Wednesday, October 28, 2009

शब्द-विचार 2

छकल छिनारिके मुँहमे गारि। सारि सरहोजि वा ननदि भाउज वा समधिन आदि गरिपढ़ुआ नारीक लेल प्रयुक्ति।
छकल नारिके मुँहमे गारि। छका गेलापर क्राधमेजे जनी गारि बकय लगैत छथि तनिका लेल प्रयोग।
छकल = ठका गेल। छन
कांग्रेसी छनमे संघी। अवसरवादी व्यमक्तिक लेल प्रस्तुगत उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
छनमे छनाक। क्षण भरिक अन्ततरमे कोनो दुर्घटना भय गेलापर दृष्टातन्‍तस्वनरूप एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
छनमे रानी छनमे चेरी। समय एवं परिस्थितिक मूल्यांोकनमे एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
छनहिमे छन रंग छनहिमे तीन रंग। जनिक विचार एवं क्रिया क्षण-क्षणमे बदलैत रहैत छनि तनिका लेल एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
छबि ने छटा खेसारीक दालि बड़ खट्टा। बिना लूरि-मुँहक जे अधिक नीक निकुत तकैत अछि तकरा पर व्यं ग्य ।
छबे-छबे खेत आ कौरे-कौरे पेट। कोदारिक एक-एक छौसँ घटैत छैक, तहिना एक-एक कौर बढ़ौलासँ भोजन बढि़ जाइत छैक आ घटौलासँ घटि जाइत छैक।
कहियो ने छूटय दूध भात। नेनाकेँ छौमासवा नौमास पर दाँत भेलासँ नीक मानल जाइत छैक।
छल-छल कयलहुँ पूआ पकौलहुँ,
सेहो पूआ खाय ने पौलहुँ। कोनहु अवसर पर अधिक प्रसन्ताक नहि मनयबाक चाही, अन्य‍था रंगमे भंग भय जयबाक, सम्भारवना रहैत छैक।
छलहुँ बासुदेव भेलहुँ बसुआ। ककरहु नाममे अनादर सूचक शब्दयक प्रयोग कयला पर एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत छैक।
छलनि बहुरिया झाँपलि,
लेलनि बहुरिया खापडि़। ककरो पुतोहु जँ मद मासि निकलि जाइत छनि तँ एहि लोकोक्ति द्वारा कुचिष्टाछ कयल जाइत अछि।
छलि छोँछिया भेलि समधिन। जाहि जनीसँ कहियो नहि पटल हो से जँ निकट सम्बँन्ध मे आबि जाय तँएहि उक्तिक प्रयोग होइत अछि।
छली तीन जनी पदलनि कौन जनी ? वा छली तीन जनी कयलनि कोन जनी ? भेद जखन स्पजष्ट रहैत छैक, चोर जखन पकड़ायले रहैत छैक तँ उक्तज लोकोक्तिक प्रयोग द्वारा व्यंतग्यम कयल जाइत अछि।
छली मरतरिया भेली समधिन। कोनो बदमासि महिला जँ निकट सम्ब न्धीत बनि जाथि तँ हास्यि-विनोदमे एहि उक्तिक प्रयोग होइत अछि।
छागर गेल भनसाघर अर्र-अर्र लगले अछि। सब किछु भय गेलाक बादो जँ केओ मृगतृण्ष्णागमे बौआइत रहैत अछि तँ एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
छान बँटलहुँ हम महींस देती सोखा। केवल आशामे बहुत दूर धरि भटकैत रहलापर वा बिना विशेष उद्यम कयनहि भाग्यरक भरोसे बैसल रहनिहारपर व्यं ग्यी।
छिक्के तँ नीके। यात्राक समयमे वा कोनो शुभ समयमे जँ केओ छीकि दैत छैक तँ अशुभक आशंकाकेँ समाप्तक करबाक हेतु लोक सन्तो षार्थ एहि उक्तिक प्रयोग करैत अछि।
छीकैत काल नाक कटायल। सामान्यप समय ओ स्वकभाविक परिस्थिति मे जँ अकस्मा‍त् कोनो घटना घटि जाय।
छीटल सातु पितर के दान। अकार्यक वस्तुर सँ जखन केओ दान-पुण्यि लगैत अछि तँ एहि उक्ति द्वारा व्यं ग्यु कयल जाइत छैक।
छुच्छाैकेँ के पुच्छाा ? एहि उक्ति द्वारा कोनो जनी अपन निर्धनताक बखान करैत छथि।
छुच्छात फटकय उधियाइत जाय। जाहि सूपमे अन्नफक बदला अधिकांशत: भूसा रहैत छैक से लगले फटका एवं उधिया जाइत छैक।
छुच्छाज माय चूल्हिक छाय। जाहि माताक हाथमे किछुओ धन नहि रहैत छनि, से सन्तािनक समक्ष अपन विवशता एहि लोकोक्ति द्वारा व्यछक्तप करैत छथि।
छुछदुलार भेलनि पदनो के आ नाकमे नथिया छेरनोके। ऊपरक मोने दुलार किन्तु दान दक्षिणाक बेरमे जखन ककरो अनका देल जाइत अछि तँ आक्रोशमे कोनो जनी एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथि।
छुछुन्नकरिक माथमे चमेलीक तेल। अयोग्यन व्यरक्तिकेँ कोनो दुर्घटनामे बाँचि जाइत अछि तँ ओकर विरोधी लोकसब एहि लोकोक्तिक प्रयोग करैत अछि।
छूछ छिमाइन तीमन डढ़ाइन,
तीन बेर छौंकलमनि तैयो उढ़ाइन। बिना तेल मसालाक तरकारी वा साग स्वा दिष्टा लगैत छैक।
छूटल घोड़ भुसकुड़बहि ठाढ़। लगातार जोतायल घोड़ा वा बड़द जखन छूटैत अछि तँ सोझे नादि दिस लपकैत अछि।
छै आदमी छै काज, नइ आदमी नइ काज। जखन जेहन परिस्थिति रहैत छैक तेहन कार्य कयनिहार एहि उक्तिक प्रंयोग करैत अछि।
छै घरनी घर हँसैछै,
नै घरनी घर कनैछ। एहि लोकोक्ति द्वारा गृहणीक महत्त्व प्रतिपादित कयल जाइत अछि।
छोटकी सरिया बड़ रे पियरिया,
नित उठि पढ़य गारी जी। एहि उक्ति द्वारा सारिक प्रति अनुरागक बखान जाइत अछि।
छोट खिखिर केर मोट नांगडि़। अपन ओकाद एवं देहदशा बिना देखनहि जे अधिक उपलब्धि प्राप्तब करय चाहैछ तकरा लेल एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
छोट पूजी बनीजे खाय। कम पूँजी द्वारा व्योवसाय कयनिहाकरकेँ फँसबाक भय रहैत छनि, कारण ओहिसँ व्यबवसाय जमि नहि पबैत छनि।
छोट मुँह मोट बात। सामान्यह व्य क्ति केओ जखन पैघ व्यनक्ति पर छींटाकाशी करैत अछि तँ एहि लोकोक्ति द्वारा ओकरा डाँटल जाइत छैक।
छोड़ कतरा मोहे डूबय दे। जे व्यरक्ति कोनहु कारणसँ रूसबाक करैत अछि, किन्तुु ईहो ध्यारन रहैत छैक जे केओ बौंसय अबैत अछि कि नहि तकरा पर व्यंसग्यि।
छोड़ मसखरी मोर जी जाइअय। शोकाकुल वा अस्वीस्थ व्यूक्तिकेँ हँसी ठट्ठा नीक नहि लगैत छनि।
छोपे छापे भीत आ जोड़े-जाड़े गीत। थोड़-थोड़ कय देवाल ठाढ़ कयल जा सकैत अछि, तहिना जोडि़-जोडि़ तुकबन्दीे कय गीत तैयार कयल जा सकैत छैक।
छौंडा टहलू टटुआ घोड़,
खाय बहुत काज करय थोड़। छोट बालककेँ जँ घरेलू नौकर राखब तथा तांगाबला घोड़ा सवारीक लेल लय आनब तँ ओ दूनू भोजन अधिक मुद्रा कार्य कम करत।
छौंड़ा-नौड़ा गाम भेल सब किछु हेमान भेल। गाममे जँ नवका तूरका जूति भय जाइत छैक तँ पुरान लोक (बूढ़-पुरान) निराशा में उक्तत लोकोक्तिक प्रयोग करैत अछि।
छौंड़ा मालिक बूढ़ देबान,
मामिला बिगड़य साँझ बिहान। नवतुरिया जँ घरक मालिक भय जाय तथा देवानजी (मुंशी) जँ बूढ़ होथि तँ कोनहु कार्य सोझ डाँडि़ए नहि चलि सकैत छैक।
छौंडी छल-छल करब छौंड़ा पुछबो ने करय। कोनो युवती जखन विशेष सौंदर्य बोध करयबाक चेष्टान करैत अछि, अधिक फैशन करैत अछि तँ कोनो प्रौढ़ा नारी एहि लोकोक्ति प्रयोग करैत छथि।
छौ मास ऋतु आगाँ धाबय। कोनहु ऋतुक प्रभाव किछु दिन पुर्वहि सँ देखाइ पड़प लगैत छैक।
छौ मासके कुत्ता आ बारह बरिसके पुत्ता। मनुष्य।क बच्चारकेँ बारह भेलापर किंचित ज्ञान होइत छैक, मुदा कुकुरक बच्ची केँ छबे मासक बाद बोध भय जाइत छैक।
छौ मास जितिया पहिनहि उपास। अवसरसँ बहुत पूर्वहि केओ अपसियाँत होमय लगैत अछि तँ ओकरा पर एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत छैक।
छौ मास लागय पड़ोसियाक दण्ड । पड़ोसी जँ दुर्जन रहैत छैक तँ अत्य।धिक तबाही मचल रहैत छैक।
छौ मास लागय पड़ोसियाक धर्म। पड़ो‍सीक भाषा एवंचालि चलनक प्रभाव पड़ैत छैक।
छौ मौगी धन तँ कर चतुरपन,
सठि जयतौ धन निकलि जयतौ चतुरपन। जकरा लगमे धन रहैत छैक तकरा चतुर मानल जाइत छैक।
छौ हाथक काँकडि़ नौ हाथक बीआ। कोनो गप्पीँ व्यकक्ति पर व्यंपग्यी करबाक हेतु एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
जकर कटहर घर-घर पाट,
तकर धीया-पुता कमरी चाट। कोनहु वस्तुिक कमीनहि रहलो पर जे अत्युन्तत अभावक अभिनय करैत अछि, कंजूसी करैत अछि,धीया-पुता जकर कथू लेल बेहाल रहैत छैक, ताहि कृपण लेल एहि उक्तिक़ प्रयोग होइत अछि।

जकर चून तकर पून,
जोगी अवधूत के पाप ने पून। वा
जकर चून तकर पून,
तमाकू खयनिहार के कोन गून? चून-तमाकू खयनिहार व्यवक्ति अखन अनकासँ मंगैत छथि तँ एहि लोकोक्ति द्वारा हुनक परिहास कयल जाइत छैक।
जकर जेठकी छुलाहि तकर छोटकी भँड़े लागल खाइ। जेठकेँ नीक होयब् आवश्योक रहैत छैक, अन्येथा ओ जँ गड़बराइत अछि तँ छोटका सबटा खराप भय जाइत छैक।
जकर ढेरीमे जकरा भोग। भोज्ये पदार्थ ग्रहण करबाक लेल अकस्मासत् केओ उपस्थित भय जाइत अछि तँ एहि उक्तिक प्रयोग द्वारा भागयक सराहना कयल जाइत छैक।
जकर धन जाय तकर धरम जाय। धन चलि धर्म कर्ममे सेहो व्यसवधान उत्पलन्नम भय जाइत छैक।
जकर बनल अषढ़बारे तकर बारहो मास। आषाढ़, श्रावण मासमे जाहि कृषक केर चलती केर चलती रहैत छनि, धानक सधन खेती करबाक मे व्यतस्त, रहैत छथि, तनिका ततेक नीक उपज जाइत छनि जे सालेभरि सुखी रहैत छथि।
जकर नाम तकर चर्चा। असंगत चर्चा कयनिहार वा अनुपलब्धि वस्तु क माँग कयनिहारकेँ एहि उक्तिक प्रयोगसँ अस्वीककार कयल जाइत छैक।
जकर मोन बसय बड़ी दूर,
तकर मोन विधाता पूर। जे अपन जीवनमे पैघ लक्ष्य बनाया तदनुसार निरन्तपर प्रयत्नजशील रहैत अछि, तकरा सफलता अवश्य‍ भेटैत छैक।
जकर मौगी दँतुली तकर बड़ भाग। कोनो कम्मोँ सुन्दभरि स्त्रीहकेँ जखन अपन पतिक पर्याप्तल स्नेगह प्राप्तै होइत छैक तँ एहि उक्ति द्वारा ओकर भाग्यगक सराहना कयल जाइत अछि।
जकर लाठी तकर मर्हीस। लाठीक बलपर ककरो धन हड़पि लेनिहार पर व्यंलग्यन।
जकरा छातीमे केश नहि तकरा पर विश्वाास नहि। मानल जाइत अछि जे प्रत्ये क सहृदय व्यलक्तिकेँ छाती मे केश होइत छनि।
जकरा ने हर-बड़द सैह जोतनियॉं। बिना खर्चेक जे अपन कार्य सुतारि लेमय चाहैत छथि तनिका पर व्यंयग्यि।
जकरा खेबा नहिसे अगिले मांगि ? बिना खर्च कयनहि फोकटमे जे सबसँ पहिने अपन कार्य करा लेमय चाहैत अछि तकरा पर व्यंरग्यच।
जकरालय कनैछी तकरा आँखिमे नोरे ने। जाहि व्य क्तिक लेल हरान रही, त्यायग करी, तकरा दृष्टमे जँ कोनो मूल्य नहि हो तँ एहि लोकोक्तष द्वारा निराशा व्यहक्तल अ‍ाछि।
जकरा हम किदन करी सैह हमर समथिन। वा सकधी। कोनो मामूली व्यीक्ति, कनीय व्यलक्ति, जखन उच्च पद पर आबि अछि तथा ओकर व्यचवहार अखरि जाइत छैक तँ क्रोधमे एहि लोकोक्तिक प्रयोग करैत अछि।
जकरा हाथमे ने कौड़ी तकर बात लपौड़ी। साधनहीन व्यनक्तिक बातपर केओ विश्वाएस नहि करैत छैक।
जकरा ऊकने तकरा फूक बड़ भारी। ओकादसँ बहुत अधिक जे आडमबर करैत छथि तनिका पर व्यंजग्यत।
जकरे घूरा तापी तकरे किदन दागी। उपकार कयलाक बादो जे अपकारे करय, कृतघ्नकताक प्रदर्शन करय, तकरा लेल एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
जकरे खाइ तकरे जुगुत। आहिठाम जकर व्यजवस्थाअ रहैत ताहिठाम तकरे बुद्धि एवं योजना कार्य करैत छैक।
जकरे डरे भिन्नं भेलहुँ सैह पड़ल बखरा। वा जाही डरे भिन्ने भेलहुँ...। घाटा लगबाक आशंकासँ दोसर मार्ग पकडि़ लेलाक बादो जँ घाटा लागिए जाय, आशंका चरितार्थ भैए जाय तँ एहि लोकोक्ति प्रयोग कयल जाइत अछि।
जकरे धारी तकरे मारी? उपहार कयनिहार व्यरक्तिक जे अहित करैत अछि तकर कृतघ्नवता पर प्रयुक्तह।
जकरे बनरी सैह नचाबय। जकर हाथक जे सामान रहैत छैक तकरे हाथ पर ओकर व्यमवहार ठीक रहैत छैक।
जकरे माँड़व तकरे गीत। वा
जकरे मड़वाँ तकरे गीत आ जकरे सरकार तकरे जूति। जाहि पार्टीक सरकार रहैत छैक तकरे गुणगान होइत रहैत छैक तथा ओही पार्टीक जूति सरकारहुमे चलैत छैक।
जकरे विवाह तकरे गीत। अर्थ एवं प्रयोग समाने अछि।
जकरे माय मरय तकरे पात पर भात नहि? प्रमुख व्य क्तिक जखन उपेक्षा होइत छैक वा धोखासँ उपेक्षित रहि जाइत अछि तँ एहि लोको‍क्ति द्वारा आश्चिर्य व्योक्त जाइत छैक।
जकरे मौगी करपरदार,
तकरे मनुसा हुलुक बिलाड़। जनिक पत्नी घरक सम्पू र्ण कार्य देखैत छथिन, नौकरी सेहो करैत छथिन, तनिक पति निरर्थक एमहर ओम हर बौआइत रहैत छथि वा लाजेँ नुकायल रहैत छथि।
जकरे घूड़ तापी तकरे टांग दागी। उपकारक बदला अपकार कयनिहार पर व्यंरग्य ।
जकरा घर-आंगन नहि से बड़ हलचल। कम ओकादवाल जाखन अधिक व्य स्त।ताक अभिनय करैत अछि तँ एहि उक्ति द्वारा उपहास कयल जाइत अछि।
जकरे लय चोरि करी सैह कहय चोरा। जकरा हित लेल केओ भ्रष्टस आचरण करैत छथि सैह जँ कहियो औंठा देखा दैत छनि तँ क्रोधावेशमे ओ उक्त लोकोक्तिक प्रयोग करैत छथि।
जकरे साँय मानय सैह सोहगिन। पैघ लोकक वरदहस्तै जनिका प्राप्त रहैत छनि से भाग्यह वान कहबैत छथि।
जखन उकखडि़मे मुँह देलहुँ तँ मुसराक कोन डर ? भयावह कार्यमे हाथ लगा देलाक बाकद पाछाँ हँटब कठिन भय जाइत छैक-भय त्याँगिकय कार्य करहि पड़ैत छैक।
जखन उकखँडि़मे माथ देलहुँ तखन समाठक चोट तँ सहहि पड़त ! (दूनू लोकोक्तिक अर्थ एवं प्रयोग समाने अछि।)
जखन धाने के पान मोर सैयाँ के कियैक ने पान ! सहज प्राप्तन होमयवला वस्तुकक उपयोग कियैक ने कयल जाय ? एहि लोकाक्तिक प्रयोग द्वारा आत्मरतुष्टिक बोध कयल जाइत अछि।
जखन पेटमे पड़लनि जुड़ाइ तखन कयलनि नहिराक बड़ाइ। खा पीबिकय जखन केओ प्रसन्नखताक अनुभव करैत बड़ाइ करय लगैत छथि तँ एहि लोकोक्ति द्वारा परिहास कयल जाइत छनि।
जखन भेल अपन बेटी,
तखन बिसरलहुँ बापक बेटी। रक्तब सम्बबन्ध क कमाल ई छैक जे बहितहनिक समक्ष पीसी दूर पडि़ जाइत छथि, बेटी भय गेलापर बहिन सेहो दूर पडि़ जाइत छथि, किन्तुल पौत्री भय गेलाक बाद बेटी सेहो दूर पड़य लगैत अछि।
जखन पेटमे पड़ल खुद्दी तखन सूझय लागल बुद्धी। भूखलकेँ सब बुद्धि हेरायल रहैत छैक।
जखन रोम धधकैत छलैक तखन नीरो वंशी बजबैत छल। कोनो अकर्मण्य। शासकक आलोचना करबाक लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
जखनहि सुनलक सासुरक नाम,
बूलि आयलि सौंसे गाम। कोनो चंचला बालिकाक लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
जखने उतरलहुँ गंगा पार,
दुखक मोटरिया चढ़ल कपार। मिथिलाक लोक गंगाक ओहिपार (दक्षिण) केँ परदेस तथा एहि (उत्तर) केँ स्वबदेश कहैत्‍ रहलाह अछि।
जखने कहलेँ काकाहौ तखने बुझलियौ जे हँसुआ हेरौले। जकरापर जे आशंका रहैत छैक से तकर प्रथमहि शब्दोकच्चाेरसँ पता चलि छैक आ आशंका प्रमाणित भय जाइत छैक।
जजमान स्वमर्गमे जाथि वा नस्कसमे, हमरा तँ दान दक्षिणासँ काज। कोनो स्वाार्थी व्यिक्तिपर व्यंकग्यक करबाक हेतु एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
जतेक के बोहु ने ततेक के लहठी। मूलसँ अधिक जखन आने वस्तुी भय जाइत छैक वा पूजीसँ अधिक खर्चे भय जाइत छैक तँ एहि लोकोक्ति द्वारा निराशा व्य क्त‍ कयल जाइत छैक।
जतेक पोन पर हाथ चलैत छैक ततेक तबला पर नहि। अनका सिखायब आसान पड़ैत छैक, किन्तु् स्वायं जखन करय पड़ैत छैक तखन पता चलैत छैक।
जतेक मुँह ततेक बात। कोनहु घटनापर जखन अनेक प्रकारक बात उठैत छैक तँ लोक एहि उक्तिक प्रयोग करैत अछि।
जतय जतय महीसक चोत,
ततय ततय हमर जोत। बलजोरी दोसराक अधिकारकेँ हड़पि लेनिहार लण्ठक व्यडक्तिक लेल प्रयोग कयल जाइत अछि।
जतेक गूड़ ततेक मधुर। नीक कार्य अधिको कयल जा सकैत अछि।
जतियासँ पतिया भारी। सामाजिक दण्डाक भय सबकेँ होइत छैक।
जनमल पूत जाड़े मरय,
पेटक लेल ओंझाइ। जे मूल्य वान वस्तुस हाथमे अछि तकर चिन्ते् नहि, किन्तुम भविष्यतक गर्भमे जे अछि तकरा लेल बेहाल रहनिहार पर व्यंतग्यल।
जन्मतक दुखिया कर्मक हीन,
ताको राम पढ़ौनी दीन। कोनहु मठक जखन अधिक संकटमे पडि़ छथि तँ एहि लोकोक्तिक प्रयोग करैत छथि।
जन्मतक दुखिया नाम सदासुख। नामक विपरीत जखन परिस्थिति रहैत‍ छैक।
जन्म देत माय-बाप कर्म हैत अपने। भाग्यव-कर्मक महत्त्व पर बल।
जन्मावहु लेबह कि बरखाहु? कोनहु रोग-व्याहधि वा समस्याप जखन बहुत दिन धरि रहि जाइत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग द्वारा अपन कष्टँक बखान कयल जाइत अछि।
जनमैत बाउ गोर नहि हेताह तॅा कि उबटन लगौलासँ गोर हेताह ? जखन कोनो कारी व्यहक्ति क्रीम पाउडर लगाय गोर बदबाक चेष्टाह करैत अछि तँ एहि उक्ति द्वारा उपहास कयल जाइत छैक।
जनिकर भूजा नहि तनिकर फँक्काज बड़। जे स्वभयं खर्च नहि करैत अछि से अनकर कयल पर वेश छहर-महर करय चाहैत्‍ अछि।
जनिह मीयाँ धूनैक बेरिया। जीवन भरि जे पाप-पुण्यर, नीक-बेजायमे लागम रहैत अछि, परलोकक चिन्ता् नहि करैत अछि, तकरा निराशा हाथ लगैत छैक।
जबर्दस्त क लाठी माझ कपार। मूर्ख मोचण्ड‍ केवल बल प्रयोग बुझैत अछि, ताहूमे जँ सरोँ खेलाइत अछि तखन तॅँ घीवहुसँ चिक्कँन।
जब्बुर मारय तँ कानहु ने देअय। अपराधी वा अधिक बलवानसँ जखन भिड़न्तव होइत छैक तँ हल्लाय करबाक समय सेहो नहि दैत छैक।
जमाय रूसल घर भरल,
बेटा रूसल घर खसल। जमाय रूसि रहताह तँ खर्चा बाँचत, किन्तुम बेटा जँ रूसि रहत तखनतँ घरक कार्ये ठप पडि़ जायत, विकासे रूकि जायत।
जय जगदम्बास जय जगदीस,
जे देलक पाँच टका तकरे दीस। कोनो अवसरवादी दरबारी व्यसक्तिक लेल एहि पदक प्रयोग होइत अछि।
जरल घोड़ा के जरले लगाम। कोनहु व्यलक्तिक दुष्कृकत्यु पर ओकर आलोचना करबाक हेतु एहि उक्तिक प्रयोग होइत अछि।
जरलावनमे छाउरक अकाल ? जाहि वस्तुाक आधिक्यि रहैत छैक तकर कृत्रिम अकाल अभाव पर एहि लोकोक्तिक प्रयोग होइत अछि।
जलमे मलाह, बाधमे गुआर आ नैहरमे नारी। उक्त। तीनू जब्बमर होइत अछि।
ज्वतर उतरब तँ नीक मुदा ज्वहर टूअब नहिनीक। बोखार अधिक नीचाँ आबि जायब खतरनाक होइत छैक, कारण ओहिसँ शरीर अधिक ठण्ढाछ भय गेलाक कारण मृत्यु भय जा सकैत अछि।
जक्क संग घूनो पिसा जाइत छैक। संगतिमे आबि निरपराधो व्यिक्ति दण्डित भय जाइत अछि, तंग तबाह भय जाइत अछि।
जस जनावर तस गड़गड़ी। जे जेहन पैघ रहैत छथि तनिकर तेहने खान-पान, रहन-सहन आदि रहैत छनि।
जहाँ सूई ने समाय तहाँ फार घोँसिआय। अधिक भीड़ रहितहुँ जे धोसिआयल अबैत अछि तेहन बिना अवकाशक अवकाश धरौनिहार पर व्यंकग्यानर्थ एहि उक्तिक प्रयोग होइत अछि।
जहाँ नहि पहुँचथि रवि तहाँ पहुँचथि कवि, जहाँ नहि पहुँ‍चथि कवि तहाँ पहुँथि आलोचक। जतय सूर्य नहि पहुँचि सकैत छथि ततहु कविक काव्यन पहुँचि जाइत अछि, किन्तुह समालोचकक स्था न ताहूसँ ऊपर अछि।
जहाँ बुझी ने बड़ाइ,
तहाँसँ भागि चली रे भाइ। जाहिठाम सम्मालन नहि भेटय ताहिठाम कथमपि नहि अयबाक चाही।
जहाँ मुर्गा नहि तहाँ प्रात नहि ? ककरहु बिना कोनो कार्य रुकल नहि रहैत छैक।
जहीँ धर तहीँ घर। जतहि डेरा खसादी सैह घर भेल।
जाइत छी पटना जोड़ा एक जाँत। जे अनका असुविधा नहि बुझैत छथि तनिका लेल प्रयोग होइत अछि।
जागल पुरुषक विनाश नहि होइत छैक। जे निश्चिन्तवसँ सूतल रहैत अछि तकरे घरमे चोरि होइत छैक।
जानथि ठाँढ़ोक मन्त्र नहि,
देथि दराधेक माथा हाथ। अपन ओकाद बिना देखनहि जे पैघ लोकसँ अरारि बेसाहय चाहैत अछि तकरा लेल एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
जाबत बाबू फाँड़ बन्ह ताह ता गामे नीलाम। कोनहु कार्यमे अतिशय विलम्बा कयनिहारक लेल एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
जाउते बसी सतौते उजड़ी। विमाता-सतौतक सम्बयन्धन नीक नहि मानल गेलैक अछि।
जाइछी पटना शहर, लेने माथपर मोहर, एना कियै चलैछी तँ जवानीके टर। निर्धनकेँ जखन धन भय जाइत छैक तँ और बजार अधिक घूमय लगैत अछि तथा घमण्डन सेहो भय जाइत छैक।
जाइत गेलहुँ अबैत होइअय लाज। रूसनिहारकेँ पुन:अपनिह मोनसँ घुरिक’ अयबामे संकोच होइत छनि तथा स्वामभिमान नहि घूरय दैत रहैत छनि।
जा ओझा पातरि लगौता ता ओझाइन फूकि सेरौती। कोनहु शुभ कार्यमे विलम्बा भेलापर एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
जाड़मे रूइये कि दुइये। अतिशय ठण्ढीु मे सरिक ओढ़य पड़ैत छैक।
जातिओ गमौलहुँ स्वाइदो ने पौलहुँ। किछु प्राप्तँ करबाक लेल अपन स्त र नीचाँ उतारियो लेलापर, सिद्धांतसँ कनेक्शन च्युनत भैयो गेलापर जँ प्राप्तक नहि भय सकय वा कम प्राप्तँ होअय तँ एहि लोकोक्ति द्वारा पश्चारत्ताप कयल जाइत अछि।
जाति स्व‍भाव ने छूटय,
कूकुर टांग उठाकय मूतय। जकर जे स्व भाव रहैत छैक से छूटैत नहि छैक।
जाधरि साँस ताधरि आस। जाधरि शरीमे प्राण अछि ताधरि आशा नहि त्यािगबाक चाही।
जाधरि पढ़बह रूद्र ता हम खयबह शुद्ध। अपन शक्तिक प्रदर्शन कयनिहार प्रतिद्वंद्वी पर एहि उक्ति द्वारा धौंस जमबैत छथि।
जान चलय नहि केराक भार। केराक भार अधिक भरिगर होइत अछि, तेँ मजगूते भरिया ओकरा उठबैत छल।
जानल चोर सेन्हक मारय। जकरा घरक भेद बूझल रहैत सैह चोरि अछि वा करबैत अछि।
जानी ने सुनी मौसी-मौसी करी। अपनहि मोने जे बिना सम्बीन्ध ठाढ़ कय लैत अछि तथा स्वानर्थ साधनमे लागि जाइत अछि तकरा लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
जाबत करब बाबू-बाबू ,
ताबत कय लेब अपन काबू। अपन कर्मठता पर विश्वाास करैत जे कम समय बर्बाद करय चाहैत अछि, अनका भरोसे नहि रहय चाहैत अछि से एहि लोकोक्तिक प्रयोग करैत अछि।
जाबत छलनि लाल नूआ ता छली कनियाँ, फाटि गेलनि लाल नूआ, भय गेली पुरनियाँ। अधिक आयु भैयो गेलापर जे श्रृंगार प्रसाधनमे कमी नहि करैत छथि, तनिका धन घटि गेलापर एहि उक्ति द्वारा कयल जाइत छनि।
जानी ढाँढ़ौक मन्त्र नहि,
दी दराधेक माथा हाथ। जनिका स्व यं किछु नहि अबैत छनि से जखन कोनो विद्वानकेँ नीवा देखयबाक चेष्टाे करैत छथि तनिका एहि लोकोक्ति द्वारा डाँटल जाइत छनि।
जाबत पुण्य धाबह-धाबह,
ताबत पाप गाँति मारह। जे अधिक पाप कयने रहैत छथि से जँ किंचित किपि पुण्योसक कार्य कय लैत छथि, तथापि पहिने पापे खेहारैत छनि; एहि प्रकारक मान्याता रहल अछि।
जाबत भगता औताह ता गोहरिये पार। वा जाबत सोखाक भाव हेतनि कारनीक ठाँठे बैसि जेतनि। कोनो कार्य करबामे केओ जँ अतिशय विलम्बाकरय चाहैत छथि, तँ एहि लोकोक्तिक प्रयोग द्वारा आक्रोश व्याक्तो कयल जाइत अछि।
जाबत सोखाक भाव हैत ता पूतक आँखिए बैसि जायत। अर्थ एवं प्रयोग पूर्ववत।
जाय जान रहय ईमान। मनुष्यन मरि जाइत अछि, किन्तु् ओकर सच्च्रित्रताक चर्चा रहि जाइत छैक।
जायब नेपाल कपार जायत संगहि। स्था न परिवर्तनक बादो जखन दुर्भाग्‍य संग नहि छोड़ैत छैक तँ एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
जाय लाख रहय साख। धन भलेँ चलि जाइत छैक, किन्तु व्योक्तिक प्रतिष्ठाल कायम रहि जाइत छैक।
जाड़ल बाभन तेज सनान,
जाड़लि मानिनि तेजय मान। अतिशय शीतलहरिक कारण ब्राह्मण त्याछगि दैत छथि तथा मानिगी नायिका (रूसलि नारी) अपन पतिक समक्ष मान त्याकगि दैत छथि।
जाल जतेक माछ देखैत अछि, ओतेक माछ जँ मलाह देखि लिअय तँ छाती फाटिकय मरि जाय। कखनोकाल सत्याकेँ नुकबय पड़ैत छैक अन्यकथा अनर्थक सम्भाबवना रहैत छैक।
जाहिठाम आकाश फाटि जाय ताहिठाम दर्जी कतेक सीबत ? अनन्त समस्याठकेँ देखि तकर निदानक एकहुटा रास्ता नहि देखि एकर प्रयोग कयल जाइत अछि।
जाहि गाममे मुर्गी नहि ताहि गाममे पराते नहि। ककरहु बिना कोनो कार्य पड़ल रहैल छैक।
जाहि लय कनलहुँ सेहो ने भेल,
एतेक नोर बेकारे गेल। कोनो व्य क्ति जखन कोनहु कार्यक लेल अपसियाँत रहैत छथि, किन्तु सब प्रयास व्यिर्थ भय जाइत छनि तँ चौल करबाक लेल केओ एहि उक्तिक प्रयोग कय दैत छनि ।
जाही पातमे खाइ ता‍हीमे छेद करी। कृतघ्ना व्यकक्तिपर व्यं।ग्य करबाक हेतु एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
जितलाहाक आगाँ हा‍रलाहाक पाछाँ अवसरवादी जाइत अछि। अवसरवादी पर क्रोध प्रदर्शन।
जितिया पाबनि बड़ भारी,
धिया-पुताके ठोकि सुतौलनि-
अपने लेलनि भरि थारी। जीमूत वाहन व्रत पैघ व्रत होइत अछि।
जीबी तँ की की ने देखी,
ताड़क गाद तरेगन देखी। कोनहु अति आश्चनर्यजनक घटना पर एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
जीबैछी ने मरैछी हुकुर-हुकुर करैछी। अपन दयनीय स्थितिक परिचय हेतु एहि लोकोक्तिक प्रयोग लोक करैत अछि।
जीबौ पुत्ता जनि दिअय भत्ता। आर्थिक सहयोग कयनिहार बेटा-भातिजकेँ आशीर्वाद देबाक हेतु एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
जीर सन छलहुँ जमाइन सन भेलहुँ,
सासुर गेने गिरथाइन सन भेलहुँ। कोनहु युवती सासुर बसलाक बाद जखन अधिक मोटा जाइत छथि तथा बजन्ताख भय जाइत छथि तँ व्यंथग्यख करबाक हेतु सखी लोकनि वा भाउज लोकनि एहि एक्तिक प्रयोग करैत अथिन।
जीवनमे लोक एकहिबेर संघक स्वनयंसेवक बनैत अछि। कोनहु संकल्पवकेँ आजन्म पालन करबाक चाही।
जूड़नि भाँङ ने ताकथ ताड़ी। ओकादसँ अधिक आडम्बवर कयनिहार लेल प्रयुक्तध।
जूड़य लाइने खाइ मिठाइ। एहू लोकोक्तिक ओहने भावना अछि।
जूड, रूचब, पचब ई तीनू ककरो-ककरो होइत छैक। जकरा जूड़ैत छैक तकरा पचैत नहि छैक वा रुचिते नहि छैक।
जूड़य गमछा नहि पहिरी धोती। ओकादसँ अधिक आडम्बिर कयनिहार लेल प्रयुक्तध।
जूड़य तँ ठाँव दऽ कऽ पाबी नहि तँ पबितो जाइ पड़यलो जाइ। मिथिलाक जनसामान्यज लोकोक्तिक प्रयोगमे अश्लीाल शब्द‍क प्रयोग सेहो निर्विकार भावसँ करैत रहैत अछि।
जूड़य भाँग ने खाइ बतासा। ओकादसँ अधिक इच्छा कयनिहार पर व्यंसग्य ।
जूड़ा बन्हौ ने तँ नीक लगैअय,
गामक लोक मुदा थूक धरैअय। कोनो विधवा वा अधिक प्रौढ़ा नारीकेँ श्रृंगार प्रसाधन कयने देखि वा ओकादसँ बहुत अधिक आडरमब्र देखि अन्यत नारी एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथि।
जे कहय बैसू तकरे घरमे पैसू। वा
तकरे कथीदनमे पैसू। उपकारक बदला अपकार कयनिहार वा अपकारक प्रयत्नक दिस बढ़निहार व्यृक्त्कि लेल प्रयुक्त्।
जे करब पूता-पूता से करब अपने बूता। अनका भरोसे अधिक समय गमायब सँ नीक जे स्वंअय प्रयत्नँ करी।
जे केओ नहि कीनय से राजा कीनय। पैघ लोकक खुशामदमे कोनो दरबारी द्वारा प्रयुक्त ।
जेजजे अषाढ़मे पाहुन से अगहनोमे पाहुन। पावस ऋतुमे धानक खेती नहि करैत छथि, केवल पहुनाइ करैत रहैत छथि, तनिका अगहनहुमे अन्नरक अभावे रहैत छनि।
जे चाटी जाँघपर चलैत छैक से तबलापर नहि चलैत छैक। सिद्धा्रत एवं व्यैवहारमे बड़ अन्तार भय जाइत छैक।
जे गरजय से बरिसय नहि। गर्जन करयवला मेघ कमे बरिसैत छैक।
जे जीबय से खेलय फागु। फगुआमे अधिक उत्सााह देखयबाक लेल वा ककरहु जीवन्तउताक समर्थनमे एहि लोकोक्तिक प्रयोग होइछ।
जेठ भेल छोट वैशाख भेल उप्पमर। वा
जेठ भेल छोट अषाढ़ भेल ऊपर। जकरा जेठ हेबाक चाही से छोट तथा जकरा छोट हेबाक चाही से जखन जेठ सम्ब न्धामे आबि जाइत अछि। तहिना छोटका जखन जेठका पर धौंस जमबय लगैत अछि तँ एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
जेठि बिआहलेँ सब होय सारि। जे सभक जेठ रहैत छथि तनिका सभक आदर प्राप्तर होइत छनि।
जे खाय गाय केर गोश्तत से की हैत हिन्दू के दोश्तो ? मुसलमानी शासन कालहिसँ हिन्दू‍ समाजमे ओकरा प्रति घृणााभाव रहलैक अछि।
जे घरेड़ करय से बिना सेन्हअ मारने नहि छोड़य। मोहल्लायमे चोर जखन चोरिक बारम्बाेर प्रयत्नय करैत अछि तँ एहि उक्तिक प्रयोग द्वारा चिन्ताा व्य क्त् कयल जाइत अछि।
जे देखलक से बाजत नहि,
जे बाजत से देखलक नहि। कोनहु विषयकेँ गुप्ति रखबाक हेतु हँसीमे एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
जे देब आनके से देब अपन परानके। कोनो कंजूसएवं अदत्त व्यपक्ति पर व्यंमग्यि।
जे धय नेंगड़ाबयसे पाँकालागल नहि छोड़य। शिकारी अपन हाथमे आयल शिकारकेँ नहि छोड़ैत अछि।
जे देखबामे नहि से चिखबामे। जे प्रथमहि दृष्ट्याि अभद्र लगैत अछि से स्वा्दिष्टि की लागत?
जे दुख देलनि राम से के मेटल आन ? भागयक दोष कष्टाकेँ अंगीकार करबाक हेतु प्रयोग कयल जाइछ।
जे ने करय खेत तकर ने भरय पेट। कृषि कार्यमे अधिक मोन लगयबाक हेतु एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
जे ने देखलहुँबापक राज से देखैछी खामीक राज। कोनो कर्तव्यँ कयने रहब तेहने फलो प्राप्त होयत।
जेठक दुपहरिया पूसक राति,
भादवक अन्हिरिया अभागल बहराथि। जेठ मासक दुप्पपहर दिनक भयंकर रौदमे, पूस मासक भयंकर ठण्ढीपक रातिमे तथा भादव मासक अन्ह रिया रातिमे कोनो भाग्यमहीनहिकेँ घरसँ बाहर निकलय पड़ैत छनि, कारण ओ कष्टबकर होइत छैक।
जे ने हैत आनसँ से हैत भगवानसँ। भगवद् भक्तिमे मोन लगयबाक हेतु प्रयुक्तर।
जे पयजामा सियबैत अछि से लग्घी करबाक जोगाड़ कय लैत अछि। कोनो समस्या़ ठाढ़ करबसँ पूर्व ओकर समाधान सोचि लेल जाइति छैक।
जे पण्डितक पतड़ा से पण्डिताइनिक अँचरा। पण्डि जे पोथी बाँचिकय कमा सकैत छथि से पण्डिताइन मांगिएकय ओतबा धन आनि सकैत छथि।
जेठ बेटा बापके, छोट बेटा मायके आ मझिला बेटा चूल्हािके। कोनहु प्रकारक पक्षापत देखि माझिल पुत्र वा पुत्री एहि प्रकारक उक्तिक प्रयोग कय आक्रोश व्यएक्तक करैत छथि।
जे गाछ पर चढ़ैत अछि सैह खसितो अछि। भरिगर कार्यमे कनेक असफल भेलापर प्रोत्सारहनमे लोक एहि उक्तिक प्रयोग करैत अछि।
जे जेहन करैअय से तेहन पबैअय। कोनो विरोधी व्येक्तिकेँ जखन कोनहु प्रकारक संकट देखैत छैक तँ लोक एहन वाकयक प्रयोग द्वारा आत्मँतुष्टो करैत अछि।
जे जेहन रोपैत अछि तेहन कटैत अछि। अर्थ एवं प्रयोग पूर्ववते छैक।
जे देत नहि सोन से देत खेतक कोन। स्वदर्णाभूषणसँ किछु झरैत नहि छैक, किन्तुह खेतीसँ पर्याप्तण अन्नर उपजैत छैक आ आर्थिक प्रगति होइत छैक।
जे ने करय बाबू-भैया से करय रुपैया। टाकासँ बहुत किछु भय सकैत छैक, तँककरो खुखामदसँ नीक जे अपन कर्मठताक बल पर टाका अर्जन करी।
जे ने करय लकीर से करय फकीर। साधु सन्त क समक्ष शास्त्र -पुरण व्यखर्थ थीक।
जे ने करय माइ से करय भादवक राइ। छोट नेनाक लेल मायक दूध सर्वोत्तम आहार मानल गेल छैक।
जे ने होय त्रिलोकसँ से होय सन्तो षसँ। सन्तो षकेँ सर्वोपरि धन मानल गेल अछि।
जे प्रतिपालहि सोइ नरेशू। जनिका द्वारा गुजर चलय सैह राजा भेलाह।
जे पूत परेदश गेल,
देव पितर दूनूसँ गेल। जे व्यतक्ति गाम-घरमे रहैत छथि तनिका मिथिलाक परम्पकरानुसार सब पाबनि-तिहार करय पड़ैत छनि, किन्तुब जे आन भू-भागमे रहैत छथि (खासकय महानगर सब मे) से ओतेक विधिव्य(वहार नहि कय पबैत छथिने पूजापाठ ने कृया कर्म।
जे नूनू से गर्भहि नूनू। होनहारक, लक्षण बाल्ययकालहिसँ देखाइ पड़य लगैल छैक।
जे बड़ काबिल से तीनठाम मखैत अछि। एक बुधियारीक दाबी रखनिहार व्यछक्ति रातिमे विष्ठाद माखि गेल।
जे बड़ अधलाहि से बड़की दाइ। जाहिठाम श्रेष्ठे लोकमे दोष रहैत अर्थात् अयोग्यम व्यबक्तिकेँ जखन पैघ कुर्सी दय देल जाइत तकरा लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
जे बड़ पढ़ुआ से बड़ भगुआ। अधिक पढ़ल लिखल लोक गाम पर नहि रहि जीविकोपार्जन हेतु प्रवास पर चलि जाइत छथि।
जे बढ़य नहि से बुढ़ाय नहि ? भुट्ट लोकक हेतुएहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
जे मेघ गरजय से बरिसय नहि। अधिक कालधरि गर्जन-तर्जन कयनिहार मेघ कम्मेरकाल बरिसैत अछि।
जेमहर गाछ ने बिरीछ तेमहर अड़ेर महावृक्ष। जाहिठाम श्रेष्ठर लोक नहि रहैत छथि, ताहिठाम कनेको नीक व्यमक्ति पूजित भय जाइत अछि।
जेमहर देखी खीर तेमहर बैसी फीर। अवसरवादी व्यीक्ति लेल एहि लोकोक्तिक प्रयोग होइत अछि।
जे बिअइली से ललइली,
बेटा लय पड़ोसिन जुड़ैली। ककरहु बेटा जखन अनकर पक्ष लय उठैत छैक, तँ उक्तष माय एहि लोकोक्तिक द्वारा आक्रोश व्य क्तक करैछ।
जे बोलय से केबाड़ खोलय। साहस करबाक हेतु ललकारा देनिहार एहि उक्तिक प्रयोग करैत अछि।
जे बाजी से करी नहि जे करी से बाजी नहि। द्वयार्थक प्रयोग।
जे मौगी साँइक नहि से गोसाँइक की ? दुश्चगरित्रा जखन पूजा पाठ अधिक करय लगैत अछि तँ व्यं्ग्याार्थ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
जेम्हारे चाँद तेम्हगरे सलाम। कोनो अवसरवादी मुसलमान पद दोसर मुसलमान एहि उति द्वारा व्यंसग्यल करैत छथि।
जे सब देवताक दौड़ा दौड़ी से गणेशजीक घुसकुनियाँ । वा महादेवक घुसकुनियाँ। कोनो सामर्थ्यनवान व्येक्तिक खुशामद मे वा अपन आत्मरप्रशंसामे एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
जे भोज नहि खयलहुँ ताहिमे पाड़ा मरओ। कोनो भोज हाथ नहि लगलापर लोभी व्योक्ति आक्रोशमे लोकोक्तिक प्रयोग करैत अछि।
जे रोगीके भाबय से बैदा फरमाबय। इच्छागनूकूल जखन परिस्थितिक निर्माण भय जाइत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
जेहन ऊकने तेहन फूक बड़ भारी। जे कोनहु जोगरक नहि छथि से जखन अधिक धौंस जमबैत छथि तँ एहि उक्ति द्वारा हुनकापर व्यं ग्य् कयल जाइत छनि।
जेहन छौक्‍ ने गे छौंड़ी तेहन छजै छौ बड़य। कोनो युवती जखन अधिक सौंदर्य प्रदर्शन एवं जमौड़ा करय लगैत अछि।
जेहन तेजने छुटछुटाहे बड़। बात बातमे फुट-फुट कयनिहार क्रोधी व्य क्ति पर व्यंयग्यी।
जेहन देवता तेहन पूजा। जेहन व्यतक्ति प्रस्तुात रहैत छथि तदनुकूले हुनक स्वानगत होइत छनि।
जेहन देश तेहन भेष। जाहि क्षेत्रमे लोक रहैत अदि तकरा ताही क्षेत्रक भेषभूषा धारण करय पड़ैत छैक।
जेहन कवि नहि तेहन आनि बड़। योग्यकतासँ अधिक जे स्वातभिमान एवं फोकसबाजी देखबैत अछि, तनिका लेल उक्तब लोकोक्तिक प्रयोग होइछ।
जेहन गाँव तेहन राव। जाहि गामक जेहने लोक रहैत अछि तेहने ओकर प्रधानो होइत छैक।
जेहन देखबामे ने नीक तेहन छिडि़याहे बड़। योग्यदता एवं क्षमताक अभाव रहितहुँ जे बारम्बाखर रूसैत अछि, तकरा लेल उक्तो लोकोक्तिक प्रयोग होइत अछि।
जेहन देखी गामक रीति,
तेहन उठावी अपन भीत। जाहिठाम जेहन परिस्थिति रहय तदनुकूले कार्य करबाक चाही।
जेहने आंगन तेहने भरनी। ककरहु घर-आंगनक खिधांस करबाक हेतु प्रयुक्तग।
जेहने करनी तेहने भरनी। क्रियाक अनुकूले परिणाम होइत छैक।
जेहने दुलहा तेहने वरियाती। वर-वीरयातीक तुलना महादेवक वरियातीसँ करबाक हेतु वा उपाहास करबाक हेतु प्रयोग होइछ।
जेहन नैहर तेहन सासुर नहि भेल,
जेहन सकल सुख तेहन वर नहि भेल। नीक कन्यासक जखन अनमेल विवाह भय जाइत छैक वा कोनो अनमेल कार्यक कुपरिणामक आश्रका रहैत छैक तँ लोक सहानुभूतिमे एहि उक्तिक प्रयोग करैछ।
जेहन विरह हो तेहन सिनेह। पर्याप्तो कष्टयक बाद जखन सुख प्राप्तू होइत छैक तँ अधिक प्रसन्न्ता होइत छैक, अधिक सुखानुभूति होइत छैक।
जेहने भनसा तेहने फल,
जेहने अंगना तेहने घर। जे जनी अपन घर-आंगन एवं भानस-भातकेँ पवित्र नहि रखैत छथि, घिनायत रहैत छनि, तनिक आलोचनार्थ उक्तत लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
जेहने मीयाँ तेहने खोर,
टूनू मिलनि जोराम जोर। जे जेहन बलशाली रहैत अछि तकरा तेहन भरिगर काय्र देल जाइत छैक।
जेहने मौगी आप छि‍नरिया,
तेहने लगाबय कुल बेबहरिया। कोनहु नारीक नवीन क्रिया-कलाप एवं व्यहवहार पर व्यंरग्यए।
जेहने सुबाइ बोहु तेहन सुलोचना। दूटा समान रूपक झगड़ाउ नारीक लेल प्रयुक्तन।
जेहने सुलाइ राम तेहने सुलोकचना,
वैह नूआ फेर फार वैह मुँह पोछना। पति-पत्नीै जखन अपचेष्टां रहैत अछि, साफ-सुथरा चेष्टान नहि करैत अछि, तँ उक्त लोकोक्ति द्वारा आलोचना कयल जाइत छैक।
जेहने खोजलह हो कुटुम,
तेहने मिललह हो कुटुम। दू समान दोषयुक्तु व्य क्तिमे जखन मित्रता वा सम्ब न्ध‍ भय जाइत छैक तँ उक्ति लोकोक्तिक प्रयोग होइछ।
जेहने तानी तेहने भरनी। दू दोषयुक्तत कार्यक आलोचना।
जेहने खीराक चोर तेहने हीराक चोर। नमहर चोर अपन क्रियाकेँ जायज प्रमाणित करबाक हेतु उक्तक लोकोक्ति प्रयोग करैत अछि।
जेहने गोनू पनखौक तेहने गोनूक पनबसना। कोनहु व्यूक्तिक कृपणतायुक्तक आडम्बरर पर व्यंुग्यक।
जेहने तेलकूड़ लगौने, तेहने मुँह झरकौने। असुन्द।रता वा अभद्रता पर व्यंनग्यक।
जाहि गाछनाथ तेहने साँपनाथ। दू भिन्नन प्रकारक दुष्टवमे ककरा नीक कहब से कठिन।
जेहने बाड़ीक ओल, तेहने चुगिलाक बोहु भकोल। कोनो दुर्जन तथा चुगिलखोर व्यतक्तिक लेल प्रयोग कय ओकर आलोचना कयल जाइत अछि।
जेहने माय तेहने धीया,
जेहने काँकडि़ तेहने बीया। माय-बेटीक दुर्जनताक बखान एहि लोकोक्ति द्वारा कयल जाइत अछि।
जेहन नैहर छल तेहन सासुर नहि,
जेहन सकल सुख तेहन गहना नहि,
जेहन अपने छलहुँ तेहन पहुना नहि। कोनहु जनी अपन एवं नैहरक गुणगान एवं मिथ्याज-बड़प्प न एहि उक्ति द्वारा करैत छथि।
जेहने बेटा रानीके तेहने बेटा कनहीके। प्रत्येेक मायकेँ अपन सन्ताीन प्रिय होइत छैक, भलेँ ओ अतिनिर्धन वा असुन्दनहे कियैक ने हो।
जेहने हरिगुन गौने तेहने बीन बजौने। भक्तिक मार्ग अनेक छैक, जैह नीक लागयसैह पकडि़ लेल जा सकैछ।
जे हमर कोलाकोलीसे तोहर सुरंग। अपन धनकेँ कम अनकर धनकेँ अधिक प्रमाणित करबाक हेतु एहि उक्तिक प्रयोग होइत अछि।
जे हर जहिना बहय तकरा तहिना जोती। परिस्थितिक अनुकूल कार्य करबाक चाही।
जे होबक रहैछै से भय कऽ रहै छै। भावी बलवान होइत अछि। कोनहु दुर्घटना पर एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
जैसन तोर देवा तैसन मोर चरबाही। अहाँ बलवान होइत अछि।
जैह कहाउतक साड़ी पहिरैत अछि आ माछ दही खाइत अछि, तकरे सासुरो जाय पड़ैत छैक। सुखक उपरान्तक दुख होइते छैक।
जैह गूड़ खाइत अछि तकरे कानो छेदबय पड़ैत छैक। एकरहु अभिप्राय समाने अछि।
जैह टिअही सैह नीलकंठ ? टिटही एवं नीलकण्ठकक दूनूक महत्त्वएक समान कोना भय सकैत छैक ? टिटहीक ध्वननि कर्कश होइत छैक, किन्तुे नीलकण्ठनक ध्वहनि अप्रिय नहि, अपितु ओहिमे शिवाक बास जानि यात्रामे दर्शन शुभ मानल जाइत अछि।
जैह नूनूकाका सैह लालकाकी ? एहू लोकोक्तिक अर्थ एवं प्रयोग समाने अछि।
जैह दिअय पाकल आम तकरे नाम हराइ मिसर। जकरासँ विशेष लाभ होइत छैक तकरे लोक गुणगान करैत रहैत अछि।
जैह राजा भोज सैह भोजबा तेली ? कोनहु साधारण व्य क्तिक तुलना महत्त्वपूर्ण व्यहक्तिसँ नहि कयल जा सकैत अछि।
जैह भाव गूआ माला सैह भाव उतरी ? उक्तेा लोकोक्ति जकाँ एकरो प्रयोग होइछ।
जोग करैतेँ रतौन्हीो आब। महत्त्वपूर्ण कार्य करबामे अत्यकधिक कष्ट। होइत छैक।
जोगना जोगय भोगना भोगय। जे साहखर्ची रहैत छथि तथा अर्जन करय पड़ैत छनि, से एक-एक पाइ जोगबैत छथि, किन्तुछ हुनके बेटा जँ फुकना निकलि गेल तँ सबटा उड़ा दैत छनि।
जोगीकेँ कुकुर बलाय। साधु-संन्या।सी कूकुरसँ हँटले रहय चाहैत छथि।
जोगी संग धुरखेल। कोनहु साधु-संन्याससीसँ हँसीठट्ठा नहि करबाक चाही-अनिष्टस केर आशंका रहैत छैक।
जोजन खाय से कोस अघाय ? जकर भोजन बहुत अधिक छैक, तकरा कनेक्शन मनेकसँ की भय सकैछ ? जोजन= योजन, पाँच कोसक बरोबरि।
जोगी ककर मीत, राजा ककर हीत, वेश्याक ककर नारी ? ई मान्यरता रहलैक अछि जे राजा निप्प होइत छथि ? जोगी वा साधु-सन्तहकेँ कोनहु प्रकारक मोह मायाक आक्रर्षण नहि रहैत छनि।
जैह हाथ सैह साथ। चतुर लोक कोनहु साधारणो उपलब्धिकेँ नहि चाहैत अछि।
जेहि गिरि चरण देइ हनुमन्ताब,
से चलि जाय पताल तुरन्ता्। तुलसीक एहि पंक्तिकेँ मिथिलाक लोक लोकोक्तिक रूपमे प्रयोग करैत अछि।
जोतल खेत घास नहि टूटय,
तकर भाग सकाले फूटय। जे कृषक अपन खेतक जोत-कोड़ ठीकसँ नहि करैत छथि, खढ़ नहि उपटैत छनि, तनिका खेतमे नीक उपजा नहि होइत छनि।
जोतषी आ डाक्टीर नवे नीक। नव ज्यो तिषी वा नव चिकित्सिक अधिक परिश्रम करैत छथि, तेँ हुनकर कार्यनीनक होइत छनि।
जोते कि चोते। खेतमे नीक उपजा तखने होयत जखन नीक जकाँ जोत-कोड़ करब वा गोबरक चोत (ढाकी) खूब देबैक।
जोहैत-जोहैत‍ धीयाकेँ भेलनि कनाह। कन्याकदानक प्रसंगमे अधिक मीन-मेष निकालैत अन्तयमे लोक ठकाइयो जाइत अछि, कारण अधिक विलम्बय भय गेलाक बाद लोक हारि कय अन्ह रा जाइत अछि आ दबो कार्य करय पड़ैत छैक।
जौक जाइ सतुआइन आइ। समय निकलि गेलाक बाद कोनो श्रम व्यार्थ भय जाइत छैक।
जौ जरि गेल भारलय बान्हनल छी। समय हाथसँ निकलि गेल तथापि प्रतीक्षामे बैसल छी।
जौ लाबय गेलाह सुतआइन कयने अयलाह। कोनहु कार्यमे जखन केओ अति विलम्ब् कय दैत अछि, समय बिताकय अबैत अछि तँ एहि लोकोक्तिक प्रयोग द्वारा कयल जाइत अछि।
जौड़ जरि गेल ऐंठन नहि गेल। सुखक दिन समाप्तठ भैयो गेलापर जे आडम्बदर एवं अहंकार नहि छोड़ैत छथि, तनिका पर उक्तर लोकोक्ति द्वारा व्यंडग्यन कयल जाइत छनि।
जँ धोबी पर धोबी बसय,
तँ कपड़ा पर इस्त्रीअ पड़य। वा साबुन पड़य। बाजारमे अधिक प्रतियोगिता रहलापर उपभोक्ताअकेँ नीक एवं सस्तभ सामग्री भेटैत छैक।
जँ भीजय तँ कम्मल भारी। कोनो वस्तु भीजि गेलापर जखन अत्याधिक भारी भय जाइत छैक तँ गलतीक अनुभव होइत छैक।
जँ कबीर काशी मरथि तँ रामक कोन नेहौरा? कबीरदास कहैत छथि जे जँ कशीमे मृत्युअ होयत तँ स्वतर्ग हेबे करत, तखन रामक कोन खुशामद ? जँ कोनो आन युक्तिसँ कार्य चलिये जायत तखन अहाँक कोन महत्व ? काशी विश्व्नाथक महत्त्व प्रतिपादन।
जँ जँ मुर्गी मोटानी,
तँ तँ नांगडि़ सुटकानी। कोनो नेना पैघो भय गेलापर जँ अपरोजके जकाँ करयवा कोनो व्येक्ति अधिक आय प्राइज़ कैयो लेलापर कंजूसी नहि छोड़ैत छथि तँ उक्त लोकोक्तिक प्रयोग द्वारा उपहास कयल जाइत छनि।
जँ हेतै खबरि तँ जेबइ ससरि,
हाकिमक हाथ दस बीस टाका दय,
ओकरो आगाँ जेबै नमरि। हाकिम-हुकुमकेँ घूस-घास दय अपन कार्य सुतारि लेनिहार चतुर एवं अवसरवादी व्याक्ति पर व्यंवग्यय।
जेँ एतेक रीन तेँ किछुआर लय घोड़ा कीन। वा
जेँ ओतेक रीत तेँ किछु लय दही कीन। जँ अधिक कर्ज भैयो गेलार किछु आवश्यीक कार्य रहिये जाइत छैक वा पैच उधार मे खर्चा अधिक भैये जाइत छैक तँ सन्तोखषार्थ उक्ता लोकोक्तिक प्रयोग होइछ।
जेँ चालिस तेँ घपचालित। जँ ओतेक घाटा सहबे कयलहुँ तँ थोड़ेक आर सहल जाय।
जेँ भैयाक दाढ़ी तेँ गाम गुलजार। जखन ककरो अपन धनक वा परोपकारक वा कोनहु वस्तुनक घमण्डव भय जाइत छैक तँ एहि उक्ति द्वारा व्यंघग्‍य कयल जाइछ।
जैं-जैं एला तैं-तैं गेला। ई चर्यापदमे प्रयुक्तत अति प्राचीन लोकोक्ति थीक, जकर अर्थ जे जहिना आयल से तहिना गेल ।
जोँ क मे जोँ क नहि सटैत छैक। जे स्वंेय शोषक अछि तकर शोषण आन कोना कय सकैत छैक ? दूटा सूदखोरक परस्पकर वयवहार पर व्यंशग्यो।
जेँ ओहन तेँ ने ई हाल। ककरहु चालि चलनि केँ दुसबाक हेतु प्रयुक्तल।
जखन बरेक माथा जाल,
तखन वरियातक कोन हवाल ? वर-वरियातीक कौचर्यक माध्यरमसँ कोनहु निन्दाि एवं उपहास एहि लोकोक्ति द्वारा होइत अछि।
जे छली रिन्नीा भिन्नील से भेली पदमिन्नीि। जे जनी पैंच उधारसँ कहुना कार्य चलबैत छलीहि तनिका आब सुख सुविधा प्राप्त् भय गेलाक कारण पद्मिनी ना‍यिकाक अभिनय करैत संकोच नहि होइत छनि।
झगड़ाने दन, चून तमाकू कियै बन ? तमाकू खयनिहारकेँ जखन अम्मूल लगैत छनि तँ एहि उक्तिक प्रयोग द्वारा एक दोसराकेँ तमाकू निकालबाक लेल प्रेरित करेल छथि।
झरकल मुँह झँपन हि सुन्द्र। कनेह दब मुँहकान तथा रोड़ाह बोलीबला नहि प्रगट होबक लेल एहि लोकोक्तिक प्रयोग करैत छथि।
झरकौल नीक परिकौल नहि नीक। ककरो एक दू बेर सुविधा देलाक बाद जखन ओ बारम्बारर पहुँचय लगैत छैत तँ पश्चा त्ताप करैत एहि उक्तिक प्रयोग लोक करैत अछि।
झिंगुर चढ़ला बकुचा पर,
कहथि हाथी हमरहि बापक। तुच्छह व्याक्तिकेँ किंचित प्रतिष्ठान भेटि गेलापर जखन अंहकार भय जाइत छैक तँ व्यंपग्याभर्थ गामक लोक अन्नत राखैत अछि।
झिंगुर बोलत रनारनी,
तखन छोड़ब जनाजनी। अधिक राति भेलाक बादे भूत उतारब।
झिझिर कोना झिझिर कोना कोन कोना जाउ,
बेलतरक मारल बबूर तर नुकाउ। बेलक चोट तथा बबूरक काँट दूनू कष्ट दायक होइत छैक।
झिटुको सँ घैल फुटैत छैक। कखनो साधारणो व्यटक्ति द्वारा पैघ व्यकक्ति हारि अछि।
झूठक खेती धर्मक दोहइ। झूठ बजनिहार व्य क्ति सदिकाल शपथ (किरिया) खाइत रहैत अछि, धर्म-कर्मक दोहाइ दैत रहैत अछि।
झूठ बाजय के जे तुक मिलाबय से। झूठ बजनिहार व्यतक्ति बहुत सफाइसँ झूठ बजैत‍ अछि।
झौंसल झरकल झँपनहि नीक। घोघ-मरोत काढ़ने अधलाहियो नीके लगैत छैक।
टाककेँ टांग होइत छैक। धनवान व्यंक्तिकेँ टाकाक बलपर सभकिछु प्राप्त भय जाइत छैक।
टाका दय केँ झगड़ा बेसाही ? खर्च एवं खिधांस दूनू नहि हेबाक चाही।
टाकासँ आ बेटासँ केओ अघायल अछि ? लोककेँ कतबो धन होइत छैक अथवा बेटा होइत छै‍क तथापि फाजिल नहि लगैत छैक।
टिकुली सिन्दुनर जरल तँ पेटो बज्जैर पड़ल? कोनो साधारण व्यहक्ति जखन पैघ कार्यकरबाक दाबी करैत अछि, जे असम्भाव रहैत छैक तँ अपहासमे उक्तय लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
टिप्पा क भरोसे शतरंज। अनका भरोसे कोनो महत्त्वपूर्ण कार्य नहि यकल जा सकैछ।
टुटलो हथिसार तँ नौ घरक सांगह। पैघलोक किछु घटियो जाइत छथि तथापि कतोक निर्धनक अपेक्षा पैघे रहैत छथि।
टेंगड़ा-पोठी चाल दिअय, रोहुक सिर बिसाय। धीया-पुता जखन कतहुसँ झगड़ा बेसाहि अनैत अछि तँ बादमे अभिभावक सेहो प्रभावित भय जाइत छथि।
टेंगड़े-पोठी रोहु धराब। दूनू लोकोक्ति एके अछि।
ठन-ठन गोपाल सोने लाल। एकहुटा पाइ जखन हाथमे नहि रहैत छैक।
ठनका खसैत छैक तँ लोक अपने माथपर हाथ दैत अछि। ब्रजपातक समयमे वा ओहुना जोरसँ मेघक गर्जनपर अकस्मा त लोक भयभीत भय उठैत अछि।
ठठेरि ठठेरिक बदला। फुसियाहीक अदला बदली पर व्यं ग्यउ।
ठाठ-बाट ओतेक जलपान नदारद। ऊपरी आडम्बअर देखौनिहार लेल प्रयुक्तअ।
ठाढ़ नाचब मोरा तँ निहुरिकय नाचब तोरा। केओ ककरो जे उपकार करैत छैक से किछु बदलामे सेहो चाहैत छैक।
ठाम गुन काजर ठाम गुन कारी। कोनो वस्तुज उचिते स्था न पर छजैत छैक, सुशोभित होइत छैक।
ठारिक चूकल वानर आरिक चूकल गृहस्थच। जहिना ठारिसँ (गाछसँ) खसल वानर मारि खजाइत अछि, तहिना कृषक जे कोनो ताक हूसि जाइत छथि तँ नीक उपजासँ हाथ धोअय पड़ैत छनि।
ठेस लगने बढ़ैत छैक। अपन कयल कृत्यसँ जखन भारी हानि होइत छैक तँ लोक दोबारा ओहन कार्य नहि करबाक संकल्पद लैत अछि।
ठेस लागल पर्वतमे फोड़ी घरक सिलौट। ककरहु अपराधर्क बदला जखन ककरो अनकापर क्रोध प्रदर्शन कयल जाइत अछि तँ एहि लोकोक्तिक प्रयोग होइछ।
ठोका करू टोकी करू भात बराबरि नहि, काका करू काकी करू माय बराबरि नहि। मिथिलाक लोककेँ रोटीक अपेक्षा भात अधिक प्रिस रहलैक अछि।
ठक बूझय ठकहीकेर भाषा। ठक लोकक चलाकी दोसर ठक बुझि जाइत अछि, किन्तुब सामान्यब लोक ठका जाइत अछि।
डाइन केँ जमाय पियार। अन्ध विश्वा।सक कारण मिथिलामे डाइनिक आतंक अधिक रहल अछि।
डाइन चाहय मरकी प्रेत चाहय अशौच। मान्यचता अछि जे अशौच (अशुचि) मैं प्रेतकेँ फबैत छैक, तहिना कोनो महामारी अयलापर डाइन केँ फबैत छैक, कारण ओ मृत आत्‍मा सबकेँ तंत्रबलसँ अपन वशमे कय लैत अछि।
डारिक चूकल बातक फूकल। डारिसँ जे चूकि जाइत अछि, तकर हाड़-पाँजर टूटैत छैक।
डारिक चूकल वानर आरिक चूकल गृहस्थच। एहि लोकोक्तिक चर्चा वर्णक्रमये भय चुकल अछि।
डाली झारि ब्रह्माक पूजा। सब देवताक पूजाक बाद अन्तकमे ब्रह्माक पूजा होइत छनि, तेँ बाँचल सबटा फूल चढ़ा देल जाइत छनि।
डाली डूली घर करू बेटी के विदा करू। आलतू-फालतू गप्पककेँ छोडि़ मुख्य कार्य संकेत एहि उक्तिक द्वारा देल जाइत अछि।
डूबल वंश कबीरके, उपजल पूत कमाल। कोनो नीक लोककेँ जखन दुर्जन उच्छृंपखल पुत्र तैयार भय जाइत छनि तँ एहि उक्तिह प्रयोग होइछ।
डूबिय पानि पीबी तँ एकाादशीक बापो नहि जानथि। चोराकय जे अनर्गल क्रियाकलाप चलबैत छथि तनिकापर लक्ष्य् कय एहि लोकोक्तिक वाण चलौल जाइत अछि।
डेग पाछू बिडि़या कोस पाछू तिरिया। कोनो बिगड़ल बबुआनक हेतु प्रयुक्त।।
डेढ़ गोट घोड़ी नौगोट फौज। पुरान लोकोक्ति।
डामेक लेखे धोबी नीच। वा हलखोर नीच। जे स्वलयं सामान्य अछि से अनका ताहूसँ अधिक निम्न बुझैत अछि।
डोम हारय अघोरी सँ। नीच व्ययक्तिक संग जखन अधिक नीचता पर उतरि जायब तँ ओ हारि मानि लेत।
डाँड़ ने चलनि तँ केराक भार। दुर्बल व्यलक्ति जखन अधिक भारी बोझ उठबय चाहैत अछि।
डाँड़ ने धोय से भगते होय। वा
किदन ने धोय से भगते होय। महान व्यधक्तिक नकल कयनिहार पर व्यं ग्यक।
डाँड़ फाटय मलार गाबी। वा
किदन फाटय मलार गाबी। कष्ट क समयमे वा परिश्रमक समयमे जे गीत गबैत अछि वा खुशी मनबैत अछि तकरापर व्यंिग्यम।
डाँड़ मे लत्ता नहि चल कलकत्ता। ओकादसँ अधिक जे माँग वा मनोरथ प्रकट करैत छथि तनिका लेल प्रयुक्तथ।
ढहलेल कनियाँ के नौ आना खाँइछ। वा नौ टाका खाँइछ। साधारण व्य क्तिकेँ जखन अधिक महत्त्व प्राइज़ करबाक आकांक्षा जोर पकड़ैत छैक।
ढहलेल कनियाँके भैंसुर लोकनियाँ। साधारण व्याक्ति जँ लोकसँ सेवा करयबाक इच्छाण करैत अछि तँ उक्तस लोकोक्ति द्वारा उपहास कयल जाइत छैक।
ढहलेल माउग के बड़हर के झुमका। असंगत कार्य कयनिहार पर व्यंाग्यर।
ढिठगरि कनियाँ के भैंसुर लोकनियाँ। अनुशासन भंग कयनिहार वा शिष्टायचारक उल्लंघन कय श्रेष्ठर लोकसँ अनपेक्षित कार्यक प्रस्ताेव रखनिहार लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
ढेकी स्वोर्गो जायत तँ धाने कूटत। जकरा भाग्यछमे जे कार्य रहैत छैक सैह सर्वत्र करय पड़ैत छैक।
ढेर जोगी मठ उजाड़। एकरा ‘अधिक जोगी मठ उजाड़’ सेहो कहल जाइत छैक।
ढोँढ़ीमे दम नहि बजारमे धक्का । ओकादसँ बहुत अधिक इच्छा रखनिहार लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइत अछि।
ढोल ढाक नहि हर-हर गीत। विवाहादि कोनहु उत्सोवमे जे बिना खर्च केवल स्त्रीनगणक गीतनाद मात्रसँ कार्य चला लैत छथि तनिक कंजूसी पर व्यंनग्यँ।
ढोल ने ढाक अंगरेजी बाजा। सामान्यढ उत्सजवमे जे अधिक ध्वानिविसतारक यंत्रक प्रयोग करैत छथि वा आने तरहक अति व्याय करैत छथि तनिका पर व्यंतग्यत।
ढोल ने ढाक शहनाइ बाजय। अर्थ एवं प्रयोग पूर्ववत।
ढौआ दय दुख बेसाहल। स्वादस्य्र् केँ हानि पहुँचाबय बला वस्तुेमे जँ पाइ खर्चकयल जाइत अछि तँ एकर प्रयोग होइछ।
ढौआने कौड़ी उतान हो गे छौंडी। वा ढौआ ने कौड़ी बीच बजारमे दौड़ा दौड़ा। बिना विभवकेर जखन केओ अधिक मनोरथ करैत अछि वा कोनो खर्चीला कार्य ठानि लैत अछि तँ उक्तन लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
तड़ल खाय से गलल जाय,
गुण्डाा खाय से भुसकुण्डात बनय।
वा गूड़ा-खुद्दी खाय से मोट बनय। पैघ लोकक धीया पुता जखन पातर आ हुनके नोकर-चाकरक धीयापुता मोटायल रहैत अछि तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
तन सुखी तँ मन सुखी। गरीबक शरीर स्वसस्य्रयो रहैत छैक तेँ ओकर मन सेहो ।
तप चूक राजा चूक नरक। कोनो ऋषि तपस्या्सँ च्युतत भय जाइत छथि तँ रानीक कोखिमे जन्म‍ लैत छथि, किन्तु जखन कुविचारी भय जाइत छथि तँ हुनका नर्क होइत छनि।
तर नारायण ऊपर गोविन्दव। जाड़क समयमे ओढ़ना बिछौनाक अभावमे गरीब लोकसब गाम मे बिछौनामे नारक बनल खिनहरि तथा ओढ़नामे खढ़क बनल गोनरिक प्रयोग करैत अछि।
तरबुज चाहय रौद, आम चाहय मेघ,
नारी चाहय जोर, नेना चाहय नेह। एहिमे कोनहु एकक उपस्थिति मे, ओकर सम्पू र्ण प्राज्ञोक्ति, पढि़ देल जाइत अछि।
तरेतर किदन मारय ऊपरसँ गंगाजल छीटय। वा
तरेतर मुँह मारय ऊपरसँ गंगाजल छीटय। वा
तरेतर जडि़ खोधय ऊपरसँ पानि छीटय। जे व्य।क्ति ऊपरसँ मित्रता, किन्तुा गुप्तेरूपसँ शत्रुता कयने रहैत छथि, तनिका लेल प्रयुक्तत।
तरेतर घिचने चल। दोसरकेँ ठकिकय जे गुप्तररूपसँ अपन घर भरैत रहैत अछि, तकरा पर व्यंपग्यानर्थ एहि लोकोक्तिक प्रयोग होइछ।
तसला तोर की मोर ? कोनहु धन पर अधिकारक विवाद कयनिहार लेल प्रयुक्त ।
ताड़के मारल बेलतर बेलक मारल बबूर तर। क्रमिक हासक स्थिति।
तालसँ भोपाल ताल, आर सब तलैया, राजातँ शिवसिंह आर सब रजैया। पोखरि तँ भोपालाक (राजावला) अछि, आर तँ डबरे डुबरी थीक।
ताहि दिनुका भोजखौका जेम्हारे कौआ उड़ैत देखैक,
तेम्ह रे लोटा लेने पहुँचि जाइक। अधिक भोज खयनिहार आलसी ब्राह्मण पर व्यं ग्यआ जे निर्लज्जँता पूर्वक भोज खयबाक जोगाड़मे लागल रहैत छथि।
तिरियागे तोहर चाकर हेबउ,
तोहर पठाओल नैहर जेबउ। पत्नीपक परम आज्ञाकारी पति वा लोलुप व्यनक्ति पर व्यंकग्यल।
तिरिया तेरह मरद अठारह। पूर्व मान्य ता रहल अछि जे तेरह वर्षक आयुमे नारी तथा अठारह वर्षक आयुमे पुरुष सक्षम भय जाइत अछि।
तीन तिरहुतिया तेरह पाक। मैथिलकेँ उपनामे नहि।
तीन कमैनी तेरह चास,
तब करिहह मड़ुआके आस। मड़ुआक खेतीक लेल कहल गेल अछि जे रोपबसँ पूर्व तेरह चास अर्थात् खूब जोत कोड़ खेतक करबाक चाही तथा रोपलाक बाद दस-दस पन्द्ररह-पन्द्ररह दिन पर तीन बैर कमौअ (खुरपी चलौनाइ) करबाक चाही।
तीन पूत रामके एको ने कामके। कहियो रामनामक व्य क्तिकेँ तीनू बेटा अकर्मण्यम निकलि गेलनि, जाहि कारण गृहस्थीय चौपट्ट रहैत छलनि।
तीन फुक्केा चानी। कोनो कार्य तेहरा देलापर पक्कान भय जाइत छैक।
तीन सत्ते सत्त। तीन बेर शपथ खुयेलासँ पक्का् भय जाइत छैक।
तीन तेकट महाखविकट। तीन व्यटक्ति मीलि कोनहु कार्य नहि करी, टोनाह होइत छैक।
तीनमे कि तेरहमे? जकरा संग कोनहु सम्बतन्ध नहि रहैत तकर-शुभा शुभसँ कोन मतलब ? भगिनमान केँ, तीन दिनक तथा दिआद केँ तेरह दिनक सम्बभन्धत होइत छैक।
तीनमे तेरह सुतरीमे गीरह। बिना सम्बहन्धेरक सम्बइन्ध ठाढ़ कयनिहार लोक लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
तीन बेर बजौलासँ आबय नउनियाँ,
आधा भार लय भूजय कुनुनियाँ। जे लेन-देन पर्याप्तइ नहि करैत छथिन, कम ओकाद छनि, तनिकासँ पौनी-पसारी अधिक शुशामद करबैत अछि।
तीन लोकासँ काशी न्या री। वारणसीक विषयमे कहल जाइछ जे ओ शंकर भगवानक त्रिशुल पर अछि; आन दुनियाँसँ ओकरा कोनो मतलब नहि।
तीन लोकसँ मथुरा न्यामरी। मथुरामे भगवान कृष्णाक जन्मबस्थाकन रहलाक कारण अत्यतन्तन महत्त्वपूर्ण जाइत अछि।
तीन ठठेरी तेरह हुक्कात,
ताहु मे उटय धक्कुम धुक्का्। लहेरी जाति आपसमे खूब लड़ैत रहैत अछि।
तीरने कमान मीयाँ कथीक पठान? पठान जाति मारि-दंगा करबामे माहिर रहल अछि।
तील गुड़ भोजन, तुरुक मिताइ,
आगाँ मिट्ठ पाछाँ कड़ुआइ। तिल गुड़क भोजन अर्थात् तिलबा गरिष्ठ होइत छैक।
तीस दिन चोरके एक दिन साधुके। एक ने एक दिन पकड़ाइते अछि।
तीसी फुलायल माछी आयल। माघ-फागुनसँ माछीक प्रकोप प्रारम्भ होइत अछि।
तुम्माु फुटिगेल रे गोसाँइ। कोनो साधु पुरुष पर जखन कलंक लागि जाइत छनि तँ एहिना लोक उपहास करैत छनि।
तुम्मान फेराफेरी। जे व्यनक्ति अधिक धुरफन्दीसक कार्य करैत अछि, ओहन झगड़लगौन व्य‍क्तिक लेल प्रयुक्त,।
तुरुक ताड़ी बैल खेसारी,
बाभन आम कायथा काम। मूर्ख मोचण्डा (मुसलमान) केँ ताड़ी पियौलासँ, बड़दकेँ खेसारी खुलौलासँ ब्राह्मणकेँ आम खुऔलासँ तथा कायस्केँौल नौकरी दिऔलासँ प्रसन्नल होइत छथि।
तुरुक तोता ओ खरगोस,
ई तीनू नहि मानय पोस। मूर्खकेँ कतबो मानदान करब तथापि ककरो सिखौलापर ओ शत्रु भय ठाढ़ भैए जायत।
तुलसीक पात जेहने छोट तेहने पैघ। आयुमे कम रहितहुँ श्रेष्ठन व्यिक्ति श्रेष्ठेक रहैत छथि।
तूर लदैतेँ लोह लदाय। साधारण वस्तुोक नाम पर सुविधा लेलाक बाद पैघो सुविधा जे हड़पि लैत अछि।
तेल जरय तेलीके, किदन फाटय मसालचीके। वा
छाती फाटय समालचीके। साधारण वस्तुाक नाम पर सुविधा लेलाक बाद पैघो सुविधा जे हड़पि लैत अछि।
तेल जरय तेलीके, किदन फाटय मसालचीके। वा
छाती फाटय मसालधीके। अनकर खर्च पर अनका जखन आँखि लागि जाइत छैक, रोकबाक चेष्टाफ करैत अछि तँ उक्त लोकोक्तिक प्रयोग लाभान्वित व्यरक्ति करैत अछि।
तेज बड़दकेँ टिटकारियो काफी। जे छात्र पढ़बामे अधिक तेज छथि हुनका साधारणे मार्गदर्शनसँ कार्य चलि जाइत छनि।
तेतर बेटी राज रजाबय,
तेतर बेटा भीख मंगाबय। तीन बेटाक बाद जनिका एक बेटी मात्र होइत छनि से आर्थिक प्रगति करैत छथि किन्तुन तीन बेटीक बाद जनिका एकटा मात्र बेटा होइत छनि से दुर्गतिकेँ प्राप्तए करैत छथि।
तेलिक बड़दकेँ घरहिमे पचास कोस। तेल पेरैत काल वा कुसियार गूड़ लेल पे‍रैत काल बड़दकेँ चारूभाग अनवरत चक्कडर लगबय पड़ैत छैक, जाहिमे ओ पचासो कोसक बरोबरि प्रतिदिन चलि लैत अछि।
तेलिक बड़द लय कुम्है नि सती। वा तेलियाइनिक संग कुम्हैचनि सती। अनका लेल आन जे बेहाल रहैत अछि, निरर्थक हरान-फिरीशान रहैत अछि, तकरा पर व्यं ग्यह।
तेलिन रूसली सँ कुप्पािलय बैसली। जकर जे व्यीवसाय रहैत छैक, जेहन विभव रहैत छैक, तकर अनुकूल सभकार्य करैत अछि।
तेलियासँ ने धोबिया घाटि,
ओकरा मुंगरा एकरा जाठि। समान आर्थिक (मामूली) स्थितिक जखन दू व्यरक्तिमे प्रतिस्प र्धा चलैत छैक, तँ उपहास एवं व्यं्ग्या्र्थ लोक उक्त लोकोक्तिक प्रयोग करैत अछि।
तेली सूरी ओ कलवार,
कर्ज ओसूलैत कल्लाम ओदार। बनियाँसँ पैंच-उधार लेलाक किछुए दिनक बाद ओकर तगादा असह्म भय उठैत छैक।
तेलो जरल अन्हाअरो भेल। खर्चक बादो जँ किछु लाभ नहि प्राप्तु हो तँ उक्तक लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
तेसर नाढ़ो हरिदासक माय। कोनो बतढहि झोँकाहिक लेल एहि उक्तिक होइत अछि, जकरा सबसँ झगड़े रहैत छैक।
तेहनक’ ने छौंकि देबनि घूरिकद्ध ने औता। ककरहु पर क्रोध प्रदर्शन करबाक हेतु कोनो एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथि।
तेहन पाठ ने पढ़लह पुत्ता,
अपने सीर बिसानी। अपनहि चालिसँ जे भयंकर घाटामे पड़ैत तकरा लेल एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
तोड़ीक साग आ भोरा नीन्दप स्वाोदिष्ट होइत छैक। सरिसवक साग स्वारदिष्टो तथा लाभदायक होइत अछि, ओहिना जेना भोरहरबाक निम्नक सुखद होइत छैक।
तोरा किछु होउँक मोरा कुर्थी उला दैह। स्वा र्थी व्युक्ति अनकर असुविधा नहि देखैत अछि।
तोर चुरबा मोर दहियो गेल। कोनहु तीर्थस्थाहन मे एक यात्री अपना संग चूरा लेने गेलाह।
तोरा पाबनिसँ मोरा की ?
कनेक भेटलासँ हैत की ? ककरहु संग समय बर्बाद निरर्थक नहि करबाक चाही।
तोरा मुँहमे अमृत बसौ। जखन केओ मनोनूकूल गप्पन कय उच्चअ शुभकामना व्यूक्त‍ करैत अछि तँ एहि उक्ति द्वारा ओकर अभिवादन कयल जाइत छैक।
तोरा मुँहमे घी शक्ककर। एहू लोकोक्तिक अर्थ एवं प्रयोग पूर्ववते अछि।
तोहर माय खरीतिया कयने छलह। केओ जखन भयंकर दुर्घटना सँ जान बजा कय निकलि जाइत अछि तँ ओकरा लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
तौलाक भाफ ढाकनसँ झाँपब,
मुँहक भाफ की लय झाँपब ? अनावश्याक अधिक नहि बजबाक चाही, अन्यशथा अनुचित शब्द ककरहु लेल जँ निकलि जायत तँ ओ फेर घुरिकय नहि आओत।
तौला भरि अनाज भेल,
जोलहाके राज भेल। मुगल शासन कालसँ ई लोकोक्ति प्रचालित अछि।
तोँ डारि-डारि हम परत-पात। ठकानिहाकेँ आर नीक जकाँ ठीक लेलापर स्वनभा‍मानमे लोक एहि उक्तिक प्रयोग करैत अछि।
थपड़ी एक हाथसँ नहि बजैत छैक। दू पथक परस्पसर सहयोगसँ दूनूकेँ लाभ होइत छैक।
थाकल ऊँट सराय ताकय। कोनहु कार्यमे थाकि गेलाक बाद जैह किछु भेटैत छैक।
थाकल नटुआ झिटुका बीछय। कोनहु कार्यमे थाकि गेलाक बाद जैह किछु भेटैत छैक ताहीसँ सन्तोाष करय पड़ैत छैक।
थाकल बड़दकेँ पेटार भारी। अधिक थाकि गेलाक बाद लोककेँ अपनो अंग वा अंगवस्त्रो भारी लागय लगैत छैक।
थास्केँअ नहि दोसर देश,
घौँघाकेँ नहि दोसर डाबर। सबकेँ अपन निश्चित धरती एवं स्थाान होइत छैक।
थूकसँ सातु नहि सनाइत छैक। जाहिठाम पर्याप्तन साधनक प्रयोजन रहैत छैक, ताहिठाम कनेक मनेकसँ कार्य नहि चलैत छैक।
थूक चटने पियास नहि मरैत छैक। एहू लोकोक्तिक भावना पूर्ववते अछि।
थोड़ करय बाली मीयाँ,
आर करय डफाली। बाली मीयाँ कनेक गबैत अछि कि डफली (ढोल) अधिक बजा कार्य चला लैत अछि।
थोड़ धनक सुखिया बहुत धनक दुखिया। जनिका आवश्यखकतासँ अधिक धन रहैत छनि से अनेक झंझटक कारण अशान्ति रहैत छथि।
थोथा चना बाजय घना। ई लोकोक्ति भोजपुरी अवधी क्षेत्रसँ अछि।
थोथीलग पोथी प्रमाण। बजक्कगर लोक विद्वानहुकेँ परास्तर कय दैत अछि।
थोड़ा पूजी बनीजे खाय। व्य़वसायमे कम पूँजी रहलासँ लाभदायक नहि भय पबैत छैक।
थोड़बहि धनमे खल बौराय। मूर्ख मोचण्ड व्यँक्ति कमे धन प्राप्त कय घमण्ड मे चूर भय जाइत अछि मदिरापान कय बौराय लगैत अछि।
थोड़ लिखल अधिक बूझब। पैघ चिट्ठी लिखनिहार पर व्यं ग्यप।
दऽ अक्षर नहि लऽ अक्षर। जे केवल लेनाइये जनैत छथि, ककरो किछु दैत नहि छथिन तनिका लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
दछिनाही कुलक्षणि, पूस मास सुलक्षिण। बंगालक खाड़ीसँ चलल हवाकेँ नीक नहि मानल गेल अछि, किन्तुल पूस-माघक लेल ओ नीक होइत अछि।
दछिनाही कुलक्षणि, पूस मास सुलक्षतिण। बंगालक खाड़ीसँ चलल दछिनाही हवाकेँ नीक नहि मानल गेल अछि, किन्तुन पूस-माघक लेल ओ नीक होइत अछि।
दमड़ीक बुलबुल टका दलाली। सामानक मूल्यलसँ अधिक जँ ओकर दलाली (कमीसन) पर खर्च हो।
दमड़ीक बुलबुल दोकड़ा नोचाइ। भावना पूर्ववत।
दम्मा जाय दम के साथ। कहल जाइत अछि जे दम्मा क रोग छूटैत नहि छैक।
दलालके देवालाकी मस्जिदमे ताला की ? जे दलालीक कार्य करैत अछि, तकरा अपन पूँजीक अभावमे देवालक भय नहि रहैत छैक।
दसक लाठी एक बोझ। कनेक कनेक्शन चन्दा भेलापर पैघ राशि बनि जाइत छैक।
दसक कहने भगवानो भूत। समाज जकरा मान्य ता दैत छैक, किन्तुग केवल टाका संगमे रहलासँ सब कार्य सम्भ व नहि होइत छैक।
दस टके नहि नितराइ,
दस समांगे नितराइ। समाजमे ओहि घरक अधिक धाख आ भय होइत छैक जाहि धरमे अधिक जवान रहैत छैक।
दस पाँच मिलि करी काज,
हारने जितने नहि लाज। समाजक दसलोकक निर्णयानुसार जे कोनो सामाजिक कार्य कयल जाइत अछि ताहिमे लाभ-हानिक कोनो चिन्ताह नहि रहैत छैक, अपयशक सेहो भय नहि रहैत छैक।
दस नहि नोतब नोतब गोपाल। अत्यहधिक भोजन कयनिहार पर व्यंाग्यै।
दसमीमे मूसो नव कपड़ा पहिरैत अछि। विजयादश्मीोक महत्त्व विश्ले्षण।
दस लोक दस मत। जाहिठाम मतभिन्नकता रहैत छैक ताहिठामत प्रयुक्ती।
दही-चूड़ा बारह कोस। ब्राह्मणकेँ जँ कतहुसँ दही-चूड़ाक भोजक निमंत्रण रहैत छनि तँ ओ बारह कोस धरि पहुँचि जाइत छथि।
दही-चूड़ा तँ बारह कोस,
मिठाइ अठारह कोस। अर्थ स्प ष्टेँ अछि।
दही-चूड़ा मिट्ठ होइत छैक, कियैक तँ सिपाहीकेँ खाइत देखैत छियैक। मिथिला क्षेत्रमे पुलिसक जवान सेहो दही चूड़ाक जलपान करैत अछि।
दही लेब दही, राति कतऽ रही?
राति रही कुंजवन दिन बेची दही। कृष्णेक संग गोपीलोकनिक रासलीलाक संकेत।
दाइ गे दाइ बड़ सुलवाहि। ककरहु कष्ट पर कोनो जनीकेँ जेखन प्रसन्नषता व्यनक्तन करबाक रहैत छनि सँ एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथि।
दाइ ने नूनू पोटरिया नूनू। जे जनी सम्प त्तिशालिनी रहैत छथि तनिका नैहरमे अधिक मान-दान होइत छनि।
दाउनमे बड़द बनियो गूड़ नहि देत। व्यनवसायी वर्ग स्व त: कृपण होइत अछि।
दाता दान करय भण्डा रीकेँ छाती फाटय। दान कयनिहारक बदला ओकर दरबारी जखन आँखि लगबैत छैक तँ दान लेनिहार एहि उक्तिक प्रयोग करैछ।
दादाक बलेँ फौदारी। अनका बल पर जे कूदैत रहैत अछि, तकरा पर व्यंेग्यअ।
दादा लय केँ तेरह। जाहिठाम पर्याप्त। लोकक प्रयोजन छैक, ताहिठाम जँ कम लोक उपस्थित होइत छैक तँ एहि उक्ति परिहास कयल जाइत अछि।
दाना ने घास खड़रा तीन तीन बेर। वा दाना ने घास दूनू साँझ दुमकज्जा । बिना खर्च कयनहि जे वाहन सुख वा माल जालक मालिक बनय चाहैत छथि।
दाना ने घास दूनू साँझ उपास। टाकाक बल पर कार्य चललाक बादो कार्य कयनिहारक प्रशंसा पर एहि लोकोक्तिक प्रयोग द्वारा विरोध कयल आइछ।
दानी कतहु सोम भेलय आ सोम कतहु दानी ? दानी कृपण नहि भय छथि, तहिना कृपण दान नहि कय सकैत अछि।
दालि भात तरकारी सब धन सरकारी । अनकर धन (वस्तु ) केँ हड़पि लेबाक तथा दुरुपयोग करबाक जे प्रयत्ना करैत अछि, तकर वर्जन एहि उक्ति द्वारा कयल जाइत अछि।
दिगम्ब्रक गाममे घोबीक बास। जाहि गामक लोक नंगटे रहैत अछि ताहिठाम धोबीक बसलाक कोन प्रयोजन ? ओकर रोजी चलत ?
दिन देखारे खेत उजाड़ल,
बचल न मड़ुआ तोड़ी,
मुखियाजीकै कान कटैअय
मुखियाजीके छौंड़ी। कोनो बदजाति बालिकाक निन्दार करैत प्रयोग कयल जाइत अछि।
दिन-दिन भेल मलेच्छरक पहरा,
देव-पितर गेल गामक बहरा। नवका लोकक तथा कथित प्रगतिवादी व्यावस्था पर पुरान लोक द्वारा टीका टिप्पीोणी।
दिन धराबय तीन नाम। वा
दिन धराबय तीन नाम, बौआ बच्चाो बूडि़। जखन जेहन समय अबैत छैक तदनुकुले यश-प्रतिष्ठा अप्रतिष्ठा् होइत छैक।
दिनमा चलि गेल गुनमा रहि गेल। ककरो स्विर्गीय भय गेलाक बाद ओकर गुणक चर्चा रहि जाइत छैक।
दिन मंगलवार तँ, सावासेर,
राति मंगलनि तँ सावासेर। कोनहु प्रकारेँ प्रयत्नक कयलापर जखन एकहि बात होइत छैक, एकेरंग परिणाम होइत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
दिल्लीैक लड्ड, जे खयलक से पछलौलक, जे नहि खयलक सेहो पछतौलक। कोनो उपलब्धि नीक नहियो रहैत यदि ओकरा लेल लालायित रहैत अछि तँ एहि लोकोक्तिक द्वारा उपहास कयल जाइत छैक।
दिन रे दिन, ताँही खुऔलयँ बेटाक रीन। अपन दुर्दिन पर झखैत व्यछक्ति द्वारा कयल जाइत अछि, जकरा अपन बेटासँ भिन्ना-भिनाउज भय गेल रहैत छैक।
दुआरि पर घोड़ा नहि नखास मोल। निष्प्ररयोजनक जे खर्च कय देखाबा करैत छथि, ओकादसँ अधिक आडम्बेर करैत छथि, तनिका लेल प्रयोग।
दुआरि पर लागल वरियात,
समधिनकेँ लागल पियास। अत्यनधिक खर्चक प्रसंग, वा अत्य धिक प्रसन्नँताक प्रसंग, वा ककरहुसँ विछोहक समयमे कण्ठामे सेफ सुखा जाइत छैक आ अबिचंक लय लैत छैक।
दुक्खी झाक दडि़भंगा। गामसँ कनेक्शन दूरक शहर जकरा पयरहि तरमे रहैत छैक, दिनमे अनेको बेर जे शहरसँ भय अबैत अछि, तकरालोल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
दुधगरि गायक लथाड़ो सहल जाइत छैक। जकरसँ किछु प्राप्त होइत छैक तकर लोक गारि फज्झुति सेहो सहैत अछि।
दुरि गेल खेत दऽ बाट,
दुरि गेल तिरिया गेल नित हाट,
दुरि गेल बड़दा बहय कुरंग,
दुरि गेल पण्डित मुरूखक संग। खेतमे रास्ताड लगौलासँ जजाति नष्टक भय जाइत छैक।
दुष्टछक दवाइ पीठक पूजा। दुष्टछ दुर्जन व्य क्ति तेरहम विद्यासँ बुझैत अछि।
दुष्टछ ने सूतत ने सूतय देत। दुर्जन व्यतक्ति ने स्वं य सुख प्राप्तँ करत ने दोसरकेँ सुखी देखि सकैत अछि।
दुष्टे ने हगल ने हगक बाट छोड़त। एहूमे उपर्युक्ते भावना अछि।
दुसाध जाति खाय नीचाँ ताकय ऊपर। दुसाध जातिक लोक चौर क्रियामे बदनाम रहलाह अछि।
दुसाधसँ चामो छुआ जाइत छैक। लोकोक्ति सँ सामाजक प्राचीन स्थितिक पता चलैत बछि।
दूधक दूध पानिक पानि। ठीक-ठीक एवं निष्पथक्ष फैसलाक लेल एकर प्रयोग होइत अछि।
दूध माछ दूनू बाँतर। जाहिठाम उभय पक्ष प्रतिकूले रहैत छैक।
दूध लेब कि मट्ठा ? जाहिठाम अनुकूल परिस्थिति उत्पैन्न भय जाइत छैक ताहिठाम प्रसन्न ता व्यनक्त करबाक हेतु एहि लोकोक्तिक प्रयोग होइछ।
दूनू हाथ लड्ड। उभय परिस्थिति अनुकूले रहलापर एकर प्रयोग।
दू नेंगड़बी एक्केक पाबी। दोहराइयो कय कोनो कार्य करब तथापि परिणाम एकहि रहत।
दू पहलमानक लड़ाइमे एक तँ हारबे करत? चुनाव अथवा खेलमे पराजित पक्षकेँ सन्तो षार्थ एकर प्रयोग होइछ।
दू फँक्काा चूड़ा आ घचदऽ मुरइ। चुनाव अथवा खेलमे पराजित पक्षकेँ सन्तोकषार्थ एकर प्रयोग होइछ।
दूरक ढोल सोहाओन। लोकक ई स्वोभाव बनि गेल छैक जे स्वकदेशी वस्तुिक अपेक्षा विदेशी वस्तुी नीक लगैत छैक।
दूर माँड़रि लग पानि लग माँड़रि दूर पानि। मेधक हल्लुिक परत चंन्द्र माकेँ दूरसँ चारूभाग घरेने रहय तँ वर्षा निकट बुझू, किन्तुग जँ लगहि सँ घेरने रहय तँ वर्षाक सम्भाुवना क्षीण।
दू हर खेती एक हर बारी,
एक बड़दसँ भला कोदारी। डाकक कहब छनि जे चारि बड़दसँ नीकजकाँ खेती भय सकैछ।
दृष्टिक लेखेँ पीठ पछुआड़। ई लोकोक्ति ‘आँखिक लेखेँ पीठ पछुआड़’ तकरे दोसर रूप थीक।
देखबामे बुडि़बक उठबामे अहल भोरे। कोनो ढहलेल नेना जखन संस्का रयुक्तड कार्य करैत अछि तँ ओकर प्रशंसामे प्रयोग।
देखबामे बुडि़बक उठबामे अहल भोरे। कोनो ढहलेल नेना जखन संस्का रयुक्तड करैत अछि तँ ओकर प्रशंसामे प्रयोग।
देखयमे छोटी-मोटी खायमे सबैया रोटी। खाधुर माउग पर व्यंरग्ये।
देखयमे नीक नहि माथामे टीक नहि। ककरो मुँहकान दुसबाक हेतु एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
देखयमे अनमुँह सूतयमे सबेरे। साँझे विश्राममे चलि गोनिहार व्य्क्तिक विरोध।
देखलहतँ देखलह चिखलह तँ नहि। गुप्तत भेद खुजिगेलापर सन्तोकषार्थ एहि उक्तिक प्रयोग होइत अछि।
देखलहुँ सीली तोहरो दिल्ली। ककरहु भेद ज्ञात कय लेलाक बाद निराशामे एकर प्रयोग होइत अछि।
देखले दडि़भंगा चिन्हहले सिपाही। केओ जखन अधिक डींग हँकैत छथि तँ विरोधमे एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
देखि देखि लगैअय दाँती,
कुकुर बन्हैगअछि गाँती। कोनो अजगुत आचार-विचार एवं वेश-भूषा देखि लोक एकि लोकोक्तिक प्रयोग करैत अछि।
देखू हे माइ नगरक रीति,
एक घर कानन एक घर गीत। एकहि गाममे ककरो ओहिठाम विवाहादि उत्स व रहैत अछि तँ ककरो ओहिठाम श्राद्ध रहैत अछि।
देखले कनियाँ देखले वर,
कोठीतर बिछौना कर। सब किछु पूर्वहिसँ देखल सुनल निम्नह स्रीिछुय जे वैवाहिक वा आन अनुबन्ध‍ होइत अछि तँ एहि लोकोक्तिक प्रयोग द्वारा लेल जाइत अछि।
देखले छौंड़ी समधिन। कोनो साधारण परिचित व्यतक्ति जखन उच्चन अधिकारी भय आबि जाइत अछि जे अकल्परनीय जकाँ रहैत छैक तँ एहि लोकोक्ति द्वारा परिहास कयल जाइत अछि।
देखले जनकपुर चिन्हिले गोसैयाँ। सब किछु परिचिते रहला पर जँ केओ बढ़ा-चढ़ा कय प्रशंसा करैत अछि तँ एहि उक्ति द्वारा ककरो मुँह बन्द कयल जाइत अछि।
फाटले चिरकुट पर एतेक टिपोर। कोनो जनी जखन अपन नहिराक बढ़ा-चढ़ाकय प्रशंसा करैत छथि वा केओ अपन मातृक-पैतृकक अधिक करैत छथि तँ एहि उक्तिक प्रयोग द्वारा विरोध कयल जाइछ।
देखैत-सुनैत महकारी,
भीतर बीया कारी। जे व्यीक्ति बाहरसँ देखैत सुन्द र किन्तुत भीतरमे दुर्जनता रखैत छथि तनिका लेल एहि उक्तिक प्रयोग।
देने लेने जस, नूनू तेले रस। समाजमे खूब खर्चबर्च करब तँ यशस्वी होयब, तहिना जेना नोनतेल-मसालाक बल पर तीमन तरकारी स्वानदिष्टे जाइत अछि।
देल बली कि ले बली देनाइ श्रेष्ट कि लेनाइ श्रेष्टि ? केओ अपन दानशीलता एवं पैघत्वन पर घमण्डि एहि उक्ति द्वारा करैछ।
देल खरि नहि खाय कोल्हुकआर चाटय जाय। समक्षमे पर्याप्तक सामग्री रहितहुँ जे एमहर ओमहर बैआयल घुरैत अछि तकरा लेल प्रयोग।
देल घास नहि खाय,
पौन्हीस चाटय जाय। एकरहु भाव पूर्ववते अछि।
देसक चोरनीसँ बिआही, भदेसक महत्माोइनसँ नहि बिआही। मान्याता अछि जे मैथिलानी जतेक कुलीना हेतीह ततेक बाहरक कनियाँ नहि।
देस रंग रे रंग लोक एके रंग। जखन नीको गाम ठामक लोक अपराधमे पकड़ाइत अछि, नीको लोक कुकर्म करैत छथि तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
देसी घोड़ी बिलेँती चालि। जखन केओ भय अंग्रेजी संस्कृयति केँ अपना लैत छथि तँ एहि उक्ति द्वारा उपहास कयल जाइत छनि।
देसी मुर्गी बिलेँती बोल। दूनूक भावना समाने अछि।
देह घुसकय नहि गहूम मांगय बोनि। अयोग्यस व्यमक्ति जखन उच्चज पद प्रतिष्ठाह प्राप्तक करबाक करैत छथि तँ एहि उक्ति द्वारा व्यंहग्या कयल जाइत छनि।
देह चलय नहि केराक भार। ओकादसँ अधिकक जे साहस करय चाहैत अछि तकरा पर व्यंसग्य ।
देह टूटय तँ मलार गाबी। अतिशय परिश्रमहुमे गीत गाबि खुशी मनौनिहार लेल प्रयोग कयल जाइछ।
देह धरौलाक दण्डर। तमसगीर जखन मारि जाइत अछि, वा कोनहु झगड़ामे पंच बनलापर जँ घाटा लागि जाय तँ उक्तच लोकोक्तिक प्रयोग होइछ।
देह पर लत्ता नहि पान खाय अलबत्ता। ओकादसँ अधिक फोकसबाजी कयनिहार लेल प्रयोग।
देह मे दम नहि बजारमे धक्काा। ओकादसँ अधिक शक्ति प्रदर्शन कयनिहार पर व्यंअग्य ।
देहातक चूड़ा बजारक रमरमी। गाम-घरमे अतिथिकेँ भोजन जलपान कराओल जाइत छनि, किन्तुा शहरमे एक कप चाह पिया जय रामजी की कहि विदा कय देल जाइत छनि।
देहातक दालिभात शहरक रमरमी। दूनूक भावना एक अछि।
दैबक देल। कोनो दब सामग्रीक विरोधमे उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
दैब न मारहि डाँग सँ,
देहि कुपन्थ चढ़ाय। विधाता ककरो सोझे नहि मारि दैत छथिन,अपितु कुमार्ग दिस ठेलि दैत छथिन विपरीत समय अयलापर अनायसे ओ कुपथगामी बनि जाइत अछि।
दोस्तीम मे कुस्तीय। जखन अनुकुल एवं अपेक्षित व्य क्तिसँ झंझट भय जाइत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
दोहासौने बनियाँ दुन्नात। बनियाँक संग मोल-मोलाइ कयलापर ओ आर अधिक गीरह काटि लेत।
दौडि़कय चलब तँ ठेसिकय खसबे करब। वा दौडि़य ने चली ठेसिकय ने खसी। कोनहु कार्यमे आवश्य कतासँ अधिक तेजी देखौलापर कार्य गड़बरा जयबाक सम्भाँवना रहैत छैक।
धन ओ राजा धन ओ देस,
जहाँ बरिसय अगहनक शेष। अगहन मासक वर्षा अति हानिकारक होइत अछि, कारण उपजलहाक दाही अर्थात् धान बर्बाद होइत अछि।
धनके बाजय घाँटी,
निर्धनके घर माँटी। धनवान व्यघक्तिक गुणगान होइत रहैत छनि, किन्तुव निर्धन लग माटिक सिवा की रहैत छैक जे लोक पुछतैक ? घाँटी= घण्टीि, गुणगान।
धन घअल जाय नाच बढ़ल जाय। धन धटियो गेलापर जकर सामाजिक चलती बढ़ले जाइत छैक, तकरा लेल प्रयोग।
धन घटल जाय विधि बढ़ल जाय। धन घटि गेलाक बादो जखन पाबनि तिहार पर खर्च घटबाक बदला बढ़ले जाइत छैक।
धन घटल जाय मन बढ़ल जाय। अतिशय खर्च कयनिहार पर व्यंाग्यल।
धन जाय तँ धर्मो जाय। धन चलि गेलापर धर्म कर्ममे बाधा उत्प्न्नघ भय जाइत छैक, मोन मे कुविचार सेहो आबय लगैत छैक।
धन दडि़भंगा जे दोहरी अंगा। बाहरक लोक (बनियाँ, मारवाड़ी आदि) जखन मिथिला मे आबि किछुए दिनमे धनाढूय भय जाइत छथिक तँ प्रसंगवश एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
धन धनीके नाम बाबाजीके। ककरहु धनक बलपर केओ जखन यशस्वी बनैत अछि तँ व्यंेग्यापर्थ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
धन धराबय तीन नाम। पैघ लोकक धीया पुताक अनेक नाम रहैत छैक, कारण ओकरा अनेक लोककदुलार भेटैत छैक।
धन बढ़य तँ मानो बढ़य। आय बढि़ गेलापर रंग-विरंगक मनोरथ सेहो बढि़ जाइत छैक।
धन मे धन एकटा हुक्का । गरीब समधिनिक उपहास।
धनमेधन कठौत। भावना पूर्ववत।
धन मोरा हिया कि धन मोरा पिया। ककरो अपन पतिक प्रशंसा करैत देखि एहि उक्ति द्वारा चुटकी लेल जाइछ।
धनि लोकक बात सुनी,
गरीबक भात खाइ। पैघ लोकक ओहिठाम भोजनमे ओतेक आदरभाव नहि भेटत जतेक गरीबाक ओहिठाम भेटत।
धर धोकड़ी भीखक नहि आस। जाहिठाम सँ याचककेँ निराश लौटय पड़ैत छैक, ताहिठाम लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
धरम करैत जँ होअय हानि,
तैयो ने छोड़ी धर्मक बानि। परोपकरादि धर्म करबामे जँ किछु घाटा लागि जाय तथापि धर्म करबाक चाही, कारण आगाँ वैह कार्य दैत छैक तथा इहलोक परलोक बनि जाइत छैक।
धर्मक सोर पताल। धर्मक जडि़ ततेक दृढ़ छैक जे ओकरा केओ उखडि़ नहि सकैत अछि।
धर्महि धाधर पापहि वृद्धि। कोनहु धर्मात्माहकेँ कष्टज तथा पापीक प्रगति देखि निराशामे लोक उकत लोकोक्तिक प्रयोग करैत अछि।
धर्मो छूटल तुम्मो फूटल। कोनहु धर्मातमाकेँ गृहस्थाोश्रमक मायामोहमे ओझरा गेलापर एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
धानक आंगन पुआरे चीन्ही्। जनिका पैघ खेती रहैत छनि, तनिकर नार पुआरक टाल नमहर रहैत छनि।
धानक जाति पानि आ अजातिक जाति टाका। पानिक बलपर धान उपजैत अछि तथा टाकाक बलपर दुर्जनकेँ प्रसन्न राखल आ सकैछ।
धान खसय भागमन्तज केर,
गहूम खसय अभगलाकेर। शीश फूटबसँ पूर्व जँ धान खसैत छैक तँ ओ केहुनिया जाइत छैक तथा ऊपर मुँह भय अधिक उपजा दैत छैक, गहूम खसलासँ बर्बाद भय जाइत छैक, ओ सडि़ जाइत छैक।
धान खसय भागसँ गहूम खसय अभागसँ। दूनूक उक्ति एके अछि।
धान धरी मुँह होइछ लाबा। अत्यधधिक घबराहटिमे एहि प्रकारक उक्तिक प्रयोग होइछ।
धान पान नित्त स्नाबन। धान एवं प्रतिदिन जलक प्रयोजन पड़ैत छैक।
धान पान खीरा,
तीनू पानिक कीड़ा। खीराक खेतीमे सेहो झीसी फूँही‍क प्रयोजन पड़ैत छैक।
धान बजबे ने करय,
भूसा टन टन बाजय। मुख्यट पात्रक बदला सहयोगी जखन अधिक बाजय तँ एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जा सकैछ।
धार आ नहरि बान्ह ल जाइत छैक,
समुद्र कतहु बान्ह्ल जाय छोट समस्याुक समाधान कयल जा सकैत छैक, किन्तुा जँ ओ अनन्त रहय तँ कोना कयल जा सकैछ ? धार = नदी।
धिपत्नोस पानि आगि मिझाबय। कोनहु रूपमे पानिसँ आगि मिझयबे करत।
धिरिक जीवन तीसीक तीमन,
ताहूसँ करैला नीमन। घरमे बारम्बा र कठतिमना भेलापर एहि उक्ति द्वारा विरोध कयल जाइछ।
धी जमाय ओ भागिना,
ई तीनू नहि आपना। कहल गेल अछि जे कतबो देब-लेब करब तथापि बेटी, जमाय आ भागिन अहाँक घर छोडि़ अपन घर जेबे करत।
धी मारी पुतोहु लिअय त्रास। ककरो भयभीत करबाक हेतु अनका डाँअ-फटकार करय पड़ैत छैक।
धीया ने पूता मुँह चाटय कुत्ता। पैघ व्य क्तिकेँ जनिका सन्ता न नहि रहैत छनि, कूकुर बिलाडि़सँ ततेक स्नेकह भय जाइत छनि जे ओ कोरा-काँखमे खेलाय लगैत छनि।
धीया राँड नहि भेली,
धीया दुलारू भेली। पूर्वमे कम आयुक बेटीक विवाह कोनहु वृद्धसँ कय देल जाइत छलैक।
धीरे धन सबूरे बेटा। कहल गेल अछि जे धन धीरे-धीरे होइत छैक।
धीया पुता ककरो,
घीढारी करथि मंगरो सन्ताीनक सुख जखन केओ आने उठा लैत छैक।
धोबिक कूकुर, ने घरक ने घाटक। कोनो पटकैत काल ओ फाटि जाइत छैक।
धोबिक बापक किछु नहि फाट। कपड़ा पटकैत काल ओ फाटि जाइत छैक।
धोबिक बेटीके ने घरे सुख ने घाटे सुख। धोबीक कार्य छैक कपड़ाक सफाइ।
धोबियासँ तेलिया की घाटि,
ओकरा मुंगड़ा एकरा जाठि। धोबी मुंगरीसँ कपड़ा साफ करैत अछि।
धोबी पर धोबी बसय,
तखन कपड़ा इस्त्री परय। वा
तखन कपड़ा मे सर्फ साबुन पड़य। बाजारमे व्यपवसायीक बीच अधिक प्रतियोगिता रहलाहक कारण उपभोक्त सँ सुविधा प्राप्तल होइत छैक।
धोयलो भेँड़ी पाँक लगाबय। कार्य सम्प़न्ना होयबासँ पूर्व अनेक विघ्न बाधा उपस्थित होइत रहैत छैक।
धोल पखारल छागरमे थाल कादो लागि रहल। दूनू लोकोक्तिक एके थिक-एक प्राचीन दोसर नवीन।
नइ मिलल तँ नइ मिलल भारीतँ लागल। ककरहु मूर्खतापर व्यंाग्यै करबाक हेतु एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
नगद कायथ भूत, उधार कायथ देवता। नगद सामान कीनैत काल लोक खूब मोल-मोलइ करैत अछि।
नङटासँ पैगम्बरर डेराथि। बदमास व्यगक्तिसँ भगवानो भय खाइत छथि।
नङटे नाचय हजार देखय। दुर्जन व्यहक्तिक तमाशा अधिक लोक देखैत अछि।
नङटे पहिरी भुखले खाइ,
जहाँ मोन आबय तहाँ जाइ। सदिकाल पञ्चाङ्गक आधार पर दिन गुनि कार्य नहि करबाक चाही।
नटी पूत नड़हरा टीक। वेश्यात वा नर्तकीक बेटा बहुधा धार्मिक प्रवृत्तिक भय जाइत छैक, कारण ओ समाजसँ उपेक्षित रहैत छैक।
नदिया नाद संयोग। अत्यान्तर सुविधाजनक स्थितिमे एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
नदी तरक चास आ वैरी तरक वास। नदीक कातक खेतक कोनो भरोस नहि, कखन ओ भासि जाय, तहिना पड़ोसिया जँ शत्रु रहय तँ बड़ खतरनाक स्थिति होइत छैक।
ननदि घरमे आगि लागल,
केओ ने मिझाबय हे। ननदिक घरक समस्या।केँ कोनो जनी अपन समस्याघ नहि बुझैत छथि।
नरमे नौआ पंछी मे कौआ। जहिना पक्षीमे कौआ चतुर होइत अछि तहिना मनुष्ये मे हजामकेँ चतुर मानल गेल अछि।
नवका गजेड़ीकेँ बड़ेरीमे धूआँ। नवसिखुआसब अधिक जमौड़ा करैत अछि।
नव जोतषी पुरान वैद्य नीक। शास्त्री-पुराणमे ज्ञान-विज्ञानमे निरन्ततर खोज चलैत रहलाक कारण नवका विद्वान अधिक अद्यतन ज्ञान रखैत छथि।
नव तुरुक प्या्जु खायमे राकस। कहल जाइत छैक जे प्यायजु लहसुनक व्य वहार केवल मुसलमानमे छलैक।
नवका दरोगाके पालकी पर बोरसी। नव हाकिम अधिक जमौड़ा करैत अछि।
नव दरोगाके गिरगिट पर डंका। एकरहु भावना पूर्ववते अछि।
नव जोगीके कथीदनमे जटा।
नव जोगी के दाढ़ी-मोछमे जटा। नवसिखुआ किछु अधिके जमौड़ा करैत अछि।
नव विवाहित के सासुरक धन अपने बुझाइत छैक। नव विवाहित युवक जखन सासुरक समस्याा पर अतिधक दौड़ धूप करय लगैत अछि तँ एहि उक्तिक प्रयोग द्वारा व्यं ग्या कयल जाइत छैक।
नव मुसलमान तीन बेर कऽ नमाज पढ़य। नव सिखुआ अधिक फोकसबाजी दैत अछि।
नवसिखुआ वैद्य जान मारय। नव डाक्टवर अनुभवक अभावमे किछु दिन असफल रहैत छथि।
नव जोगीकेँ किदनमे जटा। वा
नव जोगीकेँ डाँड़मे जटा। नवसिखुआक फोकसबाजी पर व्यं गय।
नतिनी सिखौल बूढि़ दादीकेँ। नवका लोक जखन बूढ़-पुरानक समक्ष अपन बुद्धिमानीक बखान करय लगैत अछि तथा चालाकीसँ किछु चाहैत अछि तँ उक्तष लोकोक्ति द्वारा विरोध कयल जाइछ।
नव घर उठय पुरान घर खसय। पुरान लोक जखन थाकि जाइत छथि तँ नवका उठैत अछि तथा कार्य सम्हाँरबाक चेष्टाठ करैछ।
नढि़याक मन बसय ककडि़क खेत। जकरा जे रुचिगर लगैत छैक तकरा ध्याकन चलि जाइत छैक।
ननदो हे तोहरो ननदी। जे अनका लेल काँट ओछबैत अछि तकरा अपनो एकदिन गड़बे करैत छैक।
ननमूही टाड़ी गाम बिगाड़ी। छोटकी टाड़ीक चलते गामक नियम खराप भय गेल।
नपबाक बेत्रेक उपास। केवल व्यतवस्था कयनिहारक ढिलाइसँ कोनो महत्त्वपूर्ण कार्य जँ रहि जाइत अछि तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
नफाके धाबय मूर गमाबय। जे मुनाफापर अधिक दौड़ैत अछि से मूरो गमा बैसैत अछि।
नया नया राज भेल, गगरी अनाज भेल। नवका लोकक राजपाट पर पुरान लोक द्वारा एहि उक्तिक माध्य मसँ आलोचना।
नया नौ गंडा पुरान छी गंडा। नवका नौ गंडा पुरना छौ गंडाक बरोबरि।
नया नौ दिन पुरान सबदिन। एहू लोकोक्तिमे पुराने वस्तु केँ अधिक टिकाउ मानल गेल अछि।
नरकहुमे ठेलम ठेला। जाहि सामान्य वस्तु केँ केओ नहि पूछैत अछि, ताहूलेल जखन मारामारी हूलि-मालि मचल रहैत अछि तँ एहि उक्ति द्वारा अनिच्छात व्यिक्तव कयल जाइछ।
नव गायत्री। पुरान परम्पिराकेँ छोडि़ जखन केओ नव विधान प्रारम्भ करैत अछि तँ विरोधमे एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
नव बहुरिया करैल मे झोर। पूर्वमे करैलक तरकारीमे झोर नहि पड़ैत छलैक।
नव मुसलमान अण्डाक खायमे राकस। नवसिखुआक अतिरेकपूर्ण व्यडवहार पर व्यंखग्यर।
नव मुसलमान खुदामीयाँ लय बेहाल। एकरहु भावना पूर्ववते अछि।
नव मुसलमान दस बेर नमाज पढ़य। भावना पूर्ववत।
नव विवाहितकेँ सासुरक कौआ सेहो उज्जिरे लगैत छैक। विवाह भेलापर युवावर्गमे सासुरक प्रति आकर्षण अधिक रहैत छनि।
नहाइ गुँहडबरामे आ करी एकादशी। असंगत कार्य कयनिहार लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
नहिराक अलहन सुसुराक ढीठ,
बाट चलैत नहि झाँपथि पीठ। जे नारी अपन नैहरमे बदमासि तथा सासुरमे ढीठ व्यरवहार करैत अछि, श्रेष्ठय लोकक धाख नहि मानैत अछि, तकरा लेल एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
नहु-नहु बोल रोतानि बजैछथि,
काँख तर छुरी करेज कटैछथि। कोनो पैंचियल स्त्रीटक लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
नहिरा जो बेटी ससुरा जो,
बहियाँ डोला बेटी कतहु खो। अपन परिश्रमक बलपर अहाँ कतहु गुजर कय सकैत ही।
नहिरो दुर-दुर, सासुरो दुर-दुर,
जेहो बिआहलक सेहो दुर-दुर। कोनहु दुर्जन स्त्रीरक निन्दा मे एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
नाक ने कान बालीके अरमान। समुचित मुँह-कान (आर्थिकम स्थिति) नहियो रहैत जे नीक मनोरथ रखैत अछि तकरा लेल प्रयोग।
नाक ने कान बीचमे दोकान। भावना पूर्ववते अछि।
नाङडि सुटकन्तेम् जात खरहीमे। ककरो भयभीत भय पड़ा जयबाक दृश्यहकेँ मिथिलामे संस्कृडतक एहि अशुद्ध पंक्ति द्वारा चित्रित कयल जाइत अछि, तेँ एकहरा मैथिली लोकोक्तिक कोटिमे राखल गेल अछि।
नाचय ने आबय तँ अङने टेढ़। अपन दोष नहि मानि जे अनकर त्रुटिक कारण असफलता मानैत छथि, अनका दोष दैत छथि तनिका लेल उत्नकर लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
नातीके गाँती नहि बिलाडि़केँ जमा। अपन लोकक आदरे नहि, किन्तुो तुच्छप व्य क्ति लेल जे हरान रहैत अछि, खर्च करैत अछि, तकरा लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
नानाक आगाँ ननिहालक बात। वा
नानाक आगाँ मातृकक परिचय। उचित परिचय देनिहारक समक्ष अन्दा्जी गप्प करबाक कोन प्रयोजन ? ज्ञाताक समक्ष जखन आनो डींग हँकैत अछि तँ एहि उक्ति द्वारा व्यंोगय कयल जाइत छैक।
नानीक धन जजमानीक धन,
बैमानीक धन नहि रहैत छैक। मातृकक धन, पुरो‍हितीक धन तथा भ्रष्ट चारसँ प्राप्तत धन अधिक दिन नहि टिकैत छैक।
नानी मरल नाता टुटल। जाधरि माताही जीबैत रहैत छथि ताधरि मातृकमे अधिक मानदान होइत छैक, बादमे अबरजाती कम भय जाइत छैक।
नाम ऊँच कान बूच। नामी व्यकक्तिक क्रिया जखन न्यूधन होइत छनि तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
नाम पैघ दर्शन छोट। पैघ व्य क्तिक ओहिठाम छोटाह व्यिवहार देखि एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
नाम बड़का करनी कुत्ता। पैघ जखन कोनो कुकर्म मे पकड़ाइत छथि तँ लोक अवाचो कथा कहैत छनि।
नाम बिगाड़य माय-बाप
पेट बिगाड़य बसिया भात। माता-पिता दुलारमे निरर्थको शब्द क प्रयोग नामक रूपमे करैत छथिन।
नाम मिसरीलाल गुण गूड़ोक नहि। नामक अनुरूप जकर व्यडवहार नहि रहेत छैक, अपितु विपरीते गुण रहैत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
नाम गुंलाब सुगन्ध क पतो नहि।
नाम दाताराम करनी एछीया।
नाम पृथ्वीमपति धनक पते नहि।
नाम भवानी मुँह छुछुन्नधरि सन। तमाम लोकोक्तिक एक रंगाहे।
नामी चोर कुंजा । वा
नामी चोर बहदुरबा। केओ आनो यदि अपराध करैत अछि तथापि नामी अपराधीक पहिने खोज होइत छैक।
नामी बनियाँक किदन बिकाय। वा
नामी बनियाँक मोछ बिकाय। प्रसिद्ध व्य क्तिकेँ अनायास यश प्रतिष्ठा भेटि जाइत छनि।
नामी मरय नाम लय पेटू मरय पेट लय। जे व्यरक्ति समाजमे प्रतिष्ठित रहैत छथि, तनिका प्रसिद्धिक सतत् ध्या्न रहैत छनि; किन्तुप जकर कोनो प्रतिष्ठाा नहि रहैत छैक से केवल पेट लेल बेहाल रहैछ।
नाव भासल जाय खेबालय मारि। कार्य पर ध्याखन नहि दय जे केवल मजदूरी लेल बेहाल रहैत अछि तकरा लेल प्रयोग।
निकटी हाथक खाइ मुदा उकटी हाथक नहि खाइ। कोनो गरीबो उदार भय सकैछ।
निकौडि़या गेला हाट,
काँकडि़ देखि हिया फाट। जकरा धन नहि छैक तकरा साधारणो वस्तुधक सेहन्ताध होइत रहैत छैक।
निकहा दिनमे सब मित्र। अनुकूल समयमे सब अनुकुले रहैत छैक।
निचिन्तस सूतय हेहू,
जकरा गाय ने गोरू। आलसी अकर्मण्यो व्यहक्तिक लेल व्यंरग्या र्थ प्रयोग।
नित्तहि खेती दोसरे गाय,
जे नहि देखय तकर जाय। खेत-पथारक निरीक्षण प्रतिदिन करबाक चाही तथा माल जालक निरीक्षण दोसरो दिन अवश्यम कय ली अन्योथा चौपट्ट भय जायत।
नामी चोर बदनामी बनियाँ पकड़यबे करय। बदनाम व्यबक्तिपर सर्वप्रथम सन्दे ह होइत छैक।
नित्त उपासकेँ के दिअय रोज,
नित्त रोगीकेर के करय खोज। जकरा प्रतिदिनक कोनो अनुचित अभ्यामस वा लुकुम भय जाइत छैक, तकरा लोक महत्त्व देव छोडि़ दैत छैक।
निपने पोतने देहरी,
पहिरने ओढ़ने मेहरी। घर-आङनकेँ जतेक साफ-सुथरा ततेक नीक लागत।
निपुत्रीक मुँह देखी, सात साँझ उपास पड़ी। ककरहु पर क्रोध-प्रदर्शनक हेतु कोनो बहाना बना लेल जाइत छैक।
निमोछियाक बोहु सबहक बोहु। दुर्बल व्यबक्तिक उपहास लेल प्रयुक्तु।
निरगुन गाबय धक्काक पाबय,
डाँड़ घुमाबय टक्का् पाबय। जाहिठाम उपदेश देल जाइत छैक, धार्मिक अनुष्ठा न होइत छैक, शास्त्री य संगीतक आयोजन रहैत छैक, ततय नहि जुटैत छैक, किन्तुै कोनहु नाच तमासामे भीड़ भड़क्काह अनेरे जुटि जाइत छैक।
निरगुन गाबी धक्काे पाबी,
बात बनाबी टक्काक पाबी। एकरहु भावना पूर्ववते अछि।
निर्धनकेँ बहु भावना,
निर्बलकेँ बहु क्रोध। गरीब मोन उदार होइत छैक, किन्तुम दुर्बलकेँ क्रोध अधिक होइत छैक।
निर्बल के बल राम। जकरा केओ देखनिहार नहि रहैत छैक तकर स्वओयं परमात्माै करैत छथिन।
निश्चिन्तद सूतय कुम्हाकर,
जकर माटियो ने लऽ जाय चोर। जकरा लगमे महत्त्वपूर्ण सम्पहत्ति नहि तकरा चोरि वा डकैतीक कोन भय?
नीकक संग रहब तँ खायब बीड़ा पान, अधलाहक संग रहब तँ कटायब दूनू कान। वा
नीकक संग रही तँ खाइ गूआ पान, अधलाहक संग रही तँ छेदानी दूनू कान। सदा सर्वदा नीके लोकक संग रहबाक चाही।
नीक संग नीके बुद्धि होइत छैक। प्राज्ञोक्ति। अर्थ स्पइष्ट ।
नीच ऊँचे करी चास,
भाइ भतीजे करी बास। खेती दूनू प्रकारक जमीनमे (उँचका निचका) करबाक चाही, कोन ठेकान कोन साल केहन मोसम रहत! तहिना सब समांग मे एकता रखबाक चाही, लगले भिन्न भिनाउज नहि कय लेबाक चाही।
नून-लेल पैंच भेल सेनुरो सपन भेल। कोनो नारी अपन दयनीय आर्थिक स्थितिक परिचय एहि उकित्‍ द्वारा करबोत छथि।
ने अति वक्ताि ने अति चूप,
ने अति बरखा ने अति धूप। अधिक बजनाइ वा एकदम चुप भय गेनाइ, सदा चुप रहनाइ दूनू अधलाह मानल गेल अछि।
ने आगाँ नाथ ने पाछाँ पगहा। जनिका केओ आगाँ-पाछाँ स्त्री एवं धीयापुता नहि रहैत छनि, बिना कोनो झंझटक सुख शन्तिसँ रहैत छथि, तनिका पर व्यंुग्य करबाक हेतु एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
ने ऊधो के लेना ने माधोके देना। जकरा ककरहुसँ कोनो मतलब नहि रहैत छैक, अपनाकेँ सबसँ पृथक मानैत अछि से एहि उक्ति द्वारा अपनाकेँ स्वापवलम्बीस प्रमाणित करबाक चेष्टाक करैत अछि।
ने ओ देवी ने ओ कराह। पूर्वानुमान वा निर्धारित परिस्थिति जखन समाप्तन भय जाइत छैक, जकरा लेल आहि अबैत छैक अर्थात् नीक परिस्थिति समाप्तक भय गेलापर एहि उक्तिक प्रयोग यकल जाइछ।
ने ओ नगरी ने ओ ठाम। एकरो भावना पूर्ववते अछि।
ने कयलहुँ नैहरे सुख,
ने देखलहुँ पियाक मुख। अतिशय दुखी नारी अपन दर्दशाक बखान करैत काल एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथि।
ने जाइ ओ टोल ने सुनी ओ बोल। जे कोनो विवादास्पुद मामलामे दूर-दूर तक अपन सम्बवन्ध‍ नहि रखैत छथि तनिका द्वारा एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
ने दौडि़कय चली ने ठेसिकय खसी। जे व्यिक्ति अधिक तेजी नहि देखबैत छथि से खतरसँ सेहो दूर रहैत छथि।
ने नीपय जोगरने तोतय जोगर। अकर्मण्यज व्योक्ति लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
ने बिअइली अपन मइया,
ने भेल सहोदर भैया। जाहि जनीकेँ सोदर भाइ नहि रहलाक कारण अनकर खुशामद करय पड़ैत छनिा, से एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथि।
ने मरैछी ने जीबैछी,
हुकुर-हुकुर करैछी। जे अतिशय दुर्दयशागस्तु रहैत छथि से अपन स्थितिक बखान एहि लोकोक्ति द्वारा करैत छथि।
नेम टेम गोपाल सन,
करनी चमार सन। जे केवल ऊपरसँ फोकसबाजी देखबैत छथि, किन्तुल क्षुद्र स्वबभावक परिचय दैत छथि।
ने रहत बाँस ने बाजत बाँसुरी। जकरा कारण झंझट होइत छैक ताहि मूले वस्तुककेँ जखन समाप्ता कय देल जाय तँ झंझट कथीलय होयत ?
ने राधाकेँ नौ मन घी हेतनि ने राधा नचती। कोनो कार्य जखन असम्भहव रहैत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग द्वारा नकारात्मैक उत्तर देल जाइत छैक।
ने शिवगंगा ने शिवथान,
बाटहि बाटमे गेल परान। मनोनुकूल स्थापन धरि पहुँचबामे जखन अतिशय कष्टल होइत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
ने साओन हँसबाक जोगर,
ने भादव दुसबाक जोगर। आषाढ़-श्रावणमे जे परिश्रम करैत छथि तनिकर खेती भादव-आसिनमे देखबाक जोगर रहैत छनि, प्रशंसनीय रहैत छनि।
ने हम कूटब ने हम पीसब ने हम बनायब, मुदा हमरा गरमे गरम चाही। कोनो जीहक पातर अकला लोक पर व्यं ग्यल।
नीचा पंच ऊपर परमेश्व‍र दूनू बरोबरि। पंचकेँ अति आदर देबाक हेतु एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
नीम खयलाक बाद गूड़क स्वाुद भेटैत छैक। कष्टख उठौलाक बादे सुखमे आनन्दे प्राप्तं होइछ।
नीर एवं नारीकेँ ढरैत देरी नहि लगैत छैक। जहिना जल नीचाँदिस ढरकि जाइत अछि तहिना नारी सेहो आकर्षण दिस सहज झुकैत अछि।
नूआतँ धोबी धो देत,
मुदा मुँह के धो देत? जकर जेहन मुँहकान एवं स्व?भाव रहैत छैक ताहिमे सुधार होयब कठिन रहैत छैक।
नूआ लेलियइ झूल लेलियइ गेलियइ पड़ाकऽ सासुके जेमाया लगलइ लऽ एलइ बजाकऽ जे जनी क्षणहिमे सँ सैत छथि आ क्षणहिमे बौंसाइयो जाइत दथि तनिका लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
नेता हैब तँ खैब की? सामाजिक एवं राजनैतिक क्षेत्रमे इमानदारीसूं जे केओ कार्य करैत छथि हुनका आर्थिक तंगी अधिक रहैत छनि।
नैहर पकाबी खीर-पूरी, सासुर महैछी घोर, अपन पिया परदेस बसैछथि, नयन ढरैअय नोर। जाहि जनीकेँ नैहर-सासुर दूनूठाक अधिक कार्य करय पड़ैत छनि, किन्तुअ पतिक अनुपस्थितिमे सासुरमे अधिक कष्टद छनि, तनिका लेल प्रयोग।
नैहर बहलहुँ तोर,
तीनसेर मड़ुआ चलय न मोर। उचित मजदूरी प्राप्तष नहि भेलापर एहि उक्ति द्वारा व्यंनग्यट कयल जाइछ।
नोख मजूरी खेख काम। नीक मजदूरी देबैक तँ कार्यो नीक होयत।
नोखि छौंडीकेँ चोख सौदा। वा
नोखि माउगकेँ चोख सौदा। भेषेँ भीख भेटैत छैक।
नोखि नाउनिकेँ बाँसक नहरनी। कोनो ठकनिहार व्यँक्ति पर व्यं ग्यए करबाक हेतु एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
नोखि ना‍रिकेँ बड़हरक झुमका। एकरहु भावना उपर्युक्तेब अछि।
नोखि बनियाइनिकेँ भरिघर बटखरा। भावना पूर्ववते।
नोन-तेलक नाम नहि,
भनसीयाक हाथ जस नहि। तीमन तरकारी बनयबामे तेल मसालाक प्रयोजन पड़ैत छैक।
नोन ने तेल छुच्छेत धकेल। बिना खर्चेक यश देबाक विवशता पर व्यं गय।
नौआ कतहु अपन माथपर अस्तूशरा चलाबय? स्वंयय केओ खतरा मोल नहि लैत अछि।
नौआ कतहु अपन माथपर अस्तू रा चलाबय? स्वबयं केओ खतरा मोल नहि लैत अछि।
नौआ देखने काँख बढ़य। सहज उपलब्धक भय गेलापर जखन देखाँउस लागय लगैत छैक, आवश्येकताक अनुभव होमय लगैत छैक तँ व्यं ग्याखर्थ एहि लोकोक्तिक प्रयोग होइछ।
नौआ धोबी दर्जी,
तीनू जाजि अलगर्जी। पौनी-पसारी अधिक खुशामद करबैत अछि।
नीचाँ पंच ऊपर परमेश्वकर। पंचकेँ भगवान मानल जाइत अछि।
नौआक घरमे चोरी भेल,
तीन चोंगा अस्तूभरा गेल। जकरा घरमे जैह रहैत छैक, चोरिमे सैह जाइत छैक।
नौआक बरियाती ठाकुरे ठाकुर। हजाम अपन नाममे ठाकुर उपनाम लगबैत छथि।
नौकरीक आमद आ तारक छाँह। तारक गाछ तर विशेष छाहरि नहि होइत छैक, तहिना नौकरीक मात्रसँ गुजर चलब कठिन।
नौकेर लकड़ी नब्बेह खर्च। जाहिठाम मूल खर्चसँ ओकर आने खर्च अधिक रहैत ताहिठाम एकर प्रयोग कयल जाइत अछि।
नंगट के टू बंगट लागय, चूड़ा के दू मूसर, मौगीके मरदबा लागय तब तीनू घर कुसल। दुर्जनकेँ दुर्जने सूं भिड़यबाक चाही।
नौकरी करी तँ सरकारी,
खेती करी तँ तरकारी। सरकारी नौकरीमे अधिक लाभ होइत छैक तहिना तरकारीक खेतीमे अधिक आर्थिक लाभ प्राइज़ होइछ।
पकला जौक पाथर। समस्याौक समाधानक अन्तिम चरणमे सब किछु चौपट्टभय गेलापर एहि लोकोक्तिक प्रयोग होइछ।
पगला चौदह पगली आठ,
एतबे व्रतकय जीवन काट। वर्ष भरिमे पुरुष पक्षक चौदह तथा मातृपक्षक आठ व्रत अवश्यच करी।
पछतीया रोटीक पछतीया बुद्धि। रोटी बनबैत काल अन्तिम रोटीकेँ पछतीया रोटी कहल जाइत छैक, जकरा खायबलाक बुद्धि मन्दइ तेहन भय जाइत छैक जे उपयुक्तम समय बीति गेलाक बादे कोनो बात फुराइत छैक।
पड़लेँ पाबह ठौरहिँ ताक। मनोनुकूल परिस्थिति उत्पीन्ने भय गेलापर प्रसन्नलता व्यीक्ते करबाक लेल प्रयोग कयल जाइछ।
पड़ोसिन भातो सिहइली, उपासो सिहइली। नारीकेँ पड़ोसिनिक सबकथूक सेहन्ताउ होइत रहैत छनि, हुनकर नीकोक सेहन्ताि आ अधलाहोक सेहन्ताि।
पढ़ब सिखाबी तँ फारि खाय। नीक कहैत जँ अधलाह हाथ आबि जाय।
पढ़य फारसी बेचय तेल,
देखिह‍ भाद करमके खेल। अधिक पढ़ल व्यचक्ति जखन व्य।वसायमे लागि जाइत छथि, वि
द्वान जखन कोनो फेरीमे पडि़ जाइत छथि तँ एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
पढ़ल लिखल तेरहे बाइस, नाम विद्यासागर। मूर्ख व्यरक्तिक नाम जँ विद्वान सन राखि देल जाय।
पढ़ल लिखल साढ़े बाइस,
कोट धरि भेल चाहय अंगरेजी। योग्यलताक अभाव रहितहुँ जे पैघत्वनक आडम्बलर करय, तकरा लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जा सकैछ।
पड़ोसियाके घोड़ा मोरा हीँ-हीँ-ही-हीँ। अनकर धन पर जे घमण्डर करैत छथि, ठहाका लगबैत छथि वा जे अनका दूसैत रहैत छथि तनिका लेल प्रयुक्तद।
पतिसँ पलखति नहि देओर मांगथि किदन। समयक अभाव रहितहुँ जखन केओ काय्र कराबय चाहेत्अतछितँ जनिका पलखति नहि रहैत छनि से एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथि।
पर घर नाचथि तीन, कायथ बैद दलाल। कायस्थन (कर्मचारी), चिकित्सकक एवं दलाल (दरबारी) ई तीनू अनका घर अधिक दौड़ैत छथि-आर्थिक लाभ लेल।
पर धन बान्ह य कपड़ा फाटय। अनकर धनक अपहरण कयनिहारकेँ स्वफयं क्षति उठबय पड़ैत छैक।
पर घर नाचय मूसरचन्दक। मूस अनकहि घरमे कूदैत रहैत अछि।
पर बस बन्दार सुख की जानय? पराधीन व्याक्ति सुखी अनुभव नहि कय सकैछ।
परमुण्डे फलाहार, करय ने ढेकार। अनका सिरे भोजन कयनिहार पर व्यंिग्यक।
पमरियाक तेसर। जे व्यकक्ति कोनो कार्य नहि कय केवल झूण्डयमे घोसियाकय रहैत अछि आ हँ मे हँ मिलबैत रहैत अछि तकरालेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
पर सिरे खाइत छी आ पानि जकाँ दिन जाइयै। आलसी व्यैक्तिक लेल एहिउक्तिक प्रयोग होइत अछि।
पराधीन सुख सपनहुँ नाही। चाकरी कयनिहार वा जेलमे बन्दए व्योक्तिकेँ स्परप्न हुमे सुख नहि भेटैत छैक।
परिकल नढि़या ककडि़क खेत। लोभमे फँसल व्यकक्ति पर व्यं ग्यै।
परिकू-परिकू मूसक माय,
एक बेर झपटब जीबे जाय। लोभमे परिकल व्येक्ति जखन पकड़ा जाइत अछि वा पकड़यबाक सम्भा्वना रहैत छैक तँ एकर प्रयोग कयल जाइछ।
परिकौल सँ झरकौल नीक। स्नेौह देखोलाक कारण जखन केओ माथ पर चढ़य लगैत छैक तँ क्रोधवश एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
पलासकेँ पात तँ राड़केँ भात नहि,
राड़केँ भात तँ पलासकेँ पात नहि। जखन गरीबक घरमे अन्नक नहि रहैत छैक (ग्रीष्मरसँ शरद धरि) तँ पलास वृक्षमे नवपल्लरव होइत छैक, किन्तुत अगहन मे, जखन गरीबक घरमे नपका धान अबैत छैक तँ पलासक पात ठण्ढीनमे गलिकय झरि जाइत छैक।
पहिने अपने खा ले गे लबरी तखन बैन परसिंहेँ। जीहक पातरि नारी वा लोभी पुरुषक लेल प्रयोग कयल जाइत अछि।
पहिने पेटपूजा तखन काम दूजा। पेटू व्यटक्ति जे पूजा पाठ नहि कय केवल मुँहे चलबैत रहैत अछि, एहि लोकोक्तिक प्रयोग करैछ।
पहिने भाव तखन भात। ककरहुद्वारा भोजन करायबसँ पूर्व ओकर स्नेुह देखल जाइत छैक।
पहिने भाव तखन भोजन। एकरो भावना ओहने अछि।
पहिने काँकडि़ पाछँ धान,
तकरा कही पूर किसान। जाहि खेतमे चैत-वैशाखमे फूँटि काँकडि़ तरबुन उपजोल जाइत छैक, ताहिमे धानक फसिल नीक होइत छैक।
पहिने भीतर तखन देवता-पितर। पेटू व्यतक्तिक हेतु एहि लोकोक्तिक प्रयोग होइछ।
पहिरी धनिकाइन जकाँ, राखी गरीब जकाँ। वस्त्रानभूषणकेँ खूब व्यगवस्थित रखबाक वा पहिरबाक चाही, जाहिसँ अधिक दिन धरि ओ नवे बनल रहय।
पहिरैत अछि सब झमकबैत अछि केओकेओ। अपन उपलब्धिकेँ जे अधिक प्रचारित करैत अछि अधिक जमौड़ा करैत अछि तकरा लेल प्रयोग।
पहिल कसूर भगवानो माफ करैत छथिन। गल्लीक कयनिहार व्यैक्ति सजायक भयसँ एहि लोकोक्ति (प्रोज्ञोक्ति) द्वारा क्षमायाचना करैत अछि।
पहिल पहरमे सबकेओ जागय,
दोसर पहरमे रोगी,
तेसर पहरमे चोरबा जागय,
चारिम पहरमे जोगी। नौबजे राति धरि सब जगैत अछि,बारह बजे धरि जनिका नीन्दग नहि अबैत छनि से (रोगी) जगैत अछि।
पहिल मारि धरहरिया खाय। दू पक्षमे संघर्ष प्रारम्भन होइत छैक तँ जे छोड़बय जाइत अछि तकरे पहिने मारि लागि जाइत छैक।
पहिलुक नीपल गेल दहाय,
आबक नीपल देखल जाय। वा देखू हे दाइ। पूर्वक कार्यमे विघ्ना पडि़ गेलाक कारण फेर प्रारम्भाहिसँ जखन कोनो कार्य करय पड़ैत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
पहुनमे बेचि खचर्ची। दयनीय आर्थिक स्थिति बाहरसँ प्रीतष्ठा मुदा भीतरसूं फकाकसीक स्थिति पर व्यं ग्यस।
पाकल आम सोहाओन,
पाकल मरद घिनाओन। सामान्यदत: बूढ़ भय गेला पर पुरुष आकर्षणहीन भय जाइत अछि।
पाँच कौर भीतर तब देवता-पितर। पेटू व्य क्ति पूजापाठसूं अधिक पेटकेँ महत्त्व दैत अछि।
प्रतिष्ठेभ नाङडि कटाबी तँ छौ मास व्यतथे मरी। देखाँउस कयनिहार व्य।क्ति कखनो फँसियो जाइत अछि।
पाँच मीलि जे करी काज,
हारने जितने नहि लाज। सामूहिक निर्णय कयलाक बाद कोनो चिन्ताक नहि रहि जाइत छैक।
पाँचहि मित्र पचीसहि ठाकुर। मित्र पाँचहु टाकामे मानि जयताह किन्तुय हजाम ठाकुर केँ जा पूरा लेनदेन नहि करबनि ता सन्तु ष्टन नहि हेताह।
पाँचो आंगुर बरोबरि नहि होइत छैक। अपन दोष नुकयबाक हेतु लोक एहि उक्तिक प्रयोग करैत अछि।
पात खड़खड़ायल कि बन्दाो पड़ायल। डेरबुक व्याक्ति संघर्षमे अनेक दुब्बै ल व्यिक्ति पिया जाइत अछि, तबाह भय जाइछ।
पातो छुआयल कुकुरक जातियो चिन्हाुयल। पानि छुआयल कुकुरक जाति चिन्हाकयल। एकहि बेरक जाँचमे जखन कोनो छुद्र व्यिक्ति देखार भय जाइत अछि तँ एहि उक्ति सभक प्रयोग होइछ।
प्रातकाल जे रोज नहाय,
तकरा देखि वैद पछताय। जे व्येक्ति प्रतिदिन प्रात:स्नाकन करैत अछि, तकर स्वा‍स्य्िद ठीक रहैत छैक।
पादय देवानजी नाम टहलू के। केओ व्यवक्ति जखन अपन दोष कोनो दोसर व्य क्ति पर आरोपित कय निकलि जाय चाहैत अछि तँ आरोपित व्योक्ति एहि उक्तिक प्रयोग द्वारा कटु आलोचना करैछ।
पान देने सातु नहि पनही देने पूजा। नीक लोक बनने कार्य नहि चलैत छैक।
पान सन रोटी पहाड़ सन दिन,
कोनाकऽ काटब पहाड़ सन दिन ? कम मजदूरी भेटला एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
पानि पीबी छानिकय, गुरु करी जानिकय। अशुद्ध जल नहि पीबाक चाही, तहिना किनको दीक्षा गुरु बहुत विचारिकय बनाबल चाही-बादमे पछताय नहि पड़य।
पानि पीबी छानि कय, बात बाजी जानि कय। अलगटेट जकाँ लब-लब नहि बाजि नीकजकाँ सोचि-विचारिकय बजबाक चाही।
पानि बरिसय आधा पूस,
आधा गहूम आधा भूस। आधा पूसक बाद अर्थात् जनवरीमे वर्षा भेलापर गहूम मे फोकला अधिक होइत छैक।
पानीमे मछरी नौ-नौ कुटिया बखरा। भविष्य क गर्भहिमे कोनो सफलता रहला पर जँ ओकर उपभोगक योजना बनौल जाय लगैछ तँ व्यं ग्यायर्थ प्रयोग।
पापक घेल फुटबे करय। अनुचित कार्यकेँ बहुत दिनधरि गुप्ता राखल जा सकैत अछि।
पानिमे रहिकय कतहु गोहिसँ गोलैसी होइक? अड़ोसी-पड़ोसी सँ मिलान नहि रखनिहार कहियो काल भयंकर फेरीमे पडि़ जाइत छथि।
पाव भरिक देवी सेर भरिक पूजा। ओकादसँ अधिक ककरो सम्मा न देलापर व्यंसग्यस।
पासीक गवाह पियक्कसर। पासी एवं पियक्क्र (तडि़पिब्बाह) मे अन्योएन्यामश्रय सम्बान्ध‍ रहलाक कारण एक दोसराक अनुकुल रहैत अछि।
पहिरने छी ओढ़ने छी सीकापर डोलैछी। नीक वस्त्राढभूषण पहीरिकय जे ऐठैत चलैत अछि तकरा पर व्यंतग्यि।
पाहुन अबैत छथि अपना मोनसँ,
मुदा जाइत छथि घरबैयाक मोनसँ। प्राज्ञोक्ति। अर्थ स्पमष्ट ।
पितरक बलपर एतेक गुमान। कुटुम्बलक बल पर जखन केओ घमण्डै प्रदर्शन करैत अछि तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
पिता पतितो भला। पितामे कतबो दोष होइन तथापित ओ श्रद्धेय छथि।
पितायल बिलाडि़ धुरखुर नोचय। ‘ खिसिआयल बिलाडि़ धुरखुर नोचय’ जकाँ एकरो प्रयोग हाइत अछि।
पियासल लोक इनारलग अबैत अछि, इनार कतहु पियासल लग जाइक? अर्थ स्पुष्टज।
पिया सुनरा कि हम सुनरी,
गामक लोक बनरा-बनरी। अपन एवं पतिक मिथ्याि प्रशंसा कयनिहारि नारी पर व्यं ग्या।
पीसब मड़ुआ तँ उलायब कि गहूम? जेहन कर्तव्यँ करब तेहने फल प्राप्ति होयत। व्यं्ग्य ।
पुत्र शोक सहल जाइत छैक,
धनक शोक नहि सहल जाइत छैक। प्राज्ञोक्ति। अर्थ स्पैष्टफ।
पुतोहु-पुतोहु रटली,
पुतोहु देखि धसि मरली। कोनो सासु अपन पुतोहुक निन्दापमे एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथि।
पुरिबा बहल तँ सुखायलो घाव फोफनायल। प्राज्ञोक्ति । अर्थ स्पाष्टद।
पुरान कपड़ा आ बैमान आदमी। जहिना पुरान कपड़ा पर विश्वाोस नहि, कतय धोखा दय देत, तहिना बैमान आदमी पर सेहो कोनो भरोस नहि।
पुराने चाउरक पथ्य होइत छैक। कोनो बूढ़ पुरान लोक द्वारा जखन समस्याूक समाधान कय देल जाइत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग द्वारा बूढ़ लोकक प्रशंसा कयल जाइत अछि।
पुरुष उपजाबय धान तँ मौगी लछनमान। पतिक प्रशंसामे एक जनी दोसर जीनसँ छथिन।
पूजासँ दण्डावत भारी। मूल कार्यसँ अधिक झंझट जखन ओकर आनुषंगिक कार्य मे होइत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
पूजासँ अधिक भीड़ सीधा पहुँचयबामे। पुरहितक अपमान बोधसँ घर घुरि अयला पर जखन यजमान सिदहा एवं दिक्षण पहुँचयबाक हेतु गेलाह त खूब पिटाइ लगलनि।
पूजी अछिए ने दोकान छनने छी। बिना ओकादक कार्यमे हाथ लगौनिहार पर व्यं ग्ये।
पूजी भेल सियान दुख भेल बिरान। पुत्र जखन वयस्कद भय कमाय लगैत छैक तँ दु:ख दूर भय जाइत छैक।
पूत मांगय गेलहुँ, कोखि गमाकय अयलहुँ। पुत मांगस गेलीहि भतार खाकय अयलहि। चौबे जखन छब्बेहक बदला दूबे कहाकय अबैत छथि तँ नारीलोकनि एहि उक्तिक प्रयोग करैत छथि।
पुतो नीक साँइयो नीक, किरिया ककर खाउ? वा

पूतो मीठ भतारो मीठ, किरिया ककर खाउ? उभय पक्ष जखन अपन आत्मीएय रहैत छैक तँ धर्म-संकट भय जाइत छैक-ककरा राखी ककरा गामाबी।
पूब देशसँ चलल तमाकू रहल बंगाला छाय, जकरो देह पर लत्ता नहि सेहो तमाकू खाय। तम्बा कू केर गुणगानमे एहि फकड़ाके प्रयोग कयल जाइत अछि।
पूसक दिन फूस। पूस मासमे दिन लघुतम रहैत छैक।
पेट जे ने कराबय। पेटक खातिर लोक सब किछु करबाक लेल तैयार भय जाइत अछि।
पेट करनि खाँव-खाँव कपारमे तीन टिकुली। खयबाक ओरियाने नहि, मुदा श्रृंगार वेश भेहगर।
पेट करय कह-कह जूड़ा करय मह-मह। एकरो भावना पूर्ववते अछि।
पेट बिगाड़य मुरही,
घर बिगाड़थि बूढ़ी। एहि उक्तिमे तथ्यी नहियो रहैत कोनो वाचालजनी (वा झगड़उ नारी) अपन सासुकेँ मुँहचुरू करबाक हेतु प्रयोग करैत छथि।
पेटमे अन्ने नहि बाहर ढेकार। आडम्ब री व्यहक्ति पर व्यंिग्यप करबाक हतु प्रयोग।
पेटमे खढ़ेने सिंहमे तेल। भोजनक ओरियान नहि रहैत श्रृंगार कयनाइ पर व्यंनग्यृ।
पेटमे नौ हाथके घुड़छी। प्रपंची व्यथक्तिक लेल एहि उक्तिक प्रयोग।
पेटमे पड़ल अन तँ उमकय लागल मन। पेटमे पड़ल जुड़ाइ तँ कयलहुँ नहिराक बड़ाइ। खाय पीबाक व्यलवस्थाय भय गेला पर जखन ककरो घमण्डव भय जाइत छैक तँ एहि उक्ति द्वारा व्यं ग्य कयल जाइछ।
पेट भरू पीठ लादू। जकरासँ कार्य करबैक तकरा भरिपेट भोजन तँ देब अति आवश्यरक होइत छैक-भूखलमे के सकत?
पेट भारी तँ माथ भारी। अपच भेलापर दुर्बलताक कारण माथ सेहो दुखाय लगैत छैक।
पेटमे पड़ल खुद्दी तँ निकलय लागल बुद्धि। अपन आर्थिक स्थिति पर घमण्ड कयनिहार पर व्यंथग्य ।
पेट करय कन-कन चूड़ी करय खन खन। बिना ओकादक आडम्ब-र कयनिहार पर व्यं ग्य ।
पेट नहि भरय तँ कि मुँहो नहि दुखाय ? भोजन मे जनिका अधिक समय लगैत छनि तनिका सँ हास-परिहास करबाक लेल प्रयोग कयल जाइछ।
पेटहा चाकर घसहा घोड़ा,
खाय बहुत काज करय थोड़। नौकर जँ पेटाह रहय तथा घोड़ा जँ घासे खायवला रहय तँ घाटा लागत।
पेटू मरय पेटलय नामी मरय नाम लय। प्रतिष्ठाप प्राप्त व्याक्ति पेट लेल नहि अपितु प्रतिष्ठाप रक्षार्थ सतत् प्रयत्न‍शील रहैत छथि।
प्रेम ने बाड़ी उपजय,
प्रेम ने हाट बिकाय। कोनो फसिल जकाँ खेतमे प्रेम नहि उपजैत छैक आने ओ कतहु दोकानमे कीनल आ सकैत अछि।
पैसा ने कौड़ी बीच बजारमे दौड़-दौड़ी। हाथ खाली रहितहुँ जे बजारमे बौआइत रहैत छथि, वा बजार चलबाक लेल केओ कहैत छनि तँ ओ स्वजयं एहि लोको‍क्तिक प्रयोग करैत छथि।
पैसा ने पास मेला लागय उदास। खाली हाथ मेला घूमब नीक नहि लगैत छैक।
पैसा पासके विद्मा कण्ठ के। अपना संगमे जे टाका रहत सैह कार्य देत।
पोखरि खुनायल नहि गोहि डेरा देलक। कार्यक पूर्वहि जँ कुपरिणाम आबय लागि जाय तँ एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
पोखरि रजोखरि आर सब पोखरा,
राजा तँ शिवसिंह आर सब छोकरा। कहल जाइत अछि जे पोखरि मे रजोखरि ओहि समयक सर्वश्रेष्ठि पोखरि छल, तहिना राजामे केवल शिवसिंह श्रेष्ठछ राजा भेलाह, आत तँ सब छौड़े-माँड़रि जकाँ छलाह।
पोथीक आगाँ थोथी प्रमाण। जाहिठाम लिखित प्रमाण उपलब्धड छैक, ताहिठाम मौखिक आग्रहक कोन मोजर?
पोन ठेलि जँ गाछ चढ़ाबी,
तकर तोड़ल फल कहाँ सँ पाबी? केवल पैरबी-पैगाम सँ केओ पूर्ण सफल नहि भय सकैछ।
पोसब बकरीयो नहि, खायब छाल्हीस। बिना परिश्रमक जे चरम उपलब्धि चाहैत छथि तनिका लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
पोसल पूत मरल जाय,
पेटक लेल ओझाइ। वर्तमानकेँ छोडि़ जे भविष्य्क पाछाँ बौआयल घुरैत छथि, तनिका लेल एहि उक्तिक प्रयोग।
पूत चीन्हीय मीतसँ। जेहन संगीत रहैत छैक तेहने गतिविधि भय जाइत छैक।
पंडितजीक पतड़ा पंडिताइनिक अँचरा। केओ कतबो पैघ विद्वान छथि, किन्तुय अपन पत्नीतलग किछु नहि चलैत छनि।
फगुआक ज्ञान-ध्यािन। फगुआ पावनिमे प्राय: अधिकांश लोक भांग पीबि उमकल रहैत अछि तेँ ओ अपन ज्ञान-ध्याछनमे नहि रहैछ।
फटकचन्दक गिरिधारी,
जनिका लौटाने थारी। कोनो फक्ड़ने व्यरक्ति लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
फटले नहि लजाइ मैले लजाइ। साफ सुथरा वस्त्र जँ कनेक्शन फटलो रहैत छैक तथापि प्रतिष्ठालमे हानि नहि होइत छैक।
फटलो तँ पीताम्बषरी। पीताम्ब र (रेशमी केसरिया) धोती वा साड़ी जँ कनेक्शन फट लो रहैत छैक तथापि प्रतिष्ठानमे हानि नहि होइत छैक।
फागुन केरा रोपल जाय,
मासोदिन फल बैसल खाय। केरा रोपलाक ठीक एक वर्ष पर ओहिमे घौड़ फुटैत छैक।
फाटल दूध आ फाटल मोन नहि जमैत छैक। फाटल दूधक दही नहि होइत छैक।
फुकनाक लेखे टाका झिटुकी। खर्चीला व्य क्ति टाका-ढेप-चेप जकाँ फेकैत रहैत अछि।
फुटि गेल हण्डीक सलाम भाइ चूल्हा।। अपन कार्य निकालि लेलाक बाद जे व्यूक्ति औंठा देखा दैत अछि, तकरा हेतु एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
फुरलह कहाँ त हुरलक जहाँ। भयवश जे सबकिछु करय लगैत अछि, ओना किछु नहि करय चाहैछ, तकरा लेल प्रयोग।
फुसियाहीक साँइ लेल निम्नच कामहि। जाहिठाम कोनो उपलब्धि नहिप्राप्ता होइत छैक, मात्र समय बर्बाद होइछ, तकरा लेल प्रयोग।
फुसियाहीक बनियाइनकेँ भरि पर बटखरा। अधिक आडम्बबर कयनिहार पर व्यंोग्यत।
फूक ने फाक, टांग विभरिकय ताप। बिना परिश्रमक जे अधिक लाभ लेमय चाहैत अछि, तकरालेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
फूजल घोड़ भुसौले ठाढ़। अधिक परिश्रमक बाद भरि खयबाक लेल लोक लपकैत अछि।
फूटल भाँड़ संगी जोहय। माटिक वर्त्तन (घैल, कड़ाही, तौला अ‍ादि) के अशौच भेलापर त्यायगि देल जाइत छैक तथा नव आनल जाइत अछि।
फूल ने पान फल्लाँत चललाह ब्रह्मक थान। बिना किछु खर्च कयनहि जे पुण्यल कमाय चाहैत छथि, तनिका लेल प्रयोग।
फूसक घरमे अलीगढ़के ताला। कमजोर घरमे जखन अधिक रंगटीप कयल जाइत अछि तँ एहि लोकोक्तिक प्रयोग द्वारा व्यं ग्यो कयल जाइछ।
फुसियाहीबनियाइन के भरि घर थैली,
हाथ देली तऽ किछु नइ पैली। मिथ्याल आडम्बपर कयनिहार पर व्यं ग्यप।
फेर-फेर नाढ़ो बेलतर जइती?
बेलक मारि भटा‍भटि खइती। एक बेर धोखा खा गेलाक बाद पुन: ओहन कार्य करबाक साहस नहि होइत छैक।
फेर सियार ताड़ तर जयता?
ताड़क मारि भटा भट खयता। एकरो भावना पूर्ववते अछि।
फोसरीसँ भोकन्नवर भेल। साधारण घटना जखन उग्र रूप धारण कय लैत अछि तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
बक बुढ़यने कुरेड़। वृद्धावस्थाक अवितहिँ आकर्षण समाप्ता भय जाइत छैक।
बकरीक भेँड़ारी ने नीपय जोगर ने पाथय जोगर। अकर्मण्यर व्ययक्तिक उपहासएहि उक्ति द्वारा कयल जाइत अछि।
बकरी करय पाजु तँ डाइन कहय हमरे निन्दार करैअय। वा मुँह दूसैअय। झगड़ाए स्त्री बात-बातमे झगड़ा करैत रहैत अछि।
बकरी कसैये मे राजी। जखन केओ अज्ञानतावश शत्रुक हाथमे खेलाइत रहैत अछि तँ ओकरालेल एकर प्रयोग होइछ।
बकरी मरखाहि आ कायथ पहलमान।
बकरी मरखाही कायब सिपाही।
बकरी मरखाही कोइरी सिपाही। मान्यमता छैक जे बकरी जहिना मरखाहि नहि भय सकैछ तहिना कायस्थक एवं कोइर जातिक लोक पहलमान नहि भय सकैत छथि।
बकरी सन मुँह मूसर सन पोड़ा। कोनो हास- परिहासमे ककरो सौन्दोर्यक निन्दाा एहि अक्ति द्वारा कयल जाइछ।
बकरी गेल भनसा घर अर्र अर्र लगले अछि।
सब किछु समाप्तघ भय गेलाक बादो मृगतृष्णाममे पड़ल रहनिहार पर व्यंतग्यद।
बखारी देखि जुड़यलहुँ
तामा देखि झुझुअयलहुँ। कोनो कंजूस व्यअक्ति पर व्यंदग्यइ।
बकलेल बभना,
एक खिल्लीा पान लय करैछथि खेखना। कोनहु आयोजनमे एहि उक्ति द्वारा पुरहितक संग हास-परिहास कयल जाइत अछि।
बगड़ा चलली खंजनिक चालि,
अपनो चालि बिसरलनि। अनकर नकल कयलाक कारण जखन घाटामे केओ पडि़ जाइत अछि तँ एहि लोकोक्ति द्वारा व्यं गय कयल जाइत अछि।
बागियाके मजा दहिया के साथ। बगिया(खाद्म पदार्थ) दहीक संग नीक लगैत छैक।
बघबा खाय कि नहि खाय सोनितइन महकबे करय। वा लोहराइन महकबे करय। कोनो बदनाम व्यलक्ति बारम्बरर नामित चर्चित होइत रहैत अछि।
बच्चात खेलाबय केओ, अण्डार सेवय केओ। परिश्रमक लाभ जखन केओ दोसर उठा लैत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
बच्चोँ बूडि़ आ बौओ बूडि़। किछु कयलापर जखन दुसले जाइत अछि, कोनहु स्थितिमे जखन निन्दिते होइत अछि तँ एहि उक्ति द्वारा विरोध कयल जाइत अछि।
बज्जहर पड़य कहाँ, तीन बाभन जहाँ। जाहिठाम तीन ब्राह्मण एक संग जाइत छथि ताहिठामक कार्य बिगड़बाक सम्भाछवना रहैत अछि ई पुरान मान्याता अछि।
बजिते छी तँ हारलहुँ कोना? वाचाल व्यतक्ति द्वारा गलथोथरी करबा पर व्यंलग्यक।
बटुकबा तोर कि मोर ? ककरहु द्वारा कयल गलती पर जखन डाँट-फटकार कयल जाइत अछि तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
बटेर कतहु धानक खेतमे नुकायल अछि? ककरहु पैघत्वन छपित नहि रहैत छैक।
बटैया खेत आ सगही स्त्रीप। जहिना बटैया खेतक ठेकान नहि कहिया छिना जायत तहिना अनेक पतिकेँ छोड़निहारि स्त्री क कोनो भरोस नहि।
बटैया खेत आ सगही स्त्रीी। दूनूक भावना एके अछि।
बड़काक झगड़ामे छोटका मारल जाइत अछि।
बड़काक आगाँ आ घोड़ाक पाछाँ नहि चली। दूनूक अर्थ स्पघष्टा अछि।
बड़का घर जैहोँ त ईंटा ढो-ढो मरिहोँ। पैघ लोकक ओहिठाम नौकरी कयनिहारकेँ अधिक खटय पड़ैय छैक।
बड़का चोर कनहा पार उतारय। बलगर व्यरक्तित्व।क अछैत जखन छोट व्यरक्ति पैघ पद लेमय चाहैछ तँ एहि उक्तिक प्रयोग द्वारा व्यंपग्य कयल जाइछ।
बड़का बेटा बापके छोटका बेटा मायके आ मझिला बेटा चूल्हाट के। भैयारीमे माझिल जखन उपेक्षित होइत छथि तँ एहि उक्तिक करैत छथि।
बड़काके आस राखी मुद्रा पासनहि जाइ। पैघ लोकसँ कनेक दूरी बनाकय रखबाक चाही।
बड़का घरक एक दाना काफी। पैघलोकमे (धनवानमे) बहुधा उदारताक अभाव रहैछ।
बड़का (ज्ञानी) बतिअयने,
छोटका (मूर्ख) लतिअयने। पैघलोक बातक मारि सँ आहत जाइत अछि, किन्तुत छोटका (छुद्र व्यअक्ति) तेरहमे विद्माक भयसँ सोझ रहैछ।
बड़का लोक बड़के। पैघ लोकक खुशामदमे छोटका एहि उक्तिक प्रयोग करैछ।
बड़-बड़ जन भासल जाथि, नढ़रो पूछथि कतेक पानि? वा
बड़-बड़ जनावर भासल जाथि,
घोड़गद्दह पूछथि कतेक पानि? जाहिठाम पैघक दुर्दशापर छोटका नहि चेतैत अछि, अपना महत्त्वाकांक्षाक पूर्तिमे लागल रहैत अछि ताहिठाम एहि लोकोक्ति सभक प्रयोग द्वारा स्थितिक गम्भी्रता प्रकट कयल जाइछ।
बड़का-बड़का गेलाह तँ मोछबला अयलाह। केहन-केहनसँ पार नहि लागल तँ एकटा सिपाही की कय सकैछ? कोनो बालक जखन दुस्साकहसक प्रयत्नो करय लगैछ तँ एहि उक्ति द्वारा ओकरा रोकल जाइछ।
बड़-बड़ जन भासल जाथि,
नवगदही पूछथि कतेक पानि?
बड़-बड़ गेलाह तँ चेथरू अयलाह।
बड़-बड़ जनके भेँटक लाबा,
लबरो के मिठाइ।
बड़-बड़ भूत कदम तर कानय,
लुल्हाे माँगय पूड़ी।
बड़-बड़ ललायथि तँ लबरो लय मिठाइ। कोनहु उपलब्धिक लेल अधिक तीव्रता अनावश्यपक अनलापर एहि लोकोक्तिक प्रयोग द्वारा डाँटल जाइछ।
बड़द बिकायल चरबाहियेमे। कोनहु कार्यमे आयक अपेक्षा व्य य अधिक भयगेलापर एकर प्रयोग होइत अछि।
बड़ सोझ तँ हाँसू सन। प्रपंची व्यहक्तिक लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
बड़ी गाइक बड़ी पन्हानन। पैघ लोकसँ कार्य लेबामे बहुत समय लगैत छैक।
बद नीक बदनाम नहि नीक। दुर्जन मे नाम आबय से ओतेक खराप नहि जतेक कि चरित्रहीनताक कलंक लागि जाय।
बदरीक बहुरिया मझनीयो ने खाथि। ककरहु दुर्दिन पर उपहास।
बर्दे कि मर्दे। परिश्रम करबामे जहिना मर्द सकैत तहिना बड़द सेहो सकैछ।
बनियाँकेँ घेध, गहिँकीके उदवेग। ककरहु समस्याधपर केओ जँ अनावश्यिक बेहाल होमय लगैत अछि तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
बोन तँ राम जयबे करितथि, केकइ केँ अजस। भावी प्रबल होइत छैक तथापि ककरो अपयश भय जाइत छैक।
बनय तँ इन्द्रछजाल नहि तँ जीवक जंजाल। कोनो खतरनाक कार्य करबामे जँ सुतरल तँ बड़नीक नहि तँ जानक खतरा होइत छैक।
बनियाँ ककरो नहि। जे व्य वसाय करैत अछि से सबसँ मुनाफा कमाइत अछि।
बनियाँ कहय जे छत्तीस आसनसँ तौलब, गृहस्थस कहथि जे कोठिए फोड़ब। कृषक जतेक उदार होइत छथि बनियाँ नहि होइत अछि।
बनियाँ तौलय नहि गाहिँकी कहय बस करह। ग्राहक जतेक उदार रहैत ततेक बनियाँ नहि।
बनियाँक देल ने पूरय तौल। ई आम धारणा छैक जे बनियाँ अधिक नफा कमयबाक हेतु कीनैत काल बेसियाहा आ बेचैत काल घट्टीवला बटखाराक प्रयोग करैत अछि।
बनियाँ दोहसौने दुन्नाब। जँ सामान कीनैत काल अधिक मोल-मोलइ करब तँ बनियाँ आर गीरह काटि लेत।
बनियाँ केँ खुसी भेलैक तँ एक पाइ दान कयलक। व्याकपारी वर्गक कंजूसी पर व्यंइग्य।।
बनियाँ मारय परिचित के,
अपरिचितके मारय ठक। ठक अपरिचित केँ ठकैत अछि, कारण परिचितसँ खतरा रहैत छैक, किन्तुर बनियाँ परिचि‍तहिकेँ ठकैत अछि, अपरिचितकेँ ठकत तँ ग्राहक हड़कि जयतैक।
बरक ई हाल तँ बरियातीक कोन हाल ? जखन मूलहिमे दोष तखन आन वस्तु केहन? हास-परिहासमे एहि विधि व्यँवहार पर व्यंहग्या।
बरक माथा जाल तँ वरियतक कोन हवाल? मूलहिमे दोष तखन सहायककेँ के पूछै‍त‍ अछि? हवाल=हाल।
बर गेला जात तँ कनियाँ पुछलथिन कतय अयलहुँ? अनादर भेलहुपर जखन केओ नहि मानैत अछि तँ एहि उक्ति द्वारा उपहास कलय जाइत छैक।
बर चाहथि कनियाँ वरियाती चाहथित मन, समधि चाहथि धन। बरागत-कन्यामगत मे परस्पतर लेनदेन होइत छनि, लेब-देश तँ दूनू पक्ष मात्रकेँ मुदा वरियातीकेँ तँ केवल मान-सम्मानन स्वाँगत-सत्कातर हेबाक चाही।
बर मरय तँ समय कंगन नहि टूटय। कंजूस व्य क्ति कखनो मूले गामा बैसैत अछि।
बर मरिगेल कंगन ठामे। भावना पूर्ववते अछि।
बरख दिनक रास्ताअ चली छोमासक नहि चली। नीक रास्ताा पकड़ी भलेँ कष्टन पडि़ जाय।
बरसातमे घोँघोक मुँह खुजि जाइत छैक। अनुकूल समयमे सामान्योु व्यनक्ति डींग हाँकय लगैछ।
बरे बुडि़बक तँ दहेज के लेत? स्व यं जखन बुद्धि नहि रहत तँ दोसराक मदतिसँ कतेक प्राप्त भय सकत?
बरिसय सावन तँ मन होय भावन। श्रावण मासक बुद्धि नहि रहत तँ दोसराक मदतिसँ कतेक प्राप्तन भय सकत ?
बरिसय सावन तँ मन होय भावन। श्रवण मासक वर्षासँ कृषक प्रसन्नय होइत छथि।
बरियाती कतहुसँ आबथु, गितगाइन तँ गामके रहती। कोनहु स्थितिमे गामक प्रमुखता रहितहिँ छैक।
बर्रे बालक एक समान। मुखमण्डाल पर भेल बड़रकेँ खोँटलासँ भयंकर घाव भय जाइत छैक।
बयस भेल भोर, चिल्काक लेल कोर,
नरे जरे भरल छी, पानिमे तीतइ की। बुढ़ारीक धीयापुता सँ सुखक बदला कष्टे। अधिक होइत छैक।
बलवान चोर सेन्हतहुमे गीत गाबय। बलगर लोककेँ सबकिछु छजैत छैक।
बलवानक हर भूतो जोतैत छैक। कोनहु शक्तिशाली व्यतक्तिक सब कार्य आसानीसँ ससरैत रहैत छैक।
बन्सी आ बाँस एकठाम नहि रहय। घर लग बाँस रोपबाक चाही।
बन्सग धार अपने दिस। स्वागर्थी व्य क्ति लेल प्रयुक्ता।
बसिला सन मुँह रुखान सन गोड़। ककरहु अभद्रताक बखान करबाक हेतु एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
बसाते ओसाबी आ गहिँकीए पसाबी। कृषक अनुकूल बसातसँ तथा बनियाँ ग्राहकसँ प्रसन्नस होइत छथि।
बहत्तरि बड़द हकमय कूकुर। परिश्रम केओ करय आ थकावटि केओ आने देखाबय तँ एहि उक्तिक प्रयोग द्वारा उक्तद सुकुमार व्यपक्तिपर व्यं ग्या कयल जाइछ।
बहिनिक घर भाय कूकुर,
ससुर घर जमाय कूकुर। सासुर अथवा बहिनिक घर अधिक दिन रहलापर अनादर होइत छैक।
बहिरा नाचय अपने ताले। जे व्यनक्ति ककरहु बात दिस ध्यािन नहि दय अपनहि मोनसँ उत्तेजना देखबैत रहैत अछि, तकरा लेल प्रयोग होइछ।
बहीर बलाय बड़ दुखदाय। बहीर व्ययक्तिक संग रहनिहारकेँ बड़ झंझट होइत छैक।
बहीर बलाय बड़ दुखदाय। बहीर व्ययक्तिक संग रहनिहारकेँ बड़ झझंट होइत छैक।
बहीर सुनय धर्मक कथा ? जे बहीर अछि से कोनो गप्प? सुनत कोना?
बहुत दिन पर खयलहुँ पान,
दाँत निपोड़ने गेल परान। बलहिँस्स क केर हिँसक कयनिहार, ककरो देखाँउस कयनिहार कहियो फँसि जाइत अछि।
बहुत भोग बहुत रोग। पैघ लोककेँ चिकित्सायपर अधिक खर्च होइत छनि, कारण हुनकालोनिकेँ रंगविरंगक रोग-व्यालधि होइत रहैत छनि।
बहुत मर्दे बड़द उपास,
बहुत मागुए मरद उपास। जाहि घरमे अधिक लोक रहैत छैक ताहिठाम अव्यिवस्थाक अधिक रहैत छैक।
बहुत लोक बहुत रोग। जतय अधिक लोक रहैत छैक ताहिठाम रोग-व्यातधि अधिक खेहारैत छैक।
बहुत मर्दे बड़द उपास,
बहुत मागुए मरद उपास। जाहि घरमे अधिक लोक रहैत छैक ताहिठाम अव्यिवस्थाक अधिक रहैत छैक।
बहुत लोक बहुत रोग। जतय अधिक लोक रहैत छैक ताहिठाम रोग-व्यातधि अधिक खेहारैत छैक।
बहुत हँसी-हँसी नहि करी, थोड़बे हँसी भला, बहुत हँसी राउत कयलनि, लाठी लागल गेला। हँसी दिलग्गी- कम्मे करबाक चाही, अन्यवथा दुर्घटना भय जयबाक सम्भाकवना रहैत छैक।
बाइसक बारह पढ़बैत छी,
एक मुट्ठी चाउर लय नेनाकेँ मारैत छी। भुसकौल शिक्षक पर व्यंाग्यी।
बाजल मुँह ने बरजल जाय,
चलल पयपर ने बैसल जाय। जकर जे अभ्याबस रहैत छैक से छटैत नहि छैक।
बाजय खुरदक नोन नदारद। पूर्वमे लोक स्नादनक अन्तसमे पोखरि वा नदीमे देव पितर केँ तर्पण करैत (जल दैत) छल।
बाट परक पोखरि तरपनहि गेल। पूर्वमे लोक स्नापनक अन्तसमे पोखरि वा नदीमे देव पितर केँ तर्पण करैत (जल दैत) छल।
बाँचय दियादिनी नहि दिअय भात। दियादिनीसँ आर्थिक लाभ हो वा नहि, किन्तुन ओ अपन छथि, जीबैत रहथु।
बाँझक घरमे बिलाडि़केँ दुलार। जाहिठाम धीया-पुता नहि छैक,ताहिठाम कूकुर-बिलाडि़क बच्चारकेँ दुलार भेटैत छैक।
बाँझ की जानय परसौतीक पीड़ा? जाहि स्त्रीयकेँ बच्चाु नहि भेल छैक से प्रसवक पीड़ा नहि जानि सकैछ।
बाँझकी जानय प्रसवक पीड़ा? एहू लोकोक्तिक भावना वैह अछि।
बाँटल भाइ पड़ोसिया दाखिल। भैयारीमे जखन बटबारा भय जाइत छैक तँ ओ एक दोसराक पड़ोसी जकाँ रहय लगैछ।
बाट चलैत बटमारि। कोनो खुरलुच्चीि किशोर वा उपद्रवी युवकक लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
बाड़ीक पटुआ तीत। अपन घरमे सहज उपलब्धो वस्तु्मे ओतेक आकर्षण नहि भेटैत छैक जतेक आनठामक, तथा जाहिमे खर्च होइत छैक।
बाघ ने देखू देखू बिलाडि़,
ठक नहि देखू देखू पँसारि। बाघक स्वेरूप पैघ बिलाडि़ जकाँ रहैत अछि।
बाट चलबामे आ बैसबामे बड़ अन्तडर। कोनो कार्य प्रारम्भे कयलासँ लक्ष्यअ दिस आगाँ बढ़ल जा सकैत अछि।
बाड़ी गेलेँ पात नहि घर गेलेँ केरा। ककरहुसँ किछफ प्राप्तग करबाक हेतु ओकर गामपर जाय पड़ैत छैक, निवेदन करय पड़ैत छैक।
बाढ़य पूत पिता के धर्मे,
खेती उपजय अपने कर्मे। पिताक पुण्यप-प्रतापसँ पुत्रकेँ जीवनमे किछु उपलब्धि होइत छैक, किन्तुस खेतीमे स्वकयं जतेक कर्म करब ततेक फल प्राप्ति भय सकत।
बाढि़क पानि जखन जाइत अछि तँ खेतक पानि सेहो लेले चलि जाइत अछि। अधिक पैघ उपलब्धि जँ अकस्माइत् आबि जाइत छैक तँ ओकरा जाइतो देरी नहि लगैत छैक।
बातक चट पट भीतर कपट। जे अधिक सफाइ दैत अछि से प्रपंची होइत अछि।
बातक चूकल मरद आ लातक चूकल बड़द। स्वे।च्छातचारी एवं बजक्‍कर पर व्यंउग्य ।
बात गढ़लासँ अधलाह, काठ गढ़लासँ नीक। जे अधिक बातकेँ छीजैत अछि तकरा नीक नहि मानल जाइत छैक, मुदा नीक बरही नीक काष्ठज उपकरण बनयबाक हेतु खूब कटैत छीलैत अछि।
बात लाखके करनी खाकके। जे केवल गप्पन छोड़ैत रहैत अछि, करनी किछु नहि, तकरा लेल एहि उक्तिक प्रयोग होइछ।
बात लिअ हमरासँ, टाका लिअ हमर काकासँ। अयोग्य। व्यकक्तिक हाथमे नीक वस्तुय नहि नीक लगैत छैक।
बानरक हाथमे नारिकेर।
बानर की जानय आदक स्वा द?
बानरक गरमे गाँती। उपर्युक्ते चारू लोकोक्तिक भावना एकरंगाहे अछि।
बात कही सारके, सार बुझथि बात,
बात कही गद्दहके, उछटि मारय लात। कोनहु बातक जे महत्त्व दिअय तकरे कहबाक चाही।
बापक गराँ मुंगरी, पूतक गराँ रूद्राक्ष। ककरहु नेमटेम पर व्यं,ग्यग करबाक हेतु प्रयोग।
बापक नाम लत्ती फत्ती, बैटाक नाम दुर्गादत्त। बापक नाम साग-पात बेटाक नाम पड़ोर। तुच्छड व्यगक्ति द्वारा जखन पैघ लोकक अनुकरण कयल जाइत अछि तँ एहि लोकोक्ति सभक माध्यिमसँ व्यंकग्यज कयल जाइछ।
बापक बिआह आ पितियाक सगाइ। कोनो तुच्छआ व्यगक्तिकेँ डाँट फटकार करबाक लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइत अछि।
बापके बखारी धीया के उपास। वा
बाबाके बखारी धीयाके उपास। बेटी जखन सासुर चलि जाइत अछि तखन ओकरा नहिराक धनसँ मतलब नहि रहैत छैक।
बापके गोड़ लगने बन्सबके गारि,
बोहु के गोड़ लगने तीन ढाकन दालि। पत्नीकक पक्ष लेनिहार पुत्रकेँ माय एहि लोकोक्ति द्वारा उलहन-उपराग दैत छथिन।
बाप ओझा माय डाइन। ककरो उलहन-उपराग वा तिरस्काथर लेल एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
बापक गरा उतरी बेटाक गरा कनखा। तुच्छग व्याक्तिक तिरस्काारमे प्रयोग।
बापक गरा उतरी बेटाक गरा रूदाक्ष। एकरहु भावना पूववते अछि।
बापके जूड़नि तँ कानमे सोना झूलनि। सामान्यू व्य क्तिकेँ अधिक श्रृ़गार देखि एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
बापक गराँ पितौझियो नहि,
बैआक गराँ रूद्राक्ष।
बापक गराँ कण्ठीा, बेटाक गराँ रूद्राक्ष। बापक गराँ सण्ठियो नहि, बेटाक गराँ रूद्राक्ष। उक्तर तमास लोकोक्ति द्वारा ककरो तिरस्कारर कयल जाइछ।
बाप गदहिया पूत ब्रह्मचारी। केओ जखन ओकादसँ देखाबा करैत अछि तँ एहि लोकोक्ति द्वारा उपहास कयल जाइत छैक।
बाप छल पेटमे पूत गेल गया। ककरहु द्वारा असंगत कार्य कयलापर प्रयोग।
बाप जनम नहि देखल गाय,
चालनि लऽ दुहाबऽ जाय। असंगत कार्य कयनिहार लेल तिरस्का र स्वगरूप उक्ते लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
बाप जनम नहि खलयहुँ पान,
दाँत निपोड़ने गेल परान। अति निर्धन व्यगक्तिकेँ अनेक मनोरथ लगले जाइत छनि।
बाप बङौरा पूत चौतार,
तकर बेटा तहसिलदार। निर्धन व्यहक्तिक पुत्र जखन पैघ अधिकारी बनि जाइत छैक तँ लोक ईर्ष्यारवश एहि उक्तिक प्रयोग करैत अछि।
बाप जकर मरय से खाय माछ भात, पड़ौसिया जाय गया। अनका लेल आन बेहाल रहैत अछि तँ ओकर परिजन एहि उक्तिक प्रयोग करैछ।
बाप दादाके घोड़ नहि दडि़भंगा तक लगाम। अधिक देखाबा कयनिहार लेल प्रयोग।
बाप पूत मिलि खेती करी,
बापक मुइने भाइके धरी। सब समांगकेँ मिलिकय रहलासँ नीक खेती एवं प्रगति होइत छैक।
बापे पूत परपत घोड़ा,
नहि किछु तँ किछु तँ थोड़हु थोड़ा। पितासन पुत्र होइत छैक, तहिना घोड़ासन ओकर बछेड़ा होइत छैका, किछु ने किछु मिलिते छैक।
बाप पैघ ने भैया, सबसँ पैघ रुपैया। सम्प्रघति धनकेँ सर्वोपरि महत्त्व देल जाइत अछि।
बाप भिखारी पूत भण्डनरी। गरीबक बेटा जखन अधिक देखबय लगैछ तँ एहि उक्ति द्वारा व्यंयगय कयल जाइछ।
बाप मरने कुम्म्र, माय मरने दुमार। पिताक मुइलापर ओतेक क्षति नहि होइत छैक जतेक मायक मुइलापर, कारण मायक स्थाजन दोसर नहि लय सकैछ।
बाबाक कोदारि बड़, हल्लुाक। अनकर वस्तुरमे अधिक आर्कषण होइत छैक।
बाबाक मुइने नहि डेराइ,
यमक परिकने डेराइ। एकबेर किछफ क्षति भय जयबाक चिन्ता नहि होइत छैक, चिन्तात एकहि बातक रहैत छैक जे पुन: पुन: ओहने घटना ने होमय लागय।
बाबाक बले फौदारी। कोनो श्रेष्ठद समांग वा सम्ब न्धी क बलपर जे घमण्डे् कूदैत रहैत अछि तकरा लेल प्रयोग।
बाकाके घोड़ा मोरा हीँ हीँ-हीँ हीँ। एकरहु भावना पूर्ववते अछि।
बाबा कोठी चाउर मोरा लेखे छाउर। बेटी जखन सासुर चलि जाइत अछि तँ नेहरक धनसँ अधिकार प्राय: समाप्ते भय जाइत छैक।
बाबाजीक दाढ़ी वाह-वाहमे गेल। ककरो असावधानीवश जखन क्षति भय जाइत छैक तँ दोसर मित्र हास-परिहासमे एहि उक्तिक प्रयोग करैत अछि।
बाबाजीके गाय छूटल बलाय भेल। कोनो वस्तुा रखलाक कारण जखन कष्टा बढि़ जाइत छैक तँ एहि उक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
बाजीक बाबाजी, बजनियाँक बजनियाँ। एकहि व्यबक्ति जखन दू प्रकारक कार्य कय लैत छथि तँ एहि उक्तिक प्रयोग होइत अछि।
बाबाजीक बेल हाथे-हाथ गेल। ककरहु कोनो सामग्री जखन मंगनी-चंगनीमे समाप्तक भय जाइत छैक तँ एहि लोकोक्तिक प्रयोग द्वारा स्वजयं तँ निराशा व्यकक्त करैत अछि, किन्तुछ आन परिहास करैछ।
बाबा हाथक लाठी बड़ सुरेबगर। अनकर वस्तुल पर अधिक आकर्षण होइत छैक।
बाबू भैया जाड़े मरथि, कूकुर बान्हछय गाँती। पैघ लोक सभक अधिकार छीनि छोटकाकेँ दय देल जाइद तँ लोकसब एहि उक्ति द्वारा असन्तो ष व्यबक्त् करैत छथि।
बाभनक गाममे राड़ पजियाड़। पैघ लोकक बीच तुच्छज व्यकक्ति जखन डींग हँकैत अछि वा शासन चलयबाक चेष्टात करैत अछि तँ एहि लोकोक्तिक प्रयोग कयल जाइछ।
बाभन कूकुर भाँअ, अपने जातिक काँट। बाभन कूकुर हाथी अपने जातिक घाती। ब्राह्मण, कूकुर भाँट एवं हाथी परस्पबर अपनामे खूब झगड़ा करैत अछि।
बाभन आ बानर बन्ह लो नहि जाय। पौरराणिक मान्यथता रहल अछि जे ब्रह्मण एवं वानरकेँ दण्ड‍ देलासँ लगैत छैक।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...