Friday, October 30, 2009

'विदेह' ४४ म अंक १५ अक्टूबर २००९ (वर्ष २ मास २२ अंक ४४)- PART II

अनमोल झा (१९७०- )-गाम नरुआर, जिला मधुबनी। एक दर्जनसँ बेशी कथा, लगभग सय लघुकथा, तीन दर्जनसँ बेशी कविता, किछु गीत, बाल गीत आ रिपोर्ताज आदि विभिन्न पत्रिका, स्मारिका आ विभिन्न संग्रह यथा- “कथा-दिशा”-महाविशेषांक, “श्वेतपत्र”, आ “एक्कैसम शताब्दीक घोषणापत्र” (दुनू संग्रह कथागोष्ठीमे पठित कथाक संग्रह), “प्रभात”-अंक २ (विराटनगरसँ प्रकाशित कथा विशेषांक) आदिमे संग्रहित।
लघुकथा
युगान्त

-हे सुनै छी की?
-हँ माँ कहथु ने, की कहै छथि।
-आइ रीता दाइ अबै छै।
-से की?
-से घर आँगन नीप लिअ। तिलकोड़, पापर, राहड़िक दालि, बड़ी सब सकाले कके राखि लिअ।
-बेस! एतऽ हम हिनका दुनु बेकतीक सेवाक लेल छियैनि। हिनका बेटी जमाय लेल नै। अबैत छथिन एहि बेर अपने गाम, चल जेबनि संगे। लऽ लिहथि तखन धधकल..कहलकै जे..!!

जगदीश मंडल
उपन्यास:
जिनगीक जीत ःः 1
छोट-छीन गाम कल्या णपुर। गाम क' देखनहि बुझि पड़ैत जे आदिम युगक मनुक्खअ स ल' क' आइ धरिक मनुक्‍ख हँसी-खुशी स रहैत अछि। मनुखे टा नहि मालो-जाल तहिना। एक फुच्चीम दूधवाली गाय स ल' क' बीस लीटर दूधवाली गाय धरि। बकरीओक सैह नस्लन। ऐहनो बकरी अछि जकरा तीनि-चारि बच्चात भेने, एक-दू टा दूधक दुआरे मरिये जाइत। आ एहनो अछि जकरा चारि लीटर दूध होइत। गाछियो-बिरछी तहिना। एहनो गाछी अछि जहि मे एकछाहा शीशोए टा अछि त दोसर बगुरेक। आमो गाछीक वैह हाल। कोनो एकछाहा सरहीक अछि त कोनो एकछाहा कलमीक। ततबे नहि, ओहन-ओहन गाछ अखनो अछि जे दू-दू कट्ठा खेत छपने अछि त ओहनो गाछी अछि जहि मे पनरह-पनरह टा आमक गाछ एक कट्ठा मे फइल स रहि मनसम्फेत फड़बो करैत अछि।
ओझुका जेँका कल्याोणपुर, चालीस बर्ख पहिने नहि छल। ने एकोटा चापाकल छलै आ ने बोरिंग। जेहने हर त्रेता युग मे राजा जनक जोतने रहथि तेहने हर स अखनो कल्यालण पुरक खेत जोतल जाइत अछि। ने अखुनका जेँका उपजा-बाड़ी होइत छल आ ने बर-बीमारीक उचित उपचार। सवारीक रुप मे सभकेँ दू-दू टा पाएर वा गोट-पङरा बड़द जोतल काठक पहियाक गाड़ी। अंग्रेजी शासन मेटा गेल मुदा गमैआ जिनगी मे मिसिओ भरि सुधार नहि भेल। जहिना जाँत मे दू चक्कीग होइत- तरौटा आ उपरौटा। तरौटा कील मे गाड़ल रहैत। तहिना शरही आ देहाती जिनगीक अछि। शहरी जिनगी त आगू मुहे घुसकल मुदा देहाती जिनगी तरौटा चक्की जेँका ओहिना गड़ाइल रहि गेल अछि। बान्हू-सड़क, घर-दुआर सब ओहिना अछि जहिना चालीस बर्ख पहिने छल। तेँ की कल्यािणपुरक लोक अंग्रेजी शासन तोड़ै मे, भाग नहि लेलक? जरुर लेलक। दिल खोलि साहस स लेलक। सगरे गाम क' गोरा-पल्‍टन आगि लगा-लगा तीनि बेरि जरौलक। कत्त्ो गोटे बन्दूसकक कुन्दाग से, त कत्त्ो गोटे मोटका चमड़ाक जूत्ता स थकुचल गेलाह। जहल जाइवलाक धरोहि लागि गेल रहय। कत्त्ो गोटे डरे जे गाम छोड़ि पड़ायल ओ अखनो धरि घुरि क' नहि आबि सकल। कत्त्ो गोटेक परिवार बिलटलै, तकर कोनो ठेकान, अखनो धरि नहि अछि।
कल्याोणपुरक एक परिवार अछेलालक। अगहन पूर्णिमाक तेसर दिन, बारह बजे राति मे घूर धधका दुनू परानी अछेलाल आगि तपैत रहय। पहिलुके साँझ मे स्त्री मखनी केँ पेट मे दर्द उपकलै। प्रशबक अंतिम मास रहने मखनी बुझलक जे प्रशवक पीड़ा छी। अछेलालो केँ सैह बुझि पड़लै। ओसरे पर चटकुन्नीअ बिछा मखनी पड़ि रहलि। चटकुन्नी्क बगले पे अछेलालो बैसि गेल। दरद असान होइतहि मखनी बाजलि- ‘‘दरद असान भेल जाइ अए।''
मुह पर हाथ नेने अछेलाल मने-मन सोचैत जे असकरुआ छी कोना पलहनिक ओहिठाम जायब? कोना अगियाशी जोड़ब? जाड़क समय छियै। परसौतीक लेल जाड़ ओहने दुश्मान होइत अछि जेहने बकरीक लेल फौती। दर्द छुटितहि मखनी फुड़-फुड़ा क'उठि भानसक जोगार मे जुटि गेलि। पानि भरैक घैल लए जखने घैलची दिशि बढ़ै लागलि कि अछेलाल(पति) बाँहि पकड़ि रोकि, कहलक- ‘‘अहाँ उपर-निच्चा नइ करु। हम पानि भरि अनै छी। अहाँ घर से बासन-कुसन निकालू। हम ओकरो धो क' आनि देब।''
मखनी चुल्हिह पजारै लागलि आ अछेलाल लुरु-खुरु करै लगल। बरतन-बासन धोय ओहो चुल्हिँऐक पाछु मे बैसि, आगियो तपै आ गप्पोल-सप्प- शुरु केलक। मुस्की।दैत अछेलाल बाजल- ‘‘एहिबेर भगवान बेटा देताह।''
बेटाक नाम सुनि मखनी सुखक समुद्र मे हेलए लागलि। मने-मन सुखक अनुभव करैत विचारै लागलि जे बच्चा केँ दूध पियाइब। तेल-उबटन सँ जाँतव। आखि मे काजर लगा किसुन भगवान बना चुम्माच लेब। कोरा मे लए अनको आंगन घूमै जाएब। इस्कूुल मे नाओ लिखा पढ़बैक विचार एलै, कि जहिना गमकौआ चाउरक भात आ नेबो रस देल खेरही दालि मे सानल कौर मुह मे दइते, ओहन आँकर पड़ि जाइत जहि स जी(जीभ) कटि जाइत, तहिना भेलि। मनक सुख मनहि मे मखनी क' अटकि गेलि। पत्नीजक मलिन होइत मुह देखि पति बाजल- ‘‘गरीबक मनोरथर आ बरखाक बुलबुला एक्केख रंग होइ छै। जहिना पाइनिक बुलबुला सुन्दपर आकार आ रंग ल' बढ़ैत अछि कि फुॅटिये जाइत, तहिना।''

मखनीक मन मे दोसर विचार उठलै जे धन त बहुत रंगक होइ छै- खेत-पथार,गाय-महीसि, रुपैआ-पैसा मुदा एहि सब धन स पैघ बेटा धन होइत छैक। जे बूढ़ मे माय-बापक सवारी बनि सेवा करैत अछि। ततबे नहि, परिवारो खनदानो क' आगू बढ़बैत अछि। तोहूँ मे जँ कमासुत बेटा होइत त जीवितहि माय-बाप केँ स्वेर्गक सुख दैत अछि ।
भानस भेलै। दुनू परानी खेलक। मोटगर पुआर पर चटकुन्नी विछाओल, तहि पर जा मखनी सुति रहलीह। थारी-लोटा अखारि, चुल्हि -चिनमारक सभ सम्हा रि अछेलाल चुल्हिलये लग बैसि आगि तपै लगल। तमाकुल चूना मुह मे लेलक। चुल्हिनये लग बैसल-बैसल अछेलाल ओंघाइयो लगल। ओंघी तोड़ै ले उठि क' अंगना मे टहलै लगल। भक्के टुटिते फेर चुल्हिे लग आबि अछेलाल आगि तपै लागल। मखनी निन्नि पड़ि गेलि। मखनीक नाकक आबाज सुनि अछेलाल सोचै लगल जे जँ राति-बिराति दर्द उपकतै त महा-मोसकिल मे पड़ि जायब। अपने त किछु बुझैत नहि छी। दशमीक डगरक सिदहा द' नहि सकलिऐक तेँ पलहनियो आओत की नहि? चुल्हि क आगि मिझाइत देखि अछेलाल जारन आनै डेढ़िया पर गेल। ओस स जारनो सिमसल। लतामक गाछ पर स टप-टप ओसक बुन्नम खसैत। अन्हाररक तृतीया रहने, चान त भरि राति उगल रहत, मन मे अबितहि अछेलाल मेघ दिशि तकलक। चान त उगल देखैत मुदा ओसक दुआरे जमीन पर इजोत अबितहि नहि। पाँज मे जारन नेने अंगना आयल। ओसार पर चुल्हि रहने सोचलक जे घरे मे घूर लगौनाइ बढ़ियाँ हैत किऐक त घरो गरमाइल रहत। अछेलालक पाएरक दमसि स मखनीक निन्ने टुटि गेलै। धधकैत घूर देखि मखनियो केँ आगि तपैक मन भेलै। ओछाइन पर स उठि ओ घूर लग आबि बैसलि। बीच मे घूर धधकैत आ दुनू भाग दुनू परानी बैसल। जहिना देहक दुख स मखनी तहिना मोनक दुख स अछेलाल। बेबसीक स्वआर मे अछेलाल बाजल- ‘‘अदहा राति त बीतिए गेल, अदहे बाकी अछि। जहिना अदहा बीतल तहिना बाँकियो बीतबे करत।''
अछेलालक बात सुनि मखनी पूछलक- ‘‘अखन धरि अहाँ जगले छी?''
‘हँ, की करब। जँ सुति रहितौ आ तइ बीच मे अहाँ केँ दरद उठैत त फटोफन मे पड़ि जइतहुँ। सैाँसे गामक लोक सुतल अछि। ककरा सोरो पारवैक। एक्केआ रातिक त बात अछि। कहुना-कहुना क' काटिये लेब। मन मे होइत छल जे बहिन केँ बिदागरी करा केँ ल' अनितहुँ मुदा ओहो त पेटबोनिये अछि। तहू मे चारि-पाँच टा लिधुरिया बच्चोा छै। जँ विदागरी करा क' आनव त पाँच गोटेक खरचो बढ़ि जाइत। घर मे त किछु अछि नहि। कमाई छी खाई छी।''
‘‘कहलिएै त ठीके। अपना घर मे लोक भुखलो-दुखलो रहि जाइत अछि। मुदा जकरा माथ चढ़ा क' अनितियै ओकरा कोना भूखल रखितियै?'' दिन-राति चिन्ताा पैसल रहै अए जे पार-घाट कोना लागत। भगवानो सबटा दुख हमरे दुनू परानी केँ देने छथि। एक पसेरी चाउर घैल मे रखने छी कहुना-कहुना पान-सात दिन चलबे करत। तकर बाद बुझल जेतैक।''
पसेरी भरि चाउर सुनि अछेलालक मोन मे आशा जगल। मुह स हँसी निकलल। हँसैत बाजल- ‘‘जँ हमर बनि बच्चास जनम लेत त कतबो दुख हेतइ तइओ जीवे करत। नहि जँ कोनो जनमक करजा खेने हेबै त असुल क' चलि जायत।''
पतिक बात सुनितहि मखनी केँ पहिलुका दुनू बच्चाह मन पड़ल। मने-मन सोचै लागलि जे ओहो बच्चाट नहि मरिते। जँ नीक-नहाँति सेवा होइतइ ते। मुदा मनुखे की करत? जकरा भगवाने बेपाट भ' गेल छथिन। पैछला बात मन स हटबैत मखनी बाजलि- ‘‘समाज मे ओहनो बहुत लोक होइत जे बेर-बेगरता मे भगवान बनि ठाढ़ होइत।''
‘‘समाज दू रंगक होइछै। एकटा समाज ओहन होइ छैक जइ मे दोसराक मदति केँ धरम बुझल जाइ छै आ दोसर ओहन होइ छैक जहि मे सब सभक अधले करैत अछि। अपने गाम मे देखै छियै। अपन टोल तीस-पेंइतीस घरक अछि। चारि-पाँच रंगक जातियो अछि। एक जातिकेँ दोसर स' भैंसा भैंसीक कनारि अछि। अपन तीनि घरक दियादी अछि। तीनू घर मे सुकनाकेँ दु सेर दू टाका छैक। ओकरा देखै छियै। सदिखन झगड़े-झंझटक पाछू रहैअए। टोल मे सबसे बाड़ल अछि। ओकरा चलैत हमरो से सब मुह फुलौने रहै अए। ने ककरो से टोका-चाली अछि आ ने खेनाई-पीनाई, आ ने लेन-देन। भगवान रच्छा रखने छथि जे सब दिन बोइन करै छी मौज स खाई छी नइ त एक्कोख दिन अइ गाम मे बास होइत।''
अछेलालक बात सुनि मूड़ि डोलबैत मखनी बाजलि- ‘‘कहलौ त ठीके, मुदा जे भगवान दुख दइ छथिन ओइह ने पारो-घाट लगबै छथिन।''
मखनीक बात सुनि अछेलाल बाजल- ‘‘सगरे गाम मे नजरि उठा क' देखै छी त खाली बचेलालेक परिवार स थोड़-बहुत, मिलान अछि। साल मे दश-बीस दिन खेतिओ सम्हाौरि दइ छियै आ घरो-घरहट। पेंइच-उधार त नहिये करै छी। हमर ब्रह्‌म कहै अए जे अगर बचेलालक माएकेँ कहबनि त ओ बेचारी जरुर सम्हायरि देती। कहुना राति बीतै भोर होय, तखन ने कहबनि। दुखक रातियो नमहर भ जाइ छै। एक्केु निन्नद मे भेर भ जाइ छले, से बितबे ने करै अए।''
हाफी करैत मखनी बाजलि- ‘‘देहो गरमा गेलि आ डॉड़ो दुखा गेल। ओछाइने पर जाइ छी।''
मखनीक बात सुनि अछेलाल ठाढ़ भ' मखनीक बाँहि पकड़ि ओछाइन पर ल' गेल। मखनी पइर रहलि। पड़ले-पड़ल बाजलि- ‘‘मन हल्लुपक लगै अए। अहूँ सुति रहू।''
अछेलालक मन मे चैन आयल। मुदा तइयो सोचैत जे एहि देह आ समयक कोन ठेकान। कखन की भ' जयतैक। गुनधुन करैत बाहर निकलि चारु भर तकलक। झल-अन्हाठरक दुआरे साफ-साफ किछु देखवे ने करैत। मूड़ी उठा मेघ दिशि तकलक। मेघो मे छोटका तरेगण बुझिये ने पड़ै। गोटे-गोटे बड़का देखि पड़ै। अयना जेँका चानो बुझि पड़ै। डंडी-तराजू केँ ठेकना ताकै लगल। तकैत-तकैत पछबारि भाग मन्हु आइल देखलक। डंडी-तराजू देखि अछेलाल क' संतोष भेलै जे राति लगिचा गेल अछि। फेर घुमि क' आबि घूर लग बैसल। आलस अबै लगलै। तमाकुल चुना मुह मे लेलक। बाहर निकलि तमाकुल थूकड़ि क' फेकि पुनः घुरे लग आबि बोरा पसारि घोंकड़ी लगा,बाँहिएक सिरमा बना सुति रहल। निन्न पड़ि गेल। निन्न पड़ितहि सपनाइ लगल। सपना मे देखै लगल जे घरवाली दरद स कुहरैत अछि। चहा क' उठि पत्नीिकेँ पूछलक-‘‘बेसी दर्द होइ अए?''
मखनी निन्न छलि। किछु नहि उत्तर नहि देलि। घूर क' फूँकि अछेलाल धधड़ाक इजोत मे मखनी लग जा निङहारि क' देखै लगल। मन मे भेलै जे कहीं बेहोश त ने भ' गेलि अछि, मुदा नाकक साँस असथिर रहै।
कौआ क' डकितहि अछेलाल उठि क' बचेलाल ऐठाम विदा भेल। दुनू गोटेक घर थोड़बे हटल, मुदा बीच मे डबरा रहने घुमाओन रास्ताह। बचेलालक माए क' अछेलाल भौजी कहैत। दियादी संबंध त दुनू परिवार मे नहि मुदा सामाजिक संबंधे भैयारी। बचेलालक पिता रघुनन्दमन छोटे गिरहस्तभ, मुदा सामाजिक हृदय रहने सभ सँ समाज मे मिलल-जुलल रहैत। बचेलाल ऐठाम पहुँचते अछेलाल डेढ़िया पर ठाढ़ भ' बचेलालक माय सुमित्राकेँ सोर पाड़लक। आंगन बहारैत सुमित्रा बाढ़नि हाथ मे नेनहि घरक कोनचर लग स देखि, मुस्कुमराइत बाजलि- ‘‘अनठिया जेँका दुआर पर किऐक छी?आउ-आउ, अंगने आउ।''
अछेलालक मन्हुेआयल मुह देखि सुमित्रा पूछलक-‘‘राति मे किछु भेलि की? मन बड़ खसल देखै छी।''
कपैत हृदय स अछेलाल उत्तर देलकनि- ‘‘नइ राति मे त किछु ने भेल मुदा भारी विपत्ति मे पड़ल छी। तेँ एलौ।''
‘‘केहन विपत्ति मे पड़ल छी?''
‘‘भनसियाकेँ संतान होनिहार अछि। पूर मास छियै। घर मे त दोसर-तेसर अछि नहि। जनिजातिक नीक-अधला ते अपने बुझै नइ छी। तेँ अहाँ क' कहै ले एलौ जे चलि क सम्हा रि दिओ।''
कनेकाल गुम्म भ' सुमित्रा बजलीह- ‘‘अखन त दरद नहि ने उपकलै हेन?''
‘‘नै, अखन चैन अछि। साझू पहर दरद उपकल छलै मुदा कनिये कालक बाद असान भ' गेलै।''
‘लोकेक काज लोक क' होइ छै। समाज मे सभक काज सभकेँ होइ छै। अगर हमरा गेला स अहाँक नीक हैत त किअए ने जायब।' कहि सुमित्रा फुसफुसा क पूछल-‘‘परसौती खाइले चाउर अछि, की ने?''
अछेलालक मोन मे एलै जे झूठ नहि कहबनि। कने गुम्मर भ बाजल- ‘‘एक पसेरी चाउर घर मे अछि, भौजी।''
एक पसेरी चाउर सुनितहि सुमित्राकेँ हँसी लगलनि। मुदा हँसी क' दाबि, सोचलनि जे कम स कम एक मासक बुतात चाही। मास दिन सँ पहिने परसौतिक देह मे कोनो लज्जछति थोड़े रहै छै। तेँ एक मासक बुतातक जोगार सेहो क देबै। बेर पड़ला पर गरीब लोकक मन बौआ जाइ छै तेँ अछेलाल ऐना कहलक। पुरुख जाति थोड़े परसौतीक हाल बुझैत अछि। जखन हमरा बजबै ले आइल तखन बच्चाल क' एहि धरती पर ठाढ़ करब हमर धर्म भ जाइत अछि। सिर्फ बच्चाा जनमि गेला से त नहि होइत। दुनू गोटे गप-सप करिते छल कि बचेलाल सुति क उठल। केबाड़ बन्नेच छल कि दुनू गोटेक गप-सपक आवाज सुनलक। खिड़कीक एकटा पट्टा खोलि हुलकी देलक कि दुनू गोटे केँ गप-सप करैत देखलक। केबाड़ खोलि बचेलाल दुनू गोटे लग आबि चुपचाप ठाढ़ भ गेल। पुतोहूक दुआरे सुमित्राा बाजलि- ‘‘दरबज्जेस पर चलू।''
तीनू गोटे दरवज्जाब पर आबि गप-सप करै लगल। अपन भार हटबैत सुमित्राा बचेलाल केँ कहलक- ‘‘बच्चाग! अछेलालक कनिञाँ क' सन्ताटन होनिहारि छै। बेचारा,जेहने सवांगक पातर अछि तेहने चीजोक गरीब। आशा लगाा क अपना ऐठाम आयल। गाम मे त बहुतो लोक अछि मुदा अनका ऐठाम किऐक ने गेल। जेँ हमरा पर बिसवास भेलै तेँ ने आयल।''
मूड़ी निच्चाभ केने बचेलाल चुपचाप सुनैत। माएक बात सुनि कहलक- ‘‘जखन तोरा बजबै ले एलखुन ते हम मनाही करबौ।''
‘‘सोझे गेला से त नइ हेतै। कम स कम एक मासक बुतातो चाही की ने?''
‘‘जखन तूँ घरक गारजने छेँ तखन हमरा से पूछैक कोन जरुरी? जे जरुरी बुझै छीही,से कर।''
अछेलालक हृदय मे आशा जगै लगल। मने-मन सोचै लगल जे अखन धरि बुझै छलौ जे गाम मे क्योै मदतिगार नहि अछि मुदा से नहि। भगवान केहेन मन बना देलनि जे ऐठाम एलौ। कुस्कु राइत अछेलाल सुमित्रा केँ कहलक- ‘‘बड़ी काल भ गेल भैजी, अंगना मे की भेल हेतै, सेहो देखैक अछि तेँ आव नइ अँटकब। चलू, अहूँ चलू।''
सुमित्राा- ‘‘बौआ! अहाँ आगू बढ़ू, हम पीठे पर अबै छी।''
अछेलाल आंगन बिदा भेल। सुमित्राा बचेलाल केँ कहै लागलि- ‘‘बच्चा ! मनुखेक काज मनुख क' होइ छै। आइ जे सेवा करब ओ भगवानक घर मे जमा रहत। महीना दिन हम ओकर ताको-हेर करबै आ खरचो देबै। भगवान हमरा बहुत देने छथि। कोन चीजक कमी अछि।''
बचेलाल- ‘‘माए! तोरा जे नीक सोहाओ, से कर। जा क' देखही।''
दरबज्जाु स उठि सुमित्रा अंगनाक काज सम्हाऐरै लागलि। सब काज सम्हा रि सुमित्रा अछेलाल ऐठाम विदा भेलि। मखनी ओसार पर, विछान बिछा, पड़लि। पहुँचते सुमित्रा मखनी केँ पूछलि- ‘‘कनिञाँ, दरदो होइ अए?''
कर घूमि मखनी बाजलि- ‘‘दीदी, अखन त दरद नइ उपकल हेन, मुदा आगम बुझि पडै़ अए।''
मखनी क' दू टा संतान भ चुकल छल तेँ आगम बुझैत। सुमित्रा अछेलाल केँ कहलक-‘‘ऐठाम हम छी हे। अहाँ पलहनिक ऐठाम जा बजौने आउ?''
अछेलाल पलहनिक ऐठाम विदा भेल। मुदा पलहनि ऐठाम जेबा ले डेगे ने उठैत। मन मे होइ जे दशमी डगरक सिदहा नै द' सकलिऐक, तेँ ओ आओत की नहि?मुदा तइयो जी-जाँति क' विदा भेल। भरि रास्ताद विचित्र मे अछेलाल। एक दिशि सोचैत जे जँ पलहनि नहि आओत त बेकार गेनाइ हैत। दोसर दिशि होय जे जाबे हम इमहर एलौ ताबे घर पर की हैत की नहि। पलहनिक ऐठाम पहुँचते अछेेलाल देखलक जे पलहनि मालक थैरिक गोबर उठा, पथिया मे ल खेत विदा भेलि अछि। जहिना न्यापयालय मे अपराधी केँ होइत तहिना अछेलालो केँ बुझि पड़ैत। मुदा तइयो साहस क'पलहनि सँ कहलक- ‘‘कने हमरा ऐठाम चलू। भनसिया क' दरद होइ छै।''
‘‘माथ पर गोबरक छिट्टा नेने पलहनि उत्तर देलक- ‘‘हम नइ जेबनि। डगरक सिदहा हमर बाँकिये अछि। पेट-बान्हि कतेक दिन काज करबनि।''
पलहनिक बात सुनि अछेलाल अपन भाग्यन क' कोसैत। भगवान केहेन बनौने छथि जे जकरा-तकरा स दू टा बात सुनै छी। मुह सिकुड़िअबति अछेलाल पुनः कहलक-‘‘कनिञाँ, अइ साल सिदहा नइ द सकलिएनि, तेँ कि नहि देबनि। समय-साल नीक हैत त अगिला साल दोबर देबनि। समाज मे सभक उपकार सभकेँ होइत छैक। चलू,चलू....।
खिसिया क पलहनि डेग बढ़बति बाजलि- ‘‘किन्निहु नहि जेवनि।''
एक टक स अछेलाल पलहनि क' देखैत रहल। देह मे जना एको मिसिया तागते ने बुझि पड़ै। हताश भ, दुनू हाथ माथ पर ल अछेलाल बैसि सोचै लगल जे आब की करब? आशा तोड़ि घर दिशि विदा भेल। आगू मुहे डेगे ने उठै, पाएर पताइत। जना बुझि पड़ै जे आखि स लुत्ती उड़ै अए। कहुना-कहुना क' अछेलाल घर पर आयल।
तेसर सन्तापन भेने मखनी क' दरदो कम भेलै आ असानी स बच्चाहक जन्मा भेलै। अपना जनैत सुमित्रा सेवो मे कोनो कसरि बाकी नहि रखलखिन। डेढ़िया पर अबितहि अछेलाल केँ बुकौर लगि गेलै। दुनू आँखि स दहो-बहो नोर खसै लगल। अंगना आवि मुस्कुरराइत सुमित्रा बाजलि- ‘‘बौआ, ककरो अहाँ अधला केने छी जे अधला हैत। भगवान बेटा देलनि। गोल-मोल मुह, मोटगर-मोटगर दुनू हाथ-पाएर छैक।''
आशा-निराशाक बीच अछेलालक मन उगै-डूबै लगल। हँसी होइत सुख निकलै चाहैत जबकि आखिक नोर होइत
दुख। बेटा जनमितहि सुमित्राक अंगनाक टाट पर बैसल कौवा दू बेरि मधुर स्व-र मे बाजल कौवाक बोली सुनि बचेलालक मुह स अनायास निकलल- ‘‘अछेलाल काका क'बेटा भेल।''
मुह स निकलितहि बचेलारल आखि उठा-उठा चारु कात देखै लगल जे क्योस कहलक नहिये तखन मुह स किऐक निकलल? आंगन स निकलि बचेलाल टहलैत डबराक कोन लग आयल। कोन पर ठाढ़ भ' हियासै लगल जे बच्चाहक जन्म भेलि आ कि दरदे होइत छै। सुमित्रा ओछाइन साफ करैत। अगियासी जोड़ै ले अछेलाल डेढ़िया पर जारन आनै गेल कि बचेलाल पर नजरि पड़ल। नजरि पड़ितहि अछेलाल, थोडे़ आगू बढ़ि,बचेलाल केँ कहलक- ‘‘बौआ, छैाँड़ा जनमल।''
लड़काक नाम सुनितहि बचेलालक मोन मे आयल जे जा क' देखिऐेक। मुदा सोचलक जे अखन जा क' देखब उचित नहि। चोट्टे घुमि आंगन आवि पत्नी। क' कहलक-‘‘अछेलाल काका क' बेटा भेल।''
बेटाक नाम सुनितहि मने-मन असिरवाद दैत रुमा बाजलि- ‘‘भगवान जिनगी देथुन।''
बच्चा क छठियार भ' गेल। सुमित्रा अपन अंगनाक काज सम्हाजरि अछेलालक आंगन पहुँचली। गोसाई लुक-झुक करैत। पतिआनी लगा बगुला पछिम स पूब मुहे उड़ैत अपना मे हँसी मजाक करैत जाइत। कौआ सब धिया-पूता हाथक रोटी छीनै ले पछुअबैत। जेरक-जेर टिकुली गोलिया-गोलिया उपर मे नचैत। सुरुज अराम करैक ओरिआन मे लगल। अछेेलालक बीच आंगन मे बोरा बिछा सुमित्रा बच्चाे क' दुनू जाँघ पर सुता जतबो करति आ घुनघुना क गेबो करथि-
गरजह हे मेघ गरजि सुनाबह रे
ऊसर खेत पटाबह, सारि उपजावह रे
जनमह आरे बाबू जनमह, जनमि जुड़ाबह रे
बाबा सिर छत्र धराबह शत्रु देह आँकुश रे
हम नहि जनमब ओहि कोखि अबला कोखि रे
मैलहि बसन सुतायत, छैाँड़ा कहि बजायत रे
जनमह आरे बाबू जनमह जनमि जुड़ाबह रे
पीयर बसन सुताबह बाबू कहि बजावह रे
झुमि-झमि सुमित्रा गबितो आ बच्चाा क' जँतबो करति। आखि स आखि मिला स्नेतहक बरखा बरिसबैत। बच्चा क' कोनो तरहक तकलीफ नहि होइ तेइ ले मुह दिशि देखैत। टाटक अढ़ मे बैसि अछेलाल सुमित्रा क' स्ने ह देखि, दुनिया क' बिसरि आनन्दट लोक मे बिचरैत। घ्‍
2
रवि दिन रहने बचेलाल अबेर क' उठल। मन मे यैह सोचि विछान पर पड़ल,जे आइ स्कू्ल नहिये जाएब। घर पर कोनो अधिक काजो नहिये अछि। मात्र एक जोड़ धोती, एक जोड़ कुरता आ एक जोड़ गंजिये टा खिंचैक अछि। दुपहर तक त काजो एतवे अछि। बेरु पहर हाट जा घरक झूठ-फूस समान कीनि आनब। हाटो दूर नहि,गामक सटले अछि। सुति उठि बचेलाल नित्यज-कर्म स निवृत भ' दलानक चौकी पर आबि बैसल। रुमा चाह द' गेलनि। दू घोंट चाह पीबितहि बचेलाल केँ पिता मन पड़ि गेलखिन। पिता मन पड़ितहि बचेलाल अपन तुलना हुनका(पिता) स करै लगला। मने-मने सोेचै लगल जे पिता साधारण किसान छलाह। पढ़ल-लिखल ओतबे जे नाम-गाम टो-टा क' लिखि लथि। काजो ओतबे रहनि जे कहियो-काल रजिष्ट्री अॉफिस जा सनाक बनथि। भरि दिन खेती स ल क' माल-जालक सेबा मे व्यरस्तो रहैत छलाह। मुदा एत्त्ो गुण अवश्यज छलनि जे गाम मे कतौ पनचैती होइत वा कतौ भोज-भात होइत वा समाजिक कोनो(दशनामा) काज होइत त हुनका जरुर बजौल जाइन। ततबे नहि, बूढ़-पुरान छोड़ि केयो नाम ल क' सोरो नहि पाड़ैत छलनि। अपन संगतुरिया भाय कहनि आ धिया-पूता स चेतन धरि गिरहत बाबा, गिरहत काका कहनि। परिवारे जेँका समाजो क' बुझैत छलथिन। मुदा हम शिक्षक छी। अपन काजक प्रति इमानदार छी। बिना छुट्टिये एक्को दिन ने स्कूुल मे अनुपस्थिकति होइ छी आ ने एको क्षण बिलम्बत स पहुँचै छी। जते काल स्कू ल मे रहै छी, बच्चाु सभकेँ पढ़विते छी। जना आन-आन स्कूषल मे देखै छी जे शिक्षक सभ कखनो अबै छथि, कखनो जाइ छथि आ स्कूेलो मे ताशो भँजैत छथि। ओना हमहू ककरो उपकार त नहिये करै छी किऐक त दरमाहा ल काज करैत छी। आन शिझकक अपेक्षा इमानदारी स जीवितहुँ अपना पैघ कमी बुझि पड़ैत अछि। ओ कमी अछि समाज मे रहि समाज स कात रहब। स्कूालक समय छोड़ि दिन-राति त गामे मे रहै छी मुदा ने क्योम टोक-चाल करै अए आ ने क्यो दरवज्जाी पर अबै अए। मन मे सदिखन रहे अए जे कमाई छी त दू-चारि गोटे केँ चाह-पान खुआबी-पीआबी। मुदा क्यो‍ कनडेरियो आखिये नहि तकैत अछि। हमहू त ककरो ऐठाम नहिये जाइ छी। चेतन सभक कहब छनि जे दुआर-दरबज्जाबक इज्ज‍त छी चारिगोटेकेँ बैसब। मुदा से कहाँ होइ अए। गाम त शहर-बजार नइ छी जे एक्केो मकान मे रहितहुँ, आन-आन क्षेत्रक रहने, लोक आन-आन भाषा बजैत, आन-आन चलि-ढ़ालि मे अपन जिनगी वितवैत, ककरो क्यो् सुख-दुख मे संग नहि होइत! मुदा समाज त से नहि छी? बाप-दादाक बनाओल छी। एक ठाम सइयो-हजारो बर्ख स मिलि-जुलि क' रहैत अयलाह। रंग-विरंगक जातियो प्रेम स रहैत अछि। सभ सभकेँ सुख-दुख मे संग रहैत अछि। बच्चाोक जन्मा स ल क' मरण धरि संग पूरैत। ऐहन समाज मे, हमर दशा ऐहन किऐक अछि? जहिना पोखरिक पानिक हिलकोर मे खढ़-पात दहाइत-भसिआइत किनछरि लगि जाइत तहिना त हमरो भ' गेल अछि। की पाइनिऐक हिलकोर जेँका समाजो मे होइत छैक? जँ पाइनियेक हिलकोर जेँका होइत छैक त हम ओहि हिलकोर क' बुझैत किऐक ने छी? हमहू त पढ़ल-लिखल छी।
जत्त्ो समाजक संबंध मे बचेलाल सोचैत तत्त्ो मन मलिन होइत जाइत। मुदा बुझि नहि पबैत। अधा चाह पीलाक बाद जे गिलास मे रहल ओ सरा क' पानि भ' गेल। ने चाहक सुधि आ ने अपन सुधि, बचेलाल क'। जना बुझि पड़ैत जे हम ओहन बन मे बौआ गेलहुँ जत्त' एक्कोस टा रस्तेम ने देखैत छी। गंभीर भ' बचेलाल बड़बड़ेबो करैत आ अपने-आपमे गप्पो् करैत।
आंगन स सुमित्रा आबि बचेलाल केँ देखि पूछलखिन- ‘‘बच्चा , कथीक सोग मे पड़ल छह? किछु भेलह हेन की?''
बचेलालक मुह सँ निकलल- ‘‘नहि माए! भेल त किछु नहि। मुदा गामक किछु बात मोन मे घुरिआइत अछि। जकर जबाब बुझिते ने छी।''
तारतम्यब करैत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘गाम मे त बहुत लोक रहैत अछि मुदा सभ थोड़े गामक सब बात बुझैै छै। गाम मे तीनि तरहक रास्ताह छैक। पहिल ओ जहि स समाज चलैत अछि। दोसर स परिवार चलैत आ तेसर स मनुक्खर चलैत अछि। मनुक्खि अपन चलि परिवारक चालि मे मिला क' चलैत अछि। तहिना परिवार समाजक चालि स मिला क' चलैत अछि तेँ, तीनूक अलग-अलग चालि रहनहुँ ऐहन घुलल-मिलल अछि जे सभकेँ बुझवो मे नहि अबैत।'
मुह वाबि बचेलाल माएक बात सुनि, कहलकनि- ‘‘माए, तोरो बात हम नीक-नहाँति नहि बुझि सकलहुँ। मन मे यैह होइ अए जे किछु बुझिते ने छी। अन्हा र मे जना लोक किछु ने देखैत, तहिना भ रहल अछि।'
मूड़ी डोलबैत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘अपने घर मे देखहक- दू टा बच्चा अछि, ओकर त कोनो मोजरे नहि। तीनि गोटे चेतन छी। तोँ भरि दिन इस्कूहलेक चिन्ताम मे रहै छह। भोरे सुति उठि क' नओ बजे तक, अपन सब क्रिया-कर्म स निचेन भ खा के इस्कू ल जाइ छह। चारि बजे छुट्टी होइ छह। डेढ़ कोस पाएरे अबैत-अबैत साँझ पड़ि जाइ छह। घर पर अबैत-अबैत थाकियो जाइत हेबह। पर-पखाना स अबैत-अबैत दोसर साँझ भ' जाइ छह। दरबज्जाघ पर बैसि, कोनो दिन ‘रमायण' त कोनो दिन ‘महाभारत' पढै़ छह। भानस होइ छै खा क सुतै छह। फेरि दोसर दिन ओहिना करै छह। एहिना दिन बीतैत जाइत छह। दिने स मास आ मासे स साल बनैत छैक। कोल्हु क बड़द जेँका घर स इस्कूील आ इस्कू ल स घर अबै-जाइत जिनगी बीति जेतह। मुदा जिनगी त से नहि थिक? जिनगी त ओ थिक- जना बसन्त ऋृतु अबिते गाछ-विरीछ नव कलश ल बढै़त अछि, तहिना। मनुक्खो़क गति अछि। जिनगीक गतिये मनुक्खत केँ ब्रह्‌माण्डिक गति से मिला क' ल चलैत। अज्ञानक चलैत मनुक्खद, एहि गति क' नहि बुझि, छुटि जाइत अछि। छुटैक कारण होइत व्याक्तििगत, परिवारिक आ सामाजिक जिनगी। जे सदिखन आगूक गतिक पाछु महे धकेलति अछि। जहि स मनुख समयक संग नहि चलि पबैत। मुदा तइ स की? बाधा कतबो पैघ किऐक ने हुअए मुदा मनुखो केँ साहस कम नहि करक चाही। सदिखन सब अंग क' चौकन्नाा क चलला से सब बाधा टपि सकैत अछि। पुतोहूए जनि केँ देखुन। भरि दिन भनसा आ धिये-पूतेक आय-पाय मे लगल रहैत छथुन। हमरो जे शक लगै अए से करिते छी। घर त कहुना चलिये जाइ छह। मुदा परिवार त समाजक एक अंग छी। परिवारेक समूह ने समाज छी। तेँ समाजक संग चलैक लेल परिवार क' समाजक रास्ताा धड़ै पड़त। से नहि भ' रहल छह। जना देखैत छहक जे रेलगाड़ी मे ढेरो पहिया आ कोठरी होइ छै। जे आगू-पाछू जोड़ल रहै छै। मुदा चलै काल सब संगे चलै छै। तहिना मनुक्खोम छै।''
सुमित्राक बात सुनि बचेलाल जिज्ञासा स पूछल- ‘‘अपन परिवारक की गति अछि?''
मुस्कुरराइत सुमित्रा कहै लागलि- ‘‘अपन परिवार ठमकल अछि। ओना बुझि पड़ैत हेतह जे आगू मुहे जा रहल छी, मुदा नहि। तोरा बुझि पड़ैत हेतह जे शिझक छी, नीक नोकरी करै छी। नीक दरमहो पबै छी। हँ, ई बात जरुर अछि। मुदा अपनो सोचहक जे जखन हम पढ़ल छी, बुद्धियार छी। तखन हमरा बुद्धिक काज कैक गोटे क' होइ छै। जे क्यो नहिये पढ़ल अछि ओहो त अपन काज, अपन परिवार चलबिते अछि। कने नीक कि कने अधला सब त जीवे करैत अछि। आइ तोरा नोकरी भ गेलह, तेँ ने, जँ नोकरी नइ होइतह तखन त तोहू वहिना जीवितह जहिना बिन पढ़ल-लिखल जीवैत अछि। एहिना पुतोहू जनि केँ देखुन, जना घर स कोनो मतलबे नहि अछि। हमरो बिआह-दुरागमन भेल छल। हमहूँ कनियाँ छलौ मुदा आइ जे घर मे देखै छिअह तना त नहि छल। जखन हम नैहर स ऐठाम एलहुँ तखन भरल-पूरल घर छल। सासु-ससुर जीविते रहथि। जखन चारि दिनक बाद चुल्हि छूलौ, तहिया स सासु कहियो चुल्हिा दिशि नहि तकलनि। ने कोठी से चाउर निकालि क' देथि आ ने किछु कहथि। जेहने परिवार नैहरक छल तेहने एतुक्कोर छल। जे सब काज नैहर मे करै छलौ सैह सब काज अहूठाम छल। अपन घर बुझि एकटा अन्नै आ कि कोनो वस्तुक दुइर नहि हुअए दैत छलिऐक। अखन देखै छिअह जे पाँचे गोटेक परिवार रहनहु सभ सब स सटल नहि,हटल चलि रहलह हेन। सटि क' चलैक अर्थ होइत सभ सब काज मे जुटल रही। इ त नहि कि क्यो काजक पाछू तबाह छी आ क्योक बैसले छी। परिवारक सभकेँ अपन सीमा बुझ चलक चाही, से नहि छह। हम खेलहुँ कि नहि, तोँ खेलह कि नहि। भनसिया लेल धन्यप सन। की खायव, कोन वस्तु। शरीरक लेल हितकर हैत कोन अहितकर, से सब बुझैक कोनो मतलवे नहि। जे खाई मे चसगर लागत, भले ही ओ अहितकरेे किऐक ने हुअए, वैह खायब। जहि स घर मे बीमारी लधले रहै छह। जहिना सुरुजक किरिण मे देखै छहक जे अनेको दिशा मे चलैत तहिना परिवारोक काज सब दिशा क' जोड़ैत अछि, से नहि भ' रहल छह।''
बिचहि मे बचेलाल माएकेँ पूछलक- ‘‘माए! नीक-नाहाँति तोहर बात नइ बुझि रहलौ हेन?''
बचेलालक बात क' तारतम्यक करैत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘बच्चाब, देखहक जहिना गाम मे किछु परिवार आगू मुहे ससरि रहल अछि त किछु परिवार पाछू मुहे। किछु परिवार ठमकल अछि। जहि स गाम आगूू मुहे नहि बढ़ि रहल अछि। तहिना परिवारो मे होइत। परिवारो मे किछु गोटे आगू बढ़ैक चेष्टाम करैत त किछु(आलस अज्ञान आदि क चलैत) पाछू मुहे ससरैत। किछु गोटे अदहा-छिदहा मे रहैत। तेँ परिवार केँ जहि गति मे चलक चाही, से नहि भ' रहल अछि। ततवे नहि इ रोग मनुक्खदक भीतरो मे अछि। किछु लोक अपनाकेँ समय स जोड़ि क' चलै चाहैत त किछु समयक गति नहि बुझि, पाछूऐ मुहे चलैत। इ बात जाबे नीक जेँका नहि बुझबहक ताबे ने मन मे चैन हेतह आ ने आगू मुहे परिवार बढ़तह।''
माइक बात स बचेलालक मन घोर-मट्ठा भ गेल। की नीक, की अधला से बुझबे ने करैत। माथ कुरिअबैत बचेलाल माए केँ कहलक- ‘‘माए! जखन मन असथिर हैत तखन बुझा-बुझा कहिऐं। एक बेरे नइ बुझब, दू बेरे बुझैक कोशिश करब। दू बेरे नइ बुझब तीन बेरे कोशिश करब। मुदा बिना बुझने त काज नहि चलत।''
बचेलालक बात सुनि मुस्कुूराइत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘बच्चाह जखन तोहर पिता जीविते रहथुन तखन घर मे पाथरक बटिखारा छल। ओहि स जोखै-तौलै छलहुँ। एक दिन अपने(पति) आबि कहलनि जे आब लोहाक पक्की सेर, अढ़ैया पसेरी सब आइल। हम पूछलिएनि जे पथरक जे सेर, अढ़ैया अछि तकरा फेकि देबै? ओ(पति) कहलनि-फेकबै किऐक? लोहा सेर क' पथरक सेर स भजारि लेब। बटिखारा कम-बेसी हैत, सैह ने हैत, ओकरा अपन बटिखारा हिसाब स मानि लेबै। अओर की हेतै। बौआ अखन तोरो मन खनहन नइ छह, जा तोहू अपन काज देखह। हमरो बहुत काज अछि। जखन मन खनहन हेतह तखन आरो गप्पछ करब।''
अनोन-बिसनोन मने बचेलाल कपड़ा खींचै विदा भेल। आंगन जा बाल्टीे-लोटा,कपड़ा आ साबुन नेने कल पर पहुँचल। कपड़ा साबुन के कात मे रखि पहिने कलक चबूतरा साफ केलक। बाल्टीट मे पानि भरि सब कपड़ा क' बोइर देलक। एकाएकी कपड़ा निकालि दुनू पीठ साबुन लगा-लगा, बगल मे रखैत। जखन सब कपड़ा मे साबुन लगाओल भे गेलै तखन पहिलुका सावुन लगौलहा कपड़ा निकालि खींचै लगल। सुमित्रा खन्ती ल बाड़ी ओल उखाडै़ विदा भेलि। बाड़ी मे पतिआनी लगा ओल रोपने रहथि। तीन सलिया ओल। केंकटा गाछ फुला गेल। बाड़ी मे सुमित्रा हियासै लागलि जे कोन गाछ खुनब। सब गाछ डग-डग करैत। पतिआनीक बीच मे एकटा गाछक अदहा पत्ता पिरौंछ भ गेल। पात क' पीअर देखि सुमित्रा ओइह गाछ खुनैक विचार केलनि। ओल कटि नहि जाय तेँ फइल से खुनव शुरु केलनि। सात-आठ किलोक हैदरावादी ओल। टोंटी एकोटा नहि। टोंटी नहि देखि सुमित्रा मने-मन सोचै लगली जे टोंटी रहैत त रोपियो दैतिऐक मुदा से नहि भेल। ओलक माटि झाड़ि गाछ के टुकड़ी-टुकड़ी काटि खधिये मे द उपर स माटि भरि देलखिन। सुमित्रा चाहथि जे ओलो आ खन्तिेओ ऐके बेर नेने जायब मुदा से गरे ने लगनि। दुनू हाथ स' ओल उठा एक हाथ के ल दोसर हाथ से खन्तीऐ लिअए लगथि कि ओल गुड़कि क' निच्चास मे गिर पड़नि। कैक बेर कोशिश केलनि मुदा नहिये भेलनि। तखन हारि क' पहिने दुनू हाथे ओल उठा कल लग राखि, खन्तीक आनै गेली। खन्तिखओ मे माटि लगल आ ओलो मे। तेँ दुनू क' नीक-नाहाँति घुअए पड़त। माए क' ठाढ़ देखि बचेलाल हाँइ-हाँइ कपड़ा पखाड़ै लगल। कपड़ा ल बचेलाल चार पर पसरै गेल। सुमित्रा ओल के कलक निच्चा मे रखि कल चलबै लगली। गर उनटा-उनटा दश-पनरह बेर कल चलौलनि। मुदा तइयो सिरक दोग-दाग मे माटि रहबे केलै। तखन ओल क घुसुका बाल्टील मे पानि भरि लोटा स ओलो, खन्तिाओ आ अपनो हाथ-पाएर धोलनि। आंगन आबि सुमित्रा पुतोहू केँ कहलखिन- ‘‘आइ रवियो छी, बच्चोा गामे पर रहता तेँ ओलक बड़ी बनाउ। बड़ निम्म न ओल अछि तेँ दू चक्काओ तड़ियो लेब।''
सुमित्राक बात सुनि मुह-हाथ चमकबैत पुुतोहू उत्तर देलखिन- ‘‘हिनका हाथ मे सरर पड़ल छनि तेँ कब-कब नइ लगै छनि। हमरा त ओल देखिये के देह-हाथ चुलचुला लगै अए। अपने जे मन फुड़ैन से बनबथु। हम चुल्हिि पजारि ताबे भात रन्हैब छी। सभकेँ नवका चीज नीक लगै छै हिनका पुरने नीक लगै छनि।''
पुतोहूक बात सुनि सुमित्रा मने-मन सोचै लगली जे जाबाव दिअनि आ कि नहि?समय पर जँ जबाव नहि देब त दबब हैत। मगर जबाव देनहु त झगड़े हैत। अपना जे इच्छाज अछि वैह करब मुदा बाता-बाती से त काजे रुकत। जत्त्ो बनबै मे देरी हैत तते भानसो मे अबेर हैत। मुदा सुमित्राक मन जबाव देइ ले तन-फन करैत। ओल क'बीचो-बीच काटि, चारि फाँक करै लगली ओलक सुगंध आ रंग देखि सुमित्रा जबाव देलखिन- ‘‘कनियाँ, जे चीज सब दिन नीक लागल ओ आइ अधला कोना भ' जायत?जाबे जीबै छी ताबे त खेबे करब। तेाँ जकरा अधला बुझै छहक ओ अधला नहि छी। दुनू गोटेक नजरि मे अन्तनर छह। जे अन्तिर नी-अधला मे बदलि गेल छह। दुनू गोटेक नजरि, एहि दुआरे दू रंग भ गेल छह जे दुनू गोटेक जिनगी दू रंग बीतल। तेाँ नोकरिहाराक परिवारक छह हम गिरहत परिवारक। तोहर बाप नगद-नरायण कमाई छथुन जहि स हाट-बजार से समान कीनि आनि खइ छेलह। हम त सामान उपजवै वला परिवार मे रहलहुँ। कोन वस्तु कोना रोपल जाइ छै, कोना ओकर सेवा करै पड़ैत छै, से सब वुझै छियै। तेँ हमर नीक आ तोहर नीक मे यैह अन्तकर छह।''
दुनू सासु-पुतोहूक गप-सप बचेलालो दरवज्जाक पर स सुनैत। बीच आंगन मे बैसि सुमित्रा ओल बनवति रहथि। घर मे पुतोहू भन-भना क' बजैत रहति, जे सुमित्रा नीक जेँका सुनवो ने करैत। बच्चार नेने मखनी सेहो आइलि। मखनी के कोरा मे बच्चाक देखि सुमित्रा दबारैत कहलखिन- ‘‘मासे दिनक बच्चा् के अंगना से किऐक निकाललह? जँ रस्ताक-पेड़ा मे हबा-बसात लागि जइतै तब?''
हँसैत मखनी उत्तर देलकनि- ‘‘दीदी! अइ आंगन के अनकर आंगैन कहै छथिन। हमर नइ छी? अपनो अंगना अवै मे संकोच हैत।''
मखनीक बात सुनि सुमित्रा मने-मन अपसोच करैत कहलखिन- ‘‘अनकर अंगना बुझि नइ करलियह। अखन बच्चा छोट छह तेँ बचा केँ राखै पड़तह। बेटा धन छी। घर से त निकलबे करत। पुतोहू केँ सोर पाड़ि कहलखिन- ‘‘पहिले-पहिल दिन बच्चाछ अंगना आयल। तेल-उबटन दहक। अगर उबटन घर मे नइ हुअअ ते तेले टा नेने आवह। ताबे चुल्हिह मिझा दहक। पहिने बच्चाच के जाँति-पीचि दहक।''
घर स रुमा तेल आ विछान नेने आबि अंगने मे विछौलक। तेलक माली लग मे रखि बच्चाब केँ कोरा मे लेलक। दुनू पाएर पसारि बच्चा केँ जाँध पर सुतौलक। बच्चातक मुह देखि रुमा मने-मन बाजलि- ‘‘मखनी केहेन भाग्यपशाली अछि जे भगवान ऐहन सुन्नुर बच्चा‍ देलखिन।'' उनटा-पुनटा क' बच्चान देखलक। रुमाक मन मे ऐलै जे कोना लोक बजै अए जे फल्लाँवक कपार खराब छैक आ फल्लांलक नीक? जँ कपार अधला रहितैक त बेटी होइतै। जकर कपार नीक रहै छै, ओकरा खाली बेटे होइतै। भगवानक नजरि मे सब बराबरि अछि। सभ त हुनके सनतान छी। कोन पापी बाप ऐहेन हैत जे अपना सन्ताेन केँ दूजा-भाव करत? अनेरे लोक, कपार गढ़ि, भगवान केँ दोख लगबै छनि।
सुमित्रा हाथ स ओलो आ कत्तो ल मखनी ओल बनबै लगलीह। ओल देखि मखनी सुमित्रा केँ कहलखिन- ‘‘ओल अंडाइल रोहू(माछ) जेँका बुझि पड़ैत अछि। दीदी‘हाथ धो लथु, हम बना लै छी।''
सुमित्रा हाथ धोय दुनू हाथ मे करु तेल लगा अपना पाएर मे हसोथि लेलनि। हाथक कबकबी मेटा गेलनि।ं विछान पर जा पुतोहू केँ कहलखिन- ‘‘कनि०ााँ, बच्चाा लाउ। हम जाँति दइ छियै। अहाँ चुल्हि लग जाउ।' सुमित्रा कोरा मे बच्चाग के द' रुमा चुल्हिब पजारै गेलि। सुमित्रा बच्चछ केँ जाँध पर सुतवैत मखनी केँ कहलक- ‘‘कनियाँ,बीचला चक्काम ओरिया क' काटब। ओ तड़ब। कतका सब उसनि क' बरी बनाएब।''
मुस्कीप दैत मखनी कहलकनि- ‘‘तेहेन सुन्नार ओल छनि दीदी जे चुल्हिक पर चढ़िते गल-बला जेतनि। खेबो मे तेहने सुअदगर लगतनि। अइ आगू मे दुदहो-दहीक कोनो मोल नहि।''
सुमित्रा बच्चा केँ जतबो करैत आ घुनघुना क' गेबो करैत-
‘कौने बाबा हरबा जोताओल,
मेथिया उपजाओल हे।
कौने बाबी पीसल कसाय
ओ जे बच्चाप केँ उङारब हे।
बड़का बाबा हरबा जोताओल
ओ जे सरसो उपजाओल हे।
ऐहब बाबी तेल पेरौलीह
बच्चाा केँ उङारथि हे।
जाबे मखनी ओल बनौलक ताबे सुमित्रो बच्चा क' जाँति-पीचि चानि मे काजरक टिक्काा लगा निचेन भेलीह। मखनीक कोरा मे बच्चात द सुमित्रा एक-डेढ़ सेर चाउर आ तीमन जोकर ओल द देलखिन।
(अगिला अंकमे)

कुमार मनोज कश्यप
जन्म मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। बाल्य काले सँ लेखन मे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवानी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित।

पहिल चिट्‌ठी

परमादरणीय बाबूजी,

ओना तऽ बहुत दिन सँ बात मोन मे घुरियाईत छल ; मुदा हिम्मत नहिं जुटा पाबि रहल छलहुँ जे कोना आहाँक सोझाँ मुँहा-मुँहीं कहि सकी । आई नहिं जानि एतेक हिम्मत हमरा मे कतऽ सँ आबि गेल जे अपन भावना व्यत्तᆬ करबा लेल कागज-कलम लऽ कऽ बैसी गेलहुँ ।

सोझा-सोझी अपन भावना व्यत्तᆬ कऽ सकी ई हिम्मत तऽ हमरा मे एखनो नहिं आछ । तैं गामो-घर मे सभ हमरा मुँहदुब्बरि बुझैत छल । हमर ई कायरता हमरा आहाँ सभ सँ भेटल संस्कंारक थिक वा हमर अपने भीतरक कमजोरी से तऽ नहिं कहि ; मुदा हम एतबा धरि जनैत छी नारी जातिये के लोक सर्वसहा, अवला, भोग्या ऩहिं जानि की की सर्वनाम आ विशेषण दऽ कऽ मुँहदुब्बरि बनल रहबा लेल विवश कऽ दैत छैक । हम मानैत छी जे डिबिया लऽ कऽ तकला पर बहुत एहन मैथिलानिये भेटि जेतीह जे अपन आधकार छिनि कऽ पाबि लैत छथि़ मुदा एहन तऽ किंछु मुट्‌ठीये भरि छथि ने । हम तऽ अनुभव केलहुँ आछ जे नारी के सर्वसहा भऽ कऽ जीबाक लेल जिम्मेदार तऽ नारिये थिकदादी, पिसी, नानी,माय, काकी रूप मे ।

हमरा एखनो बड़ नीक जकाँ मोन आछ जे जखन माय के चारिमो बेटिये भेलैक तऽ आँगन मे जनि-जाति कोना कन्ना-रोहट पसारि देने रहय ; जेना कोनो बज्रपात वा अपशवुᆬन भऽ गेल हो। एहन सुन्नरि़साक्षात भगवती सन बच्चा के नाम राखल गेलैक - 'मनतोड़िया' । बाबूजी साईत आहाँ एहि पर विचार नहिं केने होयबैक जे पैघ भेला पर बेचारी के अपन नाम लऽ कऽ कतेक ग्लानि के सामना करऽ पड़लैकसंकोचे ओ अपन नाम ककरो नहिं कहैक । मनतोड़िया नाम जे सुनैक से कोनादन मुँह बना लैक । संकोचे ओ संक्षेप मे अपन नाम बतबैत छैक मिस एम0 चौधरी । आहाँ अंदाज लगा सकैत छी कतेक सिद्दति भोगऽ पड़ल हेतैक बेचारी के ! आहाँ तऽ पढ़ल-लिखल बाप छलियैकआहाँ तऽ कोनो सुन्नर, आधुनिक नाम राखि दितियैक।

विक्वूᆬ के जनम के बाद पूरा परिवार के ध्यान कोना ओकरे दिस चलि गेलैक से तऽ अहुँ जनिते छी़ओकर एक-एक जरूरत के सभ ख्याल राखय मुदा हमरा सभ बहीन जेना टुअर सन भऽ गेलहुँअपडेरल । मानलहुँ जे विक्वूᆬ नेना छल आ नेना के सभ प्यार-दुलाड़ करैत छैक ; मुदा हमहुँ चारू बहीन तऽ कोनो सयान नहिये भऽ गेल छलहुँ। हमरो सभ के वात्स्ल्य आ स्नेह के भुख छल़़से तऽ केयो नहिं बुझलक ।

ई देखि कऽ हमर सभक मोन किं नहिं कचोटैत छल जे माय संदूक मे गुड़, चीनी, मेवा आ आनो नीक-निवुᆬत वस्तु सभ बंद कऽ कऽ रखैत छलीह आ चोरा कऽ विक्वूᆬ के खुअबैत छलीह । बाल मोने हम सभ बहीन मँगियै तऽ झझकारि लिअय़़क़ंखनो- कखनो बेसी लटारहम केला पर धेले चटकन सेहो पड़य। विक्वूᆬ कतबो बदमाशी करय तऽ कोनो बात नहिं; हमरा सभ बिनु गलतियो के मारि खाई़़मायक चटकन तेहन सक्कंत जे ओनाहों केयो किंछु करबाक सोचितो नहिं छल । आहाँ के तऽ बाबूजी साईत मोन होयत जे जखन विक्वूᆬ खेल-खेल मे हथौड़ी उठा कऽ हमर कपाड़ फोड़ि देने रहय तऽ माय उनटे हमरे ठुनकिंयबैत कहने रहय--'ईह ! लोथबी नहिंतन ! देखलही जे हथौड़ी उठेने मारऽ अबैत छौ तऽ पड़ायलो नहिं भेलौ '। ओ तऽ आहाँ ओहि काल मे रहि जे हमरा कोरा मे उठा कऽ शोणित पोछने रही आ माय पर तमसायल रही -' एक तऽ विक्वूᆬ बेचारी के कपाड़ फोड़ि देलकै आ उनटे आहाँ एकरे डँटैत छियै? '

बाबूजी हमरा सभ बहीनक एकेटा सम्बल अहीं टा रहि। मुदा धिरे-धिरे हमरा बुझाय लागल जे अहुँ के झुकाव विक्वूᆬये दिस बेसी आछ । नहिं तऽ विक्वूᆬ के सिनेमा-सर्कस, दोस्त-महीम पर उड़बै लेल एक्के बेर मे पाई निकालि कऽ दऽ दियै आ हमरा सभ के किंताबो-कॉपी लेल खेखनय पड़य । हम मात्र दू टा सलवार-सूट सँ काज चलाबी आ विक्वूᆬ लग नव-नव पैᆬशन के कपड़ाक अम्बार । सत्य पुछु तऽ बाबूजी एहि सभ कारणें हम अपन सहोदर छोट भाय के अपन प््रातिद्वंद्वी बुझऽ लगलहुँ हमरा एक-एक टा छोट-छीन गप्प तक कचोटऽ लागल मोन मे विद्रोहक भावना आबय लागल । मोनक पीड़ा मोने मे घुमरैत रहल व्यत्तᆬ करबाक तऽ हिम्मते नहिं छल ।

आहाँ कतेक प््रासन्न होईत छलहुँ बाबूजी आ कतेक गर्व होईत छल जखन हम स्वूᆬल मे गणित आ भौतिकी मे क्लासक हाईयेस्ट स्कंोरर होईत छलहुँ जे भेटैत छल सभ के आहाँ ई खुशखबरी सुना अबैत छलहुँ । हमरा कोरा मे उठा कऽ चुम्मा लैत कहैत छलहुँ जे हमर बेटी एक दिन हमर नाम करत । हमहुँ आगू जा कऽ ईंजिनियर बनबाक सपना बुनि लेने रही़उठैत-बैसैत अपना के ईंजिनियर के रूप मे देखि । एहि लेल जी-जान सँ परीक्षा के तैयारी मे जुटि गेल रही। मुदा बाबूजी नहिं जानि कोना अहाँ के मति फीरि गेल जे आहाँ हमर इंट्रेंसक फार्म भरबा मे ई कहि कऽ मना कऽ देने रही --- 'लड़की सभ लेल ई सभ ठीक नहिं होईत छैक । बी0एससी0 कऽ ले ओतबे बहुत छौ । ' पेᆬर आहाँ बड़की काकी दिस देखि कऽ बजने रही--' जतेक आगू जायत ओतेक पैघ ओहदावला लड़को तऽ भेटक चाही ! आ पेᆬर ओहन वर-घर लेल डाँड़ो तऽ सक्कंत रहक चाही ! ' बड़की काकीक संगे ओसारा पर बैसल सभ केयो स्वीकृति सूचक मुड़ी डोलओने छल । हमरा तऽ लागल छल जेना केयो हमरा गाछ पर चढ़ा कऽ छौ मारि देने हो़ केयो हमरा कल्पना-वुᆬसुम के पैर सँ मीड़ि कऽ नेस्त-नाबूत कऽ देने हो। बाबूजी साईत आहाँ के ई नहिं बुझल होयत जे आहाँक ओहि निर्णय सँ हमरा करेजा पर तखन की बीतल होयत ? आहाँ के मोने होयत जे एक बेर जखन अपन लहलहाईत गहुँमक सभ टा खेत साँढ़ भरिये राति मे निट्‌ठाह कऽ चरि गेल छल तऽ आहाँ कतेक दिन तक शोके व्यावुᆬल रहलहुँ । मुदा हमर ई शोक साँढ़ चरल जजाति सँ बेसी पैघ छल बाबूजी । फसील तऽ आगला बेर पेᆬर भऽ जेतैक मुदा हमर एतेक दिन सँ देखल सपना के महल जे एके झोंक मे बालूक देवाल जकाँ ढ़हि गेलैक तकर क्षतिपूर्ति की कहियो सम्भव छलैक? हम एसगर मे भरि-भरि राति कनैत रहैत छलहुँ । बाद मे कहुना-कहुना मोन के दिलासा दियेलहुँ -- ईंजिनियरिंग के पढ़ाई मे बड़ खर्चा अबैत छै । भऽ सकय जे आहाँ एहि डरे पाछु हटि गेल होई ।

आहाँ खेत बेचि कऽ डोनेशन दऽ कऽ विक्वूᆬ के प््रााईवेट डेंटल कॉलेज मे एडमीशन करेलहुँ । साईत एहि द्वारे जे विक्वूᆬ बेटा आछ़़माय -बाप के बुढ़ारी मे परवरिश करत । बेटी तऽ आनक घर चलि जायत़़ यैह ने ? आहाँक हाथें एहन दुराव सत्य पुछी तऽ बाबूजी हमरा भीतर सँ तोड़ि कऽ राखि देलकहमरा सोचय लेल विवश कऽ देलक जे एके माय-बापक संतान बेटी-बेटा के लेल भिन्न दृष्टिकोण किंयैक? किंयैक माय-बाप एखनहुँ सोचैत छथि जे बेटी लेल हुनकर दायित्व ओकर विवाह करा देब बंद तक सीमित छनि ; मुदा बेटा के पढ़ा-लिखा कऽ योग्य बनायब । की बेटी बेटा जकाँ माय-बापक देखभाल नहिं कऽ सकैछ वा करैछ ? तखन बेटा आ बेटी मे भावनाक एतेक पैघ अंतर किंयैक? खास कऽ आहाँक हाथें तऽ बाबूजी हम कहियो कल्पनो ने केने रही । हम आहाँ के प््रागतिवादी बुझैत रही से किं सत्ये पुᆬसि छल ? एतेक पढ़ियो-लिख कऽ बाबूजी साईत आहाँ सोचबाक प््रायास नहिं केलियै जे आजुक एहन पड़ाईत जिनगी मे एकटा गृहणी मात्र बनि कऽ जीवन काटब कतेक दुष्कंर छैकपति भोरे ऑफीस जेता तऽ मुन्हारि साँझ सँ पहिने नहिं घुमताह़़धिया-पुता स्वूᆬल, कॉलेज,संगी-साथी मे बाझल रहत । एसकर घर के भीतर बंद एक एक पल कोना बितैत छै से हम कोना वर्णन करू ?

हमरा क्षमा करब बाबूजी यदि भावनावश हमरा सँ किंछु अनर्गल लिखा गेल हो । आई जखन भावनाक बान्ह टूटल तऽ अपना संगे सभ दमित भड़ास के बहओने चल गेल । हमर ई आशय कथमपि नहिं जे हम अपना उपर बीतल के उकेरि । मा भगवती सँ हम एतबे मँगैत छियैन जे हमर समाज के सद्‌बुद्धि देथुन जे सभ संतान के एके नजरि सँ ताकय । एहि चिट्‌ठी के लिखबाक हिम्मत तऽ हम आई कऽ लेलहुँ ; मुदा नहिं जानि एकरा डाक सँ पठेबाक हिम्मत कऽ सकब किं नहिं ?
आहंक।

हेमचन्द्र झा
कथा

कुंठा

हेमचन्द्र झा

नौ बजे राति मे ड्‌यूटी सँ वापस भेले छल सुरेश कि पत्नी ओकरा समक्ष गाम सँ आयल चिट्‌ठी राखि देलखिन। यद्यपि सुरेश जिज्ञासा कयलक जे एहि मे की प्रमुख बात लिखल छैक से कहू, परन्तुक पत्नी स्व यं पढ़ि लेबाक लेल कहैत किचेन मे चलि गेलीह।

सुरेश गाम सँ आयल चिट्‌ठी के आद्योपांत पढ़लक आ एकटा गंभीर श्वाास लैत ओकरा टेबुल पर राखि देलक। तखनहि पत्नी एक गिलास पानि आ चाह ल' क'पहॅुंचि गेलीह। सुरेशक गंभीर मुखाकृति पर अबैत-जाईत विभिन्नप रेखाक अध्यलयन करैत पत्नीत गप्पा शुरू केलीह - ‘‘की सोचलियै एहि पर''

‘‘एहि मे सोचबा जोग किछु नै छैक, वरन्‌ ई तँ एक तरहक आदेश छैक, जेकर पालन करबाक लेल हमरा कहल गेल अछि'' - सुरेश बाजल।

‘‘कतय सँ अनबैक एतेक टाका?'' पत्नी् जिज्ञासा केलनि।

पत्नी क एहि प्रश्नटक तत्का ल कोनो जबाव नहि द' सकल सुरेश । समस्या गंभीर छलैक। एकमात्र बेटाक उपनयन सामने छलैक। दिल्लीि सन महानगर मे मात्र4-5 हजार टाकाक नोकरी करैत अपन परिवार के संगे रखैत सुरेश हरदम ‘‘हैंड टू माउथ' रहैत छल। 4-5 हजार टाका मे कोना बचतैक आ ताहि पर सँ उपनयनक वास्तेस खर्चाक एकटा पैघ आदेश गाम सँ। सेहो छोट-मोट नहि 50-60 हजार टाकाक।

चिट्‌ठी लिखने छलाह सुरेशक जेठ भाय दिनेश । दिनेश गामे मे रहथिन। हुनको दू बेटाक उपनयन रहनि। ओ झंझारपुर मे वोकालति करेैत रहथि आ गाम पर किछु ट्‌यूशन। खेती-पथारीक जिम्माा सेहो हुनके पर। माता-पिता वृद्ध रहथिन तें एहि काज मे ओ सभ कोनो आर्थिक मददि करबा में असमर्थ रहथिन। छोट भाय महेश, जिनका एकटा बरूआ रहनि, ग्वा्लियर मे रहथि। ओ फुट्‌टे अपने समस्यान सँ ग्रस्त । गामक सर-समाज देखैत, अपन परिवारक हाड़ी-बिमारी देखैत आ गाम-गामक नोत पुराई करैत दिनेशक अनुसार हुनका एको पाई नहि बचैत छनि आ उपनयनक सभ छाड़-भार सुरेश पर रहतैक, सएह पत्र आयल छल गाम सँ। तथापि पत्र मे ईहो लिखल छल जे माधव भाय कोन रूपें पछिला साल अपन बेटाक उपनयन कयलनि अछि आ एहने उपनयन होमक चाही।

घंटा-डेढ़ घंटा एहि विकट समास्याप पर विचार करैत रहल सुरेश अपन पत्नीग मीनाक संग, तथापि किछु निष्क र्ष नहि निकालि सकल। अंततः पुनः फोन पर जेठ आ छोट भाय सँ काल्हिह गप्प‍ करबाक नियार करैत दुनू प्राणी सूति रहल। परन्तुअ निन्नप कहाँ एतैक? दुनू प्राणी करौट फेरैत परात केलक। भिनसरे टेलीफोन बूथ पर पहॅुंचल। गाम आ ग्वांलियर फोन मिलेलक। परन्तुै सभटा व्यूर्थ। दुनू भाय हाथ उठा देलखिन। कियो ई सोचय नहि चाहलखिन जे एतेक पाई ई अनतैक कतय सॅ?

जे से समय पर अपन ड्‌यूटी पर पहॅुंचल सुरेश। ड्‌यूटी की छलेैक। एकटा थोक विक्रेताक ओतय काज करय। ‘‘ए टू जेड'' सभटा काज करय पड़ैक। ओना कहबाक लेल रहय तँ काउन्ट र पर, परन्तुा आवश्यरकता पड़ला पर लोहा सेहो उठबय पड़ैक आ आनो कयकटा काज करय पड़ैक। काज करैत चिंताक रेखा स्प‍ष्टल देखाय पड़ैक ओकरा माथ पर।
ओकरा किछु अनमनस्क सन देखि मालिक जिज्ञासा केलकैक। ओ टारय चाहल। तथापि मालिक नीक लोक रहैक। खोधि-खोधि क' पूछय लगलैक आ सुरेश के सभटा राम कहानी कहय पड़लैक। तथापि पाईवला गप्पो ओ नहि कहि पओलक। मालिक खर्चाक संबंध मे जिज्ञासा केलकैक तँ बाजल 50-60 हजार। एकबेर मालिको अचंभित भ' गेलैक आ एहि प्रस्तालव पर पुनः विचार करक अनुरोध केलकैक। तथापि सुरेश बाजल - ‘‘सर हमलोंगों को पूरी जिंदगी मे सिर्फ तीन काम करना है - बेटे का जनेऊ, लड़की की शादी और माँ-पिता का श्राद्ध। इससे ऊपर न हम कुछ कर सकते हैं और न ही सोच सकते हैं।''

सुरेशक उक्त बात सूनि कें मालिक थोड़े पसीझल। मालिक सुरेश के आश्वाैसन देलकैक जे तोरा जते रूपया चाही से ल' जो आ तों बाद मे धीरे-धीरे दरमाहा मे सँ हमरा कटा दिहें। सुरेश कें जेना कतहु सँ प्राण भेटलैक। तुरंत ओ हामी भरलक। साँझ मे हँसी-खुशी घर आयल आ अगिला दिन पुनः गाम आ ग्वाणलियर फोन कयलक जे समय पर उपनयन हेतैक आ अहाँ सभ अपन तैयारी मे लागि जाऊ।

उदोग सँ तीन-चारि दिन पहिने गाम पहॅुंचल सुरेश सभ के ल' क'। सभटा काज शुभ मुहुर्त मे सम्पान्नत होईत गेलैक आ रातिमक प्रात जेना निःश्वापस छोड़लक ओ। जे किछु ल' क' आयल छल लगभग सभटा खर्च भ' गेलैक। महेश 5000 पकड़ा के फराक भ' गेल। दिनेश गाम मे रहथि, सभटा कारबार अपना हाथ मे रखलनि। सुरेश खर्च करैत गेल, परन्तु खर्चक कोनो हिसाब नहि भेलैक। भार-दोर वाला आमदनी सेहो दिनेश रखलथि अपना पॉकेट मे आ निश्चिं्त भ' गेलाह।

काज सम्पपन्नि भेलाक बाद सुरेश वापस दिल्ली। आयल। आब समस्याम रहैक कर्जा सधेबाक। प्रथमतः कमरा-किचेन वाला घर छोड़ि सिर्फ एकटा कमरा वला घर लेलक ताकि मकान किराया मद मे बचैक। बच्चा सभ ठीक-ठाक स्कूफल पढ़ैत रहैक,ओकरा सभक नाम एकटा साधारण स्कूचल मे लिखेलक आ 5000 टाका दरमाहा मे सँ1000 कटेनाय शुरू केलक। कुला मिला कें दुर्दिनक शुरूआत भ' गेलैक आ सभ तरहें सुरेश कुंठित भ' गेल।

एहि तरहक कुंठा सिर्फ सुरेशे के नहि छैक, वरन्‌ मिथिलांचलक एकटा सम्पूार्ण युवा पीढ़ी एहि सँ ग्रस्ते अछि। ई एहन पीढ़ी अछि जे गाम मे पढ़लक-लिखलक,ओतय पलल-बढ़ल आ रोजगारक वास्तेट दिल्लीू वा कोनो शहर आबि गेल। संघर्षक पथ पर अग्रसर होईत अपना लेल शहर मे रोजगार ताकि कनेक स्थिेर होईत अछि ई वर्ग कि सामने अबैत छैक गामक समस्याप। आई उपनयन, काल्हि बियाह, परसू मूड़न,चारिम दिन दुरागमन आदि। हर काज मे गाम गेनाई एकर विवशता छैक आ नोकरी करेैत अछि तँ खर्चो-पानि करय पड़ैत छैक। गामक लोकक सामान्या सोच छैक - शहर मे टाकीक कोन कमी। ताहू मे जँ कियो सरकारी नोकरी मे अछि तँ ओकर शामते छैक। सरकारी नोकरीक मतलब एम्हनर-ओम्ह रक आमदनी। शहर मे अहाँ की छी? कतय छी? कोना गुजर करैत छी? एहि सभ सँ कोनो लेना-देना नहि छैक गाम लोक कें। शहर मे छी, नोकरी करेैत छी, तँ पाईक कोन समस्यार। गाम वा सर-कुटुमक सभ काज में दियौक, माने स्व,यं बिका जाऊ।

एहि नववर्गक सभ सँ पैघ समस्या अछि जे ई वर्ग अधखिज्जूा अछि। आधा गामक अछि आधा शहरक। आ तें बेसी कुंठित अछि। कोनो काज वा संस्कापर ई गाम मे करताह। कारण ओतहि रहल छथि, नेनपन बितेने छथि। एकेबेर सभटा कें तोड़बाक सामर्थ्यर नहि छनि हिनका मे। परंतु एना कते दिन चलत? कते दिन धरि कुंठित रहत ई वर्ग। आई ने काल्हिा एहि सँ उबरबाक रस्ताे निकालहि पड़तैक एहि वर्ग कें। आवश्यीकता छैक सोच मे परिवर्तत करबाक। गामक समाज सहित एतय एकटा अलग समाजक निर्माण करबाक आ सभ तरहक संस्काैरक शुरूआत एही ठाम करबाक आ तखनहि मुक्तए होयत ई वर्ग कुंठा सँ। वरन्‌ जिनगी भर पिसाईत तरह ई वर्ग एहिना।
पंचानन मिश्र
मऊ वाजितपुर सँ विद्यापतिनगर परिवर्त्तन-यात्रा
मऊ वाजितपुर गाम समस्तीतपुर जिलाक अन्त-र्गत सुदूर दच्छिन भाग मे बसल अछि। एकर लगीचहि दक्खिनवरिया कोन पर कहियो गंगाक अविरल धार बहैत रहल होएत। आजुक तिथि मे नदीक छारनिटाए बाँचि गेल अछि। गंगाक इएह दियारा क्षेत्र मे इतिहास प्रसिद्ध गाम थिक चौथम। सामाजिक संरचनाक दृष्टिऐ सम्प्रगति राजपूत ओ यादव बहुल जाति चौथमक ‘माइनजन’ थिकाह मुदा अत्यऐन्तड पिछड़ल समुदाय मे परिगणित 261 अत्यिन्ता पिछड़ल समुदाय मे कैक जातिक अवस्थिति सेहो अछिये। अनुसूचित जाति क सदस्य हुँ सँ गाम निमुन्नछ नहिये अछि। तैयो चोथमक प्रसिद्धि आ ऐतिहासिक महत्त्व रहल अछि महाकवि विद्या-पतिके लऽ कए। किंवदन्तीत अछि जे महाकवि अपन निम्नर रचनाक उपरान्ते् गंगालाभक सद्इच्छाू व्यलक्तय कयने रहथि-
सपन देखल हम शिव सिंह भूप
बतीस बरख पर सामर रूप।
बहुत देखल हम गुरूजन प्राचीन
आब भेलहुँ हम आयु विहीन।
आओर लोकमान्य ताक जनतब कहैछ जे बिस्फी् सँ जीवनक महाप्रयाणक चलल महफा एही चौथमे गाम मे महाकविक आदेश सँ राखल गेल छल जतए गंगा अपन मुख्यर धार सँ बहराए हिनक नश्वलर शरीर के जल स्पकर्शक अवसर प्रदान करैत लगले अपन मुख्यद धार मे घुरि गेल छलीह। चमथाक निकटस्थी मऊ वाजिदपुर गाम आजुहुँ ओही स्थावन पर स्थित अछि।
पूर्व मध्य रेलवेक सोनपुर मण्ड लक हाजीपुर-बछवाड़ा स्टेीशनक पतियानी मे विद्यापतिनगर स्टे्शन सँ चौथम बड़ लगीचहि अछि। एहि स्थापन के पथ निर्माण विभाग चारि दिस सँ पक्कीह सड़क सँ जोड़ने अछि। एक सड़क बछवाड़ा मे जा कए राष्ट्रीरय उच्चन पथ सँ जा मिलैत अछि। दोसर मोहिउद्दीननगर होइत महनार-विदुपुर सँ हाजीपुर धरि गेल अछि। तेसर दलसिंहसराय-नरहन रोसड़ा-बहैड़ी क मार्ग सँ लहेरियासराय के जोड़ैत अछि आ चारिम सड़क सरायरंजन-समस्तीयपुर दुनू स्था न केँ छूबैत अछि।
मऊ वाजिदपुर गामक एक पैघ भू-खण्ड‍ आब विद्यापतिनगर नाम सँ बूझल जाइछ। तैयो बूढ़-पुरान लोक द्वारा विद्यापतिनगर के ‘वाजिदपुर बाबाधाम’ कहि सम्बो धन कएनिहारक संख्या़ तऽ अछिये। महाकविक समाधि भूमि होएबाक करणे बरोबर लोकक आबाजाही लागल रहैत अछि तँ विद्यापतिनगर केँ प्रखण्डएक स्तयर प्रदान कएल गेल अछि जे समस्ती पुर जिलान्तलर्गत थिक। एतय ‘विद्यापति भवन’ नामक सामुदाथिक भवन निर्मित अछि। बिहार सरकारक पर्यटन विभाग स्थाजनक ऐतिहासिकता मे देखैत‘पर्यटन सूचना’ केन्र्मक तऽ वनौने अछि मुदा सँ मात्र औपचारिकतावश।
राजस्वऔ ग्राम मऊ वाजिदपुर इएह विद्यापतिनगर क्षेत्र मे महाकविक समाधि भूमि अछि। एहि स्थाकनक विडम्बभना रहल अछि जे एकर इतिहासपरक अनुसंधान अन्वे्षण आ विवेचन करबाक प्रयोजन कहियो-कोनहुँ स्तनर पर नहि भऽ पाओल अछि। हम सभ बिस्फीन आ एखनुक विद्यापतिनगरक महा‍कविक कालजयी व्यसक्तित्वमक संदर्भ मे स्थापनीयताक दृष्टि सँ भौगोलिक परिवेशक संदर्भ मे तखनुक सामाजिक-सांस्कृ तिक परिदृश्य् मे अध्यदयन करब आवश्यओक नहि बूझि सकलहुँ अछि। ते विद्यापति सँ जुड़ल स्थाान ‘स्ट्रेतफोर्ड ओवेन आन’ नहि बनि सकल अछि। वर्ड्सवर्थ सँ सम्ब द्ध स्थादन पर कैक तथ्या‍त्माक आलेख अभाव हम सभ आइ धरि किंवदन्ती् लोककथन आ परम्पसरागत आस्थाह के स्वी्कार करैत रहलहुँ अछि जे तथ्यक निष्पक्षता पर प्रश्न ठाढ़ करैत रहल अछि, लोकमान्य्ताक विसंगाति के देखार करैत रहल अछि इतिहासक मापदण्ड् के आघार भूमि नहि प्रदान कऽ सकल अछि। ते आइ चौथम आ विद्यापतिनगर प्रसंग मे जतेक मुंह ततेक वाणी। विद्यापतिनगर मे महाकविक समाधि भूमि अछि। तकर समीपहिं पीपरक एवं अजोध गाछ एखनहुँ अछि। कहल जाइछ जे चमथा अएला उत्तर ओ एही गाछक नीचां विश्राम कएने रहथि। क्योख ईहो कहैछ जे इएह बुढ़वा पीपर हुनक समाधिस्थाक साक्ष्य अछि। जे-सँ। आजहुँ एहि गाछ के महाकवि सँ जुड़ल रहबाक आस्थाप अछि। ते लोक अपन संतान के संस्कासर वृद्धि लेल ताविज एहि मे बन्है त अछि।
जतय महाकवि समाधि‍स्थ भेल छलाह आ मां गंगा अपन अमोध सलिला मे हुनका जलमग्ना कऽ देने रहथिन ततय आइ एक विशाल प्रस्त्र मन्दिर अछि। लाल रंगक मंदिर एहि मंदिरक गर्भ गृह मे महाकवि विद्यापति ओ महादेवक प्रस्तपर प्रतिमा छेन्हि । दुनू प्रतिमा कारी पाथरक अछि। कहल जाइछ जे ई दुनू प्रतिमा स्वनत: स्फुाट अछि। एकरा महाकविक महाप्रयाणक दोसर दिन देखल गेल छल। महाकविक एहि विशाल मंदिरक पूर्व भाग मे उत्तर सँ दच्छिन भाग मे चारि छोट-छोट मंदिर अछि। मुख्यम मंदिरक वहिर्गमन द्वार सँ बहरएला उत्तर पार्वती मं‍दिर अछि। श्वेात प्रतिमा मे पार्वती ठाढ़ मुद्रा मे छथि। एकर वाम भाग मे श्वे त पाथरक महावीरजीक विशाल मूर्त्ति अछि। तकर बाद बसहा आ अंतिम काल भैरव क मूर्ति जे कारी पाथरक विचित्र ओ भयावह लगैछ। कला सौष्ठिव ओ धार्मिक अनुष्ठािनक दृष्टि सँ ई मंदिर एवं एतूका प्रतिमा सभ मूर्तिकला ओ वास्तुलकलाक अनुपम उदाहरण अछि। सामने एक नौलखा प्रवेश अछि जे गाम मलकलीपुरक सम्पतन्न लोक द्वारा बनाओल गेल अछि।
वर्त्तमान विद्यापति मंदिरक संग कैक सत्य। कथा संलग्ने अछि। कहल जाइछ जे महाकविक महाप्रयाणक बाद पाथरक दू प्रतिमा विद्यापति ओ शिवलिंग स्व त: स्फुनट भैल छल। एकर सटले पीपरक नव अंकुर कोपरि सेहो निकलि आयल छल। पछाति एतय धार्मिक कृत्या होमय लागल। तखन दुलारपुर महन्थक तखनुक मैनेजर दिस सँ टीनक छोट-छीन मंदिर बनबौलनि। बाद मे बछवाड़ाक कोनो व्यकक्ति ई मंदिर क निर्माण करौलनि। एहि समय दलसिंहसराय थानाक केवटा गामक भेषधारी चौधरी केँ पचहत्तरि वर्षक अवस्था् मे मंदिरक कृपा सँ पुत्र भेल छलन्हि।
एक बेर तखनुक नोर्थ बंगाल रेलवे एहि मंदिर ओ पीपर गाछ के ध्वपस्तर करबाक प्रयास कएने छल मुदा ओहि अंग्रेज अफसर के काल कवलित होमय पड़ल छल। मंदिरक निकट एक ब्रजगिरा टीला अछि। कहल जाइछ कोनो मुगलकालीन बादशाह महाकविक समाधिक पशास्ति सुनि क्रोधित भऽ गेल छलाह। मंदिरक प्रशस्ति गाथा सुनि कए एकरा ध्वंवस करवाक नीयत सँ ओ हजारक संख्या मे सैनिक पठौलनि। सैनिक सभ पड़ाव दए रहल छल कि भयंकर वर्षाक संग ठनका खसल आ सौनिक विजय नहि भऽ सकल।
एहि मन्दिरक परिसरमे शिवराति ओ वसन्त पंचमी क अवसर पर पैघ मेलाक आयोजन होइछ।
हमर जनैत विद्यापति सँ जुड़ल स्थानन के पर्यटन क दृष्टिऐ विकसित करबाक योजना आइ धरि राज्य सरकार किंवा मैथिली सेवी संस्थाथक स्त र पर नहि बनाओल गेल अछि। आइ ‘बुद्धिष्टल सर्किट’ क माध्य म सँ राज्य मे भगवान बुद्ध सँ जुड़ल प्रमुख स्था्न के चिन्हित कएल गेल अछि। ‘विद्यापति सर्किट’ मे बिस्फी् उगना स्थावन आ विद्यापति नगर के जोडि़ पर्यटनक संभावना ताकल जा सकैछ।


पंचानन मिश्र
विद्यापति जयन्ती (31 अक्टूपबर 09) क अवसर पर

मिथिलाक कतिआएल सिद्धपीठ
आसिनक शारदीय नवरात्र मिथिलाक सामाजिक, सांस्कृ्तिक, ऐतिहासिक अस्मिताक विशिष्टता के जोगाए रखने रहल अछि। अदौ मे ई प्रधानत: घरैया-पूजाक स्वटरूप ग्रहण कएने छल तहुखनहो एकरा मे एकात्मेकता, संस्कािरात्म्कता ओ अंश धरि सामाजिकता विद्यमान छल। आब त’ डेगे-डेग ई सार्वजनिक स्थाेपन भऽ दुर्गा मूर्त्ति पूजाक प्रवर्त्तक मिथिला भूपति राजा कंसनारायणक स्मृछति के जग जियार कए रहल अछि। अभिप्राय जे सम्पू र्ण मिथिलांचल मे मूर्त्ति स्थांपित कए किंवा प्रस्तगर प्रतिमाक पूजाक माघ्यजम सँ जीवन के क्रियाशील रखवाक परम्पजरा रहल अछि। राजेश्व्री (दोखर मधुबनी), गिरिजास्थाजन (फुलहट मधुबनी), भुवनेश्व‍री (भगवतीपुर मधुबनी), भद्र कालिका (कोइलख मधुबनी), चामुण्डाज स्था न (पचही मधुबनी), सोनामाइ (जनकपुर नेपाल), योगमित्रा (जनकपुर नेपाल), कालिका देवी (जनकपुर नेपाल), राजेश्वीरी देवी (जनकपुर नेपाल), छिन्नगमस्तिका (उजान आ मिर्जापुर दरभंगा), वनदुर्गा (खरड़क मधुबनी), सिंधेश्व‍री देवी (सरिसव मधुबनी), देवी स्थानन (अंधराठाती मधुबनी), कंकाली देवी (रामबागपैलेस दरभंगा), उग्रतारा (महिषी सहरसा), दुर्गास्थाीन (उच्चैठ मधुबनी), जयमंगला स्था)न (मुँगेर), पूरन देवी (पूर्णियाँ), काली स्थाेन (हाजमा चौराहा दरभंगा), कात्याधयणी स्थाान (वदलाघाट सहरसा), बासठि योगिनी (सहरसा) आदि (स्त्रोित कुरूक्षेत्रम् अन्तहर्मनक: गजेन्द्र ठाकुर) स्थायन पर आसिन आ अन्यरहुँ समयावधि मे भेल आयोजन भनहि प्रसिद्धि पओने रहल अछि मुदा अन्यरहुँ कैक स्था न जतय शताब्दीभयों सँ पूजाक आयोजन सेहो इतिहासक अंशहि बूझल जएबाक चाही। एहि संक्षिप्त आलेख मे मेन स्ट्री म सँ विलग किछु स्थाजनहिंक चर्च भेल अछि जकर स्था पत्याक महत्ता अछि, लोक परम्प रा अलग छवि बनौने रहल अछि, सांस्कृसतिक प्रतिमानक गढ़नि कैक रूप मे गढ़ल जाइत रहल अछि।
मधुबनी जिलाक फुलपरास अनुमंडलक न्योरर गाम सँ डेढ़ किलोमीटर उत्तर सखड़ा मे सखड़ेश्वइरी भगवतीक भव्यप मन्दिर अछि। ई मन्दिर धार्मिक, सांस्कृ तिक ओ सामाजिक एकताक जाग्रत प्रतीक थिक। एकर प्राचीनताक प्रसंग कहल जाइछ जे मिथिलाक कर्णाटवंशीय राजा नान्य्देव जखन शासनाच्युतत भऽ गेलाह तऽ अपन कुलदेवी कुर्जा भवानी सँ रक्षार्थ प्रार्थना कयलनि। मां कुर्जा स्वप्न मे हुनका आदेश देलीह जे प्रात: स्नाकन करैत काल नदी मे जे कोनहुँ वस्तुथ भेटय ओ उठा कए चोट्टे पड़ा जायब आओर जाहि स्थापन पर ई वस्तुु खसि पड़य ततहि अपन शासन स्थावपित करी। ताहि अनुसारेँ जनकपुर सँ सोलह माइल पश्चिम सिमरौनगढ़ मे कर्णाट वंशक राज्यप पुन: स्थाीपित भेल जे पांच खाढ़ी धरि शासक रहैत गेलाह अन्तिम शासक सक्रदेव सिंह एहि भगवती के यंत्रक सिंहासन पर मन्दिर बनाए स्थाापित कएलनि। 1934 ई. क भूकम्पक मे मूल मन्दिर त’ खसि पड़ल मुदा अलौकिक शक्तियुक्ते सिंहासन आजहुँ विद्यमान अछि। सखड़ेश्व री वा सक्रेश्ववरी भगवती राजा सक्रदेव सिंहक स्मृ ति मे नामित अछि।
मुजफ्फरपुर जिलाक मीनापुर प्रखण्डजक पश्चिम छोर पर गण्डृकी नदीक कतबइमे पानापुर गाम मे विख्यामत भष्मी देवीक मन्दिर अछि। भगवती भष्मीक मूर्त्ति एकहि पाथर सँ तराशि बनाओल गेल अछि जकर दिप्तीर आइयो मंद नहि भेल अछि। साइत मिथिलांचल मे इएह एक भगवती थिकीह जनिक सोझाँ पड़वा के पूजोपरान्तद मुक्तािकाश मे विचरण करबाक लेल छोडि देल जाइछ। एतूका हवन कुंड् सँ प्राप्त भभूत मे चर्म रोग सँ मुक्तिक विश्वाकस पाओल जाइछ।
पुरातात्विक दृष्टि सँ पूर्णत: उपेक्षित ऐतिहासिक - सांस्कृ तिक धरोहर के सुरक्षित रखने दरभंगा जिलाक मनीगाछी प्रखंडक मकरन्दाू-भंडारिसम गाम स्थित मां वाणेश्व री एखनहुँ आस्थाक एवं विश्वाखसक केन्द्र थिकीह। मनीगाछी प्रखण्ड मुख्या:लय सँ 5 किलोमीटर दक्खिन-पश्चिम कोन मे डीह पर स्थित ई तांत्रिक साधना स्थील सामान्य धरातल सँ अनुमानत: 10 फीट ऊँच अछि। किछु अन्वेहषक एहि डीह के कर्णाटवंशीय शासकक प्रशासकीय स्थ्ल मानैत छथि तँ किछु राजा शिव सिंहक गढ़। जे-से। मां वाणेश्वचरीक प्रार्दुभावक सम्बसन्धध मे कैक मान्य ता थिक। कहल जाइछ जे वाण नामक भगवतीक एक उपासकक घर पुत्रीक जन्मे भेल। जनिक रूप-गुणक प्रशंसा सुनि तखनुक यवन राजा बलजोडि वाणक पुत्री के अंगीकार करबाक लेल दूत पठौलनि जकर प्रतिक्रिया स्वररूप वाण-पुत्री स्वणयं के प्रस्तरर मे परिवर्त्तित कए जल समाधि लए लेने छलीह। आजहुँ एहि परिसर मे ओ ‘परसाइन पोखरि’ अवस्थित अछि जाहि मे सँ पाथरक मूर्ति निकालि पूजा-अर्चना आरम्भँ भेल छल। एखनुक मंदिर निर्माणक सम्बनन्ध’ मे कहल जाइछ जे महाराज लक्ष्मीपश्वतर सिंह पत्नील रानी लक्ष्मीीवती द्वारा एहि भगवतीक पूजोपरान्त अपन भाए श्रीनाथ मिश्रक घर पुत्र होएबाक याचना कयने छलीह जे फलीभूत भेल छल आ 1916 ईo मे मन्दिर बनवाओल गेल।
पश्चिम चम्पागरण जिलाक रामनगर प्रखंडान्तवर्गत सोमेश्व र मे मां कालिका देवीक प्राचीन मंदिर अछि। हेवनि मे मंदिरक ऊपर नेपाली झंडा आ मंदिरक प्रवेश द्वार पर नेपाली भाषामे ‘हाम्रो अमर’ शिलापट्ट देखि विवाद उत्पवन्नन भऽ गेल छल।
दरभंगाक बेनीपुर अनुमण्डदल मुख्यापलय सँ पांच किलोमीटर उत्तर-पश्चिम अवस्थित नवादा गाम मे हयहट्ट देवी दुर्गाधाम सिद्धपीठ मानल जाइछ। एहि पीठक उत्पयत्ति शिव प्रिया सती सँ जुड़ल थिक। तंत्र चूडामणि मे सतीक अंग सँ संबंधित कुल 52 शक्तिपीठक चर्च अछि। जाहि मे ईहो परिगणित अछि। देवी भागवत पुराण एवं मत्य्ं पुराणक अनुसार सती केर वाम स्क न्धज एतेहि खसल छल। कहल जाइछ जे लगभग 600 वर्ष पूर्व राजा हयहट्ट द्वारा एतय जगदम्बाअक मूर्ति स्थापित भेल। बहेड़ी प्रखंडक हावीडीह गामक एक साधक प्रतिदिन देवीक साधना-आराधना लेल अबैत छलाह। पछाति वृद्धावस्था मे दुर्बल कायाक कारण भगवतीक प्रेरणा सँ सिंहासन सँ मूर्त्ति उठाकए हावीडीह चलि गेलाह जतय आइयो ओहि मूर्तिक पूजा कएल जाइछ। पछाति हावीडीह सँ नवादा मूर्ति अनबाक लेल संघर्षक स्थिति बनि गेल। अन्तमत: नवादाक सिद्धपीठ मे अगवे सिंहासन शेष रहल जकरहि पूजा होइत रहल अछि।
दरभंगाक घनश्यालमपुर प्रखंड मुख्याछलय सँ 8 किलोमीटर पर मां ज्वाछलामुखीक भव्य मंदिर एहि क्षेत्र मे भगवती डीहक नाम सँ प्रसिद्ध थिक। एतय मांक पिंडीक पूजा कएल जाइछ। कसरौर गामक पनचोभ मूलक ब्राह्मण परिवारक घर केर कुल देवी एकहि ठाम भगवती डीह मे विराजमान थिकीह। कहल जाइछ जे 600 वर्ष पूर्व उफरौल गाम वासी स्वएo लखनराज पाण्डेाय के हिमाचल प्रदेशक भिंडी जिलाक नगरकोट सँ दैवीय दर्शन भेल छलन्हि। काल क्रमें कसरौर मे पिण्डी बना पूजा होमय लागल । जकरा स्वचoपाण्डेनयक स्था पना मानल जाहछ। मां ज्वाललामुखीक दर्शन सँ रोग निवारणक आस्था। व्त्् कएल जाइछ।
मधुबनी जिलाक जयनगर अनुमण्डखल मुख्यागलय मे प्रान्तथक सभ सँ ऊँच दुर्गा मन्दिर अछि। एतय दुर्गा पूजाक अवसर पर जमीनक भीतर रहि कए साधना करबाक परिपाटी अछि।
सुपौल बजारक रामनगर दुर्गास्थानन मे आब बलि नहि, छागरक परीक्षा लेल जाइछ। जौं छागर परीक्षाक क्रम मे दुर्गा कबूला स्वीुकार करैत छथि तखनहि बलि प्रदान होइछ। स्नापनोपरान्त। छागर के कान पकडि उपर दिस उठा कए पुन: जमीन पर राखि देल जाइछ । छागर सिरा के हिला दैछ तखनहि बलि देल जाइछ अन्यउथा नहि।
बेगूसराय जिलाक मंझौल अनुमण्डजलक विक्रमपुर गाम मे पछिला 400 वर्ष सँ फूल, वेलपात ओ कलशक सहायता सँ माता जयमंगला देवीक प्रतिकृति बना कए दुर्गा पूजा करैत जाइत छथि । लगभग छ:(ह) हजारक आबादीवला एहि गाम मे रोस्टरर सिस्टरम सँ फूल एवं वेलपात जमा कएल जाइछ। कहल जाइछ जे एतूका लोक जयमंगलागढ़ मे दवीक रूप मे दुर्गाक समक्ष बलि प्रदान करैत छलाह। पहसाराक ग्रामीण मे सर्वप्रथम बलि प्रदान देबाक प्रश्नम पर विवाद भऽ गेल। राति मे माता जयमंगलाक स्वप्न भेल। विक्रमपुरहिमे वेलपात-फूल सँ हमर आकृति बना कए पूजा करैत जाइ।
चम्पातरण जिलाक सेमरा रेलवे स्टे शन सँ 2 किलोमीटर पश्चिमोत्तर एक विशेष देवी शक्तिपीठ, जकरा वनसती देवी स्था न कहल जाइछ। सहरसाक सोनबरसा प्रखण्डइ मे वराँटपुर मे चण्डीतमाताक मंदिर थिक। मंदिर पर सर्वसिंहदेवक नाम अंकित अछि। चण्डीसपूजा सँ पूर्व लोक ‘बुधाँई’क पूजा करैछ। ओ दुसाध जातिक देवांशी पुरुष छल। एहि स्थअल के राजा विराटक स्था न मानल जाइछ।
मानसी-सहरसा रेलवे खण्डेक बीच धमहारा घाट स्टेनशनक निकट हरौ कतानेथान शक्तिपीठ अछि जकरा कात्यायनी थान सेहो कहल जाइछ। कहल जाइछ जे महादेवक भार्या सती जखन राजा दक्षक यज्ञ मे जरि गेल छलीह त’ हुनक अधजरुआ लाश अधि महादेव हरिद्वार सँ कामाख्या् जाइत काल सती (कात्या यनी) क ‘कत्ता’ एतहिरये खसि पड़ल छल जाहि कारणेँ एकर नामकरण ‘कतानेथान’ पड़ल।
मधुबनी जिला मुख्या लय सँ 14 कि.मी. पर स्थित कोइलख गाम मे भद्रकाली कोकिलाक्षीक मन्दिर अछि जे हिनक मंदिर सँ पश्चिम प्रवाहित कमला नदी सँ बहराएल छलीह। हिनकहिं नाम सँ गामक नामकरण भेल अछि।
मिथिलाक संथाली लोकनि दशहरा मे इरा केर पूजा करैत जाइत छथि। इरा संथालक देवी थिकीह। प्रतिदिन एक-एक इराक अलग-अलग स्व रूप क आराधना दस दिन कएल जाइछ। विष्णुल पुराणक अनुसार सँ महर्षि कश्यापक एक पत्नीा इरा छलीह जनिका संथाली देवीक रूप मे अदौ सँ पूजैत रहलाह अछि।
सम्पूिर्ण मिथिलांचल मे भगवती वाराही देवीक मूर्त्ति मात्र बहेड़ामे अछि। जतय आसिन मासमे बेस जमघट रहैछ ।
दुर्गा पूजाक अवसर पर अन्यच उद्देश्यीक संगहि ओकर स्थाबनीय माहात्य्न परम्पनरागत स्वहरूप स्था्पत्य् विवेचन आदि जौं हमर एजेंडा मे होइ त’ एक सकारात्मओक प्रयास मानल जाएत।

सामाजिक परिवर्तनक संदर्भमे मैथिलीक दशा ओ दिशा
- गोपाल प्रसाद
साहित्यिक काज समाजक यथार्थ चित्रण होयत अछि । हमरा बुझवामे मैथिली साहित्य एकरासँ वंचित अछि । मैथिली साहित्यमे सामाजिक परिवर्तनक स्वर किछु आलेखमे भेटैत अछि मुदा एहि तरहेँ साहित्यिक चित्रण पुरातनवादी रचाकार लोकनिकेँ नहि पचैत अछि । वैश्वीवकरणक प्रभाव मैथिली साहित्य पर सेहो पड़ैत अछि । मैथिली पत्रकारिताक सिद्धान्तक निर्वहनकेँ फूसि दंभ भरयवला जे कहबालेल सबहक बात करैत अछि एहि सिद्धान्त पर चलबाक साहक किनकोमे नहि छैन्ह । पटना सँ प्रकाशित समय-साल नामक मैथिली द्वैमासिक पत्रिकाक अस्तित्व दीर्घजीविताक लेल मसाला पर टिकल अछि । एहि तरहक साहित्य सृजन दुकानदाररिएटा मात्र अछि । दलविशेषसँ प्रभावित रचनाकार ओ संपादकक लेखनी एखनहुँ ओकर चक्रव्यूहकें तोड़वामे समर्थ नहि अछि ।
हिन्दीमे दलित साहित्यिक सॄजन नीक जकाँ भऽ रहल अछि मुदा मैथिली साहित्य एखनहुँ एकरासँ परिपूर्ण नहि भऽ सकल अछि जखन एहि वर्गकचर्चा मैथिलीमे नहि हेतैक तखन एहि उपेक्षिक वर्गक समर्थक भाषायी समृद्धिक लेल कोना जुड़त ? गामघरमे सर्वहारा मजदूर लोकनि ओ कथित छोटका जातिक प्राणिये एहि भाषाके वास्तवमे जियाकऽ रखने अछि । मैथिली अकादमीसँ प्रकाशित ओ डॉ. मंत्रेश्वोर झा द्वारा रचित कविता संग्रह अनचिन्हार गाम मे एकर झलक दृष्टिगोचर भेल मुदा एकर बादक रचनामे एहि दृष्टिकोणक सर्वथा अभाव भऽ गेल अछि ।
समाजमे आइ मैथिलीक संदर्भमे प्रचलित अछि जे इ ब्राह्मणक भाषा थिक मुद्दा ओ गप्प दुष्प्रचारटा मात्र अछि । एकटा गंभीर पाठकक रूपमे हम जनैत छी जे जियाउर रहमान जाफरी कैसर रजा, मंजर सुलैमान, मेघन प्रसाद, महेन्द्रनारायण राम, देवनारायण साह,अच्छेलाल महतो, सुभाषचन्द्र यादव, महाकांत मंडल, अभय कुमार यादव, बुचरू पासवान,हीरामंडल, सुरेन्द्र यादव शिवकुमार यादव, बिलट पासवान विहंगम आदि अपन साहित्य सृजनतासँ मैथिली साहित्यके समृद्धि प्रदान करबा लेल सक्रिय छथि ।
पटनामे मैथिलीक समर्पित संस्था चेतनासमितिकेँ दलित महिला अमेरिका देवी ओ तिलिया देवीक सम्मानक माने की अछि ? वास्तवमे मैथिली भाषायी क्षेत्रक दलित महिलाक सम्मानसँ दलित दर्गक भाषा-भाषी लोकनिक समर्थन अवश्येै भेटत । एहि प्रयासकें अन्य संस्थाकें अपनैबाक आवश्यकता अछि । कतेक आश्च र्यक गप थिक जे नोबेल पुरस्कारक चयन समितिकें एहि वर्गक कृतित्व ओ व्यक्तिशत्व पर खुजल नजर अछि मुदा मिथिलाओ मैथिलीक संस्था एहि विषय पर आँखि मुनने अछि । बिहार राज्य धार्मिक न्यास परिषदक अध्यक्ष डॉ. किशोर कुणाल एहि विंदु पर केन्द्रित भक दलित देवो भव पुस्तकक रचना कयलनि जकर मैथिली अनुवाद होयबाक चाही ।
मैथिली साहित्यक बहुआयामी प्रतिभाक उपन्यासकार, कवि, नाटककार आ एहि साहित्यकेँ अपन अपरिमित साहित्यिक रचनाएँ उर्वर बनौनिहर डॉ. ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्म अपन विविध रचना ओ स्वभावगत विशिष्टताक कारणे अत्यंत लोकप्रिय भेलाह । हुनक लोकगाथात्मक उपन्यास मिथिलाक लोकसंस्कृतिकेँ समेटने अछि । लोरिक विजय, नैका बनिजारा, रायराणपाल, राजा सलहेस, लवहरि-कुशहरि, दुलरा दयालक रचना कय मैथिलीक सर्वाणीण विकास, भाषायी समृद्धता ओ लोकप्रियताके बढ़यबामे अपन अविस्मरणीय योगदान देलनि । हुनक उपन्यासक वातावरण किंवा विषयवस्तुमे ओ एहन पात्रक जीवन परिचायक प्रदर्शन कएलन्हि जे अपन-अपन वर्ग समुदाय ओ वर्ण व्यवस्थाक अंतर्गत जीवनयापन करबामे महत्वपूर्ण स्थान रखैत अछि । नैका बनिजारामे वर्णिक समाजक व्यापकतातँ अछिए संगहि धोबी, हजाम, ब्रह्मण, क्षत्रिय आदिक उल्लेख सेहो भेल अछि । राजा सलहेसमे दुसाघक शौर्यगाथाक वर्णन कएने छथि । लवहरि-कुशहरिमे ब्राह्मण द्वारा पूजा-पाठक विधा ओ मील-मलाह आदिक चर्चा सेहो भेल अछि । वीर क्षत्रिय राय रणपालक कथासँ सम परिचिते छी । समाजमे धनी ओ गरीबमे की अंतर अछि, तकर सूक्ष्म परण मणिपद्मजीकेँ छलन्हि । ग्रामीण जीवनयापनकेँ कारणे हुनक लेखनीमे ग्राम्यसमाजक मर्मज्ञता दृष्टिगत होयत अछि । अट्टालिकामे रहनिहार झुग्गी-झोपड़ीमे रहि कए जे चित्रण झोपड़ीक करताह ताहिमे अंतर निश्चिहत होयत मणिपद्मक रचनाक पात्र यादव, दुसाघ, मलाह, चमार, धोबी,वाणिक आदि चुनलैन्हि तकर कारण सामन्ती शोषणक धोर विरोधी हुनक मानसिकता ओ स्वातंत्र्य प्रेम छल । सामाजिक संरचनाकेँ दृष्टिमे राखि मैथिलीक अपूर्ण भंडारकेँ पूर्ण करबाक सफल प्रयास कयनिहार मणिपद्मक बाद के छथि ? वर्त्तमानमे मैथिलीमे हुनक विलक्षण लेखनशैली, कथामे पात्रक सार्थक निर्वहन ओ भाषाक व्यवस्थित रूप किंचित नहि भेटैत अछि । आइ हुनक शैलीकेँ प्रेरणाश्रोत मानि लेखनी उठयबाक पहलक आवश्यकता अछि । वर्त्तमानमे मणिपद्मक नुकायल, बिसरायल कृतिक पुर्नप्रकाशनक लेल कर्मगोष्ठी, कोलकाताकेँ योगदान प्रशंसनीय अछि । मैथिली प्रकाशकक जिम्मेवारी छनि जे एहि विषयवस्तुकेँ ध्यान राखि ओहन विधाक प्रकाशन करय जकर अभाव थिक । आजुक मैथिलीप्रेमी लोकनिक ध्यान सरगर गीत, नाटक, व्यंग्य ओ शोधपूर्ण आलोचना विधाकेँ प्रति बेसी आकृष्ट भऽ रहल अछि ।
मैथिलीके लोकप्रिय बनयबाक अभियानमे किछु रचनाकार लागि गेल छथि । आजुक युवावर्गक नब्जकेँ चिन्हबाक उपरान्त हालहिमे मधुकान्त झाक लटलीला बहराएल अछि । निश्चि त रूपे एहि कदमसँ मैथिलीक पाठकमे वृद्धि हेतैक । वास्तवमे आइ दूएटा वस्तुक बिक्री बेसी अछि- धर्म ओ काम । धर्मपर मैथिलीमे बेसी रचना भऽ रहल अछि मुदा काम पर एखन धरि दुःसाहस कियो रचनाकार नहि कयलनि । आजुक सन्दर्भमे समाजक सही चित्रण वार्त्तालापकें रुपमे लटलीलामे कयल गेल अछि । हालाँकि एकर सभ रचना पटनासँ प्रकाशित समय साल पत्रिकामे लतिकाक छद्‌म नामसँ पूर्वहिमे छवि चुकल अछि । एहि आलेखक प्रसंगमे पं. चन्द्रनाथमिश्र अमरक कहब उल्लेखनीय अछि- एहि माध्यमसँ बहुतोक सड़ल अंतरीक दुर्गन्ध बाहर आबि गेल अछि । यथार्थ नामपर नग्नताकें हम पचा नहि पबैत छी ।
रूढ़िवादिता, अंधविश्वाास, छूआछूत ओ संकीर्ण मानसिकताकें विरूद्ध ध्यानमे रखैत आइ मैथिलीमे लेखन होयबाक चाही । स्व. राजकमल चौधरी ओ स्व. प्रभास चौधरीक कृतिकें प्रतिबिम्ब नहि भेटैत अछि । व्यवस्थाक प्रति विद्रोहक स्वर जाहि लेखनमे होयत ओकर स्वागत होयबे करत । आजुक पाठकक मानसिकता बदलैत समयकेँ अनुसारे बदलि रहल अछि । एकर मूल कारण सामाजिक परिवर्तन अछि । एहि परिवतनकेँ दृष्टिमे रखैत जे लेखन नहि होयत ओकरा आजुक पाठक नकारि देत । स्व. हरिमोहनझाक कृति एकर सबसँ पैघ उदाहरण अछि । रसगर, चहटगर, हास्य-व्यंग्य ओ उपेक्षित वर्गक स्वर मैथिली साहित्यमे अनुगूंजित होयत त ओकर लोकप्रियता आ माँग दुनू उत्तरोत्तर बढत.
पुरान भाषायी शैलीक स्थान पर नवतुरिया रचनाकारक आलोचनात्मक लेखनकेँ प्रोत्साहन भेटबाक आवश्यकता थिक । गौरीनाथ, अविनाश, पंकज पराशर, श्रीधरम, विमूति आनंद,अमरनाथ, देवशंकर नवीन, मंत्रेश्वीर झा, प्रदीप बिहारी आदिक रचना एहि वर्गक प्रतिनिधित्व करैत अछि ।
संक्षेपमे कहल जायतँ मैथिलीक सर्वागीण विकास तखने होयत जखन एकर सभविद्या पर रचना होयत । एखन धरि किछु विद्या पर बेसी रचना भऽ रहल अछि मुदा दोसर विधा पर अत्यंत उल्प । एहि तरहे मैथिलेक व्यापकता ओ लोकप्रियता स्वप्नहि बुझना जाइत अछि । मैथिलीमे स्वादक अनुसारे रचनाक ढ़ालय पड़तनि तखने ओकरा सही दिशा भेटत ओ दशा सुघरत । वर्त्तमानमे एहि लेल सबसँ बेसी सक्रिय संस्था भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर ओ साहित्य अकादमी दिली तथा स्वाति फाउंडेशन (प्रबोध-साहित्य सम्मान) आदिक मैथिलीक संवर्धन हेतु प्रयास सराहनीय अछि ।

No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...