैल उठा मातृभूमिक फुलवारीक फूलक गाछ सीचि रहल छथि। अपन माय-बाप, समाजक संग जिनगी बीता रहल छथि। आइ जे दुनियाँक रुप-रेखा बनि गेल अछि ओ किछु गनल-गूथल लोकक बनि गेल अछि। जिनगीक अंतिम पड़ाब मे पहुँच आइ बुझि रहल छी जे ने हमरा अपन परिवार चिन्हैक वुद्धि भेल आ ने गाम-समाजक। दुनू आँखि स दहो-बहो नोर चुबि गाल पर होइत पलंग पर खसै लगलनि।
षिवनाथ हँसैत ओछाइन पर सँ उठि पत्नीकेँ सोर केलखिल- ‘‘कत्ते छी, कने ऐम्हर आउ?’’
मुस्की दइत लग आबि रुक्मिणी बजलीह- ‘‘भोरे-भोरे की रखने छी जे सोर पाड़लहुँ।’’
‘‘मन मे आबि रहल अछि जे अपन दुनू प्राणीक श्राद्ध कइये लइतहुँ। जँ हम पहिने मरि जायब ते अहाँक श्राद्ध हएत की नहि। नहि जँ पहिने अही मरि जायब ते हमर श्राद्ध हएत की नहि।’’
‘अखन हम थोड़े मरैवाली भेलहुँ हेँ, जे मरब।’’
‘‘अपन विआह बिसरि गेलिऐक? जखन अहाँ छह वर्खक रही आ हम सात बर्खक रही तहिये ने विआह भेल रहए। मन अछि कि नहि जे खरही से नापि केँ जोड़ा लगौल गेल रहए।’’
किछु काल गुम्म रहि रुक्मिणी बजलीह- ‘‘अपन विआह-दुरागमन आ माए-बाप जँ लोक बिसरि जायत त ओहो कोनो लोके छी।’’
मुस्की दइत षिवनाथ कहलखिन- ‘‘हमरा आखि मे अहाँ ओइह छी जे दुरागमन दिन झाँपल पालकी मे बैसि नैहर स सासुर आयल रही। अहीं कहू जे हमरा किअए ने अहाँक चूड़ीक खनखनीक अवाज मे स्वर लहरी आ माथक सेन्नुर मे जिनगीक मधु फल देखि पड़त। पचहत्तरि पार कए अस्सीक बर्खक बीच दुनू गोटे पहुँच चुकल छी तेँ खुषी अछि। आँखिक सोझ मे देखैत छी जे विआहक पाँचे दिनक वाद चूड़ियो फूटि जायत छैक आ माथो धुआ जायत छैक। तहिठाम हम-अहाँ भाग्यषाली छी की नहि?’’
पतिक बात सुनि रुक्मिणी मुस्कुराइत पतिक आँखि मे अपन आँखि गाड़ि पाछु सँ आगू धरिक जिनगी देखै लगलीह। श्

ठेलावला
बारह बजेक घंटी, टाबरक घड़ी मे, बजितहि भोलाक निन्न टूटि गेलनि। ओछाइन पर स’ उठि सड़क पर आबि हियासय लगल त देखलक जे डंडी-तराजू माथ स’ कनिये पछिम झुकल अछि। मेघनक दुआरे सतभैया झँपायल। जिमहर साफ मेघ रहए ओम्हुरका तरेगण हँसैत मुदा जेमहर मेघोन रहए ओम्हुरका मलिन। गाड़ी-सबारी स’ सड़क सुुनसान। मुदा बिजलीक इजोत पसरल। गस्तीक सिपाही टहलैत रहए। सड़क पर सँ भोला आबि ओछाइन पर पड़ि रहल। मुदा मन उचला-चाल करैत। सिनेमाक रील जेँका पैछला जिनगी मन मे नचैत रहए। जहिना चुल्हि पर चढ़ल बरतनक पानि तर स उपर अबैत तहिना भोलोक मनक खुषी हष्दय सँ निकलि चिड़ै जेँका अकासमे उड़ैत अछि। किएक नहि खुषी अओतैक? हरायल वस्तु जे भेटि गेलैक अछि। मन गेलनि परसुका पत्र पर। जे गाम सँ दुनू बेटा पठौने रहनि। असंभव काज बुझि विष्वासे नहि होइत रहनि। पत्र त नहि पढ़ल होयत रहनि मुदा पढ़बैकाल जे पाँती सभ सुनने रहथि, ओहिना आँखिक आगू नचैत रहनि। पत्र उघारि आँखि गड़ा देखै लगलथि। ‘‘बाबू, पाँच तारीख केँ दुनू भाय ज्वाइन करै जायब। इच्छा अछि जे घर स विदा हेबा काल, अहाँ केँ गोड़ लागि घर सँ निकली। तेँ पाँच तारीख क’ दस बजे सँ पहिनहि अपने गाम पहुँच जाय।’’ पत्रक बात मनमे अबितहि भोला गाम आ षहरक बीचक सीमा पर लसकि गेलाह। मनमे ऐलनि समाज सँ निकलि, छाती पर ठेला घीचि, दू टा षिक्षक समाजकेँ देलिऐक कि ओहि समाजक आरो ऋष्ण बाकी छैक? जँ नहि तँ किएक ने छाती लगाओताह। जहि सँ मनमे खुषी उपकलनि जे जहिना गाम सँ धोती गोलगोला आ दू टाका लए क’ निकलल छलहुँ तहिना देहक कपड़ा, सनेस, चाह-पानक खर्च छोड़ि किछु नहि एहिठाम लए जायब। चिड़ै टाँहि देलकै फेरि ओछाइन पर स उठि निकललाह त देखलखिन जे बाँस भरि ऊपर भुरुकबा आवि गेल अछि। चोट्टे घुरि क’ आबि भोला संगी-साथीकेँ उठा अपन सभ किछु बाँटि देलखिन अपना ले सिर्फ टिकटक खर्च, सनेस आ पाँकेट खर्च मिला सय रुपैया राखि, कपड़ा पहीरि, धर्मषाला केँ गोड़ लागि हँसैत निकलि गेलाह।
जखन आठे बर्खक भोला रहथि तखनहि माय मरि गेलखिन।। तीनिये मासक पछाति रघुनी(पिता) चुमाओन क’ लेलखिन। ओना पहिलुको पत्नी सँ चारि सन्तान भेलि रहनि। मुदा सिर्फ भोले टा जीवित रहल। सत्माय केँ परिवार मे ऐने भोलाकेँ सुखे भेलनि। ओना गामक जनिजातियो आ पुरुखो केँ होयत जे सत्माय भोला केँ अलबा-दोलबा क’ घर स भगा देतैक नहि त परिवार मे भिनौज जरुर कराइये देतीह। मुदा सभहक अनुमान गलत भेलनि। भोला घर सँ सोलहन्नी फ्री भ’ गेलाह। फ्री सिर्फ काजे टा मे भेला, मान-दान बढ़िये गेलनि। दुनू साँझ भानस होइतहि माय फुटा क’ भोला ले सीक पर थारी साँठि क’ राखि दैत छलीह। भलेही भोला दिनुका खेनाइ साँझ मे आ रौतुका खेनाइ भोरमे किएक ने खाथि।
परोपट्टा मे जालिम सिंह आ उत्तम चन्दक नाच जोर पकड़ने। सभ गाम मे तँ नाच पार्टी नहि मुदा एक गाम मे नाच भेने चारि कोसक लोक देखै अबैत।
विषौलक(भोलाक गामक) नाच पार्टी सबसँ सुन्दर अछि। जेहने नगेड़ा बजौनिहार तेहने बिपटा। जाहि स पार्टीक प्रतिश्ठा दिनानुदिन बढ़ितहि जायत। घर सँ फ्री भेने भोला नाचक परमानेंट देखिनिहार भ’ गेलाह। नाचो भरि रौतुका, नहि कि एक घंटा, दू घंटा, तीनि घंटाक। जेहने देखिनिहार जिद्दी तेहने नचिनिहारो। गामक बूढ़-बूढ़ानुस सँ ल’ क’ छौँड़ा-मारड़ि घरि भरि मन मनोरंजन करैत। मनोरंजनो सस्ता। ने नाच पार्टी केँ रुपैआ दिअए पड़ैत आ ने खाइ-पीबैक कोनो झंझट। ओना गामक बारह-चैदह आना लोकक हालतो रद्दिये। मुदा जे किसान परिवार छल ओ अपना ऐठाम मासमे एक-दू दिन जरुर नाच करबैत छलाह। ओ नटुआकेँ खाइयो ले दैत छलथि आ कोनो-कोनो समानो कीनि केँ दैत छलथिन। भोलो नाच पार्टीक अंग बनि गेल। डिग्री सेदैक जिम्मा भेटि गेलैक। डिग्रीसेदैक जिम्मा भेटितहि काजो बढ़ि गेलैक। घूरक लेल जारनोक ओरियान करै पड़ैत छलै। अपना काजमे भोला मस्त रहै लगल। मुदा एतबे स ओकर मन ्यान्त नहि भेलैक। काजक सष्जन ओ अपनोहु करै लगल। स्टेजक आगू मे जे छोटका धिया-पूता बैसि पी-पाह करैत, ओकरो सभपर निगरानी करै लगल। आब ओ चुपचाप एकठाम नहि बैसैत। घूमि-घूमि क’ महफिलोक निगरानी करै लगल। आरो काज बढ़ैलक। नटुआ सभकेँ बीड़ी सेहो लगबै लगल। बीड़ी सुनगबैत-सुनगबैत अपनो बीड़ी पीबि सीखि लेलक। किछुऐ दिनक पछाति भोला बीड़ीक नमहर पियाक भ’ गेल। किएक त एक्के-दू दम जँ पीबए, तइयो भरि रातिमे तीसि-पेंइतीस दम भ’ जायत छलैक। जहि स’ भरि राति मूड बनल रहैत छलैक।
बीड़ीक कसगर चहटि भोला केँ लागि गेलै। रातिमे ते नटुऐ सभ सँ काज चलि जायत छलैक मुदा दिनमे जखन अमलक तलक जोर करैत त’ मन छटपटाय लगैत छलैक। मूडे भंगठि जायत छलैक। मूड बनबैक दुआरे भोला बापक राखल बीड़ी चोरा-चोरा पीबै लगल। जहिक चलैत सभ दिन किछु नहि किछु बापक हाथे मारि खायत। एक दिन एक्केटा बीड़ी रघुनी केँ रहनि। भोला चोरा क’ पीबि लेलक। कोदारि पाड़ि रघुनी गाम पर अयलाह त बीड़ी पीबैक मन भेलनि। खोलिया पर स अनै गेलाह त बीड़ी नहि देखलनि। चोट पर भोला पकड़ा गेलै। सभ तामस रधुनी भोला पर उताड़ि देलखिन। मारि खाय भोला कनैत उत्तर मुहेक रास्ता पकड़लक। कनिये आगू बढ़ल कि करिया काकाक नजरि पड़लनि। भोलक कानब सुनि ओ बुझि गेलखिन जे भीतरिया मारि लागल छै। चुचुकारि केँ पुछलखिन- ‘‘की भेलौ रौ भोला?’’
करिया काकाक बात सुनि भोला आरो हिचुकि-हिचुकि कनै लगल। हिचुकैत भोला कनिये जोर सँ काका केँ कहलकनि। जे कानबक अवाज मे हरा गेलैक। काका भोलाक बात नहि बुझलखिन। मुदा बिगड़लखिन नहि, दहिना डेन पकड़ि रघुनी केँ कहै बढ़लथि। काका केँ देखि रघुनियोक मन पघिल गेलैक। काका कहलखिन- ‘‘रघुनी, भोला बच्चा अछि किऐक त विआह नइ भेलै अए। तेँ नीक हेतह जे विआह करा दहक। अपन भार उतड़ि जेतह। परिवारक बोझ पड़तै अपने सुधरत। अखन मारने दोड्ढी हेबह। समाज अबलट्ट जोड़तह जे बाप कुभेला करैत छैक। जनिजातिक मुँह रोकि सकबहक, ओ कहतह जे ‘‘माय मुइने बाप पित्ती।’’
करिया काकाक विचार रघुनीक करेज केँ छेदि देलक। आँखि मे नोर आबि गेलैक। अखन धरि जे आँखि रघुनीक करिया काका पर छलैक ओ भोलाक गाल पड़क सुखल नोरक टघार पर पहुँच अटकि गेलैक। मारिक चोट भोलक देह मे निजाइये गेलैक जे संग-संग विआहक बात सुनि मनमे खुषियो उपकलै। बुद्धिक हिसाब सँ भलेही भोला बुड़िवक अछि मुदा नाच मे मेल-फीमेल गीत त’ गबितहि अछि।
पिताक हैसियत स रघुनी करिया काकाकेँ कहलखिन- ‘‘काका, हम ते ओते छह-पाँच नहि बुझैत छियै, काल्हिये चलह कतौ लड़की ठेमा क’ विआह कइये देवइ।’’ ‘‘बड़बढ़िया’’ कहि करियाकाका रास्ता घेलनि।
भोलाक वियाह भेला आठे दिन भेल छलैक कि पाँच गोटेक संग ससुर आबि रघुनी केँ कहलकनि- ‘‘वियाह से पहिने हम सभ नहि बुझलियैक, परसू पता लागल जे लड़का नाच पार्टी मे रहै अए। नटुआ-फटुआ लड़काक संग अपन बेटीकेँ हम नहि जाय देब। तेँ, ई संबंध नहि रहत। अपना सभ मे ते खुजले अछि। अहूँ अपन बेटाकेँ वियाहि लिअ आ हमहूँ अपना बेटीकेँ दोसर वियाह कए देब।’’ कहि पाँचो गोटे चलि गेलाह।
ससुरक बात सुनि भोलाक बुद्धिये हरा गेलै। जहिना जोरगर बिरड़ो उठला पर सभ किछु अन्हरा जायत छैक तहिना भोलोक मन अन्हरा गेल। दुनियाँ अन्हार लगै लगलैक। ओना तीनि मास पहिनहि नाच पार्टी टुटि गेल छलैक। एकटा नटुआ एकटा लड़की ल’ क’ पड़ा गेल छलैक। जहि स गाम दू फाँक भ’ गेलैक। दू ग्रुप मे गाम बँटा गेलैक। सैाँसे गाम मे सनासनी चलै लगलैक। ताहि पर सँ भोला आरो दू फाँक भ’ गेल।
पाण्डु रोगी जेँका भोलाक देहक खून तरे-तर सुखै लगलैक। मुदा की रकैत वेचारा? किछु फुड़बे नहि करैत छलैक। ग्लानि सँ मन कसाइन होअए लगलैक। मने-मन अपनाकेँ धिक्कारै लगल। कोन सुगराहा भगवान हमरा जन्म देलनि जे बहुओ छोड़ि देलक। विचारलक जे एहि गाम सँ कतौ चलिये जायब नीक होयत।
घर स भोला पड़ा गेल। संगी-साथीक मुँह सँ दिल्ली, कलकत्ता, बम्वईक विड्ढय मे सुननहि रहए। जाहि सँ गाड़ियोक भाँज बुझले रहए। ने जेबी मे पाइ रहए, ने बटखरचा। सिर्फ दुइये टा टाका संग मे रहए। अबधारि कए कलकत्ताक गाड़ी पकड़ि लेलक।
हबड़ा स्टेषन गाड़ी पहुँचते भोला उतड़ि विदा भेल। टिकट नहि रहनहुँ एक्को मिसिया डर मन मे नहि रहैक। निरमली-सकरीक बीच कहियो टिकट नहि कटबैत छल। एक बेरि पनरह अगस्त केँ सिमरिया धरि बिना टिकटे घुरि आयल रहए। प्लेटफार्मक गेट पर दू टा सिपाहीक संग टी. टी. टिकट ओसुलैत। भोलाककेँ देखि टी. टीक मन मे भेलइ जे दरभंगिया छी भीख मंगै आयल अछि। टिकट नहि मंगलकै। सिपाहियो केँ बुझि पड़लै जे जेबी मे किछु छैक नहि। टिकटेवला यात्री जेँका भोलो गेट पार भ’ गेल।
सड़क पर आबि आँखि उठा क’ तकलक त नमहर-नमहर कोठा चैड़गर सड़क, हजारो छोटका-बड़का गाड़ी आ लोकक भीड़ि भोला देखलक। मनमे भेलै जे भरिसक आँखि मे ने किछु भ’ गेल अछि। जहिना आँखि गड़बड़ भेने एक्के चान सात बुझि पड़ैत, तहिना। दुनू हाथे दुनू आखि मीड़ि फेरि देखलक त ओहिना। भीड़ि देखि मन मे एलै जे जखन एत्ते लोकक गुजर-बसर चलैत अछि त हमर किएक ने चलत। आगू बढ़ि लोकक बोली अकानै लगल। ते ककरो बाजब वुझबे नहि करैत। अखन धरि बुझैत जे जहिना गाय-महीसि सभठाम एक्के रंग बजैत अछि तहिना ने मनुक्खो बजैत होएत। मुदा से नहि देखि भेलैक जे भरिसक हम मनुक्खक जोरि मे हरा ने ते गेलहुँ हेँ फेरि मन मे एलै जे लोक त संगीक बीच हरायत अछि असकर मे कोना हरायत। विचित्र स्थिति मे पड़ि गेल। ने आगू बढ़ैक साहस होयत आ ने ककरो से किछु पूछैक। हिया हारि उत्तर मुहे विदा भेल। सड़कक किनछरिये सभ मे खाय-पीबैक छोट-छोट दोकान पतिआनी लागल देखलक। भुख लगले रहै मुदा अपन पाइ आ बोली सुनि हिम्मते ने होयत। जेबी टोबलक ते दू टकही रहबे करै। मन पड़लैक मधुबनीक स्टेषन कातक होटल। जहि मे पाँच रुपये प्लेट दइत। इ त सहजहि कलकत्ता छी। एहिठाम त आरो बेसी महग हेबे करत। एकटा दोकानक आगू मे ठाढ़ भ’ गर अँटबै लगल जे नहि भात-रोटी त एक गिलास सतुऐ पीबि लेब। बगए देखि दोकानदारे कहलक- ‘‘आबह, आबह बौआ। ठाढ़ किएक छह?’’
अपन बोली सुनि भोला घुसुकि क’ दोकान लग पहुँच पुछलक- ‘‘दादा, कोना खुआबै छहक?’’
तीनि मास पहिने धरि आठे आना मे खुआबै छेलिऐक। अखन बारह आना मे खुआबै छिअए।’’
भोलाक मनमे संतोड्ढ भेल। पाइयेवला गहिकी जेॅका बाजल- ‘‘कुड़ुड़ करै ले पानि लाबह।’’
भरि पेट खा आगू बढ़ल। ओना त रंग-विरंगक बस्तु देखैत मुदा भोलाक नजरि सिर्फ दुइये ठाम अँटकैत। देवाल सभ मे साटल सिनेमाक पोस्टर पर आ सड़क पर चलैत ठेला पर। जाहि पोस्टर मे डान्स करैत देखए ओहि ठाम अटकि सोचए जे ई नर्तकी मौगी छी कि पुरुख। गाम-घर मे ते पुरुखे मौगी बनि डान्स करैत अछि। फेरि मन पड़लै संगीक मुहे सुनल ओ बात जे कहने रहए सत्य हरिष्चन्द फिल्म मे मर्दे मौगिओक रौल केने रहए। गुनधुन करैत बढ़ल ते अपने जेँका छौॅड़ा केॅ ठेला ठेलने जायत देखि सोचै लगल जे ई काज त हमरो बुते भ’ सकैत अछि। गाड़ीक ड्राइवरी त करै नहि अबै अछि। बिना सीखिने रिक्षो कोना चलाओल हएत? ततमत करैत आगू बढ़ल। सड़कक बगले मे एकटा ठेलावला केँ चाह पीवैत देखलक। ओहिठाम जा क’ ठाढ़ भ’ गेल। चाह पीबि ठेलावला पुछलक- ‘‘कोन गाँ रहै छह?’’
‘‘विषौल।’’
‘‘हमहूँ ते सुखेते रहै छी। चलह हमरा संगे।’’
गप-सप करैत दुनू गोटे धर्मतल्लाक पुरना धर्मषाला लग पहुँचल ठेला केँ सड़के पर छोड़ि दीनमा भोला केँ धर्मषालाक भीतर ल’ जा क’ कहलक- ‘‘समांग असकरे कतौ जैहह नहि। हरा जेबह। हम एक ट्रीप मारने अबै छी।’’
टंकी पर हाथ-पाएर धोए भोला दीनमा सँ बीड़ी मांगि पीबि, पीलर लगा ओँगठि क’ बैसि गेल। आखि उठा क’ तकलत त झड़ल-झुरल देवालक सिमटी, तै पर कतौ-कतौ बर-पीपरक गाछ जनमल देखलक। पैखाना कोठरीक आ पानिक टंकीक आगू मे ठेहुन भरि किचार सेहो देखलक मन पड़लैक गाम। नाच-पर्टी टूटि गेल, घरवाली छोड़ि देलक। दू पाटी गाम भ’ गेल। सोचितहि-सोचितहि निन्न आबि गेलैक। बैसिले-बैसल सुति रहल।
गोँसाइ डूबितहि दोसर ठेलावला(बुचाइ) आबि भोलाकेँ जगबैत पुछलक- ‘‘कोन गाम रहै छह?’’
आषा भरल स्वर मे भोला बाजल- ‘‘बिषौल।’’
विषौलक नाओ सुनितहि मुस्की दइत बुचाइ पुछलक- ‘‘रुपनकेँ चीन्है छहक?’’
‘‘उ ते हमरा कक्के हैत।’’
अपन भायक ससुर बुझि भोला सँ सार-बहिनोइक संबंध बनवैत कहलक- ‘‘चलह, पहिने चाह पीबी। तखन निचेन स’ गप-सप करब।’’
कहि टंकी पर जा बुचन देह-हाथ धोय, कपड़ा बदलि भोला केँ संग केने दोकन पर गेल। आखिक इषारा स दोकानदार केँ दू-दू टा पनितुआ, दू-दू टा समौसा दइ ले कहलक। दुनू गोटे खा चाह पीबि पानक दोकान पर पहुँच बुचइ पान मंगलक। पान सुनि भोेला बाजल- ‘‘पान छोड़ि दिऔ। बीड़िये कीनि लिअ।’’
बीड़ी पीबैत दुनू गोटे धर्मषालाक भीतर पहुँचल। एका-एकी ठेलावला सभ अबै लगलैक। बिषौलक नाओ सुनितहि अपन-अपन संबंध सभ फरिअबै लगल। संबंध स्थापित होइतहि चाहक आग्रह करैत। चाह पीबैत-पीबैत भोलाक पेट अगिया गेलै। अखन धरिक जिनगी ऐहन स्नेह पहिल दिन भेटलै। ठेलावला परिवारक अंग भोला बनि गेल। भोलाक सब व्यवस्था ठेलावला सभ कए देलक। दोसर दिन स ठेला ठेलय लगल।
षानि दिन केँ सभ ठेलावला रौतुका षो(नाइट षो) सिनेमा देखै जायत। ओहि षो मे एक क्लाषक कन्षेसन भेटैत अछि। भोलो सब षनि सिनेमा देखै लगल।
चैदह मास बीतलाक बाद भोला गाम आयल। नव चेहरा नव बिचार भोलाक। घरक सभ ले कपड़ा अनने अछि। धिया-पूता केँ दू-दू टा चैकलेट देलक। धिया-पूता केँ चैकलेट देखि एका-एकी जनिजातियो सभ अबै लगलीह। झबरी दादी आबि भोला केँ दखि बजै लगलीह- ‘‘कहू ते एहि स सुन्नर पुरुख केहेन होइछै जे सौंथ जरौनिया छोड़ि देलकै।’’
दादीक बात भोला केँ बेधि देलक। आखि नोरा लगलैक। रघुनीक मन सेहो कानै लगलै। दोसरे दिन रघुनी लड़की तकै घर स निकलल। ओना लड़कीक त कमी नहि, मुदा गाम-घर देखि क’ कुटुमैती करैक विचार रघुनिक मन मे रहै। कड़कीक कमी त ओहि समाज मे अधिक अछि जहि मे भ्रुण-हत्याक रोग धेने छैक। समयो बदलल अछि। गिरहस्त परिवार स अधिक पसन्द लोक नोकरिया परिवार कँे करैत अछि। बगलेक गाम मे भोलाक वियाह भ’ गेल।
वियाहक तीनिये दिन पछाति कनियाँक बिदागरियो भ’ गेलैक आ पाँचमे दिन अपनो कलकत्ता चलि देलक।
सालक एगारह मास भोला कलकत्ता आ एक मास गाम मे गुजारै लगल। गाम अबैत त अपनो घरक काज सम्हारि अनको सम्हारि दइत।
तेसर साल चढ़ितहि भेला केँ जैाँआ बेटा भेलै। नवम् मास चढ़ितहि ओ गाम आबि गेल छल। मन मे अषो बनले रहेक जे पाइ-कौड़ीक दिक्कत त नहिये हैत। सभ ठेलावला अपन संस्था बना पाइ-कौड़ीक प्रबन्ध अपने केने अछि। मुदा पहिल बेरि छी, कनियाँक देखभाल त कठिन अछिये। सरकारीक कोनो बेवस्थो नहिये छैक। मुदा समाजो त समुद्र थिक। बिनु कहनहुँ सेवा भेटैत अछि। जाहि सँ भोलो केँ कोनो बेसी परेषानी नहिये भेलैक।
समय आगू बढ़ल। पाँच बर्ख पुरितहि भोला दुनू बेटा केँ स्कूल मे नाओ लिखौलक। षहरक वातावरण मे रहने भोलोक विचार धिया-पूताकेँ पढ़बै दिषि झुकि गेल रहैक। मन मे अरोपि लेलक जे भलेही खटनी दोबर किऐक ने बढ़ि जाय मुदा दुनू बेटाकेँ जरुर पढ़ाएब। अपन आमदनी देखि पत्नी केँ आॅपरेषन करा देलक। जहि स परिवारो समटले रहलैक।
पढ़ै मे जेहने चन्सगर रतन तेहने लाल। क्लास मे रतन फस्ट करैत आ लाल सेकेण्ड। सातवाँ क्लास धरि दुनू भाय फस्ट सेकेण्ड स्कूल मे करैत रहल। मुदा हाई स्कूल मे दुनू भाय आर्ट लए पढ़ै लगल जाहि सँ क्लास मे कोनो पोजीषन त नहिये होइत मुदा नीक नम्बर स पास करै लगल।
मैट्रिकक परीक्षा द’ दुनू भाय कलकत्ता गेल। अखन धरि आने परदेषी जेँका अपनो पिता केँ बुझैत छल। तेँ मन मे रंग-विरंगक इच्छा संयोगने कलकत्ता पहुँचल रहए। मुदा अपन पिताक मेहनत, छातीक बले ठेला घीचैत देखि पराते भने गाम घुमैक विचार दुनू भाय कए लेलक। पितेक जोर पर तीनि दिन अँटकल। मुदा किछु कीनैक विचार छोड़ि देलक। मेहनतक कमाइ देखि अपन इच्छाकें मने मे दुनू भाय दाबि लेलक। मुदा तइयो भोला दुनू बेटा केँ फुलपेंट, षर्ट, धड़ी, जुत्ता कीनि क’ देलखिन।
तीनि मासक उपरान्त मैट्रिकक रिजल्ट निकललै। दुनू भाय-रतनो आ लालो- प्रथम श्रेणी सँ पास केलक। फस्ट डिवीजन भेलो पर आगू पढ़ैक विचार मन मे नहि अनलक। उपार्जनक लेल सोचै लगल। नोकरीक भाँज-भुँज लगबै लगल। नोकरियोक तँ ओइह हाल। गामक-गाम पढ़ल बिनु पढ़ल नौजवानक फौज तैयार अछि। एक काजक लेल हजार हाथ तैयार अछि। जाहि स समाजक मूल पूँजी(मानवीय) आगि मे जरैत सम्पत्ति जेँका, नश्ट भ’ रहल अछि।
समय मोड़ लेलक। पढ़ल-लिखल नौजवानक लेल नोकरीक छोट-छीन दरवज्जा खुजल। गाम स्कूल मे षिक्षा-मित्रक बहाली होअए लगलैक। जाहि सँ नव ज्योतिक संचार गामोक पढ़ल लिखल नौजवान मे भेलैक। ओना समयक हिसाब सँ षिक्षा मित्रक मानदेय मात्र खोराकी भरि अछि मुदा बेरोजगारीक हिसाब सँ त नीक अछिये। बगलेक गामक स्कूल मे रतनो आ लालोक बहाली भए गेलैक। पाँच तारीक केँ दुनू भाय ज्वाइन करत।
आगू नहि पढ़ैक दुख जते दुनू भाइक मन मे नहि रहैक ताहि स बेसी खुषी नाकरी सँ भेलैक। कोपर बुद्धि मे कलुड्ढताक मिसियो भरि आगमन नहि भेलैक अछि। दुनू भाय वैसि क’ अपन परिवारक संबंध मे विचारै लगल। रतन लाल कें कहलक- ‘‘बौआ, कोन धरानी बावू अपना दुनू भाय केँ पढ़ौलनि से त देखिले अछि। अपनो सभ एक सीमा धरि पहँुच गेल छी। तेँ, अपनो सभक की दायित्व बनैत अछि से त सोचै पड़तह?’’
रतनक बात सुनि लाल बाजल- ‘‘भैया, अपना सभ ओहि धरतीक सन्तान छी जाहि धरती पर श्रवण कुमार सन बेटा भ’ चुकल छथि। पाँच तारीक सँ पहिनहि बावू केँ कलकता सँ बजा लहुन। हमसभ ठेलावलाक बेटा छी, एहि मे कोनो लाज नहि अछि। मुदा लाजक बात तहन हैत जहन ओ ठेला घीचिताह आ अपना सभ कुरसी पर बैसि दोसर केँ उपदेष देबइ।’’
मूड़ी डोला स्वीकार करैत रतना बाजल- ‘‘आइये बाबू केँ जानकारी दए दैत छिअनि जे जानकारी पबितहि गाड़ी पकड़ि घर चलि आउ। पाँच तारीख केँ दुनू भाय ज्वाइन करै जायब। दुनू भायक विचार अछि जे अहाँ केँ गोड़ लागि घर स डेग उठायब।’’
दुनू भाइक विचार सुनितहि मायक मन सुख-दुखक सीमा पर लसकि गेलनि। जरल घरारी पर चमकैत कोठा देखै लगलीह। आखि मे नोर छलकि गेलनि। मुदा ओ दुखक नहि सुखक छलनि।

जीविका
शिवरात्रिक प्रात। मध्य मास। जहि डेढ़ मासक शीतलहरी मे सूर्य मरनासन्न भऽ गेल छलाह तहि मे जीबैक नव शक्ति सेहो आबि गेलनि। तेँ रौद मे धीरे-धीरे गरमी अबैत। चारि बजे भोर मे उमाकान्तक नीन टुटल। निन्न टुटितहि देवाल घड़ी पर नजरि देलक। चारि बजैत। ओछाइने पर पड़ल-पड़ल अपन आगूक जिनगी दिशि नजरि देलक। ओना काल्हिये दिन मे, दुनू दोस्त विचारि नेने छल। विचारि नेने छल जे दुनू गोटे टेम्पू कीनए भोरुके गाड़ी स दरभंगा जायब। बदलैत जिनगीक संकल्प उमाकान्तक मन मे। किऐक त जिनगी मनुष्य केँ किछु करैक लेल भेटैत अछि। मन मे एलै जे पाँच-पचपन मे गाड़ी अछि, तेँ पाँच बजे घर स निकलि देब। ओना अधे घंटाक रास्ता स्टेशनक अछि मुदा किछु पहिनहि पहुँचब नीक रहत। ओना काहियो कोनो गाड़ी अपना समय पर नहिये अबै अए, एक-आध (एकाध) घंटा लेट रहिते अछि मुदा तइ स हमरा की? हम समय पर जायब। शुभ काज सदिखन समय स पहिनहि करैक कोशिश करक चाही। एते बात मन मे अबितहि उमाकान्त ओछाइन छोड़ि उठि गेल। उठितहि मन मे एलै जे हमर ने नीन टुटि गेल, मुदा जँ दोसक (शोभाकान्त) नीन नहि टुटल होय, तखन त गड़बड़ होएत। से नहि त पर-पैखाना जाइ स पहिने ओकरो जा कऽ उठा दिअए। फेरि मन मे एलै दतमनि करिते जाय। किऐक त एकटा काज त अगुआइल रहत। हाथ मे दतमनि लइतहि मन मे एलै जे किछु खा-पी कऽ घर स निकलब। रास्ता-बाटक कोन ठेकान। तहू मे लोहा-लक्कड़क सवारी। कखन नीक रहत कखन बगदि जायत, तेकर कोन ठेकान। एक बेरि एहिना भेलि रहए की ने। दरभंगे जाइत रही कि मनीगाछी लोहनाक बीच गाड़ीक इंजिन खराव भऽ गेलइ। भोरुके गाड़ी, तेँ सोचने रही जे दरभंगे पहुँच किछु खायव-पीबि। ले बलैया, दू बजे तक गाड़ी ओतए अटकि गेलइ। कखनो गाड़ीक डिब्बा मे जा बैइसी त कखनो उतड़ि क, इंजिन लग पहुँच, ड्राइवर कऽ पूछियै। ओहू वेचाराक मन घोर-घोर भेलि। हमहूँ आशा-बाटी मे रहि गेलहुँ। से ज पहिने बुझितियै त गाड़ी छोड़ि विदेसर चैक पर चलि जैतहुँ आ बस पकड़ि सबेर सकाल दरभंगा पहुँच जैतहुँ। सेहो ने केलहुँ। तेकर फल भेलि जे भूखे-पियासे खूब टटेलहुँ। तेँ बिना किछु मुह मे देने घर स नै निकलब। इ बात मन मे अबिते उमाकान्त पत्नी कऽ उठबैत कहलक- ‘जाबे हम दोसक (शोभाकान्त) ऐठाम से अबै छी ताबे अहाँ चारि टा रोटी आ अल्लूक भुजिया बना लेब।’
कहि उमाकान्त शोभाकान्तक ऐठाम दतमनि करैत विदा भेल। दाँत मे घुस्सो दिअए आ मने-मन विचारवो करए। मन म एलै जे काजे ऐहेन छी जे मनुक्ख कऽ मनुक्खो बनबै अए आ जानवरो। दुनियाँक सब मनुक्ख त किछु नहि किछु करितहि अछि। मुदा कियो देव बनि जाइत अछि त कियो दानव। तेँ, काज कऽ परिखब सबसँ मूल बात छी। शोभाकान्त ऐठाम पहुँचते उमाकान्त रस्ते पर स बोली देलक- ‘दोस छेँ रौ (रओ), रौ दोस।’
ओछाइन पर स उठैत शोभाकान्त बाजल- ‘हँ। दोस छिअए रौ, हमरो नीन टुटले अछि। अखन ते अन्हारे छै।’
उमाकान्त- सवा चारि बजै छै। तैयार होइत-होइत पाँच बजिये जायत। कने पहिले स्टेशन जायब।’
उमाकान्त आ शोभाकान्त एक्के बतारी। दुनू मे के छोट (उमेरक हिसाब स) के पैघ से त ने अपने दुनू गोरे बुझए आ ने कियो टोले-पड़ोसक। किएक त टिपनि (जन्म-कुण्डली) दुनू मे से ककरो नहि। बच्चे स दुनू गोटे, बेसी काल, एक ठाम रहैत तेँ समाजोक लोक बिसरि गेल। अपना दुनू गोटेक माइयो-बाप मरिये गेल, आन मने किऐक राखत। मुदा दुनू गोटे एहि मौकाक लाभ उठबैत। लाभ इ उठबैत जे दुनू, दुनू गोटेक स्त्री स हँसी-चैल करैत। तइ ले दुनू मे स ककरो मलाल नहि। मुदा गामक बूढ़ो-बुढ़ानुस आ नवकियो कनियाँ दुनू (स्त्रीगण) केँ निरलज कहैत। तेकर गम, दुनू मे स ककरो नहि। किऐक त सब स्त्रीगण केँ होइत जे अधिक सऽ अधिक पुरुखक संग गप-सप, हँसी-मजाक हुअए।
बच्चे स दुनू गोटे- उमाकान्त आ शोभाकान्त- एक्के ठाम गुल्लियो-डंडा खेलए आ गामेक स्कूल मे पढ़बो करए। बच्चा मे दुनू गोरे दुनू कऽ नामे धऽ-धऽ बजैत। मुदा चेष्टगर भेला पर, कनगुरिया ओंगरी मे ओंगरी भिरा, दोस्ती लगा लेलक। मिडिल तक गामेक स्कूल मे दुनू गोटे पढ़लक। मुदा हाइ स्कूल मे उमाकान्ते टा नाओ लिखेलक। शोभाकान्त गरीब, तेँ पढ़ाइ छोड़ि देलक। मुदा उमाकान्त कऽ दू-तीनि बीघा खेतो आ पितो गामेक स्कूल मे नोकरी करैत। ओना शोभाकान्त उमाकान्त स बेसी चड़फड़ो आ पढ़ैइयो मे नीक। तेँ अपना क्लासक मुनिटिराइयो करैत। मुनीटरक बात शिक्षको अधिक मानैत आ चट्टियाक बीच धाखो। पढ़ाई छोड़लाक बाद शोभाकान्त नोकरी करए पटना गेल। गाम से त अइह सोचि निकलल जे जइह (जैह) काज भेटत सइह (सैह) करब। मुदा रस्ता मे बिचार बदलि गेलइ। विचार इ बदलल जे ने चाहक दोकान मे नोकरी करब आ ने होटल मे। ने कोठी मे काज करब आ ने ताड़ी-दारुक दोकान मे। अगर ज नोकरी नै हैत त रिक्शे चलाएव वा मट्टिये मे काज करब। सरकारी नोकरीक त कोनो अशे नहि। किऐक त उमेरो नै भेल हेँ।
गाम स शहर शोभाकान्त पहिले-पहिल पहुँचल। मुदा जे आकर्षण शहर-बजार देखि लोक केँ होइत ओ आकर्षण शोभाकान्त कऽ नै होइत। जहिना सोना-चानीक दोकान दिशि गरीबक नजरि नहि पड़ैत, तहिना। स्टेशन स उतड़ि ओ उत्तर दिशक रास्ता धेलक। कोठा-कोठी पर नजरि पड़वे ने करै। किछु दूर गेला पर एकटा साइकिल मिस्त्रीक दोकान देखलक। रास्ता पर ठाढ़ भऽ दोकान हियासै लगल। दोकानदारोक (मिस्त्रीक) नजरि पड़ल। शोभाकान्त पर नजरि पड़ितहि दोकानदारक मन मे आयल जे छोटो-छोटो काज मे अपने बरदा जाइ छी, जहि स नमहर काज पछुआ जाइ अए। से नइ त अइ बच्चा कऽ पूछियै जे नोकरी रहत। जँ रहत त रखि लेब। हाथक इशारा स सोर पाड़ि मिस्त्री पूछलक- ‘बाउ, की नाम छी?
‘शोभाकान्त।’
‘कत्त’ घर छी?’
‘मधुबनी जिला।’
‘कत्त’ जायब?’
‘नोकरी करए एलहुँ।’
‘ऐठाम रहब?’
‘हँ। रहब।’
जहिना अतिथि-अभ्यागत कऽ दुआर पर अबितहि घरबारी लोटा मे पानि आनि आगू मे दइत, खाइक आग्रह करैत तहिना शोभाकान्त कऽ मिस्त्री केलक। आठ आना पाइ दइत, आंगुरक इशारा स मुरही-कचड़ीक दोकान देखबैत कहलक जे ओहि दोकान स जलखै केने आउ। झोरा रखि शोभाकान्त विदा भेल। ओना गाड़ीक झमार स देहो-हाथ दुखाइत आ भूखो लागल, मुदा नोकरी पाबि देहक दरदो आ भूखो कमि गेलइ। मुरही-कचड़ीक दोकान पर बैसितहि, बगए-बानि देखि दोकानदार पूछलक- ‘बौआ, अहाँक घर कत्तऽ छी?’
शोभाकान्त- ‘मधुबनी जिला।’
‘गामक नाम कहू।’
‘लालगंज।’
‘हमरो घर त अहाँक बगले मे अछि, रुपौली। बीस-पच्चीस बर्ख सऽ हम ऐठाम रहै छी।’
बिना पाइ नेनहि दोकानदार शोभाकान्त कऽ भरि पेट खुआ देलक। खा कऽ शोभाकान्त साइकिलक दोकान पर आबि मिस्त्री कऽ पाइ घुमबैत कहलक जे दोकानदार पाइ नइ लेलक। मुदा गहिकीक झमेल दुआरे मिस्त्री आगू किछु नहि पूछलक।
साइकिल ट्यूबक पनचर बनौनाइ, छोट-छोट भंगठी स शोभाकान्त अपन जिनगी शुरु केलक। छोट-छोट काज भेने दोकानदारो कऽ आगू बढ़ैक अवसर हाथ लगल। साइकिल, रिक्शाक संग मोटर साइकिल आ टेम्पूक मरम्मत केनाइ सेहो शुरु केलक। शोभाकान्तो कऽ मौका भेटिलै। उपारजनक लूड़ि अबै लगलै। दुनियाँ कऽ बिसरि शोभाकान्त रिन्च-हथौरी मे मगन (मग्न) भऽ गेल।
छह मास बीतैत-बीतैत शोभाकान्त साइकिल, रिक्शाक मिस्त्री बनि गेल। संगहि मोटर साइकिल आ टेम्पू चलाएव सेहो सीखि लेलक। मेहनत केने शरीरो (देहो) फौदा गेलइ। साले भरि मे जवान भऽ गेल।
ड्राइवरीक लाइसेंस शोभाकान्त बना लेलक। ड्राइवरीक लाइसेंस बनवितहि शोभाकान्त कऽ मन मे द्वन्द्व उत्पन्न हुअए लगल जे ड्राइवरी करी आ कि अपन दोकान खोलि मिसतिरिआइ करी। मुदा अपन दोकान खोलैक लेल घर भाड़ाक संग सामानो (मरम्मत करैक) लिअए पड़त। फेरि मन मे एलै जे एक त मेनरोड मे घर नै भेटत दोसर पाइयो ओते नइ अए जे सामानो कीनब। तइ स नीक जे ड्रइबरिये करी। सैह केलक। ड्राइवरी मे दरमहो नीक आ बाइलियो आमदनी। महीना दिन त अव्यवस्थिते रहल मुदा दोसर मास बीतैत-बीतैत असथिर भऽ गेल। दरमाहा जमा करै लगल आ बाइली आमदनी घर पठबै लगल।
सालभरिक दरमाहा स शोभाकान्त टेम्पू कीनि लेलक। टेम्पू कीनि, अपन सब सामान लादि, शोभाकान्त सोझे गाम चलि आयल।
सेकेण्ड डिबीजन स उमाकान्त बी.ए. पास केलक। ओना पढ़लो-लिखल लोक कम, मुदा ओहू स कम नोकरी। खेती-पथारी आ कारोवार कियो (पढ़ल-लिखल) करए नहि चाहति। जहि स गाम-सबहक दशा दिनो-दिन (दिनानुदिन) पाछुऐ मुहे ससरैत। गामक लोको तेहने जे पढ़ल-लिखल लोक केँ खेती करैत देखि, दिल खोलि कऽ हँसबो करैत आ लाख तरहक लांछना सेहो लगबैत। जहि स गामक पढ़ल-लिखल लोक केँ नोकरी करब मजबूरी भऽ जायत।
नोकरीक भाँज मे उमाकान्त दौड़-धूप करै लगल। मुदा मन मे संकल्प रखने जे घूस दऽ कऽ नोकरी नइ करब। चाहे नोकरी हुअए वा नहि। दौड़-धूप स मन विचलित हुअए लगलै। संकल्प डोलए लगलै। मन मे अनेको (ढ़ेरो) प्रश्न औंढ़ मारै लगलै। कखनो मन मे होय जे पाँच कट्ठा खेत बेचि कऽ नोकरी पकड़ि लेब। फेरि मन मे होय जे जखन घूस दऽ कऽ नोकरी लेब त घूस लऽ कऽ लोकक काज किअए ने करवै? फेरि मन मे होय जे तखन जिनगी केहेन हैत? अछैते जीबिने मुरदा बनल रहब। लोक शरीर तियागक बाद मृत्यु धारण करैत अछि आ हम जीबिते मे मरल रहब। फेरि मन मे एलै जे पत्नी त जीवन-संगिनी छी तेँ एक बेरि हुनको स पूछि लिअनि। मन मे कने शान्ति एलै। पत्नी स पूछलक- ‘बिना घूस-घास कऽ नोकरी भेटब कठिन अछि, से अहाँक की विचार?’
मुस्की दइत पत्नी बाजलि- ‘आइक युग मे नोकरी भेटब जिनगी भेटब छी। तेँ हमरो गहना-जेबर अछि आ जँ ओहि स नइ पूड़ै तऽ थोड़े खेतो बेचि कऽ नोकरी पकड़ि लिअ। देखते छिअए जे साले भरि मे लोक की सऽ की क-ए लइत अछि।
एक त ओहिना उमाकान्तक मन घोर-घोर होइत, तइ पर स पत्नीक बात आरो मरनासन्न बना देलक। जिनगीक आशा टूटए लगल। आँखिक रोशनी क्षीण हुअए लगल। आशाक ज्योति कतौ बुझिये ने पड़ैत। जहिना अन्हार मे सगतड़ि भूते-प्रेत, चोरे-डकैत, सापे-छुछुनरि बुझि पड़ैत, तहिना उमाकान्त कऽ सेहो हुअए लगल। डूबैत जिनगीक आशा मे कने टिमटिमाइत इजोत बुझि पड़लै। इजोत अबिते शक्तिक संचार हुअए लगलै। मन मे संकल्पक (व्रत) अंकुर अंकुरित हुअए लगलै। जहि स दृढ़ताक उदय सेहो हुअए लगलै। मने-मन विचार करै लगल। विचार केलक जे जिनगीक किछु लक्ष्य हेवाक चाही। मनुष्य त चुट्टी-पीपरी नहि होइत जे साधारण ककरो पाएर पड़ला स मरि जायत। मनुष्य त ब्रह्मक अंश छी। ओकरा मे विशाल शक्ति छिपल छै। जिनगी मे एहिना हवा-बिहाड़ि अबै छै, तहि स कि मनुष्य मनुष्यता गमा लेत। मनुष्येता त मनुष्यक धरोहर सम्पत्ति छी। जेकरा लोक ओहिना कतौ फेकि देत। कथमपि नहि। मने-मन विचारलक जे हमरा नोकरी नै भेटत। तेँ कि हाथ पर हाथ दऽ कऽ बपहारि काटब। एते कमजोर छी। की हमरा मे मनुष्यक सब गुण (शक्ति) मरि चुकल अछि। हमरा बुते किछु कयल नै हैत? जरुर हैत।
नोकरी दिशि स नजरि हटा उमाकान्त राशनक (कोटा) दोकान चलबैक विचार केलक। विचार एहि दुआरे केलक जे जीवैक लेल अर्थक उपार्जन जरुरी होइत। जिनगीक अधिकांश काज अरथे स चलैत। तेँ बिना अर्थे जिनगी जिनगी नहि रहि जाइत। हँ, इ बात जरुर जे अर्थक उपार्जन आ उपयोगक ढ़ंग नीक हेवाक चाही। राशनक दोकानक जरुरत सब गाम मे अछि। सरकार आ समाजक बीचक कड़ी सेहो छी। ओना लाइसेंसो (डीलरीक) बनबै मे पाइयेक खेल चलैत। मुदा तइयो जी-जाँति कऽ ओ (उमाकान्त) लाइसेंस बनबै दिशि बढ़ल।
डीलरीक लाइसेंस बनौलाक उपरान्त उमाकान्त, समान उठबै स पहिने, मिश्रीलाल स कारोबारक तौर-तरीका बुझैक लेल गेल। मिश्रीलाल पुरान डीलर। मुदा जहिना गाम मे (समाज मे) अपन इज्जत बनौने तहिना सरकारियो आॅफिस मे। इज्जत बनबैक अपन तरीका। तेँ ब्लौकक पेंइतालिसो डीलर मिलि ओकरा यूनियनक सेक्रेट्री बनौने। जहिना सब डीलर मिश्रीलाल कऽ मानैत तहिना मिश्रीलालो सबकेँ। अइह बुझि उमाकान्त भेंटि करब आवश्यक बुझलक। मिश्रीलाल ऐठाम उमाकान्त पहुँचल तऽ देखलक जे चारि-पाँच टा धिया-पुता रजिष्टर पर दस-खतो करै अए आ निशानो लगबै अए। किऐक त पछिला मासक समान बँटबारा भऽ गेल छल। तेँ बिना रजिष्टर तैयार भेने अगिला समान कोना उठत? जरुरी काज बुझि मिश्रीलाल मगन भऽ अमन काज करैत। उमाकान्त कऽ देखितहि मिश्रीलाल रजिष्टरक बीचहि मे, जइ पेज मे निशान आ हस्ताक्षर करबैत, पेनो आ कार्बनो रखि, मोड़ैत बेटा कऽ कहलक- ‘बौआ, चाह बनबौने आबह?’ (उमाकान्त दिशि होइत पुछलक) किमहर किमहर ऐनाइ भेलई, बौआ।’
निरबिकार (निर्बिकार) भऽ उमाकान्त बाजल- ‘भैया, अहाँ पुरान डीलर छी। डीलरीक सब कुछ जनै छियै। बी.ए. केलाक बाद हम दू साल नोकरीक पाछु बौऐलहुँ मुदा कतौ गर नै धेलक। आब त उमरो (नोकरीक उम्र) लगिचाइले अछि, तेँ नोकरीक आशा तोड़ि डीलरीक लाइसेंस बनेलहुँ हेन।’
नोकरीक गर नहि लागब सुनि मिश्रीलाल- ‘बौआ, जहिना कोनो परिवार मे चारि-पाँच भाइक भैयारी रहैत अछि। सब कुछ सामिले (शामिले) रहै छै। मुदा स्त्रीगण (सब भाइक पत्नी) केँ अप्पन-अप्पन सम्पत्ति सेहो छै। जहि मे भाइयो सब चोरा-नुका शामिल भऽ जाइत अछि। जेकर फल होइ छै घर मे आगि लागब तहिना नोकरियो सब मे भऽ गेल अछि। जे कुरसी पर अछि ओ अपने सार-बहिनोइक जोगार मे रहै अए। कहीं-कतौ बिकरियो होइ छै। जेकर परिणाम बनि गेल अछि जे नाकरी केनिहारोक बंश बनि गेल अछि। देशक विकास केहेन अछि से त तू पढ़ले-लिखल छह, सब कुछ जनिते छहक। जँ कनी-मनी एक रत्ती आगूओ बढ़ि रहल अछि त ओहि स वेसी ओहि वंश (नोकरिहाराक वंश) मे नोकरी केनिहार बढ़ि रहल अछि। तेँ देखबहक जे डाक्टरक बेटा डाक्टरे बनत। इंजीनियरक इंजीनियरे। कते कहबह। जे जत्ते अछि ओ बपौती वुझि ओकरा पकड़ने अछि। तहि बीच तेसरक (जे ओहि स अलग अछि) जे गति हेवाक चाही सैह तोरो भेलह। तहू स बेसी जुलुम अछि जे किछु गनल-गूथल लोक अछि जे नोकरियो करैत अछि, खेतो हथिऔने अछि आ जे कोनो सरकारी योजना बनै छै ओकरो हड़पैत अछि। जइ स देखबहक जे ककरो सम्पत्ति राइ-छित्ती होइ अए आ कियो सम्पत्ति लेल लल्ल अछि।
उमाकान्त- ‘भैया, दुनिया-दारीक गप छोड़ू। अपना काजक विषय मे कहू।’
मिश्रीलाल- ‘बौआ, अखन तू जुआन-जहान छह। मुदा जइ काज क अपना जीवै चाहै छह ओ गल्ती भेलह। तोरा सन आदमी कऽ डीलरी नइ करक चाही। हम त सब घाटक पानि पीनाइ सीखि नेने छी। की नीक की अधला, से बुझिते ने छिअए। बुझह तऽ नड़ढ़ा हेल हेलैत छी। तेँ हमर कारबार ठीक अछि। मुदा तोरा बुते नै हेतह?
उमाकान्त- ‘किअए?’
तहि बीच चाह एलै। दुनू गोटे हाथ मे गिलास लेलक। एक घोंट चाह पीवि मिश्रीलाल- ‘देखहक, डीलरी दू दुनियाँक सीमा परक काज छी। एक दिशि सत्ताक दुनियाँ अछि आ दोसर दिशि आम लोकक। गड़बड़ दुनू अछि।’
उमाकान्त- ‘से की?’
मिश्रीलाल- ‘पहिने पब्लिकेक बात कहै छिअह। राशनक वस्तु (चीनी मटियातेल) तऽ हिसाबे सऽ भेटैत अछि। नामे छिअए कोटा। जँ मनमाफित भेटिते त खुल्ला बजार होइतै। से त नइ अछि। गाम मे किछु ऐहेन-ऐहेन रंगबाज सब बनि गेल अछि जेकरा खाइ-पीबै ले नै देबहक तऽ भरि दिन अपनो आ अनको उसका-उसका रग्गड़े करैत रहतह। रग्गड़ केँ त कोनो सीमा नै होइ छै। जँ कहीं गोटे दिन लाठिये-लठौबलि भऽ जेतह तखन तऽ लेनी कऽ देनी पड़ि जेतह। दू पाइ कमाइ ले धंधा करवह आ कि कोट-कचहरीक फेरि मे पड़बह। बुझिते छहक जे कोट-कचहरी लोकेक पाइ पर ठाढ़ अछि। ओइ साला (रंगबाज) सब कऽ की अछि। अपने किछु करतह नहि आ अनका काज मे सदिखन टांगे (टाँगे) अड़ौतह। गामक उत्पात स ल कऽ थाना-पुलिस, कोट-कचहरीक दलाली भरि दिन करैत रहतह। आब तोंही कहह जे बरदास हेतह? नीक लोकक लेल अइ दुनियाँ मे कतौ जगह नहि अछि। ओइ साला सब केँ की छै, भरि दिन ताड़ी-दारु पीबि ढ़हनाइत रहतह। ने छोट-पैघक विचार करतह आ ने गाड़ि (गारि) माइरिक। तइ पर स मुखियो (पंचायत मुखिया) आ वार्डो-मेम्बर सब केँ कमीशन चाहबे करियै। पब्लिको तेहने अछि। देखबहक जे कतेक ऐहेन परिवार अछि जेकरा कोटा (राशनक) वस्तुक जरुरत नै अछि (जना चीनी) मुदा ओहो कोटा स चीनी उठा दोकान मे, किछु नफा लऽ कऽ, बेचि लेतह। जबकि किछु परिवार ऐहेन अछि जेकरा कोटाक वस्तु स खर्च नै पूड़ै छैक। अपनो आखि स देखवहक जे दस-बीस कप चाह आने पीबैत अछि। की ओकरा सब कऽ फाजिल नै देवहक। जखने एक गोटे कऽ फाजिल देवहक तऽ दोसराक हिस्सा कटवे करत। ऐहेन स्थिति मे डीलरे की करत? आखिर ओहो त समाजेक लोक छी।’
उमाकान्त- ‘सब गोटे ते कोटा (वस्तु) उठबितो (उठैबतो) नै हेतै?’
मिश्रीलाल- ‘हँ, सेहो होइ अए। मुदा ओ तखन होइ अए जखन कोटाक वस्तुक दाम आ खुल्ला बजारक (थ्तमम डंतामज) दाम मे अन्तर नै रहैत अछि। मुदा जखन दुनूक दाम मे अन्तर रहैत अछि तखन जेकरो ने अपना पाइ रहै छै ओहो दोकानदार सब स, अधा-अधी नफा पर, पाइ लऽ कऽ समान उठा लइ अए आ बेचि लइ अए। ततबे नै ओहो चाहतह जे किछु फाजिले कऽ समान भेटए।
मुह बिजकबैत उमाकान्त- ‘तब तऽ बड़ ओझरी अछि।’
उमाकान्तक सोच कऽ गहराई दिशि जाइत देखि, मुस्की दइत मिश्रीलाल- ‘बौआ, एतबे मे छगुन्ता लगै छह। इ त एक दिसक बात कहलिहह। अहू मे कते ओझरी छुटिये गेलह। जँ सरिया कऽ सब बात कहबह तऽ सैकड़ो ओझरी आरो अछि। आब सुनह आॅफिस, बैंक, एफ.सी.आइक (गोदाम) संबंध मे। दौड़ि-बरहा जे करै पड़तह ओकरा छोड़ि दइ छिअह। किऐक त मोटा-मोटी यैह (अइह) बुझह जे एक दिनक काज मे पनरहो दिन स बेसिये लगतह। जइ मे समयक संग पच्चीस-पचास पौकेटो खर्च हेबे करतह।’
उमाकान्त- ‘तब त बड़ लफड़ा अछि?’
मिश्रीलाल- ‘लफड़ा कि लफड़ा जेँका अछि। जखने ब्लौक पाएर देबहक कि गीध जेँका, चारु भर सऽ, (अफसर सऽ लऽ कऽ चपरासी धरि) नोंचए लगतह। कियो कहतह जे चाह पिआउ, ते कियो कहतह पान खुआउ। कियो कहतह सिगरेट पिआउ ते कियो मिठाइ खुआउ। सुनि-सुनि मन मोहरा जेहत। मुदा की करबहक? भीखमंगो से गेल-गुजरल चालि देखबहक। जना अपना दरमाहा भेटिते ने होय। मुदा डीलरे की करत? अगर जँ सबके खुशी नै राखत ते काजे लटपटेतै। काजो तेहेन अछि जे एक्के टेबुल से नइ होइ छै। जत्ते टेबुल तते खर्च। अखन हमहू अगुताइल छी, तेँ नीक-नाहाँति नहि कहि सकबह। देखते छहक जे रजिष्टर तैयार करै छी। ब्लौक जायब। मुदा तइयो एक-दू टा बात कहि दइ छियह। सबहक तड़ी-घटी ने हम बुझै छियै।’
उमाकान्त- ‘कनी-कनी सबहक बात कहि दिअ?’
मिश्रीलाल- ‘अगुताइल मे की सब बात मनो पड़ै छै। मुदा जे मन पड़ै अए से कहि दइ छिअह। पहिने बैंकक सुनह। कोरियापट्टी मे दुनियाँलाल डीलर अछि। बेचारा बड़ मुह सच। जहिना-जहिना समान बिकाइल रहए तहिना-तहिना पाइ रखने रहए। खुदरा समानक बिक्री तेँ खुदरा पाइ। जखन बैंक मे जमा करए गेल(अगिला कोटाक लेल) ते खुदरा पाइ देखि बैंक मे लेबे ने केलकै। कहलकै जे ओते हमरा छुट्टी अछि जे भरि दिन तोरे पाइ गनैत रहब। भरि दिन वेचारा छटपटा कऽ रहि गेल। बैंक से निकलबो ने करए जे पौकेटमार सब ने कहीं पाइ उड़ा दिअए। दोसर दिन आबि क हमरा कहलक। तामस त बड़ उठल। किऐक त जना मोटका पाइ सरकारक होय आ खुदरा नै होय, तहिना। जखन पाइयेक लेन-देन बैंक मे होइ छै ते गनै ले स्टाफ राखह। मुदा की करितियै। दोसर दिन गेलौ। मनेजर के कहलियै। तखन दू प्रतिशत कमीशन पर फड़िआयल। आब तोंही कहह जे इ दू प्रतिशत कोन बिल मे चलि गेल। तहिना दोसर बात लाय, इन्सपेक्टरक (सप्लाइ इन्सपेक्टर)। इन्सपेक्टर बदली भेलइ। नव इन्सपेक्टर वुझि पनरह-बीस गोटे (डीलर) ओकरा पाइ नै देलकै। ओना पचास रुपैये (रुपैइये) प्रति डीलर प्रति मास इन्सपेक्टर कऽ दइत अछि। सबकेऽ मन मे भेलइ जे नव हाकिम छथि तेँ छओ मास त इमानदारी रखवे करताह। ले बलैया, जहाँ डीलर सब समान (दोसर कोटाक) उठौलक कि दोसर दिन भेरे विश्वनाथ (डीलर) ऐठाम पहुँच गेल। विश्वनाथो कऽ कोनो डर मन मे नहि। किऐक त समान ओहिना रहए। विश्वनाथ कऽ इन्सपेक्टर चीनी काँटा करै ले कहलक। ओहो तैयार भऽ काँटा करै लगल। पाँचो बोरा मिला कऽ चैदह किलो चीनी कमि गेलइ।
विचहि मे उमाकान्त कहलक- ‘चीनी तौलि कऽ नइ नेने रहए?’
मिश्रीलाल- ‘इ एफ.सी.आइ. गोदामक खेल छी। एफ.सी.आइ गोदाम त ब्लौके-ब्लौके नै अछि। तेँ देखबहक जे डीलर सबहक नम्बर लगल अछि। सबकेँ धड़फड़ करैत देखहक। किऐक त अपन गाड़ी (टायर) त सब डीलरक रहै नै छै। अधिक डीलर भड़े पर गाड़ी लऽ जाइ अए। तेँ मन मे होइत रहै छै जे जते जल्दी समान हैत तते कम भाड़ा लगत। तेँ कियो समान तौलबै नै अछि। जे कियो पच्चीस रुपैइये बोरा मनेजर कऽ दऽ देने रहलै ओकरा त नीक समानो आ पुड़ल बोरो देलक। जे पाइ नइ देने रहल ओकरा समानो दब आ घटल बोरो देलक। चोर पर चोर अछि।’
छुब्ध (क्षुब्ध) होइत उमाकान्त- ‘हद लीला सब अछि।’
मिश्रीलाल- ‘आब एम.ओक (मार्केटिंग अफसरक) बात सुनह। अखुनका जे एम.ओ. अछि ओ पीआक अछि। ओना काज करै मे भुते अछि। रस्तो-पेरा मे मोटर साइकिल लगा फाइल (कागज) पर लिखि दइत अछि। मुदा ओहिना नहि। पहिले एक बोतल पीआ देबहक, तखन।’
उमाकान्त- ‘अफसर भऽ कऽ रस्ता-पेरा पर बोतल पीबै अए?’
ठहाका मारि हँसि, मिश्रीलाल- ‘बौआ, तू गाम-घरक बात बुझै छहक। गाम-घर मे जे छोट-पइघीक (पैघीक), इज्जत-आबरुक विचार अछि ओ कत्तऽ पेबह। मुदा तइओ ओकरा मे दू टा गुण जरुर छलैक। पहिल गुण छलैक जे आन कोनो स्त्रीगण दिशि नहि तकितह। आ दोसर गुण छलै जे ककरो स एक्को पाइ नइ लइतह। मुदा एहि सऽ पहिलुका (एम.ओ) जे रहए ओ भारी पाइ (पैखौक) खौक। सब काजक रेट बनौने रहए। जे सब बुझै। तेँ जेकरा जे काज रहै ओ ओइ हिसाव से पाइ दऽ दइ आ लगले काज करा लिअए।
मुस्कुराइत उमाकानत- ‘तब तऽ पक्का नटकिया सब अछि।’
मिश्रीलाल- ‘नटकिया कि नटकिया जेँका अछि। रंग-बिरंगक चोर सब पसरल अछि। कियो धनक चोर अछि त कियो धरमक। कियो बुइधिक चोर अछि त कियो विवेकक। कते कहवह। तेसराक (ओहि स पहिलुका) सुनह। अंदाज करीब, पचपन छप्पन बर्खक उमेर ओकर रहए। मुदा फीट-फाट करै मे जुआनक कान कटैत। जेहने हीरोकट कपड़ा पहिरैत तेहने हिप्पीकट केश रखैत। रंग-बिरंगक तेल आ सेंट लगवे। सदिखन उपरका जेबी मे ककही देखबे करितहक। रातियो मे कैक बेरि केश सीटए। चैबीस घंटा मे दू बेरि दाढ़ी बनबे। ओ (एम.ओ.) भारी नंगरचोप (नरचोप) जेहने अपने तेहने बहूओ। दिन भरि मे पच्चीसो बेरि कपड़ा (साड़ी-ब्लाउज) आ जूत्ता-चप्पल बदले। केश मे कते रंगक क्लीप लगबे तेकर ठेकान नहि। भरि दिन रिक्शा पर अइ डेरा से ओइ डेरा, अइ बजार से ओइ बजार घुमिते रहैत छलि। संयोगो ओकरा नीक भेटिलै। एक्के बेरि बी.डी.ओ., सी.ओक बदली भऽ गेलइ। ओकरे दुनू गोटे चार्ज दऽ कऽ गेल। ओही बीच शिक्षा मित्रक भेकेन्सी भेल। लड़की सब कऽ आरक्षण भेटिलै। जहि मे जाति प्रमाणपत्रक जरुरत पड़ल। (अपसोच करैत) बौआ की कहबह, ओइ सालाक डेरा बेश्यालय बनि गेल। कखनो आॅफिस (ब्लौक) मे नइ बैइसे। जखन बैसबो करै ते आन-आन कागज देखए, मुदा एक्कोटा जाति प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर नइ करए।’
उमाकान्त- ‘परिवारक कियो किछु ने कहए?’
मिश्रीलाल- ‘स्त्रीक विषय मे त कहिये देलियह। जेठकी बेटी बी.ए. मे पढ़ैत रहए। ओकरो चालि-ढ़ालि बापे-माए जेँका। कओलेजेक एकटा छौड़ाक (आदिवासी क्रिश्चन) संग चलि गेलइ।’
उमाकान्त- ‘बाप-माए कऽ लाज नै भेलै?’
मिश्रीलाल- ‘लाज ते तेहेन भेलइ जे राता-राती ऐठाम (अइठीन) से भागल।’
उमाकान्त- ‘अहूँ कऽ बहुत काज अछि आ हमरो मन भरि गेल। आखिरी मे एकटा बात बुझा दिअ।’
मिश्रीलाल- ‘की?’
उमाकान्त- ‘अहाँ कोना अप्पन प्रतिष्ठा समाजो आ आॅफिसो मे बना कऽ रखने छी?’
मिश्रीलाल- ‘(मुस्कुराइत) समाज मे जकरा ऐठाम सराध, विआह, उपनैन (उपनयन) मूड़न, भनडारा वा आन कोनो तरहक काज होइ छै ते ओकरा हम जरुर चीनियो आ मट्टियो तेलक पूर्ति कइये दइत छियै। भले ही अपना लग नहियो रहल तइयो जहाँ-तहाँ से आनि पुराइये दइत छियै। जइ से समाजक सब खुशी रहै अए। आॅफिसक बात त पहिने कहि देलियह।’
उमाकान्त- ‘हमरा की करक चाही? किऐक ते जइ हिसाबे अहाँ कहलौ तइ से हम्मर मन भटकि रहल अछि।’
मिश्रीलाल- ‘बौआ, जखन लाइसेंस बना लेलह तखन कम स कम एक खेपि समान उठा कऽ बाँटि लाय। जइ (जहि) स समाजोक चालि-ढ़ालि आ आॅफिसोक चालि-ढ़ालि देखि लेबहक। बेवहारिक (व्यवहारिक) ज्ञान भऽ जेतह। व्यवहारिके ज्ञान असली ज्ञान छिअए। अखन हम एते मदति जरुर कऽ देवह जे तोरा कतौ अड़चन नै हेतह। मुदा दोसर खेपक भार हम नै लेबह। किऐक त बुझिते छहक जे, विलाइ जे मूस से दोस्ती करत ते खायत की? तोरो सीखैक अवसर भेटि जेतह।’
उमाकान्त- ‘बड़वढ़िया! जहिना अहाँ कहलौ तहिना हम करब।’
मिश्रीलाल- ‘बाउ, आब ते हम बूढ़ भेलहुँ। जहिया हम सोलहे बरखक रही तहिये से डीलरी करै छी। मुदा पहिलुका आ अखुनका मे अकास-पतालक अंतर भऽ गेल अछि। जते धन आ शिक्षाक प्रसार भेलि जा रहल छै ओते घटिया मनुक्ख सेहो बढ़ि रहल अछि। पहिने इमानदार लोक बेसी छल मुदा आब आंगुर पर गनै पड़तह। हम त डीलरी मे रमि गेलौ। सब घाटक पानि पीनाइ सीखि नेने छी, तेँ नीक छी।’
उमाकान्त- ‘चलैत-चलैत किछु........।’
मिश्रीलाल- ‘जहिना आमक गाछ होइ छै, जे आमक आँठी स जनमैत अछि। तहिना त मनुक्खोक होइ छै। दुनियाँ मे जते मनुक्ख अछि, सब त मुरुखे भऽ कऽ जन्म लइत अछि। मुदा एहिठाम जकरा जेहेन परिवार, समाज, वातावरण भेटैत छैक ओ ओहन बनैत अछि। जहिना आमक छोट-छोट (सरही) गाछ क नीक-नीक (कलमी) आमक गाछक डारि मे बान्हि (कलम लगा) नीक-नीक आम बना लइत, तहिना मनुक्खोक होइत। मुदा नीक परिवार, नीक समाज अछिये कतेक। अधिकांश त गेले-गुजरल अछि। ने सबकेँ भरि पेट खेनाइ भेटै छै आ ने नीक बात-विचार। तखन नीक मनुष्य बनत कोना? जाधरि नीक मनुष्य नहि बनत ताधरि नीक समाज कोना बनत? तखन त जइह अछि तेहि मे अपना कऽ जते नीक बना जीबि सकी, बइह संतोषक बात। तोहूँ अखन सादा कागज जेँका साफ छह, तेँ हम चाहब जे ओ गन्दा नहि हुअ। जेहेन विचार हाथ होइत (कर्म) निकलतह तेहेन जिनगी हेतह। कियो शरीरांत कऽ मृत्यु बुझैत अछि आ कियो आत्माक हनन कऽ। मनुष्य मे असीम शक्ति छिपल छैक, ओकरा जगबैक अछि। जे हमहू सरिया कऽ नहिये बुझै छियै।’
जहिना तेज हथियार हाथ मे ऐला स सक्कत-सक्कत वस्तु कटैक हूबा बनि जाइत तहिना उमाकान्तो कऽ भेल।
ओ विचार केलक जे आब बैलगाड़ीक युग नइ रहल। मशीनक युग आवि गेल। तेँ हमहूँ अपना हाथ स इन्जिने चलाएब।’

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