Friday, October 30, 2009

'विदेह' ४४ म अंक १५ अक्टूबर २००९ (वर्ष २ मास २२ अंक ४४)- PART I

'विदेह' ४४ म अंक १५ अक्टूबर २००९ (वर्ष २ मास २२ अंक ४४)

वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
एहि अंकमे अछि:-
१. संपादकीय संदेश

२. गद्य
२.१. जगदीश प्रसाद मंडल-मिथिलाक बेटी-(नाटक)
२.२. अनमोल झा- लघुकथा-युगान्त
२.३.उपन्यास-जगदीश प्रसाद मंडल-जिनगीक जीत

२.४.कथा-पहिल चिट्ठी कुमार मनोज कश्यप

२.५. हेमचन्द्र झा-कुंठा
२.६. पंचानन मिश्र-मऊ वाजितपुर सँ विद्यापतिनगर परिवर्त्तन-यात्रा
२.७.पंचानन मिश्र-विद्यापति जयन्तीि (31 अक्टूाबर 09) क अवसर पर-मिथिलाक कतिआएल सिद्धपीठ
२.८. सामाजिक परिवर्तनक संदर्भमे मैथिलीक दशा ओ दिशा- गोपाल प्रसाद

३. पद्य

३.१. गुंजन जीक राधा-तेरहम खेप


३.२. पंकज पराशर-वसीयत
३.३. सुबोध कुमार ठाकुर-सुन्न लागए गाम
३.४.उमेश मंडल (लोकगीत-संकलन)-आगाँ

३.५.कल्पना शरण-प्रतीक्षा सँ परिणाम तक-६
३.६. सतीश चन्द्र झा-मैथिल
३.७. रूपेश कुमार झा ’त्योंथ'-खेली सप्पत जा भुइयाँ थान
३.८. विनीत उत्पलक दू टा टटका कविता

४. मिथिला कला-संगीत-कल्पनाक चित्रकला

५. गद्य-पद्य भारती -पाखलो (धारावाहिक)-भाग-७- मूल उपन्यास-कोंकणी-लेखक-तुकाराम रामा शेट, हिन्दी अनुवाद- डॉ. शंभु कुमार सिंह, श्री सेबी फर्नांडीस, मैथिली अनुवाद-डॉ. शंभु कुमार सिंह

६. बालानां कृते- देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स)२.कल्पना शरण:देवीजी.
७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]

8.VIDEHA FOR NON RESIDENTS
8.1.Original poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy from New York
8.2. Original Maithili Poem by Sh.Ramlochan Thakur, translated by Gajendra Thakur

9. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION(contd.)


विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link.
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे
Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions


विदेह आर.एस.एस.फीड।
"विदेह" ई-पत्रिका ई-पत्रसँ प्राप्त करू।
अपन मित्रकेँ विदेहक विषयमे सूचित करू।
↑ विदेह आर.एस.एस.फीड एनीमेटरकेँ अपन साइट/ ब्लॉगपर लगाऊ।
ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मेhttp://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी।

मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू।
http://devanaagarii.net/
http://kaulonline.com/uninagari/ (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal athttp://www.videha.co.in/ .)

Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ।
VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव



भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।



गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'।


मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण"।
विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ।
"मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ।

१. संपादकीय
श्री उदय नारायण सिंह नचिकेताकेँ कीर्ति नारायण मिश्र सम्मान 2009 सँ सम्मानित कएल जएबाक घोषणा भेल अछि। चयन प्रक्रियाक तेसर चरणमे तीन सदस्यक निर्णायक मंडल हुनकर नाटक नो एण्ट्री:मा प्रविश लेल हुनका ई सम्मान देबाक निर्णय कएलक अछि। एहि सम्मानमे 11,000 टाका, प्रतीक चेन्ह, अंगवस्त्रम आ प्रशस्ति-पत्र देल जाइत अछि।

हर्टा मुलरकेँ २००९ ई.क साहित्यक नोबल पुरस्कार
रुमानियामे जनमल जर्मन लेखिका हर्टा मुलरकेँ २००९ ई.क साहित्यक नोबल पुरस्कारसँ सम्मानित कएल गेल अछि। १९५३ ई.मे जनमल मुलर निकोल चौसेस्कूक शासनक अप्रिय परिस्थिक निरूपणक लेल बेस चर्चित छलीह। स्टॊकहोमक स्वेडिश एकेडमी कहलक अछि जे हुनकर गद्य आ पद्य दुनू प्रशंसनीय अछि। एकेडमी कहलक अछि जे लेखिका गरीब-गुरबाक परिस्थितिक वर्णनमे पारंगत छथि।

रुमानियाक जर्मन अल्पसंख्यक समुदायमे जनमल मुलर १९८७ ई. मे जर्मनी आबि गेलीह। १९८२ ई. मे हुनकर पहिल जर्मन भाषाक लघु-कथा संग्रह नादिर्स रुमानियाक जर्मन भाषी गामकेँ केन्द्रित कऽ कथा कहैत अछि, ई पोथी रुमानियामे प्रतिबन्धित कऽ देल गेल। तकर बाद ओप्रेसिव टैंगो प्रकाशित भेल।

मुलर मात्र अपन मातृभाषा जर्मनमे लिखैत छथि। हुनकर द एप्वाइन्टमेन्ट उपन्यास फ्लैशबैकमे भूतकालक वर्णन करैत अछि जखन ओ ट्रामसँ रोमानियन पुलिसक इन्टेरोगेशन लेल जाइत छथि। हुनकर स्विन्गिंग ब्रेथ उपन्यास हुनकर नव्यतम रचना अछि।

हुनकर पिता द्वितीय विश्वयुद्धमे भाग लेने छथि आ हुनकर माता पाँच बर्ख धरि सोवियत वर्क कैम्पमे कटने छथि।
हुनकर आन पोथी सभमे द पासपोर्ट, द लैंड ऑफ ग्रीन प्लम्स आ ट्रैवलिंग ऑन वन लेग अछि।

आत्म-केंद्रित आ आइ-माइमे लागल अमेरिकी साहित्य लेल साहित्यक नोबल पुरस्कारक लगातार तेसर बर्ख यूरोपकेँ जाएब एकटा चेतौनीक रूपमे देखल जा रहल अछि।
नोबल पुरस्कार 2009-वेंकटरमन रामकृष्णन
भारतीय मूलक अमेरिकी नागरिक वेंकटरमन रामकृष्णनकेँ 2009 ई.क रसायनशास्त्रक नोबल पुरस्कारसँ संयुक्त रूपसँ सम्मानित कएल गेल अछि। हुनका ई पुरस्कार हुनकर एहि रिसर्च लेल जे सभ सेलमे जीनक ब्लूप्रिंट होइत अछि जकरा राइबोजोम जीवित पदार्थमे बदलैत अछि जे प्रोटीन बनबैत अछि। एहिसँ एंटीबायोटिक रिसर्चमे प्रगति होएत।

अल्मोड़ा, उत्तराखण्डमे जनमल रोनाल्ड रॉसकेँ हुनकर मलेरियापर खोज लेल 1902ई.मे मेडिसीनक नोबल भेटल।

बम्बैमे जनमल ब्रिटिश रुडयार्ड किपलिंगकेँ 1907 ई.क साहित्यक नोबल भेटल।

1913 ई. मे रवीन्द्रनाथ ठाकुरकेँ गीतांजली- (बांग्ला पद्य-संग्रह) लेल जकरा संवेदनशील, नव आ सुन्दर पद्य कहल गेल रहए-साहित्यक नोबल भेटल रहए।

1930 ई. मे चन्द्रशेखर वेंकटरमन केँ भौतिकीक नोबल- "प्रकाश किरणक बिन नमरएबला पसार"पर देल गेल।

1968 ई. मे भारतीय मूलक अमेरिकी नागरिक डॉ. हरगोविन्द खुरानाकेँ मेडिसीनक नोबल हुनकर गेनेटिक कोडक विश्लेषण आ ओकर प्रोटीन- संश्लेषण संबंधी कार्यपर देल गेल।

1979 ई. मे अल्बानिया मूलक भारतीय नागरिक मदर टेरेसाकेँ शांतिक नोबल हुनकर गरीबी आ दुखसँ संघर्ष लेल- जे शांतिक लेल खतरा अछि, देल गेल।

अविभाजित भारतमे जनमल अबदुस सलामकेँ इलेक्ट्रोवीक यूनीफिकेशन पर 1979 ई. मे भौतिकी नोबल भेटल।

1983 ई. मे भारतीय मूलक अमेरिकी नागरिक सुब्रह्मण्य़म चन्द्रशेखरकेँ भौतिकी नोबल तरेगणक सैद्धांतिक स्वरूप आ निर्माण-विसाकपर देल गेल।

1998 ई.क अर्थशास्त्रक नोबल भारतीय अमर्त्य सेनकेँ कल्याणकारी अर्थशास्त्र लेल देल गेल।

2001 ई. मे साहित्यक नोबल भारतीय मूलक त्रिनिदादमे जन्मल ब्रिटिश वी.एस.नैपॉलकेँ भेटल।

2007 ई. मे संयुक्त राष्ट्र संघक मौसम परिवर्तनक पैनेलकेँ शांतिक नोबल भेटल जकर अध्यक्ष आर.के.पचौरी छलाह।


संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १४ अक्टूबर २००९) ८६ देशक ९३१ ठामसँ ३१,२२० गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ २,०२,८२२ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।


गजेन्द्र ठाकुर
नई दिल्ली। फोन-09911382078
ggajendra@videha.co.in
ggajendra@yahoo.co.in
२. गद्य
२.१. जगदीश प्रसाद मंडल-मिथिलाक बेटी-(नाटक)
२.२. अनमोल झा- लघुकथा-युगान्त
२.३.उपन्यास-जगदीश प्रसाद मंडल-जिनगीक जीत

२.४.कथा-पहिल चिट्ठी कुमार मनोज कश्यप

२.५. हेमचन्द्र झा-कुंठा
२.६. पंचानन मिश्र-मऊ वाजितपुर सँ विद्यापतिनगर परिवर्त्तन-यात्रा
२.७.पंचानन मिश्र-विद्यापति जयन्तीि (31 अक्टूाबर 09) क अवसर पर-मिथिलाक कतिआएल सिद्धपीठ
२.८. सामाजिक परिवर्तनक संदर्भमे मैथिलीक दशा ओ दिशा- गोपाल प्रसाद


जगदीश प्रसाद मंडल


नाटक



मिथिलाक बेटी


















- जगदीश प्रसाद मण्डल
मिथिलाक बेटी
नाटक



ःः पात्र परिचय:ः


पुरुष पात्र

1. कर्मनाथ प्रशासनिक अफसर 45 बर्ख
2. सोमनाथ कर्मनाथक पिता 65 बर्ख
3. रामविलास सेवा निवृत्ति मिस्त्री 61 बर्ख
4. विकास सेवा निवृत्ति शिक्षक 70 वर्ख
5. नूनू कर्मनाथक भाइ 30 बर्ख
6. लालबाबू कर्मनाथक भाइ 25 बर्ख
7. श्रीचन किसान 45 बर्ख
8. फुलेसर कर्मनाथक बेटा 17 बर्ख
9. राधेश्याम बोनिहार 35 बर्ख

नारी पात्र

1. चमेली कर्मनाथक पत्नी 41 बर्ख
2. आशा कर्मनाथक माए 63 बर्ख
3. माधुरी रामविलासक पत्नी 58 बर्ख
4. चम्पा कर्मनाथक बेटी 19 बर्ख
5. जुही कर्मनाथक बेटी 14 बर्ख








पहिल अंक
(कर्मनाथक डेरा। बहराक कोठरी मे कर्मनाथ)
कर्मनाथ : (घड़ी देखि) पौने पाँच बजि रहल अछि, किऐक ने अखन धरि बच्चा सब पढ़ि कऽ आयल। भऽ सकैत अछि जे बाट मे किछु देखए लगल हुअए। ओना हमहँू आन दिन पाँच बजेक बादे आॅफिस स अबैत छलहुँ, मुदा आइ किछु पहिनहि आबि गेलहुँ। कोना नै अबितहुँ, आन दिन तते काज रहैत छल जे ओकरे निपटबै मे अबेर भ जाइत छल, मुदा आइ त महगीक बिरोध मे, कर्मचारी सबहक हड़ताल, आॅफिसे बन्न कऽ देलक। खैर जे होय, किछु काल मे ते सब आबिये जायत।
(कहि कुरसी पर बैसि अखबार पढ़ै लगैत)
(चम्पा आ चमेलीक आगमन। दुनू केँ हाथ मे झोरा। एकटा झोरा मे चाउर, दाइल, तरकारी आ देासर मे दूधक डिब्बा, चाय पत्तीक डिब्बा, छोट-छोट पुड़िया मे मसाला, एकटा नोनक पौकेट, आ शीशी मे करुतेल)
चमेली : बजार मे आगि लगि गेल अछि। बाप रे बाप, ऐना कतौ महगी आबए। (दूधक डिब्बा निकालि) जे बौस कीनै ले जाउ, अग्गह से बिग्गह दाम। कोना लोक कोनो चीज खायत। जे दूधक डिब्बा बीस रुपैया मे कीनै छलौ, आइ अट्ठाइस रुपैया मे देलक। जे चाहक डिब्बा (डिब्बा देखबैत) दस रुपैया मे दइत छल ओकर दाम बारह रुपैया लेलक। कोनो की एक्के-दुइये टा चीजक दाम बढ़ल, सब चीजक दाम अकास ठेकल जाइ अए। तोहूँ मे नोकरियाक जिनगी ! सब चीज पाइये हाथे हैत। साल मे एक्को दिन ऐहेन अबन्च नइ रहए अए जइ दिन ककरो नै ककरो तकेदा नइ सुनै छी।

कर्मनाथ : कते अनघोल केने छी। बजैत-बजैत होइ अए जे बताहि भ जाय। जत देखू तते महगीक चर्च। बजैत त सब अछि जे देशव्यापी महगी भ गेल। मुदा एकटा बात कहू जे महगी कतऽ स आयल। ओकरा अबैत कियो ने देखलक। अगर जँ अकासक रास्ता स हवाइ जहाज पर आयल ते ओकरा हवाइये फिल्ड पर किऐक ने रोकल गेल। जँ से नहि पाइनिक रास्ता स आयल ते पनिया जहाज के बन्दरगाह मे ढ़ूकै किऐक देल गेल। जँ सेहो नहि, माटिएक रास्ता स आयल ते ओकरा सीमाने पर ने किअए रोकल गेल। मुदा से त किछु नहि भेल, तखन कोन दोग देने, चोर जेँका, महगी चलि आयल। जे एत्ते नमहर देश मे, एत्ते लोक के एक्के बेरि चद्दैर जेँका, ओढ़ा देलक।

चमेली : अहाँ अहिना नोन- तेल मिला, बात के बतंगर बना बजै छी। एतबो नइ बुझै छियै जे बड़का-बड़का लोकक कहब छै जे अधिक उपजाबाड़ी भेला स चीजक दाम कम होइ छै आ कम भेने दाम बेसी होइ छै। जइ स दामक घटती-बढ़ती होइ छै। सदिखन रेडिओओ मे कहै छै। आ अखबारो मे लिखै छै जे खेतो आ करखन्नो मे बेसी पैदाबार भेल हेँ। तखन इ महगी किअए भेल?

(माएक बाँहि पकड़ि, डेालबैत)
चम्पा : गे माए, तू जे कहलीही उ सोझका बात कहलीही, जे हमहू हाइये स्कूल से पढ़ैत एलहुँ। मुदा अइ के तर मे असल बात अछि। बड़का-बड़का पाइबला व्यापारी सब जे अछि ओ खेतोक उपजा आ करखन्नोक बौस के कीनि लइ अए आ ओकरा नमहर-नमहर गोदाम (जे माइटिक उपरो, आ माइटिक तरो मे बनौने अछि) मे डिक दइ अए। जइ से बौस घेरा जाइ अए। घेरेला से बौस निग्हटि जाइ अए। तखन जा कऽ ओ सब (व्यपारी) कनी-कनी क कऽ बौस के निकालि-निकालि महग क कऽ बेचइ अए।

चमेली : (मुह चमकबैत) गोदाम मे जे बौस नुकबै अए, ओकरा लोक (जनता आ सरकार) नै देखै छै।

चमपा : ऊँह, गे तेहेन ठीमन के रख्ैा छै जे लोकक कोन बात जे कानूनो ने देखै छै। ओ सब करैत कि अछि जे बड़का-बड़का पनिया जहाज मे समान लादि के समुद्र मे ठाढ़ क दइत अछि। ततबे नहि, जे बौस माइटिक उपरको गोदाम मे रहै छै, ओकरा तेहेन कानूनी पेंच लगा दइत अछि जे ओ देशक छी की विदेशक, से बुझबे ने करबीही।

चमेली : (पति स) अहाँ हाकिम छियै कि माइटिक मुरुत। मोटका-मेाटका जे कानूनक किताव सब रखने छियै, ओ झींगुर खाइ ले। जखैन कानून हाथ मे अछि, पुलिस अछि, जहल अछि तखन ओकरा सब के छुट्टा खेलाइले छोड़ि देने छियै। पैछला खेप (सात दिन पहिने) अढ़ाय सौ मे जते समान भेलि रहए ओतबे समान कीनै मे आइ तीनि सौ लागल हेँ अहाँ नोकरिया छी अहूँक दरमाहा एहिना बढ़ैत अछि।

कर्मनाथ: कते, खापड़िक मकई जेँका, भरभराइ छी। होइ अए जे हम खूब बजनता छी।

चमेली : उलटे चोर कोतबाल के डाॅटे। अहीं हमरा पर आखि लाल-पीअर करै छी। एतबो आखि उठा कऽ नइ देखै छियै जे अहाँ के एते दरमाहा अछि, तखन इ रामा-कठोला अछि, जे बेटी विआह करै जोकर भेलि जाइ अए मुदा हाथ मे एकोटा फुटल कौड़ी नै अछि। (कर्मनाथ नमहर साँस छोड़ैत) अहींक आॅफिस मे जे कम महीना पबैवला संगी सब छथि, हुनका सब के की दशा होइत हेतनि। तहू मे कम महीना पौनिहार के धियो-पूतो बेसी होइ अए। जइ से परिवारो नमहर रहैत अछि।

(चमेलीक बातक गंभीरता कऽ अकैत कर्मनाथ तीनि बेरि चमेली कऽ उपर स निच्चा धरि देखि)
कर्मनाथ: बड़ सुन्दर बात अहाँ बजलहुँ, मुदा हम ते पढ़बे केलहुँ नोकरिये करै ले। जे आइ बुझै छी भूल भेल। जना हम मीनबाला परिवार क छी तना हमरा खेतीक संबंध मे पढ़ैक चाहै छल। जते धन माइटिक तर मे साले-साल बिला जाइत अछि ओकर चैथाइयो नोकरी मे नइ कमाइ छी। ततबे नहि, जाधरि सब अप्पन-अप्पन गामक सम्पत्ति के नहि जगाओत ताधरि आन ठाम से जे सम्पत्ति आओत, ओ या त भीख बनि क आओत वा कर्ज बनि क। खैर जे होय! हँ, ते कहैत छलहुँ जे लगले त हम्मर दरमाहा बढ़त नहि। तखन ते दुइये टा उपाय, दिवस गुजारैक अछि। पहिल अछि जे जेहन चीज-बौस कीनै छलौ, तइ स कनी झुस (दब) कीनू चाहे जेहेन कीनै छलौ तेहने कनी कम क कऽ कीनू। जँ से नइ करब ते पाओल जायब। करजा तर मे पड़ब। अइ ले एते आमील किअए पीबै छी। महगी कि कोनो हमरे-अहाँ टा ले भेलि हेँ, जे एते आफन तोड़ै छी। आ कि सब ले भेलइ अए। जहाँ धरि हाकिमक बात अछि, हाकिमक मतलब इ नहि ने अछि जे, जे मन फुरत से क देबइ। महगी रोकब हमरा सबहक बुताक बात छी, जे रोइक देबइ। जेकर हम नोकरी करै छियै ओकरे काज छियै महगी आनब।

चमेली : तखन झुठे एते लाम-काफ किअए देखवै छियै?

कर्मनाथ: (मुस्की दैत) दरमाहा तरे देखबै छियै। जे होइ छै ओ देखियौ। जखन अकासे फाटल अछि ते कते सीबै। तखन ते मेघ तरकै छै ते कियो अपना माथ पर हाथ दऽ ‘साहोर-साहोर’ करैत अछि। (चम्पा से) बुच्ची, चीज-बौस घर मे रक्खू। (दुनू झोरा उठा चम्पा जाइत अछि) अच्छा एकटा बात कहू जे आन दिन बाजार से सबेरे अवैत छलहुँ, आइ किऐक एत्ते अबेर भेलि

चमेली : (अकचका कऽ) से नइ बुझलियै।

कर्मनाथ: कहबै तब ने बुझबै। हम कि कोनो भगवान छी जे बिनु सुननहुँ, सुनि जायब।
चमेली : परसुका गप छियै। बजार मे एकगोटेक बेटीक विआह छलै। बनारस से बरिआती आयल छलै। बरिआतियो लाजबाब छलै। मौगी-मरद सब छलै। खूब निम्मन बैंड पाटी सेहो छलै। बैंड-पाटी मे छौड़हरे कौरनेटिया छलै। कहाँ दन ओकरा मेाछक पम्ह अबिते छलै।

कर्मनाथ: कोन खेरहा पसारि देलियै?

चमेली : ऐँह, एतबे मे अगुताइ छी । अस्सल बात त आब अछि। खाली सुनैत रहियौ। बड़ी बजनतिरी ओ छैाँड़ा छलै। बैंड-पारटीक संग बरिआतियो (मौगी-मरद) आ बजारोक छैाँड़ा-छैाँड़ी सब खूब नाचल। ओहि कौरनेटियाक संग, बजार मे रस्ताक पछबारि भग जे बड़का गद्दी छै, ओकर बेटी चलि गेलइ।

कर्मनाथ: तब ते अेाकरा बाप के, बेटीक विआह मे एक्को-पाइ खरचो ने भेल हेतइ।
चमेली : अहाँ ते अहिना आगुऐ से लोइक लइ छियै। सुनियौ, कहाँ दन ओ छैाँड़ा (कौरनेटिया) नोकरी करै अए। ओइ छैाँड़ी के माए-बाप कतबो रोकलकै, ओ किन्नहु नहि मानलकै। ओकरे संगे चलि गेलइ।

कर्मनाथ: ओ लड़की केहेन छलै?

चमेली : ओइह सब बजै छलै जे ओ (लड़की) कओलेजो मे पढ़ैत छलै आ नाचो सिखै छलै। (अफसोस करैत) से देखियो जे ओइ छैाँड़ीक गुजर ओहि कौरनेटियाक संग कोना चलतै। कहाँ अेा धनी-मनीकक बेटी आ कहाँ ओ गरीब घरक कौरनेटिया।

कर्मनाथ: (मुस्की दइत) गुजर किअए ने चलतै। एकटा बजनत्री अछि दोसर नचनिया। दुनू मिलि कऽ एकटा पार्टी ठाढ़ क लेत आ गामे-गाम नाचत।
(तहि बीच फुलेसर आ जुहीक आगमन। दुनूक हाथ मे किताब) (बेटा स) बौआ आइ बीस तारीक भ गेल। एक तारीक के गाम चलब। तइ बीच तू दुनू भाय-बहीनि (स्कूल कओलेज मे) दरखास्त द कऽ दू मासक छुट्टी ल लिहह।

फुलेसर : बावू, अगिला मास से एक घंटाक स्पेशल क्लास चलतै। ओ ते छुटि जायत। तेँ, मन होइ अए जे हम एतै रहि जइतौ।

कर्मनाथ: विचार त बड़ सुन्दर छह, मुदा असकर रहब नीक हेतह(बिचहि मे चमेली पति स)

चमेली : अहाँ ते दोसर गप करै लगलहुँ। एकटा गप सठवे ने कयल आ दोसर लाधि देलियै।

कर्मनाथ: अहाँ अपना बात के थेाड़े पछुआइ देवइ। हमही अपना बात के पाछु क लइ छी। बाजू... ..।
चमेली : हँ, ते वरिआतीक गप्प कहै छलौ ने। उ ते कौरनेटियाक कहलौ। अहू से चोखगर गप आरो अछि।

कर्मनाथ: (मुस्कुराइत) ओइ मे कने तेतरीक रस मिला देबइ।

चमेली : अहूँ ते हद छी। स्त्रीगणक बात के कोनो मोजरे ने दइ छियै।
कर्मनाथ: छुछे मोजर देने की हैत। ओ फड़बो करै तब ने।

चमेली : बुझै मे अहूँ बिहाड़िये छी। नट्ठा होइ अए पुरुख आ कहिऔ मौगी के। अनरनेवा गाछ देखलियै हेँ। मरदनमा गाछ खाली फुलेबे करैत अछि फड़ैत नहि अछि। मुदा मौगियाही गाछ जते फुलाइत अछि तते फड़बेा करैत अछि। हँ, ते सुनू बरिआतीक दोसर गप। बरिआती आबि दुआर लगलै। दुआर लगि, जखन बैठकी मे बरिआती वैसल ते बरक बाप कहलकै जे पहिने दारु पीबि, डान्स करब तकर बाद विआहक कोनो विधि-वेबहार हैत। मुदा घरवारी ओ बात मानै ले तैयारे ने भेल। दुनूक (बरिआती आ घरवारिक) बीच रक्का-टोकी शुरु भ्ेाल। दुनू मे से कियो पाछु हटै ले तैयारे नहि। ओमहर बैंड बाजा गड़गड़ाइते रहै। दुनूक बीच कहा-कही होइत-होइत पकड़ा-पकड़ी भ गेल। पकड़ा-पकड़ी होइतहि पटको-पटकी आ मुक्को-मुक्की शुरु भेल।

कर्मनाथ: (हॅसैत) बाह-बाह, तखन ते कुरथी दउन (दौन) हुअए लगल हैत।

चमेली : अहाँ ते बाजै ने दइ छी, विचहि मे लोइक लइ छियै। पटका-पटकी करितहि टेन्टक बाँस घीचि-घीचि एक-दोसर के मारै लगल। कते के कपार फुटलै। तहि बीच हड़हड़ा कऽ टेन्ट खसल। सब ओइ तरे मे झँपा गेल। ककरो निकलियेे ने होय। जहिना महजाल मे माछ फँसैत अछि, तहिना।

कर्मनाथ : मरदे-मरदी सब रहै कि मौेगियो सब रहै।

चमेली : सब रहै की। कतऽ के ओंघराइल रहे से कोइ देखइ। बड़ी कालक बाद गौँआ सब समेना हटौलक। समेना तर मे जते गोटे रहै सब गरदा स नहा कऽ गरदे रंग मे रंगि गेल। पी के सब बुत्त रहबे करै। टगैत-टुगैत सब (बरिआती) निफाहे मे जा-जा बैसल। थोड़े खान जब हवा लगलै तब बारह गेाटे (बरिआती) अप्पन-अप्पन बैंग-एटेंची ल-ल जाइ ले तैयार भ गेल। घरवारी सब गुहरिअबै लगल। मुदा कियो मानै ले तैयारे ने।

कर्मनाथ : तब ते बेचारे बरिआती सब के नइ सुतरलै।

चमेली ः ऐँह, एतबे भ्ेालइ। जते बजरुआ पौकेटमार सब रहे सब सबहक (बरिआतीक) रुपैइयो, मोबाइलेा आ आनो-आनो चीज छीनि के निकलि गेल। रौतुका मसीम रहबै करै।

कर्मनाथ: बरिआतीक सोखड़ि ओराइल कि आरो अछि।

चमेली ः एतबे मे अगुता गेलहुँ। अच्छा, एकटा आरो कहि दइ छी। बरिआती सब तते छुुड़छुड़ी आ फटाका अनने रहे जे दुआर पर पहुँचते, गदमिशान उठा देलक। लड़कीक नन्ना, ओहि काल, पैखाना गेल रहथि। एकटा बड़का फटाका ओहि पैखाना कोठरीक देवाल मे, एकटा बरिआती मारलक। से कहाँ दन ओ फटाका (बम) गुंगुंआ के तते जोर से अवाज केलकै जे ओ बेचारे धड़फड़ा कऽ भगै लगल। केबाड़ बन्न रहै। वेचारेक होश त उड़ि गेल रहनि, देवाले मे टकरा गेलाह। कपारो फुटि गेलनि आ चोट स चोन्ह आबि गेलनि। चोन्ह अबिते तिलमिना के खसलाह कि दहिना पाएर पैखानाक नाली मे फॅसि गेलनि बड़ी कालक बाद जखन दोसर गोरे पैखना जाय लगलाह कि केबाड़ बन्न देखलखिन। थोडे़ काल ओतइ ठाढ़ रहथि, मुदा कोनो सुनिगुनि नहि बुझि हल्ला केलखिन। तखन केबाडक छिटकिल्ली अलगाओल गेल। केबाड़क छिटकिल्ली अलगबिते, बुढ़ा के अचेत-भेल पड़ल देखलखिन।

कर्मनाथ : (हँसैत) तब ते बिआहक संग सराधेाक जोगार लगि गेलनि।
चमेली ः अहाँ ते अहिना अनका दुख के दुखे ने बुझै छियै।
कर्मनाथ: हम की अहाँ जेँका अनकर सुख देखि कऽ थेाड़े नचै छी। सुख-दुखक बीच जिनगीक रास्ता छैक। तेँ, जिनगी जीवैक लेल सुख-दुख अंगेज कऽ चलए पड़ैत छैक। जे यात्री (जातरी) सुख मे मगन भ जायत आ दुख मे विचलित, ओ जिनगीक यात्रा कोना सफर कऽ सकैत अछि। छोड़ू दुनियादारीक गप। अप्पन जिनगीक गप करु।
(चम्पाक आगमन) भने चम्पो आबिये गेलि।
फुलेसर ः दू मासक छुट्टी ल कऽ की करबै, बावूजी?
कर्मनाथ : चम्पाक विआह करैक विचार से गाम जायब। मुदा तू जे कहने छेलह जे स्पेशल क्लास चलत, तेँ रहि जाइक विचार होइ अए। बड़ सुन्दर विचार छह, मुदा इ बात बुझै पड़तह जे हर मनुष्य केँ पहिल कर्तव्य होइत जिनगीक रक्षा। जीबैत रहबह, तखने बुझि पड़तह जे दुनिया छैक, नहि त किछु नहि। पढ़ैक खियाल से तोहर विचार नीक छह। मुदा एकटा बात कहि दइ छिअ। हम अफसर छी तेँ विशेष अनुभव अछि। अखन अप्पन परिवारक बीच छी, तेँ बजैत एक्को पाइ असोकर्ज नै भ रहल अछि। जँ अखन सरकारक कुरसी पर रहितहुँ वा लोकक बीच, त नहि बजितहुँ।
जुही ः बावूजी, कते काल सरकारी आदमी रहै छियै?
कर्मनाथ: बाउ, जे सवाल पुछलह, ओकर उत्तर साधारण नइ अछि। अखन परिवारक काजक विचार करैक अछि, तेँ तोरा सवालक उत्तर नीक नहाँति नइ द सकवह। निचेन मे दोसर दिन बुझा देबह। अखन थेाड़े इशारा मे कहि दइत छिअह। अखन जे अपना देशक स्थिति अछि, एहि मे क्यो सुरक्षित नहि अछि। जना सब दिन अपहरणक घटना सुनै छहक। घटना मे की सुनै छहक जे पाइक दुआरे अपहरण (फिरौती) होइ छै। इहो होइ छै। मुदा एतबे टा नइ होइ छै। आखि उठा के देखवहक ते बुझि पड़तह जे बिनु पाइओवलाक अपहरण होइ छै। ततबे नहि, पाइबला त पाइ द कऽ जानो बचा लइ अए मुदा बिनु पाइवलाक जानक अपहरण होइ छैक।
जुही ः इ बात लोक कहाँ बजै अए।
कर्मनाथ: लोक के अखवार आ रेडिओ पढ़वै छैक। तेँ, जे अखबार मे पढ़ैत अछि से दोसर के पढ़बैत अछि। मुदा अस्सल बात एहि स आगू अछि। जे थेाड़-थाड़ कहियो रेडिओओ आ अखवारो कहियो दइत अछि आ बेसी नहिये कहैत अछि। हँ, ते कहै छेलियह जे अपहरण भेला पर बिनु पाइवलाक जान नहिये बँचैत अछि। तेँ, इ बात बुझै पड़तह जे के केकर जान लइ ले, खून पीबै ले तैयार अछि से कहब कठिन। (बेटा से) तू कहबह जे अहाँ त गलत काज कहियो ने केलहुँ आ ने करैत छी, तखन हमरा किऐक किछु होयत। मुदा एहि सवालक जबाब बुझै ले एहि बात पर नजरि देमए पड़तह जे जहिना दिनक विपरीत राइत होइत अछि। धनिकक गरीब आ सुखक विपरीत दुख होइत अछि। मुदा एकरे उलटा के देखवहक ते बुझि पड़तह जे जहिना दिनक विपरीत राइत होइत अछि तहिना राइतियोक विपरीत दिन होइत अछि। तहिना धनिको आ सुखेाक होइत अछि।
जुही ः बावूजी, हम इ बात नइ बुझि सकलहुँ जे विपरीतक माने की?
कर्मनाथ : बाउ, अखन हम दोसर काजक गप करै चाहैत छी, तेँ, अखन तोरा प्रश्नक जबाव नीक जेँका नहि द सकबह। मुदा तोरा जे शंका भ रहल छह, अेा हमहुँ बुझि रहल छी। अखन एतबे बुझह जे दिन-राति प्रकृति स जुड़ल अछि, तेँ अेा हेबे करत। एक-दोसरक विपरीत रहबे करत। मुदा धनी-गरीब आ सुख-दुख से नहि अछि।
जुही ः बावूजी, अहाँ जे कहलियै तइ से हमर मन नै मानलक।
(जुहीक बात सुनि कर्मनाथ मने-मन सोचै लगलथि जे जखन हाइ स्कूलक बच्चा के हम संतुष्ट नहि कऽ सकलहुँ, तखन परिवार आ समाज त बड़ नमहर होइत अछि। सोचि-बिचारि)
कर्मनाथ: बाउ, एकठाम भेाज भेलइ। भेाज नै भेलइ, पाँच गोटे आन मुलुक से एक गोटे एहिठाम ऐलखिन। आन मुलुकक रहने नमहर पाहुन भ्ेालखिन। ओ घरवारी (जिनका ऐठाम आयल रहनि) खाइ-पीबैक नीक ओरियान केलनि। आन मुलुकक पाहुन बुझि अपनो दस सवांग केँ खाइक नोत देलखिन। खाइक सब बरतन (थारी,लोटा, गिलास,बाटी,चम्मछ) सोनाक रहैक। खेला-पीलाक बाद अप्पन (घरवारीक) एकटा सवांग एकटा चम्मछ चोरा क जेबी मे रखि लेलक। घरवारी देखि लेलखिन। देखला बाद घरवारीक मन मे दुअए लगलनि जे जँ कहीं पाहुनो सब देखि नेने होथि। मुदा दोसर दिशि अप्पन मुलुक आ सवांगक प्रश्न छलनि। असमंजस मे वेचारे पड़ि गेलाह। तत्-मत् करैत ओ (घरवारी) एकटा मैजिक केलनि।
जुही ः खाइये काल मे मैजिक केलनि।

कर्मनाथ : हँ। आगू सुनह। मैजिक ओ इ केलनि जे कहलखिन- जनिका जेबी मे जे वस्तु अछि से हम देखै छी। सभकेँ आश्चर्य भेलनि। अप्पन सवांग दिशि इशारा करैत कहलखिन जे हुनका जेबी मे एकटा चम्मछ अछि। जइ सवांगक नाम कहलखिन, ओ भड़कि उठलनि। दोसर गोरे, जेबी मे हाथ द चम्मछ निकालि टेबुल पर रखि देलखिन। तेँ बाउ, तू जे प्रश्न केलह ओ अहू से नमहर मैजिक अछि। आब तू चुप रहह। आगूक गप बढ़वै दाय।
जुही ः भैयाक सवालक जबाव अधखड़ुऐ रहि गेल छनि।

कर्मनाथ : बौआ, समय ऐहन परिस्थिति पैदा क देलक हेँ जे कियो अपना कऽ सुरक्षित नहि बुझैत अछि। सचमुच अछियो नहि। अखन एकटा अपहरणक चरचा केलियह। ऐहन-ऐहन अनेको अछि। एक राज्यक लोक दोसर राजवला के दुसमन बुझैत अछि। दुसमनक संग जेहेन बेबहार होइ छै, से करबो करैत अछि। ततबे नहि, एक सम्प्रदायवला दोसर के दुसमन बुझैत अछि। तहिना एक जाइतिक लोक दोसर के बुझैत अछि।
जुही ः तना ओझड़ा-पोझड़ा के कहलियै जे हम किछु बुझबे ने केलहुँ।
कर्मनाथ : अप्पन देश विभिन्न राज्य, विभिन्न सम्प्रदाय, आ सैकड़ो जाइत मे बँटल अछि। उपर से सब कहैत अछि जेे हम सब एक देशक बासी छी। तै, मिलि-जुलि के रहैक अछि। मुदा से थोड़े अछि। एक राजवला दोसर राजवला केँ मारि-पीटि, बहू-बेटीक इज्जत लुटि, कमाइल पाइ लुटैक पाछु लागल अछि। तहिना आरो सब अछि।
जुही: तइयो अहाँ ओझराइले बात कहलियै।

(एक टक स जुही पर नजरि राखि कर्मनाथ कने काल गुम्म रहि )
कर्मनाथ: बाउ, अखन धरि तू सब शहर-बजार मे रहलह, तेँ नहि देखै छहक। हमरा ते गमैया लोक सब से गप-सप होइ अए किने। सुनह, गाम सब मे की होइ छै; एक जाइतिक लोक (जे बुतगर अछि) दोसर जाइतिक लोकक (जे अब्बल अछि) बहू-बेटी केँ दिन-देखार इज्जत लुटै अए। तहिना एक सम्प्रदाय वला दोसर सम्प्रदायवला केँ।
फुलेसर ः (नमहर साँस छोड़ैत) बाबूजी, जे बात अहाँ आइ बिकछा के कहलियै, ओइ बात दिशि हम्मर नजरि आइ घरि नहि गेल छल।
कर्मनाथ: अगर जँ अखन धरि तोहर नजरि एहि बात दिशि नहिये गेल छेलह ते ओहो कोनो बड़ भारी गलती नहिये भेल छेलह। किऐक त अखन धरि तू किताबक बीच रहलह, दुनिया दारीक बात थोड़े बुझै छहक। मुदा एकटा बात पर सदिखन आखि, कान ठाढ़ क कऽ राखै पड़तह जे सिर्फ किताबेक ज्ञान स जिनगी नहि चलैत अछि। जिनगीक लेल दुनू (किताबो आ बाहरियो) ज्ञानक जरुरत होइत अछि।
फुलेसर ः बाबूजी, अखन देखै छियै जे छोटका स्कूलक विद्यार्थी स ल कऽ कओलेज धरिक विद्यार्थी, सिनेमा आ खेल-कूदक सब बात जनैत अछि मुदा अप्पन परिवार, समाज आ वंशक विषय मे किछु नहि जनैत अछि। बहुत दिन सऽ मन मे अवैत अछि जे अप्पन परिवारक संबंध मे अहाँ से पूछी। मुदा समयक ऐहेन उटपटँग रुटिंग बनि गेल अछि जे पूछैक गरे ने लगै अए।
कर्मनाथ : (मुस्कुराइत) अपनो इ इच्छा दस वर्ख पहिने से मन मे अछि, किऐक त एहि शरीरक कोनो ठेकान नहि अछि। कुम्हारक बनाओल माइटिक काँच वरतन जेँका मनुक्खेा अछि।
(बिचहि मे)
चमेली ः बेटा फुल, एकटा बात आरो जोड़ि दहक जे दू परिवार, दू समाज आ दू वंशक योग स नव परिवारक उदय होइत अछि। तेँ, दुनू के जानव जरुरी अछि।
कर्मनाथ ः (हँसैत) हँ ते पहिने अहीं परिवारक खेरहा कहै छी। पुरुष-नारीक संयोग स नव मनुखक जन्म होइत अछि। एकर अतिरिक्त जे सब अछि ओ बाहरी उपरी छियै। तेँ, अखन एतबे कहब। मुदा हमरा संग जे अहाँक विआह भेल, ओ बच्चा सब के जरुर कहि देबइ।
जुही ः (थोपड़ी बजवैत) पहिने यैह कहियौ बावूजी। तखन आन बात कहबै।
कर्मनाथ ः (मुस्की दइत पत्नी स) हम अहाँ छोड़ि बच्चा सब के कहै छियै। तेँ, बीच मे रग्गड़ नहि ठाढ़ कऽ देवइ।
चमेली ः (मुह चमकवैत) हम बड़ रगड़ी छी, की ने।
कर्मनाथ: अपना की बुझि पड़ै अए। अहीं सन लोकक संबंध मे कहल गेल अछि जे नाक नै रहैत ते की सब खेइतहुँ, तेकर कोनो ठीक नहि।
चमेली ः छुछुनरि होइ अए पुरुख आ दुसिऔ मौगी के।
कर्मनाथ: पुरुष की छुछुनरि होइ अए?
चमेली ः बजार जाइ छी ते देखै छियै जे जहाँ पुरुख कोनो स्त्रीगण के देखत कि अनेरे ओकर जाँघक दिनाइ चुल-चुला लगै छै।
कर्मनाथ ः अहाँ कोनो डाॅक्टर छी जे दिनाइ देखि दवाई सोचै लगै छी। अहाँ दिनाइ देखै छियै कोना?
चमेली ः अँाखिये छियै। ओकरा पकड़ि कऽ रखबै, से हैत।
कर्मनाथ : अच्छा बुझि गेलहुँ। अहूँ के अप्पन विआहक बात सुनैक मन अछि, ते सुनू। जखन हम बी.ए.पास केलहुँ, तखन बावूजी विआह करैक चर्च चला देलनि। सब दिन दू-चारि कन्यागत अबै लगलथि। हम दरभंगे मे रहैत रही। इमहर बावूजी एकठाम विआहक बात पक्का क लेलनि। जे हम पछाति बुझलियै। कहाँ दन ओ कन्यागत भरिपोख द्रव्य आ कन्याक खेांछि मे बीस बीघा जमीन देवा ले तैयार रहथि। मुदा अंतिम बात हमरे पर अँटकल रहै। जेठ मास। गेाटे-गोटे गाछ मे गोटि पंगरा आम फड़ल रहै नइ त नहिये जेँका फड़ल रहै। दस बजेक बाद बाध मे लू नचै लगै। जना बुझि पड़ै जे खेत सब स आगिक ताव जेँका नाचि रहल छै। हम खा के दरवज्जेक ओसारक कोठरी मे रही। ओसारक दुनू भाग (उत्तरो आ दछिनो) दू टा कोठरी बनल रहै आ बीच मे खाली रहै। ओहि खाली ओसार मे एकटा मोथीक सोफ (नमहर बिछान) विछाओल रहैत छलै। सतासीक बाढ़ि मे ओ दरबज्जा खसि पड़ल। करीब बारह बजे तोहर (बेटा-बेटी) नन्ना आबि के, ओहि सोफ पर चारु नाल चीत भ के ओंघरा गेलाह। ओंघरेला पर जे बिछान (सोफ) खड़बड़ेलइ ते हमहू कोठरी से बहरेलहुँ, ते देखलियै जे एक गोटे दुनू बाँहि के मोड़ि माथ तर मे नेने, आखि मूनि कऽ पड़ल छथि। आ कनी हटा कऽ मत्थे सोझे एकटा बटुआ रखने छथि।
जुही ः बटूआ केहेन होइ छै, बावूजी?
कर्मनाथ: (मुस्कुराइत) बटुआ कपड़ाक बनै छै। दरजी सब सीवै अए। कोठरीनुमा ओहि मे हन्ना सब बनल रहै छै। जेकरा लोक डाॅरक डोराडोरि मे बान्हि कऽ रखैत अछि। ओहि मे अमलोक वस्तु आ पाइयो-कौड़ी रखैत अछि। हमरो हड़ल ने फुड़ल, ओतइ वैसि कऽ बटुआ उठा देखै लगलियै। ऐँह, की कहवह अजीव खजाना बटुओ होइ अए। जहिना लोक पीढ़ी, केबाड़ आ सन्दूक सब मे रंग-बिरंगक चित्र बनबवै अए तहिना ओहि बटुआक उपर मे एकटा इनार बनौल रहै। ओहि इनार पर पाँच टा जनिजातिक चित्र बनाओल रहै। एक गोटे इनार मे डोल खसबैत। दोसर उगहनि पकड़ि डोल उपर करैत। तेसर काँखतर मे घैल रखने। आ बाकी दुनू इनारक दुनू भाग ठाढ़ भ कऽ बाँहि फड़का-फड़का झगड़ा करैत अछि।
फुलेसर : इनारो-पोखरि मे लोक झगड़ा करैत अछि।
कर्मनाथ : (ठहाका मारि) हौ, इनार-पोखरि त स्त्रीगणक लड़ैक अखडे़हे छी (पत्नी दिशि देखि, मूड़ी डोला हँसि) उठा-पटक त स्त्रीगण कम करैत अछि मुदा गरिखर बेसी होइ अए। सात पुरखाक नाम आ सातो पुरखा के कोन गारि ककरा लगतै, से सबके बुझल रहैत अछि।
चमेली ः (मुह चमकवैत) इनार-पोखरि ढ़ाठै अए पुरुख आ झगड़ाउ होइत अछि मौगी। (मूड़ी डोलबैत) निरलज के ने लाज, पेट भरला से काज। पुरुख नीक रहतै ते मौगी अधला भ जेतइ, की?
फुलेसर: बटुआ जे उठौलियै से ओ नइ वुझलनि।
कर्मनाथ: (उदास होइत) ओ कोना बुझितथि। ओ कोनो रौदक जरल रहथि, ओ त जिनगीक ठोकर स घायल बटोही रहथि। चिन्ता आ दुखक अथाह समुद्र मे डूवल रहथि। जहि स निकलैक कोनो रस्ते ने देखथि।
जुही ः बटुआ मे की सब रहनि?
कर्मनाथ : (मुस्कुराइत) जखन बटुआक डोरा दुनू हाथे पकडि खेललियै कि भक दे एक्के बेरि नअ टा मुह बाबि देलक। नवो हन्ना मे नअ रंगक बौस। पहिल हन्ना मे नोइसिक डिब्बा। नोइसिक डिब्बा के उठाबितहि गमकि उठल। गमक देखि हमरो मन भेल जे कनी निकालि कऽ नाक मे लगा ली मुदा फेरि मन मे आयल जे नाक मे नोइस लगाएव ते छीक हेबे करत। जँ कही जोर से छिक्का भेल आ ओ आखि खोललनि, ते देखिये जेताह। तेँ नोइस नइ लगेलहुँ।
फुलेसर ः नोइस नइ लगेलियै?
कर्मनाथ : हँ, लगौलियै। पाछु काल । दोसर हन्ना मे छलिया सुपारी। शुद्ध कालापानी, चारि टा। खूब नमहर-नमहर। तेसर हन्ना मे पानक पनबट्टी। चारिम मे दू टा जरदाक डिब्बा। एकटा हरिशंकर काली पत्ती आ दोसर पान सौ नम्बर, पीली पत्ती। पाँचम मे चानीक रुपैया। ओ नीक जेँका नइ देखलियै। मुदा कम्मे बुझि पड़ल। छठम मे लंग, इलायची। सातम मे बिलेती तमाकुल पात। आठम मे एकटा चुनौटी मे चून आ दोसर शीशी मे बुकल खैर। नवम् मे रामपट्टीक बनाओल सरोता। नवो हना कऽ देखि नोइसिक डिब्बा से कने नोइस निकालि, चुटकी मे रखलौ। बटुआ बन्न क कऽ रखि नाक मे नोइस लगेलहुँ। नोइस लगविते खूब जोर से छिक्का भेल। जहाँ छिकलौ कि ओ फुर-फुरा कऽ उठि, बैसि रहलाह। हमरा नाक मे सुरसुरी लागल तेँ नाक मलैत रही।
फुलेसर: नाना किछु बजलाह नहि?
कर्मनाथ : ने ओ किछु बाजथि आ ने हम किछु पुछिएनि। हुनक बगए आ शरीरक रुप देखि हम्मर बोली बन्न रहै। मन मे ढ़ेरो रंगक सवाल सब उठैत रहै। जहिना कोनो राही बटोही बिनु खेने-पीने रास्ता-बाट चलैत रहैत अछि, मुदा रुकैक नाम नहि लइत, तहिना बुझि पड़ल। बड़ी कालक बाद, मन के असथिर करैत पुछलिएनि, अपने कतऽ रहै छियै? नीक जेँकँा नहि चीन्हि रहल छी। आखिक नोर पोछैत ओ कहलनि, बौआ, अहाँ अखन बच्चा छी, तेँ हम अप्पन सब बात त नहिये कहब, मुदा एते जरुर कहब जे जइ धनुष कऽ तोड़ि राम वीर भेलाह, ओहि धनुष कऽ मिथिलाक बेटी (सीता) बामा हाथे उठा बाहरै-नीपै छलीह। ओहि मिथिलाक आइ एते पतन भ गेल अछि जे बेटीक हाथ पकड़िनिहार, बिना रुपैया नेने, कियो नहि अछि।
फुलेसर: (चैंक कऽ) बड़ भारी बात कहलनि, बावूजी।
(चमेली, चम्पा आ जुहीक आखि मे नोर आबि गेल)
कर्मनाथ: हमर करेज दहलि गेल। आखि भारी भ गेल। मुहक बकार बन्न भ गेल। हम्मर आखि कखनो हुनक मुह देखैत त कखनो बगए। तहि काल पितो जी अएलाह। पिताजी केँ देखितहि ओ (तोहर नन्ना) कहलखिन, जे एकटा कुल-शील कन्याक भार उताड़ि देल जाय। जइ पर पिताजी तुरुछ भ कऽ जवाब देलखिन जे कुल-शील ल कऽ हम धो-धो चाटब। द्रव्यक युग छी। टका धर्म टका कर्म छी। अहाँ अप्पन बेटीक प्रति कते खर्च करै चाहैत छी। जहिना पाइन (तरल) बरफ बनैत, तहिना हम्मर कोमल ह्दय कठोर बनै लगल। मन मे अन्हर-बिहाड़ि उठै लगल। मुदा चुप रही। ओ (तोहर नन्ना) कहलखिन, हम्मर हालत पाइ-कौड़ी खर्च करै जोकर नहि अछि। अपनेक पाएर पकड़ि कहै छी जे एकटा मुइल बापक बेटीक भार उताड़ि देल जाय। द्रव्य से त अपनेक इच्छा पूर्ति हम नहिये कऽ सकब, तखन एकटा नोकरनी परिवार मे जरुर देब। हुनकर बात सुनि पिताजी उठि कऽ बाड़ी दिशि विदा भ गेलखिन। हमरा हुअए जे बोम फाड़ि कऽ कानी। मन मे विचित्र स्थिति पैदा ल लेलक। एक दिशि पिता दोसर दिशि निरीह कन्या।
फुलेसर ः नाना बैसिले रहलथि कि उठि के चलि गेलाह।
कर्मनाथ: बैसिले रहलथि। उठैक साहसे ने होइन। मुह करिछौन भेलि जाइत रहनि। लगले-लागल हाफी करथि। मिरमि-राइते हम पुछलिएनि, अपने कते खर्च करए चाहैत छिअए। ओ कहलनि, बौआ, जखन अहाँ पुछलहुँ ते हम अप्पन दुख कहै छी। हम दू भाइ छी। हमरा से जेठ भाइ छथि। ओ पढ़लहुँ-लिखलहुँ त बेसी नहि मुदा अखड़ाहा पर जरुर जाइ छलौ। दुनू भाइक बीच जखन बँटवारा हुअए लगल तखन ओ खेत-पथार त बाँटि देलनि, मुदा घरक बरतन-वासन, गहना-जेबड़ आ नगद-नारायण किछु नहि देलनि। एक दिन हम खिसिया के कहलिएनि। हुनको दाँव-पेंचक दाबी। ओहो ओहिना जोर से कहलनि जे जे बँटैवला छेलह से बाँटि देलियह आब किछु ने देबह। हमरो अखड़ाहा परहक ताव रहबे करए। दरवज्जे पर उठा कऽ पटकि पान-सात थापर मुह मे लगा देलिएनि। कहि दुनू हाथ माथ पर ल चुप भ गेलाह।
फुलेसर: किअए चुप भऽ गेलाह?
कर्मनाथ : थोडे खानक बाद फेरि कहै लगलाह। हौ बाउ, पेंच-पाँच त हम जिनगी मे कहियो सीखिलहुँ नहि। कोट मे केसो क देलक आ गौउओ सब के मिला लेलक। दुनू दिशि हम फँसि गेलहुँ। बलजोरी लोक सब जजातो काटि लिअए, बाँसो-गाछ काटि लिअए आ आमो तोड़ि लिअए। तारीक पर जाइ ते एक के तीनि ओकिलो-मुन्सी ठकि लिअए। केस हारि गेलहुँ। जहि के चलैत छह मास जहलो मे रहलौ। कोनो कर्म बाकी नइ रहल। सब सम्पत्ति नष्ट भ गेल। हारि के बेटा पड़ा कऽ दिल्ली चलि गेल। एहना स्थिति मे बेटी विआह करै जोगर भ गेल अछि।
चमेली ः (नोर पोछैत) हे भगवान, ऐहेन दिन ककरो नइ दिहक।
(चम्पा आ चमेली माइयक मुह तकैत आ फुलेसर बापक मुह)
फुलेसर ः बाबा घुरि कऽ एलखिन आ कि नहि?
कर्मनाथ ः ने घुरि कऽ एलखिन आ ने कतौ गेलखिन। अंगनाक पछुआरक रस्ता देने आबि कऽ अढ़ मे बैसि गेलखिन।
फुलेसर ः सोझा मे किअए ने एलखिन?
कर्मनाथ: से त ओ जानथि। मुदा हम्मर मन हुनका (पिता) स हटै लगल आ हिनका (ससुर) दिशि झुकै लगल। मने-मन सोचै लगलहुँ जे अखन जँ हम बलजोरी (पिताक बिना विचारे) विआह क लइ छी ते परिवार मे जबरदस विबाद ठाढ़ हैत। जँ विआह करै स इनकार करै छी ते दरबज्जाक इज्जत चैपट हैत।
जुही ः दरबज्जाक इज्जत की छियै?
कर्मनाथ : बाउ, दरवज्जा अंगनाक नाक होइत। आंगन व्यक्ति-विशेषक वुझल जाइत, जबकि दरवज्जा दसगरदा मे बदलि जायत। आंगन आंगनवालीक (पत्नीक) बुझल जाइत जबकि दरवज्जा द्वार (दुआर) होइत। ककरो आंगन मे पुरुख क आगमन आंगनवालीक आदेश स होइत जबकि दरवज्जाक लेल आदेशक जरुरत नहि। सबहक लेल सदिखन रहैत। पुरुखक परीछाक (परीक्षाक) केन्द्र दरवज्जा छी। परिवार मे जेहेन पुरुख रहत दरवज्जाक इज्जत ओहि रुपक होइत। हमर-अहाँक पुरुखा एहि इज्जत केँ वुझै छेलखिन, तेँ, बहुतो गोटे एहि प्रतिष्ठा के उच्च सीढ़ी धरि मर्यादित बना कऽ रखलनि। ऐहन-ऐहन हजारो पुरुख भेल छथि जे कनैत आइल मनुक्ख केँ दरवज्जा पर स हँसा कऽ विदा केलनि। अइह बात (विचार) हमरो मन मे आयल।
जुही ः इ विचार बावा मे किऐक ने एलनि?
कर्मनाथ : इ त ओ जानथि। मुदा हमरा मन मे जरुर भेल जे जहिना तोहर नन्ना कनैत अएलाह तहिना हम हँसा कऽ विदा करबनि। चाहे परिवार मे जे होय। फेरि मन मे आयल जे जाधरि परिवार स नीच विचार हटत नहि ताधरि उच्च विचार आबि कोना सकैत अछि। इ त कोनो जादू-टोना नहि छियै। बेवहार छियै। जे सोझे कर्म (काज) स जोड़ल अछि।

फुलेसर ः तकर बाद की केलियै?
कर्मनाथ: (गंभीर होइत) थेाड़े काल मने-मन विचार केलहुँ जे अखन त हमरो स्थिति काटल गाछक छाहरिये जेँका अछि। तेँ विआह करै स पहिने अप्पन आस्तित्व कायम करी। अगर जँ से नहि कऽ पहिने विआहे क जे कनियाँ घर ल आनब त ओहने दशा कनियाँक संग हेतनि जहिना अनभुआर चिड़ैक दशा चिड़ैक जेर मे होइत। तेँ जरुरी अछि जे पहिने अप्पन जिनगी कऽ अपना हाथ मे ल कऽ चली। मुदा इ होएत कोना? सोचैत-विचारैत तय केलहुँ जे आब एहि घर कऽ छोड़ि कतौ नोकरी करी। नोकरी करैक विचार मन मे अबितहिं हम कहलिएनि जे एहिठाम अपनेक जे नोर खसल ओ अपनेक उद्धार करत।
जुही: (हॅसैत) तब ते नानाक मन खूब खुशी भेलि हेतनि?
कर्मनाथ: ओ बड़ पारखी रहथि। किछु बाजथि नहि मुदा हमरे मुहक बात सुनै चाहथि। जबकि हमरा मन मे भीतर स समुद्रक लहरि जेँका उठाय। हुअए जे की कहिएनि,कत्ते कहिएनि जे अेा ठहाका मारि हँसथि। हम कहलिएनि जे अपने भोजन क-ए लेल जाउ। ओ कहलनि, बौआ अहाँ अखन बच्चा छी तेँ अपना ऐठामक विधि- बेबहार नइ बुझै छियै। अखन हम कन्यागत छी, कोना भोजन करब। मन मे भ्ेाल जे कहि दिअनि, जौर जरि गेल मुदा ऐँठन नहि गेल। हम भुखल बुझि के कहलिएनि आ ओ शास्त्र पढ़वै लगलथि। मुदा हम चुप्पे रहलहुँ। फेरि कहलिएनि जे कम से कम एक गिलास पाइन पीवि लेल जाउ। पाइनिक नाम सुनि धड़फड़ा के कहलनि, हॅ, इ भऽ सकै अए।
जुही ः चाह-ताह पीबै ले नइ कहलिएनि?
कर्मनाथ: अपना ऐठाम (इलाका) ते चाहक चलनि (1935 ई0 क बाद भेल) आब भेलि हेँ। जखन पाइन पीबैक लेल राजी भ गेलाह, तखन सोचलहुँ जे भरि मन सरबत पीआ देबनि। मुदा बाउ, अपना ऐठाम गिलास मे पाइन बच्चा पीबैत छल चेतन लोटा मे पीबैत छल। एकटा बड़का लोटा अपना घर मे अछि, जइ मे तीनि किलो से बेसिये पाइन अँटैत अछि। ओही मे भरि लोटा सरबत बना कऽ अनलौ आ आगू मे रखि देलिएनि। लोटा देखि ओ हँसि देलनि।

जुही ः सरबत देखि कऽ हँसलथि आ कि मने खुशी भऽ गेल रहनि।
कर्मनाथ: से ते ओ जानथि। मुदा तखन से हँसी मेटेलनि नहि। लोटो भरि सरबत पीबि लेलनि। सरबत पीबि, बटुआ खोलि पान निकालि मस्तगर खिल्ली लगा, मुह मे दइत कहलनि, आब मन हल्लुक भ गेल। जते हुनकर मन हल्लुक होइत जाइन तते हमरो मन मे शान्ति अबैत गेल। मुदा करेज सक्कत हुअए लगल। हम कहलिएनि, किछु दिन अपने केँ प्रतीक्षा करै पड़त। मुदा एते अखन जरुर कहि दइत छी जे जहि काजक लेल अपने परेशान छी ओ परेशानी जरुर मेटा जायत। एते सुनितहि ओ बजै लगलथि जे हम सब मिथिलाक बासी छी तेँ मैथिल छी। हमरा सबहक पूर्वज नारीक जिबठ (साहस) के जनैत छेलखिन। किऐक त जिनगी-जिनगी भरि नारी परपुरुषक मुह नहि देखलनि, भले ही ओ बाल-विधवे किऐक ने भऽ गेल होथि। जे हमर धरोहर सम्पत्ति छी। हँ, आइ भले ही समाजक विकृतताक चलैत किछु अनुचित जेँका जरुर भऽ गेल अछि। मुदा अस्सल तथ्य सभकेँ बुझैक चाही। हम दुनू गोटे गप-सप करिते रही कि ओमहर (कोठरी मे) पिताजी गरजि अन्ट-सन्ट बजै लगलथि।
फुलेसर ः अढ़े से बावा बजथि, सोझा मे किअए ने ऐलाह।
कर्मनाथ : से त ओ जानथि। ओ (तोहर नाना) उठि के विदा हुअए लगलाह कि हम गोड़ लगलिएनि। गोड़ लगितहि ओ बटुआ खोलि पाँच टा रुपैया हमरा हाथ मे दइत कहलनि बाउ, मिथिला अखने पुरुष-विहीन नइ भेलि अछि, आ ने हैत। आब अहीं सबहक (नव युवक) हाथ मे सब कुछ अछि, तेँ, जना कऽ आगू ल चली। कहि चलि गेलाह।
फुलेसर : अहाँ की केलियै?
कर्मनाथ: बी0 ए0 धरि हम कहियो, कोनो क्लास मे फेल नहि केने छलहुँ, तेँ मन मे पढ़ैक उत्साह एक्को पाइ कमल नहि छल। सोचलहुँ जे जखन नोकरी करैक अछि तखन एक बेरि प्रशासनिक परीक्षा मे बइस कऽ देखियै। नइ पास करब ते नइ करब। दू वर्ख मेहनत कऽ परीक्षा मे बैसलहु। पास केलहुँ। पास केलाक बाद विआह केलहुँ। आब पैछला खिस्सा-पिहानी छोड़ह। अखन परिवारक सब कियो छी, तेँ एकटा विचार कइये ली।

फुलेसर ः (साकांच होइत) हम सब त बच्चा छी, की विचार दऽ सकै छी। मुदा बुझि त सकै छी।
कर्मनाथ: बौआ, कोनो परिवारक बच्चा, न एक्के बेरि सियान होइत अछि आ ने एक्के रंग रहैत अछि। किऐक त सब परिवारक वातावरण एक्के रंग नहि होइत अछि।ं पढ़ल-लिखल परिवारक बच्चा आ बिनु पढ़ल-लिखल परिवारक बच्चा मे बहुत अंतर होइ छै। तहिना अगुआइल परिवारक (सम्पन्न) बच्चा आ पछुआइल परिवारक (गरीब) बच्चा मे सेहो बहुत अंतर होइत अछि। ऐहेन- ऐहेन अनेको कारण अछि जहि स दू परिवारक बच्चा के दू रंगक वातावरण भेटैत छैक। तेँ दू रंगक होइत अछि।
चमेली ः जेकर माए-बाप खूँटा सन-सन ठाढ़ रहत, अनेरे ओहि बच्चा कऽ परिवारक काज किअए पूछबै।
कर्मनाथ: बिनु वुझनहि अहाँ किअए सब वात मे टाँग अड़ा दइत छियै। (भाव बदलैत) ओना अहूँक दोख बड़ बेसी नहिये अछि किऐक ते अहुँक विचार एक रस्तेक अछि। जे रास्ता व्यवस्था स जुड़ल अछि। अइ दुनियाक अजीव बुनाबटि अछि। कने नीक जेँका बुझियौ। विषुवत रेखा बीच दुनिया मे अछि। रेखा से उतरो आ दछिनो, समान दूरी पर, एक्के रंग मौसम होइत अछि। मुदा विपरीत समय मे। तहिना विचारो आ जिनगियोक अछि। अखन चम्पाक विआहक संबंध मे विचारेैक अछि तेँ बेसी नहि कहब। कोनो परिवार, परिवारक सव सदस्यक होइत, नहि कि परिवारक गारजने टाक। हँ, इ बात जरुर अछि जे परिवारक सब काजक भार गारजने पर रहैत अछि एकर माने इ नई जे बच्चा सब बुझवे ने करए।
फुलेसर : बहीनिक विआहक चरचा करै छेलियै?
कर्मनाथ: जे बात बौआ तू पुछलह, सैह हमहू कहै चाहै छिअह। तीनू भाइ-बहीनि मे चम्पा जेठ छह। बी0एक रिजल्टो निकलिये गेलइ। अपना मन मे जे छल ओ भइये गेल। उमेरोक हिसाब से अठारहम पुरि उनैसम चढ़ल, तेँ आब बिआह क लेब, उचितो हैत। कथा-कुटुमैतीक सवाल अछि, तेँ किछु समय लगबे करत।
फुलेसर ः किछु दिनक बाद चलितहुँ
कर्मनाथ : देखहक, ओना त हमहू नीक-नाहँाति नहिये बुझै छी किअए त सब दिन बाहरे रहलौ। मुदा देखै छियै जे किछु मास छोड़ि लोक बेटा-बेटीक बिआह सब मास करैत अछि। तखन ते सब मासक अप्पन-अप्पन गुण छै। तइ मे हमरा बुझैत फागुनक काज बढ़ियाँ होइत अछि। जाड़क मास मे बेसी जाड़ आ गरमी मास मे हबा-बिहाड़िक संग रौउदो तीख होइ छै। तेँ फागुनक दिन सबसँ नीक।
(चम्पा बिआहक चर्च सुनि सबहक मनमे सब रंगक विचार उपकै लगल। चमेलीक मन मे बेटी जमाइ आ परिवार नचै लगल। जबकि चम्पाक मन मे बदलैत जिनगी। जुहीक मन मे बहीनिक विआहक आनन्द त फुलेसरक मन मे माए-बापक परेशानी। खुशी स जुही गीत गबै लगली।)
चमेली ः बेटी विआहक चर्च, बेटीक सोझा मे करैत लाज-धाक नइ होइ अए।
कर्मनाथ : से की?
चमेली ः आइ धरि ऐहेन कतौ देखने-सुनने छेलियै। आ कि मन मे सनकी सवार भऽ गेल अछि। जे मन मे अबै अए बकै छी।
कर्मनाथ: (मुस्की दइत) जकरा अहाँ नीक परम्परा बुझै छियै, भऽ सकैत अछि। जखन समाज मेदहेज(खरीद-बिकरीक) चलनि नहि रहल छल हेतइ। पढ़लो-लिखल नहिये जेँका छलै। मुदा आइक बेटी पढ़लक-लिखलक हेँ। ओ अपन जिनगी क बात बुझै लगल हेँ। तेँँ माए-बापक ओकाइत आ अपना प्रति माए-बापक सेवा ओकरा सोझा मे अछि। ते,ँ ओ खुद अपन विआहक विचार कऽ सकैत अछि। ऐहेन त नहि जे वेटीक चलैत माए-बाप डूबि जाय वा माइये-बाप बेटी के डुबा दइ। जहाँ धरि अनमेल विआहक बात अछि ओ लेन-देनक चलैत रहल अछि। तेँ बेटी के अपना पर भरोस कऽ अगिला जिनगीक लेल डेग बढ़वै पड़तै। जइ समाज मे नारी शिक्षा कऽ अधला मानल गेल ओहि समाज मे लड़का-लड़की समान कोना भऽ सकैत अछि। तखन रहल रंग-रुपक समानता,रंग-रुपक समानता परिवारक रंगरुप समाप्त कऽ दइत अछि। तहू स जुआइल गहूमन, बिनु केंचुआ छोड़ला जेँका, कात मे बैसल अछि। ओ छी जाइतिक भीतर जाइतिक कुल-मूल।
फुलेसर ः बाप रे बाप, जइ समाज मे एते रंगक विषमता अछि ओ समाज एक रास्ता स चलि कोना सकैत अछि। समाजक बात त कात रहअ जे परिवारो कोना चलि सकैत अछि। मर्द औरत (पति पत्नी) परिवारक मुख्य अंग होइत, जहिना गाड़ीक पहिया। मुदा गाड़ीक एक पहिया मजगूत होय आ दोसर कमजोर त समुचित भार ल गाड़ी कोना चलि सकत। तहिना त परिवारो अछि।
कर्मनाथ: बौआ, समाज आ परिवार एहि रुपे, पुरान कपड़ा जेँका, चिड़ी-चोंट भऽ कऽ फटि गेल अछि जेकरा सीला से काज नहि चलि सकैत अछि। जाधरि ओहि मे पीओन-चेफड़ी लगा-लगा काज चलाओल जाइत अछि, जाइत अछि। मुदा एहि स काज कते दिन चलत। अखन हम एहि स बेसी नहि कहबह। किऐक त अखन अपने सिर पर काज अछि, जहि लेल सोचैक अछि।
चमेली ः जखन चम्पाक विआह करैक विचार करै छी ते गहना जेबरक ओरियान कहिया करब?
कर्मनाथ: (चम्पा दिशि देखि) कहलौ ते ठीके, मुदा जकरा रुपैआ नइ रहतै ओ की करत?
चमेली ः छुछ देहे बेटी सासुर जायत, से अपना नीक लागत।
कर्मनाथ: कहलौ ते ठीके, मुदा जकरा अहाँ मान-मरजादा वुझै छियै ओ सिर्फ गहने-जेबर छी। गरीब लोक जे गहना-जेबरक सिहिन्ता करै अए अेा ओकर मुरुखपना छियै। कने आखि उठा के देखियौ जे कोन परिवारक माए-बाप अपना बेटी के किछु नहि किछु गहना नइ देलक, मुदा ककरा घर मे एकटा कनौसियो छै। तेँ गरीब लोक के एकर (गहनाक) सिहनते नइ करैक चाहियै।
फुलेसर ः बावूजी, जखन ऐहेन ओझराओठ काज अछि आ अखन धरि किछु केलहुँ नहि, तखन लगले कोना काज निपटाएब?
कर्मनाथ : हम संकल्प क कऽ गाम जा रहल छी, तेँ विआह हेबे करतै। काज कोना हैत से हमरा मन मे अछि। हम्मरबेटी सुगक अनुकूल अछि, ते ँ विआह नइ होइक कोनो कारणे नहि अछि। (चम्पा से) बाउ, हमर जेठ बेटी छिअह। पढ़ल-लिखल सेहो छह। ते ँ तोरा किछु बात कहि दिअए चाहै छिअह। दुनिया दिशि नइ देखह अपना आ अप्पन माए-बाप के देखह। हम पढ़ि कऽ प्रशासनिक अफसर बनलौ मुदा तोहर माए कते पढ़ल छथुन। फेरि परिवार कोना चलैत अछि। तोरा हम बी. ए. पास करा देलियह। तोरा मे ओतेे क्षमता आबि गेल छह जे स्कूल, आॅफिस, बैंक वा आन कोनो काज कऽ सकैत छह, तखन तेाहर जिनगी भारी किअए हेतह। मन से इ हटा लाय जे हम उपारजन नइ कऽ सकै छी। जहिना पुरुख उपारजन करैत अछि तहिना तोहूँ क सकै छह। हम तोहर बाप छिअह, तेाहर अधला हुअ, इ हमरा मन मे कोना आओत?
चमेली ः गाम मे जे खेत-पथार अछि, जइ से एक्को सेरक आशा कहियो ने होइ अए, भाय सब बेचि-बेचि खाइ अए, ओ बेचि कऽ बेटीक बिआह क लिअ।
कर्मनाथ : कहलौ ते ठीके मुदा जाधरि पिताजी जीवैत छथि ताधरि हम्मर बेचब उचित होएत। एक त ओहिना पिताजी (दहेज हाथ नइ लगला स) कड़ुआइल छथि, तइ पर स ज ऐहन काज करब त परिबार मे विस्फोट होइ मे बाँकी रहत। हम बेटीक विआह करै ले गाम जायब कि घर मे आगि लगवै ले।
फुलेसर ः (चिन्तित भऽ) बड़ भारी काज उपस्थिति-भऽ गेल अछि, बावूजी।
कर्मनाथ : (मुस्कुराइत) बौआ, अखन तू बच्चा छह; तेँ नीक जेँका परिवार आ समाज के नहि जनैत छहक। जहिना फुलवारी मे सैकड़ो रंगक फूल रहै छै, मुदा कात से देखिनिहार त कातेक फूल देखैत अछि। बीच मे कोन फूल केहेन छै, से थेाड़े देखैत अछि।
फूलेसर: अहाँक बात हम नहि बुझि सकलहुँ, बावूजी।
कर्मनाथ : फुलवारीक त उदाहरण देलियह। असल बात समाजक अछि। फुलबारिये जेँका समाजो मे अछि। हजारो रंगक मनुष्य समाज मे रहैक अछि। हर मनुष्य केँ अप्पन-अप्पन जिनगी, अप्पन-अप्पन विचार होइत अछि। जहि स अप्पन-अप्पन संकल्प आ उदेस (उद्देश्य) सेहो होइत अछि। नीक स नीक आ अधला स अधला मनुष्य समाजक पेट मे नुकाइल रहैत अछि। जेकरा सिर्फ देखिनिहारे देखि पबैत अछि। सब नहि। मुदा एकटा बात कहि दइत छिअह जे जखन कोनो काज करै ले डेग उठाबी ते देहक सब अंग के चैकन्ना क कऽ राखी। जेकर सब अंग क्रियाशील रहत ओ माइटिक रास्ताक कोन बात जे पाइनियो आ हवोक रास्ता स चलि सकैत अछि। तेँ सदिखन आशावान भ कऽ डेग बढ़ेवाक चाही।

 










दोसर अंक
(सोमनाथक दरवज्जा। सेामनाथ मसलन पर ओंगठल, आशा आ नूनू दुनू भाग बैसल।)
सोमनाथ ः बाउ नूनू , आइ जे भाँग पिऔने छेलह से कतऽ से अनने छेलह? अप्पन घरक पत्ती त नहि छेलह। बहुत दिन बाद ऐहेन मस्तगर भँाग पीलहुँ। आब कने चाह पीआवह। तखन, परसु जे कर्मनाथक पत्र आयल छेलह, ओ पढ़ि कऽ सुनविहह।
(नूनू चाह अनै जाइत) (पत्नी स) एकटा बात कहू।
आशा ः की?
सोमनाथ ः कने विआह दिनक बात मन पाड़ियौ ते। ओइ दिन इ बात कल्पनो केने रही जे एक दिन हमहू सब अथबल हैब।
आशा ः (खौंझा कऽ) मन बौआइ अए। जते बूढ़ भेल जाइ छी तते बुद्धियो टूटि-टूटि खसै अए। एतबो नै बुझै छियै जे अइ दुनियाक नियमे छै जे जन्म लेब, जुआन हैब आ बू़ढ़ भ कऽ मरि जायब। अगर जँ से नहि होइत आ पहिलुको लोक सब जीबिते रहितथि ते अहाँ के कि हमरा के पूछैत?
(चाह ल कऽ नूनू अवैत। एकटा कप सोमनाथक हाथ मे आ एकटा आशाक हाथ मे दइत)
सोमनाथ ः (चाहक चिस्की लइत) सात घर मुद्दइयो किअए ने हुअए मुदा भगवान जँ ओकरो बेटा देथुन ते नूनू सनक देथुन। जे बेटा बाप-माएक सेवा नै केलक ओहो कोनो बेटे छी। कखनो काल मन मे अबै अए जे दूटा समाजोक लोक कऽ आ अपनो दियाद-बाद केँ बैइसा कहि दिअए जे हमरा मुइला पर नूनूए आगि दिअए।
आशा ः ऐना किअए बजै छी। लोक सुनत ते की कहत। जखन भगवान तीनि टा बेटा देने छथि ते हमरा लिये सब बरावरि। जेकरा हाथे आगि लिखल होएत, ओ देत। कोनो कि देखै ले एबइ। माए-बापक अप्पन करतब छै, बेटा-बेटीक अपन होइ छै। तइ ले अनेरे माथ किअए धुनै छी।
सोमनाथ ः (बिगड़ि कऽ) जे बेटा जीबैत मे कटहर लगा कऽ मोजर नइ दइ अए ओ मुइला पर सोनाक मंदिर बना देत। अहाँ सैह बुझै छियै।
आशा ः (झपटैत) जना अहाँ अपना माए-बावू केँ सोनाक मंदिर बना देने होइएनि, तहिना बजै छी। जेहने किरिया-करम क कऽ मरब तेहने ने फलो हैत। जँ अशुद्ध (अधलाह) किरिया क कऽ मरब ते भूत-परेत (प्रेत) बनि गाछी-बिरछी मे बौआइब, नइ जे शुद्ध (नीक) किरिया क कऽ मरब ते स्वर्ग मे जायब। देखै नै छियै जे पपियाहा सब जे मरै अए ते ओहिना बौआइत रहै अए। पियास लगै छै ते इनार पर जा-जा लोकक धैला फोड़ै अए आ भुख लगै छै ते बाट-बटोही के पटकि-पटकि सनेस छीनि-छीनि खाइ अए। हमरा की अहाँ के विधाता छठियारे दिन लिखि देने छथि, से त हेबे करत।
सोमनाथ ः (पिनकि कऽ) मौगीक बातक कोनो ठीक नै। लगले कहै छी जे जेहेन किरिया करब तेहेन फल हैत आ लगले कहै छी जे छठियारे दिन विधाता लिखि देलनि। अच्छा, एकटा बात कहू ते, जाबे जीबै छी ताबे ने लिखलाहा हैत आ कि मुइलाक बादो।
आशा ः अहाँ के की होइयै जे मुइलाक वाद फेरि से लिखायत। आ कि छठियारे दिनक लिखल मुइलाक वादो हैत।
(पनबट्टी स पान निकालि मुह मे दइत सोमनाथ)
सोमनाथ ः (मुहक पान गाल तर दवैत) बेटा नूनू , अगर ज भगवान गाहीक-गाही बेटा नहियो दथि आ तोरा सन एकोटा रहए त ओइ गाहीक-गाही स नीक। अपना सबहक जे बाप-दादा कहने छथिन जे माए-बापक सेवा करब बेटाक सबसँ पैध धर्म थिक। से कोनो अधलाह कहने छथिन। अखनो जे इ दुनिया चलैत अछि से तोरे सन-सन बेटाक धर्म पर। नइ ते इ दुनिया कहिया ने अलोपित भऽ गेल रहैत। किऐक ते तते ने चोर-उचक्का, बइमान-शैतान सब फड़ि गेल हेन जे एक्को दिन इ धरती असथिर रहैत। अच्छा, एकटा बात कहह जे औझुका भाँग कतऽ स अनने छेलह।
नूनू ः औझुका कोन भाँग छेलए से नइ बुझलियै। दछिनवारि टोल मे जे दिनेश अछि ओइह दरभंगा से अनने अछि।
सोमनाथ ः के दिनेश?
नूनू ः हीरा कक्काक बेटा। दरभंगा कओलेज मे पढ़ै अए।
सोमनाथ ः (किछु मन पाड़ैत) हीरालाल। ओकरा ते कहियो भाँग मुह मे लइत नै देखलियै। तेकर बेटा ऐहेन ओसताज भऽ गेल।
नूनू ः ऐँह, जेहने मजगर भाँग पीवए अए तेहने टिपगर तमाकुलो खाइ अए। गाम मे ओहन माल के देखत। अपना सब ते ओ भाँग पीबै छी जे बाड़ी-झाड़ी मे अनेरुआ जनमै अए। ओ शुद्ध कलमी भाँग पीबए अए।
सोमनाथ ः भाँगो कलमी होइ छै, हौ।
नूनू ःअहाँ ते पुरना गीत गबै छी। विज्ञान कते आगू बढ़ि गेल अछि से नइ बुझै छियै। आ कि सोझे हवाइये जहाज आ रौकेटे टा बुझै छियै। विज्ञान बढ़ला से खाइओ-पीवैक वस्तु बढ़ल की। अहाँ ने सदिखन कहै छियै जे बासमती धानक चूड़ाक जोड़ा दोसर नइ अछि। मुदा आब जे चूड़ा बजार मे विकाइत अछि ओकर जोड़ा बासमतीक चूड़ा करतै।
सोमनाथ ः चूड़ाक गप छोड़ह। देखते छहक जे छह मास से तेहेन रोग ने तरे-तर देह मे धेसिया गेल अछि जे सब खेलहा-पीलहा बिसरि गेलहुँ। जे ने करै बीमारी। ने ते जइ जौ के कहियो अन्न मे नइ गनलौ, से भ गेल अछि अहार। थाकल पाँव पलंग भेल भारी, आब की लादब हौ बेपारी। खाइक बात छोड़ह। कलमी भाँग कोना होइ छै, से कनी बुझा दाय।
नूनू ः एकटा बड़ भारी कम्पनी अछि। जेकर अरबो-खरबेाक कारोवार छै। वैह भाँगोक कारोवार करैत अछि। भाँगेक जूस, मोदक इत्यादि विन्यास बना-बना देश-विदेश सगतरि बेचै अए। ओइह कम्मनी भाँगक खेतीक लेल किसान के अगुरबारे खरचो आ संकर किस्मक बीओ दइत अछि। किसानो सब के, आन फसिल से बेसी रुपैइयेा होइ छै आ मेहनतो कम होइ छै। बाधक-बाध किसान सब कात-कात मे मकै रोपने अछि आ बीच मे बीधाक बीधै भाँग लगौने अछि। ओही भाँग मे मसल्ला सब मिला के जूसो, मोदको आ आनो-आनो विन्यास सब बनबैत अछि।
सोमनाथ ः अच्छा, आब दुनियादारीक बात छेाड़ह, पत्र निकालि के सुनावह।
(जेबी से चिट्ठी निकालि नूनू मने-मन पढ़ै लगैत)
नूनू ः (चिट्ठी पढ़ि) सबतुर भैया नीके छथि। चम्पा बी.ए.पास केलक। ओकरे विआहक ले लड़का भजिअवै ले लिखलनि अछि।
सोमनाथ ः (उत्तेजित होइत) तोरा दुनू भाइ के लिखने छौ कि हमरा।
नूनू ः अहीं के लिखने छथि।
सोमनाथ ः (आरो उत्तेजित होइत) पढ़ल-लिखल लोक कते बेसरमी होइ अए से देखही। तोरा मन हेतउ कि नहि, जखैन उ (ओ) बी.ए. पास केने रहए, तखैन विआहक चरचा उठौलियै। (अफसोस करैत) ओ-हो-हो, हुसि गेल। गरदनि कटि गेल। सम्पत्ति दोवरा जइतौ। बीस बीघा खेत ते बेटीक खोंइछ मे दइ ले तैयार रहै। नगद आ जेबरक कोन ठेकान। (आदर्शवादी बनैत) कहू जे कते भारी नोकसान परिवार मे भेल।
आशा ः अहाँ ते तेना बताह जेँका बजै छी जना करमू अइ घरक कियो छीहे नहि। ने अहाँ कियो छियै आ ने ओ कियो छी। बाल-बच्चा जे कनी-मनी किछु कइये गेल ते की हेतइ। तइ ले अहाँ किअए एते आमील पीने छी।
सोमनाथ ः हूँह। एते दिन बेटा सिखौलक आ आब अहाँ सिखाउ। गीदरक नंागरि किमहर होइ छै से अहीं बुझवै। दिन-राति कमाई छी, घर चलबै छी तेँ बुझि पड़ै अए जे एहिना दिन-दुनिया चलै छै। (चिन्तित होइत) आब ते सहजहि अथबले भेलहुँ , अपनो जिनगी पहाड़ बुझि पड़ै अए। मान-अपमान, इज्जत-आबरु सब बिसरि गेलहुँ। जावे जीबै छी ताबे कौआ जेकाँ टाँहि-टाँहि करै छी। (अफसोस करैत) घरक की मान-परतिसठा (प्रतिष्ठा) छल, की रुआब छल, सब चलि गेल। भगवानो रच्छ रखलनि जे सब सुख-भोग छोड़ा देलनि। जौ के फँाटी पर आनि के रखि देलनि। नइ ते हम्मर की दशा होइत से ते उगलेहे देखितथि। (गंभीर होइत) अच्छा अहीं कहू जे बेटा मनसम्फे कमाइ अए की नै? मुदा माए-बाप के की दइ अए।
आशा ः (मुह बिजकबैत) अहाँ के कोनो गत्तर (गत्र) मे लाजे ने होइ अए। जखैन ओ (कर्मनाथ) नोकरी शुरु केलक आ महीने-महीने पान सौ रुपैया पठबै लगल, ते तीनिये मासक बाद लिखि पठौलियै जे पान सौ रुपैया ल कऽ चुट्टीक बिल गहब। आ आब निरलज भट्टा जेँका कहै छियै जे रुपैइये ने दइ अए। अगर पान सैा रुपैया झुझुआन बुझि पड़ल ते कहितियै जे बौआ मासे-मास नहि, छह मास पर एक्के ठीन पठबिहह। जहि से कोनो काज चलत।
सोमनाथ ः बड़ बुद्दिआरि छी अहाँ। एकटा बात कहू ते, जे बेटा-बेटीक विआह-दुरागमन करब माए-बापक मर्यादा छी की नहि? आ कि अपने मने विआह कऽ लिअए।
आशा ः अगर जँ करमू (कर्मनाथ) अपने मने विआह कइये लेलक ते कोन बड़ भारी जुलुम क लेलक। कोनो कि जाइत गमा लेलक। दहेज नै लेलक, सैह ने केलक। ते की हेतइ। वैह कन्यागत अहाँक तिजोड़ी भरि दइते ते बड़वढ़िया, नइ भरलक ते बड़ अधला।
सोमनाथ ः की हौ बौआ नूनू। माइयक बात के तू नीक बुझै छहक कि अधला।
नूनू ः बाबू, माए पुरना विचारक लोक छथि तेँ हिनको विचार बेजाय नहिये छनि।ं मुदा आब ते युग बदलि चुकल अछि। अर्थयुग आबि गेल। जेकरे पाइ छै अेाकरे लोक मनुक्खो बुझै छै आ समाज मे मानो-प्रतिष्ठा दइत छैक। तेँ एते घाटा त परिवार मे जरुर भेल जे मोट रकम हाथ स ससरि गेल। मुदा माए, आब परिकछो (परीक्षो) बेरि आबिये गेल अछि। करमू भैया दहेज नइ लेलनि, बड़बढ़िया। मुदा आब त अपनो बेटीक विआह करैक छनि की ने?
सोमनाथ ः (फड़कि कऽ) हँ-हँ, बेस कहलहक बौआ। जनिहें मियाँ धुनै बेरिया। भने त आविये रहल हेँ। भगवाना नीक केलनि जे अथबल बना देलनि। ने किछु करब आ ने दोखी हैब।
आशा ः बौआ नूनू , तू ने कहै छहक जे अर्थयुग आवि गेल, तेँ सब काज पाइयेक हाथे हैत। मुदा एकटा बात वुझै छहक जे मनुक्ख मनुक्खे रहत। युग कोनो अबै आ कि जाय, मुदा नीक काज करैवला नीके काज करत आ अधला काज करैवला अधले करत। जइ बेटाक दोख तू दुनू बापूत लगवै छहक ओइ बेटाक गुणो बुझै छहक। अप्पन परिवारक कोन बात जे गामे मे अप्पन कर्मनाथक जोड़ा कैक टा अछि। मनुक्ख ते सौँसे गामे भरल अछि।
सोमनाथ ः अहाँ हाकिम बेटा ल कऽ नाचू, मुदा हम ते सोमनाथे छलो आ रहबो करब। हमरा नूनू सन बेटा रहक चाही। जखैन जे कहै छियै, दासो-दास रहै अए।
आशा ः अही सन हमहुँ नै ने छी जे कर्मनाथ सन बेटा पर ओंगरी उठाएब। अपनो ते दू टा बेटी आ (कर्मनाथ छोड़ि) दू टा बेटो अछिये, किअए ने एकोटा हाइयेा स्कूल धरि देखलक। बेटेक चलैत पोती बी.ए. पास केलक। तेकरा अहाँ मनुखे ने बुझै छियै। जेकरा अहाँ नै मनुख वुझवै ओ अहाँ के मनुख बुझत?
सोमनाथ ः (शान्त होइत) आब हमरा कोन मनुख बनैक काज अछि। मृत्युक रास्ता मे अटकल छी, जखन रसीद कटि जायत, राम-राम क कऽ विदा भ जायब।
(लालबावूक आगमन)
सोमनाथ ः भरि दिन तू कतऽ निमत्ता रहै छह, लालबावू?
लालबाबू ः ऐँह, की कहब बाबू! ककर मुह देखि कऽ आइ उठलौ जे समय पर अनजलो ने भेल। सबेरे चैक दिशि गेलहुँ ते देखलियै जे मारे-लोक घेाल-फचक्का कऽ रहल अछि। अनगैाँओ आ गैाँओ थाहा-थहि कऽ रहल अछि। ससरि कऽ हमहूँ गेलहुँ, ते देखलियै जे अनगौँआ सब सन-सन कऽ रहल अछि। गौँआ सबमूड़िआरी दऽ दऽ खाली सुनैत अछि। मन असथिर भेल। एक गोटे के पुछलियै जे भाइ की बात छियै जे अहाँ सब ऐना सन-सन करै छी? कत्तऽ हेँड़ बान्हि कऽ जा रहल छी, ओ कहलक, हमरा गामक (खैरबोनीक) एकटा विद्यार्थी दरभंगा मे पढ़ैत अछि। लौज मे रहै अए। ओही लौज मे पीपराघाटक सेहो पान-सात गोटे रहैत अछि। एक ठाम रहने सबके-सबसे चिन्हारय छै। पीपराघाटक विद्यार्थी सब हमरा गामक विद्यार्थी के फुसला कऽ अपना गाम ल गेल, आ एकटा लड़कीक संग बलजोरी वियाह करा देलक।
सोमनाथ ः लड़काक बाप के बिना पुछिनहि?
लालबाबू ः हँ, तेँ ने लड़काक सवांग सब जुटि के पीपराघाट जाइ अए। लड़काक पितिऔत भाइ कहलक जे दस लाख रुपैआ पर लड़काक विआह सतगछिया ठीक भेल छै। जइ मे एक लाख रुपैया अगुरवारे देनहुँ अछि। बाकी रुपैया विआह स चारि दिन पहिने देवाक बात पक्का भ गेल छै।
सोमनाथ ः जखन लड़का-लड़कीक विआह भ गेलइ, तखन लड़कावला सब जा कऽ की करतै?
लालबाबू ः ऐँह, की करतै? तेहन गरमाइल लोक सब के देखलियै जे बुझि पड़ल जना बेटी वलाक घरक कोरो खींचि लेतइ। आ अहाँ कहै छियै की करतै?
सोमनाथ ः कते गोरे खैरबोनीवला सब छेलइ?
लालबाबू ः कोनो की गनलियै, मुदा चालीस-पचासक धत-पत छलै।
नूनू ः आइये खैरबोनीवला सबहक दालक छुटतै। तेहेन शैतानक चरखी पीपराधाटबला सब अछि जे आइये बुझि पड़तै। तहु मे एकटा तेहेन खूँखाड़ नेताक धसना पाटी अछि जे काजे यैह करै अए।
सोमनाथ ः (दुनू हाथ माथ पर लऽ) कोन जुग-जमाना चलि आयल से नहि जाइन।
नूनू ः बाबू, भगवान के कहिअनु जे दस बर्ख आरो औरदा दथि। तखन देखबै जे की सब होइ छै।
सोमनाथ ः तकर बाद की भेलइ?
लालबाबू ः सब कियो चाह-पान खा उत्तर मुहे सनकल विदा भेल। जखन ओ सब कनी चैक से आगू बढ़ल कि हमहू ससरि कऽ रतनाक चाहक दोकान पर आवि गेलहुँ। चाहक देकान पर नीक-नहाँति बैसलो ने रही कि सुरजा आयल। तामसे ओकर मुह तुरुछ जेँका भेल, मुदा किछु बजै नहि। पूछलियै जे सुरुज मन बड़ खिसिआइल छह। ओ कहलक, लालबाबू की कहब! दुनिया मे सब बेइमान भ गेल। ककरा के अप्पन बुझत। से की? हमरा सार के बेटीक विआह मे करजा भ गेलइ। ने रुपैआ होइ छलै आ ने महाजन के दइ छलै। खिसिया कऽ महाजन लालीस क देलकैेेेेेेेे। हमर सारो चलाकी केलक। ओ अप्पन सब जमीन ममिऔत भाइक नाम से फरजी कऽ देलक। ओहो साला तेहेत नेतघटू जे सब जमीन वेइमानी क दफानि लेलक। सैह, ओतइ से समाद आयल हेँ जे कनी आबि के फड़िया दिअ।
नूनू ः के केकरा पर बिसवास करत। एक त ओ वेचारा अप्पन बुझि जमीन फरजी केलक आ ओ साला केहेन गइखोक भ गेल जे सबटा बेइमानी करै छै।
लालबाबू ः अखन ते अनकर बात सुनलियै। आब अपन बात सुनू ; चाह पीबि के जहाँ घर दिशि विदा भेलहुुुुँ कि आगूऐ से गंगाइ घेरि कऽ कहै लगल।
सोमनाथ ः (उत्सुक भऽ) की, की गंगाइ कहै लगलह?
लालबाबू ः कहै लगल जे अहाँक मोहन (लालभाइ) हमर गरदनि काटि लेलनि। गरदनि कटैक नाम सुनि हम चैंकलहुँ। मन मे रंग-विरंगक बात अबै लगल। पूछलियै जे कने सरिया कऽ कहह। ओ कनैत कहै लगल जे पनरह कट्ठा खेत हुनका से नेने छलहुँ। दस हजार रुपैइये कट्ठा देने रहथि। जेकरा तीनि-चारि मास भेल हएत। खेत जोइत कऽ मकै केने छी। परसु खन मुनेसरा आबि कऽ कहलक जे गंगा भाइ मकई हमरा बाँटि दिहह। हम चैंकि गेलहुँ कहलियै जे जखन हम खेत कीनने छी ते तोरा किअए बाँटि दिअ। एते सुनिते ओ जेबी से दस्तावेज निकालि कऽ देखा देलक। ओकर रजिष्ट्री हमरा से दू मास पहिलुके छै।
सोमनाथ ः (अकचकाइत) मोहनक त चाइल-प्रकृति ऐहेन नै छै।
नूनू ः लोकक किरदानी मुह-कान देखने वुझबै। बेटीक विआह जे ओते लाम-झाम से केने छलाह से कतऽ स। एक लाख रुपिया मे पटना से खाली टेन्टे अनने छलाह। कहाँदन पच्चीस हजार भनसिया नेने छलै, तइ पर स चारि सय बरिआतीक खेनइ-पीनाइ। तहू मे जते बरिआती खेलक, तइ से बेसी समान उगरिये गेलनि।
लालबाबू ः सात लाख रुपियो गनने छलाह।
सोमनाथ ः जे सात लाख रुपिया गनत, ओ ओहने लड़का आनत?
नूनू ः लड़का अनलनि कि धन। डेढ़ सय बीघा जमीन लड़काक माथ पर पड़ै छै।
सोमनाथ ः अच्छा, छोड़ह दुनियादारीक गप। लालबावू के कर्मनाथक पत्र देखए देलहक।
नूनू ः कहाँ। नहि!
(नूनू लालबावूक हाथ मे चिट्ठी दइत। लालबावू चिट्ठी पढ़ै लगैत)
लालबावू ः दिन पनरहम छियै। हम चैके पर गुलटेनक पानक दोकान पर रही। वैह (गुलटेन) कहैत रहए जे मालिक आइ से पानक खिल्ली मे एक रुपैआ बढ़ा देलियै। किऐक ते पानक सब मसल्ला महग भ गेल। तहि बीच एक गोटे साइकिल से आयल। साइकिल दोकानेक आगू मे ठाढ़ कऽ गुलटेन के पुछलकै, पोलीथीन अछि। गुलटेन मुसकिया देलकै। ओ कम्पनीक नाम पुछलकै। पानोबला मूड़ी डोला देलकै। किलो भरिक एकटा पोलीथिन बढ़ा देलकै। ओहो बटोही एकटा पचसटकही निकालि दोकानवला के द देलकै। ठाढ़े-ठाढ़ ओ बटोही गट दे पोलीथिन पीबि गेल। पीलाक बाद ओ बटोही दोकानदार के पुछलकै, कर्मनाथ बावूक घर ऐठाम से किमहर छनि। हमरेा कान ठाढ़ भेल।
सोमनाथ ः ओकरा किछु पुछबो केलहक?
लालबाबू ः नहि। अपने मने बजै लगल जे कर्मनाथ बावू आ हम्मर भाइ सहाएव (जेठ भाइ) एक्के ठीन रहै छथि। कमा कऽ हम्मर भाइ सहाएव अमार लगा देलखिन। हमरा गाम मे एक्केा गोटे नहि अछि जे बेटीक विआह मे एते खर्च केने हैत।
नूनू ः अप्पन कर्मनाथ भइया कि रुपैइया नइ रखने छथि। तखन ते हम सब दियाद छिअनि तेँ छिपौने छथि। पाइ रखैक लूरि सबके होइ छै। कियो ढ़ोल जेँका ढ़नढ़नाइत रहत आ कियो चुपचाप दबने रहत।
सोमनाथ ः पत्रक बात त सब बुझवे केलहक। आब चारु गोटे (बाप-माए, दुनू भाइ) विचारि लाय जे की करवह?
नूनू ः जखन अहाँ दुनू गोरे (बाप-माए) छीहे तखन हम सब की कहब।
सोमनाथ ः हमरा ते साप-छुछुनरिक पड़ि भ गेल अछि। ने, हँ कहैत बनै अए आ ने नै कहैत। हँ, कहैत अइ दुआरे नइ बनैत अछि, जे सत पूछह ते हमर मन कर्मनाथ पर स ओही दिन हटि गेल जइ दिन ओ अपना मने बिआह क लेलक। देखल लक्ष्मी घुरि गेलीह। खैर, विआहो केलक ते केलक जे कमाइयो के ते एक्को पाइ कहियो नहिये देलक। मुदा छी ते बेटे। तहू मे बेटीक विआह करत। बेटी त सिर्फ माइये-बापक नहि होइत, ओ ते सबहक होइत।
आशा ः अहाँक अपने मन कखनो थीर नै रहै अए। कखनो किछु बजै छी त कखनो किछु। अहीं कहू जे जखैन करमू पान सौ रुपैया मनिआडर करैत रहै तखैन चिट्ठी मे लिखि कऽ पठौलियै जे पान सौ रुपैया से चुट्टीक बोहरि मूनब, आ आइ कहै छियै जे एक्केा पाइ नै कहियो देलक। वेचारा नोकरी करै अए, जेैह दरमाहा रहतै तेही मे ने काज चलौत। अनका देखि के करमूओ के वहिना बुझवै से ओहिना ओहो घूस-पेंच लइत हुअए तखन ने। दुनिया मे सबहक चाइल एक्के रंग होइ छै।
सोमनाथ ः औझुका लोकक भँाज अहीं पेबइ। ककरा रुपैआ बकछुहुल (अधला) लगै छै। एक बर लोक के दरमाहा रहै छै आ सात बर बाइली होइ छै।
लालबाबू ः माए गे, भइयेक एकटा संगी कमा के अमार लगा देलक हेँ। एक्के काज दुनू गोटे केँ छनि।
आशा ः बौआ, एकटा बात तूही सब कहह जे जइ सम्पतिक सुख तू सब करै छहक ओइ मे ओकर हिस्सा नै छै? ओकर हिस्सा ते अपने सब खाइ छियै। ओ कहियो किछो पूछबो केलकह हेँ। एतबो आखि मे पाइन नै छह। अगर जँ ओकरा बेटीक बिआह मे खरच नै जुमतै ते की ओ अइ सम्पत्ति मे से नइ लेत।
लालबाबू ः हमरो रहत तब ने देवइ। तू नै देखै छीही जे साले-साल खेत बेचै छी तखन कहुना के काज चलै अए। ने एकोटा पुरना गाछ गाछी मे रहल आ ने बाध मे खेत। ल द कऽ घरारी आ घरक आगू मे जे अछि ततबे रहल हेँ, सेहो अपना बुते खेती कएल होइते ने अछि। बटेदारो सब तेहेन अछि जे दूध महक डारही बाँटि के दइ अए। मुदा ओहू वेचारा सब के की कहबै, कोनो साल रौदी होइ छै ते कोनो साल दाही। लगतौ बूड़ि जाइत छै।
आशा ः से ते हमहूँ देखै छियै, मुदा रौदी-दाही दुआरे ककरो उचित कल्याण रुइक जेतइ। बेटा-बेटीक वियाह सबके हेबे करतै। घर-दुआर बनबै पड़तै। धिया-पूताक पढ़ौनी, बर- बेमारी मे खरच हेवे करतै। तहू मे हम दस कुटूम परिवार वला छी। एकरा सबके छोरबहक से बनतह। परिवार किअए कहौल कै।
सोमनाथ ः एते राँउ-झाँउ करैक कोन काज छह बौआ। अन्हार घर सापे-साप। जखन कर्मनाथ आओत, विआहक चरचा करत, तखन ने पुछबै जे बौआ कोना काज करबह? ऐठाम ते देखते छहक जे जेकरो ने किछु रहै छै, बोइन-बुत्ता करै अए, ओहो एक-आध (एकाध) लाख रुपैआ बेटीक विआह मे खरच करै अए। जबकि अप्पन परिवार त से नहि छह। कतबो काटि-छाँटि के विआह करवह, तइओ दस लाख खरच हेबे करतह। तहू मे अपना सबहक समाज तेहेन गड़िबहू अछि जे एतवो नै बुझै अए जे जे माए-बाप बेटी के पढ़बै मे ओते खर्च करै अए ओकरा से रुपैआ कोना मंगबै। से लाज थेाड़े ककरो होइ छै। नमहर-नमहर भाषण क लेत, मुदा करै काल छुतहरो से छुतहर भ जाय अए। ऐहेन छुतहर समाज मे लोक कोना जीबत।
भीतर स ः दादी, दादी, कर्मनाथ कक्का ऐलखिन।
(आशा उठि कऽ भीतर जाइत। कर्मनाथक परिवार अवैक गल्ल-गुल)
नूनू ः बावू, हम दुनू भाइ ते छोट छी, तहू मे अहाँ जीबिते छी। तखन ते जे भैया कहता से क देबनि।
सोमनाथ ः (मूड़ी डोलबैत) एकटा बात हमरा मन मे उपकै अए।
नूनू ः से की?
सोमनाथ ः कहीं ऐहन ने हुअए जे कर्मनाथ अप्पन रुपैआ दाबि लिअए आ खेत बेचै ले कहथुन। जँ से हेतह ते हाथो तरक जेतह आ पाएरो तरक।
लालबावू ः तखन की करबै?
सोमनाथ ः की करवहक सें हमहीं कहबह। आब तोहूँ दुनू भाय धीगर-पुतगर भेलह, आबो जे नइ सोचबहक ते कहिया सोचबहक। हम त सहजहि अथवल भेलियह, चलन-पियारा छियह हम्मर आशा कते दिन करबह। जाधरि दाना-पानी लिखल अछि ताधरि मुह देखै छह। जहिया उठि जायत तहिया चलि जायब।
(कर्मनाथक प्रवेश। पिता कऽ प्रणाम करैत। लालबावू आ नूनू कर्मनाथ केँ प्रणाम करैत)
सोमनाथ ः (असिरवाद दइत) कल्याण हुअ। वौआ, आब त हम्मर हालत एत्ते रद्दी भ गेल जे मुइले बुझह। छह मास से डाॅक्टर सब कुछ बड़ा देलक। जौ केर फाँटो खाइ छी, तेँ अखनो ठाढ़ छी। नै ते कहिया ने चलि गेल रहितौ। सैांसे देह जाँचि के डाॅक्टर कहलक जे रोग जड़ि से नै मेटाइत, तखन त पथ-पाइन करैत रहूँ। मन भेल जे सवा लाख महादेबक पूजा करा कऽ सेहो देखियै। मुदा आइ-काल्हि करै छी, ओहो अखैन धरि नहिये केलहुँ हेँ। सब परिवार आनन्द से छह की ने?
कर्मनाथ ः हँ । सब आनन्द सऽ छी। दू मास पहिने हमरो परमोशन भेल। चम्पो बी.ए. कऽ लेलक। बड़वढ़िया नम्बर एलै। फुलेसर बी.ए. मे, आ जुही मैट्रिक मे पढ़ै अए।
सोमनाथ ः (हँसैत) परमोशन भेलह ते दरमहो बढ़ल हेतह की ने?
कर्मनाथ ः हँ। अढ़ाई सय टाका महीना बढ़ल। मुदा तइ से की जिनगी मे कोनो बदलाव आओत।
सोमनाथ ः (अकचकाइत) से की?
कर्मनाथ ः दरमाहा जे बनल छै अेा परिवार आ पदक स्तरक हिसाब स बनल छै। तहू मे इनकम-टेक्स ओकरा (दरमाहा) नियंत्रित केने रहै छै। जहिना दरमाहा बढ़ै छै। तहिना इनकम-टैक्स सेहो बढ़ि जाइ छै। ततबे नहि, मकान भाड़ा, पाइन बिजलीक खर्च सब बढ़ि जाइ छै। घुमा-फिरा क कहुना परिवार चलवैत जीवि लइ छी। तीनि-तीनि टा विद्यार्थीक खर्च, शुरुहे से अपनो पढ़ै-लिखैक अभ्यास बनि गेल अछि, तोहू मे खर्च होइते अछि। तइ पर स जइ समाज मे रहै छी ओहू मे खर्च होइते अछि। इ सब खर्च त दरमहे मे से होइ अए। महीना लगैत-लगैत हाथ साफ भ जाइ अए। साल कहियौ कि मास, एक्को दिन ओहन नइ बँचै अए जइ दिन ककरो नै ककरो, किछु ने किछु बाकी नइ रहैत अछि। तखन ते कहुना जीबि लइ छी।
सोमनाथ ः तोरो से छोट-छोट नोकरी करैवला सब के देखै छियै जे कमा कऽ बुर्ज क लइत अछि। से कोना कऽ लइत अछि?
कर्मनाथ ः (मुस्की दैत) जहिना शरीर मे रोग होइत अछि तहिना मनो मे रोग होइत अछि। जे बात अहाँ कहलौ ओ मनक रोग छी। मुदा सबहक शरीर वा मन रोगाइले होइत अछि, एहनो बात त नहि अछि।
लालबाबू ः भैया, पछवारि गामक एक गोटे छथि, भरिसक अहाँ चिन्हतो हेबनि, जे कमा कऽ अमार लगा लेलनि अछि।
कर्मनाथ ः हुनका हमहुँ चिन्हैत छिअनि। हमरा से एक बैच पाछु छथि। पहिने बेसीकाल डेरा पर अबैत छलाह आ हमहूँ हुनका ऐठाम जाइ छलौ, मुदा धीरे-धीरे संबंध कमैत गेल। आब ने हम हुनका ऐठाम जाइ छी आ ने ओ हमरा ऐठाम अबैत छथि। रस्ते-पेरे जँ कतौ भेटि भऽ गेलाह ते भेटि गेलाह।
लालबाबू ः भैया, अहाँ जे चम्पा विआहक संबंध मे चिट्ठी लिखने छलौ से त आब अपनहुँ आबिये गेलहुँ। जहिना चम्पा अहाँक बेटी छी तहिना त हमरो भतीजिये छी। जना जे करब तइ मे हम सब कोनो अड़ंगा करब।
कर्मनाथ ः अखन ते हमहूँ विआहेक उदेस से एलहुँ, तेँ दोसर तेसर गप करब नीक नइ हैत। मुदा एकटा बात जरुर कहबह जे समय बहुत तेजी स बदलि रहल अछि, तेँ समयक संग अपनो केँ बदलै पड़तह। जँ से नइ बदलवह ते पाओल जेबह। बाबू बूढ़ भेलखुन, कते दिन छथुन तेकर कोनो ठीक नहि। मुदा तू दुनू भाइ त जवान छह। परिवार बढ़बे करतह, घटतह त नहि। तेँ खरचो बढ़बे करतह। इ त तोरा अपने पुरबै पड़तह। अखन छोट परिवार छह तखन त खेत बिकाइत छह, आ जखन खरचा बढ़तह तखन कोना पुरेबहक।
लालबाबू ः हँ, इ त ठीके कहलहुँ। मुदा नोकरियो त अपना हाथ मे नहि अछि। तखन की करबै?
कर्मनाथ ः नोकरिये के सीमा-नांगरि छै जे जे करत ओकर गुजर चलतै आ जे नै करत ओकर गुजर नै चलतै। बहुत रास काज सव अछि, जेकरा केला से धनक उपारजन होइत अछि। जे करैवला अछि ओ त नोकरियो छोड़ि अपन काज ठाढ़ कऽ करैत अछि।
लालबावू ः (मूड़ी डोलवैत) ठीके कहै छी भैया, पाछु घुरि क तकै छी ते बुझि पड़ै अए जे अखन धरिक समय फुर्र-फाँइ मे बीति गेल। आब बुझि पड़ै अए जे जीवैक लेल सबके मेहनत करै पड़तैक।
कर्मनाथ ः निचेन मे कोनो दिन नीक जेँका बुझा देबह। अखन हमहूँ काजे मे पड़ल छी तेँ पहिने एहि काज के निपटबैक अछि।
नूनू ः भैया, बेटीक विआह परिवारक सबसँ भारी काज भऽ गेल अछि। तोहू मे जेकरा पाइ-कौड़ीक अभाव छै ओकर त इज्जत-आवरु बँचब कठिन भ गेल अछि। सबसँ लाजिमी बात समाज मे इ अछि जे बेटी केहनो पढ़ल-लिखल हुअए, शील,गुण,सौन्दर्य स पूर्ण किऐक ने हुअए, मुदा ओकर कोनो मोल नहि अछि।
कर्मनाथ ः (दृढ़ता स) बौआ, चम्पाक विवाह हेबे करतै। इ हमरा अपन ब्रह्म कहि रहल अछि। जहाँ धरि दहेजक सवाल अछि, ओ हम एक्को पाइ नइ देवइ। हँ, जे बेबहारिक चलनि दछि ओ त पुरबै पड़त।
नूनू ः दहेज नइ देबइ ते काज (विवाह) हैब कटिन अछि।
कर्मनाथ ः जइ समाज मे तू दहेजक चलनि देखै छहक, ओ चुतिया समाज अछि। अेाहि समाज पर हम थूक फेकइ छी। मुदा वैह टा समाज नहि अछि। अेाहि स (समाज) हटि दोसरो समाज अछि, जे मनुक्खक समाज छी। जइ समाज मे कियो ककरो अधलाह नहि करैत अछि, आ ने ककरो अधलाह मन मे अनैत अछि। चम्पाक विआह ओहि समाज मे हेतइ। तेँ, हमरा दहेजक चिन्ता नइ अछि। तखन ते सब दिन समाज स हटि कऽ रहलहुँ , जहि स अनभुआर थेाड़े जरुर छी।


तेसर अंक
(विकास क दरवज्जा। प्लास्टिकक डोरी स कुरसी बुनैत)
श्रीचन ः (भीतरे स) विकास भाइ। यौ, विकास भाइ।
(कुरसी बीनब छोड़ि। चकोना होइत, चारु भाग विकास तकै लगैत)
विकास ः के छियह हौ। (फेरि चारु भर तकै लगैत)
श्रीचन ः (प्रवेश करैत। कान्ह पर कोदरि, हाथ मे खुरपी) बिकास भाइ। यौ विकास भाइ।
विकास ः श्रीचन। किअए ऐना अपसियाँत होइ छह, की भ्ेालह हेँ?
श्रीचन ः नाश भ गेल। गरदनि कटि गेल।
विकास ः (अकचकाइत) की नाश भेलह? मन असथिर क कऽ बाजह।
श्रीचन ः अइ से एकटा बेटा मरि जाइत, से नीक। मुदा भरल-पुरल चास नाश भेने त दू मासक मेहनत बुइर गेल।
विकास ः ऐना किअए मुह से अधला बात निकालै छह।
(कोदरि, खुरपी रखि। दुनू हाथ माथ पर लइत, कनैक मुद्रा मे श्रीचन)
श्रीचन ः भाइ की कहब। भगवानो बड़ धड़कट-बेईमान छथि। किअए लोक अपना कऽ हुनकर सनतान वुझैत अछि। जखैन ओ भगवान छथि ते सबपर एक रंग नजरि राखथि। से कहाँ रखै छथि। हुनको मे दूजा-भाव छनि। ककरो पर खुशी भऽ कऽ खूब दइ छथिन आ ककरो भेातहा कचिया (हाँसू) से गरदनि हलालि दइ छथिन।
विकास ः तेना ने तू बजै छह जे हम किछु बुझवे ने करै छिअह। कने खोलि कऽ साफ-साफ बाजह।
श्रीचन ः की खोइल कऽ कहब भाइ! अहाँ त सबटा बुझबे करै छियै, तइयो अनठा कऽ पूछै छी।
विकास ः अनठा के कहाँ पुछै छिअह। तेना ने तू कहै छह जे हम अखनो धरि बौआइते छी। उनटे तोंहि कहै छह जे सबटा अहाँ बुझिते छियै। कनी फरिछा के कहह।
श्रीचन ः अहाँ ते जनिते छी जे हम ने गिरहत छी आ ने बोनिहर। चैदह-पनरह कट्ठा खेत अछि, तेही मे खेतियो करै छी आ अपना काज नै रहै अए ते बोइनो करै जाइ छी। पान-सात कट्ठा तरकारीक खेती करै छी जइ से अपनो खाइ छी आ दू-चारि पाइ के बेचिओ लइ छी। चारि कट्ठा टमाटरक खेती केने छलौ, से सबटा गलि गेल। जना कियो चोरा कऽ नोन छीटि देने हुअए, तहिना।
विकास ः टमाटर गलि गेलह ते हमरा की कहै छह?
श्रीचन ः चलु , कनी मधमन्नी चलु।
विकास: किअए?
श्रीचन ः ओइ बीआवला कम्पनी पर लालीस करबै। अपने ते कोट-कचहरीक पेंच-पाँच बुझै नै छियै, तेँ अहाँ के संगे ल जायब। ओइ बीआवला के सिखा देवइ जे मरदक पल्ला केहेन होइ छै। जाबे ओकरा जहल मे नइ ढ़ुकाएव ताबे हम्मर मन असथिर नै हैत। जेँ चारि कट्ठा टमाटर गेल तेँ दू हजार रुपैआ आरो जा।
विकास ः कनी सरिया के सब बात कहह।
श्रीचन ः दू मास पहिलुका गप छी। जतराक (यात्राक) परात झंझारपुर हाट बीआ कीनै ले गेलौ। ओना अप्पन चिन्हरबो दोकान अछि। मुदा केान दुरमतिया कपार पर चढ़ि गेल जे ओइ दोकान नइ जा हाटे दिशि बढ़ि गेलौ।
विकास ः अप्पन चिन्हरबा दोकान किअए ने गेलह?

श्रीचन ः की कहब भाइ, हाट से कनी पछुऐ रही कि बड़का भेामहा (होरन) से बीआ-बाइलिक परचार होइत सुनलियै। खूब जोर-जोर से अमेरिकन कम्पनीक परचार करैत रहै। हमरो जना डोरी लगि गेल। जहिना अजगर सापक आखि पर आखि पड़ला से होइत, तहिना भोमहाक अवाज हमरा मन के पकड़ि लेलक। आन कोनो चीज देखबे ने करियै। जाइत-जाइत हमहूँ ओतए पहूँच गेलहुँ। एकटा खूब नमहर मोटर गाड़ीक उपर मे दू टा भेामहा, दुनू भाग घुमा के लगौने रहै। गाड़ीक बगल मे बीआ-बाइलिक खूब नमहर दोकान सेहो लगौने रहै। ओहि दोकानक चारु भर लोक सब वैसि के बीआक पौकेट सब देखैत रहै। दू गोटे दुनू भाग बैसि कऽ बीआ बेचैत रहै। पाँच गराम से ल कऽ किलो भरि-भरिक पौकेट सब रहै। पौकेट सब पर, जइ चीजक बीआ रहै, खूब रंगर फोटो सब बनल रहै।
विकास ः अमेरिकन कम्पनी रहै, से तू कन्ना बुझलहक?
श्रीचन ः भेामहो से परचार करैत रहै आ दोकानदारो कहैत रहै।
विकास ः देखै मे दोकानदार केहेन रहए?
श्रीचन ः ऐँह, की कहब भाइ; तीनू गोटे एक्के रंग देखै मे लगे। घोरहा रंग, पितरिया आखि आ मकैइया केश तीनूक रहै।
विकास ः (छुव्द होइत) घोरहा रंग, पितरिया आखि आ मकैया केश......।
श्रीचन ः अहाँ नै वुझलियै भाइ। तीनू एक्के रंग घोर जेँका (छालही मोहि कऽ घोर बनैत) उज्जर दप-दप। तेँ कहलौ घोरहा रंग। अपना सबहक आखि, केहेन सुन्दर कारी अछि आ ओहि तीनूक आखि पित्तरि जेँका देखै मे लगइ। तेँ कहलौ पितरिया आखि। आ जहिना मकै बाइलिक उपर मे जे रुँइयाँ जेँका रहै छै तहिना तीनूक केश देखै मे लगई। अपना सबहक केश केहेन सुन्दर कारी अछि से ओकरा सवहक नइ रहै।
विकास ः (हँसैत) तीनू मौगी रहै कि पुरुख?
श्रीचन ः यौ भाइ, इ हम ठीक-ठीक नइ कहब। किऐक ते तीनूक मुहो-कान आ उमेरो एक्के रंग बुझि पड़इ। मोछ-दारही रहितइ तखैन ने बुझितियै। से तीनू मे ककरो ने रहै। रहबे ने करै आ कि कटौने रहे, से नहि कहि।
विकास ःमोछ-दारही ने रहै, मुदा माथोक केश से नइ वुझलहक?
श्रीचन ः की कहब भाइ, अपना सबहक केश केहेन मरदनमा अछि। स्त्रीगणक केश नमहर होइ छै, से ओकरा सबहक नइ रहै।
विकास ः तब केहेन रहै?
श्रीचन ः ने मौगियाही केश रहै आ ने मरदनमा। ने बाबरी सीटे जेागर रहै आ जुट्टी गुहै जोकर। खोपाक त कोनो बाते नहि। ओहिना सोझे पाछु मुहे उनटौने रहै। जे लटकि के गरदनिये धरि रहै।
विकास ः सिनुरो लगौने रहै कि नहि?
श्रीचन ः ओह। एक्को गोटे सिनुर नइ लगौने रहै।
विकास ः आखि केहेन रहै?
श्रीचन ः कहलौ ते पित्तरि जेँका बुझि पड़ै। मुदा एक गोरेक आखि बिलाइ जेँका चकोना होइत रहै।
विकास ः (मुस्की दइत) आँइ हौ श्रीचन, तोँहू जीवनी (पारखी) भ कऽ अनाड़ी भ गेलह, जे मौगी रहै कि पुरुख से नइ वुझि सकलह।
श्रीचन ः यौ भाइ की कहब। एक्के रंगक पेन्टो आ अंगो पहिरने रहै। खाली बोलीक अवाज मे कनी फड़क बुझि पड़ै। दू गोरेक अबाज कनी मोट (भारी) बुझि पड़े आ एक गोरेक मेही।
विकास ः जेकर अबाज मेही रहए ओ केहेन रहए?
श्रीचन ः अरे बाप रे, बिलाइक आखि जेँका ओकर आखि चमकबो करै आ नचबो करै। मुदा तते हाँइ-हाँइ बजइ जे बुझैक कोन बात, सरिया के सुनबो ने करियै। हम ते खाली ओकरे मुहे दिशि देखियै।
विकास ः (हँसि) उ तोरा दिस देखह कि अनका दिस।
श्रीचन ः अइ भाग से ओइ भाग जे आखि नचबै, तखैन हमरो देखए मुदा बेसी ओ पाइयेवला सब दिशि देखए। हम ते तीनिये सइअ रुपैआ ल कऽ गेल रही। सेहो ढ़ट्ठा मे रखने रही। सोचने रही जे एक सइ मे बीआ कीनि लेब आ दू सइ के घरक चीज-बौस कीनि लेब। किअए ते लोक थेाड़े सब दिन हाट-बजार जाइ अए।
विकास ः बीआ जे कीनलहक तेकर रसीदो देलकह।
श्रीचन ः हँ। (जेबी से रसीद आ बीआक खाली डिब्वा निकालि विकास दिशि बढ़बैत) हे, यैह दुनू छी।
विकास ः (रसीदो आ पौकेटो मे लिखल मिलबैत) ऐँह, ओ त सोलहन्नी ठकि लेलकह। रसीद मे किछु लिखल छह आ पैकेट मे किछु। तहू मे तू कहै छह जे अमेरिकन कम्पनीक परचार करैत छलैक। तीनू तीन रंगक भ जाइ छह।
श्रीचन ः (निराश होइत) तब ते लालीस नइ हेतइ?
विकास ः नै। अगर अइ सबूत पर केस करबहक ते अपने फँसि जेबह। उनटे जहल जाइ पड़तह।
श्रीचन ः हमरे तीन सय रुपैइयौ ठकि लेलक आ हमही जहलो जायब।
विकास ः कानून के अपन रास्ता छै। जना कहै छह तना जे तीनूक मिलान रहितह ते केशो होइतह। से त नहि छह।
श्रीचन ः तब की करब?
विकास ः नीक हेतह जे भरमे-सरम चुपे रहि जाह। नहि ते अनेरे खरचो हेतह, खेतियो बुड़लह आ जहलो जेबह।
श्रीचन ः (गुम्म भ मूड़ी डोलवैत) भाइ अहाँक बात ते हम सब दिन मानैत एलहुँ। तेँ मानि लइ छी। मुदा हमर मन जरल अछि, जाबे ओकरा या त दस टा गारि नहि पढ़बै, वा दस थापर नै मारबै वा जहल नै ढ़ुकेबै, ताबे हमर मन शान्त नै हैत।
विकास ः अपना गलती से सब कुछ भेलह। कान पकड़ि लाय जे ककरो लल्लो-चप्पो मे नइ पड़ब। एक पर एक ठक दुनिया मे अछि। अच्छा, एकटा बात कहह ते ऐना अल्लग-बल्लग मे ठका कोना गेलह?
श्रीचन ः (कनै-कनै सन) भाइ, वेगरताक मारल मन बौआ गेल। ओना ते दू टा बेटी अछि, मुदा जेठकी बेटीक विआह तेसरे साल से करैक विचार अछि। तेसराँ बाढ़ि मे सब दहा गेल, तेँ नइ कए भेल। पौरुका रौदिये भ गेल, तेँ ने भेल। अइ बेर सोचने छेलौ जे जना-तना वेटीक विआह कइये लेब, मुदा सेहो आशा टुटि गेल। देखते छियै जे हमरा सब के बैंक से करजो ने भेटइ अए। गामक महाजनो सब हाथ-पाएर समेटि लेलक। तेँ सोचने छलौ जे जना-तना खेते मे खूब मेहनत कऽ बेटीक विआह कऽ लेब। सेहो ने भेल। आब किछु फुड़वे ने करै अए जे की करब।
विकास ः श्रीचन, आशा नइ तोड़ह। जखने गरीब भेलह तखने चारु दिस से बेगरता खिहारबे करतह। मुदा की करबहक। नइ अइ साल बेटीक विआह हेतइ त अगिला साल करिहह।
श्रीचन ः भाइ, हैत त सैह। मुदा गामक स्त्रीगण सब कुट्टी-चाल करै अए।
विकास ः ओहिना स्त्रीगण सब बजै अए। ककरो बजै मे किछु लगै छै। साहस करह।
श्रीचन ः भाइ, अपन मन त, समय-साल देखि कऽ, मानि जाइत अछि, मुदा घरवाली सदिखन कनिते रहै अए। ओकरा जे कनैत देखै छियै ते अपनो छाती दहलि जाइ अए।
विकास ः से ते होइते हेतह। एक बेरि तमाकू खाह।
श्रीचन ः (जेबी से तमाकुल-चून निकालि, तमाकुल चुनबै लगैत) एकटा बात ते पुछबे ने केलहुँ। आब मन पड़ल। ओ सब (अमेरिकन) जे ओहन उज्जर दप-दप लगै छले से ओकरा सबहक रंगे ओहिना होइ छै कि चरक फुटल छलै। किऐक ते अपनो गाम मे एक गोरे ओहने अछि। जेकरा सब चरकाहा कहै छै।
विकास ः जइ मुलुक मे ओ सब रहै अए, ओइठाम बारहो मास ठंढ़े रहै छै। अपना सब जेँका गरमी नै होइ छै, तेँ ओकरा सबहक रंगे ओहन भ जाइ छै।
(तमाकु खा श्रीचन विदा हुअए लगैत)
विकास ः एकटा बात सुनि लाय श्रीचन। जाबे तक अपना ऐठामक किसान नीक बीआ, नीक खाद, नीक दवाई (कीटनाशक) बनवैक लूरि अपने नइ सीखि लेत, ताबे तक एहिना ठक सब आबि-आबि ठकैत रहतै। बजैत दुख होइ अए जे अपन देश किसानक देश छी। मुदा किसानक जिनगी मुरदो स बत्तर अछि। ने खेती करैक लूरि किसान के छैक आ ने खेतीक उपकरण छै। ने पटवैक कोनो जोगार छै। धार-धुरक अप्पन इलाका रहने खेत चैरसो ने अछि। एहना स्थिति मे लोक कोना जीवित रहत?
(श्रीचन जाइत अछि। कर्मनाथ प्रवेश। विकास के प्रणाम करैत)
विकास ः आ-हा-हा, बाउ कर्मनाथ। बहुत दिनक बाद तोरा स भेटि भेल। कहिया गाम ऐलह। सपरिवार आनन्द स रहै छह की ने। बच्चा सबहक कुशल कहह?
कर्मनाथ: सब आनन्द सऽ छी। जेठकी बच्चिया बी.ए. पास केलक। बच्चा कओलेज मे आ छोटकी बच्चिया हाइ स्कूल मे पढ़ैत अछि। परसु गाम एलहुँ
विकास ः बेटी त विआहै जोकर भ गेल हेतह?
कर्मनाथ: हँ। ओइह सेाचि दू मासक छुट्टी ल कऽ एलहुँ। मुदा ऐठाम जे हवा-बिहाड़ि देखै छी तइ से मने घबड़ाइत अछि। आन नोकरिया जेँका ते हम्मर जिनगी नहि अछि।
विकास ः बाउ कर्मनाथ, अखन धरि तोरा बच्चे जेँका वुझैत एलियह आ आगुओ बुझैत रहबह। भने कहलह जे दहेजक बिहाड़ि समाज मे उठि गेल अछि। अखन धरि त कहियो कोनो काज केलह नहि, तेँ मन घबड़ाएव उचिते छह। मुदा एकटा बात वुझए पड़तह जे हवा-बिहाड़िक जन्म जहिना समाज मे उठैत अछि तहिना समाजे ओकरा रोकबो करैत अछि। अज्ञानी, लोभी आ समाज विरोधी लोक ओकरा बढ़वैत अछि। मुदा एहि स समझदार लोक थेाड़े धवड़ाई अए। जहिना एक्के खेत मे बगुरोक गाछ रहैत अछि आ नीक-नीक फलोक गाछ रहैत अछि, तहिना समाजो मे होइत अछि। नीक स नीक लोक आ अधलाह स अधलाह लोक एक्के समाज मे रहैत अछि। हँ, इ बात जरुर अछि जे कखनो अधलाह लोक नीक लोक केँ पछाड़ैत अछि त कखनो नीक लोक अधलाह लोक के पछाड़ैत अछि।
कर्मनाथ: जँ एहिना होइत रहत ते समाज नीक कोना बनत?
विकास ः अखन धरिक जे इतिहास अछि, ओहि आधार पर नीक लोक पछड़ैत रहल अछि। किऐक त जहि शक्तिक हाथ मे समाज सत्ता रहल ओ धूत्र्त, बेइमान आ शेाषकक हाथ मे रहल। तेँ ओहि शक्तिक संग इमानदार, मेहनती आ भलमानुस लोक केँ संगठित भ मुकावला करै पड़तैक। जहि स उठा-पटक हेबे करतै मुदा अंतिम विजय इमानदारेक होएत। किऐक त ऐहेन लोकक संख्यो बेसी अछि आ काजो नीक अछि।
कर्मनाथ: तखन फेरि ऐना किअए होइ छै?
विकास ः (मुस्की दइत) कम संख्या मे धूर्त, वेइमान के रहितहुँ , बुद्धि आ सम्पति ओकरे हाथ मे छै। जे दुनू हथियारक रुप मे काज करै छै। कमजोर, मुर्ख अधिक रहितहुँ अखन धरि पछड़ैत रहल अछि।
कर्मनाथ: एहि बात के अखन छोड़़ूँ। हम जहि काज से अहाँ लग एलहुँ तहि पर कने विचार कएल जाय। अपने सिर्फ गुरुऐ (शिक्षक) नहि समाज निर्माता सेहो छी। हम्मर बेटी आइक मनुक्ख छी, नहि कि घसल-पिटल परम्पराक। तेँ, हमरा मन मे अटूट बिसबास अछि जे हमरा बेटीक विआह हँसी-खुशी स हेबे करत। मुदा हम त समाज स सब दिन अलग रहलहुँ तेँ, कने चिन्ता मन मे जरुर अछि।
विकास ः बौआ, तोरा पिता स हमरा मतभेद किऐक अछि? से पहिने सुनि लाय। तोहर परबाबा जे रहथुन अेा नामी-गामी लोक रहथि। समाजो अनुकूले रहनि आ समयो तेहने रहै। जहिना हुनका धन-सम्पति रहनि तहिना मानो-प्रतिष्ठा। जखन ओ मुइलाह ते मास दिन धरि सराधक भोज होइते रहलै। हमहूँ ताबे ढ़रवे रही, मुदा सब कुछ मन अछि। तीस गाम नति के खुऔल गेल रहै। एक-एक गाम के एक-एक दिन। गामक (सब जाइतिक) ओहि काज मे जुटल रहै। किऐक त काजो भारी रहै। खेबाक सब वस्तुक ओरियान स ल कऽ नेात पठौनइ आ खुऔनाइ धरिक काज रहै।
कर्मनाथ : (मुस्की दइत) इ बात हमरा नइ बुझल छल। भने अहाँ कहि देलहुँ।
विकास ः करीब पचास-पचपन बर्ख पहिलुका बात छी। ताधरि गाम मे दोसर तरहक विचार चलैत छलैक। अखुनका जेँका लोक मे दूजा-भाब नै छलैक। ओहि समय लोकक जिनगियो छोट छलैक। तेकर बाद, करीब पेंइतीस-चालीस बर्ख पहिने, तोहर बाबा मरलखुन। हमहुँ शिक्षक भऽ गेल रही। समाज मे विचारो बदलै लगल छलै। तोहर पिताजी (सोमनाथ) भोजक लेल समाज के बैसौलनि। हमहूँ छलौ। ओ (सोमनाथ) कहलखिन जे नअ गामक जे सौजनिया अछि, तते ल कऽ भोज करब। किछु गोटे समर्थनो केलकनि। मुदा किछु गोटे विरोधो केलकनि, जइ मे हमहूँ छलौ।
कर्मनाथ ः विरोध किअए केलिएनि?
विकास ः (हँसैत) हमरा सबहक (विरोध केनिहरक) विचार छल जे कोनो भोज मे समाजक लोक के छोड़ि (आन जाइतिक) अनगोंआ के न्योत द खुआएव उचित नहि। जते खर्च कऽ भोज करै चाहै छी ओ गौंउये केँ न्योत द कऽ खुआउ। गामक कोनो जाइत किऐक ने हुअए, मुदा छी त ओ समाज। समाजक काज सदिखन लोक (समाज) के होइत छैक। कोनो बेर बेगरता मे समाजे ठाढ़ होइत अछि। अनगौंआ ते सिर्फ भोजे खाइत अछि आ खुआबैत अछि। तेँ इ काज अधलाह छी।
कर्मनाथ : (मुड़ी डोलबैत) इ त वैचारिक मतभेद भेल।
विकास ः सिर्फ वैचारिके मतभेद नहि, एकरा पाछू वास्तविकतो छैक। बेटा-बेटीक विआह लोक आन गाम मे करैत अछि। जहि स ओ समाज नहि, कुटुम्ब होइत अछि। जनिका संग नोत-पिहान चलिते अछि। मुदा आन गामक जाइत क समाज मानि खाइ-पीवैक वेवहार बनाएव, उचित नहि। हँ, उचित तखन जखन समाजक सब जाइत कऽ खुआ, आनो गामक लोक के खुआबी। मुदा समाज त जीबैत स ल कऽ मृत्यु धरि संग रहैवला होइत। तेँ, आन गामक जाइत स पैध अप्पन समाज होइत अछि। जना कतौ आगि लगै छै ते समाजेक लोक (चाहे कोनो जाइतिक किऐक ने हुअए) आबि कऽ आगि मिझबैत अछि। तहिना कियो बीमार पड़ैत अछि, वा कोनो आफत-असमानी होइत छैक त समाजे आगू अबैत अछि। अही ल कऽ दुनू गोटेक बीच मतभेद अछि। मतभेदे नहि अछि, एक जाइत रहनहुँ खेनाइयो-पीनाइ बन्न अछि। हमरो समाज अलग अछि आ हुनकेा अलग छनि। सिर्फ एक गाम मे छी तेँ गौँआ छिआह।
कर्मनाथ : तखन त गाम दू समाज मे बँटि गेल अछि।
विकास ः (दृढ़ता स) निश्चित। निश्चित दू भाग मे बँटल अछि। एक-समाजक लोक गौँआ स जुड़ल अछि आ समाजक लोक अनगैाँवा जाइत सब स जुड़ल अछि। तेँ अहाँ ऐठाम जे कोनेा भोज होइ अए ते हम खाइ ले नइ जाइ छी। आ ने अहाँक परिवार हमरा ऐठाम अबैत छथि।
कर्मनाथ: इ त जवर्दस्त कारण अछि।
विकास ः हमरा संग ऐहेन समस्या अछि जे ज अहाँ ऐठाम खाइ ले जायब त अप्पन वैचारिक समाज टुटि जायत। जँ बैचारिक समाज टुटि जाइत त फेरि ओहिना विना जड़ि-पालोक समाज मे मिझ्र भ जायब। जहि समाज मे बलात्कार के धिया-पूताक खेल बुझल जाइत अछि। गारि क मजाक बुझल जाइत अछि आ आथर््िाक शोषण (धनक बेइमानी) के परम्पराक चलनि वुझल जाइत अछि।
कर्मनाथ: (मूड़ी डोलबैत) हँ, इ त होइत अछि।
विकास ः आइ धरिक जिनगी मे हम दुइये टा काजक संकल्प कऽ करैत एलहुँ। आ अखनो करैत छी। पहिल, समाजक भेाज आ दोसर, बेटा-बेटीक विआह मे दहेज, ने लेब आ न देब। जे सिर्फ हमही टा नहि, अप्पन जे समाजक लोक अछि, ओ सब करैत अछि। अही दुनू काजे तोरा परिवार स हमरा मनमुटाव बुझहक वा पार्टी बुझहक वा दू समाज वुझहक। अच्छा, आब अपना काज पर आबह। तू ते अफसर छह, तखन किअए अफसरक समाज छोड़ि गामक समाज मे कुटुमैती करए चाहै छह?
कर्मनाथ : अफसरक समाज कहियौ वा नोकरियाक समाज, ओ अअस्थायी (अस्थायी) होइत अछि। जहिना रबड़क बैलून मे जाधरि हवा रहैत ताधरि अकास मे उड़ैत, मुदा फुटितहि कतौ जा कऽ खसि पड़ैत। तहिना नोकरियोक जिनगी होइत। जाधरि नोकरी रहैत, पावर मे रहैत आ नोकरी समाप्त होइतहि जिनगी कत्तऽ स कत्तऽ चलि जाइत। मुदा सामाजिक जिनगी से नहि होइत। स्थायी होइत। सामाजिक जिनगी बहुआयामी होइत। जहिना गनगुआरि कऽ सैकड़ो पैर होइत, जहि मे से एकाध टुटनहुँ कोनो अन्तर नहि होइत, तहिना। एकर अतिरिक्तो कारण सब अछि।
विकास ः आरो की कारण अछि?
कर्मनाथ ः नोकरी करैवला सिर्फ एक्के इलाकाक नहि हेाइत। जहि स जिनगीक ऐहन अनेको काज अछि जहि मे एकरुपता नहि हेाइत। मुदा सामाजिक जिनगी ओही स विपरीत होइत। जाधरि हमरो नोकरी अछि ताधरि हमहुँ घर स बाहर छी, मुदा नोकरी समाप्त होइतहि गाम चलि आयब।
विकास ः बहुत बढ़ियाँ विचार छह। आइ जे देखै छहक जे गाम घरक दशा दिनो-दिन पछुआइल जा रहल अछि, एकर की कारण अछि? एकर कारण अछि गामक पढ़ल-लिखल लोक केँ गाम छोड़ि कऽ चलि जायब। जाधरि गामक सम्पत्ति मे बुइधिक उपयोग नै हैत, ताधरि गामक सम्पत्ति नीचे मुहे ससरैत जायत। ओकरा (गामक सम्पत्ति क) आगू मुहे बढ़वैक लेल नव ज्ञानक जरुरत अछि। जखने नव ज्ञान क उपयोग गाम मे हुअए लगत तखने नव तकनीक, नव ढ़ंग (लूरि) आबि जायत। नव तकनीक आ नव ढ़ंग नव मनुष्य पैदा करत। नव मनुष्य पैदा होइतहि नव समाज बनि कऽ ठाढ़ भ जायत। जे समयक अनुकूल चलै लगत।
कर्मनाथ:(मूड़ी डोलबैत) हूँ-उ-उ।
विकास ः एतबे नहि, अपना इलाकाक (मिथिलांचलक) जे अमूल्य व्यवहार, अमूल्य क्रिया-कलाप अछि, ओ धीरे-धीरे घटि रहल अछि। आ ऐहेन बुझि पड़ि रहल अछि जे घटैत-घटैत मेटा जायत। लोकक जीवन शैली बदलि रहल अछि, जहि स सामाजिक संबंध, कला संस्कृति सब कुछ प्रभावित भ रहल अछि। नान्हि-नान्हि टा काज, नान्हि-नान्हि टा बात मे, लोक तेना ने दिन-राति ओझराइल रहैत अछि जे आगू मुहे ससरैक कोन बात जे पाछुऐ मुहे ढ़रैक रहल अछि। जहि स सदिखन बातावरण दूषित भेल रहैत अछि। अनेरो लोक सदिखन चिन्ता आ तनाव मे पड़ल रहैत अछि।
कर्मनाथ : एहि दिशा मे समाजक बुद्धिजीवी लोकनि केँ आगू अबै पड़तनि।
विकास ः निश्चित। कोनो समाज के आगू बढ़वैक लेल वा गलत दिशा स सही दिशा दिशि ल जाइक लेल वुद्धिजीविये अगुआइ कऽ सकैत छथि। जेकरा अपने दिशाक बोध नहि छैक अेा आगू मुहे कोना बढ़ि सकैत अछि। ओना पढ़लो-लिखल सभकेँ दिशाक बोध होइते अछि, सेहो बात नहि। जना कहल गेल अछि जे जहि पोथी कऽ पढ़ि लोक ज्ञान अर्जित करैत अछि वैह पोथी लोक केँ अज्ञानोक दिशा मे बढ़वैत अछि।
कर्मनाथ ः (गंभीर होइत) अपने जे बात कहि रहल छी, ओहि दिशि हमरो धियान अखन धरि नहि गेल छल।
विकास ः (मुस्कुराइत) अखन धरि तोहर धियान, एक वेवस्थाक बीच रहलह तेँ नीक-अधला बेरबैक (फुटबैक) ज्ञान नहि भेलह। किऐक त व्यवस्था वेवहारक माघ्यम स चलैत अछि।
कर्मनाथ : (मूड़ी डोलवैत) तखन ते नीक-अधला वुझैक लेल मन स नहि विवेक स कयल जा सकैत अछि।
विकास ः निश्चित। एहि मे एक्को पाइ संदेह नहि। मन निर्णय करैत बुइधिक हिसाव स। बुद्धि बनैत व्यवस्थाक हिसाव स। तेँ लोकक जे सोचैक आ बुझैक प्रक्रिया अछि ओ वेवसथाक अनुकूल होइत अछि। मुदा वेवसथा केहेन अछि, ओ एहि स आगूक प्रक्रिया छी। हमरा नीक हुअए, इ सब चाहैत अछि। मुदा एहिक भीतर प्रश्न उठैत जे अप्पन नीकक संग जँ दोसर के अधला होय, तखन? नीक त तखन ने नीक जे अपना संग-संग दोसरोक नीक होय। जँ दोसर के नीक नइ हेाय त अधलो नहि होय। हँ, इ बात जरुर जे किछु काज व्यक्तिगतो होइत अछि, जहि स दोसर के मतलब नइ होइत।
कर्मनाथ : (नमहर साँस छोड़ैत) तब ते विवाह मे जे दहेजक चलनि अछि, सेहो ओहने अछि।
विकास ः (मुस्की दइत) निश्चित। दहेज लेनिहार तीनि रंगक अछि। पहिल अछि जे जते दहेज लइत अछि ओहि स दोबरा-तेवरा कऽ बजैत अछि। दोसर तरहक अछि जे बेटाक विआह मे जते दहेज लइत ओहि स कम बेटीक विआह मे दइत अछि वा नहियो दइक विचार मे रहैत अछि। तेसर तरहक अछि जे दहेज लेलाक बादो छिपबै चाहैत अछि। आब तोंही कहह जे ऐना किऐक अछि।
कर्मनाथ ः ऐहन ओझराइल सवालक हल कोना होएत?
विकास ः (हँसैत) यैह काज त हम अपना समाज मे कऽ रहल छी। उपर से नहि बुझि पड़तह, मुदा समाजक भीतर समाज बनि चलि रहल अछि। जहिना बेटा तहिना पढ़ौल शिष्य। तू हमर पढ़ाओल शिष्य छियह, तेँ तोरा हम विसबास दइ छियह, हम्मार जे जरुरत तोरा हुअअ, तेही लेल हम तैयार छिअह। तोहर बेटी हम्मरो त पोतियो छी। तोरा हम शुरुहे से जनैत छिअ जे आन नोकरिया जेँका तू लेन-देन स परहेज केने छह। तोरा एक्को पाइ दहेज कहि खर्च नहि हेतह। तखन त बेटा-बेटीक विआह छी। जे वेवहार अदौ स आबि रहल अछि ओ त पुरवै पड़तह।
कर्मनाथ : आइ धरि जे समस्या माथ के भरिऔने छल ओ निकलि गेल। मन हल्लुक भ गेल। मुदा एकटा बात कहि दइत छी कक्का, हम त नोकरिया छी। गनल दिनक छुट्टी अछि तेँ दोहरा कऽ छुट्टी नहि लिअए पड़ए। तहि पर नजरि रखबैत।
विकास ः (मुड़ी डेालबैत) हमहुँ नोकरी कऽ चुकल छी तेँ छुट्टीक महत्व बुझै छियै। काल्हिये से हम तोरा काजक पाछु पड़ि जायब।ं परसु फेरि भेटि होएव बेटी किछु विशेष पढ़ल छह तेँ काज थेाड़े भरिगर जरुर अछि। किऐक त गाम-घर मे लड़कीक कोन बात जे लड़को कम पढ़ल-लिखल अछि। बी.ए. पास लड़कीक लेल कम स कम एम.ए. पास लड़का चाहिऐक। नहि त इंजीनियर, डाॅक्टर, वकील त चाहबे करिऐक।
कर्मनाथ : आब हम कने हटि कऽ एकटा सवाल पूछै छी। अखनो आ पहिनहुँ स देखैत एलहुँ जे नीक स नीक (बेसी स बेसी) पढ़ल लिखल लड़काक संग अनपढ़ लड़कीक विआह होइत अछि वा होइत आयल अछि। ओ उचित बुझल जाइत। मुदा अधिक पढ़ल-लिखल वा पढ़ल-लिखल लड़कीक संग कम पढ़ल वा अनपढ़ लड़काक संग विआह करब, उचित वा अनुचित।
विकास ः एहि प्रश्नक उत्तर दोसर दिन देबह। अखन हमर मन तोरा काज मे ओझरा गेल अछि।
चारिम अंक
(रामविलासक घर)
रामविलास: जिनगीक साइठम बर्ख मे, आइ वुझि पड़ैत अछि जे निचेन भेलहुँ सेहो सोलहन्नी नहि, पाँच पाइ चिन्ता अखनो बाकिये अछि। मुदा तइओ आइ अपना कऽ निचेन मानै छी, किऐक त जहिना एक दिन बीतने पूर्वज सौंसे माध बीतब मान लेलनि, तइ हिसाबे त पाँच पाइ भार बड़ थेाड़ भेल। जिनगीक साठि बर्खक संघर्षक (रग्गरघस) उपरान्त जे फल भेटल ओ त सुअदगर आ मीठ हेबे करत,तेँ मन मे खुशी सेहो अछि।
माधुरी : मन मे खुशी आछि त नाचू।
रामविलास: नचै त शरीरक भीतर मन अछि। हम कोनो नचनिया छी जे मंच पर नाचब। तखन हँ, एकटा बात मन मे जरुर उपकैत अछि जे अहाँ स भरि मन गप करी।
माधुरी : ठीके लोक कहैत अछि जे पुरुखक बात आ गाड़ीक पहिया दुनू बरोबरि। जहिना गाड़ीक पहिया घुमैत रहैत अछि तहिना पुरुखोक बात। कहू जे केहेन अकड़हर बात बजै छी जे एते दिन दुनू गोरे संग-संग रहलौ, मुदा भरि मन गप कहियो ने केलहुँ।
रामविलास: (मुह बिजकबैत) अहाँ कऽ की होइये जे हम फुसिये कहलहुँ।
माधुरी : अपना की बुझि पड़ै आए जे साँचे कहलहुँ।
रामविलास: सुआइत लोक कहैत अछि जे पुरुख आगू बढ़ैत-बढ़ैत चोर-डकैत, लुच्चा, लम्पट सब बनि गेल, मुदा मौगी गोबरक चोत जेँका ठामक-ठामहि रहि गेलि। अहीं से पुछै छी जे कहू काल्हि धरि हम कहिया निचेन भेल छलहुँ आ अहाँ से भरि मन हँसी-खुशीक बात केलहुँ।
माधुरी : कोन बड़का पहाड़ उलटबै छलौ, जेकरा उलटबै मे साठि बर्ख लागि गेल।
रामविलास: (गंभीर होइत) बड़ सुन्दर बात कहलौ। सबसे पहिने इ बात बुझि लिअ जे जहिया से हम अहाँ एकठाम भेलहुँ आ जाधरि नहि भेल छलहुँ। तेँ पहिने, दुनू गोटेक विआह स पहिलुका बात कहि दइत छी। तकर बाद विआहक उपरान्तक बात कहब। जहिया अहूँ अपना गाम मे रहैत छलौ आ हमहुँ अपना गाम मे।
माधुरी : अहाँक अप्पन कोन गाम छल? हम त अप्पन गाम अप्पन नैहर कऽ बुझै छी।
रामविलास: एतवेा नइ बुझै छियै जे अप्पन गाम होइत अछि अपना रहने। से ज नइ रहलौ त अप्पन गाम कोना भेल? बड़बढ़ियाँ अहाँ अप्पन नइहर के अप्पन गाम कहलियै। मुदा हमरा त अपना गाम से भगा देलक।
माधुरी : के भगा देलक?
रामविलास: गरीबी भगा देलक। जखन हम दसे-बारह वर्खक छलौ तखन बवू दुखित पड़लाह। तीनिये गोरेक परिवार छल, माए-बावू आ हम। हम ताबे खेलाइते-धुपाइते छलौ आ धरिये पहिरैत छलौ। दुख से बाबूक हालत दिनो-दिन बिगड़िते जाइत रहनि। असकरे माए बोइनो क कऽ आनए आ बावूओक सेवा टहल करैत रहए। दिन-राति तंग-तंग रहैत छलि। बेबस भ एक दिन कहलक जे बौआ गाम मे सब अन्न बेतरे मरि जेवह। गाम मे ने कियो काज करौनिहार अछि आ ने अपना कोनो-आए-उपाए छह। तेँ कतौ जा कऽ कमा आनह।
माधुरी : गाम से माइये जाइ ले कहलनि।
रामविलास: हँ। मुदा ओहो बेचारी की करैत।
माधुरी : गाम से असकरे कत्तऽ गेलियै?
रामविलास: असकरे कहाँ गेलियै। अपनो गामक आ लग-पासक आनो-आनो गामक लोक, सब साल पटुआ कटै ले, धनरोपनी करै ले पूभर जाइ छल। ओकरे सबहक संगे हमहूँ गेलौ। तीन दिने मोरंग पहुँचलौ। ताबे कोसी धार मे पुलो ने भेल रहए। नावे पर पार भेलहुँ। भीमनगर से जगबोनी बस चलैत रहए। कोसी पार भ कऽ बथनाहा मे बस पकड़लौ। जे नेने-नेने जगबोनी पहुँचा देलक। जगबोनी से पाएरे मोरंग गेलौ। तेसर दिन किरिण डूबैत-डूबैत मोरंग बजार पहुँलौ। ओही दिन हाटो रहए। हम सब हाटे पर रही कि एकटा थारु, दुनू परानी, आइल रहए। ओ जे हमरा सब के देखलक ते बुझि गेल जे पछबड़िया सब छी। लग मे आबि के कहलक जे अइ देसवाली भइया हमरा संगे चलह। सव कियो ओकरे संगे विदा भेलहुँ। जहाँ हाट से निकलै लगलौ कि कहलक जे भैया तोरा सब के भुख लागल हेतह तेँ किछु खा लाय। दू छिट्टा मुरही आ कचड़ी कीनि के द देलक। सब कियो गमछाक खोंचड़ि बना मुरही ल लेलहुँ आ खाइते विदा भेलहुँ। साँझ मे ओकरा अइठिन पहुँचलौ। देखै मे ते ओ अलबटाहे जेँका बुझि पड़ै, मुदा रहए पूजीगर। आठ जोड़ा बड़द खूँटा पर रहए।
माधुरी : कते दिन ओकरा ऐठाम रहलियै?
रामविलास: दू मास रहलियै। एक मास पटुआक काज चललै आ एक मास धनरोपनी।
माधुरी : काजक लूरि कोना भेल?
रामविलास: सबकेँ जना-जना करैत देखियै, तहिना-तहिना हमहुँ करियै।
माधुरी : दू मास मे कत्ते कमेलियै?
रामविलास: डेढ़-डेढ़ सौ रुपैआक फँाट सबके भेलइ। ओइ मे से हम सबा सौ रुपैआ गाम पठा देलियै आ पच्चीस रुपैआ लऽ कलकत्ता चलि गेलियै। कलकत्ता त गेलियै मुदा कियो चिन्हरए रहबे ने करए। बस स्टैण्ड मे उतड़ि एकटा दोकान मे खाइ ले गेलहुँ। खाइते रही कि तीनि-चारि टा मटिया चाह पीबै आयल। ओ सब अपने बोली बजै। हम खेबो करैत रही आ ओकरे सब दिस तकबो करैत रही। हमहूँ हाँई-हाँई के खा हाथ धोय, दोकानदार के पाइ द, एक गोरे के कहलियै, भाइ हमहूँ काजे करै ले एलौ, कतौ जोगार लगा दाय। ओ सब अपने संगे हमरो नेने गेल।
माधुरी : मटिया सब काज की करए?
रामविलास: बोरो उधै आ आनो-आनो सामान सब उधै। ओकरे लाट मे हमहूँ काज करै लगलहुँ। बर्ख दिन ओकरे सबहक संगे रहलौ। बर्ख दिनक बाद ओहो सब गाम आयल आ हमहूँ एलौ। बरखे दिन मे कते गोरे से चिन्हारय भ गेल। गाम आवि एकटा भीतघर बन्हलौ। बावूओक मन नीक भ गेलनि। अपन मासुल ले रुपैआ रखि अन्न-पानि कीनि के घर मे द देलियै आ डेढ़ मासक बाद फेरि चलि गेलहुँ।
माधुरी : फेरि मटिये काज करै लगलहुँ?
रामविलास: हाँ। पाँच बर्ख धरि मटिया काज करैत रहलहुँ। तेकर बाद अहाँक संग विआह भेल। विआहक बाद जे कलकत्ता जाइत रही कि दरभंगा मे एक गोरे परिवारक संगे हमरे लग मे आबि कऽ बैसिलथि। ओहो कलकत्ते जाइत रहथि। समस्तीपुर तक हमहूँ चुप्पे-चाप बैसल रही, मुदा ओ सब अपना मे गप सप करैत। समस्तीपुर तक छोटकिये गाड़ी चलै। समस्तीपुर से बड़की गाड़ी कलकत्ता जाइ। जखन समस्तीपुर टीशन लगिचाइत कि ओ हमरा कहलनि, वौआ कतऽ जेबह। हम कहलिएनि, कलकत्ता। ओ कहलनि जे हमहू कलकत्ते जायब। हमरा समानो सब अछि आ दू टा बच्चो अछि, तेँ कने समस्तीपुर टीशन मे बच्चा सब के सम्हारि दिहह। हमहूँ सैह केलहुँ।
माधुरी : समस्तीपुर टीशन मे जे गाड़ी पकड़लियै अेा सेाझे कलकत्ता ल गेल कि बीच मे कतौ फेरि बदलै पड़ल।
रामविलास: नहि। बीच मे कतौ नै बदलै पड़ल। समस्तीपुर टीशन मे जे गाड़ी पर बैसलहुँ , तखन से ओइह चाहो पिअबथि आ गपो-सप करै लगलहु। ओ अपने इलाकाक रहथि। हिन्द मोटर कारखाना मे नोकरी करैत रहथि । इंजीनियर रहथि। देखै मे ते साधारणे बुझि पड़थि, मुदा ओ राक्षात् देबता रहथि। ओ कहलनि जे बौआ तू हमरे संगे चलह। हमरे ऐठाम रहिहह आ तोरा हम करखन्ने मे काज धरा देवह। तहिया से हम हुनके ऐठाम रहै लगलहुँ।
माधुरी : (मुस्की दइत) अखन धरि विआह से पहिलुके जिनगीक बात कहलियै।
रामविलास: हँ। विआहक बाद ते अहूँ आबिये गेलहुँ आ देखवे करैत एलियै जे साल मे एक बेर, महीना दिनक छुट्टी मे अवैत छेलहुँ। तहि एक मास मे जे-जना घरक काज रहैत छल ओकरे सम्हरै मे महीना बीति जाइत छल। तखन आब अही कहू जे हम कहिया निचेन भेलहुँ।
माधुरी : अच्छा, आब अपन खिस्सा-पिहानी छोड़ू। काल्हि त बौआक (मदनक) रिजल्ट निकलिये गेल। पढ़ाइयो ओकर समापते (समाप्ते) भ गेलै। आब ओकर विआह क लिअ।
रामविलास: अपनो मन मे सैह अछि। मुदा अखन धरि त घरक गारजन अहाँ रहलौ हम ते सब दिन बाहर खटलौ। घरक तीत-मीठ त बुझलियै नहि। आब रिटायर क कऽ एलहुँ हेँ। आब जे घरक भार उठबै चाहब से हमरा बुते सम्हरत।
माधुरी : कोनो काज केने लोक काज सीखैत अछि। अहाँ कतबो अनाड़ी छी तइयो त पुरुखे छी। हम कतबो जीवनी छी तइयो त स्त्रीगणे छी। घरक काज सम्हारि सकै छी, मुदा घर स बाहरक काज कोना सम्हारल हैत।
रामविलास: अहूँक बात एकतरहक जरुर अछि। मुदा आब त तीनि गोटे भेलहुँ। मदनोक पढ़ाइ समापते भ गेलै। तेँ सबसे पहिने ओकर विआह क लेब अछि।
(विकासक आगमन)
रामविलास: (हँसैत) आउ, आउ मास्टर सहाएव। अहोभाग्य हम्मर आ हमरा परिवारक। बहुत दिनक बाद अपने स भेटि भेल। शरीर स स्वस्थ रहै छियै की ने?
विकास : हँ।
रामविलास: परिवारक सब आनन्द स छथि की ने?
विकास : हँ। बच्चा (बेटा) हाइ स्कूल मे मास्टरी करैत अछि। अपने त आठ साल पहिने रिटायर भ गेलहुँ।
रामविलास: (मुस्कुराइत) वाह,वाह। हमरो मदन एम.कम. केलक। काल्हिये ओकर रिजल्ट निकललै। फस्ट डिवीजनभेलइ। (पत्नि स) अनासुरती मास्टर सहाएव पहुँच गेलथि, भाग्य हम्मर। किऐक त मास्टरे सैहबक पढ़ौल मदन छिअनि, तेँ सबसे पहिने मास्टर सहाएव के मिठाइ खुअविअनु।
(माधुरी जाइत अछि)
विकास : मदन कहाँ अछि। बिना असिरवाद देने मिठाइ कोना खायब।
रामविलास: ओ त आइये भोरुका गाड़ी से दरभंगा गेल। अप्पन संगियो-साथी आ प्रोफेसरो सब से भेटि करए गेल। भऽ सकैत अछि सौझुका गाड़ी से घुमत। नइ ज संगी सबहक संगे सिनेमा देखै लगत ते काल्हि कखनो आओत। हमहुँ पैछला मास रिटायर कऽ गेलहुँ। मदनेक दुआरे घरक सब काज जक-थक पड़ल अछि। किऐक त जाधरि ओ पढ़ैत छल ताधरि घरक काज मे कोना लगबितियै। मुदा सोचै छी जे सबसे पहिने ओकर विआह कऽ ली। ओना अखन धरि घरो बनौनाइ पछुआइले अछि।
विकास : हँ, हँ, बड़बढ़ियाँ विचार अछि।
रामविलास: एकटा भार मास्टर सहाएव अहूँ कऽ दइ छी, किऐक त गाम-घरक (समाजक) बात अपने बुझै नइ छी। घन्यवाद घरेवाली के दी जे वेचारी स्त्रीगण रहितहुँ अखन धरि घर सम्हारि कऽ चलौलनि। हम त जिनगी भरि सिर्फ कमेलहुँ, एहि स बेसी त किछु केलहुँ नहि। अपने केँ यैह भार दइ छी जे मदनक विआह कतौ करा दिऔ।
विकास : भार त बड़बढ़िया देलहुँ, मुदा.......।
रामविलास: मुदा की?
विकास : बेटा-बेटीक विआह आब विजनेस भ गेल अछि। जइ से हमरा सख्त घृणा अछि। सत्तरि वर्खक जिनगी मे, सैकड़ो विआहक अगुआइ केलहुँ मुदा एकोटा मे लेन-देन नहि केलहुँ। तखन आब अहीं कहू जे इ भार हमरा उठत।
(प्लेट मे मिठाइ नेने माधुरीक प्रवेश)
रामविलास: मास्सैब, ल द कऽ एकटा बेटा अछि, अगर जँ ओकरो बेचियै लेब तखन मुइलाक बाद एक चुरुक पाइनियो के देत। बेचलाहा बेटा ज देवे करत ते ओहि से थोड़े सबुर हैत।
विकास : (मुस्कुराइत) कहलियै ते बड़बढ़िया, मुदा आब लोक थेड़े इ बात बुझैत अछि। आब त लोक के रुपैआक आगि मन मे लागि गेल छैक। रुपैइये के धरम-करम सब वुझैत अछि। समाजोक ऐहेन रुखि भ गेल छैक जे जेकरा रुपैया छैक ओकरे पूछै अए आ जकरा नइ छै ओकरा कियो ने पूछै अए।
रामविलास: (मुस्कुराइत) मास्सैब, हम अपन बात कहै छी, जाधरि हमहूँ नइ बुझै छेलिएक ताधरि मन मे सदिखन रुपैऐक बात रहैत छल। संतोष के एकटा शब्द मात्र बुझै छेलियै। मुदा धन्यबाद ओहि इंजीनियर सहाएव केँ दिअनि जे आखिक परदा हटा देलनि। आब रुपैया के एकटा साधन मात्र बुझै छी। जिनगी नहि।
विकास : ओ इंजीनियर के छलाह?
रामविलास: हुनकर घर अपने इलाका छनि मुदा बच्चे स ओ कलकत्ते मे रहलाह। ओतइ पढ़वो केलनि आ हिन्द मोटर मे नोकरियो केलनि। बहुत दिनक बात छियै, हमहूँ कलकत्ता जाइत रही आ ओहो दरभंगा मे गाड़ी पकड़ि जाइत रहथि। गाड़िये मे भेटि भेलाह। अपने संगे हमरो ल जा पहिने त, उठे काज मे घरौलनि मुदा किछुए दिनक बाद हमरो परमानेंट नोकरी भ गेल। सदिखन ओ यैह कहथि जे राविलास गरीबक पूँजी मेहनत छियै। तेँ मेहनत के अपन दोस्त बना कऽ चली। हुनके परसादे हम हेड मिसतिरी भ के रिटायर केलहुँ। मुरुख रहितहुँ हम कमा कऽ बुर्ज लगा देलियै।
विकास : की बुर्ज लगा देलियै?
रामविलास: जना-जना आमदनी बढ़ैत गेल तना-तना अपन कारोबार बढ़बैत गेलहुँ। जाबे मशीनक ज्ञान नहि भेल छल ताबे एकटा सेकेण्ड हेंड टैक्सी कीनिलहु। एकटा ड्राइवर के पचास रुपैया रोज पर चलवै ले द देलियै। अपन जे दरमाहा हुअए ओहि मे अधा गाम पठाबी आ आधा जमा करी। किछुए दिनक बाद पुरना टेक्सी के बेचि नवका कीनि लेलहुँ। तख भड़ो वेसी हुअए लगल। अपनो मिसतिरीक हेल्पर से मिसतिरी बनि गेलहुँ।
विकास : बाह-बाह। तखन ?
रामविलास: जखन मिसतिरी बनि गेलहुँ तखन दरमहो दोवरा गेल। आ गाड़ी के बनौनाइ सीखि लेलहुँ। आठ घंटा करखन्ना मे डयूटी करी बाकी समय मे बजारक गाड़ी सबके ठीक करै लगलहुँ। फेरि दोसर टेक्सी लेलहु। ओहो भाड़ा पर लगा देलियै। मन पड़ै अए ते हँसी लगै अए। जहिना रुपैयाक लेल मन जरल रहैत छल तहिना रुपैयाक बरखा हुअए लगल।
विकास : बाह-वाह। तखन?
रामविलास: आमदनी देखि मन हुअए लगल जे कलकत्ते मे जमीन कीनि मकान बना ली। मुदा जखन हुनका (इंजीनियर के) पुछिलिएनि ते ओ कहलनि जे विचार त बड़बढ़िया छह, मुदा मुरुखपाना हेतह। अपना इलाका सन दुनिया मे कोनो इलाका नहि अछि। सिर्फ पाइये सब कुछ नहि ने छियै। ऐठाम ने खेत कीनह आ ने मकान बनावह। हॅ जाबे नोकरी करै छह ताबे किछु अस्थायी (टेमप्रोरी) कारोबार करै छह ते करह। मुदा रिटायर भेला पर गाम चलि जइहह।
विकास : किअए गाम अबै ले कहलनि?
रामविलास: हमहूँ इ बात पुछलिएनि ते बुझवैत कहलनि जे देखहक अपन इलाका, बजारक हिसाबे, बड़ पछुआइल अछि। पछुआइल इलाका मे लोकक आमदनियो आ जिनगिओ पछुआइले रहै छै। मुदा अइ स ककरो घवड़ेबाक नहि चहियै। कोनो इलाका अगुआइल अछि ओहिठामक लोकक मेहनत स। जँ लोक मेहनत नहि कऽ कऽ भागतते ओ इलाका अगुऐतै कोना?
विकास : (गंभीर होइत) बड़ पैघ बात कहलनि।
रामविलास: तहि बीच मदन चिट्ठी लिखलक जे बाबू अपने गाम होइत ‘राष्ट्रीय राज पथ’ (एन.एच.डव्लू) बनि रहल अछि। अपने ते चिट्ठियो ने पढ़ल होइत अछि, हुनके पढ़ै ले देलिएनि। चिट्ठी पढ़ि ओ मने-मन खूब हँसलाह। कहलनि जे रामविलास अहाँ मिसतिरी छीहे, आब अहाँक कलकत्ता गामे भ जायत। हमरा कोनो अरथे ने लागल। तखन ओ वुझा के कहलनि जे नोकरियो लगिचाइले अछि आ बड़का सड़को बनिये रहल अछि। ठाठ से ऐठामक सब गाड़ी बेचि एकटा नमहरका बस कीनि लेब। ताबे वेटेाक पढ़ाई समापते भ जायत। बेटा के वस द देबइ आ अपने एकटा लेथ मशीन कीनि के रोडे साइड मे बैसा देबइ। हमहूँ खेत-पथार नइ कीनिलहु। सिर्फ घर लग तीनि कट्ठा कीनि लेलहुँ।
विकास : बड़ सुन्दर विचार अछि।
रामविलास: ओना अखन सब काज पछुआइले अछि। ने घर बनेलहुँ हेँ आ ने वस कीनिलहु हेँ। मुदा तीस लाख रुपैआ हाथ मे रखने छी। तेहि से सब काज भ जाइत। अपनो नोकरिये करैत छलहुँ आ बेटो पढ़िते छल, तेँ कोना करितहुँ। आब पाइक भुख मेटा गेल। दुनिया देखैक ढ़ंगो बदलि गेल।
विकास : दुनियाँ देखैक की ढ़ंग बदलि गेल?
रामविलास: जाबे मिसतिरी नइ बनल छलौ आ कम आमदनी छल, तावे जे लोकक हाइ-फाॅइ देखियै ते हुअए जे कोन दरिदरा भगवान हमरा सब के जन्म देने छथि जे सब दिन सब चीजक अभावे रहै अए। मुदा जखन मिसतिरी बनलौ आ आमदनी बढ़ल, तहिया से वुझि पड़ै लगल जे हमरा सन-सन दरिद्र ते सौंसे दुनिये भरल अछि। जहि से मन मे संतोषक अंकुर जनमै लगल। आब ओ अंकुर विशाल गाछक रुप मे भ गेल अछि। जहि स आखिक इजोत सुन्दर होइत गेल। आब वुझि पड़ै अए जे दुनिया बड़ सुन्दर अछि।
विकास : की सुन्दर?
रामविलास: आब देखै छी जे दुनिया, स्वर्गो स सुन्दर आ हजारो तीर्थ स्थान मिलौला से जेहेन होइत, तहू से पवित्र आ पैध अछि। कोनो देवस्थान मे गनल-गूथल देवताक वास होइत मुदा दुनियारुपी तीर्थ स्थान मे अरबो-अरब देवता वास करैत अछि। किऐक लोक एहि देवस्थान स हटै चाहत। मन मे संकल्प शक्तिक जन्म भेल। जे संकल्पशक्ति विचारक रास्ता बदलि देलक। जहि स जिनगी फूलो स हल्लुक बनि गेल अछि।
विकास : इ त दुनिया देखैक नजरि भेल, मुदा अपना जिनगी मे की सब आयल?
रामविलास: जाधरि जिनगी नहि बदलल छल ताधरि कमेनाइ-खेनाइ मात्र बुझैत छलहुँ। मुदा आब दोसर केँ मदति करब बुझै लगलहुँ। अनका हाथे जे अपन मेहनत बेेचै छलौ ओ मेहनत आब अपना काज मे लगबै लगलहुँ। जहि स मनक गुलामी मेटा गेल।
विकास : आव अपना काज दिशि आउ। जहिना अहाँक लड़का पढ़ल-लिखल छथि तेहने एकटा लड़की हमरो नजरि मे अछि। बी.ए.पास ओ लड़की अछि। शील, स्वभाव, आ गुणक भंडार अछि। शुद्ध लछमीपात्र। ओहन लड़की भगमन्ते घर मे जन्म लैत अछि।
रामविलास: मास्सैब, हम मदनक पिता जरुर छिअनि मुदा ज्ञान दइवला गुरु त अहीं छिअनि। तेँ, मदन के अहाँ अपन बेटा वुझि जतए विआह करा देवनि, हमरा दिस स एको-पाइ आपत्ति नहि। पाइ-कौड़ीक हमरा एको-पाइ लोभ नहि अछि।
विकास : (मने-मन खुश होइत) देखिऔ ओ लड़की एकटा पैध अफसरक छिअनि। ओ अपनो साक्षात् देवता छथि। ओना ओहो (अफसर) हमरे पढ़ाओल छथि, तेँ हमरा पर अटूट विसवास छनि। जे कहबनि से ओ जरुर करताह। मुदा आइ-काल्हि देखै छियै जे झूठ-फुस ल कऽ शादी-विआह मे झगड़ा-झंझट भ जाइत छैक। खास कऽ स्त्रीगणक चलैत। जँ से सब नइ हुअए ते हम एहि काज मे पड़ब।
रामविलास: मदन त अखन नहि अछि, नइ ते अहाँ के संग लगा दइतौ। ओना हम कन्यागत नहि बरपक्ष छी, तेँ पहिने पाएर कोना उठाएब। मुदा अहाँ ऐठाम जेबा मे ते कोनो असोकर्ज नहि अछि। चलू हम अहींक संग चलै छी। आ कन्यागत से गप-सप करा दिअ।
माधुरी : माहटर बावू, बेटा त हमरो छी आ पुतोहुओ हेती, तेँ, एकटा बात हमहूँ कहै छी। लोक सब बजैत अछि जे दुनिया बड़ आगू बढ़ि गेलई, इ त नीक बात। जते आगू दुनिया बढ़तै तते आगू सब बढ़त। मुदा हम सब त मिथिलाक गाम मे रहै छी, जइ ठाम अखनो लोक पाएरे नैहर-सासुर करैत अछि। कोनो सोखे त नहि करैत अछि। अभाव मे करैत अछि। शहर-बजारक लोक हवाई-जहाज पर उड़ैत अछि आ हमरा सबहक सवारी अखनो नाव अछि। तेँ, एहि सब केँ नजरि मे राखब जरुरी अछि।
विकास : (ठहाका दइत) इ सब कहैक जरुरत नहि अछि। पहिनहि कहि देलहुँ जे कन्या लछमीपात्र छथि। साक्षात् लछमीक आगमन परिवार मे होएत।
रामविलास: मास्सैब, शुभ काज मे बिलंब नहि करक चाही। हमरो कपार परक, अंतिम भार उतडि ़जायत, जे पाँच पाइ चिन्ता अछि ओहो मेटा जायत। तेँ, हम्मर विचार अछि जे हमहूँ अपनेक संग चलि, सब बात आइये फरिच्छा लेब।



पाँचम अंक
(विकासक दरवज्जा। विकास, रामविलास आ तीनि चारि गोटे बैसल)
विकास ः राधेश्याम, कने कर्मनाथबावू केँ बजौने आवह?
(राधेश्याम जाइत)
रामविलास ः कते दूर पर हुनकर घर छनि?
विकास ः थोड़वे दूर पर छनि। लगले चलि औताह।
रामविलास ः मास्सैब, जखन ऐठाम धरि आबिये गेलहुँ तखन कहुना काज कऽ सलिटिआइये देवैक।
विकास ः देखियौ, हम त अपना भरि परियास करबे करब तखन ते.........।
(राधेश्यामक संग कर्मनाथ अबैत)
विकास ः आउ, आऊ कर्मनाथ बावू। हमरा त होइत छल जे अहाँ गाम मे छी की नहि। मुदा संयोग नीक अछि।
कर्मनाथ ः अखने हमहूँ मामा गाम (मात्रिक) से एलहुँ। ममो संगे अएलाह हेँ।
विकास ः हुनको किअए ने संगे नेने ऐलिएनि?
कर्मनाथ ः कोना नेने अवितिएनि। राधेश्याम सोझे कहलक जे विकास कक्का बजौलनि अछि।
विकास ः (रामविलास के देखवैत) हिनका त अहाँ नहि चिन्हैत हेबनि। हिनकर घर सुन्दरपुर छिअनि। हिनका एकटा लड़का छनि जे एहिवेर एम.कम. केलनि अछि। काल्हिये रिजल्ट निकललनि हेँ। ओना ओ लड़का हमरे पढ़ौल छी मुदा किछु दिन पहिलुका देखल अछि। मुदा लड़का दिव हेबे करत।
(कर्मनाथ मुस्कुराइत)
रामविलास ः रिजल्ट सुनि बौआ पराते भिनसुरका गाड़ी पकड़ि, संगी-साथी सब स भेटि करै चलि गेला हेँ। भए सकैत अछि जे रौतुका गाड़ी स आबि जाय, नहि जँ संगी साथीक संग सिनेमा देखै लगए त काल्हि आओत।
विकास ः रामविलास जी, हिनका (कर्मनाथ बावू केँ ) ते अहूँ नहिये चिन्हैत हेबनि। इहो हमरे पढ़ौल छथि। मुदा हमरा गामक रत्न छथि। गामक पहिल फुल। बड़का अफसर छथि। भगवान ऐहेन बेटा सबकेँ देथुन। जेहेने पैघ अफस तेहने इमानदार। सज्जनक त चरचे नहि। ओना जिनगी भरि हमहूँ गुरुआइये केलहुँ। मुदा औझुका शिक्षक सब जेँका नहि, जे अपनो पढ़ौल विद्यार्थी, सोझा मे सिगरेट, बीड़ी पीवैत रहत आ शिक्षक मुड़ी निच्चा कऽ जाइत रहताह। आजुक जे छौड़ा-माड़रि सब भ गेल अछि ओ ने माए-बाप केँ आदर करैत अछि आ ने शिक्षक केँ।
रामविलास ः (हड़वड़ा कऽ कर्मनाथ केँ प्रणाम करैत, मने-मन सोचैत जे कहुना कुटुमैती भ जाय।) मास्सैब अहाँ के ते हम कहि देलहुँ जे भलेही मदन हम्मर बेटा छी मुदा शिष्य त अहींक छी। तेँ, मदन पर जते अधि हमर अछि ओहि स मिसिओ भरि कम अधिकार अहूँक नहि अछि। माए-बाप जन्म दैत अछि मुदा जिनगीक रास्ता त गुरुऐ बतबैत अछि।
विकास ः (मुस्की दैत) अहाँ दुनू गोटे सोझा मे छी, तेँ हमरा किछु बजैत असोकर्ज नहिये भ रहल अछि। कर्मनाथ बावू, अपने त बड़ ज्ञानी लोक छी, तेँ हम किछु बाजी से हमरा उचित नइ वुझि पड़ै अए। मुदा दू परिवारक बीचक संबंध अछि तेँ चुप्पो रहब उचित नहि।
(कर्मनाथो आ रामविलासो ठहाका मारि हँसैत)
हम दुनू गोटे केँ परिचय करा देलहुँ। आब एकटा बात अॅाझुका समयक संबंध मे कहि दइत छी।
रामविलास ः अबस, अवश्य अपनेक कहि देल जाओ।
विकास ः अखुनका समयक संबंध मे कहि रहल छी। अहाँ (कर्मनाथ) जेठरैयति परिवारक छी जे आब निच्चा मुहे भऽ रहल अछि। उपर स निच्चा उतड़ैत आ निच्चा स उपर जाइत, एक सीमा पर दुनू गोटे (सामाजिक, आर्थिक आ शैक्षणकित) पहुँच गेल छी। तेँ, दुनूक बीच मे संबंध बनब समयानुकूल अछि। रहल बात लड़का-लड़कीक। अपना ऐठामक जे सामाजिक ढ़र्रा बनि गेल अछि, ओकरा हम झुस (घटी) बुझै छी। किऐक त मुरुख लड़कीक संग पढ़ल-लिखल लड़काक विआहक चलनि अछि। जेकरा सबकियो नीक बुझि अंगीकारो कऽ नेने छी। मुदा एहिठाम एकटा प्रश्न उठैत अछि जे मुरुख लड़काक संग पढ़ल-लिखल लड़कीक विवाह के नीक मानल जाय वा अधलाह। मुदा अहाँ दुनूक संबंध मे त से बात नहिये अछि। तेँ, एहि संबंण मे किछु कहैक जरुरते ने अछि। हृदय स असिरवाद बुझी वा धन्यवाद देव बुझि हम दुनू गोटे केँ (मदन आ चम्पा) दइत छिअनि।
रामविलास ः (हँसैत) से की?
विकास ः जहिना अहाँक मदन रत्न भेलाह (बोनिहार परिवारक दुआरे) तहिना हम चम्पो के (नारी शिक्षाक) बुझैत छिअनि। तेँ, चाहे रत्नक हार होय वा फुलक, एकोटाक माला बनैत आ सओक। मुदा दुनू गरदनिये मे पहिरल जाइत। भलेही एकक डोरा सबहक नजरि पर पड़ै आ दोसराक झँपाइल होय।
रामविलास ः (हँसैत) मास्सैब, हम त मुरुख छी तेँ अहाँक सब बात बुझियो ने रहल छी, मुदा एते बिसवास मन मे जरुर अछि जे अहाँ हमर अधला कखनो नहि सोचब।
विकास ः देखियौ, दुनू गोटेक विचार एक रास्ताक अछि, तेँ एहि संबंध मे किछु अटकलबाजी करब उचित नहि। आब काजक गप कऽ आगु बढ़ाउ।
कर्मनाथ ः हमरा मन मे एक्को पाइ इ शंका नहि अछि जे हम लड़का के नहि देखलहुँ। मुदा जखन ऐठाम (हमरा गाम) पहुँच गेल छी त कने हम अप्पन दुनू भाइयो केँ बजा लइ छिअनि। एहि दुआरे नहि कि हुनका से पूछब जरुरी अछि, बलकि एहि दुआरे जे हुनको सबहक मन मे इ नइ होइन जे भैया हमरा सब के कहबो ने केलनि। ततवे नहि, हम त चाहब जे अपना बेटिओ के देखा दी।
रामविलास ः आइ अहाँक बेटी तेँ सब भार अहाँ उपर मे अछि। मुदा विआहक उपरान्त त हमरो पुतोहूऐ हेतीह। तेँ, जखन ऐठाम धरि आबिये गेल छी ते असिरवादो देनहि जेवनि।
विकास ः (हँसैत) बड़बढ़िया। राधेश्याम, तू कने फेरि दोहरा के कर्मनाथ बावू एहिठाम जा आ दुनू भाइयो (लालबावू आ नूनू) आ चम्पो केँ बजौने आबह।
(राधेश्याम बजवै ले जाइत)
कर्मनाथ ः कक्का, हम्मर बेटी आइक मनुक्ख छी। सिर्फ पढ़ले-लिखल अछि, ततबे नहि। कमप्युटरक ज्ञान सेहो छैक। परिवार चलवैक सब लूरि छैक। आ सबसँ पैघ गुण इ छैक जे मिथिलाक सब व्यवहार क (जे नारी लेल अछि) ज्ञाने नहि व्यवहार मे सेहो छैक। ओ सिर्फ कुशल गृहणिये नहि अपना पाएर पर ठाढ़ भ जीवन-यापन करैक लूरि स सेहो सम्पन्न अछि।
रामविलास ः कर्मनाथबावू, हम मुरुख रहितहुँ ओहन विचारवान आदमी लग रहि जिनगी बितेलहुँ, जिनका हम देवता बुझैत छिअनि। ओ हमरा अपना पाएर पर ठाढ़ भ जीवैक लूरि (ज्ञान) सिखा देलनि। सदिखन ओ कहथि जे श्रमिक अपन श्रम पूँजीपतिक हाथ बेचि लइत अछि, जे उचित नहि। तेँ, हम अप्पन श्रम केँ अपना काज मे लगेबाक सतत प्रयास करैक चेष्टा करी। ओना हमहूँ जिनगी भरि नोकरिये केलहुँ किऐक त ऐहेन मजबूर परिवार मे जन्म भेल छल जे दोसर चारा नहि छल। मुदा आब हम एते कमा लेलहुँ जे हमरा परिवार के कहियो नोकरी क लेल मुहताज नहि होअए पड़त।
(लालबावू,नूनू आ चम्पाक प्रवेश)
विकास ः रामविलास जी यैह बच्चिया थिक।
(एकटक स रामविलास चम्पा कऽ देखि)
रामविलास ः मास्सैब, हमरा पाइक भुख नहि, मनुक्खक भुख अछि। (हँसैत) हम अपन बेटे टा नहि, विआहोक खर्च हमही करब।
कर्मनाथ ः (मुस्की दइत) बौआ तोरा दुनू भाइ (लालबावू आ नूनू) के हम एहि दुआरे बजौलियह जे जहिना बेटी तहिना भतीजी, तेँ तोहूँ दुनू भाइ अप्पन विचार दाय।
दुनू भाइ : (लालबावू आ नूनू) भैया, जहिठाम अहाँ आ विकास कक्का छी, तहिठाम हम सब की बाजब। अहाँ लोकनिक पसन्द हमरो पसन्द।
कर्मनाथ ः (चम्पा से) बाउ, गोड़ लगहुन।
(सबसँ पहिने चम्पा विकास केँ, तेकर बाद अप्पन पिता कर्मनाथ केँ तेकर बाद रामविलास केँ गोड़ लगलक)
रामविलास ः (हजारी नोट दइत) भगवान जिनगी दथि। मास्सैब, भलेही हम बेटावला छी मुदा कर्मनाथ बावूक आगू मे किछु नहि छी। धन्यवाद हम अहाँ कऽ (विकास बावू) दइत छी जे हमरा कीचड़ स निकालि सिंहासन पर पहुँचा देलहुँ।
विकास ः रामविलास जी, हम दुनू गोटे स आग्रह करब जे शुरुहेक लगन मे काज (विवाह) निपटा लेब।
रामविलास ः हमरा दिशि स कोनो आपत्ति नहि।
विकास ः एकटा बात आरो। अखन जे लोकक रुखि भऽ गेलै अए जे खूब लाम-झाम से विआह करै अए से नहि हेवाक चाही। जेते खर्च (चाहे कन्यागतक होय वा बड़क पिताक) झुठ-फुस मे करब, ओ बेकार। ओ पइसा जँ बँचा कऽ कोनो काज क लेव त ओ जिनगीक लेल होएत। हम अप्पन बात कहै छी, हम्मर जे विवाह भेल छल अहि मे सिर्फ पितेजी टा बरिआती गेल रहथि। तइयो काज भेलइ। तेँ, कौआ स खइर लुटायब, कोनो नीक बात नहि।
रामविलास ः अपनेक विचार स हमहूँ सहमत छी। जना कर्मनाथ बावू कहताह, तहिना करब।
कर्मनाथ ः हम्मर कोनो विचार नहि, जना विकास कक्का कहताह, तहिना हम करब।
विकास ः विआहक बात त समपन्ने जेँका भऽ गेल। आब जँ किनको मन मे किछु बात बाकी हुअए से अखने बाजि चलू।
कर्मनाथ ः हम जहि समाज मे अखन धरि छी ओहि समाजक बीच त बेटीक विआह नहिये कऽ रहल छी, मुदा ओहि समाज मे त बहुत अधिक संबंध (लेन-देन) बनि चुकल अछि। तेँ, हम आग्रह करब जे एक बेरि, विआहक बाद, बेटी के अपना संगे ल जाएव। ओकरो सखी-विहीनिया छैक तेकरो सब स भेटि-घाँट क लेत। तकर बाद त अहाँक ऐठाम रहत आ ओइह अपन घर हेतैक।
विकास ः हम नीक जेँका अहाँक बात बुझि नहि सकलहुँ, कर्मनाथ बावू।
कर्मनाथ ः काकाजी, जहि समाज (अफसर समाज) मे रहैत छी ओहिक बीच पच्चीसो-पच्चास काज (विआह,मूड़न इत्यादि) सब साल होइत छैक। जहि मे हमहूँ आमंत्रित होइत छी। ओहि मे हम त सिर्फ भोजने करैत छी, मुदा प्रति काज पाँच सय स दू हजार धरि खर्च होइत अछि। मुदा हम त अेाहि समाज स अलग भ कऽ अप्पन काज कऽ रहल छी। तेँ, ओहि समाज मे रहैक लेल हमरो किछु करै पड़त।
विकास ः ओ-ो. ो. ो, ो। हँ इ त उचिते छी। की यौ रामविलास जी अहूँक किछु समस्या अछि?
रामविलास ः हँ। समस्या त हमरो अछि। मुदा हम्मर समस्या दोसर तरहक अछि।
विकास ः की?
रामविलास ः अपने केँ कहिये देने छी जे किछुए दिन पहिने नेाकरी स निवृत भेलहुँ आ मदनो पढ़िते छल। मरदा-मरदी कियो घर मे छेलहुँ नहि, जहि स घरक सब काज पछुआइल अछि। जना, घर बनौनाइ, काज सब ठाढ़ केनाइ, जहि कऽ पुरबै मे कम स कम छह मास जरुर लगत। अखन घरो ने अछि, जहि मे रहब। तेँ हमरो किछु समय चाही। ओना विआह अखन कइये लेब, मुदा जहाँ धरि बिदागरीक सवाल अछि ओ अगिला साल करब।
विकास ः की सब काज करैक अछि?
रामविलास ः (हँसैत) मास्सैब, मुरुख रहितहुँ हम बहुत (बड़) कमेलहुँ। जाधरि कमाइत छलहुँ ताधरि अपनो अनके घर मे रहैत छलहुँ। वेटो होस्टले मे रहैत छल। सिर्फ पत्निये टा घर मे रहैत छलहुँ , तेँ ने बेसी घरक जरुरत छल आ ने बनवैक समय भेटल। आब दुनू बापूत निचेनो भेलहुँ आ दुनू काजो (नोकरी आ पढ़नाई) सम्पन्न भ गेल। तेँ, दुनू ठाम (रहबोक लेल आ कारोबार करैक लेल) घरो बनवैक अछि आ कारोवार शुरुह करैक अछि।
विकास ः की सब कारोबार करैक विचार अछि?
रामविलास ः सबसँ पहिने रहैक लेल चैघारा घर बनाएव। तीन अलंग अंागन मे रहत आ एक अलंग दरवज्जा रहत। तेकर बाद चैकपर (एन.एच.क बगल मे) तीनि टा कोठरी बनवैक अछि। जहि मे एकटा कोठरी मे लेथ मशीन बइसायब। दोसर मे अप्पन कारोवारक (मिसतिरिआइक) रहत आ तेसर मे बच्चा कऽ आॅफिसनुमा बना देवइ, जहि मे ओ अप्पन कारोवारक हिसाव-किताब राखत।
विकास ः वाह, बड़सुन्दर योजना अछि। तेकर बाद की करब?
रामविलास ः घर बनौलाक बाद दुनू बापूत कलकत्ता जायब। ओतुक्के बैंक मे रुपैइयो अछि। रुपैइया उठा इंजीनियर सहाएव केँ संग कऽ एकटा वस बेटा लेल कीनब। अपना लेल मशीन आ जखन पुतोहू कमप्युटर सीखन छथि ते हिनका लेल एकटा कमप्युटर कीनब। तेकर बाद जे रुपैया उगरत ओहो आ सब सामानो बसे मे लादि कऽ ल आनब। एहि सब काज करै मे छह मास स बेसिये लाइग जायत।
विकास ः काज त बहुत अछि। बड़वढ़िया नहि छह मास त साल भरि मे सब काज भइये जायत।
रामविलास ः हँ, से किअए ने हैत।
विकास ः भने दुनू गोटे, एहि साल भरि मे, अप्पन-अप्पन काज साल भरिक भीतर पूर्ति कऽ लेब। बिबाह त अखन कइये लिअ, विदागरी अगिला साल करब। मुदा दुरागमनोक विधि समपने कऽ लेब। अखन कनियाँ केँ अप्पन सीमा पार कऽ घुमा लेब। विवाहक काज त समपन्ने बुझू।

ःः:ः:ः:ः:ः:ः:ः:ः:ः:ः
समाप्त

No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३० म अंक १५ जुलाइ २०१७ (वर्ष १० मास ११५ अंक २३०)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. आशीष अनचिन्हार-  "कतेक रास बात" इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल उपस्थिति नै अछि ...