Wednesday, October 28, 2009

शब्द-विचार 4

छछार गृहावयव-लेपन। घर छछारल-घरक भीत गोबर-माटिसँ उपलिप्तल कएल।
पछार बजारब। हम चोरकेँ पकडि़ पछारलहुँ-बजारलहुँ ।
मछार मछारिसँ युक्त करब। खेत मछौरत अछि-मछारि (जलनिरोधमात्रार्थक कल्पित आरि) सँ युक्तल अछि।
गजार पानिमे तृण सड़बाक हेतु हलकर्षण। धानक खेत गजारल-पानिमे तृण सड़बाक हेतु जोतल।
बजार पटकब। जयदेव सत्तू पहलबानकेँ बजारलक-पटकलक।
भजार बटिखाराक ओ तामाकआदिक जाँच। ई सेर भजारल अछि- दोसर सेरसँ ओजनमे जाँचल अछि एहि पथिआक भजार कएल-जाँच कएल, आध मन अटल ।
निड़ार आँखिक अकृत्रिम आस्फा लन। कुकुर आँखिक निड़ारिकेँ-आस्फाधलित कएकेँ मुइल ।
गुड़ार आँखिक कृत्रिम आस्फाकलन। तामसेँ आँखि गुड़ारैत अछि-आस्फाधलित करैत अथ्छख।
बढ़ार संमार्जन। आँगन बढ़ारलक-बाढ़निसँ साफ कएलक।
उढ़ार स्वास्त्रीतक भावसँ परस्त्री केँ लए जाएब। नट मौगीकेँ अछि-अपन रंत्रीक भावेँ लए जाइत अछि।
ततार लस्साइ दए आगिसँ युक्त करब। बेमाए ततारैत अछि-लस्सा दए अग्निसंयुक्त करैत अछि।
सतार शीघ्रतासँ संपादन। हम कार्य सभ सतारल-शीघ्रता संपत्र कएल।
उतार उत्तारण (उपरसँ हेठ करब)। सीकसँ दही उतारलक-हेठ कएलक।
सुतार युक्यादह संपादन कएल लेब। हम अपन काज सुतारलहुँ-युक्याकए संपत्र कए लेल।
बिथार पसारब। नेना हाथ बिथारने अछि-पसारने अछि, मधुर दिऔक।
घेँथार धुसबाक हेतु अतिप्रश्न । अहाँ बड़े घेँ थारैत छिऐक-धुसबाक हेतु बहुत पुछैत छिऐक।
ओदार त्वरचाप्रभृति अत्यकन्ता संलग्नुकेँ खैँचि फराफ करब। घाओक खैँठी ओदारिकेँ-छोड़ाएकेँ-मलहम लगाबी।
सुधार उचित मार्गपर आरूढ़ कराएब। बिगड़ल नेनाकेँ सुधारब-उचित क्रियापर आरूढ़ कराएब असंभव।
उनार फान अधिक होएबाक हेतु आकर्षण। माठा उनारल जाएत-खैचिकेँ अधिक फानक कएल जाएत, तखन पहिरल जाएत।
झमार जोरसँ कम्पित करब। हमरा एक्काि बड़े झमारलक-जोरसँ डोलओलक, तेँ देह दुखाइत अछि। बोतलमे पानि दए झमारू तखन साफ होएत।
समार जोतलकेँ उनटा पुन: जोतब। हरबाक खेत समारैत अछि-जोतल खेतकेँ फेर उनटा जोतैत अछि।
पसार प्रसारण(विस्तृैत करब)। ओछाओन पैध अछि, पाएर पसारिकेँ-प्रसृत कएकेँ सुतू।
ससार बलात् घुसकाएब। वायु उखड़ल अछि, ससारि दिअ-घुसकाए दिअ, अर्थात् अपना जगह पर बैसाए दिअ। पेट ससारू एहिठाम पेट शब्दए उदस्थू वायुमे लाक्षणिकम जानब।
बिसार विस्मपरण कराएब। हमरा बुढ़ारी अवस्थाू बिसारलक-विस्मबरण करओलक।
उसार समाप्तु करब (उत्सारण)। हम नाच तमासा उसारल-समाप्तण कएल।
घोँसार बिसराएब (निन्दाणशब्दण)। हम अहाँकेँ सब बात घोँसारि देब-बिसराए देब (कोपोक्ति)।
निहार तत्पररतापूर्वक देखब। विवाहमे सभलोक कन्या्केँ निहारैत अछि-तत्प्रतासँ देखैत अछि।
खेहार विद्रावण। कुकुर गीदड़केँ खेहारैत अछि-नेँगारैत अछि।
सम्हार बाधासँ हटाए संपादन। हम सभ काज सम्हाारल-बाधासँ बचाओल। हम पिच्छाड़मे खसए लगलहुँ परन्तु सम्हा‍रलहुँ-खसलहुँ नहि।
पहिर परिधान। हम धोती पहिरैत छी-परिहित करैत छी।
निघुर धर नम्र करब। देवदत्त निघुरल चलैत छथि-धर नमाए चलैत छथि।
ठिठुर शैत्य प्रयुक्त हस्तामदिक त्व्चासंकोचरूप विकारलाभ। हाथ ठिठुरि गेल-शीतसँ त्वाचा संकोच प्राप्तु कएलक।
निहुर धर नम्र करब। देवदत्त निहुरल चलैत छथि।–धर नम्र कएने चलैत छथि।
मचोर जोरसँ ऐँठब। हमर हाथ मचोरल गेल-ऐँठल गेल, दुखइत अछि।
हँथोर हँथोरिआ देव (अन्हाँरमे हाथसँ ताकब)। अन्हा र घरमे खाटतर हँथोरू-हँथोरिआ दिअ अर्थात् हाथसँ ताकू तखन लोटा भेटत।
ममोर ऐँचब। वायु पेट ममोरैत अछि-ऐँचैत अछि, अर्थात् व्योथा करबैत अछि।
झरखर सकल पत्रक त्यायग। वसन्तत समय गाछ झरखरैत अछि-सब पात छोड़ैत अछि।
सपहर मालक सापसँ दष्ट होएब। गाए सपहरल अछि-सापक काटल अछि, मतीकेँ अनाउ।
सहिआर 1. चेतब ।
2. ठीक करब। हम पहिनहि सहिआरल-चेतल वा ठीक कएल।
पचकार अधिक तैलादिलेपन। हूराहूरीक (गोक्रीड़ाक) दिन चरबाह देहमे तेल पचकारैत अछि-अधिक लगबैत अछि।
झटकार गमनमे शीघ्रता करब (झटझट डेग उठाएब)। अबेंर भेल अछि, झटकारू-झट-झट डेग उठाउ जे शीघ्र पहुँची।
फटकार लम्फरलम्फाच करब (वाह्मडम्बलर करब)। निन्दाम शब्दव। हुनका बड़ फटकार-अधिक बाह्माडम्बिर।
धिरकार धिक्का र कहि गञ्जन । ओकरा हम धिरकारलैक-धिक्का।रेँ गत्र्जि त कएलैक।
ललकार जोरसँ दबाड़ब। शत्रुकेँ ललकारल-जोरसँ दबाड़ल।
हलकार बहुत मालकेँ एकदिश लए जाएब। मालकेँ लहकारैत अछि-एकट्ठा कए एकदिश लए जाइत अछि।
चुचुकार चुचु शब्दजसँ विश्वोस्तए करब। बड़दकेँ चचुकारि-चुचु शब्दस विश्वरस्तक कए पकडू।
होहकार चोरआदिक उद्देशेँ घोल करब। लोकसब ककरा होहकारैत अछि-ककरा उद्देशेँ घोल करैत अछि ? होहकार भए रहल अछि।
बिहखार छिद्रसँ युक्त करब। तमासा देखबाक हेतु लोकसभ टाट बिहखारलक-छिद्रसँ कएलक।
परचार निरोधसूचना। हम तोहरा परचौरत छिऔक-निरोध करबाक सूचना दैत छिऔक, आब तोहर माल हमर उपद्रव नहि कराए।
बहटार आन दिश लए जाएब। हुनक मोन हम बहटारैत छी-नाना प्रकारक गप्पब कहि दोसरा दिश लए जाइत छी।
परतार प्रतारण। नेनाकेँ परतारब- प्रतारण करब कोनो कठिन नहि।
खटपार दु:खेँ खाटपर शरीरक स्थारपन। जयवीर शोकसँ खटपारने-खाटपर शरीरक स्थातपन कएने छथि।
हिलकोर तरङ्गसँ टारब। समुद्रक तटमे राखल वस्तुनजात हिरकोरल गेल-तरङ्गसँ टारल गेल।
टकटोर अन्धरकारमे पुन:पुन हाथ रोपब। अन्हारर घरमे टकटोरैत-वारंवार हाथ रोपैत बहरएलहुँ।
ढकढोर अनुचितरूपेँ वस्तुरसबक संचालन। ओ नेना वस्तुटजात ढकढोरैत अछि-अनुचित रूपेँ संचालित करैत अछि, ओकरा मना करू।
ल ग्रहण। देवनाथ पुस्त क छथि-ग्रहण करैत छथि। ई पुस्त क हम काशीमे मोल लेल-मूल्यलसँ गृहीत कएल। हम पुस्तछक बेचि लेल एहिठाम ल धातुक ग्रहण अर्थ नहि से अनुप्रयोगप्रकरणमे कहि आएल छी।
गल विलय। मेघसँ खसल पाथर लगेल गलैत अछि-विलीन भए जाइत अछि। जमल रौदमे वा आगिपर गलत-पघिलत।
चल चलन। अहाँ हमरा सङ्ग काशी चल धातु संस्कृमते स्वचस्रूृपेँ गृहीत अछि। एकरासँ तिङ् प्रत्यङय भूतमे अकर्मक धातुवत् अबैत अछि। ओ चललाह। कर्ममे प्रत्यछय होइतहि अछि, अपने गाम चलह जाए।
मल मर्दन। साफ करबाक हेतु नोकर वर्तन एलैत मलैत अछि-मर्दित करैत अछि।
घाल शस्त्रछसँ आहत करब। मारिमे देवसिंह घालि भेल-हाथआसँ आहत भेल।
चाल चालन (संशोधन)। आँटा चानिसँ चालैत अछि-संशोधित करैत अछि।
पाल पालन। माए नेना केँ बहुत कष्टेँ पालैत अछि।
साल काठक भीतर काठ पैसाएब। बरही चौकठि सालैत अछि-छेद कए चौकठिक पासि पैसबैत अछि।
छिल तक्षण (अस्त्र। खसाए काटब)। चरबाह खुरपीसँ घास छिलैत अछि।
मिल 1. आश्ले ष
2. सुश्लिष्टै होएब। भरत रामचन्द्रुसँ बनमे मिललाह-आश्लेाष कएलैन्हि। ‘’ भेटब ’’ अर्थमे मिल धातुक प्रयोग हिन्दीेमे होइत अछि, तेँ हमरा रुपैआ मिलओ ई प्रयोग अशुद्ध थीक। कागजसँ रुपैआ नहि मिलैत अछि-एकविध नहि होइत अछि।
हिल डोलब। भूकम्पलमे सभ हिलए लगैत अछि-डोलए लगैत अछि। बुढ़ारीमे दाँत हिलैत छैक।
खुल गुप्त विषयक प्रकाश। ओ विषय खुलि गेल-गुप्त छल किन्‍तु आब प्रकाश भए गेल।
पुल परिणामसँ गुलगुल होएब। ई आम धुलत-गुलगुल तखन खएबाक योगय होएत।
झुल आन्दोहलित होएब। गरम समय लोक मचकीपर झुलैत अछि-बसात लगबाक हेतु आन्दोयलित होइत अछि।
फुल विकारसँ मोट होएब। हुनक देह फुलि गेलैन्हि।
बुल टहलब। जयदेव फुल तोड़बाक हेतु भिनसरुक पहर बुलैत छथि-एमहर-ओमहर चलैत छथि।
हुल हठात् गमन। मन्दिरसँ हम बहराए लगलहुँ तावत दर्शकक झुण्डब हुलि देलक-प्रवेश करए लागल, हमरा बहराएब कठिन भए गेल।
ठेल हाथसँ धक्का देब। मेलामे सिड़हीपर यात्रीसभ हमरा ठेललक-हासथसँ धक्का देलक, तेँ खसलहुँ ।
हेल अवगाहन। गङगामे हेलने-अवगाहन कएने धर्म छैक। जलमे हाथसँ खेबि उपर-उपर चलब अवगाहन कहबैत अछि।
ओल हाथक सञ्चालनसँ धान्याञदिकेँ गर्दाक उपर आनब। धानमे गर्दा अधिक अछितेँ कुट्टी लेनिहारिसभ ओलैत अछि-हाथसँ संचालन कए धान गर्दाक उपर अनैत अछि।
खोल बन्धलमुक्त करब (मोचन)। केबाड़ बन्दक अछि, खोलू-उद्धाटन करू। घोड़ाकेँ खोलैत अछि जे चरए।
छोल फलकेँ त्वखचासँ वियुक्त करब। सितुआसँ सजमनि छोलैत अछि-खोँ इचासँ रहित करैत अछि। बिना छोलने सिद्ध नहि होइतैक।
झोल शुष्क चूर्णक वस्त्रोसँ संचालन द्वारा संशोधन। वैद्य औषधक चूण्र झोलैत छथि-वस्त्र सँ संशोधित करैत छथि ।
डोल आन्दोिलन (हिलब)। भूकम्पतमे सभ डोलए लगैत अछि-आन्दोपलित होअए लगैत अछि ।
फोल खोलब (बन्धतमुक्त करब)। घर बन्द अछि, फोलू-खोलू, अर्थात् कबाड़ खोलू।
तौल तराजूप्रभृतिसँ नाप। धान तौतैत अछि। निकतीसँ सोन तौलल, एक भरि भेल।
निकल बहिर्भाव। बतहा एहि ठामसँ निकलल-बहार गेल अर्थात् चल गेल।
बिचल शिराक विचलन (अन्यचथास्थिति)। मोर पड़बाक कारणोँ शिरा बिचलल-जेना रहबाक चाही ताहिसँ अन्यलथा भए गेल।
छछल चिक्कनमे स्खालन। कजरीबाला सिढ़ीपरसँ पाएर छछल-रखलित भेल।
उछल उच्छतलन (हठात् कित्र्चित् ऊर्ध्वभगमन)। वर्षा पड़ैत पोठी माछ पानिमे उछलैत अछि-उपर जाइत अछि।
बदल विनियम (वस्तुअक हेरीफेरी करब)। धानसँ गम्हतरी बदलैत अछि-धान दएकेँ गम्हँरी लैत अछि।
छहल छछलब। कजरीपर पाएर छहलत-छछलत।
टहल विहारर्थ मन्दह-मन्द- चलब। प्रात: काल हम नित्यद टहलैत छी-विहारार्थ मन्दल-मन्द- चलैत छी।
दहल धैर्यत्या ग। संकटमे सबक मन दहलैत अछि-धैर्यक त्यामग करैत अछि। भवदत्त कहुखन नहि दहलताह-अधीर नहि होएताह।
निकाल निष्कालसन। ओहि नोकरकेँ हम निकालल-निष्काकशित कएल।
उगिल उद्गिरण (मुहसँ फेँकब)। कुसिआरक रस खाए सिठ्ठी उगिलैत अछि-मुहसँ फेँकैत अछि।
पघिल घनीभावक त्यामग। घीउ जमल अछि, रौदमे पघिलत-द्रवीभूत होएत।
उझिल पात्रास्थित धान्याफदिक अध:पातन। बोरासँ धान उझिल-नीचाँ खसा1 पात्रकेँ उनटाए धान्याझदि खसाएब उझिलब थीक।
धकेल धक्का दए ठेलब। मेलामे लोक धकेलल जाइत अछि- धक्काेसँ ठेलल जाइत अछि।
कस 1. कसौटीमे जाचक हेतु घर्षण।
2. अश्लीथ बन्धरन ।
3. घोड़ाग्रभृतिक सज्जी करण। 1. सोन कसलासँ-कसौटीपर घर्षण कएलासँ जाचल जाइत।
2. बोरामे धान कसल अछि-अश्लणथ बद्ध अछि।
3. घोड़ा कसल अछि-सुसज्जित अछि।
खस स्खधलन (पतन)। घोड़ासँ सवार खसल। बिहारिमे घर खसल-पतित भेल।
गस सक्कत करब। मालामे फूल गसल अछि-निविड़ संबद्ध अछि।
घँस घर्षण। चानन घँसैत छी-रगड़ैत छी।
धस नीच होएब। नव भरल भूमि वर्षा भेलापर धसैत अछि-नीच भए जाइत अछि।
बस निवास। लोक उच्च भूमिपर बसैत अछि-निवास करैत अछि।
भस 1. जलमे पतित होएब।
2. तृणधिक्या दिसँ हीन होएब। निर्माल पानि भसल, हमहि जाए भसाओल।
हँस हास्य।। भवदेव हँसैत छथि-हास्यमयुक्तब होइत छथि।
पिस पेषण। सरबक हेतु धीन पिसैत अछि।
झुस भयोत्पातदनपूर्वक द्रव्यमग्रहण। अधर्मी अधिकृत लोकसँ रुपैआ-पैसा झुसैत अछि-भग्र उत्परत्र कराए डरेँ देल रुपैआ लैत अछि।
ठुस बलात् प्रवेश कराएब। मुसक बिहरिमे गोबरमाटि ठुसैत अछि-बलात् प्रविष्टो करैत अछि।
दुस निन्दाप। ओ हमरा दुसलैन्हि-हमर निन्दा् कएलैन्हि।
धुस गञ्जन। अटपटांग बजनिहार सभामे धुसल जाइत छथि-गत्र्जि त होइत छथि।
रुस रुष्टछ होएब। ओ नेना रुसल अछि-रुष्टि भेल अछि, मधुरसँ ओकरा बौँ सू ।
हुस 1. लक्ष्य मे असंबद्ध होएब। 2. अवसराभावसँ अलब्धअ होएब। 1. मधुकरबा पड़ाएल जाइत चोरकेँ झटहा मारलक परन्तुब झटहा हूसि गेलैक-चोरपर नहि गेलैक।
2.हम पछाति अएलहुँ तेँ भोज हुसल-अवसराभावसँ भोज अलब्धो भेल अर्थात् नहि खाए सकलहुँ।
ठेस चलबाक काल लोष्ठा दिमे पाएर आहत होएब। 1. पाएर पजेबामे ठेसल-आहत भेल।
2. हम ठेसलहुँ-हमर पाएर पजेबामे लगलासँ हम आहत भेलहुँ।
ढेँस मालक उकासी करब। बड़द ढेँसैत अछि-उकासी करैत अछि। यद्यपि उकासी करब मालमे नहि बाजल जाइत अछि तथापित मनुष्यलकेँ उकासीमे शब्द होइत छैक जाहि हेतुक ताही हेतुक मालहुँकेँ शब्दत होइत छैक से टैँसब कहबैत अछि।
नेस दीपक ज्वाकलन। दीप नेसैत अथ्छ -प्रज्वहलित करैत अछि।
पेस पैसाएब। बाती बतरखमे पेसैत अछि-पैसबैत अछि।
भेँस देहमे अस्त्र क भोँकब। भाला देहमे भेँ सलकैक-भोकलकैक।
रेस फुटल द्रव्यदक मरम्मपति करब। फुटल लोटा रेसलापर निचू होएत।
लेस दीपक ज्वा लन। दीप लेसैत अछि-नेसैत अछि।
पोस पोषण। गाए पोसबाक चाही, पक्षी नहि पोसी।
झौँस झरकाएब। तेलक अभावसँ आइ तरकारी झौँसेल अछि-झरकले अछि।
बौँस रुसलक आश्वा सन। नेना रुसल अछि, ओकरा मधुरसँ बौँसू-प्रसत्र करू।
बकस अभयदान। हम विशेष अपराधी छलहुँ परञ्च मालिक बकसि देलैन्हि-अभय देलैन्हि।
सकस अवकाशून्यि होएब। कोनो दिन रेलगाड़ीमे लोक सकसल रहैत अछि-अवकाशशून्यस भेल रहैत अछि।
उकस हटब। उकसिकेँ बैसू-कित्र्ति् घु‍सकि बैसू। उकस-पाकस करैत अछि।
हँपस अनुचित अधिक लेब। कनिएँ लेअए कहबैन्हि तँ हँप (फ) सताह-अधिक लए लेताह।
दमस मेघादिक ध्वकनि। मेध दमसैत अछि-शब्दह करैत अछि।
समस कित्र्ति् सार्द्र होएब। नुआ समसल अछि-कित्र्चित् आर्द्र अछि।
परस परिवेषण। न्योेतहारीलोकनि बैसलाह, आब परसू-परिवेषण करू।
निरस असाध्यणताग्रयुक्त त्यािग। ओहि रोगीकेँ वैद्य निरसलैन्हि-असाध्यगता बझि छोडि़ देलैन्हि।
जँघास अधिक काल जाएब-आएबसँ परिच्छित्र करब। ई रास्ताि हमरा जँघासल अछि-अधिक गतायातसँ अछि।
अख्यातस तर्क-स्मररण। हमरा अख्याछस नहि अछि-स्मअरण नहि अछि जे हम कतेक रुपैआ लेल।
बारेस वर्षण । मेघ बरिसैत अछि-वर्षा करैत अछि।
बिहुँस 1. ईषद्धास ।
2. विदीर्ण होएब। 1. ओ आनन्द सँ बिहुँसैत छथि-मन्दन-मन्द. हँसैत छथि ।
2. जगह बिहुँसि गेल अछि-कित्र्चित् विदीर्ण भए गेल अछि।
उधेस यथावत् राखलकेँ अयथावत् करब। नारक टाल झुकि गेल अछि, ओकरा उधेसिकेँ-उजारिकेँ ठीक करू। नेना वस्तुकजात उधेसलक-एमहर-ओमहर कएलक।
घटोस घटघट कए अधिक जल पीअब। अधिक पिआसल लोक पानि घटोसैत अछि-घट
2. कए पीबैत अछि। ई निन्दाह शब्दर थीक।
ढकोस ,, ,, ,, ,,
कह कथन। अहाँ की कहल ? हम कहलहुँ जे अहाँ जाउ।
ढह उञ्च दृढ़ वस्तुप (भित्त्यादि) क पतन। भीत ढहल-खसल। हुनक गौरव ढहलैन्हि इत्याुदि प्रयोग नाशदि अर्थमे लाक्षणिक जानब।
बह 1. बसातक चलब।
2. प्रवाह।
3. गाड़ी आदिमे वृषभादिक चलब। 1. बसात बहैत अछि, तेँ ठंढा समय अछि।
2. धारमे जल बहैत अछि। घाऔ बहल। पीजु बहैत अछि।
3. बड़द बहैत अछि।
मह मथन। दूध महैत अछि, जे नेनु बहार हो।
रह स्थिति। एहिठाम हम रहब-संस्कृ त स्था स्याजमि।
लह 1. एक दिस नीच होएब। 2. व्यािपारक साफल्य । 1. घर लहल अछि-यत्कि‍त्र्चित् भागमे नीच भए गेल अछि।
2. ई उद्योग हमरा लहल-सफल भेल।
सह 1. भोलननिवृत्ति ।
2. सहन। 1. हम एकादशीकेँ सहैत छी-भोजन नहि करैत छी।
2. ई अपराध हम सहलहुँ-सह्म कएलहुँ।
चाह इच्छाँ। अहाँ की चाहैत छी-कोन वस्तुहक इच्छाक करैत छी ?
डाह जारब, भस्मीमकरण। मत्रूलालक घर चोर डाहलकैन्हि-भस्म कएलकैन्हि
ढाह उञ्चक क्रमिक भङ्ग करब। देबाल ढाहैत छी-तोड़ैत छी।
थाह तलक स्पार्श करब, अस्पृुश्यभ तलसँ । पोखरि थाहल, दश हाथ पानि भेल। ई पोखरि अथाह अछि-बिना डुबने अस्पृ श्य तक अछि।
बाह पशुस्त्री क पुंपशुसंबन्धि। पाड़ी बाहल-पाड़ासँ संगत भेल।
लाह लाहसँ जोड़ब। फुटल लहठी लाहैत अछि-आगि लगाए संयुक्तठ करैत अछि।
साह कि‍त्र्चित् घुसकाएब। खाटकेँ उत्तर साहू, तखन दच्छिन दिस जगह फएल होएत।
बिह रोपल धानकेँ बीच-बीचमे फुटाएब। गृहस्थ। फुटबासँ पूर्वहिँ बिहैत अछि-फुटबैत अछि।
कुह क्लेैश देब। अहाँ लोककेँ बड़े कुहैत छिऐक-क्ले-श दैत छिऐक।
गुह सटाएब। मालाक फूल गुहैत छी-चुटकीसँ सटबैत छी।
दुह दोहन, चुअकीसँ खैँचि-खैँचि भीतरक वस्तुु बहार करब। गाए दुहैत अछि। पटिआक तानी दुहैत छी।
खेह जनौक सोटब। ई जनौ खेहल नहि अछि-सोटल नहि अछि।
जोह अन्वे षण। लोक अपन प्रियवस्तुआ जोहैत अछि-ओकर अन्वे्षण करैत अछि।
सोह फलकेँ त्व्चा‍रहित करब। केरा सोहू-खोचासँ वियुक्ति करू।
चिन्हस चिन्हससँ जानब। हम रत्नह चिन्है त छी। हम गङ्गधर शास्त्री केँ चिन्हैुत छलिऐन्हि।
बिन्ह् कीटक दंशन। बिरनी बिन्हिलक-दंशन कएलक।
औन्ही अधोमुख करब। तसला औन्हिकेँ-अधोमुख राखू।
उगह उद्वहन। भरिआ भार उगहैत अछि-कान्हखपर राखि अन्यउत्र लए जाइत अछि। गदहा ऊस उगहैत अछि।
निबह निर्वाह। ततबा अत्र भेल जे भरिवर्ष निबहब-निर्वाह करब।
उड़ाह 1. नवीन मृद्धाण्डिकेँ कार्यमे लगाएब।
2. कूपादिक उद्धार। माटिक भाण्ड। तौला उड़ाहल-पाकमे लगाओल।
निबाह संपादन। हमर काज भगवान निबाहताह-संपादित करताह।
सराह उत्तहमतया निश्चित करब। हम कार्य करएबामे जयदेवकेँ सराहैत छी-योग्यजतया निश्चित करैत छी-योग्यरतया निश्चित करैत छी। ई धातु प्राय: हिन्दीिसँ आएल अछि।
ओराह अशुष्क सत्वएच अत्रक साक्षात् आगिमे पाक। बदाम ओराहू-काँच छिमडि़ लागल आगिमे पकाउ। ओरहा खएबामे नीक होइत अछि।
उसाह कनेक उपरकेँ साहब। चार उसाहू, तखन बरी पर चढ़त।
बेसाह नित्यस खाए अत्राक क्रयण। हमरा बेसाह लागल अछि-नित्य़ अत्रक कीनब चलैत अछि हम चाउर बेसाहैत छी1 अहाँ रोग बेसाहि आनल इत्याादि लाक्षणिक जानब।
परिह पहिरब (परिधान)। नव धोती परिहैत अछि-पहिरैत अछि।
सनोह मालकेँ कतबा दूध होइत अदि तकर जाँच । महीसिक दूध सनोहैत छी-कतबा दूध होइत छैक से नपैत छी, महीसि मोल लेबाक अछि।
सिसोह सुड़रब। नेना धान सिसोहैत अछि-सुड़रैत अछि।
तु 1. फलक रोगसँ खसब
2. नक्षत्रक प्रवेशदिन बुन्दअ-मात्रक पातन। 1. विपाकसँ आमक टकोरा तुऔत अछि-खसैत अछि।
2. हस्त नक्षत्र तुअल-प्रथम दिन बुन्द पात कएलक।
टो फलकेँ पक्वनतादिक जाँचक हेतु दबाएब। कटहर टोऐत छी-हाथसँ दबैत छी जे पाकल अछि की नहि।
धो प्रक्षालन (जलसँ साफ करब। धोती धोऐत अछि-जलसँ निर्मल करैत अछि।
बो बाओग करब। धान बोआल-बाओग कएल।
फो बन्धबमुक्त करब। ताला फोअल-बन्धरमुक्तै कएल।
हो उत्प त्ति। 1. व्यािपारसँ लोक शीघ्र धनी होइत अछि। 2. कार्य होइत अछि (कार्य प्रवर्तते)।
जक तराउपरी ढेरी करब। अहाँ मडुआ काटि जाकब-ढेरी करब। हम जाकल, जकलासँ गुमैत छैक तखन मिड़बामे सुकरता होइछ। लकड़ी सभ जाकल अछि-तराउपरी कए राखल अछि।
तक 1. निरीक्षण ।
2. अन्वे्षण। 1. हम अहाँक मुह तकैत छी।
2. वस्तुा हराएल अछि, ओकरा ताकू-अन्वे षण करू।
झँक भात सिद्ध भेलापर तत्काुल पात्रसँ नीचामे ढेरी करब। एक खखड़हरक भात झाँकल-पात्रसँ बहार कए नीचामे राखल। दोसराक आब झाँकब।
टँक दूर-दूर पर सीअब। दरजी पहिने अंगा टँकैत अछि-दूर
2. सीबैत अछि, पश्चाहत् कलसँ सिबैत अछि।
थक श्रान्ति होएब। चलैत 2. हम थकलहुँ-श्रान्तम भेलहुँ। अहाँकेँ थाकनि नहि होइत अछि।
पक 1. रोटीक सिद्ध होएब।
2. फलक साक्षात् अग्निमे पाक।
3. परिणत होएब।
4. शरीरावयक अग्नितापज विकार। 1. सोहारी पकैत अछि-अग्नितापसँ बनैत अछि।
2. सानाक हेतु भाँटा पकैत अछि।
3. आम पाकल-परिणात भेल।
4. हमर हाथ पाकल-अग्निसँ तप्त भेल।
फँक 1. सूँड़ाक खाएब।
2. भूजाप्रभृति मुहमे फेँकि-फेँकि खाएब। 1. सूड़ा चाउस फँकलक।
2. हम लाबा फाँकल।
हँक अश्वा दिक प्रेरण। बड़द हाँकि-प्रेरित कए लए जो। तोँ माल सभ हाँक।
चख चीखब (जाँचक हेतु खाएब)। मधुर चाखू जे केहन अछि।
मख लगबा योग्यज वस्तुखक संपर्क। ओमहर देने थाल माखब-थालसँ युक्ता होएब।
रख 1. स्थाथपन ।
2. रक्षण। 1. अहाँ पुरान धान रखैत छी-स्था‍पित करैत छी, आब हमहु राखब।
2. हमर गाछी देबना रखैत अछि-रक्षा करैत अछि। ओ सदाक हेतु हमर रखबार- रक्षक अछि।
जग जागरण। हम एक बजे रातिमे जगलहुँ, आन केओ जागल, नहि छल।
तग तुराइप्रभृतिक तूरक अविघटनार्थ सीअब। दरजी तुराइ तगैत अछि-दूर 2.केँ सीबैत अछि।
धँग पाएरसँ आक्रमण। पसरल नुआकेँ नेना धँगैत अछि-पाएरसँ आक्रान्ता करैत अछि, लए आउ।
धङ ,, ,, नीपल खरिहान मालसभ धङैत अछि।
पग सिरकासँ युक्त करब। मखान पगैत अछि-सिरकासँ युक्‍त करैत अछि।
पँग सभ ठारि काटब (ठारि टुटु करब)। सीसोक ठारि पँगैत अछि वा पङैत अछि-कटैत अछि। सीसोसभ पाँगल वा पाङल गेल-ठारि काटि ठुट्ठु कएल गेल।
पङ ,, ,,
लग 1. युक्त होएब।
2. निसा करब।
3. पन्हाकएब।
4. प्रवृत्ति।
5. जरब ।
6. व्य य।
7. सुश्लिष्ट। होएब। 8. उत्पलत्ति ।
9. अपेक्षित होएब।
10. इष्ट होएब, इत्या।दि अनेक अर्थ। 1. पाएरमे थाल लागल-संयुक्तर भेल एवं दाग लागल।
2. हमरा भाँग लागल अछि-निसा कएने अछि। हफीमक लागि-निसा।
3. गाए लगैत अछि-पन्हांइत अछि। आइ महीँसि नहि लागल।
4. हम काजमे लागल छी-प्रवृत्त छी।
5. पानि कम पड़बाक कारणेँ दालि लागि गेल-जरि गेल।
6. तीर्थयात्रामे हजार रुपैया लागल-खर्च भेल।
7. हमरा श्लोरकक अर्थ नहि लगैत अछि-सुश्लिष्टर नहि होएत।
8. हमरा भूख लागल अछि-उत्पित्र अछि। खएलाक उत्तर पिआस लागत-उत्प त्र होएत।
9. एहिमे बहुत यत्न् ‍ लागल-अपेक्षित भेल।
10. अहाँक आँखि लाल लगैत अछि-दृष्ट होइछ। ई धातु पदषविशेषसमभिव्याधहारवशात् ओ प्रकरणवशात् आनो अनेक अर्थक बोधक होइत अछि-शक्तिसँ वा लक्षणासँ। यथा, आँखि लागल-कित्र्चित् निद्रा भए गेल वा असंभाव्यँ अतिशय बुझल। हमरा किछु खेत हाथ लागल-प्राप्तम भेल। हमर लागल अछि-कार्यमे व्यापृत अछि। चक्कूल लागल-कटलक।
टँग निराधार राखब। सुखएबाक हेतु गाछमे धोती अछि। करीन टा‍डि़.केँ राखू।
टँङ ,,
धँग पाएरसँ आक्रमण। साग बाओग अछि, धाँगी जनु। नुआ सुखाइत पसरल अछि, ओकरा माल धाङए नहि।
धङ ,,
पँग 1. शाखाक छेदन।
2. छित्रशाखीकरण। सीसोक ठारि पाँगल वा पाङल-काटल। सीसोगाछ पाँगाल वा पाङल-‍छित्रशाख कएल।
पङ ,, ,,
भँग 1. खण्डा करब।
2. सीकक निर्माण। 1. सुपारी भँगैत अछि वा भङैत अछि-खण्डित करैत अछि।
2. सीक भँगैत अछि वा भङैत अछि-बनबैत अछि।
भङ ,,
मँग याचन। प्रजा सम्राटसँ स्वछराज्यछ मँगैत अछि वा मङैत अछि-स्व राज्याक याचना करैत अछि
मङ ,,
लँघ लङूघन। हनुमान् सम्रद्र लँघलैन्हि-समुद्रक लंघन कएलैन्हि।
अँच इन्धननयोग। तेहड़ामे जारन आँचू-युक्तम करू।
जच परीक्षण सोन कसौटीमे जाचल जाइत अछि-परीक्षित होइत अछि।
नच नर्तन। उत्सनबमे नटुआ नचैत अछि।
पच त्वसचाक भीतर सूचीसँ प्रवेशन। पचनिआ नेनाकेँ पचैत अछि।
कछ हाथक निचला भागसँ घृतादिक लेब। जमल घृत काछैत छथि-हाथक निचला भाग लगाए उद्धृत करैत छथि।
चँछ तीक्ष्णए वस्तुिक आघर्षणसँ त्व्चाक विघटन। काँटसँ देह चाँछल गेल, शोणितो बहल।
बछ अनेक प्रकारसँ एक प्रकारक वस्तु क पृथक्करण। बीआक हेतु बोझसँ मालभोग धान बाछू-पृथक् करू।
बज व्यूक्त वा अव्याक्त वचन। मनुष्ये अपना भाषामे बजैत अछि-व्यषक्तनवर्णक उच्चा रण करैत अछि। बाजा बजैत अछि-अव्यतक्त ध्व नि करैत अछि।
भज अनेक न्यू नमूल्यत ग्रहणपूर्वक देल जाएब। रुपैआ भजल वा भँजल-न्यू नमूल्यणक बहुद्रव्य ग्रहण-पूर्वक देल गेल।
भँज ,, ,,
मज संघर्षणसँ निर्मलीकरण। लोटा माजू जे साफ हो।
सज सुसज्जित करब। मन्दिर उत्सबवदिनमे सजल रहैत अछि-सुसज्जित रहैत अछि।
बझ मध्य्मे फँसब। जालमे पक्षी बझल-जालक मध्यछमे फँसल।
कट 1. छेदन ।
2. यापन। जारनक हेतु गाछ कटैत अछि-गाछक छेदन करैत अछि।
चट अवलेहन। कुकुर माँड़ चटैत अछि। बहार कए जीहसँ ग्रहण चाटब भेल।
छँट उखरिमे मुसरक चोटसँ साफ करब। अँकड़ा चाउर साफ करबाक हेतु छँटैत अछि-उखरिमे मुसरसँ आहत करैत अछि। छाँटल चाउर छँट्टा कहाओल जाइत अछि।
झँट 1. सीसमे लागल अत्रक उच्च. वस्तुापर आधातसँ पृथक्करण ।
2. बाढ़निआदिसँ आधात। 1. धान झँटैत अछि-आघातसँ पृथक् करैत अछि।
2. झट्टासँ घर छारल। बाढ़निसँ भेम्ह केँ झाँटू-आहत करू।
डँट क्रोधसँ उच्चह स्वररेँ मना करब। व्याचप्त होएब। नेनाकेँ डाँटू-उच्चव स्वमरेँ मना करू जे फेर एहन कार्य नहि करए।
हमर खेत पटैत अछि-जलसँ व्या प्तर होइत अछि, अहाँक पाटल।
फट विदीर्ण होएब। धोती बीचसँ फाडू-विदीर्ण करू। हमर अङ्ग फाटल।
फँट विभाग। चारि गोटाक बोनि एकट्ठा छैक तकरा फाँटि दिऔक-विभक्त कए दिऔक।
बँट 1. वितरण। 2. विभाग। 1. दीन दुखीकेँ अत्र बटबारा-वितरण करैतछथि ।
2. हमरा दुहू भाइक वस्तुाजात बाँटि दितहुँ-विभक्तभ कए दितहुँ से नीक होइत।
सट संयुक्त करब। स्त्रीतगण कपारमे टिकुली सटैत अछि। गोसउनिक कोठामे आरत साटू।
ठठ ठाठक निर्माण। हम चार ठाठल-निर्मित कएल।
सठ पात्रमे ओरिआएकेँ राखब। सनेस साँठू-ओरिआएकेँ पात्रमे राखू।
सँठ ,, ,, ,,
फँड़ नामानामी विभाग। आम फाँड़ल-दू खण्डआ बनाओल। एकर फाँडा अँचार बनाएब।
भँड़ रहस्य क प्रकाश कए देब। हुनका कहबैन्हि तँ सभ बात भाँडि़ देताह-प्रकाश कए देताह ।
जँत दाबब। थाकल छी, पाएर जाँतू-दबाउ।
दँत दाँतसँ युक्त होएब। ई बाछा दाँतल-दाँतसँ युक्तह भेल।
गथ ग्रन्थ न। भगवानक हेतु फुलक माला गथेत छी वा गँथैत छी। स्त्रीलगण हारी गाँथि पहिरैत अछि।
गँथ ,,
नथ बन्धैनार्थ नासिकाकेँ छिद्रयुक्त करब। ई बड़द नाथल अछि-नाकमे छिद्रसूं युक्तद अछि।
पथ 1. एकाग्र राखब।
2. चिपड़ीक निर्माण। 1. कान पाथि-एकाग्र कए सुनैत छी जे कोन शब्द अबैत अछि।
2. चिपड़ी पथैत अछि-बनबैत अछि।
पद पर्दन (गुदरव)। दुष्ट लोक नहि किछु कए सकए तेँ सिरामे पादिओ दिअए।
लद भरती करब। गाड़ी लादल अछि-भरती अछि। धान लदैत छी-भरती करैत छी।
लध बिनबाक वस्तु-क आरम्भर (तानी दुरुस्त‍ करब)। पटिआ लधैत अछि-तानी दुरुस्त) करैत अछि, अर्थात् पटिआ आरम्भछ करैत अछि।
सध सोझ होएबाक हेतु दाबिकेँ राखब। टेढ़ बाँस सधैत अछि-दाबिकेँ रखैत अछि जे सोझ हो। ठेँगा साधि केँ सोझ कएल।
अन आनयन। भानसक हेतु जारन अनैत अछि-लबैत अछि। हम आगि आनल।
कन क्रन्दमन। खएबालए नेना कनैत अछि-क्रन्दैन करैत अछि।
छन 1. वस्त्रािदिसँ परिशोधन । 2. दुहू पाएर एकट्ठा कए बान्ह ब। गुरु बनाबी जानि पानि पीबी छानि-वस्त्रनसँ संशोधित कए।
जन बुझब। हम शास्त्र। जनैत छी-हमरा शास्त्र क ज्ञान अछि।
ठन प्रारम्भ करब। हम घरहठ ठानल-प्रारम्भ कएल।
तन आस्फाहलन। चनबा नमरल अछि,
ओकरा छी-आस्फानलित करैत छी।
फन लङूघन। हनुमान समुद्र फानि गेलाह-लडििघत कए गेलाह।
सन मेलन। भात दालिमे सानिकेँ खाउ-दालिमे मिलाए खाउ।
कप कम्पएन। अहाँक देह जाड़ेँ कपैत अछि-कम्पित होइत अछि।
छप 1. मुद्रित होएब।
2. मुद्रित करब। 1. छापाखानामे पुस्त क छपैत अछि-मुद्रित होइत अछि।
2. यन्त्रााधिकृत व्यकक्ति पुस्तकक छपैत अछि-मुद्रित करैत अछि।
झँप आवरण। कुलीना स्त्री देह झँपने रहैत अछि-आवृत कएने रहैत अछि। भदबारि मास सूर्य मेघसँ झाँ पल जाइत अछि।
तप आगिक सेवा। चैतमे आगि तापब गुणद थीक
थप 1. स्थापसकसँ युक्त करब। 2. भार देब। 1. नुआ थपैत अछि-स्था सक (थापा) सँ युक्त करैत अछि।
2. ई कार्य हम अहाँ पर थापल-एहि कार्यक भार अहाँकेँ देल।
नप प्रमाण। हाथसँ नुआ, नापल, दश हाथ भेल।
हँक मारबाक चेष्टा करब (मालक)। ई बड़द हँफैत अछि-मारकाब चेष्टममात्र करैत अछि, किन्तुर मारत नहि।
दब उपरसँ आक्रमण। हमर पाएर हाथसँ दबैत अछि-जँतैत अछि। अतेक दाबत ततेक निक।
लब आनब। वस्तुअ लबैत अछि-अनैत अछि।
तम कोदारिसँ उत्खुनन। खेत तमैत अछि-कोदारिसँ माटि ठीक करैत अछि।
चँस हरसँ क्षेत्रक प्रथम विदारण। खेत चाँसल-प्रथम कठा रोपित कएल।
डँस डाँस प्रभृतिक बीन्ह ब। डाँस डँसलक-कटलक।
फस पाशमे पड़ब। पक्षी व्या।धाक फाँसमे फसैत अछि वा फँसैत अछि-निर्गमनरहित होइत अछि।
फँस ,, ,, ,,
बस वासित करब। पान कर्पूरसँ बासल अछि-वासित अछि, अर्थात् कर्पूरक सौरभसँ सुगन्धित अछि।
बन्हा बन्हान। खेत पटबालए लोक सभ धार बन्है्त अछि-बद्ध करैत अछि। हम घर बान्ह ल इत्याटदि प्रयोग बनाएब अर्थमे लाक्षणिक जानब ।
रन्हष रन्धषन। भात रन्हैजतछी- सिद्ध करैत छी। तीमनो रान्हनब।
बिक बिक्री होएब। बजारमे वस्तुह बिकाइत अछि-बिक्री होइत अथ्छ्। बिकाएत, बिकाएल।
नुक प्रच्छथत्र होएब। देवतालोकनि महिषासुरक भयसँ नुकाएल छलाह-प्रच्छनत्र छलाह।
ओक हदमदाएब (वान्तिशङकाकुल होएब)। जी ओकाइत अछि-वमनशङ्कायुक्तत अछि।
चौँक अकस्माइद्धयसँ कम्पित होएब। नेना बालाग्रहमे चौँकैत अछि-अकस्माअत् भयसँ कम्पित होइत अछि।
मुसुक ईषद्धास। आनन्दासँ जयलाल मुसुकाइत छथि-अतिमन्द। हँसैत छथि।
अकचक विस्म्यसँ एमहर-ओमहर ताकब। चञ्चल लोक अकचकाइत अछि-विस्म यसँ एमहर-ओमहर तकैत अछि।
चकचक चाकचक्योसँ चमकब। हीरकमणि चकचकाइत अछि-2 करैत अछि, अर्थात् विकीर्णकिरणक होइतअछि।
छकछक देह कित्र्चित् उष्णथ होएब। हमरा ज्वररमे देह छकछकाइत अछि-कित्र्चित् उष्णउ होइत अछि।
झकझक स्वकच्छव देखि पड़ब। समुद्रक पानि झकझकाइत अछि-स्वदच्छक पड़ैत अछि।
टकटक अतिदौर्बल्यिप्राप्ति। ई नेना दु: खसँ टकटकाइत अछि-कार्श्यदभाक् अछि।
ठकठक शीतवेदनासँ दाँतेँ ठकठक शब्दे करब। माघ मास प्रात: स्नाान कएने कतेक लोक ठकठकाइत अछि-दाँतसँ ठकठक शब्दठ करैत अछि।
पकपक क्रोधसँ अस्फु टवचन होएब। जयदेव क्रोधेँ पकपकाइत छथि-अस्फु टवचन होइत छथि।
फकफक भूखसँ व्याधकुल होएब। बटोही भूखेँ फकफकाइत अछि-व्याुकुल होइत अछि।
भकभक कटुसंसर्गजन्यक पीड़ासँ युक्त होएब। आँखिमे मेरिचाइ लागल तेँ आँखि भककाइत अछि-कटु वस्तुभ संसर्ग जन्यह वेदनविशेषसँ युक्तग होइत अछि।
मकमक निवृत्ति। आब उत्‍सब मकमकाएल-किछु कम्प भेल।
लकलक अतिकृश होएब। दु:खवशात् अहाँक देह-अतिकृश भए गेल अछि।
सकसक समन्ताित् संयोगसँ जनवकाश होएब। मेलामे लोक सकसकाइत अछि-चारू दिशसँ उत्पीसड़नवशात् अनवकाश होइत अछि।
हकहक वुभुक्षाजन्य‍ व्या कुलीभाव। देवदत्त दिनमे नहि खएलैन्हि तेँ हकहकाइत छथि-भुखेँ व्याककुल होइत छथि।
टिकटिक कित्र्चित् पूर्वावस्थाखप्राप्ति। ई दु:खसँ अतिकृश भए गेल छलाह, आब टि‍कटिकएलाह-कित्र्ति् पूर्वावस्धापपत्र भेलाह।
लुकझुक कित्र्चित् पूर्वावस्था प्राप्ति। आब सूर्य लुकझुकाइत छथि। बाढि़मे धान डूबि गेल, ओकर पात लुकझुक करैत अछि-यत्कित्र्चित् दृश्य होइत अछि।
धुकधुक 1. तेजक न्यू.नाधिकभावप्राप्ति ।
2. वायुसँ सतत शिरामे संचालन। शिराक वायुसँ छाती धुकधुकाइत रहैत अछि। आगि
हुकहुक प्राणवायुक अल्पत संबन्ध । आब ओ हुकहुकाइत अछि-प्राणवायुक अल्प संयोगवान् अछि।
ख 1. भक्षण ।
2. भाविसमभिव्यअहारमे प्राप्ति। फल खाइत अछि। खाएत। खएलक।
खख खखड़ीसँ युक्त होएब। रातिमे वर्षा होएबाक कारण धान खखाएल-खखड़ीसँ युक्त भेल।
धख सशडिल.कत होएब। ई अहाँकेँ कहबामे धखाइत छथि-सशङिक होइत छथि।
दुख व्यिथा। माथ दुखइत अछि-शुष्कि होइत अछि। देहो दुखाइत अछि।
सुख शुष्कीुभाव। रौदमे जारन सुखाइत अछि-शुष्क होइत अछि।
तराख कित्र्चित् शुष्की भाव। जारन तरखाएल अछि-कित्र्चित् सुखाएल अछि।
दगदग तारातम्य मे पड़ब। हम दश हाथ फनबामे दगमगाइत छी-तारतम्यामे पड़ैत छी। प्रौढ़ लोककेँ कोनो कार्यमे दगमगी-तारतम्ये नहि होइत छैक।
बगबग पीलूक संचलन। ई आक सडि़ गेल, एहिमे पीलु बगबगाइत अछि-संचलित होइत अछि।
डगमग नावक डोलब। एकठा नाओ डगमगाइत अछि-डोलमाल करैत अछि।
अघ मुहुर्भोजिनजन्यत वा‍ञ्छानिवृत्ति । हम अघाएल छी-बहुत भोजन कएलासँ भोजनवा‍ञ्छासँ रहित छी। अघाएल बककेँ पोठी तीत।
कचकच कुत्सित क्रोध करब। ई नेना टोकने कचकचाइत अछि-तमसाइत अछि।
पचपच मुहक आभ्य न्तयरविकारसम्बसन्धब। हमर मुह पचपचाइत अछि-आभ्यमन्तबर विकासँ युक्त होइत अछि।
लचलच लचकब। बाँसक फट्टाक बान्हअ लोक चलबाक काल लचल जाइत अथ्छह-लच 2 करैत अछि, अर्थात् डौलैत अछि। भार लचलचाइत जाइत अछि-लचकैत जाइत अछि।
कि‍चकिच कचकचाएब। ई नेता कि‍चकिचाएत-तमसाएत, तेँ किछु कहिऔक।
कुचकुच कुचकुची-वेदनाविशेषसँ युक्त होएब। कबाछु लगलसँ देह कुचकुचाइत अछि-विलक्षण वेदनासँ होइत अछि। हमरा कुचकुची लागल अछि, भूआ लगबाक कारणेँ वा आने कोनो कारणेँ ।
पनिछ खाद्यवस्तुआक दर्शनस्मँरणसँ जिह्राक पानिसँ युक्त होएब। जीह पनिछाइत अछि-चटनी अँचारक सुगन्धि लगलसँ जलयुक्तह होइत अछि।
कछमछ वेदनासँ उनटब-पलटब। हम ज्वँरसँ कछमछाइत छी-उनटैत-पनटैत छी।
ज गमन। हम गाम जाइत छी। गुरूजी गेलाह । यद्यपि ई धातु सकर्मक थीक तथातिप एकरासँ तिङ्प्रत्यु अकर्मकधातुविहिते अबैत अछि।
लज लज्जाअ। मिथिलाक कुलीन स्त्री पुरुषसँ लजाइत अछि-पुरुषकेँ देखि लाजसँ युक्तल होइत अछि।
निल व्य।थाक परिणाम। ई संम्प्रुति गाछसँ खसल अछि, एकरा चोट काल्हि निजएतैक-परिणत होएतैक।
खौँज कुडि़ऐनीसँ युक्त होएब। हमर देह खौँ जाइत अछि-कुडिऐनीसँ युक्ते होइत अछि।
दूरिज विनष्टह होएब। वस्तुटसभ दरिजाइत अछि-अकर्मक भेल जाइत अछि, ओरिएकेँ राखू।
बजबज साद्रीभाव। ईधर बजबजाइत अछि-बज करैत अछि, अर्थात् सार्द्रतासँ लसलसाइत अछि।
उजबिज। उद्वेग। मन उजबिजाइत अछि-उग्द्विग्नत होइत अछि जे व्यतक्ति सतत लोकसंघर्षमे रहैत अछि औकरा एकान्तिमे राखि देलासँ मन उजबिजाइत छैक।
झझ पसरिकेँ थोड़ पानि चलब। बाहामे कतहु-मतहु उच्चमता रहि जएबाक कारण तत्तत् स्थतलमे पानि झझाइत अछि-थोड़-थोड़ चलैत अछि।
पझ निर्वाण (तेजक शान्ति)। आगि पझाएल-मिझाएल ।
मिझ ,, दीप मिझाएल-बरैत नहि अछि।
खौँझ अधिक कुडि़ऐनीसँ होएब। देह खौँ झाइत अछि-अधिक कुडि़ऐनीसँ आकुल होइत अछि। हमर नीक देखि ओ खौँ झाइत छथि इत्याीदि लाक्षणिक जानब।
टट 1. कोमल वस्तु क तापसँ सक्त् झा होएब।
2. हाथपाएरक वेदनाविशेष। 1. सोहारी टटाएल-सक्कजत भेल।
2. पाएर टटाइत अछि-दुखाड़त अछि। अस्थिगत वेदना टटैनी थीक।
मेट विलुप्त होएब। अति प्राचीनतक कारण एहि पुस्त कमे कतहु 2 अक्षर मेटाएल अछि-विलुम अछि।
लेट गर्दामे ओङूघड़ाएब। बटेर गर्दामे लेटाइत अछि-ओङ्घड़ाइत अछि।
लोट अमनुष्य्क लेटाएब। घोड़ा माटिमे लोटाइत अछि-ओङ्घड़ाइत अछि।
खटखट खटखट शब्दि करब। ककरो खड़ाँम खटखटाइत अछि-खट 2 शब्द करैत अछि, जेना केओ खडाँम चढ़ल आबि रहल अछि। हुनका टोकबैन्हि तँ खटखटाए उठताह इत्याहदि लाक्षणिक जानब।
छटछट स्वाषचाक अभ्यतन्त‍रमे ग्रन्थिक स्पवर्शत: संचलन। गिलटी छटछटाइत अछि-छुइने सञ्चलित होइत अछि।
खटपट ऐकमत्या भाव। ओहि दुहू गोटामे खटपटाइत छैन्हि-वैमत्यह होइत छैन्हि।
लटपट अयभावद्धाव, यथोचित नहि होएब। आबल्यदसँ चलबाक काल पाएर लटपटाइत अछि-बजबो लटपटाइत अछि-यथोचित नहि होइत अछि।
सुटसुट अपराधसँ सशङ्किोत चेष्टा करब। आब ओ सुटपुटाइत छथि- सशङिकत चेष्टाु करैत छथि।
जड़ जाड़सँ युक्त होएब। जाड़मास विना नुएँ जड़ाइत अछि-जाड़सँ (शैत्यासँ) जड़ाइत अछि।
पड़ पलायन। जाग भेलासँ चोर पड़ाइत अछि-द्रुतगमन करैत अछि।
जुड़ ठंढा होएब। गर्मी मास स्नाअन कएलासँ देह जुड़ाइत अछि-ठण्ढा। होइत अछि। विष्णुतपति नाँगड़ छथि।
नँगड़ स्खलित गमन। रुद्रधरक एक पाएर टुटि गेलैन्हि, तेँ नँगड़इत छथि-गमनमे स्ख लित होइत छथि विष्णुरपति नाँगड़ छथि।
ओँधड़ उलटब-पलटब। शोकेँ माटिमे ओँ घड़ाइत छथि उलट-पलट करैत छथि।
नङड़ स्ख़लित गमन। भवदेव नङड़ाइत छथि-एक पाएरक कज्जी रहबाक कारण स्खटलित गमन करैत छथि।
धड़धड़ हृदयक कम्पान। ज्वयरमे छाती धड़धड़ाइत छैक-कम्पित होइत छैक।
गड़बड़ असंपत्ति। कार्य गड़बड़ाएल-संपत्र नहि भेल।
हड़बड़ 1. अगुताएब।
2. हड़बड़ शब्दड करब। 1. कोनो काजमे हड़बड़ाइ नहि-अगुताइ नहि।
2. घरमे वस्तु हड़बड़ाइत अछि-हड़बड़ शब्द. करैत अछि।
कुड़बुड़ मनहिमन तमसाएब। ओ हमरा पर कुड़बुड़ाइत छथि-मनहिमन तमसाइत छथि।
लेढ़ समस्तन शरीमे पङ्कदिसँ योजन। जेठ मास सुगर खत्तामे लेढ़ाइत अछि-समस्ता देहकेँ पाँकसँ लेभड़बैत अछि।
लोढ़ माटिमे एमहर-ओमहर उनटब-पुनटब। घोड़ा माटिमे लोढ़ाइत अछि-ओढ़नाइत अछि।
सुस्त विश्राम करब। चलैत 2 थकलहुँ तेँ सुस्ताढइत छी-विश्राम करैत छी।
अगुत शीघ्रता करब। ओ अगुताइत अछि-शीघ्रता करैत अछि जे शीघ्र कार्य हो।
ततमत तारम्य् करब। ओ जएबामे ततमताइत अछि-ततमत करैत अछि, अर्थात् जएबामे तारतम्यत करैत अछि।
सथ विश्राम करब। हम तावत् सथाइत छी-विश्राम करैत छी।
बरद बाधाक प्राप्ति। जनसब बराइत अछि-बाधाप्राप्ति करैत अछि, अर्थात् बेकार अछि, तेँ काजक आज्ञा देल जाइक।
गदगद आनन्द सँ गद्गदस्वबर होएब। आनन्द सँ गदगदाइत छथि-गद्गदस्‍वरक होइत छथि।
लदबद पशुक गर्भभारक्रान्तद होएब। गाए लदबदाएल अछि-गर्भभारक्रान्त् अछि, आब शीध्रे बिआएत।
हदमद ओकाएब (वान्तिपूर्वकरूपाक्रान्तक होएब)। जी हदमदइत अछि-वान्तिक पूर्वरूपसँ युक्तम होइत अछि।
अगध अतिपृप्ति। ओ खाए अगधाएल छथि अतितृप्त छथि।
बन फलपरिपाकक पूर्वावस्थाूप्रप्ति। ई आम बनाएल अछि-परिपाकक पूर्वावस्थाअ पओने अछि।
घिन घृणाविषय होएब। वर्षा भेलासँ कार्य घिनाए गेल-घृणास्पतद भेल । अओ, अहाँ सभ कार्यमे घिनबैत छी।
बोन फलक परिपाकपूर्वरूप प्राप्ति। ई आम बोनाएल अछि-पकबाक पूर्वास्थालपत्र अछि
औन अल्पव अवकाशप्रयुक्त मनक उद्विग्न‍ताप्राप्ति। केबाड़ बन्द कएने हमर मन औनाइत अछि-व्या‍कुल होइछ।
ओढ़न ओँघड़ाएब। नेनाभूमि पर कनैत ओढ़नाइत अछि, एकरा उठाए लिऔक।
अफन व्या कुलीभाव। हमर मन अफनाइत अछि-व्या कुल होइत अछि।
फफन बाँतर खएबाक प्रयुक्त व्रणक वृद्धि। बाँतर वस्तु खाएब तँ घाओ फफनाएत-बढि़ जाएत
बिसन निद्रावस्था मे बाजब। केओ अधिक काल बिसनाइत अछि-निद्रामे बजैत अछि।
ढहन बिना हेतु एमहर-ओमहर जाएब। ई नेना ढहनाइत अछि-बिना काजेँ एमहर ओमहर करैत अछि।
कनकन 1. मारबाक चेष्टाि करब। 2. व्रणक दुखाएब। 1. बड़द कनकनाइत अछि-मारबाक चेष्टाद करैत अछि।
2. गूर कनकनाइत अछि-वेदनाविशेषसँ युक्त होइत अछि।
खनखन अतिबुभुक्षायुक्त होएब। राति नहि खाएल तेँ हम खनखनाइत छी-अतिबुभुक्षासँ युक्तज छी।
गनगन गनगन शब्दख करब। लोकक बजबासँ मन्दिर गननाइत अछि-गनगन एतादृश अव्यिक्ती शब्दक करैत अछि। ई बात गनगनाए गेल इत्याअदि लाक्षणिक जानब।
छनछन वेदनविशेषसँ युक्त होएब। नोन पड़लासँ घाओ छनछनाइत अछि-वेदनाविशेषसँ युक्तछ होइछ।
तनतन घाबक बहबासँ पूर्वकालिक वेदना। गूर पीजुसँ तनतनाइत अछि-वेदना विशेषसँ युक्तत होइत अछि
अनमन अन्यषमनरक होएब। (विमन होएब)। अहाँ अनमनाएल छी-विमनस्क्व‍ छी।
कनमन क्रोधसँ मारबाक अभिलाषा। ई हमरा पर कनमनाइत अछि-मारबाक चेष्टा करैत अछि।
बिनबिन सहसहाएब। सड़ल आममे पिलुआ बिनबिनाइत अछि-बिनबिन (अनहर-ओमहर सञ्चाल) करैत अछि।
झुनझुन झुनझुनीसँ युक्त होएब। पाएमे एक गरेँ अधिक काल बैसबासँ झुनझुनी भरल अछि (वायुक गतिविशेष)।
बुनबुन भीतरसँ बुत्री (बुद्बुद) छोड़ब वा उपरसँ बिन्दु पात। पोखरिक पानि बुनबुनाइत अछि-बुत्री छोड़ैत अछि, प्राय : बड़का माछ आएल अछि। मेघ बुनबुनाइत अछि-कित्र्चित् 2 बुन्नीद खसबैत अछि।
दप दर्प करब। ई नेना हाथसँ पोथी छिनबालए दपाइत अछि-दर्प करैत अछि।
छपछप पानिक बराबरि होएब। बाढि़मे धान छपछपाएल अछि-पानिक बराबरि अछि।
सबसब त्वबचाक भीतरमे कुडि़ऐनी होएब। हाथ सबसबाइत अछि-भीतरमे कुडि़आइत अछि।
भभ भभ शब्दत करैत खसब। कोठीक मुह खुजि गेल अछि तेँ कोठी भभाइत अछि-भभ एतादृश अव्यीक्तभ शब्दत करैत अछि, चाउर खसि रहल अछि।
झम शोकसँ कारी होएब। अहाँ सभ दिन झमाइत छी-झामवत् होइत छी अर्थात् कारी होइत छी।
डर भययुक्त होएब। बाधकेँ देखि के नहि डराइत अछि-के नहि भयभीत होइत अछि ?
भर भारसँ युक्त होएब। नेना बड़ीकालसँ जाँधपर बैसल अछि, तेँ भराए गेल-भाराक्रान्त भेल।
थिर पशुक आर्तवधर्मलाभ। महीसि थिराएल अछि-ऋतुधर्म प्राप्तन कएने अछि।
सिर दाँत मूलमे मुइल शोणितमय सिरासँ युक्त होएब। हमर दाँत सिराएल अछि-मृतशोणितयुक्तए सिरासँ युक्ति अछि।
डेर निस्तािपीभाव। रातिकेँ अन्हा रभे नेना डेराइत अछि-भीत होइत अछि।
सेर निस्ताइपीभाव। गरम मास सेराएल-निस्तारप भेल भात खाइ।
हेर अदृश्यस होएब (नहि भेटब)। हमर छड़ी हेराएल-अदृश्यि भए गेल।
टर्र इतस्तडत: वृथा चलब। मन आनन्द‍ रहलासँ नेना अछि-इतस्तनत घूमैत अछि।
अगर आनन्दनसँ नाना चेष्टाल करब। ई नेना अगराइत अछि-आनन्देसँ नाना चेष्टा करैत अछि।
ओझर दुरुद्धर होएब। गेठिअएबाक काल जनौ ओझराएल-दुरुद्धर भेल।
सोझार सूद्धर होएब। ई जनौ सोझराएल अछि-उद्धारमे सुकर अछि।
मड़र मण्डौलाकार आकाशमे घुमब। गिद्ध मर देखि मड़राइत अछि-मण्डधलाकार घुमैत अछि।
नितर अभिमान करब। ई नितराइत अछि-अभिमान करैत अछि। निन्दाछशब्दि।
कदर कातरवत् आचरण करब। जाड़क हेतु पानिमे पैसबामे नेना कदराइत अछि-कातरवत् आचरण करैत अछि।
फहर आकाशमे वस्त्रनक डोलब। उत्समवमे पताका फहराइत अछि-आकाशमे डोलैत अछि।
अन्हमर अन्धमकारावृत होएब। सन्याे ड भेल, समय अन्हतराएल-अन्धमकारवृत भेल। ई अएना अन्ह,राएल अछि-मलरूप अन्धलकारसँ आवृत अछि।
चोन्हेर आँखिक तेज: प्रतिबन्धकक विकारयोग। लिखैत 2 आँखि चोन्हाराएल-तेज: प्रतिबन्धलक विकारसँ युक्त‍ भेल।
चरचर बहुत अश्रव्य‍ बाजब। नेनासब ततेक चरचराइत छल-अश्रव्यए बहुत बजैत छल जे निद्रा नहि होअए पओलक।
थरथर कम्प।। अबलक देह चलबामे थरथराइत छैक-कम्पित होइत छैक। जाड़ेँ देह थरथराइत अछि-कपैत अछि।
बरबर अज्ञानसँ बाजब। ज्वञरक वेगमे बरबराइत अछि-दरी बजैत अछि।
लरबर लरबर करब (अदृढ़ रहब)। झाँझनक पूल लरबराइत अछि वा लरलराइत अछि-अस्थिर होइत अछि।
लरलर ,,
मिरमिर दुर्बलीभाव। मिरमिराएकेँ बजैत अछि। दीप मि‍रमिराइत अछि।
घुरघर दहपर कीड़ाक चलब। देहरप किछु घुरघुराइत अछि-कोनो कीड़ा चलैत अछि।
फुरफर इतस्त त: धावन। ई नेना फुरफुराएल भेल फिरैत अछि-इतस्तात: दौड़ल भेल फिरैत अछि।
सुरफुर लेबाक इच्छाुसँ एमहर-ओमहर करब। ई नेना सुरफुराइत अछि-लेबाक इच्छाासँ एमहर-ओमहर करैत अछि।
बिल विलीन होएब (ठामहि अदृश्यह होएब)। मेघ बिलाएल-विलीन भेल।
फुल 1. पुष्पबक विकसन।
2. फुलसँ युक्त होएब। 1. कमल सूर्य उगलसँ फुलाइत अदि-विकासित होइत अछि।
2. फूलक बहुत गाछ वसन्तामे फुलाइत अछि-फूलसँ युक्ता होइत अछि।
गोपल विनष्टत होएब। ओ वस्तुा गोपलाएल-नष्टइ भेल।
कलकल भोजनक अत्य न्तए इच्छाट (बुभुक्षासँ आतुर होएब)। ई नेना कलकलाएल अछि-भूखसँ आतुर अछि।
गलगल अस्प ष्टछ बाजब।
ई सुगा आब गलगलइत अछि-अस्पछष्टब बजैत अछि।
दलदल आधातसँ भूमिक डोलब। ई भूमि दलदलाइत अछि-पादाद्याघातसँ डोलैत अछि।
झलफल अस्पतष्ट सूझब। हमर आँखि झलफलाइत अछि-सुझबामे दोषविशेषसँ युक्त होइत अछि।
खलबल तापसँ जलक संचार। चूल्हिपर जल खलबलाइत अछि-तापसँ सशब्दि सञ्चालित होइत अछि।
छलबल संचाल करब। चल्हबा माछ वर्षा पड़ैत छलबलाइत अछि-उनटैत-पुनटैत अछि।
दलमल भूमिक डोलब। चलैत रेलगाड़ीक लग धरती दलमलाइत अछि-डोलैत अछि।
गुलगुल गुलगुल होएब (कोमलीभाव)। आम गुलगुलाएल-कोमल भेल।
बिस परिणाममे दु:ख देब। हम जे कुसंयम कएल से हमरा बिसाएल-विषवत् आचरण कएलक, अर्थात् परिणाममे दु:ख देलक।
अलस आलस्यतयुक्त होएब। हम जएबामे अलसाइत छी-आलस्यबयुक्ती होइत छी।
कसकस सक्क्ता होएब। तौलामे आँटा कसकसाएल अछि-सक्कमत भेल बैसल अछि।
बि‍सबिस दंशनादिन्या विषवेदना। साँप कटलक तेँ बिसबिसाइत अछि-वेदनाविशेष करैत अछि, तेँ मन्त्रुसँ झाडि़ दिअ।
लुसफुस लोभसँ लेबाक चेष्टाि करब। ई नेना मधुरक हेतु लुसफुसाइत अछि-मधुरक लोभेँ अछि।
दह जलक उपर भसिआएब। धारमे काठ दहाइत अछि-उपर-उपर भसिजआइत अछि।
नह स्नाआन। गङामे नहाउ-स्ना-न करू।
सिह दर्शनसँ तद्धिषयक स्पहा। अपने खाइत छी नेना सिहाइत अछि-देखलासँ खएबाक इच्छाायुक्तछ होइछ।
बोह प्रवाहमे विनष्टच होएब। जयलाल गङगमे बोहाए गेलाह-प्रवाहमे विनष्टग भेलाह।
सोह प्रिय लागब। ई हमरा नहि सोहाइत अछि-प्रिय नहि लगैत अछि। एहि धातुक प्रयोग प्राय: स्त्रीछगण करैत अछि।
पन्हर मालक थनमे दुग्धीपूर्ण होएब। हमर गाए पन्हा्इत अछि-थनमे दुग्धापूर्ण होइत अछि।
कुकुह कानक कुडि़ऐनी। कान कुकुहाइत अछि-कुडि़आइत अछि।
टहटह घाओक वेदनविशेष। गूर टहटहाइत अछि-वेदनाविशेष करैत अछि।
महमह सुगन्धट करब। बेली फूल महमहाइत अछि-अति सुगन्धू करैत अछि। घरमे गुलाबक जल छीटल गेल अछि तेँ घर महमहाइत अछि।
लहलह 1. ज्वा लाक आन्दो लन।
2. जिह्राव्याेपार। 1. आगि लहलहाइत अछि-ज्वा लायुक्त अछि।
2. कालिकाक जीह लहलहाइत छैन्हि-सव्या पार छैन्हि।
सहसह अनेक पीलुक संचाल। एहि सड़ल आममे पिलुआ सहसहाइत वेदना करेत अछि।
चुहचुह वेदनाविशेषयोग। देह चुहचुहाइत अछि-कुचकुचाएब सदृश वेदना करैत अछि।
बि प्रभव। हमर गाए बिआएल-गर्भमोचन कएलाक।
खि घर्षणसँ क्षीण होएब। चलैत-चलैत खणम खिआएल-क्षीण भए गेल।
खे ,, ,, घास छिलैत-छिलैत खुरपी खेआएल-क्षीण भेल।
जो परिपाकक पूर्वरूपप्राप्ति। गाछमे जोआएल-परिणामक पूर्वरूपापत्र बहुत अछि।
सो पाकसँ सक्कलत होएब। रन्हँबाक काल भाँटा सोआए गेल-सक्कँत भए गेल।
औ किंकर्तव्यलता-विभूढ होएब। अहाँ एना औआइत छी किएक-किंकर्त्तव्यतमूढ किएक होइत छी?
टौ अनाथ होएब। ई नेना माइक बिना टौआइत अछि-अनाथ भेल रहैत अछि।
बौ 1. व्यािमोहसँ अनभिप्रेत मागेँ गमन।
2. ज्वा रादिमे बिना ज्ञानेँ किछु-किछु बाजब। 1. हम बौअएलहुँ-व्याामोहसँ अनभिप्रेत मार्गें चललुँ।
2. हिनका ज्वुर बड़ तेज छैन्हि, बौआइत छथि-अज्ञानमे बजैत छथि।
ही अधिक कुडि़ऐनी। हमर देह कलकलिसँ हौआइत अछि-अधिक कुडि़आइत अछि।
नकि नाक देने बाजब। केओ 2 नकिआइत अछि-नाकक सम्बदन्धेँि बजैत अछि।
छिछि इतस्तेत: गमन। हओ, तोँ रौदमे किएक छिछिआइत छह-इतस्तोत: भेल फिरैत छह।
खटि कम होएब। हमरा गाममध्य मस बड छल, आब खटिआएल-कम भेल।
ढठि नीक ढाठीपर आएब। ई नेना आब ढठिआएल-नीक ढ़ाठी पर आएल।
गडि़ आँखि दुखाएब। आँखि उठल अछि तेँ गडि़आइत अछि-दुखाइत अछि।
जडि़ दृढ़मूल होएब। ई गाछ जडि़आएल-दृढ़मूल भेल। दु:ख जडि़आएल इत्यातदि लाक्षणिक जानब।
भिँडि़ भीँ डीरूपेँ अवस्थित होएब। सुतरी भिडि़आउ-भीँड़ी रूपेँ अवस्थित करू।
कुडि़ घर्षणनिवर्तनीय होएब। देह कुडि़आइत अछि-कण्डूथसँ युक्तभ होइत अछि।
सुँढि़ सिद्धूयुन्मु ख होएब। आब काज सुँढि़आएल-सिद्धयुन्मुडख भेल।
नेढि़ वृथा इतस्तढत: गमन। ई नेना नेढि़आइत अछि-इतस्तमत: चलैत रहैत अछि।
लेढि़ लेटब। सूगर खातमे लेढि़आइत अछि-लेढ़ैत अछि।
दँति दाँत निपोडि़ देब। दँतिअएलाह-दाँत निपोडि़ देलैन्हि तेँ हम छोडि़ देलिए‍ेन्हि।
पति विश्वािस करब। हम अहाँक कथा नहि पति आएब-निश्वित नहि मानब। यद्यपि ई धातु सकर्मक थीक किन्तु बजादिवत् अकर्मकत्वकप्रयुक्तु एत्यरय अबैत अछि। महाराज बात पति अएलाह।
भोति गन्ताव्यए मार्गक त्यायग (संमोहसँ अगन्तलव्यर मार्गें चलब)। हम भोति अएलहुँ-भ्रममे पड़लहु। एकर मार्गभ्रममे मुख्यल प्रयोग।
हदि निभरोस होएब। हदिआउ नहि-निभरोस जनु होउ।
उ़धि पाकसँ ऊर्ध्व-गति। दूध उधिआइत अछि-आँच देने उपर बढ़ैत अछि।
पेनि पाछाँ-पाछाँ भेल फिरब। जयलाल पेनिआइत छथि-पाछाँ-पाछाँ भेल फिरैत छथि।
खपि खपब (क्षीण होएब)। ग्रहणमे सूर्यचन्द्रोमा खपिआइत छथि-खपैत छथि।
हफि हाफीसँ युक्त होएब। अहाँ हफिआइत छी-हाफीसँ युक्त होइत छी।
अरि अकच्छह होएब। हम अरिअएलहुँ-अकच्छाफ भेलहुँ।
फरि निर्विवाद होएब। हमरा जयसिंहसँ लेन-देन फरिआएल-साफ भेल।
छिरि विकीर्ण होएब। चाउर छिरिआएल अछि-विकीर्ण अछि।
घुरि पुनरागति। ई दु:खमे घुरिअएलाह-पुन:पुन पड़लाह।
ओरि ठीक होएब। वस्तुोसब ओरिआएल-ठीक भेल।
भसि प्रवाहमे तदनुकूल जाएब। रेतमे लोक भसिआइत अछि-भासैत अछि।
खिसि 1. क्रोध करब।
2. गञ्जन । 1. हमरापर जयलाल खिसिआएल छथि-क्रुद्ध छथि।
2. हमरा पर गुरूजी खिसिअएलाह-गञ्जन कएलैन्हि। इहो बजधातुवत् अकर्मकत्वैप्रयुक्तेव प्रत्य।य उत्प।त्र करैत अछि।
घोँसि थोड़ अवकाशमे पैसब। गीदड़ सोन्हिमे घोँ सिआएल-पैसल रहैत अछि।
ढेहि बिना हेतु इतस्तघत: गमन (निन्‍दाशब्दए)। ई नेना ढेहिआइत रहैछ-वृथा इतस्तहत: करैछ।
सन्हि सन्धिमे पैसब। साप बीहरिमे सन्हिआएल-पैसल।
बधु किंकर्तव्येवेमूढ़ होएब। अहाँकेँ की भेल अछि जे बधुआएल छी-किंकर्तव्यबविमूढ़ उदास छी ?
भकु भक (आँखिक झपनी) लागब। ई नेना भकुआएल अछि-औँघीसँ आँखिक झपनीसँ युक्तऔ अछि।
छुछु वथा इतस्तीत: जाएब। ई नेना छुछुआएल भेल फिरैछ-वृथा एमहर-ओमहर दौड़बड़हा करैत अछि।
झुझु कम देखि अपरितोष। ई भूखल अधिक छथि तेँ थारीमे थोड़ भात देखि झुझुअएलाह-अपरितोष प्राप्ति कएलैन्हि।
घटि क्रमश:देखि होएब। हुनका दिनानुदिन धन घटिजाइत छैन्हि-कम्पट होइत छैन्हि।
घटु उदास होएब। घटुआएल छी-उदास छी।
लटु लटब। नेना अतीसार रोगक कारणेँ लटुआएल लटल अछि।
बिधु मुहक दु:खचेष्टा । अहाँक मुह बिधुआएल किएक अछि-उदास किएक अछि ?
अरु सिद्धान्न क शुष्क होएब। भात बड़ी काल रान्हकल गेल, तेँ अरुआएल अछि-शुष्कलप्राय अछि।
भरु आतपजन्यअ पत्रादिक अयथावत् स्थिति। पात तीव्र रौदमे मरुआइत अछि-मूर्छित भए जाइत अछि।
मसु पाकसँ कठोरताप्राप्ति। भाँटा मसुआएल-पाकविरामप्रयुक्तम कठोरता पओलक।
कन्हुा पशुक क्रोधचेष्टा । बड़द कन्हुचआइत अछि-मारबाक पैश करैत अछि, तेँ हटिकेँ जाउ।

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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २२५ म अंक ०१ मई २०१७ (वर्ष १० मास ११३ अंक २२५)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. १. राजदेव मण्‍डल -  दूटा बीहैन क था २. रबीन्‍द्र नारायण मिश...