Sunday, October 11, 2009

पेटार ३९

जीवन संघर्ष
उपन्यांस












जगदीश प्रसाद मंडल
बेरमा, मधुबनी, बिहार।

जीवन संघर्ष ःः 1
कातिकक अन्ह रिया पख। रौदियाह समय भेने जेठक रौद जेँका रौद तीख। उम्म।स सेहो। दस बजेक उपरान्तर बाध-बोन मे रहब कठिन। तेँ सवेर-सकाल सब चलि अबैत, मुदा घरो पर चैन कहाँ। माथ परक पसीना नाक पर होइत टप-टप खसैत आ देहक पसीना स कपड़ा भीजैत। मन औल-बौल करैत। आठमे दिन दिवाली, तहू मे काली-पूजा करैक विचार सेहो सैाँसे गैाँवा मिलि के क लेलक। दुनू अमबसिये दिन। ओना दिवाली एक दिना पावनि होइत मुदा काली पूजा धूम-धाम से मनबैक विचार भेने, पाँचो दिन सब अपना-अपना ऐठाम दीप जरवैक विचार क लेलक। सब अप्पलन-अप्प न घर-आंगनक टाट-फड़क स ल' क' जते-जते गामक रस्तार-पेरा टूटल अछि ओकरो सरिअवै मे लागि गले। गाम मे पहिल बेरि काली-पूजा सेहो हैत तेँ सब वयस्त । सब मे तजगर उत्सासह। अप्प न-अप्पकन खेती-बाड़ी छोड़ि सब नीक जेँका ओहि काज मे भीड़ल। ओना खेत मे हालोक कमी किऐक त अधा भादो मे जे एकटा मझोलका अछार भेल तइ दिन से एक्कोो बुन बरखा नई भेल, खेत मे दरारि फाटि गेल। उपरका खेतक धान मरहन्ना भ' गेल। केकरो-केकरो गरमा धान जे अगता रोपने छल, ओकर कम दिनक धान रहने सोलहन्नी , मुदा जे वेसी दिनक गरमा धान अछि ओ अधा-छिधा। पूजाक पैघ आयोजन तेँ विष्‍ोष वयवस्थालक जरुरत। मुदा लोकक उत्सााहे तते जे कोढ़िला बोझ जेँका काज के बुझैत। अनठौला से हल्लु्को काज भारी भ जाइ छै, मुदा उत्सालहित भ केला से भारिओ काज हल्लुलके बनि जाइ छै।
आइ तक अइ गाम मे(बँसपुरा मे) ने कहियो कोनो यज्ञ-जाप भेल आ ने कोनो पूजा-पाठ। तेँ इलाकाक लोक वँसपुराके पपीयाहा गाम बुझैत। ओना गोटे-गोटे साल, महावीर जी स्था न मे, अष्टपयाम कीर्तन भ' जायत। ओहो नियमित नहि। जइ साल उपजा-बाड़ी नीक होइत ओइ साल उत्साेहित भ' सब कीर्तन क लैत, मुदा जइ साल रौदी वा दाही भ जाइत तइ साल अष्ट यामो या त रौदिया जाइत वा दहा जाइत। बेकता-बेकती कहियो काल भनडारा सेहो क लइत। अइ बेर काली पूजा करैक विचार सैाँसे गामक लोक मिलि क' केलक। मेलो धुमधाम से हैत। पाँच दिनक मेला। नाच-तमाषा स ल' क' दोकान-दौरीक नीक व्यइवस्थान हैत। गाम मे काली-पूजा हैत, तेँ लोक मे विष्‍ोष जिज्ञसो आ उत्सामहो। भिनसर से खाइ-पीवै राति धड़ि सब यैह चर्चा करैत। काली-पूजाक प्रति लोकक मन एते उड़ि गेल जे सब अप्प्न-अप्प न काज-राज छोड़ि, अही पाछू बेहाल। मालो-जालक आ खेतो-पथारक भार स्त्री गणे पर पड़ि गेल। मुदा ओहो सब खुषी। किअए खुषी? खुषी अइ दुआरे जे हम्मजर घरबला धरमक काज मे लागल छथि, जे हमरो हैत। ओना दिवाली, एक दिना पावनि अदौ स होइत आयल, भलेही दिवालीक प्रात गोधन पूजा, दोसर दिन भरदुतिया-चित्रगुप्त पूजा होइत, मुदा एक-दोसर स अलग-अलग होइत। दषमी(दुर्गापूजा) जेँका नहि जे सप्तामी क' भगवती केँ आखि(डिम्भात) पड़िते मेला शुरु भेल आ नेने-नेेने एक्केह बेर जतरा दिन उसरल। मुदा अइबेर बँसपुराक दिवाली के काली-पूजा रंग चढ़ा देलक। किऐक त सब अपना मे विचार क लेलक जे जाबे तक काली पूजाक मेला चलत ताबे तक सब अप्पेन-अप्पचन घर-आंगन, दुआर-दरवज्जाी स ल क' पोखरिक घाट, इनार चापाकल, माल-जालक खूँटा पर सेहो दीप जरौत।
गाम मे काली पूजा किअए हैत? तेकर कारण भेल। कारण इ भेल जे बँसपुरा से सटले(डेढ़ कोस पर) सिसौनी मे पच्चीकसो बर्ख से दुर्गा-पूजा होइत अबैत अछि। चरिकोसीक लोक(मरद-मौगी) दुर्गा-पूजा देखै सिसौनी अबैत। अप्पेन-अप्पोन कबुला-पाती सेहो चढ़वैत आ मेलो देखैत। साँझो दैत। बलि प्रदान सेहो करैत। बलि-प्रदान मे सिसौनीक दुर्गा नामी। किऐक त एते बलि प्रदान कतौ ने होइत। किलो भरि-भरि छागरक दाम पँच-पँच सौ भ जाइत। अइ बेरक पूजा मे एकटा घटना घटल। घटना इ जे बँसपुराक एकटा अठारह-बीस बर्खक लड़की के, पूजा कमिटीक तीन गोटे, बलजोरी पकड़ी क' भंडार घर ल जा भरि राति रखि लेलक। राति मे ते कियो ने बुझलक, मुदा भिनसर मे जखन ओइ लड़की के छोड़लकै आ लड़की कनैत-कनैत गाम पहुँचि सब के कहलकै तखन जना सबहक(जे सुनै) देह मे आगि लगैत गेलै। लड़कीक माए बताहि जेँका जोर-जोर से सरापबो करै, गारियो पढ़ै आ घर से फरुसा(फौरसा) निकालि सोझे सिसौनी दिसक रस्तोल पकड़लै। साड़ीक अँचरा क' उलटा पीठि पर बान्हिक, जना सन मे सिपाही जाइत, तहिना विदा भेलि। लड़कीक बापो तहिना मुरेठा बान्हि् हरोथिया लाठी ल अनधुन गरिअबैत, स्त्री क पाछु-पाछु विदा भेल। मुदा समाजक मरदो आ जनिजातियो दुनू केँ पकड़ि क' रोकलक। जेना-जेना समाचार पसरैत तेना-तेना गाम दलमलित हुअए लगल। रंग-बिरंगक गप-सप, गाम मे चलै लगलै। कियो बजैत जे चलै चलू सिसौनी मे आगि लगा सैाँसे गाम क' जरा देब। त कियो बजैत जे सैाँसे गाम के लुटि सबहक बहू-बेटी क' पकड़ि घिसिया क ल आनब। कियो कहैत जे ओइ सार(कमिटीक सदस्यब) के खून क देब। मुदा इ सब विचार खुदरा-खुदरी छल, सामूहिक नहि। गामक बुद्धियार लोक सब सबके शान्तिू करै मे लगल। एक्केद-दुइये, गामक सब(मरद-मौगी) सड़क पर आबि थहा-थही करै लगल। मेला जेँका लोक सड़क पर भ' गेल। ककरो-ककरो हाथ मे लाठी त ककरो-2 हाथमे भाला त ककरो-2 हाथ मे तीर-धनुष सेहो। गाम मे सबसे अधिक उमेरक मखन बाबा। नब्बेह बर्ख से उपरे उमेर। हाथ मे फराठी नेने, देह थरथराइत, टुघरल-टुघरल आबि आखि उठा के देखलनि ते बुझि पड़लनि जे आइ दुनू गामक बीच मारि हेबे करत। केमहर से के मरत, तकर ठेकान नहि। मन पड़लनि, जे एहिना एक बेरि जूरषीतल मे एकटा नढ़िया खातिर बेला आ मैनहीक बीच मारि भेल, जइ मे तीनि टा खूनो भेल आ कते गोरे के जे जाँघ टुटलै, से जिनगी भरि ठाढ़ नै भेल। हो न हो कहीं आइयो ओहिना ने हुअए। फेरि मन मे भेलनि जे सबके मनाही क' दियै। मुदा फेरि भेलनि जे हम्महर बात मानत के। विचित्र गुन-धून मे मखन बावा। थोड़े आगू बढ़ि मखन बाबा देखलनि जे जेस्त्री गण आ मरदो धाक करै अए ओहो सब सोझे मे निधोक अन्टन-सन्टे बाजि रहल अछि। लाज-धाकक कोनो बिचारे नै। मन मे एलनि जे जहिना आगि मे जरैत लकड़ी पर पाइन देला से आगि त मिझा जाइत मुदा आगिक ताव(गरमी) त रहवे करैत। तहिना त लोकोक बीच हैत। गुन-धुन करैत मखन बाबा फराठी बले बीच रास्ताे पर ठाढ़ भ, ने आगू बढ़ैत ने पाछु होइत। अपन दायित्वन बुझि आ(मखन बावा) एक हाथ से फराठी पकड़ने आ दोसर हाथ उठा, सबके शान्तै रहै ले कहथिन। मुदा हुनकर अवाजो आ हाथक इषारो भीड़ मे हरा जाइत। सब अपने सूरे। थोड़े आगू बढ़ि मखन बाबा पाछु घुरि तकलनि ते देखलखिन जे एते काल चेतने लोक सब के देखै छेलियै, आब ते जेरक-जेर धियो-पूतो सब आवि रहल अए। गामक जते कुत्ता अछि सेहो सब नाङरि डोला-डोला भुकै अए। एक त देहक अब्ब-ल दोसर मन मे चिन्ता्, बीचे रस्ताभ पर फराठी रखि मखन बावा वैसि, दुनू हाथ माथ पर ल सोचै लगलथि। मन एलनि जे घटना भेल अछि ओ त इज्जेत स जुड़ल अछि। तेँ जँ लोक जान द बँचवै चाहै अए ते नीके करै अए। मुदा गामक भीतर त ऐहेन-ऐहेन किरदानी सब दिन होइ अए। तखन कहाँ कोइ किछु बजै अए। तइ काल मे छौँड़ा-छौउड़ीक खेल भ जाइ अए। इ बात मन मे अबिते मखन बावाक मुह स हँसी निकलल। हँसैत मखनबावा सोचलनि जे एक्के तरहक काज ले सैाँसे गामक लोक मारै-मरै पर तैयार अछि आ दोसर ठाम छउरा-छउरीक खेल बना दैत अछि। अजीव अछि लोकोक बुद्धि आ विचार। जँ एकरा इज्जाति बुझै छै ते इज्जबत बना राखह, नै जे खेल बुझै अए ते खेल बुझह। मुस्कीछ दैत ओ सबसे आगू जा रास्ताइ पर पइर रहलाह। पड़ल-पड़ल कहै लगलखिन- ‘‘अगर तू सब अइ से(अपना के चेन्हप बना) आगू बढ़बह ते हम एतै परान गमा देब। नै ते अखैन शान्ते हुअअ बाद मे रस्ताद से जबाव देवइ।''
मखन बाबाक बात सब मानि गेल। सब शान्तन भ गेल। स्त्रीनगण सब घर दिसक रास्ता‍ धेलक। धीरे-धीरे लोको पतड़ाए लगल। बाकी जे लोक रहल ओ हुनका(मखन बाबा) लग जा पूछलकनि- ‘‘बाबा, कोना जबाव देबइ?''
उत्सानहित भ मखन बाबा कहलखिन- ‘‘अखन ते नहाइ-खाइ बेर भेल जाइ अए, तेँ अखन नहि। चारि बजेे मे सब कियो एक ठाम बैइसू। जे करैक हैत से सब विचारि के क लेब।''
सैह भेल।
चारि बजे सब ब्रह्‌मस्थाोन मे बैसल। सबहक विचार एक दिषाहे। दू पार्टी(पक्ष-विपक्ष) रहला से बैसारक रुप अलग होइत, मुदा से त नहि अछि। अप्पदन-अप्पपन विचार के सब जोर-जोर से बाजि-बाजि रखै चाहैत। जइ से ककरो कियो बाते ने सुनैत। सब अपने सुरे अपन बात रखै मे बेहाल। बजैत-बजैत जब सबहक पेटक बात सबटा निकलि गेलै तब अपने सब चुप भ गेल। चुप भ सब सबहक मुह देखै लगल। होइत-हबाइत सब मखन बाबा केँ कहलक- ‘‘बाबा, अहाँ जे निर्णय करब, हम सब मानि लेब।''
सबहक विचार सुनि मखन बावाक मन मे संतोष भेल। ओ अपन विचार दइ ले ठाढ़ भेला। मुदा बुढ़ापाक चलैत दुनू जाँघ थरथर कपैत। थरथराइत जाँघ देखि सब कहलकनि- ‘‘बैसिये के कहिऔ बाबा।''
मुदा बैसि के कहला से सब सुनत की नहि, इ बात मन मे होइन। ठाढ़े-ठाढ़ अप्पैन दुनू जाँघ के असथिर करैत मखन बावा कहै लगलखिन- ‘‘दू गामक झंझट असान नै होइत। दू गोटेक बीचक झंझट नइ छी। जहिना तू सब कहै छहक तहिना ते ओहू गामक लोक सब कहतै। अखन ते एक्के गोरेक संग घटना घटल अछि मुदा झंझट बढ़ौला से ऐहेन-ऐहेन कते घटना घटत। मारि करै जेबहक ते तोँहू मारबहक तोरो मारतह। तोँहू कपार फोड़बहक तोरो फोड़तह। हाथ-पाएर तोँहू तोड़बहक तोरो तोड़तह। अखन ने बुझि पड़ै छअ जे सोलहन्नी़ हमही सब मारबै आ ओ सब माइर खायत। मुदा माइर मे से थोड़े होइ छै। दुनू दिसक लोक मारबो करै छै आ माइरियो खाइ अए।''
मखन बाबाक विचार सुनि सब मूड़ी डोला-डोला सोचै लगल। सब सब दिस तकैत। सबहक मन मे बिचारक गंभीरता अवै लगलै। मुदा तइओ मन मे सोलहन्नीस क्रोध नै मेटेलै। मुदा मनक विचार मे गजपट हुअए लगलै। कखनो शान्तीमक रास्तास मन मे जोर पकड़ै ते लगले मारि-दंगाक विचार। लगले मन मे खुषी अबै ते लगले तामस उठै। सबहक मुहक रुखि देखि मखन बावा आगू कहै लगलखिन- ‘‘गामे मे की देखै छहक? जे कने हुबगर अछि ओ गरीब-गुरबाक संग केहेन बेवहार करै अए। तहिना गामोक होइ छै। अप्पैन गाम(वँसपुरा) भीतर मे फोंक अछि। देखते छहक जे सब अपन-अपन नून-रोटी मे भरि दिन लगल रहै अए। ने अपना पेट से छुट्टी होइ छै आने अनकर आ कि समाजक कोनो चिन्ता रहै छै। तेही ले बेइमानी-सयतानी सेहो करै अए। सब मिलि के कोनो समाजिक काज करी, इ विचार ककरो मे मन छइहे नहि। ओना सिसौनीयो मे बेसी नहिये छै मुदा अपना गाम से थोड़े बेसी जरुर छै। किऐक त सब मिलि दुर्गा पूजा क लइ अए। जइ से साल-भरिक जे रुसा-फुल्लीा रहै छै, ओ कमि जाइ छै। तेँ समाज के आगू बढ़ैक लेल दसनामा(सर्वजनिक) काज जरुरी अछि। जाबे तक लोकक मन मे दसनामा काजक प्रति सिनेह नइ आओत(औत) ताबे तक समाज आगू मुहे कोना ससरत? अइ नजरि से देखला पर बुझि पड़तह जे अपना गाम(बँसपुरा) से सिसौनी थोड़े अगुआइल अछि। सिसौनियो से अगुआइल अछि बरहरबा। किऐक त ओइ गाम(बरहरबा) मे दुर्गो-पूजा होइ छै आ पढ़ै-लिखै ले हाइयो स्कूुल तक छै। बरहरबो से अगुआइल कटहरवा अछि। ऐखते छहक जे कटहरबा मे हाइयो स्कूहल छै, अस्पबतालो छै आ साल मे एक बेरि सब मिलि के चारि दिनक मेला सेहो काली-पूजा मे लगा लइ अए। यैह सब काज गामके आगू बढ़ैक रास्ता छी। जइ गाम मे जते बेसी दसनामा काज हैत ओइ गामक लोक मे ओते बेसी प्रेम बढ़त जखने लोकक बीच प्रेम बढ़त तखने छोट-छीन बात ले झगड़ा-झंझट कमत। झगड़ा-झंझट की होइछै? देखबे करै छहक जे सदिखन एक-दोसर मे गारि-गरौबलि, मारि-मरौबलि होइते रहैछै। जखने लोक झूठ-फूस मे ओझराइये तखने ओकर घरक काज(खेती-बाड़ी, माल-जालक सेवा) मारल जाइ छै। जखने आमदनीक काज मरल जेतइ तखने चारु कात से अभाव दौड़ल औतै। अभाव तेना भ क' पकैड़ लेतै जे ओ बेवस भ जायत। जखने बेवस हैत तखने दुनिया मे अन्हाीर छोड़ि इजोत देखबे ने करत। तेँ जरुरी अछि जे लोकक मन दसनामा काज दिस बढ़ै। जइ गाम मे जते दसनामा काज हैत ओ गाम ओते तेजी से आगू बढ़त।''
मखन बाबा बजिते छल कि सब अपना मे कन-फुसकी करै लगल। कन-फुसकी एते हुअए लगलै जे सबहक धियान मखन बाबाक विचार स हटि अपना दिस भ गेल। लोकक धियान हटैत देखि मखन बाबा ठाढ़े-ठाढ़ सोचै लगल जे भरिसक सबहक मन मे कोनो नव विचार उपकलै। बैसले-बैसल जोगिनदर जोर से बजै लगल- ‘‘दुर्गा-पूजा ते आब परुका(पौरकाँ) साल हैत, मुदा काली-पूजा त लगिचाइल अछि। तेँ हम सब आइये संकल्पओ ली जे हमहू सब काली-पूजा गाम मे करब।''
जोगिनदरक बात सुनि सब कसि क' थोंपड़ी बजा समर्थन देलक। अही प्रतिक्रियाक फल थिक गाम मे काली पूजा। ओना रौदीक चलैत गामक किसान आ बोनिहारक दषा दयनीय, मुदा सिसौनीक घटना लोकक उत्सा ह केँ एते ने बढ़ा देलक जे बोनिहारो सब एकावन-एकावन रुपैया चंदा अपने-अपने मुहे गछै लगल। बोनिहारक चंदा किसान के मुसकिल मे द देलक। मुदा एक त समाजक संग चलैक सवाल दोसर आइ धरिक परिवारक प्रतिष्ठा केँ बँचबैक, तेसर नव काज गाम मे भ रहल अछि, तइ मे पाछू हटब, उचित नहि। एक्केष-दुइये किसानो सब उत्सानहित भ गेल। एक स्वार से सब समर्थन द देलक। सबकेँ उत्साषहित देखि प्रेमलाल ठाढ़ भ बजै लगल- ‘‘भाइ लोकनि, अपना गामक बहू-बेटी आन गामक मेला मे जा बेइज्ज त होइ अए। एकर की करण छै? एक कारण अछि जे अपना गाम मे कोनो तेहेन काजे ने होइ अए। जखने अपनो गाम मे तेेहेन काज हुुअए लगत ते अनेरे ओहू सब गामबला के दहसति हेतइ जे जँ हमसब ओइ गाम(बँसपुरा) वला के किछु करबै ते ओहो सब ओहिना करत। जखने बराबरीक बिचार मन मे औते तखने चालि-ढालि बदलतै। जखने चालि ढालि बदलतै तखने सब बराबरीक रास्ता धरत। जँ से नइ करत ते हमहूँ सब ओहिना करबै जना ओ सब करत।'' कहि प्रेमलाल बैसि रहल।
प्रेमलाल के बैसिते फेरि सब कन-फुस्की शुरु केलक। कनफुसकी एते हुअए लगलै जे सौजनिया भोज जेँका हल्ला बुझि पड़ै। कनफुसकी देखि छीतनलाल उठि क' ठाढ़ भ खिसिया के बजै लगल- ‘‘देखू, गल्लख-गुल्ल केने किछु ने हैत। सिसौनीवला सबके एते गरमी किएअ चढ़ल रहै छै से बुझै छियै? ओ सब दस हजार रुपैआ खर्च क क' दुर्गा-पूजा क लइ अए, तेँ। ओकरा सब के बुझि पड़ै छै जे अइ परोपट्टा मे हमही सब टा पुरुख छी। हमरे सब टा के रुपैआ अछि आ आन-आन गाम वला मौगी छी, ओकरा सव के रुपैआ छइहे नै। तेँ पुरुख बनि ओकरा सबके जबाव दिअए पड़त। ओ सब दस हजार रुपैया दुर्गा-पूजा मे करै अए हम सब पचास हजार रुपैया खर्च क क' काली-पूजा करब। जँ सवैया-डयोढ़ा काज करब ते ओ सब मद्दिये ने देत। किऐक ते पच्ची'स बर्ख से ओकर मुह अगुआइल छै। एक बेरि समधानि के दबैक काज अछि। तेँ तेना के दाबैक कोषिष करु जे ओ सब बुझत हमरो दादा कियो अछि। एक बेरि हरदा बजबैक अछि। तेँ, भने अखन सब बैसिले छी, अखने पूजा कमिटी बना लिअ। पूजा कमिटी मे सब टोल आ सब जाइतिक सदस्य बना लिअ। जँ सब टोल आ सब जाइतिक सदस्यम नइ बनाएव ते अनेरे लोकक मन मे अनोन-विसनोन हुअए लगतै। ततबे नइ, सब जाइतिक सदस्य भेने काजो मे असान हैत किऐक त सब तरहक काज करैक लेल अनुभवी लोक भेटि जायत।''
छीतन लालक कारगर विचार के सब एक मुहरी समर्थन देलक। कमिटी बनै लगल। सब टोल आ सब जाति मिला क एक्केकस गोटेक कमिटी बनि गेल। एक्कैबसो सदस्य बैसार मे। सब नौजवान। एक्केा बेरि सब अपना-अपना जगह पर ठाढ़ भेल। सैाँसे गामक सब आखि उठा-उठा के बेरा-बेरी एक्कैकसो के देखलक। एक्कै।सोक मन मे खुषी जे हमसब परिवार स आगू बढ़ि समाज मे एलौ। तेँ सब मुस्कुेराइत। एक्कैकसो गोटे एक दिषि बैसल आ शेष समाजक दोसर दिस। किऐक त कमिटीक लेल अध्यकक्ष, उपाध्यएक्ष आ कोषाध्यमक्षक जरुरत होइत। अध्य क्ष के बने? अइ सवाल पर सब सबहक मुह देखै लगल। किऐक त गाम मे पहिले-पहिल कमिटियो बनि रहल अछि आ तेकर अध्यपक्षो बनत। तेँ जहिना अध्याक्ष बनैक इच्छा सबहक मन मे, तहिना अनभुआर काज बुझि डरो। गुनधुन करैत रघुनाथ अप्प्न पितिऔत भाइ, देवनाथक नामक प्रस्ताभव अध्योक्षक लेल केलक। देवनाथक परिवार गाम मे सबसे अगुआइल। अगुआयल अइ माने मे जे जाइतियो पैघ आ धनो बेसी। दोसर गोरेक नामक प्रस्ता व नइ देखि मंगल उठि क' ठाढ़ भ अप्पकन नाम अध्यनक्षक लेल रखलक। जखने दू गोरेक नाम एलै कि बैसार मे गुनगुनी शुरु भेल। जाइतिक मामला मे मंगल पछुआइल।
देवनाथ आ मंगल, गामक स्कू ल स ल क' काओलेज संगे-संग पढ़ने। ओना पढ़ै मे मंगल तेज मुदा रिजल्टत देवनाथक नीक होय, किऐक त देवनाथ धुड़फन्दाआ। जना-जना दौड़-बरहा क क' नीक रिजल्टद आनि लिअए। मंगलक नाम सुनि दुनू भाइ-देवनाथ आ रघुनाथ आखिक इषारा से गप-सप करै लगल। कनिये कालक बाद रघुनाथ, मंगल के पलौसी दैत कहलक- ‘‘भैया, हमरा लिये जेहने अहाँ तेहने देवनाथ भैया। अहूँ दुनू गोरे संगिये छी। संगे-संग पढ़नौ छी। तेँ हम कहब जे देवनाथ भैया के अध्ययक्ष आ अहाँ उपाध्यभक्ष बनि पूजा-कमिटी चलाउ।''
मंगलक मन मे सिर्फ कमिटिये चलवैक बात टा नहि, समाज के आगू मुहे बढ़वैक विचार सेहो। बच्चे से देवनाथक चरित्र के मंगल देखने। मुदा समाज त पोखरिक पाइनिक सदृष्यर होइत। जहिना पोखरि मे गोला फेकला से पाइन मे हिलकोर उठैत मुदा रसे-रसे असथिर होइत, पुनः पहिलुके रुप मे चलि अबैत। जे बात मंगल जनैत। मंगलक मन मे एकटा आरो बात घुरिआइत। ओ बात इ जे एक दिन(करीब तीनि साल पहिने) एकटा गामेक लड़की संग देवनाथ दुरबेवहार करैत रहए। ओहि समय मंगल हाट स अबैत छल। ओ लड़की मंगल के देखि कानि-कानि देवनाथक संबंध मे कहलकै। मंगलक तामस बेकावू भ गेलै। देवनाथ के बिना किछु पुछनहि चारि-पाँच थापर गाल मे लगा देलक। थापर लगौलाक उपरान्तन तामसो कमलै। डर से देवनाथ थर-थर कपैत। ओना मंगलो थरथराइत। मुदा तामसे। मंगल देवनाथ के कहलकै- ‘‘बच्चाै से अखन धरिक संगी छेँ छोड़ि दइ छियौ, नइ ते समाजक बेटी संग अतियाचार केनाइ केहेन होइ छै, से सिखा दैतियौ।''
दुनू हाथ जोड़ने देवनाथ आगू मे ठाढ़। जिनगी भरि(अखन धरिक जिनगी) जे देवनाथ हँसी-मजाक से ल क' सब रंगक बात मंगलक संग करैत आइल छल, ओइ देबनाथ के आइ मुह स बकार नै निकलि रहल छै। जहिना बोली थरथराइत तहिना करेज। जेना कोनो अपराधी न्याायालय मे न्या याधीषक आगू अपना के बुझैत तहिना मंगलक आगू मे देवनाथ। आखि से नोर बहबैत देवनाथ दुनू हाथ जोड़नहि बाजल- ‘‘भैया, हम जे केलौ से पौलौ। संगी होइक नाते एकटा बात कहै छिअह जे अइ घटना के तीनि आदमी छोड़ि चारिम नै बुझै।''
हँसैत मंगल कहलकै- ‘‘आइ कान पकड़ि ले जे ऐहेन काज समाजक बहीनि-बेटीक संग जिनगी मे कहियो ने करब। समाजक ककरो बहीनि वा बेटी समाजक होइ छै। जाबे तक ओकर विआह-दुरागमन नै भेल रहै छै ताबे तक ओ माए-बापक ऐठाम रहि समाजक बीच रहै अए, तकर बाद त ओ सदा-सदाक लेल समाज छोड़ि दोसर समाज मे मिलि जाइ अए।''
यैह बात मंगलक मन मे घुरिआइत।
रघुनाथक बात के जबाब दैत मंगल कहै लगलै- ‘‘बौआ रघु दसनामा काजक(सार्वजनिक काजक) शुरुआत गाम मे भ रहल अछि। मुदा समाज त टुकड़ी-टुकड़ी भ छिड़िआयल अछि। तेँ सबसे पहिने ओइ टुकड़ी सब केँ बीछि-बीछि समेटए पड़त। जँ से नै हैत त स्वअस्थस समाजक निरमान(निर्माण) कन्नाए हैत। अखन धड़िक जे समाजक ढाँचा रहल ओ बेढ़ंग अछि। ओहि बेढ़ंग के ढंगर बनबैक अछि। जाबे तक से नै हैत ताबे तक वेइमान, शैतान, गुण्डां, बदमाष समाज पर हावी रहत। जाबे धरि ओ तत्व हावी रहत ताबे तक समाजक असली करता लुटाइत रहत। कमाइत कोइ आ खाइत कोइ। जे होइ अए। तेँ दसनामा काज मे समाजक बच्चात-बच्चा के बराबरीक हिस्साध हेवाक चाहियै। मुइल-टूटल कियो किअए ने हुअए मुदा ओकरा मन से इ बात निकलि जेबाक चाही जे इ काज(दसनामा) हम्मबर नै फलनाक छियै। हम मात्र करैवला छी, करबैवला नहि। इ बात सत्य जे हमरा सबहक बाप-दादा हर जोतैत आयल जे हमहू सब करै छी। तहिना कियो मोटा उठबैत आयल, त कियो अप्प न श्रम के दोसराक हाथे बेचैत आयल। कियो पालकी उठबैत आयल ते कियो ढोल-पीपही बजवैत, नीच-स नीच काज हमरा सबहक बाप-दादा से समाजक किछु गोटे करवैत आयल, अखनो करबै अए। की हमरा शरीर मे ओ शक्ति नै अए जे ओकरा बदलि सकब। आजुक समयक इ मांग भ गेल अछि। तेँ नजरि स काज के आगू बढ़ौल जाय। अखन गामक सब बैसल छी तेँ आइये अइ बातक निरनय(निर्णय) भ जेवाक चाही। हम नइ चाहै छी गाम मे दसनामा काज नइ हुअए। मुदा जना आन-आन गाम मे देखै छी तना नै हुअए देब। जँ से हैत ते हमहू सब फुट भ दोसर जगह(ठाम) पूजा करब।''
मंगलक बात सुनि सब चुपचुप भ मने-मन सोचै लगल। सबहक मन मे सब बात अँटबो ने करै। किऐक त अखन धरि जइ काजक अभ्यमस्तम भ गेल अछि आ आखिक सोझहा मे आन-आन गाम मे देखै अए, वैह बात मन मे नचैत। मुदा मंगलक विचार नव मनुक्ख , नव समाजक लेल अछि।
सबकेँ चुप देखि मंगल दोहरा क' बाजल- ‘‘जहिना नव घर बनवै ले पुरान घर के उजाड़ै पड़ै छै। जँ से नै उजाड़त ते नवका घरक नीब(वुनियाद) कोना देत। अगर पुरने घरके नव ढंग से बनवै चाहत ते ओ नव घर नहि, पुरना घरक मरम्मात हैत। सब कियो देखै छियै जे जते-कतौ दुर्गा-पूजा वा काली पूजा होइ अए, ओइ ठाम मुरती कुम्हाैर बनवै अए। जे माइटिक काज छियै। मुरती बनबैक लेल चाल बढ़ही बनवै अए। घर गरीब-गुरबा बनवै अए। मुदा सब काज भेला ओ पूजाक हकदार कोन बात जे स्थारनक भीतरो जेवाक अधिकारी नइ रहै अए। इ विषमता अखन धरि समाज मे अछि। तेँ हम ताबे तक विरोध करैत रहब जाबे तक इ विषमता मेटा जायत। हमर अध्येक्ष बनैक लिलसा नइ अछि, मुदा विषम के सम बनवैक जरुर अछि। तेँ हम कहब जे जते गोटे जते टोल आ जाइतिक छी ओ सब अपना-अपना मे विचार क निर्णय करु।''
मंगलक बात सुनि सबहक मन मे द्वन्द्वग उत्प न्न हुअए लगल। किऐक त समाजक अधिकांष लोक परजीवी बनि गेल अछि। परजीवी अइ माने मे जे कियो दोसराक कमाइ लुटि वा ठकि के जीवैत अछि। ते कियो दोसराक बले(जना कोट-कचहरीक पैरवी, थाना-बहाना, खरीद-विक्री, डॉक्टनर-वैद्‌य। ...?) जीवैत अछि। तेँ एक-दोसर स टूटै नहि चाहैत अछि। जे समाजक विषमताक जड़ि छी। पैइच-उधार, लेन-देन, एकर मुख्या अंग छियै। बड़ी काल धरि बैसार मे गुन-गुन, फुस-फुस होइत रहल। परोछ मे त उचित बात बजनिहारक कमी नहि मुदा सोझा-सोझी कियो नहि। एकरो दू कारण छैक। पहिल बुधियार लोक अनका कन्हाह पर बन्दूडक रखि चलबै चाहैत आ बूड़िबक डरे नै बजैत।
गुन-गुन, फुस-फुस होइत देखि मंगल बुझि गेल। मन पड़लै बुद्धदेवक ओ बात- जे बीणाक तार के ओते नै कड़ा कड़ी जे टुटि जाय आ ने ओते ढील राखी जे अवाजे ने निकलै। तेँ किछु इम्हओरो आ कुछ ओम्हुरो से(अर्थात्‌ मध्य। स) ल क' डेग उठेबाक चाही। उठि क' ठाढ़ भ बाजल- ‘‘हम अप्पटन नाम वापस लइ छी। देवनाथे अध्यनक्ष हेता। मुदा आइ स ल क' जावे धरि पूजाक प्रकरण समाप्तह नहि भ जायत ताबे तक सब काजक निर्णय कमिटीक बीच हैत। जँ कियो अपना विचारे बलधकेल कोनो काज क समाजक नोकसान करत त ओकर फैसला समाजक बीच हैत।''
कहि मंगल बैसि गेल। मंगल क' बैसिते देवनाथ उठि क' ठाढ़ भ बजै लगल- ‘‘जिनगी मे पहिले-पहील दिन समाजक काज(सार्वजनिक) करैक मौका भेटल, तेँ मन मे बहुत खुषी अछि। मुदा हमहू त अनाड़िये छी, तेँ भुलचुक हेबे करत। हम चाहब जे पूजा-प्रकरणक जे मुख्यम-मुख्यक कार्य अछि ओ समाजेक बीच तय-तसफिया भ जाय। जहि स समाजक नजरि मे सब बात रहत।''
बहुत बढ़िया! बहुत बढ़िया बात देवनाथ कहलक। आइये(अखने) पूजाक मुख्यज-मुख्यम काजक निर्णय हम सब मिलि के क ली। तर्क-वितर्क हुअए लगल। तर्क-वितर्क होइत-होइत निर्णय भेल-
1. गामेक कारीगर(कुम्हालर) मुरती बनवे। ओना एक पर एक कारीगर बाहर अछि, मुदा पूजा-आराधना मे कारीगरी(कला) नइ देखल जाइ छै। देखल जाइ छै ओहि देवी-देवताक स्वारुप। दोसर बात जे जँ हम अप्प न बनौल वस्तुा के अपने अधला मानव, ते हम आगू कोना बढ़व? तेँ गामक जे कला अछि ओ ऐहेन-ऐहेन अवसर पर आगू बढ़ैत अछि।
2. काली मंदिर,(मंडप) गामेक घरहटिया बनवे। जेकरा घर बनवैक लूरि रहतै ओ मंडप किएक ने बनौत। संगे इहो हैत जे अधिक से अधिक गामक लोकक भागीदारी हेतैक।
3. पूजाक लेल, परम्पेरा स अवैक पुरोहितक संग ओहू आदमी के अवसर भेटै जे पूजा स सिनेह रखै अए। चाहे ओ कोनो जाइतिक किअए ने हुअए। समाज समाजक निरमते नहि नियामक सेहो होइत अछि।
4. मनोरंजनक लेल, गामक कलाकार के सेहो अवसर देल जाय। संगे वाहरक ओहन-ओहन तमाषा आनल जाय, जेहेन अइ इलाका मे नइ आयल अछि। इ बात सत्यय जे पैघ कलाकारक कला अधिक लोक देखबो करैत आ प्रसंसो(परसनसो) करैत, मुदा पैघियो कलाकार मे इ गुण होइत जे छोटो कलाकारक कला देखि आगू बढ़बैक कोषिष करैत। तेँ दुनू-गामोक आ बाहरोक कलाकार केँ अप्पआन-अप्प न कला देखवैक अवसर भेटए।''
5. पूजा समितिक सदस्यक आ अतिरिक्त् काजकेनिहार से बेहरी नै लेल जाय किऐक त ओकर समय लागि चुकल रहै छै।
6. जइ परिवार से बेहरी लेब, अगर जँ ओहि परिवारक कियो दोकान-दौरी करत, ते ओकरा से बट्टी नइ लेल जाय।
7. गामक जते गोटे काज करत, ओइ मे नीक-नीक काज केनिहार केँ पुरस्कृीत कयल जाय। संगे अधला केनिहार के आगू करैक मौका नइ देल जाय।
सैाँसे गामक लोकक बीच सातो निर्णय भ गेल। सातो निर्णय के अध्य क्ष पढ़ि के सबके सुना देलक। बैसार उसरि गेल।
खा-पी के मंगल बिछान बिछबैत राइतिक साढ़े एगारह बजैत। मंगल से भेटि करै ले जोगिनदर आयल। सतरंजी बिछा मंगल दुनू हाथ से जाजीम के पकड़ि झाड़लक। झाड़ैक अवाज कनी जोर से भेलै। अवाज सुनि जोगिनदर दलानक दावा लग डरे बैसि रहल। मन मे भेलै जे कतौ थ्री-नट्टा चललै हेँ। कान ठाढ़ क अकानै लगल। मुदा ने गल-गुल सुनै आ ने ककरो देखलक। मन असथिर भेलै, तखन उठि क' ठाढ़ भेल। ठाढ़ भ मंगल के सोर पाड़लक। कोठरिये से मंगल अबाज दैत बहरायल। बाहर आबि ओसारक चौकी लग आबि जोगिनदर के कहलक- ‘‘आबह! आबह! भाइ, निच्चाक मे किअए ठाढ़ छह? दुनू गोरे चौकी पर बैसि गप-सप करै लगल। जोगिनदर मंगल के कहलकै- ‘‘भाइ, आइ तक तोरा, ऐना भ क' नै चिन्हकने छेलियह। मुदा तोहर औझुका विचार देखि, बारह हाथक छाती भ गेल। भाँई मे क्योि दादा हुअए।''
जोगिनदरक बात सुनि मंगल बाजल- ‘‘भाइ, राइत बहुत भ गेल। भोरे उठैक अछि। एते राइत मे किअए ऐलह, से कहअ?''
‘‘एती राइत मे अबैक खास कारण अछि। तेँ निचेन बुझि एलौ। तू ते देखते छहक जे अखन तक हम गाम मे दहलाइते छी। ने रहैक ठौर आ ने जीवैक आषा। मुदा......।
‘मुदा की?'
‘‘मुदा यैह जे हम करोड़पति छी। करोड़क लप-झप रुपैआ हमरा बैंक मे अछि।
करोड़क नाम सुनि मंगल चौंकि गेल। अकचकाइत पूछलक- ‘करोड़ कते होइ छै से बुझै छहक?'
‘‘हँ। एक सौ लाख एक करोड़ होइ छै। एक सौ हजार एक लाख होइ छै। आ दस सौ के हजार होइ छै।''
‘रुपिया रखने कत-अ छहक?'
‘‘अइ गप के छोड़ह। जहिया से दिल्लीए नोकरी करै गेलौ तहिये से रुपैआक ढेरी लग पहुँच गेलौ। शुरु मे जे रुपैआ देखियै ते हुअए जे छपुआ कागज छियै। मुदा किछु दिन रहला पर रुपैआ हथिअवैक लूरि भ गेल। (कमाइक नहि) अखन, दिन भरि मे लाख रुपैआ हसोथब कोनो भारी कहाँ बुझै छियै। मुदा आब ओइ से मन उचैट गेल। आब एक्के टा इच्छा अछि जे बाहरक खेल-तमाषा छोड़ि, मनुक्खल जेँका गामे मे रहब। आब जँ गामो मे रहब, ते ओते-पूँजी भ गेल जे नीक-जेँका जिनगी बीति जायत।''
‘हमरा की कह-अ चाहै छअ?''
‘‘अखैन ते सब पूजा मे ओझड़ायल छी। तेँ पूजाक पछाति तू हमरा मदति क दाय। अखैन हम एक लाख रुपैआ ल क' आयल छी। अप्पेन जे लोक सब छअ, जदि ओकरा रुपैआक जरुरी होय ते हम बिना सुदिये के सम्हाछरि देबै। मूड़क-मूड़ घुमा देत। संगे तोरो कहै छिअअ जे रुपैआ दुआरे पूजा मे कोनो अभाव ने होय।''
जोगिनदरक बात सुनि मंगलक मन मे द्वन्द्व शुरु भेल। एक मन कहै जे रुपैआ दुआरे बहुत काज छुटि जाइ अए, से आब सम्ह।रि जायत। त दोसर मन कहै की हम डकैतक भाँज मे ने पड़ल जाइ छी। एसमगलर छी की माफिया? किछु बुझिये ने पड़ि रहल अछि।
दोहरा के मंगल पूछलकै- ‘एते रुपैआ कन्ना भेलह?'
मंगलक प्रष्नल सुनि जोेगिनदर चौंकन्नाआ भ चारु दिषि तकै लगल। मुदा ककरो नहि देखि घुन-घुना के कहै लगलै- ‘‘भाइ, जकरा ऐठिन हम नोकरी करै छलौ ओ बड़ पैघ कारबाड़ी। हजारो नोकर, ढेरो कारबार। मुदा सबसे भीतरका कारोवार रहै विदेषी रुपैआ के भजौनाइ। कोन-कोन देषक लोक कोन-कोन रुपैआ ल क' अबै आ अपना रुपैआ से भजबै, से चिन्ह-बो ने करियै। मुदा हमरा पर सेठबा के बड़ विसबास होय। किअए ते हमही सदिखन लगो मे रहियै आ चाहो-पान आनि-आनि दियै। निसोदंड राइत मे एक आदमी गाड़ी पर अबै आ भरि दिन मे जते रुपैआ भेल रहै ओ सब द दइ। आ ओकरा पासवुक पर रुपैया चढ़ा दै। सेठवा के जखैन जते रुपैआक काज होय, हमही बैंक से आनि दिअए।''
मंगलक भक्के खुजल। पूछलकै- ‘‘दिल्लीि सनक शहर मे पुलिस आ सी.आइ.डी. किछु ने करै?''
हसैत जोगिनदर कहलकै- ‘‘सबके महीना बान्ह‍ल छै।''
प्रषासनक इ रुप देखि मंगल हतोत्सा ह(हतोतसाह) भ गेल। मन मे अबै लगलै जे तखन लाक जीति कइअ दिन? छाती थर-थर कपै लगलै। मुदा मन के असथिर करैत पूछलकै- ‘तू ओहि सेठक संगे रहै छह कि.....?'
जोगिनदर- ‘‘दस बर्ख ओइ सेठवा अइठिन रैह के ओकर सबटा तड़ी-घटी बुझि लेलियै। नोकरी नइ छोड़लियै। ओकर कहलियै जे हम गाम जायव। माए दुखित अछि। तेँ अगुरबार रुपैआ दिअ जे माइयक इलाज करैब। भरि दिन मे कते शराब पीबे तेकर कोनो ठेकान ने, मुदा तइयो कतौ काज मे नै हुसै। हम सोचलहु जे एकरा ऐहेन कड़गर शराब पीआबी जे बेहोष भ जाय। सैह केलहुँ। जखन शराब पीलक आ निसां जोर करै लगले तखन वाहवाही दैत कहलक- ‘‘नीक माल अछि।''
हमहू अनठा देलिऐ। मने-मन सोचलौ जे जँ कही किछु रुपैआ ल क' पार करबै ते कानून मे ओझड़ौत। तेँ की केलहुँ जे कहलियै मालिक, हम चारि बजे भोरे चलि जायब। किएक त गाड़ी सवा चारि बजे टीषन से खुजै छै। अखने सब समान जोड़िया लेब। ओकरा निसां चढ़ैत जाय। जखैन बुझि पड़ल जे आब बेमत भ गेल, तखैन कहलियै- ‘‘मालिक रुपैया-पैसा अखैनिये द दिअ।'' पड़ल-पड़ल ओ कुन्जीक द देलक। कोठरी खोललौ ते रुपैआ देखि के मने उनटि गेल। जहिना अपना सब अन्नप भरल बोरा थकिऔल। एकटा वोरा निकालि, कोठरी बन्न क, चाभी पलंग पर रखि, अपना वैग मे रखि लेलौ। समानो सब सरिया लेलौ। सेठानी लग जा क' कहलियै- ‘‘मलिकाइन, हम भोरे गाम चलि जायब।'' ओकरा लग से निकलि दोस-महिम से भेटि-घाट करैत थाना पर गेलौ। सब चिन्हगरबे। कहलियै जे भोरे हम गाम चलि जायव तेँ अखन भेटि करै एलौ। सबसे भेटि-घाट करैत अपना डेरा ऐलौ। राति मे सुतलौ नै। दू बजे राति मे निकलि दोसक ऐठाम चलि गेलौ। सब बात दोसो के कहलियै। बीस लाख से उपर रुपैया रहै। ओकरे पूँजी बना हमहूँ वैह करोबार(विदेषी रुपैआ के भजौनाइ) शुरु केलौ। सबसे चिन्हाल-परिचय रहबे करै तेँ कतौ दिक्कभत हेबे ने करै। वैह हमर कमाइ अछि। मुदा आब ओइ काज से मन उचटि गेल। तेँ, आब गामे मे रहब।''
मंगल- ‘अप्पमन की योजना(जोजना) छह?'
जोगिनदर- ‘‘अप्प‍न मन अछि जे दस कट्ठा घरारी जोकर जमीन भ जाय आ पाँच बीघा धनहर। दस कट्ठा घरारी अइ दुआरे चाहै छी जे दसो कट्ठा के चारु भर से भरि मरद ऊँच छहर-देवाली द देबै। ओइ बीच मे डेढ़ कट्ठा मे चौघारा घर बना लेब। माछ पोसै ले दू कट्ठा खुनि लेब। वैह(ओही) माइट से सैाँसे भरा सेहो देवै। दू कट्ठा मे फल सब लगा लेब। दू कट्ठा तीमन-तरकारी ले राखब आ बाँकी अढ़ाइ कट्ठा ओहिना खसा के राखब। किऐक ते अन्नटक मास मे खरिहानक जरुरी होइत। ओहुना कते काज परिवार मे होइत रहै छै।''
मन पाड़ैत मंगल कहलकै- ‘देखते छहक जे बथनाहा(बगलवला गाम) मे अवधिया सब अछि। ओकरा सबहक खेत अपनो गाम मे अछि। ओइ मे से एक गोरे बैंक मे नोकरी करै अए। समांगोक पातर अछि। असकरे अछि। आन-आन गोरे ते अपने खेती करै अए, मुदा ओकर खेत बटाई लागल छै। ओ अपना गामक(बथनाहा छोड़ि) जमीन वेचै चाहै अए। करीब दस बीघा जमीन अपना गाम मे छै। अगर चाह-अ ते दसो बीघा भ जेतह। ओहो पाँच बीघा से कम नै बेचै चाहै अए। अगर खुदरा-खाइन बेचते ते बिका गेल रहितै। मुदा ने एक ठाम पाँच बीघा कीनैक ककरो ओकाइत छै आ ने ओ खुदरा बेचत। मुदा एकटा बात पूछै छिअ? अखन धरिक जे तोहर जिनगी छअ ओ हमरा विचारक विपरीत छअ। तेँ हमरा तोरा बीच कते दिन अपेछा चलत, तइ पर शंका अछि। इ कोना मेटाइत?'
मंगलक बात के सुनि जोगिनदर गंभीर भ सोचै लगल। थोड़े काल सोचि जोगिनदर जबाव देलक- ‘‘मंगल भाइ, तोहर शंका सोलहन्नी सही छह। मुदा हमरो मन अप्पमन काज से उचैत गेल। सदिखन, चोरक मन जेँका हमरो मन डराइले रहै अए। हरदम होइत रहै अए जे कखन सड़क पर घूमै छी आ कखन जेल मे रहब, तेकर कोनो ठीक नहि। ओना रोडक सिपाही से ल क' नीक-नीक पाइवला सलामी दइ अए। मुदा हम इहो बुझै छियै जे जोगिनदर के नहि, जोगिनदरक धंधा आ पाइ के सलामी दइ छै। कहियो काल जे राइत मे सपनाई छी ते ओहिना देखै छियै। जे आगू-आगू सी.पी.आइ. गरिअवैत आ पाछु-पाछु सिपाही थोपड़बैत रास्ताद पर नेने जाइ अए। मन मे कखनो आन विचार नइ अबै अए। सदिखन देषी-विदेषी पाइयेक रहै अए। तेँ कखनो मन मे होइ अए जे आगू मुहे सरसराइल जा रहल छी त लगले होइ अए जे अइ दुनियाँ से पड़ाएल जा रहल छी। हमरा ले अइ दुनिया मे पाइ छोड़ि की अछि?'' एते-बजैत-बजैत जोगिनदरक दुनू आखि से दहो-बहो नोर खसै लगलै। दुनियाक प्रति आकर्षण देखि मंगलोक हृदय दल-दल भ अपना मे जोगिनदर के साटै चाहैत। मुदा तरल वस्तुण रहनहुँ करुतेल आ मटिया तेल कोना मिलत? जँ घोड़ाइयो जायत ते दुनू दुनूक गुण के समाप्त क' देतए। मुदा मनुक्ख क जे बदलैक क्रिया अछि ओ एते प्रबल(परबल) अछि जे शायद अनुपमेय अछि। तेँ कोनो मनुक्ख क संबंध मे निसचित(निष्चि त) बात कहि देब असंभव बात थिक। हँ जिनगीक दषा देखि कहलो जा सकै अए। मुदा तइओ मंगलक मन मे एकटा नमहर खाइध बुझि पड़ै। ओ इ जे अखन धरि हम तपबे केलौ मुदा इ ते तपक उनटे चलल। उम्र मे अधिक अन्त़र भले ही नइ हुअए मुदा जिनगी त दू दिषा से बढ़ि रहल अछि। मने-मन सोचै लगल। एकटा बात मन पड़लै। ओ(मंगल) मात्रिक(मातरिक) गेल रहै। कोषिकन्हा मे मात्रिक। कोषी स(पूव मे कोसी आ पछिम मे कमलाक बीच जते धार-धुर छै) ल क' कमला धरिक पाइन(बाढ़ि) ओहि गाम होइत दछिन मुहे जाइत। एकटा बाँसक बीट रहै। ओहि मे चालीस-चालीस हाथक बाँस रहै। अगते बाढ़ि(वैषाखे मे) आबि गेलै। गामक लोक गाम छोड़ि, माल-जालक संग सब अप्पढन-अप्प)न कुटुमक ऐठाम चलि गेल। ऐहेन परिस्थि ति मे जन्मम भूमि स्वंर्ग कोना भ सकै अए? पनरह हाथ पाइन ओइ बाँस मे लगि गेल। खाइधनुमा बाध। अधिक दिन धरि बाढ़ि रहलै। ओइ बाँस मे पनरह हाथ उपरक गिरह पर से बाँसक कोपड़ रहलै। ओइ बाँस मे पनरह हाथ उपरक गिरह पर से वाँसक कोपड़ द देलकै। जखन पाइन सुखलै ते आमेक गाछ जेँका बाँसक बीट बुिण्‍ पड़ै। सोचैत-विचारैत मंगलक मन मे एलै जे एकटा(षर्त्त) बान्हि स बान्हिस दोसती क लेब। मुस्कुमराइत मंगल कहलक- ‘‘
भाइ, जहिना तू दरबज्जाष पर ऐलह तहिना तोहर सुआगत करब हमरो काज भ जाइ अए। मुदा हम आइ धरि झूठ नै बजलौ, से हमरा कोना निमहत?
मंगलक बात मंगलक पिता गणेष सेहो सुनलक। ओ पेषाब करै ले निकलल छल। हाँई-हाँई के पेषाब क गणेष दुनू गोटेक बीच पहुँच गेल। जोगिनदर चीन्हि गेल। बाजल- ‘‘आबह-आबह कक्काण! तोहूँ एतै बैसह।''
गणेष कहलक- ‘‘बौआ हम बैसिवह नहि। ठाढ़े-ठाढ़ अप्प'न एकटा खिस्सा। सुना दइ छियह। करीब चालीस साल पहिलुका बात छी हम जुआन होइते रही। मोछ-दाढ़ीक पम्ह् अविते रहै। माए-बाबू जीविते रहथि। हम एक्कोह धुर जमीन बढ़ेलहुँ नहि, जते एखनो अछि ओते ओहू दिन मे रहै। एहिना कातिकक मास रहै। तीन बजे करीब(बेरु पहर) एकटा मोटरी नेने, नाना पहुँच गेलाह। अबिते माए के कहलखिन- ‘‘दाय, हम गंगा नहाइ ले जाइ छी। गामक बड़ लोक जाइ अए। हम ओकरा सब के कहि देने छियै जे टीषने पर भेंट हेबह। तेँ ताबे हमहू सुसता लइ छी आ तोहू तैयार हुअअ। खेवा-खरचा हमरा अछिये तेँ कोनो चीज लइ-दइ के नै छअ।'' नानाक बात सुनि माए गुम्म- भ गेलि किअए त एक दिन पहिने गाय विआइल छलै। अइ सब मे माए बड़ सुतिहार रहै। पहिने गाय विआइल छलै। अइ सब मे माए बड़ सुतिहार रहै। माइयक मन मे दू टा बात टकराइ। एकटा इ जे हम ओमहर(गंगा नहाइ ले) जाइ आ इमहर गाय के किछु भ जाय, तखन ते दस मासक मेहनतक मेहनहताना चलि जाइत। आ दोसर बात इ होय जे गौँवा छोड़ि के हमरा संग करै आयल, हम नइ जेवइ आ ओमहर गौँओ छुटि जाय, तखन की हेतइ? तेँ गुम्म । ताबे बवुओ मालक घर से निकलि के आयल। हम ते रहबे करी, मुदा हमर मोजरे कोन। बावू आबि के गोड़ लागि आगू मे ठाढ़ भ गेलखिन। ने माए किछु बजैत आ ने बावू। नाना अप्प न बात बाजि चुकल रहथि तेँ ने किछु बजैत। पानि आनि के हम पहिनहि राखि देने रहियै। तीनू गोटे के चुप देखि हमही कहलिअनि- ‘‘नन्‍ना पैर धुअ-अ ने।''
एतबे बजैत देरी कि नन्नाे बजै लगलखिन- ‘‘नै-नै, पैर-तैर नै धुअब। टेनक टेम भेल जाइ छै।''
सामंजस्य' करैत माए बाजलि- ‘‘बच्चाम, छोड़ैवला कोनो ने छह। नाना संगे तोँही जा...।''
मन अपनो रहै, मुदा किछुु बाजी नहि। किऐक त एक दिन एकटा खिस्सा सुनने रहियै जे गंगा तेहेन भारी(नमहर) धार अछि जइ मे सैाँसे दुनिया क मनुक्ख् स ल क' चुट्टी-पीपरी धरि अटि जायत। तइओ पेट(गंगाक पेट) खालिये रहत। तेँ देखैक जिज्ञासा रहै। नाना संगे विदा भेलौ। जखन गंगा मे पैसि(दुनू गोटे) नहाइ लगलौ कि नाना कहलनि- ‘‘नाइत, मने-मन गंगा के कहि दहुन जे आइ से झूठ नै बाजब, आ डूम ल लाय।'' सैह केलौ। दू सालक बाद बाबू मरि गेल। घरक भार पड़ि गेल। मुदा काज करैक लूरि त सबटा रहबे करै। कहियो कोनो भार बुझिये ने पड़ै। झूठ बजैक जरुरते ने हुअए। किऐक ते भरि दिन अपना काज मे लागल रही। दछिनबारि टोल मे सरुप रहै। दस बीघा खेतो रहै। मुदा फुर्‌र-फाँइ वला आदमी। ललबवुआ। ने खेती-पथारी नीक जेँका करै आ बड़द खूँटा पर रखने रहै। भरि दिन ऐमहर से ओमहर केने घुरै। कनफुसकी क-क क' लोक सब के खूब झगड़ा लगबै। रहवो करै बड़ डाहि। अनके हर-बड़द से खेतियो करै आ जइ जन के खटबे ओकरा बोइनो ने दइ। तेँ कि होय जे दस बीधा खेत रहनौ दुइओ मासक बुतात नै होय। जेकरा से जे चीज लइ ओकरा फेरि घुमा के नइ दइ। एक दिन अपना ऐठाम आबि कहलक- ‘‘गणेष, सुनै छी तू चाउर बेचै छह?''
हम कहलियै- ‘हँ।'
‘‘हमरा एक मन चाउरक काज अछि।''
‘‘भऽ जायत। ककरो पठा देवइ, नइ जे अपने नेने जायब ते ल लिअ।'' ओ चाउर तौला के छोड़ि देलक कहलक जे तोरा तगेदा करैक काज नहि। जखने हाथ मे रुपैआ औत तखने तोरा द देवह। हम कहि देलियै- ‘‘बड़बढ़ियाँ।'' छह मास बीति गल। जखन जुआन से कहि देने रहियै जे तगेदा नइ करब तखन तगेदा कन्ना करितियै। साल बीत गेल। दोसर साल फेरि ओहिना केलक। तेसरो साल केलक। ओ चाउरक दाम दिअए नै आ हम तीनि खेप चाउर द देलियै। पाइयक दुआरे अपन काज बिथुत भ जाय। तब मन मे आयल जे कमाइ हम खाय दोसर, इ त सोझा-सोझी गरदनि कट्टी भ रहल अछि। ओह, से नइ ते आब चाउर गछबे ने करबै। कहबै जे नइ अछि। मुदा फेरि मन आयल जे झुठ कोना बाजब। विचित्र स्थि ति भ गेल। हारि के झूठ बजै लगलौ। तेँ बौआ, तू दुनू गोरे जवन जहान छह, कहि दइ छिअ-अ जे नीक-अधलाक विचार करैत आगू मुहे पाएर उठविहह।''
जीवन संघर्ष ःः 2
अमावासिया दिन। आइये दिवालियो होएत आ कालियो पूजा।

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'विदेह' २२५ म अंक ०१ मई २०१७ (वर्ष १० मास ११३ अंक २२५)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. १. राजदेव मण्‍डल -  दूटा बीहैन क था २. रबीन्‍द्र नारायण मिश...