Saturday, September 12, 2009

पेटार ३५

जगदीश प्रसाद मंडल

उत्थान-पतन उपन्यास जगदीशमंडल बेरमा,मधुबनी,बिहार। उत्थान-पतनःः1 गामे-गाम, कतौ अष्टयाम कीर्तन तँ कतौ नवाह, कतौ चण्डी यज्ञ त’ कतौ सहस्र चण्डी यज्ञ होइत। किसेक तँ एगारह टा ग्रह एकत्रित भऽ गेल अछि। की हैत की नइ हैत कहब कठिन। एकटा बाल ग्रह बच्चा केँ भेने त’ सुखौनी लगि जाइत आ जहिठाम एगारह टा ग्रह एकत्रित अछि तइ ठाम त’ अनुमानो कम्मे हैत। परोपट्टा भगवान नाम स गदमिसान होइत। जओ तील, घीउक गंध सँ हवा सुगन्धित। सभक हृदय मे भगवान क स्वरुप बिराजैत। सभ व्यस्त। सभ हलचल। खरचाक कोनो इत्ता नहि। जना निसाँ लगला पर बेेहोशी होइत, तहिना जाधरि लोक कीर्तन मंडलीक संग, मंडप मे कीर्तन करैत ताधरि घरक सब सुधि-बुधि बिसरि मस्त भ रहैत। मुदा घर पर अबिते केयो भूखल गाय-महीसिक डिरिऐनाई सुनि, चिन्तित होइत त क्यो बच्चा केँ बाइस-बेरहट ले ठुनुकब सुनि। व्यथा कऽ दबैत सब आखिक नोर होइत बहाबैत। चारि सालक रौदीक चलैत पोखरिक पाइन सूखि गेल। नमहर-नमहर दरारि खेत स ल कऽ पोखरि धरि फाँटि गेल। इनारक मटिआइल पानि भरि-भरि सब घैल मे रखि, जखन फड़िछाइत तखन गिलास, लोटा मे ल ल पीबैत। लोक की करत? कत्ते जायत? मृत्युक मुह छोड़ि दोसर रस्ते की? आजुक कोलकत्ता ओ कलकत्त नहि जहिठाम अकाल आ समुद्री तूफान स ढ़ेरो लोक मरैत छल। जकरा आइ अपन दोसर घर बुझि लोक जीवन-यापन करै जाइत अछि। आजुक पंजाब ओ पंजाब नहि जहिठाम आन-आन राजक लोक जा खेत-खरिहान स कारखाना धरि खटि क परिवारक भरण-पोषन करैत अछि। पंजाबक ओ दशा छल, जइठाम कल-कारखानाक कोन गप जे खेतक माटि गेउर रंगक कंकड़ मिलल, बरखा स भेटि नहि होइत छल। साइते-संयोग साल मे कहिओ बरखा भऽ जाइ छलै। ओतुक्का लोक पड़ा-पड़ा आन-आन राज जा हड़तोड़ मेहनत कऽ जीविका चलबैत। बम्बई आजुक मुम्बई नहि। ने सिनेमा उद्योग छल ने कलकाखाना आ ने अखुनका जेँका कारोबार। गंगानन्द केँ तीस बीघा जमीन। तीनि भाईक भैयारी आ सत्तर गोटेक आश्रम। जइ साल सबारी समय समय होइत ओइ साल आश्रम चला, मलगुजारी दइयो के गंगानन्द केँ अन्न उगड़ि जाइत जकरा दू-सलिया , तीनि सलिया पुरान बना खाइत। सबाइयो लगबैत। पहिल सालक रौदी गंगानन्द केँ बुझि नहि पड़लनि। घर मे धान-चाउर, गाय-महीसि ले बड़का-बड़का दू टा नारक टाल। पहिलुके जेँका गंगानन्दक मन हरियर। दोसर साल घरक धान-चाउर लगिचायल। रौद मे, जहिना गाछक तोड़ल फूल मौलाइ लगैत तहिना गंगानन्द मौलाइ लगला। कुटुम्बो-संबंधीक आवाजाही बढ़ि गेलनि। गंगानन्दक जेठ बेटी रीता सासुर बसैत। चारि बेटी आ एक बेटाक संग रीता सेहो आबि गेलनि। रीताक जेठकी आ मझिली बेटी विआह करै जोकर। जँ कहिओ रीता कोनो काज मे नैहर अबैत त काजक पराते सासुर जाइ ले धूम मचा दैत। किऐक त सासुरक सब भार रीते दुनू परानी पर। भैयारी मे जेठ रहने घर से बहार धरिक सब तरद्दुत करय पड़ैत। रौदीक चलैत रीता धिया-पूता ल’ छबो गोटे नैहर आयल। मासो सँ उपरे भ’ गेलैक मुदा सासुर जेवाक चर्चे ने करैत। बाप-माय बेटीके कोना मुँह फोड़ि जाइ ले कहत। भरिआयल खरचा सँ गंगानन्द तेरे-तर कुहरैत। छाती दलकैत। साल खेपब कठिन रहै। बरखाक कतौ पता नहि। सभ खेत परती भेला स’ पड़ल। ने हर जोतय जोकर एकोटा आ ने पानिक कोनो दोसर उपाय। मने-मन रीता सोचए जे अगर सुमनक(जेठ बेटी) विआहक चर्चा माए करत तँ ओकरे माथ पर पटकि देव। अपना बूते तँ वियाह पार लागव कठिन अछि। सभ दिन साझू पहर क’ गंगानन्द चूड़ाक भूजा फँकैत छलाह। बीस मनिया कोठी टा मे चाउर बचल छल। धान पहिने एठि गेल छल। धानक दुआरे चूड़ा कुटाओल कथीक जायत? गंगानन्दक पत्नी पार्वती पतिक अभ्यास बूझि चाउर भूजि छिपली मे नेने एलखिन। भूजल चाउर देखि गंगानन्द मने-मन बुझि गेलखिन जे धान सठि गेल। पुरान चाउर रहने भूजा पथरा गेल, तेँइ सक्कत रहै। पहिलुक फक्का मुँहमे लइते गंगानन्दक दाँत सिहरि गेलनि। दाँत सिहरतहि गंगानन्द लोटाक पानि मुँहमे ल’ गुल-गुला केँ घोटलनि। मुँहक चाउर घोटि छिपली आगू सँ घुसका देलखिन। मने-मन पार्वती अंदाजलनि जे सक्कत दुआरे भूजा नहि खा’ भेलनि। मुदा उपाय की? गंगानन्द केँ तामस नहि उठलनि। जँ घरमे धान रहैत तँ चूड़ा कुटाओल जायत। नहि रहने कतए सँ आओत। जहिना लकड़ी जरि केँ राख भेला पर षक्तिहीन भ’ जायत तहिना गंगानन्दक दषा भ’ गेल रहनि। गिलासमे चाह नेने नातिन सुमन आइलि। दुनू परानीक नजरि सुमन पर पड़ल। चाह राखि सुमन आंगन चल गेलि। लग्गी भरि हटि क’ बैसलि पार्वतीकेँ हाथ्क इषारा सँ गंगानन्द लग ऐवाले कहलनि। पार्वती बैसले-बैसल घुसुकि क’ लग आयलि। फुस-फुसा क’ गंगानन्द पत्नीकेँ कहलखिन- ‘‘रीताक दुनू बेटी, जेठकियो आ मझलीयो वियाह जोकर भ’ गेल। जँ कहीं एहिसाल एकोटा वियाह ठनलक तँ इज्जति वाँचव मोसकिल भ’ जैत। हमहू तँ नने छियैक।’’ एखन धरि वार्वती अंगना सँ दलान धरि अवैत-जायत रहली हेन। एहि सँ अधिक नहि देखलनि। ने समय भेटलैनि आ ने घरक नी अधला नीक अधला बुझल। नातिनक यिाह बुझि उद्गार सँ पार्वती कहलकनि- ‘‘यज्ञो ककरो बाकी रहैत छै। यैह तँ भगवानक लीला छन्हि जे गरीब स’ ल’ क’ अमीर धरि सबहक काज होइते जायछै।’’ चोटाइल साप जेँका गंगानन्दक दषा रहनि। दिन ससरब कठिन। तई पर सँ पत्नीक चढ़ल बात सुनि, केँचुआ छोड़ैत सापक साँस तेज भ’ जाइत तहिना नमहर साँस छोड़ैत गंगानन्द कहए लागलखिन- ‘‘ऐहन दुरकाल मे जीवि कठिन अछि तई पर वियाह सनक यज्ञ तहन तँ जकरा सिर पर जे काज अबैत छैक, कोनो ने कोनो तरहेँ करिते अछि। दू सालक रौदीक झमार। अखनो धरि पानिक कोनो आषा नहि, पहिले ओ पार करब अछि। वियाह तँ एक-आध साल आगूओ बढ़ाओल जा सकैत अछि।’’ ओलती लग ठाढ़ भ’ रीता माय-बापक फुसुर-फुसुर गप्प सुनैत। जखन गप्प मोड़ पर आयल कि रीता आगू बढ़ि मायक लग आबि ठाढ़ भ’ गेलि। अपन बात क’ छिपबैत गंगाननद कठहँसी हँसि पत्नीकेँ कहए लगलनि- ‘‘रीतोक बेटी वियाह करए जोकर भेल जाइछै?’’ मुँह निच्चा केने रीता बाजलि- ‘‘बावू, दुनू बहीन तरे-उपरे भ’ गेलि अदि। मुदा घरक जे दषा अछि तहिमे अखन वियाह पार लागब कठिन अछि। जखन समय-साल सुधरतै तखन बुझल जेतै।’’ मने-मन गंगाननद सोचथि जे घरक भार पड़ला सँ सभ आगू-पाछू देखि किछु करैत। मूड़ी हिलबैत गेगानन्द कहलखिन- ‘‘हँ, से तँ ठीके। अखन विवाह करबाक अनुकूल समयो ने अछि। सिर्फ हमरे टा नइ समाज मे बहुतोँ के बेटी विवाह करै जोकर छै। सभक पार तँ भगवाने लगौथिन।’’ पिताक बात सुनि रीता क’ मोनमे षान्ति एलै। अपन परिवारक संबंध मे रीता पिताकेँ कहए लागलनि- ‘‘बावू घरक हालत खराव भ’ गेल अछि। एक तँ दू-अढ़ाई बरखक रौदी दोसर सवांगो सभ उहिगर नहि ने क्यो कमाई-खटाई बला नहि अछि। भरि दिन, कतौ बैसि क’ गप्प-षप्प लड़वैत दिन बितवैत छथि। जेना कोनो धैन-फिकिर नहि। भैयारी मे जेठ रहने दुनू परानी काजक पाछु दिन-राति अपस्याँत रहैछी।’’ मास पूरए मे दू दिन रहल। राजक सिपाही केँ पटवारी अंतिम सूचना मालगुजारीक लेल पठौलक। सिपाही आबि गंगानन्द केँ कहलकनि- ‘‘परसू तक जँ मालगुजारी नै देवइ तँ जमीन निलाम भ’ जायत। पटवारी अपन जाति-बेरादर बुझि चुपचाप पठौलनि।’’ सिपाहीक समाचार सुनि गंगाननदकेँ हृदय मे ऐहन धक्का लागल जना कोनो राजाकेँ दुष्मन राज छीनि, भगा दैत। छाती धकधकाइत! कंठ सुखैत गंगानन्द सिपाहीकेँ कहलक- ‘‘अखन जे दषा अछि तहि मे मालगुजारी देव असंभव अछि। दोसर कोनो रास्तो ने सुझैत अछि।’’ गंगाननदक मजवूरी वुझति सिपाही कहलकनि- ‘‘एकटा उपाय अछि।’’ ‘‘की?’’ ‘‘पटवारी केँ वियाहै जोकर बच्चिाया छन्हि। अहाँ अपन बेटाकेँ बियाह क’ लिअ। देबो-लेब नीक जेँका हैत। हुनके हाथक काज छन्हि जमीनक रसीद द’ देताह। क्यो बुझवो ने करत काजो भ’ जायत।’’ बचनाक आवाज सुनि, फुलिया जाँत चलौनाई रोकि, एक हाथ सँ हथरा पकड़ने, तकलक। बचनाक मोन, जना धिया-पूताक हाथ सँ कौआ रोटी लपकि उड़ला पर होइत, तहिना रोगाइल मने बचना पत्नी(फुलिया) केँ कहलक- ‘‘हम लक्ष्मीपुर(फुलिया नैहर, अपन सासुर) जँ कोनो गर जँ कोनो गर रुपैयाक लागि जायत त’ लगौने अवै छी।’’ नैहरक नाम सुनि फुलियाक मनमे आनन्दक अंकुर अंकुरित होअए लागल मुदा विपत्त्कि चादरि ओकरा झाँपि देलक। सोगाइल मने फुलिया बाजलि- ‘‘जाउ, कपार तँ फुटले अछि तइओ अपना भरि परियास करु। कपार तँ उनटवो-पुनटवो करैछै जँ नीके गड़े उनटि जाय। कनिये थमि जाउ। रोटी पका दइ छी। खा के जायव।’’ मन्हुआइल बचना ठोर पटपटबैत बाजल- ‘‘बड़वढ़ियाँ। ताबे हमहू दौड़ले दाढ़ी बनौने अवैछी।’’ बचना दाढ़ी कटबैए ले विदा भेल। फुलिया जाँत लगक चिक्कस मुजेलामे उठौलक। चुल्हि लग मुजेला राखि कोठी परसँ चिक्साही सूप अनलक। गठूलासँ जारन आनि चुल्हि पजारलक। नौवा गाममे नहि छल। मूडनक पता देइ ले सुखेत गेल छल। बिना दाढ़ी कटौनहि बचना घुमि आवि, नहाए लागल। फुलिया रोटी पका, भाँटा क’ सन्ना बनौलक। बचना हाँहि-हाँहि खा धोति-अंगा पहिर छाता ल’ लक्ष्मीपुर विदा भेल। वचना रास्तो चलै आ मने-मन महावीरजी कँ सुमरैत कहलकनि- ‘‘हे महावीरजी काज भ’ जायत तँ अहाँ केँ एक रुपैया क’ चिन्नी चढ़ाएव।’’ महावीरजी केँ कबूला करितहि जना बचनाक मोनमे विष्वास भ’ गेल जे काज हेबे करत। लक्ष्मीपुर पहुँचते बचना सभक मन उदास मोन खसल छै! मुँ सँ फुफरी उड़ैछै। करेज पर पाथर राखि बचना सरहोजि सँ पूछलक- ‘‘किऐक सभ अनोन-बिसनोन जेँका छथि।’’ नोराइल आँखिये सरहोजि उत्तर देलकनि- ‘‘पाहुन की कहब, खेतक मलगुजारी दू सालक पछुआयल छै। तई दुआरे परसू सब खेत लिलाम भ’ जेतै।’’ सरहोजिक कलहंस बात सुनि बचना अवाक् भ’ गेल। ककर दुख के हरत! पाएरो ने धोय चोट्टे बचना गाम घूमि गेल। विसेसर घरक आगू मे रास्ता पर लोक सभ ठाढ़ रहै। रौदाइल विसेसर। हर जोेति कँ अबिते छल। हाथ मे हरवाही पेना। माथ मे गमछाक मुरेठा बन्हने। फरिक्के सँ विसेसर सुनलक जे कचहरीक सिपाही बलजोरी बाड़ी जा कदीमा तोड़ि लेलक। विसेसरक पत्नी मोहिनी कतबो मनाही केलकै सिपाही नहि मानलकै। मोहिनी आ सिपाहीक बीच श्रक्का-टोकी होइते छल, कदीमा सिपाहीक हाथे मे रहै। धाँय-धाँय विसेसर चारि-पाँच पेना सिपाहीके लगा, कदीमा छीन लेलक। गरिअबैत विसेसर कहलक- ‘‘बापक बाड़ी बुझि कदीमा तोड़ले। सिपाही तू मालिकक छीही की हमर?’’ चाड़ि-पाँच गोटे मकड़ि विसेसरकेँ पकड़लक। दू-दू गोटे दुनू डेन पकड़ने तइओ जोष मे बिसेसर उठि क’ ठाढ़ भ’ हुरुकि-हुरुकि सिपाहीके मारक कोषिष करए। लोकक कहला सँ कनेक तामस विसेसरक कमल। गरिऔनाइ बन्न केलक। मुदा तामसे ठोर पटपटैते। षान्त भ’ विसेसर बाजल- ‘‘अहाँ समाज मिलि पकड़लहुँ, मुदा पच्चीस बेर सिपाहीकेँ कान पकड़ि उठाउ-बैसाउ। चाहे थुक फेकि चटबाउ जे फेरि ऐहन गल्ती नै करै। ई चोर छी। लालीस क’ जहल से बाहर नै हुअए देवइ। राँड़-मसोमात हमरा बुझलक।’’ बिसेसरके मात्र दू कट्ठा घरारिये टा। सेहो बेलगान। दुइये गोटाक आश्रम। बेटा-पुतोहू भिन्न। एकटा तेरह हाथक घर अपनो आ बेटो मिलाकेँ रहै। बाकी डेढ़ कट्ठा बाड़ी बनौने। मोहिनी अपन बाड़ी मे सभ दिन राषि-राषि क’ तरकारी उपजबैत। बिसेसर बोइन करए। दुनू परानीक मिलानक चर्चा गामो मे होइत अछि। दुनू गोटे अपन-अपन काज बँटने। भिनसुरका उखराहाक तीन सेर धान आ बेरका डेढ़ सेर दलिहन बोइन सभ दिन विसेसर कमाइत। दुनू साँझ भरि पेट खाय निचेन सँ रहैए। कोनो हरहर-खटखट जिनगीमे नहि। दू सेर चारि सेर घरो मे अन्न रहैत। साठि बर्खक विसेसर जुआन जेँका तनदुरुस्त। ने एकोटा दाँत टूटल आ ने केष पाकल। जना दोसर-तेसर बोनिहार पचास वरख पुरैत-पुरैत झुन-कुट बूढ़ भ’ जाइत तना विसेसर नहि। नियमित काज खायब आ सुतब विसेसरक खास गुण छलैक। तरकारीक गाछ रोपै स’ ल’ क’ पटौनी, कमौनी सभ मोहनिये करैत अछि। 44 मोहिनी डेढ़हो कट्ठा बाड़ी मे कोदारिक काज सँ ल’ क’ खुरपी हसुआँक सभ काज करैत अछि। लत्ती-फत्ती ले छोट-छोट मचानो अपने बना लैत। तरकारीक गाछ रोपब, पानि देब, कमैनी सँ ल’ क’ देखभाल तक करैत। अंगने जेँका चिक्कन वाड़ियो बनौने। सभ दिन मोहिनी धान कूटए। गाछी-बिरछी से पात खछड़ि अनैत। दष हाथ्क एकटा लग्गी बनौने कुटए जइ से गाछक सुखल ठहुरी तोड़ै। विसेसर तमाकुल खाइत मोहिनी हुक्का पीबैत। अमलो आसान। कातिक मे सय गाछ तमाकुल बाड़ी मे मोहिनी रोपि लैत जे माघ मे जुअएला पर काटि लैत। उपरका मूड़ी, कनोजरि आ निचला पात डाँट के छाँटि पीनी कुटैत आ बीचला पात सुखा क’ खेवा ले रखैत। एक्को पाई खरच नहि। बाध सँ मुइलहा डोका मोहिनी बीछि आनए। ओकरा डाॅहि क’ चून बना लिअए। एक सेर धान क’ छुआ कीनि, डावा मे राखि, सालो भरि पीनी कूटए। भोलिया विसेसरक बेटा। जाबत छोट छल मायक संग घर-आंगनाक काज करैत। गाछ पर चढ़ि सुखल जारनो तोड़ैत। जखन नमहर भेल वियाह भेले। विसेसर अपने संगे काज करै ले ल’ जाय। बियाहक बाद साल भरि भोलिया बापक संग काज करैत रहल। मुदा छैाँड़ा मारड़िक संगत मे पड़ि भोलिया भाँग पीबए लागल। बाड़ी-झाड़ी मे भाँगक गाछ। ओकर फूल झाड़ि-झाड़ि आ जट्टा वाला डढ़ि काटि-काटि सुखा-सुखा रखैत। विसेसर केँ कोनो पता नहि। साल भरिक बाद जखन विसेसर काज करए। विदा हुअए तखन भेलिया सुतले। मोहिनी उठवए जाय तँ गरजि केँ भालिया कहैत- ‘‘मन खराव अछि, माथ दुखाए।’’ एक दिनक नहि भोलियाकेँ आदत भ’ गेलै। षुरु मे दू-चारि दिन विसेसर बाजल- ‘‘छैाँड़ा, मौगियाह भ’ गेल।’’ कहि छोड़ि देलक। मुदा आदत देखि विसेसर भोलिया केँ कहलक- ‘‘तू बेटा छियैँ, एकर माने ई नहि जे तू मालिक भ’ गेलै। दू परानी तोहूँ छेँ। दुनू गोटोक खाइ-पीवै ले कमाइये पड़तौ। भिन्न रह कि साझी, बिना कमेने ने हेतौ। जो आइ से फुटे भानस कर।’’ भालियकेँ विसेसर भिन्न क’ देलक। साझू पहर केँ सभ दिन विसेसर डेढ़िया पर बिछान बिछा, जावत भानस होइ, भजन-कीर्तन करैत। असकरे विसेसर खजुरी बजा भजन करैत। ने दोसर साज आ ने दोसर संगी। अपने गवैया अपने बजनिया अपने सुननिहार। पाँचे टा भजन विसेसर केँ अवैत। जे सभ दिन गावए। जखन भजन करए वइसे। तखन पहिने ‘‘सत् नाम, सतनाम, सँ षुरु करए। एक सुर खूब झमका केँ सतनाम गावए। चुल्हि लग मोहिनी भानसो करए आ घुन-घुना क’ संग-संग सतनामो गावए। सतनामक बाद ‘‘साँझ भयो नहि नहि आयो मुरारी’’ अह्लाद सँ विसेसर गावए। अड़ोस पड़ोसक सभ पाँचो भजन सीख लेने। जहाँ विसेसर षुरु करए कि सभ अपना-अपना अंगना मे घुन-घुना- घुन-घुना गावए। साँझ गोलाक बाद विसेसर विनती गवैत। विनती गेवा काल ततेक तन्मय विसेसर भ’ जाइत जना भवान हृदय मे वैसि प्रेरित करति होथि। विनती समाप्त हाइते विसेसर खुजुरी राखि तमाकुल चुना क’ खाइत। मोहिनी चुल्हिये लग बैसल-बैसल हुक्का भरि क’ पीवैत। तमाकुल थूकड़ि पानि सँ कुड़ुर क’ विसेसर कृपण रुप-वर्णन षुरु करए। रुप-वर्णनक समय विसेसर कँ बुझि पड़ै जे अन्तज्र्ञान सँ ब्रह्माण्ड केँ देखि-देखि गवैत छी। गबैत-गबैत विसेसर उठि के ठाढ़ भ’ खजुरियो बजवैत आ ठुमकी चालि मे झूमि-झूमि नचबो करैत। असकर रहनहुँ विसेसर केँ बुझि पड़ैत जे हजारो-लाखो लोकक बीच नाचि-गावि रहल छी। कखनो हँसैत, त’ कखनो मुस्की दैत। कखनो नोर बहबैत त’ कखनो पंडित जेँका प्रवचन करैत। रुप वर्णन समाप्त होइते तौनी सँ मुँ-हाथ पोछि सोहर गवैत। सेाहर गवैत-गवैत विसेसर केँ भरि दिनक ठेही उतरल वुझि पड़ैत। अंत मे समदाउन गावि समाप्त करैत। उत्थान-पतनःः1 रोहितपुरक दोनौक चर्चा बुढ़हो-पुरान अष्चर्य स’ करैत कहैत जे ऐहन जिनगी मे नहि देखने छलौ। पर हवा उठल। गोल-मोल भ’ सुरुंगा दौड़ैत टोल मे आबि घरक छप्पड़ सभकेँ उड़बै गोल-मोल नचैत। जना कोनो नर्तकी घघड़ा पहिर नचैत तहिना नचैत हजारो हाथ ऊपर गर्दा खढ़-पात उड़ि जाइत। घरक नुआ वसत्र उध् ि ाया’उधिया आंगन सँ हटि-हटि खेत सभ मे जा-जा खसैत। चेतन सभ अपन-अपन बच्चाकेँ पकड़ि-पकड़ि रखने जे विर्ड़ो मे उड़ि ने जाय। बिरड़ो बढ़ैत-बढ़ैत आँधी मे बदलि गेल। राहितपुर मे एक्को घर अवन्च नहि रहल जकरा कोनो नोकसान नइ भेल होय। घर गिरबो कएल आ उधिऐवो कएल। सैाँसे गामक लोक विपत्ति मे डूबि गेल। के ककर नोर पोछत? सभकेँ अपने गिरैत।

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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...