Tuesday, September 01, 2009

पेटार १७

केदार कानन आ अरविन्द ठाकुर
सृजन केर दीप पर्व

लघुकथा / वोटक प्रश्न / तारानान्द झा
तरुण



पूर्वी तटबन्ध पर कोसीक बाढ़िक दृश्य देखबाक लेल उपस्थित भीड़ लग प्रभावित लोक
सब अपन - अपन कष्टक वर्णन अत्यन्त कारुणिक स्वरें सुना रहल छल। बाढ़ि - प्रभावितमे
सँ किछु हिन्दू आ किछु मुसलमान वत्र्तमान सरकार आ मुख्यमंत्रीकें गरिया रहल छलै जाहि
सरकारक अकर्मव्यताक कारणें ओलोकनि मरि रहल छल।



ओसभ अपनेमे बजैत छल जे एहिसँ नीक तँ पछिले सरकार चल जे एहन समयमे सब
तरहक सहायता दैत छल। तखने उपस्थित भीड़मे सँ एकटा स्वर अभरलै --- अच्छा, तों सब
अगिला चुनाओमे ककरा देबहक

वोट ?



बाढ़ि - प्रभावितमें सँ एकटा मौलाना टपकि उठल - 'नहि वोट तँ देबै एही सरकारकें,
कारण एकर नेता सब कम सँ कम हमरा सभक धर्मस्थलक रक्षाक बात तँ करैत अछि। ओकर
एहि बातकें सुनि शेष हिन्दू समूह, जाहिमे अधिकांश पिछड़ा वर्गक रहथि, मौलानाक समर्थन
करैत बाजल - 'हँ, वोट तँ ठीके एकरे देबैक, कारण ई सरकार आरक्षणक बात तँ करैत अछि।



एहि बातक क्रममे एहन लागि रहल छल जेना बाढ़ि प्रभावित लोक - समूहक मुँह परसँ
कष्टक सब चेन्ह हठात लुप्त भऽ गेल हो।



गोबर




नारायणजी



हम नगर-सेवा बसमे बैसल छी। बस चलि रहल अछि। महानगर बनैत राजधानी
पटनाक हमर ई पहिल अनभुआर यात्रा थिक। एखन, हमरा यारपुर जयबाक अछि। चौराहाक
एकटा होटलमे खयबाकाल हम पता कऽ लेने रही जे एतयसँ यारपुर जयबा लेल नगर-सेवा
बस पाइ आ समय दुनू लेल किफायती हैत। आ थोड़ेक पुछा-अछीक बाद हम एहि बसमे
आबि बैसि गेल छी।



हम तीनगोटेक बैसबाक जगहबला सीटपर बीचमे बैसल छी। धोती पहिरने। हमरा बाम
आ दहीन जे दुनू बैसल अछि फुलपेंट पहिरने। हमरा तीनूक बैसबाक बर्थ एक रहितहुँ,
जेनाकि बसमे रहैत छैक, ओंगठनिया उपरमे तीनूक खतल-खतल फूट-फूट अछि, जे बैसबाक
सीमाकें निर्धारित करैत अछि बेरबैत अछि। हम पाछू घुमि देखैत छी, जे हम अपना
ओंगठनियाँक सीमा-क्षेत्रक बाहर तऽ नहि छी ? हम सोचैत छी, असावधानियेमे सही हमरा
द्वारा अनका सीमा क्षेत्रक अतिक्रमणसँ हमरा कातमे बैसल दुनू व्यक्तिकें बूझऽमे कनियो देरी
नहि लगतैक जे हम देहाती छी। अपना देहातीपनकें प्रकट नहि होमऽ देबा लेल हम पूर्ण
सचेत छी।



बस ठाम ठाम रुकैत चलि रहल अछि। लोक चढ़ि-उतरि रहल अछि। हमरा बसक
खिड़कीसँ बाहर देखब नीक लगैत अछि। अनचिन्हार जगह, अभिनव शहरक दृश्य जे हस
चललासँ प्रतिपल बदलैत हमरा देखाइत अछि, अपना संग हमर सहज उत्सुकताकें गथने अछि।
हमरा मनमे होइत अछि, एना देखलासँ हमरा भीतरक उत्सुकता हमरा आकृतिपर साफ प्रकट
भऽ जाइत अछि। सम्भव थीक हमर अगल-बगल बैसल दुनू शहरी बाबू हमर एहि देखबाक
उत्सुकताकें नोट कऽ लिअय आ देहाती बूझी लिअय हमरा। तें हम बाहर देखब छोड़ि दैत
छी।



हम अपनाकें जन - साधारणसँ थोड़ेक ऊपर मानै छी। तकर आधार अछि, अपना
नजरिमे, जे हम देशी - विदेशी उत्कृष्ट साहित्य पढ़ैत छी। तें धोती पहिरनहु ओहि दुनू शहरी
बाबूक बीचमे बैसल हम पटनाक अपन एहि पहिल यात्रामे अपनाकें ओहि दुनूसँ झूस नहि बूझि
रहल छी। हमरा संगमे एखनो एकटा कविताक किताब अछि। यद्यपि चलैत बसमे किताब
पढ़ब साफे कठिन होइत छैक, तथापि हम अपन एक तरहक आत्म-विज्ञप्ति लेल, अपना काँकमे
लटकल झोड़ा, जकर डँटकी तऽ काँखमे अछि मुदा झोड़ा जाँघपर

राखल अछि, सँ किताब बहार करैत छी। हमरा होइत अछि किताब बहार करबाकाल हमर
केहुनी नहि बामकात बलाकें लागि जाय, आ ओ अकचकाकें ताकय नहि लागय, आ हमरा
देहाती नहि बूझि लिअय, तें हम ओरियाकें झोड़ासँ किताब बहार करैत छी।



किताब ओड़िया कवि सीताकान्त महापात्रक - 'समुद्र' थिक। हम किताबकें अपना बाम
हाथमे पकड़ि तेना कऽ अगिला सीटक ओंगठनियापर हाथ अकटबैत छी, जाहिसँ ओ दुनू
आसानीस एहि किताब तथा कविक नाम पढ़ि सकय। किन्तु, ओहि किताबकें हमरा हाथमे


देखैत रहलाक बादो, ककरो आँखिमे हमरा कोनो प्रकारक उत्सुकता आ लालच नहि देखाइत
अछि। हमरा अपना अहमक तुष्टि होइत अछि, जे हम जन साधारणसँ ऊपर छी, अहू दुनूसँ
ऊपर । यद्यपि हमरा कातमे बैसल दुनू व्यक्तमेसँ क्यो उकस-पाकस कऽ अपना नजरिमे कोनो
प्रकारक सम्मान नहि दैत अछि, पूर्ववत उदासीन रहैत अछि हमरा प्रति। तथापि, किताब
हाथमे रखने, हमरा अपना एकटा पृथक दर्प - बोधक आनन्द होमऽ लगैत अछि, चलैत एहि
बसमे।



हम बसक खिड़कीसँ बाहर तकैत छी। आस्ते होइत बससँ हम बाहरक दोकान सभक
साइनबोर्ड पढ़ऽ चाहैत छी, जाहिसँ हमरा मोहल्लाक ज्ञान भऽ जाय, आ अपन गन्तव्य पाछू
नहि छूटि जाय। किन्तु हमरा कोनो साइनबोर्ड पढ़ल नहि होइत अछि। कारण ई बस
एकदम्मे ठाढ़ नहि होइत छैक, ससरिते रहैत छैक आ स्पीड पकड़ि लैत छैक।



हम थोड़ेक घबराइत छी। हमरा अपना कातबलासँ अपना गन्तव्य - स्थानक मादे
पुछबाक मोन होइत अछि। हम सोचैत छी, एना पुछलासँ ओ हमरा देहाती बूझि लेत हमरा
अपन क्षण भरि पहिने ठोस बनल अहम गलैत बुझाइत अछि। हम पुनः सोचैत छी, अपन
गन्तव्य स्थान दऽ नहि पुछलास हमरा जतऽ जयबाक अछि से तऽ पाछू छुटबे करत, हम कतऽ
चलि जायब से स्वंय नहि जानि पायब।



हम घबराइत छी कछमछाइत छी। हम अपनामे साहस एकत्रित करैत छी। हम खूब
साहस कऽ अपना बाम कातबलासँ यारपुर दऽ पुछैत छी। यारपुर बहुत पाछू छूटि गेल ओ
चकित होइत कहैत अछि। ओ हमरा सम्पूर्ण शरीरपर नजरि दौड़ाय आशंका प्रकट करैत अछि
जे हम पटना पहिले-पहिल आयल छी की ?

हमरा ओकर नजरि सूइया जकाँ गड़ैत अछि। हमरा अपना गर्व-बोधक महल हाथमे
किताब लेने खंडहर भेल बुझाइत अछि। यद्यापि ओ व्यक्ति हमरा बड़े आवेशसँ बैसल रहबा
लेल कहैत अछि, आ बस थीर होइत उतरबाक सलाह दैत अछि। किन्तु हम उठि कऽ ठाढ़
भऽ जाइत छी। बस ठाढ़ होयबासँ पूर्वे, बसक गेटपर बिना एको पल दूरि कयने, चलि जाय
चाहैत छी। अपना जनतबें घबरायल रहितहुँ हम बड़े सावधानीसँ

बैसलाहा रो सँ बहराइत छी। किन्तु, लाख सावधानीक अछैतहुँ बहरयबाकाल हमरा बूते
बामकात बलाक पयर पिचा जाइत अछि। पुनः ओ हमर सम्पूर्ण शरीर दिस तकैत अछि, आ
किछु भनभनाइत अछि। सम्भवत हमरा देहतियोसँ अधलाह जानवर कहने हैत। हम अपनामे
अपनाकें विवस्त्र पबैत छी।



किछु मिनटक बाद बस रुकैत अछि। रुकैत कहाँ अछि ससरिते रहैत अछि। आ हम
ससरैत बससँ पछिला उतरनिहारक होहकारापर धोतीक कोंचा सम्हारने उतरैत छी, आ दूर
धरि फेकाइत खसैत-खसैत बचैत छी। खलासीक 'अरे रे-रे .......' क स्वर हमरा सुनबामे
अबैत अछि। आ हमर निजी निर्मित देहातीपनकें झँपने आवरण चिर्रीचोंत भेल बुझाइत अछि।



हम पीचरोडक कात आबि एकटा गाछक छाँहमे ठाढ़ भऽ जाइत छी। आ अपनाकें


सामान्य आ स्थिर करैत छी। हम चलैत रेलगाड़ीमे कैकबेर चढ़ल-उतरल हैब। किन्तु,
कहियो एना कहाँ भेल छल। ई कोन

बस थिकै, जे ससरिते रहैत छैक, कखनहुँ पूरा ठाढ़ नहि होइत छैक, आ लोक हुल्ल दऽ चढ़ि-
उतरि जाइत अछि शहरमे ?



हम देखैत छी, आगूमे चाकर पीचरोड अछि। पीचरोडक बीचमे आड़ि जकाँ बनाओल
छैक जकर बाम आ दहीन वाहनसभ आबि जाय रहल अछि। लगमे कोनो बजार नहि अछि।
एहि निर्जन इलाकामे पीचरोडक दुनू कात भारी-भारी गाछसभ अछि। हम सोचैत छी, ई सड़क
अशोक राजपथ तऽ नहि थिकै ? सम्राट अशोक द्वारा बनबाओल, शेरशाह द्वारा पुनरुद्धरित ?
हमरा बच्चामे इतिहासमे पढ़ल बात मोन पड़ि जाइत अछि। हमरा गोलघर देखबाक अछि
म्यूजियम देखबाक अछि। मुदा, से बादमे। एखन, हमरा यारपुर जयबाक अछि।



अपना दिस अबैत एकगोटेसँ पुछलासँ ज्ञात होइत अछि जे अगिला चोराहापर गेलासँ
यारपुर लेल हमरा ढेरी रिक्शा भेटि जायत। आ हम अगिला चौराहा दिस चलि दैत छी।

हम क्षण भरि पहिने अपना संग घटित बसबला घटनाकें बिसरि जाय चाहैत छी हम
अपन मूड़ी हनैत छी। हम पुनः अपना देहातीपनकें प्रकट नहि होमऽ देबा लेल कटिबद्ध भऽ
जाइत छी। बसमे अथवा आनोठाम एना ककरो संग भऽ सकैत छैक, हम अपनोकें सतोष
दिअबैत छी। हम सोचैत छी, हम साहित्य पढ़ैत छि विचारक स्तरपर परिष्कृत लोक छी, जन
साधारणसँ थोड़ेक ऊपर। फेर हमर मौलायल दर्प अपना अन्तरमे कलश तानि लैत अछि।
हम अपन बाम हाथसँ धोतीक साँची मुट्ठीमे पकड़ि सुस्थिर चलऽ लगैत छी, गाछक छाहडिए-
छाहड़ि।



थोड़ेक आगू एकटा गाछक जड़िमे चारिटा गजपीबा गाँजा लटबैत अछि। हम डेग
झटकारि आगू बढ़ि जाइत छी। हमरा डर होइत अछि। हमरा मोन पड़ैत अछि, अखबारमे
पढ़ल समाचार-पटनामे लूटि हत्या, बलात्कार....। ई सभ हमर झोड़ा - झपटा छीनि सकैत
अछि।



हम तेजीसँ आगू बढ़ैत जाइत छी। हमरा डेगमे थोड़क भय आ अपन गन्.व्यक दूरी
नपबाक आकुलता अछि।



थोड़ेक आगू बढ़लाक बाद हम देखैत छी, एकटा गाछतर दूटा युवती दूटा छिट्टामे गोबर
उठौने ठाढ़ि अछि। हमर नजरि पड़िते एकटा हमरासँ गोबर माथपर उठा देबाक अनुनय करैत
अछि। हम विस्मित होइत छी, आखिर कोन एहन लेबुल साटल अछि हमरा कपारपर जे हमर
देहातीपनेकें देखार करैत अछि आ हमरा गोबर सन वस्तु माथपर उठा देब कहबाक ई सभ
साहस कऽ रहलि अछि। ग्लानि आ रंजसँ हमर मुँह लाल भऽ जाइत अछि। थाड़ेक हम
सहज होइत सोचैत छी पटना सन शहर लेल कनियो उपयोगी हैब छोट बात रहैत छोटबात
नहि थिक। हम जन सामान्यसँ पृथक छी, थोड़ेक ऊपर, विचारक स्तरपर परिष्कृत लोक।




हम ओकरासभक लग जाइत छी। ता एकटा युवती जे हमरा बजौने रहय आ जे
अवस्थामे पैघ रहय हमरा दिस तकैत, मुस्कियाइत दोसराकें गोबरक छिट्टा माथपर टेकि दैत
अछि। आ तेहन मुस्की सग अपन आँखि हमरा आँखिमे सन्हियाय अपन छिट्टा उठयबा लेल
इशारा करैत अछि जे हम मुग्ध भऽ जाइत छी, जे दुनियामे केहन मुग्ध करऽ बला शेष अछि
हँसी। हम चट छिट्टा ओकरा माथपर टेकि दैत छियैक।



हम अपनामे एकटा अव्यक्त तृप्तिक अनुभव करैत छी। हम ठाढ़ भऽ तकरा सुआदऽ
लगैत छी। ओ दुनू युवती ता दस डेग आगू बढ़ि गेलि रहैत अछि। ओसभ भनभना अपनामे
की गप करैत अछि, से तऽ हम

बूझि नहि पबैत छी, किन्तु ओ दुनू खूब जोरसँ हँसैत अछि। ओकरा सभक किलकारी जे
साधारणसँ अधिक ओकरासभक देहकें डोलबैत अछि हम देखैत - सुनैत छी। हमर सर्वागपर
चोट करैत अछि। हम सोचैत छी, ओसभ अपन अपन शहरी चालाकी आ हमर देहातीपर पर
हँसलि हैत।



हम ठाढ़ रहैत छी।



ओकरासभके हँसब आइयो हमरा कानमे चोट करैत अछि, सामान्य लोक जकाँ।



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लघुकथा / बनियाँ / राजेन्द्र झा

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प्रायः पाँच बर्खक बाद भेंट भेल छल डा0 विपिनसँ। एहिबीच अदभुत परिवत्र्तन भेल
छलै। आइसँ दस बर्ख पहिनो जाहि डा0 विपिनकें जनैत छलहुँ ओ पूर्ण साहित्यिक आ
साहित्यिक गतिविधि लेल समर्पित छलाह।



आजुक डा0 विपिन नगरक सभसँ व्यस्त प्रैक्टिशनर छथि। काल्हि डा0 विपिन
किरायाक मकानमे रहथि आइ अपन मकान बना लेने छथि।



भेंट भेल हुनक चेम्बरमे रोगी सभक अबरजातक बीच। डा0 विपिनक पुरनका
स्वाभाविक गुण 'उन्मुक्तता' हेरायल वस्तु जकाँ लागल। हम कहलियनि 'लगैत अछि जे
रिजर्व बैंकक छापल कागतक कड़कड़यबाक स्वरमे रचनाधर्मिताक सुमधुर संगीत गुम भऽ गेल
अछि।'



तुरत ओ किछु नहि कहलनि। दू-चारि गोट रोगीकें देखि चैम्बरक केबाड़ी भीतरसँ बन्न
कऽ कुरसीपर आबि बैसलाह। उदास स्वरमे कहलनि-- 'ठीके कहलहुँ। रोगी सभकें हमरापर


वि•ाास छैक, तें घंटो प्रतीक्षामे बैसल रहैत अछि, आ हमरेसँ इलाज कराबय चाहैत अछि।
मुदा भीड़ भड़क्काक कांरणें हम प्राय सभक संग न्याय नहि कऽ पबैत छी आ ई बात हमरा
मथैत रहैत अछि।'



फेर कने बिलमि कऽ बजलाह-- साहित्यिक रचना करबामे जे सुख आ तृप्ति छल से
एहिमे कतय? तहिया हम गुण आ विधाक गाहक छलहुँ आ आइ लक्ष्मीपात्र दोकानदार। हमर
वत्र्तमान स्थिति तँ बुझू जे बनियाँ जकाँ भऽ गेल अछि-ग्राहककें जेना-तेना निपटयबाक प्रति
चिन्तित।'



ताड़सँ खसल



शैलेन्द्र आनन्द



ठक....ठक....ठक। एस. ई. साहेबक केबाड़मे तीन बेर थाप पड़लनि आ प्रत्युत्तरमे
कोठलीसँ आवाज आएल- 'भोजन कए रहल छी, बैसू तावत।' ओहि समयमे एस. ई. साहेब
अपन डाइनिंग टेबुलपर बैसल मात्र दू-चारि कऽर खएने हेताह। भीषण गर्मी छलै। मुदा अपन
स्वभावसँ लाचार ओ परियोजनास्थलीसँ घूरि रहल

छलाह। ओ भोजनो अपनहि हाथें बनबैत छथि। परियोजनाक कार्य सुचारु रूपसँ चलय, तें
ओ प्रत्येक दिन निर्माणस्थलीक निरीक्षण कएल करैत छथि। से ओ आइयो किछुए काल पूर्व
कार्य - स्थलीसँ घूमल छलाह। भोजन परोसि, टेबुलपर बैसले छलाह। आ मात्र दू - चारि
कऽर खएने हेताह कि एहि आगन्तुकक सूचना भेटलनि। ओ सोचलनि जे भोजन कैये लेल
जाय, तखनहि गप्प ठीक हएत।



मुदा आगंतुक किछु बेसी हड़बड़ीमे छल आ तें ओ पूर्ण रोबदार चालि चलैत एस. ई
साहेबक डाइनिंग टेबुलक समक्ष आबि किछु काल बिलमल आ एकटा कुटिल मुस्कानक संग
हुनक आगूक थारी उठा नालीमे फेकि आयल आ बाजल - 'हमर आ अहाँक गप्पक बीच यैह ने
बाधक छल। हम ओकरा दूर कऽ देलौ। आब हमरा अहाँक बीच नीकसँ बात भऽ सकत,
हमर आदमी अहाँक टेबुलपर फस्र्टक्लासक डीस लगा देत। एहिसँ बहुत सुपर व्यंजनबला।
अहाँ पैघ लोक भऽ कऽ साधारण भात-दालि-तरकारी खाइ छी। इहो कोनो जीवन छियै ?
डेरामे एकटा नोकर नहि। की, अहू पदके घिनबी छियै ? एकटा इंजीनियरक रोब-दाबमे
रहू।' एस. ई. साहेबकें जेना प्रज्ञा हेरा गेल रहनि। ओ एहि अपरिचितक एकहुटा बातकें जेना
नहि सुनि रहल छलाह आ ने बूझि रहल छलाह। हुनक चुप्पीकें पुनः वएह आगन्तुक तोड़लक-
'डेरामे बेसिन अछि कि नहि, आ कि फॉक तल्ला?' एस ई साहेबक प्रज्ञा किछु जागल ओ
बेसिनमे जा हाथ धोलनि। टेबुल लग आबि आग्नेय नेत्रसँ तकैत ओ अपरिचित आगन्तुकसँ
प्रश्न कएलनि- 'अहाँ के छी ? आ की चाहैत छी ?' आगन्तुक भभाकें हँसैत बाजल-'आखिर
अहाँक बोल तँ फूटल । हमरा तँ होइत छल जे अहाँ पूर्ण रुपसँ बौक छी। आब जखनि


पूछिये देलौ तँ सूनू-हमर नाम पी. सुरेका भेल। हम सी. एम. के रिलेटिव छियनि। हमर
सारक ममियौतक भाइ अपन मकान बनबा रहल छथि। जाहिमे एक सौ बोड़ा सिमेन्ट अहाँके
पठेबाक छल आ अहाँ हुनक आदमीके ई कहिकऽ घुरा देलियनि जे अहाँक सिमेन्ट सरकारी
योजनाक निमित्त अछि। प्राइवेट लोककें ओहिसँ कोनो सरोकार नहि छैक। से यदि नोकरी
करय चाहैत होइ तँ अविलम्ब अपन गाड़ीसँ सिमन्ट मुहैया करबाउ। अन्यथा... ।' ....
आगन्तुकक बढ़ल-चढ़ल बातसँ एस ई. साहेबक पारा गरम भऽ गेलनि। आ ओ आक्रामक मुद्रामे
प्रश्न पूछक लेल बेबस भऽ गेलाह-'अन्यथा की ?' आगन्तुक एकदम गम्भीर छल। एस ई.
साहेबकें क्रोधायल देखितो ओ डिजर्व करबाक मुद्रामे बाजल-'अहाँक बिस्तर आइये बन्हा
जाएत। आर की ?'



एस. ई. साहेबक भेलनि जेना हुनक शरीरक सम्पूर्ण रक्त सोखि लेल गेल छनि। ओ
क्रोधसँ थर-थर काँपय लगलाह। हुनक इमनदारीपर पूरा कार्यालय सुचारु रुपसँ चलैत छल
ओना यैह इमानदारी बरखमे चारि बेर हुनक ट्रान्सफर करबैत छलनि। ओ अपन बदली
रोकेबाक हेतु कहियो कोनो नेता लग पैरवी नहि कयने छलाह। चालू परियोजनाक कार्य ओ
अत्यन्त दक्षतासँ करैत अयलाह अछि। एहि स्वभावपर ठीकेदार मोने-मोन गुम्हरैत रहैत छनि
हुनकापर। आ वएह सभ मीलि हिनक बदलीक लेल नेता सभ लग पैरवी करय। मुदा इहो
अथक लोक छलाह। आ यैह कारण छल जे ओ परिवारकें संग नहि रखैत छलाह। हुनक
बिछाओन हरदम बन्हले रहैत छल। ओ भीतरे भीतर घृणासँ भरि गेलाह। सत्ताधारीक
करतूतसँ मोन आक्रोशित भऽ उठलनि।



ओ गुम्हरैत बजलाह-'हमर ट्रान्सफर करबाएब कोनो नव बात नहि भेल। नव बात भेल
ई जे अहाँ अष्टतापूर्वक एतय घूसि एलहुँ आ हम अहाँके माफ कऽ देलौ। जाउ, कहबनि सी
एम कें जे हमरा एहि ठामसँ उठा कोनो उपेक्षित इलाकामे फेकि देथि। जतय हमरा कष्टे -
कष्ट हुअय। मुदा अहाँसन लोकक दर्शन नहि हुअय हम ओ लोहा छी जेकरा कतबो धिपेबै नहि
लीबत। भऽ सकैये टूटि जाय बरु।' आगन्तुक फुफकारि उठल-'ई दम्भ ? हम अहाँकें
मटियामेट कए देब। अहाँक इमानदारी बीच बाजारमे नीलाम भऽ जायत। अहाँक अपहरण
कए अहाँक लाशकें रेलक पटरीपर फेकबा सकैत छी। मुदा नहि। मृत्यु तँ जीत थीक।

अहाँ जीबैत रहब आ लोक अहाँक करतूत पर थूकत। स्वीकार अछि ई बात ?' एस. ई.
साहेब आपासँ बाहर भऽ गेलाह। आगन्तुककें बिना कोनो उत्तर देने अपन बेडरुममे घूसि
गेलाह फोनक नम्बर डायल कयलनि फोनक चोगा क नमे सटौलनि। रिसीवरपर आवाज आबि
रहल छल-'येस प्रफुल्ल कुमार, नदी घाटी योजना विका मंत्री। हँ ! अरे ! ओ अपनहि पहुँचि
गेल छथि ? गोदामसँ एक सौ बोरा सिमेन्ट निकलबा तुरत पठा दियनु। स्टॉकमे जँ ओतेक
सिमेन्ट नहि रहय तँ फ्री सेलसँ लऽ पूरा कऽ लियऽ। मंत्रीजीक स्पष्ट वक्तव्य छल जे समयकें
देखैत काज निकासि चलू। मंत्रीजी प्रसन्न, अहूँ प्रसन्न, संग लागल हमहूँ प्रसन्न। सभहक
प्रसन्नताक बात हएबाक चाही। ओना युगक संग नहि चलि सकब। एस. ई. साहेबकें होइत
छनि जे ओ एकदम्म अरक्षित छथि। कानून आ न्याय सभटाक मालिक आजुक नेतेलोकनि
छथि। वत्र्तमान समयमे हुनका शतरजक मोहरा बना देलकनि अछि।




एस ई साहेबकें लगै छनि जेना सौंसे मकान, ओकर छत, देवाल, फर्स सभटा घूमि
रहल अछि। चप्पा-चप्पामे दुबकल दलाल मकानक नीओकें कोड़ि रहल अछि। ओकरा
रोकनिहार कियो नहि छै। ओकरा लेल कोनो कानून नहि छै। ओ दागल साढ़ थिक। जकर
जजाति चरबाक इच्छा हेतै चरि लेत। मोनक उद्विग्नता कम करबाक लेल, ओ रेडियोकें ऑन
करैत छथि। रेडियो पर रवीन्द्र संगीत चलि रहल छै-'यदि तोमार डाक सूने केऊ न आसे।
तबे एकला चलो रे।' एस. ई साहेब के बुझाइछ जेना क्लान्त शरीरमे नव जीवनक संचार भऽ
उठलनि अछि। ओ वि•ााससँ भरि उठैत छथि।





अन्हारक विरोधमे



अरविन्द ठाकुर



कएक दिनसँ बजली गायब छल।



घर विलम्बसँ घुरल छलहुँ। लैम्पक बीमार पीयर इजोतमे घड़ी देखल-सवा दस बाजल
छल। जल्दी-जल्दी कपड़ा फेरलहुँ। हाथ मुँह धोकऽ अयलहुँ, तावत पत्नी भोजन परोसि देने
छलीह। भूख सेहो जोरसँ लागि गेल छल। खूब प्रेमपूर्वक भोजन कयलाक पश्चात कनेकाल
वज्रासनमे बैसलहुँ।



बाहर भकोभन्न भऽ गेल छल। कागतक उज्जर पीच पर कलमक यात्रा लेल सर्वोत्तम
समय। मोन भेल जे किछु लिखी। बेसी इजोत लेल लैम्पक बत्तीकें कने तेज कऽ देलियैक।



कागत-कलम लऽ कऽ बैसले रही कि बाहरक अन्हार आ भकोभन्नकें चिर्रीचोंथ करैत
खूब जोरसँ हाकरोस भेल। हम अकानि कऽ हाकरोसक दिशाक अनुमान लगयबाक प्रयास
करय लगलहुँ। हो न हो, कुजड़टोली-ए सँ उठि रहल अछि ई स्वर-स्त्रीगणक जोर-जोर सँ
चिकरबाक स्वर, शब्द स्पष्ट नहि छल।



घड़ी दिस देखलहुँ। घड़ी बन्न छल। ओकर कांटा पौने एगारह बजाकऽ रुकि गेल
छलै। कतेक बाजल होयत अखन ? साइत साढ़े एगारहसँ बारहक बीच। चिकरबाक स्वर
फेर आयल। हमरा मोनमे पहिल विचार ई आयल जे प्रत्येक राति जकाँ कुजड़बा सभ कचका
शराब पी - पीकऽ घूरल होयत बजारसँ आ रोजनमचा पूरा करबाक लेल अपनहिमे झगड़ करैत
होयत।

मुदा फेर स्त्री गणक तिक्ख आत्र्तनाद भेल। ई नव गप रहय - रोजनमचासँ फराक।
रोज - रोज होमऽबला झगड़ा आ गारिगरौजक अपन एकटा फराके सुर-ताल होइत छैक।
ओहिमे बाझल लोक सभकें ओकरासँ एकटा आनन्ददायक उत्तेजना भेटैत हेतैक - एहन हमरा


लगैत छल। मुदा अजुका घोंघाउजमे एकटा भयक मिश्रण छलै-आतंक, दहशतिक भय।
निश्चित रुपसँ कोनो खतराक गप छलै।



हमरा लेल कोठरीमे चुपचाप बैसल रहब मोसकिल भऽ गेल। कागत-कलमकें एक
कात राखि बाहर जयबाक लेल हम चप्पल पहिरनाइ शुरुहे कयने रही कि पत्नी बाँहि धऽ
लेलनि --- 'नञि जाउ। एतेक रातिकें....।' ओ मनुहार कयलनि।



हम किछु नहि बजलहुँ। देहमे एकटा तनाव सन अनुभव करैत छलहुँ। बिना किछु
बजने कोठरीक फाटक खोलिकऽ बहरा गेलहुँ।



बिनु चानक राति छल आ बहरमे घटाटोप अन्हार पसरल छल। बहडापर अबितहि
कोनो गाछसँ उल्लूक चिचिअयबाक स्वर आयल। देह भुलकि गेल। पत्नी भयभीत भऽ हमर
पीठसँ सटि गेलीह।



हमर घरक आगाँ फुलवारी, फुलवारीक बाद सड़क। सड़कक बाद किछु बीघा खेतीक
जमीन। फेर एकटा पोखरि। पोखरिक बाद फेर खेतीक किछु एक बीघा जमीन। तकर बाद
कुजड़टोली। हमर घरसँ प्रायः तीन सय डेगक दूरी पर। सुन्नी मुसलमान सभक मात्र पचीस-
तीस परिवारक एकटा टोल-कुजड़टोली।



टोलक मरद सभ भोर होइतहि फल आ तरकारी बेचय लेल हटिया-बजार दिस निकलि
जाइत अछि आ संझक बाद अपन-अपन दोकनदारी समेटि बेस रातिकें घर घुरैत अछि -- दारु
पीबिकऽ झूमैत-लटपटायत, धाराप्रवाह गारिक बौछार करैत। स्त्रीगण सभ दिन भरि घर
अगोरैत अछि। बैसल-बैसल एक दोसरक खिधांस करैत अछि, आरोप-प्रत्यारोप करैत अछि।
अपनेमे घोंघाउज करैत थाकि जाइत अछि तऽ अपन-अपन मरदक घूरलापर एक दोसरासँ
फरिया लेबाक धमकी दऽ चुलही-बासनमे लागि जाइत अछि। मरद सभक बेस राति गेल
घूरलाक बाद स्त्रीगण सभ नून-तेल औसिकऽ ओकरा सभकें भरि दिनक खिस्सा सुनबैत अछि
आ तखन सौंसे कुजड़टोली झगड़ा, हल्ला आ गारिगरौजक भूतियाही धारमे डूबऽ-उपराबऽ
लगैत अछि। इएह रोजनमचा छै एहि टोलक। मुदा आइ ?



बरंडापर अयलहुँ तँ आगाँ सड़कपर किछु लोकक आहटि सुनलहुँ। टॉर्चक इजोत सेहो
देखायल। हम पुछलियै-के ?'



'राजाराम।' --- राजाराम माने हमर भातिज।

'की बात छै ?' -- हम फेर पुछलियै।

'किछु थाह नहि लगैत छै।' -- इतस्तितहमे डूबल ओकर स्वर आयल।



हम आगाँ बढ़लहुँ। पत्नी फेर हमरा रोकऽ चहलनि। आइ-काल्हि डकैती आ खून सन
आपराधिक घटना सभ खूब बढ़ल अछि। लोकसभ भयसँ त्रस्त रहैत अछि। हमर पत्नी तँ


किछु बेसी-ए आतंकित रहय छथि एहि सभ चीजसँ। हुनक नैहरमे दू-तीन बेर डकैती पड़ि
चुकल अछि। तें सभ हल्ला गुल्लाक पाछाँ डकैत सभक हाथ होयबाक आशंका आ सभ
हल्ला-गुल्लापर हुनक आतकित भऽ जायब स्वाभाविको छै। व्यक्तिगत रुपसँ हम अखन धरि
डकैतीक कोनो घटनाक प्रत्यक्षदर्शी नहि भऽ सकल छी। आ एकर भुक्तभोगी

होयबाक हमर अनुभव शून्य अछि। ओना हमरा भय नहि होइत अछि एहन बात नहि। बस,
भयकें हम कखनो अपना पर हावी नहि होमऽ दैत छियै। ओहिनो, जाहि दिन जे होयबाक
अछि-होनी वा अनहोनी-ओ तऽ भइये कऽ रहत। हम ओकरा रोकि लेब की? पत्नीकें भीतरसँ
कोठरी बन्न कय लेबाक सलाह दऽ हम बरडाक सीढ़ी उतरि गेलहुँ।



स्त्रीगणक चिकरबाक स्वर निरंतर अबैत छलै। हम फुलवारीकें टपैत सड़क धरि
अयलहुँ। राजारमकें लगमे पाबि हम पुछलियै - किछु पता चललौ जे की बात छै ?'



ऊँहूँ !'--नीचा जमीनपर छिटकैत ओकरे टार्चक इजोतमे हम ओकर माथकें अस्वीकारमे
हिलैत देखलियै।



हमरा आबि गेलासँ ओकर साहस बढ़लै। ओ दस-बीस डेग आगाँ बढ़ल, फेर रुकि
गेल। ओ जोरसँ चिकरि कऽ पुछलकै --'की बात छै हओऽऽऽ? की भेलै ?



'बचबऽ हओ बाप सब। मारि देलकऽ हओ। लुटि लेलकऽ हओ....।' --एहि बेर जे
स्वर आयल ओहिमे शब्द स्पष्ट छलै। ओहिमे स्त्रीगणक चिकरब आ ओकरा सभक कानबाक
स्वर सेहो सम्मिलित छल।



कने काल लेल हमर करेज काँपि गेल। फेर, स्त्रीगणक रुदन जेना हमर पुरुषत्वकें
चुनौती देलक। हम दस-बीस डेग आरो आगाँ बढ़लहुँ। पोखरिक महार आबि गेल रहय।
कान लग मच्छर सभक भनभनयबाक स्वर एकत्रित हमय लागल। किछु डेग आरो बढ़लहुँ।
पोखरिक महारपर बरसातक कारणें उगि आयल छोट-छोट झड़क जंगल पसरल छल जे
पयरसँ टकरबैत छल। ओकर दोग सभमे साप-बीछ सभ होयबाक जबरदस्त आशंका छल।
तखने कतओ कोनो गाछ पर दुबकल कोनो उल्लू चिचिआबय लागल।



'आब आगाँ नहि जाउ काका। ओम्हर किछु भऽ सकैत छै।'--राजाराम हमरा आगाँ
बढ़बासँ रोकऽ चाहलक। ओकरा स्वरमे अनदेखल खतराक प्रति एकटा अज्ञात-सन भय छल।
अन्हार इनारमे कूदबाक भय -- ने गहींरक पता, ने ओकर पानिक थाह, ने ओकर सूखल
होयबाक आ•ाासन । हमरो मानस पटलपर अखबार सभमे रोज-रोज छपैत साम्प्रदायिक
तनावक खबरि सभ अभरल। हम थमकि गेलहुँ।



अगल बगलक टोल सभसँ सेहो कियो बहराइत नहि छल। दहिना दिस धनुकटोलीसँ
किछु लोक अपन-अपन घरक भीतरेसँ 'की छै? की छै ?' केर आवाज लगबैत छल। एहि


'कीछै ? की छै?' सँ फुटैत ध्वनि कारी चादरि ओढ़ल हवापर दौगेत भयक लहिरकें
घटयबाक बजाय बढ़ाबिते छल।



हम चिकरलहुँ - 'अरे की बात भेलै ? कियो बाजबो तऽ करऽ।'



'अलीमुदीनमा घरमे घुसिकऽ मारि देलकऽ हओ बाप.......सब बाकस पेटी लुटि कऽ
लऽ गेलै हओ.....हओ बाप सब हओ बाप सब.....हओ जुलूम भऽ गेलै हओ....।'



एहि बेर स्त्रीगणक कानब-कलपब आ छाती पीटबाक स्वर लगक कोनो खेतसँ आयल-
प्रायः तीस डेगक दूरीसँ।



हमरा एहि घुप्प अन्हारमे अपन सांस घुटैत जकाँ लागल। इतस्तितह हमर शिरा सभकें
एकटा कष्टदायी तनावसँ भरि देलक।



अकस्मात, हम झपटिकऽ राजारामक हाथसँ टार्च लऽ लेलियै। ओकर मुँह आगाँ कए
स्वीच दाबि देलियै। अन्हारक थालकें काछैत इजोत दूर-दूर धरि पसरि गलैक। कने काल
लेल हम खतराक आशंका, उल्लू सभक चिचिआयब, साप-बीछक भय बिसरि गेलहुँ,
साम्प्रदायिक तनावक गप बिसरि गेलहुँ। इतस्तितहक जबरिया बोझ हम अपन कान्ह परसँ
उतारि फेकलहुँ।



टॉर्चक इजोत फेकैत हम तेजीसँ आगाँ बढ़लहुँ आ आवाज सभक लग पहुँचबाक प्रयास
करय लगलुँ। स्त्रीगणक कनबाक स्वर सिसकीमे बदलि चुकल छल। ओकर लग पहुँचिकऽ
हम ओम्हर इजोत फेकलियैक।

हम स्त्रीगण सभकें एकटा घरक पछुआरक खेतमे यत्र-तत्र पसरल बनौआ झाड़ सभक बीच
ठाढ़ि पौलहुँ। टॉर्चक इजोतमे ओकर सभक चेहरा सेहो चिन्हबामे आयल भोला मियाँक पुतोहु
आ पोती सभ छलै।

'की भेलै ? -- हम पुछलियै।



स्त्रीगण सभकें जेना साप सूघि गेलै। ओकर सभक सिसकी बन्न भेऽ गेलै। मात्र
ओकरा सभक जोर जोरसँ सांस लेबाक स्वर हमर कान धरि पहुँचि रहल छल।



'आरे, हम रंजन छी, रजन। डरय नै जाह। साफ-साफ कहय जाह जे की बात छै
आ ई कन्नारोहट बन्न करय जाह तोरा सभ।' ---- हम अपन स्वरमे आ•ाासन अधिकार आ
नियंत्रणकें एक संग सम्मिलित कयलहुँ।



'घरमे कियो मरद-पुरुख नै रहै। अलीमुदीनमा अपन भाय सभक संग हमरा घरमे घूसि
गेलै, हमरा सभके मारलक-पीटलक आ घरक सबटा सामान, बक्सा-पेटी लूटि कऽ लऽ गेलै।'


--- भोला मियाँक जेठकी पोती सुबकैत बाजलि।

'ओ सभ चलि गेलै तऽ तों सभ एहि जंगलमे कियै ठाढ़ छह। जाइ जाह अपन घर।' -
- हम कहलियै।



'नै हओ बाप। सब अखनी ओतहि हेतै।'



गप किछु बुझायल नहि। जरुर किछु नुका रहल अछि ई छौड़ी। लागल जेना
रहस्यक कोनो वृतमे फंसि गेल छी।



हम उनटि कय देखलहुँ। राजाराम पीठहिपर ठाढ़ छल। हम जी कड़ा कयलहुँ आ
कोनो अनहोनीक आशंकासँ ग्रस्त भोला मियाँक आँगन दिस जयबाक लेल मुड़लहुँ।



राजरामक थरथरायल स्वर हमरा टोकलक -'आब घूरि चलु काका। एकरा सभक तऽ
ई रोजक धंधा भऽ गेलै-ए -- पीअब, पीबिकऽ गारिगरोज आ मारिपोट करब। छोड़ू, कतय
जायब।'



' नै हओ बाप सब। नै रोकहक ददाकें हओ। एक बेर जाकें देखय दहक हओ।
खुनीमा सब अखनी ओतहि हेतै...हओ बाप सब, हओ बाप सब।' -- स्त्रीगणमेसँ कियो कलपि
कऽ बाजलि।



खुनीमा। माने खून करयबला। सुनिकऽ एकबेर तऽ अदंक पैसि गेल। मुदा हमर
जिद हमरा उकसबैत छल। हम दोबारा जी कड़ा कयलहुँ आ अपन सौंसे हिम्मति बटोरिकऽ
एकबैग भोला मियाँक आँगन पैसि गलहुँ। चारू दिस टॉर्चक इजोत देलियै। कत्तहु कियो नहि
छल। हम आगाँ बढ़लहुँ। अपन पाछाँ देखनहि बिना हम अपन पीठपर राजारामक
उपस्थितिकें अनुभव करैत छलहुँ।



एहि टोलमे घर पर घर चढ़ल छै। आँगन दरबज्जा आ कोनटामे कोनो फरक नहि
देखाइत छै। आँगन टपिकऽ एकटा कोनटा सन जगहकें पार कऽ बाहर अयलहुँ तऽ खूजल
सन ओ जगह देखायल जतय पचासेक मौगी-मरद सभ जमा छलै। कातक एकटा घरसँ कोनो
मरदक निसाँमे मातल चिकरब आ बिक्खैन-बिक्खैन गारिक अनवरत बोछार अबैत छल। स्वर
सभसँ लागल जे किछु लोक ओकरा सम्हारबा आ बुझयबाक बेस प्रयास कय रहल अछि।



हम ओतय ठाढ़ समूहपर टॉर्चक इजोत देलियैक। समूहकें अपन बीच टोलसँ बाहरक
कोनो अनठीयाक आगमनक आभास भेल छलै साइत आ, ओकरा सभक बीचक फुसफुसायब-
भनभनायब एकटा स्तब्ध मौनमे बदलि गेल छलै। हम टॉर्चक इजोत किछु एहि तरहें ऊपर
नीचा आ अगल-बगल देलियै जाहिसँ लोककें हमरा चिन्हि लेबऽमे आसानी होइ। अपन एहि
उद्देश्यमे हमरा सफलता भेटल छल। एकटा स्त्रीगण फुसफुयालि - 'कक्का छथिन।'




नहुँ - नहुँ शहरक बेजाय चीज सभ ओढ़ैत जाइत हमर मोहल्लामे ग्रामीण जीवनक
कतिपय खूबी सभ अखनो लोकक भीतर सुरक्षित अछि। धनुकटोली, कुजड़टोली, बभनटोली
वा चमरटोलीक क्षुद्र घेराबन्दीमे नहुँ - नहुँ काछु जकाँ सिमटि रहल लोक सभ आइयो आपसी
व्यवहारमे भैया, काका, दादा आदि सम्बन्धेक नामसँ एक-दोसराकें सम्बोधित करैत अछि।
अगड़ा-पिछड़ा, हिन्नू-मियाँ, बैकबा-फोड़बा वा छूत-अछूतक विध्वंसक नारा आ तोड़क-शक्ति
सभक ताबड़तोड़ विस्फोटक प्रयासक अछैत ढेर रास लोक सभ अपन-अपन ह्मदयमे मानवीय
प्रेमक अस्तित्व बचाकऽ रखने अछि -उजड़ि गेल जमीनदारक ओहिठाम बिका गेल हाथीक
सिक्कड़ि जकाँ। 'कक्का' सम्बोधनक मीठगर आंचमे हमर सम्पूर्ण तनाव भाप जकाँ उड़ि
गेल। हमर हेरायल आत्मवि•ाास घूरि आयल।



हम हवामे अपन प्रश्न उछालि देलियै -- 'अरे भाय ! के सभ छह एतय ? एतेक
रातिकें कोन हंगामा मचयने छह? कियो बतयबो तऽ करऽ।'



एकटा पुरुष आकृति लग आयल---'रंजन बाबू छी ?'



'हँ। के, रुदल ?' हम पुछलियै - 'की बात भेलै हओ ?'

'की बताउ कका ! ई जे भोला मियाँ के बेटा छै ने-बिकुआ, ई कमीना रोज दारु पीबि
कऽ टर्र भए जाइ छै आ भला-भला लोककें गरियबैत रहय छै बहूदा।'



हमरा दारुक गंध लागल। नहि जानि, रुदलक मुँहसँ अबैत छलै वा अगल-बगलसँ।



'........काल्हियो साँझमे पीबि कए बुत्त रहय। अपन देह तक नै सम्हरैत रहय
बेहूदासँ। ओ जनारदन चौधरी छै ने-मोहरिल, ओकर भाय ओहि समय सड़कक कातमे अपन
घरक आगाँमे ठाढ़ रहय। बिकुआकें हरलै ने पुरलै, लगलै ओकरा गरिआबए.....।'

रुदल अखन विवण दइये रहल छल कि एकबेर जोरसँ भगदड़ मचलै। आँगनमे गारि
बकैत व्यक्ति प्रचण्ड अन्हड़ जकाँ खसै-उठैत, लटपाटइत, कात कतबहिमे ठाढ़ लोक सभकें
ठेलैत-धकियबैत भोला मियाँक आँगन दिस लपकल -- 'खून कए देबो... हरमजादी रंडी आ
भड़ुआ सभकें जानसँ मारि देबय.....कत्तय गेल भोंसरी सब..........।'



हम चिकरलियै--'ऐऽऽऽ। रोक एकरा।'



आठ-दस गोटय लपकल आ ओकरा पकड़बाक प्रयास करय लागल। बताह हाथी
जकाँ निरंकुश झूमैत ओहि व्यक्तिकें हम चिन्हलहुँ --अलीमुद्दीन छल। तऽ इएह गारि बकैत
छल आँगनमे !




'....छोड़ि दे हमरा, आइ जिन्दा नै छोड़बै हरमजादी रंडिया सबकें....।'

अलीमुद्दीन चिंघाड़ैत छल आ अपन हाथ-पयर फेकि रहल छल। आठ-दस गोटयसँ
सम्हारने नहि सम्हरैत छल ओ। लोक सभक पकड़ैतो-पकड़ैत ओ भोला मियाँक एकटा घरक
टाटक किछु बत्ती सभ तोड़ि देने छलै आ किछु बत्तीकें अपन हाथमे जकड़ि राखने छल।



'अरे, हाथ कटतो, हाथ। छोड़ि दही बत्तीकें ।'-कियो चिकरलै।



हम पयक्कड़, खास कऽ पीबाक नामपर लखेड़ा ठाढ़ करयबला पियक्कड़ सभसँ बड्ड
घबड़ाइत छी। पीबिकऽ लखेड़ा ठाढ़ करैत अलीमुद्दीनकें देखि, आब एतय धरि आबि जयबाक
अफसोचो भऽ रहल छल। मुदा आब की भऽ सकैत अछि। फँसि गेलहुँ तऽ फँसि गेलहुँ।
आब तऽ एहि सभ झमेलासँ कोनो सम्मानजनके तरीकासँ निपटय पड़त। कतेक लोक चीन्हि
लेने अछि। लटकल मामिलाक बीचमे तऽ पड़ाइयो नहि सकैत छी। की कहत लोक ?



हम मामिलाकें शीघ्रतासँ निपटयबाक मादे सोचलहुँ। अपन साहस जुटयलहुँ आ स्वरमे
जतेक ओजन दऽ सकैत छलहुँ, दऽ कऽ कहलियै - 'रे ! अलीमुद्दीन छें की ? बन्न कर ई
तमाशा आ जो अपन घर। आ खबरदार जे मारिपीट आ गारिगरीज केलैं तऽ। बहुत भेलौ।
जो, अपन घर जो....।'



हमर दहाड़ सन फटकार सुनिते आठ-दस गोटेक पकड़िमे छटपटाइत अलीमुद्दीन
अस्मात जेना जड़ भऽ गेल। ओकर गतिहीन होइतहि ओकरा पकड़ि राखने लोक सभ ओकर
छोड़ि देलकै। अलीमुद्दीन पूरा प्रयास कए अपनाकें सोझ ठाढ़ केलक आ फेर लड़खड़ाइत
हमरा दिस बढ़ल। ओतबा पीलाक बादो नहि जानि ओ हमरा कोना चीन्हि लेने छल, सेहो
एहि अन्हारमे। लड़खड़ाइत आबिकऽ ओ हमरासँ दू-तीन डेगक दूरीपर ठाढ़ भऽ गेल।
ओकरा मुँहसँ दारुक दुर्गन्धक भभाका छुटैत रहय। ओ पटपटाइत स्वरमे बजबाक प्रयास
कयलक---'र.....न....ज....न क....काऽऽ....परनाम।' - ओ अपन दुनू हाथ जोड़लक -
'ह....म....र गप सुनि लिअऽऽऽ।'



हम हड़बड़ा गेलहुँ, जल्दीसँ बजलहुँ --'काल्हि सुनबौ, काल्हि। अखन जाकऽ सूति
रह। भोरमे सुनबो तोहर गप।'



'नइ ऽऽ कक्काऽऽऽऽ....अखनीऽऽ सुऽऽनि लिअऽऽऽ ।'



'नहि, नहि, काल्हि सुनबौ। सबटा गप सुनबौ काल्हि। अखन जो।' --- हम आब
जल्दीसँ जल्दी एहि दरुआह माहोलसँ भागि जाइ चाहैत छलहुँ।



'सुनि ने लिओ, काकाजी, कहऽ चाहै छै।' -कोनो स्त्रीगणक अनुरोध भरल स्वर कतहु
लगेसँ आयल।




स्त्रीगण हमर संवेदनाक परिधिक केन्द्रमे रहैत छथि। हम हुनक बात काटबाक साहस
कहियोकाल, सेहो विशेषतया पत्नी-एक मामिलामे, कऽ पबैत छी। हम दुविधामे फँसि गेलहुँ।



ई सार बिकुआ मादर...' --अलीमुद्दीन बाजय लागल छल।



'ए ! खबरदार जे हमरा सोझाँ गारि बकलें तऽ।'--हम फटकारलहुँ।

लागल जेना चमत्कार भऽ गेल हो। अकस्मात अलीमुद्दीन पूर्णरुपेण चौकस आ भद्र
नजरि आबय लागल। ओकर देह अखनो थोड़-बहुत हिलैत छल, मुदा ओ पूर्ण चेतन व्यक्ति
जकाँ तनिकऽ सोझ ठाढ़ भऽ गेल। एना, जेना ओ शराब छूने तक नहि हो।



'कक्का ! जनारधन चौधरी हमर यार छियै। ओकरा लेल हम जान दऽ सकइ छी आ
ककरो जान लइयो सकइ छी। छीयै तऽ हम मुसलमान, जातिक कुजड़ा। मगर बहुत रास
हिन्दू-रैजपूर, बाभन, कलबार सभसँ हमरा यारी - दोस्ती छै। आ काल्हि.... काल्हि ई बिकुआ
मादर....।' - गारि ओकर मुँह पर अबैत-अबैत रुकि गेलै। ओ अपन जीह कूचि लेलक।



'....काल्हि ई बिकुआ हमर यारक भाइकें....हमर भाइकें गारि पढ़लकै आ सेहो बिना
कोनो कारणें। ओकर बेहुदपनीक शिकाइत लय कय जनारथनक भाइ हमर घर अयलै। हम
घरपर रहियै नै। ओ हमर घर आबि कऽ हमरा सोर पारलक....।'



ओकर देह आ स्वर फेर लटपटाबऽ लगलै।



'....ओ हम्मर घर्र आबिकऽ हमरा भैयाऽऽऽ भैयाऽऽऽ कहि कऽ सोर पारैत रहय कि
तखने....तखने बिकुआ आबि कऽ ओकरा मारय लागलै आ ओकर घरक मौगी सब ओकरा गारि
पढ़य लागलै। ओ सार मादर....की बुझौ छै अपनाकें ?



हम एहि नशेरी सभक बीच आब घूटन अनुभव करय लागल छलहुँ। दम फड़फड़ाबऽ
लागल छल आ हम पड़ा जाइ चाहय छलहुँ एकरा सभक बीचसँ---उड़िये कऽ सही।



'ठीक छै ! ठीक छै ! काल्हि ओहि चोट्टाकें बजाकऽ डाँटबय। काल्हि.... ।' हम
ओकरा टारऽ चाहलहुँ। दारुक भभक्कासँ हमर माथ घूमऽ लागल छल।



आ जानय छियै कक्का ? केत्ते हरामी छै ई बिकुआ ? एक तऽ ओहि निर्देष के
मारलकै आ ओकरा मारलाक बाद टोलमे हिन्दू मुसलमानके शगूफा सेहो छोड़ैत रहय।'



हमर देह तनि गेल। एहन मामिला सभमे मामूली सन बातसँ तिलक ताड़ भऽ जाइ
छै। हम ओहि


क्षणकें कोसय लगलहुँ जखन हम एतय अयबाक निर्णय कयने छलहुँ।



अलीमुद्दीन आगाँ बढ़ि हमर बाँहि धऽ लेलक-'कक्का। ओहि हरमजादाक खूने गरम
भेल रहै तऽ हमरा मारितय, हम सहि लेतौ। खुदा कसम, हम सहि लेतौ। मगर अप्पन
टोलमे हमर यारक भाइकें ... हम्मर भाइकें ... आ सबसँ बढ़ि-एक गोट हिन्दूकें ओ मारलक।
बाप-दादाक देल मोहब्बतक तालीमकें माटिमे मिला देलक ई हरमजादा। कोन इज्जति रहि
गेलै एहि टोलक आ हमरा सबहक....।'



अलीमुद्दीन हबोढकार भए कानय लागल।



आ आश्चर्य !



दारुक गंधसँ सानल जाहि माहोलमे हमर प्राण फड़फड़ा रहल छल आ जतयसँ हम
पड़ा जाइ चाहैत छलहुँ -- कतऽ छल ओ दमघोंटू माहौल ?



कत्तहु नहि !



आकि तखने, चारु दिस अपन जराओन छाँह पसारने अन्हारक छातीकें चीरैत बिजलीक
जगमग इजोत दूर-दूर धरि पसरि गेल।



टांगल मोन



चन्द्रेश



ओ अपस्याँत छल। समस्याक चांगुरमे ओझरायल, समस्याक निदान तकबामे व्यस्त।
व्यावहारिकताक कमी ओकरा जीह भरिकऽ चूरि रहल छलैक। की करत ? लाचार छल ओ।
दिन-राति कापी-किताबमे आँखि गड़बयबला समरकें की पता जे एक दिन एहनो समस्या जटिल
बनि गेल छलैक। दिनमे दोस्त-महिमक आवाजाही आ राति बीच....। ओह, आँखिक निन्न
बिला गेल छैक। ओ चाहैत छल जे भरि पोख सुतय। मुदा, चाहला मात्रसँ की हेतैक ?
समरक समस्या आबि जिजी समस्या नहि रहि गेल छैक। सर-सम्बन्धी, दोस्त-महिम सभक
परेशानी छैक। पत्नीक तामस मगज चढ़ल छैक। दाम्पत्य प्रेम सेहो सुल्फापर लटकल छैक।
एक दिन तामसे-पित्त भेल लोहछिकऽ बाजलि-ई लटखुटबला घर 'कबाड़ीखाना' बुझाइत अछि
। दिन-राति ई झिंगुर आ खरबड़-खरबड़ करैत मूस....आँखियो ने झपकऽ दैत अछि।



समर की बजितय ? ओ तँ भुक्त-भोगी अछि। खरबड़-खरबड़ करैत मूस सभ
बहराइक आ जा उठय ता ससरि जाइक कहियो मुसरियो ने हाथ अएलैक। की की ने उपाय


कएलक । मूसमारक दबाइ, कीटनाशक पौडर आ रंग बिरंगी औषधि सभ। किछु दिनक लेल
आफियत भेटैक, मुदा पुनि वैह रामा आ खटोलबा।



'अएँ यौ एतेक दामी पोथी सभ अछि आ जहतर-पहतर छिड़िआयल अछि।'



शुभेच्छुक गप सुनय। मोन अप्रतिभ भऽ उठैक। हारि-थाकि कऽ एकटा अलमीरा
बनबओलक। आब निश्चिन्त रहत। अनुमाने रहलैक। नहि भऽ सकल निश्चिन्त। किताबसँ
भरि गेलैक। दोसर तेसर बनबओलक। तैयो समस्या बनल रहलैक। ओ समस्याक फानीमे
ओझराइत रहल। जँ एकेटा काज रहितैक अलमीरा बनौनाइ तँ बात किछु बनितैक। काज तँ
सतत होइते छैक दोसर किताब अनबाक क्रम सेहो जारी छलैक।



एक, दू तीन आ ....। आब की अलमीराक भाओ कम छैक ? जखन सभ जिनिसक
भाओ आकाशे ठेकल जाइत छैक तखन एकरे भाओ किएक घटतैक ? किताबोक दाम तँ माथ
चढ़ल छैक।



किताब एकटा भूख थिकैक । रंग-बिरंगक किताब पढ़ब ओकर आदति छैक। रातिमे
किताब पढ़लाक बादे आँखि लगैत छैक। मुदा, किछु दिनसँ पोथी पढ़लाक बादो आँखिक
खुमारी नहि उतरैत छैक। ओकर आँखिक निन्न हरि लेने छैक। चोर आ डाकूसँ दू हाथ
भइयो सकैत छैक, मुदा ई जीव-जन्तु.... ।



ओ परेशान छल। कैक बेर सोचने छल जे ओ पोथी आब नहि कीनत। पहिने ओ
पोथीक संग्रह करैत छल। तें किछु पोथीमे ठकायलो छल। नीको लेखकक दब पोथी हाथ
लागल छलैक। ओ भाग्यवादी नहि छल। कमंपर वि•ाास छैक। तें पोथी कीनऽ काल सतर्क
रहैत अछि। कैक दिन खालियो हाथ घूरि अबैत अछि। खाली हाथें देखि पत्नीकें संतोष भेटैत
छैक। पत्नी भखत छलैक-की हैत पोथी कीनिकऽ। पोथी सुरक्षित नहि अछि आ बरबाद होइत
अछि।'



सत्ते, कतेक पोथी नष्ट भऽ गेलैक। किछु तँ नष्टप्राय स्थितिमे छैक। अधिकांश
पोथीजँ बाँचलो छैक तँ यत्र-कुत्र छिड़िआयल।



जखन रहबामे असौकर्य छैक तँ पोथी रखबाम दिकदारी स्वाभाविक। एकटा छीट-छीन
घर। कुर्सी-टेबुल सरि भऽ कऽ राखक जगह नहि। कुर्सी टेबुल छैक तँ एकर उपयोग पोथिये
रखबाक लेल छैक। जहिया कहियो ओ हुलसिकऽ पढ़बाक लेल कुर्सी-टेबुल अनने टा छल।
एको दिन ओठंगितय तँ दोसर सुख भेटितैक। मुदा, ओहिपर गेंटल पोथीकें देखैत अछि तँ
हर्षित होइत अछि, दोसर सुखक अनुभव करैत।



ओ कतबो किताब सभकें सैंतिकऽ सरिया अबैत अछि तैयो छिड़िआयले रहैत छैक।
एक तँ अपने जखन-तखन उनटैत-पुनटैत अछि, दोसर मूसक धमाचौकरी। कखनो बिलाड़ि


सेहो धावा कऽ दैत छैक। आब ओ मूस नहि छैक। मूसो सभ साकांक्ष भऽ गेल अछि। एक
तँ बिलाड़िके देखिते जगह धऽ लैत अछि, दोसर ओकर खोखियाकऽ छूटब। एक संग कैकटा
मूसक आक्रामक रुप देखि बिलाड़ियो सहमि जाइत छैक। एहि धमाचौकरीमे सैंतल पोथीक
ढनमनायब स्वाभाविके थिक। ओ मुक्ति चाहैत छल, समस्याक ओझरौटसँ मुक्ति संतोष टीपने
रहैक-'लऽ ने लियऽ एकटा ट्रंक। झिंगुर आ मूससँ त्राण भेटि जैत।'



कैक दिन ओहो सोचने रहय। किताब रखबाक लेल अलमीरा नीक होइत छैक।
ट्रंकमे पोथी बेसी अँटैत छैक, मुदा निकालबाक क्षणमे असौकर्य होइत छैक। ओ बहुत दिन
धरि गुनधुनमे पड़ल रहल। अलमीरा वा ट्रंक-एहि उधेड़बुनमे कतेक दिन खेपि लेलक। ओ
दिन की खेबैत छल जे पोथी सभक दम निकलैत छैक। पोथीक स्थिति आरो दयनीय देखि
अन्तमे हारि थाकिकऽ निर्णय लेने छल जे किछु लैये कऽ रहत।



तन्द्रा भंग करैत बाजल संतोष - 'की सोचैत छी ? लऽ ने लियऽ एकटा ट्रंक। ओहुना
एकटा आलमारीसँ समाधान नहि होमऽबला जछि। पैघ ट्रंकमे किताबोक समावेश बेस होयत।
भऽ सकत तँ एक-दू टा सिड़को....।'



ओकरा कपड़ाक चिन्ताक ततेक नहि छलैक जतेक पोथीक। कतोक दामी कपड़ा-
लत्ताकें कुतरि गेलैक। अफसोस भेलैक, मुदा किताबकें कुतरैत देखि ओकर छाती फाटय
लगैक। एक दिन खौंझाकऽ एकटा चेरा फेकने छल। मुसरी तँ ससरि गेलैक, मुदा पोथीक
फाटल पन्ना.... ।



किछु बीति जैत। ओ आइ ट्रंक कीनबे करत। कल्पित सुख-स्वप्नमे चिन्ताक बादरि
छँटि गेलैक। ओ नव-नव योजन गढ़ऽ लागल। एखने ओ ट्रंक लऽ अनैत, मुदा दिनमे कैकटा
काज छैक। खासकऽ ड्यूटी करय पड़ैत छैक। कोना ने करतैक ? आइ काल्हिमे सभसँ
बदनाम शिक्षके छैक। ग्रामीणक निकट रहलाक सन्ता सभक आँखिपर शिक्षके चढ़ल छैक।
गाम घर पर आजिज माय-बाप मोनकें बहटारबाक निमित्त स्कूलक बाट धरा दैत छैक। शिक्षक
राष्ट्रनिर्माता जे होइत छैक।



ओकर मोन आइ पढ़ौनी पर कम ट्रंकपर बेसी छलैक। कतोक खेप छुट्टी मगबाक हेतु
फुसफुसौलक, मुदा परिस्थितिक भान होइते चुप्पी साधि लेलक। आइ कल्हिमे निरीक्षण एकटा
हौवा बनि गेल छैक। ओ अपने डेरायल रहैत अछि जे ओकर कोठरीमे दिन-राति निरीक्षणे
होइत छैक। विवशताक भेरमे मोन मारिकऽ प्रतीक्षा करय लागल



चारि बेज बादक समय ओकर अपन छैक। बन्धुआ मजूरसँ फराक स्वतंत्र जीवन।
हुलसैत-फुलसैत संतोषक संग बजारक बाट धयलक। एक दोकानसँ दोसर दोकान। रंग
बिरंगक ट्रंक। ओ चाहैत छल जे पैघ ट्रंक लियऽ। मुदा, ओकर मोन मध्यम आकारक ट्रंक
पर गड़ि गेलैक। मजगूतो छैक। दाम-दीगरमे अन्तर छलैक। दोकनदारो बुझने छलैक-
बेगरतूत अछि, जतेक पाइ एेंठि सकी। ओ हारि-थाकिकऽ मोल-मोलाइ करैत लऽ लेलक


एकटा ट्रंक।



रिक्शापर ट्रंक दरिते ओकर छाती द्विगुणित उमंगमे हुलसि उठल। डेरा अबिते रिक्शा
रुकि गेलैक । ओ पट खोललक। ई की ? ट्रंकक समावेश नहि भऽ रहल छैक। भीतर लऽ
जयबामे चौकठिक संग देबालक किछु हिस्सा सेहो बाधक छैक। आब ओकर ध्यान ट्रंकपर
केन्द्रित भऽ गेलैक। एकटा नव समस्या। कतबो जोगाड़ भिड़ौलक, कोनो उपाय नहि।
माथपर चढ़ैत सोचक बलमे किछु आर फुरयलैक। लगीचेक दोसर घरमे रखबाक हेतु लऽ
गेल। ओहि घरक मुँहक चकराइ कनेक बेसी छलैक। मुदा, ओहिमे चौकठि निकालबाक
समस्या छैक।



ओना ओ घर अपने छैक। ओहि घरकें ठाढ़ करबामे अनके मदति लेबऽ पड़लैक।
अपना बुते तँ एकटा कोड़ो धरि चार पर चढ़ाओल नहि हेतैक। एहि मामिलामे ओ सुस्त छल।
सुस्त की छल जे काजक नाओं पर हाथ पयर लोथ भऽ जाइत छैक। कागतक संग दुश्मनी
छैक। तें ढेर ढाकी कागत घरमे सोहरल रहैत छैक। सोचमे समरकें निमग्न देखि बाजि
उठल संतोष हाथ पर हाथ धयलासँ काज नहि चलत?



लोहछिकऽ बाजल समर तँ की पानि डेंगाउ ? खौझीक स्वर लक्ष्य केलक संतोष आ
एकटा खंती लऽ प्रयासरत भेल। सीमेन्ट आ कंक्रीटसँ जमल ओहि देबालकें तोड़ब कठिन
काज छैक। जँ तोड़िये देल जइतैक तँ एत्तेक जल्दी ठीक होयब....आखिर एकटा ट्रंकक हेतु
एतेक चीज वस्तु.... । हारि थाकिकऽ छोड़ि देलक

संतोष।



आब ट्रंकक समस्या समरकें आरो चालि रहल छलैक। कीनबाक समयमे आरो पैघ
कीनय चाहैत छल। ओ तँ मझोलबे पसिन्न पड़लैक तें यैह कीनलक। दोकनदार पहिने तँ डेढ़
गुना दाम कहलकै। गहिकीकें फिरैत देखि दाम खसा देलकैक। ओ घुरिफिरिकऽ आरो कम
दामपर कीनय चाहैत छल। मुदा, ओना दोकान सभसँ आपस घूरैत देखि इहो दोकनदारक
मोन तुच्र्छ भऽ गेलैक आ दाम किछु बेसिये चढ़ा देलकैक। अन्तमे हारि-थाकिकऽ सकपकाइते
मोल-मोलाइ करैत पटैत दामपर कीनने छल।



जहिना कीनबाक व्यग्रता रहैक तहिना रखबाक समस्या सेहो जोर मारैत छैक। आब
किताबसँ बेसी ट्रंकक चिन्ता मस्तिष्ककें हौंड़ि रहल छैक। ओकरा अपन विवेकपर खौझ भऽ
उठलैक। जँ आइ केबाड़क चकराइ नापिकऽ लऽ जाइत तँ ई समस्या नहि उठितैक। किताबी
ज्ञान तँ मात्र सैद्धान्तिक होइत छैक। व्यवहारमे कतेक दूर धरि सिद्धान्त सङ दैत छैक तकर
लेखा-जोखा करबाक क्रममे छल ता संतोषक स्वर सुनि तन्द्रा टूटि गेलैक।



संतोषक स्वर छल-की करब ?



ओ भारी मोने जबाब देलक-किछु नहि फुराइ-ए।




चलू तखन सिनेमा। हॉलमे किछु फुरा जाय। संतोषकें मजाक सूझैत छलैक आ
समरकें खौझ बढ़ैत छलैक। की करत ? ट्रंक लेल कपारो फोड़ि लेलापर समाधान नहि भऽ
सकैत छैक। ओ हारल थाकल सन स्वरमे बाजल मुदा, ट्रंक ?



प्रत्युत्तरमे बाजल संतोष-चिन्ता करबाक काज नहि। दरबज्जापर राखल अछि।
श्रवणक ओगरबाहीमे धऽ दैत छिऐक। सिनेमासँ आपसी भेलापर हम अहाँ ओगरबाही करब।
नहि हैत तँ हम राति बीच ट्रंकपर सूति रहब। अछताइत-पछताइत विदा भेला। ओकर मोन
ट्रंकपर टाङल छलैक। सिनेमा की देखत। आपस आयल तँ दरबज्जापर ट्रंक नहि देखि मोन
हुलसि उठलैक जे कोहुना तँ भीतर गेल। ओ निसास छोड़लक आ खुशीमे श्रवणकें उठौलक।
पट खोलितहि नजरि भीतर गेलैक तँ छाती धुक्क दऽ बैसि गेलैक आ बाजि उठल ट्रंक?
श्रवणक उतारा भेटलैक-पड़ोसियाक ओहिठाम रखबा देने छी। राति-बिराति कखन आँखि
लागि जाइत तें रखबा देलिऐक।



समर उसास पओलक। आप ट्रंकक भूत माथपरसँ क्षण भरिक लेल उतरि गेल छलैक।
देखल जेतैक काल्हि सोचिते अपन कोठरी आयल। घर अन्हार छलैक। मूसक धमाचौकरी
जमल छलैक। ओ लैम्प लेसलक। इजोतक मुस्कीमे घर नहा उठलैक तँ देखैत अछि जे मूस
ओहिना किताबकें दँतिऔने छैक। ओ दमसलक। मूस एकोढ़ भऽ गेलैक। ओ ओछौनपर
गेल। मूस पुनि जुमि अयलैक। ओ जा जा उठय ता ता बुझयलैक जे मूस मुँह दूसिकऽ
पड़यबाक व्योंतमे छैक।



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--------------------लघुकथा / मुलाजिम /
निर्भय

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मुलाजिमक खिस्सा एना शुरु होइत अछि। भूकम्पक साल यानि 1934 मे मुलाजिमक
दादा एक जोड़ बड़द, एकटा गाय आ सोलह-सत्तरह टा मुर्गा-मुर्गी लऽ कऽ हमर गामक अतिम
छोरपर, बूढ़-पुरानक मोताबिक जतय दिनोमे नढ़िया भूकैत छल, एकटा खोपड़ि ठाढ़ कऽ
लेलक।



कोसीक जमाना छल आ मनुक्खे जखन संकटमे छल तऽ माल मवेशीक जे हाल होइ।
खाहे भजहा होइ वा गोसाउन, मुलाजिमक दादाक छूबिते बीमारी छू-मन्तर भऽ जाइत छल।
सात पुस्तसँ ओकर खानदानमे हाथक ई इलम चल आबि रहल छल।



परोपट्टा भरिमे मुलाजिमक नाम आदर आ श्रद्धासँ लेल जाइत छल। हमरा गाममे धन-
सम्पत्ति ककरो भने बेसी होइ मुदा जे प्रतिष्ठा मुलाजिमक छल, से ककरो नहि।




एक दिन संयोग कहियौ वा दुर्याग, गाममे एकटा छौड़ा पधारलक। नाम हुनकर छल
अखिलजी। ओ भऽ गेल 'चरित्र गठन शिविर'क गुरुजी । गामक जतेक चरित्रहीन युवक
छल, भऽ गेल ओकर सदस्यगण। नहुए-नहुँ ओकरा सभक दिल आ दिमागमे ई बात ठूसि देल
गेल जे हम सभ एखन धरि परतत्र छी, गाँधीजी देशकें बेचि देलकै। सभटा मुसलमान विदेशी
अछि बाबरक सन्तान । काल्हि तक जे छौड़ा सभ साँझमे भाँग पीबि गारि पढ़ैत छल पुलपर
बैसिकऽ अबरपनी करैत छल से आब मुलाजिमकें गरियाबऽ लागल। बहुतरास लोक तँ एहि
ताकमे छलाहे, लगलथि चक्रव्यूह रचऽ।



तीन पुस्तसँ परगनाक सेवा करऽ बला मुलाजिम अकस्मात विदेशी भऽ गेल, आओर
बाबरक सतान। आब डागडर मुलाजिम, मियाँ मुलाजिम भऽ गेल छथि।



निकष



ज्योत्सना दन्द्रम

एगाहर बजबामे आब मात्र पाँच मिनट रहि गेल छलै, मुदा एखन धरि प्रोफेसर
लोकनिक कोनो पता नहि छल। हॉलमे सर्वत्र छात्रलोकनिक माछी सन भनभनाहटि व्याप्त
छल। नोट्सआ टेक्स्टबुकपर विहंगम दृष्टि दौगबैत सभ जेना अपसियांत भेल छल। चाहैत
छल जे जते जल्दी जे पढ़ी, सभटा कण्ठस्थ भऽ जाय। तनु पुनः घड़ी पर नजरि खिरौलक-
ओफ ! जे घड़ी नहि एगारह बजलै अछि। आइ एक्जाम हेतै कि नहि। पता नहि की भऽ
गेलनि अछि निरीक्षक लोकनिके...। टाइम भेल छै आ परीक्षा लेनिहारक कोनो पते नहि।



तनु, एगारह तँ बजि गेल ! टोकलकै सेतु.........हूँ, बजलासँ की ? जा सब लोकनिक
प्रादुर्भाव नहि होयतनि साघ्ये की? तिक्त स्वरें उत्तर देलक तनु....काँपी भेटओ कतबो विलम्बसँ
मुदा लेताह धरि घड़ीक सूइ

मिलाइएकें।



नोटस पलटैत अनुक हाथ हठात गेलै मंजुलक हाव-भाव ओ कार्य देखि। शॉल लपेटने
मंजुल तहे-तह पुर्जी सभ अख्यासि-अख्यासि सहेजि रहल छलि। ठाम-ठाम बाँटि - बाँटि कऽ।
तनु नहुएसँ आगाँ बैसलि मीनूक हाथ दबौलक। दुनूक दृष्टि मिललै - विक्षोभक भाव आ
निरुपायताक मेल भेलैक आ दुनू पल खसा लेलक। करत की ......?



ठीक एगारह पाँचपर सर लोकनिक आविर्भाव भेल। हॉलमे जेना एकहि बेर भूचाल
आबि गेलैक। नोट्स आ किताब टेबुलक नीचाँ जमा होबऽ लागल। कॉपी-पर्चा हाथ पबितहि
हॉलमे निस्तब्धता पसरि गेल। मात्र चलैत हाथ आ दौगैत पेनक खड़खड़ाहटि टा सुनबामे
अबैत छल।




प्रश्नपत्र बाँटि निरीक्षक लोकनि सेहो अपन अपन स्थान धऽ लेने छलाह मोटका पोथीमे
आँखि गड़ौने प्रो0 वर्मा उत्तर पुस्तिकापर ललका पेन रगड़त डॉ0 मिश्र आ शॉलक सुखद
गरमीमे लेपटायल आँखि मुनने चिन्तनलीन डॉ0 पाण्डेय सभ अपना अपनी व्यस्त छलाह।
घुमैत छलाह मात्र डॉ0 सिंह मुदा हुनक दृष्टि सुतिक्ष्ण रहितहु प्रदीप्त नहि अपितु मिझाइत दीप
सन निष्प्रभ छल आ मुद्रा निर्विकार । एहन सन स्थिति जेना रामराज्य पसरल हो।



मुदा क्षणो नहि बीतल छलै कि वॉक आउटक नारासँ यूनिवर्सिटी कैम्पस गनगना
उठल। बन्द केबाड़पर लगातार प्रहार भऽ रहल छलै आ सगहि-सगहि विविध रंगक आह्वान
आ धमकी सेहो सुनबामे आबऽ लगलै । एतेक विलम्बसँ पर्चा पाबि जे लोकनि उत्तर लिखबामे
व्यस्त भऽ गल छलाह, सभक क्रम जेना एहि गर्जनसँ टूटि गेलनि। निश्चिन्त प्राध्यापक लोकनि
सचेत भऽ उठलाह आ भयाक्रान्त छात्रकें शान्त करऽ लगलाह। परस्पर दृष्टि-विनिमयक
पश्चात उपस्थितिक अस्सी प्रतिशत वॉकआउट विरोधपर उतारू भऽ गेल। प्रश्नपत्र मनोनुकूल
छलैक आ वहिष्कार हेतु कोनो टा कारण नहि छलै। मुदा एहि उन्मत्त भीड़कें बुझबओ के?
भरि सेशन सड़कपर मटरगस्ती करत आ अन्तिम आवरमे प्रोफेसरक कंठपर चढ़ि गनि कऽ
दसटा गेस माँगत। ताहूमे की तऽ ओहो पढ़त नहि। पुर्जा आनत लहल बड़ बेस नहि लहल-
कऽ दियऽ वॉकआउट ! अशिष्टता तऽ जन्मसिद्धि अधिकार छैकै.....। भनभना रहल छलाह
डॉ0 सिंह।



की यो? केबाड़ तोड़ि दै जायत ? खोलि दियै की ? बाहर तीब्रातर होइत हल्ला आ
केबाड़पर अनवरत होइत पद प्रहारसँ चिन्तित भऽ उठलाह डॉ0 पाण्डेय।



कने हिनको सभकें तऽ पुछि लियनु-आँखि सिकुड़बैत प्रो0 वर्मा सुझाव देलनिकी विचार
वॉकआउट करबै ? नहि सर हम सभ परीक्षा देब-सभ एक स्वरे बाजि उठल।

बेस, तँ उठै जाउ आ ओहि कोठलीमे चल जाउ-डॉ0 सिंह फुरतीसँ हॉलक उतरबरिया
केबाड़ खोलैत बजलाह।



वर्मा जी, गेट खोलि दियौ। पिलुस बल जा रोकैक रोकैक-एकटा रेला भीतर पैसि
चुकल छल। जे दोसर हॉलमे जा चुकल छलाह ओ तँ भाग्यवश बाँचि गेलाह, शेषक प्रश्नपत्र
आ पुस्तिका दू भाग भऽ ठामहि फेका गेल। आ जहिना अन्हर बिहाड़ि जकाँ सभ आयल छल
तहिना नारा लगबैत विदा भऽ गेल। मुदा गेलाक बादो ओ भयावहता सहसा नहि मेटा सकलै।
पाँच मिनट धरि वातावरण भरिआयल रहल आ हॉल शान्त। पुनः प्रकृतिस्थ होइत प्राध्यापक
लोकनि परीक्षा लेबाक प्रयत्नमे लागि गेलाह। करेजमे कॉपी सटने डेरायल छात्र सभ फेर
अपन सीट धयलनि। जनिक कॉपी छिना गेल छलनि हुनका पाँच मिनट अतिरिक्त भेटबाक
आ•ाासनक संग कॉपी भेटलनि आ हॉल कने-कने सुस्थ होबय लागल। तनुक कोंढ़मे एखनो
धड़धड़ी पैसल छलै। लाख प्रयास करय मोन एकाग्र करबाक, अधूरा उत्तर पूरा करबाक मुदा
सभटा व्यर्थ भऽ जाइक। मोन जेना फेर-फेर ओही दृश्यमे ओझरा जाइक आ भयसँ रोम-रोम
सिहरि उठैक।




तनु, की तकै छी, लिखू ने-मीनू इशारा कयलकै। तनु एकबेर पुनः अपन समस्त शक्ति
एकत्रित कऽ प्रश्नपर ध्यान लगौलक आ धीरे धीरे ओहीमे रमि गेल। मुदा ई तन्मयता बेसी
काल नहि टिकि सकलै।

प्राध्यापक लोकनिक लगातार वार्निंग इंगित कऽ रहल छल जे मजिस्ट्रे साहेबक आगमन भऽ
गेल छनि आ ओ कोनहु क्षण हॉलमे दर्शन दऽ सकैत छथि। मंजुलकें कतेको वर्जना भेटि
चुकल छलनि मुदा, ओहो हारि मानयबाली जीव नहि। अंततः भेलैक वैह चेकिंगमे पुर्जा सहित
पकड़ल गेलीह आ निष्काषित भऽ गेलीह। मंजुलक ई दुःस्थिति तनुक मर्म छूबि गेलैक। दुनूक
बीच सम्बन्ध छलैक नेनहिक स्नेहक । दुख होयब तँ स्वाभाविके। आ तैं तनु एकक बाद
दोसर एहि आघातसँ बड़ डिस्टर्ब भऽ उठल। लिखैत-लिखैत हठात ओकर दृष्टि मंजुलक रिक्त
स्थानपर चल जाइक आ विषाद आर गहीर भऽ उठैक। तनुक ई स्थिति सेतुसँ नुकायल नहि
रहि सकलै।



किए दुखी होइत छी, ओकर सभक किछु बिगड़त, ओकरा पाछाँ अपन समय नष्ट करब
मूर्खता थिक। बेस बुझनुक जकाँ सेतु बाजल।



तनु किछु उत्तर नहि दऽ पुनः कापीपर मूड़ी झुका लेलक। आ प्रश्न पूरा कऽ जखन
माथ उठौलक तँ अवाक रहि गेलि। सामने गर्वसँ माथ उठौने मुस्काइत मंजुल हॉलमे प्रवेश
कऽ रहल छलैक। ओकर हाथमे छलै छिनायल कॉपी आ सम्पूर्ण हॉलक दृष्टि ओकरहि पर
केन्द्रित छलै।



तनु अपन उत्सुकता बेसीकाल दबा नहि सकलि आ हॉलसँ बहराइतहि मंजुलसँ ओकर
पहिल प्रश्न छलैक-मंजुल, ई भेल कोना, अहाँ तँ..........दूर बुरबक, हँसैत मंजुल ओकर गप
बीचहिसँ काटि देलकै। अहाँ सभदिन किताबी कीड़ा रहि गेली। दुनियाँ कतऽ सँ कतऽ गले,
सेहो देखियौ कनी। तनु सत्ते बुड़बक जकाँ बकर-बकर मुँह तकैत रहि गेलि। मँजुल अपन
बात जारी रखैत बाजल तनु ई सभटा एकटा सुनियोजित प्रक्रिया छैक-अहाँ कहब हम दोषी
छी, चोरि कयलहुँ, पकड़ैलौ, निष्काषित। भेलौं।



मुदा हमहीं दोषी किएक ? ओ शिक्षक दोषी नहि, जे अपन कोर्स पूरा नहि करा
कत्र्तव्यसँ पड़ाइत छथि - ओ निरीक्षक दोषी नहि जे सोझाँ मे चोरी होइत देखियो कऽ भयवश
आ स्वार्थवश अनठा दैत छथि। आकि ओ प्रशासक दोषी नहि, जे ऊपरी सोर्सक डरें या पाइक
बलें अपन नैतिकता बेचैत छथि। सभ दोषी अछि एतऽ तनु। बल्कि हम तऽ कहब जे देशक
सुव्यवस्थाक संचालक ई राजनीतिज्ञ सभसँ बेसी दोषी छथि, जे एहि सभ दोषीके सरक्षण दैत
छथि, प्रश्रय दैत छथि।



तनु अवाक छलि। मंजुलक ई रुप ओकरा लेल सत्ते अप्रत्याशित छलैक। हरदम
सतही हँसी मजाक आ गीत गजलमें डूबल रहनिहारि ई मंजुल आइ एहन तेवरमे ?



तनु, अहाँ ई जानऽ चाहैत छी ने, जे निष्काषित भेलाक पश्चातहु हम पुन परीक्षा मे


सम्मिलित कोना कयल गेलौ - बेस, इहो पुराण सुनिए लियऽ । हॉलसँ बहरयलाक बाद पहिल
काज छल हमर मजिस्ट्रेट साहेबक अमला सिपाहीसँ हुनक जाति आ जिला पूछब। जखने पता
लागल जे साहेब चौधरी छथि आ गाम छनि पूर्णिया दिस, तुरत हम एकटा चालि चललहुँ।
कहलियैक जे जा कऽ साहेबकें कहि दहुन जे हम फलाँ मिसरक पुतहु छी आ जतेक आसानीसँ
ओ हमरा निष्कासित कयलनि अछि, ताहिसँ कनेको बेसी देरी हमरा हुनका डिसमिस करबामे
नहि लागत। इएह जाइत छी, कने डायल घुमयबाक देरी अछि।



ओ सिपाही गेल आ कनेक कालक बाद साहेब स्वयं जबौलनि फेर की छल। तुरत
चपरासो पठाओल गेल - मधुर, नमकीन आ कॉफीक व्यवस्था भेल। इएह सौ-पचासक धक्का
बुझू - परिणाम अहाँक सोझाँ अछि।



मुदा मंजुल, अहाँ फल्लाँ मिसरक पुतोहु ? अहाँ तँ..........।



जाउ, यै एतऽ फलाँ मिसरक पुतोहु बनू वा फलाँ ठाकुरक से मुख्य नहि छैक। मुख्य
छैक जे हमर कोनो नेता वा मंत्रीसँ सोझ सम्पर्क होयबाक चाही - आ से एहि सम्बन्धसँ स्पष्टे
प्रकट होइछ। बुझलौ की ने ? आ अहाँक मोने की---ओ ठीके हमर ससुर..... जाउ, कतऽ
ओ आ कतऽ हम। ओ तऽ टैक्टिस छल एकटा। एकटा बचावक कवच, जे आइ आवश्यक
भऽ गेल छैक एहि व्यवस्थाक सामना करबाक लेल ई कोनो एक क्षेत्र वा व्यक्तिक दोष नहि,
पूरा प्रक्रिया छैक-जे शुरु होइत अछि राजनीतिक खाद-माटिसँ। अपन गप्प खत्म करैत
मंजुलक ठोरपर संतोषक संग कुटिल मुस्कान पसरि गेलै आ तनुक मोनमे अभरि अयलै-छात्रक
निकण की ? योग्यता, परिश्रम वा तिकड़म।



रिकोमेन्डेसन



विजय विक्रम



बाटक कछेरमे अवस्थित राकेशमोहन बाबूक चिक्कन-चुनमुन भव्य तिमंजिला मकान
कोनो राहगीरकें कनेक काल ठमकि सूक्षमतासँ घरकें निहारबाक लेल विवश कऽ दैत छैक।
अमरकें कम्पनीक काजक मादे ओतऽ जयबाक अवसर भेटलैक। प्रणाम पाती करिते अपन
पहिचान - पत्र मोहन बाबूक हाथमे थमौलक।



बेस ! नीक जकाँ विस्तारमे अपन काज आ कम्पनीक उपलब्धि बताउ।



अमर खूब मेहनति आ प्रयाससँ दत्तचित भऽ अपन लक्ष्यकें साधि एक-एक टा महीन
तथ्य फड़िछौलक।



सरकारक सबसिडीक संदर्भमे हमरा बुझाउ।




जी ! सरकारक एहि पद्धतिपर पचहत्तरि फौसदी अनुदान छैक। ओ मंजूर करायब
कम्पनीक जिम्मेवारी थीक।



यस! ह्वाट्स योर नेम मिस्टर ?



जी! अमर !



माइन्ड इट अमर ! यू आर नोट टाकिंग विद ए विलेजर ऑर फारमर। एट प्रजेन्ट यू
आर टाकिंग विद एन एजुकेटेड मेन! सो प्लीज रिप्लाई प्रेसाइजली। आइ कैन एडॉप्ट द
सिस्टम विदाउट सबसिडी आलसो।..........



उखरल सन बिक्खसँ भरल एेंठल बोल सुनि अमरकें छगुन्ता लागऽ लगलै। करेज धक
धक करऽ लगलैक - जे आखिर हमरासँ अपराध की भेलैक अछि ? एकटा चाकर सन
व्यवहार भेटलासँ अमरकें जेना

खौत नेसि देलकैक। तामससँ लहालोट भऽ गले। देहक एक-एक टा रोइयाँ ठाढ़ भऽ गेलैक।
अध्ययनक क्षेत्रमे सदिखन वर्चस्व रखनिहार अमरकें पहिले सीढ़ीपर एहनो दुर्दिन देखऽ पड़ि
रहल छैक-किंवा ई विधिक विडम्बना छल आ कि भाग्यक दोष, बुझबामे नहि अयलैक।
अन्तस्तल पूछि उठलैक-की पेटक खातिर जिनगी एतेक भयावह आ कठिनाह छैक ?.....तँ की
भेल ? जिनगीक यथार्थकें लगीचसँ देखबाक अवसर तँ भेटल अछि। कखनो-कखनो
उद्विग्नावस्थामे चाकरी छोड़बाक कागत धरि भरि लैत अछि, मुदा घरक पैघ जिम्मेवारीसँ
लादल कान्ह आ किछु सीमा धरि अनुशासन ठामहि रोकैत ओकरा बोल-भरोस दऽ दैत छैक।
फटोफाँटमे पड़ल अमर कठहँसीक मध्य अपनाकें सम्हारैत बाजल-श्रीमान ! हम अहाँक
भावनाकें आहत करबाक दृष्टिएँ नहि किछु कहलहुँ अछि। यथार्थकें नीक ढगसँ प्रस्तुत करबामे
जँ हमरासँ त्रुटि भऽ गेल, क्षमा याचनाक लेल हाथ पसारैत छी। साँचे ! अपने सन लोककें
अनुदानक की जरुरति ? सौरी सर ! वेरी वेरी सॉरी !



बिनु अपराधक क्षमा याचनासँ ओकर अन्तः रुग्न भऽ उठलैक । लिलोह भेल
मुखाकृतिकें सम्हारब मोस्किल भऽ गेलैक । विरासतमे भेटल आदर्श आ ओसूलकें जेना बन्हकी
राखि रहल छल। भला नौकरो-चाकरकें दवतुल्य बुझनिहार ओ अट्टालिकामे बैसल एहन
महारथीक उपेक्षा आ अपमान कयलक अछि-फूसिक एहन आरोपसँ अपसियाँत अमरक करेज
दरकि गेलैक। फिरीसानीमे पसेनासँ लथपथ भऽ गेल। एखन धरि अमर सोफाक कातमे ठाढ़े
छल-बिनु आदेशक बैसब अनुचित लगलै। मोहन बाबू मुँह बिजुकबैत कहलनि-बैसि जाउ।
अच्छा अहाँक कम्पनीक डायरेक्टर ?



जी, इलकिया दफ्तरमे श्री हून साहेब ! हुनक फोन नम्बर थिक..... ।




हुनकासँ स्पष्ट रुपें किछु विशेष गप्प करक अछि।



अमर साकांक्ष भेल--जी ? सम्भव होइ तँ कहल जाय ! एक सीमा धरि हमहुँ
अधिकार पऔने छी।



हँ ! ई पद्धति एहि इलाकामे कतेक ठाम लागल अछि ?



एहि क्षेत्रक लेल हम सभ नव छी। तैं कसिकऽ मेहनति करऽ पड़ि रहल अछि। दिन-
राति चौखटि-चौखटि घूमि सभ धरि संदेश पठेबाक प्रयास कऽ रहल छी।



सएह हमहुँ कहैत छी। हमरा ओहिठाम ई पद्धति मँगनीमे लगाउ, जे व्यावहारि रुपें
सभसँ बेसी प्रभावी

प्रचार होयत।



अमर देखलक जे हुनका एतेक बाजबामे कनियों संकोच नहि भऽ रहल छनि।
वितृष्णासँ मोन तीता गेलैक। लोहछि उठल मोहन बाबूक लेल जे किछु सम्मान ओकरा ह्मदयमे
रहैक, तिरस्कारमे बदलि गेलैक। क्षणे भरि पहिलुका दूरदर्शी पढ़ल-लिखल आ स्वाभिमानी
मोहन बाबू एतेक संकुटित, दूषित आ पतित-वि•ाास नहि भेलै। घृणा आ क्षोभसँ भरल मोन
उद्विग्न भऽ उठलैक। अट्टालिकाक राज बुझि गेल। देखैत रहल मोहन बाबू दिस। मोन
भेलैक जे आजुक एहि रावणक मुँह खखोरि लैक-जीह पकड़ि कऽ घैंचि लैक-अपना आंगुरकें
चांगुर बना घेंट मचोड़ि दैक-परंच फेर ओकर अपन सीमा आ बन्हन मोन पड़लैक। मोन
मसोसैत अपनाकें बुझबऽ लागल-एकर सबहक जिनगी कूपमण्डूकक जिनगी थिकैक, जे आन,
बान आ शान एतबे धरि टा बुझैत अछि। एहि युगकें भौतिकता दिस लऽ जयनिहार यैह
स्वार्थान्ध लोक सभ अछि, जेकर सुरता खाली

दावपेंचसँ धन-सम्पत्ति अरजब होइछ। परंच बिनु संघर्ष आ अभावक जिनगी जिअऽबलकाकें
कहियो संतोष नहि भेटैत छैक। हँ ! हेंजक-हेंज लोकमे आबि ओ सेहो जीबि लैत अछि --
एतबे धरि टा ओकर जिनगीक सार छैक।



श्रीमान ! ध्यान रखबैक ! कैंचा जमा कयलापर पद्धति जलदीये लागि जायत।



ओके ! आगूसँ एकटा गप्प ध्यनमे राखब जे दूपहरियामे नहि आबी आ अयबासँ
एकदिन पहिने फोनपर अप्वांइटमंट लऽ ली।



पचास-साठि कोस दूरसँ जेठक दुपहरियामे अमर जे व्यस्त भेल तकरा एक्को ग्लास
पानियोक आग्रह भेल रहैत, तँ अमरकें संतोष होइतैक। ताहूपरसँ अनसोहाँतक बोल। ओ
खिन्न होइत सांकेतिक अभिवादनक संग विदा भऽ गेल।



वएह दिन ! वएह गाम ! वएह परिस्थिति ! आ वएह अमर ! परिवत्र्तन एकटा


राकेश मोहनक स्थानपर जयचन्द। दस बीघा खेतक बीचमे साधारण सुन्नर चमकैत घर, जे
ओकर सार्थक जिनगीक हाल कहैत छलैक। ओ कम्मे पढ़ि-लिखि खेती-बाड़ीक व्यवसायमे
जुटि गेल छल। कोनो लस्कर आ लटारम ओतऽ नहि छलैक। देखिते अपनेसँ दौड़िकऽ
अमरक वास्ते माथपर खटिया उठौने आयल। प्रचण्ड रौदसँ हकमैत आयल अमर बड़का धात्री
गाछक जड़िमे खाटपर अनेरो औंघड़ा गेल। ततबेमे जयचन्द एक लोटा दूध आ बाटीमे किछु
मोतीचूरक लड्डू, लेने ठाढ़ छल। मुँहसँ कोनो आग्रह नहि कयलकैक, परंच क्षणे भरिक
सांकेतिक श्रद्धा आ स्नेह ओकरा अपनत्वक सीमामे बान्हि देलकैक। प्रसन्नताक नोरसँ
छलछलायल अमरक आँखि अपना समक्ष जयचन्द आ हुनक स्त्रीकें निष्कलुष रुपें ठाढ़
देखलक। क्षणे भरि पहिनुका विकृत मोनकें तृप्ति भेटि रहल छलैक। सत्ये सम्पत्ति लोककें
अभिमानी बना दैत छैक......एतबे नहि, ओकरा मनुक्ख आ मनुक्खतासँ फराक कऽ दैत छैक।
सभटा सद्यः आइये अपना आँखिसँ देखलहुँ अछि। साँचे जिनगी ओकरे सफल मानल जाइछ
जे धारक मध्य मोइनमे भसिआइत अपनाकें बचेबाक वास्ते एकसरे पैघ तेजगर प्रवाह आ घूमैत
भँवरसँ लड़ैत अछि। जे कछेरमे बैसि ओहन व्यक्तिक तमाशा मांत्र देखि ठहाका लगबैत अछि,
से एहि विराट जिनगीक अर्थ कप्पार बुझत ? पुरखाक अरजल संपत्तिपर कबाति छटनिहार
ओहन लोकक लेलतँ जिनगी एकभगाह अछि....आनन्द आ मौज-मस्ती टा....पेटहि आ प्रजनन
टा....आर किछु नहि।



भक्क टूटलैक। जयचन्दसँ आर्डर लेलक। परंच ओकर सहज अनुराग आ स्नेह
अमरकें डेग उठयबासँ रोकि रहल छलैक। अपन काज रहलापर छखि कऽ ओतऽ रहैत, मुदा
कम्पनीक अधीन एतेक आजादी नहि छलैक। अन्तर्मनसँ बेर-बेर आ स्प्ट रुपें बौक भऽ हाथ
जोड़ैत विदा भऽ गेल।



आफिसक टेबुलपर राकेश मोहनक फोनपर पठाओल अमरक शिकायत लिखित रुपें
राखल छल। ओ विस्मित भेल। ओतहि बैसि रिपोर्ट लिखलक।



एतेक दिन एहि कार्यक्षेत्रसँ हटबाक हमर उत्कट अभिलाषा छल। परंच यायावरंक
जिनगी जीबैत आइ हम संतुष्ट भेलहुँ अछि। आइ हमरा लागल जे एक्के दिनमे हम सम्पूर्ण
जिनगी जीबि लेलहुँ - आशा....निराशा, सुख...दुख, क्षोभ...तृप्ति, फूसि.... यथार्थ,
मोह....वैराग्य सभटा। एहि खातिर हम कम्पनीक आभार प्रकट करैत छी। आइ मोहन बाबू
आ जयचन्दसँ साक्षात्कार भेल। स्पष्ट तथ्य जे सरकारक अनुदान जयचन्द सन लोकक लेल
छैक, मोहन बाबू सन लोकक लेल नहि। हमर कम्पनीक सिद्धान्त अछि-'वि•ाास

हमर नींव थिक आ आइ एहि वि•ाासरूपी नींवक पहिल पजेबा जयचन्दकें मानबाक लेल
लिखैत हमर रोम-रोम पुलकित भऽ रहल अछि। जयचन्द सन लोककें वि•ाासमे अनलासँ
कम्पनीक उन्नतिक बाट प्रशस्त होयत से हम आ•ास्त छी। ओना जयचन्द काल्हि संध्याकाल
धरि उचित रकमक संग एहिठाम आओत, परंच ओकर खेत डेमोन्सट्रेसन वास्ते हम रिकोमेन्ड
करैत छी। दोसर दिस, मोहन बाबू सन लोक मतलबी आ स्वार्थी अछि। हुनका अनुदान धरि
नहि देल जाय, अन्यथा सेवामुक्त होयबा वास्ते हम तत्पर छी। ई हमर अभिमान नहि, हमर
आत्मा आ ओसूल बाजि रहल अछि। आशा करैत छी हमर पहिनुका वि•ाास आ कत्र्तव्य ई


पहिल चुनौती संग लड़बामे हमरा सबयोग देत। इति।



दासानुदास अमर।



जोगाड़



गौरोनाथ





माघ मास ! सिहकैत पछबा !....। सगरे धुँध पसरल। सात दिनसँ सुरूज केर दर्शन
नदारथ। राति भरि बुन्नी-बुन्नी पानि भेल छलैक। धरती एकदम बजबजाह ! जाड़क कनकनी
पढ़ि गेल छलैक। कोम्हरो बहरायब निरापद नहि। बूढ़हू कहै, केयो पापी मरल होयतै.....'
रेडियो सुना रहल छलैक, शीतलहरी से मरन वाले की संख्या....' आ शुभकलाल कहै 'जे मरि
गेलै ओ बड़ भाग्यवान छलै। ओकरा जोगाड़ पाँतिक तँ चिन्ता नहि....।'



ललिया मूड़ी उठा कऽ सातो मुसहरकें देखलक। ओहि सातो मुसहरकें, जे अपनाकें
मरद कहैत अछि

आ एकदिनमे एक पोखरि खुनैक आकि एक बान्ह बान्हैक दाबी रखैत अछि। मुदा, ओ जे
किछु बाजि रहल छल, से तकर अनुकूल नहि छलैक। 'रगटुट्टा ! समाँगजरुआ !....' मोने-
मोन कुड़रैत ललिया घूर दिस तकलक। बाँसक भूट धधकि रहल छलैक। मुदा, ओहिपर
सातो मुसहर अपन अधिकार जमौने छल। ललिया फेर ठेहुनमे मूडी गाड़ि ओढ़नाक सलगी
ऊपर धरि घींचि कान आ मुँह झाँपि लेलक। गांजाक दम समाप्त भेलाक बाद सभ अपन
जोगाड़मे बहरा गेल।

ललिया घुसकिकें घूर लग चलि गेलि। आगि खूब लहलह छलैक। कुरहड़िडोरी लऽ
बहराइत ललिया

माइ ओकरा कोंचिएलक एकबेर मालिक ठीन चलि जो। बरतन बासन मांजि....जे किछ टहल-
टिकोरा...ओकर बोली मरमरा गेलैक.... राति लए किछुओ चाउर...' वाक्य अपूर्णो छोड़ि
मालिकक बसबिट्टी दिस चलि गेलि।



ललिया टकटक घूर दिस तकैत रहलि। जेना किछु नहि सुनलक। एकदम निस्पन्द।
पहिनहुँ कैकबेर कहल गेल छलैक ओकरा। ....धनकटनी बीतलाक बाद प्रायः सभ साल
मुसहरीक बेसी लोकक इएह हाल होइत छैक। ललियाक आँखिमे मालिकक खरिहानमे पसरल
धानक बोझ नाचि जाइत छैक।



पछिला दिन शुभलाल मूसहनि कोड़ि किछु धान अनने छल। राति ओकरे चूड़ा कुटने
छलि आ तीन टा मूस मारने छलैक, से पकौने रहय। मुदा, भोरसँ चूल्हि नहि पजरलैक।


रमुआ, बेचनी कैकबेर खाइ लए कनलै। दू मुट्ठी चूड़ा रखने छलै एहने कुबखत लेल। से
देलकै । मुदा, जतय पसेरीक खाग, ओतय कनमाक बात।....ओसराक खूबटामे बान्हल बकरी
मेमिया रहल छलैक। भेड़ारी पसरलै, ओतहि गोंइतियो

देलकै। शुभकलाल कटहरक पतगरहा ठारि तोड़ि बकरीकें देलकै। रमुआ बकरीक गरदनि
पकड़ि बाजल 'बाबू हौ, ऐ बकरीकें काटऽ ने, एकरे माउस खायब। सार घरेमे गोंतै छै।'



'मर.....! गाभिन बकरीक माउस खाइ छै। एकरा पेटमे बच्चा छै। दूग जरुरे
होयतैक। बजैत शुभकलालक सोझा दूनू बकरीक बच्चा कुदऽ लगलैक। छब्बे मासमे जे तीन
सौ टाकाक जोड़ी भऽ जयतैक। आ ओहिसँ कोनो पैघ काज करत। फेर द्रवित होइत नहुए
बाजल 'काल्हि मूसक माउस खुएलियौ रहय, आइ अन्है - माछ खुएबौ'



'एखने जेभक। हमहुँ चलब।' रमुआ चहकि उठल। बेचनी सेहो तकलक।



'नहि, तू दूनू भाइ-बहिन नहि जो। अन्है-माछ थालमे रहै छै। जाड़मे नहि बहराइ।'
हिदायतक स्वरमे शुभकलाल बाजल आ कोदारि लऽ पुबरिया गब्बी दिस चलि देलक। जाइत-
जाइत ललियाकें चड़िओने गेल 'चलि जइहें ओम्हर..... ।' ललिया फेर किछु नहि बाजलि।
रमुआ, बेचनी अन्है माछक गप्प कऽ रहल छल। ओ भीतरे-भीतर सुनगैत रहलि। ओकर पेट
मरोड़ि रहल छलैक।



टेकना अपन घरवालीकें ओधसि रहल छलैक। बड़ीकालसँ अट्ठाबज्जर बजरल छलैक।
दू दिन पहिने टेकना दू सेर अल्हुआ अनने छल। से आइ एक्कोटा नहि छलै। ओकर माइ
कहै घरवाली खयने होयतौ.... ।' घरवाली कहै 'सभटा माइ खयलकै। ई झूट्ठी छै। हम
आँखिसँ देखलियै।'



बेचनी, रमुआ हल्ला सुनि टेकनाक घर दिस चलि गेल। ललिया एकसरि बड़ी काल
धरि घूर लग बैसलि रहलि। सहसा ओकर ध्यान घरक कोनमे लागल पुआरक सेजटि दिस
गेलैक। उठिकें माइक सलगी सेहो घीचि लेलक आ दूनू टांग मोड़ि, मुँह झाँपिकें सूति रहलि।
बड़ी काल धरि माइक गप्प आ बापक चड़िआयब ओकरा मोनमे घुरिआइत रहलैक। मोनमे
बजैत रहलैक शंख आ ओ गुनधुनमे ओझरायलि रहलि। किछु निर्णय नहि भेटलैक, तँ एक्के
झटकामे ओकरा कात कऽ देलक आ एकटा कल्पनाक जाल बुनऽ लागलि। तत्काल बड़
आसान होइत छैक, सुखद सेहो--कोनो कठिन निर्णयक जालमे ओझरा गेलापर ओकरा एक
झटकामे कात कऽ एकरा रंगीन कल्पना सजायब....आ ओहि तात्कालिकतामे ओ नीन पड़ि
गेल।



मालिकक पट्टीसँ काज कऽ एकसरि ललिया घुरि रहलि अछि। जाड़क पहिल साँझ।
झलफल अन्हार। निचाट रस्ता। रस्ताक दूनू कात राहड़िक खेत।....ललिया देखैत अछि
आगाँमे राकेश बाबूकें । मुखयाजीक बेटा राकेश ! जे बड़ पढ़ने-लिखने अछि आ कलेक्टरीक


तैयारी करैत अछि। तें मुसहरीक बेसी लोक ओकरा कलस्टर बाबू' कहऽ लागल छैक। मुदा,
ललियाकें लगैत छैक ओ राकेश नहि राकस हो !.... ओ अज्ञात भयसँ घेरा जाइत अछि कि
देखैत अछि, राकेश ओकरा लग चलि आयल आ पाँजमे पकड़ि लेलक। ओ भगैत अछि....
राखेश पाछाँसँ खेहाड़ि रहल अछि..... कि नीन टूटि जाइत छैक। दम फूलिये रहल छलैक।
छातीक धड़धड़ी तेज छलैक आ भीतरसँ घाम छूटि अयलैक। उपरका ओढ़ना फेकि किछु
काल धरि चुपचाप बैसलि। मुदा, मोन शांत नहि भेलैक। ....ओना आब ओ जमाना नहि
रहलैक जे मालिकक मनमानी चलतैक। मुदा, तैयो एहन किछु छैक जे एकटा अदृश्य भय
बनल रहैत छैक। ललियाक सोझाँ सपनाक राकेश, नहि, राकस नचैत छैक। ....ओ उठिकें
घरसँ बहरा गेलि।



बाहर रमुआ बेचनी सड़क कात टोलक बच्चा संग खेलि रहल छलैक। ओसराक
खूटामे बान्हल बकरी पात टोंगि रहल छलैक। हवामे कनकनी घोरल। पछबा कम नहि भेल
रहय। गाछ-पात सभ भीजल

रहैक, जेना दिनोमे ओस खसि रहल हो। पश्चिमक आकाश ललछौह छलैक। वातावरण
एकदम भारी, जेना भीजल नूआ ! दिनक उजास कमि गेल रहैक। टोलक उपर घुआँक छोट-
छोट टुकड़ी टंगल। घूर लग हाथ सेदैत ललिया निश्चय कयलक जे ओ मालिक ओतय नहि
जायत। किन्नहुँ नहि। आ ओकरा मोनक भय छटि गेलैक।



माइक दोबरायल नुआ ओढ़ि घरक फटक लगा बाहर आयलि। रमुआ, बेचनी रस्ता
कात खेलिये रहल छलैक। पुछआरिक नीम गाछतर आबि कुछु काल धरि ठाढ़ नीमक पीयर-
पीयर पातकें निहारैत रहलि। फेर झटकारिकें चलि देलक ! सोझे धार दिस। धारक काते
टिलासँ उत्तर दू टा गाय चरैत छलैक आ टिलासँ पूरब आढ़मे एकगोट केओ बैसल आगि तपैत
छलैक। ओकरा चिन्हैत देरी नहि भेलैक जे ओ कमला थकैक।



कमलाक घर दोसर टोलमे छैक। एम्हर किछु दिनसँ दूनूक भेंट नहि भऽ सकल
छलैक। ललियाकें देखि ओ बड़ प्रसन्न भेलि। कमलाक खोंइछामे बहुत रास बैर छलैक। बैर
खाइत ललियाकें घूरमे अल्हुआक गमक बुझलैक 'घूरमे अल्हुआ छौ गँ।' 'हऽ' 'कतऽ सँ
आनलहिक गै ! एतय... ?' ललियाकें आश्चर्य भेलैक 'भोलाक खेतसँ।' कमला सामान्य
छलि। चोरा कऽ ?' 'नहि गै !.....जवानीमे कोनो छौड़ाक खेतसँ बिन पूछि कऽ कोनो चीज
लेबै।' 'छी ! .... से कोना गे ?' कमला ओकरा अपना बाँहिमे समेटि लेलक 'तोरा कय बरख
भेलौक ?' 'सतरहम।' 'तू एखनो बच्चे छें। तीरा उमरिमे हम जवान रही। ई हमर बाइसम
छीयैक।' ललिया बकर-बकर तकैत रहलि।



दूनू गरमा-गरम अल्हुआ निकालि-निकालि खाय लागलि। ललियाक तँ खूच्ची सोहैक
ध्यान नहि रहलैक। जाबत दूनू गोटय घूरक अल्हुआ समाप्त कयलक, अन्हार पसरि गेल
रहैक। आसमानमे एक्कोटा तारा नहि छलैक। चान सेहो बादलमे नुकायल। मुदा इजोरियाके
उजास रहैक। 'ललिया तू जँ झोड़ा रहितें, तँ हम तोरेसँ बियाह करितियौक।' कहि ललियाक


माथा घीचिकें अपना छातीपर सटऽ लेलक कमला।



'जँ तू छोड़ा रहितें ?' ललियाकें गुदगुदी जकाँ लगलैक। कान लग मुँह दऽ नहुए
पूछलक 'ई सभटा अल्हुआ भोले देलको रहय।' आ भभाकऽ हँसलि। ओकर हँसी दूर धरि
पसरि गेलैक।



'हँऽ....काल्हि कने पहिने आ ने।' कमला कहलक आ ओकर ठोर चूमि लेलक।

भरि रस्ता ललियाकें रोमांचक अनुभूति होइत रहलैक। घर आयलि, तँ रमुआ, बेचनी,
माइ बाप सभ घूर लग बैसल छलैक। शुभकलाल दू टा छोट छोट अन्है माछ आनने छलै-
रमुआ, बेचनी घूरेमे पका कऽ खाय गेल। ललिया माइ बाँसक भूट उखाड़िकें आयल छलि।
ओकर दम उखड़ि गेल रहैक। मोन एकदम तमसायल। ललियाक अबितहि ओ झनकि उठलि
- 'एखन धरि कोन सांय लग मरल रही गे निरासी ! किछो आनले-ए की नहि ?'



'गेलो रही की नहि गै ? बजै एकिएक नहि, बध लागि गेलैक।' ललिया माइ भरल
रहबे करय, फूटि पड़लि । फेर ललियाकें चुप देखि झपटि कऽ केश पकड़लक 'बाज कतऽ
रही ? नहि तँ खून बोकरा देबौक।'......



घूरपर जोरसँ बकरी छटपटा उठलैक-में-एें-एें ऽऽऽ में-एें-एेंऽऽऽ। ललियाकें छोड़ि
तेजीसँ ओकर माय बहरायलि। पाछाँ लागलि ललिया सेहो। शुभकलाल ओसराक खूटामे
बान्हल बकरीकें टांग पकड़ि घूरपर

पका रहल छलैक। धीरे-धीरे छटपटायब बन्न भऽ गेलैक मुदा शून्यमे ओकर आवाज ओहिना
छलैक। ललिया माइ नीचासँ भूट जोड़ि रहल छलि। ललिया चुपचाप ठाढ़ि। निस्पन्द।.....



आगंतुक



सुस्मिता पाठक



ओ चूल्हि लग, पीढ़पर बैसि निश्चिन्त भावें चाहक एकटा नमहर घोंट लेनहि छलि कि
आंगनमे पटियापर बैसलि माँक आदेश भेटलै-'नीलू एक कप चाह आरो पठाउ देखू, के आयल
छथि ?' ओ हुलकि कऽ देखलक। साँझक झलफलमे चेहरा तँ स्पष्ट नहि देखि सकलि मुदा
कातमे ठाढ़ लाल रंगक साइकिल देखयलै। ओकर मोन रिक्त भऽ उठलै। बिनु एको पल देरी
कयने एेंठे चाह अपन बेटीक हाथमे दऽ खीझि कऽ कहलक जो, दऽ आ ओकरा।'



ई लाल रंगक साइकिल ओकर जीयब मोस्किल कऽ देने छैक। आइ सोचने छलि, जे
दिनका बहुत भात बचल अछि, रातिमे भोजन नहि पकायत आ आरामसँ सांझहि ओछाओनपर
पसरि जायत। मुदा, भाग्यमे लिखल हो तखन ने। सब माँक कयल धयल। हुनका हमर


तबाहीसँ कोन मतलब ? वैह एहि लाल साइकिलकें माथपर चढ़ौने छथि। नहितँ एतेक
पहुनाइ कतहु भद्र लोक करय ? ने कोनो सर-सम्बन्धी। केओ अपन रहैत तँ दोसर बात
छलै। ओहिनो एहि महगीमे एक सांझक-भोजनक अर्थ थिक बीस टाका। आ बीस टाकामे
चारि सांझक तरकारी आबि जायत। ताहुपर एकर पेट नहि, जेना कोनो खदहा थिक। एक
संग दस टा रोटी। एहि दस रोटीमे ओकर बच्चा सभ तीन दिन खायत।



प्रत्येक सप्ताह बीस टाका। नीरू हिसाब जोड़लक तँ ओकर शिरामे गरम लहू दौगऽ
लगलै। ओ एकहि संग अपन दसो आंगुर फोड़लक आ घुसकि कऽ नीचामे बैसि गेलि।
किछुए कालमे माँ अयतीह आ स्वभावत कहतीह- चारि टा रोटि पका देबै कनियाँ। लखनकें
देरी भऽ गेलै कचहरीमे आइ नहि तँ गाम चलि जइतै।



माँक की जाइ छनि ? हुनका तँ केओ बात करयबला लोक चाही, जे हुनका हँ मेहँ
मिलबैत टा रहय। ओ एक नजरि तीतल जारनि दिस देलक आ एकबेर आटाक टीन दिस
विवशतासँ देखलक। आब कानिकऽ एथवा हँसिकऽ रोटी बनबहि पड़त। ओ उठि कऽ बाहर
तकलक, माँ अपनत्व भावें लखनसँ गप करैत छलि। ओकर जी जरि उठलैक। हुनक नैहरिक
कुकूरो - बिलाड़ि आबि जाय तँ ओ अपन कोरामे बैसाकऽ पुचकारैत रहतीह। आ ओकर भाइ
आबि जायत तँ ओकरा आगूक थारी देखि माँक आँखि फाटय लगैत छनि। कोनो ने कोनो
भाँजें कहिये देतीह--'तेल कने हिसाबसँ खर्च करू कनियाँ.... ।' 'हुँह-नीलूक ठोरपर माँक एहि
द्वैध नीयतसँ एकटा व्यंग्य भरल तिर्थक स्मित पसरि गेलै।



प्रायः एक मास पहिने एहि लाल रंगक साइकिल बलासँ माँ हुलसिकऽ परिचय करबौने
छलि--'ई अहाँक ससुरक अभिन्न संगीक बेटा थिक कनियाँ एतहि कचहरीमे काज करैत अछि।
आब ओहन मैत्री कतय.....। सौंसे गाममे हुनक मैत्रीक चर्चा गूंजैत रहैत छल कनियाँ.....।'
माँक चेहरा पर विस्मृत अतीतक मधुरताक धरोहरि अनायासे अभरि अयलै।



ओहिदिन तँ नीलू ओकर खूब स्वागत कयलक। पराठा, भूजिया, दही खुआ देलकै।
ओसरापर ओछाइन, मुसहरी। आरामसँ सुतबाक सब व्यवस्था कऽ देलकै। बस वैह बिक्ख
भऽ गेलै। ओहि दिनसँ एहि घरक स्नेहिल भावभूमि आ माँक औदार्यक मरीचिका लखनकें बेर-
बेर खैंचि आनय। लखनक बेर-बेर आयब नीलूकें खीझ आ ऊबसँ भरि देलकै। आब तँ ओकर
मैल-चिक्कट कुरता - पयजामा, जीवन बीमा लिखलाहा टूटल बैग आ पान खाइत-खाइत कारी
भेल दाँत घिनाउन लगैत छलै।



माँ नीलूक ऊबकें चीन्हि गेल छलोह। मुदा अपन स्वर्गीय पतिसँ सम्बन्धित ओहि
व्यक्तिसँ ओ उबरि नहि पबैत छलि। ओ चाहैत छलि जे नीलू लखनसँ गपशप करय, ओकर
स्वागत करय। मुदा एहि दाबल-सैंतल इच्छाकें नीलूक तरेड़ल आँखि खा जाइक। माँ निरीह
- अवश शिशु जकाँ नीलूक आँखिमे ताकि नजरि मोड़ि लैत छलि।



एखनो गप करैत माँक दृष्टि बेर-बेर भनसाघर दिस उठि जाइत रहै।




छोटकी बेटी अकस्मात कानब शुरु कऽ देलकै। ओकरा हाथमे नीलू दूध सँ भरल
गिलास थमा देलकै। छोट बच्चा, गिलास सम्हारि नहि सकलै, सभटा दूध धरती पर खसि
पड़लै। फेर की छलै ? आगन्तुकपर खौंझी उतारबाक नीक अवसरि देखि नीलू ओहि नान्हि
टा बेटीक लाथें अनेक प्रचलित गारि पढ़ब शुरु कऽ देलक आ बेहिसाब डांटब शुरु कऽ देलक-
- खा ले हमर माथ । एहन महगीमे एतेक दूध नाश कऽ देलें.......चलि अबैत अछि माथ खाय
लेल....भाग एतयसँ।' भनसाघरसँ अबैत शब्दक भीतरका अर्थ माँक अनुभवी नाक कान
क्षणभरिमे सूंघि-सुनि लेलक।



आगंतुकक कानसँ ओहि शब्दकें बचयबाक निरर्थक चेष्टामे ओ पूछले प्रश्न सब फेरसँ
पूछय लागलि-'बड़की बेटीक विवाह कतय कयलहुँ बाउ.....जगह जमीन छैक ने ?' मुदा काँच
जारनिसँ उठैत धुआँक कड़ुआहटिसँ आगंतुकक आँखि भरि गेल छलै। किछु एहन छलै जकरा
ओ ताकि रहल छल।



माँक गपकें अनठबैत ओ बाजि उठल- 'सोखपुर जयबाक रस्ता बड्ड खराब छै, रोज
लूट-पाट । सूर्यास्तसँ पहिने चलि जाइ तँ नीक, नहि तँ.....।' ओ बातकें आगाँ बढ़बैत
बाजल-'अहाँक स्नेह आ ममता हमरा खैंचि अनैत अछि मुदा, घरक लोककें हम बहुत कष्ट
देलियै।' एकदम खाली आ दान देल गेल हँसीसँ ओ हँसि पड़ल आ एक नजरि भनसाघरक
खिड़कीपर फेकि अपन साइकिल पकड़ि लेलक।

माँ सन्न रहि गेलीह, अवाक। मनुक्ख थिक कि देवता, मोनक बात कोना बुझि गेल ?
हुनका होइत छलनि जे लखनक हाथ पकड़ि, कहथि - 'कने खा लियऽ बौआ..... राति-बिराति
नहि जाउ....रस्ता खराप छैक।'



मुदा माँक आँखिमे नीलूक अत्यन्त व्यावहारिक आ तरेड़ल आँखि गाड़ि गेल छलनि।
माँ चुपचाप ओकरा जाइत देखैत रहलि।

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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...