Wednesday, October 28, 2009

शब्द विचार- 5

बाभन जाति अन्हारिया राति,
एक खिल्ली पान लय दौड़त जाथि। कोनहु लोभी ब्राह्मणक हेतु एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
बाभान पेटे, गुआर बकोटे,
राजा दीठी जोगी पीठी। ब्राह्मणक पेट, यादवक बाकुट वा मारि, राजाक दृष्टि एवं जोगीक परोक्षा कृपा ई सबटा प्रसिद्ध अछि।
बाभन पोथी छत्री तीर,
नेनहि सिख चरबाहि अहीर। बाल्य कालहिमे सीखैत छथि-ब्रह्मण पोथी पढ़ब, क्षत्रिय हथियार चलायब एवं मालजाल चरयब यादव सीखि लैत छथि।
बाभन नाचय कोइर देखय। पैघ लोकक धीया-पुता जखन मंच पर खुलेआम नृत्या, संगीत एवं अभिनय प्रस्तु़त करैत छथि तँ पुरानपंथी लोक द्वारा एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
ब्राह्मण केँ रक्षाबन्ध।न, क्षत्रियकेँ दशहारा, वैश्यपकेँ दियाबाती आ शूद्रकेँ होरी। मीथिला प्रान्ते् रक्षाबन्धयन दिन ब्राह्मण जनिका लोकनिकेँ राखी बान्हि आशीर्वाद दैत छथिन सेसब किछुकय टाका दैत छथिन जाहिकारण पर्याप्तद आमद भय जाइत छनि।
बाभन बेटा लोटे-पोटे,
सुदि मूर दूनू सरपोटे। ब्राह्मणक धीया पुताकेँ जँ कर्ज देब तँ ओ बुड़ले बुझबाक चाही।
बाभन वचन परमान। पण्डितजी जे कहथि सैह सत्य मानी।
बान्हतसँ खत्ता ऊँच। मूलसँ सहायक जँ प्रबल भय उठय तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाछ।
बान्हकल भेली भेली फुटने चूर। गुड़क भेली (चेप) केँ जखने फोड़ब तँ ओ भहरि जायत।
बारह बरख पर दतमनि कयलनि,
कोबरहिमे नहइली। अपरोजकि नारिपर व्यंयग्य करबाक हेतु एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
बारह हरक जोतनियाँकेँ एकटा डाँइडोरि नहि। पैघ व्यकक्तिकेँ जखन कोनो समान्यु वस्तु क अभाय जाइत छनि तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
बालुक भीत ओछाहक प्रीति। ओछाह व्यतक्तिक संग मित्रता आ बालुक देवाल स्थाओयी नहि होइत छैक।
बाँसक जडि़मे बाँसे जनमैत छैक। जकर गाछ तकरे बह निकलैत छैक।
बास नहि पाबी उपाति लय मारि। जाहिठाम थोड़बो सम्भिव नहि ताहिठाम जँ अधिकक केओ आस लगौने रहैछ तँ एहि लोकोक्तिक प्रयोग द्वारा व्यंहग्यह जाइछ।
बाँससँ कड़चीए मोट। मूलसँ सहयोगी जँ बलगर निकलि जाय तँ एकर प्रयोग होइछ।
बासि ने बाँचय ने कूकुर खाय। सब किछु समाप्तन भय गेलाक बाद एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
बास शहरक खेती नहिराक नीक। अर्थ स्प ष्ट अछि।
बाहरक खाइ घरक गाबी। भोजन कतहुसँ चलय, भुदा अपनाकेँ नहि बिसरी।
बाहरक फिट-फाट देख रे नौआ,
भितरी एहल हगैछनि कौआ। कोनो आडम्बरी व्य क्तिक लेल प्रयोग होइछ।
बाहरक लोक भोजन करथु,
घरक गाबओ गीत। नजदीकी दिआद-बादक जखन उपेक्षा होइत छैक तँ वैह उपेक्षित लोक एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथि।
बाहर नामी नामी धोती,
घरमे मसुरीक रोटी। मिथ्यास आडम्ब र पर व्यंयग्य ।
बाहर बाबू भरल घमण्डब,
घरमे मुसरी घीचय दण्ड । एकरहु भावना पूर्ववत् अछि।
बाहरमे उजरा धोती,
घरमे मड़ुआक रोटी। भावना पूर्ववते अछि।
बासक आगाँ चास की ? घराड़ीक मूल्य जोतसिम सँ अधिक होइत छैक।
बिअइली से पझइली,
अदनौरक बेथे मरली। गुप्तांबग रोगक व्यसथासँ आहत बाँझ महिलाक प्रति।
बिआहसँ विधि भारी। कोनहु साधारण कार्यमे जखन अधिक झंझट भय जाइत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
बिआही बोहु पपियाही,
सगही बोहु सिपाही। केओ जखन दोसर विवाह कय ओहिमें अधिक आसक्तस भय जाइत अछि तँ पहिल स्त्रीस वा ओकर पक्षधारी एहि उक्तिक प्रयोग करैछ।
बितपनि जानिकय लेलहुँ बजाय,
अइपनक चाउर लेलनि चोराय। कोनो नीक लोक जखन अधलाह कर्म करैछ।
बिना नाथ के कूदय गदहा,
आगाँ नाथ ने पाछाँ पगहा। जे बिना स्त्रीछ बाल-बच्चािक रहैत ऐश-मौज करैत रहैत अछि तकरा पर व्यंाग्यच करबाक हेतु एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
बिआहलके एक बोहु बिना बिआहल के सय बोहु। जाधरि विवाह नहि भेल छैक ता अनेक कथा अबैत रहैत छैक, किन्तुा विवाहक बाद एकटामे फँसिकय रहि जाय पड़ैत छैक।
बिना बापक बेटा की, बिना अमिलायल भाँटा की ? प्राज्ञोक्ति।
बिना कनने माइयो दूध नहि पियबैत छैक। अधिकार प्राप्तो करबाक हेतु सत्यायग्रह करहि पड़ैत छैक।
बिना नायक के लस्कछर। सेना बिना सेनापतिक व्यकर्थ।
बिना खयने भूख आ बिना देखने आँखि। बिना खयने भूख नहि मेटाइत छैक, तहिना बिना देखने जाँखि नहि जुड़ाइत छैक।
बिना चरे चोरि नहि। चोरिसँ पूर्व गुप्तहचरी होइत छैक।
बिना नाकबलाक देशमे नाकबला नक्कून। जाहिठाम जाहि वस्तु क अभाव रहैत छैक तकर निन्दाह प्रसंगवश कयल जाइत अछि।
बिना बजौने कनियाँक पर गेलहुँ,
कनियाँक माय पुछलनि कतय अयलहुँ? बिना बजौने कतहु गेलापर अपमानक आशंका रहैत छैक।
बिना मरीचक भांग। भांग पीसैत काल मरीचक जोग परम आवश्यपक होइत छैक अन्य था ओ कुस्वारदु भय जाइत अछि।
बिना मेह दाउन आ बिना लगामक घोड़ा। बिना लगामक घोड़ी। बिना मेहक दाउन। अनुशासहीन नर नारीक लेल एहि उक्ति सभक प्रयोग कयल जाइत अछि।
बिनु घरनी घर भूतक डेरा। कहल गेल अछि घरनीए घर हरबाहे हर।
बिनु भय होइ न प्रीति। बिना कथूक डरसँ केओ ककरहु कार्य नहि करैत अछि।
बिप्र टहलुआ चीक धन ओ बेटीके बाढि़; ताहुसँ धन नहि घटयतँ करी बड़कासँ राडि़। जँ ब्राह्मण केँ टहलूमे राखब, बकरी-छकरी पोसब एवं जँ अधिक बेटी जनमा लेब तँ दरिद्र हेबे करब।
बिलाडि़क भागे टूटल सीक। अत्यडन्तट अनुकूल परिस्थिति निर्माण भय गेलापर लोक एहि लोकोक्तिक प्रयोग करैत अछि।
बिलाडि़ क गर्दनिमे घण्टीय के बान्हमत? कोनो खतरनाक साहस करबाक हेतु प्रेरित करबाक लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
बिलाडि़ एहि घरसँ ओहि घर जाइत अछि तँ सुस्तार लैत अछि। जे डेगहि डेगपर सुस्तााइत रहैत अछि ताहि आलसी नर-नारी पर व्यंतग्य करबाक हेतु एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
बिनु सरदारे सेना नास। सेनापतिक अभावमे सेनाक टुकड़ी भहरि जाइत अछि।
बिसरि गेल राग रंग बिसरि गेल छकरी, तीन चीज मोन रहल नोन तेल लकड़ी। व्य़क्ति जखन जीवनक वसन्तोकेँ देखि घरक मायाजालमे फँसि जाइत अछि तँ सब ऐश मौज बिसरि केवल घरक आर्थिक चिन्ता मे फँसि जाय पड़ैत छैक।
बिसुखल गायकेँ खरिदेल सानी। जकरासँ कोनो लाभ नहि रहैत छैक तकर उपेक्षा भय जाइत छैक।
बीत खिया जाय मुदा पैघ नहि खिआय। घटलहुपर पैघ लोकक रहन-सहन नीके रहैत छैक।
बी‍यरि छोड़लनि मूस आ बास लेलनि साँप। मूसक शिकरमे बिषघर ओकर बीयरिमे डेरा खसा दैत अछि।
बीसी तीसी मकर पचीसी। जाड़ बीस दिन अगहन, सम्पूार्ण मास पूस पचीस दिन माघ कुल पचहत्तरि दिन रहैत अछि।
बुच्चीि गय बुच्चीि, उक्खडि़ चढि़ उच्चीत। कोनो अति चंचला बालिका लेल प्रयुक्त ।
बुझलनि साढ़ेबाइस। अकान लोकक लेल प्रयोग।
बुडि़बक कनियाँके नौ आना खाँइछ। वा
नौ टाका खोँइछ। जे कोनो जोगरक नहि से जेँ अधिक मजूरी माँगय।
बुडि़बक कनियाँके भैंसुर लोकनियाँ। भावना पूर्ववत अछि।
बुडि़बकके धन दी मुदा अकिल नहि दी। प्राज्ञोक्ति।
बुडि़बक बकरी हुराड़सँ ठट्ठा वा
बुढि़या बकरी हुराड़सँ ठट्ठा। दुर्बल ओ अकान व्यडक्ति जखन पैघ ओ बलवानसँ अररि ठानि लैत अछि तँ एहि उक्ति द्वारा डाँटल जाइत छैक।
बुडि़बक बकरी के फुलबाड़ी चरबाक बड़ सौख।
बुडि़बक बक्खो के सरायमे डेरा। निम्नब व्यसक्ति जखन नीक जगह दफानिकय बैसि जाइछ।
बुडि़बक धनाइके रहिका बास,
कोठीमे धान-चाउर घरमे उपास। कोनो कंजूस व्याक्तिक लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
बुडि़बक बरके अन्हायर घर कनखी।
बुडि़बक बरके कुरथीक अक्षत। किछु असंगत कार्य कयलापर कोनो मूर्ख व्युक्तिक उपहास उक्तम लोकोक्ति द्वारा कयल जाइछ।
बुडि़बक बरके साँझे बिछौना।
बुडि़बक मीयाँ तीन टुइयाँ। तुच्छब व्य क्ति जखन अधिक सम्माान पयबाक प्रयत्न मे लागल रहैत अछि तँ उक्तक लोकोक्तिक प्रयोग होइछ।
बुडि़बक बारिक नोन परसय।
बुडि़बक वक्ता धन्ययवाद ज्ञापन करथि। सोझमतिया नि:स्वानर्थ व्यजक्ति पर व्यंयग्यी।
बुड़लो दडि़भंगा तँ हजार घोड़ा। झखरल पैघ लोकक प्रशंसामे प्रयोग।
बुडि़बक बरके बथनाहा बिआह। ककरहु मूर्खतापर व्यंहग्या।
बुडि़बक मुइला बिरानवे फिकिर। अनका लेल हरान रहनिहार पर व्यंंग्य।।
बुडि़बक बकरी मीयाँ बकरी खायमे राकस। ककरहु मूर्खता पर व्यंरग्यस।
बुडि़बक बकरी के फुलबारी चरबाक सौख। वा बुढि़या बकरी। जे निर्धन निर्बल नीक निकुल खयबाक लेल बेहाल रहैत अछि तकरा पर व्यंिग्य ।
बुडि़बकहाक खेती अगिला साल। मूर्ख एवं आलसी व्यिक्ति सब कार्यकेँ आगाँक हेतु टारैत रहैत अछि।
बुडि़बकहाक बोहु सभक भौजाइ। सामान्यह व्यौक्ति ककरो मूर्ख बनबय चाहैत छैक तँ ओ अस्वीुकृतिमे एकर प्रयोग द्वारा प्रश्न करैछ।
बुडि़बकहाक धन कबिलाहाक चटनी। ककरहु मूर्खताक लाभ उठा जख केओ ओकर धन हड़पि लैत छैक वा चटनी जकाँ स्वाधदिकय खाइत रहैत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
बुडि़बक विद्मार्थीके गत्ता मोट। सामान्य व्यगक्ति जखन अधिक आडम्बर करैत अछि।
बुडि़बकहा के धन होइत छैक तँ कबिलाहा कतहु पड़य? ककरहु मूर्खतासँ केओ जखन आर्थिक लाभ उठा लैत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइत अछि।
बुढ़बे भतार पर तीन टिकुली। कोनहु नारीक मिथ्या पसाहनि पर व्यंकग्यत।
बुढ़बे बहय कि पुरबे बहय। बूढ़ व्यहक्ति, पुरान बड़द एवं पुरिबा हवा अधिक बहैत अछि।
बुढि़या डेराबय थूकसँ। निर्बल व्यरक्तिक उपहास एहि उक्तिसँ कयल जाइछ।
बुढि़या मरय मरमसँ, धी पुतोहु उपहास। नवकीक चालि बुढि़याकेँ आ बुढि़याक चालि नव नौतारिकेँ नीक नहि लगैत छैक।
बुढि़या सराहय धीखिचड़ी। निर्धन व्याक्तिक मनोरथक उपहास।
बुधियार लोक भूखे मरय? कतोक लोक बुद्धिक बल पर गुजर करैत अछि।
बुन्देो बुन्दे तालाब। एक-एक पैसा जमा कय पैघ पूजी कयल जा सकैत अछि।
बूड़त बन्सि कबीरके, जनमल पूत कमाल। कमाल सन पुत्र जनमिकय कबीरदासक वंश केँ बुड़ा देलकनि।
बूडि़ केँ कोनो कि सिंह-नाङडि होइत छैक? ककरो मूर्ख बनयबाक हेतु प्रयोग।
बूझाब ने सूझब मूसर लयकय जूझब। मूर्ख मोचण्डबक लेल प्रयोग।
बूढ़ घोड़ा लाल लगाम। वृद्ध व्याक्ति जखन लहक चहक वस्त्र धारण कय लैत छथि तँ लोक एहि उक्तिक प्रयोग करैछ।
बूढ़ भेलहुँ नाक लगले। कोनो वृद्ध अपन अपमान भेलापर एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथि।
बूढ़ डेराबय मरबे, राँड़ डेराबय उढ़रबे। बूढ़ लोक जखन खिसिया जाइत अछि तँ मरबाक भय देखबय लगैत अछि।
बूढ़मे एहन तँ जुआनीमे केहन? कोनहु वृद्धाक दुर्जनता पर व्यंँग्यउ।
बूढ़ सूगा पोस मानय? नेनहिसँ नीक रास्ताज पकड़यबाक चाही, अन्यिथा बादमे हाथसँ निकलि जयबाक सम्भासवना रहैत छैक।
बूढि़ गाय केर लटकन। बूढ़ारीमे श्रृंगार पर व्यं।ग्यि।
बूढि़ बकरी हुराडसँ ठट्ठा। दुर्बल व्य क्ति जखन सबलसँ भिड़बाक प्रयत्नव करैत अछि तँ एहि उक्ति द्वारा डाँटल जाइत छैक।
बेगर्ते आन्ह र। अपन आवश्यनकताक समक्ष दोसर दिस ध्याआन नहि देनिहार पर व्यंकग्यध।
बेकारसँ बेगार भला। नीक नौकरीक अभावमे साधारणसँ कार्य चलाओल जाइत अछि।
बेङ खसलाह खत्तामे तँ कहलनि मान सरोवर यैह थिकैक। तुच्छ व्य क्ति जखन सामान्येग दृश्ययक बढि़ वर्णन करैत डींग हँकैत अछि तँ एहि उक्ति द्वारा ओकरा पर व्यंअग्यउ जाइत छैक।
बेटबो मिट्ठ भतारो मिट्ठ किरिया ककर खाड? उभय पक्ष जखन अपने रहैत छैक वा जे व्य क्ति दूनू पानि मारबाक चेष्टा करैत अछि तकरा लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
बेटा भेल लोकि लेल,
बेटी भेल फेकि देल। जे बेटीक उपेक्षा तथा बेटाक मान सम्‍मान करैत छथि तनिका लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
बेटाक पते नहि डाँरडोरि लय मारि। समयसँ पूर्वहि जे व्यरग्रता देखबैत छथि तनिका लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
बेटा बुलन्ताि भला घोड़ा कुदन्ताछ भला। जे घोड़ा जतेक छड़पैत अछि ततेक नीक मानल जाइछ।
बेटा आ लोटा बाहरे चमकैत छैक। प्राज्ञोक्ति । अर्थ स्परष्टन।
बेटा-बेटी ककरो, घीढारी करथु मंगरो। ककरहु बेटाक दुलार-मलार जखन कोनो आन नारी करय लगैत छथि तथा जे मायकेँ अप्रिय लागि जाइत छनि, तँ ओ उक्ते लोकोक्तिक प्रयोग करैत छथि।
बेटी आयल गेल सिङार।
सौतिनि आयल बढ़ल सिङार। बेटी-जमाय भय गेला सँ श्रृंगार करैत संकोच होमय लगैत छैक, किन्तुर सौतिनि आबि गेलापर ईर्ष्याकवश पुन: पसाहनि प्रारम्भप लगैछ।
बेटी चमारके नाम रजरनियाँ। गरीबक धीयापुताक नीक नाम पैघ लोककेँ नहि सोहाइत छनि।
बेटीक जन्मेछ नहि डेराइ, बेटीक कर्मे डेराइ। बेटीक जन्म।सँ भयभीत पुरना समाजक उक्ति।
बेटी धन आ धर्म दूनू लैत छैक, चलैत काल कनाइयो दैत छैक। प्राज्ञोक्ति। अर्थ स्पतष्ट,।
बेदिल चाकर दुश्म्न बरोबरि। नौकर जँ हृदयहीन हो तँ शत्रु जकाँ खतरनाक होइछ।
बेलक मारल बबूर तर आ बबूरक मारल बेल तर। जकरा कतहु चैन नहि भेटैत छैक से एहि उक्तिक प्रयोग करैत अछि।
बेल पकने कौआ के की? जे फल हाथ नहि लागयवला अछि तकर नीक बेजाय सँ कोन प्रयोजन?
बेर पड़ने गदहो काका। जखन किछु लेबाक रहैत छैक तँ न्यूीन व्य क्तिकेँ सेहो महत्त्व देमय पड़ैत छैक।
बेसबाक टूट सन्यािसी। परिस्थितिवश वेश्यायक झुण्ड़सँ निकलि केओ सन्यावसी बनि जाइत अछि।
बेसबाक पूत वशिष्ठा। तुच्छक व्याक्तिक बेटा जखन पढि़ लिखि हाकि बनि जाइत अछि तँ ईर्ष्यािवश पैघलोक एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथि।
बेसिया घटाकय जोगी बढ़ाकय बयस कहय। प्राज्ञोक्ति। अर्थ स्पकष्ट ।
बेसिया, बड़द, पहलमान,
बुढ़ारी में तीनू एक समान। जवानीमे तँ तीनू बम-बम करैत अछि, किन्तुे वृद्धावस्थायमे तीनू दुर्दशाग्रस्त् भय जाइत अछि।
बेसिया रूसल धरम बाँचल। कोनो दुर्जन व्य क्ति वा नारी सँ जखन सम्ब न्धब छूटि जाइत छैक तँ एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
बैदक घोड़ा बेकार नहि चलय। कोनो महत्त्वपूर्ण व्येक्ति जँ अकस्माएत् आबि तँ एहि उक्ति द्वारा अयबाक उद्देश्यज पूछल जाइत छनि।
बैद पँसारी आधहि आध। चिकित्साक एवं पौनी-पँसारी आधा धन लय लैछ।
बैरक गाछतर उधार कपार,
तकरा जनिहह निछट गमार। कोनहु खतरनाक स्थामनमे जँ असावधन रही तँ खतरा हेबे करत।
बैल करी छोअ-मोट, साहुकरी भारी। बड़द छोट राखी तथा व्योवसाय नमहरसँ करबाक चाही।
बैल लिहह कजरा,
दाम दिहह अगरा। करिक्काह बड़द अधिक गुणवान होइत अछि।
बैसल बनियाँ की करय,
एहि कोठीक धान ओहि कोठीमे धरय। वा एहि भागक सामान ओहिभाग धरय। जे निरर्थक घरक सामान एमहर सँ ओमहर करैत रहैत अछि तकरा लेल एहि लोकोक्ति प्रयोग होइछ।
बैसल बिलाडि़के तीन बखरा। जेजनी बैसलि फरमाइस करैत रहैत छथि, किछु कार्य नहि करैत छथि, तनिका लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
बैसल बुढि़या दाव बताबय। जे गुप्तिरूपसँ दू पक्षमे झगड़ा लगबैत रहैत छनि, तनिका पर व्यंषग्यड करबाक हेतु प्रयोग।
बैसल सँ बेगारी भला वा बेगारू भला। बैसारी रहलाक कारण लोक अनकर उपकार सेहो कय दैत अछि।
बैसने पहर चलने कोस। बैसल रहलापर घण्टोस बीति जायत, किन्तुक लागब तँ अनेक किलोमीटर निकलि जायब।
बैसल छली माँझे घुसुकि अइली कान्हे़। कतहुसँ कतहु जे घुसुकि जाइत छथि, कनेक्शन अधिकार भेटितहिँ जे अधिक प्राप्त कय लैत छथि, तनिका लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
बैसली माँझे घुसुकि गेली साँझे। बीच आङनमे बैसलि छलीहि मुदा राति भय गेलापर सबेर सकाल पति गृह दिस ससरि गेलीहि।
बोकबा रहल कुमारे। ककरो विवाहमे विलम्बि भेलापर हास-परिहास।
बोखारक जडि़ खाँसी,
झगड़ाक जडि़ हाँसी। अधिक सर्दी-खाँसी सँ बोखारक सम्भावना, तहिना अनेरो हँसैत रहलाक कारण कतहु झगड़ा भय जा सकैछ।
बोलक ढंग नहि गेल कहचरी। ककरहु मूर्खताक बखान एहि लोकोक्ति द्वारा कयल जाइछ।
बोल केहन ओलसन ? अप्रिय कथन कयनिहार वा कयनिहारि लेल प्रयुक्तथ।
बोल केहन अनमोल? कटुभाषीक वचन पर व्यं?ग्यल।
बोललह से बोललह फेर मति बेलिहह। प्रतिद्वन्द्वी केँ मूख्र बनयबाक एवं डँटबाक हेतु प्रयोग।
बोहु थिकी इसरी, सबदुख बिसरी;
माय थिकी जाफर , सब दुख काफर। माताक अछैत जे अपन पत्नीीक अधीन भय जाइत छथि, तनिका लेल माय एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथि।
बोहु ने धी नढेर भेल छी। बिना बाल बच्चारक व्यकक्ति जखन अनेरो बौआयल घुरैत अछि कोनो बालक सेहो जखन पढ़ाइ छोडि़ बौआइत रहैत अछि तँ अभिभावक एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथिन।
बोहु ने बेटा अपने पेटा। पेटू व्यबक्तिक लेल प्रयोग।
बोहु-बोहु करैत मोन भेल हर्षी;
अन्न वस्त्र जोड़ैत मोन भेल चरखी। विवाह करबाक लेल तँ बड़ मोन लागल रहैत छैक, किन्तु जखन परिवारक खर्चा जोड़य पड़ैत छैक तँ मोन चर्खा जकाँ अशान्तप भय जाइत छैक।
बौआ ललितगर जूता पुरान। निर्धनक मनोरथ पर व्यं।ग्य ।
बौएलालक घोड़ा कटाह। अतिशय क्रोधी व्याक्तिक लेल प्रयोग।
बौक हँसलाह हाथी देखि। ढहलेल व्यहक्तिक व्य्वहार पर व्यंकग्य ।
बौना चलल अकास छूबय तुच्छच व्ययक्ति जखन पैघ मनोरथ करैत अछि तँ एहि उक्ति द्वारा उपहास कय जाइत छैक।
बौनी मौगीके छाबामे बुद्धि। कोनो भुट्टी चतुरा नारीक लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
बाप पैघ ने भैया, सबसँ पैघ रुपैया। धनक समक्ष सब केओ न्यू न भय जाइत छथि।
बैसक देलहुँ बुढ़बा जानि,
बुढ़बा सूतल सलगा तानि। कनेक्शन अधिकार प्राप्ति भेलापर जे अधिक हड़पि लैत अछि तकरा लेल प्रयोग।
भगता कहलकै आकास बान्हरब पाताल बान्हकब,
बोहु कहलके-पहिने घरक कोनटा जे टूटल छैक से ने बान्हौह। केहनो गुणी व्य क्तिकेँ अपना घरमे विशेष महत्त्व नहि भेटैत छनि।
भगवान जकरा दे छथिन तकरा चार फाडि़कय दै छथिन,
आ लैछथिन तँ किदन मारि कऽ लऽ लैछथिन। ककरो अधिक आर्थिक प्रगति देखि ईर्ष्यािवश एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
भगवान जकर मुँह चीरैत छथिन तकरा लेल,
दानाक सेहो प्रबन्धै करैत छथिन। भाग्य वादी लोक निराशाकेँ आशामे बदलबाक हेतु एहि उक्तिक प्रयोग करैत अछि।
भजन आ भोजन एकान्तकहिमे नीक। प्राज्ञोक्ति । अर्थ स्पपष्ट ।
भजन आ अध्यतयन एकान्‍‍तहिमे नीक। अर्थ स्प्ष्टए।
भतारक रोटी ठट्ठा। पतिक धन उड़ौनिहारि पर व्यंयग्यह।
भदबारिक बेङ। जाहिठाम अधिक भीड़भाड़ रहैत छैक, लोक अधिक कूदफान करैत रहैत अछि तथा हल्लाक करैत अछि से देखि केओ एहि उक्तिक प्रयोग कय दैछ।
भदबारि जाइत जाइत जाड़के कहलक-हमरातँ धूआँ धुकुरसँ, तोरालय रंगले रजैया हो जाड़ भाइ। कार्तिक मासक शीतलतामे कोनो कृषक एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथि।
भनहि विद्मापति ऊपर-ऊपर। कोनहु दरबारी व्यपक्ति पर व्यंयग्यक।
भनहि विद्मापति सुनु हे भमरा,
एतेक कुचेष्टाि होइये हमरा। केओ अपन निन्दा सुनि सफाइमे एहि उक्ति द्वारा हास-परिहास करैत अछि।
भून ने जानय भावरे,
पेट भरनसँ काज रे। कोनहु पेटू मूर्खक लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
भऽ रने करी भुँइहार के,
नाङडि ने पकड़ी सियार के। ने भूमिहार पर विश्वाउस करी आ ने नढि़याक नाङडि पकड़ी, दूनूमे धोखा खा जायब।
भरि गाम इतिया-पितिया,
अपने पिसान के बनौलहुँ लिटिया। अपेक्षित भरि गाम रहितहुँ जखन केओ कार्य नहि अबैत छैक, स्वरयं सबकिछु करय पड़ैत छैक सँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
भरि घर देओर भतारसँ ठट्ठा। एकरहु भावना पूर्ववते अछि।
भरलि आमा सँठिते व्या कुलि,
छुच्छआ आमा कनिते व्यायकुलि। बेटीक द्विरगमन मे धनियकाइन माय रंग विरंगक सामान दान-दहेजमे सँठैत रहैत अछि, किन्तुक निर्धन माय तँ ओहू लेल केवल नोरे बहबैत रहि जाइछ।
भरल पुरल दाइ लियौन केने जाइ,
छुच्छु बिछौन दाइ घुरियो ने तकनि भाइ। जे बहिन पैघ घरमे रहैत छथि तनिकर स्वाहगत अधिककाल नैहरमे होइत रहैत छनिा, किन्तुे जे गरीब रहैत तनिकर खोजो-पुछारी नहि होइत छनि।
भरिगाम ओझा चलब ककर सोझा? जँ एक दूटा सम्माकननीय व्यइक्ति मात्र छथि तँ हुनकर धाख मानल जाइत छनि, किन्तुछ जँ हुनक संख्याा अधिक भय जाय तँ ककर धाख मानल जा सकैछ?
भरि दिन अहर-पहर,
साँझ खन तीन पहर। भरि दिन अवसर प्राप्त करबाक लेल जे साँझक प्रतीक्षा करैत रहैत छथि।
भरिझ जनम पोनठेलिये। कोनो पैरबीपुत्रक लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
भरिदे भरादे माथपर चढ़ादे। सब किछु अनकेक भरोसे रहनिहार पर व्यंिग्यस।
भरिफागुन बुढ़बा देओर लगाय। फगुआ उत्साुह उमंगक पर्व थीक।
भरोसे रही तँ बिथूति नहि होअय। ककरो भरोसे जँ कोनो कार्य जयबाक खतरा रहैत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
भलक संग रहब तँ खायब बीड़ा पान, अधलाहक संग रहब तँ कटायब दूनू कान। नीक लोकक संग रहलासँ लाभ तथा दुर्जनक संग घाटा लागि जाइत छैक।
भल दुनियाँ रहितय अपन बेटा खइतय, नगरक लोकके नइ छिछियबितय। डाइन-जोगिनक प्रति अन्धयविश्वासस प्रदर्शन।
भल पिया हेताह तँ गुदरियो पर रिझताह। नीक लोक पोशक पर नहि, गुण पर प्रसन्न होइत छथि।
भल भातके भल तीमन नहि,
भल नारिके भल पुरुष नहि। उपयुक्तक मिलान नहि भेलापर प्रयोग।
भलमानुस के एकटा बात आ भल घोड़ा के एकटा लात। नीक लोक एकटा बातहिसँ भयभीत जाइत छथि।
भल माय रहैत छैक तँ तेतरिक पातहु पर खीर खुअबैत छैक। माय कोनहु स्थितिमे अपन सन्तापनक पालन कय लैछ।
भल मोन पाड़ल लाठी लाउ। जे बाहरसँ निर्भीता देखबैत छथि, मुदा भीतरसँ डेरबुक रहैत छथि तनिका पर एहि उक्ति द्वारा व्यंतग्यप कयल जाइछ।
भाइ कोसलिया चाकर चोर,
नापरि कुलक्षणि मृत्युिक हँकोर। भाइ यदि भाइसँ नुकाकय निजी धन जमा करय, नौकर यदि चोर हो तथा पत्नी। जँ कुलक्षणि अर्थात् पतिक विपरीत विचारक हो तँ मृत्युथ दुर्गति निशिचते अछि।
भाइ भैयारी महिँसिक सीङ,
जखने जनमल तखने भीन। दू भाइ तथा महिँसिक दूनू सीङ जनमिते भिन्नइ-भिन्नी रहैत छैक।
भाइसँ जे करी चोरी,
की होइ निर्धन की होइ कोढ़ी। अपन भाइसँ चोराकय जे धन संग्रह करैछ, वैमानी करैछ तँ अगिला जन्महमे दरिद्र वा कोढि़ होइत अछि।
भाइ दूर पड़ोसी नीअर। जे व्यरक्ति घरक लोकसँ मनमोटाव तथा पड़ोसीसँ रखैत छथि, तनिका दुर्दिन अबैत छनि।
भाइमे केओ दादा भेल ताकय। समांगमे केओ पैघ पद प्रतिष्ठा कय लैत छथि तँ एहि उक्ति द्वारा सन्तो ष व्यवक्त कयल जाइछ।
भाइजी सँ नहि जीती तँ भाभीक कोँचा फाड़ी। बलगरसँ नहि टकरा अनावश्यभक दुर्बल पर क्रोध झा‍ड़निहार लेल प्रयोग कयल जाइछ।
भला लोकक संसार नहि। नीक लोक कतहु पीडि़त भेला पर प्रयोग करैत छथि।
भाइ सन हित नहि कि भाइ सन मुदइ नहि। मिलान रहला पर भाइ मित्र दोसर नहि, मनमोटाव भेला पर ओकरासन शत्रुओ दोसर नहि होइछ।
भाइ साथके हथियार हाथके। भाइसँ यदि मिलान रहय तथा हथियार जँ हाथमे रहय तखने ओ कार्य दैत अछि, नहितँ व्य र्थ।
भाग छनि तिनका, साँय मारनि जिनका। जनसाधारणमे पति-पत्नीमक बीच झगड़ा सोहाग भाग होइत छैक।
भाग्य वान के भूत कमाय। किनको अकस्मायत् पूर्ववते अछि।
भागल भूतके लंगोटी लाभ। अधिक बूड़ल स्थिति में किछुओ ऊपर भय गेलापर लोक एहि उक्तिक प्रयोग करैछ।
भाँड़ो छुलहुँ आ पेटो नहि भरल। न्यू़न कार्य कयलाक बादो कार्य नहि चलैत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
भातमे कोदोक भात आ सासुमे ममिया सासु। दूरक सम्बोन्धीु जखन अधिक तंग करय लगैत छथिन तँ हुनक उपहास करबाक लेल प्रयोग होइछ।
भाते उबजुब माँड़ के पूछय? जखन नीक वस्तुँक कमी नहि तखन दब सामान कियैक लेल जाय?
भादव भदवा सी मी बरि,
केरा रोपी दिन बिचारि। केरा भादव मास, भदवा एवं सी अर्थात् एकादशी सँ चतुर्दशी धरि तथा मी अर्थात् पंचमीसँ दशमी धरि नहि रोपबाक चाही।
भात छुटय तँ छुटय साथ नहि छूटय। अपन लोकसँ मनमोटाव भय गेलाक बादो समय पर सहयोग अवश्यभ करबाक चाही।
भादवक अन्होरियो नामी, इजोरियो नामी, रौदो नामी, गुमारो नामी। प्राज्ञाक्ति। अर्थ स्पनष्टी।
भादवक मेघ आ नेनाक पेट। साओन-भादवक मेघ आ नेनाभुटकाक पेट जतेक झरय ततेक नीक।
भादव महिँसा चैत चमार। चैतमे रब्बी काढ़बाक कारण्सा मजदूर वर्ग तथा भादवमे भदइ चरलाक कारण पाड़ा मोटा जाइत अछि।
भावहु लाजे बाजथि नहि,
भैंसुर बाट छो‍ड़थि नहि। बिना कहला पर अपनहि मोनसँ जे सब बात बुझि सुविधा प्रदान नहि करैत छथि तनिका लेल प्रयोग।
भारी मोटा सब अपनहि कपार। जकरा ऊपर अधिक भार पडि़ जाइत छैक से एहि उक्तिक प्रयोग करैछ।
भाव घट्टी नीक सेर घट्टी नहि नीक। सामान कनेक्शन महग भैटय ताहिलेल हर्ज नहि, किन्तुग नीक हेबाक चाही आ कम ओजन नहि तौलयबाक चाही।
भीख मांगिकय खाइ, बहिनिक दुआरि नहि जाइ। बहिनिक ओहिठाम निर्धनताक प्रदर्शनसँ बहिनोइ द्वारा सारक अपमान होइत छैक।
भीतर-भीतर जडि़ काटी,
ऊपर सँ गंगाजल छीटी। ऊपरसँ मिलान किन्दु। परोक्षमे जे शत्रु सन व्यसवहार करैत छथि तनिका लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
भिखमंगनी पहुँचली कोबरा घर। निम्नग कोटिक नारी जखन पैघ घरमे चलि जाइछ आ घमण्डनक प्रदर्शन करय लगैछ तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
भुखले आन्ह र खयने कोढि़। जाहि नौकरकेँ सकसकी फकफकी दूनू रोग रहैत छैक से भूखलमे फक फक करय लगैत अछि तथा खयला पर सकसकरा जाइछ।
भुखले गेलहुँ बोहु बेचय,
अघयने कहलक बन्हहकी। निषिद्ध कार्य कयलहु पर जखन काय्र नहि चलैत छैक तँ विवशतामे एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
भूखले मोन पड़य कोबराक खीर। भुखायलमे साधारणो खाद्मपदार्थ नीक लगैत छैक।
भुखले लागय गूलरि मीठ। एकरहु भावना ओहने अछि।
भुखायल बंगाली भात-भात। अधिक भूख लगलापर होइत छैक की खाइ की नहि।
भुट्टीके घुट्ठीमे बुद्धि,
पंचहत्थी के ठडि़आयल बुद्धि। ठका गेलापर नमछर नारी द्वारा भुट्टी पर एहि उक्ति द्वारा व्यंदग्यी कयल जाइछ।
भुसकौल विद्मार्थीक गत्ता मोट। कार्य कम आडम्ब्र अधिक कयनिहार लेल प्रयुक्त ।
भूत जान नहि मारय हरान करय। दुर्जन व्यिक्ति अधिक तंग-तबाह करैत छैक।
भूत मारय नहि तँ सताबय अवश्यत। दूनू एकहि प्रकाराक प्राज्ञोक्ति अछि।
भूमिहारक आत्माा जिलेबी सन सोझ। कहल जाइत अछि जे भूमिहार लोकनि अति पेँचियल होइत छथि-जिलेबी सन घुरमल।
भूमिहार बड़ सोझ तँ हाँसू सन। ओनातँ ओ पेँचियल होइताहिँ छथि, हाँसूसँ केओ कम नहि।
भूजा जरि गेल भारलय मारि। कार्य किछु नहि मुदा मजदूरी चाहबे करी।
भुख ने देखय छुच्छद भात,
निम्ने ने मानय टूटल खाट।
भूख ने जानय बासी भात,
पियास ने जानय धोबी घाट,
निम्न ने जानय टूटल खाट। जखन ककरो भूख पियास वा उंघी लागल रहैत छैक तँ जैह भेटैत छक्‍ ताहीसँ कार्य चला लैत अछि।
भेट सुपारी सँ नहि तोड़थि सुपारी। बिना ओकादक जे आडम्बोर देखबैत छथि तनिका लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइत अछि।
भेखेँ भीख भेटैत छैक। ककरहुसँ किछु लेबाक लेल ओहन मुँहकान (व्य क्तितत्वन) सेहो चाही।
भेल पुत्ता मरल जाय, पेटक लेल ओझाइ। वा
ढिंढा लेल ओझाइ। निश्च यकेँ छोडि़ जे अनिश्चेय पर दौड़ैत छथि, तनिका लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
भेल बिआह मोर करबह की,
धीया छोडि़ कय लेबह की ? विवाह द्विरागमन जखन भय जाइत छैक, तखन जमायक रूसनहि की?
भैयासँ नहि जीती तँ भौजीक कोँचा फाड़ी। ककरहुसँ झगड़ामे नहि सकलाक कारण क्रोध केँ दोसर पर झाड़य जाइत अछि तँ पीडि़त व्यदक्ति एहि लोकोक्ति प्रयोग करैत अछि।
भोजक कालमे कुमहड़ रोपी। समयसँ पूर्व ने नहि अन्तहमे उपक्रम करैत अछि तँ एहि उक्ति द्वारा ओकर उपहास कयल जाइछ।
भोज कतहु धमगज्जिर कतहु। उचित स्थाधन पर उत्सातह नहिक देखाय अन्य त्र जे देखबैत अछि तकरा लेल प्रयोग।
भोजन अनकर पेट अपन। अनकर खाद्मपदार्थ जे अहगरसँ धरैत छथि।
भोज ने भात हड़ हड़ गीत। खर्च-बर्चक पता नहि, केवल ध्व नि विस्ता रसँ गीतक रेकर्ड बजौनिहार पर व्यंतग्य ।
भोजैतिन कानथि कनेक्शन माँड़ लय। जाहि भोजमे अपने घरक स्त्री़गणकेँ एकदम नहि सटय देल जाइत छैक, पूरा-पूरी पुरुषक हाथमे रहैत छैक।
भेँड़ी गेल भनसाघर, अर्र-अर्र लगले। सब किछु समाप्तभ भय गेलाक बादो जँ मृगतृष्णाममे केओ पड़ल रहैत छथि तँ हुनका लेल एहि उक्ति द्वारा उपहास कयल जाइछ।
भोरका घाघस बकरिक ढूसि,
साँय-बोहु झगड़ा तीनू फूसि। भोरे-भोर झपसी लाधब, दू बकरीक परस्पगर ढूसि लड़ब तथा पति-पत्नी क नोंक-झोूक एहि तीनूकेँ व्यतर्थ वा अस्थाीयी मानल गेलैक अछि।
भोरे भोर रामक नाम। सबेरगरे कोनो आश्च।र्यजनक वा घृणित घटनाक बखान कयलापर कहल जाइछ-भोरे भोर रामक नाम लिअ।
मखमलमे मूजक बखिया। नीक वस्तुजक संग दब वस्तु-क मेल लगा देलापर एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
मग्घाहक कनियाँ बग्घाछ। मघा नक्षत्रमे जाहि कन्यााक जन्मघ होइछ से बाघ जकाँ झपटैत अछि।
मग्घाक के जल बग्घा । मघा नक्षत्रमे जँ बदरी लधैत छैक तँ कतोक दिनधरि लधने रहैत छैक।
मङनीक चानन अछि तँ हमरो चाही, हमर कक्कोन के चाही,
पैसाक अछि तँ हमरा सर्दी भेल अछि। मङनीके चन्द न घसु रघुनन्द्न। मुफतमे किछु प्राप्तर भेलापर कम्मो। आवश्येक वस्तु‍ लोक दूनू हाथ सँ लूटय चाहैत अछि किन्तुस जखन दाम देबय पड़ैछ तँ अनावश्यकक लगैछ।
मङनीके पाइ तँ टकेसेर तोलाइ। बिना प्रयासक टाका हाथमे अयला पर महगो किनबामे आसकति नहि होइछ।
मङनी-चङनी पर एतेक गुमान। ककरहु गरीबी पर उपहास वा निर्धन द्वारा टेढ़ी देखौलापर एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
मङनीके बड़द इजोरिया राति। मङनीमे भेटल तँ फैलहिसँ कार्य कयनिहार पर व्यंमग्यल।
मङनीक बड़दक दाँत के देखैत अछि? जे वस्तु़ मुफतमे भेटैत अछि ताहिमे किछु दोषो रहैत छैक तथापि लोक ओहि दिस ध्या न नहि दैत अछि।
मङनीके गंगा फैलसँ नहाली। मुफतमे जँ नीक चीज भेटैत छैक तँ लोक अहगरसँ उपयोग करैत अछि।
मङनी मे चङनी दाँत निपोड़नी। मा‍ङि-चा‍ङि कय आनल वस्तु मे जखन केओ किछु मांगि दैत छैक तँ एकर प्रयोग होइछ।
मङनी मे चङनी बिलाडि़ माङय आधा। एकरो भावना उपर्युक्ते जकाँ अछि।
मङनीमे निकलय काम तँ कियै लगायब दाम? जतय मुफत भेटैछ ताहिठाम दाम नहि लगौल जाइछ।
मङनीमे पाबी तँ नौ मन तौलाबी।
मङनीमे पौलहुँ तूं सत्तरि मन तौलौलहुँ। चतुर व्यौक्तिकेँ मुफत में वा अति सस्ताव कोनो वस्तुह जखन भेटैत छनि तँ ओ फैलसँ लय लैत छथि।
मङनीमे मारि खयलहुँ। कोनहु परिश्रम जखन व्यनर्थ भय जाइत छैक तँ पश्चामत्ताप मे एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
मट्ठा घोँटाय नहि पिट्ठ धकेल। नीक वस्तुट जखन नहि रुचैत छैक तूा दबकेँ के पूछय ? मट्ठा = घोर ।
मचकीसँ खसलेँ बुलकी टुटलौ। कोनो अति चंचला बालिकाक लेल प्रयोग।
मड़ुआ मीन चीन संग दही,
कोदोक भात दूध संग सही।
खिचरिक संग जे मछरी खाय,
मुइला बोहुक नैहर जाय।
बाट चलैत जे गाबय गीत,
से तीनू थिक परम पतीत। मड़ुआक रोटीमे माछ, चीनाक संग (माढ़क संग) दही एवं कोदोक भातक संग दूध नीक लगैत छैक।
मटिऔने गहूम ढेपियौनी बदाम। गहूमक खेतीमे चौकी खूब पड़ैत छैक, खूब रहबाक चाही, किन्तुक बदामक (बूटक) खेतीमे कम्मे जोत कोड़ सँ कार्य चलि जाइत छैक।
मङने-चङने काज चलय तँ बिआह के करय? कोनो निठल्ला वयसाहु कुमार व्यिक्ति पर व्यं ग्यह।
मङने बनियाँ गूड़ों नहि दिय, मुँह दबौने सब किछु दिअय।
मधुमाछीक खोँता उजाड़ब तँ कटबे करत। दुर्जन व्योक्तिसँ काते रहबाक चाही।
मधुरे आँचे रोटी मीठ। मधुर व्यचवहार रखलासँ सबठाम माधूर्य बनल रहैत छैक।
मन अगुआइयै मन पछुआइयै,
एहन सुनरि बाहु छोड़लो ने जाइयै। वा
मन अछताइयै मन पछताइयै...। कोनो उपलब्धि प्राप्तम करैत जिनक मोन छौ । तेज आँचमे रोटी झरकि जाइत छैक।
मन चंगा तँ कठौतीमे गंगा। जकर मोन शुद्ध छैक तकरा कतहु जयबाक कार्य नहि।
मन चंचल चित्त उदास,
जलमे ठाढ़छी लागल पियास। कोनो गम्भीीर तिचन्ता मे फँसल रहलाक कारण कथूमे मोन नहि लगैत छैक।
मनमे आन बगलमे ईंटा। ऊपरसँ मिलान मुदा शत्रुता सधबाक ताकमे।
मनमौजी जोगीके गाजर के शंख,
मोन भेलै बजौलक नहि तँ चिबौलक। कोनहु वस्तुौक दुरुपयोग केओ जखन अपने मूर्खतावश करैत अछि।
मनसा उपजाबय धान तकर मौगी लछमान। पुरुष नीक आय करैत अछि तँ गृहणीक सेहो प्रशंसा होइत छनि।
मन्त्रीरक अभावमे राजभंग। राजाकेँ उचित सलाहकार लोकनिक आवश्येकता रहैत छनि, अन्ययथा व्यसवस्थात चौपट्ट भय जयबाक सम्भा वना रहैछ।
मन हर्षित तँ गाबी गीत,
घर खर्ची तँ सुती निचिन्त,। प्रसन्नीतामे लोक गीत गबैत अछि।
मन होइयै मलपूआ खैतहुँ,
चिकसे ने अछि; घी रहैत तँ गूड़ पैंचो लितहुँ। घरमे जँ अभाव अछि तँ जीह सैतिकय राखू।
मनुक्खँके छाँछ नहि बिलाडि़ के मटकूड़। महत्त्वपूर्ण व्यछक्तिक बिना चिन्ता। कयनहि जखन सामान्यण लोक केँ अधिक महत्त्व भेटि जाइत छैक तँ एहि उक्ति व्यंधग्यव कयल जाइछ।
मनुख मनुसयलाह तँ बेङ लऽ पड़यलाह। कोनो मूर्ख किन्तुब दुर्बल व्यंक्ति द्वारा पौरुष प्रदर्शनक प्रयास पर एहि उक्ति द्वारा व्यंवग्या कलय जाइछ।
मनुकखकेँ हाँकल जाइत छैक आगाँसँ,
मालजाल केँ पाछाँसँ। अर्थ स्पेष्टछ।
मनुकख छह कि मारवाड़ी? मिथिलाक लोक मारवाड़ी समाजसँ (जे मिथिलाक कोनो शहरमे बसल छथि) ईर्ष्याल करैत अछि।
मर्दके लहना मौगीके गहना। पुरुषकेँ अधिक कमाइ नीक लगैत छैक, किन्तुे स्त्री गणकेँ वस्त्रा भूषणमे अधिक आकर्षण होइत छैक।
मर्द के खयनाइ मौगीके नयनाइ।
मर्दक नहयनाइ मौगीक खयनाइ नहयनाइ, केओ देखलक केओ नहि दखलक। नारीकेँ स्ना,न भोजन पर्दामे करबाक चाही तथा पुरुषकेँ शीघ्र करबाक चाही।
मर्दके सालन आ भीतके आलन। पुरुषकेँ अनुशास्ति करब आवश्य क रहैत छैक; तहिना देबालक ऊपर दाब एवं चार पड़ब आवश्यनक, अन्य था ओ ढहि सकैत अछि।
मर्द मोटाय गवाहीमे बड़द मोटाय दमाहीमे। जकरा बारम्बा र कहचरीमे ककरहु-ककरहु दिससँ गवाही देमय पड़ैत छैक तकरा अधिककाल भोजे रहैत छैक।
मर्द हुअय जे गुआर बुझाबय।
मर्द हुअय जे राउत बुझाबय। कोनो मूर्ख व्याक्ति जँ सामान्यु ढंगसँ नहि बुझैत अछितँ एहि उक्तिक प्रयोग द्वारा परिहास कयल जाइत छैक।
मरक मोन नहि तँ रहि-रहि उकासी। मरबाक मोन नहि तँ उठि वैसी। जखन कोनो कार्य करबाक इच्छाय नहि रहैत छैकतँ लोक कोनो बहाना तकैत अछि।
मरबाक डरे खेती नहि करी जीबी तँ खाइ की? जे व्यडक्ति मेहनतिसँ जी चोरबैत छथि तनिका लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
मरय माय जीबय मौसी,
आधा राति खुआबय मौसी। मायसँ सेहो अधिक मौसी स्नेोह करैत छैक।
मरलके मारी नहि,
बाँसलय खोँचारी नहि। कोनो दीन दुर्बल पर अत्या चार नहि करी।
मरने नाम कि पड़यने नाम।
मरल पुतोहु के बड़ी-बड़ी आँखि। मृत्युतक बाद सामान्यो व्यकक्तिक अनेक प्रकासँ गुणगान होमय लगैत अछि।
मरल मायके गोनहि तर झाँपी। प्रिय व्य क्तिक परोक्ष नीक नहिो लगैत छैक।
मरलाक आगू डोम राजा। मृत्युआक बाद केओ देखय नहि अबैत अछि जे के राजा भेल आ के रंक।
मरला धानमे डोम राजा। मरैत धानमे पानि पडि़ गेला पर अमृत समान होइत छैक, किन्तुम नीक जकाँ सुखा गेलाक बाद वर्षा भेलासँ व्यनर्थ।
मरला भेँड़ खखोरेला बिनु। भेँड़ीक केशसँ ऊन बनैत छैक।
मरि गेलापर रासि गाबी। जीबैतमे कोनो जोगाड़ नहि कयलहुँ, आक मरि गेल तँ घौना पसारने छी।
मरैछी ने जीबैछी, हुकुर-हुकुर करैछी। अपन अत्य धिक दुर्गातिक बखान लोक एहि उक्ति द्वारा करैत अछि।
मलिकाइन बिअइली कूथिकऽ,
चेरिया कहलक बेटिए। अत्ययधिक परिश्रमक जखन मूल्यांोकन नहि होइत छैक अपितु दूसि देल जाइत छैक तँ एहि उक्ति द्वारा असन्तो ष व्य क्तन कयल जाइछ।
मरक बेरमे चुट्टीके पाँखि जनमैत छैक। ककरहु दुर्दशाक समय निकट अयलापर तथा अनुचित कार्य कयलापर एहि उक्ति द्वारा डाँटल जाइत छैक।
मरल घोड़ाके घास खुआबी। असम्भोव कार्य करबाक प्रयत्न पर व्यं ग्य ।
मरऽ चलल वर काजर कऽ कऽ। खतरनाक कार्य करबसँ पूर्व श्रृंगार-पसाहनि कयनिहार पर व्यंबग्यश।
मरुआ मालिक पातर नीक,
रब्बीम रैयति घन नीक। मङुआ दूरू दूर पर रोपल जाइत छैक, जाहिसँ नमहर होइक।
महतक घर सन्तहतिक वास। पैघलोकक घरमे सन्ता नक अभाव रहैत छैक।
महतमसँ बहिया भेल बली,
कहय डाक सन्ताभपेँ मरी। मालिक सँ अधिक समृद्ध जखन हुनक पूर्व नौकर भय जाइत छनि तँ मालिक लाज-सन्ताभपसँ अति दुखी रहैत छथि।
महफा महक कानबे ने करय,
लोकनिन भोकासी पाड़य। अनका लेल आन जखन सफाइ देमय लगैत अछि तँ एहि उक्तिक प्रयोग द्वारा व्यं ग्यक कयल जाइछ।
महिँसा लादय लोहिया खाय,
तकरा पापे पड़ोसियो जाय। जे व्याक्ति गाड़ीमे पाड़ाकेँ जोतैत अछि तथा लोहिया अथवा लोहक पात्रमे खाइत अछि तकरा पाप कर्म कहि निषिद्ध कयल गेल अछि।
महिँसा-महिँसाक लड़ाइ,
खोँता बिढ़नीक उजाड़। पैघ लोक सभक टक्कारमे दुर्बल लोकसब पिसा आइत अछि।
महीँस आ बेटीके बेटा भेनहिँ की ? पुरान लोकोक्ति।
माघक बदरी बकरीक ढूसि,
साँय-बोहु, झगड़ा तीनू फूसि। माघ मासक बदरी अधिक दिन नहि टिकैत छैक, दू बकरीक ढूसि तथा पति-पत्नीलक झगड़ा सेहो अस्थादयी होइत छैक।
माघ बरिसय तीन जाय,
गहूम गाय, बेमाय। माघक वर्षासँ गहूम गलैत छैक, गायकेँ अतिशय जाड़ होइत छैक तथा बेमाय छुटि जाइत छैक।
माघ बुआरी चैत गुआरी। माघ मासमे बुआरी माछ तथा चैतमास (बसन्त ) मे युवती स्त्रीह नीक लगैत छैक।
माघ बुआरी चैत गुआलरी। वसन्तुमे गुआलरी गीत बड़ प्रियगर लगैत छैक।
माङय जाय तँ टाङय चाह। कनेक कोनो सामग्री मङनीमे लय जयबाक अनुमति भेटितहिँ जे अहगरसँ लय लेमय चाहैत अछि तकरा लेल प्रयोग।
माइये धीये गौर पूजथि,
अपन-अपन सोहाग माङथि। मिथिलाक नारी भगवती गौरीक पूजा कय अपन अखण्डा सौभाग्यपवती बनलि रहबाक कामना करैत छथि।
माइये-धीये पूजब, अपन-अपन भूजब। उपर्युक्ते भावना एहू मे अछि।
माउग ने मनुख बलिगोविना। ई बाल गोविन्दब छथि-ने स्त्री ने पुरुष।
मागो मायक ई पहिले यज्ञ। कोनहु स्वाेगत नहि भेलापर एहि उक्तिक प्रयोग द्वारा असन्तो‍ष जाइत अछि।
माङमे तेले ले टाङमे तेल। उपयुक्ते स्वालगत नहि भेलापर एहि उक्तिक प्रयोग असन्तो ष व्यतक्ता कयल जाइछ।
मा‍ङि दही खायब तँ मरि नहि जायब? ककरो मङनी-चङनी करैत देखि एहि उक्ति द्वारा मारल जाइछ, ताहूमे पड़ोसिन पर विशेष।
माछ-मांस अपने खाय,
हत्या। लेले पाहुन जाय। ककरो द्वारा कयल अपराध जखन कोनो आन अपेक्षित पर मढ़य बाक सम्भाोवना रहैछ तँ एकर प्रयोग होइछ।
माछ आ पहुना, तीन दिन कहुना। लगातार तीन दिनसँ अधिक जहिना माछ नीक नहि लगैत छैक, तहिना पाहुन सेहो तीन दिनसँ अधिक नीक नहि लगैछ।
माछ-भात पाँच हाथ। माछ-भातक भोजन मिथिलामे अति प्रिय रहलाक कारण जहिया बनैत अछि तहिया धीयापुता सब बजैत अछि।
माछीक लात पटीदारक बात। देह पर मोछी बैसलापर लोक लगले ओकरा रोमैत अछि; तहिना दिआदक बोल सेहो अप्रिय लगैत छैक।
मा‍ङिकऽ ने खाद तॅं कि रूसल जाइ? भोजनमे लाज नहि करबाक चाही।
मा‍ङि-चाङि खायब तँ मरि नहि जायब? बेसीकाल किछु-किछु माङयवाली पड़ोसिन पर व्यं ग्यब।
माटिक घोड़ा सूतक लगाम। गम्भी रतासँ कोनो कार्य नहि कयनिहार लेल प्रयोग।
माटिक चौरा ठोपहि गेल। कोनहु वस्तुठपर जखन अधिक चोट लोक करेत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग वस्तु वला करैत अछि।
माटिक देवता रैंचीक अक्षत। जेहन अतिथि तेह स्वा।गत।
माघक कनियाँ बाघ। माघमे जनम लेनिहारि कनियाँ अधिक लड़ाकू होइत छथिा।
माघ बरिसबे करय भाइ भिन्नँ हेबे करय। मान्यरता अछि जे शिशिर ऋतुमे एक बेर किछुओ वर्षा होइतहिँ छैक।
माघहि ऊखम, जेठहि जाड़,
निश्च य मरय पहिने गाढ़। माघमे जँ गर्मी लागय तथा जेठमे जाड़हो तँ पैघलोक पर आफद बुझी।
माँड़ पीलाक बहुत स्वा।द। कनेक्शन सस्तबगर आ न्यूदन वस्तु कयनिहार कंजूस पर व्यंगग्य़।
माथ नमहर सरदारके,
पयर नमहर गमारके। पगड़ीक कारण सरदारजीक माथ नमहर छनि, किन्तुा गामक लोककेँ जूता पहिरबाक अभ्याकस नहि रहलाक कारण पयर नमहर रहैत छनि।
माटिमे गाड़ैत छी तँ दिवार खाइत अछि आ चार पर रखैत छी तँ चिल्होचडि़ लूझैत अछि। माछ वा अन्यर खाद्मपदार्थ, जकरा चाहितो नुकाकय नहि राखल जासकैछ, तकरा लेल प्रयोग चिल्होखडि़ = माछक प्रिय एकटा पक्षी।
माथ पर रखैत छी तँ केस उड़ैत अछि, हाथमे रखैत छी तँ हाथ पकैत अछि। धीपल वस्तु क लेल कहल गेल अछि।
मान घटय जहँ नित्तह जाइ,
रोग घटय नित औषध खाइ,
पाप घटय नित हरिगुन गाइ। जाहिठाम प्रतिदिन जायब ताहिठाम सम्मािन कम भय जायत।
मानीतँ देवता नहितँ पाथर। ककरो सम्मातन देलासँ सम्मामननीय नहितँ सामान्य्।
मामाक आगाँ मातृकक परिचय? जे सबकिछु जनैत छथि तनिकालग गप्पा नहि छजैत छैक।
मायक पेटमे भात नहि,
पत्नीपक गलामे चन्द्र हार। मायकेँ दु:ख कटैत देखियो कय जे पत्नी क श्रृंगारमे लागल रहैत छथि तनिकालेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
माय करय कुटान पिसान, बेटाक नाम दुर्गादत्त। कोनो निर्धन व्यिक्तिक बेटा जखन नीक पढ़ाइ करय लगैछ तँ ईर्ष्याकवश पैघलोक एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथि।
मायक पेट कुम्हाोरक आबा,
कोनो कारी कोनो गोर। जाहि भैयारीमे केओ कारी तथा केओ गोर रहैत अछि तकर समर्थन में एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
मायके मुइने एक सराध,
बोहुक मुइने तीन सराध। मायक मृत्येसँ उद्धार भय जाइत छैक, किन्तुृ पत्नीउक मृत्युयसँ झंझट बढि़ जाइत छैक।
माय गुनी धी पिता गुन घोड़,
नहि किछु तँ थोड़बहु थोड़। मायक अनुकूल बेटी तथा घोड़ाक अनुकूल ओकर बछेड़ा होइत छैक।
म्याउँ के मुँह के पकड़त? खतरनाक कार्य केओ नहि करय चाहैत अछि।
माय छौ डाइन पितियाइन केने छौ। भगतइ केर नकल करबाक हेतु तथा कोनहु नेनासँ चौल करबाक हेतु एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
माय ताकय अँतरी, बोहु तकय पोटरी। माय सतत् बेटाक स्वातस्य्िक क चिन्ता़ करैत अछि, किन्तुए पत्नीथ धनक खोजमे रहैछ।
माय तिताइ, बहिन मिरचाइ, बोहु मिठाइ, मोन होइअय कहॉं लय पड़ाइ। पत्नीिभक्तन पर हुनक माय एवं बहिन एहि उकित द्वारा व्यं्गय करैत छथिन।
माय तोहर खरजितिया कयने छलह। कोनो भयंकर खतरासँ बाँचि गेलापर लोक एहि लोकोक्तिक प्रयोग ओहि व्यपक्तिक लेल करैछ।
माय थिक काफर सब दुख जाफर,
बोहु थिक इसरी सब दुख बिसरी। दुर्जन नारीकेँ जखन अपन बेआ पुतोहुसँ नहि पटैत छनि तँ बेटापर एहि उक्ति द्वारा व्यंपगय करैत छथि।
माय-बाप मरिगेल, रहिगेल भाइ भौजाइ, तीमन तरकारी जरिगेल, रहिगेल नून मिचचाइ। नैहरम माता-पिता जखन नहि रहि जाइत छथिन तँ आदर सेहो कम भय जाइत छनि।
माय मुइने बाप पित्ती। कम आयुमे मायक मृत्यु। भय गेलापर जखन पिता दोसर विवाह कय लैत छथिन तँ हुनक व्यसवहार बदलि जाइत छनि।
माय होइछै आन, बोहु होइछै परान। पत्नीोभक्तह बेटापर कड़गर स्वी।भावबाली माय एहिउक्ति द्वारा व्यंतग्यर करैत छथि।
मार गोसैयाँ तोहरे आस। पतिसँ कतबो झगड़ा होइत छैक तथापित नीक पत्नीो पुन: मिलान कय लैछ।
मारल चोर उपासल पाहनु। चोरकेँ जाहि घरमे एकबेर ठोकाइ लागि गेल रहैत छैक, तथा अतिथिकेँ जतय भूखल रहय पड़ल रहैत छनि से पुन: कहियो घूरिकय नहि अबैत छथि।
मारय सिपाही नाम जमादारक। ककरहु परिश्रमक यश जख मुँहगरहाकेँ भेटैत छेक तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
मारिक डरेँ भूत पड़ाय। सोझ डारिसँ काय्र नहि कय जखन केओ भय देखौलापर कार्य करैत अछि वा दुष्टह‍ जखन भयभीत भेलापर जान छोड़ैत अछि तँ एति उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
मारी घुट्ठी फुटय कपार। ककरहु द्वारा व्यंकग्य।वाण छोड़लापर एउहि उक्तिक प्रयोग।
मारीमाछ ने उपछी पानि। जे व्यछक्ति कोनहु झंझटमे नहि रहैत अछि से कतहु झंझट ठाढ़ भेलापर एहि उक्तिक प्रयोग करैछ।
मारिकय ससरी खाकय पसरी। भोजनक बाद लोट-पोट करबाक चाही, किन्तुब मारि-झगड़ाक बाद स्थाोन छोडि़ घसकि जयबाक चाही।
मारीतँ हाथी लूटी तँ सोना। कोनहु प्रकारसँ शिकार जँ करी तँ नमहर।
मारी बोहुके पादय पड़ोसिन। ककरो मारिसँ केओ आने जखन भयभीत भय जाइछ वा ककरो भयभीत करबाक लेल जखन अपनाकेँ पीटल जाइछ तँ एहि उक्तिक प्रयोग।
मारू-काटू पिया तैयो अहीँक आस। कुलीना पत्नीक (पतिव्रता) कोनहु स्थितिमे पतिकेँ नहि छोड़ैत छथि।
माल-जाल एक दिनमे मनकुख सात दिनमे। माल-जालकेँ सुख भेलापर एकाहि दिनमे मोटा गेनाइ आ भोजन नहि भेटलापर एकहि दिनमे लटि गेनाइ देखल जाइत छैक, किन्तुे मनुष्यहकेँ सुख-दुखक असरि पाँच-छौ दिनक बाद होइत छैक।
मानु तँ महादेव नहितँ पाथर। मान्यततहिपर सबकिछु निर्भर करैत छैक।
माल बला हारि गेल गालबला जीति गेल। फचाँडि़ लोक जखन यर्थार्थकेँ झाँपय अछि तँ पीडि़त व्य्क्ति एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथि।
मिलय मियाँ के माँड़ों नहि, ताड़ीक फरमाइस। भेटयबला किछु नहि, किन्तुउ फैलहिसँ फरमाइस कयनिहार पर व्यंनग्यु।
मीयाँ जोडि़हँ नडि़ये-नडि़ये खुदा लऽ जइहेँ एकहिबेरिये। बहुत प्रयत्नर कयलाक बादो जखन बारमबार फेरी लागल चलि जाइत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
मीठ गपगप तीत थूथू। लाभ लैत काल केहन प्रसन्न मुदा घाटा बेरमे मुँहने देखू!
मीयाँक थूक मीयँक दाढ़ी। अधलाह कार्य कयनिहार स्वनयं ओकर फल भोगैत छथि।
मीयाँक थूक महजित तक। ककरो दौड़ धूपक स्था।न जखन विदिते रहैत छैक, घूरि फिरि कय जखन ओतबहि दूरमे दौड़ैत रहैत अछि तँ ओकर खोज करैत काल एहि उक्तिक प्रयाग कयल जाइछ।
मीयाँ के जूता मीयेँ के सिर। अनकालेल राखल हथियार जखन अपनहि पर चलि जाइछ।
मीयाँ जीके पार ने पौलहुँ,
बीबीजी के बकुटि कऽ खयलहुँ। अनकर क्रोध जखन अनका पर केओ झाड़ैत अछि तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
मीयाँ बुझलनि प्या जु। कोनहु बातक उचित अर्थ नहि लागि जखन ककरो आने अर्थ लागि जाइत छैक तँ ओकरा लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
मुइने नाम कि पड़यने नाम। ककरो मुइलापर ओकर गुणगान होइत छैक, भलेँ ओ सामान्येक व्य क्ति कियैक ने हो।
मुइल बड़दा छकरी। जे बड़द मरिगेल से छौ दाँतक छल।
मुइला पूतक बहुत नाम। ककरहु मुइलाक बाद ओकर गुणगान होइतहिँ छैक।
मुखमे राम बगलममे छूरा। पेँचियल व्यगक्तिक लेल प्रयोग।
मुखशुद्धिक ने प्रकार तनिका अरियातक बड़ चमत्का र। जनिका बिना ओरियानक बाह्माडम्बिर अधि‍क रहैत छनि, देखाबा अधिक रहैत छनि तनिका लेल प्रयोग होइछ।
मुख मीन तन सुन्दरर। जे देखैत तँ सुन्दयर छथि मुदा बोल वेश कटाह छनि, गारि अधिक बजैत छथि तनिका लेल प्रयोग।
मुकिऔने कटहर नहि पकैछ। कोनहु कार्य समयसँ पूर्व नहि होइत छैक।
मुदइके दी ऊँच पीढ़ी। विरोधी केँ सम्माढन देबाक चाही।
मुर्गा नहि बाजय तँ भोर नहि हुअय ? ककरो बिना कोनो काय्र बाँकील नहि रहैत छैक।
मुर्दा पर जेहने एक मन तेहने सय मन। वा मुर्दा पर जेँ सय मन जारनि तेँ एक मन आर। बहुत भार ककरहु पर पडि़ गेलाक बाद कनेक्शन आर पड़लासँ कोनो अन्त र नहि पड़ैत छैक।
मुरहीक पूजी नहि, पूड़ीक दोकान। ओकादसँ अधिक मनोरथ कयनिहारक लेल प्रयोग।
मुँह खाय आँखि लजाय। बैमानीक उपलब्धि पर निर्लजज व्य क्ति लेल प्रयोग।
मुँह नहि बोल आँखि नहि नोर। कोनहु भावुक परिस्थितिक चित्रण में प्रयोग।
मुँह ने धोय से भगते होय। कोनो तुच्छय व्योक्ति जखन डींग हँकैत अछि तँ एहि उक्ति द्वारा ओकरा डाँटल जाइछ।
मुँहने देखियौन चुकड़ीभट्ट। कोनो कनीय व्यनक्तिक मुँह दुसबाक लेल प्रयोग।
मुँहने देखियौन चुहाड़ सन। एकरो भावना पूर्ववते अछि।
मुँह देखि बीड़ा पोन देखि पीढ़ा। जेहन व्यिक्तितत्व तेहन स्वािगत होइत छैक।
मुँह केहनो सौख बराबरि। निर्धन, अभद्र एवं अपंगकेँ सेहो सौख मनोरथ होइत छैक।
मुँह परक बड़ाइ खुशामद। अर्थ स्प ष्टद।
मुँह मुसहरनी किदन धनुकाइन । वा मुँह मुसहरनी डाँड़ धनुकाइन। मुसहरक अपेक्षा धानुक सुन्द।र एवं सुखी होइत अछि।
मुँहमे दाँते ने पेटमे आँत। बुढ़ारियहु मे जे यथेस्टँ भोजन करैत छथि तनिकोल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
मुँहमे दाँत नहि मटर जलपान। एकरहु भावना पूर्ववते अछि।
मुँहमे धान दी तँ लाबा हुअय। अत्यमधिक चिन्ताु एवं निराशाजनक स्थिति निकलि गेलाक बाद ओकर चर्चा एहि उक्ति द्वारा कयल जाइछ।
मुँहमे तँ अछि चाउर बाजब ताल बेताल। दुलारे फटियाइत लोक कार्य सेहो उनटे पुनटा करैत अछि आ उनटे वैह जोरहुसँ बाजय लगैत अछि।
मुँहलगुआ डोमिन गाबय ताल बेताल। एकरहु भावना पर्ववते अछि।
मुँह सन मुँह नहि, मुँह तिनकोनमा,
कोदोक चाउरसँ कय दहुन चुमनमा। कोनो गारिपढ़आ वा आनी मित्रकेँ बुडिबक बनयबाक हेतु एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
मुँह सन मुँह नहि, रुपैया मुँह देखना। एकरहु भावना पूर्ववते अछि।
मुँहसँ निकलल बात आ बन्दू।कसँ निकल गोली। खूब विचारिकय कोनहु बात बजबाक चाही अन्यवथा अनुचित बजा सकैअय।
मुइने बैद अयलाह तँ मुँह बिधुऔने गेलाह। समय हाथसँ निकलि गेलाक बाद पछताबा रहि जाइछ।
मुदइ सुस्तन गवाह चुस्तत। मुख्यस पात्र जखन आलसी रहैत छथितँ सहायककेँ सक्रिय भेनहिँन की।
मुँह देखि बीड़ा गुण देखि पीढ़ा। व्यहक्तित्वद अनुरूपे आदर प्राप्तत होइत छैक।
मूड़ पलटने नाचय साहु। बनियाँके जँ पूजी ऊपर भय जाइत छैक, घाटा नहि लगैत छैक तँ ताहूपर ओ प्रसन्न भय जाइत अछि।
मूडि़ देलहुँ माङि खाउ। ‍ केओ ककरो जखन आगाँ बढ़ा स्वं य घुरि जाइत अछि तँ ओकरा पर एहि उक्ति द्वारा व्यं ग्यप कयल जाइछ।
मूर्खक लाठी माँझ कपार। लाख बुझौलहुपर मूर्ख मोचण्डक नहि बुझैत अछि आ झगड़ा झंझट ठाढ़ कय दैत अछि।
मूरसँ सूदि पियारा। बेटा-बेटीसँ नाति-पोता अधि प्रिय होइत छैक।
मूरी काटिकय रक्षा? मूलमे हानिकय सूदिक रक्षा करब बुद्धिमानी नहि।
मुनल मुँह मटकुडि़ये सन। कोनो गुम सुम उदास व्यनक्तिक लेल प्रयोगा, हास-परिहास।
मूसक मुँहमे मूसर। ओकादसँ पैघ भार लेब सम्भाव नहि।
मूस कयलनि यात्रा बिलाडि़ भेलनि आगु। कोनो योजना प्रारम्भल करितहिँि जँ विरोधी आगाँ आबि जाय तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
मूसकेँ गहूम होइत छैक तँ कि पूड़ी पकाकऽ खाइत अछि? जकरा जेहने सुविधा रहैत छैक, तेहने कार्य करैत अछि।
मुँह मरौनी भगवेनियाँ नाम। वा
किदन मरौनी भगवनियाँ नाम। स्वनयं कुकर्म सँ भरल, मुदा बाहर सँ शुभ्र।
मूस मोटयती तँ मुङड़ी होयती। क्षुद्र व्यतक्ति कतेक पैघ कार्य कय सकैछ? डींग हँकनिहार पर एहि उक्ति द्वारा व्यं्ग्य कयल जाइत छैक।
मुँह ने कान बीमे दोकान। मुँह दब्बर एवं कम गुणी व्य क्ति जखन अधिक अधिकार प्राप्तु करबाक प्रयत्नध करैत अछि तँ एहि उक्ति द्वारा मुँह दूसल जाइत छैक।
मेहियाँ ताँही कि मोही। दाउनमे मेहियाँ बड़दकेँ अधिक भीड़ पड़ैत छैक।
मैया के ने मोटरी धीयाके ने नोर। निर्धन मायक लेल बेटी नहि कनैत छैक।
मैया मरय धीया लय,
धीया मरय जारलय। माय अपन बेटी लेल हरान आ बेटी अपन प्रेमी लेल हरान।
मोटा ने चोटा बड़कीटा लोटा। धन बीतक पता नहि जलपात्र वेश नमहर।
मोनक पैंच मोने निस्ता्र। मोनहि मोने पैंच लेला-देलापर ओ मोनाहिमे रहि जाइत छैक, ओसूल होइत छैक।
मोर पियाक माथपर पाँच बिगहा खेत। अपन पतिक समृद्धि पर, मिथ्या पैघतव पर जे ऐँठैत चलैत छथि तनिका लेल प्रयोग।
मोर पुत बिगड़ल तिरहुति जाय,
घुरमि-घुरमि कय टुनकी बजाय। ककरो नीक कार्य सिखौलापर जँ अयश भय जाय।
मोर बेटा बड़ पण्डित, ककरो कहल मानय नहि। केओ अपन फचाँडि़ वा उपद्रवी बेटा पर जखन घमण्डच करैत अछि तँ व्यं ग्यममे एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
मोर भेल बिआह आब करबह की? जकरा केओ नहि पूछैत छैक, कोनहु प्रकारक विकलांग रहलाक कारण कुमारे रहि जयबाक स्थितिमे रहैत अछि, जँ कहुना झूठो बाजकय विवाह भय जाइत छैक तँ बादमे हल्लाा भेलापर एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
मोरा मन माय जानय,
कठौतीमे चिक्कास सानय। पेटू रहितहुँ जे आनठाम भोजनमे लाज करैत अछि, तकरा लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
मोर मन मोर मन नहि पतिआय। सौतिनिक टाङ टूनू झूलिते जाय। जाहि नारीकेँ अपन पति वा कोनो दोसर नारीपर विश्वाअस नहि होइत छैक, तकरा पर व्यंवग्यप करबाक हेतु एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
मोर सैयाँ के उनटे रीति,
साओन मास उठाबथि भीत। उनटा-पुनटा एवं असामयिक कार्य कयनिहार लेल प्रयोग।
मोर सौतिनि खयलनि दही,
मोरासँ कोना जायत रही। एक पटीदारकेँ किछु भेटि गेलापर दोसर पटीदार जखन व्यिग्र भय उठैत छथि तँ हुनक व्यखग्रता पर व्यंैगय।
मोलबी साहेबक दाढ़ी वाह-वाहमे गेल। हँसिये-मजाकमे जखन कोनो आवश्य क सामान सठा देल जाइत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
मौगीक खयनाइ आ नहयनाइ केओ देखलक केओ नहि देखलक। नारीकेँ स्नािन भोजन पर्दामे करबाक चाही।
यत् पठितम् तत् गुरुए समर्पितम्। बज्र भुसकौल विद्मार्थीक हेतु एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
यमराजक फेरी पड़नहि। एक ने एक दिन मृत्यु् निश्चित अछि।
यार के गुस्साम भतार पर। ककरहु अपराधक सजाय जखन दोसरकेँ दय देल जाइत छैक।
यार कुसियार यार। अति गाढ़ मित्रता लेल प्रयोग।
यारी ने लागय। अति गाढ़ मित्रताक बाद मनमोटाक सम्भाावना पर एहि उक्तिक प्रयोग।
यैह गूड़ खयने कान छेदौने। कान छेदयबाक काल नेनाकेँ मिट्ठ खुआ भुलोल जाइत छैक।
यैह जगदिप्पोै नगर उजाड़लनि। झगड़लगौन वा बदमासि स्त्री क लेल एहि उक्तिक प्रयोग।
यैह ठाकुर गाम कमयताह जनिका अस्तूारा ने कैंची। पैघ मनोरथ रखनिहार तुच्छच व्य क्तिक मुँह दुसबाक हेसु एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
यैह मुँह पान आ यैह मुँह पनही। अपन स्वहभाव एवं व्य।वहारक अनुकूले स्वासगत वा अपमान होइत छैक।
यैह लोहार गाम कमयताह, जनिका रुखान ने बसिला। तुच्छ व्यतक्ति जखन पैघ मनोरथ प्रकट करैछ।
योगीके कूकुर बलाय। कोनो वस्तुु वा जीव जखन ककरो लेल भार एवं घाटाक सौदा भय जाइत छैक तँ एकर प्रयोग कयल जाइछ।
योजन खय से कोस अघाय? जे बहुत अधिकक आकांक्षा रखैत अछि से कनेकमे कोना सन्तुंष्टछ भय सकैछ?
रकटल छलहुँ कोहबर लय,
हे गैसैयाँ प्रात नहि करब। अधिक दिनक प्रतीक्षाक बाद जखन कोनहु कार्यमे रमि जाइछ तँ ओकरा पर एहि उक्ति द्वारा व्यंतग्यह कयल जाइछ।
रङल सियार जकाँ। ऊपर सँ शुभ शाभ्र किन्तुग भीतरसँ दुर्जन व्य क्ति लेल प्रयोग कयल जाइछ।
रण्डीँ रूसल धरम बाँचल। कोनहु दुर्जनसँ जखन मनमोटाव भय जाइत छैक तँ प्रसन्न तामे एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
रमता जोगी बहता पानी। जहिना बहैत पानि कतहु सँ कतहु चलि जाइत अछि, तहिना साधु-सन्यायसी सेहो आइ एतय काल्हि ओतय चालि जाइत छथि।
रण्डीअ ककर बोहु भड़ुआ ककर सार? चरित्रहीन लोक पर कयमपि विश्वा स नहि करबाक चाही।
रब्बी राँड़के भदइ साँढ़के। रब्बी (खेसारी, मसुरी तीसी राहडि़ आदि) उपजबामे ओतेक परिश्रम नहि करय पड़ैत छैक, जतेक भदइ उपजयबामे।
रवि शुक्रजे पश्चिम जाय,
हानि होय पन्थश सुख नहि पाय। रवि एवं शुक्र दिन पश्चिम मुँह दिक्शू,ल होइत छैक।
रस्सीछ जरि गेल मुदा ऐंठन नहि गेल। घटि गेलाक बादो जिनकर अहंकार नहि जाइत छनि।
रहथि दुन्दुाभी बजबैत, रावण के दरबार; सैहकलियगुमे आबिकय भय गेलाह भूमिहार। भूमिहार जातिक मित्रक संग हास-परिहासमे एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
रहय बाँस ने बाजय बाँसुरी। झंझटिया वस्तुाए जँ समाप्तइ कयदी तँ झंझटे समाप्तु भय जाइत छैक।
रहलह बात थोड़, जनि रेकाबह घोड़। छोट बात पर नमहर झगड़ा ठाढ़ कयनिहार लेल प्रयोग।
रहली मरतिरया, भेली समधिन। कोनो देहाती मूर्ख दुर्जनकेँ जखन प्रतिष्ठात भेटि जाइत छनि तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
रही गरीब ताकी गामक जमा। साधारण व्याक्ति जखन बड़का हिसाब माङय लगैछ तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
रही बुलबुल खाइ डूमरि। तुच्छु व्यमक्ति जखन बड़का मनोरथ करय चाहैत अछि तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
रही सासुर दिन दुइ चारि,
तखन मजा भेटत ससुरारि। कमदिन रहब तखने सासुरमे प्रतिष्ठाग ओ प्रसन्नहता प्राप्ति भय सकत।
रहैलय चमार करैलय एतबार। सामान्यम व्यरक्ति जखन अधिक पूजा-पाठ आचार-विचार देखबय लगैत अछि तँ ओकरा पर पैघलोक ईर्ष्यायवश एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथि।
राउत परिकल ढौआमे। कोनो नीक लोक जँ दू नम्ब री कार्यमे लागि जाथि तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जा सकैछ।
राख पति रखा पति। अहाँ ककरो प्रतिष्ठाप देबैक तखने अहूँके केओ प्रतिष्ठात देत।
राकसक घरमे भेम पकवान। जेहन लोक तेहन भोजन।
राज-पाट घटल जाय हुकूममति बढ़ल जाय। घटि गेलाक बादो जे अपन आडम्बूर नहिक घटबैत तनिका लेल एहि उक्तिक प्रयोग।
राजपूत आ धानक ओर छोर नहि। कोन धान कहिया कतय सँ आयल, कय प्रकारक धान होइत अछि से पता लागब कठिन, तहिना राजपूत जातिक इतिहास अति प्राचीन अछि, पता लागब कठिन।
राजपूत जाति आ मुसराक धनुष। जहिना समाठक धनुष नहि लहैत तहिना राजपूत नहि झुकैत छथि।
राजबुद्धिसँ चोर बुद्धि तेज होइत छैक। चोर बड़ चतुराइसँ अपन कार्य करैत अछि।
राजा ककर पाहुन, जोगी ककर मीत? राजा ककरो अतिथि तथा साधु-सन्यामसी ककरो मित्र नहिि बनय चाहैत छथि।
राजाक दरबामे कनैत जाय सेहो मारल जाय,
हँसैत जाय सेहो मारल जाय।
राजाक ने आगाँ चली ने पाछाँ चली। दुर्जन एवं पैघलोक सँ बचिकय रहबाक चाही ओकरा संग किछु करैत सजाय भेटि जाइत छैक।
राजाके सेवने कान दूनू सोन,
बनियाँके सेवने छटाक भरि नोन। पैघ उदार लोकक सेवासँ अधिक लाभ होइत छैक।
राजा जे बूझय से न्याभय। शासक जैह निर्णय करैत अछि सैह कानून मानल जाइत छैक।
राजाक गाँव मुसहर बाँटय। मुसहर अपनामे बाँटि लैत अछि आ तदनुसार कमाइत अछि़।
राजाक घरमे टाकाक दुख पैघ लोककेँ आर्थिक सुविधा रहैत छैक।
राजा करय से न्याकय पासा करय से दाव। राजा किछु करत तँ क्षम्या छैक, तहिना कुश्तीि वा बाँक्सिंग मे कनेक्शन मारिपीट सेहो दावे पेँच मानि लेल जाइत छैक।
राजाके राजक चिन्ताि, पेटूके पेटक चिन्ता । राजाके राजक चिन्ताक, गड़ेरीके चिन्ता । जकर जे अध्य वसाय रहैत छैक, प्रिय रहैत छैक, से ताही में व्य‍स्तप रहैत अछि।
राजा हैब तँ खायब की ? नेतागिरी जँ इमानदारीसँ कयल जाय तँ सतत् आर्थिक संकट बनल रहैत छैक।
राड़क असघैं जीवक जंजाल। कोनो सामान्यज मजूदर वर्गक लोक जखन पढि़लिखि लैत अछि तँ पैघलोककेँ अखड़य लगैत छनि।
राड़क घरमे माँड़क लेखा। गरीबक घरमे माँड़क सेहो महत्त्व होइत छैक।
राड़क बेटी महफा चढ़लि,
सागक मूरी देखिते गेलि। जकर जे स्तदर रहैत छैक, केहनो परिस्थितिमे तदनुकूले ओकर आचरण देखल जाइत छैक।
राड़क बोहु सभक भौजाइ? गरीबक स्त्री सँ अधिक लोक हास परिहास करैत रहैत अछि।
राड़क मागु माँडि़ तिरपित। निर्धन लोक कम्मे़ उपलब्धिमे प्रसन्नो भय जाइछ।
राड़क लग्घीकक कार्य भेल तँ छौमास लग्घिए नहि। कोनो सामान्य‍ व्य क्ति जखन कोनहु लेल बारम्बामर हरान कैयोकय नहि करैत छैक, तँ क्रोधमे लोक एहि उक्तिक प्रयोग करैछ।
राँड़क सुख जे सबके मरय,
महिँसिक सुख जे मढि़या पड़य। अपना जखन सुख नहि रहैत छैक तँ अनको सुख नीक नहि लगैछ।
राँड़ की जानय अहिबाती के बात?
राँड़ की जानय आद-गुड़क स्वासद ? जे बाल विधवा रहैत छथि हुनका प्रसव नहि भेलाक कारण आद-गुड़ नहि खयने रहैत छथि।
राँड़ कानय अहिबाती कानय, तकरा संग बूढ़ कुमारि कानय। देखाँउस पर जे अनर्गल प्रलाप करैत अछि तकरालेल प्रयोग कयल जाइछ।
राँड़ के सुख बलाय।
राड़ के सुख बलाय। जकरा सदिकाल काजहिमे मोने लगैत छैक, आरामक व्यावस्थानक विरोध करैत अछि तकर मूर्खता पर व्यं्ग्या।
राँड़ मरय जब सब मरय। जकरा लेल अधिक लोक नहि कनैत छैक से अधिक दिन जीबैत अछि।
राँड़ तँ मँडि़ मे सुखी। दीन-हीन लोक कमहिमे प्रसन्नस भय जाइछ।
राँड़ने भेली साँढ़ भेली।

राँड़ मौगी साँढ़। जे विधवा अधिक दबंग रहैत छथि तनिका लेल प्रयोग ।
राँड़ साँढ़ सन्यादसी, जँ जीवय तँ सेवय कासी।
राँड़ साँढ़ सन्यादसी, जान बाँचय तँ सेवय कासी। उक्त तीनूक आधिक्य वाराणसी मे देखल जाइत अछि।
राडि़न मूडि़न हेरय बाट,
कहाँ होइयै भोज-भात। निर्धनकेँ भोजहिमे भरिपेट नीक भोजन भेटैत छैक।
राड़ं एड़ं पवित्रम्। दुर्जन व्य क्ति तेरहम विद्मासँ सोझ रहैत अछि।
रातिसँ धनियाँ कामरू जाथि,
दिमे कौआ देखि डेराथि। डाइन जोगिन दिन भरि तँ भयभीता रहैत छथि मुदा राति भेने गाछ हँकैत कामरूप कामाख्या सँ भय अबैत छथि।
रातिमे भूतसँ डेराथि से ओझा कहाबथि। सामान्यभ व्येक्ति जखन गुणी बनबाक अभिनय करैत अछि तँ एहि उक्ति द्वारा व्यंयग्य कयल जाइछ।
राजीके माँड़ो नहि नौडि़न के बुनिया। प्रमुख व्यडक्ति केँ किछु नहिं किन्तु सामान्यवकेँ जखन अधिक स्वांगत कयल जाइत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
रानी रूसथि अपन सोहग लेथि। रुसला पर जकरा अधिक घाटा जाइत छैक।
रामक नाम लिअ। अनिच्छित प्रसंग पर एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
राम कहय से धक्का पाबय,
डाँड़ घुमाबय टक्काा पाबय। भजन गौनिहारक उपेक्षा तथा फिल्मी। वा अश्लीौल गीत पर टाकाक वर्षा होमय लगैछ।
राम कहय हर गोड़हा बहय,
चूल्हि-खापडि़ सोझाँ रहय। रामक नाम लेनिहार आस्तिक व्यँक्ति अधिक श्रम करैत अछि।
राम कहह राम कहह राम कहह तोता, रामक भजन बिनु खयबह गोँता। पिजड़ाक जे सूगा रामक नाम नहि लैछ, टेँ टेँ करैछ, तकरा लोक खोँचाड़ैत छैक।
राम कहू राम कहू राम कहू बाउरे,
रामक चरण किछु हृदय लगाउ रे। आस्तिक द्वारा नास्तिक केँ उपदेश।
रामके वनवास केकइके कलंक। जे अवयमभावी छैक तकरा लेल जँ ककरो अयश भय जाइछ तँ उक्ता लोकोक्तिक द्वारा स्प टीकरण देल जाइछ।
रामचन्द्रइ लक-लक सीतादाइ चोकना। वर पातर कनियाँ मोट रहला पर हास-परिहास कयल जाइछ।
रामधनी के कोन कमी ? रामभक्तककेँ सबकिछु प्राप्तस भय जाइत छैक।
रामनाम की लूटि हय,
जे लूटि सकय से लूट। मङनीमे जखन किछु वितरण होमय लगैत अछि तँ लूटि मचि जाइत अछि।
राम वाम तँ सब वाम। भगवानक विरोधीकेँ सब किछफ विरीते भय जाइत छैक।
राम भजनमे आलसी भोजनमे होसियार। जकरा कार्यमे मोन नहि लगैत छेक केवल चिन्ताा में जोगाड़मे रहैत अछि तकरा लेल एहि लोकोक्तिक प्रयोग होइछ।
रान्होल भात परसऽ दे। अनकर कयल पर यश कमयबाक प्रयत्नह।
राहडि़ सबसँ बाहरि। गाम भरिमे एकसर दुर्जन व्ययक्ति पर व्यंभग्यर।
राहटके टाटमे अलीगढ़के ताला।
राहटके टाटके गुजराती ताला। सामान्यट वस्तुलमे कोनो मूल्ययवान वस्तु लगौला पर एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
रीन खयने की खढ़ तपने की ? ऋणक पाइ अधिक दिन नहि चलैत छैक।
रीने बिआय पैंचे खिआय। ऋण में सूदि भेटौत छैक, जाहिसँ पूजी बढि़ जाइत छैक, किन्तुछ लगौलासँ से नहि भय अवमूल्यकनेँ भेल चलि जाइत छैक।
रुपैयाक पूत पहाड़ तोड़य। टाकाक बलपर भरिगरों कार्य भय जाइत छैक।
रुपैया खरचब दू तीन चारि,
कनियाँ ताकब खूब होसियारि। कम खर्चमे जे नीक कार्य करय चाहैत छथि तनिका पर व्यंकग्यह।
रुपैया चीन्हीव बेर-बेर,
आदमी चीन्हीह एक बेर। टाकाकेँ बारम्बायर चिन्हहबाक अवसर भेटैत छैक, किन्तुर मनुष्यबकेँ एकहि बेरमे गमि लेल जाइत छैक।
रुपैये सँ रुपैया बाझय। जकरा लग जतेक पूजी रहैत छैक से ततेक कमाइत अछि आ समाजकेँ ततेक प्रभावित करैत अछि।
रुसने फुलने फल पायब,
बिलाडि़क ऐँठाओल वैह अन्न, खायब। रूसि रहलाक बादो फेर रास्तातपर आबहि पड़ैत छैक, उनटे किछु घाटा लागि जाइत छैक।
रूसल जमैया करता की,
धीया छाडि़कऽ लेताह की विवाह द्विरगमन भय गेलाक बाद जमायकेँ रुसलासँ कोनो लाभ नहि होइत छनि आने ससुरकेँ कोनो अन्तनर पड़ैत छनि।
रूसल जँ बैंसल नहि जाय आ फाटल जँ सीवल नहि,
जाय तँ एहि संसारक कार्ये नहि चलय। प्राज्ञोक्ति-अर्थ स्प ष्ट ।
रूसल बहुरिया खोरल आगि। उक्त दूनू पहिने धधकैत छैक, किन्तुब लगले शान्तोह भय जाइत छैक।
रे डोमा....। ककरहु कुकृत्य. पर डाँट फटकार करबाक लेल प्रयोग।
रोगक घर खाँसी झगड़ाक घर हाँसी। उकासीसँ असाध्यझ रोग (कफ तपेदिक, दम्मास आदि) तथा हँसी भजाक सँ झगड़ाक सम्भासवना रहैत छैक।
रोगी बिआहलनि बैदक भरोसे। पथ्य -परहेज स्व।यं करय पड़ैत छैक।
रोटी तँ मोट भल नारी तँ छोट भल। अधिक खपटी रोटी नीक नहि लगैत छैक, तहिना पुरुषक अपेक्षा अधिक नमछर स्त्री सेहो नीक नहि लगैछ।
रोहुक मूड़ा भुन्नाषक पेट,
दहीक ऊपर गूड़क हेठ। माछामे रोहुक मूड़ा तथा भुन्‍नाक पेटी अधिक स्वाहदिष्टभ होइत छैक।
रौताइन के दही राजाके भेँट। पैघ लोककेँ दही दूध सेहो उपहारमे आबि छैक।
लगन बीति जायत, चमकब छूटि जायत। कोनहु कार्य शीघ्र करबाक प्रेरणा।
लग माँड़रि दूर पानि, दूर माँड़रि लग पानि। रातिमे चन्द्ररमाक चारूभाग माँड़रि यदि घेरने रहय तँ किछु दिनमे वर्षाक सम्भा वना, किन्तुभ जँ लगाहिसँ घेरने रहय तँ अधिक दिन में वर्षाक सम्भाकवना मानल जाइत छैक।
लगमे कचहरी घूसदेब बेकार। अपेक्षा मे नाजायज खर्च नहि होइत छैक।
लङटा पड़ल उघारक पाला। दुर्जनकेँ जखन पैघ दुर्जनसँ भिड़न्तक भय जाइत छैक।
लङटासँ भगवानो डेराथि। दुर्जन व्याक्तिसँ सबकेँ भय होइत छैक-भगवानहुँके, कोन ठेकान मन्दिरसँ मूर्ति चोराकय इनार-पोखरिमे फेकि दिअय।
लच्छकन एक कुलच्छिन चारि,
की करिहेँ घर भूरि बिलाडि़। भुल्लीह बिलाडि़ पोसनाइ शुभ होइत छैक, किन्तुह जँ अन्यापन्येह चारिटा कुलक्षण रहत तँ के बचा सकत ?
लड़य सिपाही नाम जमादारके।
लड़य सिपाही नाम सरकार के । वा
कप्तासन के वा हवलदार के। परिश्रम ककरो प्रति‍ष्ठा ककरो।
लडि़का लाथे लडि़कोरी जीबय। ककरहु बहानासँ केओ जखन लाभ उठालैत अछि तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
लड्डू लड़य झिल्ली झरय,
नारदजीके पेट भरय। दू व्यकक्ति वा गुटमे जखन संघर्ष होइत छैक तँ तेसर केँ लाभ भेटैत छैक तेँ ओ झगड़ा लगबैत रहैत अछि।
लडि़का सिखाबय बूढ़ बाबाके। कनीय व्यिक्ति जखन वरीयकेँ शिक्षा देमय लगैछ तँ एहि उक्ति द्वारा विरोध कयल जाइछ।
लबर-लबर तीन पहर। भरिदिन जे गप्पेन हँकैत रहैत अछि तकरापर व्यंेग्यह।
लबराक मौगति माघ मास। जे अनेरो फैशन कयने रहैछ, ओहन लबरफाँडि़ व्य क्तिक दुर्दश अत्यनधिक ठण्ढीघमे भय जाइत छैक।
लबरी मौगी नीक लबरा मनसा नहि नीक। लबर फाँडि तँ केओ नीक नहि किन्तुद नारी कोनहु पुरुषकेँ मूर्ख बनयबाक हेतु एकर प्रयोग करेत छथि।
लबरी लचक्का मारय, तीन दिन पर नूआ फाइय।
लबरी लचक्का मारय, मासे5मोस नूआ फाड़य। दुर्ब्बकल चरित्रवाली नारी ककरो आकृष्ट करबाक हेतु रंग-विरंगक शारीरिक (अंग) प्रदर्शन करैत अछि।
लबरी लचक्का, साँयके कहलक कक्का। चारित्रिक दोष पर व्यंयग्यक।
लबरीके बेटा भेल,
नाम उखपाती देल। ओहि प्रकारक नारी अपन सन्तांनक नामे तेहने रखेत अछि।
लमगर धोती मुखमे पान,
घरके हाल गोसैयेँ जान। वा लम्बा धोती...। निर्धन रहितहुँ बाहरसँ जे पैघत्वकक अभिनय करैत छथि तनिका लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
ललकल पगिमा फलकल टीक,
तखने बुझी तिरहुतिया थीक। पूर्वमे मधुवनी दरभंगा सेहो तिरहुते कमिश्नेरीमे छलैक।
लस्क्रमे ऊँट बदनाम। कोनो फसादी व्यमक्तिकेँ सब घटनामे जोडि़ देल जाइत छैक।
लहङ लाड़ला सदा सुखी। बिगड़ल बालक, जे घरक कोनो कार्य नहि करैछ तकरा लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
लहनाक पूत तगादा। बिना तगादाक कर्जओसूली नहि होइत छैक।
लक्ष्मीा अबैत कतहु नहि बेढ़। लक्ष्मीाकेँ अबैत काल केओ ढाठ नहि लगबैत छनि।
लाउ टाका मारू फक्काब। लेन-देन परस्पतरे होइत छैक।
लाचारके विचार कोन? दीन-हीन व्य्क्तिकेँ विवशताक कारण उच्चक विचार छोड़य छैक।
लाजू मरय ढीठू जीबय। जे ढीठ व्यीक्ति छथि तनिका सुविधा रहैत छनि, किन्तुछ जे संकोची छथि से भूखे मरैत छथि।
लाजे भावहु बाजथिक नहि,
भैंसुर बाट छो‍ड़थि नहि। बिना बजलासँ जखन कार्य नहि चलैत छैक तँ विवश भय एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
लाजो के लाज होइ छै। कोनो विशेष घटना पर सब लज्जित भय उठैछ।
लाजो ने लजयली मौगो धीर,
झोरक बदला मङलनि खीर। कोनो निर्लजज नारी केँ दोसरि एहि उक्ति द्वारा झगड़ा करैत छथिन, फज्इवति करैत छथिन।
लाठी मोरा लेखे काठी,
मुक्का मोरा लेखे हुक्का। जकरा दिन राति मारि लगैत रहैत छैक तेहन थेत्थारि माउग वा पुरुष लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
लातक देवता कतहु बातसँ मानय? दुर्जन बिना मारिक नहि मानैत अछि।
लाठीक हाथे राउत बेमाक। लण्ठक व्येक्ति बातसँ नहि लाठीसँ बात करैत अछि।
लादि दे लदा दे लादनवाला संग कय दे। सब काय्र अनके कयनिहार परजीवि व्यिक्ति पर व्यंरग्यि।
लादू साहुके बेटा पादू साहु,
छौ मन के खरीद नौ मन के बेचलक। जे व्यकक्ति घाटाक सौदा करैत अछि तकरा लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
लापट सापट हर बहय,
मोर बड़दा बैसल रहय। केहन कहाँ (कनहा-कोतरा) बड़द हर बहैत अछि सुदा हमर ओतेक नीक बड़द नहि बहैत अछि।
लालच बस परलोक नसाय। अधिक लोभीक इहलोक परलोक दूनूक नाश भय जाइत छैक।
लाल बुझक्ककर बुझि गेल। अलगट्टे बुझबाक गप्पब हँकैत अछि, किन्तुै विफल रहैछ तकरा पर व्यंिग्यै।
लाल महफामे कारी कनियाँ खूब सोभय। असुन्दफरि नारीक फैशन पर व्यंतग्य ।
लाल मिरचाइमे बड़ी तिताइ। देखैत सुन्देर किन्तु स्वा्द अति कड़गर।
लिखऽ अबैअय तँ नहि, मेटबऽ अबैअय तँ दूनू हाथे। जे सृजनमे नहि विध्यतवंसमे विश्वावस रखैत छथि, तनिका पर व्यंवग्यव।
लिखि लोढ़ा पढि़ पाथर। जे निट्ठाह अपढ़ रहैछ, तकरा लेल एकर प्रयोग कयल जाइछ।
लियऽ बासू अपन हाँसू। ककरो द्वारा देल दायित्वरकेँ आपस करैत काल प्रयोग।
ली बकरी ली, अपन खाइछी अनका की ? केओ नीक निकुत खा रहल अछि; कोनो मित्र कहल कै-‘’ली बकरी ली।‘’ उत्तर देलकै-‘’अपन खाइछी अनका की?’’ हास-परिहासमे प्रयोग।
लुक्खी मारने दुखी, कौआ मारने सुखी। लुकखी अप्रिय जीव नहि थीक, किन्तुे कौआक व्य्वहार अप्रिय होइत छैक।
लुच्चा् मारलक बटेर,
नौ मन गदरी सौ मन तेल। झूठ बजनिहार पर व्यंलग्य ।
लुच्चान मारलक बेङ,
सय-सय पसेरीके एक-एक टेङ। भावना पूर्ववते अछि।
लूटिमे लटबा नफा। मङनीमे जैह किछु भेटि जाइत छैक सैह लाभ होइत छैक।
लूटि लाउ कूटि खाउ। एकहक साँझक सीधाक जोगाड़ कय जे बनबैत खाइत अछि, जकरा किछुओ संचित धन नहि छेक तकरा लेल एहि उक्तिक प्रयोग।
लूरि ने भास दैवक त्रास। अपना कोनो लूरिमुँह छनि नहि, झुटे्ठ दैवक दोष लगबैत छथि।
लेखा लेब कि बनियाँ डाँड़ब ? जे बिना हिँसाब कयनहि ककरो आर्थिक मामलामे दण्डित करय चाहैछ तकरा लेल पीडि़त व्य्क्ति एहि उक्तिक प्रयोग करैछ।
लेखे जोखे थाहे, बचबा डूबल काहे? हिसाब कयलासँ थाह पाबि गेल रही तखन बचबा डूबि कोना गेल ? व्यबवहारिक ज्ञानक अभाव पर व्यंनग्य ।
लेब-देब साढ़े बाइस, भरि ठेहुन जमौरा। जे आर्थिक सहयोग नहि कय केवल गप्पय छोड़ैत रहैत अछि तकरा लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
लोककेँ अपन टेटर नहि सूझैत छैक। अपन दोष ककरो नहि देखाइ पड़ैत छैक।
लोकनिनिक पयर जतने सासुर वास? लोक जतय रहैत अछि ततहि सबसँ मिलिकय रहय पड़ैत छैक।
लोक पतित कि बन्स पतित? व्य क्तिगत गुण-दोष होइत छैक, वंशक नाम लोक व्यतर्थ लगबैत अछि।
लोक लोकपतियोक नहि। निर्दोष व्योक्तिक सेहो आलोचना होइत अछि।
लोटा आ बेटा बाहरे चमकैत छैक। जाहि लोटाकेँ बक्साचमे बन्दल रखने रहब से क्रमहिँ कारी भय जायत, मुदा बाहर राखब तँ चमकैत रहत।
लोढ़ा कयलनि अपन बड़ाइ,
हमहू शम्भुिनाथ के भाइ। विद्वान ओ पैघ औफीसरक भाइत जखन मूर्ख रहितहुँ घमण्डक करय लगैत छथि तँ हुनका लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
लोढ़ानाथ के माढ़ा भोग। मूर्ख व्यकक्तिक स्वा गत साधारणे वस्तुखसँ कयल जाइत छैक।
लोभहि पतन कहय संसार। संसार भरिक लोकक ई धारणा छैक जे लोभक कारण लोक पतित भय जाइछ, ओकर पतन जाइत छैक।
लोभीक गाममे ठक कतहु उपास पड़य? कोनो लोभी व्यकक्ति जखन ठका जाइत अछि तँ ओकरा लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत छैक।
लोभीक घरमे ठक कतहु उपास पड़य? दूनूक भावना एक अछि।
लोभी गुरु लालची चेला,
दूनू नरकमे ठेलमठेला। ढूटा लोभी लालची व्य।क्तिकेँ एकठाम देखि हास-परिहासमे एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
लोभी मरथि लोभ लय,
नामी मरथि नाम लय। जकरा जाहि कार्यमे रुचि रहैत छैक से ताहि कार्यक लेल व्युग्र रहैत अछि।
लोहारक कुच्चीे आगि-पानि दूनूमे। जे उभय पक्षमे उपस्थित रहैत अछि तकरा लेल प्रयोग।
लोहे लोह धराब। लोहहिसँ लोह पकड़ाइत छैक एवं कटाइत छैक।
लौटती वरियातीकेँ के पुछैत अछि? कार्य निकलि गेलाक बाद मनोवृत्ति बदलि जाइत छैक।
लंकामे आगि लगलैक तँ उनचासो बसात बहय लगलैक। विपत्ति एकसर नहि अबैत छैक।
लंकामे जे बड़ छोट से उनचास हाथ। रावणकालीन लंकाक भयावहतासँ आधुनिक उपद्रवी गामक तुलना उक्तस लोकोक्ति द्वारा कयल जाइत अछि।
वन-वन फिरहिँ बलि के मारे। ककरहु द्वारा जखन किछु लोक अत्याधिक शोषित-पीडि़त होइत अछि, डरेँ पड़ायल घुरैत अछि तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
वर कतौक रहथु, गामक लोक गीतो गायबसँ गेल?
वर कतौक रहथु, गितगाइन तँ गामेक रहती। बाहरसँ केहनो व्य,क्ति आबि जाथु, किन्तुस स्थासनीय लोकक प्रभावकेँ समाप्तक नहि कयल जा सकैछ।
वर-कनियाँके भेटे ने अठोङर लय मारि। समयसँ पूर्व जे व्यकग्रता देखौल जाइत अछि तँ एहि उक्तिक प्रयोग द्वारा व्यंङग्य कयल जाइछ।
वरके माथा जाल तँ वरियातक कोन हवाल? प्रमुखे व्याक्ति जखन घिना गेल तँ सहयोगीक कोन हाल?
वर-चाहथि कनियाँ, समधि धन आ वरियाती चाहय मन। वरकेँ नीक कनियाँ, समधिकेँ पर्याप्तआ तिलक दहेज चाही, किन्‍तु वरियातीकेँ मात्र स्वकगत सत्का र चाही।
वरकेँ देखियनु गे माई...। हास-परिहासमे शंकरसे कोनहु युवकक तुलना करैत एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
वरे बुडि़बक तँ जैतुक के लेत ? वा
दहेज के लेत ? जेहन मुँह-कान वा अपन व्ययवहार रहैत छैक तकर अनुकूले लाभ-हानि प्राप्तत होइत छैक।
वरोक माय आ कनियोँक माय। जे उभय पक्षकेँ धेने रहैत केम्हनरहुसूं देखार नहि होइत छथि, तनिका लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ। दूनू प्रतिद्वन्दीए गुटक भाजन बनबाक सम्भा वना।
वस्त्रन पहिरी तीन दिन,
बुध वृहस्प ति शु्क्र दिन,
हरने खगने रवि दिन। नव वस्त्र रवि बुध, वृहस्पकति आ शुक्र दिन पहिरबाक चाही।
वानर की जानय आदक स्वावद? जकरा प्रस्तु त विषयक ज्ञान नहि रहैत छैक तकरा लेल एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
वानर गर नहि शोभय माल। एकरहु भावना पूर्ववते अछि।
विप्रट हलुआ छीक धन ओ बेटी के बाढि़, ताहूसँ धन नहि घटय तँ करी बड़का सँ राडि़। ब्राह्मणकेँ टहलू मे रखनाइ, सदिकाल छीकायवाली बकरी केँ पोसनाइ तथा अधिक बेटीक जन्मब भय गेनाइ दरिद्राक लक्षण थीक।
विरही जनके सदा वसन्त । जे विरहमे छथि तनिका मिलनक आतुरता ततेक रहैत छनि जे सब दिन वसन्तेत बुझि पड़ैत छनि।
विवाह भेल कि पढ़ाइ गेल। जे केवल विवाहक लेल पढ़ाइ करैत छथि से विवाह होइतहिँ पढ़ाइ छोडि़ दैत छथि।
विवाहसँ विधि भारी। विवाहक सम्पू र्ण विधि सम्निन्नक करब छैक।
वैह मुँह पान खुअबैत छैक, वैह मुँह पनही खुअबैत छैक। अपन स्वअभाव आ व्यववहारक अनुसारे मान वा अपमान प्राप्तआ होइत छैक।
वैह रामा वैह कठोलाबा। सम्पूार्ण परिस्थिति परिवर्तनक बादो जँ केओ अपन व्यहवस्थाि नहि बदलैछ वा निर्धनता यथावते रहि जाइछ।
विपत्ति एसगर नहि आबय। अर्थ स्पएष्ट।।
शनि जारय रवि फारय सोमा करय सुङ्डाह। मंगल मारय जीवसँ बुध पहिरि घर जाह।। नव वस्त्रज जँ शनि दिन पहिरब तँ जरि जायत, रवि दिन पहिरब तँ फाटि जायत, सोम दिन जरिकय सुङ्डाह भय जायत, मंगल दिन पहिरब तँ जान पर खतरा बुझू; तेँ बुध दिन नव वस्त्र पहिरी।
शानि मंगलवार पश्चिम दक्षिण जाइ,
अनको धन किछु पड़लो पाइ। शानि एवं मंगलकय पश्चिम एवं दक्षिण मुँहक यात्राा नीक मानल गेल अछि।
शहर सिखाबय कोतबाली। जखन जेहन दायित्वल भेटैत छैक तदनुकूले लोककेँ बनय पड़ैत छैक तथा निर्वाहो भय जाइत छैक।
शीलवान पुरुष भिखारि,
शीतवती नारि छिनारि। जे व्य क्ति विचारवान एवं संकोची रहैत छथि से भूखो मरैत छथि, किन्तुो नारी जँ ओहन छथि तँ हुनवा शारीरिक शोषण भैयो गेलापर ओ किछु बजैत नहि छथि।
शंकर चललाह करय विवाह। वयसाहु तथा पैआह (विकलांग) वर पर व्यंहग्यव।
शंख बाजय बलाय भागय। प्रत्येयक हिन्दू केँ पूजाक अन्तवमे आरतीक समय शंख चाही।
सकल पदारथ एहि जग माही,
करमहीन नर पाबत नाही। सब प्रकारक सुख सुविधा एहि धरतीपर विद्ममान छैक।
सगर गाम ओझा चलब ककर सोझा? जँ सम्पूओर्ण गाम सम्मारननीये व्यपक्ति होथि तँ कतेक केँ सम्माून कय सकबनि? कतेकक धाख मानबनि ?
सगर नगर मारि अबिहेँ,
कतहु किछु नहि पबिहेँ। सबठाम प्रयत्न कयलाक बादो कतहु किछु हाथ नहि लगलगि।
सज्जनन बैसय आठ, तैयो ने टूटय खाट; दुर्जन बैसय एक, टूटय खाट अनेक। सज्ज।न शान्तिप्रिय एवं व्यतवस्थित रहैत छथि, किन्तु् दुर्जन सतत् खुराफाते करैत रहैछ।
सड़ल गाय बाभनके दान। गुणहीन वस्तुन जखन दान कयल जाइछ, ककरो पुरान-धुरान जखन देल जाइछ तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
सड़ल घोड़ी के लाल लगाम। कम गुणवान केँ जखन अधिक मान-सम्माणन भेटैछतँ एकर पयोग एकर प्रयोग कयल जाइछ।
सडि़ गलि जाय गोतिया नहि खाय, गोतियाक खायल अकारथ जाय। कोनो वस्तुयक बर्बाद भय जयबाक सम्भाववना रहितहु दोसरकेँ जे नहि दैत अछि तेहन अदत्त लेल एहि लोकोक्ति प्रयोग कयल जाइछ।
सड़लो तेली तँ नौ अधेली। बनियाँ कतबो छोट रहत तथापि गल्लाकमे सयपचास रहबे करतैक।
सड़लो भुन्नाक तँ रोहुक दुन्नाम। भुन्नाभ नमहर तथा स्वाहदिष्टग माछ होइत छैक।
सतमाय ओगारलनि सतधीके,
छुच्छाल मुँहमे काजर। ककरहु द्वारा जखन ककरो छुछदुलार कयल जाइत छैक, तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
सतमायक कारण वादी बाप। कोनो बालकक पिता जखन दोसर विवाह कय लैत छथि तँ नवकी पत्नी क दबावक कारण मुदइ जकाँ व्य वहार बेटाक संग करय लगैत छथि।
कहय से मारल जाय। सत्यस बजनिहारकेँ जखन घाटा लागि जाइत छैक तँ ओ एहि उक्तिक प्रयोग करैत अछि।
सब किछु लय गेल फदकी दय गेल। बूढ़-पुरानकेँ रोगक इलाज भेलाक बादो मस्तिष्क- कनेक्शन विकृत रहि गेला पर, अधिक बजनाइत पर व्यंनग्यृ।
सब काज दाइके नाम भौजाइ के। करय केओ आ नाम लागय दोसराक तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
सब काल दाइ ओहि छिनारि।
सब काल दाइ भोजकाल छिनारि। नीको लोक जखन स्वा र्थ साधनमे पाछाँ नहि रहैत छथि तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
सब गप्पी गेल गंगा नहाय,
ई एतहि छथि। झूठ बजनिहारक लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
सबके दाता राम। जन सामान्यर मे ई धारण छैक जे भगवान सभक मदति करैत छथिन।
सबके दुअरिया गोपीचन,
मा‍ङि-चाङि खदहऽ,
बहिनी दुअरिया मति जइहऽ जइहऽ जी। निदान स्थितिमे बहिनिक ओहिठाम नहि जयबाक चाही।
सबकेँ बँटैछी हमरा डँटैछी। अपन अनपेक्षित उपेक्षा पर एहि उक्ति प्रतिक्रिया व्यपक्त कयल जाइछ।
सब जोगिया मरय, मोर खपरबा भरय। स्वाोर्थक पूर्तिक लेल जे दोसराक अनिष्टफ चाहैछ तकरा लेल प्रयोग।
सब दँतरंगुआ, चूल्हि के फूकय ?
सब हाथ लहठी, धान के कूटय? बहुत नारी घरमे रहितहुँ कोनो जनी पान खाइत छथि तँ कोनो सीट साट कयने लहठी खनकबैत रहैत छथि।
सन्तोखषक गाछमे मेवा फड़ैत छैक। धैर्य रखलासँ सब समस्यााक समाधान होइत छैक।
सब दिन खैहह पबनी ललैहह। उचित अवसर पर जकरा कोनो लाभसँ वंचित रहि जाय पड़ैत छैक से एकर प्रयोग करैछ।
सबदिन सेबलहुँ कासी,
मरबाक बेर सरहदक बासी। जीवनभरि (जीविको पार्जनमे) नीक स्थाभनपर बाद अन्तिम समय मे जँ देहाती जीवन बिताबय पड़ैत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
सब देवताक घोड़दौड़,
गणेशजीक घुसकुनियाँ। एकसर अनेक लोकक बराबरि कार्यकयनिहार लेल एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
सब दिन बाइस पेसेरी। सभक संग एकहिप्रकारक दुर्व्यतवहार कयनिहार पर कोनो बलगर व्यवक्ति जखन भारी पड़ैत छथि तँ एहि उक्ति द्वारा ओ डँटैत छथिन प्रश्न करैत छथिन।
सब धर्मात्मा् पार उतरि गेल,
पापी रहल किनारे। केओ जखन महत्त्वपूर्ण कार्यसँ वंचित रहि जाइत अछि तँ लोक ओकरा लेल एहि उक्तिक प्रयोग करैछ।
सन्तोकषी गेलाह पात आनय,
अधक्की कहलक निच्चतहिमे दैह। जनिका किछु प्राप्ति करैत काल धैर्य नहि रहैत छनि तनिका लेल प्रयोग।
सत्य वादी धक्काो खाय,
चाटुकार सम्मावन पाबय। जतय दरबारिक चलती तथा कर्मठ ओ इमानदारक उपेक्षा होइत छैक तहिठाम प्रयोग।
सनेस ने बारी खखास बड़ भारी। बिना खर्चक जमौड़ा कयनिहार लेल प्रयोग।
सपना देखि रही मन गोय,
अपना देखी अनका होय। स्वाप्नोक बात गुप्त। रखबाक चाही।
सबदिनसँ लोककँ अनकर बखारी भरल आ, अनकर बोहु सुन्नलरि बुझि पड़ैत छैक। अनकर धन लोककेँ अधिक आ अपन कम बुझि पड़ैत छैक।
सब पर दया चिल्लअर पर नाही। चिल्ल र उड़ीस, मच्छनड़ आदि अपकारी जीवपन दया नहि करबाक चाही।
सब बूडि़ गेलाह कासी,
ई रहलाह आसी। केओ जखन कोनहु आवश्यरक कार्यसँ चूकि जाइत अछि तँ पछताइत ओहन व्यहक्तिक लेल प्रयोग होइछ।
सब बूडि़ गेलाह गंगा कात,
ई नकडुब्बा रहला एतहि। एकरो अर्थ एवं प्रयोग पूर्ववत अछि।
सबसँ बुडि़बक दीनानाथ। श्रेष्ठक व्यवक्तिक जखन उपेक्षा होइत छनि तँ ओ एहि‍ उक्ति क प्रयोग द्वारा प्रश्नोवाचक असन्तोुष व्यतक्तप करैत छथि।
सब सखी झुम्मतरि खेलाय,
लुल्ही कहय हमहू। केओ साधारण व्य क्ति जखन श्रेष्ठग व्यिक्तिक नकल करैत अछि देखाँउस करबाक चेष्टाे करैत अछि।
सबसँ कठिन जाति अपमान। अपन जातिक अपमान बर्दास्तअ नहि होइत छैक।
सबसँ जितलहुँ कोखिसँ हारलहुँ। अपन सन्ताहनक समक्ष सबकेँ पराचित भय जाय पड़ैत छैक।
सब सखी झूमरि गाबय,
नेङड़ी हुचुक्काब मारय। सबकेँ उत्सुव मनबैत देखि कोनो विवश लाचार व्यसक्ति जखन मुँह तकैत रहि जाइत अछि तँ ओकर विवशतापर व्यंहग्या।
सबहक धीया सासुर गेलि,
मोरा लेखे चैत पडि़गेल। शुद्ध बीति गेलाक बादो जखन ककरो कन्या दान नहि भ पबैत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
सबहक नाम कटलक भाँटाक साना। हास-परिहासमे कोनहु तरकारीक प्रशंसा।
सतौते मरी आ जाउते जीबी। सतमाय-सतौतक सम्ब न्ध् ओतेक नीक नहि रहि पबैत छैक, जतेक जाउत पितियाइनिक रहैत छैक।
सब साँप मरिगेल तँ ढोँढ़ के पड़ल टीका। जाहिठाम वीर विहीन समाज रहैछ ताहिठाम साधारणो पौरुष देखौनिहार पुरस्कृ त होइत अछि।
सम्पूकर्ण रामायण पढि़ गेलहुँ मुदा सीता ककर बोहु से नहि बुझलियैक।
सम्पूोपर्ण रामायण पढि़ गेलहुँ मुदा ई नहि बुझलियैक जे सीता मर्दबा गोट ककर बोहु। सब किछु बुझा देलाक बादो जँ केओ एक दू व्युक्ति मूले विषय नहि बूझि पाबथि तँ ओहन भुसकौल व्य्क्तिक लेल एहि लोकोक्तिसभक प्रयोग कलय जाइछ
समय पड़लापर लोक गदहो केँ बाप कहैछ। जकरासँ कार्य लेबाक हो तकर आदर करय पड़ैत छैक भलेँ ओ आदरणीय हो वा नहि।
समादे दही नहि जनमैत छैक। कोनहु कार्य तत्पमरतासँ करबाक चाही, फेक नहि करबाक चाही।
समांगक मुइने नहि ओतके डर,
जतेक यमक परिकने डर। कोनो अनुचित कार्य प्रारम्भेा नहि करी, अन्य था एक दोसराकेँ देखाँउस लागय लगैत छैत तथा प्रचलित भय जाइत छैक।
समांगक सुख पेटक दुख। जखन पैघ आश्रमक कारण भरि पेट भोजन भेटब कठिन रहैत छैक तँ प्रसंगवश एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
सम्मुकख छीक दोबर लाभ। यात्रा छीक दोबर लाभ।
सम्पूार्ण खीरा खाकऽ पेनी तीत।
सौंसे खीरा खाकऽ पेनी तीत। कार्यक अन्तखमे जखन बखेड़ा ठाढ़ भय जाइत छेक तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
सम्प।त्तिक श्रृंगार विपत्तिक आधार। स्वपर्ण आभूषण सम्प त्तिक श्रृंगार होइत छैक तथा संकट में आ आर्थिक आधार सेहो बनैत छैक।
सय चोट सोनारके एक चोट लोहार के। अनेक अपराधक बदला जखन एकरहि बेरमे लय लेल जाइत छैक वा सम्भाएवना रहैत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
सय बजक्कहर के मुँह बन्दइ करय एक चुप्पा्।
सबसँ भला चुप। अधिक वजनिहार घाटामे तथा कम बजनिहार नफामे रहैत अछि।
सम दिन चोरके एक दिन साधुके। अनेक अपराधक बदला जखन एकहि बेरमे लय लेल जाइत छैक।
सय टाटी के एक माटी। फूसक घरमे टाट अधिक टूटैत छैक, तेँ सय टाटक्‍ बदला एकटा देवाले दय देबाक चाही।
सय दवाइ के एक संयम। बिना पथ्येपरहेजक दवाइक सेवन व्ययर्थ जाइत छैक।
सममे सूर हजारमे काना,
सवालाखमे ऐंचाताना। चतुराइ मे आन्हेर सयमे एक, कनाह हजारमे एक तथा डेर सावलाखमे एक होअत अछि-ओतेक केँ ठकि सकैत अछि।
सरगसँ खसी तँ मुंगराक मारि। नीक दिनसँ अकस्मागत् अधलाह दिन आबि गेला-पर जखन केओ आर फेरीमे पडि़ जाइत अछि तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
सर्वस्वि हारी तँ हारी मुदा गजभरि नहि फारी।
थान भरि मुदा गजभरि नहि फारो। कनेह नहि देलाक कारण जखन बहुत अधिक देमय पडि़ जाइत छैक तँ एहि लोकोक्ति द्वारा व्यंछग्यक कयल जाइछ।
सयतानक डरे भगवानो डेराइत छथि। दुर्जनसँ सब दूर रहय चाहैत अछि।
सम्मुनख छीक दोबर लाभ।
सम्मुनख छीक लड़ाइ भाषय,
पीठ पाछाँ सुख अभिलाषय। यात्रा पहर आगाँसँ केओ छीकि दैत छैक तँ भलेँ सामनेमे झगड़ा कयली मुदा परोक्षमे सब प्रशंसे करैछ; तेँ शुभलक्षणे मानल जाय।
सस्तार मरद बड़द उपास,
सस्तार मोगी मरद उपास। जाहि घरमे अधिक पुरुष रहैत छैक ताहिठाम एक दोसराक भरोसे रहलाक कारण बड़द उपास रहि जाइत छैक; तहिना अधिक नारी जाहि घरमे रहैत छथि तहिठाम समय पर भोजन तैयार नहि भेलाक कारण कोनो पुरुष भुखलो रहि जाइत छथि।
सस्ताछ पौलहुँ तँ नौ मन तौलौलहुँ। जे वस्तु‍ अधिक सस्तम भेटैत छैक से अनावश्युको अधिक मात्रामे कीनि लेल जाइत अछि।
ससुर भैंसुर के डरे नहि,
जकर डर से घरे नहि। कोनो निर्भीक नारीक लेल प्रयोग।
सस्तेन गहूमे घर-घर पूजा। कोनो वस्तुी जखन अधिक सस्तार भेटय लगैत छैक तँ लोक ओकर अधिक उपयोग करय लगैत अछि।
ससुरारि सुखक सारि,
जँ रही दिन दुइ चारि। पुरुषकेँ सासुरमे कम दिन रहलापर अधिक सुख प्राप्तस होइत छैक।
सस्तौ्आ कानय बेरि-बेरि,
महगौआ कानय एक बेरि। सस्ता सामान जल्दी नस्ट। भय जाइत छैक, किन्तुक महग किनबामे एकहि बेर (कीनैतकाल) कष्टक होइत छैक।
सहय तकरा लहय। जे सहनशील छथि तनिकर विजय होइत छनि।
साँइक तमास सौतिनि पर। अपराध ककरो मुदा क्रोध करी ककरहुपर तँ एहि उक्तिक प्रयोग द्वारा व्यं ग्यक कयल जाइछ।
साँइक राज महाराज,
बेटाक राज मुँहताज। अपन पतिक कमाइपर रानी बनलि नारी जखन बेटाक राजमे मुँहतक्की मे जीबैत अछि तँ एहि उक्तिक प्रयोग करैछ।
साँइक माथा तेलेने,
गोसाँइक माथा तेल। अपना केर उपेक्षा तथा अनकर आदर कयनिहारि लेल प्रयुक्त ।
साँइयो मीठ बेटबो मीठ,
किरिया ककर खाउ? जे दूनू पक्षक मुँह धयने रहैत अछि, केम्हनरहुसँ टूटय नहि चाहैछ, तकरा पर व्यंहग्यँ।
साँइक कौड़ी भाइक नाम। वस्तु ककरो आ नाम ककरो।
साँइक नाम सब जनैअय मुदा हेहे करैअय। सब किछु जानिओ कय अनठौनिहार पर व्यंिग्यअ।
साँइक सोहागिन मोखा लागथि। पतिक दुलारू स्त्री लेल प्रयोग।
साओन जनमत गिद्दर भादव आयल बाढि़, गिदरबा बाजल-बापरो एहन बाढि़ कहियो नहि देखलौं। कोनो नव व्य क्ति जखन पुरान अनुभविक समक्ष डींग हाँकय लगैत अछि तँ ओकरा एहि उक्ति द्वारा डाँटल जाइत छैक।
साओनसँ भादव कथीक दुब्ब र? जेठ भाइसँ बढि़ चढि़कय जखन छोट भाइ प्रस्तुसत रहैत अछि वा जेठि बहिन सँ छोटि बहिन वा वरीय सँ कनीय तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत छैक।
साओन के ढोल सोहाओन। पावस ऋतुमे संगीतक विशिष्टह महत्त्व छैक मिथिलामे श्रावण मासमे मृदंग बजाय विशिष्टे गीत संगीतक माध्यममसँ अनेकानेक देती-देवताक आराधना कयल जाइत अछि, जे मनकेँ मोहि लैत अछि।
साओन पछबा बहय दिन चारि,
चूल्हिक पाछाँ उपजय सारि। श्रावण मास जँ पछबा बहय तँ ततेक वर्षा हो जे केहनो उँचका खेतमे धान उपजि जाय।
साओन पछबा भादव पुरिबा,
आसिन बहय इसान।
कातिक कन्ताा सिकियो ने डोलय,
कहाँकऽ राखब धान किसान। साओन मास जँ पछबा, भादवमे पुरिबा, आसिनमे ईशान कोनसँ हवा चलय आ कार्तिक मे एकदम शान्त रहय तँ अत्यतधिक धान उपजत।
साँचमे आँच कोन? सत्यमकेँ कथूक भय नहि होइत छैक।
सागरक अछैत कूपक दोहाइ। विशिष्टछ व्यिक्तिक समक्ष कोनो मामूली आदमीक गुणगान करब उचित नहि।
साँझ पराती भोर वसन्तत। जे गाबय से होय रिबन्स ।
साँझ पराती भोर वस्त्स न,
तखने बुझलहुँ गीतक अन्तन। कुसमयक गीत नीक नहि लगैत छैक।
साँझक पाहुन आ साँझक बदरी कतऽ जायत? साँझमे पाहुनकेँ प्रस्थाीन नहि करयब देल जाइत छनि, वा जँ कोनो साँझमे औताह तँ रहबे करताह।
साँझ बीति गेल की करब दीया,
बयस बीति गेल की करब पीया। समय बीति गेलाक बाद कोनो वस्तु अप्रासंगिक भय जाइत छैक।
साझीक बोहु नीक मुदा चीज नइ नीक। कोनहु सामान साझीमे रखला पर कलहक सम्भा वना रहैत छैक।
साँझे खेती बिहाने गाय,
जे नहि देखय तकर जाय। खेती एवं मालजालपर प्रतिदिन ध्या न रखबाक चाही अन्यपथा गड़बरा जयबाक सम्भा वना रहैत छैक।
साँझे खयलहुँ हर्रे
पराते टोलहुँ कीदन। समयसँ पूर्वहि जे प्राप्त करबाक लेल अगुताय लगैत अछि तकरा लेल एहि लोकोक्तिक प्रयोग होइछ।
साठा तँ पाठा। बुढ़ारीमे अधिक सक्रिय रहनिहार लेल प्रयोग।
सात गाम माङथि तैयो एके तामा,
एक गाम माङथि तैयो एके तामा। किछु कयलापर जकरा कार्य नहि चलैत छैक।
सात नूए सीता नाङटि। बहुत सामग्री रहलहु पर जे उपयोग नहि कय पबौत छथि तनिका लेल प्रयोग।
सात बड़दे बाभन कोढि़। जे स्वतयं कोनो कार्य नहि कय अनकहिसँ सब कार्य करबैत छथि, जनिका लोकक कमी नहि छनि तनिका लेल प्रयोग।
सात बेर सतमनि साँय आगू दतमनि। जलपानादिक बाद विलम्बगसँ जे मुँह धोइत अछि, दातमनि करैत अछि, तकरालेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
सात बैदे कारनी नास1 अधिक चिकित्सनक एकहि रो‍गीपर लगादेलासँ खतरनाक स्थिति उत्परन्नग भय जाइत छैक।
सात बाभन सात पेट,
सात राड़ एक पेट। ब्राह्मण जातिमे एकता होयब असम्भ व रहैत छैक।
सातु तेना खाइ जे मोछमे नहि लागय। आर्थिक अनियमितता नहि करी मुदा जँ करहि पड़य तँ ततेक सावधानीसँ जे ककरो पता नहि चलि सकैक।
सात तामाके सात पकौलहुँ चौदह तामा एके;
तोँ कुलबोरना सातो खयलेँ हम कुलमन्तीो एके। चतुर लोक जखन अपन त्याेगक बखान करय लगैत अछि तँ एहि उक्ति द्वारा ओकरापर व्येिब्यक कयल जाइछ।
सात महिँस के सात चभक्कात, सोलह गुलमा खाँउ रे ; वा
सोलह सेर घी खाँउ रे;
कहाँ गेलौ तोहर बाघ मामा,
एक बेर लडि़जाँउ रे। अपन शौर्य पराक्रमक जे डींग हँकैत रहैत अछि तकरा लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
सात सकारे सिन्दु रदान। कोनहु कठिन कार्यक आदेश भेटलापर एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
सता सुआती फूटय धान। स्वासती नक्षत्र सात दिन बीति गेलापर सब धान फुटि जाइत छैक।
सातुक संग घून पिसाय। अपराधीक संग रहलापर निर्दोष सेहो फँसि जाइछ।
साँझे मुइलाह कानब कतेक? कोनो बात अधिक भय गेलापर ओकर महत्त्व स्वित: कम भय जाइत छैक।
साधु सतौने दुन्नाग दुख। साधु पुरुषकेँ दु:ख देलाक कारण कुपरिणाम भोग्यप पड़ैत छैक तथा पश्चाात्ताप सेहो होइत छैक।
साँपक मन्तकर खाटक बानि,
अनका नीके अपना हानि। जकरा साँप काटल झाड़बाक मन्त्रश अबैत तथा खाट घोरय अबैत छैक तथाच खाट घोरय अबैत छैक तकरा बेसीकाल लोक मङनीमे समय बर्बाद करैत रहैत छैक।
साधु सताबी आपु दुख पाबी। साधु-सन्तुकेँ सतौलापर दुस्प रिणाम भोगय पड़ैत छैक।
साँपक सरापसँ कतहु मरलैअय? शत्रुक शाप नहि लगैत छैक।
साँपो मरय लठियो ने टूटय। कार्यो भय जाय आ किछु क्षति नहि हो तेहने कार्य करबाक चाही।
साझीक सूइ सा‍ङि नहि चढ़य। साझी आश्रममे कार्य कम होइत छैक।
साँप गेल बीयरिमे, धँसना डेङौलासँ की ? जे अवसर हाथसँ निकलि गेल ताहि लेल आब प्रयत्नथ व्येर्थ।
सामाक खेती अहीर मीत,
कहियो-कहियो होइछ हीत। साम-काउनक खेती हितकर नहि मानल गेल अछि।
साँय कहलक पदनी मोन भेल हुलास। कोनो अलगी तथा पतिक मिथ्याल प्रशंसा कयनिहारि पर व्यंिग्यन।
साँयसँ छुट्टी नहि देओर माङय किदन। अति व्यछस्तओ पुरुष वा स्त्री केँ जखन केओ कोनो कार्य अढ़बैत छथिन तँ एहि लोकोक्तिक द्वारा ओ अस्वीँकार कय दैत छथि।
साँय नित्त नहाइन, बोहु ढाकने मे खाइन। कोनो अपरोजकि नारी लेल प्रयोग कयल जाइछ।
साँय नूनू बौआ नूनू किरिया ककर खाड? जे दूनू पक्षक मुँह धयने रहैछ, केम्हछरहुसँ देखार नहि होमय चाहैछ तकरा लेल प्रयोग।
साँय-बोहु राजी का करय गामके काजी ? पति-पत्नीरक झगड़ामे नहि पड़बाक चाही अन्योथा मूर्ख बनि जयबाक खतरा।
साँय सराहलक तँ चार चढि़ बैसलहुँ,
लोक थुकारलक तँ नीचाँ उतरलहुँ। पतिक दुलारू किन्तुा झगड़ाउ स्त्री पर व्यं ग्यु।
सारिमे आधा सरहोजिमे पूरा। सारितँ विवाहक बाद पतिक घर चलि जाइछ तेँ आधा, किन्तुज सरहोजि आजन्म एही घरमे रहतीति तेँ पूरा कहल गेल अछि।
सावा हाथ बी‍हरि आ सावा पहर दिन, देखियौक तँ की होइत छैक। मुसहर मूसक बीहरिसँ खेतमे धान कोड़ैत अछि।
सावा हाथ साङि‍ सब पर। मृत्युा उपरान्तम दाहसंस्कासरमे सावा हाथक काष्ठु खण्डा सबकेँ लगैत छैक।
सारके आ भाँटके मुँह नहि रोकल जाइत छैक। सार मुँहलगुआ, गरिपढ़आ आ दुलारू होइत छथि।
सासु अपने बेटे बेटैतिन,
पुतोहु अपने बेटे बेटैतिन। सबकेँ अपने बेटासँ बेटाबाली कहयबाक सौभाग्यप प्राप्ती होइत छैक।
सासुके उकासी ननदिके दम्माी,
के करय घरक कम्माि? जाहि घरमे पुतोहु एकसरेँ खटेत रहैत छथि।
सासु घरुआरी पुतोहु दरबारी। जाहि घरक पुतोहु बाहर नौकरी वा नेतागि‍री करैत छथि ताहि घरक लेल प्रयोग कयल जाइछ।
सासु तर बसलहुँ तँ की बसलहुँ,
पुतोहु तर बसी तखन ने। कोनो बदमासि नारी, जकरा सासु वा पुतोहु ककरहुँ सँ नहि पटैत छैक तकरा लेल प्रयोग।
सासु ने ननदि अपने आनन्दत। जे जनी एक सरिये प्रसन्नत रहैत छथि।
सासु-पुतोहुमे झगड़ा भेल,
सूप-चालनि बखरा भेल। कोनहु निर्धन घरक बाँट बखरा पर व्यंलग्यह।
सासु चुमाबय गेली,
आगेदाइ पुतोहु हमरे रंग। वाचाल एवं आतमप्रशंसी नारी पर व्यंंग्यह।
सासुर बसने दुहु कुल नास। पुरुषकेँ सासुर बसलापर मातृक एवं पैतृक दूनू कुलक उद्धार गरिपढ़ुआ सब कय दैत छैक।
सासुसँ बैर पड़ौसिनसँ नाता। बुद्धिहीन पुतोहु लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
सासुसँ भेलीभिन तँ ननदि पड़लनि बखरा। जकरा कारण लोक भिन्नन-भिनाउज करैछ सैह जँ ओकर हिस्सा्मे आबि जाइक तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
साहु पलटने दुन्ना लाभ। बनियाँ जँ पलटि जाय तँ लाभे होइत छैक।
साहु बटो‍रथि कौड़ी-कौड़ी,
सहुआइन बटोरथि कुप्पाक। साहुजी एक-एक पाइ लेल हरान मुदा सहुआइन एकटा कुप्पा लेल हरान।
साँझे हाँसू धयल पिजाइ,
चोर-चोर मसिऔत भाइ। दू अपराधीकेँ परस्पिर वेश मिलान रहैत छैक।
सिखने छी पढ़ने छी आङुर तर जँतने छी, जखन भय पड़त तखन कय छोड़ब। चुपचाप सब तैयारी कयनिहार लेल प्रयोग।
सिधामे सन्देयह गव्य -गव्य। करथिष। जाहिठाम थोड़बहुक आशा नहि ताहिठाम अधिक मङनिहार पर व्यं ग्यअ।
सिन्नमहुर टिकुली जरल तँ पेटहु बज्ज।र पड़ल? जाहि जनीकेँ अपन पतिसँ आर्थिक तगीक शिकाइत रहैत छनि सँ एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथि।
सिफलाक मौगति माघ मास। अधिक फैसनेबुल व्यमक्तिकेँ अतिशय शीतलता में दुर्दशा भय जाइत छनि।
सियारकमन बसय ककडि़क खेत। जे जाहिठाम परिकल रहैछ तकर मोन सदिकाल ततहि दौड़ेत छैक।
सिरकी एक देलनि तानि,
ताहिबेरमे आयल पानि,
सिरकी उठबैक रहल ने बेरा,
आगाँ नाथ ने पाछाँ पगहा। अधिकांशत: लोक ‘आगाँ नाथ ने पाछाँ पगहा’ एहि उक्तिक प्रयोग करैछ।
सिर सलामत तँ पगडी पचास। पाग-मुरेगक रक्षा लेल माथ नहि कटा लेबाक चाही।
सिलवन्ता पुरुष भिखारि,
सिलवन्ति नारि छिनारि। नीक लोककेँ आर्थिक तंगी रहैत छनि, तहिना सुशील नारी संकोचवश नहि किछु बजबाक कारण शारीरिक शोषणक शिकार जाइत छथि आ तकर बाद तँ अभ्यिस्ते भय जाइत छथि।
सीत चटने पियास नहि मरैत छैक। जाहिठाम अधिक वस्तु क प्रयोजन छैक ताहिठाम अतिअल्प्सँ कोना कार्य चलि सकैछ?
सीताक जन्मि बिरोगेहिँ गेल,
दुख छाडि़ सुख सपनहुँ नहि भेल। आजन्मा दुखी रहनिहारि कोनो मै‍थिलानीक मुँहसँ एहि उक्तिक प्रयोग प्रसंगवश होइत रहैत अछि।
सीना तानिकऽ ठाढ़ भेने दान नहि भेटैत छैक,
हाथ हसारलासँ मान नहि रहैत छैक। जे कतहु हाथ पसारैत छथि तनिक मान-सम्माहन पर बट्टा लगैत छनि, किन्तुक जे सीना तानिकय (ककरो भयभीत कय) दान लेमय चाहैत छथि हुनका किछु नहि प्राप्त होइत छनि।
सीक चभक्का छोडि़दे,
देखादेखी खाहु। अधिक आर्थिक घपलीा कयलासँ फँसबाक सम्भाआवना, तेँ देखी-देखी कनेह मनेक सँ कार्य चलयबाक चाही।
सीरेँ भेँडि़ कनाह। कोनहु कार्य प्रथम दर्शनहिमे जँ हास्या सपद भयजात तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
सुकठीक बनीज पशुपतिक दर्शन। एक पन्थब दुइ कार्य जखन भय जाइत छैक।
सुख सुखराती देबउठान,
तकरे बारहे करी लवान। विभिन्नर पावनिक तिथिक अनुसार गणना कय पद जोडि़ लोकोकित बना देल गेल छैक।
सुतरय पहुँनाइ तँ मुँहमारी खेती के। जँ परान्नेन लगैत रहय तँ खेती करबाक कोन प्रयोजन ? आलसी एवं भोलखौका पर व्यंपग्य ।
सुन्न् चोट नेहाइक माथ। बारम्बायर एकहि व्य क्ति पर जखन चोट कयल जाइत छैक तँ एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
सुन्नग घरमे पुन्ना् नाचथि। जतय केओ नहि ततय जैह सैह पुण्यनवान।
सुतरल तँ दोबर नहितँ गोबर। भाग्य पर भरोस रखनिहार एहि उक्तिक प्रयोग करैछ।
सुनि-सुनि लगइछ दाँती,
ककुर बन्हैछअछि गाँती। कोनहु अजगुत घटना पर प्रयोग।
सुक्रिये नाम कि कुक्रिये नाम। नीक अधलाह दूनू प्रकारक कार्य पर नाम होइत छैक।
सुख चाहय खेती करय,
धन चाहय व्याीपार। कृषककेँ समय-समय पर आराम-विश्राम भेटैत रहैत छनि किन्तुम जे धनवान बनबाक लेल व्या पार करैत छथि हुनका आराम कतय?
सुख सिहुली दुख दिनाय,
कर्म घटय तँ फाटय बेमाय। सुखक देहमे सिहुली तथा दुाखक देहमे दिनाय होइत छैक।
सुख ने स्वाछस्थ , देह जरल अकारथ। कष्टनक कारण कोनो नारी अपन पतिकेँ एहि उक्ति द्वारा उलहन उपराग दैत अछि।
सुतबाक चटाइ नहि तम्मू क फरमाइस, सुतबाक चटाइ नहि तमाकूक फरमाइस। जाहिठाम किछुओ भेटयबला भेटयबला नहि ताहिठाम जँ अधिकक माँग कयल जाय तँ एहि उक्ति द्वारा व्यं ग्यए कयल जाइत अछि।
सुतरय तँ सगाइ नहि तँ जनम भरि हगाइ। जँ दुर्भाग्यतवश नीक पति वा पत्नीय नहि भेटल तँ जीवन भरि झेलैत रहय पड़ैछ।
सुद्धाक मुँह कूकुर चाटय। सोझमतियाकेँ सब ठकैत छैक।
सुधरने सपूत बिगड़ने कपूत। सुधरि गेल तँ सपूत भेल नहि तँ कपूत कहबे करत।
सुन्नार घरक पहुनाा, जस आबथि तस जाथि। घरमे जँ केओ रहबे ने करत तँ अतिथि ठहरताह कोना ? केओ-केओ अतिथिक भयसँ घरमे ताला ठोकि केम्हेरो निकलि जाइत छथि।
सुन्नाथ घरमे मुन्ना राजा। अभिभावकक अभावमे एकटा नेना सेहो घरक मालिक भय जाइत अछि।
सुपत कहने संग विद्मआय। ककरो उतिच कहलापर तमास भय जाइत छैक।
सुरती मुरती दैवक देल,
एकटा मङलहुँ चारिटा भेल। विलम्बङसँ सन्तालन भेलाक कारण बेटिओ दुलारू भय जाइत छैक।
सुमिरने मरी बिसरने जीबी। कोनहुँ दुखदे घटनाकेँ बिसरिये गेनाइ नीक।
सूतल छी बिआह होइअय। जे व्यीक्तिक पड़ले पड़ल वा बैसले बैसल सबठाम लाभ प्राप्त़ कय लेमय चाहैत छथि तनिका लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
सूती खरहर सपनाइ धरहर। ओकाद थोड़ा मुदा मनोरथ पैघ रखनिहार पर व्यंडग्यन।
सूती पुआर पा सपना देखी नौ लाखक। भावना पूर्ववते अछि।
सूतक बेर बहतौनीक लेखा। कुसमयमे कोनहु कार्य करबाक प्रयास पर व्‍यंग्य्।
सूई मे फार नहि सन्हिआइ छै। असम्भेव केँ सम्भछव करबाक प्रयत्नत पर व्यंभग्यँ।
सूतल जगैत अछि, जागत कतहु जागय? अनठाकय सूतल रहल वा सुतबाक अभिनय कयनिहार केँ जगौलापर नहि जगैत छैक।
सूतल छी खाट पर, कोँचा अछि टाट पर। असंगत कार्य कयनिहार लेल प्रयोग।
सूतल छी घरमे पयर दूनू बहरा।
सूतल छी अहरा पयर दूनू बहरा। भावना पूर्ववते अछि।
सूती असौरा डाँड़ चिमारा। एकरहु भावना पूर्ववत अछि।
सूती सेज पर सपना देखी महलके। ओकादसँ बहुत अधिक मनोरथ रखनिहार पर व्यंबग्यम।
सूपक भाँटा एमहर सँ ओमहर। जाहि व्यटक्तिकेँ कतहु कोनो गुंजाइस नहि होइत छैक, सबठाम ठोकरौल जाइत अछि, तकरा लेल प्रयोग।
सूरदास के कारी कम्मतल,
चढ़य न दूजो रंग। जे व्य क्ति कोनहू स्थितिमे बदलय बला नहि रहैछ तकरा लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
सूर्य कतहू सूप तर झाँपल जाथि? महान प्रतापी व्यरक्तिकेँ केओ गुप्त नहि राखि सकैत अछि।
स्वे त-स्वेित सब किछु भला, स्वे‍त भला नहि केस,
नारि रीझय ने रिपु डरय, ने आदर करय नरेश। उज्जनर सबकिछु नीक मुदा उजरा केश नहि नीक।
से गुड़ कहाँ जे माछी खाय? जनिकासँ कार्य चलयबला नहि रहैत छैक तनिका लेल प्रयोग कयल जाइछ।
से दिन हैत मे से दिन हैत,
कनहा पुत मोरा कोहबर जैत। वा
से दिन भेल गै से दिन भेल... कोहबर गेल। जाहि सफलताक स्वेप्न.हुमे आशा नहि से प्राप्तल भय गेला पर नचैत देखि एहि उक्तिक प्रयोग अनका द्वारा व्यंलग्य मे कयल जाइत छैक।
सेर जागल पौआ जागल,
कनमा के छरपट्टी ऊठल। भोरे-भोरे भुटका जखन खयबाक लेल मङत अछि तॅं मनोरंजनार्थ वा दुलारसॅं एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
से सौदा रहितहुँ तँ डाट छाडि़ कुहाट नहि बिकैतहुँ। जे अपन गुणक मिथ्या गुणगा एवं आत्मपप्रशंसा करैत रहैत छथि तनिका रहैत छथि तनिका लेल प्रयोग।
सैयाँक कौड़ी भैयाक नाम,
ऊँच कय धरिह बाबाक नाम। जे जनी अपन कोसलियाक टाका नैहरमे रखैत छथि तनिका पर व्यंकग्यख।
सैयाँ कहलक सुनरी,
सनाथ भऽ गेल दैया। पतिसँ बेसीकल खट पट रहला पर जँ कहियो नीक सम्बटन्धप रहैत छनि वा नीक सम्बोन्ध‍क बखान करैत छथि तँ पड़ोसिन वा दियादिनी एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथिन।
सैयाँ के दुलारू कोतबाल आब डर कथीके? कोनहु प्रभावशाली सम्बलन्धीेक बलपर जे कूदैत रहैत छथि तनिका लेल प्रयोग।
सोखगरि आमा सँठिते व्याेकुलि,
निर्धन आमा कनिते व्या्कुलि। जे सौख मनोरथबाली धनी माता छथि से बेटीक द्विरागमनसे अनेक सामान सँठैत व्‍यस्ते रहैत छथि, किन्तुद जे निर्धन छथि से तँ कनिते रहैत छथि।
सोझ आंगुरूसँ घी नहि बहराइत छैक। कार्य निकालबाक लेल कनेक्शन टेढ़ पड़ैत छैक।
सोतिक बेटी ओलक टोटी,
बिकयती तँ बिकयली नहि तँ गन्हतयती। श्रोत्रिय ब्राह्मणमे बेटीक विवाह कम वयसमे करबाक परम्प्रा रहलैक अछि।
सोनक सोहागा। अत्य न्त अनुकूल परिस्थिति निर्माण भेला पर केओ प्रशंसामे प्रयोग करैछ।
सोनमे सुगन्धस। अत्येन्त‍ अनुकुल परिस्थिति निर्माण भेला पर केओ प्रशंसामे प्रयोग करैछ।
सोनमे सुगन्धस। उभय स्थितिमे अनुकूलता।
सोन सनक कनियाँ छुछुन्नगरि सन पर। कोनहु नबोढ़ाक असुन्द्र बरक निन्दािमे प्रयोग।
सोनार कहलकै-नहि गढ़ायब तँ देखहु दिअ। लोकक ई धारणा छैक जे सोनार किछु ने किछु सोनामे कलइ कैये दैत अछि किछु घिचिए लैत अछि।
सोनाक कटोरामे भीख के देत ? पैघ लोककेँ भीख नहि सम्मा न भेटैत छैक।
सोना सोनार के गहना संसारके। असली सोना सोनारे खा जाइछ।
सोम के दुन्नाा खर्च। कृपणताक कारण कखनो अधिके खर्च भय जाइत छैक।
सोमे शुक्रे बुधेरे उषा,
छाड़ह पण्डित लेखा जोखा। मंगलवार शनि ओ वृहस्पखतिक भोरे भोर (सूर्योदयसँ पूर्व) यात्रा करबामे दिन तकयबाक कार्य नहि।
सोमे शुक्रे बुधे बाम,
एहि विधि लंका जीतल राम। उपर्युक्तल तीनू प्रभातमे यात्रासँ राम लंका पर विजय प्राप्ती कयलनि।
सौखी बिलाडि़के कम्मील के चोली। फैशनक पाछाँ जखन केओ उटपटाँग वस्त्रच पहिरि लैछ, मूल्यँवान वस्त्र क दुर्दशा कय लैछ तँ एहि उक्त्कि प्रयोग द्वारा उपहास कयल जाइछ।
सौखसँ चूर फिककिरसँ बुकनी। अधिक सौख मनोरथसँ आर्थिक तंगी अबैत छैक।
सौखीन चढ़बैयाके पालकी पर बोरसी। अधिक सौखीन व्येक्ति उटपटांग कार्य कय लैत छथि, जाहि कारण ओ उपहासक पात्र बनि छथि।
सौखीन बहुरियाके कम्मजल के चोली। एकरो भावना पूर्ववते अछि।
सौखीन बुढि़या के काँखतर चटाइ। अधिक शौ‍कीन व्यकक्तिक पर व्यंंग्यद।
सोखो मे सोख मेरचाइ के सौख। केओ व्य क्ति जखन हानिकारक वस्तुरक सेवन सौाख पुरयबाक हेतु करैत अछि दुव्य्रासनी बनैत अछि तँ एहि उक्तिक प्रयोग द्वारा उपहास कयल जाइत छैक।
सौतिन मे खट पट सासु बदनाम। अनेरे झगड़ा लगयबाक दोष जाखन ककरहु पर मढ़ल जाइत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
सौतिनिक खुसामदे सासुर वास? केवल ककरो खुशामद कलयासँ कार्य नहि चलैत छैक, अपितु अपन चालि-चलन, स्वतभावादि ठीक राखय पड़ैत छैक, कर्मठता आनय पड़ैत छैक।
सौतिनी ने मितनी गोतनी ने अपनी। सौतिनिसँ मित्रता हैब कठिन छैक; तहिना-दिआदिनी गोतनी अपन नहि भय सकैत छथि।
सौन मासक आन्ह रके हरियरे सूझैत छैक। अपन मनोवृत्तिक अनुकूले लोकम सबइाम अपेक्षा रखैत अछि, जे बहुधा अनुपयुक्तन होइत छैक।
सौनमे सुखाय धान भादवमे सुखाय गहूम। श्रावण मासमे रोपनिक बोनि तौलबाक हेतु कृषक धान निकालैत छथि, किन्तु ओ सठि गेलापर कमौटक बोनिमे गहूम देमय पड़ैत छनि।
सौंसे खीरा खाकय पेनी तीत। कोनो कार्य पूरा होइत काल जखन गड़बराय लगैत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
सौंसे गामक ओतनियाँ के एकटा डाँड़ाडोरियो नहि। पैघ व्योक्ति जखन अपना लेल अधिक कृपणता लगैत छथि तँ एहि उक्तिक प्रयोग द्वारा उपहास कयल जाइछ।
सौंसे जाड़ बिताकय चैतमे ब्राह्मण बाछी बेचि किनलनि। संयोगवश कोनो साल चैतक रातिमे अधिक जाड़ होमय लगैत छैक, जकरा लेल लोक तैयार नहि रहैछ।
सौंसे रामायण पढि़ गेलहुँ तखन पुछलहुँ सीता ककर बोहु? लाख बुझौलहु पर जे समय पर बि‍सरि जाइत अछि, तकर मूर्खता पर व्यं ग्यस।
संगक सुखे बनारस जाइ। जँ संग साथ देनिहार भे‍टि जाइत छैक तँ लोक निष्प्रदयोजनो तीर्थाटनसँ भय अबैछ।
संगे बिआह संग-संग गवना,
सबके धिया-पुता हमर साँय बौना। अनकर भागय अपन अभागय देखि केओ एहि उक्तिक प्रयोग करैत अछि।
संगे-संगे अयलहुँ संगिया मरिगेल हम भुतलाइते छी। कोनहु मित्र द्वारा धोाखा देलापर एहि उक्तिक प्रयोग।
संगे संगे गैया चरौलहुँ,
किसुनमा भेल गोसैयाँ। कोनो संगतुरिया जखन पैघ पर चलि जाइत अछि, अति महत्त्वपूर्ण बनि जाइत अछि तँ एहि उक्ति द्वारा मित्र पर व्यंकग्यत कयल जाइत छैक।
संजीवनी बूटीक तलाशमे गेलाहतँ पहाड़े लेलनि उपाडि़। छोट वा कम सामानक बदला जखन कोओ पैघ वा बहुत अधिक सामान लय अनैत छथि तँ हुनकालेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
संसारमे जतेक वस्तुि चमकैत छैक,
सब सोने नहि रहैत छैक। आकर्षक दृश्यर देखि आकृष्टछ नहि भय जयबाक चाही, धोाखा खा सकैत छी।
संसार में सन्तोतषसँ पैघ धने नहि छैक। सन्तो षी व्यतक्ति सुखी रहैछ तथ निराशामे दुख होइछ।
हजामक वरियाती ठाकुरे ठाकुर। एकहि प्रकारक लोलकक जतय जमघट भय जाइत अछि, ताहिठाम खौंढझाहटि वा व्यंाग्य मे एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
हजाम के चूड़ादही समांगके भूजा। जाहिठाम अनकर स्वासगत तथा अपन लोकक उपेक्षा होइत अछि ताहिठाम प्रयोग।
हजाम देखने दाढ़ी बढ़ल। अनावश्यखक देखाँउस कयनिहार पर व्यंयग्यछ।
हट्ठासँ कोल्हुअरबे नीक। हट्ठाक बड़दकेँ अधिक श्रम होइत छैक-ताहूमे कदुआ गजारमे (धानरोपनिमे) आर अधिक।
हड़बरीक बिआह कनपटीक सिनूर। धरफरीमे गड़बरी भय गेलापर एहि उक्तिक प्रयोग कयल आइछ।
हड़हीक रंग वैरागीक संग। सन्याकसीक संग मित्रता तथा हड़ाडि स्त्रीयक संग प्रेम दूनू बरोबरि होइत छैक।
हड़ही गायकेर भिन्नेत बथान। बदियल गायकेँ आन पशुसँ पृथक राखय पड़ैत छैक।
हड़ही गाय बीचे खेत खाय। जा चरबाह दौड़ैत अछि ता हड़ाहि गाय बीच खेत मे पहुँचिकय बहुत फसिल चरि जाइत अछि।
हड़ही संगे कपिली जाय,
दूनू मारि बराबर खाय। नीक लोक जखन कोनो दुर्जनक संग धरैत छथि तँ ओकरा संग हिनको मारि खाय पड़ैत छनि।
हड़ाहि गायके मुङड़ी सिङार। बदमासि गायक गर्दनिमे मुङड़ी वा खाटक पौआ बान्हिकय लटका देल जाइत छैक, जाहिसँ ओ अधिक तेज नहि दौडि़ सकय।
हड़ाहि गाय लेखे चास कतेह दूर? दुर्जन एवं भ्रष्टा लोक केहनो घपला कय सकैछ।
हथियाक पेटसँ निकलल जाड़,
गोनडि़ लय खढ़ कटैअय राड़। हथिया नक्षत्रक झटक सँ ठण्ढीा प्रारम्भ होइत छैक।
हथिया झअकय चित मड़राय,
घर बैसल गृहस्थ नितराय। हस्तै नक्षत्रमे वर्षा-बिहाडि़सँ धानक फसिल स्वतस्ज्ञत् एवं नीक उपजि जाइत छैक।
हनुमान गोला लंका,
अशोक वाटिका देलनि उजाडि़।
हनुमान गेला लंका, उद्मान देलनि उजाडि़। हनुमान गेला लंका,
सिर सजमनि देलनि उजाडि़। कोनो नेना जखन फुलबा‍ड़ीक फूल उजाडि़ दैत अछि तँ एहि उक्ति सभक प्रयोग होइछ।
हम छोड़ी जँ कमरिया छोड़य। कोनहु कार्यक इच्छा नहि रहलाक कारण जे कोनो बहाना बनबैत अछि तकरा लेल प्रयोग।
हम ठकी दिल्ली -दिल्ली,
हमरा ठकय घरके बिल्लील। जखन ककरो केओ वंचना करय चाहैछ तँ ओ एहि उक्ति द्वारा व्यंचग्यि करैछ।
हम नरौनेक धी हमरा के कहत की, हमरा तरबे मे घी। वाहम बलियासबय के धी। वा हम खोआड़य के धी; (वाकोनहु मूलमे लगाय)। कोनहु दुर्जनक उपद्रव पर ध्यालन नहि दय सज्जुन व्यलक्ति एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथि।
हम बैसौलहुँ बुढ़बा जानि,
बुढ़बा सूतल सलगा तानि। कनेक अधिक देलापर जे अधिक हड़पि लैछ, तकरा लेल प्रयोग।
हमर काका पहलमान। अपन परिस्थितिक घमण्ड कयडींग हँकनिहार लेल प्रयोग।
हमर बाबाके नौ सय गाय,
राति चरय दिन कत्तय जाय? मिथिला क्षेत्रमे किछु बुझौअलिक प्रयोग सेहो लोकोक्तिक रूपमे कयल जाइत छैक।
हम्म र मोन माइये जानय, कठौती भरि चिक्कलस सानय। कोनहु पेटू व्य क्ति पर व्यं ग्य ।
हमरा के कहत की, हमरा तरबहिमे घी। कोनो घमण्डी नारीपर व्यंरग्यघ।
हमरा गहूम सँ घर-घर पूजा,
हमरा कुतरूमक भूजा। भरिगामकेँ सम्हाजरनिहार जखन स्व,यं अभावमे आबि जाइत छथि तँ एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथि।
हमरा ओहिठाम आयब तँ की सब लायब, अहाँक ओहिठाम जायब तँ की सब खुआयब? उभय स्थितिमे जे लाभ चाहैत छथि तहि स्वासर्थलोलुप व्यछक्ति पर व्यंाग्य।।
हम सुनरी कि पिया सुनरा,
गामक लोक बनरी-बनरा। जे जनी अपन दाम्प-त्य जीवनक सुखक बखान करैत रहैत छथि, अनका किछु नहि बुझैत छथि, तनिका पर व्यंनग्य ।
हम सुनरा कि तूँ सुनरी,
गामक लोक बनरा बनरी। उपुर्युक्तेर परिस्थितिमे पुरुष लेल प्रयोग।
हरक भाँगठ हर साली। कोनहु कार्यसँ पाछाँ नहि हँटबाक चाही।
हर जोतय कोदारि पाड़य तकरा मारी पाँच लात,
कान लग जे कहय बात तकरा परसी माछ-भात। जखन श्रम कयनिहारक उपेक्षा तथा दरबार कयनिहारक महत्त्व देल जाइत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
हरदम कुसियारे मुँहे रास्ताह? सब दिन अनुकूले परिस्थिति नहि रहैत छैक।
हरती ने धरती, देह लोटाइअय माँझ परती। कोनो भूमिहीन वा कम भूमिबला लोक जखन ऐल-फैलसँ अनकर भूमि दफानि लैत अछि तँ एहि उक्तिक प्रयोग द्वारा व्यंअग्य् कयल जाइत छैक।
हम पंचैती तँ मानैत छी, मुदा खुट्टा गाड़ब एतहि। जे व्यएक्ति अपन जिद्द पर अड़ल रहैछ, पंचकेँ ठकैत रहैछ तकरा लेल एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
हरने फार लबर-लबर कर। जे व्याक्ति किछु कार्य नहि करैत छथि, केवल भरिगाम झगड़ा लगौने घुरैत छथि, भर-भर बजैत रहैत छथि तनिका लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
हर ने बड़द ढोँढ़ाइ मड़र। बिनु कार्य-उद्मम कयनहि जे प्रतिष्ठाभ चाहैत छथि तनिका लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
हर बहय बड़द, बैसल खाय तुरंग। जखन खटैत्‍ अछि केओ, मुदा खाइत अछि दोसर तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
हर बहय से खढ़ खाय,
बकरी खाय अँचार। एकरो भावना पूर्ववते अछि।
हरबाहे हर घरनीए घर। हरबाहक अनुकूल खेती होइत छैक, तहिना गृहणीक अनुकूल घरक व्यइवस्था। रहैत छैक।
हरमे जँ तँ चौकीमे बिहाडि़। उचित कार्यमे खेती होइत छैक, तहिना गृहणीक अनुकूल घरक व्यतवस्था। रहैत छैक।
हर लागल पताल तँ भागि गेल अकाल। जाहि खेतमे वेशाख जेठमे हर लागि जाय, हाल रहय तँ खेती बारी हेबे करत।
हरामजादाक बिखेता। बदमास बला खिस्सा।क परि।
हरदिक दग-दग नोन बिहुना,
फुहरिक रान्ह-ल हैत कैसना? कोनहु अपरोजकि नारीक अलूरि व्यसवहारक लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
हरिनक गवाही सूगर देल,
दूनू पड़ाकय जंगल गेल। एक स्वडभावक दू व्येक्तिक मित्रताक कारण एक दोसराकेँ समर्थन करब स्वााभविक।
हरि रूसे गुरु देय मिलाय,
गुरु रूसे हरि सकथि ने पाय। गुरुक महत्त्वक प्रतिपादन।
हल्लु क सवार घौड़ा फौद मारैजय। मामूली कार्यमे जे अधिक देखबैत छथि तनिका लेल प्रयोग।
हँसना बाभन खँसना चोर,
कुपथ कायथ कुलके बोर। ब्राह्मण जँ अनावश्य।क हँसैत रहथि, चोरकेँ जँ उकासी अधिक होइक तथा कायस्थक जँ कुपथगामी भय जाथि तँ हुनका लोकोनिक नाशे बूझू।
हँसय कानय गाबय गीत,
ताहि मौगीकेर नहि परतीति। जे स्त्री क्षणमे कनैत हँसैत अछि तथा क्षणहिमे गीत सेहो गाबय लगैत अछि, तकर कोनो विश्वाीस नहि।
हँसिकय बाजय नारी,
बनलो काज बिगाडी। जेस्त्री हँसि-हँसिकय बाजि अपन काज निकालि लैत छथि से अनका मूर्ख बना दैत छथि आ हुनक सोझ रायलो कार्य ओझरा दैत छथिन।
हँसि देलहुँ लाज पड़ा गेल। गलती कयनिहार जखन हँसैत रहैछ तँ डाँट फटकारक हेतु एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
हँसि पहुनमा तोहरे आस,
कानि पहुनमा तोहरे आस। पत्नीपक सम्ब।न्ध पीतक संग अटूट होइत छैक।
हँसीसँ मसखरी। हँसी-दिलग्गीब जखन बिकराल रूप धारण कय लैछ तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
हल्लुछक बाजा सहनाइ।
हल्लुछक बाजा ढोल बाजापिपही। जाहि कार्यमे अधिक भीड़ नहि पड़ैत छैक ताहिठाम व्यं ग्या र्थ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
हाटक चाउर बाटक पानि। जनिका घरमे पर्याप्त। अन्नर नहि रहैत छनि, प्रत्ये्क हाटसँ (सप्तािह मे दू दिन) कनेक-कनेक चाउर-गहूम अबैत छनि वा आटा अबैत छनि तनिका लेल प्रयोग।
हाथक कंगनाके अयनाक कोन काज? जखन हाथहिम कंगन अछि तखन दर्पणमे देखबाक कोन पयोजन? प्रत्यबक्षकेँ अप्रत्यकक्षक सहयोग नहि चाही।
हाथक बसिला नाकमे। हाथक बसिलासँ नाक कटायब असम्भनव।
हाथ काटिकऽ घाव कयल,
दोष दैछी दैवक। जे बात-बातमे भाग्यभक दोष दैत अछि, स्वबयं कर्म नहि करैत अछि तेहन आलसी व्यबक्ति पर व्यंकग्यन।
हाथ खाली कानमे वाली। ओकादसँ अधिक तथा समय एवं परिस्थितिक विपरीसति मनोरथ कयनिहार पर व्यंतग्यम।
हाकिम टरय हुकुम नहि टरय। सरनकारी पदाधिकारी द्वारा एक बेर कोनो आदेश भय गेला पर ओ कार्य होइतहिँ छैक, भलेँ उक्ति पदाधिकारिक बदली कियैक ने भय जाय।
हाकिम हारय तँ मुँहमे मारय। सरकार जँ कोनो मोकदमा हारि जाइत अछि तँ सदनमे विधेयक आनि पारित करा ओकरा कानून बना लागू कय दैछ।
हाँडियो छुतायल आ कुकुरक जातियो चिन्हाोयल।
हाँडि़यो फूटल आ कुकुरक जातियो चिन्हाययल। कूकुर केहनो रहत, खुजलापर ओ जहाँ तहाँ मुँह दैए देत।
हाँड़ीमे छनि खुद्दियो नहि, चललीहय गाँव नोतय। बिना ओकादक पैघ कार्यमे हाथ लगौनिहार लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
हाथ सुमेरनी बगल कतरनी। हाथमे माला फेरैत छथि मुदा पार्श्वामे कैंची छथि।
हाथमे लोटा काँखतर बच्चाा,
तखने बुझल करियम्माथक लुच्चार। लक्षणसँ बहुत बात मीलि जाइत छैक।
हाथ मलने की, बाझ तँ उडि़ गेल। जखन कोनो सुअवसर हाथसँ निकलि जाइत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
हाथी औता हाथी औता हाथी पदलनि फुरस। कोनहु उपलब्धिक लेल जतेक लोक आशा करैत अछि।
हाथी चलय बजार कूकुर भुकय हजार। आलोचनाक परवाह बिना कयनहि आगाँ स्मृनति चिहन लेल झंझट कयलापर एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
हाथी बिका गेल आंकुश लेल मारि। मुख्यब वस्तु बिरहा गेलाक बाद ओकर स्मृयति चिहन लेल झंझट कयलापर एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
हाथीक पीठ पर तूरक फाहा। शक्तिशाली व्यतक्तिकेँ जँ अति सरल कार्य देल जाय तँ ककरो द्वारा व्यंँग्यरमे एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
हाथी ऊँट भासल जाथि, घोड़गद्दह पूछथि कतेक पानि? जाहिठाम पैघ लोकसभक दुर्दशा ताहिठाम सामान्य व्यरक्ति डींग हँकैत अछि।
हाथीक पाछाँ कुकुर भूकय। पैघ लोकक किछु ने किछु आलोचना रहिते छैक।
हाथी अपने पयरे भारी,
चुट्टी अपने पयरे भारी। सबकेँ अपने समस्याभ पैघ बुझि पड़ैत छैक।
हाथीक दाँत मर्दक बात,
निकलि गेल-निकलि गेल। जँ कोनो बचन ककरो दय देलियैक तँ ओकरा पूरा करबाक चाही।
हाथीक खबैयाके घोड़ाक पकौड़ा। जे पैघ खौकार छथि हुनका कनेक्शन मनेकसँ की हेतनि?
हाथीके दू दाँत,
एक खयबाक दोसर देखयबाक। कथनी आ करनीमे जकरा अन्तकर छैक, जे अभिनय किछु करैत अछि मुदा वास्त्मे किछु आने रहैत अछि तकरा लेल प्रयोग।
हाथी चलय घोड़ा चलय,
तकरा पाछाँ संगसौर चलय। पैघक संग जखन छोटको सब कूदय लगैछ।
हाथी फिरय गाम-गाम,
जकर हाथी तकर नाम। अधिक नाम पैघे लोकक चलैत रहैत छैक।
हाथी बाझय जंगलमे आ छाती फाटनि राजा सलहेस केर। कोनहु प्रकारक घटना वा शोषण भेलापर पैघ एवं संवेदनशील व्य क्ति दुखी होइत छथि।
हाथी भेटत तँ महाउतो भेटत। पैघ उपतब्धि जँ प्राप्तण भय सकत तँ ओकर उपयोगक जोगाड़ सेहो हेबे करत।
हाथीसँ हाथी बझैत्‍ छैक। पैघक संग पैघे अबैत अछि।
हाथो मे अलता पयरहुमे अलता वर कोना मारता? कोनहु मूर्खतापूर्ण व्यलवहार पर व्यंतग्ये।
हार राड़ बोहु चेरी,
नित्तह लाठी फेरी। हर-फारकेँ नित्य, साफ कयलासँ ठीक रहैत छैक।
हारने जूआ तीत जितने मीठ। जीतैत काल जूआ खेलयबामे खूब लगैत छैक किन्तुज जखन हारय लगैत अछि तँ सबटाहारि गेलाक बाद कान पकड़ैत अछि।
हारल नटुआ झिटुका बीछय। जखन विवशता रहैत छैक तँ अनिच्छीअ पूर्वक बोनो करहि पड़ैत छैक।
हारि पच्छन मड़ुआ भच्छछ। एकरहु भावना पूर्ववते अछि।
हारि मानय झगड़ा छूटय। दू पक्षमें छगड़ा अधिक दिन धरि चललापर कोनो एककेँ झुकहि पड़ैत छैक, अन्य था झगड़ाक अन्तझ हैब कठिन।
हाल मीयाँ प्याहलु खाय मे राकस। हाल मीयाँ पाँच बेर कऽ नमाज पढ़य। हाँसूक बिआहमे खुरपीक गीत। परिस्थितिक विपरीत कार्य कयलापर, बात बजलापर एहि उक्ति द्वारा उपहास कयल जाइछ।
हाँसू टेढ़ो होइत छैक तँ अपने दिस घीचैत छैक। स्वातर्थी लोक सतत् अपनहि लेल हरान रहैछ।
हिँसाब लेब कि बनियाँ डाँड़ब? बिना हिसाब कयनहि जे ककरो आर्थिक दण्ड देमय चाहैत छथि, तनिका लेल प्रयोग।
हुकमी कि रुकमी? नियम-कानून ताक पर राखि जे जबर्दस्तीि करय चाहैछ तकरालेल प्रयोग।
हुराड़ चीन्हरय बाभनके पूत? दुष्ट़ उछृंखल व्याक्ति नीक अधलाह लोकक विचार नहि रखैत अछि, अपितु नीकहि लोकपर अधिक आक्रमण करैछ।
हुबगररि तिरिया पहाड़ ढाहय। स्वगस्थत एवं उत्सातहयुक्तल नारी भरिगरो कार्य कय लैछ।
हे मोन, ककरा लय मरी तँ जे मरय हमरा लय। सहयोग परस्पआरे कयल जाइत छैक।
हेलि गेलहुँ हेलि अयलहुँ,
गोहि देखलहुँ फीरि गोलहुँ। खतरा उपस्थित होइतहिँ जे पलायन करय लगैछ, तकर पौरुष केर ललकारा देबाक लेल प्रयोग।
हे हरख, तोहर पेट कियै तरख ?
ई की देखलह, देखिहऽ अगिला बरख। घमण्डद मे चूर रहनिहार मूर्ख व्यरक्तिक लेल प्रयोग।
हेहराक किदनमे गाछ जनमलैक तँ कहलकै हम छाहरिये तरमे छी।
हेहराक पेटमे गाछ जनमलैक तँ कहलकै हम छाहरिये तरमे छी।
हेहराके गाछ जनमलै तँ कहलकै हम छाहरियेमे छी। जकरा सजाय भेलहु पर भय नहीं होइत छैक ओहन थेत्थहर व्य क्ति पर व्यंकग्यातर्थ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
हेहरी गे हेहरी, साँय मारलकौ बापक देहरी। कोनो थेत्थेरि नारी जकरा सजाय भेलहु पर भय नहि होइत छैक, तकरा लेल प्रयोग कुलटा वा दुर्जन स्त्रीर पर व्यंयग्यं।
होनहार गाछ के लुहलुहार पात। कोनो प्रतिभा सम्प्न्ना नेनाक प्रशंसामे प्रयोग।
होबक भीन खायक रीन। भिन्नभ भेनाइ तथ ऋण खयनाइ दूनू बरोबरि।
होम करैत हाथ जरल। ककरो उपकार कयला पर जँ स्व यं फेरी लागि जाय तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
हौ भाइ, तोँ कोन जाति तँ हम छी गुआर, तखन तोहर माथपर पुआर। आ तोँ
कोन जाति तँ हम छी हजाम; तखन माथपर जाँत। हौ भाइ, नइ मिलह,
नइ मिललह तँ नइ मिललह भारी तँ लगलह। मूर्खतावश उटपटांग कार्य एवं उटपटांग गप कयनिहार लेल एहि उक्तिक प्रयोगब कयल जाइछ।
हौ भाइ, कतऽ जाइछऽ तँ हम जाइछी कूकुर बधिया करऽ । कटतह नइ तँ से
तँ अवधारियेकऽ जारहल छी। खुराफात वा झंझटिया कार्य कयनिहार ई मानिएकय चलैछ जे ओ संकटमे पडि़ सकैछ।
हौर कामहि नीक कौर कामहि नहि नीक। भोजन करैत काल सामग्री घटि गेलापर जँ विलम्बर सँ अबैत छैक तँ केओ एहि उक्तिक प्रयोग कय बैसैत छधि।
त्राहि कृष्णस कहि देल। विपत्तिमे पड़ल लोक भगवानकेँ गोहरबैछ।
हेमन्ति जाइत-जाइत शिशिरकेँ कहलकै- हमरा तँ खेपलक धूँआँ धुकुर सँ
तोरालय रंगले रजैया हो जाड़ भाइ शिशिरमे सर्वाधिक शीतलता रहैत छैक।
ज्ञानझाक जोग। बुद्धि लगाकय कार्य करबाक लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
ज्ञान बढ़य चोटसँ रोग बढ़य भोगसँ। ठोकर लगलापर बुद्धि बढ़ैत छैक।
ज्ञान बढ़य सोचसँ। अध्यनयन मनन ओ चिन्तकनसँ बुद्धि-ज्ञान बढ़ैत छैक।
ज्ञानी मरय ज्ञानलय पेटू मरय पेट लय। जकर जे स्त र छैक से ताही लेल हरान रहैत अछि।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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