Saturday, October 03, 2009

पेटार ३८

उत्थालन-पतन
उपन्यानस












जगदीश प्रसाद मंडल
बेरमा, मधुबनी, बिहार।
उत्था न-पतन ःः 1
गामे-गाम, कतौ अष्ट1याम कीर्तन तँ कतौ नवाह, कतौ चण्डी यज्ञ त' कतौ सहस्र चण्डी यज्ञ होइत। किऐक तँ एगारह टा ग्रह एकत्रित भ' गेल अछि। की हैत की नै हैत कहब कठिन। एकटा बाल ग्रह बच्चा केँ भेने त' सुखौनी लगि जाइत आ जहिठाम एगारह टा ग्रह एकत्रित अछि तइ ठाम त' अनुमानो कम्मेर हैत। परोपट्टा भगवान नाम सँ गदमिसान होइत। जओ तील, घीउक गंध सँ हवा सुगन्धि त। सभक हृदय मे भगवान क स्वँरुप बिराजैत। सभ व्यठस्त । सभ हलचल। खरचाक कोनो इत्ता नहि। जना निसाँ लगला सँ बेेहोशी होइत, तहिना। जाधरि लोक कीर्तन मंडलीक संग, मंडप मे कीर्तन करैत ताधरि घरक सभ सुधि-बुधि बिसरि मस्ति भ' रहैत। मुदा घर पर अबितहि केयो भूखल गाय-महीसिक डिरिऐनाई सुनि, चिन्तिोत होइत तँ क्योर बच्चा केँ बाइस-बेरहट ले बच्चाईक ठुनुकनाइ सुनि। दुखि भ' आँखि मे नोर भरैत। चारि सालक रौदीक चलैत पोखरिक पानि सूखि गेल। नमहर-नमहर दरारि खेत सँ ल' क' पोखरि धरि फाँटि गेल। इनारक मटिआइल पानि भरि-भरि सभ घैल मे राखैत, जखन फड़िछाइत तखन गिलास, लोटा मे ल' ल' पीबैत। लोक की करत? कत्त' जायत? मृत्युखक मुह छोड़ि दोसर रस्तेल की? आजुक कोलकत्ता ओ कोलकत्ता नहि जहिठाम अकाल आ समुद्री तूफान सँ ढ़ेरो लोक मरैत छल। जकरा आइ अपन दोसर घर बुझि लोक जीवन-यापन करै जाइत अछि। आजुक पंजाब ओ पंजाब नहि जहिठाम आन-आन राजक लोक जा खेत-खरिहान सँ कारखाना धरि खटि क परिवारक भरण-पोषन करैत अछि। पंजाबक ओ दशा छल, जहिठाम कल-कारखानाक कोन गप्पर जे खेतक माटि गेउर रंगक कंकड़ मिलल, बरखा सँ भेटि नहि होइत छलै। साइते-संयोग साल मे कहिओ बरखा भ' जाइ छलै। ओतुक्काा लोक भागि-भागि आन-आन राज जा हड़तोड़ मेहनत क' जीविका चलबैत छल। मुम्बाई आजुक मुम्बेई नहि। ने सिनेमा उद्‌योग छल ने कलकारखाना आ ने अखुनका जेँका कारोबार।
गंगानन्दे केँ तीस बीघा जमीन। तीनि भाईक भैयारी आ सत्तरह गोटाक आश्रम। जइ साल नीक समय होइत ओइ साल आश्रम चला, मलगुजारी दइयो क' गंगानन्द‌ केँ अन्नर उगड़ि जाइत जकरा दू-सलिया, तीनि सलिया पुरान बना खाइत। सबाइयो लगबैत। पहिल सालक रौदी गंगानन्दइ किऐक बुझताह। घर मे धान-चाउर, गाय-महीसिक लेल बड़का-बड़का दू टा नारक टाल। गंगानन्ददक मोन पहिलुके जेँका हरियर। दोसर साल भरल कोठी, ढ़क(ठेक) खलिआइल। रौद मे, जहिना गाछ सँ तोड़ल फूल मौलाई लगैत तहिना गंगानन्दीक मोन मन्हुलआई लगलनि। कुटुम्बोा-संबंधीक आवा जाही बढ़ि गेलनि। रीता गंगानन्दहक जेठ बेटी जे सासुर बसैत। चारि बेटी आ एकटा बेटा रीता केँ। जेठकी आ मझिली बेटी विआह करै जोकर भ' गेल। जहिया कहिओ कोनो काज मे रीता नैहर आबति, काजक पराते सासुर जाइ ले धूम मचावैत। कारण सासुरक सब भार रीते दुनू परानी पर। भैयारी मे जेठ रहने घर सँ बहार धरिक सब तरद्‌दूत करय पड़ैत।
रौदीक चलैत रीता धिया-पूता ल' छबो गोटे नैहर गेलि। मासो सँ उपरे भ' गेलैक मुदा सासुर जेवाक चर्चे ने करैत। बाप-माय बेटी केँ कोना मुँह फोड़ि जाइ ले कहत। भरिआयल खरचा सँ गंगानन्दे तेरे-तर कुहरैत। छाती दलकैत। साल खेपब कठिन। बरखाक कतौ पता नहि। सभ खेत परती भेल पड़ल। ने हर जोतय जोकर एकोटा आ ने पानिक कोनो दोसर उपाय। मने-मन रीता सोचए जे अगर सुमनक(जेठ बेटी) विआहक चर्चा माए करत तँ ओकरे माथ पर पटकि देव। अपना बूते तँ वियाह पार लागव कठिन अछि।
सभ दिन साझू पहर क' गंगानन्दन चूड़ाक भूजा फँकैत। बीस मनिया कोठी टा मे चाउर बचल। धान पहिनहि सठि गेल छल। धानक दुआरे चूड़ा कथीक कुटाओल जायत। पत्नीध(गंगानन्द क) पार्वती पतिक अभ्यातस बूझि चाउर भूजि छिपली मे नेने एलखिन। भूजल चाउर देखि गंगानन्दि मने-मन बुझि गेलखिन जे धान सठि गेल। पुरान चाउर रहने भूजा पथरा गेल, तेँइ सक्कनत। पहिलुक फक्काे मुँहमे लइते गंगानन्दहक दाँत सिहरि गेल। दाँत सिहरतहि गंगानन्द् लोटाक पानि मुँहमे ल' गुल-गुला केँ घोटलक। मुँहक चाउर घोटि छिपली आगू सँ घुसका देलखिन। मने-मन पार्वती अंदाजलनि जे सक्क्त दुआरे भूजा नहि खेलनि। मुदा उपाय की? गंगानन्दम केँ तामस नहि उठल। जँ घरमे धान रहैत तँ चूड़ा कुटाओल जायत। नै रहने कतए सँ आओत। जहिना लकड़ी जरि केँ राख भेला पर षक्तिघहीन भ' जायत तहिना गंगानन्दँक दषा भ' गेल। गिलासमे चाह नेने सुमन(नातिन) आइलि। दुनू परानीक नजरि सुमन पर पड़ल। चाह राखि सुमन आंगन चल गेलि। लग्गीा भरि हटि क' बैसलि पार्वतीकेँ हाथक इषारा सँ गंगानन्दु लग ऐवा ले कहलनि। पार्वती बैसले-बैसल घुसुकि क' लग आयलि। फुस-फुसा क' गंगानन्दक पत्नीबकेँ कहलखिन- ‘‘रीताक दुनू बेटी(जेठकी आ मझली), विआहए जोकर भ' गेल। जँ कहीं एहि साल एकोटा वियाह ठनलक तँ इज्जसत वाँचव मोसकिल भ' जायत। हमहू तँ नने छियैक।''
अखन धरि वार्वती अंगना सँ दलान धरि अवैत-जायत। एहि सँ अधिक ने देखैक समय भेटलनि आ ने घरक नीक अधला बुझल। नातिनक वियाह बुझि उद्‌गार सँ पार्वती कहलकनि- ‘‘यज्ञो ककरो बाकी रहैत छै। यैह तँ भगवानक लीला छन्हिक जे गरीब स' ल' क' अमीर धरि सभक काज होइते जायछै।''
चोटाइल साप जेँका गंगानन्दयक दषा। दिन ससरब कठिन। तई पर सँ पत्नीँक चढ़ल बात सुनि, केँचुआ छोड़ैत जना सापक साँस तेज भ' जाइत तहिना नमहर साँस छोड़ैत गंगानन्द, कहए लागलखिन- ‘‘ऐहन दुरकाल मे जीवि कठिन अछि तई पर वियाह सनक यज्ञ....। तहन तँ जकरा सिर पर जे काज अबैत छैक, कोनो ने कोनो तरहेँ करिते अछि। दू सालक रौदीक झमार। अखनो धरि पानिक कोनो आषा नहि, पहिले ओ पार करब अछि। वियाह तँ एक-आध साल आगूओ बढ़ाओल जा सकैत।''
ओलती लग ठाढ़ भ' रीता माय-बापक फुसुर-फुसुर सुनैत। जखन गप्प- मोड़ पर आयल कि रीता आगू बढ़ि मायक लग आबि ठाढ़ भ' गेलि। अपन बात क' छिपबैत गंगाननद कठहँसी हँसि पत्नी केँ कहए लगलनि- ‘‘रीतोक बेटी वियाह करए जोकर भेल जाइछै?''
मुँह निच्चाँ केने रीता बाजलि- ‘‘बावू, दुनू बहीन तरे-उपरे भ' गेलि अछि। मुदा घरक जे दषा अछि तहि मे अखन वियाह पार लागब कठिन अछि। जखन समय-साल सुधरतै तखन बुझल जेतै।''
मने-मन गंगाननद सोचति जे घरक भार पड़ला सँ सभ आगू-पाछू देखि किछु करैत। मूड़ी हिलबैत गंगानन्दग कहलखिन- ‘‘हँ, से तँ ठीके। अखन विवाह करबाक अनुकूल समयो ने अछि। सिर्फ हमरे टा नइ समाज मे बहुतोँ के बेटी विवाह करै जोकर छै। सभक पार तँ भगवाने लगौथिन।''
पिताक बात सुनि रीता क' मोनमे षान्तिक एलै। अपन परिवारक संबंध मे रीता पिताकेँ कहए लागलनि- ‘‘बावू घरक हालत बड़ खराव भ' गेल अछि। एक तँ दू-अढ़ाई बरखक रौदी दोसर सवांगो सभ उहिगर नहि नै क्योम कमाई-खटाई बला नहि। भरि दिन, कतौ बैसि, गप्प -षप्पर लड़वैत दिन बितवैत छथि। जेना कोनो धैन-फिकिर नहि। भैयारी मे जेठ रहने दुनू परानी काजक पाछु दिन-राति खटैत-खटैत अपस्याँ त रहैछी।''
मास पूरए(पूरै) मे दू दिन रहल। राजक सिपाही केँ पटवारी अंतिम सूचना मालगुजारीक लेल पठौलक। सिपाही आबि गंगानन्दर केँ कहलकनि- ‘‘परसू तक जँ मालगुजारी नै देवइ तँ जमीन निलाम भ' जायत। पटवारी अपन जाति-बेरादर बुझि चुपचाप पठौलनि।''
सिपाहीक समाचार सुनि गंगाननदकेँ हृदय मे ऐहन धक्का। लगल जना कोनो राजाकेँ दुष्मुन राज छीनि, भगा दैत। छाती धकधकाइत, कंठ सुखैत, गंगानन्दद सिपाहीकेँ कहलक- ‘‘अखन जे दषा अछि तइ मे मालगुजारी देव असंभव अछि। दोसर कोनो रास्तोख ने सुझैत अछि।''
गंगाननदक मजवूरी वुझति सिपाही कहलकनि- ‘‘एकटा उपाय अछि।''
‘‘की?''
‘‘पटवारी केँ वियाहै जोकर बच्चिाअया छन्हि्। अहाँ अपन बेटाकेँ बियाह क' लिअ। देबो-लेब नीक जेँका हैत। हुनके हाथक काज छन्हि जमीनक रसीद द' देताह। क्योक बुझवो ने करत काजो भ' जायत।''
बचनाक आवाज सुनि, फुलिया जाँत चलौनाई रोकि, एक हाथ सँ हथरा पकड़ने, तकलक। बचनाक मोन, जना धिया-पूताक हाथ सँ कौआ रोटी लपकि उड़ला पर होइत, तहिना सोगाइल मने बचना पत्नीह(फुलिया) केँ कहलक- ‘‘हम लक्ष्मीजपुर(फुलियाक नैहर, अपन सासुर) जाइ छी जँ कोनो गर रुपैआक लागि जायत तँ लगौने अवै छी।''
नैहरक नाम सुनि फुलियाक मनमे आनन्दोक अंकुर अंकुरित होअए लगल मुदा विपत्त्कि चादरि ओकरा झाँपि देलक। सोगाइल मने फुलिया बाजलि- ‘‘जाउ, कपार तँ फुटले अछि तइओ अपना भरि परियास करु। कपार तँ उनटवो-पुनटवो करैछै जँ नीके गड़े उनटि जाय। कनिये थमि जाउ। रोटी पका दइ छी। खा केँ जायव।''
मन्हु आइल बचना ठोर पटपटबैत बाजल- ‘‘बड़वढ़ियाँ। ताबे हमहू दौड़ले दाढ़ी बनौने अवैछी। नहाइयो लेब।''
बचना दाढ़ी कटबै ले विदा भेल। फुलिया जाँत लगक चिक्क स मुजेलामे उठौलक। चुल्हिा लग मुजेला राखि कोठी परसँ चिक्साुही सूप अनलक। गठूलासँ जारन आनि चुल्हिा पजारलक।
नौवा गाममे नहि छल। मूड़नक पता देइ ले सुखेत गेल छल। बिना दाढ़ी कटौनहि बचना घुमि आवि, नहाए लगल। फुलिया रोटी पका, भाँटा क' सन्नान बनौलक। बचना हाँहि-हाँहि खा, धोति-अंगा पहिर छाता ल' लक्ष्मीछपुर विदा भेल। वचना रास्तोन चलै आ मने-मन महावीरजी कँ सुमरैत कहलकनि- ‘‘हे महावीरजी काज भ' जायत तँ अहाँ केँ एक रुपैया क' चिन्नीव चढ़ाएव।'' महावीरजी केँ कबूला करितहि जना बचनाक मोनमे विष्वा स भ' गेल जे काज हेबे करत। लक्ष्मीहपुर पहुँचते बचना सभक मन उदास देखलक। मने-मन वचना सोचए लगल की भ' गेल जे सभक मोन खसल छै! मुह सँ फुफरी उड़ै छै। करेज पर पाथर राखि बचना सरहोजि सँ पूछलक- ‘‘किऐक सभ अनोन-बिसनोन जेँका छथि।''
नोराइल आँखिये सरहोजि उत्तर देलकनि- ‘‘पाहुन की कहब, खेतक मलगुजारी दू सालक पछुआयल छै। तई दुआरे परसू सब खेत लिलाम भ' जेतै।''
सरहोजिक कलहंत बात सुनि बचना अवाक्‌ भ' गेल। ककर दुख के हरत! पाएरो ने धोय चोट्‌टे बचना गाम घूमि गेल।
विसेसर घरक आगू मे रास्ताग पर लोक सभ ठाढ़। रौदाइल विसेसर। हर जोेति कँ अबिते छल। हाथ मे हरवाही पेना। माथ मे गमछाक मुरेठा बन्हसने। फरिक्केि सँ विसेसर सुनलक जे कचहरीक सिपाही बलजोरी बाड़ी जा कदीमा तोड़ि लेलक। मोहिनी(विसेसरक पत्नी ) कतबो मनाही केलकै सिपाही नहि मानलकै। मोहिनी आ सिपाहीक बीच रक्का -टोकी होइते छल, कदीमा सिपाहीक हाथे मे छलै। धाँय-धाँय विसेसर चारि-पाँच पेना सिपाहीके लगा, कदीमा छीन लेलक। गरिअबैत विसेसर कहलक- ‘‘बापक बाड़ी बुझि कदीमा तोड़ले। सिपाही तू मालिकक छीही की हमर?''
चारि-पाँच गोटे पकड़ि विसेसरकेँ बैसौलक। दू-दू गोटे दुनू डेन पकड़ने तइओ जोष मे बिसेसर उठि क' ठाढ़ भ' हुरुकि-हुरुकि सिपाहीके मारैक कोषिष करए। लोकक कहला सँ कनेक तामस विसेसरक कमल। गरिऔनाइ बन्नस केलक। मुदा तामसे ठोर पटपटैबिते। षान्तो भ' विसेसर बाजल- ‘‘अहाँ समाज मिलि पकड़लहुँ, मुदा पच्चीेस बेर सिपाहीकेँ कान पकड़ि उठाउ-बैसाउ। चाहे थुक फेकि चटबाउ जे फेरि ऐहन गल्तीो नै करै। ई चोर छी। लालीस क' जहल से बाहर नै हुअए देवइ। राँड़-मसोमात हमरा बुझलक।''
बिसेसर कँ मात्र दू कट्ठा घरारिये टा। सेहो बेलगान। दुइये गोटाक आश्रम। बेटा-पुतोहू भिन्नर। एकटा तेरह हाथक घर अपनो आ बेटो मिला केँ। बाकी डेढ़ कट्ठा बाड़ी बनौने। मोहिनी अपन बाड़ी मे सभ दिन राषि-राषि क' तरकारी उपजबैत। बिसेसर बोइन करए। दुनू परानीक मिलानक चर्चा गामो मे होइत अछि। दुनू गोटे अपन-अपन काज बँटने। भिनसुरका उखराहाक तीन सेर धान आ बेरका डेढ़ सेर दलिहन बोइन सभ दिन विसेसर कमाइत। दुनू साँझ भरि पेट खाय निचेन सँ रहैए। कोनो हरहर-खटखट जिनगी मे नहि। दू सेर चारि सेर घरो मे अन्नट रहैत। साठि बर्खक विसेसर जुआन जेँका तनदुरुस्त । ने एकोटा दाँत टूटल आ ने केष पाकल। जना दोसर-तेसर बोनिहार पचास वरख पुरैत-पुरैत झुन-कुट बूढ़ भ' जाइत तना विसेसर नहि। नियमित काज खायब आ सुतब विसेसरक खास गुण छलैक। तरकारीक गाछ रोपै स ल' क' पटौनी, कमौनी सभ मोहनिये करैत अछि।
मोहिनी डेढ़हो कट्ठा बाड़ी मे कोदारिक काज सँ ल' क' खुरपी हसुआँक सभ काज करैत अछि। लत्ती-फत्ती ले छोट-छोट मचानो अपने बना लैत। तरकारीक गाछ रोपब, पानि देब, कमौनी सँ ल' क' देखभाल तक करैत। अंगने जेँका चिक्कसन वाड़ियो बनौने। सभ दिन मोहिनी धान कूटए। गाछी-बिरछी से पात खछड़ि अनैत। दष हाथक एकटा लग्गीे बनौने जइ सँ गाछक सुखल ठहुरी तोड़ै। विसेसर तमाकुल खाइत मोहिनी हुक्काष पीबैत। अमलो आसान। कातिक मे सय गाछ तमाकुल बाड़ी मे मोहिनी रोपि लैत जे माघ मे जुअएला पर काटि लैत। उपरका मूड़ी, कनोजरि आ निचला पात डाँट के छाँटि पीनी कुटैत आ बीचला पात सुखा क' खेवा ले रखैत। एक्कोज पाई खरच नहि। बाध सँ मुइलहा डोका मोहिनी बीछि आनए। ओकरा डॉहि क' चून बना लिअए। एक सेर धान क' छुआ कीनि, डावा मे राखि, सालो भरि पीनी कूटए।
भोलिया विसेसरक बेटा। जाबत छोट छल मायक संग घर-आंगनाक काज करैत। गाछ पर चढ़ि सुखल जारनो तोड़ैत। जखन नमहर भेल वियाह भेले। विसेसर अपने संगे काज करै ले ल' जाय। बियाहक बाद साल भरि भोलिया बापक संग काज करैत रहल। मुदा छैाँड़ा-मारड़िक संगत मे पड़ि भोलिया भाँग पीबए लगल। बाड़ी-झाड़ी मे भाँगक गाछ। ओकर फूल झाड़ि-झाड़ि आ जट्टा वाला डाढ़ि काटि-काटि सुखा-सुखा रखैत। विसेसर केँ कोनो पता नहि। साल भरिक बाद जखन विसेसर काज करए विदा हुअए तखन भेलिया सुतले। मोहिनी(माय) उठवए जाय तँ गरजि केँ भोलिया कहैत- ‘‘मन खराव अछि, माथा दुखाइ अए।'' एक दिनक नहि भोलिया केँ आदत भ' गेलै। षुरु मे दू-चारि दिन विसेसर कहै- ‘‘छैाँड़ा, मौगियाह भ' गेल।'' कहि छोड़ि देलक। मुदा आदत देखि विसेसर भोलिया केँ कहलक- ‘‘तू बेटा छियैँ, एकर माने ई नहि जे तू मालिक भ' गेलै। दू परानी तोहूँ छेँ। दुनू गोटेक खाइ-पीवै ले कमाइये पड़तौ। भिन्नभ रह कि साझी, बिना कमेने तेँ नै हेतौ। जो आइ से फुटे भानस कर।'' भालियकेँ विसेसर भिन्नक क' देलक।
साझू पहर केँ सभ दिन विसेसर डेढ़िया पर बिछान बिछा, जावत भानस होइ, भजन-कीर्तन करैत। असकरे विसेसर खजुरी बजा भजन करैत। ने दोसर साज आ ने दोसर संगी। अपने गवैया अपने बजनिया अपने सुननिहार। पाँचे टा भजन विसेसर केँ अवैत। जे सभ दिन गावए। जखन भजन करए वइसे तखन पहिने ‘‘सत्‌ नाम, सतनाम, सँ षुरु करए। एक सुर खूब झमका केँ सतनाम गावए। चुल्हिे लग मोहिनी भानसो करए आ घुन-घुना क' संग-संग सतनामो गावए। सतनामक बाद ‘‘साँझ भयो नहि आयो मुरारी'' अह्‌लाद सँ विसेसर गावए। अड़ोस पड़ोसक सभ पाँचो भजन सीख लेने। जहाँ विसेसर षुरु करए कि सभ अपना-अपना अंगना मे घुन-घुना- घुन-घुना गावए। ‘साँझ भयो' गोलाक बाद विसेसर विनती गवैत। विनती गेवा काल ततेक तन्मघय विसेसर भ' जाइत जना भगवान हृदय मे वैसि प्रेरित करति होथि। विनती समाप्तक हाइते विसेसर खुजुरी राखि तमाकुल चुना क' खाइत। मोहिनी चुल्हिाये लग बैसल-बैसल हुक्काा भरि क' पीवैत। तमाकुल थूकड़ि पानि सँ कुड़ुर क' विसेसर कृष्णतक रुप-वर्णन(नख-सिख वर्णन) षुरु करए। रुप-वर्णनक समय विसेसर कँ बुझि पड़ै जे अन्त र्ज्ञान सँ ब्रह्‌माण्डह केँ देखि-देखि गवैत छी। गबैत-गबैत विसेसर उठि के ठाढ़ भ' खजुरियो बजवैत आ ठुमकी चालि मे झूमि-झूमि नचबो करैत। असकर रहनहुँ विसेसर केँ बुझि पड़ैत जे हजारो-लाखो लोकक बीच नाचि-गावि रहल छी। कखनो हँसैत, त' कखनो मुस्कीक दैत। कखनो नोर बहबैत त' कखनो तौनी सँ मुह झपैत विलाप करैत, कखनो हाथ सँ तीर-धनुष छोड़ैत रुप, गदा भॅजैत त' कखनो पंडित जेँका प्रवचन करैत। रुप वर्णन समाप्त होइते तौनी सँ मुँ-हाथ पोछि सोहर गवैत। सोहर गवैत-गवैत विसेसर केँ भरि दिनक ठेही उतरल वुझि पड़ैत। अंत मे समदाउन गावि समाप्तग करैत।






जिनगीक जीत
उपन्या स











जगदीश प्रसाद मंडल
बेरमा, मधुबनी, बिहार।
जिनगीक जीत ःः 1
छोट-छीन गाम कल्यागणपुर। गाम क' देखनहि बुझि पड़ैत जे आदिम युगक मनुक्ख स ल' क' आइ धरिक मनुक्खम हँसी-खुशी स रहैत अछि। मनुखे टा नहि मालो-जाल तहिना। एक फुच्ची दूधवाली गाय स ल' क' बीस लीटर दूधवाली गाय धरि। बकरीओक सैह नस्ल-। ऐहनो बकरी अछि जकरा तीनि-चारि बच्चाम भेने, एक-दू टा दूधक दुआरे मरिये जाइत। आ एहनो अछि जकरा चारि लीटर दूध होइत। गाछियो-बिरछी तहिना। एहनो गाछी अछि जहि मे एकछाहा शीशोए टा अछि त दोसर बगुरेक। आमो गाछीक वैह हाल। कोनो एकछाहा सरहीक अछि त कोनो एकछाहा कलमीक। ततबे नहि, ओहन-ओहन गाछ अखनो अछि जे दू-दू कट्ठा खेत छपने अछि त ओहनो गाछी अछि जहि मे पनरह-पनरह टा आमक गाछ एक कट्ठा मे फइल स रहि मनसम्फे फड़बो करैत अछि।
ओझुका जेँका कल्या णपुर, चालीस बर्ख पहिने नहि छल। ने एकोटा चापाकल छलै आ ने बोरिंग। जेहने हर त्रेता युग मे राजा जनक जोतने रहथि तेहने हर स अखनो कल्यााण पुरक खेत जोतल जाइत अछि। ने अखुनका जेँका उपजा-बाड़ी होइत छल आ ने बर-बीमारीक उचित उपचार। सवारीक रुप मे सभकेँ दू-दू टा पाएर वा गोट-पङरा बड़द जोतल काठक पहियाक गाड़ी। अंग्रेजी शासन मेटा गेल मुदा गमैआ जिनगी मे मिसिओ भरि सुधार नहि भेल। जहिना जाँत मे दू चक्कीन होइत- तरौटा आ उपरौटा। तरौटा कील मे गाड़ल रहैत। तहिना शरही आ देहाती जिनगीक अछि। शहरी जिनगी त आगू मुहे घुसकल मुदा देहाती जिनगी तरौटा चक्कीत जेँका ओहिना गड़ाइल रहि गेल अछि। बान्ह -सड़क, घर-दुआर सब ओहिना अछि जहिना चालीस बर्ख पहिने छल। तेँ की कल्याछणपुरक लोक अंग्रेजी शासन तोड़ै मे, भाग नहि लेलक? जरुर लेलक। दिल खोलि साहस स लेलक। सगरे गाम क' गोरा-पल्ट न आगि लगा-लगा तीनि बेरि जरौलक। कत्त्ो गोटे बन्दू कक कुन्दा। से, त कत्त्ो गोटे मोटका चमड़ाक जूत्ता स थकुचल गेलाह। जहल जाइवलाक धरोहि लागि गेल रहय। कत्त्ो गोटे डरे जे गाम छोड़ि पड़ायल ओ अखनो धरि घुरि क' नहि आबि सकल। कत्त्ो गोटेक परिवार बिलटलै, तकर कोनो ठेकान, अखनो धरि नहि अछि।
कल्याैणपुरक एक परिवार अछेलालक। अगहन पूर्णिमाक तेसर दिन, बारह बजे राति मे घूर धधका दुनू परानी अछेलाल आगि तपैत रहय। पहिलुके साँझ मे स्त्रीे मखनी केँ पेट मे दर्द उपकलै। प्रशबक अंतिम मास रहने मखनी बुझलक जे प्रशवक पीड़ा छी। अछेलालो केँ सैह बुझि पड़लै। ओसरे पर चटकुन्नी बिछा मखनी पड़ि रहलि। चटकुन्नीकक बगले पे अछेलालो बैसि गेल। दरद असान होइतहि मखनी बाजलि- ‘‘दरद असान भेल जाइ अए।''
मुह पर हाथ नेने अछेलाल मने-मन सोचैत जे असकरुआ छी कोना पलहनिक ओहिठाम जायब? कोना अगियाशी जोड़ब? जाड़क समय छियै। परसौतीक लेल जाड़ ओहने दुश्ममन होइत अछि जेहने बकरीक लेल फौती। दर्द छुटितहि मखनी फुड़-फुड़ा क' उठि भानसक जोगार मे जुटि गेलि। पानि भरैक घैल लए जखने घैलची दिशि बढ़ै लागलि कि अछेलाल(पति) बाँहि पकड़ि रोकि, कहलक- ‘‘अहाँ उपर-निच्चाम नइ करु। हम पानि भरि अनै छी। अहाँ घर से बासन-कुसन निकालू। हम ओकरो धो क' आनि देब।''
मखनी चुल्हि पजारै लागलि आ अछेलाल लुरु-खुरु करै लगल। बरतन-बासन धोय ओहो चुल्हििऐक पाछु मे बैसि, आगियो तपै आ गप्पोन-सप्प शुरु केलक। मुस्कीरदैत अछेलाल बाजल- ‘‘एहिबेर भगवान बेटा देताह।''
बेटाक नाम सुनि मखनी सुखक समुद्र मे हेलए लागलि। मने-मन सुखक अनुभव करैत विचारै लागलि जे बच्चाम केँ दूध पियाइब। तेल-उबटन सँ जाँतव। आखि मे काजर लगा किसुन भगवान बना चुम्मा‍ लेब। कोरा मे लए अनको आंगन घूमै जाएब। इस्कूिल मे नाओ लिखा पढ़बैक विचार एलै, कि जहिना गमकौआ चाउरक भात आ नेबो रस देल खेरही दालि मे सानल कौर मुह मे दइते, ओहन आँकर पड़ि जाइत जहि स जी(जीभ) कटि जाइत, तहिना भेलि। मनक सुख मनहि मे मखनी क' अटकि गेलि। पत्नीदक मलिन होइत मुह देखि पति बाजल- ‘‘गरीबक मनोरथर आ बरखाक बुलबुला एक्केप रंग होइ छै। जहिना पाइनिक बुलबुला सुन्दनर आकार आ रंग ल' बढ़ैत अछि कि फुॅटिये जाइत, तहिना।''

मखनीक मन मे दोसर विचार उठलै जे धन त बहुत रंगक होइ छै- खेत-पथार, गाय-महीसि, रुपैआ-पैसा मुदा एहि सब धन स पैघ बेटा धन होइत छैक। जे बूढ़ मे माय-बापक सवारी बनि सेवा करैत अछि। ततबे नहि, परिवारो खनदानो क' आगू बढ़बैत अछि। तोहूँ मे जँ कमासुत बेटा होइत त जीवितहि माय-बाप केँ स्व र्गक सुख दैत अछि ।
भानस भेलै। दुनू परानी खेलक। मोटगर पुआर पर चटकुन्नीव विछाओल, तहि पर जा मखनी सुति रहलीह। थारी-लोटा अखारि, चुल्हि -चिनमारक सभ सम्हापरि अछेलाल चुल्हिीये लग बैसि आगि तपै लगल। तमाकुल चूना मुह मे लेलक। चुल्हिचये लग बैसल-बैसल अछेलाल ओंघाइयो लगल। ओंघी तोड़ै ले उठि क' अंगना मे टहलै लगल। भक्क टुटिते फेर चुल्हिज लग आबि अछेलाल आगि तपै लागल। मखनी निन्नह पड़ि गेलि। मखनीक नाकक आबाज सुनि अछेलाल सोचै लगल जे जँ राति-बिराति दर्द उपकतै त महा-मोसकिल मे पड़ि जायब। अपने त किछु बुझैत नहि छी। दशमीक डगरक सिदहा द' नहि सकलिऐक तेँ पलहनियो आओत की नहि? चुल्हि क आगि मिझाइत देखि अछेलाल जारन आनै डेढ़िया पर गेल। ओस स जारनो सिमसल। लतामक गाछ पर स टप-टप ओसक बुन्नअ खसैत। अन्हाढरक तृतीया रहने, चान त भरि राति उगल रहत, मन मे अबितहि अछेलाल मेघ दिशि तकलक। चान त उगल देखैत मुदा ओसक दुआरे जमीन पर इजोत अबितहि नहि। पाँज मे जारन नेने अंगना आयल। ओसार पर चुल्हिे रहने सोचलक जे घरे मे घूर लगौनाइ बढ़ियाँ हैत किऐक त घरो गरमाइल रहत। अछेलालक पाएरक दमसि स मखनीक निन्न टुटि गेलै। धधकैत घूर देखि मखनियो केँ आगि तपैक मन भेलै। ओछाइन पर स उठि ओ घूर लग आबि बैसलि। बीच मे घूर धधकैत आ दुनू भाग दुनू परानी बैसल। जहिना देहक दुख स मखनी तहिना मोनक दुख स अछेलाल। बेबसीक स्व र मे अछेलाल बाजल- ‘‘अदहा राति त बीतिए गेल, अदहे बाकी अछि। जहिना अदहा बीतल तहिना बाँकियो बीतबे करत।''
अछेलालक बात सुनि मखनी पूछलक- ‘‘अखन धरि अहाँ जगले छी?''
‘हँ, की करब। जँ सुति रहितौ आ तइ बीच मे अहाँ केँ दरद उठैत त फटोफन मे पड़ि जइतहुँ। सैाँसे गामक लोक सुतल अछि। ककरा सोरो पारवैक। एक्केँ रातिक त बात अछि। कहुना-कहुना क' काटिये लेब। मन मे होइत छल जे बहिन केँ बिदागरी करा केँ ल' अनितहुँ मुदा ओहो त पेटबोनिये अछि। तहू मे चारि-पाँच टा लिधुरिया बच्चोक छै। जँ विदागरी करा क' आनव त पाँच गोटेक खरचो बढ़ि जाइत। घर मे त किछु अछि नहि। कमाई छी खाई छी।''
‘‘कहलिएै त ठीके। अपना घर मे लोक भुखलो-दुखलो रहि जाइत अछि। मुदा जकरा माथ चढ़ा क' अनितियै ओकरा कोना भूखल रखितियै?'' दिन-राति चिन्तार पैसल रहै अए जे पार-घाट कोना लागत। भगवानो सबटा दुख हमरे दुनू परानी केँ देने छथि। एक पसेरी चाउर घैल मे रखने छी कहुना-कहुना पान-सात दिन चलबे करत। तकर बाद बुझल जेतैक।''
पसेरी भरि चाउर सुनि अछेलालक मोन मे आशा जगल। मुह स हँसी निकलल। हँसैत बाजल- ‘‘जँ हमर बनि बच्चास जनम लेत त कतबो दुख हेतइ तइओ जीवे करत। नहि जँ कोनो जनमक करजा खेने हेबै त असुल क' चलि जायत।''
पतिक बात सुनितहि मखनी केँ पहिलुका दुनू बच्चा' मन पड़ल। मने-मन सोचै लागलि जे ओहो बच्चाख नहि मरिते। जँ नीक-नहाँति सेवा होइतइ ते। मुदा मनुखे की करत? जकरा भगवाने बेपाट भ' गेल छथिन। पैछला बात मन स हटबैत मखनी बाजलि- ‘‘समाज मे ओहनो बहुत लोक होइत जे बेर-बेगरता मे भगवान बनि ठाढ़ होइत।''
‘‘समाज दू रंगक होइछै। एकटा समाज ओहन होइ छैक जइ मे दोसराक मदति केँ धरम बुझल जाइ छै आ दोसर ओहन होइ छैक जहि मे सब सभक अधले करैत अछि। अपने गाम मे देखै छियै। अपन टोल तीस-पेंइतीस घरक अछि। चारि-पाँच रंगक जातियो अछि। एक जातिकेँ दोसर स' भैंसा भैंसीक कनारि अछि। अपन तीनि घरक दियादी अछि। तीनू घर मे सुकनाकेँ दु सेर दू टाका छैक। ओकरा देखै छियै। सदिखन झगड़े-झंझटक पाछू रहैअए। टोल मे सबसे बाड़ल अछि। ओकरा चलैत हमरो से सब मुह फुलौने रहै अए। ने ककरो से टोका-चाली अछि आ ने खेनाई-पीनाई, आ ने लेन-देन। भगवान रच्छर रखने छथि जे सब दिन बोइन करै छी मौज स खाई छी नइ त एक्कोे दिन अइ गाम मे बास होइत।''
अछेलालक बात सुनि मूड़ि डोलबैत मखनी बाजलि- ‘‘कहलौ त ठीके, मुदा जे भगवान दुख दइ छथिन ओइह ने पारो-घाट लगबै छथिन।''
मखनीक बात सुनि अछेलाल बाजल- ‘‘सगरे गाम मे नजरि उठा क' देखै छी त खाली बचेलालेक परिवार स थोड़-बहुत, मिलान अछि। साल मे दश-बीस दिन खेतिओ सम्हा रि दइ छियै आ घरो-घरहट। पेंइच-उधार त नहिये करै छी। हमर ब्रह्‌म कहै अए जे अगर बचेलालक माएकेँ कहबनि त ओ बेचारी जरुर सम्हाारि देती। कहुना राति बीतै भोर होय, तखन ने कहबनि। दुखक रातियो नमहर भ जाइ छै। एक्के निन्न। मे भेर भ जाइ छले, से बितबे ने करै अए।''
हाफी करैत मखनी बाजलि- ‘‘देहो गरमा गेलि आ डॉड़ो दुखा गेल। ओछाइने पर जाइ छी।''
मखनीक बात सुनि अछेलाल ठाढ़ भ' मखनीक बाँहि पकड़ि ओछाइन पर ल' गेल। मखनी पइर रहलि। पड़ले-पड़ल बाजलि- ‘‘मन हल्लुुक लगै अए। अहूँ सुति रहू।''
अछेलालक मन मे चैन आयल। मुदा तइयो सोचैत जे एहि देह आ समयक कोन ठेकान। कखन की भ' जयतैक। गुनधुन करैत बाहर निकलि चारु भर तकलक। झल-अन्हा।रक दुआरे साफ-साफ किछु देखवे ने करैत। मूड़ी उठा मेघ दिशि तकलक। मेघो मे छोटका तरेगण बुझिये ने पड़ै। गोटे-गोटे बड़का देखि पड़ै। अयना जेँका चानो बुझि पड़ै। डंडी-तराजू केँ ठेकना ताकै लगल। तकैत-तकैत पछबारि भाग मन्हु आइल देखलक। डंडी-तराजू देखि अछेलाल क' संतोष भेलै जे राति लगिचा गेल अछि। फेर घुमि क' आबि घूर लग बैसल। आलस अबै लगलै। तमाकुल चुना मुह मे लेलक। बाहर निकलि तमाकुल थूकड़ि क' फेकि पुनः घुरे लग आबि बोरा पसारि घोंकड़ी लगा, बाँहिएक सिरमा बना सुति रहल। निन्नड पड़ि गेल। निन्नल पड़ितहि सपनाइ लगल। सपना मे देखै लगल जे घरवाली दरद स कुहरैत अछि। चहा क' उठि पत्‍नीकेँ पूछलक- ‘‘बेसी दर्द होइ अए?''
मखनी निन्नन छलि। किछु नहि उत्तर नहि देलि। घूर क' फूँकि अछेलाल धधड़ाक इजोत मे मखनी लग जा निङहारि क' देखै लगल। मन मे भेलै जे कहीं बेहोश त ने भ' गेलि अछि, मुदा नाकक साँस असथिर रहै।
कौआ क' डकितहि अछेलाल उठि क' बचेलाल ऐठाम विदा भेल। दुनू गोटेक घर थोड़बे हटल, मुदा बीच मे डबरा रहने घुमाओन रास्ताल। बचेलालक माए क' अछेलाल भौजी कहैत। दियादी संबंध त दुनू परिवार मे नहि मुदा सामाजिक संबंधे भैयारी। बचेलालक पिता रघुनन्दसन छोटे गिरहस्तह, मुदा सामाजिक हृदय रहने सभ सँ समाज मे मिलल-जुलल रहैत। बचेलाल ऐठाम पहुँचते अछेलाल डेढ़िया पर ठाढ़ भ' बचेलालक माय सुमित्राकेँ सोर पाड़लक। आंगन बहारैत सुमित्रा बाढ़नि हाथ मे नेनहि घरक कोनचर लग स देखि, मुस्कुँराइत बाजलि- ‘‘अनठिया जेँका दुआर पर किऐक छी? आउ-आउ, अंगने आउ।''
अछेलालक मन्हुाआयल मुह देखि सुमित्रा पूछलक-‘‘राति मे किछु भेलि की? मन बड़ खसल देखै छी।''
कपैत हृदय स अछेलाल उत्तर देलकनि- ‘‘नइ राति मे त किछु ने भेल मुदा भारी विपत्ति मे पड़ल छी। तेँ एलौ।''
‘‘केहन विपत्ति मे पड़ल छी?''
‘‘भनसियाकेँ संतान होनिहार अछि। पूर मास छियै। घर मे त दोसर-तेसर अछि नहि। जनिजातिक नीक-अधला ते अपने बुझै नइ छी। तेँ अहाँ क' कहै ले एलौ जे चलि क सम्हाछरि दिओ।''
कनेकाल गुम्मह भ' सुमित्रा बजलीह- ‘‘अखन त दरद नहि ने उपकलै हेन?''
‘‘नै, अखन चैन अछि। साझू पहर दरद उपकल छलै मुदा कनिये कालक बाद असान भ' गेलै।''
‘लोकेक काज लोक क' होइ छै। समाज मे सभक काज सभकेँ होइ छै। अगर हमरा गेला स अहाँक नीक हैत त किअए ने जायब।' कहि सुमित्रा फुसफुसा क पूछल- ‘‘परसौती खाइले चाउर अछि, की ने?''
अछेलालक मोन मे एलै जे झूठ नहि कहबनि। कने गुम्मम भ बाजल- ‘‘एक पसेरी चाउर घर मे अछि, भौजी।''
एक पसेरी चाउर सुनितहि सुमित्राकेँ हँसी लगलनि। मुदा हँसी क' दाबि, सोचलनि जे कम स कम एक मासक बुतात चाही। मास दिन सँ पहिने परसौतिक देह मे कोनो लज्ज-ति थोड़े रहै छै। तेँ एक मासक बुतातक जोगार सेहो क देबै। बेर पड़ला पर गरीब लोकक मन बौआ जाइ छै तेँ अछेलाल ऐना कहलक। पुरुख जाति थोड़े परसौतीक हाल बुझैत अछि। जखन हमरा बजबै ले आइल तखन बच्चाक क' एहि धरती पर ठाढ़ करब हमर धर्म भ जाइत अछि। सिर्फ बच्चाल जनमि गेला से त नहि होइत। दुनू गोटे गप-सप करिते छल कि बचेलाल सुति क उठल। केबाड़ बन्नेम छल कि दुनू गोटेक गप-सपक आवाज सुनलक। खिड़कीक एकटा पट्टा खोलि हुलकी देलक कि दुनू गोटे केँ गप-सप करैत देखलक। केबाड़ खोलि बचेलाल दुनू गोटे लग आबि चुपचाप ठाढ़ भ गेल। पुतोहूक दुआरे सुमित्राा बाजलि- ‘‘दरबज्जेा पर चलू।''
तीनू गोटे दरवज्जा़ पर आबि गप-सप करै लगल। अपन भार हटबैत सुमित्राा बचेलाल केँ कहलक- ‘‘बच्चाु! अछेलालक कनिञाँ क' सन्ताेन होनिहारि छै। बेचारा, जेहने सवांगक पातर अछि तेहने चीजोक गरीब। आशा लगाा क अपना ऐठाम आयल। गाम मे त बहुतो लोक अछि मुदा अनका ऐठाम किऐक ने गेल। जेँ हमरा पर बिसवास भेलै तेँ ने आयल।''
मूड़ी निच्चाि केने बचेलाल चुपचाप सुनैत। माएक बात सुनि कहलक- ‘‘जखन तोरा बजबै ले एलखुन ते हम मनाही करबौ।''
‘‘सोझे गेला से त नइ हेतै। कम स कम एक मासक बुतातो चाही की ने?''
‘‘जखन तूँ घरक गारजने छेँ तखन हमरा से पूछैक कोन जरुरी? जे जरुरी बुझै छीही, से कर।''
अछेलालक हृदय मे आशा जगै लगल। मने-मन सोचै लगल जे अखन धरि बुझै छलौ जे गाम मे क्योे मदतिगार नहि अछि मुदा से नहि। भगवान केहेन मन बना देलनि जे ऐठाम एलौ। कुस्कु‍राइत अछेलाल सुमित्रा केँ कहलक- ‘‘बड़ी काल भ गेल भैजी, अंगना मे की भेल हेतै, सेहो देखैक अछि तेँ आव नइ अँटकब। चलू, अहूँ चलू।''
सुमित्राा- ‘‘बौआ! अहाँ आगू बढ़ू, हम पीठे पर अबै छी।''
अछेलाल आंगन बिदा भेल। सुमित्राा बचेलाल केँ कहै लागलि- ‘‘बच्चार! मनुखेक काज मनुख क' होइ छै। आइ जे सेवा करब ओ भगवानक घर मे जमा रहत। महीना दिन हम ओकर ताको-हेर करबै आ खरचो देबै। भगवान हमरा बहुत देने छथि। कोन चीजक कमी अछि।''
बचेलाल- ‘‘माए! तोरा जे नीक सोहाओ, से कर। जा क' देखही।''
दरबज्जात स उठि सुमित्रा अंगनाक काज सम्हाररै लागलि। सब काज सम्हाररि सुमित्रा अछेलाल ऐठाम विदा भेलि। मखनी ओसार पर, विछान बिछा, पड़लि। पहुँचते सुमित्रा मखनी केँ पूछलि- ‘‘कनिञाँ, दरदो होइ अए?''
कर घूमि मखनी बाजलि- ‘‘दीदी, अखन त दरद नइ उपकल हेन, मुदा आगम बुझि पडै़ अए।''
मखनी क' दू टा संतान भ चुकल छल तेँ आगम बुझैत। सुमित्रा अछेलाल केँ कहलक- ‘‘ऐठाम हम छी हे। अहाँ पलहनिक ऐठाम जा बजौने आउ?''
अछेलाल पलहनिक ऐठाम विदा भेल। मुदा पलहनि ऐठाम जेबा ले डेगे ने उठैत। मन मे होइ जे दशमी डगरक सिदहा नै द' सकलिऐक, तेँ ओ आओत की नहि? मुदा तइयो जी-जाँति क' विदा भेल। भरि रास्ताऐ विचित्र मे अछेलाल। एक दिशि सोचैत जे जँ पलहनि नहि आओत त बेकार गेनाइ हैत। दोसर दिशि होय जे जाबे हम इमहर एलौ ताबे घर पर की हैत की नहि। पलहनिक ऐठाम पहुँचते अछेेलाल देखलक जे पलहनि मालक थैरिक गोबर उठा, पथिया मे ल खेत विदा भेलि अछि। जहिना न्याकयालय मे अपराधी केँ होइत तहिना अछेलालो केँ बुझि पड़ैत। मुदा तइयो साहस क' पलहनि सँ कहलक- ‘‘कने हमरा ऐठाम चलू। भनसिया क' दरद होइ छै।''
‘‘माथ पर गोबरक छिट्टा नेने पलहनि उत्तर देलक- ‘‘हम नइ जेबनि। डगरक सिदहा हमर बाँकिये अछि। पेट-बान्हिा कतेक दिन काज करबनि।''
पलहनिक बात सुनि अछेलाल अपन भाग्यत क' कोसैत। भगवान केहेन बनौने छथि जे जकरा-तकरा स दू टा बात सुनै छी। मुह सिकुड़िअबति अछेलाल पुनः कहलक- ‘‘कनिञाँ, अइ साल सिदहा नइ द सकलिएनि, तेँ कि नहि देबनि। समय-साल नीक हैत त अगिला साल दोबर देबनि। समाज मे सभक उपकार सभकेँ होइत छैक। चलू, चलू....।
खिसिया क पलहनि डेग बढ़बति बाजलि- ‘‘किन्न हु नहि जेवनि।''
एक टक स अछेलाल पलहनि क' देखैत रहल। देह मे जना एको मिसिया तागते ने बुझि पड़ै। हताश भ, दुनू हाथ माथ पर ल अछेलाल बैसि सोचै लगल जे आब की करब? आशा तोड़ि घर दिशि विदा भेल। आगू मुहे डेगे ने उठै, पाएर पताइत। जना बुझि पड़ै जे आखि स लुत्ती उड़ै अए। कहुना-कहुना क' अछेलाल घर पर आयल।
तेसर सन्ताैन भेने मखनी क' दरदो कम भेलै आ असानी स बच्चाबक जन्म भेलै। अपना जनैत सुमित्रा सेवो मे कोनो कसरि बाकी नहि रखलखिन। डेढ़िया पर अबितहि अछेलाल केँ बुकौर लगि गेलै। दुनू आँखि स दहो-बहो नोर खसै लगल। अंगना आवि मुस्कु राइत सुमित्रा बाजलि- ‘‘बौआ, ककरो अहाँ अधला केने छी जे अधला हैत। भगवान बेटा देलनि। गोल-मोल मुह, मोटगर-मोटगर दुनू हाथ-पाएर छैक।''
आशा-निराशाक बीच अछेलालक मन उगै-डूबै लगल। हँसी होइत सुख निकलै चाहैत जबकि आखिक नोर होइत
दुख। बेटा जनमितहि सुमित्राक अंगनाक टाट पर बैसल कौवा दू बेरि मधुर स्वसर मे बाजल कौवाक बोली सुनि बचेलालक मुह स अनायास निकलल- ‘‘अछेलाल काका क' बेटा भेल।''
मुह स निकलितहि बचेलारल आखि उठा-उठा चारु कात देखै लगल जे क्योल कहलक नहिये तखन मुह स किऐक निकलल? आंगन स निकलि बचेलाल टहलैत डबराक कोन लग आयल। कोन पर ठाढ़ भ' हियासै लगल जे बच्चा क जन्मक भेलि आ कि दरदे होइत छै। सुमित्रा ओछाइन साफ करैत। अगियासी जोड़ै ले अछेलाल डेढ़िया पर जारन आनै गेल कि बचेलाल पर नजरि पड़ल। नजरि पड़ितहि अछेलाल, थोडे़ आगू बढ़ि, बचेलाल केँ कहलक- ‘‘बौआ, छैाँड़ा जनमल।''
लड़काक नाम सुनितहि बचेलालक मोन मे आयल जे जा क' देखिऐेक। मुदा सोचलक जे अखन जा क' देखब उचित नहि। चोट्टे घुमि आंगन आवि पत्नीे क' कहलक- ‘‘अछेलाल काका क' बेटा भेल।''
बेटाक नाम सुनितहि मने-मन असिरवाद दैत रुमा बाजलि- ‘‘भगवान जिनगी देथुन।''
बच्चाकक छठियार भ' गेल। सुमित्रा अपन अंगनाक काज सम्हा रि अछेलालक आंगन पहुँचली। गोसाई लुक-झुक करैत। पतिआनी लगा बगुला पछिम स पूब मुहे उड़ैत अपना मे हँसी मजाक करैत जाइत। कौआ सब धिया-पूता हाथक रोटी छीनै ले पछुअबैत। जेरक-जेर टिकुली गोलिया-गोलिया उपर मे नचैत। सुरुज अराम करैक ओरिआन मे लगल। अछेेलालक बीच आंगन मे बोरा बिछा सुमित्रा बच्चा क' दुनू जाँघ पर सुता जतबो करति आ घुनघुना क गेबो करथि-
गरजह हे मेघ गरजि सुनाबह रे
ऊसर खेत पटाबह, सारि उपजावह रे
जनमह आरे बाबू जनमह, जनमि जुड़ाबह रे
बाबा सिर छत्र धराबह शत्रु देह आँकुश रे
हम नहि जनमब ओहि कोखि अबला कोखि रे
मैलहि बसन सुतायत, छैाँड़ा कहि बजायत रे
जनमह आरे बाबू जनमह जनमि जुड़ाबह रे
पीयर बसन सुताबह बाबू कहि बजावह रे
झुमि-झमि सुमित्रा गबितो आ बच्चाि क' जँतबो करति। आखि स आखि मिला स्नेकहक बरखा बरिसबैत। बच्चाि क' कोनो तरहक तकलीफ नहि होइ तेइ ले मुह दिशि देखैत। टाटक अढ़ मे बैसि अछेलाल सुमित्रा क' स्ने ह देखि, दुनिया क' बिसरि आनन्द् लोक मे बिचरैत। घ्‍
जिनगीक जीत ःः 2
रवि दिन रहने बचेलाल अबेर क' उठल। मन मे यैह सोचि विछान पर पड़ल, जे आइ स्कूील नहिये जाएब। घर पर कोनो अधिक काजो नहिये अछि। मात्र एक जोड़ धोती, एक जोड़ कुरता आ एक जोड़ गंजिये टा खिंचैक अछि। दुपहर तक त काजो एतवे अछि। बेरु पहर हाट जा घरक झूठ-फूस समान कीनि आनब। हाटो दूर नहि, गामक सटले अछि। सुति उठि बचेलाल नित्यू-कर्म स निवृत भ' दलानक चौकी पर आबि बैसल। रुमा चाह द' गेलनि। दू घोंट चाह पीबितहि बचेलाल केँ पिता मन पड़ि गेलखिन। पिता मन पड़ितहि बचेलाल अपन तुलना हुनका(पिता) स करै लगला। मने-मने सोेचै लगल जे पिता साधारण किसान छलाह। पढ़ल-लिखल ओतबे जे नाम-गाम टो-टा क' लिखि लथि। काजो ओतबे रहनि जे कहियो-काल रजिष्ट्री अॉफिस जा सनाक बनथि। भरि दिन खेती स ल क' माल-जालक सेबा मे व्यपस्त‍ रहैत छलाह। मुदा एत्त्ो गुण अवश्यस छलनि जे गाम मे कतौ पनचैती होइत वा कतौ भोज-भात होइत वा समाजिक कोनो(दशनामा) काज होइत त हुनका जरुर बजौल जाइन। ततबे नहि, बूढ़-पुरान छोड़ि केयो नाम ल क' सोरो नहि पाड़ैत छलनि। अपन संगतुरिया भाय कहनि आ धिया-पूता स चेतन धरि गिरहत बाबा, गिरहत काका कहनि। परिवारे जेँका समाजो क' बुझैत छलथिन। मुदा हम शिक्षक छी। अपन काजक प्रति इमानदार छी। बिना छुट्टिये एक्को दिन ने स्कूकल मे अनुपस्थिइति होइ छी आ ने एको क्षण बिलम्बर स पहुँचै छी। जते काल स्कूलल मे रहै छी, बच्चाु सभकेँ पढ़विते छी। जना आन-आन स्कू्ल मे देखै छी जे शिक्षक सभ कखनो अबै छथि, कखनो जाइ छथि आ स्कूसलो मे ताशो भँजैत छथि। ओना हमहू ककरो उपकार त नहिये करै छी किऐक त दरमाहा ल काज करैत छी। आन शिझकक अपेक्षा इमानदारी स जीवितहुँ अपना पैघ कमी बुझि पड़ैत अछि। ओ कमी अछि समाज मे रहि समाज स कात रहब। स्कू लक समय छोड़ि दिन-राति त गामे मे रहै छी मुदा ने क्यो टोक-चाल करै अए आ ने क्यो़ दरवज्जात पर अबै अए। मन मे सदिखन रहे अए जे कमाई छी त दू-चारि गोटे केँ चाह-पान खुआबी-पीआबी। मुदा क्योर कनडेरियो आखिये नहि तकैत अछि। हमहू त ककरो ऐठाम नहिये जाइ छी। चेतन सभक कहब छनि जे दुआर-दरबज्जाूक इज्ज त छी चारिगोटेकेँ बैसब। मुदा से कहाँ होइ अए। गाम त शहर-बजार नइ छी जे एक्‍के मकान मे रहितहुँ, आन-आन क्षेत्रक रहने, लोक आन-आन भाषा बजैत, आन-आन चलि-ढ़ालि मे अपन जिनगी वितवैत, ककरो क्यो सुख-दुख मे संग नहि होइत! मुदा समाज त से नहि छी? बाप-दादाक बनाओल छी। एक ठाम सइयो-हजारो बर्ख स मिलि-जुलि क' रहैत अयलाह। रंग-विरंगक जातियो प्रेम स रहैत अछि। सभ सभकेँ सुख-दुख मे संग रहैत अछि। बच्चातक जन्म स ल क' मरण धरि संग पूरैत। ऐहन समाज मे, हमर दशा ऐहन किऐक अछि? जहिना पोखरिक पानिक हिलकोर मे खढ़-पात दहाइत-भसिआइत किनछरि लगि जाइत तहिना त हमरो भ' गेल अछि। की पाइनिऐक हिलकोर जेँका समाजो मे होइत छैक? जँ पाइनियेक हिलकोर जेँका होइत छैक त हम ओहि हिलकोर क' बुझैत किऐक ने छी? हमहू त पढ़ल-लिखल छी।
जत्त्ो समाजक संबंध मे बचेलाल सोचैत तत्त्ो मन मलिन होइत जाइत। मुदा बुझि नहि पबैत। अधा चाह पीलाक बाद जे गिलास मे रहल ओ सरा क' पानि भ' गेल। ने चाहक सुधि आ ने अपन सुधि, बचेलाल क'। जना बुझि पड़ैत जे हम ओहन बन मे बौआ गेलहुँ जत्त' एक्कोअ टा रस्ते ने देखैत छी। गंभीर भ' बचेलाल बड़बड़ेबो करैत आ अपने-आपमे गप्पोा करैत।
आंगन स सुमित्रा आबि बचेलाल केँ देखि पूछलखिन- ‘‘बच्चाल, कथीक सोग मे पड़ल छह? किछु भेलह हेन की?''
बचेलालक मुह सँ निकलल- ‘‘नहि माए! भेल त किछु नहि। मुदा गामक किछु बात मोन मे घुरिआइत अछि। जकर जबाब बुझिते ने छी।''
तारतम्य करैत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘गाम मे त बहुत लोक रहैत अछि मुदा सभ थोड़े गामक सब बात बुझैै छै। गाम मे तीनि तरहक रास्ताह छैक। पहिल ओ जहि स समाज चलैत अछि। दोसर स परिवार चलैत आ तेसर स मनुक्ख‍ चलैत अछि। मनुक्खम अपन चलि परिवारक चालि मे मिला क' चलैत अछि। तहिना परिवार समाजक चालि स मिला क' चलैत अछि तेँ, तीनूक अलग-अलग चालि रहनहुँ ऐहन घुलल-मिलल अछि जे सभकेँ बुझवो मे नहि अबैत।'
मुह वाबि बचेलाल माएक बात सुनि, कहलकनि- ‘‘माए, तोरो बात हम नीक-नहाँति नहि बुझि सकलहुँ। मन मे यैह होइ अए जे किछु बुझिते ने छी। अन्हाुर मे जना लोक किछु ने देखैत, तहिना भ रहल अछि।'
मूड़ी डोलबैत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘अपने घर मे देखहक- दू टा बच्चात अछि, ओकर त कोनो मोजरे नहि। तीनि गोटे चेतन छी। तोँ भरि दिन इस्कूेलेक चिन्ताद मे रहै छह। भोरे सुति उठि क' नओ बजे तक, अपन सब क्रिया-कर्म स निचेन भ खा के इस्कू ल जाइ छह। चारि बजे छुट्टी होइ छह। डेढ़ कोस पाएरे अबैत-अबैत साँझ पड़ि जाइ छह। घर पर अबैत-अबैत थाकियो जाइत हेबह। पर-पखाना स अबैत-अबैत दोसर साँझ भ' जाइ छह। दरबज्जा पर बैसि, कोनो दिन ‘रमायण' त कोनो दिन ‘महाभारत' पढै़ छह। भानस होइ छै खा क सुतै छह। फेरि दोसर दिन ओहिना करै छह। एहिना दिन बीतैत जाइत छह। दिने स मास आ मासे स साल बनैत छैक। कोल्हु क बड़द जेँका घर स इस्कूदल आ इस्कूसल स घर अबै-जाइत जिनगी बीति जेतह। मुदा जिनगी त से नहि थिक? जिनगी त ओ थिक- जना बसन्तढ ऋृतु अबिते गाछ-विरीछ नव कलश ल बढै़त अछि, तहिना। मनुक्खोतक गति अछि। जिनगीक गतिये मनुक्ख- केँ ब्रह्‌माण्ड क गति से मिला क' ल चलैत। अज्ञानक चलैत मनुक्खअ, एहि गति क' नहि बुझि, छुटि जाइत अछि। छुटैक कारण होइत व्यथक्ति गत, परिवारिक आ सामाजिक जिनगी। जे सदिखन आगूक गतिक पाछु महे धकेलति अछि। जहि स मनुख समयक संग नहि चलि पबैत। मुदा तइ स की? बाधा कतबो पैघ किऐक ने हुअए मुदा मनुखो केँ साहस कम नहि करक चाही। सदिखन सब अंग क' चौकन्नान क चलला से सब बाधा टपि सकैत अछि। पुतोहूए जनि केँ देखुन। भरि दिन भनसा आ धिये-पूतेक आय-पाय मे लगल रहैत छथुन। हमरो जे शक लगै अए से करिते छी। घर त कहुना चलिये जाइ छह। मुदा परिवार त समाजक एक अंग छी। परिवारेक समूह ने समाज छी। तेँ समाजक संग चलैक लेल परिवार क' समाजक रास्तास धड़ै पड़त। से नहि भ' रहल छह। जना देखैत छहक जे रेलगाड़ी मे ढेरो पहिया आ कोठरी होइ छै। जे आगू-पाछू जोड़ल रहै छै। मुदा चलै काल सब संगे चलै छै। तहिना मनुक्खोो छै।''
सुमित्राक बात सुनि बचेलाल जिज्ञासा स पूछल- ‘‘अपन परिवारक की गति अछि?''
मुस्कुरराइत सुमित्रा कहै लागलि- ‘‘अपन परिवार ठमकल अछि। ओना बुझि पड़ैत हेतह जे आगू मुहे जा रहल छी, मुदा नहि। तोरा बुझि पड़ैत हेतह जे शिझक छी, नीक नोकरी करै छी। नीक दरमहो पबै छी। हँ, ई बात जरुर अछि। मुदा अपनो सोचहक जे जखन हम पढ़ल छी, बुद्धियार छी। तखन हमरा बुद्धिक काज कैक गोटे क' होइ छै। जे क्यो नहिये पढ़ल अछि ओहो त अपन काज, अपन परिवार चलबिते अछि। कने नीक कि कने अधला सब त जीवे करैत अछि। आइ तोरा नोकरी भ गेलह, तेँ ने, जँ नोकरी नइ होइतह तखन त तोहू वहिना जीवितह जहिना बिन पढ़ल-लिखल जीवैत अछि। एहिना पुतोहू जनि केँ देखुन, जना घर स कोनो मतलबे नहि अछि। हमरो बिआह-दुरागमन भेल छल। हमहूँ कनियाँ छलौ मुदा आइ जे घर मे देखै छिअह तना त नहि छल। जखन हम नैहर स ऐठाम एलहुँ तखन भरल-पूरल घर छल। सासु-ससुर जीविते रहथि। जखन चारि दिनक बाद चुल्हिर छूलौ, तहिया स सासु कहियो चुल्हिछ दिशि नहि तकलनि। ने कोठी से चाउर निकालि क' देथि आ ने किछु कहथि। जेहने परिवार नैहरक छल तेहने एतुक्कोे छल। जे सब काज नैहर मे करै छलौ सैह सब काज अहूठाम छल। अपन घर बुझि एकटा अन्नु आ कि कोनो वस्तुक दुइर नहि हुअए दैत छलिऐक। अखन देखै छिअह जे पाँचे गोटेक परिवार रहनहु सभ सब स सटल नहि, हटल चलि रहलह हेन। सटि क' चलैक अर्थ होइत सभ सब काज मे जुटल रही। इ त नहि कि क्यो काजक पाछू तबाह छी आ क्योक बैसले छी। परिवारक सभकेँ अपन सीमा बुझ चलक चाही, से नहि छह। हम खेलहुँ कि नहि, तोँ खेलह कि नहि। भनसिया लेल धन्य सन। की खायव, कोन वस्तु। शरीरक लेल हितकर हैत कोन अहितकर, से सब बुझैक कोनो मतलवे नहि। जे खाई मे चसगर लागत, भले ही ओ अहितकरेे किऐक ने हुअए, वैह खायब। जहि स घर मे बीमारी लधले रहै छह। जहिना सुरुजक किरिण मे देखै छहक जे अनेको दिशा मे चलैत तहिना परिवारोक काज सब दिशा क' जोड़ैत अछि, से नहि भ' रहल छह।''
बिचहि मे बचेलाल माएकेँ पूछलक- ‘‘माए! नीक-नाहाँति तोहर बात नइ बुझि रहलौ हेन?''
बचेलालक बात क' तारतम्यक करैत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘बच्चाह, देखहक जहिना गाम मे किछु परिवार आगू मुहे ससरि रहल अछि त किछु परिवार पाछू मुहे। किछु परिवार ठमकल अछि। जहि स गाम आगूू मुहे नहि बढ़ि रहल अछि। तहिना परिवारो मे होइत। परिवारो मे किछु गोटे आगू बढ़ैक चेष्टाह करैत त किछु(आलस अज्ञान आदि क चलैत) पाछू मुहे ससरैत। किछु गोटे अदहा-छिदहा मे रहैत। तेँ परिवार केँ जहि गति मे चलक चाही, से नहि भ' रहल अछि। ततवे नहि इ रोग मनुक्ख क भीतरो मे अछि। किछु लोक अपनाकेँ समय स जोड़ि क' चलै चाहैत त किछु समयक गति नहि बुझि, पाछूऐ मुहे चलैत। इ बात जाबे नीक जेँका नहि बुझबहक ताबे ने मन मे चैन हेतह आ ने आगू मुहे परिवार बढ़तह।''
माइक बात स बचेलालक मन घोर-मट्ठा भ गेल। की नीक, की अधला से बुझबे ने करैत। माथ कुरिअबैत बचेलाल माए केँ कहलक- ‘‘माए! जखन मन असथिर हैत तखन बुझा-बुझा कहिऐं। एक बेरे नइ बुझब, दू बेरे बुझैक कोशिश करब। दू बेरे नइ बुझब तीन बेरे कोशिश करब। मुदा बिना बुझने त काज नहि चलत।''
बचेलालक बात सुनि मुस्कुकराइत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘बच्चाब जखन तोहर पिता जीविते रहथुन तखन घर मे पाथरक बटिखारा छल। ओहि स जोखै-तौलै छलहुँ। एक दिन अपने(पति) आबि कहलनि जे आब लोहाक पक्कीै सेर, अढ़ैया पसेरी सब आइल। हम पूछलिएनि जे पथरक जे सेर, अढ़ैया अछि तकरा फेकि देबै? ओ(पति) कहलनि-फेकबै किऐक? लोहा सेर क' पथरक सेर स भजारि लेब। बटिखारा कम-बेसी हैत, सैह ने हैत, ओकरा अपन बटिखारा हिसाब स मानि लेबै। अओर की हेतै। बौआ अखन तोरो मन खनहन नइ छह, जा तोहू अपन काज देखह। हमरो बहुत काज अछि। जखन मन खनहन हेतह तखन आरो गप्पख करब।''
अनोन-बिसनोन मने बचेलाल कपड़ा खींचै विदा भेल। आंगन जा बाल्टीह-लोटा, कपड़ा आ साबुन नेने कल पर पहुँचल। कपड़ा साबुन के कात मे रखि पहिने कलक चबूतरा साफ केलक। बाल्टी मे पानि भरि सब कपड़ा क' बोइर देलक। एकाएकी कपड़ा निकालि दुनू पीठ साबुन लगा-लगा, बगल मे रखैत। जखन सब कपड़ा मे साबुन लगाओल भे गेलै तखन पहिलुका सावुन लगौलहा कपड़ा निकालि खींचै लगल। सुमित्रा खन्तीे ल बाड़ी ओल उखाडै़ विदा भेलि। बाड़ी मे पतिआनी लगा ओल रोपने रहथि। तीन सलिया ओल। केंकटा गाछ फुला गेल। बाड़ी मे सुमित्रा हियासै लागलि जे कोन गाछ खुनब। सब गाछ डग-डग करैत। पतिआनीक बीच मे एकटा गाछक अदहा पत्ता पिरौंछ भ गेल। पात क' पीअर देखि सुमित्रा ओइह गाछ खुनैक विचार केलनि। ओल कटि नहि जाय तेँ फइल से खुनव शुरु केलनि। सात-आठ किलोक हैदरावादी ओल। टोंटी एकोटा नहि। टोंटी नहि देखि सुमित्रा मने-मन सोचै लगली जे टोंटी रहैत त रोपियो दैतिऐक मुदा से नहि भेल। ओलक माटि झाड़ि गाछ के टुकड़ी-टुकड़ी काटि खधिये मे द उपर स माटि भरि देलखिन। सुमित्रा चाहथि जे ओलो आ खन्तिीओ ऐके बेर नेने जायब मुदा से गरे ने लगनि। दुनू हाथ स' ओल उठा एक हाथ के ल दोसर हाथ से खन्तीक लिअए लगथि कि ओल गुड़कि क' निच्चा मे गिर पड़नि। कैक बेर कोशिश केलनि मुदा नहिये भेलनि। तखन हारि क' पहिने दुनू हाथे ओल उठा कल लग राखि, खन्तीे आनै गेली। खन्ति़ओ मे माटि लगल आ ओलो मे। तेँ दुनू क' नीक-नाहाँति घुअए पड़त। माए क' ठाढ़ देखि बचेलाल हाँइ-हाँइ कपड़ा पखाड़ै लगल। कपड़ा ल बचेलाल चार पर पसरै गेल। सुमित्रा ओल के कलक निच्चाा मे रखि कल चलबै लगली। गर उनटा-उनटा दश-पनरह बेर कल चलौलनि। मुदा तइयो सिरक दोग-दाग मे माटि रहबे केलै। तखन ओल क घुसुका बाल्टीर मे पानि भरि लोटा स ओलो, खन्तिाओ आ अपनो हाथ-पाएर धोलनि। आंगन आबि सुमित्रा पुतोहू केँ कहलखिन- ‘‘आइ रवियो छी, बच्चोथ गामे पर रहता तेँ ओलक बड़ी बनाउ। बड़ निम्मतन ओल अछि तेँ दू चक्का तड़ियो लेब।''
सुमित्राक बात सुनि मुह-हाथ चमकबैत पुुतोहू उत्तर देलखिन- ‘‘हिनका हाथ मे सरर पड़ल छनि तेँ कब-कब नइ लगै छनि। हमरा त ओल देखिये के देह-हाथ चुलचुला लगै अए। अपने जे मन फुड़ैन से बनबथु। हम चुल्हिि पजारि ताबे भात रन्हैय छी। सभकेँ नवका चीज नीक लगै छै हिनका पुरने नीक लगै छनि।''
पुतोहूक बात सुनि सुमित्रा मने-मन सोचै लगली जे जाबाव दिअनि आ कि नहि? समय पर जँ जबाव नहि देब त दबब हैत। मगर जबाव देनहु त झगड़े हैत। अपना जे इच्छाअ अछि वैह करब मुदा बाता-बाती से त काजे रुकत। जत्त्ो बनबै मे देरी हैत तते भानसो मे अबेर हैत। मुदा सुमित्राक मन जबाव देइ ले तन-फन करैत। ओल क' बीचो-बीच काटि, चारि फाँक करै लगली ओलक सुगंध आ रंग देखि सुमित्रा जबाव देलखिन- ‘‘कनियाँ, जे चीज सब दिन नीक लागल ओ आइ अधला कोना भ' जायत? जाबे जीबै छी ताबे त खेबे करब। तेाँ जकरा अधला बुझै छहक ओ अधला नहि छी। दुनू गोटेक नजरि मे अन्त र छह। जे अन्तरर नी-अधला मे बदलि गेल छह। दुनू गोटेक नजरि, एहि दुआरे दू रंग भ गेल छह जे दुनू गोटेक जिनगी दू रंग बीतल। तेाँ नोकरिहाराक परिवारक छह हम गिरहत परिवारक। तोहर बाप नगद-नरायण कमाई छथुन जहि स हाट-बजार से समान कीनि आनि खइ छेलह। हम त सामान उपजवै वला परिवार मे रहलहुँ। कोन वस्तुर कोना रोपल जाइ छै, कोना ओकर सेवा करै पड़ैत छै, से सब वुझै छियै। तेँ हमर नीक आ तोहर नीक मे यैह अन्तहर छह।''
दुनू सासु-पुतोहूक गप-सप बचेलालो दरवज्जा पर स सुनैत। बीच आंगन मे बैसि सुमित्रा ओल बनवति रहथि। घर मे पुतोहू भन-भना क' बजैत रहति, जे सुमित्रा नीक जेँका सुनवो ने करैत। बच्चा नेने मखनी सेहो आइलि। मखनी के कोरा मे बच्चा देखि सुमित्रा दबारैत कहलखिन- ‘‘मासे दिनक बच्चा के अंगना से किऐक निकाललह? जँ रस्ताक-पेड़ा मे हबा-बसात लागि जइतै तब?''
हँसैत मखनी उत्तर देलकनि- ‘‘दीदी! अइ आंगन के अनकर आंगैन कहै छथिन। हमर नइ छी? अपनो अंगना अवै मे संकोच हैत।''
मखनीक बात सुनि सुमित्रा मने-मन अपसोच करैत कहलखिन- ‘‘अनकर अंगना बुझि नइ करलियह। अखन बच्चाम छोट छह तेँ बचा केँ राखै पड़तह। बेटा धन छी। घर से त निकलबे करत। पुतोहू केँ सोर पाड़ि कहलखिन- ‘‘पहिले-पहिल दिन बच्चान अंगना आयल। तेल-उबटन दहक। अगर उबटन घर मे नइ हुअअ ते तेले टा नेने आवह। ताबे चुल्हि- मिझा दहक। पहिने बच्चाअ के जाँति-पीचि दहक।''
घर स रुमा तेल आ विछान नेने आबि अंगने मे विछौलक। तेलक माली लग मे रखि बच्चार केँ कोरा मे लेलक। दुनू पाएर पसारि बच्चाल केँ जाँध पर सुतौलक। बच्चा क मुह देखि रुमा मने-मन बाजलि- ‘‘मखनी केहेन भाग्यचशाली अछि जे भगवान ऐहन सुन्नचर बच्चाउ देलखिन।'' उनटा-पुनटा क' बच्चाग देखलक। रुमाक मन मे ऐलै जे कोना लोक बजै अए जे फल्लाँ।क कपार खराब छैक आ फल्लांाक नीक? जँ कपार अधला रहितैक त बेटी होइतै। जकर कपार नीक रहै छै, ओकरा खाली बेटे होइतै। भगवानक नजरि मे सब बराबरि अछि। सभ त हुनके सनतान छी। कोन पापी बाप ऐहेन हैत जे अपना सन्ताोन केँ दूजा-भाव करत? अनेरे लोक, कपार गढ़ि, भगवान केँ दोख लगबै छनि।
सुमित्रा हाथ स ओलो आ कत्तो ल मखनी ओल बनबै लगलीह। ओल देखि मखनी सुमित्रा केँ कहलखिन- ‘‘ओल अंडाइल रोहू(माछ) जेँका बुझि पड़ैत अछि। दीदी ‘हाथ धो लथु, हम बना लै छी।''
सुमित्रा हाथ धोय दुनू हाथ मे करु तेल लगा अपना पाएर मे हसोथि लेलनि। हाथक कबकबी मेटा गेलनि।ं विछान पर जा पुतोहू केँ कहलखिन- ‘‘कनि०ााँ, बच्चा़ लाउ। हम जाँति दइ छियै। अहाँ चुल्हिप लग जाउ।' सुमित्रा कोरा मे बच्चाँ के द' रुमा चुल्हिज पजारै गेलि। सुमित्रा बच्च केँ जाँध पर सुतवैत मखनी केँ कहलक- ‘‘कनियाँ, बीचला चक्काा ओरिया क' काटब। ओ तड़ब। कतका सब उसनि क' बरी बनाएब।''
मुस्कीओ दैत मखनी कहलकनि- ‘‘तेहेन सुन्नार ओल छनि दीदी जे चुल्हि पर चढ़िते गल-बला जेतनि। खेबो मे तेहने सुअदगर लगतनि। अइ आगू मे दुदहो-दहीक कोनो मोल नहि।''
सुमित्रा बच्चा केँ जतबो करैत आ घुनघुना क' गेबो करैत-
‘कौने बाबा हरबा जोताओल,
मेथिया उपजाओल हे।
कौने बाबी पीसल कसाय
ओ जे बच्चाप केँ उङारब हे।
बड़का बाबा हरबा जोताओल
ओ जे सरसो उपजाओल हे।
ऐहब बाबी तेल पेरौलीह
बच्चाा केँ उङारथि हे।
जाबे मखनी ओल बनौलक ताबे सुमित्रो बच्चा क' जाँति-पीचि चानि मे काजरक टिक्काल लगा निचेन भेलीह। मखनीक कोरा मे बच्चा द सुमित्रा एक-डेढ़ सेर चाउर आ तीमन जोकर ओल द देलखिन।

जिनगीक जीत ःः 3






























मौलाइल गाछक फूल
उपन्या स











जगदीश प्रसाद मंडल
बेरमा, मधुबनी, बिहार।
मौलाइल गाछक फूल ःः 1
दू साल रौदीक उपरान्त क अखाढ़। गरमी स जेहने दिन ओहने राति। भरि-भरि राति बीअनि हौंकि-हौंकि लोक बितबैत। सुतली राति मे उठि-उठि पाइन पीबै पड़ैत। भोर होइते पसीना अपन उग्र रुप पकड़ि लैत। जहिना कियो ककरो मारै ले लग पहुँच जाइत तहिना सुरुजो लग आबि गेलाह। रास्तात-पेराक माटि सिमेंट जेँका सक्कात भ गेल अछि। चलबा काल पाएर पिछरैत अछि। इनार-पोखरिक पानि, अपन अस्मि ता बँचवैक लेल पातालक रास्ताा पकड़ि लेलक। दू साल सँ एक्कोत बुन्न- पानि धरती पर नहि पड़ने धरतीक सुन्दपरता धीरे-धीरे नष्टि हुअए लगल। पियासे दूबि सभ पाण्डु रोगी जेँका पीअर भ'-भ' परान तियागि रहल अछि। गाछ-पात बेदरंग भ' गेल अछि। लताम, दारीम, नारिकेल इत्या दि अनेको तरहक फलक गाछ सूखि गेल। आम, जामुन, गमहाइर, शीषोक गाछक निच्चाे पातक पथार लगि गेल। दसे बजे सँ बाध मे लू चलै लगैत अछि। नमहर-नमहर दरारि फाटि धरतीक रुपे बिगाड़ि देने अछि। की खायब? कोना जीबि? अपना मे सभ एक-दोसरा सँ बतिआइत अछि। घास-पानिक दुआरे मालो-जाल सूखिकेँ संठी जेँका भ' गेल अछि। अनधुन मरबो कयल। अनुकूल समय पाबि रोगो-बियाधि बुतगर भ गेल। माल-जाल स' ल' क' लोको सभहक जान अबग्रह मे पड़ि गेल अछि। खेती-बाड़ी चौपट्ट होइत देखि, थारी-लोटा बन्हलकी लगा-लगा लोक मोरंग, दिनाजपुर, ढाका भगै लगल। जैह दषा किसानक ओइह दषा बोनिहारोक। कहिया इन्द्र भगवानक दया हेतनि, एहि आषा मे अनधुन कबूला-पाती लोक करै लगल।
तीनि दिन स अनुपक घर चुल्हि नहि पजड़ल। नल-दमयन्तील जेँका दुनू परानी अनुप दुखक पहाड़क तर मे पड़ल-पड़ल एक-दोसराक मुह देखैत। ककरो किछु बजैक साहसे नहि होइत। बारह बरखक बेटा वौएलाल, बोरा पर पड़ल माय केँ कहलक- ‘‘माए, भूखे परान निकलल जाइ अए। पेट मे बगहा लगै अए। आब नइ जीबौ!''
वौएलालक बात सुनि दुनू परानी अनुप केँ आखि स नोर आवि गेलै। मुहक बोल बुताय लगलै। लग मे बैसल रधिया उठि क' डोल-लोटा ल', इनार दिषि विदा भेलि। इनारोक पानि निच्चाल ससरि गेल अछि, जहि स डोलक उगहनियो छोट भ' गेल। कतवो निहुड़ि-निहुड़ि रधिया पानि पबै चाहैत, तइयो डोल पानि स उपरे रहैत। रधियाक मन मे एलै जखन अधला होइवला होइ छै तखन एहिना कुसंयोग होइ छैक। वौएलाल नइ बँचत। एक त पाँच टा संतान मे एकटा पिहुआ बँचल सेहो आइ जाइ अए। हे भगवान कोन जनमक पापक बदला लइ छह। इनार स डोल निकालि, लहरे पर डोल-लोटा छोड़ि रधिया उगहनि जोड़ै ले डोरी अनै आंगन आइलि। रधियाक निराष मन देखि अनुप पूछलक- ‘‘की भेल?''
टूटल मने रधिया उत्तर देलक- ‘‘की हैत, जखन दैवेक(दइबैक) डाँग लागल अछि तखन की हैत। उगहनि छोट भ गेल तेँ जोड़ै वला डोरी ले एलौ।''
रधियाक बात सुनि अनुप घरेक(ओसारेक) बनहन खोलि रधिया केँ देलक। खड़ौआ जौर ल रधिया इनार पर जा उगहनि जोरलक। उगहनि जोड़ि पानि भरलक। पाइन भरि लोटा मे लए' रधिया आंगन आबि बौएलाल केँ पीबै ले कहलक। पड़ल बौएलाल केँ उठिये ने होय। ओसार पर लोटा राखि रधिया वौएलालक बाँहि पकड़ि उठा केँ बैसौलक। अपने हाथे रधिया लोटा स चुरुक मे पानि ल' वौएलालक आखि-मुह पोछलक। वौएलालक देह थर-थर कपैत। थरथरी देखि रधियोकेँ थरथरी पैसि गेलनि। लोटा उठा रधिया बौएलालक मुह मे लगवै लागलि कि थरथराइत हाथ स लोटा छुटि गेलैनि जहि स पानि बोरा पर पसरि गेल। दुनू हाथे छाती पीटैत रधिया जोर स बजै लागलि- ‘‘आब बौएलाल नै जीति, जे घड़ी जे पहर अछि।''
रधियाक बोल सुनि अनुप जोर स कनै लगल। अनुपक कानब सुनि टोलक धियो-पूतो आ जनिजातियो एक्के -दुइये अबै लगल। सभहक मुह सुखाइले रहै। के ककरा बोल-भरोस देत। सभहक एक्केए गति। अनुपक कानब सुनि रुपनी अंगने से कनैत अबैत। रुपनी अनुपक ममिओत बहिन। अनुपक आंगन आबि रुपनी बौएलाल केँ देखि बाजलि- ‘‘भैया, बौआक परान छेबे करह। अखन मुइलह हेन नहि। किअए अनेने दुनू परानी कनै छह। जाबे शरीर मे साँस रहतै ताबे जीवैक आषा। चुप हुअअ।'' कहि रुपनी वौएलाल क' समेटि कोरा मे बैसौलक। तरहत्थीक स चाइन रगड़ै लागलि। वौएलाल आखि खोलि बाजल- ‘‘दीदी, भूख से पेट मे बगहा लगे अए।'' वौएलालक बात सुनि रुपनी बाजलि- ‘‘रोटी खेमे।''
‘‘हँ।''
वौएलालक बात सुनि रधिया घर मे धयल फुलक लोटा, जे रधिया के दुरागमन मे बाप देने रहथि, निकालि अनुप केँ देलनि। लोटा नेने अनुप दोकान दिषि दौड़ल। लोटा बेचि गहूम कीनने आयल। अंगना अबिते रधिया हबड़-हबड़ केँ चुल्हिु पजारि गहूम उलौलक। दुनू परानी रधिया जाँत मे गहूम पीसै लगल। एक रोटीक चिक्क़स होइतहि रधिया समेटि क रोटी पकबै आवि गेलीह। अनुप गहूम पीसै लगल। रोटी पका रधिया वौएलाल लग ल गेल। अपने सँ रोटी तोड़ि खेवाक साहसे वौएलाल केँ नहि होयत। छाती, दाबि- दाबि रधिया वौएलाल केँ रोटी खुआवै लगली। सैाँसे रोटी वौएलाल खा लेलक। रोटी खायत-खायत वौएलालो केँ हूबा एलैक। अपने हाथे लोटा उठा पानि पीलक। पानि पीवितहि हाफी होअए लगलैक। भुइँये मे ओंघरा गेल। जाँत लगक चिक्क।स समेटि रधिया चुल्हिल लग आनि सूप मे सानै लगलीह। जाँघ पर पड़ल चिक्कटस अनुप तौनी स झाड़ि, लोटा-डोल नेने इनार दिषि बढ़ल। हाथ-पाएर धोय, लोटा मे पानि लए आंगन आबि खाइ ले बैसल। छिपली मे रोटी आ नोन-मेरिचाइ नेेने रधिया अनुपक आगू मे देलक। भुखे अनुप केँ होय जे सैाँसे रोटी मोड़ि-सोड़ि क एक्केज बेरि मुह मे ल' ली, मुदा से नहि कए तोड़ि-तोड़ि खाय लगल। छिपलिक रोटी सठितहि अनुप रधिया दिषि देखै लगल, मुदा तीनिये टा रोटी पका रधिया चिक्कोसक पथिया कोठी पर रखि देने। रधिया क' देखि अनुप चुपचाप दू लोटा पानि पीवि उठि गेल।
दिन अछैते नथुआ, दौड़ल आबि, हँसैत अनुप केँ कहलक- ‘‘गिरहत कक्काे बड़की पोखरि उड़ाहथिन। काल्हिम से हाथ लगतै। तोहूँ दुनू गोरे काज करै चलिहह।''
नथुआक बात सुनितहि रधियाकेँ, जना अषर्फी भेटि गेल होय, तहिना भेलै। अनुपोक मुह सँ हँसी निकलल। अनुपक खुषी देखि नथुआ बाजल- ‘‘अपने मुसना कक्कात मेटगिरी करत। ओइह जन सबहक हाजरी बनौत।''
नथुआ, अनुप आ रधियाक बीच गप-सप होइतहि छल कि मुसनो धड़फड़ाइल आयल। मुसना दिषि देखि नथुआ बाजल- ‘‘मुसनो कक्काल ते आबिये गेला। आब सभ गप फरिछा केँ बुझबहक।''
मेटगिरी भेटला सँ मुसनाक मन तरे-तर गदगद होयत। ओना कहियो मुसना मेटगिरी केने नहि, मुदा गामक बान्ही-सड़क मे मेट सबहक आमदनी आ रोब देखने, तेँ खुषी। मने-मन सोचैत जे जकरा(जहि जन) मन हैत तकरा जन मे राखब आ जकरा मन हैत तकरा नै राखब। इ त हमरे जुइतिक काज रहत की ने। जकरा मन हैत ओकरा बेसिये क हाजिरी बना देबैक। पावर त पावर होयत। जँ पावर भेटै आ ओकर उपयोग फाजिल क' के नहि करी त ओहन पावरे ल क' की हेतइ। जँ से नहि करब ते मुसना आ मेट मे अनतरे की हैत। लोक की बुझत। मुस्कीि दैत मुसना अनुप केँ कहलक- ‘‘भैया, काल्हि से बड़की पोखरि मे काज चलतै, तोहू चलिहह। दू सेर धान आ एक सेर मड़ुआ, भरि दिनक बोइन हेतह। तत्त्ो टा पोखरि अछि जे कहुना-कहुना रौदी खेपिये जेबह। सुनै छी जे आनो गामक जन सभ अबै ले अछि मुदा ओकरा सभ केँ माटि नहि काटै देबै।''
मुसना बात सुनि वौएलाल फुड़फुड़ा क' उठि कहलक- ‘‘कक्का हमरो गिनती क' लिह'। हमहू माटि काटै जेबह।''
-‘‘बेस वौआ, तीनू गोरे चलिहह। हमरे हाथक काज रहत। दुपहर मे भानस करै ले भौजी क' पहिने छुट्टी द देवैइ।''
कहि मुसनो आ नथुओ चलि गेल।
दोसर दिन भोरे, पोखरि मे हाथ लगै से पहिनहि चौगामाक जन कोदारि-टाला वा पथिया-कोदारि ल' पोखरिक मोहार पर पहुँच थहाथहि करै लगल। मेला जेँका लोक। जते गामक जन तहि स कैक गुना बेसी आन गामक। जनक भीड़ देखि मुसनाक मन मे अहलदिल्लीह पैसि गेलइ। तामसो आ डरो से देह थर-थर कपै लगलैक। मुसनाक मन मे एलै हमर बात के सुनत। माथ पर दुनू हाथ ल' मुसना बैसि गेल। किछु फुरबे ने करैत। ठकमूरी लगि गेलैक। सैाँसे पोखरि, गैाँवा स अनगैाँआ धरि, जगह छेकि-छेकि कोदारि लगा टल्ला ठाढ़ केने। सोचैत-सोचैत मुसनाक मन मे एलै जे रमाकान्तर बावू(गिरहत कक्काि) केँ जा क सब बात कहिअनि। सैह केलक। उठि क' रमाकान्ता ऐठाम विदा भेलि।
तहि बीच गौँवा-अनगौँआ जन मे रक्का -टोकी शरु भेल। अनगौँवा सभ जोर-जोर से बजैत जे कोनो भीख मंगै ले एलहुँ। सुपत काज करब आ सुपत बोइन लेब। गौँवा जन सभ कहै जे हमरा गामक काज छी तेँ हम सभ अपने करब। सुखेतक भुटकुमरा आ गामक सिंहेसरा एक्केम ठाम पोखरि(माटि) दफानने। दुनूक बीच गारि-गरौबलि हुअए लगलै। सभ हल्लास करैत तेँ ककरो बात कियो सुनबे नहि करैत। सभ अपने बजै मे बेहाल। गारि-गरौबलि करिते-करिते भुटकुमरो सिंहेसर दिषि बढ़ल आ सिंहेसरो भुटकुमरा दिषि। दुनूक बीच मुह स गारियो-गरौबलि होइत आ हाथ स पकड़ो-पकड़ा भ' गेल। एक-दोसर केँ पटकि छाती पर बैससै चाहैत। दुनू बुतगर। पहिने त भुटकुमरे सिंहेसराकेँ पटकलक किऐक त सिंहेसराक पाएर घुच्ची। मे पड़ि गेलै, जहि स ओ धड़फड़ा क खसि पड़ल। मुदा सिंहेसरो हारि नहि मानलक। हिम्म‍त क उठि भुटकुमरा केँ, छिड़की लगा खसौलक।
दरबज्जाह पर बैसि रमाकान्तट बावू बखारीक धान, मड़ूआक हिसाव मिलबैत। हलचलाइत मुसनाकेँ देखि रमाकान्तत पुछलखिन। मुसनाक बोली साफ-साफ निकलबे नहि करैत। मुदा तइयो मुसना कहै लगलनि- ‘‘काका, तत्त्ो अनगौँआ जन सब आबि गेल अछि जे गौँवा केँ जगहे ने हैत। कतबो मनाही केलियै तइयो कोई मानै ले तैयारे ने भेल। अपने से चलि केँ देखियौक।''
कागज-कलम घर मे रखि रमाकान्तह विदा भेलाह। आगू-आगू रमाकान्तच आ पाछू-पाछू मुुसना। पोखरि सँ फड़िक्केा रमाकान्तभ रहथि कि पोखरि मे हल्लाा होइत सुनलखिन। मन चौंकि गेलनि। मन मे हुअए लगलनि जे अनगौँवा सभ बात मानत की नहि! अगर काज बन्नौ क' देब त गौँओ कामै(कामए) हैत। जँ काज बन्नब नहि करब ते अनगौँओ मानवे नहि करत। विचित्र स्थिुति मे रमाकान्तस। निअरलाहा गड़बड़ भ' जायत। पोखरिक महार पर रमाकान्तत केँ अबितहि चारु भर सेँ जन सभ घेरि लेलकनि। सभ हल्लाड करैत जे जँ काज चलत त हमहू सब खटब। ततमत्‌ मे पड़ि रमाकान्तल अनगौँआ सभ केँ कहलखिन- ‘‘देखू रौदियाह समय अछि। सभ गाम मे काजो अछि अ करौनिहारो छथि। चलै चलू, अहाँ सभहक संगे हमहू चलै छी आ हुनको सभकेँ कहबनि जे अपना-अपना गामक बोनिहार केँ अपना-अपना गाम मे काज दिऔ।''
आन सभ गामक लोक कोदारि, छिट्टा, टल्लाग नेने विदा भेल। रमाकान्तोा संगे विदा भेलाह। किछु दूर गेला पर रमाकान्त मुसनाकेँ (इषारा मे) कहि देलखिन जे जखन आन गामक लोक निकलि जायत तखन गौँआ जन केँ काज मे लगा दिहक। तहि बीच क्योा जा क' सिंहेसरा घरवाली केँ कहि देलक जे पोखरि मे तोरा घरवला केँ ओंघरा-ओंघरा मारलकौ। घरवलाक मारिक नाम सुनितहि सिंहेसराक घरोवलाी आ धियो-पूतो गामे पर से गरिअबैत पोखरि लग आबि गेलि। मुदा तइसे पहिने अनगौँआ सभ चलि गेल छल।
पोखरिक काज शुरु भेल। तीनू गोटे अनुप एक्केे ठाम खताक चेन्हस देलक। कोदारि स माटि काटि-काटि अनुप पथिया भरैत, रधिया आ वौएलाल माथ पर ल' ल' महार पर फेकए लगल। बारहक अमल भ' गेल। रमाकान्त घुरि केँ आबि पोखरिक पछबरिया महार पर ठाढ़ भ' देखै लगलथि। मुसनाक नजरि पड़ितहि दौड़ि क रमाकान्तब लग पहुँचल। मुसनाकेँ पहुँचतहि रमाकान्तल, आंगुरक इषारा स वौएलालकेँ देखबैत, पूछलखिन- ‘‘ओ(वौएलाल) के छी। ओकरा साँझ मे कहिहक भेटि करै ले।'' कहि रमाकान्त घर दिसक रस्ताल पकड़लनि। बारह बर्खक वौएलालक माटि उघब देखि सभकेँ छगुन्ताह लगैत। जाबे दोसरो कियो एक बेरि माटि फेकैत ताबे वौएलाल तीनि बेरि फेकि दइत। वौएलालक काज देखि अनुप मने-मन सोचै लगल जे बोनिआती स नीक ठिक्का होइत। मुदा हमरे सोचला से की हेतैक। ताबे मुसनो रमाकान्तन केँ अरिआति घुरि क' अनुप लग आबि कहलक- ‘‘भैया, मालिक दुनू बापूत केँ साँझ मे भेंट करै ले कहलखुन हेँ।''
मालिकक भेटि करैक सुनि अनुपक हृदय मे खुषीक हिलकोर उठै लगल। मुदा अपना क' सम्हाकरि अनुप मुसना केँ कहलक- ‘‘जखन मालिक भेंट करै ले कहलनि ते जरुर जायब।''
सुरुज पछिम दिस एकोषिया भ' गेलाह। घुमैत-फिरैत मुसना अनुप लग आबि रधिया केँ कहलक- ‘‘भौजी, अहाँ जाउ। भरि दिनक हाजरी बना देने छी। भानसोक बेर उनहि जायत।''
रधिया आंगन विदा भेलि। अनुप आ वौएलाल काज करिते रहल। चारि बजे सभ काज छोड़ि देलक। गाम पर आबि अनुप दुनू बापूत नहा क' खेलक। कौल्हुेके गहूमक चिक्कोसक रोटी, आ अरिकंचन पात के पतौरा बना पकौने छलि, ओकर चटनी बनौने छलि। खा क' तीनू गोटे(अनुप, वौएलाल आ रधिया) ओसार पर बैसि गप-सप करै लगल। अनुप रधिया केँ कहलक- ‘‘भगवान बड़ी गो छेथिन। सब पर हुनकर नजरि रहै छनि। देखियौ ऐहेन कहात समय मे कोन चक्कोर लगा देलखिन।''
गप-सप करितहि गोसाई डूबि गेल। झलफल होइतहि अनुप दुनू बापूत रमाकान्तन ऐठाम विदा भेल। रस्तास मे दुनू बापुत केँ ढेरो तरहक विचार मन मे उठैत आ समाप्तम होयत। ओना दुनू बापुतक मन गदगद।
दरबज्जाम पर बैसि रमाकान्तत मुसना से जनक हिसाब करैत रहथि। मुसना जनक गिनतियो केने आ नामो लिखने। मुदा अपन नाम छुटल तेँ हिसाव मिलवे ने करैत। अही घो-घाँ मे दुनू गोटे। तहिबीच दुनू बापूत अनुप पहुँचल। फरिक्के स अनुप दुनू हाथ जोड़ि रमाकान्त- केँ गोड़ लागि बिछान पर बैसल। वौएलालो गोड़ लगलकनि। वौएलाल केँ देखि रमाकान्त- बिहुँसति अनुप केँ कहलखिन- ‘‘अनुप तोँ इ बेटा हमरा द' दाय?''
मने-मन अनुप सोचै लगल जे ई की कहलनि? कने काल गुम्मौ भ' अनुप उत्तर देलकनि- ‘‘मालिक, वौएलाल की हमरे टा बेटा छी, समाजक छियै। जखन अपने केँ जरुरत हैत तखन ल' लेब।''
अनुपक उत्तर सुनि सभ छगुन्ताल मे पड़ि गेलाह। मास्टगर साहेव अनुप केँ निङहारि-निङहारि देखै लगलथि। एकटा युवक, जे दू दिन पहिने भाग्यमक मारल आयल छल, ओहो आषा-निराषा मे डूबल। ओहि युवक केँ तीन बर्ख कृषि विज्ञानक पढ़ाई पूरा भेल छलैक, सिर्फ एक बर्ख बाकी छलैक। अपन सभ खेत बेचि पिताक बीमारीक इलाज करौलक, मुदा ठीक नहि भ' मरि गेलखिन। कर्जा ल पिताक श्राद्ध-कर्म केलकनि। खरचा दुआरे पढ़ाइयो छुटि गेलनि आ जीवैक कोनो उपायो ने रहलनि। जिनगीक कठिन मोड़ पर आबि ओ युवक निराष भ' गेल छलाह। साल भरि पहिने विआहो भ' गेल छलनि। एक दिस बूढ़ि माए आ स्त्रीभक भार दोसर दिस जीवैक कोनो रास्ताो नहि। सोग स माइयोक देह दिन व दिन निच्चेत मुहे हहड़ल जाइत। रमाकान्कर उदार विचार सुनि ओ युवक आयल छल।
सभ दिन रमाकान्त। चारि बजे पिसुआ भाँग पीबैत छथि। दोसरि-तेसरि साँझ होयत-होयत रमाकान्त् केँ भाँगक नसा(नषा) चढ़ि जाइत छनि। भाँगक आदत रमाकान्त केँ पिता स लागल छलनि। रमाकान्त क पिता न्या(य शास्त्रजक विद्वान्‌। ओना गाम मे कम्मे -काल रहैत छलाह, बेसी काल बाहरे-बाहर। हुनके प्रभाव रमाकान्तइक उपर। तेँ रमाकान्ता जेहने इमानदार तेहेन उदार विचारक। पोखरिक चर्चा करैत रमाकान्त मुसना केँ कहलखिन- ‘‘काल्हिग से वौएलाल केँ दोबर बोइन दिहक।''
दोबर बोइन सुनि, कने काल गुम्मा भ' मुसना कहलकनि- ‘‘मालिक, एक गोरे के बोइन बढ़ेबै ते दोसरो-तेसरो जन मांगत। हहि से झंझट शुरु भ' जायत। झंझट भेने काजो बन्न‘ भ जायत।''
काज बन्न' होइक सुनि रमाकान्तस उत्त्ोजित भ' कहलकखिन- ‘‘काज किअए बन्न' हैत। जे जतेक काज करत ओकरा ओते बोइन देबैक।''
रमाकान्तजक विचार केँ सभ मूड़ी डोला समर्थन क देलकनि। समर्थन देखि गद्‌गद होइत रमाकान्तक कहै लगलखिन- ‘‘अखन वौएलाल केँ बोइन बढ़ेलहुँ बाद मे दू बीघा खेतो देबैक। मास्टतर सहायव, अहाँ राति केँ वौएलाल केँ पढ़ा दिऔ। सिलेट-कितावक खरच हम देवै।''
खेतक चर्चा सुनि मुसना रमाकान्तड केँ कहलकनि- ‘‘विपन्ना(गरीब) त वौएलाले टा नहि अछि, गाम मे बहुतो अछि।''
मुसनाक प्रष्नन सुनि रमाकान्तनक हृदय मे सतयुगक हरिष्च‘न्द्रा पैसि गेलनि। उदार विचार, इमान मे गंभीरता, मनुक्खयक प्रति सिनेह हुनक विवेक केँ घेरि लेलकनि। अखन धरि ने सुदिखोर महाजनक चालि, आ ने धन जमा करै वला जेँका अमानवीय व्य वहार प्रवेष केने छलनि। नीक समाज मे जहिना धन केँ जिनगी नहि बुझि, जिनगीक साधन बुझि उपयोग होइछ, तहिना रमाकान्तोज परिवार मे रहलनि। जखन रमाकान्तबक पिता गाम मे रहैत छेलथिन आ कियो किछु मंगै अबैत त खाली हाथ घुरए नहि दइत। जे रमाकान्तोु देखथिन। सदिखन पिता कहथिन जे जँ किनको ऐठाम पाहुन-परक आवनि आ ओ किछु मांगै आवथि ते हुनका जरुर देबनि। किऐक त ओ गामक प्रतिष्ठा- बँचाएव होयत। गामक प्रतिष्ठाथ व्यहक्तिनगत नहि सामुहिक होइछ। तहिठाम जँ क्यो सोचैत जे गाम सभहक छियैक हमरा ओहि स कोन मतलब? गलती हेतैक। गाम मे अधिकतर लोक गरीब आ मुर्ख अछि, ओ एहि प्रतिष्ठाो केँ नहि बुझैत अछि। तेँ जे वुझिनिहार छथि हुनकर इ खास दायित्वम बनि जाइत छनि। एहि धरती पर जतेक जीव-जन्तु स ल क' मनुख धरि अछि सभकेँ जीबैक अधिकार छैक। तेँ, जे मनुख ककरो हक छिनै चाहै छैक ओ एहि भूमि पर सबसँ पैघ पापी छी। जनकक राज मिथिला थिकैक तेँ मिथिलावासी केँ जनकक कयल रास्ता केँ पकड़ि क' चलक चाही। जहि स ओ प्रतिष्ठाे सभदिन बरकरार रहतैक।

मौलाइल गाछक फूल ःः 2

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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...