Tuesday, September 01, 2009

पेटार २३

डाॅ. देव शंकर नवीन


(जन्म: 2 अगस्त 1962) मैथिली तथा हिन्दी मे एम.एण्, पी-एच.डी., भौतिकी मे एमए
स-सी. तथा पुस्तक प्रकाशन एवं अनुवाद मे पी.जी. डिप्लोमा, ल.ना. मिथिला वि.वि,
दरभंगा; रांची वि.वि., दिल्ली वि.वि., जे.एन.यू. तथा केंद्रीय हिन्दी संस्थान आगरा सं
कएलाक बाद जी.एल.ए. काॅलेज डालटनगंज मे छओ बर्ख धरि मैथिली मे अध्यापन
कएलनि। हिन्दी अकादमी, नई दिल्ली सं श्रेष्ठ युवा कविक पुरस्कार, पल्लिवाणी (ओड़िया
साहित्यिक संस्था) द्वारा सम्मान, यू.जी.सी. द्वारा तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वाराकनिष्ठ शोध अध्येता वृत्ति प्राप्त कएलनि। राजकमल चैधरीक साहित्य तथा तुलनात्मकसाहित्य पर विशेषज्ञता प्राप्त नवीनक प्रकाशित कृति छनि:

‘ओ ना मा सी’ (मैथिली तथा हिन्दी की अभ्यासकालीन सर्जना), ‘चानन काजर’ (मैथिली
कविता संग्रह), ‘जमाना बदल गया’ (हिन्दी कहानी), ‘राजकमल चैधरी का रचनाकर्म’
(आलोचना), ‘प्रतिनिधि कहानियां: राजकमल चैधरी’, ‘राजकमल चैधरी की चुनीहुई कहानियां’, शव यात्रा के बाद देह शुद्धि, ‘उत्तर आधुनिकता: कुछ विचार’, ‘लोकवेद
आ लाल किला’ (संपादित), ‘सद्भाव मिशन’ (पत्रिका) क संपादन।

मुद्रणाधीन: ‘अभिधा’ (हिन्दी कविता संग्रह), ‘साठ के बाद की मैथिली एवं हिन्दी
कवितओं का तुलनात्मक अध्ययन’ (शोध-ग्रंथ) ‘राजकमल के पांच उपन्यास’, ‘प्रतिनिध् ि
ा कविताएं: राजकमल चैधरी’, ‘पत्थर के नीचे दबे हुए हाथ’, ‘रा.क.चै. की मैथिली
कहानियां’ (संपादित)।

एतद्रिक्त हिन्दी, मैथिली की समस्त प्रतिष्ठित पत्रा-पत्रिका मे कविता, कथा, आलोचनात्मक
निबंध, लघुकथा आदि प्रकाशित तथा बांग्ला, तेलुगु, पंजाबी, अंगे्रजी मे अनूदित।

रुचि: जीवन आ लेखन, भाषा आ व्यवहार, रचना आ कर्म मे समानता राखब आ
विपरीत आचरण कएनिहारक विरोध करब।


;आलोचनात्मक निबंध्-संग्रहद्ध

देवशंकर नवीन


कहबाक छल जे..



मैथिली भाषा-साहित्यक गद्यक इतिहास संसारक सभ भाषा सं पुरान अछि। मुदा
एकर आलोचना साहित्य संसारक सब भाषा सं पछुआएल अछि। असल मेआलोचनाक अंकुर तं लक्षण ग्रंथक फरमूला पर कृतिक परीक्षण सं फूटल, मुदा बाद
मे आलोचनाक सामाजिकता महत्वपूर्ण होअए लागल। साहित्य, अपना समयकसमाजक चित्तवृत्ति वाहक होइत रहल अछि। कोनो कालक इतिहास समकालीन
राजाक राजपाट, शासन- व्यवस्था, युद्ध-शांति, आखेट-प्रेम, क्रूरता-दयालुताक खिस्सा
कहैत रहल अछि। ओहि कालक अधिसंख्य जनता, जे राज-पाट बढ़बै मे वध भ’
जाइत अछि, मरि खपि जाइत अछि, जकरा लेल कननिहार सर-कुटुमक क्रंदनक
सूचना राज दरबार धरि पहुंचियो नइं पबैत अछि, ताहि समुदायक दुख दर्द कतहु
उल्लिखित नइं होइत अछि। राज्याश्रय प्राप्त व्यक्तिक आतंक-अत्याचार कें विवशतावश
सहैत जनताक व्यथा कतहु अंकित नइं होइत अछि। सब समयक साहित्य अहीजनताक चित्तवृत्तिक इतिहास होइत आएल अछि। मुदा मैथिली साहित्यक ई
विडंबना थिक जे एकटा समृद्ध साहित्यिक परंपराक अछैत, एकर कोनो दृष्टि संपन्न
इतिहास नइं लिखल गेल। इतिहास-दृष्टि आ आलोचना-दृष्टिक अकाल मैथिलीक
जड़िआएल बीमारी थिक। रमानाथ झा द्वारा कएल काजक विस्तार नइं भेल।
रामानुग्रह झा आ ललितेश मिश्र प्रारंभ करिते देरी बंद क’ देलनि। फेर अइ
आलोचना दिश थोड़ेक काज कुलानंद मिश्र आ भीमनाथ झा कएलनि, मुदा हुनकोमुख्य वृत्ति से नइं रहलनि। एखन मोहन भारद्वाज आ रमानंद झा ‘रमण’ अइ कर्म
मे केंद्रित भ’ कए जुटल छथि। ओना तं मैथिलीक अधिकांश रचनाकार समय-समय
पर आलोचना कर्म करैत रहैत छथि। तारानंद वियोगी आ शिवशंकर श्रीनिवास द्वारा
लिखल थोड़ेक आलोचनात्मक लेख, आलोचनाक प्रतिमान बना सकल अछि। मुदा
ई कहबा मे हमरा कोनो संकोच नइं भ’ रहल अछि, जे मैथिलीक रचनाकार
समालोचनाक महत्व कें बड़ कम वजन पर ल’ रहलाह अछि। कोनहुं भाषाक

आलोचना साहित्य ओकर सार्वत्रिक लोकप्रियता आ सार्वत्रिक प्रसारक कारण होइत
अछि, एहि तथ्य सं मैथिलीक लोक अपरिचित छथि। आलोचना कर्म लेल सहृदयता,
क्रूरता, ईमानदारी, तटस्थता, अध्ययनशीलता, परिश्रम आ सर्वोपरि प्रतिभाक जतबा
आवश्यकता होइत छैक, ततबा पूंजी लगब’ लेल मैथिली मे किओ तैयार नइं छथि।
आलोचक कें ने तं सत्य कहबाक क्रूरता छनि आ ने रचनाक संग न्याय करबाक
सहृदयता तं फेर आलोचना कोना हो ?

ई पोथी किछु सर्वेक्षण आ किछु मूल्यांकनक संग उपस्थित अछि। आधुनिक
मैथिली साहित्यक परिदृश्य ततेक विराट भ’ गेल अछि, जे एक-एकटा रचनाकार पर
एक एकटा संपूर्ण पोथीक खगता अछि, ताहि मे ई एकटा पोथी पूरा परिदृश्य कें कोना
समेटि सकत ? सीताराम झा, कांचीनाथ झा ‘किरण’, हरिमोहन झा, मनमोहन झा,
ब्रजकिशोर वर्मा ‘मणिपद्म’, रामकृष्ण झा ‘किसुन’, धीरेन्द्र, सोमदेव, हंसराज, रामदेव
झा, रमानंद रेणु, साकेतानन्द, रामलोचन ठाकुर, सुकान्त सोम, महाप्रकाश, भीमनाथ
झा, उदयचन्द्र झा ‘विनोद’, कुलानंद मिश्र, पूर्णेन्दु चैधरी, अग्निपुष्प, उपेन्द्र दोषी,
विनोद बिहारी लाल, नवीन चैधरी, विभा रानी, सियाराम सरस, केदार कानन, शैलेन्द्रआनन्द, राज, हरेकृष्ण झा, विद्यानन्द झा सन कतोक महत्वपूर्ण रचनाकारक योगदान
कें अंकित कएने बिना आधुनिक मैथिली साहित्यक परिदृश्य पूर्ण नइं भ’ सकैत
अछि। मुदा एक व्यक्तिक श्रम आ एक प्रकाशकक साधनक तं सीमा होइत अछि,
ताहि सीमा मे यथासाध्य क्षमताक उपयोग करैत जे भ’ सकल, से प्रस्तुत अछि।
लेखक आ प्रकाशक प्रतिश्रुत अछि, जे अगिला खेप मे अइ कमी कें पूर क’ देल
जाएत। ओना तं कोनो नीक काज कहिओ पूर्ण नइं होइत अछि। मुदा मैथिली भाषा
साहित्यक प्रति तटस्थ जिज्ञासा रखनिहार पाठकक कनेको तृषा ई पोथी जं शांत क’
सकल, तं हम अपन परिश्रम सार्थक बूझब।

सन् 1983 सं आइ धरि, मैथिली मे लिखल प्रकाशित अप्रकाशित आलोचनात्मक
लेखक संपादित संकलन थिक ई पोथी। संपादनक क्रम मे पुरान लेख सब कें
छोट-पैघ कएल गेल अछि, तें प्रकाशन वर्ष अथवा पत्रिकाक नाम उद्धृत नइं कएल
गेल। शताब्दीक अंतिम दशक मे कतोक नाम अपन महत्व साबित कएलक
अछि शैलेन्द्र कुमार झा, अरविंद ठाकुर, संजय कुंदन, कामिनी, रमण कुमार सिंह,
निर्भय, विनय भूषण, कृष्ण मोहन झा, अनलकांत, श्याम दरिहरे प्रभृत्ति लोकनि पर
सेहो विचार हएबाक चाही। मुदा, से आब आगू...। जतेक गोटएक आभारी छी,
तिनकर नाम गनाएब असंभवो अछि, अनुचितो। ओना मैथिली मे थोड़ेक नटवर
लाल, हर्षद मेहता, सतवंत-बेअंत सब छथि, हम हुनका लोकनिक विशेष रूप से
अभारी छी।

µदेवशंकर नवीन


विषय-सूची

कहबाक छल जे 7

सर्वेक्षण
गद्यक विकासक रूपरेखा 11
आधुनिक मैथिली साहित्य पर एक नजरि 18
मैथिली कथायात्रा आ कथाकारक संधान 31
समकालीन मैथिली कथा 38
लक्ष्य-संधान करैत मैथिली कथा 47
समकालीन उपन्यास: प्रयास आ परिणाम 56
आजुक मैथिली कविता 68
मैथिली नाटक: प्रयोग आ प्रवृत्ति 73
मैथिली गजल: स्वरूप आ संभावना 81
नग्नता, नकल, प्रगतिशीलता 87

मूल्यांकन
पुरान आ नव युगक सेतु 93
मधुप आ द्वादशी 99
नवतुरिए आबओ आगां 104
दृष्टिकोण आ काव्य वस्तुक सीमा 115
विधात्मक तोड़-फोड़क कथा 120
जर्जर अतीत सं मुक्तिक कथा 127
मनोवैज्ञानिक सत्यक कथा 133
परंपरा सं प्रगति धरिक अनुशीलन 140

कंस सं डेराए गेलहुं बलराम ? 146
कथा शिल्पक विश्वकर्मा 151
परंपराक रक्षक मुदा नवारंभक आग्रही 157
कथा संसार मे कथाकारक जीवनी 162
पतित नायकक पावन कथाकार 167
अभिमन्युक एकालाप 174
पक्षी आ पिजराक संघर्षक कविता 181
जीवनक डायरिए असली कथा थिक 188
आकुल-व्याकुल मोनक रचनाकार 193
नव कथ्य शिल्पक मांसल कथा 198
विसंगतिक भीड़ मे सहज संधान 204
प्रवहमान भाषाक डिक्टेटर 208
स्वाभाविक आ स्वाभिमानी जीवनक कथा 212
अद्यतन विषयक मनमौजी कवि 217
सकारात्मक स्वरक प्रगतिकामी कविता 220


सर्वेक्षण्




गद्यक विकासक रूपरेखा


मैथिली साहित्यक विकासक लेल मैथिली गद्यक सभ संवर्गक समृद्धि आवश्यक
अछि। सभ दिशा मे एकर गद्य सभ तरहें युगीन राग, लय एवं ताल सं चलि सकए,
विषय आ शिल्प दुनू स्तर पर अपन नूतनता आ मौलिकताक स्थापना कए सकए,
से अपेक्षा तं अछि मुदा एहि मे सभ सं पैघ बाधक अछि प्रकाशनक असुविधा।

गद्य लेखन, कविकर्मक कसौटी होइत अछि से सर्वविदित बात थिक। विदित
बात ईहो थिक जे गद्यक विकास सं कोनहु भाषा साहित्यक सर्वतोन्मुखी विकास
संभव अछि। प्रारंभिक काल सं पद्य मे लयात्मकता, पदलालित्य, छंद विधान
आदि-आदि तत्व लोकरुचि कें अपना मे लपटौने रहल अछि। मुदा, तें ई नहि कहल
जा सकैत अछि, जे गद्यक प्रति लोकक उपेक्षा भाव कहियो रहल होयत। होएबा
लए तं भारतीय साहित्यक आदिकाव्य पद्ये सं प्रारंभ भेल अछि। किंतु, ई बात सहज
अनुमानक थिक, जे ओहू समय मे गद्यक उपेक्षा नहि होइत होएत। कारण, सृष्टिक
विकास मे जहिया सं मानव सभ्यताक बीच आपसी अभिव्यक्तिक माध्यम वाचिकप्रक्रिया बनल अछि, सामान्यतया लोक आपस मे वात्र्तालाप गद्यहि मे करैत होएत।
जेना कि कथा-कहानीक मादे कहल जाइत अछि, जे पहिने ई कह’ आ सुन’क
वस्तु छल। भारतक समस्त आधुनिक भाषाक गद्यक प्रसंग इएह कहल जा सकैत
अछि। सामान्य संभाषण, विचार-विमर्श, उपदेश-आदेश, कथा-उपकथा आदिक माध्यम
गद्ये रहल होएत।

गद्यक विकासक परंपरा तकबा मे अपस्यांत भेल हिंदीक अनुसंधानार्थी जखन
नाथपंथी योगी सभक धार्मिक उपदेशक अंश उद्धृत क’ कए ब्रजभाषा गद्यक काल
विक्रम सं. 1400 कहिओ क’ संतुष्ट नहि भेलाह, तखन मैथिली साहित्यिक महत्वपूर्णकृति ‘वर्णरत्नाकर’ दिस दौड़लाह। जखन कि मैथिली गद्यक विकास परंपरा ताक’
मे एहेन कोनो फिरीसानी नहि अछि। संस्कृतक अतिरिक्त प्रायः आन कोनो एहन
भारतीय भाषा नहि होएत, जकर गद्य-साहित्य एतेक प्राचीन हो। मुदा मैथिली गद्यक
ई विडंबना थिक, जे एतेक प्राचीन आ सबल परंपराक अछैतो लिखित साहित्यक

गद्यक विकासक रूपरेखा / 11

रूप मे ई भकरार भ’ कए नहि आबि सकल। कारण स्पष्ट अछि जे तत्कालीनविद्वतवर्ग संस्कृतानुरागी रहैत छलाह, लोक भाषा मे रचना करबा मे हीनता बोध
होइत छलनि। ओहि समय मे अपन प्रखर साहसिकताक परिचय विद्यापति देलनि।
घोषणा करैत लोकभाषा मे रचना कयलनि। मुदा, मैथिली गद्य हुनकहु साहित्य मे
नहि पनगल।

गद्यक विधिवत विकास, वस्तुतः कोनो साहित्यक श्रेष्ठता आ साहित्यक
प्रमाण-पत्रा मानल जाइत अछि। मैथिली गद्यक आरंभिक सूत्रा भने हमरा लोकनि
कें चैदहम शताब्दी मे भेटि जाए, वर्णरत्नाकर ल’ कए पुरजोर दावा ठोकि ली, मुदा
ईहो बात सहज रूपें मानबाक थिक जे ज्योतिरीश्वरक पश्चात् मैथिली गद्यक धारा
रुकि जकां गेल आ आजुक मैथिली गद्यक जे स्वरूप हमरालोकनि कें प्राप्त अछि,
तकर गहन प्रारंभ प्रायः उनैसम शताब्दीक अंतिम काल आ वत्र्तमान शताब्दीक आरंभिक
काल मे भेल अछि। ई बात भिन्न, जे आजुक गद्य कें ‘वर्णरत्नाकर’ सं संबंध करएबा
लेल बीचक शताब्दी सभ मे नेपाल आ आसाम मे लिखल मैथिली नाटक सभकगद्य कें उद्धृत क’ ली आ ओहि क्षीण शृंखला कें मैथिली गद्यक क्रमिक विकासक
सोपान मानि ली। एहि मध्य व्यक्तिगत पत्रा, अधिकार पत्रा, दान-पत्रा आदि मे प्रयुक्तगद्यक चर्चा इतिहासकार लोकनि करैत छथि। सभ समयक भाषा, समकालीन संस्कृति
सं प्रभावित होइत अछि। एहि बीचक सामाजिक प्रथाक अनुसार भाषा मे परिवर्तन
होइत गेल। मुदा भाषा संबंधी जे किछु महत्वपूर्ण बात उनैसम शताब्दी मे भेल से
अनेक दृष्टिएं अद्वितीय अछि। एहि शताब्दीक मध्य अबैत-अबैत मिथिलाक
जीवन-प्रक्रिया मे, सामाजिक परिवेश मे, क्षिप्र गतिएं परिवर्तन प्रारंभ भ’ गेल। मिथिला
मे अनेक अंग्रेजी स्कूलक स्थापना, विदेशी लोकनिक द्वारा भारतवासी पर अपनसंस्कृति, भाषा, आचार-विचार कें थोपि देबाक उत्साह, ईसाई धर्मक प्रचार-प्रसारक
तेजी, मिथिला राज्यक शासन कोर्ट आॅफ वार्ड्सक अंदर जाएब, ईस्ट इंडिया कंपनीक
प्रारंभिक प्रोत्साहन सं मुसलमान द्वारा नागरी लिपिक बहिष्कार आदि-आदि घटनावली
संवेदनशील विद्वान लोकनि कें उत्प्रेरित कएलकनि। मातृभाषाक प्रति हिनका लोकनि
आदरक भावना बढ़ल। आन-आन पाश्र्ववर्ती भाषा सभ मे सेहो गद्य प्रचलित होअए
लागल। एहि परिस्थिति मे मातृभाषाक परम अनुरागी लौह-पुरुष कवीश्वर चन्दा
झा, विद्यापतिक पुरुष-परीक्षाक अनुवाद मे मैथिली गद्य प्रयुक्त कएलनि आ तत्पश्चात्
मैथिली गद्य विविध सभा सोसाइटी, संस्था, अधिवेशन आदिक आलोक मे विकसित
होअए लागल। एतए सं गद्यक परंपरा तीन दिशा मे चलल पहिल दिशा मे प्रारंभिक
पौराणिक अथवा शास्त्राीय ग्रंथक अनुवाद, दोसर असहज भाषाक टीका आ तेसर
पोथी सभक भूमिका आदि। मुदा, ई स्थिति बेसी दिन नहि रहल। ‘मैथिल हित
साधन’ (1905), ‘मिथिला मोद’ (1906), ‘मिथिला मिहिर’ (1909) आदि पत्रिकाक
प्रकाशन प्रारंभ भेल आ मैथिली गद्यक प्रगति बेस प्रखरता सं होअए लागल। पुनः

12 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


नव-नव पत्रिकाक प्रकाशन बढ़ैत-घटैत रहल आ मैथिली गद्य अनुवाद सं मौलिकता
पर आबि गेल। अनुवाद भारतीय साहित्यक अतिरिक्त पाश्चात्यो साहित्यक होअए
लागल। एहि सं गद्य लेखनक शिल्प एवं शैली मे तेजी तं अएबे कएल, संगहिं
गद्यक उपांगक रचना सभ सेहो प्रारंभ भेल।

मैथिली गद्यक अद्यतन विकसित स्वरूपक आधार पर एकरा चारि कोटि मे
बांटल जा सकैत अछि सृजनात्मक, वर्णनात्मक, विश्लेषणात्मक तथा तथ्यात्मक।
रचनात्मक गद्यक अंतर्गत कथा, लघुकथा, उपन्यास, नाटक, एकांकी; वर्णनात्मकगद्यक अंतर्गत जीवनी, आत्मकथा, संस्मरण, यात्रा वृत्तांत, शिकार कथा, रेखा चित्रा,
रिपोर्ताज; विश्लेषणात्मक गद्यक अंतर्गत अनुसंधान, अनुशीलन, आलोचना, परिचर्चा;
तथ्यात्मक गद्यक अंतर्गत इतिहास, भूगोल, धर्म, दर्शन, मनोविज्ञान आदि अबैत
अछि।

आइ मैथिली गद्यक जे स्वरूप हमरालोकनिक समक्ष अछि से सर्वांश मे मैथिल
हित साधन, मिथिला मोद, मिथिलामिहिर, विभूति, भारती, वैदेही आदि पत्रिका सभक
संग आनो-आन पत्रा-पत्रिकाक देन कहल जाएत। एहि पत्रा-पत्रिका सभक संपादक
लोकनि मैथिली गद्यक प्रगति मे अपन दूरदर्शिता आ मातृभाषाक प्रति प्रबल अनुरागक
परिचय देलनि अछि। सन् 1898 मे पहिल बेर प्रकाशित ‘पुरुष-परीक्षा’क अनुवाद
मे कवीश्वर चन्दा झा मैथिली गद्य मे जाहि तरहें नवताक सूत्रापात कएलनि, तकर
परवर्ती प्रतिफलन एकटा सुदीर्घ, सुपुष्ट रूपें, आ पाछू मौलिक रूपें होमए लागल।
प्रारंभिक काल मे प्रकाशनक अभाव छल आ संग-संग लोकभाषाक प्रति कोनो
अतिरिक्त अनुराग नहि छल। गीत आदि तं लोकानुरंजनक भावना सं सेहो लोकप्रिय
होइत गेल। मुदा, चन्दा झाक समय मे प्रकाशनक सुविधा भेटए लागल। लेखक
लोकनिक उत्साहवर्द्धन भेलनि। विविध तरहक भावनाक प्रकाशन सं विद्वान लोकनिकदृष्टिफलक बढ़लनि। वैज्ञानिकताक प्रवेश सं लोक पाश्र्ववत्र्तीक अतिरिक्त सुदूर देशसभक सभ्यता-संस्कृति सं परिचित होअए लागल। एहि क्रम मे चिंतक-विचारक
लोकनि कें अपन डीह-डाबर, घर-समाज डेरही-दलान, इनार-पोखरिक अतिरिक्तदेश-विदेशक संस्कृति ओकर आर्थिक, शैक्षिक, मानसिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक
परिदृश्य सूझए लगलनि। ओ अपना सं ओकर तुलना करए लगलाह। एहि क्रम
मे मैथिली गद्यक प्रगति आओर जोर पकड़लक। तें ई कहि देब एकदम भ्रामकहोएत जे मैथिली गद्यक आधुनिक रूप कोनो पाश्चात्य साहित्यक अनुकृति थिक।हं, संस्कृतक ऋणी होएब एकर कृतज्ञता अवश्य मानल जाएत। वस्तुतः संस्कृतकअनुवाद सं प्रारंभ आधुनिक मैथिली गद्यक परंपरा किछु दिन धरि संस्कृतक छाहरि
सं मुक्त नहि भए सकल। ओना, ईहो कहल जएबाक चाही, जे व्यक्ति विशेषकअपन मौलिकताक स्तरक कारणें संस्कृतक प्रभावक प्रतिशतता मे कमी-बेशी होइत
रहल अछि।

गद्यक विकासक रूपरेखा / 13

संस्कृतक सघन छाहरि सं मुक्त मैथिली गद्यक प्रारंभ होइत अछि वत्र्तमान
शताब्दीक तेसर दशकक अंतिम चरण सं। एहि परंपराक पुरोधा छथि रमानाथ झा
आ भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’। जें कि साहित्य मे कोनो नवीन भावधाराक प्रारंभ हठात्
नहि भ’ क’ एकटा सुनिश्चित विकास परंपराक अंतर्गत होइत अछि, मैैथिली गद्ययहुक
संग से भेल। एहि दुनू गद्यकार सं पूर्वक गद्य साहित्य कें दू कोटि मे बांटल जा
सकैत अछि पहिल ओ, जे अनुवादक कारणें खाहे रचनाकारक अनुभवहीन प्रयोगधर्मिताककारणें संस्कृतबहुल, बेलसि भाषा विन्यास, संस्कृतक विभक्ति, सामासिकता, क्लिष्टताआदि सं युक्त अछि आ दोसर ओ, जकर आधार भने संस्कृतक हो, मुदा मैथिलीक
मौलिकता, भाषाक सहजता, सरलता, आदि ओहि मे विद्यमान अछि। हं, दोसरोकोटिक गद्य मे तत्सम शब्दक बाहुल्य अछि, से धरि मान्य। किंतु, संस्कृतक विभक्ति
सं मुक्त रहलाक कारणें ओकर बोधगम्यता पर आघात नहि पड़ैत अछि। एहि कालक
प्रतिनिधि रचनाकार मे मुख्यतया कवीश्वर चन्दा झा, महावैयाकरण दीनबंधु झा,
मुकुन्द झा ‘बख्शी’, त्रिलोचन झा, बलदेव मिश्र, तुलापति सिंह, जीवन झा, रघुनन्दन
दास, मुरलीधर झा, गंगनाथ झा प्रभृति लोकनि अबैत छथि। एही मे सं क्रमे-क्रमे
मैथिली गद्य अपन मौलिक लेखन आ मौलिक चिंतनक सीमा दिस उन्मुख भेल।क्रमशः संस्कृतक शब्दादि सं रचनाकार बचए लागलाह आ मैथिलीक मौलिकतासुपुष्ट होइत गेल। रमानाथ झा मुदा संस्कृतनिष्ठ भाषा सं पूर्णतः मुक्त नहिएं भेलाह।

एही समयांतराल मे मैथिलीक सृजनात्मक गद्य विकसित भेल। प्रारंभ मेसंस्कृतक पौराणिक कथाक अनुवाद आ फेर प्रारंभिक ग्रंथक कथासूत्रा पर आधारित
मौलिकताक संग कथा-रचना शुरू भेल। सन् 1914 सं उपन्यास लेखन मौलिक
रूपें मान्य थिक। अनुवादक क्रम मे रचनाकार लोकनि गद्यक लोकप्रियता सं परिचित
भेला। अपन सामाजिक परिवेशक समस्त जीवन-विधान हिनका लोकनिक समक्ष
छलनि। प्राचीन ग्रंथक उपदेशात्मकता आ मनोरंजनात्मकता सं अनुप्रेरित भ’ कए
ई लोकनि समकालीन जन-जीवनक कटु-मधु अपन सृजनशीलताक संग उगाहए
लगलाह। मैथिली नाटकक लेखन सेहो पहिले दशक सं प्रारंभ भए गेल।

वर्तमान शताब्दीक चारिम दशक अबैत-अबैत मिथिलाक सामाजिक परिवेशक
हालति थोड़ेक आओर जटिल भ’ गेल। सामाजिक विडंबना मात्रा बाल-विवाह,
बहुविवाह, सासु-पुतौहुक अमानुषिकता, दहेज आदि नहि रहि गेल। फलतः साहित्य
सेहो मनोरंजन आ उपयुक्त समस्याक आंगन मे बौआइत नहि रहल। विदेशी शासककअत्याचार, धर्मक पाखंड, सामंतशाही निष्ठुरता, स्तुत्य संस्कृति आ परंपराक उपेक्षा,
उच्चवर्गक स्वेच्छाचारिता, राजनीतिक विकृति, मानवीय संबंधक विगलन आदि-आदि
समस्या जीवन-क्रम कें आओरो जटिल बनौलक। आब विद्वान लोकनि बाह्यजगतक
संग-संग मनुष्यक अंतर्भावना सं सेहो परिचित होअए लगलाह। मैथिलीक कथा,
उपन्यास, नाटक, एकांकी आदिक कथ्यक विस्तार भेल। हंसी-ठट्ठा, सखी-बहिनपा,

14 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


पूजा-पाठ, विवाह-दान, कोबर-अरिपन आदि सं एकर विषय निकलि कए आत्मदमन,
शोषण, अनाचार, महगी, बेकारी, भूख, दांपत्य-तनाव, दैहिक विवशता, मानसिक
घीचा-तीरी, श्रम-अवमूल्यन आदिक बाट तय करैत विद्रोह आ आंदोलन धरि आबि
गेल। एहि समस्त विषयक आलोक मे विद्वान लोकनि शिल्पक दिशा मे सेहो नवीन
भेलाह। रमानाथ झा आ भुवनक गद्यशैली कें अपन-अपन यत्किंचित मौलिकताक
संग पुष्ट कएनिहार मे परिगणित प्रमुख विद्वान सभ छथि भोला लाल दास, लक्ष्मीपति
सिंह, ईशनाथ झा, सुरेन्द्र झा ‘सुमन’, तंत्रानाथ झा, हरिमोहन झा, जयदेव मिश्र,
जयकान्त मिश्र, राधा कृष्ण चैधरी, कांचीनाथ झा ‘किरण’, वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्राी’
ब्रजकिशोर वर्मा ‘मणिपद्म’, आनन्द मिश्र, ललित, राजकमल चैधरी, मायानन्द मिश्र,
धीरेन्द्र, सोमदेव प्रभृति।

देश-विदेशक अनूदित साहित्यक संपर्क, अपन सुपुष्ट आ सुदीर्घ सृजन परंपरा
तथा फरीछ चेतनशीलता, सोझराएल दृष्टिकोण एवं मौलिक सृजनशीलताक त्रिवेणी
मे स्नातक मैथिलीक सृजनात्मक गद्य आब शिल्प, शैली एवं कथ्य सभ तरहें पूर्ण
समर्थ भ’ आएल। जेना-जेना सामाजिक स्थिति-परिस्थति बदलैत गेल, रचनाकारक
कथ्य विस्तृत होइत गेल। एम्हर आबि कए यात्राी आ राजकमल फेर सं एकटा
नव प्रकाश अनलनि, जे परवर्ती पीढ़ीक लेल अनुकरणीय बनि गेल अछि। शिल्प-शैलीक
स्तर पर ई दुनू व्यक्ति अपना-अपना दिशा मे विशाल प्रयोगशाला छथि, जतए शैलीक
आविष्कार कएल जाइत रहल अछि आ अनुगामी पीढ़ीक लेल आलोक बांटल जाइत
रहल अछि। चारिम दशक सं प्रारंभ क’ कए नवम् दशकक अंत धरिक सर्वेक्षण
सं साफ-साफ बात सोझां अबैत अछि जे एहि छओ दशक मे सृजनात्मक साहित्य
बेस लिखल गेल ! एकटा पैघ सन वर्ग, गद्य लेखन लेल तैयार भेल। पत्रा-पत्रिकाकप्रकाशन सं ई धारा उत्प्रेरित भेल आ संगहि एहि अंतराल मे तीन टा महत्त्वपूर्ण
मोड़ आयल। पहिल मोड़ सं एहि अंतरालक प्रारंभ थिक, जखन सामान्य सामाजिक
समस्याक संग-संग परतंत्राताक त्रास ओहि कालक रचनाकार लेकनि कें आंदोलनोन्मुख
सृजन दिश उत्प्रेरित कएलकनि। दोसर मोड़ थिक साठिक बादक, जखन भारतक
जनता स्वतंत्राताक मृगतृष्णा सं परिचित भेल आ चतुर्दिक समस्याक जाल पसारि
देल गेल। एहि समस्त आयामक संगें मैथिली गद्य विकसित भेल आ क्रमशः कथ्य
तथा शिल्पक स्तर पर निधोख आ निडर भ’ गेल अछि।

मैथिली गद्यक दोसर उपांग, जकरा वर्णनात्मक गद्य कहल गेल अछि, शुद्ध
रूप सं हेबनि मे विकसित कहल जाएत। आत्मकथाक छिट-फुट एकाध टा परंपरा
कें मजगूत करबाक लेल आ एहि विधा कें समृद्धि देबाक लेल हरिमोहन झाक
देन स्तुत्य अछि। हिनकर ‘जीवन-यात्रा’ पुस्तक मैथिली गद्य मे आत्मकथाक विकासक
परंपरा लेल माइल-स्टोनक रूप मे निर्विवाद रूपें परिगणित होएत। ओना एहि सं
पूर्वहु एहि दिशा मे प्रयास प्रारंभ भेल, मुदा से अपन परिचिति नहि बना सकल।

गद्यक विकासक रूपरेखा / 15

एहि कोटिक दोसर आयाम थिक यात्रा वृत्तांत। मिथिलाक लोक पहिने विदेश गमन
कें पाप बुझैत छलाह। किंतु बाद मे बहुत रास एतुक्का विद्वान लोकनि विदेश
जाए लगलाह। साहित्यिक लूरि-बुद्धिक लोक कम गेलाह। स्वदेशे मे तीर्थाटन अथवाशिक्षा दानक निमित्त कएल भ्रमण कें किछु विद्वान लोकनि एहि शताब्दीक आरंभ
मे लिपिबद्ध कएलनि। एहू दिशा मे छोट-छीन अनेक प्रयास भेल अछि। मुदा, सुभद्र
झाक ‘प्रवास’ आ उपेन्द्रनाथ झा ‘व्यास’क ‘विदेश-भ्रमण’ एहि परंपराक लेल विपुल
आलोक पुंजक काज कएलक अछि, जे मैथिली गद्यक एहि प्रभाग कें दिशाक संग-संग
एकर सफलता आ लोकप्रियताक सूत्रा सेहो बुझबैत अछि। शिकार-कथा प्रायः मैथिलीमे नहिएं लिखल गेल अछि। अपेक्षाकृत खूब लिखल गेल अछि ‘जीवनी’परक गद्य।
से खाहे पुस्तकाकार हो अथवा छिट-फुट, मुदा एकर अस्मिता मैथिली गद्य मे नीक
जकां स्थापित भ’ चुकल अछि। मिथिलाक इतिहासपुरुष, साधु, संत, विशिष्ट विद्वान,
प्रसिद्ध साहित्यकार, लोककथाक नायक आदिक जीवन कें संक्षेप मे आंकबाक खूब
प्रयास मैथिली मे भेल अछि। कतेको विभूति कें केंद्र मे राखि नाटक एकांकी सेहो
लिखल गेल। एम्हर साहित्य अकादमी आ मैथिली अकादमीक प्रश्रय सं वर्णनात्मक
गद्यक ई संवर्ग आओरो बेसी पुष्ट भेल। आब तं व्यक्ति परक शोध प्रबंध मे सेहो,
ई परंपरा बेस जकां सुदृढ़ भए रहल अछि। संस्मरण, रिपोर्ताज आ रेखाचित्रा शुद्ध
रूप सं एखनहुं पत्रिके धरि सीमित अछि। एकदम सं हेबनि मे विकसित ई संवर्ग
अत्यंत कम समय मे आ बहुत कमे लिखएलाक पश्चात् अपन प्रतिमान स्थापित
कए चुकल अछि तथा खूब लोकप्रिय भेल। लोकप्रियताक ई सोपान, निश्चित रूप
सं एकर मौलिकता आ सृजन प्रतिभाक तीक्ष्णताक द्योतक थिक।

मैथिली साहित्यक विश्लेषण, परीक्षण पहिने मैथिलीएतरे विद्वान लोकनि प्रारंभ
कएलनि। मुदा विधिवत मैथिली मे आलोचना आदिक प्रारंभ कवीश्वर चन्दा झा
सं प्रारंभ होइत अछि जे अनेक विद्वानक लेखनी सं समृद्ध होइत रमानाथ झाक
समालोचना पद्धति मे नीक जकां माटि पकड़लक आ फेर आनन्द मिश्र, शिवशंकर
झा ‘कान्त’, रामानुग्रह झा, कुलानन्द मिश्र, मोहन भारद्वाज, रमानन्द झा ‘रमण’
प्रभृतिक लेखनी सं अनुप्राणित भेल। एहि अंतराल मे ई प्रक्रिया दुइ गोट आओर
दिशा सं सुपुष्ट भेल। एक दिशा थिक विश्वविद्यालय मे प्रारंभ शिक्षण-पद्धति आ
दोसर दिशा थिक पी-एच. डी. तथा डी. लिट्क उपाधि हेतु लिखित शोध-प्रबंध।
एहि दुनू अभिक्रिया सं सेहो मैथिली गद्यक अनुशीलन, अनुसंधान आलोचना आदि
कें यथेष्ट विकासक अवसर भेटलैक। मुदा तत्वाभिनिवेशन मैथिलीक आलोचना मे
कम भेल अछि। समालोचनाक आठो तत्व प्रतिभा, सहृदयता, अंतर्दृष्टि, निष्पक्षता,
सहानुभूति, ईमानदारी औचित्यबोध, अभ्यास आदि मे सं कोनो-ने-कोनो तत्वक
यत्किंचित उपेक्षा होइत रहल अछि आ से भेल प्रायः उपाधि हेतु लिखल आलोचना
मे। ओना साहित्यक इतिहास लेखन सेहो एहि संवर्ग कें बल देलक अछि।

16 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


वस्तुतः रचनाकार आ पाठकक बीच पुल बनएबाक क्रम मे, समालोचक, दुनू
वर्गक लेल अलग-अलग सेहो क्रियाशील रहैत छथि। एहि प्रक्रिया मे रचनाकारककृति समालोचकक परीक्षण कसौटी सं परिशोधित होइत अछि। स्वाभाविक रूप संकृतिक गुण आ दोष दुनूक अन्वेषण होइत अछि। मुदा, रचनाकार एकरा बर्दाश्त
नहि क’ पबैत छथि। समालोचक एहि कोपभाजन बनबाक प्रक्रिया सं बचए चाहैत
छथि। जखन कि अपेक्षा अछि रचनाकार सं सहनशीलताक आ समालोचक सं
निर्भीकताक। मैथिली मे ओना अधिकांश वस्तुवादिए समीक्षा भेल अछि, कलावादी
समीक्षा नहिएं जकां। मुदा, वस्तुवादी समीक्षा मे सेहो प्रारंभ मे सैद्धांतिक समीक्षा
होइत रहल अछि। मोहन भारद्वाज, कुलानन्द मिश्र, रमानन्द झा ‘रमण’, प्रभृति अपनसमीक्षा कें प्रवृत्तिमूलक बनौलनि अछि से धरि प्रशंसनीय। वास्तविक रूपें प्रवृत्तिगते
समीक्षा रचनाक संग उचित न्याय क’ पबैत अछि।

मैथिलीक तथ्यात्मक गद्यक विकास वस्तुतः एखनहुं मौलिक रूपें नहिएं जकां
प्रारंभ भेल अछि। मैथिलीक माध्यमे स्कूल मे पढ़ौनी प्रारंभ भेला सन्तां टेक्स्ट बुक
कमिटी पोथी सभक अनुवाद करौलक, तकर अतिरिक्त वेद-उपनिषद सभक अनुवाद
भेल आ भ’ रहल अछि। हं, इतिहासक कोटि मे परिगणित किछु पुस्तक अवश्य
आयल अछि, जाहि मे प्रमुख थिक म. परमेश्वर झाक ‘मिथिला तत्व-विमर्श’, ‘मैथिली
अकादमी सं प्रकाशित उपेन्द्र ठाकुरक ‘मिथिलाक इतिहास’ आदि।

मुदा मैथिली साहित्यक सर्वतोन्मुखी विकासक लेल मैथिली गद्यक सभ संवर्गक
समृद्धि आवश्यक अछि आ सभ दिशा मे एकर गद्य सभ तरहें युगीन राग, लय,
ताल सं चलि कए; विषय आ शिल्प दुनू स्तर पर अपन नूतनता आ मौलिकताक
स्थापना कए सकए तेहन प्रयास होएबाक चाही। मुदा पत्रा-पत्रिका आ पुस्तकक
प्रकाशन सुविधाक अभाव गद्यक विकासक प्रबल बाधक बनि आयल अछि।

गद्यक विकासक रूपरेखा / 17


आधुनिक मैथिली
साहित्य पर एक नजरि


कोनो साहित्यिक कृति, समकालीन जीवन-धाराक अनुकृति होइत अछि। सामान्य
जन जीवनक परिवेश आ मानसिकताक परिचय साहित्य दैत अछि। अइ परिचय
देबाक क्रम मे कोनहुं कलाकृतिक लेल ‘शिल्प’क उपादेयता प्रबल भ’ उठैत अछि।
विषय वस्तुक चयन तं सभ रचनाकार समकालीन समाजे सं करैत अछि, समाजक
समस्त प्राणी अपन परिवेशक घटनावली सं तं परिचित रहिते टा अछि, तखन अइ
स्थिति मे कोनो रचनाकारक रचना विशेष जं किनको नवीन लगैत छनि, तं मूल
कारण ओहि कथ्यक उपस्थापन शैली होइत अछि। शिल्प आ शैली एक टा एहेनकूंची होइत अछि, जाहि सं चमत्कृत भ’ क’ कोनो विषय प्रेक्षकक सोझां नवीनताक
संग उपस्थिापित होइत अछि। उदाहरण लेल राजकमल चैधरीक दू टा कथा ‘चन्नरदास’
आ ‘कीर्तनियां’ कें लेल जा सकैत अछि। एक्के विषय पर लिखल ई दू टा कथा
जं भिन्न लगैत अछि तं एकर मूल कारण शिल्पे थिक। असल मे परिवेशक समस्त
घटना, जे रचनाकारक मोन-प्राण कें उद्वेलित करैत अछि, रचनाकारक संवेदनशील
मानसिकता कें निश्ंिचत भ’ क’ बैस’ नंइ दैत अछि, से शिल्पेक संयोग सं अपन
प्रभावशाली स्वरूप ग्रहण करैत अछि। अइ अर्थ मे विषय सं शिल्पक संबंध अत्यंत
घनिष्ठ अछि।

डाॅ. नगेन्द्र शैली कें विशेष भाषिक संरचना मानैत छथि। असल मे शिल्प
कें शैलीक पर्याय नहि कहल जा सकैत अछि। मुदा किछु अर्थ मे शिल्प, कला,
रूप, शैली, रीति आदिक स्थिति आपस मे गड्डमड्ड रहैत अछि। अइ परिस्थितिक
सूक्ष्मता सं परिचित होइत कोनो भाषाक अध्ययन-परीक्षण एक टा खास अर्थ रखैत
अछि।

शिल्प आ शैलीक कारण कृतिक मौलिकता देखबा लेल मैथिलीक दू टा

18 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


महत्वपूर्ण कृति कवीश्वर चन्दा झा रचित ‘मिथिला भाषा रामायण’ आ महाकविलालदास रचित ‘रमेश्वर चरित रामायण’ कें देखल जयबाक चाही। कृतिक अइ
नवीनताक मूल कारण शिल्पे थिक। ई बात अन्यान्यो कैक टा रचनाक परीक्षण
मे सत्य होइत अछि।

मैथिली मे प्रेम, वर्षा, ग्रीष्म, भक्ति, विकृति आदि पर भिन्न-भिन्न रचनाकारक
भिन्न-भिन्न रचना अलग-अलग भाव-बोधक अछि, तं तकर मूल कारण शिल्प आ
शैलिए थिक।

विद्यापति सं ल’ क’ आइ धरिक मैथिली कविताक विकास क्रम मे कैक
टा महत्वपूर्ण मोड़ आयल। सभ मोड़ पर शिल्प आ शैली अपन सामथ्र्यवान स्वरूपक
संग ठाढ़ भेल। मुदा मैथिली आलोचना-साहित्यक नजरि अइ दिशा मे नइं उठल।
शिल्प एवं शैलीक संग विषय वस्तुक अंतरंगता देखबैत मैथिली कविताक सूक्ष्मतर
अध्ययन कतेक महत्वपूर्ण अछि, से गंभीरता सं नइं बूझल गेल। जूता मे खीर परसि
क’ खोआयब कतेक प्रभावकारी होयत, से के नइं जनैत अछि ? शिल्प आ शैलीक
इएह महत्व अछि।

शिल्प आ शैलीक अनुशीलन मे ध्यान रखबाक थिक, जे भाषा, शिल्प आ
रचना शैलीक वैज्ञानिक अध्ययन हो। सामान्यतया भाषाक चारि टा उपकरण मानल
गेल अछि वर्ण, शब्द, वाक्य आ अर्थ। अही आधार पर भाषा-विज्ञान, वाक्य-विज्ञान
आ अर्थ-विज्ञानक अध्ययन होइत अछि। मैथिली कविता आ आन विधाक परीक्षण
अइ कसौटी पर आवश्यक अछि। बिंब आ प्रतीकक अध्ययन सेहो शैलिएक अंतर्गत
अबैत अछि। पाठकक हृदय मे कविताक प्रवेश बिंब आ प्रतीकेक माध्यमे होइत
अछि आ एकरे सहायता सं कविता, पाठकक मनीषा कें उद्बुद्ध करैत अछि। तेंई बात सहज प्रमाणित अछि जे शिल्प आ शैलीक अनुशीलन, साहित्य-निष्पत्तिक
अनुशीलन होयत।

मैथिली साहित्य मे आधुनिकताक प्रवेशक पश्चात जतेक परिवत्र्तन आ प्रगति
आयल अछि, तकर जड़ि पकड़बा लेल तं ई आओर बेसी महत्वपूर्ण भ’ उठल अछि।
ओना आधुनिक समय मे अइ कलावादी अनुशीलन पर अंगुरी उठेनिहार लोकक
कमी नहि अछि, मुदा सत्य सत्य होइत अछि। साहित्य-समीक्षा करबा काल कछुआ
धर्म अपनौनाइ उचित नहि। आधुनिक मैथिली साहित्यक समीक्षा करैत काल इएहकलावादी समीक्षा कोनो दू टा रचनाकारक कृतिक भिन्नता स्पष्ट क’ सकैत अछि।
‘निर्दयी सासु’ आकि ‘कन्यादान’ आकि ‘पारो’, ‘नवतुरिआ’ आकि ‘मधुश्रावणी’
कोना क’ अलग- अलग रचना भ’ सकल, तकर स्पष्टता शिल्प आ शैलीक मदति
सं बेसी संभव अछि।

‘मैथिली मे आधुनिकता या आधुनिक मैथिली साहित्यक सूत्रापात पत्राकारिता
सं भेल अछि, जकर मुख्य भूमिका कवीश्वर चन्दा झा एवं जार्ज ग्रियर्सन तैयार

आधुनिक मैथिली साहित्य पर एक नजरि / 19

कयलनि। बंगलाक विद्वान महामहोपाध्याय हरप्रसाद शास्त्राी, पी. सी. बागची, सुनीति
कुमार चटर्जी, नगेन्द्र नाथ गुप्त, खगेन्द्रनाथ मित्रा, विमान बिहारी मजूमदार आदि
लोकनि आधुनिक मैथिलीक विकास मे अप्रतिम योगदान देलनि।’1

1. समकालीन साहित्य ओ समीक्षा/डाॅ. बेचन/पृ. 66

पत्राकारिताक विकास पर चर्चा करैत बेचन आगू कहैत छथि, ‘पत्राकारिताक
विकास 1905 ई. सं मैथिली मे भेल, जखन कि, ‘मैथिल-हित-साधन’ नामक पत्रिकाक
प्रकाशन श्री मधुसूदन झा (जयपुर) कयलनि। सन् 1906 ई. मे ‘मिथिलामोद’ आ
फेर ‘मिथिला मिहिर’क प्रकाशन आरंभ भेल।’1

पत्राकारिताक विकासक मादे बेचनक मत सत्य छनि। दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’
सेहो इएह गप कहैत छथि2। मुदा आधुनिक मैथिली साहित्यक सूत्रापातक प्रसंग
बेचनक मतक संशोधन कयल जा सकैत अछि।

मैथिली साहित्यक आधुनिकता कें दू रूप मे ताकल जा सकैत अछि पहिल
तं विषयगत आ दोसर शैलीगत। एहि दुनू दृष्टिकोण सं मैथिली साहित्य मे आधुनिकता
आ नवताक भावभूमि कवीश्वर चन्दा झा सं पूर्वहि मनबोधक साहित्यक मे नीक
जकां परिलक्षित होइत अछि।

महाकवि मनबोध सं पूर्व प्रबंधात्मक शैली मे मैथिली मे काव्य रचनाक परंपरा
नहि छल। मुक्तक काव्यक रचना होइतो छल, तकर विषय-वस्तु अधिकांशतः
राधा-कृष्णक प्रेम-विषयक छल अथवा भक्तिपरक छल। महाकवि मनबोध एहि परंपराकें तोड़ि क’ एक टा नव परंपराक स्थापना कयलनि आ ‘कृष्ण-जन्म’ महाकाव्यकरचना कयलनि। एहि कृति मे महाकवि अपन अद्भुत साहसक परिचय देलनि
अछि। शब्द प्रयोगक आधुनिकता, तत्सामयिक लोकोक्ति आ मुहावरा प्रयोगकउत्कृष्टता, ठेठ शब्द-प्रयोगक शैली, अलंकार योजनाक नवीनता, छंद-निबद्धताक
कौशल, विषयगत नूतनता सभ तरहक आधुनिकता आनि, मैथिली साहित्य मे एकटा नव शैलीक स्थापना कयलनि आ तकरहि बल पर मैथिली मे ई प्रवृत्ति बढ़ैत
गेल। फलस्वरूप प्रबंधात्मक शैली मे साहित्य-सृजनक एक टा परंपरा आबि गेल
आ मैथिली साहित्यक प्रबंधात्मक विधा जगजियार भेल, प्रतिष्ठित भेल, प्रचलित
भेल, प्रशंसित भेल। काव्य कहबाक, सर्जना करबाक शैली मे अधुनातन प्रयोगक
प्रक्रिया प्रारंभ भेल।

सिपाही विद्रोहक पश्चात लोक राष्ट्रव्यापी स्वतंत्राताक प्रति बेसी सचेष्ट भेल।
अंग्रेजी शिक्षाक प्रचार-प्रसार देखि लोक मातृभाषाक उत्थानक प्रति जागरूक भेल।
मैथिलियहु मे लोकक चेतना स्फुटित भेल। गद्य मे सेहो रचना प्रारंभ भेल। नव
शैलिएं साहित्य मे यथार्थ बातक उपस्थापना होअय लागल। तखन कोना नहि कहल
जाय, जे मैथिली साहित्य मे आधुनिकताक सूत्रापात भेल। आधुनिकता आयल, अवश्य

20 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


आयल, आ से आयल मनबोधक साहित्य सं; हं, ई बात फराक, जे कवीश्वर चन्दा
झाक साहित्य मे ई बेसी भकरार भेल। हिनकर साहित्य मे थोड़ेक आओरो शैल्पिक
नूतनता आयल।

1. ऐजन/पृ. 66-67
2. मै. साहित्यक इतिहास/डाॅ. दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’ पृ. 122

नूतनता विषय-वस्तु मे सेहो आयल। विषय-वस्तु मे जे सर्वप्रथम नवीनता
आयल, से थिक युगक यथातथ्य चित्राण।

अपन रचना मे अति साधारण, सर्वप्रचलित आ सर्वबोधगम्य शब्दक प्रयोगक
कारणें कवीश्वर चन्दा झा अत्यंत लोकप्रिय रचनाकार साबित भेलाह। सर्वविधि
शैलीगत नूतनताक उन्नायक हएबाक कारणें जे लोकप्रियता भेटल होइनि, मुदा प्राचीन
पाखंडी सभ सं उपेक्षो कम नहि भेटलनि।

कवीश्वर चन्दा झा कें इतिहासकार लोकनि युगसंधिक कवि कहलकनि अछि,
मुदा मूल रूप सं हम ई कह’ चाहैत छी, जे मैथिली साहित्य मे नवताक जाहि भाव
भूमिक निर्माण मनबोध कयलनि तकर सर्वतोन्मुखी विकास हिनकहि साहित्य मे
भेल। पद्य रचनाक अतिरिक्त आनहुं क्षेत्रा मे नव प्रयोगक प्रणेता इएह भेलाह।
विद्यापतिक गद्य-पद्य मिश्रित पोथीक मैथिली अनुवाद क’क’ मैथिली मे अनुवाद
साहित्य आ गद्य साहित्यक परंपरा इएह चलओलनि।

मैथिली साहित्य मे मनबोध आ चन्दा झाक पश्चात् पूर्ववर्ती रचनाकार सं
प्रेरणा-ग्रहण, वैज्ञानिक युगक प्रगति, देश-विदेशक साहित्य सं परिचय आ पत्रा-पत्रिकाक
प्रकाशनक मदति सं शिल्प-शैली मे अनेक प्रकारक नूतनता आयल। पहिने प्रेमपरक
अथवा भक्तिपरक मुक्तक गीत लिखल जाइत छल। मुदा प्रबंधकाव्य आ गद्य लेखनक
विविध स्वरूप जाहि तरहें मैथिली मे होअय लागल, से आधुनिकतेक प्रमाण छल।
एहि आधुनिकता कें पत्रा-पत्रिकाक प्रकाशनक प्रारंभ भेला सं तूल भेटलैक आ क्रमे-क्रमे
एहि साहित्यक सभ विधा मे शैलीक अधुनातन स्वरूपक स्थापना होअय लागल।

मैथिली मे प्रबंध काव्यक परंपराक प्रारंभ हम ‘कृष्णजन्म’ सं मानैत छी, सत्ते
ई मैथिलीक पहिल प्रबंध काव्य थिक। ओना ‘मैथिली साहित्यक इतिहास’ मे दुर्गानाथझा ‘श्रीश’ मनबोधक कृष्ण जन्म कें कथाकाव्यक बिना कोनो परिभाषा स्थिर कयने
कथाकाव्य कहि देने छथि। पुनः एही पोथी मे आगू एकरा मैथिलीक प्रथम महाकाव्य
मानैत छथि। कहि नहि हिनकर दुनू उक्ति मे सत्य कोन थिक। प्रबंधात्मक शैली
मे लिखल काव्य कें महाकाव्य आ खंडकाव्य दू कोटि मे बांटला पर खंडकाव्यक
रचनाक प्रारंभ इतिहासकार लोकनिक सूचनाक आधार पर 1909 ई. थिक।

मनबोधक ‘कृष्णजन्म’, चन्दा झाक ‘मिथिला भाषा रामायण’ आ लाल दासक
‘रमेश्वर-चरित-रामायण’ तीनू प्रबंधकाव्य बीसम शताब्दीक पहिल-दोसर दशक

आधुनिक मैथिली साहित्य पर एक नजरि / 21

अथवा ओहि सं पूर्वक थिक आ तीनूक रचनाकाल मैथिली प्रबंधकाव्यक शैशवावस्था
थिक। शैलीगत जे कोनो सामान्यो चमत्कार एहि तीनू मे भेटैत अछि, से अतुलित
कहल जायत। ई समय मैथिली-प्रबंध काव्यक उद्भवक समय थिक, तथापि एहि
मे शैल्पिक चमत्कार अपूर्व अछि। सहज शब्द, प्रचलित लोकोक्ति, प्रभावकारी
भाषा-शैली, मार्मिक उपस्थापन शैलीक प्राचुर्य एहि मे सर्वत्रा भेटैत अछि। प्रमाण-स्वरूप
किछु अंश उद्धृत अछि:

कतो एक दिवस बीति गेल, हरि पुनु हथगर गोरगर भेल।

से कोन ठाम जतए नहि जाथि, कय बेर अंगनहु सौं बहराथि।

द्वार उपर सौं धरि-धरि आनि, हरखथि हंसथि यशोदा रानी।

कय बेर आगि हाथ सौं छीनु, कय बेर पकलाह तकला बीनु।

(कृष्ण जन्म)
बालापनक चंचलता कें द्योतित करबाक शैली मे रचनाकारक कल्पनाशीलता अद्भुत
छटा आनि देने अछि।

अरे बाबा दावानल सदृश लंका जारैए

अधम्र्मी लंकेशे तनिक सभ पापे मरैए

पड़ा रे रे बाबू किछु न मन काबू परैए

बिना पानि लंकनृपति पटरानी मरैए।

(मिथिला भाषा रामायण)

लंका जरय अनाथ सन, बढ़ल ज्वाल आकाश

रवि सन कपि तहि बीच मे, शोभित प्रभा प्रकाश

अनल अनिल साहित्य सौं, लंका कै अनुमान

भरम कमल छन मे यथा त्रिपुरहि रूद्रक बान।

(लाल दास)
तीनू महाकाव्यक अवलोकन सं ई बात सोझां अबैत अछि, जे ई तीन रचनाकारलोकनि अपन-अपन कृति मे कथ्यक अपेक्षा शैली मे कनेको कम सफलता नहिप्राप्त कयलनि अछि। संपूर्ण कृति मे वर्ण, शब्द, वाक्य आ अर्थक अनुपम प्रयोग
सं लक्ष्यार्थ प्रतीत करएबाक सामथ्र्य, शैल्पिक चमत्कारक योग सं आयल अछि।

श्री विद्यानिवास मिश्रक शब्द मे ‘काव्य भाषा के रूप मे एक तीसरा स्तर
भी जुड़ जाता है। वह स्तर है लयबोध का। यह लयबोध श्रव्यगुण के रूप मे ध्वनि
व्यवस्था के द्वारा (कभी-कभी यतिभंग के द्वारा भी), कलाघात या सुराघात के द्वारा
तथा आंशिक भीतरी या बाहरी तुकों के द्वारा और उससे भी अधिक एक शब्द यापदबंध या प्रत्यय या एक प्रकार की संरचना की पुनरावृत्ति के द्वारा, उस पुनरावृत्ति
मे भंग के द्वारा भी सार्थकता का एक नया आयाम जोड़ देता है, किंतु इस तीसरे
आयाम को पकड़ने के लिए विश्लेषणीय सामग्री विपुलता मे उपलब्ध होनी चाहिए;

22 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


जैसे पूरी कविता, कहानी, उपन्यास या महाकाव्य।’1

एहि लय-बोध, ध्वनि व्यवस्था, पदबंध, पुनरावृत्ति इत्यादिक लेल रचनाकारकें यथेष्ट अवसर भेटलनि। कृतिक विपुल काया, कृतिकारक विपुल शब्द-ज्ञान,
कल्पनाशीलता, शैली चयनक चातुर्य आदिक योगदान सं आप्लावित भ’ क’ विशिष्ट

1. रीति विज्ञान/श्री विद्यानिवास मिश्र/पृ. 23
शैली मे अनुपम स्वरूपक संग उपस्थित भेल।

एहि तीनू कृतिक बाद मैथिली मे महाकाव्यक शृंखला प्रारंभ भेल। बद्रीनाथ
झाक ‘एकावली परिणय’, मुं. रघुनन्दन दासक ‘सुभद्राहरण’, तंत्रानाथ झाक ‘कीचकवध’ तथा ‘कृष्णचरित’, सीताराम झाक ‘अंबचरित’, जीवनाथ झाक ‘रावणवध’,
दीनानाथ पाठक ‘बंधु’क ‘चाणक्य’, श्री लक्ष्मण झाक ‘गंगा’ तथा ‘शांतिदूत’,
काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’क ‘राधा विरह’, वैद्यनाथ मल्लिक ‘विधु’क ‘सीतायन’, सुरेन्द्रझा ‘सुमन’क ‘दत्तवती’, बुद्धिधारी सिंह ‘रमाकर’क ‘स्मृति सहòी’, मार्कण्डेय प्रवासीक
‘अगस्त्यायिनी’, किरणजीक ‘पराशर’ प्रभृति महत्वपूर्ण महाकाव्य सभ थिक।

जेना कि महाकाव्यक नामे सं स्पष्ट अछि, प्रायः सभ महाकाव्यक आधारतत्व रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत, वेद अथवा संस्कृतक प्राचीन ग्रंथ सभ थिक।एहि सभ वस्तुक चित्राण प्रायः संस्कृत साहित्य मे पूर्वहि भ’ चुकल छल। मुदा तैयो,
विषयक पुनरावृत्ति पाठकक मनोमस्तिष्क कें उबिअएबाक अवसर नहि देलक आसभ कृति कें यथायोग्य प्रशंसा भेटलैक, तकर एक मात्रा कारण थिक वस्तु उपस्थापनक
शैली, अभिव्यंजनाक प्रविधि।

चरित्रा-चित्राण मे मनोविश्लेषण, प्रकृति-चित्राण मे मानवीकरण, अलंकार-योजना
मे पदलालित्य आदि सं विविध रचनाकार विविध शैलीक आश्रय लेलनि अछि।

सैरन्ध्रीक वेश मे द्रौपदीक आत्मसंस्कार कें द्योतित करैत आ चाणक्यक
आत्मचिंतन कें द्योतित करैत मनोविश्लेषणक किछु उदाहरण एना अछि

शार्दूली की कखनहुं पाबए त्रास

जंबूकक ? की ज्वलित अंगार

तृणचय सकय झांपि ? की चम्पकवास

भ्रमर तुच्छ कए सकए कतहु उपभोग ?

(कीचक वध)

रवि सम दीप्त अनल सम दाहक, पवि सम कठिन कठोर

कोनो गूढ़तम भावमगन चिंता सं आत्म-विभोर

अंग-अंग सं चूबए टपटप सुदृढ़ आत्मविश्वास

पाटलिपुत्राक जनपथ पर के घूमि रहल गत त्रास ?

(चाणक्य)

आधुनिक मैथिली साहित्य पर एक नजरि / 23

साहित्य शाब्दिककला थिक। कोनो रचना विशेष, भाषाक सीमा मे बन्हायल एकनिष्ठवस्तु थिक। कृति, भाषा कें आ शब्द कें, ने केवल अपन माध्यम बनबैत अछि,
अपितु ओ भाषाक अंतस्तल मे जन्म सेहो लैत अछि। सत्य तं ईहो थिक जे भाषाक
संबंध विचार सं अछि, चिंतन सं अछि भाषाक अभाव मे मनुष्य सोचब बंद क’
देत। रचनाक संदर्भ मे भाषाक प्रकृति एवं संरचरना कें स्पष्ट करबाक क्षमते ओकर
शैलीक स्वरूप होइत अछि।

महाकाव्यक रचनाक संदर्भ मे किंचित उदाहरण सं तत्काल ई कहि आगू
बढ़ल जयबाक चाही, जे मैथिली महाकाव्यक विषय-वस्तु पुरान रहितहु शैलीएककारणें प्रशंसित अछि आ कृति मे रोचकता, एकतानता आ आकर्षण आनि सकल
अछि। प्रबंध काव्यक दोसर उपविधा थिक खंडकाव्य। शास्त्राीय बंधनक कारणें सेहो
संभव अछि, जे मैथिली महाकाव्यक सूची नमहर नहि अछि मुदा खंडकाव्यक रचनाअपेक्षाकृत बेसी भेल अछि। मुदा, जे भेल अछि, ताहि मे अधिकांशक विषय-वस्तु
वैह धर्म-कथा, नीति कथा, उपाख्यान, महाभारत, पुराण आदिक आधार पर अछि।
1947 सं पूर्व खंडकाव्यक जे सूची अछि, ताहि मे इतिहासकार लोकनि छेदी झा
‘द्विजवर’क ‘कोइलीदूती’ कें सेहो खंडकाव्य मानि नेने छथि। मुदा एकरा खंडकाव्य
मानबा मे हमरा विरोध अछि। ओना जे हो, एत’ हमर अभीष्ट शैलीक चर्चा करब
अछि। तें एतबा कहब आवश्यक अछि, जे ‘कोइलीदूती’ संदेश-काव्य जकां लिखल
भारतवासीक परतंत्राताक मनश्चेतना थिक। शैली प्रशंसनीय अछि, श्लाघनीय अछि।

मैथिली खंडकाव्यक क्षेत्रा मे अभिनव भावधाराक स्थापना प्रारंभ भेल अछि श्री
उपेन्द्रनाथ झा ‘व्यास’क ‘संन्यासी’ सं। ‘संन्यासी’क पश्चात उल्लेखनीय खंडकाव्य
थिक केदारनाथ लाभक ‘लखिमा रानी’ तथा ‘भारती’, रमाकरक ‘शरशय्या’ आदि।‘संन्यासी’ खंडकाव्य अंगरेजी-शिल्पक आधार पर लिखल गेल अछि। ई कृति सर्गबद्ध
नहि अछि। पाश्चात्य शैली मे पंक्तिक गणनाक आधार पर एकर रचना भेल अछि।हमरा बुझने मनोरंजन झाक ‘इंटउघनी’ प्रायः एसगर एहन कृति थिक जे शास्त्रा
पुरानक परिपाटी सं अलग हटि क’ नूतन शिल्पक संग उपस्थित भेल।

आकर्षक आ प्रभावकारी शैली मे रचल आन खंडकाव्य सभ मे सं प्रमुख
अछि व्यासजीक ‘पतन’, अमरेन्द्र मिश्रक ‘एकलव्य’, लक्ष्मण झाक ‘उत्सर्ग’ आदि।

मुक्तक काव्य मे, उनैसम शताब्दीक प्रारंभ सं आइ धरि अनेक मोड़ उपस्थित
भेल अछि। छंद, अलंकार, पद, लय, ताल आदिक आधार पर विचित्रा-विचित्रा परिवर्तन
भेल। रस-बोध, भाव-बोधक अद्भुत स्वरूप उपस्थित भेल। मनबोध, चंदा झा आ
लालदासक साहित्य मे विषयगत, भाषागत क्रांति आयल तं आगू आबि क’ आओरो
नवीनताक आह्वान भेल।

सन् 1905 मे पत्राकारिता प्रारंभ भेल। लोक अपन मातृभाषाक प्रति जागरूक
भ’ चुकल छल। देश परतंत्राताक बोझ तर कुचा रहल छल। अंग्रेजक कुशासन सं

24 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


समस्त भारतीय नागरिक त्रास्त छल। ओकर भावनाक अभिव्यक्ति होयब आवश्यक
छल, मुदा अभिव्यक्त करबाक लेल खतराक पहाड़ सोझां ठाढ़ छल। कुशासकक
कुशासन नागरिकक मुंह कें सीबि देने छलैक। एहेन परिस्थिति मे रचनाकारक
दायित्व छलैक जे ओ नागरिक कें सही दिशा-निर्देश दैथि। साहित्य कोनहुं ऐतिहासिक
क्रांतिक अगुआ रहल अछि। साहित्य मे नागरिकक यथास्थितिक चित्राण आवश्यक
छलैक।

संपूर्ण समाज मे विक्षोभ आ कुंठाक वातावरण पसरि गेल छल। भाषा-शैली
वा शब्द-विन्यासक ढंग ततेक ने परिवर्तित भ’ गेल जे प्राच्य कविता बहुत पाछू
रहि गेल। अंग्रेजी मे जे कविता ‘लिरिक’ कहबैत छल, मैथिली मे एहि शैलीक
कविता नवीन गीतिकाव्य कहाब’ लागल। अर्थात् बंगला, हिन्दी आ अंग्रेजीक मिश्रित
प्रभाव तथा देश-देशांतरक संपर्कक कारणें मैथिली कविता पर अद्भुत प्रभाव पड़ल।
कविताक शैली मे मौलिक परिवर्तन लक्षित होअय लागल।

एहि सभ दृष्टिएं 1925 ई.क पश्चातक मैथिली कविताक शैलीगत विश्लेषण
कयने ई तथ्य सोझां अबैत अछि, जे प्रगीत-काव्यक स्वरूप मे चलल एक टा काव्यक
शैली बहुत बाद धरि नंगराइत-नंगराइत अबैत रहल ता बीचहि मे प्रगतिवाद, प्रयोगवाद
आ आधुनिक कविता आबि गेल।

ओना नवीन गीतिकाव्यक आत्माभिव्यक्ति मूलक तत्व चन्दा झाक रचना सं
उभर’ लागल छल। मुदा सन् 1925 अबैत-अबैत ई बेस भकरार भेल आ तकर
सर्वश्रेष्ठ उन्नायक मानल जाइत छथि भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’। भुवनक पश्चात कविता
कें आओरो नवीनोन्मुख करबाक श्रेय जाइत छनि वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्राी’क नामे।
यात्राी क काव्य धारा मे अद्भुत शैली, अभिनव प्रयोग भेल अछि। शैलीक भाषा
वैज्ञानिक विश्लेषणक आधार पर एहि मे ध्वनि विज्ञान, अर्थ विज्ञान, रूप विज्ञान,
वाक्य विज्ञान, बिंब-प्रतीक आदि सभ तरहें हिनकर कविताक शैली अभिनव अछि।भाषा शैलीक उत्तम प्रभावोत्पादकता आ शब्द योजनाक कोमलता आह्लादक अछि।
संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रियापद, कारक, वचन, लिंग आदिक वक्र प्रयोग सं उत्पन्न
चमत्कारक मार्मिक विश्लेषण हिनकर रचना मे देखाओल जा सकैत अछि। 1941
ई. क हिनकर कविताक पांति द्रष्टव्य अछि

तोहर मन दौड़ैत छह कोठाक दिश

पैघ-पैघ धनीक दिश दरबार दिश

गरीबक दिश ककर जाइत छइ नजरि

के तकइ अछि हमर नोरक धार दिश

(कविक स्वप्न)
सुमन, यात्राी, तंत्रानाथ, मधुप, प्रभृति रचनाकारक रचनाशीलता मे अनुपम शैलीक
छटा सं मैथिली कविता अनुप्राणित होइत रहल। यात्राीक ‘चित्रा’क प्रकाशन बाद

आधुनिक मैथिली साहित्य पर एक नजरि / 25

राजकमलक स्वरगंधा, किसुनक आत्मनेपद प्रकाशित भेल। राजकमल लय, गीत,
छंद, यति आदि सभ सं बेसी महत्व कविता मे शब्द कें देलनि, शिल्प कें देलनि


कविता आब नहि अछि नायिका भेद, नख शिख सिंगार

कविता नहि अछि रतिविपरीतक उनटल ग्रीवाहार

कविता थिक जनजीवनक अग्निप्राण जयघोष

गाएब, गाबिकए रिझाएब नहि थिक कविता (राजकमल)
एहि तरहें मैथिली कविता एकबाइगे शिखर पर पहुंचि गेल। अद्भुत रूप सं नवीनतम
परंपराक प्रारंभ गेल। कोनो तरहक ‘वाद’ अथवा आंदोलन सं मुक्त भ’ क’ नूतन
बिंब प्रतीक, वक्रोक्ति, वैचित्रय आदि सं कविताक नूतन स्वरूप बनल आ तकर
अनुयायी पर्याप्त संख्या मे भेल। हिनका संगें काव्य-सृजनक प्रक्रिया मे जुटल रहलाह
मायानन्द मिश्र, सोमदेव, रेणु, धूमकेतु, धीरेंद्र, रमानन्द रेणु, प्रभृति। आ हिनकर
पाछां एही शैली मे काव्य-संसारक बहाव चलल। रचनाकार अएलाह गंगेश गुंजन,
जीवकान्त, कीर्ति नारायण, महाप्रकाश, पूर्णेन्दु चैधरी, सुकान्त सोम, भीमनाथ झा,
महेन्द्र, उपेन्द्र दोषी, उदयचन्द्र झा ‘विनोद’, ललितेश मिश्र, रामलोचन ठाकुर, कुणाल,
अग्निपुष्प विभूति आनन्द, अशोक, तारानन्द वियोगी, केदार कानन, शिवशंकरश्रीनिवास, नारायणजी, हरेकृष्ण झा, नरेन्द्र, सारंग कुमार, रमेश, विद्यानन्द झा, प्रभृति।

मैथिली कविताक क्षेत्रा मे एहि तरहें आयल आधुनिकता मे शैली कें अत्यंत
गंभीरता सं लेल गेल। एक दिस कवि लोकनिक सूक्ष्म दृष्टि जं समाजक प्रत्येक
नागरिकक अतल मोन मे उठैत मनोभाव, वेदना, क्रांतिक बुलबुला कें देखबाक
लेल साकांक्ष भेलाह, तं दोसर दिस ओहि मनोभाव कें समाजक प्रत्येक नागरिकधरि पहुंचेबाक लेल उत्तम सं उत्तम, प्रभावकारी आ आकर्षक शैली मे ढारि देबा
मे सफल भ’ सकलाह। शैलीक कारणें ई कविता सभ अत्यंत नोछराह साबित भेल,
जे जनमानसक सूतल विद्रोही भावना कें नोछरि-नोछरि जगेबाक लेल अधिकाधिक
सफल भ’
सकल।

मैथिली साहित्य मे मौलिक कथालेखनक परंपरा प्रारंभ भेल अछि मूलरूप सं वर्तमान
शताब्दीक चारिम-पांचम दशक सं। एहि सं पूर्व मैथिली मे कथालेखनक नाम परसंस्कृतक कथा सभक अनुवादे चलैत छल। प्रो. हरिमोहन झाक ‘प्रणम्य देवता’क
प्रकाशन सं मैथिली कथा-साहित्यक ई अजोह टांग एकाएक समर्थ भ’ गेल आहिनकर भाषा शैली, वस्तु-उपस्थापनक शैली, कथ्य-चयनक प्रवृत्ति, कथा-लेखनक
शिल्प, एकाएक मैथिलीक कथा साहित्य मे आंदोलन आनि देलक। एहि समय
धरि पत्रा-पत्रिकाक प्रकाशन खूब होअय लागल छल। वैदेही पत्रिकाक प्रकाशन प्रारंभ

26 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


भेल। ओहि सं पूर्व ‘मिथिला मोद’, ‘मिथिला मिहिर’, ‘मैथिली प्रभाकर’, ‘मिथिला
मित्रा’, ‘मैथिल बंधु’, ‘विभूति’, ‘भारती’ आदि पत्रिका सभ छपैत छल। एहि समय
मे एतय कथा-लेखन अथवा कथा वाचनक जे परंपरा छल, से छल हास-परिहासक
रूप मे, कोनो प्रेम-प्रसंगक रूप मे उठाओल गेल बात कें सोझ-सपाट ढंगें कहि
देब। एहि कहि देबा मे कोनो कलात्मकता, कोनो गुणात्मकता देखायब आवश्यक
नहि छल। एहेन बात नहि छल, जे परिवेश मे कथ्यक अभाव छलैक। कारण, जे
जं अभाव रहितैक तं ओहि समय मे हरिमोहन झा कें कोना एहेन-एहेन आकर्षक
कथ्य भेटितनि ?

सन् 1935 सं पूर्वक कथाक मादे राजमोहन झाक कहब छनि, ‘ओहि समयक
कथा सुधारवादी होइत छल, जाहि मे कथानक वा चरित्रा-चित्राण दिस ध्यान देब
जरूरी नहि बूझल जाइत छल। दैव-संयोग आ आकस्मिक घटनाक संयोजन पर
कथा आधारित रहैत छल। कथाकार लोकनिक मुख्य ध्यान रहैत छलनि सामाजिक
कुरीति पर, जकर दुष्परिणाम देखा क’ नायकक प्रति सहानुभूति जगेबाक प्रयास
मे सायास करुण भ’ गेनाइ कथाक नियति भ’ जाइत छलैक।’1

मुदा हरिमोहन झाक ‘प्रणम्य देवता’क प्रकाशन 1945 ई. मे जखन भेल,
तं एहि सं मैथिली पाठकक सोझां ई बात स्पष्ट भ’ क’ आएल, जे चरित्रांकनक
कौशल, कथानकक मांसलता, कथ्यक नूतनता आ मौलिकता, उपस्थापन-शैलीक
सौंदर्य, ओकर कलात्मकता आदिक बड्ड बेसी महत्व अछि कथा लेखन मे। ‘प्रणम्य-देवता’
संग्रहक कथा सभ मे अनेरो, अवांछित, अनावश्यक करुणा उत्पन्न क’ क’ जबरदस्ती
पाठकक हृदय मे करुणा उत्पन्न करबाक प्रयास नहि कयल गेल अछि आ ने कोनो
उचित प्रसंगक झांपा-तोपी। समाजक प्रत्येक ओहि बिंदु पर हितकर आ अनुभवी
दृष्टि देल गेल अछि, जे समाजक कुरीति छल, असाध्य पीड़ा छल। आ कथ्यक
दृष्टिकोणें तथा उपस्थापन शैलीक दृष्टिकोणें हिनकर कथा संसार मे नूतनता आयल।
कथा कहबाक हिनकर शैली सरेस कागज सन नोछराह अवश्य साबित भेल, मुदा
जहिना सरेस सं काठ कें रगड़ि क’ चिक्कन आ मुलायम बनाओल जाइत अछि,
तहिना हिनकर उपस्थापन शैली सेहो रहल। मिथिलाक जीवन-प्रक्रिया, स्थापितसंस्कार, संस्कृति आ रहन-सहन मे अदौ सं जे जड़िआयल ग्रंथि सब छल, हरिमोहन
झा तकरा नोचि-नोचि क’ हटौलनि। कथा मे शैलीगत परिवर्तनक ई मौलिकताद’ क’ ओ एक टा उत्कृष्ट काज कयलनि, जकर फलस्वरूप मैथिली कथालेखन
मे सब तरहें परिवर्तन आबि गेल। पाश्चात्य आ आनोआन भारतीय भाषा सबहक
संगें एक्के अखड़हा पर उतरबा लेल मैथिली कथाक तेवर बन’ लागल। सुग्गा-मैना,
कौआ-नढ़ियाक बदला मे, राजकन्या आ ऋषिकन्याक बदला मे, किन्नर आ गन्धर्वक
बदला मे कथाक पात्रा आम आदमी होअय लागल।

सन् 1950 सं पूर्वक कथाकार मे सं प्रमुख छथि कांचीनाथ झा ‘किरण’,

आधुनिक मैथिली साहित्य पर एक नजरि / 27

मनमोहन झा, उमानाथ झा, उपेन्द्रनाथ झा ‘व्यास’, सुधांशु शेखर चैधरी प्रभृति।
वातावरणक विश्लेषण, पात्राक मनोविश्लेषण आ सहज भाषा शैली मे यथार्थ-निरूपण
हिनका लोकनिक कथाक मूल उद्देश्य रहल।

सन् 1950 क बाद तथा 1960 क पूर्वक कथाकार मे सं प्रमुख छथि मणिपद्म,
गोविन्द झा, चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’, राधाकृष्ण झा ‘बहेड़’, शैलेन्द्र मोहन झा, किसुन,
ललित, राजकमल, मायानन्द, सोमदेव, धीरेन्द्र, बलराम, धूमकेतु, लिली रे, हंसराज,
रमानंद रेणु, रामदेव प्रभृत्ति। एहि समयक प्रायः समस्त कथा एकदम अधुनातन
शैलीक

1. प्रणम्य देवता (कथा-संग्रह) क भूमिका/राज मोहन झा/पृ.-ग
संग आबि सकल।

एहि कथाकार लोकनिक कथाक विश्लेषण कयला पर ई बात सोझां आओत,
जे जत’ ब्रजकिशोर वर्मा ‘मणिपद्म’ अपन कथाक प्रभावोत्पादकता बढ़ेबाक उद्देश्य
सं तथा पात्रा एवं वातावरणक मौलिकता कें अक्षुण्ण रखबाक उदेश्य सं अधिकांशतः
निम्नवर्गीय भाषा, देहाती लोकोक्ति, ठेठ शब्दावलीक प्रयोग कयलनि अछि, ओतहि
शैलेन्द्र मोहन झाक भाषा-शैली निविष्ट आ पण्डिताम। मुदा तें कथाक प्राणतत्व
कें कोनो हानि नहि भ’ सकल। अन्य समस्त कथाकार लोकनि सभ सेहो हिनकहि
जकां यथार्थक धरातल सं कथाभूमिक चयन करब अपन ध्येय बुझलनि। बाह्यपक्ष
आ अंतर्पक्ष दूनूक निरूपण सहज, सरल आ स्वाभाविक ढंगें कयलनि अछि।
पात्रानुकूल भाषाक निबद्धता सं कथाक सौंदर्य मे अतीव वृद्धि भेल अछि। राजकमल,
ललित आ मायानन्द कनेक आगू बढ़ि क’ कथाक मूल तत्व, शैली कें प्रधानता
देलनि। हिनका लोकनिक कथा मे अंतर्मनक चित्राणक प्राधान्य रहल। बल्कि
राजकमल थोड़ेक आओर आगू आबि क’ समाजक आ सामाजिक प्राणीक अंतर्मन
कें चित्रित कयलनि, ओकर गुणावगुण, दोषादोष निरूपण सं अपन पाठक वृन्दक
नजरि खोललनि।

बीसम शताब्दीक सातम-आठम दशक मे उदित कथाकार सभ मे सं प्रभास
कुमार चैधरी, गंगेश गुंजन, धीरेन्द्र, जीवकान्त, राजमोहन झा, सुभाषचन्द्र यादव,
महाप्रकाश, सुकान्त सोम, ललितेश मिश्र प्रभृति किछु एहेन गरिमामय नाम अछि,
जे अपन पछिला पीढ़ी सं प्रेरणा, युगीन समाज सं अनुभव आ अपन प्रतिभा सं
कौशल जमा क’ क’ कथा लेखनक क्रम कें विकसित कयलनि, जे परवर्ती पीढ़ीक
कथाकार लोकनिक लेल प्रेरणापुंज बनि सकल। तत्पश्चात् एहि समयक कथाकार
लोकनि मे सं प्रमुख छथि महेन्द्र, उपेन्द्र दोषी, उदयचन्द्र झा ‘विनोद’, विभूति आनन्द,
केदार कानन, प्रदीप बिहारी, विनोद बिहारी लाल, तारानन्द वियोगी, शेफालिका वर्मा,
पूर्णेन्दु चैधरी, शिवशंकर श्रीनिवास, अशोक, शैलेन्द आनन्द, रमेश, प्रभृति।

28 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


कथाकारक एहि समूहक बाद जे कथाकार लोकनि अपन पहिचान बनौलनिओहि पीढ़ी कें कोनो अलग सं नाम देब, संख्या आ गुणवत्ता दुनू दृष्टिएं बहुत
आवश्यक नहि अछि। कथा विधा मैथिली साहित्यक सर्वाधिक विकसित विधा थिक,
से कथ्य आ शिल्प दुनू दृष्टिकोणें। परीक्षण-स्वरूप अनेक उदाहरण ताकल जा सकैत
अछि। शिल्पक विकासक परिणाम थिक एखनुक लघुकथा, जाहि मे किछु शब्द मात्रा
मे बहुत बात कहल जा रहल अछि अथवा कोनो कथा, जाहि मे बड़ी काल धरि,
बहुत ढंगें कनिए टा बात कहल जा रहल अछि अथवा विज्ञान कथा, जाहि मे साहित्य
मे विज्ञान द्वारा काल्हि होअय बला सूचना देल जा रहल अछि।

प्राचीन कालक अपेक्षा उपन्यासक विकास सेहो यथेष्ट भेल अछि। उपन्यासकार सभ
मे सं प्रारंभिक नाम अबैत अछि जनार्दन झा ‘जनसीदन’, जीवछ मिश्र, पुण्यानन्द
झा, भोल, कांझीनाथ झा ‘किरण’, हरिमोहन झा, लक्ष्मीपति सिंह, कुमार गंगानन्द
सिंह, हरिनन्दन ठाकुर सरोज, योगानन्द झा, ब्रजनन्दन प्रभृति लोकनि, जे मैथिली
मे मौलिक उपन्यास लेखनक परंपरा चलओलनि। ई बात स्पष्टतया कहल जा सकैत
अछि, जे ई लोकनि युगीन परिस्थिति मे जे देखलनि, तकरा शैलीगत आकर्षण आ
सौंदर्यक संग पाठकक सोझां प्रस्तुत कयलनि। मुदा, एहि मे सं दू टा नाम एहेन
अछि, जे सर्वथा, सभ तरहें मैथिली उपन्यास लेखन कें नव तरहें आगू बढ़ौलनि।
आ ओ नाम थिक किरण तथा हरिमोहन। आगू आबि क’ जे मैथिली उपन्यासक
कोष पुष्ट भेल तकर सर्वाधिक श्रेय एही दुनू उपन्यासकार कें देल जयतनि।
‘कन्यादान’ अपन शैलीक कारणें मैथिली पाठकक बीच प्रशस्त भेल आ पाठक मैथिली
उपन्यास दिस झुकलाह। तत्पश्चात् जतेक नमहर उपन्यासकारक समूह बनल, ताहि
मे अग्रगण्य छथि यात्राी, व्यास, शैलेन्द्र मोहन झा, अमर, मणिपद्म, ललित, राजकमल,
मायानन्द, सोमदेव, रेणु, धीरेन्द्र, सुधांशु शेखर चैधरी, गंगेश गुंजन, जीवकान्त, विभूति
आनन्द, प्रदीप बिहारी, नवीन चैधरी, उषाकिरण खान प्रभृति।

एहि समस्त उपन्यासकारक संपर्क विश्व साहित्य सं बनल आ तखन
शिल्प-शैलीक मौलिकताक संगें ई लोकनि उपन्यासक कायापलट कोन मनोरम ढंगें
कएने छथि तकर उदाहरण आंदोलन, आदिकथा, चानोदाय, बिहारि-पात-पाथर, दू-पत्रा,
दूध-फूल, भोरुकबा, दू कुहेसक बाट आदि उपन्यास मे ताकल जा सकैत अछि।

मनोविश्लेषण प्रधान, चरित्रा-प्रधान, घटना-प्रधान, वर्णन-प्रधान, पत्रात्मक,
आत्मकथात्मक आदि शैली उपन्यास विधा कें खूब प्रशस्ति देलक।

मैथिली साहित्य मे नाटकक उद्भवक òोत जं ताकल जायत, तं ई विधा
ज्योतिरीश्वरक ‘धूर्त समागम’ सं शुरुह मानल जाएत, तहिया नाटकक उद्देश्य प्रायः
हास्य रहैत छल। नाटक, साहित्यक सर्वसशक्त विधा थिक। मुदा ताहि समय सं
आधुनिक काल धरि पुनः अनेक नाट्य परंपरा आएल आ चल गेल। कीर्तनियां

आधुनिक मैथिली साहित्य पर एक नजरि / 29

नाटकक परंपरा सेहो चलल। नेवारी नाटक, अंकिया नाट आदि लिखल गेल, मंचित
भेल। मुदा बीसम शताब्दी मे आबि क’ जीवन झाक नाटक सभ, पुरना सभ नाटक
सं भिन्न जकां आयल। किंतु हिनकहु नाटक मे अधिकांशतः पद्ये मे बात कहल
जाइत रहल। संवाद वाचनक शैली मे जे नूतनता आयल, से मूलतः युगीन प्रभावक
कारणें। साज-सज्जाक यथेष्ट सुविधा, मंचनक सौविध्य, नौटंकीक विकास, सिनेमाक
प्रादुर्भाव, वैज्ञानिक साधनक सुविधा आदिक कारणें नाटकक भाषा-शैली, लेखन-प्रक्रिया,
कथ्य आदि मे परिवत्र्तन भेल। आम आदमीक जीवन पर नाटक लिखल जाय लागल।

एहि नूतनताक आगमन भेल ईशनाथ झा, गोविन्द झा, काशीनाथ मिश्र,
मणिपद्म, किरण प्रभृति नाटककार लोकनिक नाटक सं। मुदा महेन्द्र मलंगिया एकरा
सर्वथा नव स्वरूप देलनि एहि परंपराक विकास सं एक टा आओर नव परंपराक
जन्म भेल आ से थिक एकांकी नाटक। एकांकी लेखकक सूची मे प्रमुख छथि हरिमोहन
झा, सुधांशु शेखर चैधरी, आनन्द मिश्र, मणिपद्म, किरण, तंत्रानाथ झा, अमर, गोविन्द
झा, राजकमल, महेन्द्र मलंगिया प्रभृति। खाहे नाटक हो वा एकांकी, एतबा अवश्य
कहबाक थिक जे ई विधा बहुत थोड़ समय मे बड्ड बेसी ख्याति पओलक आ से
पओलक शैलिएक कारणें।

आलोचना साहित्य कोनहुं साहित्यक लेल बड्ड आवश्यक आ महत्त्वपूर्ण होइत
अछि, मुदा मैथिली साहित्य मे एहि विधाक दशा-दिशा बड्ड दयनीय अछि। एतेक
प्रगति प्राप्त कयलाक पश्चातहु मैथिली साहित्य मे प्रशंसा कें आलोचना आ आलोचना
कें निंदा बूझल जा रहल अछि। आलोचना विधा मैथिली साहित्य मे कोनहुं आनभाषा-साहित्य सं कम पुष्ट नहि अछि, मुदा गुणवत्ता आ आलोचकक निष्ठा कें ध्यान
मे राखि जखन एकर अवलोकन कयल जाय, तं लगैत अछि, जे मैथिली साहित्यक
आलोचना रचनापरक नहि, व्यक्तिपरक होइत अछि (अपवाद कें छोड़ि क’)।

मैथिली मे एखन धरि आलोचनाक चारि स्वरूप देखाइछ कोनो पोथीक भूमिका
लेखन, साहित्यक इतिहास लेखन, फुटकर निबंध लेखन आ कोनो रचना पर पाठकीय
प्रतिक्रिया अथवा समीक्षा। भूमिका लेखन कें ने प्रारंभ सं ल’ क’ आइ धरि मे प्रशंसेक
संज्ञा देल जायत, मुदा अन्य तीन मे इमानदारी पूर्वक बात कहल जएबाक चाही,
किंतु कहल नहि जाइत अछि। जे कहलनि, से अनावश्यक ओहि रचनाकार समेत
हुनकर समूहक कोपभाजन बनताह। एकरा मूल मे रचनाकारक असहिष्णुता अछि।
दोसर बात ई, जे अधिकांश आलोचना एखन एहनो अबैत अछि, जाहि मे पन्नाक-पन्ना
बात कहि देलाक बादहु कोनो बात साफ नहि होइत अछि। ओना भाषाक दष्टिएं
प्रारंभिक आलोचना सं एखनुक आलोचना विकसित भेल अछि। रचनाक परीक्षणक
शैली मे अभूतपूर्व परिवर्तन आयल अछि, मुदा तकर उपयोग कम ठाम होइत अछि।

किछु आन विधा, जेना रेखाचित्रा, जीवनी, रिपोर्ताज, ललित निबंध आदि एखन
ततेक विकसित नहि भेल अछि। मुदा जाहि कोनो विधाक जाहि तरहें प्रगति-प्रसार

30 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


भेल अछि, तकर शैलीक पुनर्पुनरावलोकन बड्ड आवश्यक अछि।


मैथिली कथायात्रा आ कथाकारक संधान

कथा कहबाक प्रथा हमरा लोकनिक ओतए ओतबे पुरान अछि, जतेक मानवक सभ्यता,
हमरा लोकनिक संस्कृति। ई प्रवृत्ति अदौ सं प्रगतिशील रहल अछि आ समय-समय
पर ई अपन आंतरिक गुण मे युग सापेक्ष परिवर्तन अनैत रहल अछि। भारतीय
साहित्य मे तं वैदिके काल सं कथाक मूल स्वरूप प्राप्त भ’ जाइत अछि। वेद उपनिषद
आदि मे अनेक आख्यान, उपाख्यान प्राप्त होइत अछि, पौराणिक साहित्य मे सेहो
कथाक सम्यक विकास परिलक्षित होइत अछि। कहबाक अभिप्राय ई, जे भारतीय
परंपरा मे कथा-साहित्य कोनो नव उद्भूत विधा नहि, अपितु एहि आख्यायिका अथवा
लोक गाथाक विकासक एकटा पैघ सन धाराक परिणाम थिक। मुदा लगले ईहो
कह’ पड़ैत अछि जे एखनुक कथा साहित्यक जे रूप, जे चाक्चिक्य अछि, से एहि
पौराणिक साहित्यक कथात्मकता अथवा लोक गाथात्मकताक अपेक्षा पाश्चात्य कहानी
सं विशेष संपर्कित बुझाइछ। ई संभव जे रूपक ई आधुनिकता अनेक वर्षक विकासक
परिणाम तथा देश-देशांतरक बढ़ैत निकटताक फल हो।

मूल रूपें मैथिली मे कथा साहित्यक आरंभ अनूदित कथा सं भेल अछि।
हरिमोहन झाक प्रसिद्ध कथा-संग्रह ‘प्रणम्यदेवता’क प्रकाशन वर्ष 1945 सं पूर्व
मैथिली-कथा साहित्यिक नाम पर अनूदित कथा-संग्रहक नाम जोड़ा कए संतोष करए
पड़ि रहल अछि। इतिहासकार लोकनि द्वारा गनाओल जं किछु मौलिक कथाक नाम
सोझां अबितो अछि तं ओहि पर इतिहासकार लोकनि अपने कथ्य पर अपनहि
ओझरा गेल छथि। एम्हर आबि कए ‘प्रणम्य देवता’ कथा संग्रहक पुनर्मुद्रण भेल
अछि। अइ मे राजमोहन झा द्वारा प्रकाशकीय मे देल गेल किछु सूचना सं बात
थोड़ेक फरिछाइत अछि। इतिहासकार लोकनिक कतोक पंक्ति तं एहेन भ्रमाह बुझाइत
छनि, जे कोनो अर्थ बहार करब असंभव। दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’ एकहि हाथें अपन
एकहि इतिहास मे एक ठाम किरणजीक ‘चन्द्रग्रहण’ कें उपन्यास लिखै छथि आ
दोसर ठाम एकरा दीर्घ कथा लिखै छथि। आब हिनकर कोन कथन कें प्रामाणिक

मैथिली कथायात्रा आ कथाकारक संधान / 31 32 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


मानी, से निर्णय करब कठिन।

राजमोहन झाक लिखल प्रकाशकीय सं ई सूचना भेटैत अछि जे ‘प्रणम्य देवता’
क पहिल संस्करण 1945 मे बहार भेल। एहि सं पूर्व मात्रा चारि गोट मौलिक कथा-
संग्रहक चर्चा अछि चन्द्रप्रभा (श्री कृष्ण ठाकुर), गप्प-सप्पक खरिहान (वैद्यनाथ
मिश्र ‘विद्यासिन्धु’), कामिनीक जीवन (कालीकुमार दास) तथा बीछल फूल (श्री
प्रबोध नारायण चैधरी)। एहि चारू कथा-संग्रहक, अलावे हमरा लोकनि अनूदिते
कथा- संग्रहक नाम गना सकैत छी, जाहि मे अबैत अछि चन्दा झा द्वारा ‘पुरुष-परीक्षा’क
अनुवाद, मुरलीधर झा द्वारा मित्रालाभ आ हितोपदेशक अनुवाद। म. म. परमेश्वर
झा द्वारा ‘सीमन्तिनी आख्यान’क अनुवाद आदि।

एहि चारू मौलिक कथा- संग्रहक मादे इतिहासकार लोकनि एक सं एक
वजनी पंक्ति देलनि। केओ ‘विद्या-सिन्धु’ कें पाश्चात्य रीतिक प्रथम गल्पकार मानलनितं केओ कलात्मक सौष्ठव देखलनि, मुदा असली गप्प ई अछि जे ‘चन्द्रप्रभा’ संस्कृतक
मित्रालाभ-हितोपदेश जकां उपदेशात्मक ढंगें लिखल छोट-छोट लोककथाक संग्रह थिक
आ ‘गप्प-सप्पक खरिहान’ नामानुकूल हास्य-लघु कथाक संग्रह थिक। ‘कामिनीक
जीवन’ बिना कोनो कलात्मकताक कोनो प्रेम-प्रसंगक सपाट वर्णन थिक। एहि सभ
सं कनेक आगू प्रबोध नारायण चैधरीक कथा- संग्रह ‘बीछल फूल’ अवश्य अछि,
मुदा कथानक आ शिल्पक दृष्टिएं बहुत प्रभावशाली नहि। तैयो मैथिली कथा-साहित्य
मे जें कि मौलिक लेखन इएह लोकनि प्रारंभ कयलनि तें हिनका लोकनिक नाम
कथा-साहित्यक इतिहास मे श्रद्धापर्वूक लेल जाएत। आ, अही चारू संग्रहक पश्चात
मैथिली कथा-साहित्य पर छाड़ल कुहेस कें एकबाइगे फाड़ि देलक हरिमोहन झाक
‘प्रणम्य देवता’। ओ ‘विकट पाहुन’ कथाक भावभूमि कें समाजक एकदम लगीच
जा कए उठौलनि आ तकरा ततेक मनोरम ढंगें सजौलनि अछि जे सामान्यो पाठकक
लेल ई अतीव सुखदायी अछि। हरिमोहन झाक नाम मैथिली साहित्य मे अग्रगण्य
एही टा लेल नहि छनि, जे ओ मैथिली मे बहुत रास लिखि कए साहित्य कें समृद्ध
कएलनि, बल्कि विशेष एहि लेल छनि जे ई मैथिली साहित्यक लेल एकटा विशाल
पाठक वर्ग तैयार कएलनि। भाषाक सरलता, अभिव्यक्तिक सुस्पष्टता, विषयक
व्यापकता, कथ्यक नूतनता, शिल्पक आकर्षण इत्यादि सभ दृष्टिकोणें हिनकर साहित्य
विशेष रूपें चर्चित रहल। की उपन्यास, की कथा...सभ मे हिनकर योगदान विशेषमहत्त्वक अछि। जहिना उपन्यास मे ‘कन्यादान’ कें पढ़बाक लेल मैथिली भाषा सं
इतर वर्गक लोक सेहो मैथिली पढ़ब सिखलनि, अनपढ़ लोक पढ़बा कए सुनलनि,
कथाक क्षेत्रा मे तहिना ‘प्रणम्य देवता’क स्थिति रहल। मैथिली कथा-साहित्यक कथ्य,
शिल्प, कथानक इत्यादि अनभिव्यक्तिक जाहि विशाल चट्टान तर दाबल छल, तकरा
एकहि बेर मे ज्वालामुखी सदृश फाड़िकए प्रणम्य देवता बाहर आएल आ परवर्ती
साहित्यकार-पाठक लोकनि मे कथा लिखबा-पढ़बाक अभिरुचि जगौलक आ सफलो

मैथिली कथायात्रा आ कथाकारक संधान / 33

भेल ! सफलताक इएह प्रतिफल थिक जे आइ कथा साहित्य एहेन समृद्ध अछि
आ ‘प्रणम्य देवता’ संग्रहक कैक संस्करण बहराएल। ‘प्रणम्य देवता’क अतरिक्तहिनक आओर कथा संग्रह सब अछि जे विशेष महत्त्वक वस्तु मे गनले टा
जाइछ रंगशाला, चर्चरी, तीर्थयात्रा, एकादशी इत्यादि। ओना हिनकर सुप्रसिद्ध
हास्य-व्यंग्यात्मक निबंध संग्रह ‘खट्टर ककाक तरंग’ कथा तत्वक अभावक अछइतो
भाषाक सरलता आ आनो बहुत रास गुणक कारणें कथा - संग्रह मे गनल जाए
लागल।

सन् 1889 (चन्दा झा द्वारा अनूदित ‘पुरुष-परीक्षा’क अनुवाद) सं ल’ कए
1930 धरि अनूदित कथा-साहित्य अबाध गतिएं चलैत रहल। ताही संग- संग मौलिक
कथालेखनक एकटा भावभूमि 1940 धरि, अर्थात् प्रबोध नारायण चैधरीक ‘बीछल
फूल’ धरि रहल। तें एकर बादक समय कें अर्थात् 1941 सं आइ धरिक समय
कें छओ दशक मे बांटल जा सकैत अछि। जें हेतुएं 1950 सं पूर्व धरि मौलिक
कथा लेखन बड़ा विरल गतिएं भेल, तें 1950 सं पूर्वक कथा पर एक किस्त मे
विचार कएल जा सकैत अछि। सन् 1947 मे देश स्वतंत्रा भेल। मुदा स्वतंत्राताप्राप्ति सं जे असंतोष, आक्रोश, समाजक कुरीति, सत्ताक कुव्यवस्था पाओल गेल,
से सभटा छठम दशक मे व्यक्त होअए लागल।

जं संग्रहक बात कें गौण राखि, पत्रा-पत्रिका मे प्रकाशित कथा सभ सं बात
उठाओल जाए तं मैथिलीक मौलिक कथा लेखन प्रायः तेसरे दशक सं प्रारंभ भेल
मानल जाएत। एहि समयक कथा मे कुमार गंगानन्द सिंहक ‘मनुष्यक मोल’, भुवनेश्वर
सिंह ‘भुवन’क ‘शून्य’ आ ‘रौद छाया’, जलेश्वर सिंहक ‘भगवतीक पाश्चात्य रूप’,
भीमेश्वर सिंहक ‘विसर्जन’ वा ‘साओनक राति’ इत्यादि अबैत अछि। हिनका
लोकनिक अतिरिक्त अइ संग्रह विहीन कालावधि, अर्थात् 1950 सं पूर्वक समयकमहत्त्वपूर्ण कथाकार सभ छथि हरिमोहन झा, लक्ष्मीपति सिंह, कांचीनाथ झा ‘किरण’,
प्रबोध नारायण चैधरी, तंत्रानाथ झा, मनमोहन झा, उपेन्द्रनाथ झा ‘व्यास’, योगानन्द
झा, सुधांशु शेखर चैधरी, सुरेन्द्र झा ‘सुमन’ प्रभृति।

हरिमोहन झाक कथालेखनक प्रारंभ मैथिली साहित्यक ओहि संक्रमण काल
मे भेल, जखन मैथिली साहित्य कें पाठकक अभाव छलैक। पांचम दशक धरिक
प्रकाशित पत्रा-पत्रिका, जं एक दिश एकटा बेस पैघ लेखक वर्ग तैयार कएलक तं
हरिमोहन झा दोसर दिश एकटा पैघ पाठक वर्ग तैयार कएलनि आ एतहि सं पुनः
अबाध गतिएं संग्रहक लेखन-प्रकाशन होअए लागल। जतए गंगापति सिंह, लक्ष्मीपतिसिंह, हरिनन्दन ठाकुर ‘सरोज’, ‘किरण’, कुलानन्द ‘नन्दन’, परमानन्द दत्त ‘परमार्थी’,
कालीकुमार दास, नंदकिशोर लाल, जयनारायण मल्लिक, प्रभृति कथाकार लोकनिककथा शृंगार ओ करुणरस सं परिपूर्ण रहैत छल, ओतए हरिमोहन झाक कथा हास्य-रसक
डबडबाएल रसगुल्लाक संग उपस्थित भेल, मुदा एहि हास्यक भीतरी तह मे व्यंग्यक

34 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


ततेक मेंही आ मार्मिक चित्राण रहैत छल, जे एकर उद्देश्य मात्रा मनोरंजने टा नहि,
एहि समाजक प्रत्येक अनुचित व्यवहार आ अतार्किक अभिक्रिया दिश सामान्य
पाठकक ध्यान आकर्षित करब सेहो रहल।

पांचम दशक धरिक परिगणित कथाकार लोकनि मे जतेक नाम गनाओल
जाइत अछि ताहि मे श्री बैद्यनाथ मिश्र ‘यात्राी’क नाम विलक्षणतापूर्वक लेबाक थिक।
अपन समसामयिकताक दृष्टिएं ई अति प्रगतिशील रहलाह। ग्राम्य जीवनक चित्रा
ई ततेक स्पष्ट आ सहज शब्द सं घीचैत छथि जे सामान्य पाठक सब तरहें हिनकर
कथ्य कें बूझि लेबा लेल उताहुल रहैत छथि आ बुझिए कें विश्राम लैत छथि।
अति सुबोध-सहज ठेंठ शब्दक प्रयोग, सामान्य जन-जीवनक सुच्चा अभिव्यक्ति,
छोट-छोट घटना पर सूक्ष्म चिंतनक संग कथा लेखन, कथ्यक अनुरूप भाषा-शैली,
सहजता, स्वाभाविकता, सरलता इत्यादि हिनकर लेखनीक मुख्य प्रवृत्ति थिकनि।
यद्यपि हिनकर कथाक संख्या अंगुरिए पर गन’ जोग अछि।

कथा-साहित्य मे मनमोहन झाक नाम श्रद्धापूर्वक लेल जाइत छनि। ओना
कथा तं ई अनगिनत लिखलनि मुदा सभ सं मुख्य रूपें ई ‘अश्रुकण’क संग चर्चित
होइत छथि। कथा मे नारी हृदयक गहनतापूर्वक चित्राण करबाक अपूर्व कौशल उपस्थितकएने छथि। करुणा हिनकर कथाक मूल प्रवृत्ति थिकनि। कथाकार योगानन्द झाककथा रोमांचक आ शृंगारिक गुण सं ओत-प्रोत रहैत छनि। ‘आमक जलखरी’ हिनकर
चर्चित कथा मे सं अबैत अछि, तहिना मैथिल समाजक विविध अंगक सजीव ओ
संवेदनशील चित्रा उपस्थित करबा मे उपेन्द्रनाथ झा ‘व्यास’ पहिने तं ‘रूसल जमाय’
सं चर्चित भेलाह, मुदा पछाति कतोक नीक-नीक कथा लिखलनि।

रामदहिन मिश्र लिखै छथि (काव्य दर्पण/पृ. 258) जे कथाक प्रधान उद्देश्य
होइत अछि मनोरंजन, मुदा जं से बात रहितै तं किरणक ‘मधुरमनि’ पढ़ि कए आतात्कालिक मनोरंजन प्राप्त क’ कए बिसरि जएबाक प्रवृत्ति बला मनुक्ख जाति
बिसरि गेल रहितए ओहि कथा कें। मनोरंजन तं होइते छैक, एकर अलावे आओरोबहुत रास महत्त्वपूर्ण उद्देश्य होइत छैक कथाक, जे ओकरा शाश्वतता प्रदान करैत
छैक। इएह शाश्वतता अछि मधुरमनि मे। एहि पांचम दशकक अंत अबैत-अबैत
सुधांशु शेखर चैधरी, विकल, विशारद, भ्रमर प्रभृति कथाकार प्रतिष्ठित भ’ गेल छलाह।अपन विविध कथाक माध्यमे ई लोकनि आत्मसंघर्षक चित्राणकत्र्ताक रूप मे मानदंड
बनौलनि।

एहि पैघ अंतराल कें एकहि ठाम समेटैत आब कथा-यात्राक दोसर डेग प्रारंभ
होइत अछि 1951 सं। एहि छठम दशक मे ओना कथाकार सूची बड्ड पैघ नहिबनल मुदा अपेक्षाकृत संख्या बढ़ल। संख्याक संगहि कथाकारक नजरि खुजलनि।
कथाक फलक बढ़ल। वस्तुक व्यापकता देखल गेल। स्वतंत्राता प्राप्तिक बाद लोकक
जे इच्छा, आकांक्षा छलैक तकर पूर्तिक कोनो टा बाट प्रशस्त नहि भेल, समाज सं

मैथिली कथायात्रा आ कथाकारक संधान / 35

मानवताक गुण सभ विलीन होइत देखल गेल। फलस्वरूप युगीन समस्या सं अकच्छभ’ कए ठाढ़ भेलाह शैलेन्द्र मोहन झा, रामकृष्ण झा ‘किसुन’, प्रबोध नारायण सिंह,
रमाकान्त झा, गोविन्द झा, ललित, राजकमल, मायानन्द, सोमदेव, हंसराज, रामदेव
झा, बलराम, धीरेन्द्र प्रभृति।

एहि दशकक कथाकार लोकनिक कथा लेखन मे किछु प्रवृत्तिगत अंतर पाओलगेल। किछु लोकनिक प्रवृत्ति रहल कथातत्व कें अक्षुण्ण रखैत, चरित्रा-चित्राणक
सूक्ष्मताक संग उचित वातावरणक निर्माण कए सामाजिक युगीन समस्या सभ कें
रसात्मक उत्कर्ष देब, जेना गोविन्द झाक ‘भुतही पाकड़ि’, मणिपद्मक ‘संयोग’
रमाकान्त झाक ‘रक्तदान’, शैलेन्द्र मोहन झाक ‘प्रारब्ध’ इत्यादि। किछु लोकनिकप्रवृत्ति रहल सामाजिक यथार्थ कें सहज एवं पात्रानुकूल भाषा मे चरित्राक मनोविश्लेषण
करैत उद्घाटित करब। एहि वर्गक कथाकार लोकनि मे अबै छथि सोमदेव (अúा),
बलराम (मोटरी), रामदेव झा (एक खीरा: तीन फांक), हंसराज (छिद्र), कल्पना शरण
(रंगीन पर्दा) प्रभृति। मुदा अहू सं किछु आगू बढ़ि कए युगीन क्लिष्टता मे जिबैत
मनुक्खक अतल मोनक दुःख दर्द कें बूझि कए, छोट सन कथ्य पर शिल्पक माध्यमे
विशाल सं विशाल कथा बुननिहार मे जाहि तीन गोट नाम कें मुख्य रूप सं गनल
जाइछ, तकरा लोक ‘त्रिपुंड’ कहि कए अभिहित कएलनि ललित, राजकमल,
मायानन्द। हिनका लोकनिक लेल कथाक हेतु मूल चीज शिल्प रहल। जीवन-जगत
कें अतीव गंभीरता पूर्वक ई लोकनि देखलनि एवं मैथिली कथाधारा कें जे दिशा
देलनि, तकरे फल थिक जे मैथिलीक कथा साहित्य नवम दशक मे आबि कए
एतेक फर्रोस भेल। ललितक ‘रमजानी’, ‘ओभर लोड’, ‘मुक्ति’, राजकमलक ‘सांझक
गाछ’, ‘ललका पाग’, ‘पनडुब्बी’ तथा मायानन्दक ‘गाड़ीक पहिया’, ‘हंसीक बजट’
इत्यादि कथा सभक चर्चा दृष्टांत स्वरूप कएल जा सकैछ। मैथिली कथाधारा कें
एहि त्रिपुंड सं जे भेटलैक से मैथिली कथा साहित्य कहिओ नहि बिसरि पाओत।

एहि दशकक बाद प्रारंभ होइत अछि सातम दशक। सातम दशक मे आबि
कए मैथिली कथा साहित्य बेसी पुष्ट भेल। लेखन क्षिप्र गतिएं होअए लागल, पछिलो
दशकक कथाकारक संग- संग नवोदित कथाकारक कथा लेखन चलैत रहल। एहि
दशकक कथा लेखन मे सामाजिक कुव्यवस्था, असमानता, शोषण, सीदन इत्यादिक
चित्राण बेसी प्रखर होअ’ लागल। एहि मे अबै छथि गंगेश गुंजन, प्रभास कुमार
चैधरी, रमानन्द रेणु, जीवकान्त, उदयचन्द्र झा ‘विनोद’ प्रभृति कथाकार लोकनि
जे लगातार अबाध गतिएं कथा लिखैत रहलाह आ समाजक नग्न सत्य टीपैत सामान्य
लोकक दृष्टि मे रहलाह। बाद मे अही पीढ़ी सं मैथिली साहित्य मे राजनीतिक
चिंतापरक लेखन पुष्ट हएब प्रारंभ भेल। ओना राजनीतिक बिंदुक प्रवेश मायानन्दक
लेखन मे भ’ चुकल छल। रमानन्द रेणुक (एक टघार नोर), जीवकान्तक ‘हाहि’
गंगेश गुंजनक ‘अभिनय’, साकेतानन्दक ‘जिनगीक कांट’, प्रभास कुमार चैधरीक

36 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


‘आएल पानि गेल पानि’, राजमोहन झाक ‘युद्ध-युद्ध-युद्ध’ सुभाष चन्द्र यादवक
‘काठक बनल लोक’, महाप्रकाशक ‘जोड़-घटाव-गुणा-भाग’ इत्यादि युगीन समस्याक,
सामान्य जन-जीवनक दुःख-दर्दक वाहक बनल।

आठम दशक मे कथा, कथा-संग्रह आ कथाकारक संख्या बेस पुष्ट भेल, सेउत्कृष्ट साहित्य आ साहित्यकार सं, दृष्टिपूर्ण प्रतिभा सं। एहि दशकक कथाकार
मे ओना कथाकरक सूची तं पैघ अछि, मुदा मूल रूप सं गनल जाइत छथि विनोद
बिहारी लाल , विभूति आनन्द, पूर्णेन्दु चैधरी, शिवशंकर श्रीनिवास, अशोक, तारानन्द
वियोगी, केदार कानन, प्रदीप बिहारी, प्रभृति लोकनि। वैज्ञानिक युगक प्रादुर्भाव
सं देश-विदेशक संपर्कक कारणें साहित्यिक चेतना बढ़ल आ उध्र्वमुखी यथार्थक प्रतिरचनाकारक आग्रह बढ़ल। साहित्यिक आदान-प्रदान सं साहित्यिक प्रवृत्ति पर प्रभाव
पड़ब स्वाभाविक छल। पाश्चात्य धारा सं हमरा लोकनिक साहित्य प्रभावित होअ’
लागल। कथा मे घटनाक प्रधानताक बदला शिल्पक प्रधानता भ’ गेल। कथा
देश-देशांतरक मारि-लड़ाइ, प्रक्षेपास्त्रा, लौहमानव, चन्द्रतलक भ्रमण, सूर्य-पृथ्वीक
आपसी संबंधक गप्प कहए लागल, बेकारी-बेगारी, भूख, दुःख, अभाव, व्यभिचार,
शोषण-सीदनक गप्प सुनब’ लागल। शोषित कें ओकर तागतक बोध करबैत ललकारा
देब’ लागल आ शोषकक पतनक बात कहए लागल। अल्पवेतन भोगी परिवारक
विविध समस्या कें उद्घाटित करए लागल, मानवीय इच्छा आकांक्षाक दमित वासना
कें उद्घाटित करए लागल आ एहि समस्त अभिव्यक्तिकक संग आएल तारानन्द
वियोगीक ‘पिआस’, ‘बिसरभोर’, केदार काननक ‘नाटक’, ‘तामस’, ‘आतंक’, प्रदीप
बिहारीक ‘एकटा रोगियाह जिनगी’, विनोद बिहारी लालक ‘जिनगी’, विभूति आनन्दक
‘खापड़ि महंक धान’ इत्यादि।

रौद मे रहला सं कोनो रंगीन वस्त्रा उदास भ’ जाइत अछि, रंग उड़िकए पूर्ण
रूपें उज्जर नहि होइत अछि, तहिना मनुक्खो कें अपन-अपन संस्कारक प्रति किछु
विवशता रहैत छैक। किछु गोटे प्रभावित होइतो छथि, किछु नहिओं होइत छथि।आठम-सातम दशकक प्रायः सभ कथाकार पर अपेक्षाकृत युगक प्रभाव बेसी पड़ल
आ ओही प्रभावक अंतर्गत लेखनो भेल। जीवकान्तक कथा ‘गौर’ विशुद्ध रूप सं
प्रतीकात्मक थिक। ओना प्रतीक मूल रूपें कविताक वस्तु होइत अछि, कथा मे पाठक
कें सपाट ढंगक गप्प भेटबाक चाही, मुदा प्रतीकात्मक रहला सं ओकर सोद्देश्यता
भंग नहि हो, कथ्यक अभिव्यक्ति भ’ जाए आ प्रभावोत्पादकता मे कतहु व्यतिक्रम
नहि आबए तं ओ, कथाक विशिष्ट गुण भेल। कथा शीर्षक ‘गौर’ एहि कसौटी
पर सोलहो आना सुच्चा उतड़ैत अछि। अदौ सं बान्हल गौर जखन बथान पर सं
खुजि कए जंगली मवेशीक हेंज मे चल जाइछ तं ओकरा चीन्हब आ चीन्हि कए
ल’ आनब ओतबे कठिन अछि जतेक एखनुक जनवादी समूह मे सर्वहाराक ढुकि
गेला पर ओकरा निकालि आनब। दोसर अर्थ मे हमरा लोकनिक हेराएल मानवता,

मैथिली कथायात्रा आ कथाकारक संधान / 37

मानवीय मूल्य इएह गौर थिक जकर खोज मे हमरा लोकनि बौआइत छी, ताकि
नहि पबैत छी।

तारानन्द वियोगीक कथा ‘उद्दीपन’ एक दिश सामंतवादीक शोषण प्रवृत्ति आसर्वहाराक सीदन सहबाक प्रवृत्ति देखबैत अछि तं दोसर दिश सर्वहारा वर्ग मे दू
पीढ़ीक संघर्ष मे नूतन पीढ़ीक विजय देखबैत अछि। तहिना कथा शीर्षक ‘कंस-वध’
समाजक एकदम अछूत वस्तु कें उठाकए चलल अछि।

एहि सभ पीढ़ीक कथा-कथाकारक चर्चाक पश्चात एतबा कहब अपेक्षित जेबीसम शताब्दीक पहिल चरणक उत्तरार्द्ध अथवा दोसर चरणक पूर्वार्द्ध सं उद्भूत
मौलिक मैथिली कथा लेखन, छठमे दशक धरि मे जतेक प्रगति केलक ताहि तुलना
मे ओकर अगिला लेखनक प्रगति न्यून बुझाइछ। ई बात भिन्न जे एखन मैथिली
साहित्यक सभ सं बेसी सफल विधा कथे साहित्य भ’ गेल अछि, मुदा तें ई कहब
उचित नहि जे ई विधा अपन यथेष्ट विकास क’ चुकल अछि।

पांचम दशक मे मौलिक कथालेखन नीक जकां अपन प्लेटफार्म तैयार नहि
कएने छल, हरिमोहन पाठक वर्ग तैयार कर’ मे लागले छलाह कि छठम दशक मे
‘त्रिपुंड’क कथा मे मानवक अंतर्मनक व्यथा, शिल्पक प्राधान्य आब’ लागल। मुदातकरा बाद कतोक समय बीति रहल अछि, किंतु प्रगति अपेक्षाकृत कम अछि।
आब’क कथा मे मानसिक संघर्ष, संवेगात्मक अथवा बौद्धिक कुतूहल इत्यादिक प्रति
आग्रह तथा राजा-रानी वाला कथा परंपराक प्रति उदासीनता रहबाक चाही। कथाक
जे धारा एखन चलि रहल अछि ताहि मे एखन छोट-सं-छोट कथ्य पर नीक सं
नीक कथा लिखल जा सकैछ। आब’क कथा घटना प्रधान नहि रहि शिल्प प्रधान
भ’ गेल अछि, तें आब एहि विधा सं बेसी-सं-बेसी प्रगतिक आशा कएल जा सकैए।

38 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्




समकालीन मैथिली कथा


जेना कि एजरा पाउंडक कथन छनि । ळतमंज ंहम व िसपजमतंजनतम पे चमतींचे ंसूंले
ं हतमंज ंहम व िजतंदेसंजपवद ;डंा.सपज.छमूए च्ंहमकृ101ए 125द्ध

अर्थात् कोनो साहित्यक महान युग, ओहि मे अनुवाद-युग होइत अछि।
मैथिलीक कथा-साहित्य, एकर अपवाद नहि थिक। प्रारंभ मे मैथिलीक कथा-साहित्य
पौराणिक कथा सभक भावानुवादे छल। तें एकर इतिहास बड़ पुराण नहि अछि।

मैथिली मे कहबा-सुनबाक प्राक्रिया मे पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोक, कथा सिखैत रहल,
समय-परिवेशक अनुसार कहबाक क्षमता मे किछु जुटैत गेल, किछु कटैत गेल।
कथावाचक प्रायः निरक्षरे होइत छल, लिखबाक क्षमता ओकरा नहि रहैत छलैक।
फलस्वरूप अधिकांश कथा खिसक्करक संगहि चल गेल आ हमरा लोकनिक कथा
साहित्य, एहू कारणें पाछां क’ विकसित भेल।

हमरा लोकनि कथा-लेखनक मौलिकता अनुवादे सं सिखलहुं। संस्कृत-साहित्यककथा-उपकथा सं अनुवाद भेल। संस्कृत-साहित्य मे एहि कथा सभक उद्देश्य
उपदेशात्मक रहैत छल। धर्मशास्त्राक नीति वाक्य सं पाठक अथवा श्रोता कें अविचलित
रखबाक लेल मनोरंजनात्मक सेहो रहैत छल।

मुदा, एखन हमरा लोकनि कथाक जे स्वरूप देखैत छी, तकरा ने केवल पौराणिकसाहित्यक देन कहल जायत आ ने विदेशी साहित्यक प्रभाव। कथा-साहित्यक वत्र्तमान
स्वरूपक श्रेय चारि टा òोत कें जाइत अछि संस्कृत साहित्य, फारसी साहित्य,
लोक साहित्य आ पाश्चात्य साहित्य। संस्कृत साहित्य सं प्राप्त सामग्री हमर पुरानसंस्कृति आ समकालीन सामाजिक परिस्थितिक झांकी प्रस्तुत करैत अछि। धार्मिक
आ लौकिक होइतो एहि मे उद्देश्यगत एकता आ जीवनक प्रति एकटा संतुलित
दृष्टिकोण भेटैत अछि। फारसी-साहित्य दार्शनिकता-प्रधान हेबाक कारणें विशिष्ट
रूपक दृष्टिकोण प्रदान कयलक। मध्यकालीन भारतक संपदाक रूप मे शौर्यपूर्ण
आ रोमानी कथासूत्रा हमरा लोकनि कें लोक साहित्य सं प्राप्त भेल। मुदा, एहि तीनू

समकालीन मैथिली कथा / 39

òोत सं उपलब्ध कथाक वण्र्य-विषय पुरान छल। तें आधुनिक भारतक आवश्यकताआ भावनाक अनुकूल कथा नहि बनि पबैत छल। एहि मे मिथिलाक वत्र्तमान
रीति-कुरीति, ईष्र्या-द्वेष, मान-अपमान, वर्ग-संघर्ष, शोषण, अनाचार इत्यादिक चित्राण
भेटब दुर्लभ छल। फलतः कथा मे जन-जीवनक ई चित्राण पाश्चात्य साहित्य सं
आयल।

साहित्य मे दू तरहक मूल्य होइत अछि वत्र्तमान मूल्य आ शाश्वत मूल्य।
वत्र्तमान मूल्य भेल वर्तमान समय मे व्याप्त मानव-जीवन सं ओहि साहित्यक तादात्म्य
आ शाश्वत मूल्य भेल चिरकालक बाद ओहि साहित्यक चित्राण-वर्णनक उपयोगिता।
साहित्यक वर्तमाने मूल्य ओकर समकालीनताक द्योतक थिक। ‘समकालीनता’ शब्दविशेष रूपें विचारणीय अछि। जे साहित्य समकालीन नहि होएत अर्थात् जकर वत्र्तमान
मूल्य उपेक्षणीय हैत, ओ शाश्वत मूल्यक वस्तु कहिओ नहि भ’ सकैत अछि। साहित्य
मे समकालीनताक अर्थ भेल तत्कालीन समाजक, आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक
परिस्थितिक चित्रांकनक संग सामाजिक जीवनक यथार्थ कें अंकित करब। युगपरिवत्र्तनक संग-संग मानव जीवनक स्थिति-परिस्थिति, मनुष्यक सभ्यता-संस्कृतिमे परिष्कार होइत अछि, किछु परिवत्र्तन होइत अछि तें जीवन-प्रक्रिया कें अथवारहन सहन कें अथवा सभ्यता-संस्कृति कें मनुष्य बिसरि नहि जाइत अछि, ओ थाती
कोनो ने कोनो रूप मे, किछु ने किछु अंश मे सुरक्षित रहैत अछि। अतएव, ईबात सर्वथा मान्य थिक जे समकालीन साहित्य शाश्वत-मूल्यक दृष्टिकोणें सेहो उत्तमहोइत अछि। आ तें, साहित्यक उत्कृष्टताक हेतु ई आवश्यक अछि, जे ओ समकालीन
होअय।

मैथिली कथा-साहित्यक समकालीनता पर विचार करबा सं पूर्व एकटा समस्या
आगां अबैत अछि, प्रकाशनक समस्या। एहि समस्याक कारण एहि बातक पूर्ण
संभावना रहैत अछि, जे कोनो कथाकारक आजुक अनुभूति, आजुक कथ्य, आजुक
शिल्प जं संयोग लागय, तं बीस-बाइस बर्खक बाद हमरा लोकनिक सोझां आबय।

साहित्यकार अत्यंत भावुक आ संवेदनशील प्राणी होइत अछि। ओ जाहि परिवेश
मे जीबैत अछि, ओकर कटुमधु अनुभव ओकरा नीक जकां प्रभावित करैत छैक।
समाज मे विद्यमान एक-एकटा उचित अभिक्रिया ओकरा अंतस् कें सुख दैत छैक
आ एक-एकटा अनुचित, अवैध, अवांछित अभिक्रिया, अनाचार-अत्याचार, शोषकीय
प्रवृत्ति इत्यादि ओकर मोन-प्राण कें व्यथित करैत छैक। रचनाकारक ई संवेदनशीलता
ओकरा भीतर मे एकटा अद्भुत प्रक्रिया प्रारंभ क’ दैत छैक। अव्यवस्था आ विसंगतिक
ई प्रत्यक्ष दर्शन रचनाकारक मोन मे ओहि घटनाक एकटा भोक्ताक जन्म दैत अछि
जे ओहि घटना कें भोगैत अछि अर्थात् ओहि भोक्ता सं रचनाकार अंतरंगता स्थापित
करैत अछि आ तखन एहि यथार्थ-भोगक पश्चात् एहि घटनाक परिस्थिति-परिवेश-
उद्देश्य-परिणाम इत्यादि पर विचार केलाक बाद अनुभूतिक नाङट स्वरूप तैयार करैत

40 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


अछि। पुनः भाषा शिल्पक साज-शृंगारक संग पाठकक आगां प्रस्तुत करैत अछि।
‘की कही’ से जतेक आवश्यक अछि, ताहि सं बेसी आवश्यक ‘कोना कही’ से
अछि। यैह ‘कोना कही’ थिक शिल्प। कथाक समकालीन स्वरूप मे ‘शिल्प’ विशेष
रूपें चर्चित अछि।

विरासत मे संस्कृत सं प्राप्त संस्कार, वैज्ञानिक युगक देन सं बढ़ैत देश-विदेशकसभ्यता-संस्कृतिक संपर्क, आ विदेशी साहित्यक प्रभाव मैथिली कथाक वर्तमान स्वरूप
कें प्राप्त भेल छैक।

मैथिली कथा-साहित्यक सभ सं ऐतिहासिक उत्थानक समय थिक स्वतंत्राता
प्राप्तिक आस-पासक पांच बर्खक समय। एहि समय मे समाजक विविध वर्गक
लोक लेखनी उठौलनि आ से संकीर्णता सं निरपेक्ष रहि क’। एहि समयक रचनाकार
कोनो जातिवादी, वर्गवादी, संप्रदायवादी विचार, रूढ़िग्रस्तता आदि सं मुक्त छलाह।
हिनका लोकनिक दृष्टिफलक विशाल छलनि। फलस्वरूप समाजक विविध क्रिया-प्रक्रिया
कें कथा लेखनक विषय बनाओल जाए लागल आ साहित्य, सामान्य जन-जीवन
सं जुटि सकल।

कथा सन छोट रचना मे, चरित्रा-चित्राणक बेसी सुविधा नहि रहैत अछि।कथोपकथनो कें बेसी नमरयबाक शौकर्यक अभावे रहैत अछि। मुदा कथाक प्राणतत्त्व
कथानक, घटना चक्रक आधार पर आ वर्णन कौशलक आधार पर बढ़ैत अछि, कथ्यक
विस्तार आ स्पष्टीकरण एही सं होइत अछि। एहि घटनाचक्र कें वर्णित करबाक
लेल परिस्थितिविशेष, परिवेशविशेष, स्थान-काल-पात्राविशेष केर खास-खास तथ्य कें
चित्रित करए पड़ैत छैक। एहि चित्राण मे यथासंभव चरित्रा-चित्राण, कथापेकथन,
परिस्थितिक चित्राणक सौष्ठव झलकि उठैत अछि। मुदा, एम्हर आबि क’ कथाकदुइए टा तत्त्व प्रमुख होअए लागल अछि कथ्य आ शिल्प।

कथा लेखन मे अद्यावधि तीन तरहक मौलिक परिवत्र्तन आयल अछि कथ्यगत,
शिल्पगत आ भाषागत। ई तीनू परिवत्र्तन हमरा समाजक बदलैत सभ्यता-संस्कृति,
बढ़ैत रीति-कुरीति, विकसित ज्ञान-प्रतिभा आ देश-देशांतरक मित्राता इत्यादिकअवदान थिक। जेना-जेना समय ससरैत गेल, कथा-लेखनक तेवर मे परिवत्र्तन आयल
गेल। आ आब एहि निष्कर्ष पर पहुंचल छी, जे कथा साहित्य मैथिलीए नहि अपितु
सभ भाषाक सर्वप्रसिद्ध सर्वप्रशंसित विधा थिक। मैथिली कथा-विधा आन सभ विधा
कें अत्यंत पाछू छोड़ि विश्व-साहित्यक दौड़ मे जुटल अछि, मुदा एम्हर आबि क’
मैथिली मे किछु गोटे थोड़ेक स’ख सं कथा लिखब प्रारंभ कयलनि। साहित्य लेखन
एकटा पैघ साधना थिक आ तें स’ख सं कथा लिखनिहार कथाकार एहि साधना
मे नहि थम्हताह। जेना गदहा नाल नहि ठोकबाओत। एहन कथाकारक रचना,
सभ दृष्टिएं उपेक्षणीय अछि। भत्र्सनोक दृष्टिएं एहन रचनाक चर्चा नहि होयबाक
चाही।

समकालीन मैथिली कथा / 41

कथा लिखब बहुत पैघ जोखिम उठायब थिक। आन कोनो विधा मे कनेक
हुसि जायब क्षमा करबा योग्य होइतो अछि, मुदा कथा-लेखनक प्रारंभ आ अंत होयबा
पर किछु मत एना अछि कहानी वह ध्रुपद की तान है जिसमें गायक महफिल
शुरू होते ही अपनी संपूर्ण प्रतिभा दिखा देता है, एक क्षण में चित्रा को इतने माधुर्य
से परिपूरित कर देता है, जितना रात भर गाना सुनने से भी नहीं हो सकता
(प्रेमचन्द्र/साहित्य का उद्देश्य पृ.-44)। राजकमलक एकटा निबन्ध मे चेखवक
उद्धरण अछि उत्तम कोटिक कथा अपन समाप्तिए स्थल सं प्रारंभ होइत अछि
(मिथिला मिहिर, 6 जून 1965 पृ.-20)। राजकमल स्वयं कहैत छथि ‘कथा समाप्तिए,
कथाक अंतरात्माक प्रतीक होइत अछि, कथाक विषय नहि (पृ.-21)। एहि निबंधक
संपादक संपादकीय टिप्पणी मे कहैत छथि ‘कथाक समाप्ति किछु एहने सन स्थल
पर क’ देल जाए जाहि सं पाठक कें नीक जकां बौआय पड़ि जाइक, तं से भेल
एकर शिल्प, मुदा कोनो शिल्प विशेषक कारणें यदि पाठक समाप्तिक अर्थ कें अनर्थक
रूप मे ग्रहण करए तं से भेल कथाकारक दौर्बल्य (पृ.-31)।’

आब प्रश्न उठैत अछि जे कथाक मध्य भाग केहन होयबाक चाही ? युगीन
मानसिकताक हिसाब सं, कथाकार कें कथाक बुनावटि, भाषा, वाक्य-विन्यास,
चरित्रांकन, कथा-शिल्प, कथ्य, शब्द-प्रयोग इत्यादि सभ पर एतेक अनुशासन रखबाक
चाही, जे कथा, अपन उद्देश्य सं तिल भरि विचलित नहि होअय। कथा समकालीन
समाजक आर्थिक-राजनीतिक-सामाजिक चित्रावलि होअ’ लागल अछि, वर्ग-संघर्ष,
दैन्य, विवशता शोषण, अभाव इत्यादि कें भोगैत विशाल जन समुदायक दर्दगाथा
होअए लागल अछि। समाजक एहन परिवेश मे जीबैत मनुष्यक मस्तिष्क एहि समस्त
मनोविकार सं भरल रहैत छैक, तखन दुःख पर ई दुःख लोक किएक भोगत ? ज्वर
सं पीड़ित मनुष्य अपन तिक्त मुंह कें कुनैनक गोली सं आरो तिक्त कोना करत ?
एहि तिक्तताक निवारण हेतु एहि गोली पर मनोरंजकताक मिठास लेपल रहैत अछि।
ई मनोरंजकता पाठक कें कथाक आद्योपांत पारायण धरि एकाग्र कएने रहैत अछि,
बन्हने रहैत अछि। फलस्वरूप अंत मे पाठक कथाक मौलिक उद्देश्य धरि पहुंचि
पबैत छथि। प्रारंभ मे मनोरंजकते मैथिली कथाक मुख्य ध्येय छल, जेना सुधांशु
शेखर चैधरी सेहो स्वीकारैत छथि (संदर्भ पृ. 70)।

कथाकार लेल अप्पन जीवन-दर्शन; परिपक्व अनुभूति, सफल, निर्धोख, कटु
आ यथार्थ परिस्थितिक अभिव्यक्तिक साहसिकता; प्रखर प्रतिभा, आकर्षक भाषा-
शैली इत्यादि बड्ड आवश्यक शर्त अछि। प्रारंभे सं हमरा समाज मे पूंजी-प्रथा, छूआ-छूति,
बहु-विवाह, बाल-वृद्ध विवाह, कुत्सित यौनाचार पसरल छल। एतद्रिक्त, स्वतंत्राता
प्राप्तिक पश्चात् थोड़ेक आर दुर्गुण हमरा समाज कें सनेसक रूप मे प्राप्त भेलैक।
सुविधा सन चीज प्रशासनिक मुट्ठी मे गनल-गूथल लोक लेल बंद भ’ गेल। मौलिक
अधिकार, कहबाक लेल बनल, मुदा ओ संविधान किछु खास लोकक चीज भ’गेल।

42 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


गाम, समाज, देश सभ खंड-खंड मे विविध स्तर सं बंटि गेल। कार्यालय मे अराजकता,
चोरी, बैमानी, घुसखोरी बढ़ि गेल। नेता-अफसर-पत्राकार-शिक्षक समस्त बुद्धिजीवीअपना कत्र्तव्य सं विमुख भ’ गेल। समाज दुर्गुणक खजाना भ’ गेल। मुदा एहू परिस्थिति
मे पूर्वक कथाकार लोकनि समाजक रूढ़ि ग्रस्त कट्टरता आ अव्यवस्था आ अनाचार
इत्यादि सं टक्कर लेब वाजिब नहि बुझलनि। एहि परिस्थिति मे समाजक दैनिक
जीवनक बाह्य आ आंतरिक यथार्थ कें चिन्हलनि हरिमोहन झा, मणिपद्म, किरण,
व्यास, मनमोहन झा, सुधांशु शेखर चैधरी, लक्ष्मीपति सिंह, गोविन्द झा, शैलेन्द्रमोहन
झा, किसुन, प्रबोध नारायण सिंह, ललित, राजकमल, मायानन्द, सोमदेव, हंसराज,
कल्पना शरण (लिली रे), रामदेव, धीरेन्द्र, रमानन्द रेणु, प्रभृति।

एहि रचनाकार मे सं किछु केर ध्येय रहलनि कथाक कथातत्त्व कें अक्षुण्णरखैत चारित्रिक वैशिष्ट्य कें उत्कर्ष देब, तं केछु केर रहलनि आत्मसंघर्षक ऊहापोहआ मानस विश्लेषणक फेरा मे कथा तत्त्व कें गौण क’ देब। एकर अलावे एहि
समय मे थोड़ेक आर कथाकारक नाम गनाओल जा सकैत छल, मुदा ओहि मे अधिकांश
नाम, रहि नहि सकल। एहि समय मे मैथिली मे कतोक पत्रिकाक प्रकाशन सेहो
होब’ लागल आ ई प्रकाशन कथाकारक एकटा समूह बनयबा मे बेसी समर्थ साबित
भेल।

युगीन संदर्भ मे गामक उच्चवर्गीय, अर्थसंपन्न परिवारक संभ्रांत नागरिक द्वाराअर्थविपन्नक शोषण, ओकर अभाव सं लाभ लेबाक प्रवृत्ति, निम्नवर्गीय लोकक स्त्राीक
संग व्यभिचार...आदिक चित्राण बेसी आवश्यक छल।

समकालीन समाजक एहि आंतरिक पक्ष कें चिन्हलनि ललित, राजकमल,
मायानन्द, सोमदेव, कल्पना शरण। मुदा अभिव्यक्तिक जोखिम उठयबा मे राजकमल
सभ कें पाछू छोड़ि, बढ़ि गेलाह। प्रायः हिनकर समस्त कथा-साहित्य मे अंतर्मुखी
विचारधारा प्रगाढ़ होइते गेल। आ एतए आबि क’ राजकमल, मैथिली-कथा-साहित्यक
एकटा युग जीति गेलाह, जे मैथिली-कथा मे अपूर्व नूतनता अनलनि। देश-देशांतरक
साहित्य सं संपर्क छलनि, दुर्द्धर्ष प्रतिभाशाली, दुर्दांत पढ़ाकू छलाहे। विश्व-साहित्यक
परिप्रेक्ष्य मे अधुनातन प्रयोगक जानकारी छलनि। हिनकर कथा साहित्य मे मूल
स्थान शिल्प प्राप्त कयलक। हिनकर कहब छलनि जे असल वस्तु कथा मे शिल्पे
होइत अछि, कथ्य तं सभक एक्के होइत छैक, शिल्पेक नवीनता लेखकक निजत्व
होइत अछि (स्मृति संध्या, पृ. 153)। लेखकक लेल ओ ईहो शर्त राखैत छथि जे
हुनका मे एतबा प्रतिभा, क्षमता रहबाक चाही, जाहि सं ओ साधारण सं साधारण
पाठक कें अपन कथावस्तु, अपन मन्तव्य, अपन शिल्प-प्रयोग आ अपन आंतरिक
उद्देश्य सं स्पष्ट भावें परिचित करा सकय (मि. मि.; 6 जून, 65 पृ.-20)। अपन
शिल्प-प्रयोग आ अपन उद्देश्य सं राजकमल सामान्यो पाठक कें परिचित करयबा
मे सफल भेलाह अछि आ शिल्पक नवीनता एक्के कथ्य कें कोना भिन्न करैत अछि,

समकालीन मैथिली कथा / 43

तकर दृष्टांत स्वरूप ‘कीरतनियां’ आ ‘चन्नरदास’ एवं ‘आवागमन’ आ ‘एकटा
चंपाकली एकटा विषधर’ कथा देखल जा सकैत अछि।

पाछू आबि क’ ललित-राजकमल-मायान्दक नाम सं मैथली कथा-धारा मे
त्रिपुंडक प्रचलन भेल। मुदा राजकमलक कथा-प्रक्रिया परवर्ती कथाकार लोकनिक
लेल विशेष रूप सं अनुकरणीय भेल ! प्रायः एहन देखल गेल अछि, जे सभ रचनाकार
अपन पूर्ववर्ती रचनाकार सं प्रेरणा ल’ क’, प्रभाव ग्रहण क’ क’ डेग आगू ससारैत
छथि, मुदा, मैथिली कथा कें आइ सं तैंतीस बर्ख पूर्व राजकमल जतए छोड़ि कए
गेलाह, ततए धरि एखनो किछुए कथाकार पहुंचि सकलाह अछि।

निम्नवर्गीय जन-जीवन पहिने मैथिली साहित्य लेखनक विषय नहि होइत
छल। एहि परंपरा कें प्रायः शुरुह कयलनि कांचीनाथ झा ‘किरण’। मणिपद्म केर
कथा लेखनक तं विषये यैह वर्ग रहलनि। फेर ललित आ बाद मे एहि पर रमानन्द
रेणुक लेखनीक चमत्कार देखल जाए लागल। निम्नवर्गीय परिवेश कें भोगैत जनताक
आत्माभिव्यक्ति, चरित्रांकन, ओकर दैन्य, ओकर विवशता हिनका साहित्य मे आएल।ओना, कथा मे मनोरंजकता अथवा उत्कृष्टता अनबाक लोभें एम्हर कतोक कथाकार
लोकनि, देखा-देखी निम्नवर्गीय आंचलिक बोलीक समावेश करए लगलाह। मुदा,
एहि वर्गक बोली पर साधनाक अभाव रहलाक कारणें ओ कथाक दोष बनि कए
रहि गेल।

कथा-विधा मे जे नूतनता राजकमल अनलनि, तकर आन जे कोनो कारण
रहल हो, मुदा परिवेशगत आवश्यकता ई अवश्य छल। कथा लिखबाक क्रम मे अत्यंत
छोटो सन घटना क्रम कें चित्रित करबा काल, पात्राक पूर्वकथा, ओकर परिवेश, ओकरचरित्रा, ओकर मानसिकता, ओकर प्रवृत्ति, ओकर गुण, ओकर अवगुण, ओकर
सामाजिक मानदण्ड, ओकरा पर परिवेशक प्रभाव इत्यादिक वर्णन हैब आवश्यक
भ’ गेल अछि। एहि वर्णनक क्रम मे आब प्रत्येक प्राणीक एक-एक क्षणक घटना
कथाक निर्माण क’ सकैत अछि। युगीन विसंगित मे जीबैत मनुष्यक जीवन एतेक
क्लिष्ट आ वैविध्यपूर्ण अछि जे मनुष्य एक-एकटा सांस कथा-लेखनक प्लाॅट पर
घिचैत अछि। एहि परिस्थिति कें पकड़लनि गंगेश गुंजन, प्रभास कुमार चैधरी,
धूमकेतु, राजमोहन झा, जीवकान्त, महाप्रकाश, गंगेश गुंजन, सुभाषचन्द्र यादव, सुकान्त
सोम, उषाकिरण खान, पूर्णेन्दु चैधरी प्रभृति।

वत्र्तमान शताब्दीक आठम दशक मे हमरा समाज मे किछु नव समस्या अपन
प्राबल्य पर आएल। बेरोजगारी-बेकारी आ एकरा संगे महगी। एहि सं पुनः अनेक
अराजकता उत्पन्न भेल। मानवक अवमूल्यन भेल। अभाव बढ़ल। शोषण-बढ़ल।
अभावग्रस्त युवापीढ़ी तनावग्रस्त अवस्था मे जीब’ लागल। एम्हर आबि क’ किछु
नव बात ईहो भेल जे, शोषित समुदायक बीच युवावर्ग कें थोड़ेक आत्मचेतना,
अस्तित्त्वबोध भेलनि। एहि समस्त सामाजिक क्रिया-अभिक्रिया, स्थिति-परिस्थिति

44 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


कें एहि कालक प्रतिभाशाली कथाकार लोकनि चिन्हलनि। उदय चन्द्र झा ‘विनोद’,
विनोद बिहारी लाल, विभूति आनन्द, नवीन चैधरी, प्रदीप बिहारी, तारानन्द वियोगी,
केदार कानन, शैलेन्द्र आनन्द प्रभृत्ति कथाकार लोकनिक युगबोध, आत्म-परीक्षण
चेतनशीलता हिनका सभक कथा मे भेटैत रहल अछि। समकालीन
सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक परिवेश सं हिनका लोकनिक कथा बेसी लगीच लगैतअछि। जन-जीवनक वत्र्तमान समस्या हिनका लोकनिक कथ्य होइत रहलनि, ओहि
समस्या कें भोगैत व्यक्ति हिनकर चरित्रा नायक होइत अछि आ तकर चरित्रांकन
मे अपन पूर्ण जीवन-दर्शनक उपयोग क’ क’ पात्राक मनोभाव कें पढ़ि क’ ओकराउजागर करैत रहलाह अछि। सेवा निवृत्तिक पश्चात् कोनो व्यक्तिक मनोविश्लेषणात्मक
चरित्रांकन, युवावर्गक आत्मचेतना, नवीन संस्कारक विजय प्राप्ति, पघिलैत दांपत्य-सूत्रा,
क्लिष्ट जिनगीक संघर्ष, युगीन छल-छद्म, मोह-भंग, विद्रोह, बेकारीक समस्या सं
उद्भूत अनेक मानसिक द्वन्द्व सं अइ दशकक कथा सराबोर अछि।

असल मे स्वतंत्राता प्राप्तिक पश्चात् मिथिलाक सभ्यता-संस्कृति आ जीवन-प्रक्रियामे किछु तेना जकां परिवत्र्तन अबैत रहलैक, जे एहि विधाक स्वरूप तुरत-तुरत बदलैतगेल। प्रतिभाशाली कथाकार एहि परिवत्र्तनक औचित्य कें, आ साहित्य मे एकर
चित्राणक आवश्यकता कें बुझैत रहलाह।

वस्तुतः मैथिली कथा आब कोबर-डहकन, चुलहा-चिनबार, सोहर समदाओन,
अरिपन-पुरहरक सीमा सं बाहर आबि युगक प्रतियोगिता मे गर्व सं ठाढ़ अछि।
कथ्य-शिल्प-भाषा, तीनू नवीनताक संग मैथिली कथा एखन युगक प्रतिनिधित्व मेसंलग्न अछि। प्रेमचन्दक मतें सभ सं उत्तम कोटिक कथा ओ होइत अछि, जकर
आधार कोना मनोवैज्ञानिक सत्य पर हो (साहित्य का उद्देश्य, पृ.-51)। मनोविज्ञान
एखन साहित्य मे विशेष रूपें भेटैत अछि। कथाक श्रवण वा अध्ययन सं प्राप्त
आनन्द अथवा घटित विरेचन, वस्तुतः एकटा मानसिक प्रक्रिया थिक। मनोविश्लेषणात्मक
चित्राण एहि कारण सं पाठकक हेतु विशेष रूप सं लोकप्रिय भेल अछि। मानव-जीवनक
यथार्थ आब संघर्षक अखाड़ा बनि गेल अछि। जीवन-संग्राम मे तन्मय मनुष्य कें
आब मनोरंजनक लेल समयक अत्यंत अभाव रह’ लागल छैक। एहि परिस्थिति
मे आब आवश्यक अछि, जे ओ कम समय मे अधिक सं अधिक मनोरंजन प्राप्त
करबाक बाट ताकए। मनोरंजन नहियों हो, कम सं कम मोनक सुंदर भावना कें
जाग्रत अवश्य करए। एहि लेल आवश्यक अछि कथा मे संपन्नता, बुनाबटि मे
गहनता, कथ्य मे यथार्थता, चरित्रांकन मे मनोवैज्ञानिकता, अभिव्यक्ति मे स्पष्टता,
आ शिल्प मे नूतनता। कथाक एक-एक शब्द आकर्षक हो आ अपरिहार्य हो। कथाक
एहि सीमा-शर्त कें समकालीन कथाकार लोकिन चीन्हि रहल छथि। एत’ हम, ओहनकथाकारक चर्चा क’ क’ हुनका अनावश्यक महत्त्वपूर्ण नहि बनब’ चाहैत छी, जे
स’ख सं रचनाकार बन’ चाहैत छथि, अर्थ-संपन्न छथि तं पोथिओ छपा लैत छथि,

समकालीन मैथिली कथा / 45

मुदा ने तं साहित्यक वत्र्तमान मूल्य कें बुझैत छथि, ने शाश्वत मूल्य कें। कथा-लेखन
बिजलीक धारा सदृश होयबाक चाही, स्वीच दबल कि धारा प्रवाहित हैब शुरू, कथाक
पहिल पंक्ति पढ़लहुं कि कथाक परिवेश मे चल गेलहुं।

एखन मैथिली मे कथा लेखन खूब भ’ रहल अछि, मुदा लगैत अछि जेना
मामिला सेराएल सन हो। एकर मूल कारण प्रकाशनक दुर्दशा थिक। एकटा समय
छल सन् 1950-55 क, जाहि मे ‘वैदेही’क प्रकाशन सं मैथिली कथा कें एकटा
दिशा भेटलैक। ललित, राजकमल प्रभृति कथाकारक एकटा समूह तैयार भेल जे
मैथिलीक कथा-विधा कें एकटा युगीन स्वरूप देलनि। ‘मिथिला मिहिर’क पुनर्प्रकाशन
एहि दिशा कें मजगूती देलक। मुदा, एखन प्रकाशनक अभाव मे युगसम्मत कथा,
कथाकारक फाइल मे दाबल अछि, आ अर्थ समृद्ध, देखौंसिया कथाकारक कथा-संग्रह
इत्यादि आयल जाइत अछि।

महगी, बेकारी, अभाव, अस्पृश्यता, दहेज, घुसखोरी, दांपत्य जीवनक कटुता,
बेमेल-विवाह, ईष्र्या, द्वेष, कुत्सित यौनाचार, अर्थ संपन्नताक आश्रय सं अर्थविपन्नक
शोषण, बलात्कार, चोरी, राजनीतिक अस्थिरता, राजनीतिक अराजकता आ असंतुलन,
राजनीतिक अपराधीकरण, विज्ञानक आगमन सं प्राप्त प्रगति आ अवनति इत्यादिएखन हमरा समाजक वत्र्तमान समस्या अछि। एहि मे सं सभ एक दोसरक जननी
थिक। एहि कटु यथार्थ सं मुंह चोराएब हमरा कथाकारक नियति नहि थिक।
निम्नवर्गीय जातिक सर्वविधि शोषण समाजक उच्च वर्गीय जातिक अधिकार जकां
बनि गेल, मुदा आजुक शिक्षा प्रणालीक प्रचार-प्रसार, शहरी-क्षेत्रा आ शिक्षित लोकक
संसर्ग निम्नजातिक युवा वर्गक दृष्टि खोलि देलक। ओकर आत्मबोध जागि गेल।
फलस्वरूप ओकरा मोनक विद्रोह धधकि उठल। ओकर ई विद्रोही स्वभाव, तथाकथित
उच्चवर्गीय समुदाय कें अनुचित लाग’ लगलनि। एहि उचितानुचितक संघर्ष कें
हमर कथाकार उपेक्षित नहि कएलनि।

कथ्य केर ई विशद-विराट फलक कथा साहित्यक काया मे समा गेल, समा
रहल अछि। एकरा चित्रित करबाक लेल तीक्ष्ण भाषा-शैली आ नूतन शिल्पक अपेक्षासहजें कयल जा सकैए। अदौ सं चल अबैत भाषा आ शिल्प मे वत्र्तमान कथ्य
कें, अभिव्यक्ति कें ओझरयबाक पूर्ण संभावना छलैक। तें शिल्प आ भाषाक नवीनता,
कथा कें नव-नव रूप मे आन’ लागल।

एम्हर आबि क’ शिल्पक ई नूतनता मैथिली मे लघुकथा नामक विधाक जन्म
देलक अछि। जकर अंग्रेजी होयत ैीवतज ैीवतज.ैजवतल। मुदा ई अंग्रेजी साहित्यक
प्रभाव सं नहि आयल। ई आएल अछि वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, आरण्यक, पंचतंत्रा
अथवा लोकथाक अजò òोत सं, जतए ई उपदेशात्मक प्रवचनक बीच मे अथवा
लोककंठ मे नुकाओल छल। अर्थ गांभीर्य सं भरल, छोट काया मे तीक्ष्ण भाषा, नूतन
शिल्प आ अत्यंत मर्माहत क’ देब’ वला ई उपविधा खूब प्रभावकारी साबित भेल

46 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


अछि आ विकास पाबि रहल अछि।

असल मे मैथिली मे सीमा क्षेत्रा छोट रहबाक कारणें पैघ साहित्यकारक सान्निध्य,
पैरवी आ दरबार पसंद, दृष्टिहीन, अर्थसंपन्न संपादक सं परिचय सहज भ’ जाइत
अछि। फलस्वरूप भदबारिक बेंग जकां बहुत रास लिखनिहार आबि जाइत छथि।
मुदा एहेन लेखक सब रहितो छथि भादबे भरि। अपन जीवन-दर्शन, परिवेशगत
अनुभूति आ प्रतिभाजन्य अभिव्यक्ति जिनका छनि, साहित्य मे वैह स्थायी भ’
सकलाह।

मैथिली कथा-लेखन मे थोड़ेक नकली प्राणी सेहो अबैत रहलाह अछि, जे
‘महाजनो गतेन स पन्थाः’ पर चलि क’ प्रसिद्धि हथिया लेब’ चाहैत छथि, मुदा
से भ’ नहि पबैत छनि। चूंकि राजकमलक कथा मे सेक्स-चित्राण भेल आ राजकमल
अभूतपूर्व ख्याति प्राप्त क’ लेलनि, तें, हमहूं सेक्स पर लिखि क’ प्रसिद्धि समेटी;
एहनो मानसिकता मैथिलीक कथाकार लोकनिक रहलनि अछि। ई देखबाक, परखबाक
प्रतिभा नहि छनि, जे ओ सेक्स-चित्राण कोन संदर्भ मे आ कोन रूप मे भेल अछि ?

तथापि, एहि छिट-फुट समस्याक अछैतो, मैथिलीक वत्र्तमान कथा समकालिक
माटि-पानि, जन-जीवन, जीवन-संग्राम, ज्वलंत समस्या, परिस्थिति, यथार्थ-जीवन,
वर्ग-संघर्ष, युगीन संदर्भ इत्यादिक प्रतिबिंब देखबैत अछि। संख्याक हिसाब सं थोड़बे
सही, मुदा एहनो कथाकार छथि, जे खेत मे काज करैत ज’न-हरवाहक, बंधुआ-मजदूरक
शोषण क’ अबैत छथि, सूद पर सूद जोड़ि क’ ल’ अबैत छथि आ आपस अयला
पर ओकर दैन्य पर, ओकर विवशता पर कथा लिखैत छथि। कथा-लेखन कें एहि
छद्म प्रगतिशीलता सं फराक राखब आवश्यक अछि। रचनाकारक लेखन आ जीवन,
सिद्धांत आ व्यवहार मे समानता रहबाक चाही।

लक्ष्य संधान करैत मैथिली कथा / 47


लक्ष्य संधान करैत मैथिली कथा


मैथिली मे मौलिक कथा वत्र्तमान शताब्दीक तेसर दशक सं प्रारंभ भ’ क’ धराधरि
नव-नव आयाम ग्रहण करैत गेल। सन् 1921 मे जें अनूप मिश्र अपन ‘नारद-विवाह’
काव्यक भूमिका मे सर्वप्रथम उपन्यास एवं कथा कें अलग-अलग स्वतंत्रा विधाक
रूप मे रखलनि, तें प्रायः काली कुमार दासक ‘भीषण-अन्याय’ (1923) तथा कुमार
गंगानन्द सिंहक ‘मनुष्यक मोल’ (1924) कें मैथिलीक प्रारंभिक मौलिक कथाक
रूप मे स्वीकारल गेल अछि। अर्थात्, मात्रा आठ दशकक यात्रा मे मैथिली कथा
आइ धरिक स्थिति मे पहुंचल अछि।

प्रकाशनक अवधि कोनहुं कथाक समकालीनता द्योतित करैत अछि। मैथिली
साहित्यक ई एकटा समस्या रहलैक अछि जे कथाकारक पांच-पांच दस-दस बर्खक
पुरान अनुभूतिक अभिव्यक्ति प्रकाशित होइत अछि, किंवा नहिओं होइत अछि।
जेना कि राजमोहन झा अपन कथा संग्रह ‘एकटा-तेसर’ मे कहलनि अछि जे ‘ईहोतं मैथिली अकादमीएक कृपा थिक जे उनैस सय चैरासिओ मे आबि कए सरसठिसं पचहत्तरि धरिक लिखल कथा संग्रहीत भ’ गेल, अन्यथा आबिओ सकैत कि
नहि।’ तथापि, जं प्रकाशने कें ध्यान मे राखि आधुनिक मैथिली कथाक अध्ययन
कएल जाए तैयो एकरा तीन कोटि मे बांटि लेल जएबाक चाही (1) प्रारंभ सं
पांचम दशक धरिक कथा (2) छठम दशकक कथा आ (3) छठम दशक सं बादक
कथा।

नीतिपरक आ समाजपरक कथा सभक अनुवाद सं प्रारंभ भेल मैथिली कथा
‘प्रणम्य देवता’क प्रकाशन होइत-होइत पाठकक बीच बेस प्रसिद्धि पाबि लेलक।
फलस्वरूप आगूक कथाकार कें कथ्य आ शिल्प मे थोड़ेक आओर आगू अएबा मे
सुविधा भेलनि। छठम दशकक कथाकार समाजक बाह्य ढ’ब-ढांचाक मोह छोड़ि सोझे
व्यक्तिक चिंतन आ जीवन सं जुड़ि गेलाह। छठम दशकक बादक कथाकार सभकें सेहो जं वर्गीकृत करी तं साफ-साफ देखाइत अछि, जे सातम आ आठम दशक

48 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


मे कथाकारक पैघ सूची तैयार भेल जे अचानक नवम दशक मे ओछ भ’ गेल।
ओना अइ ओछ हएबाक प्रत्यक्ष कारण थिक प्रकाशन मीडियाक अभाव। आॅडिओ-विजुअल
अथवा आॅडीबुल मीडिया सं मैथिली मे एखनहुं धरि किछु सीझ-पाकि नहि रहल
अछि। अइ पैघ सूचीक संग सातम आ आठम दशक खूब जोश-खरोश सं आएल
छल। अइ दुनू दशकक कथाकार कें एकटा सुनिश्चित दूरी तय कएल कथा-क्रम
भेटलनि, बदलल माहौल भेटलनि, स्वागत लए पाठक समुदाय भेटलनि, रचनात्मक
डेग राख’ लेल पत्रिकाक प्लेट फार्म भेटलनि, जीवन-दर्शन विकसित कर’ लेलसामाजिक विकृति आ मानवीय संघर्ष भेटलनि आ अइ समस्त स्थितिक बीच मे
कथ्यक वैराट्य एवं शिल्पक वैविध्य भेटलनि। ई लोकनि अइ समस्त अवदानक
उपयोग कएलनि आ अपन रचना संसार मे विरासत सं प्राप्त प्रवृतिक विकास
कएलनि।

नवम दशक मे अपन सृजनशीलताक परिचय देनिहार कथाकारक संख्या अत्यंत
कम अछि। मुदा जतबे अछि, से पूर्वक समस्त रचनाकारक मैथिली कथाक शिल्पआ कथ्य कें समय-सापेक्ष बनएबाक लेल दत्तचित भ’ कए जुटल छथि।

चूंकि, जीवन-दृष्टि मनुष्य कें शिक्षा सं नहि, उम्र सं नहि, आत्म-संघर्ष सं
प्राप्त होइत अछि। आ युगीन प्रगतिशीलताक सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक
प्रभावक क्षेत्रा मे मिथिला, आन प्रक्षेत्रा सं पछुआएल इलाका अछि। साहित्यिक स्वरूपक
प्रगतिशीलता लेल घटनाक्रम आवश्यक अछि। मिथिलांचल ओहुना आत्मजीवी लोकक
निवास-स्थल थिक, जतए लोक यथास्थितिवादेक पोषक बेसी काल रहैत अछि।
अही क्रम मे मैथिलीक साहित्यकारो थोड़ेक दिन मध्यम गति सं चलए लगलाह।
फलस्वरूप राजकमलक बाद कथाक तीक्ष्णता प्रखर नहि भ’ कए सामान्य गति सं
चलए लागल।

अइ तीन दशक मे जनजीवनक विभीषिका उत्तरोत्तर विकसिते भेल। कतोक
प्रतिभाशाली कथाकार संसार सं उठि गेलाह आ शेष कथाकार कें आगूक समय मेव्यवस्था जन्य विकृति नाक सं उपर बुझाए लगलनि। आत्मसंघर्षक रूप पराकाष्ठा
पर आबि गेल। रचनाकार लोकनि कें जन-जीवनक एक-एक संास मे कथा-तत्व
भेटए लगलनि। अइ संघर्ष सं उद्भूत कथा-सृजन प्रखर भेल। अनुभवी रचनाकारक
मांजल शिल्प आ नव कथाकारक नूतन शिल्प मे कथा-लेखन होअए लागल।

मूल रूप सं कथाक लेल दुइए टा वस्तु विचारणीय रहि गेल अछि कथ्य
आ शिल्प। परिवेश सं उठाओल राॅ मैटेरियल कथ्य भेल आ ओकरा प्रस्तुत करबाक
लूरि शिल्प भेल। राजकमल एहि प्रसंग एक बेर कहने छथि जे कथाक लेल असल
वस्तु शिल्प होइत अछि। कथ्य तं बहुतो व्यक्तिक एक रंग भ’ सकैत अछि, मुदा
कथ्य कें उपस्थापित करबाक लूरि अपन-अपन खास-खास तरहक होइत अछि।
एकहि परिवेश सं उठाओल विविध साहित्यकार द्वारा राॅ-मैटेरियल तं एक भ’ सकैत

लक्ष्य संधान करैत मैथिली कथा / 49

अछि, मुदा शिल्प निर्माण लोक अपन-अपन अनुभूतिक परिपक्वताक आधार पर
करैत अछि। एही शिल्पक कारण एकहि कथ्य सं कैक तरहक कथाक जन्म देल
जा सकैत अछि। इएह शिल्प हेबनि मे आबि कए कथा कें मनोवैज्ञानिकता दिश
मोड़ि देलक। कथा, कथानक प्रधान नहि भ’ कए, घटना प्रधान नहि भ’ कए, शैली
प्रधान होमए लागल। अनुभूतिक परिपक्वता सं शिल्प निर्मित होइत अछि। सन्
1960 क दशक मे अपन परिचिति बनौनिहार रचनाकार लोकनि नव भावबोध कें
नव शैलिएं चित्रित करए तं लगलाह, मुदा किछु रूढ़िग्रस्त लोक कें से नहि पचलनि।
अर्थ-तंत्रा सं प्रभावित राजकमलक ‘ननदि-भाउज’ सन कथा ओहि पीढ़ीक लोक कें
नहि अरघलनि। ओना, अपवाद सब किछु मे होइत अछि। गोविन्द झा सन लेखक
आ पाठकक संख्या कम अछि। कथ्यक स्तर पर सेहो नवे पीढ़ीक लोक अपन फलक
कें बेसी बढ़ा सकैत छथि, ई बात मानल जएबाक चाही। पुरान पीढ़ीक लोक लेल
एखनहुं किछु क्षेत्रा वर्जिते छनि; जखन कि नव पीढ़ीक लोक दिशाहारा युवा वर्गकफ्रस्ट्रेशन पर सेहो ध्यान केंद्रित करैत छथि आ एहि मानसिकता मे कैबरा डान्स
देखैत काल सेहो अथवा कोनो वेश्याक कोर मे मूड़ी राखि कए चरम शांति प्राप्त
करैत काल सेहो हुनका जीवन सं कथा तत्व निकालि लैत छथि। अर्थात, नव पीढ़ीक
कथाकार लेल जीवनक कोनो क्षेत्रा साहित्य मे बागल नहि जाइत अछि। एहि सृजक
समूह लेल अभिव्यक्तिक कोनो खतरा नहि रहि गेल। अर्थ-तंत्रा, राजनीति, कूटनीति,
नारी-उत्पीड़न, भूख-बेरोजगारी- अभाव-शोषण, शैक्षिक-वेश्यावृत्ति, वैचारिक वेश्यावृत्ति,
दांपत्य आ रक्त संबंधक विगलन, संबंधक ढोंग, धार्मिक पाखंड आदि समस्त
सामाजिक गतिविधि कथाक वस्तु भ’ सकैत अछि। छठम दशक सं ल’ कए आइ
धरिक कथा मे समयानुसार आ रचनाकारक कौशलक अनुसार ई सभ ताकल जा
सकैत अछि।

युग संदर्भक संग रचनाकारक बड्ड अंतरंग संबंध रहैत छैक। रचनाकार कें
युगानुकूल अपन दृष्टिक कैनवास परिवर्तित कर’ पड़ैत छनि। आइ नेता, पुलिस,
पत्राकार, शिक्षक, अफसर प्रभृति सभ व्यक्तिवादी धारणा मे समटा गेल छथि, तें
आब जन सामान्यक आगू पथद्रष्टाक संकट अछि राजकमल ई दायित्व साहित्यकारक
मानैत छथि। वस्तुतः उचितो सएह थिक। सृजनधर्मी लोक सामाजक सभ सं
संवेदनशील तंतु होइत अछि, जकरा समाजक प्रत्येक छोट-पैघ घटना प्रभावित करैत
छैक। आ जखन समाजक व्यवस्था तंत्रा एहि तरहें स्वार्थ मे लिप्त भ’ जाए, तखन
वस्तुतः ई दायित्व साहित्यकारक होइत छनि जे ओ जनसामान्य कें दृष्टिबोध देथि
आ युगक संग डेग मिला कए चलबाक लेल प्रेरित करथि।

दिनानुदिन युग बदलैत रहल अछि। रचनाकारक परिवेशमे आमूल परिवत्र्तन
भ’ गेल अछि। परिवेश सं रचनाकारक भोक्ता मन प्रभावित भेल। अनुभूतिक नव-नव
दिशा प्राप्त केलक। वैज्ञानिक युगक आविर्भाव सं क्षेत्रा-विस्तार भेल, भौगोलिक दूरी

50 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


कमि गेल, विश्वक सीमा घोकचि कए कम भ’ गेल। जिनगीक व्यस्तता बढ़ल।
मनुष्य रेल, हवाई जहाज सं यात्रा प्रारंभ कएलक। चंद्रमाक पूजा कएनिहार, चंद्रमापर सं भ्रमण क’ आएल। ई सभटा परिवत्र्तन, सभ क्रिया-कलाप साहित्य संरचनाक
क्षेत्रा मे एकटा क्रांति आनि देलक। लोक कम-सं-कम समय से बेसी-सं-बेसी सुख
भोगबाक अभ्यासी बनि गेल। महाकाव्य सं खंड काव्य, खंडकाव्य सं मुक्तक, नाटक
सं एकांकी, उपन्यास सं कथा, कथा सं लघुकथा दिश पाठकक झुकान बढ़ल। रचनाकारकें पाठकक एहि प्रवृत्ति कें चीन्हए पड़लनि। एहि चरम-सत्य सं छाह काट’ वलारचनाकारक रचना वत्र्तमान समय मे त्याज्य भ’ जाएब एकदम स्वाभाविक थिक।
समस्यायुक्त समाजक जटिलतम जिनगी मे जीवित पाठक कें एकटा रहए राजा,
एकटा रहए रानी कहि कए आब ओझराओल नहि जा सकैत छल। व्यवस्था सं
उबिआएल एहि तंगहाल प्राणीक मनोविकारक शमन लेल रचना मे ‘ओकर’ बात
कहब आवश्यक छल, अन्यथा विरेचन हएब असंभव भ’ जइतए, जे साहित्यिक
असफलताक द्योतक होइतए।

प्रायः सभ रचनाकार अपन पूर्ववर्ती रचनाकार सं कोनो-ने-कोनो तरहें अनुप्रेरित
होइते टा छथि। या तं ओ प्रभाव ग्रहण करैत छथि, या आने कोनो तरहक दिशा-सूचना
प्राप्त करैत छथि। एहि क्रम मे पूर्वक निकटवर्ती रचनाकारक रचना सं प्रेरणा भेटबाक
बेसी संभावना रहैत अछि। छठम सं नवम दशक धरिक कथा मे थोड़-बहुत एहि
क्रमक परिचय भेटैत अछि आ आब जखन कि छठम दशकक किछुए अग्रज कथाकार
शेष तीन दशकक कथाकारक संग रचनाशील छथि, करीब-करीब अपन-अपन
सृजन-सीमा तय क’ कए मैथिली कथा-संसारक फलक-निर्माण मे लागल छथि।

सामान्य जनता आब हरदम मानसिक तनाव मे जीबैत अछि। लोकजीवनक
ई दृश्य कथा शिल्प कें सोलहो आना बदलि देलक अछि। कथा मे आब कथात्मक
चरित्रा-चित्राणक बदला मनोविश्लेषणात्मक चरित्रा-चित्राण होअए लागल अछि। एहना
स्थिति मे पात्राक बाह्य संघर्षक अपेक्षा आंतरिक संघर्षक प्रति रचनाकारक मोह जाग’
लागल अछि। तदनुसार कथ्य ओ शिल्पक नवीनता मुखर भेल। कथाक काया-कल्प
छोट होमए लागल। लघुकथा खूब लिखल जाए लागल। अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास,
एम. मणिकान्त, तारानन्द वियोगी, कुमार पवन, प्रदीप बिहारी, देवशंकर नवीन,
विद्यानन्द झा, सारंग कुमार प्रभृति लोकनिक सूक्ष्म प्रेक्षणीयता, काव्यात्मक कौशल
सं कथ्य संप्रेषित करबाक क्षमता लघुकथा सभ मे अबैत रहल अछि, समय-समय
पर पत्रा-पत्रिकाक माध्यमे अपन कथा-शिल्पक परिचय ई लोकनि दैत रहलाह अछि।
अर्वाचीन काल मे पाश्चात्य शैली सं प्रभावित भ’ कए मैथिली-कथा अपन नव रूप-रंग
मे प्रसारित-प्रचारित भेल। प्रचीन कथा जकां आब एहि मे बाह्य जगतक चित्राण
सुनियोजित नहि रहल, अंतर्मनक कथा उमड़ि कए आबए लागल। जीवनक पक्ष-विशेष
कें कम-सं-कम पात्राक आश्रय सं कम-सं-कम घटना-क्रम ल’ कए छोट-छीन काया

लक्ष्य संधान करैत मैथिली कथा / 51

मे विशेष प्रभावशाली ढंग सं कहबाक आग्रह आधुनिक मैथिली कथा मे रहए लागल।
बंगलाक करुणा आ आंग्ल-भाषाक मनोवैज्ञानिकता मैथिली कथा मे रच’-पच’ लागल।
सारंग कुमारक ‘निश्चिंत’, शिवशंकर श्रीनिवासक ‘धार आ मनुक्ख’, तारानन्द
वियोगीक ‘परिस्थिति’, विद्यानन्द झाक ‘जरसीमन’, देवशंकर नवीनक ‘उसांस’ आदि
एकर साक्षी अछि। ‘कोसी कुसम’क लघुकथा अंकक प्रायः सभटा मौलिक लघुकथा
मे करुणा आ मनोवैज्ञानिकताक ई स्वर मुखर भेल अछि।

सूक्ष्मता सं जांच-पड़ताल कएल जाए तं ई तथ्य सोझां अबैत अछि, जे शुद्ध
रूपें लोकानुरंजन लेल प्रारंभ भेल मौलिक कथा लेखन कें हरिमोहन झाक कथा-सृजन
एकटा स्वरूप आ दिशा देलक, जकरा ललित, राजकमल, मायानन्द, धूमकेतु प्रभृति
बहुत साहस आ बहुत मनोयोग सं नव क्षितिज देलनि। बादक दशकक कथाकार
सभ एकजुट भ’ कए एखनहुं सृजनशील छथि। मुदा ई देखाइत अछि जे कथा-सृजनक
जे स्तर आगू नहि बढ़िकए क्षैतिज तल पर चलल जाइत छल, आइ सेहो घटए
लागल अछि। मैथिली कथा आब विश्व कथा-साहित्यक स्तर पर डेग मिलएबा मे
सक्षम भ’ सकल अछि। एकटा अल्प अवधि मे ई जतए धरि पहुंचल, से आन
कथा-साहित्यक लेल चुनौतीक बात भ’ सकैत अछि। सुभाषचन्द्र यादव सन प्रतिष्ठित
कथाकारक ‘नदी’ आ ‘कबाछु’, विनोद बिहारी लालक ‘भोटतंत्रा’, जीवकान्तक ‘गंगा
लाभ’ आदि सन किछु कथा देखि कए मैथिली कथा-विकासक मार्ग अवरुद्ध मानब
समीचीन होएत। एतए नामवर सिंह कें उद्धृत करब उचित लगैत अछि, ‘कहानी
की असफलता परिश्रम और अभ्यास की कमी के कारण भी हो सकती है, लेकिन
अभ्यस्त लेखकों के यहां यदि कहानी की ऐसी रूपहानि दिखाई पड़े तो क्या कहा
जाएगा ? यही कहानी के क्षेत्रा मे नए शिल्पवादियों की पहचान हो सकती है। नए
भाव-सत्य के अनुसार नए कहानी-शिल्प के नाम पर ये कहानी मे कभी केवल
वातारवरण देते हैं, जो कभी केवल एक व्यक्ति का रेखाचित्रा, तो कभी रोचक व्यंग्यों
मे फैलाकर आद्यंत विचार (नई कहानी: सफलता और सार्थकता)।’

नामवर अपन ई वक्तव्य जे हिन्दीक नई कहानीक संदर्भ मे देलनि अछि,
तकरा मैथिलीक आधुनिक कथाक लेल सेहो ओही रूप मे देखल जा सकैत अछि।
नामवरक शब्द मे ‘कहानी का यह दुर्भाग्य है कि वह मनोरंजन के रूप मे पढ़ी
जाती है। और शिल्प के रूप मे आलोचित होती है। मनोरंजन उसकी सफलता
होती है तो शिल्प उसकी सार्थकता।’ मैथिली कथाक जांच-पड़ताल सेहो अही अंदाज
मे हएबाक चाही। आइ धरिक मैथिली कथाक उपलब्धि सं एकर उद्देश्य प्राप्ति नहि
भ’ सकैत अछि। आजुक समयाभाव आ जीवन-संग्रामक कारण मैथिली कथा जतए
धरि पहुंचल अछि, से मैथिली कथाक चरम लक्ष्य नहि थिक आ एकर तीक्ष्णता
अवरुद्ध करब लक्ष्य-गमन लेल अभिशाप थिक। आठमे दशक सं सक्रिय विभूति
आनन्द, विनोद बिहारी लाल, प्रदीप बिहारी, अशोक, शिवशंकर श्रीनिवास, तारानन्द

52 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


वियोगी, शैलेन्द्र आनन्द, रमेश, देवशंकर नवीन प्रभृत्तिक कथा पत्रा-पत्रिका मे देखि
ई कहल जा सकैत अछि जे मैथिली कथा कें युग-सापेक्ष बनएबा मे ई लोकनि
जीतोड़ प्रयास कएलनि अछि। ‘टुटैत बेढ़’ आ ‘बिहारि मे जड़ैत दीप’ दुनू कथाक
कथ्य आस-पड़ोसक रहितहु शिल्पक कारणें एकरा जे भिन्नता विनोद बिहारी लाल
देलनि, से हिनकर प्रशंसनीय शिल्पक द्योतक थिक, मुदा से आगूक किछु कथा
मे अपने प्रभाव कम करैत गेल अछि। विधवा विवाहक प्रति आग्रही, असहाय जायाक
शोषणक प्रति विद्रोही कथाकार विनोद अपन कथ्य चयन मे सामाजिक सत्यक लगीच
बुझाइत छथि। मुदा से कोनो-कोनो कथा मे ततेक अतिरंजित भ’ जाइत छनि, जे
कथा-पात्रा कें बलजोरी-जनवादी बनबए लगैत अछि।

तारानन्द वियोगीक ‘बिसरभोर’ आ ‘पिआस’ कोशीक तांडव सं त्रास्त जनता
पर राजनेता आ ग्रामनेताक अत्याचार सं उत्पन्न टटका अनुभूतिक अभिव्यक्ति थिक।
दलित समुदायक मनोविश्लेषण आ ओहि समुदायक लोकक सतही एवं सामान्य
आकांक्षा कें चीन्हब वियोगीक कथाक धर्म होइत छनि।

विभूति आनन्द पीढ़ीक द्वंद्व आ वर्ग-संघर्षक कथाकार छथि। ‘रिटायरमेंट’
कथा मे सेवामुक्त व्यक्तिक मनोविश्लेषण करबा मे विभूति सफल भेल छथि।
मायानन्द मिश्रक ‘चन्द्रबिंदु’ आ हिन्दी लेखिका उषा प्रियम्वदाक ‘वापसी’ कथा
कें स्मरण रखितो विभूतिक ‘रिटायरमेन्ट’ कथाक अस्मिता अपना दिशा मे स्वतंत्रा
रूपें जाइत मानल जएबाक चाही। देह संबंधक रागात्मक एप्रोच सेहो विभूतिक कथाक
मूल धर्म मे अबैत अछि। भाषाक स्तर पर विभूति सामान्य जन-जीवनक बेसी लगीच
छथि।

‘सरंगिया’ प्रदीप बिहारीक मानसिक द्वंद्वक कथा थिक, जतए सरंगिया बनि
भीख मंगैत अपन पति कें चीन्हि गेलाक बाद पत्नीक कारुणिक स्थिति फरीछ भ’
कए आएल अछि। भावना आ यथार्थक ई संघर्ष प्रदीपक कथा मे भकरार भ’ कए
आएल अछि। समस्या बहुल समाज मे एखन प्रेम-प्रसंग जेना उपेक्षित होअए लागल
अछि, तकरा प्रदीप अपन आकर्षक खिस्सा-शैली मे कहैत छथि। अत्यंत सामान्य
कोटिक लोक-जीवनक अत्यंत छोट-सन घटना प्रदीपक कथाक कथ्य बनैत अछि।
‘मौगियाह’ अइ कोटिक कथा मे राखल जा सकैत अछि। नारी-संबंधक अनिवार्यता
प्रदीपक कथाक मुख्य गुण जकां भ’ गेल अछि। परिमाणात्मक रूप मे बहुत कथा
लिखि कए गुणात्मक रूपें कम कथाक संगें मोन रहनिहार कथाकार मे प्रदीप बिहारी
आ विनोद बिहारी लाल गनल जएताह।

‘डेरबुक’, ‘ओहिरातिक भोर’ आ ‘मिर्जासाहेब’ अशोकक कथा-लेखनक विस्तार
कें द्योतित करैत अछि। ‘डेरबुक’ जतए ग्रामीण बालाक मानसिक संवेग सं गहन
संपर्क करबैत अछि, ओतहि ‘मिर्जा साहेब’ सांप्रदायिक संबंधक कटुता कें। अशोक
अपन कथा-लेखनक समस्त दिशा मे मानवीय संबंधक दैन्य पर चिंतित छथि। संबंधक

लक्ष्य संधान करैत मैथिली कथा / 53

व्याकरण हिनकर कथा सृजन कें उद्वेलित कएने छनि।

शिवशंकर श्रीनिवासक ‘सीतापुरक सुनयना’ आ ‘दबाइ’ सामाजिक रहस्यात्मक
घटनाक मूलतत्व कें उद्घाटित करैत अछि। शिवशंकर अपन संपूर्ण कथा लेखन
मे पाठकक संगें विचरैत छथि। कथाक्रमक सहज विकास, लोकजीवनक पारंपरिकसंस्कृतिक प्रति सहज संवेदन हिनकर कथाक प्रमुख गुण थिक। अपन माटिक गंधक
मौलिकता कें अक्षुण्ण राखब हिनकर कथा कें जीवनी शक्ति दैत अछि। अतिरंजना
हिनकर कथा मध्य हुलकिओ नहि मारैत अछि। इएह कारण थिक जे सफलता
आ सार्थकता दुनूक संग ई एकहि समय मे तैयार रहैत छथि।

रमेश वत्र्तमान जनजीवनक व्यावहारिक रहन-सहन मे छिड़िआएल सूक्ष्मताककथाकार छथि। युगीन चटक-मटक आ उपभोक्ता संस्कृतिक आधुनिकता मे
दहाइत-भसिआइत मानवोचित संस्कारक लोमहर्षक चित्राण हिनकर कथा मे भेटैत
अछि। ‘कैलास मंडलक फिलिप्स रेडियो’ सन कतोक कथाक नाम लेल जा सकैत
अछि। रमेश अपन परिवेशक प्रति अत्यंत सजग आ साकांक्ष कथाकार छथि। देवशंकर
नवीनक ‘बबूर’ कथा सेहो अपन अन्वितिक लेल समृद्ध कथा थिक।

केदार काननक ‘नाटक’, ‘तामस’, ‘आतंक’ प्रभृति कथा सभ युगचेतना सं
सराबोर अछि। व्यवस्थाक नांगट दृश्य अत्यंत निर्भीकता सं उपस्थित करबा मे केदारधखाइत नहि छथि। हिनका अभिव्यक्तिक पूर्ण स्वतंत्राता प्राप्त छनि। उत्कृष्ट
अभिव्यक्ति लेल ई कठोर-सं-कठोर शब्द कें साहित्यिक गरिमा द’ दैत छथि।
व्यक्ति-सत्य कें समूह-सत्यक आंखिएं देखबाक हिनकर कौशल प्रशंसनीय छनि।शैलेन्द्र आनन्दक ‘उठ पुत्ता ! पुरल-पुरल’ समाज सापेक्ष यथार्थ आ युग सापेक्ष शिल्पक
उदाहरण भ’ सकैत अछि। यद्यपि कथा-लेखन मे शैलेन्द्र अत्यंत मंथर छथि, तथापि
तात्विक आ गुणात्मक उत्कर्ष, परिमाणात्मक कमीक क्षति पूर्ति करैत अछि।

कथा आ कथाकारक नाम गना कए मैथिली कथाक विश्लेषण एकटा निबंध
मे करब आब संभव नहि अछि। अहू पीढ़ीक कतोक कथाकार आ कतोक कथा
एहेन अछि, जकर अहम भूमिका अइ संधान मे रहल अछि। मुदा सभक नाम गनएबा
सं बेसी उपयुक्त अइ पीढ़ीक पूर्ववर्ती दिश जाएब बेसी आवश्यक अछि। तेसर दशक
सं आरंभ भेल मैथिलीक मौलिक कथा कें ललित-राजकमल-मायानन्द जे नव दिशा
प्रदान कएलनि, से परवर्ती कथाकार लोकनि कहिओ नहि बिसरि सकताह।
मायानन्दक रचनाधर्मिता सं मैथिली कथा एखनहुं अनुप्राणित होइत रहैत अछि।
मुदा ई बात खूब निर्भीकता सं कहल जा सकैत अछि जे राजकमल अपन कथाक
माध्यमे कथालेखनक जे बाट निर्दिष्ट केलनि तकरा पकड़बा मे परवर्ती कथाकार
सफल भ’ सकलाह अछि। भाषा आ शिल्पक नूतनता तथा तेजीक कारण ओकरा
एकैसम शताब्दीक मैथिली कथा कहल जा सकैत अछि। ओहि टक्करक कथा जं
आइ पूर्ण सामथ्र्यक संग आबए लागए तं हमरा बुझने आन साहित्यक कथा

54 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


प्रतियोगिताक बाट पर मुंह बिधुऔने रहि जाएत। हिनका लोकनिक अतिरिक्त
धूमकेतु, सोमदेव, प्रभास कुमार चैधरी, गंगेश गुंजन, राजमोहन झा, रमानन्द रेणु,
हंसराज, धीरेन्द्र, लिली रे, जीवकान्त, सुभाष चन्द्र यादव, महाप्रकाश, महेन्द्र, ललितेश
मिश्र, मार्कण्डेय, सुकान्त सोम, पूर्णेन्दु चैधरी, उषाकिरण खान प्रभृति रचनाकारक
कथा सं मैथिली कथा-साहित्य समृद्ध होइत रहल अछि। आधुनिक मैथिली कथाक
सबल स्तंभ सभक रचना ‘अगुरवान’ (धूमकेतु), ‘इन्किलाब’, ‘तेतरी’, ‘गौड़’ (जीवकान्त),
‘अनुपस्थित महाशय’ (गंगेश गुंजन) ‘पाखंड पर्व’ (महाप्रकाश), ‘युद्ध-युद्ध-युद्ध’,
‘सब-दे-सब’ (राजमोहन झा) ‘काठक बनल लोक’ (सुभाष चन्द्र यादव) आदि मे
आत्मसंघर्ष सं उद्भूत अनुभूतिक दर्शन होइत अछि, युगबोधक चित्रा भेटैत अछि।
मैथिलीक कथा आ कथाकारक विपुल संख्याक नामोल्लेख एतए नहि भ’ सकल
अछि, मुदा तय अछि जे ओ लोकनि मैथिली कथाक शैशव कें बड़ा मनोयोग सं
सम्हारलनि अछि, कैशोर्य कें सजौलनि अछि आ पल्लवित-पुष्पित कएलनि अछि।
छत्रानन्दक ‘स्वर्ग’क संप्रेषणीयता पाठकक अंतस्तल कें छूबि लैत अछि, ‘अनुपस्थितमहाशय’ मे नायकक विदेशी सभ्यताक प्रति झुकान आ मातृभाषाक प्रति कृत्रिम
स्नेह, कथाकार गंगेश गुजनक खौंझ कें जगा दैत अछि, श्री देवक ‘नज्म-ए-लक्ष्मी’
मिथ्या जातिवादक साफ चित्राण करैत अछि, मनमोहन झाक ‘जोंक’ व्यक्तिकभलमनसाहतक अनुचित लाभ उठएबाक कुकृत्यक परिचय दैत अछि। राजमोहनक
‘सब-दे-सब’ मे पंजाबी भाषाक समावेशक कारणें किछु पाठक ओकरा कमजोर
कहलनि, मुदा कथाक स्तरक कसौटी ओकर किछु संवादे टा नहि थिक। वस्तुतः
कथा मे प्रसंगानुकूल आन भाषा अथवा बोलीक समावेश परिस्थितिक मांग पर निर्भर
करैत अछि। जं कथ्य संप्रे्रषण मे ई समावेश बाधक नहि हो, तं ई गुणे कहल जएबाक
चाही, एहि सं कथ्यक विश्वसनीयता पुष्ट होइत अछि। युग-जीवन आब बड्ड गतिशीलभ’ गेल अछि। मात्रा अरिपन-पुरहर आ कोबरक चित्त-भित्ति पर मैथिली कथा कें
राखब सर्वथा युग-जीवन सं काटब हएत। एहि मनोवैज्ञानिक युगक द्रुत गतिक
संग मैथिली कथाक भाषा कें, विषय कें, नव टेकनिक कें दौड़’ पड़तै, तखनहि मैथिली
कथा युगक संग चलबामे समर्थ हैत। तें वाक्य प्रयोगक एहि तरहें विरोध उचित
नहि।

एतए एकटा बात आब कहक चाही जे तथाकथित नेता, पुलिस, पत्राकार
आदि जकां प्रशस्ति पाबि गेलाक बाद रचनाकार कें साहित्य संग वंचना नहि करबाक
चाही, प्रशस्तिक कमाइ नहि खएबाक चाही। एहि सं हुनकर तं जे थोड़-बहुत बिगड़नि
से बिगड़नि, साहित्यक भारी अनिष्ट होइत छैक आ अइ पर एकर दूरगामी दुष्प्रभाव
पड़ैत छैक। ‘पूर्वांचल’ पत्रिकाक कथा सभमे प्रतिष्ठित कथाकार लोकनिक किरदानी
देखल जा सकैत अछि। साहित्यकार लोक-जीवनक पथ-प्रदर्शक होइत छथि, तें हुनकाकम-सं-कम कत्र्तव्य बोध रहबाक चाहिअनि। अनुभूत सत्य, जन-जीवनक समस्या

लक्ष्य संधान करैत मैथिली कथा / 55

आदि सं संबद्ध रहि कए सृजन करबाक चाहिअनि। लोक-जीवन सं पृथक रहि
कए कएल गेल लेखन बालुक भीत ठाढ़ करब हएत।

वैज्ञानिक युगक एहि व्यवस्था सं प्रभावित परिवेश मे मनुक्खक व्यस्तता बढ़ि
गेल अछि। समयक अभाव, दूरीक संकुचन, मानव मस्तिष्क मे तनावक बाहुल्य,
रोटीक समस्या, रोटीक अभाव मे नारी-देहक बिक्री, शोषण, अपहरण, लूटि आदि
आम बात भ’ गेल अछि। घूसखोरीक प्रवेश भेल, उचितो काज अनुचित जकां होअए
लागल, अनुचित कें उचितक स्थान भेटि गेल। जनमानस मे एहि सं असंतोष जागल।
परिवेशक एहि क्लिष्टता सं साहित्य प्रभावित भेल। संचार आ संधान माध्यमककारणें देश-विदेशक संपर्क बढ़ल, एक देशक साहित्य, संस्कृति, रीति-रिवाज दोसर
देश मे प्रचारित भेल। मैथिली साहित्यक कथा लेखन अहू सं प्रभावित भेल। ईप्रभाव, जाहि रूप मे लोकरुचिक परिवत्र्तन कएलक, मैथिली कथाक स्वरूप तकर
अनुरूपे रह’क चाही। जे, किंचित अछिओ, किंचित नहि।

आधुनिक कथा सही अर्थ मे घोड़दौड़क चुस्ती सं युक्त रहक चाही। कथाक
पहिल पंक्ति मे प्रवेश करिते एहेन वातावरण बन’क चाही, जाहि सं पाठक समाधिस्थ
भ’ जाइथ आ कथा समाप्त होइत-होइत पाठक कें पूर्ण मनःतोष भेटि जाइन।
राजकमलक कथा एहि दिशा मे सर्वसफल कथा अछि। अपन परिवेशक सर्वविधि
ज्ञानक अभाव मे, साकांक्ष दृष्टिक अभाव मे ई उपलब्धि असंभव अछि। जन-जीवन
सं निरपेक्ष रहिकए कथा लिखब, घड़ियालक नोर बहाएब थिक। पुनः युग-सत्य
कें चीन्हब-बूझब आ ओहि सं जुटि कए रचना करब जतेक आवश्यक अछि, भाषाक
तेजी, शिल्पक नूतनता, अभिव्यक्तिक स्पष्टता तथा छोट-सं-छोट काया मे बेसी-सं-बेसी
संतुष्टि देबाक क्षमता सेहो ओतबे आवश्यक अछि।

स्वयं वातानुकूलित निवासक सुख ली आ जेठक रौद मे झरकैत वा माघक
जाड़ मे ठिठुरैत बोनिहारिनक जीवन पर कथा लिखी; परिस्थिति आ व्यवस्थाक मारल
असहाय नारीक लाचारी सं मौज मनाबी आ तखन इजोत मे ओकर मुक्तिक लेल
नारा लगाबी; ई रचनाकारक घोर बैमानी आ रचनाधर्मिताक प्रति खेलौड़ कहल जाएत।
कथाक सफलता लेल कथाकारक लेखन आ जीवन-दर्शन मे साम्य हएब ओतबे
आवश्यक अछि, जतबा कथालेखन। एकटा रचनाकार असंख्य लाठी तैयार करबाक
सामथ्र्य रखैत छथि। इएह कारण थिक जे इतिहासक क्रांति दूत, सभ युग मे
साहित्यकारे बनैत अएलाह अछि। साहित्य कें युग-सापेक्ष हएबाक लेल रचनाकारकें कत्र्तव्य-बोध हएब आवश्यक। इएह कत्र्तव्यबोध जनजीवनक यथार्थक संग
रचनाकारक शिल्प पहिरि कए साहित्य मे उतरैत अछि जे जनताक आंखि खोलैत
अछि, ओकर चेतना कें जाग्रत करैत अछि, ओकरा अस्तित्व बोध दैत अछि। अंततः
सामाजिक क्रांति होइत अछि, व्यवस्था-परिवत्र्तन होइत अछि।

मैथिली कथा एखन जतए धरि पहुंचल अछि, से उम्र-सापेक्ष तं भ’ गेल,

56 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


युग-सापेक्ष एखन धरि नहि भ’ सकल अछि। वैज्ञानिकता आ आधुनिकताक एहि
होड़ मे एकरा युग-सापेक्ष बनएबा लेल कथाकार कें अपन दायित्व पर पूर्ण सचेष्ट
रह’ पड़तनि। बिना से भेने व्यवस्था कें गारि पढ़ब अरण्य रोदन हएत...।

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