Sunday, October 11, 2009

'विदेह' ४३ म अंक ०१ अक्टूबर २००९ (वर्ष २ मास २२ अंक ४३)-part i

'विदेह' ४३ म अंक ०१ अक्टूबर २००९ (वर्ष २ मास २२ अंक ४३)

वि दे ह विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
एहि अंकमे अछि:-
१. संपादकीय संदेश

२. गद्य

२.१. कथा- बहीन -जगदीश प्रसाद मंडल
२.२. अनमोल झा- लघुकथा
२.३.उपन्यास-उत्थान-पतन

२.४.कथा-फ्यूज बल्व कुमार मनोज कश्यप
२.५. पन्ना झा-असामान्य के
२.६.संस्कार गीत/ लोक गीत नाद-जगदीश प्रसाद मंडल
२.७. -नवेन्दु कुमार झा-सेमीफाइनलमे धाराशायी भेल राजग
२.८. हेमचन्द्र झा-मास्टर साहेब नहि रहलाह


३. पद्य

३.१. गुंजन जीक राधा


३.२. पंकज पराशर
३.३. सुबोध कुमार ठाकुर
३.४.उमेष मंडल (लोकगीत-संकलन)
३.५.कल्पना शरण-प्रतीक्षा सँ परिणाम तक-५
३.६.विजया अर्याल-आजुक जीवन
३.७.सरोज खिलाडी-मनक बात मनमे
३.८. दयाकान्त-बाढ़ि


४. मिथिला कला-संगीत-कल्पनाक चित्रकला

५. गद्य-पद्य भारती -पाखलो (धारावाहिक)-भाग-६- मूल उपन्यास-कोंकणी-लेखक-तुकारामरामा शेट, हिन्दी अनुवाद- डॉ. शंभु कुमार सिंह, श्री सेबी फर्नांडीस, मैथिली अनुवाद-डॉ. शंभु कुमार सिंह

६. बालानां कृते- देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स)२.कल्पना शरण:देवीजी.
७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]

8. VIDEHA FOR NON RESIDENT MAITHILS (Festivals of Mithila date-list)

8.1.Original poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy from New York
8.2. where lies the fault- maithili story by shyam darihare translated by Praveen k jha

9. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION(contd.)


विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link.
विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी रूपमे
Videha e journal's all old issues in Braille Tirhuta and Devanagari versions

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मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू।
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भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।



गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'।


मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण"।
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१. संपादकीय
नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा स्वातंत्र्योत्तर मैथिली कविता संकलन अक्खर खम्भा (सम्पादक देवशंकर नवीन) केँ सर्वश्रेष्ठ प्रोडक्शनक पुरस्कार प्रगति मैदान दिल्लीक 2009 अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक मेलादिससँ देल गेल अछि। अक्खर (अक्षर ) खम्भा (संचयन) [तिहुअन खेत्तहि काञि तसु कित्तिवल्लि पसरेइ। अक्खर खम्भारम्भ जउ मञ्चो बन्धि न देइ॥कीर्तिलता प्रथमः पल्लवः पहिल दोहा। माने जे अक्षररूपी स्तम्भ निर्माण कए ओहिपर (काव्यरूपी) मंच नहि बान्हल जाए तँ एहि त्रिभुवनरूपी क्षेत्रमे ओकर कीर्तिरूपी लता (वल्लि) प्रसारित कोना होयत।] मे नामक अनुरूप ६१ कविक २९५ टा कविता संकलित अछि, अन्तमे कवि लोकनिक संक्षिप्त परिचय सेहो देल गेल अछि। एहिमे काशीकान्त मिश्र “मधुप” ( अनुक्रममे नाम बोल्डफेस नहि रहने सोझाँक पृष्ठ संख्या नहि आयल अछि) आ शिवेन्द्र दास (हिनकर संक्षिप्त परिचय सयोगसँ छुटि गेल छन्हि)सेहो सम्मिलित छथि। एहि संग्रहमे सम्मिलित अछि:

सीताराम झा
हमरा क्यो कहलनि
कांचीनाथ झा ‘किरण’
माटिक महादेव, जय महादेव, अर्जुन, कृष्ण
तन्त्रानाथ झा
धनछूहा, नूतन वत्सर (साॅनेट)
काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’
घसल अठन्नी
सुरेन्द्र झा ‘सुमन’
दायित्व, नारी-वर्णना नयन, देश, स्वदेश
वैद्यनाथ मिश्र यात्राी
एहि घर पर बैसल रहए गिद्ध, ओ तँ थिकाह दधीचिक हाड़, आजुक महाकारुणिक बुद्ध, ओ ना मा सी धं!, पत्राहीन नग्न गाछ, अखाढ़, बीच सड़क पर, जगतारनि!, पसेनाक गुण-धर्म, बाँसक छाहरि,ताड़क गाछ, देशदशाष्टक, परम सत्य, सिंहवाहिनी दशभुजा चण्डी
आरसी प्रसाद सिंह
बाजि रहल अछि डंका
ब्रजकिशोर वर्मा ‘मणिपर्’िं
तखन कोन सोना केर मोल, कवि-कोकिलसँ भेंट
गोविन्द झा
युग-पुरुष, अन्न देवता
रामकृष्ण झा ‘किसुन’
खिस्सा-पिहानी, प्रतिवादक स्वर, अनुत्तरित, खुटेसल
चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
देखहक हौ गाँधी बाबा, नेतावचनामृत, युगचक्र
राजकमल चैधरी
सीता मृत्यु: अहिल्याक जन्म, इजोरिया धनुकाइन, निन्न ने टूटए, बन्धन मोक्ष, तथाकथित परम्परावादीक प्रति, महावन, कवि परिचय, गामक नाम थिक पुरबा बसात पछबा बसात, पति-पत्नी कथा, उपमा, दृष्टि उत्थापन
मायानन्द मिश्र
मूल्य, पैघत्व, हमर पीढ़ी, इतिहासक गली, चिन्ता, ताजा खबरि
सोमदेव
कर्मनाशा, की लिखल छनि वैदेहीक कपारमे, कीलन, तैयो जुलूस नहि रुकल, महाभिनिष्क्रमण,किछु भ’ सकैछ
धीरेन्द्र
मनुक्ख आ मशीनी आदमी, हमर जिनगी, चलि रहल छी, की हेतै?, सत्य, गुरु द्रोणक प्रति
हंसराज
गन्ध, ईश्वर, अन्वेषण
रामदेव झा
निर्जल मेघ, भारत-जननी
धूमकेतु
कविता, मुक्ति, मुदा
कीर्तिनारायण मिश्र
हेराएल अस्तित्व, ओ अएलाह!, एहि लेसल शरीरकें
जीवकान्त
बस्तीक स्त्राी, माटि भेल मृदुल, आबि रहल छथि सूर्य, शुभ हो, किरिन एक मुट्ठी भरि, नचैत ग्लोब जकाँ, खदकैत रही रसमे
रमानन्द रेणु
व्यक्ति, कहिया धरि,
गंगेश गुंजन
बाजार-कालमे मन, प्रेम लेल सब किछु, रातिक पेट, शब्द: एक, शब्द: दू, छोट-छोट पैघ लोक,स्वाधीनता, विजय पर्व: आॅपरेशन टेबुल पर, जुआएल लोकतन्त्रामे दादी-पोता, अचार समाचार,मेघक गाछ
वीरेन्द्र मल्लिक
सावधान, होशियार, शून्य काल, नक्सालइट, बंगाल बन्द, हे हमर अग्रज शान्त भ’ जाउ
रवीन्द्रनाथ ठाकुर
परिचय, बचू, चित्रा-दर्शन, भोर भेल भोर...
रामानुग्रह झा
एलेक्ट्रिक गर्ल, मधुमाछीक खोता आ हम, युद्ध आ शान्ति
मार्कण्डेय प्रवासी
दू-चारि दिनक ई यात्रा अछि, बौक अछि गाम हमर, आउ हम वसन्तकें बजाबी
कुलानन्द मिश्र
ओना कहबा लेल बहुत किछु छल हमरा लग, ऊष्माक जोगाड़, राति भरि बरखा भेलै’ए, बिसरल वसन्त शोर पाड़लक’ए, शपथ छनि गौतम तापसकें, उत्तरक प्रतीक्षामे
भीमनाथ झा
लंगूर, मुदा उड़लै कहाँ परबा?, समाचार दर्शन
मन्त्रोश्वर झा
पूजा, अन्हराक लकड़ी, छिपकली, एकटा शून्य अछि, नवका नवका सत्य
उदयचन्द्र झा ‘विनोद’
यात्रासँ पूर्व, नीरव बालिका, डाइन, विकास, स्त्राी
उपेन्द्र दोषी
स्वागत हे..., कोना चलत ई घर?, जाड़क रौद, आत्म-कथ्य
रामलोचन ठाकुर
लाख प्रश्न अनुत्तरित, सौंदर्य-बोध, इतिहासमे नइं छै
नचिकेता
विरोध समुद्रसँ, ऋतु-विशेष, पृथ्वी पर, एक अहीं छी, नामकरण, भीतर उगैत शब्द
बुद्धिनाथ मिश्र
गरहाँक जीवाश्म, चलला गाम बजार, लोकसभासँ शोकसभा धरि, रेड रिबन एक्सप्रेस, जनी जाति
महाप्रकाश
नंगटा नेना, पन्द्रह अगस्त, जूता हमर माथ पर सवार अछि, सूर्य महाकाल अछि, मृत्युक रंग,रंगसँ इतर की अछि?, पहाड़-समुद्र भेल जीवन, शब्द नहि होयत शिखण्डी, नव सदीक चेहरा,हुलसि क’ करब स्वागत
सुकान्त सोम
निषेधाज्ञा, आगिक बेगरता, निज संवाददाता द्वारा, एकटा युद्धक तैयारी
पूर्णेन्दु चैधरी
चारि गोट कविता, स्वार्थक शुभ-लाभ,
महेन्द्र
बहुत अछि अपना लेल..., बाट अछि निस्तब्ध..., समय, नखदर्पण में नित्तह, अन्हारक अन्हार...
ललितेश मिश्र
एकटा जारज युद्ध, नियति, एकटा भ्रान्त संकल्प, मिथ्या परिचय, कामना गीत
विभूति आनन्द
एहि तरहें अबैत अछि भोर, धनछूहा, विडम्बना, तैयार अछि पृथ्वी, इच्छा, हाक
हरेकृष्ण झा
जिमूतवाहन, अकाजक काज, छागदान, एना त नहि जे, अनेरे
अग्निपुष्प
इजोतक लेल, भोर, की चुनू, सदानीराक स्नेह, दादागिरी, स्नेहक समस्त सुर
अशोक
मोछ, दाँत, बुधियार, ई के सोर करै’ए?, फेरसँ,
शिवशंकर श्रीनिवास
लाठी, बाढ़िक पानि घटि रहलै’ए, कनेक काल लेल, रामधन राम चैठी पासवान, अहाँक नहि आएब
तारानन्द वियोगी
मीता, अहाँक हँसी; पितामहसँ, बागडोरामे भिनुसरबा, बाबा, प्रभु राग, संलग्न, अद्वैत, मिथिलाक लेल एक शोक-गीत, बुद्धक दुख
केदार कानन
हमर भावी पीढ़ी, हमरा चाही ओ हाथ एक बेर, जनताक कवि, भरि घर भोरका हवा, बिझाएल ह’रक फार, एतएसँ ओतए धरि
रमेश
कोसी सरकार, आदि कथा, ओइ पार अइ पार, मरसीया, कोसीकनहाक आम बात: कोसिकनहाक खास बात, गाम, बजार
विवेकानन्द ठाकुर
गिद्ध बैसल मन्दिर, भूख आ पियासक अर्थ
सियाराम सरस
एक आँखि कमल दोसर अढूल, सत्यसँ साक्षात्कार
देवशंकर नवीन
माइक कथा, मजूर, उखड़ल गाछ, कने रोकि लिअनु हुनकर मृत्यु, झरना, दुनियाँ-दारी, समाचार,बिज्जू स्त्राीवाद, तराजू
नारायण जी
निर्बल भोगत जीव-सुख भुवनमे, कोसी, पैंजाब हमर अँगनाक गीतनाद छी, जल धरतीक अनुरागमे बसैत अछि, पृथ्वी मोन रखैत अछि प्रेम, पृथ्वीमे हाथसँ अर्पित करैत अभिलाषा
ज्योत्स्ना चन्द्रम
पुल, वैदेहीक नाम, अक्षर-पुरुषक दुहिता, छठि, फराक-फराक नहि सोचब
सुस्मिता पाठक
कखन होएत भोर, हमर कविता, हमर निस्तब्धताकें थपकी दैत अछि चान, हथियार, कत’सँ शुरू करू, भोरक खोजमे
शिवेन्द्र दास
पाइ, सम्भावना, विरोधक कविता
विद्यानन्द झा
गामसँ पत्रा, हम आ अहाँ, एहना समयमे, मृत पितासँ वात्र्तालाप, खिचकाहनिमे चलैत, बहतरा भ’जाइत अछि लोक, टीवी
कृष्णमोहन झा
अहाँ बिसरि जाएब हमरा, नर्क-निबारन-चतुर्दसी, स्त्राीक आँखिएँ, एक दिन, ओहि स्त्राीक कानब
रमण कुमार सिंह
उलटबाँसी, फेरसँ हरियर, किछु अंतरंग मित्राक प्रति, आस्थाक गीत, सड़क बनौनिहार,
अहीं सभ लेल
अविनाश
सभ दिन रातिमे, की हम पछुआएल छी, कहबाक कला होइ छै, सन्दिग्ध विलाप
पंकज पराशर
बिहाड़िक बीच बाट तकैत, राग मालकोश, मारु(ख) विहाग, खयाल, ध्रुपद
अजित आजाद
मृतकक बयान, लिंग भेद, बारूदक विरोधमे, पिताएल छथि प्रभुगण, अघोषित युद्धक भूमिका
कामिनी
अन्हारक सत्ता, चारि पाँती, छौंड़ीक आँखिमे, मादा, दुनिया बड़ छोट छै
संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ १४ सितम्बर २००९) ८५ देशक ९२३ ठामसँ ३०,४२४ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ २,००,६७५ बेर देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।

गजेन्द्र ठाकुर
नई दिल्ली। फोन-09911382078
ggajendra@videha.co.in
ggajendra@yahoo.co.in
२. गद्य
२.१. कथा- बहीन -जगदीश प्रसाद मंडल
२.२. अनमोल झा- लघुकथा
२.३.उपन्यास-उत्थान-पतन

२.४.कथा-फ्यूज बल्व कुमार मनोज कश्यप
२.५. पन्ना झा-असामान्य के
२.६.संस्कार गीत/ लोक गीत नाद-जगदीश प्रसाद मंडल
२.७. -नवेन्दु कुमार झा-सेमीफाइनलमे धाराशायी भेल राजग
२.८. हेमचन्द्र झा-मास्टर साहेब नहि रहलाह

जगदीश प्रसाद मंडल
कथा-
बहीन


‘आब अधिक दिन माय नहि खेपतीह। ओना उमेरो नब्बे बर्खक धत-पत हेबे करतनि। तहूँमे बर्ख पनरह-बीसेक सँ कहियो बोखार के कहे जे उकासियो
नहि भेलनि अछि। एक तऽ ओहिना पाकल उमेर तहि पर सँ देहक रोगो पछुआयल, तेँ भरिसक एहिबेरि उठि कऽ ठाढ़ हेबाक कम भरोस। किऐक तऽ एक न एक उपद्रव बढ़िते जाइत छन्हि। अन्नो-पानि अरुचिये जेकाँ भेलि जाइ छनि।’’ -भखरल स्वरमे राधे-श्याम पत्नीकेँ कहलथिन।
पतिक बात सुनि, कने काल गुम्म रहि, रागिनी बाजलि- ‘‘ककरो औरुदा तऽ कियो नहिये दऽ सकैत अछि। तहन तऽ जाधरि जीवैत छथि ताधरि हम-अहाँ सेबे करबनि की ने?’’

‘हँ, से तँ सैह कऽ सकैत छियनि। मुदा जिनगीक कठिन परीक्षाक घड़ी आबि गेल अछि। एते दिन जे केलहुँ, ओकर ओते महत्व नहि जते आबक अछि। किएक
तँ कखनो पानि मंगतीह वा किछु कहतीह, तहिमे जँ कनियो विलंब हएत आ कियो सुनि लेत तँ अनेरे बाजत जे फल्लांक माय पानि दुआरे किकिहारि कटैत रहैत छथिन। मुदा बेटा-पुतोहू तेहन जे घुरि कऽ एको-बेरि तकितो नहि छन्हि। ककरो मुंहमे ताला लगेबै। देखिते छियै जे गाममे कोना लोक झुठ बाजि-बाजि झगड़ो लगबैत आ कलंको जोडै़त अछि। तेँ चैबीसो घंटा ककरो नहि ककरो लगमे रहए पड़त। जँ से नहि करब तऽ अंतिम समयमे कलंकक मोटरी कपार पर लेब।’’

‘‘कहलहुँ तँ ठीके, मुदा बच्चा सबहक हिसाबे कोन, तहन तँ दू परानी बचलहुँ। बेरा-बेरी दुनू गोटे रहब। अन्तुका काज अहूँ छोड़ि दिऔ। किएक तँ अंगनेक
काज बढ़ि गेल। बहीनो सभकेँ जनतब दइये दिअनु।’’
‘‘अपनो मनमे सैह अछि। जँ तीनू बहीनि आबि जायत तँ काजो बँटा कऽ हल्लुक भऽ जायत। ओना अंगना सँ दुआरि धरि काजो बढ़बे करत। किएक तँ जखने सर-
संबंधी, दोस्त-महिम बुझताह तँ जिज्ञासा करै अयबे करताह। जखन दरबज्जा पर औताह तँ सुआगत बात करै पड़त”।
मूड़ी डोलबैत रागिनी बजलीह- ‘‘हँ, से तँ हेबे करत।’’

‘‘एखन निचेन छी आ काजो करैऐक अछि। तेँ अखने तीनू बहीनियो आ मामोकेँ जानकारी दइये दैत छिअनि।’’
आन कुटुम्बकेँ एखन जानकारी देब जरुरी नहि छै। मोबाइलमे मामाक नम्बर लगौलक। रिंग भेलै।

‘‘हेलो, मामा। हम राधेश्याम।’’

‘‘हँ, राधेश्याम। की हाल-चाल?’’

‘‘माय, बड़ जोर दुखित पड़ि गेलीह।’’

‘‘एखन हम एकटा जरुरी काज मे बँझल छी। साँझ धरि आबि रहल छी।’’
मोबाइल बन्न कऽ राधेश्याम जेठ बहीनि गौरीक नम्बर लगौलक।

‘‘हेलो, बहीनि। माए दुखित पड़ि गेलथुन।’’

‘‘एखन हम स्कूलेमे छी आ अपनहुँ (पति) कओलेजे मे छथि। छुट्टीक दरखास्त दइये दैत छिअए। साँझ धरि पहुँच जायब।’’
मोबाइल बन्न कऽ छोटकी बहीनिक नम्वर लगौलक।

‘‘सुनीता। हम राधेश्याम।’’
‘‘भैया, माय नीके अछि की ने?’’
‘‘एखन की नीक आ कि अधलाह। तीनि दिनसँ ओछाइन धेने अछि। तेँ किछु कहब कठिन।’’
‘‘हम अखने छुट्टीक दरखास्त दऽ आबि रहल छी।’’
‘‘बड़बढ़िया’’ कहि मझिली बहीनि रीताक नम्बर लगौलक।
‘‘हेलो, रीता। हम राधेश्याम। माए, बड़ जोर दुखित छथुन।’’

‘भैया, हम तँ अपने तते फिरीसान छी जे खाइक छुट्टी नहि भेटैत अछि। काल्हिये सँ दुनू बच्चाक प्रतियोगिता परीक्षा छियै।’
बिना स्विच ऑफ केनहि राधेश्याम मोबाइल राखि अकास दिशि देखए लगल। ठोर पटपटबैत- ‘बच्चाक परीक्षा......, मृत्यु सज्जा पर माय....! केकरा प्राथमिकता देल जाय? एक दिशि, जे बच्चा एखन धरि जिनगीमे पैरो नहि रखलक, सौंसे जिनगी पड़ल छैक। दोसर दिशि कष्टमय जिनगीमे पड़ल बृद्ध माय। खैर, सभकेँ अपन-अपन जिनगी होइ छैक आ अपना-अपना ढ़ंग सँ सभ जीबै चाहैत अछि। हम चारि भाइ बहीनि छी तेँ ने दोसर पर ओंगठल छी। मुदा जे असकरे अछि, ओ कोना माए-बापक पार-घाट लगबैत अछि। किछु सोचितहि छल कि नव उत्साह मनमे जगल। नव उत्साह जगितहि नजरि पाछु मुहे ससरल। चारु भाइ-बहीनिमे माय सबसँ बेसी ओकरे(रीता) मानैत छलि आ ओकर सेबो केलक। कारणो छलैक
जे बच्चेसँ ओ रोगा गेल छलि। मुदा आश्चर्यक बात तँ ई जे जेकरा माय सभसँ बेसी सेवा केलक वैह सभसँ पहिने बिसरि रहलि अछि।

गोंसाइ डूबैत-डूबैत मामो आ दुनू बहीनि-बहिनोइ पहुँच जाइ गेलथिन।
अबितहि डॉ. सुधीर(छोट बहिनोइ) आला लगा माए(सासु) केँ देखि कहलखिन-‘‘भैया, माए बँचतीह नहि। मुदा मरबो दस दिनक बादे करतीह। तेँ एखन ओते घबड़ेबाक बात नहि अछि। अखन हम जाइ छी, मुदा बहीनि(डॉ. सुनिता) रहतीह। ओना हमहूँ दू दिन-तीन दिनपर अबैत रहब।’’

डॉ. सुधीरक बात सुनि सभकेँ क्षणिक संतोष भेलनि।
मामा कहलखिन- ‘‘भागिन, ओना हम ककरो छींटा-कस्सी नहि करैत छिअनि मुदा अपन अनुभवक हिसाबे कहैत छिअह जे भरि दिन तँ स्त्रीगण सब मुस्तैज
रहथुन मुदा राति मे नहि। ओना हमरो गाम बहुत दूर नहिये अछि। एखन तँ धड़फड़ाइले चलि एलहुँ। तेँ एखन जाइ छी। काल्हि सँ साँझू पहरकेँ अयबह आ भोर कऽ चलि जेबह। भरि राति दुनू माम-भगिन गप-सप करैत ओगरि लेब।’’
दुनू बहिनोइयो आ मामो चलि गेलखिन।

‘‘आइ सातम दिन माएकेँ अन्न छोड़ब भऽ गेलनि। दू-चारि चम्मच पानि आ दू-चारि चम्मच दूध, मात्र अधार रहि गेल छनि।’’ -आंगनसँ दरवज्जापर आबि रागिनी पतिकेँ कहलथिन। पत्नीक बात सुनि राधेश्याम मने-मन सोचै लगलाह। मन मे उठलनि चारु भाइ-बहीनिक पारिवारिक जिनगी। कतेक आशासँ दुनू गोटे(माए-पिता) हमरा चारु भाइ-बहीनि केँ पोसि-पालि, पढ़ा-लिखा, वियाह-दुरागमन करा परिवार ठाढ़ कऽ देलनि। जहिना गौरी(जेठ बहीनि) एम.ए. पास अछि। तहिना एमए.पास बहिनोइयो छथि। हाई स्कूलमे बहीन नोकरी
करैत अछि तँ कौलेजमे बहिनोइ। परिवारक प्रतिष्ठा, समाजोमे बढ़वे केलनि जे कमलनि नहि। तहिना छोटकियो बहीनि अछि। बहीनो डॉक्टर आ बहिनोइयो डॉक्टर।
तहिना तँ पिताजी मझिलियो बहीनि केँ केलनि। दुनू परानी इंजीनियर। बम्बईमे दुनू गोटे नोकरी करैत।

जहिना तीनू बहीनि पढ़ल-लिखल अछि तहिना बहिनोइयो छथि। अजीव नजरि पितोजीक छलनि। मनुष्यक पारखी। तेँ ने बहीनिक विआह समतुल्य बहिनोइक संग केलनि। एक माए-बापक तीनू बेटी, पढ़ल-लिखल, एक परिवारमे पालल-पोसल गेलि, मुदा तीनूक विचारमे एते अंतर कोना अबि गेलै। एहि प्रश्नक जबाव राधेश्यामकेँ बुझैमे अयबै नहि करनि। मन घोर-घोर होइत। एक दिशि माइक
अंतिम अवस्थापर नजरि तँ दोसर दिशि मझिली बहीनिक व्यवहार पर।

विचारक दुनियाँमे राधेश्याम औनाय लगलाह। प्रश्नक जबाब भेटिबे ने करनि। अपन परिवार पर सँ नजरि हटा बहीनि सभक परिवार दिशि नजरि दौड़ौलनि।
गौरीक ससुर उमाकान्त हाई स्कूलक शिक्षक रहथिन। अपने बी.ए. पास मुदा पत्नी साफे पढ़ल-लिखल नहि। नामो-गाम लिखल नहि अबनि। ओना पिता पंडित रहथिन। मुदा बेटी कऽ परिवार चलबैक लूरिकेँ बेसी महत्व देथिन। जाहिसँ कुशल गृहिणी तँ बनि जाइत, मुदा ने चिट्ठी-पुरजी पढ़ल होइछै आ ने लिखल। ओना जरुरतो नहि रहै। किऐक तऽ ने पति-पत्नीक बीच चिट्ठी-पुरजीक जरुरत आ
ने कुटुम्ब-परिवारक संग। मुदा दुनू परानी उमाकान्त आ सरिताक बीच असीम स्नेह। मास्टर सैहब केँ अपन बाल-बच्चा सँ लऽ कऽ विद्यालयक बच्चा सभकेँ
पढ़बै-लिखबैक मात्र चिन्ता। जहि पाछू भरि दिन लगलो रहथि। जखन कि पत्नी सरिता परिवारक सभ काज सम्हारैत। एखनुका जेकाँ लोकक जिनगियो फल्लर नहि, समटल रहै। गौरीक परिवार पर सँ नजरि हटा राधेश्याम छोटकी बहीनि डॉ. सुनिताक परिवारपर देलनि। जहिना बहीनि डॉक्टरी पढ़ने तहिना बहिनोइयो। जोड़ो बढ़ियाँ। सुनिताक ससुर बैद्य रहथिन। जड़ी-बुट्टीक नीक जानकार। जहिना जड़ी-बुट्टीक जानकार तहिना रोगो चिन्हैक। जहि सँ समाजमे प्रतिष्ठो नीक आ जिनगियो नीक जेकाँ चलनि। तेँ अपन चिकित्साक वंशकेँ जीवित रखैक दुआरे बेटाकेँ डॉक्टरी पढ़ौलनि। पत्नियो तेहने। अंगनाक काज सम्हारि, बाध-बोन सँ जड़िओ-बुट्टी अनैत आ खरलमे कुटबो करैत रहथि। दवाइ बैद्यजी अपने बनाबथि
किऐक तँ मात्राक बोध गृहिणी केँ नहि रहनि। छोटकी बहीनिक परिवार पर सँ नजरि हटा मझिली बहीनिक परिवारपर देलनि। रीताक ससुर मलेटरिक इंजीनियरिंग विभागमे हेल्परक नोकरी करैत। अपनहि विचार सँ मलेटरिऐक बेटी सँ विआहो केने- लभ-मैरिज । मलेटरिक नोकरी, तेँ पाइयो आ रुआबो। हाथमे सदिखन हथियार तेँ मनो सनकल। मुदा बेटा-बेटीकेँ नीक जेकाँ पढ़ौलनि। जहिना रीता इंजीनियरिंग पढ़ने तहिना घरोवला। दुनू बम्वईक कारखानामे नोकरी करैत। कमाइयो नीक खरचो नीक, तहिना मनक उड़ानो नीक। एकाएक राधेश्यामक
मनमे उठल जे आब तँ माइयक अंतिमे समय छी तेँ एक बेरि रीताकें फेरि फोन कऽ कऽ जानकारी दऽ दिअए। मोवाइल उठा रीताक नम्वर लगौलनि। रिंग भेल।

‘‘हेलो, हम राधेश्याम।’’
‘‘हेलो, भैया। अखन हम स्टाफ सबहक संग काजमे व्यस्त छी।’’

रीताक जबाव सुनि राधेश्याम सन्न रहि गेलाह। रातिक दस बजैत। इजोरियाक सप्तमी अन्हार-इजोतक बीच घमासान लड़ाइ छिड़ल। किछु पहिने जहि चन्द्रमाक
ज्योति अन्हारपर शासन करैत, वैह चन्द्रमा पछड़ि रहल अछि। तेज गति सँ अन्हार आगू बढ़ि रहल अछि।

तहि बीच छोटकी बहीन डॉ. सुनीता आंगनसँ आबि भाइ राधेश्यामकेँ कहलक-‘‘भैया, हम तँ भगवान नहि छी, मुदा माइयक दशा जहि तेजी सँ बिगड़ि रहल
छनि, तहि सँ अनुमान करैत छी जे काल्हि साँझ धरि परान छुटि जेतनि।’’

एक दिशि माइक अंतिम दशा आ दोसर दिशि रीताक बिचारक बीच राधेश्यामक धैर्यक सीमा डगमग
करै लगलनि। विचित्र स्थिति। जिनगीक तीनिबट्टी पर
वौआइ लगलाह। तीनिबट्टीक तीनू रस्ता तीनि दिस जाइत।
एक रास्ता देवमंदिर दिशि जाइत त’ दोसर दानवक काल
कोठरी दिशि। बीचक रास्ता पर राधेश्याम ठाढ़। एकाएक
निर्णय करैत राधेश्याम बहीनि सुनिता क’ कहलखिन-
‘‘कने गौरियो क’ बजाबह।’’

आंगन जा सुनिता गौरी क’ बजौने आयलि। दुनू
बहीनिक बीच राधेश्याम बजलाह- ‘‘बहीनि, जहिना हमर
बहीन रीता तहिना त’ तोड़़ो सबहक छिअह। तेँ, तोहूँ सब
एक बेरि फोन लगा मायक जानकारी द’ दहक। हम
निर्णय क’ लेलहुँ जे जहिना एहि दशा मे मायक रहनहुँ,
ओकरा अपन धिया-पूता सँ अधिक नहि सुझैत छैक
तहिना हमहूँ ओकरा भरोसे नहि जीबैत छी। तेँ जँ माय
के जीवित मे नहि आओत त’ मुइलाक बाद नहो-केश
कटबैक जानकारी नहि देबइ। हमरा-ओकरा बीच ओतबे

काल धरि संबंध अछि जते काल मायक प्राण बँचल छैक।
कहलो गेल छैक ‘‘भाइ-बहीनि महीसिक सींग, जखने
जनमल तखने भिन्न।’’ मन त होइत अछि जे भने ओ
एखन स्टाफ सभक बीच अछि, तेँ एखने सभ बात कहि
दियै। मुदा कहनहुँ त’ किछु भेटत नहि, तेँ छोड़ि दैत
छियै।’’
जहिना अकास मे उड़ैत चिड़ै के बंश रहितहुँ परिवार नहि
होइछै तहिना जँ मनुक्खोक होइ त अनेरे भगवान किऐक
बुद्धि-विवेक दइ छथिन। किऐक नहि मनुक्खो केँ
चिड़ैइये-चुनमुनी आ कि चरिटंगा जानवरेक जिनगी जीबए
देलखिन।’

बजैत-बजैत राधेश्यामोक आ दुनू बहीनियोक करेज
फाट’ लगलनि। आंखि स’ नोर टघरै लगलनि। भाइ-बहीनिक
टूटैत संबंध स’ सभ अचंभित हुअए लगलथि। सभहक
हृदय मे रीता नचै लगलनि। बच्चा स’ वियाह धरिक
रीताक जिनगी सभहक आंखिमे सटि गेलनि। एक दिशि
रीता बम्बईक घोड़दौड़ जिनगीक प्रतियोगितामे आगू बढ़ै
चाहैत छलि त’ दोसर दिशि देवाल मे टांगल फोटो जेँका
सबहक हृदय मे चुहुट क’ पकड़ने। जहिना बाँसक झोंझ स
बाँस काटि निकालै मे कड़चीक ओझरी लगैत तहिना ध् ि
ाया-पूताक ओझरी मे रीता।

‘तीनू ननदि-भौजाई(गौरि, सुनिता आ रागिनी)
माय लग बैसि मने-मन सोचै लगलीह। कियो-ककरो
टोकैत नहि। तीनू गुमसुम। सिर्फ आंखि नाचि-नाचि
एक-दोसर पर जाइत। मुदा मन श्वेतबान रामेश्वरम्
जेँका। एक दिशि जिनगी रुपी भूमि(स्थल) जेँका विशाल
भूभाग देखैत त दोसर दिशि मृत्यु रुपी अथाह समुद्र। यैह
थिक जिनगी आ जिनगीक खेल। जहि पाछु पड़ि लोक
आत्मा क’ बलि चढ़वैत। तहि बीच माय बाजलि-
‘रीता.....।’ रीताक नाम सुनि तीनूक हृदय मे ऐहेन
धक्का लगलनि जहि स तीनू तिलमिला गेलीह।

रातिक एगारह बजैत। गामक सब सुति रहल।
इजोरियो डुबै पर। झल-अन्हार। दलानक आगू मे, कुरसी
पर बैसि राधेश्याम आंखि मूनि अपन वंशक संबंध मे
सोचैत रहथि। मन मे अयलनि जे आइ सप्तमीक चान
डुबि रहल अछि, अन्हार पसरि रहल अछि, मुदा कि
कल्हुका चान आइ स’ कम ज्योतिक होएत? की अगिला
ज्योति पैछला अन्हारक अनुभव नहि करत? सब दिन स’
अन्हार-इजोतक बीच संघर्ष होइत आयल अछि आ होइत

3

रहत। फेरि मन मे उठलनि जे आजुक राति हमरा लेल
ओहन राति अछि जे भरिसक मायक जिनगीक अंतिम
राति होएत। जनिका संग हजारो राति बीतल ओहि पर
विराम लगि रहल अछि। विचारक दुनियाँ मे उगैत-डूबैत
राधेश्याम। तहि काल शबाना पोतीक संग पहुँचलीह।
दलान-आंगनक बीच रास्ता पर दुनू गोटे चुपचाप
ठाढ़ि। दुनू डेरायल। राधेश्याम आंखि मुनने तेँ नहि
देखैत। परोपट्टा मे हिन्दु-मुसलमानक बीच तना-तनी।
जहि डर स शबाना दिन के नहि आबि अन्हार मे
आयलि। किऐक त सरोजनीक स्नेह खींचि क ल’
अनलकें। रेहना शबाना क’ कहलक- ‘‘दादी, अइठीन
किअए ठाढ़ छीही, अंगना चल ने?’’

रेहनाक अवाज सुनितहि राधेश्याम आंखि
तकलनि त दुनू गोटे क’ ठाढ़ देखलनि। पुछलथि-
‘‘के?’’
शबाना बाजलि- ‘‘बेटा, राधे।’’

‘‘मौसी।’’

‘‘हँ’’

‘‘एत्ती राति क’ किऐक अलेहें?’’

‘‘बौआ, से तू नै बुझै छहक जे गाम-गाम मे केहेन
आगि लागि रहल छैक। पाँचम दिन सुनलौ जे बहीनि
बड़ जोड़ अस्सक छथि। जखने सुनलहुँ तखने मन भेल
जे जाइ। मुदा की करितौ? मन छटपटाइ छलै। बेटा क’
पुछलियै त कहलक जे से तू नै देखै छीही रस्ता-बाटमे
इज्जत-आवरुक लुटि भ’ रहल अछि। मार-काट भ’
रहल अछि। ऐहन स्थिति मे कोना जेमए। मुदा मन नै
मानलक। जिनगी भरि दुनू बहीनि संगे रहलौ, आइ
बेचारी मरि रहल अछि त मुहो नै देखब? जी-जाँति
पोती के संग केने एलौ।’’

कुरसी पर स उठि राधेश्याम शबानाक बाँहि
पकड़ि आंगन दिशि बढ़ैत बहीनि क’ कहलथिन-
‘‘मौसी अयलखुन। पाएर धोय ले पानि दहुन।’’

राधेश्यामक बात सुनि दुनू बहीनियो(गौरी आ
सुनिता) आ रागिनियो घर स निकलि आंगन आइलि।
गौरी बजलीह- ‘‘मौसी, शबाना मौसी!’’
शबाना बजलीह- ‘‘हँ।’’

दुनू गोटे(शबानो आ रेहनो) पाएर धोय सोझे
बहीनि(सरोजनी) लग पहुँच दुनू पाएर पकड़ि कनै

लगलीह। कनैत देखि सरोजनी पुछलथिन- ‘‘कनैइ किअए
छेँ। हम कि कोनो आइये मरब? एत्ती राति क’ किअए
एलैहें?’’

शबाना बाजलि- ‘‘बहीनि, रस्ता-पेरा बन्न अछि। दू बर्ख
स’ भौरियो-बट्टा(घुमि-घुमि बेचनाइ) बन्न भ’ गेल। जखैन
से अहाँ द’ सुनलहुँ, तखैन स’ मन मे उड़ी-बीड़ी लगि गेल
तेँ दिन-देखार नै आबि चोरा क’ अखैन ऐलौहें।’’
सरोजनी बहुत कठीन सँ बाजलि- ‘‘धिया-पूता नीके छौ की
ने?’’
शबाना कहलकनि- ‘‘शरीर से ते सब नीके अछि, मुदा
कारबार बन्न भ’ गेल अछि।’’

‘‘गामो(नैहर) दिशि गेल छलेहें?’’

‘‘नै। कन्ना जायब....। तेसर सालक बाढ़ि मे अहूँक गाम
कटि क’ कमला पेट मे चलि गेल आ हमरो गाम कोसी मे।’
हमरो गाम भरना पर बसल हेँ आ अहूँक गाम कमलाक
पछबरिया छहरक पछबरिया बाध मे। घनश्यामपुर तक त’
रस्ता छइहो(छहिहो) मुदा ओइ से आगू रस्ते सब पर मोइन
फोड़ि देने अछि। पौरुका जे जाइत रही त लगमा लग मे डूबै
लगलौ।’
सरोजनी गौरी के इशारा सँ कहलक- ‘‘दाइ, बड़ राति
भेलइ। मौसी के खाइ ले दहक।’’
शबाना बाजलि- ‘‘बहीनि, पहिने हम कना खाएब? पहिने
बौआ (राधेश्याम) के खुआ दिऔ। खा क’ सुति रहत। हम
भरि राति बहीन से गप-सप करब। बहुत दिनक गप पछुआइल
अछि।’’

शबानाक बात सुनि राधेश्याम मने-मन सोचै लगल
जे दुनियाँ मे बहीनिक कमी नहि अछि। लोक अनेरे अप्पन
आ बीरान बुझैत अछि। ई सब मनक खेल छिअए। हँसी-खुशी
स जीवन बितबै मे जे संग रहए, ओइह अप्पन। शवाना क’
कहलक- ‘‘मौसी, माए त ने सिर्फ हमरे माए छी आ ने
अहींक बहीनि। सबहक अप्पन-अप्पन छिअए, तेँ कियो
अप्पन करत की ने?’’

पूबरिये घरक ओसार पर राधेश्याम सुतल। बाकी
सभ पूबरिया घर मे बैसि गप्प-सप करए लगलीह। गौरी
पुछलनि- ‘‘मौसी, अहाँ दुनू बहीनि त दू गामक छिअए। दुनू
गोरे मे चीन्हा-परिचय कहिया भेलि?’’
शबाना बाजनि- ‘जइहे(जहिहे) से ज्ञान-परान भेलि, तेहिये से
अछि। हमरा बाप आ तोरा नाना(कका) क’ दोसतियारै

4

रहनि। कोस भरि पूब हमर गाम(झगड़ुआ) अछि आ कोस
भरि पछिम बहीनिक। अखन त’ दुनू गाम उपटि क’
दोसर ठीन बसल अछि। मुदा पहिने बड़ सुन्दर दुनू गाम
छलै।

गौरी बाजलि- ‘‘मौसी, हम त बच्चे मे, बहुत दिन पहिने
गेल रही। तइ दिन मे त’ बड़ सुन्दर गाम रहए।’’
शवाना बजलीह- ‘‘हँ, से त रहबे करए। मुदा आब
देखवहक ते बिसबासे ने हेतह जे अइह गाम छिअए। हँ,
त कहै छेलिहह, काका केँ(गौरीक नाना) बहुत खेत-पथार
रहनि। चारि जोड़ा बड़द खुट्टा पर, चारि-पाँच टा महीसियो
रहनि। मुदा हमरा बाप के खेत-पथार नै रहै। गामे मे
खादी-भंडार रहए। सौंसे गामक लोक चरखोे चलबै आ
कपड़ो बीनए। सबसँ नीक कारीगर रहए हमर बाप।
घरक सब कियो सुतो काटी आ कपड़ो बनबी। सलगा,
चद्देरि, गमछी आ धोती बीनएमे हमरा बापक हाथ
पकड़िनिहार कियो नहि। बहीनिक गामक सब हमरे बाप
स’ कपड़ा कीनए। सौंसे गाम से अपेछा रहए। पाँचे-सात
वर्खक रही तहिये से बहीनिक(ऐठाम) अइठीन जेबो
करियै आ खेबो करियै।’’

शबानाक बात सुनि गौरी क अचरज लगलै।
मने-मन सोचै लगली जे एक त’ गरीब तहू मे मुसलमान।
तहि बीच दोस्ती। मुस्की दैत रागिनी बाजलि- ‘‘कोन
पुरना खिस्सा मौसी जोति देलखिन। ई कहथु जे दुनू
बहीनिक बिआह एक्के दिन भेलनि?’’
शबाना बाजलि- ‘धूर्र कनियाँ! अहाँ की बजै छी। हमरा
स’ बहीनि दू-तीन बरख जेठ छथि। बहीनिक वियाह से
दू वर्ख पाछु क’ हमर वियाह भेल। कक्का हमरा बाप के
कहलखिन जे पूबरिया आ दछिनवरिया इलाका कोशिकन्हा
भ’ गेल तेँ आब कथा-कुटुमैती उत्तरेभर करब नीक हैत।’
कन्ने गुम रहि, शबाना बाजलि- ‘‘बेटी, कपारक दोख
भेल। आब अपनो बुझै छी जे नैहरक काजक जे महौत(महत्व)
छेलै से अइ काजक(भौरीक) नै अछि। मुदा की करितियै?
अइ ठीन(सासुर) उ काज अछिये नहि। ने खादी-भंडार छै
आ ने कारोवार अछि।’’

मुस्की दइत रागिनी बाजलि- ‘‘मौसी, अपना वियाह मे
तँ हम कनिये टा रही। सब गप मनो ने अछि। हिनका त
मन हेतनि, विआह मे झगड़ा किअए भेल रहए?’’
कने काल गुम रहि शबाना ठाहाका मारि हँसि, बजै

लगलीह- ‘‘अहाँक बावू बड़ मखौलिया रहथि। हँसी-चैल
मे ककरो नइ जीतए देथिन। घरदेखी मे अयलथि। हम
दुनू बहीनि खूब छकौलिएनि। पीढ़ी तर मे खपटा, झुटका
आ रुइयाँ तरि क’ सेहो देलिएनि। खा क’ जहाँ उठलाह
कि एक डोल करिक्का रंग कपार पर उझलि देलिएनि।
मुदा हुनका लिये धनि सन। तहिना बरिआती मे ओहो
छकौलकनि। सबहक धोती मे चारि-पाँच दिनक सड़लाहा
खैर(खइर) लगा देलकनि। पहिने त बरिआती सब अपन
मे रक्का-टोकी केलक। मुदा जखन भाँज लगलै जे घरवारी
सबकेँ सड़लाहा खइर लगा देलक। तखन बरिआतियो सब
टूटल। मुदा कहे-कही भ’ क’ रहि गेलइ। मारि-पीटि नहि
भैल।’’ कहि हँसै लागलि। सभ हँसल।

राधेश्याम ओसार पर सुतल रहथि। मुदा एक्को
बेरि आंखि बन्न नहि भेलनि। किऐक त मन मे शंका
होइत जे अनचोके मे ने माय मरि जाय। खिस्से-पिहानी मे
राति कटि गेल।

भोर होइतहि शबाना राधेश्याम क’ कहलक-
‘‘बौआ, अपन मन अछि जे आब बहीनि क’ एक
काठी(लकड़ी) चढ़ाइये क’ जायब। मुदा गामे-गाम जे
आगि लगल देखै छिअए तइ से डर होइ अए।’’
राधेश्याम बजलाह- ‘‘मौसी, एहिठाम कियो किछु नहि
बिगाड़ि सकैत छओ। जहिया तक तोरा रहैक मन होउ,
निर्भीक स’ रह।’’
शवाना बाजलि- ‘‘बौआ, मन होइ अए जे बहीनिक सब
नुआ-बिस्तर हम खीचि दिअए। फेरि ई दिन कहिया
भेटत’’
राधेश्याम- ‘‘दुनू बहीनिक बीच हम की कहबौ। जे मन
फुड़ौ से कर।’’

इम्हर आब राधेश्यामक माय सरोजनीक टनगर
बोलो मद्धिम भेल जा रहल छलनि।


अनमोल झा (१९७०- )-गाम नरुआर, जिला मधुबनी। एक दर्जनसँ बेशी कथा, लगभग सय लघुकथा, तीन दर्जनसँ बेशी कविता, किछु गीत, बाल गीत आ रिपोर्ताज आदि विभिन्न पत्रिका, स्मारिका आ विभिन्न संग्रह यथा- “कथा-दिशा”-महाविशेषांक, “श्वेतपत्र”, आ “एक्कैसम शताब्दीक घोषणापत्र” (दुनू संग्रह कथागोष्ठीमे पठित कथाक संग्रह), “प्रभात”-अंक २ (विराटनगरसँ प्रकाशित कथा विशेषांक) आदिमे संग्रहित।
लघुकथा
अधिकार

-एकटा बात ध्यानसँ सुनि ले लखना,जऽ बेगारी नै खटमे हमर आ आबाज ऊँच कके बजमे तऽ बासडीह जे छउ तकरा खाली करऽ परतउ। हमर पुरखा तोरा बाप-पुरखाकेँ रैयतमे जमीनपर बसेने छला एहि उपकार ले जे तू हमरा मुँह लागल जबाब देमे।
-तकर माने की अहाँ हमर उपजल बोनि नै देब आ अहाँक बेट-भातिज हमर इज्जत दिस आँखि उठायत। हाथ-पैर तऽ तोड़ि देबै तकर। हँ रहल बासडीह बला सवाल से एतेक सस्ता नै छैक जे खाली करबा देब अहाँ। दस-बीस साल जे बटाइयो खेती करै छै तऽ सरकार कहै छै जे खेत ओकरे छियै आ दू पाँच पुरखासऽ जाहि डीहपर बसल छी हम सब से हम्मर नै! हाकिमक देल बासगीत परचा सेहो अछि हमरा लग।


जगदीश मंडल
उपन्यास:
उत्थान-पतनः


गामे-गाम, कतौ अष्टयाम कीर्तन तँ कतौ नवाह, कतौ चण्डी यज्ञ त’ कतौ सहस्र चण्डी यज्ञ होइत।
किसेक तँ एगारह टा ग्रह एकत्रित भऽ गेल अछि। की हैत की नइ हैत कहब कठिन। एकटा बाल ग्रह बच्चा
केँ भेने त’ सुखौनी लगि जाइत आ जहिठाम एगारह टा ग्रह एकत्रित अछि तइ ठाम त’ अनुमानो कम्मे हैत।
परोपट्टा भगवान नाम स गदमिसान होइत। जओ तील, घीउक गंध सँ हवा सुगन्धित। सभक हृदय मे भगवान
क स्वरुप बिराजैत। सभ व्यस्त। सभ हलचल। खरचाक कोनो इत्ता नहि। जना निसाँ लगला पर बेेहोशी होइत,
तहिना जाधरि लोक कीर्तन मंडलीक संग, मंडप मे कीर्तन करैत ताधरि घरक सब सुधि-बुधि बिसरि मस्त भ
रहैत। मुदा घर पर अबिते केयो भूखल गाय-महीसिक डिरिऐनाई सुनि, चिन्तित होइत त क्यो बच्चा केँ
बाइस-बेरहट ले ठुनुकब सुनि। व्यथा कऽ दबैत सब आखिक नोर होइत बहाबैत। चारि सालक रौदीक चलैत
पोखरिक पाइन सूखि गेल। नमहर-नमहर दरारि खेत स ल कऽ पोखरि धरि फाँटि गेल। इनारक मटिआइल पानि
भरि-भरि सब घैल मे रखि, जखन फड़िछाइत तखन गिलास, लोटा मे ल ल पीबैत। लोक की करत? कत्ते जायत?
मृत्युक मुह छोड़ि दोसर रस्ते की? आजुक कोलकत्ता ओ कलकत्त नहि जहिठाम अकाल आ समुद्री तूफान स
ढ़ेरो लोक मरैत छल। जकरा आइ अपन दोसर घर बुझि लोक जीवन-यापन करै जाइत अछि। आजुक पंजाब
ओ पंजाब नहि जहिठाम आन-आन राजक लोक जा खेत-खरिहान स कारखाना धरि खटि क परिवारक
भरण-पोषन करैत अछि। पंजाबक ओ दशा छल, जइठाम कल-कारखानाक कोन गप जे खेतक माटि गेउर रंगक
कंकड़ मिलल, बरखा स भेटि नहि होइत छल। साइते-संयोग साल मे कहिओ बरखा भऽ जाइ छलै। ओतुक्का
लोक पड़ा-पड़ा आन-आन राज जा हड़तोड़ मेहनत कऽ जीविका चलबैत। बम्बई आजुक मुम्बई नहि। ने सिनेमा
उद्योग छल ने कलकाखाना आ ने अखुनका जेँका कारोबार।

गंगानन्द केँ तीस बीघा जमीन। तीनि भाईक भैयारी आ सत्तर गोटेक आश्रम। जइ साल सबारी समय
समय होइत ओइ साल आश्रम चला, मलगुजारी दइयो के गंगानन्द केँ अन्न उगड़ि जाइत जकरा दू-सलिया ,
तीनि सलिया पुरान बना खाइत। सबाइयो लगबैत। पहिल सालक रौदी गंगानन्द केँ बुझि नहि पड़लनि। घर मे
धान-चाउर, गाय-महीसि ले बड़का-बड़का दू टा नारक टाल। पहिलुके जेँका गंगानन्दक मन हरियर। दोसर साल
घरक धान-चाउर लगिचायल। रौद मे, जहिना गाछक तोड़ल फूल मौलाइ लगैत तहिना गंगानन्द मौलाइ लगला।
कुटुम्बो-संबंधीक आवाजाही बढ़ि गेलनि। गंगानन्दक जेठ बेटी रीता सासुर बसैत। चारि बेटी आ एक बेटाक संग
रीता सेहो आबि गेलनि। रीताक जेठकी आ मझिली बेटी विआह करै जोकर। जँ कहिओ रीता कोनो काज मे
नैहर अबैत त काजक पराते सासुर जाइ ले धूम मचा दैत। किऐक त सासुरक सब भार रीते दुनू परानी पर।
भैयारी मे जेठ रहने घर से बहार धरिक सब तरद्दुत करय पड़ैत।

रौदीक चलैत रीता धिया-पूता ल’ छबो गोटे नैहर आयल। मासो सँ उपरे भ’ गेलैक मुदा सासुर जेवाक
चर्चे ने करैत। बाप-माय बेटीके कोना मुँह फोड़ि जाइ ले कहत। भरिआयल खरचा सँ गंगानन्द तेरे-तर कुहरैत।
छाती दलकैत। साल खेपब कठिन रहै। बरखाक कतौ पता नहि। सभ खेत परती भेला स’ पड़ल। ने हर जोतय
जोकर एकोटा आ ने पानिक कोनो दोसर उपाय। मने-मन रीता सोचए जे अगर सुमनक(जेठ बेटी) विआहक
चर्चा माए करत तँ ओकरे माथ पर पटकि देव। अपना बूते तँ वियाह पार लागव कठिन अछि।

सभ दिन साझू पहर क’ गंगानन्द चूड़ाक भूजा फँकैत छलाह। बीस मनिया कोठी टा मे चाउर बचल
छल। धान पहिने एठि गेल छल। धानक दुआरे चूड़ा कुटाओल कथीक जायत?गंगानन्दक पत्नी पार्वती पतिक
अभ्यास बूझि चाउर भूजि छिपली मे नेने एलखिन। भूजल चाउर देखि गंगानन्द मने-मन बुझि गेलखिन जे धान
सठि गेल। पुरान चाउर रहने भूजा पथरा गेल, तेँइ सक्कत रहै। पहिलुक फक्का मुँहमे लइते गंगानन्दक दाँत
सिहरि गेलनि। दाँत सिहरतहि गंगानन्द लोटाक पानि मुँहमे ल’ गुल-गुला केँ घोटलनि। मुँहक चाउर घोटि छिपली
आगू सँ घुसका देलखिन। मने-मन पार्वती अंदाजलनि जे सक्कत दुआरे भूजा नहि खा’ भेलनि। मुदा उपाय की?
गंगानन्द केँ तामस नहि उठलनि। जँ घरमे धान रहैत तँ चूड़ा कुटाओल जायत। नहि रहने कतए सँ आओत।




जहिना लकड़ी जरि केँ राख भेला पर षक्तिहीन भ’ जायत तहिना गंगानन्दक दषा भ’ गेल रहनि। गिलासमे चाह
नेने नातिन सुमन आइलि। दुनू परानीक नजरि सुमन पर पड़ल। चाह राखि सुमन आंगन चल गेलि। लग्गी भरि
हटि क’ बैसलि पार्वतीकेँ हाथ्क इषारा सँ गंगानन्द लग ऐवाले कहलनि। पार्वती बैसले-बैसल घुसुकि क’ लग
आयलि। फुस-फुसा क’ गंगानन्द पत्नीकेँ कहलखिन- ‘‘रीताक दुनू बेटी, जेठकियो आ मझलीयो वियाह जोकर
भ’ गेल। जँ कहीं एहिसाल एकोटा वियाह ठनलक तँ इज्जति वाँचव मोसकिल भ’जैत। हमहू तँ नने छियैक।’’

एखन धरि वार्वती अंगना सँ दलान धरि अवैत-जायत रहली हेन। एहि सँ अधिक नहि देखलनि। ने समय
भेटलैनि आ ने घरक नी अधला नीक अधला बुझल। नातिनक यिाह बुझि उद्गार सँ पार्वती कहलकनि- ‘‘यज्ञो
ककरो बाकी रहैत छै। यैह तँ भगवानक लीला छन्हि जे गरीब स’ ल’ क’ अमीर धरि सबहक काज होइते
जायछै।’’
चोटाइल साप जेँका गंगानन्दक दषा रहनि। दिन ससरब कठिन। तई पर सँ पत्नीक चढ़ल बात सुनि, केँचुआ
छोड़ैत सापक साँस तेज भ’ जाइत तहिना नमहर साँस छोड़ैत गंगानन्द कहए लागलखिन- ‘‘ऐहन दुरकाल मे जीवि
कठिन अछि तई पर वियाह सनक यज्ञ तहन तँ जकरा सिर पर जे काज अबैत छैक, कोनो ने कोनो तरहेँ करिते
अछि। दू सालक रौदीक झमार। अखनो धरि पानिक कोनो आषा नहि, पहिले ओ पार करब अछि। वियाह तँ
एक-आध साल आगूओ बढ़ाओल जा सकैत अछि।’’

ओलती लग ठाढ़ भ’ रीता माय-बापक फुसुर-फुसुर गप्प सुनैत। जखन गप्प मोड़ पर आयल कि रीता
आगू बढ़ि मायक लग आबि ठाढ़ भ’ गेलि। अपन बात क’ छिपबैत गंगाननद कठहँसी हँसि पत्नीकेँ कहए
लगलनि- ‘‘रीतोक बेटी वियाह करए जोकर भेल जाइछै?’’
मुँह निच्चा केने रीता बाजलि- ‘‘बावू, दुनू बहीन तरे-उपरे भ’ गेलि अदि। मुदा घरक जे दषा अछि तहिमे अखन
वियाह पार लागब कठिन अछि। जखन समय-साल सुधरतै तखन बुझल जेतै।’’
मने-मन गंगाननद सोचथि जे घरक भार पड़ला सँ सभ आगू-पाछू देखि किछु करैत। मूड़ी हिलबैत गेगानन्द
कहलखिन- ‘‘हँ, से तँ ठीके। अखन विवाह करबाक अनुकूल समयो ने अछि। सिर्फ हमरे टा नइ समाज मे बहुतोँ
के बेटी विवाह करै जोकर छै। सभक पार तँ भगवाने लगौथिन।’’
पिताक बात सुनि रीता क’ मोनमे षान्ति एलै। अपन परिवारक संबंध मे रीता पिताकेँ कहए लागलनि- ‘‘बावू
घरक हालत खराव भ’ गेल अछि। एक तँ दू-अढ़ाई बरखक रौदी दोसर सवांगो सभ उहिगर नहि ने क्यो
कमाई-खटाई बला नहि अछि। भरि दिन, कतौ बैसि क’ गप्प-षप्प लड़वैत दिन बितवैत छथि। जेना कोनो
धैन-फिकिर नहि। भैयारी मे जेठ रहने दुनू परानी काजक पाछु दिन-राति अपस्याँत रहैछी।’’

मास पूरए मे दू दिन रहल। राजक सिपाही केँ पटवारी अंतिम सूचना मालगुजारीक लेल पठौलक। सिपाही
आबि गंगानन्द केँ कहलकनि- ‘‘परसू तक जँ मालगुजारी नै देवइ तँ जमीन निलाम भ’ जायत। पटवारी अपन
जाति-बेरादर बुझि चुपचाप पठौलनि।’’
सिपाहीक समाचार सुनि गंगाननदकेँ हृदय मे ऐहन धक्का लागल जना कोनो राजाकेँ दुष्मन राज छीनि, भगा दैत।
छाती धकधकाइत! कंठ सुखैत गंगानन्द सिपाहीकेँ कहलक- ‘‘अखन जे दषा अछि तहि मे मालगुजारी देव असंभव
अछि। दोसर कोनो रास्तो ने सुझैत अछि।’’

गंगाननदक मजवूरी वुझति सिपाही कहलकनि- ‘‘एकटा उपाय अछि।’’

‘‘की?’’

‘‘पटवारी केँ वियाहै जोकर बच्चिाया छन्हि। अहाँ अपन बेटाकेँ बियाह क’ लिअ। देबो-लेब नीक जेँका
हैत। हुनके हाथक काज छन्हि जमीनक रसीद द’ देताह। क्यो बुझवो ने करत काजो भ’ जायत।’’

बचनाक आवाज सुनि, फुलिया जाँत चलौनाई रोकि, एक हाथ सँ हथरा पकड़ने,तकलक। बचनाक मोन,
जना धिया-पूताक हाथ सँ कौआ रोटी लपकि उड़ला पर होइत, तहिना रोगाइल मने बचना पत्नी(फुलिया) केँ




कहलक- ‘‘हम लक्ष्मीपुर(फुलिया नैहर, अपन सासुर) जँ कोनो गर जँ कोनो गर रुपैयाक लागि जायत त’ लगौने
अवै छी।’’
नैहरक नाम सुनि फुलियाक मनमे आनन्दक अंकुर अंकुरित होअए लागल मुदा विपत्त्कि चादरि ओकरा झाँपि
देलक। सोगाइल मने फुलिया बाजलि- ‘‘जाउ, कपार तँ फुटले अछि तइओ अपना भरि परियास करु। कपार
तँ उनटवो-पुनटवो करैछै जँ नीके गड़े उनटि जाय। कनिये थमि जाउ। रोटी पका दइ छी। खा के जायव।’’
मन्हुआइल बचना ठोर पटपटबैत बाजल- ‘‘बड़वढ़ियाँ। ताबे हमहू दौड़ले दाढ़ी बनौने अवैछी।’’


बचना दाढ़ी कटबैए ले विदा भेल। फुलिया जाँत लगक चिक्कस मुजेलामे उठौलक। चुल्हि लग मुजेला
राखि कोठी परसँ चिक्साही सूप अनलक। गठूलासँ जारन आनि चुल्हि पजारलक। नौवा गाममे नहि छल। मूडनक
पता देइ ले सुखेत गेल छल। बिना दाढ़ी कटौनहि बचना घुमि आवि, नहाए लागल। फुलिया रोटी पका, भाँटा
क’ सन्ना बनौलक। बचना हाँहि-हाँहि खा धोति-अंगा पहिर छाता ल’ लक्ष्मीपुर विदा भेल। वचना रास्तो चलै
आ मने-मन महावीरजी कँ सुमरैत कहलकनि- ‘‘हे महावीरजी काज भ’ जायत तँ अहाँ केँ एक रुपैया क’ चिन्नी
चढ़ाएव।’’ महावीरजी केँ कबूला करितहि जना बचनाक मोनमे विष्वास भ’ गेल जे काज हेबे करत। लक्ष्मीपुर
पहुँचते बचना सभक मन उदास मोन खसल छै! मुँ सँ फुफरी उड़ैछै। करेज पर पाथर राखि बचना सरहोजि सँ
पूछलक- ‘‘किऐक सभ अनोन-बिसनोन जेँका छथि।’’
नोराइल आँखिये सरहोजि उत्तर देलकनि- ‘‘पाहुन की कहब, खेतक मलगुजारी दू सालक पछुआयल छै। तई
दुआरे परसू सब खेत लिलाम भ’ जेतै।’’

सरहोजिक कलहंस बात सुनि बचना अवाक् भ’ गेल। ककर दुख के हरत! पाएरो ने धोय चोट्टे बचना
गाम घूमि गेल।

विसेसर घरक आगू मे रास्ता पर लोक सभ ठाढ़ रहै। रौदाइल विसेसर। हर जोेति कँ अबिते छल। हाथ
मे हरवाही पेना। माथ मे गमछाक मुरेठा बन्हने। फरिक्के सँ विसेसर सुनलक जे कचहरीक सिपाही बलजोरी बाड़ी
जा कदीमा तोड़ि लेलक। विसेसरक पत्नी मोहिनी कतबो मनाही केलकै सिपाही नहि मानलकै। मोहिनी आ
सिपाहीक बीच श्रक्का-टोकी होइते छल, कदीमा सिपाहीक हाथे मे रहै। धाँय-धाँय विसेसर चारि-पाँच पेना
सिपाहीके लगा, कदीमा छीन लेलक। गरिअबैत विसेसर कहलक- ‘‘बापक बाड़ी बुझि कदीमा तोड़ले। सिपाही
तू मालिकक छीही की हमर?’’
चाड़ि-पाँच गोटे मकड़ि विसेसरकेँ पकड़लक। दू-दू गोटे दुनू डेन पकड़ने तइओ जोष मे बिसेसर उठि क’ ठाढ़
भ’ हुरुकि-हुरुकि सिपाहीके मारक कोषिष करए। लोकक कहला सँ कनेक तामस विसेसरक कमल। गरिऔनाइ
बन्न केलक। मुदा तामसे ठोर पटपटैते। षान्त भ’ विसेसर बाजल- ‘‘अहाँ समाज मिलि पकड़लहुँ, मुदा पच्चीस
बेर सिपाहीकेँ कान पकड़ि उठाउ-बैसाउ। चाहे थुक फेकि चटबाउ जे फेरि ऐहन गल्ती नै करै। ई चोर छी।
लालीस क’ जहल से बाहर नै हुअए देवइ। राँड़-मसोमात हमरा बुझलक।’’

बिसेसरके मात्र दू कट्ठा घरारिये टा। सेहो बेलगान। दुइये गोटाक आश्रम। बेटा-पुतोहू भिन्न। एकटा
तेरह हाथक घर अपनो आ बेटो मिलाकेँ रहै। बाकी डेढ़ कट्ठा बाड़ी बनौने। मोहिनी अपन बाड़ी मे सभ दिन
राषि-राषि क’ तरकारी उपजबैत। बिसेसर बोइन करए। दुनू परानीक मिलानक चर्चा गामो मे होइत अछि। दुनू
गोटे अपन-अपन काज बँटने। भिनसुरका उखराहाक तीन सेर धान आ बेरका डेढ़ सेर दलिहन बोइन सभ दिन
विसेसर कमाइत। दुनू साँझ भरि पेट खाय निचेन सँ रहैए। कोनो हरहर-खटखट जिनगीमे नहि। दू सेर चारि
सेर घरो मे अन्न रहैत। साठि बर्खक विसेसर जुआन जेँका तनदुरुस्त। ने एकोटा दाँत टूटल आ ने केष पाकल।
जना दोसर-तेसर बोनिहार पचास वरख पुरैत-पुरैत झुन-कुट बूढ़ भ’ जाइत तना विसेसर नहि। नियमित काज
खायब आ सुतब विसेसरक खास गुण छलैक। तरकारीक गाछ रोपै स’ ल’ क’पटौनी, कमौनी सभ मोहनिये करैत
अछि।




44
मोहिनी डेढ़हो कट्ठा बाड़ी मे कोदारिक काज सँ ल’ क’ खुरपी हसुआँक सभ काज करैत अछि।
लत्ती-फत्ती ले छोट-छोट मचानो अपने बना लैत। तरकारीक गाछ रोपब, पानि देब,कमैनी सँ ल’ क’ देखभाल
तक करैत। अंगने जेँका चिक्कन वाड़ियो बनौने। सभ दिन मोहिनी धान कूटए। गाछी-बिरछी से पात खछड़ि
अनैत। दष हाथ्क एकटा लग्गी बनौने कुटए जइ से गाछक सुखल ठहुरी तोड़ै। विसेसर तमाकुल खाइत मोहिनी
हुक्का पीबैत। अमलो आसान। कातिक मे सय गाछ तमाकुल बाड़ी मे मोहिनी रोपि लैत जे माघ मे जुअएला पर
काटि लैत। उपरका मूड़ी, कनोजरि आ निचला पात डाँट के छाँटि पीनी कुटैत आ बीचला पात सुखा क’ खेवा
ले रखैत। एक्को पाई खरच नहि। बाध सँ मुइलहा डोका मोहिनी बीछि आनए। ओकरा डाॅहि क’ चून बना
लिअए। एक सेर धान क’ छुआ कीनि, डावा मे राखि, सालो भरि पीनी कूटए।

भोलिया विसेसरक बेटा। जाबत छोट छल मायक संग घर-आंगनाक काज करैत। गाछ पर चढ़ि सुखल
जारनो तोड़ैत। जखन नमहर भेल वियाह भेले। विसेसर अपने संगे काज करै ले ल’ जाय। बियाहक बाद साल
भरि भोलिया बापक संग काज करैत रहल। मुदा छैाँड़ा मारड़िक संगत मे पड़ि भोलिया भाँग पीबए लागल।
बाड़ी-झाड़ी मे भाँगक गाछ। ओकर फूल झाड़ि-झाड़ि आ जट्टा वाला डढ़ि काटि-काटि सुखा-सुखा रखैत। विसेसर
केँ कोनो पता नहि। साल भरिक बाद जखन विसेसर काज करए। विदा हुअए तखन भेलिया सुतले। मोहिनी
उठवए जाय तँ गरजि केँ भालिया कहैत- ‘‘मन खराव अछि, माथ दुखाए।’’ एक दिनक नहि भोलियाकेँ आदत
भ’ गेलै। षुरु मे दू-चारि दिन विसेसर बाजल- ‘‘छैाँड़ा, मौगियाह भ’ गेल।’’ कहि छोड़ि देलक। मुदा आदत देखि
विसेसर भोलिया केँ कहलक- ‘‘तू बेटा छियैँ, एकर माने ई नहि जे तू मालिक भ’गेलै। दू परानी तोहूँ छेँ। दुनू
गोटोक खाइ-पीवै ले कमाइये पड़तौ। भिन्न रह कि साझी, बिना कमेने ने हेतौ। जो आइ से फुटे भानस कर।’’
भालियकेँ विसेसर भिन्न क’ देलक।

साझू पहर केँ सभ दिन विसेसर डेढ़िया पर बिछान बिछा, जावत भानस होइ,भजन-कीर्तन करैत।
असकरे विसेसर खजुरी बजा भजन करैत। ने दोसर साज आ ने दोसर संगी। अपने गवैया अपने बजनिया अपने
सुननिहार। पाँचे टा भजन विसेसर केँ अवैत। जे सभ दिन गावए। जखन भजन करए वइसे। तखन पहिने ‘‘सत्
नाम, सतनाम, सँ षुरु करए। एक सुर खूब झमका केँ सतनाम गावए। चुल्हि लग मोहिनी भानसो करए आ
घुन-घुना क’ संग-संग सतनामो गावए। सतनामक बाद ‘‘साँझ भयो नहि नहि आयो मुरारी’’ अह्लाद सँ विसेसर
गावए। अड़ोस पड़ोसक सभ पाँचो भजन सीख लेने। जहाँ विसेसर षुरु करए कि सभ अपना-अपना अंगना मे
घुन-घुना- घुन-घुना गावए। साँझ गोलाक बाद विसेसर विनती गवैत। विनती गेवा काल ततेक तन्मय विसेसर भ’
जाइत जना भवान हृदय मे वैसि प्रेरित करति होथि। विनती समाप्त हाइते विसेसर खुजुरी राखि तमाकुल चुना
क’ खाइत। मोहिनी चुल्हिये लग बैसल-बैसल हुक्का भरि क’ पीवैत। तमाकुल थूकड़ि पानि सँ कुड़ुर क’ विसेसर
कृपण रुप-वर्णन षुरु करए। रुप-वर्णनक समय विसेसर कँ बुझि पड़ै जे अन्तज्र्ञान सँ ब्रह्माण्ड केँ देखि-देखि गवैत
छी। गबैत-गबैत विसेसर उठि के ठाढ़ भ’ खजुरियो बजवैत आ ठुमकी चालि मे झूमि-झूमि नचबो करैत। असकर
रहनहुँ विसेसर केँ बुझि पड़ैत जे हजारो-लाखो लोकक बीच नाचि-गावि रहल छी। कखनो हँसैत, त’ कखनो मुस्की
दैत। कखनो नोर बहबैत त’ कखनो पंडित जेँका प्रवचन करैत। रुप वर्णन समाप्त होइते तौनी सँ मुँ-हाथ पोछि
सोहर गवैत। सेाहर गवैत-गवैत विसेसर केँ भरि दिनक ठेही उतरल वुझि पड़ैत। अंत मे समदाउन गावि समाप्त
करैत।




उत्थान-पतनःः1


रोहितपुरक दोनौक चर्चा बुढ़हो-पुरान अष्चर्य स’ करैत कहैत जे ऐहन जिनगी मे नहि देखने छलौ। पर
हवा उठल। गोल-मोल भ’ सुरुंगा दौड़ैत टोल मे आबि घरक छप्पड़ सभकेँ उड़बै गोल-मोल नचैत। जना कोनो
नर्तकी घघड़ा पहिर नचैत तहिना नचैत हजारो हाथ ऊपर गर्दा खढ़-पात उड़ि जाइत। घरक नुआ वसत्र उध् ि
ाया’उधिया आंगन सँ हटि-हटि खेत सभ मे जा-जा खसैत। चेतन सभ अपन-अपन बच्चाकेँ पकड़ि-पकड़ि रखने
जे विर्ड़ो मे उड़ि ने जाय। बिरड़ो बढ़ैत-बढ़ैत आँधी मे बदलि गेल। राहितपुर मे एक्को घर अवन्च नहि रहल
जकरा कोनो नोकसान नइ भेल होय। घर गिरबो कएल आ उधिऐवो कएल। सैाँसे गामक लोक विपत्ति मे डूबि
गेल। के ककर नोर पोछत? सभकेँ अपने गिरैत।
(अगिला अंकमे)

कुमार मनोज कश्यप
जन्म मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। बाल्य काले सँ लेखन मे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवानी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रीय सचिवालय मे अनुभाग आधकारी पद पर पदस्थापित।

फ्यूज बल्व

से सत्ये वर्मा साहेबक डरे खऽड़ जरैत छलैक । से रूतबा आ धाख छलनि वर्मा साहेब के जे ककर मजाल जे कल्ला अलगबितै । वर्मा साहेब समय के तेहन ने पावंद जे कहैथ जे नौ बजे सँ ऑफीस शुरू हेबाक मतलब जे नौ बजे सभ काज करय लागय , नौ बजे ऑफीस आबय नहिं । ऑफिसक सभ आधकारी आ कर्मचारी छीह कटैत वर्मा साहेबक डरे जे कहीं कॉरीडोर मे घुमैत वा कैंटीन मे गप्प लड़बैत पक़डा ने जाई । जे केयो बाहर मे देखा गेला तनिकर तऽ अभगदशा बुझू दस लोकक बीच मे झाड़ सँ लऽ कऽ लिखित वार्निंग तक किछु भऽ सकैत छल । एतबे नहिं , आधकारी -कर्मचारी अपन सीट पर सँ भागल नहिं रहय तैं हुनकर समय-समय पर सरप्राईज भिजीट सेहो भेल करय । जे केयो सीट पर नहिं भेटलाह तनिकर नाम आ भिजीट समय नोट कऽ कऽ राखि लेथि आ मैसेज छोड़ि देथि जे जखन आबथि तऽ हमरा लग पठायब ।

वर्मा साहेब के चैम्बर मे घुसबा सँ पहिने कतेक-कतेक के आधा जान अपने निकलि जाईत छलैक़़ रूपे तेहने छलैऩ़पाँच हाथक चाकर-चौरठ शरीऱ़ एहन टा कल्ला़ भयाओन दृष्टि । आवाज की भारीबिना ले ईस कें'हू आर यू एंड व्हाई कम टु मी ?' लोक के पहिने सँ सोचल सभ बात बिसरा देबा लेल पर्याप्त छल । जीनका लग समुचित कारण नहिं भेलनि ; तनिका तऽ बुझु सस्पेंड हेबा सँ ब्रम्हो नहिं बचा सकथिन । वर्मा साहेब के लेल तऽ ककरो सस्पेंड करब नेना-भुटका के खेल । विभागीय सचिव रहथि तैं ककरो सँ कोनो आदेश लेबाक जरूरतो नहिं । पैघ-पैघ ऑफीसर तक के डाँट-डपट करबा मे वर्मा साहेब के कोनो टा असोकर्ज वा मलाल नहिं । डाँट-डपट की कैक बेर तऽ भरल लोकक बीच मे बेईज्जत तक कऽ देथिन । भरि ऑफीस मे कहबी पसरल छलैक जे जाबत तक लोक वर्मा साहेबक डाँट नहिं सुनि लैत आछ ताबत तक मोन हौंड़ैत रहैत छै। जहाँ ने डाँट पड़ल की मोन के शांति भेटैत छै ।

से वर्मा साहेब सरकारी सेवा सँ सेवानिवृत भऽ गेलाह । भरि ऑफीसक लोक जी-जी कऽ उठल। चर्चा ईहो छलैक जे वर्मा साहेब पेᆬर सँ सलाहकर बनि कऽ मंत्रालय मे ज्वाईंन करताह । गोपीबाबू तऽ सभ के चेतेन्हो रहथिन जे शैतान के जाबत तक श्राद्ध नहिं भऽ जाय ताबत ओकरा मुईल नहिं बुझल जेबाक चाही । तैं लोक साकाँक्ष नहियों होईत तते तर खुशी तऽ मनेनहे छल भरि ऑफिस मे चोराईये नुका कऽ सहा ; मिठाईयो बाँटले गेल छलैक । लोक के भीतरे-भीतर डरो छलैके जे कहीं वर्मा साहेब पेᆬर सँ आबि गेलाह तऽ सभ खुशी मनेनहार सँ हिसाब चुकता कऽ लेथिऩ़ भेदिया तऽ सभ ठाम रहिते छै ने ।

मंत्रालय के लोकक कपार एतबो खराब नहिं छलैक़़वर्मा साहेब दोबारा सँ नहिं एलाह । समय तऽ गतिमान होईत छैक ; बितैत गेलैक । वर्मा साहेब लोक के एखनो मोन छथिन खिस्साक रूप मे । वर्मा साहेव के अरदली बालकिशन सेहो समय पर सेवा निवृत भेल कतेक लोक आअयल-गेल ऑफीस चलैत रहलैक ।

ओहि दिन बालकिशन दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्मक बेंच पर बैसल ट्रेनक प््रातिक्षा मे छल कि तखने बगल मे बैसल कनियाँ केहुनिया कऽ ओकरा पुᆬसपुᆬसा कऽ कहलकै- 'ओम्हर देखहक तोहर पहिलुका साहेब ठाढ़ छथुऩ़भीड़ धकियबैत हैऩ़बजा कऽ बलु हमरा सीट पर बैसा दहक़़हम ओम्हर चल जाईत छी़हमरा आऊर तऽ ठाढ़ो रहब तऽ कोनो बात नहिंओ तऽ हाकीम-हुक्काम छथि ।' ईशारा सँ देखेलकई बालकिशन वर्मा साहेब के़लोकक रेला मे ट्रेनक प््रातिक्षा मे ठाढ़़़पसीना सँ तरबतर भेल़़एक हाथ सँ एटैची थम्हने आ दोसर हाथ सँ मुँह पर बेर-बेर माँथ सँ टघरि कऽ अबैत पसेना के रूमाल सँ पोछबाक अनवरत प््रायास करैत । कखनो काल रेला बढ़ै तऽ लोकक धक्का सँ अपन संतुलन सेहो बनबैत । बालकिशन किछु सोचलक आ कनियाँ के बाँहि पकड़ि कऽ बैसल रहबाक ईशारा केलकै- 'रहऽ दही़ बैसल रह तों । आब हम आ वर्मा साहेब दुनू गोटे पत्यूज बल्व जकाँ छी़पत्यूज बल्व मे कोन फरक जे हजार वॉट के छलैक की साठि वॉट के। '

वर्मा साहेब भीड़क दोगें खनहुँ-खनहुँ कनखिया कऽ बालकिशन के देखि लैत छलाह । बालकिशन आओर पैर पसारि कऽ बैसि रहल छल़़ट्रेनक एखनहुँ कोनो पता नहिं छलैक।


पन्ना झा
असामान्य के

डाक्टर नन्दीक चेम्बर मे बैसल-बैसल मोन थाकि गेल। अनायास भेंटकरक समाद पठेने छलाह। मोने-मोन कारणक अटकर लगा रहल छलहुं। कतेकोकारण मोन मे आयल मुदा एकोटा कारण सटीक नहि बुझना जाइत छल। डा.नन्दीक अनुपस्थिति मे हुनकर रोगी या सम्पूर्ण नर्सिंग सम्हारयवला हुनकरदहिना हाथ डा. सिन्हा कतेको बेर अपन मुखरित मुखारविन्द देखाय गेला। पुछलापर कहने छलाह कारण त' हमरो नहि बूझल अछि, तखन मात्र एतबे कहने छथिजे अयला पर बैसय कहबन्हि।
डा. नन्दीक कार्यव्यस्तता आ समयक अभाव मोन पड़ला पर इच्छा भेलउठि क' चल जाइ। आखिर कतेक काल प्रतीक्षा कयल जाय? एना कयला स'गुरुक गुरुता लघु भ' जयतन्हि। समय बितयबाक लेल नर्सिंग होमक निरीक्षणकरय लगलहुं। आधुनिक आ सुरूचिपूर्ण सजावट, जीवाक लालसा उत्पन्न करयवलाचित्र सब, जे संभवतः मानसिक रोगी सभक द्वारा चित्रित छल, एक कोन मेलतरल मनी प्लान्ट, टेबुल पर टटका फूलक गुच्छा कांचक पात्र मे पानि परराखल। भीतर जा क' रोगी सब स' भेंट करक इच्छा भेल मुदा नहि गेलहु जे कोनठीक एही बीच डाक्टर साहब आबि ने जाइथ।
अपना स्थान पर बैसले छलहुं कि एक सौम्य, हृष्ट-पुष्ट, प्रसन्नमुख युवकप्रवेश कयलन्हि। हुनकर अनुसरण आवश्यकता स' अधिक गंभीर एक व्यक्ति क'रहल छलाह। अबितहिं पहिल युवक हमरा स' प्रश्न कयलन्हि- डा. नन्दी छथि किनहि?
-नहि, बैसू कनेक काल मे औताह''। हमर उत्तर छल। पहिल युवक कें देखिक' लागल जे हम पूर्व-परिचित छी। स्मरण नहि भ' रहल छल। सोचल-हमरसंबंधी त' नहिये छथि तखन कतय देखने छियैन्ह? कोना चिन्हैत छियन्हि? पूर्वमे कतहु देखने छियन्हि, एतबा निश्चित छलहुं। एही ओझराहटि मे छलहुँ कि संगआयल दोसर युवक ठठा क' हँसि पड़ल आ फेर तुरत गंभीर भ' फुसफुसाय लागल,जेना ककरो स' गप्प क' रहल हो। एहि तरहक व्यक्तिक एहि तरहक क्रिया-कलापदेखक अभ्यस्त भ' गेल रही तें कोनो विशेष प्रभाव नहि पड़ल। संग आयल पहिलयुवक सेहो तटस्थ छलाह। मुदा तीव्र ठहाका डा. सिन्हा के ओतय अयबा लेलबाध्य कयने रहनि। आगन्तुक दिस अभिमुख होइत पुछने छलखिन्ह- कहल जाय,नब कोनो समाचार? संगे के छथि? आगन्तुकक शान्तभावें उत्तर छलन्हि - अहांलेल कोनो नब नहि। हमरा लेल अशान्तिदायक। ई छथि, रोगीक मित्र रोगी आओ बिहुंसल छल। डा. सिन्हा हमरा पुछलन्हि - हिनका चिन्हलियैन्ह? अपन केस-हिस्ट्री ई मात्र अहींके कहने छलाह। हमरा भक्क द' सब स्मरण भ' आयल। ओव्यक्ति लज्जापूर्वक आंखि नीचा कयनहिं हाथ जोड़ि देने छल।
ओकर स्वास्थ्य लाभ पर हार्दिक बधाई दैत हमरो हाथ जोड़ा गेल छल। डा.नन्दी के अयला पर हुनका स' आवश्यक गप्प क' डेरा विदा त' भ' गेलहुं मुदाओहि व्यक्तिक संग प्रथम साक्षात्कार आर ओकर केस हिस्ट्री पुनः स्मृति-पट परआबि गेल।
लुम्बिनी पार्क ;मानसिक-रोग-अस्पताल मे डा. मित्राक क्लास आठ बजेप्रातः प्रारम्भ भ' जाइत छलन्हि। अस्पताल डेरा स' काफी दूर छल। डेराक काजसलटि, बस स' पहुंचलहुं त' भीतर जा क' हड़बड़ायल अपना ग्रूपक संगी सबकेताकय लेल एक बेर चारू दिस दृष्टि घुमाओल। तखनहि एक रोगीक कोठली स'अनु हड़बड़ायल निकललि आर हमरा देखितहिं कहने छलि -बाज अयलहुं हम एहिडिग्री स'। लुम्बिनीक ई हमर अंतिम भीजिट भेल।'' हमर जिज्ञासा छल - कियैककी भेल? एखने हिम्मत टूटि गेल? एखन त' पूरा एक साल बाकी अछि? अनुगंभीर भ' कहने छलि - एहन पेसेन्ट त' एकोटा नईं भेटल छल। किछु साधरणप्रश्न पुछलियै त' मुंह पर थूकि देलक।''
अनु डा. मित्राक चेम्बर दिस बढ़ि गेल छल। हम ओही कोठली मे घुसलरही जतय स अनु बहरायलि छलि। ओतय हमरा ग्रूपक आर सब छात्रा-छात्राबैसल छल। सामने एक सुदर्शन पुरुष मुंह घुमाक' खिड़की बाटे बाहर ताकि रहलछल। किछु क्षण परिस्थितिक निरीक्षण क' हम एक सहपाठी स' आस्ते स' पुछनेरहियैक - की कोनो खास बात? ओ शी करैत मुंह पर आंगुर देने हमरा बाहरआनि कहलक - एकर केस हिस्ट्री लेबाक हमरा लोकनिक सब चेष्टा निष्फल भेलअछि। ककरो किछु कहिते नईं छै। अनु किछु बेशी प्रश्न केलकै त' मुंह पर थूकिदेलकै। तों त' गिन्नी ;विवाहिता, मलिकाइन छें। सब ठाम प्रिफरेन्स' भेटैत छउ।भ' सकैयै एतहु लहि जाउ।
प्रश्न विचारणीय छल, मुदा मित्रा सर कें कंक्रीट काज चाहियन्हि, खाना-पूर्त्तिनहि। साहस क' आगू बढ़लहुं।
ओहि व्यक्तिक सम्मुख जा नमस्कार क' परिचय पूछक साहस कयनेछलियैक। ओ निर्विकार भावे मात्र हमरा दिस तकने छल।
-जँ हम गलती नहि क' रहल छी त' अहीं श्री चौधरी छी?
ओ तैयो चुप।
-हमरा डा. मित्रा पठेने छथि। अहां स' किछु जानकारी लेबय लेल। अहांकेंअसुविधा नहि हो त' हम किछु पूछि सकैत छी?''
ओ एक बेर मूडी उठा, हमरा दिस देखलक फेर खिड़कीक बाहर देखयलागल जेना किछु ताकि रहल छल। ओकर प्रतिक्रियाहीन चुप्पी स' हमरा बलभेटल। बुझबैत कहने रहियैक -एहि स' अहूंकें लाभ होयत। एहि कैदखाना स' मुक्तिभेटत। ऑफिस जा सकब।'' ओ हमरा पर बरसि पड़ल छल- बन्द करू अपनलेक्चर। भगवानक लेल दया क' अहाँ लोकनि हमरा एसगर छोड़ि दिय'। स्वयंबड़बड़ायल छल - घरक लोक एहि नर्क मे धकेल गेल आर एतय घर जयबाकगप्प।
हमर ग्रूप ओतय स' बिदा भेल ई बुझि जे एकरा पाछू समय नष्ट कयलास' कोनो लाभ नहि। हम जयबा काल अंतिम प्रयास कयल - अहां एकान्त चाहैतछी त' ठीक छैक, हमरा लोकनि जा रहल छी। मुदा अहां त' स्वयं विद्वान आबुझनुक छी, मोनक कष्ट बँटला स' मोन हल्लुक होयत आ चिकित्सा मे सुविधासेहो।
क्षीण आशाक संग ओ पुछने छल - तखन हमरा छोड़ि देल जायत? -एतयअहाँ कोनो जन्म भरिक लेल त' नहिये आयल छी। स्वस्थ्य भेला पर पुनःपरिवारक संग रहब।''
ओ हमरा बैसक संकेत कयने छल। बाहर मे अपना ग्रूप के सूचना द' हमआबि क' बैस गेल छलहुं। ओ बिना कोनो भूमिकाक सहज स्वाभाविक रूपें कहबआरंभ कयने छल - नाम हमर अहांकें बुझले अछि। अधिकांश लोक नामे स'जनैत अछि, चेहरा स' ओतेक नहि। हम कलकत्तेक वासी छी। इन्जीनियर छलहुं।एखन त' पागल छी। जेना सब रहैत अछि हमहूं रहैत छलहुं। डेरा, ऑफिस, क्लब,मित्र-वर्ग, संबंधी सब स' लगाव छल। अनायास एक दिन अपने महल्ला क रीनास' परिचय भेल। हमरे ओहिठामक आयोजित एक भोज मे। रीना सुन्दरि, स्मार्ट,हँसमुख, डिग्री कोर्स - फाइनलक छात्रा। ओकर सब किछु हमरा आकर्षितकयलक। हाव-भाव, व्यवहार, वेश-भूषा सब नीक लागल। ओकरा स' बेशी कालभेट होमय लागल या कहि सकैत छियैक जे भेटक सुयोग बनबैत गेलहुं। ओहोबिना कोनो प्रतिवादक हमर संग दैत गेलि। लेक, सिनेमा, थियेटर, होटल कतहुसंग जयबा मे हिचकिचायल नहि। हमरो ओकरा बिना कतहु मोन नहि लगैतछल। सतत एक्केटा ध्यान मे रहैत छल - रीनाक सामीप्य। ओहो कहैत छलि -क्लास, लेक्चर, घर कतहु मोन नहि लगैत अछि। हम विभोर भ' जाइत छलहुं।दूनू गोटे मे कतेको प्रेम, आश्वासन आर प्रतिज्ञाक गप्प होइत छल। हमरा लोकनिदिन-प्रतिदिन एक दोसराक समीप होइत रहलहुं। घरक लोकक प्रतिवादक उपरान्तोहम ओकर प्रत्येक इच्छा आर आवश्यकताक पूर्त्ति करैत रहलियैक।
ओ आनर्सक परीक्षा पास कयलक। ताहि उपलक्ष मे हम ओकरा अपनऔंठी उपहार स्वरूप द' कहने छलियै -एकरा अपना स' अलग करक अर्थ होयतअहाँ हमरा अलग करब। उत्तर मे ओ मात्रा बिहुँसि देने छल। एक दिन रीनानौकरी करक इच्छा व्यक्त कयने छलि, जाहि मे हमर सहयोग अपेक्षित छलैक।हम हंसि क' कहने रहियैक - दूनू गोटे बाहरे काज करी ई आवश्यक छैक की?मात्रा हमर आय पर्याप्त नहि होयत?
ओ मौन रहि गेल छलि। आस्ते-आस्ते हम रीना मे परिवर्त्तनक अनुभवकयल। ओ हमर सामीप्य त' दूर भेंट तक नहि करय चाहैत छलि। हमर देलउपहार सेहो आब नहि लेबय चाहैत छलि। कारण पुछला पर कतेको बहाना। हमराकोनो कारण बुझवा मे नहि आबि रहल छल। हम अपना कें कमजोर आ विचलितअनुभव करय लागल छलहुं।
बीच मे किछु दिन सर्दी-ज्वरक कारण डेरा स' निकलल नहि भेल। रीनापुछारियो तक करय नहि आयल। कनेक स्वस्थ भेला पर हमहीं ओकर डेरा गेलहुंत' पता लागल जे किछुए काल पहिने बाहर निकललि अछि। मोन कें संतोष देलहुं- ई बताहि निश्चित नोकरीक पाछू बउआइत होयत।
समय व्यतीत करक ध्येय स' हम सिनेमा हॉल दिस बढ़ि गेल रही। संयोगस' टिकट भेट गल छल। सिनेमा आरंभ भ' गेल छलै। हमरा सामनेक सीट परएकटा जोड़ी बैसल छल। हाव-भाव स' नव-दम्पति हेबाक आभास भेल।इन्टरवलक प्रकाश मे जे देखल ओहि स' बड़ पैघ मानसिक झटका लागल। ओयुवती हमर रीना छल, आ युवक हमरा लेल अपरिचित छल। अनायासे मुंह स'निकलि गेल छल - रीना! अहूं आयल छी? हम अहांक डेरापर गेल छलहुं। अहाँस' भेट नहि भेल त' सोचल सिनेमा देखि समय बिता आबी।
रीनाक प्रति हमर सम्मोहन हटल नहि छल। ओहि युवकक उपस्थितिहमरा लेल नगण्य छल। तखनहि सुनाइ पड़ल - ई के थिकाह, रिनी? -हमरामुहल्ला मे रहैत छथि।'' रीनाक एहि उत्तर स' हमरा मोन मे ठेस लागल। हॉल मेफेर अन्हार भ' रहल छलैक। ओ व्यक्ति रीनाक हाथ पकड़ि सीट पर बैस गेलछल। ओतय रहब हमरा असह्‌य बुझना गेल आ हम डेरा घुरि आयल रही। हमरआत्मा ई स्वीकार नहि क' पाबि रहल छल जे रीना एहन कोनो काज करत जाहिस' हमरा - ओकरा बीच मनमुटाव भ' जाय। दर्द स' हमर माथ फाटय चाहैत छल।मुदा से भेलै नहि। कखन झपकी लागि गेल, नहि बुझलियै। निन्न मे हम चिचियाउठल रही - नहि, नहि एना नहि भ' सकैत अछि, ई असंभव ..... मिथ्या छी।माय जगा देने छलि - की स्वप्न देखैत छी यौ? निन्न मे बाजक बीमारी त' अहांकें नहि अछि? दू दिन बाद रीनाक ओतय स्पष्टीकरण लेल जयबाक साहस कयनेछलहुँ। गप्पक क्रम मे कहने छलि - विवाह आ मित्रता मे कोनो सम्पर्क नहिहोइत छैक। मित्र कतेको भ' सकैत छथि, विवाह कोनो एकटा स' होयत। विवाहकरक योग्य मित्र एखन तक नहि भेटल अछि। सिनेमा हालक ओकर संगीयुवकक चर्चा कयला पर कहने छलि -.......... इन्डस्ट्रीक मालिक छथि। इन्टरव्यूमे हमरा स' बहुत प्रभावित छलाह। बड़ सरल आ मिलनसार लोक। हमहूँ हुनकास' प्रभावित छी।''
हतप्रभ भेल मानसिक झंझावात नेने डेरा चल आयल रही। तखनहिं स'प्रत्येक महिला हमरा नाटकक पात्रा लागय लागलि। लागल जेना सब अपन-अपनकुशल अभिनय मे लागल अछि।
हमर छोट बहीन भोजन लेल पूछय आयलि त' प्रश्न कयने रहियै - तोंहुकोनो अभिनय क' रहल छें? अप्रत्याशित प्रश्नक उत्तर प्रश्ने स' भेल छल -अहांपागल भेलहुं अछि की?'' हमरा भय छल एहि पीड़ा स' हमर मस्तिष्क ने विकृतभ' जाय आर यैह कटु सत्य हमर बहीन बाजल छल। तामसे हम पेपर वेट उठाक' ओकरा पर फेकने छलियैक जे ओकरा माथ स' शोणित बाहर क' देने छलैक।तकर बाद सबक पूछल प्रश्नक उत्तर हम टेढ़ आ अपशब्द मे देने रहियै। भोर मेऑफिस जयवाक या किछु करक इच्छा नहि भेल तें घर बन्द क' पड़ल रहलहुँआर रीनाक व्यवहार पर सोचैत परेशान होइत रहलहुँ। हमर दुर्व्यवहार बढ़ि नेजाय तें ककरो स' गप्प नहि कयल, एसगर कनैत रहुलहुं, स्वयं मे ओझरायलगप्प करैत रहलहुं। घरक सब गोटे केवाड़ खोलक नेहोरा करैत रहैत छल, हमनहि खोलैत छलियै।
दैनिक-दिनचर्या बाधित भ' गेल छल। ऑफिस जयबाक त' कोनो प्रश्ने नहिछल। स्वयं मायक खुओला पर एक दू क'र खा लैत छलहुँ। एहिना कतेक दिनबीतल मोन नहि अछि। आब घर स' निकली त' सभक कातर दृष्टि हमरा पर रहैतछलै। हमरा भेल छल आब सभ हमरा क्षमादान द' देने अछि। एक दिन बाबूजीकआग्रह पर हुनकर एक नजदीकी मित्रक ओतय जयबा लेल तैयार भेल छलहुं। मायभरि पाँज क' पकड़ि कानय लागल छल, जे अनर्गल लागल। बाबूजी माय के डटनेछलखिन्ह। संभवतः डर भेल रहनि जे हम जयबा स' बिमुख नहि भ' जाइ।बाबूजीक ओ मित्र वास्तव मे एतयक डाक्टर छलाह आ तहिया स' हम एतहि छी।अहाँ पूछि सकैत छी जे अहाँक सहपाठिका पर हम थूकि कियैक देलियन्हि। एकत' ओ अनावश्यक चहकि रहल छलीह, रीना जकाँ। हुनक स्वर आ आकृतिअझक्के मे हमरा रीना सन लागल। लागल जेना ओ जानि-बूझि क' हमरा खौंझारहल छल।
चौधरीक केस-हिस्ट्री बूझि हम बहुत आश्वस्त भेल छलहुं। हुनका सांत्वनादैत बाजल रही - अहां त' एकदम स्वस्थ छी। एतेक नीक जकां अपन मोनकगप्प हमरा स' कयलहुं। हम मित्रा सर के अहांक प्रोग्रेसक रिपोर्ट द' दैत छियन्हि।
चौधरीक आकृति पर पुनः आक्रोशक भाव आबि गेल छलै। ओ हमरा स'पुछने छलाह - हमर एक प्रश्न अछि - लोक हमरे कियैक पागल कहैत अछि?अहाँ लोकनिक शब्द मे असामान्य। असामान्य हम कियैक? रीना या एहि तरहकअभिनय करयवाली कियैक नहि? हम हुनक प्रश्नक उत्तर बिना देनहिं ओतय स'बिहुंसि क' निकलि गेल रही।
संस्कार गीत/ लोक गीत नाद-
जगदीश प्रसाद मंडल
संस्कार कल्पना थिक। हमरा सभक बीच संस्कारक प्रयोग विभिन्न रूप मे विभिन्न जगह पर होइत अछि। ओना जहि रूप मे संस्कारक प्रयोग हमरा सभक बीच होइत, ओ मन्द आ कुषाग्र रूप मे सेहो होइत। मुदा विचारणीय प्रष्न अछि जे मन्द तँ किऐक? आ कुषाग्र तॅ किऐक? एखन हम एहि प्रष्नक उत्तर नहि द शास्त्रीय प्रयोग दिषि नजरि दैत छी। गर्भजनित वातावरण जन्य कतिपय अपदार्थ के दूर करैक हेतु संस्कारक कल्पना कयल गेल अछि। कहल गेल अछि जे एहि सॅ शरीर आ मन परिष्कृत होइत अछि। शालीनता आ शिष्टता मनुष्यताक परम सिद्वि थिक आ ओकर प्राप्तिक साधन थिक संस्कार कर्म। दषर्न शास्त्रक अनुसार भोग्य पदार्थक अनुभूतिक छाप थिक संस्कार कर्म। मनुष्यक अव्यक्त मन पर अुभवक जे छाप पड़ैत छैक, समय अयला पर ओ प्रकट भऽ जायत छैक। यैह छाप थिक वासना आ यैह कहबैत अछि जन्मान्तक संस्कार। धर्मशास्त्री लोकनि संस्कार केॅ शारीरिक, मानसिक आ बौद्धिक गुणश्दोषक प्रक्रियाक रुप ग्रहण कयलनि अछि।
आष्वलायन अपन गृहसूत्र मे एगारह तरहक संस्कारक वर्णन केने छथि। जखन याज्ञवल्क्य बारह तरहक। गौतम भिन्नश्भिन्न दैवयज्ञ केॅ संस्कार मे परिगणित कऽ अड़तालिस संख्या धरि लऽ गेल छथि। भारत सरकारक 1901 इसवीक जनगणना प्रतिवेदनक अनुसार ओहि समय हिन्दू मे बारह संस्कार प्रचलित छल। मिथिला मे सोलह तरहक संस्कारक विधान मान्य अछि ई थिकश् गर्भधान,पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राषन, चूड़ाकर्म,कर्णबेध, उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन, विवाह, वानप्रस्थ, सन्यास आ अन्त्येष्टि। एखन सिर्फ पाँच तरहकश् जन्म,मूड़न,उपनयन,विवाह आ मृत्यु संस्कारक चलनि अछि। मुदा इहो सभ जाति मे समान नहि अछि। जेना उपनयन सिर्फ समाजक अगुआइल जातिक बीच अछि। मूड़नोक रुपरेखा एकरंगक नहि अछि। तेँ जँ सभकेँ नजरि मे राखि देखैत तँ सिर्फ तीनिये टा संस्कार जन्म,विवाह आ मृत्यु अछि।
संस्कारक कल्पना आ ओकर चयन वा नामकरणक पाँछा सामाजिक कारण सोहो प्रमुख रहल। स्पष्ट अछि जे संस्कारक शासन जीवन पद्धति के खास ढ़ंग सॅ नियंत्रित आ आदर्षोन्मुखी बनयवाक लेल देल गेल। शुद्धताक अपेक्षा सुनियोजित जीवनश्व्यवस्थाक आवष्यकता अथवा स्थितिक उपस्थिति दिषि संकेत करैत अछि। कहैक तात्पर्य जे आर्यश्अनार्यक घालमेल सँ उपजल सामाजिक स्थिति मे संस्कारक माध्यम सॅ अपन अस्मिता के सुरक्षित रखवाक ब्राहम्णवादी चिन्तनक परिणाम थिक संस्कार। मध्यकाल मे संस्कारक पालन पर बेसी जोर देल गेल। ओना दोषक निवारण आ गुणक अंगिकार करब अधलाह बात नहि थिक। इतिहास साक्षी अछि जे भौतिक परिस्थितिक प्रभवक कारणे समाज मे कखनो बेटिक त कखनो बेटाक मोल बढ़ैत रहलैक अछि।
आइ जकरा मैथिल संस्कृति कहल जा रहल अछि,से की वस्तुतः मिथिलाक संस्कृति थिक? एहि लेल मिथिलाक इतिहास दिषि देखए पड़त। मिथिलाक धरती हिमालयक माटिश्बालू सँ बनल अछि। नदी प्रदेषक एहि भूभाग पर किरात आ कोल रहैत छल। आर्यीकरणक अभियान मे जे किछु बहरबैया लोक सभ एहिठाम अयलाह ओ द्विज बनि के एहि प्रदेष पर सत्ता स्थापित केलनि। क्षत्रिय राजसत्ता कब्जा केलनि आ ब्राह्मणक हाथ मे समाज सत्ता आयल। वैष्वलोकनि अर्थसत्ताक स्वामी बनलाह। मूलवासी अर्थात आदिवासी अन्त्यज बनि गेलाह। बहरबैया लोक कम संख्या मे आयल रहथि तेँ कृषि कर्यक लेल वा आनो प्रयोजन सँ प्रतिलोम विवाह जोर पकरलक। जकर चर्चा मनुस्मृति आ मिथिलाक इतिहास मे बिस्तार सँ अछि। द्विजक संख्या कम रहने, एहि ठामक आदिवासीक देवीश्देवता,पावनिश्तिहार आ नेमश्तेम अपनौलनि। जहि स ब्राह्मणीकरण भऽ गेल। समाजक सत्ता ब्राह्मणक हाथ मे छलनि तेँ हुनके जीवनश्षैली संस्कृति बनल। बहुसंख्यक मूलवासी पर एकटा नवश्संस्कृति आरोपित कयल गेल। औझुका जेँका प्रचारश्प्रसारक माध्यम त नहि छल, मुदा जे किछु छल ओ हुनके सभक बीच छलनि। लिखैकश्पढ़ैक सुविधा आ सामथ्र्य रहने हुनके (द्विजिक) संस्कृति सम्पूर्ण मिथिलाक संस्कृति रसेश्रसे बनि गेल। मुदा मूलवासीक जीवनश्शैली आ रीतिश्नीतिक पूर्ण विलयन ने त संभव छल आ ने से भेल। आइयो ओ (मूलवासी) दूबि बनि माटि पकड़ने छथि। जकर संस्कृति लोक संस्कृत कहल जाइत छैक।
मूड़न आ उपनयन, आब सेहो काम्य संस्कारक कोटि मे अबैत जा रहल अछि। अखनो मिथिला मे ढ़ेरो जाति बसल अछि। किछु जाति छोड़ि बहुसंख्यक जातिक बीच उपनयन प्रथा नहि अछि तेॅ उपनयन के मिथिलाक संस्कार कोना मानल जाय? हाँ, खंडित संस्कार कहल जा सकैत अछि। तहिना मूड़नोक अछि। एक रुप मे मूड़नोक चलनि नहि अछि। केयो देवस्थान जा मूड़न करबैत त क्यो गंगाकात जा। केयो गामे मे कबुलाश्पाती द करबैत त केयो बिना गीतेश्नाद,पूजेश्पाठ केने,करैत। केयो समाज मे खीरश्टिकड़ी बाॅटि करैत त क्यो भोजश्भात कऽ। तेॅ सब मिला के देखला पर प्रष्न उठैत जे मुड़नक कोन रुप मानल जाय? तहिना विवाहोक संबंध मे प्रष्न उठैत? कुमार बर आ कुमारि कन्याक संग विवाह प्रचलित अछि। मुदा द्वितीय बर आ कुमारि कन्याक संग विवाह होइत जखन कि बहुसंख्यक जाति मे द्वितिय बरश्कन्याक विवाह सेहो होइत। द्वितिय कन्याक संग कुमार बर के सेहो होइत अछि तहिना मृत्यु संस्कार मे सेहो एकरुपता नहि अछि। मृत्यु के शोक बुझि गीतिश्नाद नहि होइत। मुदा प्रष्न उठैत जे मृत्यु शोकेक संस्कार किऐक थिक? हाॅ, असामयिक मृत्यु के शोकक श्रेणी मे राखल जा सकैत। मुदा उचित आयु बीतला परक मृत्यु के शोक किऐक मानल जाय? जहिना प्रकृति मे देखैत छी जे अपन पूर्ण आयु पाबि स्वतः नष्ट भऽ जाइत अछि तहिना त मनुष्यो थिक। मुदा ढ़ोरो प्रष्न उठलाक उपरान्तो समाज, विवाह आ मृत्यु के व्यवहारिक संस्कार रुप मे अपनौने अछि। छिटश्फुट ढ़ग सँ जे किछु होइत हो मुदा समुद्र रुपी समाज, सब कुछ अपना पेट मे समेटि लैत अछि।
व्यक्तिगत जीवनक समस्या सँ ऊपर उठि कऽ सार्वजनिक जीवन जीवाक एहि अभ्यास कालक महत्व आइयो अछि। सन्यास यैह थिक। ब्रह्मचर्य जीवन ज्ञान अर्जनक होइत। गृहस्ताश्रम व्यवहारिक जीनगी होइत, जे उपार्जन क जीवनश्जीवाक माध्यम होइत। नव परिवारक सृजन होइत। जहि सॅ समाज आगूओ बढ़ैत आ समृद्धो होइत। तेसर अवस्था वा अंतिम संन्यास अवस्था तक पहुँचैतश्पहुँचैत ज्ञान आ कर्म सँ पूर्ण मनुष्य केँ अज्ञान आ अबोध मनुष्यक सेवा मे लगि जायब, बेजाय नहि। वास्तव मे ओ जरुरियो अछि।
संस्कार गीतक अर्थ थिक विभिन्न संस्कारक प्रसंग मे गाओल जायवला गीत। ई लोक प्रचलित गीत थिक। तेँ एहि मे लोक गीतक आत्मा बसैत अछि। लोक गीतक मनोहर फुलवाड़ी मे यदि संस्कार गीत के हटा देल जाय तँ ओ निष्प्राण भऽ जायत। यैह कारण थिक लोकगीतक, प्रायः समस्त विषेषता संस्कार गीत मे उपलब्ध अछि। मृत्यु संस्कार केँ छोड़ि अन्य सभ संस्कार आनन्दोत्सवक माहौल मे मनाओल मे जाइत अछि। उमंगमय वातावरण मे नारी कंठ सँ निकलैत स्वरलहरी देह मे थिरकन, हृइय मे झंकार आ मस्तिष्क मे चुलबुली उत्पन्न कऽ दैत अछि। गीति गायव मिथिलाक सभ नारश्नारीक सहजात गुण रहल अछि। जेना दखैत छी जे मूड़न, उपनयन, विवाह इत्यादिक समय सभ नारी समवेत स्वर मे गीति गबैत छथि। जे मिथिलाक धरोहर छी। तहिना पुरुषो पावनि आ धार्मिक कार्य मे सभ मिलि गबैत छथि।
संस्कार गीत लाकगीतक अंग थिक। कहल जाइत अछि जे लोकगीतक रचनाकार नहि होइत छथि, ओ सार्वजनिक रचना होइत अछि। एकर वास लोक कंठ मे अछि। एक कंठ सँ दोसर कंठ धरि जाइतश्जाइत गीतक स्वरुप बदलि जाइत। ततबे नहि! गीतक भास सेहो बदलैत। एक्के गीत भास बदलिश्बदलि कत्ते रुप मे गाओल जायत। तेँ संस्कार गीत मे एकरुपताक अभाव भेटैत अछि। स्वभावगत एहि स्थितिक दोसर परिणाम थिक भनिताक बेलगाम प्रयोग। गीत गौनिहारि सभ अपने फुरने कोनो गीत मे कोनो रचनाकार नाम भनिताक रुप मे जोड़ि दैत छथि। विद्यापतिक रचना उमापतिक भ जाइत त कखनो उमापतिक चंदा झाक वा मनबोधक। ततबे नहि मैथिली क्षेत्र सँ बाहरोक रचनाकार जना तुलसी, सूर दास,मीरा इत्यादि मिथिलाक माएश्बहीनिक कंठ मे आबि मिथिलेक आ मैथिलिऐक गीतिकार बनि जाइत छथि। जे उचित आ अनुचित दुनू थिक। उचित एहि लेल जे हुनकर लोकप्रियता विनयपत्रिता, रामायण, सुरसागर माध्यम सँ एतेक अधिक प्रचलित भऽ गेल अछि जे अपन बनि गेल छथि। जहाँ धरि शब्द टूटैक प्रष्न अछि ओ ज्ञानश्अज्ञानक बीचक बात थिक। भषाक जन्म आम जनक बीच होइत। किछु नव शब्दो जन्म लैत अछि आ शुद्व शब्द टूटि कऽ नवो बनि जायत अछि। तेँ कोन गीत किनकर लिखल थिकन्हि, संस्कार गीत मे वुझब कठिन भऽ जायत अछि। स्पष्ट अछि जे संस्कार गीत मैथिलश्महिलाक परिष्कृत सांस्कृतिक चेतनाक परिचायक थिक।
मिथिला मे संस्कार गीत अनौपचारिक षिक्षाक माध्यम अछि। मैथिल समाज मे नारीक लेल औपचारिक षिक्षा वर्जित छल। सिर्फ नारिये नहि माटि परक लोकक लेल सेहो छल। कहल जाइत अछि जे वेद वा गीता पढ़ला सँ ओ बताह भऽ जायत। नारी मे विदुषी होइत छलीह। संस्कार गीतक संबंध संस्कृति आ साहित्य से त अछिये, समाज स सेहो अछि। संस्कृति, साहित्य आ समाजक अन्तरावलम्वन केँ जत्ते नीक जेँका संस्कार गीत प्रकट करैत अछि तत्ते एहि प्रकारक आन कोनो घटक नहि। संस्कार गीतक संकलनश्प्रकाषन सँ मौखिक परम्परा साहित्य समेटल जाइत अछि आ ओ साहित्य अघ्ययनश्विष्लेष्णक आधार प्रस्तुत करैत अछि
मिथिला मे संस्कार गीतक श्रीगणेष होइत अछि गोसाउनिक गीत सँ। एहि स मैथिल समाजक धर्मभावनाक ज्ञान होइत अछि। किन्तु प्रष्न अछि जे संस्कारक अवसर पर ई धर्मश्भावना मुख्यतः गोसाउनिऐक गीत मे किऐक प्रकट होइत अछि? स्पष्ट अछि जे एहिठाम गोसाउनि गोसाई सँ बेसी महत्वपूर्ण छथि। भगवानोक गीत मिथिला मे गाओल जाइत अछि मुदा संस्कार कर्मक अवसर पर जे प्रधानता भगवती गीतक अछि से भगवानोक गीतक नहि! आब प्रष्न उठैत जे मिथिला मे देवीश्पूजाक प्रमुखता किऐक अछि? सभ जनैत छी जे देवीश्पूजा तंत्रसाधना सँ सम्बद्ध अछि। किछु इतिहासकारक मत छन्हि जे तंत्रसाधना असंस्कृत जनजातिक समाज सँ आयल अछि। जकरा कालान्तर मे ब्राह्मणवादी लोकनि अपना लेलनि। बहुत दिन धरि तंत्रश्साधना अवैदिक कार्य बूझल जायत छल। रसेश्रसे अपनवैतश्अपनवैत सनातन धर्म मे जोड़ा गेल। वैदिक धर्मावलम्बी सभ सेहो तंत्रश्साधना अपना देवी पूजा दिषि आकृष्ट भेलाह। एहि सँ अतिरिक्त मिथिलाक समाज मे शैवश्धर्मक प्रमुखता छल अथवा शाक्त धर्मक। जे विवाद विद्वत मंडली मे बहुत दिन धरि चलल। पनचैती सँ फरिआयल जे मिथिलाक लोक पंचदेवोपासक होइत छथि। ई मान्यता पुरानकालक समन्वयवादी धार्मिक जीवनक देन थिक। संस्कार गीतक मध्यकालीन चरित्र के देखार करैत अछि।
गीत संस्कार मे मैथिली गीतक अपन इतिहास अछि। लोचनक ‘रागतरंगिणी’ मे मैथिल गीतक जे इतिहास लिखने छथि तदनुसार एकर जन्म तेरहमश्चैदहम शताब्दी मे भेल। षिव सिंह आ विद्यापति समकालिन छलाह। हुनके पितामह सुमति मैथिली गीतक परम्पराक प्रारंभकर्ता छलाह। एहि प्रकारे मिथिलाक देषी गीत परम्पराक स्थापना भेल। ऐतिहासिक आाधार पर यैह मानल जाइत अछि मुदा गीत गेवाक प्रवृति मनुष्यक विकासक संग जुड़ल अछि। जहि आधार पर आरो पुरान कहल जा सकैत अछि।
गीत गेवाक ढ़ंग, जकरा राग कहल जाइत, मिथिला मे भास कहल जाइत छैक। मिथिला भासक अपन विषिष्टता छैक। संस्कार गीत एहि भासक भंडार छी। हँ,किछु त्रुटिपूर्ण बात सेहो अछि जे कम जनने एक्के गीत (समदाउन) खुषीक समय मे सेहो गवैत छथि आ शोकक समय सेहो जखन कि दुनूक लेल अलगश्अलग विषयवस्तु होइछ। तहिना बेटाक विवाह मे कुमार गीत आ बेटीक लेल कुमारि गीत मे सेहो अंतर होइत अछि। जनमक समय खेलौना आ सोहर मे सेहो अंतर अछि। ...


-नवेन्दु कुमार झा
सेमीफाइनलमे धाराशायी भेल राजग

बिहार विधान सभाक सेमीफाइनल प्रदेशमे सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधनक लेल परेशानी बाला रहल। एहि चुनावमे मतदाता नीतीश सरकारकेँ जोरक झटका धीरेसँ देलनि। विधान सभाक अठारह सीटक लेल भेल उप चुनावक जे परिणाम सोझाँ आयल अछि एकर कल्पना शायद सत्तारूढ़ गठबंधन नहि कयने होयत।ज्यों एकर एहसास रहैत त चुनाव प्रचारक क्रम मे राजगक नेता अपना-आपके आत्म विश्वास सँ भरल प्रकट नहि करितथि। लोकसभा चुनाव आ विधान परिषदक स्थानीय निकाय कोटाक चुनाव मे भेटल सफलता सँ उत्साहित मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एहि चुनाव मे जे राजनीतिक प्रयोग कयलनि से असफल रहल। राजनीति मे परिवारबाद विरूद्ध डेंग उठायब आ दल-बदलू के तरजीह देब हुनका लेल महग पडल। एहि चुनाव मे दल बदलूक पूरा मान-मर्दन मतदाता कयलनि अछि। भाजपा छोडि राजदक टिकट पर मूँगेर सँ जीतल विश्वनाथ प्रसाद गुप्ता आ उदय माँझी के छोडि आन उम्मीदवार चुनाव नहीं जीति सकल।
अठारह सीट पर भेल मतदानक परिणाम राजद-लोजपा गठबंधनक पक्ष मे गेल अछि। एहि गठबंधन के नौ सीट पर सफलता भेटल अछि त राजग के मात्र पाँच सीट पर संतोष करय पडल अछि। काँग्रेस आ बसपा लेल ई चुनाव लाभदायक रहल। काँग्रेस जतय दूटा सीट कय झटकि लेलक ओतहि बसपा एक सीट हथिया कय उत्तरप्रदेशक सीमा सँ सँटल क्षेत्र सभ मे परिवार बादक विरूद्ध जे विगूल मुख्यमंत्री फूकलनि से निरर्थक गेल। पूरा बिहार नीतीश के, घोसी जगदीश के’क नाराक संग जदयू सांसद जगदीश शर्माक कनिया शांति शर्मा निर्दलीय उतरि जीतय मे सफल रहलीह एहि ठाम जदयूक उम्मीदवार तेसर नम्बर पर चलि गेलनि।
दल बदलू के जनता रास्ता देखा देलक। राजद छोडि जदयू मे सम्मिलित भेल रमई राम, श्याम रजक, अजय कुमार टुन्ना, जदयू छोडि भाजपाक टिकट पर चुनाव लडल अभय सिंह, जदयू छोडि राजदक दामन थामने विजय राम आ ललन पासवान सहित कतेको दल बदलू विधान सभाक चौखट धरि पहुँचय मे असफल रहलाह। प्रदेश मे नव सोशल इंजिनियरिंग मे लागल मुख्यमंत्री नीतीश कुमारक प्रयास एहि चुनाव मे असफल रहल। महादलित आ अति पिछडाक रूप मे नव वोट बैंक तैयार करबाक प्रयास के सेहो झटका लागल अछि। एहि उपचुनाव मे सात टा सुरक्षित क्षेत्र सेहो छल जाहि मे सँ मात्र दूटा सीट जदयू के भेटल जखनकि राजद आ लोजपा अपन-अपन कब्जा बाला सुरक्षित सीट बचब मे सफल होयबाक संगहि लोजपा बोधगया (सु0) आ काँग्रेस चेनारी (सु0) सीट राजग सँ छीनि लेलक। ई उपचुनाव न्यायक विकास’क नारा देबय बाला नीतीश सरकारक लेल जनताक चेतौनी अछि त राजद आ लोजपाक लेल आत्म विश्वास बढब बाला कहल जा सकैत अछि। काँग्रेसक लेल ई चुनाव प्रयोग पहिल सफलता अछि असगर लडबाक काँग्रेसक निर्णय सँ एहि सँ आलाकमान पर दबाब बनब मे सफलता भेटत। उत्तरप्रदेश सीमा सँ सटल नौतन सीट पर बसपा अपन कब्जा जमा सभ राजनीतिक दलक लेल खतराक घंटी बजा देलक अछि।
उपचुनावक परिणामक सभ दल अपना-अपना दलक मोताबिक विश्लेषण क रहल अछि। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हारिक कारण स्थानीय मुद्दा के जनैलनि अछि आ एहि हारिक चिंतन करबाक बात कहलनि अछि। भाजपाक निशाना पर काँग्रेस अछि। भाजपाक अध्यक्ष राधामोहन सिंहक मानब अछि जे राजद-लोजपा आ काँग्रेस भीतरे-भीतरे एकजूट छल आ राजग के नोकसान पहुँचैबा लेल काँग्रेस असगर मैदान मे उतरल जहि सँ राजग के नोकसान भेल अछि। लोजपा अध्यक्ष रामविलास पासवान आ राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद एहि जीत पर खुशी व्यक्त करैत कहलनि जे चुनाव परिणाम नीतीश सरकारक पोल खोलि देलक अछि। विकासक नाम पर जनताक ठगबाक काज आ महादलित आ अति पिछडलक नाम पर समाज के बँटबाक प्रयासक जबाब जनता द देलक अछि। काँग्रेस अध्यक्ष अनिल कुमार शर्मा दू सीट पर भेटल सफलता आ पार्टी प्रदर्शन के सोनिया गाँधी आ राजीव गाँधीक बढैत लोकप्रियताक परिणाम जनौलनि अछि। भाजपाक आरोप के खारिज करैत श्री शर्मा कहलनि अछि जे काँग्रेस ककरो वोट बैंक मे सेंधमारी नहि कयलक बल्कि काँग्रेसक जे वोट बैंक छिटकि गेल छल ओकरा वापस अपना दिस अनलक अछि।
हाँलाकि एहि परिणाम सँ सरकारक स्वास्थ्य आ स्थिरता पर कोनो असरि नहीं पडत मुदा भाजपा आ जदयूक भीतर आक्रोशक विस्फोट भ सकैत अछि आ एकर किछु बानगी सेहो सोझा आयल अछि। ओना एहि चुनाव के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आत्म विश्वासक संग सेमीफाइनल कहैत छलाह आ खेलक नियमक मोताबिक सेमीफाइनल हारलाक बाद फाइनल मे स्थान नहीं भेटैत अछि मुदा राजनीतिक नियम अपना अनुसार बनैत अछि। हारि के जीत आ जीत के हारिक विश्लेषण राजनीतिक दल आ राजनेता अपना अनुसार सँ करैत छथि आ नियमानुसार फाइनल मे फेर राजग, लोजपा-राजद आ काँग्रेस एक दोसरा के सोझा होयत त परिणाम कि होयत ई त भविष्यक गर्त्त मे अछि मुदा सत्तारूढ भाजपा-जदयूक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधनक बढल आत्म विश्वासक खतराक घंटी जनता बजा देलक अछि।
वि0 सभा विजयी उम्मीदवार निकटतम प्रतिद्वन्दी भोटक
क्षेत्र आ दल आ दल अंतर
बगहा(सु0) कैलाश बैठा नरेश राम 6950
(जदयू) (काँग्रेस)
नौतन नारायण प्रसाद मनोरमा प्रसाद 13326
(बसपा) (जदयू) वारिसनगर विश्वनाथ पासवान डा0 संजय पासवान 6235
(सु0) (लोजपा) (भाजपा)
कल्याणपुर अशोक वर्मा रंधीर कुमार 19029
(राजद) (जदयू)
बोचहाँ मुसाफिर पासवान रमई राम 4000
(सु0) (राजद) (जदयू)
औराई सुरेन्द्र राय राम सूरत राय 8801
(राजद) (जदयू)
अररिया विजय कुमार मंडल अजय कुमार झा 13468
(लोजपा) (भाजपा)
बेगूसराय कृष्ण सिंह सुदर्शन सिंह 9259
(भाजपा) (लोजपा)
त्रिवेणीगंज दिलेश्वर कामत दीनबन्धु यादव 11419
(जदयू) (लोजपा).
धोरैया मनीष कुमार नरेश दास 2695
(सु0) (जदयू) (राजद)
मूँगेर विश्वनाथ प्र0 गुप्ता मो0 सलाम 4152
(राजद) (जदयू)
सिमरी चौधरी महबूब अली डा0 अरूण कुमार 5870
बख्तियारपुर कौसर (काँग्रेस) (जदयू)
रामगढ अम्बिका प्र0 यादव नरेन्द्र कु0 सिंह 2957
(राजद) (बसपा)
चैनपुर बृजकिशोर बिन्द विरेन्द्र कु0 सिंह 3369
(भाजपा) (राजद)
चेनारी मुरारी प्रसाद गौतम ललन पासवान 1150
(सु0) (काँग्रेस) (राजद)
घोसी शांति शर्मा दिनेश प्र0 यादव 5200
(निर्दलीय) (राजद)
बोध गया कुमार सर्वजीत विजय कुमार मांझी 7662
(सु0) (लोजपा) (भाजपा)
फुलवारी उदय मांझी श्याम रजक 1274
शरीफ(सु0) (राजद) (जदयू)

सीटक हेरा-फेरी
विस0 सीट 2005 उपचुनाव
रामगढ राजद राजद
चैनपुर राजद भाजपा
चेनारी जदयू काँग्रेस
बेगूसराय भाजपा भाजपा
घोसी जदयू निर्दलीय
नौतन जदयू बसपा
बगहा जदयू जदयू
औराई जदयू राजद
बोचहाँ राजद राजद
फुलवारी राजद राजद
कल्याणपुर जदयू राजद
वारिसनगर लोजपा लोजपा
त्रिवेणीगंज जदयू जदयू
बेगूसराय भाजपा भाजपा
मूँगेर जदयू राजद
अररिया भाजपा लोजपा
धोरैया जदयू जदयू
सिमरी बख्तियारपुर जदयू काँग्रेस


परिणाम तालिका

दल सीट(सं0) मे विधान सभा सीट राष्ट्रीय जनता दल 06 फुलवारी शरीफ(सु0), रामगढ,
मूँगेर,बोचहाँ(सु0), औराई आ
कल्याणपुर।
लोकजनशक्ति पार्टी 03 वारिसनगर(सु0), अररिया आ
बोढगया(सु0)।
जनता दल यूनाइटेड 03 बगहा(सु0), धोरैया(सु0) आ
त्रिवेणीगंज।
भारतीय जनता पार्टी 02 चैनपुर आ बेगूसराय।
काँग्रेस 02 चेनारी(सु0) आ सिमरी
बख्तियारपुर।
बहुजन समाजवादी पार्टी 01 नौतन।

निर्दलीय 01 घोसी।

कुल 18

......

हेमचन्द्र झा
मास्टर साहेब नहि रहलाह

आई मास्टर साहेब शांत भऽ गेलाह । भोरे-भोर सौंसे गाम मे खबरि पसरि गेल जे आब मास्टर साहेब दुनिया मे नहि छथि । छब्बे मास पहिने तँ रिटायर भऽ कऽ आयल रहथि ओ । एखन पेंशनक कागतो कहाँ सोझरायल रहनि । कएकटा काज एखन बाँकिये रहनि । सेहेन्ते अपन एकमात्र बेटा भोलूक वियाह १६ वरषक अवस्था मे करेने रहथि । अगहन मे दुरागमन करेबाक विचार रहनि,से कहाँ भेलनि । जेठे मे विदा भऽ गेलाह ओ । जिनगी भरि एक-एक पाई बचेनहार, चारि-चारिटा कनेदान अपना हाथें केनहार, बाप-पुरषाक ७-८ बीघा जमीन के १२ बीघा पर लऽ गेनहार, साबिकक घरारी सँ अलग घरारी लऽ कऽ घर बनेन्हार मास्टर साहेब आखिर अपन बेटाक लेल दू कोठली पक्का घर नहिये बना सकलाह । भला कालक आगाँ ककरो बस चललैक अछि? मास्टर साहेब हारि गेलाह काल आ समय सँ । आई मास्टर साहेब नहि हुनक लहाश पड़ल अछि आँगन मे । करुण क्रंदन सँ पूरा आँगन शोकाकुल छैक ।
किछु दिन पहिने सँ ओ दुखित छलाह । दरभंगा जा कऽ दवाई-दारू करेने रहथि । दवाई सभ चलिये रहल छलनि, ता एकाएक काल्हि सांझ मे ओ बेसी दुखित भऽ गेलाह । गाम मे जे डाक्टर रहैक से बजाओल गेलाह । ओ नाड़ी देखलनि, बी.पी चेक केलनि, आला लगेलनि आ कहलनि जे ता हम किछु दवाई लीखि दैत छी आ ईहो कहैत छी जे हिनका आगू लऽ जैऔन । परिवारक सभ सदस्य हुनका आगू लऽ जेबाक उपक्रम मे लागल । परंतु मास्टर साहेब मना कऽ देलनि । शायद हुनका अपन मृत्युक आभास भऽ गेल रहनि । ओ स्पष्ट कहने रहथि जे जँ भिनसर धरि बाँचि गेलियह तँ डाक्टर लग लऽ जैहह । हम राति-बिराति डाक्टर लग नहि जायब ।
से मास्तर साहेबक मरितहि हुनक एकमात्र बालक भोलू पर विपत्तिक पहाड़ टूटि पड़ल । १६ वरषक बालक जेकर जन्म चारि बहीनक बाद भेल छलैक,विपत्तिक तँ एखन धरि नामो ने सुनने छल । पछिले साल तँ मैट्रिक कयलक ओ आ एखन पटना मे आई.ए. मे पढ़ैत अछि । वियाहो भऽ गेल छैक । आब ओकरा पर अपन पढ़ाइ पूरा करबाक जिम्मा छैक, माइक लेल परिवार पेंशनक कागत बनबेबाक छैक, अपन परिवारक चिन्ता छैक आ ७-८ बीघा खेतक जिम्मा छैक । भला १६ वरषक बालक सँ एते हो कोना आ ताहि पर सँ सामने छैक पिताजीक श्राद्धक चिन्ता ।
मास्टर साहेब शुरुहे सँ मास्टर साहेब नहि छलाह । अपना जमाना मे शास्त्री केलाक बाद जखन शीघ्रे नोकरी नहि भेलनि तँ कलकत्ता चलि गेलाह । ओतय पूजा-पाठ वला ड्‌यूटी पकड़लनि । १६-१६ घंटा पूजा-पाठ वला ड्‌यूटी करथि । फेर बाद मे कोनो जोगाड़ सँ मास्टरी भेलनि आ बनि गेलाह हाइस्कूलक संस्कृत शिक्षक । एक-एकटा पाई बचाबथि आ गाम पठाबथि । गाम मे परिवारो नमहर रहनि । तीन भाईक भैयारी मे जेठ रहथि । ७-८ बीघा खेत तीन भाइ मे कम लगनि, क्रमश: ओकरा बढ़ाय १२ बीघा पर लऽ गेलाह । बीच-बीच मे कनेदानो सभ केलनि । पिताजीक मृत्युक बाद भिन-भिनौज भऽ गेलनि । घरारी तक बँटा गेलनि । अपनहि अमलदारी मे बेटाक माथ पड़हक ४ बीघा खेत के ७-८ बीघा पर पहुँचा देलनि आ सभटा कनेदानो सँ मुक्त भेलाह ।
दाह-क्रिया सम्पन्न भेल आ तीनिये दिनक बाद आबि गेल छौड़झप्पी । सभ चीज सँ समांग सभ मुक्त भेलाह । आब आयल असली तैयारीक बेर । ओमहर मास्टर साहेब मुईलाह आ एम्हर गौंआ मे कनफुसकी शुरू । मास्टर साहेब जिनगी मे कत्ते कमेलाह एकर गणना होमय लागल । ओहि मास्टर साहेबक श्राद्ध तँ नीक सँ हेबाक चाही, गौंआ के दू दिनक भोज तँ हेबाके चाही ऊपर सँ किछु बँटलो जाय यथा लोटा या धोती या ....। कियो एकोबेर ई नहि सोचलाह जे मास्टर साहेब जिनगी भरि काजे करैत रहलाह । आ किनको लग ईहो सोचबाक समय नहि रहनि जे एहि १६ वरषक बालकक एतेटा जिनगी कोना कटतैक । जाहि बालकक पिताजीक स्वर्गवास भऽ गेलै, घरक कर्ता-धर्ता चलि गेलै, जेकरा लग स्वयं सिर छुपेबाक लेल एकटा घर नहि छैक, ओकर जिनगी कोना बिततैक । बस ऊपर सँ किछु हेबाक चाही ।
औपचारिकतावश गामक बैसारी भेल । ५-१० टा बूढ़-पूरान उपस्थित भेलाह । वस्तुत: पहिने एहि बैसारीक पाछू एकटा पैघ उद्देश्य रहैक । कर्ताक गड़ा मे उतरी रहैत छनि, ओ कोनो काज नहि कऽ सकैत छथि । ओ समाजक समक्ष अपन मोनक इच्छा रखैत छलाह जे हम अपन पिता/माता श्राद्धक निमित ई सभ करय चाहैत छी । आब समाजक दायित्व बनैत छलैक जे कर्ताक इच्छाक पूर्ति कोना हो आ समाज तदनुसार अपन काज करैत छल । जहन कर्ताक गड़ाक उतरी टूटैत छलनि तँ ओ समाज के एक-एक पाई सधा दैत छलखिन । परन्तु आब बैसारक उद्देश्य दोसर भऽ गेलैक अछि । समाज कर्ताक समक्ष अपन माँग राखय रखलाह अछि जे तोहर पिता तोरा लेल ई केल्थुन, तों ई करह, ई बाँटह...। सएह भेल, बूढ़-पुरान सभक विरोधक बावजूदो बैसार मे ई मुद्दा उठिये गेल जे की बाँटल जायत । कर्ता अपन असर्मथता जतेलैन, तथापि अगिला दिन भोर होइत-होइत सौंसे गाम मे खबरि पसरि गेल जे मास्टर साहेबक श्राद्धक समाप्तिक बाद प्रति परिवार पूरा गाम मे “फुलही लोटा” बाँटल जायत । पाई कतौ सँ अबौ, समाज के कोन मतलब?
भोज भातक तैयारी सहित श्राद्धक आन तैयारी सभ समयानुसार शुरू भऽ गेल । एकादशाह आ द्वादशाह मे खूब जमगर भोज भेलैक । गौंआ सभ खएलक आ बैसि गेल लोटाक इंतजार मे । एतबे नहि सरो-कुटुम कहाँ बाकी रखलनि । मास्टर साहेबक जेठकी बेटीक नि:संतान मृत्यु भऽ गेल रहनि आ तें आब तीनटा जीवित रहथिन । दोसर बेटी दिसक दुनू नाति नानाक श्राद्धक उसरगाक लेल तत्पर रहैक । तेसर बेटीक तीनू बेटा सेहो कम नहि रहय । ओहो सभ तैयारे छल । चारिम बेटीक धिया-पुता छोट रहैक आ तें एहि झमेला सँ काते रहैक ।
एकादशाह दिन आँगन मे उसरगा समान सभ पर नाति सभक नजरि रहैक । उसरग-पुसरगक विध खतम होईतहि सामानक लेल नाति सभ तत्पर भेल । सभ कियो सभ सामान लेलक । लेकिन दोसर बेटी दिसक दुनू नाति छोट सामानक मोह मे नहि पड़ि गाय के हाँकि के अपना गाम पर बान्हि आयल । तेसर बेटी दिसक नाति सभक हाथ मे अयलैक ओछाओन, छाता, जूता. खटिया आदि । ओकरा सभ के ई बात बड्‌ड अखरलैक जे हमर मसिऔत सभ गाय लऽ कऽ चलि गेल । मामला द्वादशाह दिन तँ शांत रहलैक, परन्तु तकर प्राते गरमा गेलैक । तेसर जमाय सभटा सामान वापस कऽ देलनि आ विरोध स्वरूप रूसि रहलाह ।
काल्हिए तँ भोलूक उतरी टुटलैक अछि आ आईये नव समस्या आबि गेलैक । ओ किकर्तव्यविमूढ़ भऽ गेल । सभ सभठाम फुट्‌टे रूसल । जेकर पिताजी मरि गेलैक तेकरा के देखतैक, अपने मे समाने लय सिर-फुटौव्वल । आखिर ओ अबोध बालक अपन चुप्पी तोड़ि सभ बहीन के एकठाम बजेलक आ प्रश्न केलक - “हम तोरा सभ बहीन सँ छोट छियौ । तों सभ हमरा बोल-भरोस कतय देमे, उल्टे सामान सभ लेल झगड़ा करैत जाई छें । की बाबूक मृत्युक बाद हमरा प्रतिये तोरा सभक कोनो फर्ज नहि बनैत छौक? भोलूक प्रश्नक जबाव केकरो लग नहि छल । सभ निरुत्तर छल ।

३. पद्य

३.१. गुंजन जीक राधा


३.२. पंकज पराशर
३.३. सुबोध कुमार ठाकुर
३.४.उमेष मंडल (लोकगीत-संकलन)


३.५.कल्पना शरण-प्रतीक्षा सँ परिणाम तक-५
३.६.विजया अर्याल-आजुक जीवन
३.७.सरोज खिलाडी-मनक बात मनमे
३.८. दयाकान्त-बाढ़ि




गंगेश गुंजन

गुंजन जीक राधा- बारहम खेप
फेर तं वैह संसारक गाथा!
फेर सृष्टिक वैह सबदिना चर्च-वर्च।
बीतल रातिक लेभरल बिसरल अनुभव
सोझांक दिनक सब उद्योग उपाय मे अपस्यांत जीवन
घाम चुअइत देह-माथक रेखा में फंसल पसेनाक
अति सूक्ष्म जलप्राण-कण करैत चक चक
अनमन जेना प्रोषित पतिकाक निर्धन सेहन्ताक चमचम ठोप!
आँखि-भौंह मध्य भाल पर ठीक उूपर। यद्यपि जरल कपार
अभागलिक तथापि । सौभाग्य-जगमग ठोपक विलास हो जाग्रत,
थिक संभव ई बात स्त्रीक करुणा, लज्जा कें बचा रहल हो दया,
महाभाव बन’ नहि दैत हो हीन-अभागिन।
रक्षा मे हो सजल शस्त्र सन सोहागक ठोप ओकर।
ओना ई एतेक दया आ एहन कृपा कथीक स्त्री लेल?
कि तं दुर्गन्जने-दुतकार आकि किछु एहने मामूलियो दुःख पर
सहानुभूति-सम्वेदनाक वर्षा, जे बनि जाय मनहि पर पहाड़!
किएक से ? देह दशा नहि ओकर तइ जोग
करय स्त्रीयो कृषि काज ?
दूहि क दूध, पोसय बछड़ू चरबय गाय। ओ कि मात्र
मक्खने टा मथि सकैए, रान्हि सकैए भात। एहि सं फाजुल नहि ?
किएक नहि हर-बड़दक दिनचर्या सकैत अछि सम्हारि ?
किएक नहि जोति सकय हर
खेत करय आबाद हाॅंकि क ल’ जाय बैलगाड़ी
बिदागरीक ? नहि रहि जाय पुरुषे बहलमान सब काल अनिवार्य।
किएक नहि क’ सकय ओहो ई सब काज ?
स्त्री-हम सक्षम नहि सब ? लिखी पोथी बोॅची सब शास्त्र ?
किएक नहि संभव ई सब जेना पुरुष बुते ?
बान्हि मूड़ी मे मुरेठा, ठेहुन धरि नूआंॅ समेटि ?
नीपय जे आंगन-असोरा, नहि कोनो संकोच तं
बाध जाय हर जोतबा मे की बाधा, की लज्जा आ व्यर्थक विचार ?
‘‘ओहनहुं तं असकर पुरुष सदाय सं करैत श्रम
कठोर जीवन यापनक उपाय जोतैत हर
चीड़ि क’ जाड़नि, उूघैत बोड़ा-मोटा क’ क’ बहलमानी
बड़य थाकल बुझाइत अछि। बड़ ठेहियायल, असोथकित।
कठमस्त देह पर्यन्त भ’ गेलैये सिंगार-विलास विमुख।’’-
कहने छलि रमकनियांॅ भौजी। बड़ छलि उदास,
बनल छलि स्वयं भरि देह पियास!
तथापि लाज सं सिहरलि।-कंठ आ देह प्राण अतृप्त,
आगि लागल हो जेना सौंसं शरीर।
ई अनुभव केहन विकट कतेक अनचिन्हार
स्त्री-पुरुखक ओहनो भेटल से सुन्दर स्नेह-काल
होयबाक छल जे शृंगार श्लथ रस धार स्नानक उद्दाम अवसर !
सेहो बनि जाय जं मरुथल-मरुथल
चारू कात उड़ैत बालुक असकर एकान्त
तरबा सं माथ धरि धहधह ताप
करय की तेहन लोक अपना आप ?
बुधिबताहि रमकनियाॅ भौजी !
27 अगस्त,2009.

(अगिला अंकमे...)
पंकज पराशर
सरगोधा
निःशब्दा राति मे खुजल पहिले-पहिल चंचु
आ हूक उठल पंचम मे?

मोन स्थिर करैत
तकैत छी एहि स्वर-धार केर उत्स
मुदा भोरुकबा उगबा लेल जेना उताहुल छल

निःश्वास छोड़लहुं- ह’-ह’ भोर होयत आब भोर
आ मोन केँ भेटत त्राण
मुदा ई कोन चिड़ै थिक
जे ‘ध’ केँ उच्चरित करैत अछि ‘द’
आ कहैत अछि- सरगोदा सरगोदा
गोदा...हाय सरगोदा

निन्न जेना गामे मे रहि गेलीह
संग नहि अयलीह एहि ठाम
भोर होइत अछि करौट फेरैत-फेरैत

होइत अछि अंततः भोर
मुदा भोर भेल शहर मे
औनाइत रहैत अछि राति

अखबारो चिचियाइत अछि
निःशब्दा रातिक स्वर जकां
रक्तगंधी स्वर मे ओहिना सरगोदा

बहराइत छी एहि शहर सँ चरैवेति...चरैवेति
आ समवेत स्वर मे सुनैत रहैत छी
चंचु सबहक पंचम स्वर
2009
सुबोध कुमार ठाकुर
अधूरा प्रेम आर चान
छिटकल क्षण आकाशमे छल
मनमे दबल जतेक बात छल

कहए लगलहुँ चानसँ
बुझबए लगलहुँ प्राणसँ

हमरो प्रेमक ज्योति जागल रहए
हमरो प्रीतक आगि लागल रहए


प्रेम करए लागल रहौँ हुनका हम प्राणसँ
ई कहए लगलहुँ चानसँ


आएल छलीह हमर मरुभूमि रूपी मनमे ओ
मृगमरीचिका जेकाँ बनि कऽ ओ
खेलाय लागल छलीह ओ हमर अरमानसँ
कहए लगलहुँ हम चानसँ

अखन तँ प्रेमक आँकुरो नहि फुटल छल
मनक स्नेह सेहो ढंगसँ नहि चढ़ल छल
नीक जेकाँ हुनका सुननहुँ नहि छलहुँ कानसँ
कहए लगलहुँ ई चानसँ


कर्मक डोरी संग बान्हल छलहुँ
जीवन सार्थक करएमे लागल छलहुँ
अर्थकेँ जुटबैमे प्यासल छलहुँ

प्रेम मधुर संगीत फीका लागए हमर कानसँ,
परंच हमर मनक गाममे ई शोर छल
कहि नहि सकलहुँहुनका ई अपन जुबानसँ
कहए लगलहुँ ई चानसँ



अन्तर्द्वन्द चलिये रहल छल
प्रेमक रंग चढ़िये रहल छल
परंच ठीक भय गेलै हुनकर विवाह ककरो आनसँ,
कहए लगलहुँ ई चानसँ

जिनक पाणिग्रहण हम नहि कए सकलहुँ,
जिनका लेल हम तड़पैत रहि गेलहुँ
हाय केहन बान्हल छलहुँ विधाताक विधानसँ

ओ छलीह हमर अधूरा प्रेम,
कल्पना ओ यथार्थक बेजोड़ संगम
आर पवित्र गीता कुरानसँ
कहए लगलहुँ ई चानसँ


उमेष मंडल

एहि बेरक बात थिक। विविधश्भारती रेडियो स्टेषन सँ गीत सुनैत छलौ। एखन धरि मैथिली साहित्य सॅ कम्मेश्सम्म सिनेह छल। ओना परिवार सॅ समाज धरि मैथिलिऐक बीच आठो पहर समय बीतैत अछि। कातिक पूर्णिमाक दिन रहने, समाजक माएश्बहिन लोकनि सामा भसा आंगन दिषि सोहर गबैत घुमलीह। एकाएक हमरो कान मे, गीतक ध्वनि हवा मे छिछलैत अबै लगल। रेडियो बन्न कऽ सोहर सुनै लगलहुँ। गीतक स्वर हृदय केॅ झकझोड़ए लगल। जेहने माएश्बहीनि लोकनिक स्वरक मधुर टाँस तेहने एकरुपता। जहिना बहीनि,माएश्बाप समाजक सखीश्सहेली छोड़ि, सासुर जेबा काल, अपन क्रन्दन स वातावरण केॅ शोकाकुल बनबैत आ सखीश्सहेली सोहरक स्वर सॅ विदा करैत,तहिना भऽ गेल। हृदय विदीर्ण हुअए लगल।
अनायास मन मे सवाल उठै लगलश्
(क) श् की हमर कलाश्साहित्य, भूमण्डलीकरण स, आगू बढ़त?
(ख) श् आ कि जतय अछि ततय, अजेगर साॅप जेॅका थुसकुरिया मारि, बैसल रहत?
(ग) श् आ कि हमर कलाश्साहित्य मटियामेट भऽ जायत?
एहि प्रष्नक बीच उलझल मोन मे, डिबियाक टिमटिमाइत इजोत जेकाॅ, आयल जे अपनो मातृभाषा आ मातृभूमिक सेवा लेल किछु कयल जाय! एहि जिज्ञासाक संग अपने लोकनिक बीच, एकटा छोटश्छीन पोथी ‘संस्कार गीत’राखि रहल छी। आषा अछि जे अधला पर ध्यान नहि दऽ, आगूक सेवा लेल पे्ररित आ प्रोत्साहित जरूर करब।
गीतक संकलन किछु पोथिओक अछि आ अधिकतर माएश्बहीनिक कंठक सेहो अछि। जहि गीतिकार लोकनिक गीत संकलित अछि, हुनक आभारी छी। आ जे गीत माएश्बहीनि लोकनिक कंठक अछि, ओ जहिना कहलनि तहिना लिखलो गेल अछि तेॅ शब्दक फेड़िश्फाड़ आ टूटल सेहो अछि।
गीतक संकलन करै मे अग्रज सुरेष मंडल आ अनुज मिथिलेष मंडलक भरपूर सहयोग रहल।
(1)
सिंह पर एक कमल राजित ताहि उपर भगवती।
उदित दिनकर लाल छवि निज रुप सुन्दर छाजती।
दाँत खटश्खट जीह लहश्लह श्रवन कुन्डल शोभती।
शंख गहिश्गहि, चक्र गहिश्गहि खर्ग गहि जगतारिणी।
मुक्तिनाथ अनाथ के माँ भक्तजन के पालती।
सिंह पर एक कमल राजित ताहि ऊपर भगवती।
माँ ताहि ऊपर भगवती।
(2)
सभ के सुधि अहाँ छी अम्बा हमरा किए बिसरै छी हे।
हमरा दिस सँ मुह फैड़े छी, ई नहि उचित करै छी हे।
छी जगदम्बा जग अबलम्बा तारिणी तरणि बनै छी हे।
छनश्छन पलश्पल ध्यान धरै छी दरसन बिनु तरसै छी हे।
छी हम पुत्र अहीं केर जननी से तँ अहँा जनै छी हे।
रातिश्दिन हम विनय करै छी पापी जानि ठेलै छी हे।
सभ के सुधि अहाँ लै छी अम्बा हमरा किए बिसरै छी हे।
(3)
कोन दिन आहे काली तोहर जनम भेल, कोन दिन भेल छठियार।
शुक्र दिन आहे सेवक हमरो जनम भेल, बुध दिन भेल छठियार।
पहिर ओढ़िय काली गहबर ठाढ़ि भेली, करब मे काली के सिंगार।
कोन फूल ओढ़न माँ के कोन फूल पहिरन, कोन फूल सोलहो सिंगार।
चम्पा फूल ओढ़न, जूही फूल पहिरन, ओढ़हुल फूल सिंगार।
भनहि विद्यापति सुनु माता काली, सेवक रहु रक्षपाल।
कोन दिन आहे काली तोहर जनम भेल, कोन दिन भेल छठियार।
(4)
अब ने बचत पति मोर हे जननी,
अब ने बचत पति मोर।
चारु दिसि पथ हेरि बैसल छी,
क्यो ने सुनै दुख मोर। हे जननी.....
एहि अवसर रक्षा करु जननी,
पुत्र कहाएव तोर। श् हे जननी.....
अलटिश्बिलटि कऽ जँ मरि जायब,
हँसी होयत जग तोर। श् हे जननी.....
अबला जानि शरण दीअ जननी,
नाम जपत हम तोर। श् हे जननी....


(5)
हम अबला अज्ञान हे श्यामा,
हम अबला अज्ञान।
धन सम्पत्ति किछु नहि अछि हमरा,
नहि अछि किछुओ ज्ञान। श् हम अबला....
नहि अछि बल, नहि अछि बुद्धि,
नहि अछि किछुओ ध्यान। श् हम अबला......
कोन विधि भव सागर उतरब,
अहिंक जपल हम नाम। श् हम अबला...
(6)
जगदम्ब हे अबलम्ब मेरी, जननी जय जय कालिका।
दष भुजा दष खड़ग राजित, पाष खप्पर विराजित।
मुण्ड लयश्लय मगन नाचय, गाबय योगिन मालिका।
भाइ भैरब मुण्ड छीनथि जय जय कालिका।
(7)
अहाँ कियै भेलहुँ कठोर हे जननी अहाँ कियै भेलहुँ कठोर।
हम दुखिया माँ शरण अहाँ के अहाँ कियै भेलहु कठोरश् हे जननी...
अतुल कष्ट सहि जनम देल अछि आब पोछत के नोरश्हे जननी ...
ककरा पर हम जनम गमायब के करती आब शोरश् हे जननी....
ककरा पर हम रुसि परायब के आब रक्षक मोरश् हे जननी अहाँ कियै....
(8)
क्यो ने हमर रखबार हे जननी,
क्यो ने हमर रखबार।
चिन्ता विकल विवस मन मेरो,
मन दुख होइए अपार। हे जननी क्यो....
बिनु अबलम्ब धार मे डुबलहुँ,
सुझत नहि किनार। श् हे जननी.....
अहाँ किए देर लगेलहुँ जननी,
हम डुबलहुँ मझधार। श् हे जननी....
सृष्टिक मालिक अहीं छी जननी,
करहु सभक प्रतिपाल। श् हे जननी....
माता के सब पुत्र बराबरि,
पंडित मूर्ख गमार। श् हे जननी....
कतेक विनय कय थाकि गेलहुँ हम,
अब करिअ भव भार। श् जननी...

(9)
कहाँ नहैली काली कहाँ लट झाड़लन्हि,
कहाँ कयल सिंगार हे।
गंगा नहैली काली बाट लट झाड़लन्हि,
गहबर कयल सिंगार हे।
पहिरि ओढ़िया काली गहबर ठाढ़ भेलि,
करय लगली सेवक गोहारि हे।
यष लिय यष लिय काली हे माता,
अहाँ यष फिरु संसार हे। श् कहाँ.....
(10)
अयलहुँ शरण तोहार हे जगतारनि माता।
लाले मन्दिरबा के लाले केवरिया,
लाले ध्वजा फहराय हे जगतारनि माता।
लाले चुनरिया के लाले किनरिया,
लाले सिन्दुर कपार हे जगतारनि माता।
राखि लिय मुख लाली हमरो,
हम लेब अँचरा पसारि हे जगतारनि मता।
अयलहुँ शरण तोहार हे जगतारनि माता।
(11)
हे जगदम्बा जय माँ काली प्रथम प्रणाम करै छी हे।
नहि जानि हम सेवा पूजा अटपट गीत गबै छी हे।
सुनलहुँ कतेक अधम के मैया मनवांछित फल दै छी हे।
पुत्र सम जानि चरण सेवक के जन्मक कष्ट हरै छी हे।
विपतिक हाल कहल की हे मैया आषा लागि जपै छी हे।
सोना चानी महल अटारी ई सब किछु ने मँगै छी हे।
मनक मनोरथ मनहि मे राखि मंदिर तक पहुँचे छी हे।
अहाँक चरण के दास कहाबी एतवे हम मनबै छी हे।
प्रेमी जन सँ पाबि निराषा नयन नीर बहबै छी हे।
नोर बहा कऽ अहाँ लय मैया मोती माल गुथै छी हे।

(अगिला अंकमे)
कल्पना शरण
प्रतीक्षा सऽ परिणाम तक – 5

पृथ्वी पर जन्मक मूल उद्देश्य दिस
कृष्ण बढ़ला द्रुपद के दरबार मे
अपन महल सऽ निष्काषित पाण्डव
अत उपस्थित छलैथ ब्राह्मणक रूपमे
अपन धर्नुबल सऽ सव्यसाची भेला
घोषित विजयी द्रौपदीक स्वयंवरमे

वस्त्रहरण होय वा वनवास होय
वा जरासंघ आ भीमक मल्लयुद्धमे
वा अर्जुन संग सुभद्राक विवाह होय
बलराम असमर्थ परिजनक विभाजनमे
मुदा धर्मप्रेमी प्रभु एला पाण्डव दिस
इन्द्रपुत्रक आग्रह पर सारथिक रूपमे

आशंकित अर्जुन के गीताक मूलमंत्र संग
कुर्उक्षेत्रमे विष्णुक विराटरूपक दर्शन भेल
अग्निक गाण्डीव आ शिवक पशुपतास्त्र
मनोबल नहिं देलकैन भीष्मके मारऽ लेल
सारथि कृष्ण करेलखिन शक्तिक पूजा
देवी दुर्गाक समर्थन भेलैन जिष्णुके लेल

विजया अर्याल
आजुक जीवन




प्रत्येरक दिन मृत्युजसँ सापट मांगिकऽ
बाँकी–बक्यौिता देबऽ लेल
ऋणक रूपमे बाँचिरहल अछि जीवन ।
प्रत्येमक क्षण मृत्यु सँ पैँचा मांगिकऽ
क्षतिपूर्ति करबाक हिसाबसँ
व्यािजक रूपमे भरिरहल अछि जीवन ।
जीवन आर्जन करबाक हिसाबमे नहि
जीवन प्रत्येरक क्षणक ऋण देबाक हिसाबसँ
चुकएबाक दरमे असुल–उपर भऽ रहल अछि ।
युद्ध आ शान्तिसक जोड़–घटाउमे
भूखक बारूद लऽकऽ
माटि खाएपर मजबूर भऽ रहल अछि जीवन ।
अखन डेराओन मुँहसभ
अमूर्त्त अर्थमे नुकाएल जीवनके, आँटाक संग बदलिकऽ
विवशतासँ बाँचिरहल अछि ।
इच्छाा आ महात्वाीकांक्षीक कोठीके
प्रदूषित वातावरणके तोड़ल समयमे
संघर्षे–संघर्षक बीचसँ भागि
मनुक्खेक अस्ति्त्विपर दाग लगाबऽ लेल
सर्कसक जोकर बनि बाँचिरहल अछि जीवन ।
खोजमेसँ लाएल संरचनामे, अपनेसँ लगाएल आगि
जरिरहल पृथ्वीसक भागमे शान्तिस शान्ति करत
छितिर–बितिर भेल शताब्दी क हड्डीमे मलहम लगाबऽ
क्षेप््रतयास्तदसँ काटल गेडी लऽकऽ
कछुआक गतिमे चलिरहल अछि जीवन ।
(आबय बला पोथी अएना मैथिली कविता संग्रह-सम्पादक संतोष कुमार मिश्रसँ)


सरोज खिलाडी
मनक बात मनमे


सामनेमे तँ हम चुपचाप छलहुँ
परोछमे हम बरबराइत रहै छी
हुनका सामने हम हँसऽ नहि सकलहुँ
अएनाके सामने हम किए मुस्किनआइ छी ?

मनक बात हम हुनकासँ कहऽ नइ सकलहुँ
अखन हम किए पछताइ छी
हुनका आगू किछु बाजऽ नहि सकलहुँ
अखन हम किए नोर बहबै छी ?

मनेमन कहै छलहु अहाँ विन जीयब कोना
सामनेमे नहि कहऽ सकलहुँ
संकोच आ डरसँ चुपचाप छलहुँ
मोनसँ कहियो हँसऽ नहि सकलहुँ ।

यादमे हुनक कते दिन नोर बहाउ
हुनक इच्छा के हम बुझऽ नहि सकलहुँ
ओ तँ हमरा पौने छली
हुनका हम पाबऽ नहि सकलहुँ ।

अखनो यादमे हुनक डूबल रहै छी
कनियो चैन नहि पाबऽ सकलहुँ
एहन केहन रोग भऽ गेल हमरा
इलाज हम करबऽ नहि सकलहु ।

गलती तँ हुनकेसँ भेल
ओहो तँ हमरा कहऽ नहि सकली
ताली तँ हम बजाबऽ चाहलहुँ
मुदा दुनू हाथके मिलन कराबऽ नहि सकलहुँ
मनक बात मनेमे २।
(आबय बला पोथी अएना मैथिली कविता संग्रह-सम्पादक संतोष कुमार मिश्रसँ)

दयाकान्त
बाढ़ि
हाथ जोरी के विनय करै छी
सुनु माँ कमला, कोशी
बकसि दियै आब मिथिला के
पुत्र टुगर भेल चैदिस |
चिनवार पर सँ बहै छल धार
जान बचायब भेल पहाड़
नहि खेवाक कोनो ओरियान
बितल अन्न बिन कतेको साँझ
नेना-भुटका मुँह तकै छल
मायाक आँखी सँ नोड खसै छल
बाप बेचारा बेबस बैसल
अपना माथ पर हाथ धेने छल
दुधपीबा बच्चा करै छल सोर
मायक दुध, सुखायल ठोर
नहि जानि कोन जन्मक ई पाप
पुत्र बियोगक परल संताप
कियाक बिधाता भेला बाम
नहि छोरल खरदुतियाक ओरियान
देल कमलाक कतेको साँझ
तइयो मुइन फुटल अंगनाक मांझ
बेटा, पुतोह, नैत आ नाती
बहि गेल सबकियो टूटी गेल छाती
कनि-कनि बढिया भेल बताह
सागर गाम में मचल तवाह
सुखी गेल पानि सुखल नोर
पसरि गेल महामारीक प्रकोप
बाध-बोन सब भेल बिरान
सुखी गेल गाछ उजरल मचान
भुतही पोखरी में उरैया बाल
उच्चका डीह पर लगावय जाल
स्वर्ग से सुन्दर छल ई धरती
भय गेल आई अनाथ
व्याकुल पुत्र छटपटा रहल जेना
बिना पानि के माछ

कल्पना शरण








विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती
पाखलो
मूल उपन्यास : कोंकणी, लेखक : तुकाराम रामा शेट,
हिन्दी अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह, श्री सेबी फर्नांडीस.मैथिली अनुवाद : डॉ. शंभु कुमार सिंह

पाखलो- भाग-६

चारि (4)
गोविन्द जाहि दिन नोकरी पर लागल, पाखलो ओहि दिन लौह – अयस्क केर खदान पर ट्रक ड्राइवर बनि गेल। ओकर काज देखि कए एक बरखक भीतरहि कम्पनी ओकर नोकरी पक्की क’ देलकैक। ओकरा 450 रूपैया दरमाहा भेटैत रहैक आ एकर अलावे ओवरटाइम सेहो। ओकर खेनाय-पीनाय कोनो एक्कहि होटलमे होइत छलैक आ ओ कतहुँ सुति जाइत छल।
पाखलो आ आलेक्स दुनू अपन पयरक तरेँ दूभिकेँ मसोड़ति लदानक गैरेज लग जा रहल छल। काल्हि आनल गेल लौह – अयस्क केर चूर्ण केर ढेर देखिकए ओ बहुत अचरजमे पड़ि गेल। ओ दुनू गैरेजमे चलि गेल। ट्रक स्टार्ट क’ कए दूभिक मेघकेँ पाछू छोड़ैत ओ लोकनि ट्रक तेजीसँ बढ़ौलक।
साँझुक काल पाखलो आ आलेक्स अपन-अपन ट्रक आनि गैरेजक लग लगा देलक। ओ काल्हुक अपेक्षा आइ एक खेप बेसी लगौने छल। आइ दुनू बहुत बेसी प्रसन्न देख’ मे आबि रहल छल। पाखलो अपना देह पर एक नजरि देलक। ओ धूरा सँ सानल बुझाइत छल। ओकर कपड़ा पूर्ण रूपसँ धूरामे सानल रहैक। माथक केश, मोछ आ सौंसे देह धूरा सँ सानल रहैक। ओ हाथ-पयर धोबाक लेल आलेक्सक संग नल दिस चलि देलक।
नल पर जमा भेल सभटा मजुरनी पाखलोक मजाक उड़ाब’ लागलैक। एकटा मजुरनी अपन एकटा छोट सन एना निकालि पाखलो केँ ओकर अपनहिं रूप देखबा लेल देलकैक। ओ एना लेलक, ओहिमे अपन अजीब रूप देखि ओकरा हँसी लागि गेलैक। ओकरा बुझेलैक जो ओ ललका मुँह बला बनरबा छैक।
पाखल्या, पेड़ाक बगल वला झीलमे जेना धूरा जमैत छैक तहिना तोरहुँ देह पर जमल छह। एकटा मजुरनी पाखलो केँ पयर सँ माथ धरि देखैत कहलकैक। अरे,ओ तँ धूरेक मिल पर नोकरी करैत अछि। एकटा दोसर मजुरनी ओकर मजाक केलकैक। ई सुनि सभटा मजुरनी हँसय लागलीह।
ओ धूरासँ भरल अछि एहिलेल अहाँसभ ओकरा पर हँसि रहल छी? आलेक्स मजुरनीसँ पूछलकैक। आब नहएलाक बाद ओकरा देखि लेबैक, ओ सेब सन लाल आ एकदम फिरंगी सन भ’ जाएत जकरा देखि कए कोनो बाप अपन बेटी ओकरा देबा लेल तैयार भ’ जेतैक।
आलेक्स, पाखलोक लेल अहाँ अपनहि जातिमे कोनो कन्या ताकि दियौक, पहिलमजुरनी कहलकैक।
…….से किएक? ओकरा तँ कोनो पाखलिने चाही। पाखल्या, अहाँ अपना लेल लिस्बन सँ एकटा पाखलिन ल’ कए आबि जाएब। एहि बात पर सभ केओ हँसय लागल मुदा पाखलो केर भौंह तनि गेलनि।
ओ.......हो...... ओकर मामाक बेटी छैक ने? बीचहिमे स्मरण आबि गेलासँ दोसर मजुरनी बाजल।
ओकर मामा सोनू परसूए शेलपें सँ गाम रहबा लेल आएल रहैक। ओकरा बेटीक एखनहि बियाह भ’ गेल छैक।
शी..... ई तँ पाखलो छैक ने?
पाखलो सँ एकर बियाह.....? शी.....पहिल मजुरनीक कहल सुनि कए सभ क्यो चुप भ’ गेल। पाखलो केँ बहुत खराप लागलैक आ ओकर भौंह तनि गेलैक।
देह धो-पोछि ओ लोकनि नीचाँ उतर’ लागल। उतरैत काल आलेक्स सीटी बजा रहल छल आ पाखलो चुपचाप चलि रहल छल। ओहि मौनक स्थितिमे ओकरा अपन मामा, सोनूक पछिला बात सभ स्मरण आबि गेलैक।
सोनूक बियाहक लेल पाखलोक माय, पाखलो केँ गोदीमे ल’ कए गेल छलैक। बियाहसँ ठीक दू दिन पहिने, सोनू अपन बियाहक खबरि अपन बहिनकेँ देने छलैक। ओ बियाहमे कोनो बिध-व्यवहार करबाक लेल तैयार नहि रहथि, मुदा सोनूक जिद्द केर कारणेँ ओकरा मानय पड़लैक।
सोनूक दुनियाँ केवल दू वरख धरि चलि सकलैक। ओकरा एकटा बेटी भेलैक मुदा तेसरहि बरख ओकर घरनी ओकरा सदाक लेल छोड़िकए चलि गेलीह।
पाखलो एकटा नमहर साँस छोड़लक। ढ़लानसँ नीचाँ उतरैत ओकर पयर लड़खड़ा गेलैक।
आलेक्स आ पाखलो नदीक कछेर वला होटल पहुँचि गेल। नित दिन जकाँ ओ सभ होटलक भीतर जयबाक लेल ओ सभ अपन-अपन माथ नीचाँ झुकौलक। पाखलो चाह पीबि लेलक मुदा ओकरा दिमागसँ एखन धरि ओहि बातक निसाँ नहि उतरल छलैक। जमा भेल मित्र सभसँ आलेक्स गप्प करए लागल।
पाखलो होटलसँ बाहर निकलल आ खेत दिस खुलल पेड़ा बाटे चलय लागल। ओ बहुत दुखी अछि, एहन ओकरा चेहरासँ बुझाइत छलैक। मजुरनी सभ द्वारा कएल गेल गप्पक नह ओकर करेज फारने जा रहल छलैक।
शी..... ई तँ पाखलो छैक ने? मामाक बेटीक बियाह पाखलोक संग?.....
मंगुष्ठी (एक प्रकारक जंगली फल जे लोक खाइत अछि) झरनाक पानिक आवाज आबि रहल छलैक। कपड़ा-लत्ता धोबा आ पानि भरबाक लेल आबए बाली कन्या आ स्त्रीगण सभक आवाज नहि छलैक। आइ पाखलो कने देरीसँ आएल रहय। ओ किछु अन्यमनस्क सन लागैत छल। ओ झरनासँ गाम दिस जाएबला लोकपेड़िया दिस देखलक। ओहि लोकपेड़ियाक बाटेँ अन्हरिया गाममे पयर रखने छल।
ओ अपन देह परसँ कपड़ा उतारलक आ मंगुष्ठक गाछक जड़िमे राखि देलक। ओ झरनाक कछेरमे बैसि गेल। बहैत पानिमे ओ अपन पयर खुलल छोड़ि देलक। ओकरा जाड़ लागलैक। ओ जाड़ ओकरा नसमे समा गेलैक। ओ अपन आँखिक पिपनी बन्न क’ लेलक। दूपहरमे धूरा पर चलैत जे पयर छक-छक पाकैत रहैक ओहि पयरकेँ एखन जाड़ लागि रहल छलैक। ई सोचि पाखलो एकटा नमहर साँस छोड़लक आ आँखि बन्न क’ लेलक। ओ प्रायः आबिकए पहिने अपन पयर ठंढा पानिमे डुबबैत रहय। जखन सभटा कन्या आ स्त्रीगण लोकनि पानि भरि कए चलि जाइक तखनहि ओ नहबैत छल आ अपन कपड़ा-लत्ता धोबैत छल।
ओ पानिमे डुबकी लगौलक। छपाक केर आवाज भेलैक एहिलेल ओ अपन मूड़ी उठौलक तँ देखलक जे शामा हँसि रहल छलीह। ओहो हँसल। शामा झरनाक उपरका धार पर अपन घैल भरए लगलीह। आइ पानि भरबामे देरी किएक भेल?पूछि लेबैनि, पाखलो सोचलक। मुदा ओ चुप रहल। शामा घैल अपना डाँर पर राखलक आ छोटकी घैल अपना हाथमे राखि चलि देलीह। नजरिसँ दूर होइत धरि ओ ओकरा देखतहि रहि गेल।
ओ होशमे आएल। कि शामा पानिमे पाथर फेकने छलीह? ओ सोच’ लागल, हँ – ओकर मोन कहैत छलैक। ओ आएल छथि आ हमरा बुझएबाक लेल ओ पाथर फेकने छलीह – ओकर दोसर मोन कहैक – नहि, ओ पाथर मार’ एहन काज नहि क’ सकैत अछि। भ’ सकैछ उपरका मंगुष्ठ नीचाँ गिरल होइक। ओ ई सोचतहिं छल ताधरि एकटा मंगुष्ठ पानिमे गिरलैक। खाइत काल ओकरा स्मरण भेलैक। एहि घटनाक बहुतो बरख भ’ गेल रहैक। जंगलमे काजू आ काण्ण खाइत-खाइत गोविन्द आ ओ एहि झरना पर आएल छल। मंगुष्ठी झरनाक मंगुष्ठ बहुत पाकि गेल छलैक। पाखलो आ गोविन्द ओहि मंगुष्ठ पर पाथर मारए लागल। ओहि समय शामा झरना पर आबि रहल छलीह, ई गोविन्द देखलक आ देखतहिं अपना हाथसँ पाथर फेकि देलक आ पाखलो सँ कहलकैक – पाखल्या, हाथसँ पाथर फेकि दियौक, विन्या मामाक शामा आबि रहल छथि।
किएक? पाखलो पुछलकैक।
अरे, मंगुष्ठी झरनाक जगह ओकरे छैक ने, हमसभ जे मंगुष्ठ झटाहि रहल छी ई बात जँ ओकरा बाबूकेँ पता लागि गेलनि तँ से नीक गप्प नहि थिक। ओ गारिओ देताह आ मारबो करताह। गोविन्दक कहलाक पश्चातो पाखलो अपना हाथसँ पाथर नहि फेकलक। ओ लगातार झटाहतहिं रहल। गोविन्दक रोकलाक पश्चातहिं ओ रूकल। शामा ओतए आबि गेलीह। ओ लाल रंगक पाकल मंगुष्ठकेँ देखलक। ओकरा मंगुष्ठ खएबाक मोन भेलैक। ओहो पाथर मारि-मारि मंगुष्ठ झखारए लागलीह। ओकर दू-तीन पाथरसँ एकटा पातो नहि गिरलैक। पाखलो आ गोविन्द दुनू हँसए लागल। ओ लजा गेलीह। ओकरहिं आनल पाथरसँ पाखलो मंगुष्ठ झटाह’ लागल। जल्दीए ओ पाथर ओतहि फेकि मंगुष्ठक गाछ पर चढि गेल। मंगुष्ठक गाछक डारिकेँ हिलाब’ लागल। मंगुष्ठ सभ ढब-ढब कए गिरए लागलैक। छिट्टा आनबाक लेल शामा घर चलि गेलीह। मुदा आपस अबैत काल ओकरा संगहि ओकर बाबूजी सेहो आबि गेलाह। धरती पर पसरल मंगुष्ठ देखि कए ओ पाखलो केँ ओकरा माए लगा कए गारि देलकैक। तकरा बादसँ जखन कहियो शामा ओकरा बाटमे भेटैक ओ अपन माथ झुकाकए चलि जाइत छलीह।
जाहि दिनसँ पाखलो ड्राइवर भेल छल ताहि दिनसँ ओ मंगुष्ठी झरना पर नहएबाक लेल अबैत छल। पाखलो केँ देखि शामा कहिओ-कहिओ हँसैत छलीह। एकदिन तँ ओ कनखी मारि कए गोविन्दक हाल-समाचार पूछने छलीह। ताहि दिन तँ ओ प्रायः पाखलो केँ देखि कए हँसैत छलीह आ पाखलोक मोनमे ओकरा प्रति नब अंकुर अबैत छलैक।
पाखलो सँ ई खबरि सुनि, गोविन्द पाखलोक खूब मजाक उड़ौलक।
पाखल्या, हुनकर स्वभाव बहुत नीक छनि। ओ कने कारी अवश्य छथि मुदा देख’मे नीक छथि। अहाँक जोड़ी खूब जँचत। ई बात पाखलोक मोनमे घूमैत रहैक आ ओ नहबैत काल अपना-आपहिंमे उफानक महसूस करैत छल।
दोसर दिन रबि रहैक। पाखलो घूमबाक लाथे बाहर निकलल। बाट चलैत-चलैत ओ मंगुष्ठ झरना लग पहुँचि गेल। झरनाक शीतल पानिसँ ओ एक आँजुर पानि पीबि लेलक आ लगीचक आमक गाछ दिस चलि देलक। ओहि आमक गाछक एकटा नमहर जड़ि धरतीक उपर आबि गेल रहैक। नेना सभ जकाँ ओ अपन केहुँनी उपर उठौने धरती पर परल रहय। पाखलो एकटा जड़ि पर बैसि गेल आ प्रकृतिक सौंदर्य देख’ लागल।
आइ चैत मासक पूर्णिमा छलैक। गामस लोक सभ सांतेरी मंदिर लग बसंत पूजा करए बला रहैक मुदा ताहिसँ पहिने प्रकृति फूल आ फल सभक लटकनि लगा कए बसंत ऋतुक स्वागत क’ चुकल छलैक। आमक गाछक अजोह आम सभ गोटपंगरा पाकए लागल छलैक। काजूक गाछ पर लाल आ पीयर काजू लागल रहैक। हरियर अजोह काजू सभ पाकबाक बाट जोहि रहल छल आ एखन धरि डारि पर कोंढ़ी सभ डोलि रहल छलैक।
शनैः – शनैः बसात सिहकए लागलैक। पाखलो केँ लागलैक – आब ई प्राणदायी बसात प्रकृतिकेँ नब जान द’ देतैक। गाछ – बिरीछकेँ पागल बना देतैक। बसातक सिहकबक संगहि पाखलोक मोनमे विचारक लहरि हिलकोर मार’ लागलैक। ई बसात पच्छिम दिसक पहाडकेँ पार करैत, खेतक बीचोबीच धरतीकें चीरैत नदीकेँ पार करैत पूबरिया पहाड़ दिस उझलैत बिना रूकनहि आगू बढि जाएत। ओ कतए सँ आएल हेतैक? कोन ठामसँ आएल हेतैक ई बतएबाक कोनो उमेद नहि अछि। ओ सभ ठाम भ्रमण करएबला प्रवासी अछि।
बसातकेँ अबितहिं धरती ओहि बसातमे रंग उछालि ओकर स्वागत केलक। बसात धरतीक माथक चुंबन लेलकैक। गाछकेँ गर लगेलकैक। लत्तीसभकेँ बाँहिसँ पकड़ि कान्ह पर राखलकैक आ फेर नीचाँ राखि देलकैक। फूल, फल आ पात सभक चुंबन लेलकैक। आ पूरा बगैचामे सभकेँ हाथसँ इशारा करैत ओ आपस चलि गेल।
पाखलहुँ के बुझाब’ लागलैक जे – बसाते जकाँ ओहो एहि इलाकामे घूमि-फिरि रहल अछि। ओ जन्महि कालसँ एहि इलाकामे रहैत छल। मुदा हम बसात जकाँ आबि कए चलि नहि जाइत छी अपितु एतुका निवासी भ’ गेल छी। एहि आम गाछक सदृश हमरहुँ जड़ि बहुत भीतर धरि चलि गेल अछि। एहि माटिक बल पर हम पैघ भेलहुँ फरलहुँ-फुललहुँ। एहि माटिक संस्कारमे पललहुँ-बढ़लहुँ अछि हम।
साँझ खतम भ’ कए गदहकाल भ’ रहल छलैक। मंगुष्ठी झरना पर पानि भरि कए कन्या आ स्त्रीगण लोकनि घर जा रहल छलीह। पाखलोक ध्यान ओमहर नहि छलैक, अपितु आइ शामा पानि भरबाक लेल नहि आएल रहैक एहि लेल ओकर प्राण फँसल जा रहल छैक, ओकरा एहने लागलैक। हड्डी आ मांसुसँ पैघ भेल पाखलो केँ एकटा कुमारि कन्यासँ सिनेह भ’ गेल छलनि आ ओ ओकरासँ बियाह करबाक लेल सोचि रहल छल। जकरा एक नजरि देखियहिकेँ ओकरा नस-नसमे उमंग आबि जाइत छलैक वैह शामा आइ झरना पर नहि आयल छलीह तैँ ओ अपनाकेँ मंद महसूस करैत छल।
गदहकाल खतम हेबा पर रहैक आ अन्हार अपन पयर पसारि रहल छल। सांतेरी मंदिर लग पाखलोकेँ पेट्रोमैक्सक जगमग करैत इजोत देखा पड़लैक। ओकरा आइ होमएबला बसंत पूजाक स्मरण आबि गेलैक। बसंत पूजा दिन सांतेरी माएक पालकी बड़ धूमधामसँ बाहर निकलैत अछि। ओ प्रकृतिमे आएल बसंत ऋतुसँ भेंट करैत अछि। ओहि राति ओ मंदिर आपिस नहि जाइत छथि अपितु बाहरहिं प्रकृतिक संग रहैत छथि। बसंत ऋतुक दिन गाम भरिक लोक भरि राति उत्सब मनबैत अछि। पूजाक लेल तँ शामा अवश्ये अओतीह, तखनहिं हम हुनकासँ भेंट क’ लेब। पाखलो सोचलक।
शामासँ भेंट करबाक बहन्ने ओकरा पूरा देहमे जोश आबि गेलैक आर गामक दिस जयबाक लेल ओ तीव्र गतिएँ चलए लागल।
मंगुष्ठी झरना पर सभ दिन जकाँ पाखलो आइयो अपन कपड़ा धोबैत छल। रबि लगाकए आइ तीन दिन भ’ गेल रहैक। गोविन्द रबिकेँ किएक नहि अएलाह? ओ यैह सोचि रहल छल। ततबहिमे दूरसँ – ”पाखल्या, यौ पाखल्या” गोविन्दकेँ एहन आवाज सुनबामे अएलनि। ओ पाछू घूमिकए देखलक। गोविन्दकेँ देखतहि पाखलो तुरन्त उठल आ ओकरा दिस दौड़िकए चलि गेल। दुनू एक दोसराक हाथ पकड़ि लेलक। गोविन्दक कनहा अपना हाथसँ हिलबैत पाखलो पुछलकैक –
अहाँ रबि दिन किएक नहि एलहुँ?
की कही, हमरा ऑफिसक मित्र लोकनि हमरा पिकनिक पर ल’ कए चलि गेल छलाह। हम जाएवला नहि रही, मुदा की करितहुँ ओ सभ हमरा जबरदस्ती ल’गेलाह। हमर मोन करैत रहय जे अहाँसँ आबि भेंट करी। गोविन्द अपन मोन खोलि देलथि।
जाय दिअ, एखनहिं मिललहुँ यैह की कम अछि?
दुनू हँसय लगलाह।
“चलू पहिने अहाँ नहा लिअ”
गोविन्दक कहला पर पाखलो झरनामे नहाबए लगलाह। गोविन्दकेँ उत्सुकता रहनि। ओ अपना हाथहिं सँ पानि निकालि पाखलोक देह पर छिट्टा मारए लगलाह, पाखलो सेहो हुनका पर पानि फेकलकनि। ओहि काल गोविन्दक कपड़ा नीक जकाँ भीजि गेलनि। पाखलो केँ कने खराप लागलनि। ओ गोविन्दसँ माफी माँगलनि। गोविन्द एकरा सभकेँ मजाकमे उड़ा देलथि।
पाखलो नहाकए अपन देह पोछलक। अपन कपड़ा सुखबाक लेल लारि देलकैक। बादमे दुनू गोटे आमक जड़ि पर आबि बैसि गेल। पाखलो गोविन्दक आँखिमे देखलक। गोविन्द किछु कहए चाहैत छलाह, ई हुनका आँखिसँ पाखलोकेँ पता लागि गेलैक।
कोनो नब समाचार? पाखलो पुछलकैक।
कोन समाचार?
हमरा लेल एकटा संबंध आएल अछि।
अहाँक लेल संबंध? कतएसँ? केकर? पाखलो एकसँ एक प्रश्न कएलनि।
ई सभ हम अहाँकेँ बादमे कहब। मुदा पहिने बताउ – शामा आइ आयल छलीह पानि भरबा लेल?
हँ – नहिं......,एखन धरि तँ नहि। पाखलो सोचिकए जवाब देलक।
नहि ने? तखन तँ हमर अनुमान ठीके भेल। हम अहाँकेँ आर नहि उलझाएब। हमरा लेल विन्या आपा (दादा) क दिससँ शामाक लेल संबंध आएल अछि। हम ओकरा साफ मना क’ देलियैक।
पाखलोकेँ बतएबाक लेल आनल गेल रहस्य गोविन्द खोलि देलक।
मुदा संबंधक लेल नहि किएक कहलहुँ? पाखलो फेर प्रश्न केलक।
एकर जवाब तँ बड्ड सरल छैक यौ। गोविन्द बाजल।
शामाक जोड़ीक लेल अहाँक प्रयोजन अछि हमर नहि। अहाँकेँ स्मरण अछि, हम एकबेर अहाँकेँ कहने रही – “शामा आ अहाँक जोड़ी केहन रहत?” किछु कालक लेल दुनू गोटे चुप भ’ गेलाह।
बादमे गोविन्द बाजए लगलाह।
हम दुपहरकेँ घर गेल रही। खएबाक बाद माए हमरा एहि संबंधक बारेमे बतौलनि। हम साफ मना क’ देलियनि, मुदा किएक? से नहि बतौलियनि।
नहि गोविन्द, एहि संबंधकेँ नकारि अहाँ नीक नहि केलहुँ। अहाँ हमरा लेल त्याग क’ रहल छी। ई हमरा नीक नहि लागि रहल अछि। पाखलो कहलक।
एहन नहि छैक पाखलो, अहाँ बुझैत नहि छी। अहाँकेँ क्यो नहि अछि। शामा अहाँकेँ पसिन्न अछि। ओ अहाँकेँ भेटि जेतीह तँ हमरा खुशी होएत।
मुदा हमरा संग.....
पाखलो किछु कह’ वला रहथि।
ओ सभ बादमे देखल जेतैक। ई कहि गोविन्द चुप भ’ गेल। पाखलोक मोन विचलित भ’ गेलैक। मुदाक शामाक सभ स्मरण एखनहुँ महकैत रहैक। शामाक द्वारा गोविन्दक लेल कएल गेल पूछताछ.....ओकर नमगर केशराशि.....फूल-सन ओकर हँसी.....सभटा।
ओकरा दुनूकेँ देखि शामा झरनासँ बिना पानि भरनहिं आपस चलि जाइत छलीह। तकर बाद ओ शामासँ भेंट केलक आ “हमरासँ बियाह करब?” पूछलकैक।
शामा ओकरा “हँ” कहतैक ओकरासँ यैह अपेक्षा छलैक पाखलोकेँ, मुदा ओ – नहि अहाँ पाखलो थिकहुँ, ई जवाब देलथि। पाखलो शामाकेँ किछु कहबाक लेल मुँह खोलनहि छलीह कि ओ चलि गेलीह। पाखलोक मोन तँ बुझु जे नागफनी सँ भरल रेगिस्तानक सदृश भ’ गेलैक।



क्रमशः

श्री तुकाराम रामा शेट (जन्म 1952) कोंकणी भाषामे ‘एक जुवो जिएता’—नाटक, ‘पर्यावरण गीतम’, ‘धर्तोरेचो स्पर्श’—लघु कथा, ‘मनमळब’—काव्य संग्रह केर रचनाक संगहि कैकटा पुस्तकक अनुवाद, संपादन आ प्रकाशनक काज कए प्रतिष्ठित साहित्यकारक रूपमे ख्याति अर्जित कएने छथि। प्रस्तुत कोंकणी उपन्यास—‘पाखलो’ पर हिनका वर्ष 1978 मे ‘गोवा कला अकादमी साहित्यिक पुरस्कार’ भेटि चुकल छनि।

डॉ शंभु कुमार सिंह
जन्म: 18 अप्रील 1965 सहरसा जिलाक महिषी प्रखंडक लहुआर गाममे। आरंभिक शिक्षा,गामहिसँ, आइ.ए., बी.ए. (मैथिली सम्मान) एम.ए. मैथिली (स्वर्णपदक प्राप्त) तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। BET [बिहार पात्रता परीक्षा (NET क समतुल्य) व्याख्याता हेतु उत्तीर्ण, 1995] “मैथिली नाटकक सामाजिक विवर्त्तन” विषय पर पी-एच.डी. वर्ष2008, तिलका माँ. भा.विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार सँ। मैथिलीक कतोक प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिका सभमे कविता, कथा, निबंध आदि समय-समय पर प्रकाशित। वर्तमानमे शैक्षिक सलाहकार (मैथिली) राष्ट्रीय अनुवाद मिशन, केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर-6 मे कार्यरत।
सेबी फर्नांडीस

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'विदेह' २२५ म अंक ०१ मई २०१७ (वर्ष १० मास ११३ अंक २२५)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. १. राजदेव मण्‍डल -  दूटा बीहैन क था २. रबीन्‍द्र नारायण मिश...