Tuesday, September 01, 2009

पेटार २२

रमानन्द झा "रमण"


कविवर आरसी

मैथिली आ हिन्दी दूनू भाषा-साहित्यमे समान रूपे रचना करैत ख्याति अर्जित कएनिहार
साहित्यकार यात्री, आरसी प्रसाद सिंह एवं राजकमलमे आरसी प्रसाद सिंहक (ज. 1911)
अपन खास विशेषता छनि। यात्री आ राजकमतल जतय विविध विधामे रचना कएने छथि,
ओहिठाम कविवर आरसी मूलरूपें गीत विधाकें अपनओने रहलाह अछि।




मैथिली साहित्य परिषदक मुजफ्फरपुर अधिवेशन (1937 ई0) क अवसर पर ओयोजित
कवि सम्मेलन मे पठित 'शेफीलिका' कविताक माध्यमसँ कविवर आरसी मैथिली जगतमे ख्याति
पाओल। एहि कविता क उत्कुष्टताक अनुभव विद्वत समाज कएलक तथा कविवर आरसी कें
रंजत पदक' प्रदान कएल गेल। आ तकर

वाद सँ कविवर निरन्तर मैथिलीक मन्दिरमे अर्चना करैत रहलाह अछि। एखनधरि हिनक
तीनटा कवितासंग्रह प्रकाशित अछि ओथिक "माटिक दीप" (1958), "पूजाक फूल" (1967)
तथा 'सूर्यमुखी' (1982)। एकर अतिरिक्त कतेको रचना विभिन्न पत्र-पत्रिकामे छिडिआएल
अछि। समय-समय पर रेडियो संगीत रूपक तथा एकांकीक रचना सेहो कएल अछि। हिनक
संगीतरूपक हमर स्वप्न सार्थक भेल'1 पूर्ण प्रसिद्धि पओलक। 'मेघदूत' क सरल मैथिली
अनुवाद सेहो कएने छथि। 'सूर्यमुखी' काव्य कृति पर 1982 मे कविवर विद्यापति पुरस्कार तथा
वर्ष 1984 मे साहित्य अकादेमी पुरस्कार भेटलनि।



कविवर आरसीक रचनाक मुख्य स्वर अछि राष्ट्रीयता। हिनक रचनामे राष्ट्रीयताक
भावना कूटि-कूटि कए भरल अछि। आरसी बाबू सदिखन लोककें जगबैत आ प्रेरित करैत रहैत
छथि। जाहिसँ राष्ट्रीय एकता मजगूत होइत रहए। तँ राष्ट्रीय एकताकें कमजोर करबामे
लागल राष्ट्रीय तत्वकें निर्मूल करबाक चिन्ता आरसी बाबू रचनाक शब्द-शब्द मे गुंजित अछि।
स्वाधीनता, प्रजातंत्रीय मूल्य आ धर्म-निरपेक्षतामे अटूट वि•ाास छनि। भारतीय संस्कृतिक
समवन्वयतात्मक मूल्यमे आस्था छनि। एही विचारक प्रति ध्वनि थिक जे ओ कोटि-कोटि
भारतवासीकें नव जीवन मूल्यक निर्माणमे तत्पर देखैत छथि-



'स्वाधीनता हमर अछि, अधिकार जन्म जाते

के दस्यु ल' सकै अछि, एकरा उधार खाते

हम ऐक्य-सूत्र बान्हल रजल कोटि-कोटि बासी

युग आइरचि रहलछी, नव सर्जना करै छी

हे जन्मभूमि भारत हम बन्दना करै छी।' 2



कविवरक राष्ट्रभूमि केवल वन्दना-अर्चना धरि सीमित नहि अछि। ओहिसँ आगू आत्म
वलिदानक आवश्यकता लेले तैयार रहबाक हेतु ओ रहबाक हेतु ओ लोकें प्रेरित करैत छथि।
स्वतंत्रताक प्राप्ति आ तकर रक्षा आत्मवलिदान चाहि सकैछ व•ाास छनि। विना त्यागक तकर
रक्षा नहि भए सकैछ-



'भारत जननी माड़ि रहल छथि,

आइ हमर वलिदान

उठू उठू हे भारत प्रहरी

रजागू भारत भक्त

नहि स्वतंत्रता क्यो पबैत अछि

विना चढ़ौने क'




कविवरक रग रगमे स्वदेशक प्रति अगाध प्रेमसमायल अछि। स्वदेशक कण-कणक प्रति
जाग्रत रागात्मकता गीतात्मक भए उठैछ। एहि स्वदेश वर्णनमे मिथिला, मैथिल आ मैथिलीक
प्रति प्रेम आ ओकर हितरक्षाक चिन्ता अभिव्यक्त भेल अछि। मिथिला जनपद मे एकठामहीं
विभिन्न मतावलम्बीक सौहाद्र्रपूर्ण सह अस्तित्वसँ उत्पन्न वैशिष्ट्य आ दोसर दिस 'हर हर बम-
बम' स्वर सँ गुंजित होइत वातावरणक यथार्थ चित्र प्रस्तुत करैत कविवर गबैछ-



'दक्षिण पवन डोलाबय चारि

मंगल गीत सुनाबय सामरि

बम बम करइत भक्तगण विचरय

गंगा जलसँ भरि-भरि कामरि।'



मिथिलाक प्राकृतिक शोभा अध्ययन-अध्यापनक अविच्छि-परिपाटी आ अपन प्रिय कवि
विद्यापतिक आह्लादक गानक प्रसंग कविवर आरसी अपन सरल आ सहज गीतात्मक शैलीमे
लिखल अछि-



'बाड़ी बाड़ी लतरल थान

पोखरि-पोखरि फुटल मखान

राह बाट मे गुंजित होइछ

विद्यापतिक मनोरम गान

गाम-गाममे धर्म धुरन्धर

पढ़ति-पढ़ावथि मीन ओ मेष

धन्य धन्य ई मिथिला देश' ।

कविवर चन्दा झा धनधान्यसँ परिपूर्ण मिथिलाक वर्ण करैत लिखने छथि-

'नदीमातृक क्षेत्रसुन्दर शस्यसँ सम्पन्न

समय सिरपर होय वर्षा बहुत संचित अन्न ।'



किन्तु, कविवर आरसी नन्दन वन सन सुन्दर मिथिलाकें पसान भेल देखि व्यथित भए
गेल छथि। मिथिलाक शोषण आ जन आकांक्षक त्रास अनुभव करैत छथि। किन्तु, शोषित आ
उपेक्षित मिथिलाक भीतर धधकैत धधराक धाह अनुभव कएलाक बाद ई वि•ाास भए गेलछनि
जे लोकक मूँहकें आर अधिक दिनधरि जाबि राखल नहि जी सकैछ। जायज अधिकार सँ
अधिक दिनधरि वंचित नहि राखि सकैछ-



'मरघट भेल स्वर्गवन गीदड़

गीध कुकूर कुचरै अछि।

बैसि कण्ठ पर क्यो बलजोरी

स्वर नहि दाबि सकै अछि ।


लेब अपन अधिकार आब हम

अपन महालक पानी

मांगि रहल छी प्रथम आइ हम

अपन मातृ जन वाणी।'



कविवर अनुभव करैछ जे व्यक्तिकें अपन भाषा साहित्य, संस्कृति आ क्षेत्रक विकासक
अधिकार छैक। किन्तु, मिथिलावासी ओहि अधिकार सँ वंचित अछि। ओकरा ई अधिकार नहि
छैक। भाषा आ साहित्यक विकास क बाट उन्मुक्त करबाक स्थान पर ओकर अवहेलना कएलं
जाइछ। शोषणक पात्र बना रखबा लेल सभ प्रकारक ध्योंत कएल जाइछ। त्रासद स्थिति सँ
मुक्तिहेतु कविवर युद्धगान करैछ। कविक स्पष्ट धारणा अछि जे कमला, कोशी आ वागमतीक
तेजधार जकाँ उमड़ल लोकक बाढ़ि, जे लुप्तकएल जाइत अपन प्रतिष्ठा रक्षा हेतु, आबि रहल
अछि, केओ रोकि नहि सकैछ। एहि जन आक्रोशक समस्त कुचक्र धूल धूसरिता भए जाएत तंत्र
डगमगा उठत-



'चलि ने सकै अछि आब सवारी हौदा कसि क'

ई अदराक मेघ ने मानत, रहत वरसि क।'



स्वाधीनताक प्राप्तिपर जन जीवनमे नवीन उत्साह उमड़ल। वि•ाास छलैक जे स्वतंत्र
भारतमे भरिपेट अन्न, भरिदेह वस्त्र आ रौद-तापसँ बचबा लेल कमसँ कम एकचारीक व्वस्था
अवश्य भए जएतैक। ओहि उल्लासमय व्यवस्थाकें स्वर कविवर देल-



"नवीन युग नवीन जन

नवीन मुक्ति बालिका

स्वतंत्र देशमे खिलल

नवीनदीप मालिका।'



किन्तु, स्वतन्त्रदेशक नवीनदीपमालिका, लोकक आशा-आकांक्षाक बरल दीप, टेमी-
बातीक विना टिमटिमाय लागल। पाँच वर्ष लेल निर्वाचित नेताक किएदानीसँ लोक अचंभित भए
उठल। विकास योजनाक राशि नेता, अभियन्ता आ ठीकेदारक अथाह पेटमे निपन्ता होअय
लागल। बाढ़िकें रोकबाक नामपर आवंटित राशि त्रिमूर्तिक उदरस्थ होइत गेल। किन्तु, बाढ़िक
प्रकोपएसँलोक मुक्त नहि भेल। घर-आड़न, खेत-खरिहान प्रतिवर्ष दाहइत रहल। रोग-शोकसँ
लोक तबाह होइत रहल। किन्तु नेता लोकनि बाढ़ि ग्रस्त अपन निर्वाचन क्षेत्रक हवाई सर्वेक्षण
दिल्ली आ पटनासँ उड़िउड़ि करैत रहलाह। लोकक त्रासद स्थिति आ नेताक लोकविरोधी
अन्यमनस्कता कविवरकें भीतरसँ झकझोरैत रहल। विकल जनकवि आरसी ओहि कोटिक नेता
पर व्यंग्यवाण छोड़ैत रहलाह-



'हे ऊधो माधोसँ कहबनि अपने गेलाह विदेश,

हमरा ले द गेलाह एतय ई भूखमरीक कलेश ।


एको बून अखाढ ने वरिसल साओन आयल बाढ़ि

चूल्हिक पूत्ता पानि चढल अछि, माय कन छथि ठाढ़ि ।'



जनप्रतिनिधिकँ मंत्रिमंडलमे स्थान हेतु अपस्याँत भेल देखि कविवर दुखी भए जाइत
अछि। मंत्रीत्वक आकांक्षी नेताक रुचि ध्वंसात्मक होमय लागल। एक मंत्रीमंडल कें खसाय
दोसरकें उठेबाक प्रवृत्ति बढ़ल। एहि प्रकारक जोड-घटावसँ जनताक प्रति ध्यान मे कमी आएल।
भूखल नाङट लोक लेल जीवनक कोनो अर्थ नहि रहल। किन्तु दोसर दिस ओकरहि शोणित
पीबि मोकना बनल जाइत लोककें देखलन। एहि कारणें पसरैत विकृतिकँ कविवर चिन्हल।
कारण कें शब्दायित कएल। भूखल ति सहानुभूति जगबात, स्थितिक भयंकरताक वर्णन करैत
कविवर लिखल-



'जकरा चाही मुँहमे रोटी

आओर कण्ठमे पानि

से त्रिकालमे की दै सकैछ

चन्द्र किरणकें मानि?

ख ने सकै अछि पीबिने जकरा

से बूझत की लोग

नव वसन्त शोभा के देखत

आँखि पेट मे रोग ।'



कुर्सीक रक्षा हेतु नेताक सह पर लठैत लोकनि जनतंत्रीय मूल्यक डाँढ़ तोड़ैत रहल।
बूथ पर कब्जा सामान्य बात भए गेल। वोट हँसोथि अपन नेताक पेटीमे खसादेब अप्रत्याशित
घटना नहि रहल। एहिसँ सामाजिक आ राजनीतिक अनैतिकता बढल। असामाजिक प्रवृत्तिकें
बल भेटलैक। चोर उचक्का प्रश्रय पओलक। एहिसँ मानवीय मूल्यक विघटभेल। विकृति आ
बिडम्बना पसरल। एहि देश कविवरक नजरि नहि जाएब असंभव छल-



'पुण्य बनल अछि चोर बजारी

सेठ भेल शठ, चोर जुआड़ी

टीक कटौने भरिसक दमड़ी

झा चामक व्यापार करै छथि ।

कलि कौतुक विस्तार करै अछि।'



मानवीय, सामाजिक अथवा वैयक्तिक मूल्यक सँ सांस्कृतिक कार्यक्रमक अर्थ संकुचित
भए गल। सांस्कृतिक शब्द उच्चारणसँ जाहि उदारताक बोध होइत छल, से घृणास्पद भए
गेल।

'निष्फल शास्त्र पुरानक चर्चा

नीक नाच रंगक बट खर्चा


लाड़ि-चारि एकहि लड़नासँ

सब किछु बंटाधार करै अछि,

कलि कौतुक विस्तार करै अछि।



कविवर आरसीक सर्जनात्मक जीवनक प्रारम्भिक कालमे हिन्दी साहित्यमे छायावाद ओ
रहस्यवाद अपन उत्कर्ष पर छल। ओ दूनू भाषाक प्रति सतर्क रहि रचना करैत छलाह।
छायावाद ओ रहस्यवादक प्रवृत्तिसँ अछूत रहब, युगीन प्रवृत्तिसँ फराक रहब छल। तँ कविवर
आरसी छायावादी-रहस्यवादी मूल गीतक रचना सेहो कएल :



'दीप जरैत रहि गेल राति भरि

सगुन उचारैत राति भरि,

हम रहि गेलहुँ आँखिसँ अपने

बाट बोहारैत राति भरि ।'

छायावादी काव्यक प्रवृत्ति स्थूलतासँ सूक्षता दिस आ प्रकृतिक मानवीकरणक अनुरूपहि
'शोफालिका' कवितामे सफलरूपें प्रयुक्त अछि-



'नित्य विहरावलि प्रभातहि

उठि हमर मृदु विरुद गाबय

आबि दक्षिण देशसँ

पावन पवन हमरा जगाबय।

चकित विस्मित चौंकि जहिना

आँखि खुलि जाइछ हमर कल

बांधि किरणक पाशसँ

नूतन तरणि हमरा जगाबय ।



भोर मे पक्षीक कलरवकँ विरुदगान मानव, दक्षिण पवन द्वारा देह डोलाएब सूर्यक
किरणरूपी डोरी मे बान्हि जगाएब आदि द्वारा एक सफल ब्म्बक निर्माण कएल अछि।
एकहिठाम विभिन्न प्रकारक विम्बकें उपस्थि उपस्थित कएएक सान्द्र बिम्बक निर्माण कविवर
आरसीक काव्यक एक खास विशेषता अछि।



विभिन्न घटनाक ओराहक-अवरोह सम्पुंज मनुष्यक एहि जीवनमे रुदन-हास आ आश-
निराशाक क्षणक अभिव्यक्ति, कविक रचनामे होएब अस्वाभाविक नहि अछि। आ एही
स्वाभाविकताक कराणें हिनक रचनामे नैराश्य बोध सेहो भेटैछ :



'काल रुाोत मे कमल फूल सय जीवन भांसल जाए

रस समुद्रमे यद्यपि डूबल प्राण पियासल जाय ।'




किन्तु, कविवर आरसीक नैराश्य वोध मे एक विशेषता अछि। ओ विशिश्टता थिक
नैराश्यक अन्हर-बिहाड़िमे प्रवहमान कोमल भावनामय कविक सौन्दर्य चेतना। इएह कोमल
भावना लोककें अपनादिस आकर्षित कए लैतथा पाठक कविक अनुभूतिक संग एकात्म्य भए
जाइछ। कविवर आरसीक कविताक ई विलक्षणता थिक। कवि कर्मक सफलता थिक।
तरंगावलीक गर्जनक बीच भसिआइत लक्ष्यच्युत जीवनक तीव्रता, अवसाद आ नैराश्यक
घटाटोपक अछैतो कविवर जीवनक सुखद क्षणक सफल गीतात्मक अभिव्यक्ति अपन गीत 'मोन
हमर शरत् प्रात' मे कएल अछि-



'मोन हमर शरत् प्रात, प्राण हमर हरसिंगार

झड झड झड़ झड़ल सुमन, मह मह मह पसार ।

मन्द मन्द मलय पवन

सुरभित उपवन वन वन

मादक मोहक प्रसार

बाँटि रहल भुवन-भुवन

आंगन आंगन सुवास, बहय सास सुरुचि धार

मोन हमर शरत् प्रात, प्राण हमर सिंगार।5



कविवरक एहि गीतमे आदिसँ अन्तधरि कविक तीव्रभावानुभूति प्रवाहित भेल अछि।
भावानुभूतिक त्वरित अभिव्यक्तिमे प्रभावक क्षिप्रता अछि। अनुरणात्मक शब्द योजनासँ उत्पन्न
गेयधर्मिता, हार्दिकताक भाव भूमि पर तादात्म्य स्थापित करबा लेल विवश कए दैछ। संगहि
शिल्पक दृष्टिसँ एहि गीतमे एकहिठाम अनेक काव्य वैशिष्ठ्य विद्यमान अछि। मोन जे अप्रस्तुत
अछि तकरा लेल अप्रस्तुति शरत् प्रात तथा अप्रस्तुत प्राण लेल प्रस्तुत हरिसिंगारक योजना
कएल अछि। एहि प्रकारें अप्रस्तुत लेल अप्रस्तुत तथा अप्रस्तुत लेल प्रस्तुत योजनाक माध्यमसँ
उल्लासमय वातावरणक सृष्टि करबामे कवि सफल भेलाह अछि। एहिगीत मे कविक ऐन्ट्रिक
संवेदना सेहो प्रखरतम रूपमे अछि। 'झड़ झड़ झड़ झडब' आ मन्द मन्द मलय पवन' सँ
गत्यात्मक चित्र बनैछ। ई चाक्षुष रूपविधानकें सेहो स्पष्ट करैछ। हर सिंगार आ सुमनमे रस आ
गंधबंधी, पवनमे स्पर्श संबंधी तथा सुरभिधारमे रस, गंध, नाद संबंधी ऐन्ट्रि य संविदना वर्तमान
अछि। सभ मिलाकए गत्यात्मक चित्रविधानक सफल संयोजन एकहिठाम भए गेल अछि।
संक्षेपमे आरसी बाबूक कविताक चेतनाक प्रसंग कहल जा सकैछ जे शोफालिकाक चेतनासँ
सूप्यमुखीक चेतना दिसबढ़ैत गेलाह अछि।

मै. अ. प. 1982



.. .. .. ..



उपेन्द्र ठाकुर 'मोहन' आ हुनक कविता



'मज्जरि रस मदिरा पीबि-पीबि


शाखाक अंक मे लीबि-लीबि

स्वर मे विह्वलता सीबि-सीबि

पिक गाबि रहल अछि मत दुरन्त

आएल बसन्त! आएल बसन्त !1



छात्र वर्गक प्रिय श्रीरामचन्द्र बाबू पढ़ा रहल छलाह-'आएल बसन्त आएल बसन्त।' जेना
पाँती मे छैक तहिना ओहो काव्य रस मदिरा पीबि-लीबि जाइत छलाह। पिक द्वारा स्वर मे
विह्वलता सीबाक प्रक्रिया कें हाथ सें देखाकें छात्र वर्गक मन मे नैसर्गिक मद जगबैत छलाह।
कण-कण कें उत्फुल्ल आ प्राणामय कए दैत छलाह। गीतक विविध विशेषता क विश्लेषण करैत
गीतक रचयिता क नाम उचारैत छलाह 'मोहनजी माने उपेन्द्र ठाकुर मोहन' । आ फेर पढ़बय
लगैत छलाह्' आएल वसन्त आएल बसन्त'। शिक्षकक संगे पूरा कक्षा लीबि स्वर मे विह्वलता
सीबय लगैत छल।



किछु वर्षक बाद पटना गेला पर 'मिहिर' कार्यालय अधिक काल जएबाक अवसर होअय
लागल। एक गोटेकें सदिखन किछु ने किछु लिखैत अथवा मन सँ प्रूफ संशोधन मे रत
पबिअनि। आश्चर्य होअय जे गप्प सरक्का सँ अप्रभावित रहि, ओ सदिखन कोना कार्यशील रहि
जाइत छथि। जखन नहि रहल गेल तँ हंसराजजी (ज. 1938) सँ पूछिए देलिअनि। 'मोहनजी'
सुनितहि धकसन लागल। 'आएल वसन्त आएल बसन्त वला' मोहन जी? अभूतपूर्व आनन्द सँ
आह्लादित भए उठलहुँ। जे रचना गत कतेको वर्ष सँ जीहे पर छल, तकर रचयिता मैथिली
साहित्य क एकटा विभूति मोहन जी'क दर्शन पाबि गदगद भए उठलहु। असीम श्रद्धा उभरि
पड़ल।



मोहनजी संग परिचय क्रमशः प्रागाढ़ होइत गेल। एही बीच हम 'श्यामानन्द रचनावली'
पर काज आरम्भ कए देने छलहुँ। ज्ञात भेल जे 'मोहनजी' कें स्व0 श्यामानन्द झा सँ खूब
परिचय छलनि। जिज्ञासा कएला पर पहिने पारिवारिक परिचय पूछि जे किछु महत्वपूर्ण सूचना
देल से कहबाक क्रम मे देखल जे मोहनजीक आँखि डबडबा गेल छलनि। बम्बइ प्रवासक
संस्मरण सुनला सँ दूनू विभूतिक व्यक्तित्व बुझबाक मौका भेटल।



मोहनजी सेवा सँ अवकाश पाबि गेल छलाह। उद्वेग लागल छल। भेंट करबा लेल डेरा
पर गेल छहुँ। देखितहिं आनन्द विभोर भए उठलाह आ पत्नी सँ कहलथिन 'रमणजी' छथि,
श्यामानन्द बाबूक भातिज, जे हमरा बम्बइ मे जीविका दिऔने छलाह। आ फेर देखल मोहनजी
अथीत मे हेरा गेलाह। आँखि डबडबा अएलनि। हम अप्रतिभ भए उठलहुँ। अश्रुपूरित नेत्र देखि
ओहि महान कविक महान व्यक्तित्व क ओर-छोर देखबाक हम असफल प्रयास करए लगलहुँ।
आश्चर्य लागल छल जे मात्र एक संयोग कें जीवन भरि मोन राखय बला लोक औखन अछि।



कविवर उपेन्द्र ठाकुर 'मोहन' क जन्म 1913 ई0 मे ग्राम-पुरुषोत्तमपुर (चतरिया), पो0-
शुभंकरपुर, जिला दरभंगा मे भेलनि। हिनक परिवार मे सरस्वतीक चास-वास छल मुदा लक्ष्मीक


नहि। तें बालक 'मोहन' कें ओ सुविधा कहिओ नहि भेटि सकलनि जे सभ एक नेनाक शिक्षा
लेल आवश्यक रहैछ छैक। स्थिति तँ एहन त्रासद छल जखन विद्यालय मे नाम लिखाओल
गेलनि तँ एकोटा पोथी नहि छलनि।



मोहनजी क परिसर मे एकटा कहबी बड़ प्रचलित छल, 'पढ़ह पूत चण्डी, तखन
चढ़तह हंडी।' तात्पर्य जे योग क्षेम लेल गुर्गापाठक पूर्ण अभ्यास आवश्यक रहैत छलैक। परंच,
मोहनजी पिता जे स्वयं वैदिक छलाह, पुत्र कें हंडी चढेबाक हेतु चण्डी नहि, तत्वज्ञानक हेतु
गीताक अभ्यास पहिने करा देलथिन। एकर फल भेलनि मोहनजी कें परमार्थ चैतन्यक बोध
भेलनि, अपन गोटी सुतारबाक प्रोढ़ि नहि। किन्तु जें कि योग क्षेम लेल दुर्गापाठक अभ्यास
अत्यावश्यक रहिते छल, तें मोहनजी चण्डीक अभ्यास सँ कोना बाँचल रहितथि?



मध्यमाक छात्र मोहनजी कें एकोटा पोथी नहि। पोथीए नहि तखन पढ़ताह की? एही
बीच एकटा घटना घटल। राज दरभंगाक कंकाली मन्दिर पर दुर्गापाठ लेल रामबागक हरि
मन्दिर पर दुर्गापाठक परीक्षा लेल जाइत छलैक। ई सुनि गामक एक बूढ़ा ललकारादेल। 'जाहू,
दुर्गाक अभ्यास कहिआ काज अओतह।' मोहनजी कें रहल नहि गेल। परीक्षा लेल जूमि गेलाह।
हिनका देखि पंडित सभ धुतकारि देल। मोहनजी डटल रहलाह। हतोत्साहित करबाक नियतें
दस मिनट धरि विभिन्न स्थल सँ पाठ कराओल गेलनि। किन्तु उच्चारणक शुद्धताक कारणें,
परीक्षक मंडली क समक्ष उत्तीर्ण घोषित करबाक अतिरिक्ति आन कोने उपाये नहि रहल। एहि
प्रतियोगितामे उतीर्ण भेला पर मध्यमा क पोथी क जोगाड़ तँ लगबे कएलनि, दुर्गा पाठेक बल
पर मुजाफ्फरपुर से संस्कृत कॉलेज क छात्रावासो क खर्च जुटबैत रहलाह।



साहित्यक प्रति अभिरुचि आ साहित्य सर्जनाक प्रतिभा वाल्य-कालहि सँ मोहनजीमे
छल। ई बुझितो जे साहित्य अर्थकारी नहि थिक, तैयो साहित्ये पढल। पिता सेहो चाहैत
छलथिन जे साहित्य पढ़ि कोनो विद्यालय मे हेड पंडित भए जएताह। मुदा सेहो नहि भेलनि।
कोनो विद्यालय अथवा अन्ये शिक्षण संस्था मे जीविका पएबाक स्थान पर प्रेसजीबी भए गेलाह।
प्रूफ पढ़ैत-पढ़ैत एक प्रतिभासम्पन्न सर्जनाकारक जीवन गुदस्त भए गेल।



मोहनजी प्रारम्भहि सँ एक मोधावी छात्र छलाह। सभ दिन परीक्षाफल उत्तमे होइत
रहल। किन्तु तदनुरूप जीविका नहि भेटल। पिताक मनोरथ पूरा नहि भेल। परिवारक स्थिति
तेहन नहि छलनि जे घरे बैसि काव्य सर्जना करितथि। स्वयं लिखैत छथि' - शास्त्री, आचार्य,
प्रथम श्रेणी मे उत्तीर्ण कएलो पर प्रान्त मे कतहुँ जीविका नहि भेटल रहय। आश्रमक दीन-हीन
स्थिति, परिवारक लोक उद्विगन। कौचर्य असह्र भेल तँ बाहर जएबा लेल उनमुनयलहुँ, पाँखि
फड़फडओलहुँ, गामक परिस्थिति गाम छोड़ि बाहर जयबालेल विवश' कए देलक।' मुदा
जएताह कतय? वट खर्चा कतयसँ आओतनि? चिन्ता छलनि। मुदा मित्र लोकनिक सदाशयता
सम्बल भेल। गाम सँ विदा भए गेलाह। काशी सँ बड़ौदा पहुँचलाह। राजकीय प्रतियोगिता मे
सफल भेलाह। यश आ अर्थ दूनू प्राप्त भेलनि। ओतय सँ सूरत होइत बम्बई पहुँचलाह। अपन
पाण्डित्यक विजय पताका फकरबैत, कविते सँ बटखर्चा चलबैत। पूर्व देल आ•ाासन आ


सहयोग क अनुरूप मैथिलीक ख्यातनाम साहित्यकार एवं संस्कृतक विष्णात् विद्वान जे0 वी0
एम0 संस्कृत कॉलेज बम्बई क प्रधानचार्य पं0 श्यामानन्द झाक सत्यप्रयासे मोहनजी किछु दिन
जीविका क लेल ट¬ूशन कएल। तदुपरान्त, लक्ष्मी वेंकटे•ार प्रेस, कल्याण बम्बई मे स्थायी
जीविका प्राप्त भेलनि, प्रूफ संशोधन विभाग मे। ओहि दिन क प्रसंग मोहनजी लिखने छथि-
'हमर जीवनक ओ प्रथम स्वर्णदिन छल। स्थायी जीविका पाबि आनंदाश्रु झरल छल। श्यामानन्द
बाबू अपन कत्र्तव्य-भार समाप्त बूझि चैनक साँस छोड़ैत बाजल छलाह। जीवनक एकटा नीक
काज सम्पादित भेल

हमरा सँ। अहाँक सफलता हमर उल्लास थिक। अहाँ अँखिगर पंखिगर नहि छी। आ ने
चलतापूर्जा छी, हमरा भार छल, चिन्ता छल।'2



मैथिलक दूर प्रवास सहिता क 'मोहन' जी अपवाद नहि छलाह। गामक उचाट लागि
गेलनि। पिता परोक्ष भए गेलथिन। पुनः जखन बम्बई जएबा लेल उनमुनयलाह तँ ओ नौकरी
छूटि नौकरी गेल छलनि। किछु वर्ष गाम मे बेकार रहलाह। मुदा एकटा फेर संयोग भेलैक।
ओएह पं0 सुरेन्द्र झा 'सुमन' (ज. 1911) जे काशी बड़ौदा, सूरत आदि जयबा काल विशेष
संबल बनल छलथिन, आर्यावत्र्त' मे प्रवेश हेतु सहायक भेलथिन। 1949 ई0 मे आर्यावत्र्त मे
अन्तर्मुक्त कए लेल गेलाह। 1960 ई0 मे जखन 'मिथिला मिहिर' साप्ताहिक प्रकाशन पटना सँ
भेल तँ ओकर सम्पादकीय विभाग मे बजा लेल गेलाह, जतय सँ 1977 ई0 मे अवकाश प्राप्त
कएल आ। 1978 ई0 मे 'बाजि उठल मुरली' पर साहित्य अकादेमीक पुरस्कार प्राप्त कएल।



मोहनजी 'घटाटोपी' नहि छलाह। तँ सभ दिन ओ कागजी पंडित बनल रहलाह।
'चोखो पंडित' नहि बनि सकलाह। हिनका सँ योग्यता आ क्षमता मे न्यूनो व्यक्ति हिनकर आगूए
रहल। बम्बइमे दोसर बेर भगतिया नहि भए सकलाह, जपे करबा लेल सदिखन मनोनीत होइत
रहलाह। एहि हेतु जे 'भंगतिया' कँ अधिक दक्षिणा भेटैत छलैक तँ ओकर मनोनयम परिचय एवं
पैरवी पर होइत छलैक।



मोहनजी चाटुकार नहि छलाह। ललो-चप्पो नहि करैत छलाह। तँ पटनो मो ओएह
'कागजी पंडित' रहलाह। लिखैत छथि-'कोनो क्षेत्र मे चोकखो पंडित' सिद्ध होएबा लेल ओएह
खुशामद-दरबार चाही, नहि तँ 'कागजी पंडित' रहिक सड़ की? मसाला रखलो पर जपे
करबाक बाध्यताब 'भगतिया' पंडित ओएह होएत जे खुट्टा कँ सधने रहए। बम्बइए कियेक पटना
अएलहुँ तँ ओएह 'कागजी पंडित' ततबे ।'3



मोहनजी स्वाभिमानी छलाह। सवाभिमानक रक्षा सबसँ पहिल काज मानैत छलाह।
स्वाभिमान क रक्षार्थे कतेको लाभ छोड़ैत रहलाह। एक बेर कवि सम्मेलन मे किछु व्यक्ति क
उकसौला पर कविता पढैत काल हल्ला भेल, जाहि सँ मोहनजीक स्वाभिमान कें धक्का लगनि।
मोहन जी पुनः मंच पर नहि गेलाह, जीवन भरि प्रण निवाहल।




उपकार क मोन रखबाक अद्भुत गुण 'मोहनजी' मे छल। रजे केओ व्यक्ति जाहि कोनो
अवस्था जेना सुमन जी बडौदा जएबा लेल मासूलक व्यवस्था कएलथिन 'आर्यवत्र्त' मे नौकरी
हेतु सत्यप्रयास कएलथिन, काशी मे पं0 काशीनाथ ठाकुर 'कलेश' (स्व0 1990) एवं कांची
नाथ झा 'किरण' ग्रासवास देलथिन, सूरत मे गुरुकुलक विज्ञान पं0 लक्ष्मीकान्त झा ओ पं0
श्यामसुन्दर झा सहायक भेलथिन, बम्बइ मे पं0 श्यामानन्द झा स्थायी जीविका क व्यवस्था
करौलथिन, सभक प्रति मोहनजी कृतज्ञ रहलाह। सुमनजीक प्रसंग लिखैत छथि'-सुमन जी सँ
हमरा नीक लग्न-नक्षत्र मे भेंट ओ सदा हमर योग-क्षेम चाहलन। एहिना पं0 श्यामानन्द झाक
प्रसंग लिखैत छथि-'श्यामानन्द बाबू आइ नहि छथि, मुदा हमर रोम-रोम हुनक स्नेह द्याक प्रति
कृतज्ञ अछि। श्री रमानन्द झा 'रमण' कें देखैत देरी हुनक स्मृति सजग भए उडैछ ओएह उदार
प्रकृति, ओहने मनीषी आ स्वाभिमानी। ओहने प्रतिभा मेधा, ओहने कुलीनशालीन। मोहन जीक
व्यक्तित्व कतेक विशाल छल तकर उदाहरण थिक हुनक आभार-ज्ञापन।



मोहनजी अपादमस्तक कवि छलाह। कविता मे जीवैत छलाह। ओ कहिओ मंचक पाछू
नहि दौड़लाह। मानैत छलाह जे नीक कंठ आ घटाटोपी व्यक्ति लेल मंच होइछ। ओ ने तँ
घटाटोपी छलाह आने गीते गएबाक लूरि छलनि, तें ओ सदा मंच सँ परहेज कएल। ओ कतेको
कवि जकाँ बन्द लिफाफ क पाछू कहिओ ने

गेलाह। मोहनजी इहो मानैत छलाह जे पैघ-पैघ। मंच आ जनसमुदायक बीच कवि सम्मेलन
कविताक आस्वादन लेल उपयुक्त स्थान नहि थिक। यद्यपि प्रत्येक कें अपन आ अपन कविता
प्रचार-प्रसार क इच्छा रहैछ। मुदा कवि सम्मेलन गंभीर कविताक स्थान नहि थीक। ओतय
ओएह कवि प्रशस्ति पाबि सकैत छथि जे अपन स्वर मधुरिमा सँ लोक सँ लोक कें मंत्रमुग्ध कए
ठहक्का क हिलकोर उपजा सकय अथवा कोनो वीर भावनाक पद कें तर्जन-गर्जन क संग
अनेक मुद्रा देखाकए शौर्यक उद्रेक आनि देअय। रजँ केओ कलाबाजी नहि जानथि तँ अनेरे
ओतए स्वयं उपहास्य बनताह। मंचक हेतु कवि भिन्न, स्तरीय कविताक कवि भिन्न। स्तरीय
कविताक पाठक स्थान एहन गोष्ठी भए सकैत अछि, जतय चुनल-बीछल निष्णात बौद्ध श्रोता
होथि। कवि सम्मेलन मे तँ इहो होइत छैक जे गट्टी बना कए कोनो अपेक्षित कें प्रसंशित आ
अनपेक्षित कें निन्दित करा देल जाइत अछि-



'मोहन'जी मैथिलीक बहुविध विकास लेल सदिखन चिन्तित रहैत छलाह। ओ मानैत
छलाह जाबत काल धरि मैथिली कें संविधान मे स्थान नहि भेटैछ, बहुविधि विकास मे बाधा
अबिते रहतैक। किन्तु, वि•ाास भए गेल छलनि, आगि पजरि गेल अछि। पसाही लगेबाक देरी
छैक। जे भएं रहलैक अछि ओहि मे आर अभिवृद्धि होइत जेतैक। जा धरि लक्ष्य सिद्ध नहि
होइछ, चैन नहि लेल जाय।' 7



मैथिलीक एहि महान साहित्यकार आ हितचिन्तकक देहावसान 24 मई 1980 कें 67
वर्षक अवस्था मे भए गेलनि। हिनक देहावसान पर मार्कण्डेय प्रवासी (ज. 1942) धर्मराज क
नाम एकटा शोकपत्र लिखैत छथि-धर्मराजा। अहां कें ई स्वीकार करबाक चाही जे श्री उपेन्द्र
ठाकुर 'मोहन' कें मारि कए अहाँ ओहने गलती कएलहुँ अछि, जेहन गलती वाल्मीकि,


कालिदास, भारवि, जयदेव, विद्यापति आ चन्दा झा आदि कें मारि कएने छलहुँ। अहाँ सन
बुझनुक लोक ई अनुमान कएं सकल जे मोहनजी सन कवि कें मारब अहाँक सामथ्र्य सँ बाहर
क विषय अछि। तँ मोन नहि मानैछ जे अहाँक नेनमति एखन धरि गेल नहि अछि आ एही
कारणें अहाँ मोहनजी सन अमर कवि व्यक्तित्व कें टोङि लैत छी, जकरा समाज जीवित राखए
चाहतैक ओकरा मारि देला सँ स्वयं मृत्युए हास्यास्पद बनैछ। की अहाँ एहि सत्य कें स्वीकार
नहि करैत छी?



कविवर उपेन्द्र ठाकुर 'मोहन' कें साहित्यक प्रति अभिरुचि आ सर्जनात्मक प्रतिभा
बाल्यकालहि सँ छल। जखन ओ प्रथमाहिक छात्र छलाह सर्जनात्मक प्रवृत्ति हुलकी मारैत छल।
पाठ्यपुस्तक सँ वेशी साहित्यिक रचनाक स्वाद लीअ लागल छलाह। 'ई रजनी-सजनी हमरा
प्रथमा क बादे जकड़ि लेने छल, हम पाठ्य-पुस्तक सँ अधिक कविता, कथा नाटक उपन्यास
पढ़ल करी हिन्दी, संस्कृत, आ मैथिलीक। छोटे वयस मे सर्जनात्मक प्रतिभा हुलकए लागल
पहिने संस्कृत, फेर हिन्दी आ बाद मे मैथिली धराएल। किछु तेहन कारण भेलैक जे मैथिली
केन्द्र विषय भए गेल, आन कौखन-कौखन किछु-किछु।' कविता लिखब अथवा साहित्यक प्रति
विशेष अनुराग ओहि समय मेनीक नहि मानल जाइत छल। ओ अर्थकारी नहि छल संगहि
अन्यशास्त्र जकाँ साहित्यक विभिन्न उपादानक वा मानदण्डक खास कए श्रृंगार रसक उन्मुक्त
व्याख्या विशेष कए गुरु सँ सुनब अधलाह बूझल जाइत छल। प्रायः तें मोहन जी अपन
बाल्यकाल क अनुभव कें रजनी-सजनी क मादे व्यक्त कएल छथि। अस्तु। मोहनजी लिखने
छथि जे विशेष कारणवश ओ मैथिली मे लिखब आरम्भ कएल। ओ विशेष कारण वा प्रेरक
छलाह साहित्यिक गुरु कविशेखर बदरीनाथ झाक (1893-1974) सानिध्य आ परम स्नेही ओ
शुभेच्छुक वन्धु कविवर सुरेन्द्र झा 'सुमन'। प्रेरित करैत सुमन जी कहने छलथिन मैथिलीक सेवा
अमूल्य सिद्ध होएत, एकर भंडार भरियौक। एकरा एखन प्रयोजन छैक, संस्कृत हिन्दीक क्षेत्र
विशाल, भोतिअयले रहब। सुमनजीक बात मोहनजीकें जँचि गेलनि आ मैथिली लागि गेलाह।
तकर वादक स्थितिक प्रसंग लिखैत छथि जहिना शिक्षक नहि भए हम प्रेस जीवी भए गेलहुँ
तहिना संस्कृत वा हिन्दी मे लिखबो मन्द पड़ि गेल। मैथिली मे पद-पाँती जोड़ब पवित्र धर्म
जकाँ जोर-शोर सँ धरा गेल।



कविगुरु कविशेखर जीक काव्यमय सानिध्य आ मित्र सम्पादक 'सुमनजी' क प्रेरणा सँ
मोहनजीक साहित्य धार अनाहत आ अवाधित चलैत रहल। विभिन्न पत्र पत्रिका मे प्रकाशित
होइत रचनाक महमही सँ मैथिली क काव्य अस्वादक उत्फुल्ल होइत रहलाह। मोहनजीक
प्रसिद्धि आ ख्याति द्विगुणित होइत गेल। 'मिथिला मिहिर' मे अएबा सँ पूर्व मोहनजी मुख्यतः
कविता लिखैत रहलाह, किन्तु बाद मे पत्रिकाक आवश्यकताक अनुसारे गद्य रचना दिस सेहो
प्रेरित भेलाह। अपन मूल नामे तँ रचना करितहि रहलाह किछु छट्म नामे, यथा-विजयानन्द,
कुंजरंजन, सुदर्शन, पुण्डरीक वामनशास्त्री, वामनकाश्यप, श्रीठाकुर आदि रचना करैत रहलाह।



अद्यावधि मोहनजीक तीन संग्रह प्रकाशित अछि। पहिल छनि 'फूल-डाली' दोसर अछि
'बाजि उठल मुरली' आ तेसर अछि 'इति श्री'। फूल डालीक प्रकाशन (मई 1942) मे भेला


एहिमे फिल्मी भासक गीत अछि। दोसर संग्रह थिक 'बाजि उठल मुरली'। एकर प्रकाशन
सितम्बर 1977 ई0 मे भेल तथा 1978 क 'साहित्य अकादमी'क पुरस्कार प्राप्त कएलक। एहि
मे मोहनजी क 101 गीत कथा काव्य मान्यताक शास्त्रीय उपल्थापन अचि। तेसर संग्रह थिक
'इति श्री' एहि पोथी मे 'बोजि उठल मुरली'क बादक अधिकांश रचना संगृहीत अछि। कविता
क अतिरिक्त पोथीक अन्त मे कविक संस्मरण अछि, जे मोहन जीक जीवन यात्राक प्रामाणिक
गाथा थिक। किछु संस्कृत रचना सेहो अछि। 'इति श्री' नामकरण करैत काल प्रायः ई धारणा
रहल होएतैक जे आब मोहनजी नहि छथि, तें हुनक काव्य प्रणयन के अन्त मानि लेल जाय।
मोहनजीक रचनात्मक सक्रियताक हिसाबे 'इति श्री' भएं सकैछ, मुदा जतय धरि पूर्व प्रकाशित
गद्य रचनाक संकलन-प्रकाशनक प्रश्न अछि, इतिश्री नहि मानल जयबाक चाही, विभिन्न छद्म
नामे प्रकाशित हुनक गद्य आ पद्य रचना सम्प्रति छीड़ि अएले अछि।



मोहनजी आपादमस्तक कवि छलाह। हुनक कविता वा हुनक गीत कवि व्यक्तित्व क
एक भास्वर प्रतीक थिक। ओ एक ओहन भास्वर प्रतीक छलाह जे छलाह जे सदिखन मानव
कल्याणक अजस्त्र रुाोत प्रवाहित करैत रहलाह। ओ व्यक्ति अथवा, जाति वर्ण वा इलाकाक
आधआर पर मनुष्यकें देखबाक अपेक्षा सम्पूर्णता मे देखबाक अभ्यासी भए गेल छलाह। एक
कवि व्यक्तित्व समक्ष भेद-भाव नहि मानैत कवि कें परिभाषित करैत लिखल अद्दि-'कवि माने
प्रस्फुटित पुष्प, जतय सँ पराग झरय आ मकरन्द बरसय। कवि मानें उदित इन्दु जतय सँ
मादक ज्योत्सना पसरय आ आह्लाद बरसय। कवि माने स्वच्छ उच्छल निर्झर। जतय सँ
निर्मल सलिल रुाोत बहय आ झहर-झहर संगीत निनादित होइत रहय।



मोहनजी क नजरि मे कविक जे रूप अछि, कवि कें जेना ओ परिभाषित कएल अछि
बड उदात्त अछि। मोहन जी इहो मानेत छथि जे कविता लिखब चाहला सँ नहि होइछ। केओ
चाहय जे हम कवि बनि किछु पाँति जोड़ि कविक पाँती मे आबि जाइ से नहि भए सकैछ। पाँती
जोड़ि ओ अधिक दिन धरि पाठक-श्रोताकें ठकि नहि सकैछ। भंडा फूटबे करतैक। कविता करब
ओ एक एहन प्रक्रिया मानैत छथि जे संस्कारगत होइछ। जे प्रतिभा आ मेधाक उपेक्षा रखै।
जहिना आग्रह वशीभूत 'कामिनीक संग सहवास तेहने अनुद्रिक्त स्थिति क रचना' मोहनक जीक
नजरिमे अछि। कवि व्यक्तित्व आ कविता कें एक दोसरा सँ फूटाओल नहि देखैत छथि।
फूटाकए देखला पर ने तँ कविता कें चिन्हल जा सकैछ आने कविक व्यक्तित्वक विश्लेषण
सम्भव भए सकतैक। एतनहि मान्यताक स्थिति मे कविताकें परिभाषित करैत छथि-'कविताक
माने कविक जीवन जगत क दर्शन रूपी तड़ित पोथी, कविता माने कविक व्यक्तित्व कृतित्व क
निचोड़। कविता माने कविक भावना अनुभूतिक क सप्राण प्रतिभा। कविता माने कविक प्रतिभा
मेधाक सार पदार्थ-नेनु। कविता माने सृष्टिक समस्त सौन्दर्य राशिक प्राक्कलित संचित केन्द्र
बिन्दु।



कविल लेल आवश्यक छैक जे अपन परिवेश मे जीवित रहय। ओकरा लेल अतीत जीवी
होएब अवावश्यक छैक। ओ अतीतक ज्ञान राखय अवश्य, किन्तु अतीत मे जीवय नहि। अतीतक
जीवन रस जे आजुक परिवेश मे सेहो ओतबे प्रासंगिक अछि, तकरा प्रति साकांक्ष रहब, एक


प्रतिभाशील आ जागृत कवि लेल आवश्यक छैक। जँ ओ आरम्भ सँ अन्त धरि एके राग अलापैत
रहि गेल, तँ ओहि कोटिक रचना मे कोनो प्रकारक परिवत्र्तन नहि अबैछ, जे अपन जीवन-
जगतक प्रति संवेदनशील नहि छथि, तकरा मोहनजी कारी कम्बल कहल अछि-वज्र लेप धारणो
क अनेक कवि छथि, जे ओदि सँ अन्त धरि एके सुर धयने रहि जाइत छथि। ओ कारी कंबल
थिकाह, जाहि पर आन कोनो रंग कहिओ नहि चढ़ि सकैत अछि।



कवि आ कविता मोहनजी मानैत छथि स्वच्छ निर्मल धार जकाँ सभक लेल होइछ।
जकरा जतेक छाक पीबाक होइक पीबि सकैछ। तें ओ कविकें कोनो धर्म, सम्प्रदाय दर्शनक
राजनीतिक बाद सँ असम्पृक्त रहब आवश्यक मानैत छथि। सभक सम्पत्ति कें असम्पृक्त रहब
आवश्यक मानैत छथि। जे सभक सम्पत्ति थीक, जे सर्व जन हिताय अपन जीवन कें अर्पित
कएने रहैछ, ओकरा लेल कोनो एक संकीर्ण बाट पर चलब 'मोहनजी' अनुचित मानैत छथि।
ओ साहित्य कें राजनीति सँ सर्वथा फराक राखय चाहैत छथि। राजनीतिक मूलमंत्र थिक
स्वार्थ-नीति, जेना-तेना गद्दी हथिआएब किन्तु साहित्यक लक्ष्य अछि स्वच्छ निर्मल उच्छल निर्झर
जकाँ बिना ककरो बारने स्फूर्त्ति प्रदान करब। एहि सन्दर्भ मे मोहनजी स्पष्टतः लिखैत छथि-
साहित्य जखन राजनीति कला कौशल सँ छल छद्म दिस अभिमुख भए जाइछ तुँ ओ मूलतः
कर्मनाशा (लेरक नदी) भए उठैत अछि।' 14



सम्प्रति प्रचलित विभिन्न राजनीतिक वाद वा मतवादक पक्षपाती होएब कवि लेल
मोहनजी पातक तॅ मानिते छलाह, साहित्यक राजनीतिओ कें ओ काव्य नहि मानैत छलाह।
आलोचन क क्षेत्र मे व्याप्त दृष्टि, अपनहि 'गट्टी भरि पनवट्टी' कें ओ स्वस्थ विकासक लेल
बाधक मानैत छथि। एहि प्रवृत्ति सँ भलहि अपन गट्टीक प्रतिभाहीनो व्यक्ति किछु क्षण लेल
चमकि उठय, किन्तु कालान्तर मे कलइ खुजबे करतैक आ खुजबे कएलैक अछि, से मोहनजीक
अनुभव आ मान्यता अछि। सही आलोचकक विशेषताक प्रसंग मे लिखल अछि-आलोचक वर्ग
कोनो सत्ताक वेतन भोगी दास नहि थिक, कोनो सत्ताक निर्धारित नीतिक भोंपा, लाउडस्पीकर
नहि थिक, एकरा सही विवेचक होएबाक चाहियेक कोनो वकील जकाँ अपन सुअक्किलक पक्ष
मे वुद्धिक व्यायाम कए, अनुकूल युक्तितर्क जुटायबे एकर गरिमा क साधक कोना भए सकैत
छैक? किन्तु भए रहलैक अछी सैह-फल्लाँ कें उठयबाक अछि, तँ तेहने लेयर(कलइ) चढ़ा
दियौक जे पितड़ि क वत्र्तनो चानी जकाँ चकमका जाइक। आ खसेबाक अछि तँ चानियो पर
कारी लेप पोति दियौक। झाम गुड़थु बाजार मे केयो पुछबो ने करतनि,15 सर्जनाकार अपन
भावावेगक अभिव्यक्ति लेल विभिन्न विधाकें माध्यम मे स्वीकार करैछ। ओहि विधा कें भरैछ,
विकसित परिष्कृत करैछ। ओहिना यदि मोहन जीक सर्जनात्मक प्रतिभाक अभिव्यक्तिक माध्यम
ताकल जाय तँ ओ जाहि विधाकें अंगीकार कएल ओ होएत काव्य। कतेको सर्जनाकार एकहि
संग विविध विधा कें माध्यम बना लैत छथि, मुदा मोहनजीक संग एकटा विचित्रता अछि जेओ
कविताकें अपनौलनि। ओहू मे गीतक हुनक सम्पूर्ण सर्जनात्मक प्रतिभाक अभिव्यक्तिक एक मात्र
माध्यम रहल अछि।



गीत कें माध्यम रूप मे स्वीकार करबाक कारण अछि गीतनाद कें जीवनक अंग मानब।
मोहनजीक स्पष्ट मान्यता छनि जे मन बहटारय लेल सभ क्यो कौखन किछु गबैत अछि, अथवा


दबले स्वर मे गुनगुनाइत अछि। ई नाद ब्राहृकें जगएबाक प्रक्रिया थिक। ई आत्म ज्योतिकें
चिन्तन सँ शब्दक सही बोध आ अर्थ सही परिचय सँ बाध्य होइत अछि। गीतनाद जें कि
साधनाक मधुरमार्ग थिक, आनन्दक संग ज्योति जगएबाक लेल लोक एकरा अपनौने रहल
अछि। तें लोक जीवनक अत्याज्य अंग भए गेल अछि।' मोहनजी द्वारा गीत विधा कें अपनेबाक
एक दोसरो कारण अछि, छन्दक नियम उपनियमक पालन। मोहनजी मानैत छथि जेना एकटा
माली

फूलक गाछ कें छोपि, छपटि एक सोझ आ आकार मे रखैछ, जाहि सँ फूलबाड़ीक शोभा बढ़ि
जाइछ, तहिना छन्द कविताकें सुदृढ़ आ प्रभावोत्पादक बना दैछ।'



छन्दक सोझ सम्पर्क मनुष्यक रागात्मक वृत्ति सँ छैक। मोहनजीक कवि वर्णतः रागात्मक
अछि, जे सभमिलि गीत विधाकें अंगीकार करबालेल विवश कए देने होएतनि। कारण जे कोनो
होइक, मुदा ई सार्वकालिक सत्य थिक जे मोहनजी गीत विधाकें अपनौलनि, गीते टा
लिखलनि, आ गुनगुनाइत रहलाह।



काव्य रचना प्रक्रियाक संबंध मोहनजीक जे मान्यता अछि तकरो आधार पर इएह
प्रमाणित होइछ जे ओ गीतक गुनगुनाहटि मे जीवनक सम्पूर्ण रस पीबि गेल छलाह। कविताक
रचना प्रक्रियाकें स्पष्ट करैत लिखल अछि। कविताक उद्गम यथार्थतः मिलन, विरह, कुसुम
काँट आ अन्धकार-प्रकाशक पृष्ठभूमि वा भाव भूमिक आधार लए कए वेशी प्रखर मुखर होइत
अछि। कोनो भावनाप्रण कवि एहने क्षण मे अनमना उठैत अछि, औनाय लगैत अछि, ओकर मन
मे किछु हौड़य लगैत छैक, माथ मे किछु घुरघुराय लगैत छैक, कल्पनापरी नाचय-गायब लगैत
छैक, शब्द अर्थक घनघटा सँ रिमझिम बुन्द टपकए लगैत छैक, कविताक मोती माला गँथाय
लगैत छैक, उन्मादपूर्ण, मधु तरल।'



गीत थिक सुख-दुःख जन्म भावावेशमयी अवस्था विशेषक परिसीमित शब्द मे स्वर
साधन उपर्युक्त चित्रण? एहि गीत क पांच टा आवश्यक तत्व अछि-(1) आत्माभिव्यक्ति (2)
भावातिरेक (3) एकरूपता (4)संगीतात्मकता (गीत तत्व) एवं (5) संक्षिप्ता। चूँकि मोहनजी क
प्रायः सम्पूर्ण रचना गीतात्मक अछि तें ई देखब आवश्यक भए जाइछ मोहनजीक गीत,
गीतविधाक नपना मे कतेक फीट करैत अछि।



आत्माभिव्यक्ति-गीतक पहिल आवश्यक तत्व आत्माभिव्यक्ति भेल कविक ह्मदयक
अभिव्यंजना। एहि अभिव्यंजना मे मिलन-विरह कुसुम-काँट आ अन्धकार प्रकाशक अभिव्यक्ति
होइछ। कविक संवेदनशील ताक अभिव्यक्ति होइछ। मोहनजी क गीत आत्माभिव्यक्ति थिक।
किन्तु ई आत्माभिव्यक्ति ततेक ने तीव्र अछि जे वैयक्तिक नहि रहि, सार्वजनिक भए गेल अछि।
ई जाहि स्थितिक वर्णन गीत मे कएल अछि, ओ केवल नहि समान भाव भूमि मे जीवैत जन
जीवनक ह्मदयक धुक-धुकीक अभिव्यक्ति भए गेल अछि। वेदनाक प्रभाव स्थायी छैक से वेदना
हिनक गीतक मर्म थीक। ई वेदना विरहजन्य हो अथवा जीवन यात्रा मे प्राप्त अनुभूमिक
सघनतर घनीभूतरूप, एक समाने मोहनजीक गीत मे व्यंजित अछि।




'मानल अति कटु आहति पड़लौ

मधुमद तरंग मे नहि भरलौ

वनगिरि रटलें घिघिरी कटलें

उच्छल हिन्दोलन नहि बँटलें

पसरओ प्रकाश, हुलसओ सुवास

कर्पूर जकाँ चों जरइत रह,

निर्झर रे, अविरल बहइत रह ।'



एहिठाम व्यक्त निर्झरक वेदना कविक वेदना थिक। जल-जनक वेदना थिक जे स्वयं
आघात सहि-सहि, दोसराक हेतु अपनाकें बिलहि रहल अछि। कविक जीवन मे सामाजिक
मंगल कामना कतेक वेशी सक्रिय रहल अछि, निम्न पॉतीमे अभिव्यक्ति भेल अछि-



'अरे फेकल फूल छी हम

भुवन वनमे झरल मुरझल

पद दलित मृदु फूल छी हम

हमर जीवन मे विघाती जग विषम विष घोरि देलक

सरस सुरभित नवल दल कें दाबानलमे बोरि देलक

लोक कण्ठ क वास वंचित

अशिव शिव निर्मात्य छी हम।



भावातिरेक : गीत मे संघनित भावक सहज अभिव्यक्ति होइछ। संघनित भावक आवेश
ततेक ने तीव्र भए जाइछ जे ओकरा टारब कठिन। कविक मनमे उमड़ैत-घुमड़ैत भाव घनीभूत
होइत रहैछ। एहि प्रक्रिया कें मोहन जी नीक जकाँ फरिछाकए लिखल, जकर चर्चा ऊपर
अछि। किन्तु, मोहनजीक गीतक ई विशेषता थिक जे ओ भावातिरेक संयमक बान्ह तोड़ि गीतक
पाट कें तेना नहि कए देलक अछि जे ओकर पूँजीभूत प्रभाव लटपटा कए धराशायी भए गेल
हो।



"हम किए ठाढ़ि छी मुग्ध जड़ सन एतऽ?

जानि ने बीति गेलै कतै क्षण एतऽ?

पानिलए जाइ घर, आ कि चलि दी ओत' ?

देह अँटकल एत 'प्राण लटकलओत' ?



नटवरक वेणुक ध्वनि पर मातलि नागरिकाक चित्रण पूर्ण कौशल आ यथार्थपरक अछि,
किन्तु, भावातिरेकक बान्ह टूटल नहि छैक। जे देह अँटकल एत', प्राण लटकल ओत' से स्पष्ट
अछि।



एकरूपता- गीतक सफलता एहि बात पर निर्भर करैछ जे गीतक भाव मे कतेक


एकरूपताक निर्वाह भेल अछि। गीतक सृष्टि अत्याधिक एकान्वित अनुभूतिक स्थिति मे होइछ।
एहि लेल चित्तवृत्तिक संयमित आ केन्द्रित होएब परमावश्यक। गीतमे कथा उपन्यास जेकाँ
इतिवृतात्मकता अपेक्षित नहि अछि। तें जाहि भावनाक धार फूटल अछि, तकर निर्वाह अन्त घरि
होअए से आवश्यक। मोहनजीक गीतमे भावक एकरूपताक निर्वाह सर्वत्र भेल अछि। जे कोनो
गीत ली एकही भावक गुम्फन भेल भेटैछ।



गीततत्व-गीत नाद कें मोहनजी मानव जीवनक एक अभिन्न व्यापार मानल अछि। ई
अभिन्न व्यापार कविक अन्तरतम सँ फूटल रचनाकें गीतात्मक बना दैछ। जखन संगीतक लय,
ताल आदि उपकरणक काव्यक शब्द, अर्थ आदि उपकरणक संग संगमित भए जाइछ तँ बाट
घाटो मे गुनगुना उठैछ आ गीत उतारि अबैछ। मोहन जीक अधिकांश रचना गीत थाक जाहि मे
गीतात्मकताक निर्वाह पूर्ण सफलतापूर्वक भेल अछि। बाजि उटल मुरली, वंशी ध्वनि, विफल
श्रृंगार नहि हमर घनश्याम रे, मोहन, बसुरिया डसि लेलक' (बाजि उठल मुरली) तथा जरब
निसॉस,' 'विश्राम-जिज्ञासा' (इतिश्री) आदि मोहन जीक पूर्ण गीत थिक।



संश्रिप्तता-गीत लेल जेना आत्माभिव्यक्ति, भावातिरेक, एकरूपता, गीतात्मकता आदि
तत्त्व महत्वपूर्ण अछि, ओहिना इहो महत्वपूर्ण अछि जे उक्त सभ तत्वक सफल समावेश छोटे
आकार मे भए जाए। यदि आकार पैघ भए जाएत तँ प्रभावे छितड़ा जएतैक। तें गीतक सफलता
लेल अत्यावश्यक छैक जे आकार संक्षिप्त हो। जतए धरि मोहनजीक गीतक प्रश्न अछि ओकर
आकार एक सफल गीतक आकारक अनुरूप अछि। हिनक गीत तेहन कस्सल आ गस्सल अछि
जे ओहि मे इतिवृतात्मकता वा अलंकारिकताक प्रवेशो नहि भए सकल।

गीतक एक-एक शब्द माँजल-खराजल, नापल-तौलल अछि, ने एक शब्द वेशी ने एक शब्द
कम।



मोहनजीक प्रसंग डा0 जयकान्त मिश्र लिखल अछि--छद्रड्ढदड्डद्धठ्ठ च्र्ण्ठ्ठत्त्द्वद्ध ग्दृण्ठ्ठद त्द्म
ड्ढद्मद्मड्ढदद्यत्ठ्ठथ्थ्न्र् ठ्ठ थ्न्र्द्धत्ड़ घ्दृड्ढद्य. क्तड्ढ त्त्ददृध्र्द्म द्यण्ठ्ठद्य दृद्वद्ध द्मध्र्ड्ढड्ढद्यड्ढद्मद्य द्मदृदढ़द्म ठ्ठद्धड्ढ द्यण्दृद्मड्ढ द्यण्ठ्ठद्य
द्यड्ढथ्थ्द्म द्मठ्ठड्डड्डड्ढद्मद्य द्यण्दृद्वढ़ण्द्य. क्तत्द्म थ्र्ड्ढथ्दृदड़ण्दृथ्न्र् त्द्म ण्दृध्र्ड्ढध्ड्ढद्ध ददृद्य ध्ड्ढद्धन्र् ड्डड्ढड्ढद्रद्म ठ्ठदड्ड ण्ड्ढ
ण्ठ्ठद्म ठ्ठथ्थ्र्दृद्मद्य ठ्ठडठ्ठदड्डदृदड्ढड्ड ध्र्द्धत्द्यत्दढ़ त्द द्धड्ढड़ड्ढदद्य न्र्ड्ढठ्ठद्धद्म. कोनो कवि अथवा रचनाकार कें
संग्रह प्रकाशित नहि रहलाह की घाटा से डा0 मिश्रक लेखनी सँ स्पष्ट अछि। 'फूलडाली'क
प्रकाशनक करीब चारि दशकक बाद 'बाजि उठल मुरली' प्रकाशित भेल। एहि बीच मोहनजीक
लेखनी चलिते रहल, तथापि डा0 जयकान्त मिश्र लिख देने छथि जे-क्तड्ढ ण्ठ्ठद्म ठ्ठथ्थ्र्दृद्मद्य
ठ्ठडठ्ठदड्डदृदड्ढड्ड ध्र्द्धत्द्यत्दढ़ त्द द्धड्ढड़ड्ढदद्य न्र्ड्ढठ्ठद्धद्म.



ऊपर जे वर्णन भेल अछि, ओ थिक मोहनजीक प्रिय विधा गीतक प्रसंग। किन्तु
जतयधरि मोहनजीक रचनाक कथ्यक संदर्भ अछि ओ बड़ व्यापक अछि। मोहनजीक कविताक
कथ्य विस्तार और विविधताक प्रसंग आचार्य रमानाथ झा 5 लिखने छथि-"ई विभिन्न वस्तु
विभिन्न विभिन्न भाव लए कविता लिखने छथि। एक दिस यदि सामाजिक वैषम्य, पीड़ित दीनता,
विपन्नताक चित्रण कएल तँ दोसर दिस समाज मे नवोद्भूत ओजस्वी चेतनाक सेहो चित्रण


कएल। जाहि-जाहि कवितामे आत्मनुभूतिक व्यापक चित्रण भेल अछि, ताहि-ताहि ठाम
मोहनजीक जीवनमे निहित नैराश्य एवं करुणाक चित्रण अछि"। एहिना डा0 जयकान्त मिश्र
मोहनजीक कविता क प्रसंग लिखल अछि जे--क्ष्द द्मदृथ्र्ड्ढ दृढ द्यण्ड्ढ द्मदृदढ़द्म ण्ड्ढ (ग्दृण्ठ्ठद)
द्धठ्ठत्द्मड्ढद्म ण्त्द्म ध्दृत्ड़ड्ढ ठ्ठढ़ठ्ठत्दद्मद्य द्मदृड़त्ठ्ठथ् ड्ढध्त्थ्द्म द्यदृदृ. च्र्ण्ड्ढ थ्त्ढड्ढ दृढ ठ्ठ ध्र्ठ्ठढ़ड्ढ ड्ढठ्ठद्धदड्ढद्ध त्द्म द्रत्ड़द्यद्वद्धड्ढद्म
द्दद्वड्ढथ्न्र्, डद्धदृद्वढ़ण्द्य डड्ढढदृद्धड्ढ द्वद्म ठ्ठद्म ध्र्ड्ढथ्थ् ठ्ठद्म द्यण्ठ्ठद्य दृढ द्यण्दृद्मड्ढ ध्र्ण्दृ ध्र्ठ्ठद्मद्यड्ढ द्यण्ड्ढत्द्ध द्यत्थ्र्ड्ढ ठ्ठदड्ड
ड्ढदड्ढद्धढ़न्र् त्द त्ड्डथ्त्दढ़.



डा0 श्रीशक मतें मोहनजीक आरम्भिक कविता मे छायावादी छाप पूर्ण छल, किन्तु बाद
मे करुणाभावना क प्राधान्य भए गेल-स्व0 उपेन्द्र ठाकुर 'मोहन'क कविता क मुख्य आकर्षण
थिक करुणा- भावनाक चित्रण। आरम्भ मे छायावादी विषादक छाप हिनका मे उत्कट छल,
मुदा पश्चात् आबि सांसारिक अनुभव-जन्य विषाद मे दार्शनिकताक मणि-काँचन संयोग देखना
जाइछ। 'फूलडाली'क किछु रचना मे मजदूर किसानक सेहो चित्रण कएने छथि। 'युवक वीर'
मे युवक क निर्माण लेल क्रान्ति भावना ओ 'नव युग' मे युगीन ओजक बड़ उल्लसवद्र्धक
अभिव्यक्ति भेल अछि।'



मोहनजी अपन समय सालक प्रति सर्तक छलाह। अपन परिवेश मे उठैत लहरि कें
देखैत छलाह, चीन्हैत छलाह आ आत्मसात करैत ओहि लहरिक प्रभाव कें स्वर दैत छलाह।
इएह कारण थिक जे कविवर गीत मे ओहो तत्व मुखर अछि जे राष्ट्रीय आन्दोलनक समय
प्रत्येक सचेत कविक चेतनाकें प्रभावित करैत छलैक। एहि हेतु कवि युवक कें मातृभूमिक
रक्षाहेतु ललकारैत प्रेरित करैछ-

'सहगामी बन्धु उठू बढ़ाउ उत्थान कार्य नव युग प्रभात

रे पाँक फँसल गायक समान हारल उठान की धयल कात?

देशक अभिलाषाक हमहि केन्द्र करबाक पड़ल अछि कते काज

साहित्य विपद्गत हन्त आइ, पतनोन्मुख अछि दुर्गत समाज ।

रे जन्म-भूमि जननीक नोर

पोछत के हमरा बिना वीर?"

देशक अभिलाषाक हमहि केन्द्र युवक वीकें जिनगीक लक्ष्य कवि बुझबैछ-

'पसरय पजरि पसाही सन जे ज्योतिर्मय, से जिनगी

काल ज्वाल मे जकर भस्म हो, प्रतिरोधी से जिनगी।'



काल ज्वाला मे प्रतिरोधी कें भस्म करबा लेल सक्षम युवक जिनगी मे सम्भव छैक जे
एक-विषम स्थिति आबि जाए, एक सँ बढ़ि एक प्रतिरोधी समक्ष आबि जाए, किन्तु अपन प्रण पर
डँटल रहब आवश्यक अछि। ओ निर्झर कें उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत करैत लिखल अछि-निर्झर रे
अविरल बहइत रह'।



कविवर मोहनक व्यवहारे मे नहि कवितो मे नवकें उत्साहित करबाक भाव अछि। नवका
पीढ़ीक क्षमता मे हुनका पर्याप्त आस्था छलनि, ओ बढ़य से सदिखन चेष्टा रिनहैछ। एही


विचारक अनुकूल कविवरक 'अठओ नवका ध्वज' गीत अछि। कविकें वि•ाास छनि जे झरल
झखरल गाछ आ उसरल हाट कें पटऔने वा ओगरने कोनो लाभ नहि छैक-



'गाछ ई जे फेर पल्लव सँ सजत नहि

मदिर मधुमय महमही महिमा भरत नहि

मज्जर क छवि छटा स्वर्णिम नहि उमड़तै

मंडपायित सघन शाखा नहि चतरतै।

वज्रलेपी तुलायल पतझार से, जें

कोकिल कुल उड़ल पाबि उजार

तें अत्यावश्यक अछि जे नव गछुली कें पटाओल जाए, प्रोत्साहन देल जाए, आ फलक
कामना कएल जाए-

'ज्योति नव गछुली समृद्धि निधान शीतल

बढ़ि हरओ जनताप, फलसँ भरओ हीतल।'



समाज मे सदिखन किछु एहन व्यक्ति आ वर्ग अछि जे दोसराक उत्थान सँ आहत
होइछ। दोसर भरि पेट अन्न पबैछ, ओहि सँ ओकरा दुःख होइछ। ओकरा एहू लेल दुःख होइछ
जे सभ दिन शोषित छल, शापित छल आ प्रताड़ित छल से कियेक आइ मूड़ी उठबैत अछि।
किन्तु कविवर मोहन प्रगतिशील तत्वक पक्षपाती छथि, जे सभदिनसँ शोषित, प्रताड़ित आ
शापित रहल छथि, तकरहु मे चेतना जगैत देखैत छथि। नवयुग कें काल करौट लैत देखैत
छथि। लातक धाङल धूलिक कण कें विरड़ो बनि जाइत देखैत छथि। अथबल-अजगर कें
गुड़कि ससरि गिरि पर चढ़ैत देखैत छथि। एहि परिवत्र्तन सँ कवि' सामन्तीधाह पतरायल'
अनुभव करैत छथि। सुविधा भोगी वर्गक मन से समायल ईष्र्या आ आतंक कें स्वर दैत कवि
गाबि उठैछ-



'उँच महल चढ़ि जे छथि बैसल

हुनकर मन मे डर छनि पैसल

सोर-पोर सँ काछे उखरय

ढ़नमनैल अछि कोठी सैंतल

प्रलंयकार ईबाढ़ि तेहन ने

तुन्दिल जक झुरझुर झखैत अछि,

नव युग काल करौट लैत अछि।'



मोहनजीक जीवन मे संघर्षक क्षण विशेष रहल अछि। एही संघर्षक क्षणक अन्तराल मे
अवसाद ओ नैराश्यक तरंग कौखन सेहो उठैत रहल अछि। इएह कारण थिक जे मोहनजीक
गीत मे अवसाद ओ नैराश्यक रूप भेटैछ। सक्षम रहैतो कोना अक्षम असहाय बना दैछ तकर
प्रमाण थिक मोहनजीक अभिव्यक्ति-




'बहि रहल धार पर निर्जीव तन सन

हाथ पयर पसारि फेंकि शरीर झरल।'



हारल-थाकल आ निर्जीव तन-सन पानिक धार पर भसिआइत जीवन वा आद्र्र इन्धन
सब धुएँल जरैत जीवन' कविक नैराश्य बोधक अभिव्यक्ति थिक। सम्पूर्ण जीवन मे व्याप्त नैराश्य
आ असफलताक अनुभूति कवि कें होइत रहल अछि, एक सँ बढ़ि एक दारुणा स्थिति कें भोगल
अछि, एक सँ बढ़ि एक सुन्दर भविष्यक कल्पना क क्षण त्रासद भए गेलैक अछि। जीवनक
विफलताक प्रसंग कविक वाणी फूटि पड़ैछ-



'ढ़हि रहल दिन मलिन रवि किछु क' सकल नहि

रहल लाधल ढांप-तोपक तेहन बेढ़ल।'

तें जीवनक अपराह्न मे कवि गाबि उठैछ-

'नव करब की पुरान फल कोन लहलह,

असह छल लुती, पड़ल अछि आगि धहधह।'



जीवनयात्रा मे प्राप्त वैफल्य बोध ओ अवसादक मार्मिक अभिव्यक्तिक परिणति
निराशामूलक नहि अस्था मूलक अछि। 'ज्योति नीड़' शीर्षक गीत मे जीवन संग्राम मे विभिन्न
स्थलक चित्रण-



'सर सँ सागर धरि छिछिअयलें

मिथिला मगध सगर बौअयलें

उष्ण शीत आ समरस बनलें

भाग भोग जतबे से अनलें

रटलें खटलें भरि पौलें कह

कन्था, तजि की खाट?

विहग धर ज्योति नीड़ केर बाट।

आ अन्त मे-

'पश्चिम क्षितिजक लाली जगलौ'

माँ पद गहि तम काट।'



कविक आस्था कें व्यक्त करैछ। एहि कविताक वैशिष्ट्यक प्रसंग आचार्य रमानाथ झा
(1906-1971) लिखल अछि जे आत्मानुभूतिमूलक एहि कविता मे जीवनक कटु अनुभव निर्वेद
जन्य अभिव्यक्ति अछि। जाहि मे निराशाक भाव संगहि आस्तिकताक आ•ाासन कविक व्यक्तिगत
वैषिष्ट्यक घोतक थिक।'



मोहनजी ओहि व्यक्ति सभक खूब आलोचना कएल अछि जे मातृभाषाकें महत्व नहि
दैछ। हिनका मतें मातृभाषा आ तखन आन कोनो भाषा-




'घरक गोसाउनि झंखथि अन्हारें

मन्दिर बारब दीप?

गाम नोत नहि, नोत बेलाही

जड़ि तजि पकड़ब छीप।'



जड़ितजि छीप पकड़ला सँ एकटा पैध खतरा छैक। ओ खतरा अछि क्रमशः असम्बद्ध
होइत जएबाक। जखन घरे ठीक नहि तखन बाहर ठीक करबाक प्रक्रिया कतेक सफल भए
सकैछ मोहनजीक प्रश्न अछि।



'जखन मैथिली सूपक भाँटा

भेल संकटापन्न

की राष्ट्रीयता? देश भक्ति की?

के गौरब सम्पन्न?



मैथिली अकादमी पत्रिका-1989



.. .. .. ..



शुद्धतावादी कथाकार उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास'



उपेन्द्रनाथ झा 'व्यास' (ज0 1917) क अद्यावधि दू टा कथासंग्रह 'विडम्बना' (1950)
तथा 'भजना भजले'(1989) प्रकाशित अछि। कुल सतरहटा कथाक अतेक दीर्घ रचनाकाल
(1944-1989) मे लिखब आ प्रकाशित होएब, गणितीय दृष्टिसँ झुझुआन लगैत अछि। कतहु ने
कतहुसँ इहो अनुभव होइत छैक जे व्यासजीक सर्जनात्मक अभिव्यक्तिक मूलविधा कथा नहि
थिक। परंच, जँ व्यासजीक रचनात्मक जीवनक सम्पूर्ण उपलब्धिकें एकठाम राखि देखल जाए,
तँ ई स्वतः स्पष्ट भए जाइछ जे हुनक रचनात्मक जीवनमे निरंतरता अछि। ओ निरंतरता
कथाक अतिरिक्त उपन्यास, कविता, यात्रा-साहित्यक, संगहि अनुवाद साहित्यकें सेहो पुष्ट करैत
भेटत। ओहुना लेखकक साहित्यिक उत्कर्षक मानदण्ड मात्रा नहि, रचनामे अन्तर्निहित गुणवत्ता
मानल जएबाक चाही। ढाकीक ढ़ाकी लिखेले पर जँ कोनो जीवनमूल्य स्वीकृत नहि भए सकल
अथवा रचनाकारक पाँतीमे पृथक व्यक्तिव्त नहि झलकैत रहय तँ भरिगर गत्ताक अछैतो जीवन
कालहिमे ओ रचनाकार अप्रसांगिक घोषित भए जाइत अछि। व्यासजी मैथिलीक प्रथमहि
रचनाकार छथि जे मूल (दू पत्र) अनुवाद ('विप्रदास') उपन्यास-साहित्य लेल साहित्य
अकादेमीक पुरस्कार प्राप्त कएने छथि।



व्यासजीक रचनात्मक परिवेशमे कतेको उठा पटक भेल अछि। परिवत्र्तन आएल अछि।


सबसँ पैघ परिवत्र्तन राजनीतिक क्षेत्रमे राजनीतिक दासत्वसँ मुक्ति भेल। संविधानसँ लोक कें
मौलिक अधिकार भैटलैक। कत्र्तव्य बूझय लागल। शिक्षाक प्रचार-प्रसार भेल। सामाजिक-
सांस्कृतिक केन्द्र मे परिवत्र्तन आएल। युग-युगसँ ग्रामक निर्मल आ स्वच्छ वातावरण मे पोषित
मानसिकतावला लोक शहर दिस पड़ाएल। गामक गाम उजड़ैल गेल, शहर पसरैल गेल। शान्त
आ स्निग्ध गिरिप्रान्तर मे दन्तार कारखानाक स्थापनासँ निर्मलवायु आच्छादित आकाश धूम्रमय
होमए लागल। लोकक जीवन यापन, रहन-सहन मे परिवत्र्तन आएल। विकृति छल-प्रपंच आ
दाव, पेंच बढल। परंच व्यासजीक रचनात्मक दृष्टि अपन परिवेशक भौतिक-अभौतिक
परिवत्र्तनक प्रति असम्बद्ध रहल। अप्रभावित रहल। स्थान, काल आ पात्रमे यत्किंचित
परिवत्र्तनक अछैतो रचनात्मक मूल्य स्थापना आ तकर पल्लवनमे परिवत्र्तन नहि आएल। ओ
कथाक परिवेशक निर्माण एहि प्रकारें करैत रहलाह, जाहिसँ कथाकारक परिवेशक छाप, कमसँ
पड़ैक। विडम्बना, शैदा आओर हमीदा, मुखियाजी, तथा ममता कथाक परिवेशक निर्माणमे
कथाकारक परिवेशक जे किछु चित्र आएल अछि, तकरा अपवादे मानल जा सकैछ। इहो
आपवादिक स्थिति स्वाधीनतापूर्वक देशक राजनीतिक चेतना, देश विभाजनक समय,
शारणार्थीक

समस्या, आ नरसंहार जन्य मानवीय त्रास अथवा धर्मान्तरणक समस्यासँ संवद्ध मानवीय पीड़ा
आ विवशताक अभिव्यक्तिक लेल नहि अछि। अपितु कथाक चरित्रकें उदात्त बनेबा लेल अछि।
पद्मकान्त (विडम्बना) क स्वाधीनता आन्दोलनक क्रममे जहल जाएब, अथवा कोर्टमे मैथिली मे
बयानदेव गौण अछि। व्यासजीकें पद्मकान्तक चरित्रकें एहि प्रकारें स्थापित करबाक छनि, जे
राष्ट्रपिता महात्मागांधीक आह्वान पर अंग्रेजी सरकारक विरोध करैत जहल जाइत अछि,
मातृभाषा मैथिलीक प्रति अटूट आस्था छैक, गंगा मे डूबैत मित्रक प्राणरक्षा करैत अछि, वांसुरी
बजा कए लोककें मोहि लैत अछि। छात्रवर्गक नेतृत्व करैत अछि। वाद-विवाद प्रतियोगितामे
प्रथम अबैत अछि। शिक्षक समुदायक प्रिय पात्र अछि। पिआज, लहसून नहि खाए, भारतीय
संस्कृति आ आचार-व्यवहार मे आस्था राखि पाँजिवला लोकसँ विशेष शुद्ध आचरण करैत अछि
आदि। ओहिना शैदा आओर हमीदा' मे भारत विभाजन, शरणार्थीक समस्या, साम्प्रदायिक
अथवा नरसंहार आदि गौण अछि महत्वपूर्ण अचि सहमूलक स्थापना जाति, धर्म, वर्ण, क्षेत्र
आदिक आधार पर मनुष्य-मनुष्यक वीचक विभेद कें मेटाए, मानवीय गुणक प्रतिष्ठा करब।
शैदाक चरित्रक माध्यमसँ कथाकार ई स्थापित कएदेल अछि जे मानवीय करुणा आ प्रेम
जातिआ-धर्मक बान्हमे नहि अछि। अपन एक पूर्व परिचित आ पड़ोसी हिन्दू युवक कें अपह्मत
भेल देखि यवनी शैदा जाहि प्रकारें लाहौर मे हुनक प्राणरक्षा करैत अछि, शैदाक चरित्रकें
जाति, धर्म सम्प्रदाय आ क्षेत्रक सीमा सँ ऊपर उठादैत छैक। साहुजीक माता पर पिताक
आत्याचार (ममता) धरसँ भगादेब, मुसलमानक हाथमे पड़ब, विवाह कए मुसलमानित बानि
जाएब स्वाधीनतापूर्वक धर्मान्तरणक समस्याकें प्रकट करैत अछि। परंच, कथाक मूल उद्देश्य
अछि, माइक ममताकें स्थापित करब। सर्वप्रकारक बंधनसँ मुक्त देखाएब। ममता, धर्म आ
जातिगत गुण नहि, आत्माक गुण धर्म थिक। पुत्र कुपुत्र भए सकैत अछि, परंच माता कुमता भए
नहि सकैत अछि। कथाकारक अभिप्रेत इएह थिक।



समाजमे सब तरहक लोक होइत अछि, चोर-उचक्का, दुराचारी-व्यभिचारी सँ लए कए
त्यागी, परोपकारी एवं सद्वृत्तिक लोक धरि। परंच, व्यासजी ओहन प्रवृत्ति अथवा प्रकृतिक लोक


कें अपन कथाक चरित्र नहि बनबैत छथि। जाहिसँ सामाजिक जीवन किंवा व्यक्तिगते जीवनमे
मूल्यहीनताक स्थिति आबए, ओकर विजय होइक, दुष्टता बढय, कालुष्य लोक-जीवनकें आच्छन्न
करए ओहन काज व्यासजीक कथा नायक किन्नहुँ नहि कए सकैत अछि। सामाजिक जीवनक
सौमनस्य खण्डित कए व्यक्तिवादक स्थापना एकोटा पात्र नहि कए सकैत अछि। एकोटा चरित्र
वा पात्रक सृजन ओहन नहि अछि जे छल, प्रपंच विद्वेषक आश्रय लए उत्कर्ष प्राप्त करैत हो।
आ इएह कारण थिक जे व्यासजीक कथाक चरित्र अपन शुद्धतावादी जीवन दृष्टिक खातिर
सहजहि चिन्हा जाइत अछि। ओ एहन चिन्हार कथा नायक नायिका अछि जे एक आदर्शक
लेल जीवैत अछि, आदर्शक स्थापना करैत अछि। कथाकारक ई आदर्शवादी दृष्टि रमाकान्त एवं
पद्मकान्त (विडम्बना) वहीनदाइ, गोविन्द आ देवू (देवू), डिपुटी साहेब आ हुनक परिवारिक
सदस्यगण (रक्तदान), बुढ़िया (माता), रमेश बाबू (भजना भजले), शैदा (शैदा आओर हमीदा),
भग्गूदा (भग्गूदा) आदि पात्रमे स्पष्ट अछि। वहीनदाइक ममता आ अनाथ देवूक प्रति जागृत
सहानुभूति गोविन्दक भ्रातृत्व आ प्रतिष्ठा रक्षाक वोध एवं देवूक त्याग आदर्शक चरमविन्दु थिक।
जे पाठकक ध्यान आकृष्ट करैत सहानुभूतिक प्रवाह उत्पन्न कए दैत अछि। प्रत्यक्षतः हास्यास्पद,
व्यंग्यास्पद भग्गूदा भीतरसँ कतेक सहज, उच्च विचारक तथा त्यागक प्रतिमूर्त्ति छथि से स्पष्ट
भए जाइत अछि।



वेदव्यासक प्रसंग कहल जाइत अछि, अठारह पुराण मे मूलतः दुइएटा तथ्य लिखल-
परोपकार थिक पुण्य आ परपीडन थिक पाप। जीवनक इएह आदर्श कथाकार व्यासहुक कथा
नायक नायिकाक जीवनमे परिलक्षित होइत अछि। ई आदर्शवादी आस्थावादी दृष्टि जीवन
मूल्यकें सामाजिकता प्रदान करैत अछि। परंच, व्यासजीक आस्थावाद व्यक्ति आधारित नहि
अछि, व्यक्ति आत्मबल कें प्रकट नहि करैत अछि। जीवनक आ जीवनक प्रति व्यक्त एहि
आस्थाक जड़ि अछि परोक्षपतामे। धर्मनिष्ठ व्यक्तिक प्रत्येक आचारणक परिणति अथवा

कर्मक फलकें ई•ाराधीन मानबालेल प्रतिवद्ध रहैत अछि। ढ़ेपाचेपाक कोनो मर्मस्थल पर नहि
लागवकें एकादशीक महात्म्य मानि लेब (एकादशी महात्म्य) अथवा स्वप्नमे फल्गूक कात मे
पिण्डदान लले मूड़िआरी दैत पुरुखाक सभक प्रेतात्माक वीच भजना(नौकर) आ भजले (कुकुर)
कें देखि पिण्डान करब आ हरिजनभोज कराएब, अथवा पाथर फोड़ि जीविका चलबाए वाली
एक सामान्य लोककें ओतेक ऊपर उठा देव, जाहिसँ ओहिमे देवत्वक प्रतिष्ठा भए जाइक
कथाकारक ओही दृष्टिक परिणति थिक। लोकमे देवत्वक प्रतिष्ठान अथवा ई•ारक भरोस पर
सभ किछु छोड़ि आस्थावाद आदर्शवाद कें मनुष्येतर जगतमे पहुँचाएव थिक। ओहिठाम पहुँचि
मानवीय विशिष्टता निश्चितरुपे न्यून भए जाइत अछि।



व्यासजीक कथामे व्यक्त प्रेमक स्वरूप अशरीरी अछि। देहक आकर्षक सीमाकें टपि
ह्मदयक रसमे सरावोर भए जाइत अछि। भौतिक सुख एवं समृद्धिक आकर्षण लूसी आ बौब
(मन कें मनाएब) क बीच उपजल पूर्वराग कें खण्डित नहि करैत अछि। वि•ायुद्धमे अपंगभेल
बौद्धिकप्रति लूसीक समर्पणमे किंचिंतो खोर नहिहोइत अछि। अपितु बौबक बिना अपन जीवन कें
बेकार मानि लैत अछि। विजयक प्रति संध्याक आकर्षण (रक्तदान) जे दाम्पत्य जीवनक स्वरुप
लए सकैत छल, दुर्घटनाग्रस्त विनय बाबूकें का डिपुटी साहेब परिचर्चा आ रक्तदान सहोदर-
सहोदराक उत्कर्ष आ उच्चताकें प्राप्त कए लैत अछि। व्यासजीक कथामे व्यक्त प्रेमकभाव मानव


सीमा सँ पशुक सीमा धरि व्याप्त अछि। बकरी ("बकरी") तथा भजले (कुकुर-"भजना आ
भजले") क प्रति व्यक्त भाव मनुष्येत्तर जीवोक प्रति प्रेम आ सहानुभूतिक प्रगाढ़ता कें घोषित
करैत अछि। उक्त दूनू जीवन प्रति उपजल प्रेम, सहिनुभूति आ दया कथानायक क अचेतन मे
तेना भए बैसल अछि जे स्वप्नमे मनुष्यक शरीरमे बकरीक मुँह तथा पुरखाक पौतीमे कतेको
वर्षपूर्व सापक प्रहारसँ मालिकक रक्षाक क्रममें आहत भजलेक आकृति गयाकें पिण्डदानक लेल
आबि जाइत अछि, शिल्पक दृष्टिसँ दूनू कथामे विलक्षण साम्य अछि कथाकार दूनू कथामे
अवचेतनहिक आश्रम लेल अछि।



व्यासजीक कथामे समाजमे व्याप्त विकृति आ रूढ़ि पर प्रहार भेल अछि। आचरणक
शुद्धताक संगे विचारक शुद्धता आ उच्चता पर विशेष बल देल अछि। पॉजिवला गोपी बाबूक
ओतय पद्मकान्त द्वारा पिआज-लहसून वला तरकारी थुकरी देब तथा अपंजीवद्ध पद्मकान्तसँ
अपन कथन्याक विवाह करब गछि लेब, हरिसिंहदेवी व्यवस्था पर व्यंग्य करैत अछि। वुलूकें
पश्चिमी वेश भूषा मे देखि भारतीय वस्त्र धारण करबाक विचार देव (विडम्बना) पश्चिमी
संस्कृति आ सभ्यताक अंधानुकरण पर कथाकार प्रहार कएल अछि। परंच ठामहि पद्मकान्तक
व्यक्तिगत गुण पर आकर्षित वूलू द्वारा विवाहपूर्ण पत्रचार करब परिपाटीक प्रतिकूल होइतहु, वर
वरण करबाक स्वतंत्रताक कारणें प्रगतिशीलताक द्योतक मानल जाएत। सामाजिक कुरीति पर
प्रहारक सन्दर्भ मे उत्तरदायित्व आ वागदान कथोक नाम लेल जा सकैत अछि।



कथ्यक अतिरिक्त व्यासजीक क कथाक सवसँ पैघ विशेषता थिक रोचकता। ओएह
पाठक कें अन्तधरि बान्हि रखैत अछि। रोचकतासँ परिपूर्ण व्यासजीक कथामे उल्लेखनीय अछि
'मिस्टर बटर फलाई, फोटो, भग्गूदा, रुसल जमाए आदि। मिस्टर बटर फलाई मे जीवन
मूल्यक सन्दर्भ गौण अछि, परंच रोचकता आ उत्सुकताक प्रभाव अवाधित अछि। मेकाल
साहेबक टिकुली पकड़बाक तल्लीनता पकड़ि ओरिआ कए रखबाक विशेषज्ञताक वर्णन मे
कथाकारक कुशलता झलकैत चलैत अछि। रोचकता विषयमे तँ रहिते अछि, प्रस्तुति अर्थात
कहबाक ढंग' तेहन सुन्दर होइत छनि जे पाठक वान्हल भए जाइत अछि। व्यासजीक कतेको
कथाक विषय-वस्तु यद्यपि रोचक नहि अछि, परंच उरोचक विषयहुकें ताहि कुशलताक संग
प्रस्तुत करैत छथि ऊ जाहिसँ पाठकक उत्सुकता अन्त-अन्तधरि बनल रहैत अछि। रोयल
इंजिनियर मैकॉल साहेबकें फुरसतिक समय तितली पकड़बाक सौख छलनि, ओकर भेद-प्रभेदक
अनुसंधानक सौख छलनि, विषय कोनो रुचिगर नहि। परंच, व्यासजीक लेखनी पाबि ओ कथा
खूब मनलग्गू बनि गेल अछि। "फोटो" कथाक हास्य यद्यपि एक

विन्दु पर आबि उत्कृष्ट भए गेल अछि। अनका हास्यास्पद-व्यंग्यास्पद बनेबामे नित्यानंद बाबूक
पत्नी जे धखाइत नहि छथि, सेस्वयं तेहन हास्यास्पद बनि जाइत छथि जे तीन वर्षक मधुर
दाम्पत्य जीवनमे बढ़ैत सन्देहक गेंठक गीरह ठहाकामे खूजैत अछि। तात्पर्यजे कथाक अन्तधरि
पहुँचवा लेल जेहन आ कोन बाटक अनुसरण कएल जाए, व्यासजीक कथा लेखनक विशेषता
थिक। नव दम्पत्तिक वीच छोट-छोट वात पर ठनि जाएब बड़ स्वाभाविक अछि, परंच जटाधरजी
('रुसल जमाए')क रुसि कए पड़ाएब, निश्चलतापूर्वक अपन ह्मदयक वात उगिलि देब आ फेर
सासुर जाएब मनोरंजक अछि। औहूसँ वेशी मनोरंजक भए जाइछ कतेको वर्षक वाद
जटाधरजीक पत्नीक द्वारा कथा वाचक कें ई कहैत उपालंभ देब जे-ओ ई छथि बड़का झगड़ा


लगाओन ककरो बॉसि कें फेरि रुसबो सिखादैत छथीन्ह।"



कथाकें रोचक बनेवालेल व्यासजी सर्वप्रथम वातावरणक निर्माण करैत छथि। पात्रक
परिचय करवैत छथि। वातावरण निर्माण लेल प्रकृतिक मनोहारी चित्रण करैत छथि। जाहि
कथाक परिवेश छोटानागपुरक अछि, प्रकृतिक चित्रणक कथामे समावेशसँ कथाक प्रभावान्वित
द्विगुणित भए गेल अछि। एकादमी महात्म्य, रक्तदान आ अखरी बुढ़ियाक नाम एहि विशेषताक
हेतु अनायासहु लेल जा सकैत अछि।



यद्यपि व्यासजीक अधिकांश कथाक प्रारंभ भूमिका आ पात्र परिचयक संग होइत अछि
परंच (भजना आ भजले), कथाक शिल्प आन कथासँ किंचित फूट अछि। एहि मे अन्तसँ प्रारम्भ
भेल अछि। भरि दिनक झमराल ढ़ोहिआएल रमेश बाबू अपन मित्र श्यामजीकें कहैत छथिन्ह,
आइ जकरा ले, ई सभ कएलहुँ अछि, जकरासँ बुझू तँ एक तरहे उऋण भेलहुँ अछि, ओकर
नाम छलैक भजना।"



व्यासजीक कथा मनोजगतमे नहि वाह्र जगतमे घटित होइत अछि। एहि कारणें हिनक
कथाक काल परिवेश विस्तृत होइत अछि। एकादमी महात्म्य आ रुसल जमाए के अपवाद मानि
सकैत छी। "रुसल जमाएक काल परिवेशक मुख्य अंग यद्यपि किछु कालक अछि परंच पूर्ण
होइत अछि कतेको वर्षक वाद। जावतधरि वार्तालाप राटनपर अथवा स्टेशन पर चलैत अछि,
ताधरिक मनक बात कथाकार उद्घादित करैत जाइत छथि। किन्तु, जखनहि कथाक काल,
परिवेश नयचरि जाइत अछि कथाकार स्मृतिक प्रत्याख्यान विविधक अनुसरण करैत छथि।
पात्रक मनोजगत अनुद्छादित रहि जाइत अछि।



प्रस्तुतिक दृष्टिएँ व्यासजीक कथा दू कोटिक अछि। पहिल थिक स्वानुभूतिक अभिव्यक्ति
आ दोसर थिक सुनल कथाक पुनराख्यान। स्वानुभूतिमूलक कथामे जे प्रथम पुरुषमे वर्णित अछि
"एकादशी महात्म्य, रुसल जमाए, फोटो, ममता शैदाआओर हमीदा, आदि तथा मिस्टर
बटरफलाइ मनकें मनाएब आदि कथा सूनल अछि। मुदा, दूनू कोटिक कथाकें पुटाएब सुलभ
नहि अछि। दूनूक वर्णन आ विकास ततेक कुशलता आ सूक्ष्मतासँ कथाकार सम्पन्न कएल अछि
जे आत्मानुभूति आ परानुभूतिक अभिव्यक्त शिल्पगत विशेषताक कारणें आ प्रवाहहीन नहि होइत
अछि। स्वानुभूतिए सन लगैत अछि। ओहिना सुस्वादु।



मैथिली कथा साहित्यक विकासमे व्यासजीक कथाक छथि सबसँ फूट अछि सम्कालीन
अथवा परवर्तीकालक कथाकारक रचनासँ सर्वथा फूट स्वाद हिनक कथा दैत अछि। व्यासजीक
कथा समसामयिक जीवनसँ विशेष प्रभावित नहि होइत अछि आ परिवर्तित होइत युग-जीवन
आओर विकृति आ विडम्बना सँ अप्रभावित रहैत अछि। तें, व्यासजीक कथाक स्वाद आ प्रभाव
बासितेवासि नहि होएत। टटका बनल रहत। जेना पात्रक निर्दुष्टता आ सच्चरित्रता व्यासजीक
कथाक वैशिष्ठ्य थिक, ओहिना भाषाक शुद्धताक रक्षा करैत मनोरंजक शैलीमे अपन बात कहि
देव व्यासजीक कथाक आकर्षक विशेषता थिक।

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पं0 राजे•ार झा : व्यक्तित्व ओ कृतित्व



साहित्यकारक व्यक्तित्वकें बूझब सर्वप्रथम आवश्यक अछि। विना व्यक्तित्वकें बूझने
कृतित्वक तहमे जाएब संभव नहि होइछ। व्यक्तित्वक निर्माण परिवेश सँ होइछ आ तें कृतित्वक
माध्यमसँ रचनाकारक परिवेशकें सेहो बूझल जा सकैछ। साहित्यकारक व्यक्तित्व जाहि तरहक
रहैछ, ओ जतेक प्रखर रहैछ, जतेक संघर्षशील रहैछ, ओही अनुपातमे ओहि रचनाकारक
साहित्य समक्ष अबैछ।



पंडित राजे•ार झा (ज0-1922) मातृभाषाक सर्वतोमुखी विकासक लेल संघर्षरत
सेनानी साहित्यकारक अगिला पाँतीमे विराजमान रहलाह। हिनक एहि सक्रियताक दिशा
रचनाकारकें प्रेरित करबाक दिश विशेष छल। लोक कें साहित्य रचनालेल प्रेरणा भेटौक अथवा
कोन प्रकारक पोथीक आवश्यकता मैथिली साहित्य लेल वेशी छैक, राजे•ारबाबू सदिखन
प्रयत्नशील रहैत चलाह। एही सक्रियताक प्रतिफल थिक जे राजे•ारबाबू की रचनात्मक
जीवनक अल्प वयमे अनेको पोथीक रचना कए सकलाह। मैथिली पोथी प्रकाशनक जे समस्या
अछि से ओ नीक जकाँ अनुभव करैत छलाह। मुदा मातृभाषाक भंडार कें विभिन्न विधाक पोथीसँ
भरबाक हुनक लालसाकें राजे•ारबाबूक आर्थिक विपन्नता नहि रोकि पबैत छल। आ इएह करण
थिक जे प्रतिवर्ष जेना-तेना राजे•ारबाबू कोनो-ने-कोनो पोथी प्रकाशित करिते छलाह।
मातृभाषाक वलिवेदी पर अपन अर्थक आहुति चढ़बिते छलाह। 'मिथिलाभारती' सन
शोधपत्रिकाक प्रकाशन हो किंवा 'मैथिली साहित्य संस्थानक' साहित्यिक कार्यक्रम हुनकहि
सत्प्रयासक प्रतिफल छल। एक युगक सर्जनात्मक अवधिमे दू दर्जनक करीब पोथी? विभिन्न
विधामे लिखि प्रकाशित कए लेब सामान्य बात नहि थिक। पुस्तक लेखन-प्रकाशनमे ओ ततेक
पकिया छलाह जे घोषित तिथिक अन्दरे बोथी लिखि विमोचन करा लैत छलाह।



राजे•ार झाक कृतिक विभाजन तीन कोटिमे कएल जा सकैछ। पहिल कोटिमे अबैछ
अनुसंधान परक पोथी, दोसर कोटि मे अछि ऐतिहासिक वा पौराणिक कथाक आधार पर
लिखित पोथी तथा तेसर कोटिमे अछि सर्जनात्मक। अनुसंधान परक पोथीमे अबैछ-(1)
मिथिलाक्षरक उद्भव ओ विकास (2) मैथिली साहित्यक आदिकाल (3) अवहट्त्वकः उद्भव ओ
विकास (4) पूर्वाञ्चलक मध्यकालीन वैष्णव साहित्य तथा (5) लोक गाथा विमोचन। पूर्वाञ्चलक
मध्यकालीन वैष्णव साहित्य हिनक अन्तिम प्रकाशित कृति थिक। अवट्टष्टक उद्भव ओ विकास
वर्ष 1976 मे मरणोपरान्त साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत भेल। ऐतिहासिक किंवा पौराणिक
कथाक आधार पर लिखित पोथीमे अछि-(1)महाकवि विद्यापति नाटक, (2) शास्त्रार्थ नाटक (3)
कन्दर्पी घाट नाटक (4) विद्याधर कथा (5) उर्वशी (6) मेनका (7) धर्मव्याध कथा (8) जट-
जटिन एवं (9) श्यामा-चकेवा आदि।



तेसर कोटिक पोथीमे अछि-(1) दुखिया बाबाक खटरास (2) अपरिणीता आदि। एहि
प्रकारक पोथी राजे•ार बाबूक सर्जनात्मक प्रतिभाक द्योतक थिक।




मैथिली साहित्यक इतिहासकें सामान्यतः सिद्धलोकनि द्वारा रचित, विशेषः शरहपादक
साहित्यक आधार पर सप्तम अष्ठम शताब्दी धरि लएगेल जाइछ। मुदा राजे•ार झा एहि
स्थापनासँ सहमत नहि छथि। अपन अनुसंधानक आधार पर ओ मैथिली साहित्यक आदिकालक
इतिहासकें निम्नप्रकारे विभाजित कएल अछि-(1) 1500 ई0 पू0 सँ 800 ई0 धरि उद्भव एवं
अविकसित साहित्य (2) 800 ई0 सँ 1200 ई0 धरिक अवधिमे रचित साहित्यकें प्रारम्भिक एवं
विकासक साहित्य तथा (3) 1200 ई0 से 1400 ई0 धरिक अवधिमे रचल

साहित्यकें समृद्ध साहित्य मानल अछि।



साहित्यक काल निर्धारण लेत सर्व प्रथम आवश्यक अछि जे ओहि कालक रचना
उपलब्ध हो। सामग्री उपलब्ध भेला पर भाषाक विकासात्मक विवेचन आवश्यक होइछ। यद्यपि
राजे•ार झा मैथिली साहित्यक आदिकालक आरम्भ 1500 ई0 पू0 सँ मानल अछि। किन्तु तेइस
सए वर्षक साहित्य जकरा ओ अविकसित साहित्य कहल अछि, बानगी प्रस्तुत करबामे असमर्थ
छथि। ओ वाल्मीकि रामायण सँ गुह्यसमाजतंत्र, ज्ञानसिद्धि साधनमाला, ललित विस्तर आदिमे
मैथिली शब्दक प्राचीन प्रयोग पबैत छथि आ प्रमाण स्वरूप दू चारिटा शब्द प्रस्तुत कएल अछि।
किन्तु दू चारिटा शब्दक उपस्थितिसँ ओकर प्रयोगक सन्दर्भ तथा तकर एखनधरि कोना भेलैक
अछि, से स्पष्ट नहि होइछ। तात्पर्य जे साक्ष्यक आभावमे राजे•ारबाबूक तर्क कमजोर छनि।
भाषाक विकासक रूपरेखा प्रस्तुत करबाक बदलामे ओ ओहिकाल खण्डक राजनीतिक आ
सामाजिक इतिवृत्तिमे लेपटा गेल छथि आ तें प्रतिपाद्य छूटि गेल छनि।



अवहट्ट क उद्भव ओ विकास मे राजे•ार बाबू अपन प्रतिपाद्यकें प्रस्तुत करबामे असमर्थ
भए जाइत छथि। अवहट्टक प्रसंग लिखने छथि-'पूर्वीय भारतीय भाषाक विकासका जे अवस्था
अवहट्टक नामसँ प्रख्यात अछि ओकर प्राचीनरूप अपभ्रष्ट थिक।' आ तकर वाद ओ पदतंजलि,
भरत आदिक मत प्रस्तुत करैत छथि। अवहट्टक सीमारेखा कोन ठामसँ अछि सर्वप्रथम कोन
ठाम एकर प्रयोग भेल से प्रामाणिक ढंगे कहबामे असमर्थ छथि। अवहट्ट केवल पूर्वीय भारतमे
प्रचलित छल से नहि, पश्चिमो भारतमे प्रचलित छल। ओकरो विकास होइत गेलैक अछि। ओहू
विकासक वर्गीकरण भेल अछि। किन्तु राजे•ार झाक जे विवेचन अथवा वर्गीकरण अछि ओहिमे
कोनो मौलिकता नहि अछि, जे समक्ष अबैछ ओ थिक चर्वित चर्वण। एकटा आरो फरिछा कए
कहल जा सकैछ जे अवहट्टक प्रसंग अनेको विद्वानक मतक अप्रमाणिक संग्रह मैथिलीमे
राजे•ार बाबू कएने छथि। दशम शताब्दीमे अपभ्रष्सकें लौकिक भाषारूपमे प्रचलि पबैत छथि
मुदा जखन विवेचना अथवा मत प्रतिपादनक बेर अबैछ तँ 1960 इ0 क सर्वानन्द टीका
सर्वस्वक लौकिक प्रेहलिका उपस्थित करैत छथि। असम्बद्धताक दोष एहिमे नहि छैक से नहि,
कौखन ओहनो सामग्री प्रस्तुत भए गेल अछि जकर विषय सँ कोनो येल नहि छैक।



अनेको असंवद्ध विषयक उल्लेखक बाद अवहट्टक जे विशेषता प्रस्तुत कएल अछि
राजे•ार झाक प्रतिपादनसँ निष्पन्न नहि अछि। अपितु डा0 गजानन वासुदेव तगारे आ डा0
तेसरीक मतक उल्लेख करैत छथि। अनेक अधीतो विद्वानक मतक उल्लेख करब लेखकक
गहन अध्ययनशीलताक तँ परिचय अवश्य दैछ मुदा तदुपरान्त लेखकक जे अपन मान्यता


निष्पन्न होइछ, से नहि भए पबैछ। राजे•ार झाक आनो शोध संबंधी पोथीमे एहि प्रकारक
स्खलन अछि।



ऐतिहासिक किंवा पौराणिक कथाक आधारपर लिखित पोथीक संख्या अधिक छनि।
तकर प्रमुख कारण जे राजे•ार बाबू एक तेहन संस्थान सँ संबद्ध छलाह, जाहिठाम विविध
विषयक पौराणिक अथवा ऐतिहासिक पोथीक संख्या विशेष छैक। ओहि पोथी सभक अनवरत
अवलोकन राजे•ारबाबूकें अपन मातृभाषामे ओहि विषयक पोथी लिखबाक प्रेरणा देने होएतनि।
आ जँ राजे•ारबाबूक एहि पोथीसभक मूल्यांकन हुनक मातृभाषा प्रेमकें ध्यान मे राखि करी तँ
विशेष लाभकर प्रतीत होएत, ओकर मूल्यांकन नीक जकाँ कएल जा सकैछ।



ऐतिहासिक किंवा पौराणिक कथाक आधार पर लिखित कतेको पोथीक नामक संग
राजे•ारबाबू नाटक जोड़ि देने छथि। एहि पोथीक अवलोकनसँ इएह प्रतीत होइछ जे नाटकक
विषय-वस्तु केहन होएबाक चाही, डायलौग केहन होएबाक चाही, स्थान काल आ पात्रमे कोना
सामंजस्य कएल जएबाक चाही, राजे•ार बाबू

ध्यान नहि दैल छलाह। आ प्रायः एही हेतु राजे•ारबाबूक ओ पोथी जकर नामक संग नाटक
शब्द जोड़ल अछि, से ने तँ मंचोपयोगी नाटक थिक आने सुपाठ्य। किन्तु, एहि सभक सबसँ
पैघ विशेषता अछि जे ओ मिथिला, मैथिल एवं मैथिलीक प्रति प्रगाढ़ प्रेम जगएबाक भावनासँ
ओतप्रोत अछि। जे लेखकक मातृभाषाक प्रति प्रतिवद्धताक द्योतक थिक।



'दुखिया बाबाक खटरास' आ 'अपरिणीता' राजे•ारबाबूक सर्जनात्मक प्रतिभाक द्योतक
थिक। एहि दूनू पोथीमे राजे•ारबाबू कल्पनाक आधार लेलनि अछि। दुखिया बाबाक खटरास क
प्रसंग स्वयं लिखने छथि-'हुनक नामधामसँ कोनो संबंध नहि रहि मात्र हमर कल्पनाक आधार
छनि जकर उपकरण कौतुक प्रियता आ चातुर्य थिक। एहिमे सात गोट कथा संगृहीत अछि।
सामान्यतया एकरा व्यंग्यपरक कथा कहल जा सकैछ। मुदा केवल व्यंग्ये धरि सीमित नहि
राखि प्रभावक तीव्रताकें स्थिर रखबाक बदलामे स्पष्टरूपे भूमिकामे उपदेश देल अछि, जे
प्रभावकें छितरा दैछ। मुदा एहि पोथीक बाषा अपन विशेषताक कारणें गद्य साहित्यक नमूना
बनि गेल अछि। गामघर मे प्रचलित शब्दक प्रयोग जेना ओ गाँज मे छानि कएने होथि। ई
लेखकक भाषा संवेदना, शब्दक परिचय आ प्रयोगकें द्योतित करैछ।



राजे•ार झाक व्यक्तित्व ओ कृतित्व कें जँ तराजूक पलरा पर राखल जायतँ कृतित्वक
अपेक्षा व्यक्तित्व विशेष भरिगर भए जएतनि। किएक तँ राजे•ारबाबू प्रेरणाक काज बड़ करैत
छलाह। लोककें लिखबाक लेल प्रेरित करैत छलाह। कार्यक्रम आयोजित कए लेखक ओ विद्वान
लोकनिकें नव-नव विषयपर सोचबाक लेल विवश करैत छलाह। आ एहि काज लेल ओ
स्मरणीय रहताह। ओहि महान व्यक्तित्वक निधन 23-4-1977 कें पचपन वर्षक वयसमे भए
गेल।



-मिहिर : 1978

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ललितक कथामे परिवेशक संक्रान्त जीवन



स्वतंत्रताक पूर्व भारत मे आशाक किरण पसरल छल, आकांक्षाक ज्योति प्रज्वलित
छलैक। अपन देशीय शासन व्यवस्थाक उन्मुक्त आकाश मे साँस लेबाक आतुरता छलैक। लोक
समान अधिकार आ समान उत्तरदायित्व बोधक भावना सँ अभिभूत छल। शिक्षाक विकास सँ
अशिक्षा, गरीबी, भूखमरी, बैसारीक अन्त, योजनाक सफलताक प्रति आ•ास्त छल। सामन्तवादी
साम्प्रदायिकताक पाँक मे फँसल शासन-व्यवस्था मे लोकतंत्रात्मक विधानक उन्मेष सँ जन-
हितक विशेष ध्यानक प्रति आस्थावान छल। परंच, स्वतंत्रता प्राप्तिक उपरान्त भेलैक सभ
आशाक विपरीते। आशाक किरण निराशा मे बदलि गेलैक। लाबनि टूटि कए खसि पड़लैक।
यथार्थक धरातल पर निराशाजनक प्रतीति सँ, असफलताक घनघोर घटा सँ, सदिखन भारतीय
आकाश कें आच्छान्न आक्रान्त देखि, एहि ठामक लोकक चेतना आक्रोश कए उठलैक। अनास्था
आ अवि•ाासक प्रबल वेग मे समस्त मर्यादा आ मान्यताक कड़ी एक्के बेर झनझना कए टूटि
गेलैक, अस्त-व्यस्त भए गेलै। प्रथमे निर्वाचन मे धुरफंदी, स्वार्थान्धता, धन आ जातिवादक नग्न
नाच देखि, योग्य काजुल समाज सेवी कें अपने धोधरि भरबा लेल आतुर तथाकथिन नेता सँ,
प्रतिनिधि सँ, पराजित होइत देखि लोक अपना कें, असहाय अनुभव करय लागल। आशा छलैक
जे काजुल अछि, इमानदार अछि, जकरा मे गरीबक दुख-दर्द कें बुझबाक, प्रतिकार करबाक
उत्सुकता छैक, जे अशीक्षा आ बैसारीक झंझावात सँ उबारि, भरि पेट भोजनक व्यवस्था
करौनिहार नेता होअय, प्रतिनिधि चुनल जाएत। परंच, चुना जाइछ ओ व्यक्ति जकरा केवल
अपने

हित-रक्षाक अकुलाहटि छैक। गिरगिट जकाँ रंग-बदलि कए केवल अपने धोधरि कें भरबक
बेगरता रहैछ। चुना जाइछ ओ व्यक्ति, जकरा गरीबक रक्त सँ रंजित भरल बटुआ छैक, जे
खगल व्यक्तिक क्षेत्र सँ फराक वातानुकूलित अट्टालिका मे खुश-फैल सँ जीवन व्यतीत करैछ।
आ एहि नकली नेता द्वारा निर्मित विकास योजनामे गरीबक नाम पर धनीकक हित रक्षाक
प्रारूपक अन्तिम परिणति गरीबक गरीबी मे बृद्धि करैत अछि।



प्रतिनिधि चुननिहार मतदाता खगल अछि, दोसर साँझाक बुतातक बेगरता सदिखन
रहिते छैक। आर्थिक दुव्र्यवस्थाक पाँक मे फसल अछि। अपन शुभचिन्तक आ अपन उद्धारक,
असली नेताकें चिन्हियो कए बिसरि जाइछ, जखन ओकर धीयापूता पेटक भूख सँ अकुला
उठैछ, चिचिया उठैछ, आ ओ बिसरि जाइछ अपन नैतिक कत्र्तव्य, अधिकार बोध आ फँसि
जाइछ अपने रक्त सँ सराबोर धनीकक बटुआ मे तथा आर्थिक दासत्व असली नेता कें,
कार्यकत्र्ता कें ओकरा सँ बलात् अपह्मत कए लैछ।



चित्रधर बाबू 'प्रतिनिधि गरीब जनताक चित मे विराजमान छथि। अन्तरसँ समाजसेवी
छथि। दिन-रात्रि गरीबक सेवा लेल निःस्वार्थ भावें तत्पर छथि। अपन निःस्वार्थताक कारणें
चुनाव मे जीतक प्रति अवि•ाासो नहि छनि। परंच, रातिए राति गरीब, बेल्लल मतदाता पुहुकर
बाबूक बटुआक समक्ष डोलि जाइछ, नतमस्तक भए जाइछ, अपन दायित्व बोधसँ बलात् विमुख
भए जाइछ। मुदा पुहुकर बाबूक विजय अवश्य भक्क तोड़ैत छैक। गरीब तँ पुहुकर बाबूक


ओहिठाम अपन दुःखकें प्रकट करबालेल हुनक पोसुआ कुकूरक डरें पहुँचियो नहि सकैछ।
तखन, दुख दूर होएबाक प्रश्ने कहाँ? एहि कथाक माध्यमसँ कथाकार ललित (6.4.32-
14.4.83) वर्तमान राजनीतिक जीवनमे व्याप्त वैमानी, भ्रष्टाचार आ सुविधाक राजनीति पर
तीव्र व्यंग्य कएलनि अछि। पुहुकर बाबू आ चित्रधर बाबू दू वर्गक प्रतिनिधित्व करैछ। पुहुकर
बाबू ओहि वर्गक प्रतिनिधि छथि जे अपन सुख-सुविधा, स्वार्थ आ पदक लोभें जनताक शोषण
करैछ। ओकर स्थिति सुधारबाक बदला मे अपन स्थिति दृढ़ करबा पर तूलि जाइछ।



पाइक बल पर जीतल नेता अथवा उपकृत, सुरक्षित व्यक्ति शोषितक बलपर अपनाकें
जीवित रखबा लेल नैतिकता आ मानवीय गुणसँ कात कए लेलक अछि। ओकर समक्ष गरीबक
प्रति, भूखलक प्रति सहानुभूति नहि छैक, आर्थिक स्थितिकें जीवन स्तर कें सुधारि भरि पेट अन्न
देबाक उत्सुकता नहि छैक। ओ चाहैछ, भूखल, अभावग्रस्त आ पीड़ित कें टरका, शान्तिपूर्वक
भौतिक जगतक उपभोग करब। परंच, कतेक दिन धरि? की अनन्त काल धरि घोष बाबू
(प्रश्नचिन्ह) भूखलकें पोसुआ नोकरक बलपर फाटक सँ फराक रहताह, लोक जागि गेल अछि,
जागि रहल अछि अनन्त काल धरि समाज सुतले नहि रहि सकैछ। जड़ भेल नहि रहि सकैछ।
गरीब गुम्हड़ि गेल अछि। लोक नकली नेताक खोलकें फाड़ि फेंकबा लेल तैयार भए रहल
अछि। गरीब आ शोषितो क बीच चेतना आबि गेल छैक। ओकरो बीच रामगुलाम (प्रतिनिधि)
सन लोक छैक, जे अपन हककें नहि बेचल जएबाक प्रयास करैछ, अधिकार आ कत्र्तव्यक प्रति
सतर्क रहबा लेल ललकारि रहल छैक। आँखि पर पड़ल पर्दा कें फाड़ि रहल छैक। रामगुलाम
स्पष्टतः घोषित करैछ-"तों अपन हक बेचै छें। जेना चोर कुकुरकें सुखायल रोटीक टुकड़ा खुआ
चोरी करै-ए-तहिना तोरा सभकें रोटीक टुकड़ा खुआ-खुआ ई सभ तोरे सभकें लूटै छौक।" एहि
घोषणामे यथार्थ व्यंजित अछि। व्यंग्यक माध्यमसँ ललकार सम्प्रेषित अछि।



सुखायल रोटीक टुकड़ा खुआ-खुआ स्वयं मौज कयनिहार व्यक्तिक हाथमे देश आ
समाजक नेतृत्व, नैतिकताक ह्यास, रागात्मकताक अभाव, आर्थिक विपन्नता आ ओहि पर सँ
व्यर्थक पाँजिक गर्व, आजुक लोककें अत्याधिक संत्रासक तरहरामे धकेलि देने छैक। एहि
अन्हार कुप्प तरहारमे लोक औना रहल अछि, छटपटा रहल अछि। एक दिस पेटक ज्वाला कें
शान्त करबाक असमर्थता तँ दोसर दिस अपन कुल आ परंपराक प्राचीन मर्यादा क बल पर,
ओकरा भजा भजा जीवन खेपबाक, निब-हबाक भावुकता। यद्यपि ओ गौरवमय

परम्परा कें कायम नहि राखि सकल, पाँजिक गर्वपर आँजी सिद्धि नहि सिखलक, तथापि
व्यर्थक मोह छैक, गौरव छैक। समाज आ कुटुम्बक हँसारतिक कारणें चपरासीक काज नहि
कए सकैछ। घृणाक पात्र बूझल जयबाक भय छैक। आइ0 ए0 धरि कालेज मे पढ़ि लेने अछि।
अंग्रेजीक ए0 बी0 सी0 डी0 क अल्प ज्ञान भए गेल छैक। तँ खेत मे खुरपी कोदारियो कोना
चलाओत? अंग्रेजी शिक्षा सँ उत्पन्न व्यर्थक व्यामोह मे फँसल अछि। शारीरिक श्रम कयनिहार कें
समाज मे अप्रतिष्ठा भेटैछ। ओ एहि ग्रन्थि सँ पीड़ित अछि। तखन ओ एहि व्यर्थताक स्थितिमे
चाहैछ जे तानि कमरिया पड़ल रही। अपन कोकनल व्यक्तित्व आ तेलाह परिस्थिति पर
टिनोपाल छीटि, बाहरी तड़क-भड़क सँ अपन असली रूपकें नुकयबाक अथक प्रयास करैछ।
परंच संत्रास आ व्यर्थता बोधक आत्यान्तिक परिस्थितिमे ओकर मोह-भंग होइछ आ ओ युगक
संक्रमणशीलता सँ परिचित होइछ। वर्तमान स्थिति सँ उबारबा लेल शरीरिक परिश्रमक महत्ता


कें स्वीकारैछ। अंगीकार करैछ। शहर सँ बौआढ़ेहना कए अएला पर अनेको ठेस लगला पर
आँखि खुजैछ। खेत कें जोति-कोड़ि, बिना ग्रामीणक व्यंग्यक परवाही कयने अपना संग देशक
समृद्धिक हेतु तत्पर भए जाइछ। संत्रासक प्रायः सभ कारण (1) असत्य प्रतिष्ठा कें बचयबाक
प्रयास मे जीवन मे दारुण दर्द (2) परम्परागत मूल्यक दबाब सँ वास्तविकताकें स्वीकार नहि
करबाक असमर्थताजन्य छटपटाहटि। (3) संत्रासक अभिवृद्धि सँ अजीव निरर्थकता बोधक
रिक्तता बोध तथा (4) जीवनमे आद्र्रताक अभाव-ललितक कथा 'उड़ान' मे वत्र्तमान अछि,
अभिव्यंजित अछि।



देशक गरीबी धर्म निरपेक्ष अछि। धर्म सापेक्षताक स्थान एहि देशमे नहि छैक। तें, एहि
लोक निर्मित अभिशाप सँ सभ ग्रस्त अछि। सभ जाति समान रूपें गरीबीक जाँत मे पीसा रहल
अछि। रमजानी (रमजानी) सेहो कोना एकर अपवाद भए सकैछ? ओ ने तँ हिन्दू थिक आने
मुसलमान। ओ तँ एक गरीब मजदूर थिक। पुस्तैनी टमटम रखने अछि। ओहि सँ अपन
परिवारक भरण-पोषण करैछ, परंच, बाप-दादाक अमलक टमटमक प्रति ओकरा आब मोह नहि
छैक। ओकर मोह भंग भएगेल छैक, पीच सड़क पर नवनिर्मित परिवेश मे टमटम 'फिट' नहि
करैछ। तें रमजानी चाहैछ जे टमटम कें बेचि कए, परम्परावाद कें त्यागि नव निर्माण करी। तें
ओ चाहैछ, रिक्सा कीनब, आजुक युगक अनुरूप व्यवसाय करब। अपन टमटम आ परम्परा कें
भावुकतासँ नहि, अपितु उपयोगिताक दृष्टिये देखैछ। रमजानी क बाप तँ ओकरा टमटम
चलायब सिखौलक परंच ई अपन बेटा कें स्कूल पठयबा लेल व्यग्र अछि, छटपटा रहल अछि।
अपन परम्परा आ परिपाटिक जड़ता कें तोड़ि ओकर उपयोगी विकास कोना आजुक परिवेश मे
भए रहल अछि, तकर यथार्थ चित्रण रमजानी मे भेटैछ। संघर्षक वाद, अन्धकारमय वत्र्तमान सँ,
नव निर्माणक प्रसव-पीड़ा सँ कोना वत्र्तमान परिवेश आक्रान्त अछि, तकर सजीव सत्यपरक चित्र
उपस्थित होइछ। मोहभंगक बाद संघर्षशील आ दायित्वबोधक अवस्था मे कोना आजुक लोक
मृत्युंजय बनि गेल अछि, तकर अभिव्यंजना भेटैछ।



यद्यपि मृत्युंजय कें मृत्युक भय नहि छनि, परंच मृत्युक दंश सँ पीड़ित अवश्य छथि।
जिनगीक अछैतो जिनगीक उपभोग करबाक अवसर नहि छनि। अमृत्यु आ अजीवनक
ओभरलोड सँ पिचायल छथि, संत्रस्त छथि। दारोगा दीनानाथ कें रिकत्ताक 'ओभरलोड'
(ओभरलोड) पकड़बाक सरकारी आदेश छनि। अलिखित जुर्माना सँ उपरका हाकिमक आदेश
पूरा करबाक भार छनि। परंच, हुनका पर जे ओभरलोड छनि। एक अर्जनकत्र्ता पर अनेक
व्यक्तिक भार, शिक्षित बेरोजगारक भार, ओकरा के पकड़त? ओकरा पकड़निहार क्यो नहि?
बैसारी क मारल दारोगाजी क बेटा आ भाइ सेहो अपन व्यर्थता सँ परिचित अछि। अपन आ
घरक मुखियाक मानसिक स्थिति सँ भिज्ञ अछि। वर्तमान महगी आ आर्थिक अस्तव्यस्तताक
स्थिति मे प्रत्येक पारिवारक मुखिया, मात्र एक उपार्जन कत्र्ता, परिवारक शेष सदस्य कें रक्त-
पिपासु जोंक जकाँ अनुभव करैछ। यद्यपि लोक कें अपनापर, अपना कमाइ पर वि•ाास छैक,
परंच स्थितिकें सुधारबामे असमर्थ अछि। ओकर सभ प्रयास, सभ व्यग्रथा निरर्थक भए जाइछ।
अपन स्थिति कें अओरो बिगड़ैत टुकुर-टुकर देखैत अछि। कामूक कथाकृति 'ला स्ट्रेन्जर'क
मृत्युदण्डक फैसला सुनैत कथा नायकक व्यर्थता-बोध, जे आँगा-बढ़ि काफ्काक कथा

'मेटामार्फासिस'-मे आतंकपूर्ण अमानवीय रूप ग्रहण कए लैछ। एहि कथाक सहरुा टाङवला


उनटल झींगुरक निस्सहायता आ छटपटी ओभरलोडक जोंक समान अनियोजित परिवारक
सदस्य सँ चुसाइत दीनानाथ मे, भीमकाय सबारीक भार सँ आक्रान्त अबोध रिक्साचालक मे
तथा पंचानन बाबू (एक पुष्ठ) मे वत्र्तमान अछि। दीनानाथ, रिकसाचालक अथवा पंचानन बाबूक
निस्सहायता, संत्रास, छटपटी आजुक परिवेशक संक्रान्त मनःस्थितिक यथार्थ चित्र उपस्थित
करैछ।



वैज्ञानिक रुचि विकासक कारणें आजुक लोक धार्मिक क्रियाकलाप आ आडम्बरक
तार्किक व्याख्या कए अंगीकार करैछ। आँखि मूनिकए किछुओ स्वीकार करबालेल तत्पर नहि।
एहि प्रकारक वैचारिक क्रान्तिक पाछू वैज्ञानिक आ तार्किक रुचिक अतिरिक्त धर्मक नाम पर
धर्माधिकारी द्वारा कयल जा रहल द्वैध आचरण सँ परिचय अछि। धर्मक वाह्राडम्बर पर आस्था
नहि छैक। वि•ाास कोकनि गेलैक अछि। मन्दिरक पाछू मे धर्मक नाम पर चलि रहल कुकृत्य
सँ लोक परिचित भए गेल अछि। मर्यादा पुरुषोत्तम रामक सेवक, धर्मक ठीकेदारक मानसिक
द्वैध रूप (दू चित्र), कामिनी आ कंचनक प्रति विमोहन तथा अस्पतालवासी पतिक अतिरिक्त
छोट-छोट बच्चाक भरण-पोषण कयनिहारि मंदिरक हता बाटे जाइत मलाहिनिक प्रति धर्मक
नाम पर अवाच्य कथाक प्रयाग सँ लोक नीक जकाँ परिचित भए गेल अछि। एहि कथाक
माध्यम सँ धार्मिक नेताक द्वैध व्यक्तित्व पर कड़गर व्यंग्य भेल अछि।



अस्तित्ववादी दार्शनिक परम्पराक स्थापना आ नित्से द्वारा 'ई•ारक मृत्युक घोषणा' सँ
पराभूत साहित्य मे परंपरित धर्म, आदर्श, नैतिकता, जे रचना आ विकास लेल, उत्प्रेरकक काज
करैत आबि रहल छल, थस्स लए लेलक, एखाएक भरकुस्सा भए गेल। इन्द्रियातीत जगतक
पूर्णतः निषेध आ वहिष्कारसँ लोक मूलतः मानव भए गेल अछि। आ ओकर मानवीय आचरण
पर, आवश्यकता पर, जैविक विवशता पर नैतिकता, धर्म आ आदर्शक पर्दा नहि रहि पाओल।
सामाजिकताक बदलामे वैयक्तिकताक उन्मेष भए गेलैक। काम अथवा सेक्स क प्रति लोकक
प्राचीन मान्यता आ धारणामे आमूल परिवत्र्तन आबि गेलैक। एहि परिवर्त्तित विचारधाराक
फलस्वरूप कामक भूख, पेटक भूख जकाँ, पानिक पियास जकाँ जैविक विवशताक रूप लए
लेलक। त्वचा संवेदन आ जैविक विवशताक तृप्तिक लेल रूद्ध संप्रयोगक स्थान पर रूचि
परिवत्र्तनक आवश्यकता महत्त्वपूर्ण भए गेल अछि। स्नायुविक तनाव लेल ओ प्रतिबंध नहि, मुक्ति
चाहैछ। स्नायुविक तनाव अथवा टेंसनक स्थिति मे जीवैत अपन समस्त कोशिकाक व्यापार
अथवा विचारधारा कें प्रभावित राखब, ओ उचित नहि बूझैछ। मुक्ति क नारी चिररोगी पतिसँ
मुक्ति चाहैछ। आ, चिररोगी पति सेहो अपन शारीरिक असमर्थता कें कबूलैत मादाक प्रथम
आवश्यकता स्वस्थ नर द्वारा स्नायुविक तनावक तृप्ति, स्वीकारैछ, तृप्तिक अनुभव करैछ।
ललितक कथा वाणीक मुक्ति पत्नीक सौन्दर्यकें अनाघ्रान्त, अनस्पर्शित, अक्षुण्ण रखबाक निमित्त
पतिक आराध्य भावनासँ उबिआयल अतृप्त पत्नीक मनोग्रंथिक विश्लेषण करैछ। आ एहि प्रकार
सँ आजुक परिवेशमे वैचारिक स्तर मे, आचरण मे 'सेक्स' अथवा काम-भूख सेकुलर अछि,
धर्मनिरपेक्ष अछि, तकर सूक्ष्म विश्लेषण ललितक कथा मे भेटैछ।



विदेशी चल गेल। जमीन्दारी चल गेल। परंच ओहि स्थितिक सुविधाभोगीक मनोवृत्ति
नहि गेलैक। ओ एखनो चाहैछ अपन धन बल पर शासन करैत उपभोग करब। अपन


सामन्तवादी सुविधाभोगी मनोवृत्तिक तृप्ति लेल चुनाव मे धुरफंदी, धर्ममे आडम्बर तथा वासनाक
तृप्ति लेल पाइक उपयोग करबा मे नहि चुकैछ। अपन पेटक अतिरिक्त नाङड़ि माइक भार
उठौने अबोध कंचनियाँ (कंचनियाँ) कें बालो बाबूक बाघ छाप उठन्नीक बाघ नछोड़ि लैछ,
भम्होड़ि लैछ आ ओ असहाय बनि घृणा आ क्रोधक बीच तिलमिलाइत रहैछ। आजुक नकली
नेता आ सामाजिक कार्यकत्र्ता अपन स्वार्थक सिद्धि लेल, अपन सुख-सुविधा लेल राष्ट्रीय स्तरक
नामे कें भजएबाक हेतु आन्दोलन करैछ, हुनक नाम पर स्मारक बनेबाक हेतु कोष एकत्रित
करबा लेल हड़ताल करैछ, आन्दोलन

करैछ, मुदा ई आन्दोलन अपन अपन स्वार्थक आन्दोलन भए जाइछ। ई सत्ताधरी बनबाक
आन्दोलन थिक।



अपन देशकें जे लड़ाई लड़बाक अवसर उपस्थित भेलैक अछि से एक सीमित भौगोलिक
क्षेत्र धरि रहल अछि। एहि मे सम्पूर्ण राष्ट्रीय चेतना झनझना उठैछ। एहि प्रकारक स्थितिक
मोकाबिला करबाक लेल, एहि झंझनाएल मानसिक स्थितिक देशक खण्डता, एकता आ
स्वाधीनताक हेतु नवतूर अपनाकें मातृभूमिक बलि वेदी पर उत्सर्ग करबा लेल आतुर रहैछ।
कोनो प्रकारक भय अथवा घबराहटि नहि रहैछ। परंच ओकर माय-बाप लड़ाइक नामे सूनि
काँपि उठैछ, विह्वल भए उठैछ। भावुकता सीमा रेखा तोड़ि बहि जाइछ। पराधीन राष्ट्रक
मनोवृत्ति मे स्वाधिन राष्ट्रक सीमा रक्षाक महत्व अनालोचित रहैछ। एहि प्रकारक द्वैध
मानसिकता दू पीढ़ीक वैचारीक स्तरक दायित्वबोधक अभिव्यक्ति 'लड़ाइपर' कथा मे अछि।
राष्ट्रीय स्वाधीनता, एकता, अखण्डताक प्रति साकांक्षताक उद्घाटन भेटैछ। चर्चित कथाक
अतिरिक्त कथाकार ललितक अनेको कथा, यथा 'एक्सवाइ ओ (पल्लव-56) 'जंगल ओ रास्ता
(मिहिर), नीलकण्ठ (वैदेही) 'बोले बम' 'नव-पुरान' आदि अछि, जे वत्र्तमान संक्रमणशील युगक,
परिवेशक यथार्थकें सम्प्रेषित करैछ।



मिहिर 1975

.. .. .. ..



धीरेन्द्रक कथाक सामाजिक सन्दर्भ



कथाक सामाजिक सन्दर्भ जीवनक समग्र चित्रसँ प्रकट होइछ। ओहि चित्रक केन्द्र बिन्दु
होइछ रचनाकारक अनुभव। ओहि अनुभवमे किछु अपरिहार्य वैचारिक स्थिति होइत अछि जे
सामाजिक जीवनकें प्रभावित करैत अछि। रचनाकारक समाजक प्रति दार्शनिक दृष्टि
राजनीतिक मान्यता आ आर्थिक स्थिति जीवनक प्रभावक बिन्दु आ प्रेरक भए सकैत अछि। सभ
मिलि समाजकें प्रभावित करैत अछि। लोक जीवनक दृष्टिकें प्रभावित करैत अछि। एकहिसंग
विभिन्न दिशासँ अनेक प्रकारक दृष्टि अबैत अछि। एहिसँ रचनाकारक दृष्टि क्रमशः संश्लिष्ट
भेल जाइछ। संश्लिष्टता अनुभव क्षेत्रकें व्याप्ति प्रदान करैत अछि। रचनाकारक अनुभव क्षेत्र
समाजक अनुभवक रूपमें स्वीकृति पाबि जाइछ। तात्पर्य जे रचनाकारक ओएह अनुभव समाजक
अनुभव भए पबैत अछि, समाजक दर्पण भए पबैत अछि, जे सौन्दर्यक सृष्टि करैत हो।
सौन्दर्यक सृष्टि भेल रचनाक सामाजिकता, सामाजिक सन्दर्भ। सामाजिकता, थिक समाजरूपी


नेहाइ पर पीटि, तैयार रूपाकृति। नेहाइ थिक व्यक्तिमन आ सामाजिक मनक द्वन्द्व। व्यक्तिमन
चाहैत अछि लेखकक वैयक्तिक जीवनमे अनुभूत सुख-दुख, आश-निराशा, भूख आ यन्त्रणाक
अभिव्यक्ति। एहि प्रसंग लेखक वेसी सँ वेसी कहय चाहैत अछि, लिखय चाहैत अछि।
व्यवहारिको जीवनमे एहन किछु व्यक्ति अवश्य भेटताह जे आत्मप्रशंसा करैत अघाइत नहि
छथि। परंच श्रोताकें वितृष्णा अवश्य भए जाइत अछि। आत्मप्रशंसी व्यक्तिकें अबैत देखि अथवा
कोनोठाम पूर्वहिसँ विराजमान देखि चाहैत अछि कन्नी काटय। कारण स्पष्ट अछि। ओ व्यक्ति
अपन मन आ सामाजिक मनक बीचक अन्तरकें बूझि नहि पबैत अछि। कहबाक अभिप्राय जे
रचनाकारक वैयक्तिक जीवनमे प्राप्त अनुभूतिक अभिव्यक्ति तखनहि लोकक ह्मदयमे भाव जागृत
कए सकैत अछि, जखन ओहिमे सामाजिक मनक अभिव्यक्ति रहय, ओ सामाजिक सन्दर्भ रखैत
हो।



कथाकारक व्यक्तिमनक अभिव्यक्तिमे सामाजिक मनक अभिव्यक्ति अछि अथवा नहि। आ
जँ अछिओ तँ कतेक दूर धरि सफल भेल अछि, तकरा कोना नापल जाए। कोन पैली सँ नापि
पाठकक लेल प्रस्तुत कएल जाए। ओना सभसँ सुलभ ई विधि अछि जे जँ कोनो रचना पढ़ि
अथवा सूनि कथाकारक व्यक्त अनुभूति पाठक

वा श्रोताक सुप्त भावकें स्फुटित कए सकय, शान्त पोखरिमे फेंकल ढ़ेपसँ उत्पन्न हिलकोर
सदृश्य वैचारिक जगतकें जे रचना उद्धेलित कए सकय, सएह ओहन रचना थिक जाहिमे
सामाजिक मनक अभिव्यक्ति रहैत अछि। ओएह रचना सामाजिक सन्दर्भक द्योतक थिक।



प्रत्येक नवयुवक जे निष्ठापूर्वक श्रम करैत अछि, आकांक्षा रहैत छैक जीवनमे किछु
करबाक। जीवनमे किछु बनि देखेबाक। वि•ाविद्यालयक डिग्री पबितहि माय-बाप, भाइ-बहीन आ
सर कुटुम्बक टकटकी शुरु भए जाइत छैक। किन्तु आशाक ओ दीपक जतय जीविका लेल
आवेदन करैत अछि। परोक्ष विधिए ओ रिक्त स्थान भरि देल जाइत अछि। जे सुविधा सम्पन्न
रहैत अछि, जकर गतात सूत्र मजगूत रहैत छैक, सभठाम सफल भेल जाइत अछि। मेधा आ
उच्चाशिक्षाक अतिरिक्त जकरा लेल आर किछु नहि छैक जकर पारिवारक आर्थिक मेरुदण्ड
कमजोर छैक, आने पैरबीक पात्रता छैक, दरबज्जे दरबज्जे निराश आ अपस्याँत होइत रहैत
अछि। जतय कतहु जाइत अछि लोक मुँह दूसि दैत छैक। सभ आँखि प्रश्न करैत छैक-'बेकार
छी आइ-काल्हि कोनो काज किएक ने धए लैत छी (गीध)। जेना कोनो काज पकड़ि लेब
पाठ्यपुस्तक घोंखि लेब हो। अपन हाथक होइक। पढ़ाइक क्रममे पिता द्वारा महाजन सँ लेल
कर्ज कम दुखदायी नहि छैक। शिक्षित नवयुवकक मनःस्थिति आ बेकारीक बढ़ैत रोगक
स्थितिक वर्णन डा0 धीरेन्द्रक (ज0-17 जुलाई 1934) कथा मनुक्ख विकाएत आ गीध मे नीक
जकाँ व्यक्त भेल अछि।



सत्य हरिश्चन्द्रक जमानामे लोक अपना कें बेचि वचनक पालन करैत छल, किन्तु
आजुक युगमे केओ क्रेता नहि अछि, एकटो ग्राहक नहि अछि। ठाम-ठाम 'सत्यमेव जयते'
लिखल रहैत अछि। परंच विजय होइत छैक असत्यक। छल आ प्रपंचक। ओना सभ केओ
अपनाकें सत्यवादी आ पर हितकारीए बनैत अछि। घोषित करैत अछि। धीरेन्द्रक एक कथा
नायक कहैत अछि 'हरिश्चन्द्र ! सुनह ! सुनह ! हम जोरसँ कहि रहल छियह। सुनैत छह हौ


लोकसभ एक गोट मनुक्ख विकाएत 'एक गोट ग्रेजुएट जे तोहर कोनो काज कए देतह। यदि
अवसर दहक मनुक्ख बिकाएत।' परंच आधुनिक हरिश्चन्द्र ओकरा बूझि लैत अछि-बताह
पाकेटमार। शिक्षित बेरोजगार नवयुवकक ई व्यथा-कथा एक व्यक्तिक नहि रहि पबैत अछि
अपितु कथाकारक ई कटु अनुभव देशक लाख-लाख नवयुवकक अनुभव भए जाइत अछि।
कठखोधी जकाँ एक गाछसँ दोसर गाछपर बैसबाक विवशता एक व्यक्तिक नहि, सामजिक
सन्दर्भकें व्यक्त करैत अछि।



बड़का माछ छोटका माछकें तँ खाइते अछि। एक मनुष्य दोसर मनुष्यक अस्तित्वकें
सेहो स्वादैत अछि। एक व्यक्ति दोसर व्यक्तिक श्रमक फलकें हथिया लैत अछि। अपनहि
सामाजक अपनहि वर्गक निर्बल व्यक्तिक आर्थिक, धार्मिक आ सामाजिक शोषण कए अपन
स्वार्थसिद्धिक प्रयास चिन्ताक कारण बनैत अछि। ओ सुविधा सम्पन्न वर्ग छल-छद्म आ भेद-बल
द्वारा श्रीहीन आ आश्रयहीन वर्गक अधिकारक अपहास सदिखन करबाक चेष्टामे रहैत अछि।
ओकर रक्त मज्जाकें चूसि अपन परिधि-विस्तार करबामे पुरुषार्थक बोध करैत अछि। गामक एक
गरीबहाक नेनाक वंशीक माछकें गामक मुँहगर विरजू बाबू छीनि, सरकारी डबरो पर अपन
अधिकार जना लैत छथि। आ ओ असहाय नेना वंशीक तरैला जकाँ विरजू बाबूक मुँह दिस
शून्य दृष्टिएँ तकैत रहि जाइत अछि। विरजू बाबू आन लोककें एक जीवित लहास सँ वेशी नहि
मानैत अछि। (गीध)। ओहिना गाम-गामक शिक्षण संस्था ओकर चरौर थिकैक। ओ कौखन नहि
चाहैत अहि जे दीन-दुखीक धीयापूता युग-युगसँ शोषित प्रताड़िक लोकवेद शिक्षा पाबय। शिक्षित
भए सामाजिक अधिकारसँ परिचित होअए अथवा सामाजिक न्याय पएबालेल मूड़ी उठाबए
(पढाइत धूरक आगि)। अपन शोषण चक्रकें अवाधित रखबालेल फगुनियाँ (ओकर फगुआ) सन
युवकक जीवन लीला अकालहि समाप्त कए देल जाइत अछि। ओ व्यक्ति बादुर (बादुर) जकाँ
सभ गोलमे भिझरा जाइत अछि। लाभ भोगक आकांक्षा रखैत अछि। किन्तु कथाकारक दृष्टि
समाजक बादुरी चरित्रक व्यक्तिकें चिन्हा दैत अछि। छद्मवेशी सँ लोककें परिचित करा दैत
अछि।

वस्तुस्थितिक यथार्थचित्रणक संग न्याय आ अधिकार पएबाक प्रति सतर्क रहबाक चाँकि आनि
दैत अछि। डा0 धीरेन्द्रक कथाक ई सामाजिक चाँकि सामान्य विशेषता थिक।



महादेवक विसर्जनक मन्त्रोच्चारणक बीचहिमे आद्याबाबू (धर्मात्मा) कमला महारानीक
विनाश लीला तथा मलेरिया क आक्रमण सँ पस्त भेल सुकला द्वारा कर्ज चुकता नहि कएलाक
कारणें गारि-पढ़ैत छथि। वज्रसम कठोर आद्याबाबूक ह्दयमे सुकलाक आर्तनाद किंचितो दयाओ
सहानुभूतिक मिलियोभरि उत्पन्न नहि कए पबैत अछि। आद्याबाबूके एक वातक पर्याप्त रंज छनि
जे सुकलाक आङनवाली जँतबाक हुनक आदेश अनठिया देने छलनि। आ तें मालिकक संकेत
पबितहि बचनमा सुकना कें ओधबेध कए दैत अछि। बैसले-बैसल आद्याबाबू पेटीसँ कजरौटी
बाहर कए सादा कागज पर चटपट औंठा छाप लए लैत छथि। आ पुनः पढय लगैत छथि
'सहरुा शीर्षा पुरुषः' समाजमे ओहि कोटिक लोकक कमी नहि अछि, जे लोकक विवशताक
प्रत्येक लाभान्वित होमय चाहैत अछि। धीरेन्द्रक कतेको कथामे सामाजिक जीवनमे व्याप्त एहि
प्रकारक विसंगतिक प्रभावक उद्धाटन अछि।




धीरेन्द्रक अधिकांश कथाक जन्म समाजक ओहि क्षेत्रक व्यथासँ होइत अछि जे
सामाजिक स्तर पर तिरस्कृत अछि। शारीरिक स्तर पर बात-बात पर ततारल जाइत अछि।
आर्थिक स्तर पर औंठा बोरबा लेल अभिशप्त अछि। बापे-पूते खटितो रहला पर भविष्यक प्रति
सदिखन चिन्ताकातर रहैत अछि। रौदी, दाही, बाढ़ि आ अकालसँ झमारल मनोहरा (घंटी)
अपन प्रिय सिलेविया गाइक करिया बाछी नुनुआकें मात्र बीस टाकामे बेचि अपन दस वर्षक बेटा
ठिठाराकें कमेबालेल पूब पठा दैत अछि। बपटुग्गर सोनमा प्रत्येक मास बापक कर्जा मनीऑर्डर
सँ चुकबैत जाइत अछि। परंच नीत्तू बाबूकें हेरायल बही भेटैत जाइत छनि। इमनदार सोनमा
गाममे रहबाक अपन मोहकें त्यागि विदा भए जाइत अछि ('सवाइ')। बंगट मिसरक (फतिंगा)
अकारण नालिस करब, गामक कतेको व्यक्तिकें मामिला मोकदमाक पसाहीमे झरका कए मारि
दैत अछि। •ोत मेघक टुकड़ी सन पवित्र विवाहिताक लाहुरे (पति) जखन परदेशसँ नहि अबैत
अछि तँ आर्थिक विवशताक कारणें गर्दनिसँ पोतेक छड़ (मंगल सूत्र) डबडबायल आँखिए बाहर
कए एक बेरि चूमि, जूमा कए फेकि दैत अछि तथा शेरेचन होटलक प्रौढ़ महिलाक संग विदा
भए जाइत अछि। (हिचुकैत बहैत सेती)। दस वर्षक वीरेक जखन खेलेबा धुपेबाक बेर छलैक,
माय ओ छोट पैघ बहिनक मोह ममताकें बिसरि असमय प्रोढ़ बनि नोकरीक ताकमे मोगलान
(भारत) विदा भए जाइत अछि (पहाड़क फूल)। झोटहूबाबू (गामक ठठरी) अपन बहियाक घर
घड़ाड़ी लिखा लैत छथि तँ गाम छोड़बाक अतिरिक्त आन कोनो उपाय नहि रहि जाइत छैक।
करजाक फरिछौटमे मालिक पोसियाक गाय आ टूनाकें गोनराक बथान सँ खोलि लए जाइत
छथि। ओही सवत्सला गाय पर गोनराक समस्त परिवारक ध्यान केन्द्रित रहैत छलैक। एक धार
दूधक प्रत्याशामे बैसल गोनराक नेनाक आशापर तुषारपात सेहो भए जाइत छैक। खूंटापरसँ
गाय आ ओकर टून्नाक खोलबाक काल नेनाकसंग परिवारक समस्त सदस्यक मनोदशाक
वास्तविक चित्र टूना कथाकें प्राणवान बनादैत छैक। धीरेन्द्रक कथामे समाजक निर्धनवर्गक
अनेक विधि शोषणक चित्र भेटैत अछि।



धिरेन्द्रक समकालीन आ परवर्ती कतेको कथाकारक कथामे नारीक चित्रण एक मादाक
रूपमे भेल अछि। ओ जैविक विवशताक तृप्ति लेल उच्छामात्रहिसँ कतहु आ कौखन जा सकैत
अछि। दूध पीबा नेनकें पेसीया लगा कए निभ्र्रान्त घूमि सकैत अछि। पति-पत्नीक बीच समर्पण
आ एकात्म भाव नहि, प्रत्येक भ्रूभंगिमासँ स्वार्थ टपकैत रहैत अछि। किन्तु, धीरेन्द्रक कथा
आधुनिक युगक एहि कृत्रिम बन्धन आ विसंगति सँ फराक अछि। ओ नारीकें प्रेम आ त्यागक
मूर्तिक रूपमे देखैत अछि। ओकरामे ममता कूटि-कूटि कए भरल अछि। ओ व्यवहारपटु रहैत
अछि। स्वयं कष्टसहितो अम्लानमुख रहैत अछि। ह्मदयक विशालता ओकर विशेष गुण थिकैक।
मामीक स्नेह (मामी), वुचनीक ममता, कर्मठता आ दारुण आर्थिक दुःस्थितिसँ लड़ैत रहाबक
धैर्य

(मादा काँकोड़) भौजीक सहिष्णुता आ व्यवहार कुशलता (गुम्मा थापड़) आभा आ घनमायाक
स्नेह (पहाड़क फूल), गुड़की बुढ़ियाक त्याग (बन्हकी) अगहनियाक भ्रातृत्व (कंठा) आदि
उल्लेखनीय अछि। एकर अर्थ ई नहि जे धीरेन्द्रक कथाकार नारीसँ केवल त्याग, दया ममता
आ समर्पण-कामना राखि चित्रित करैत छथि। 'विधवा' आ 'देवीजी' नितान्त भिन्न मूल गोत्रक
कथा थिक। धन, वस्त्र आ आभूषण सँ नवकनियाँ कें तोपि कें राखि, सभ प्रकारक भौतिक सुख
सुविधाक अम्बार रहलो पर ओकर ह्मदयक भाव कें दवा कए नहि राखल जा सकैछ कथाकार


सेहो अनुभव कएल अछि। अनमेल विवाहसँ होइत अकाल वैधव्यक कारण ओकर माए-बाप,
भाए-बहीन आ समाज सेहो समान रूपे दोषी अछि। देवीजी सामाजिक कुरीतिक विरोधमे ठाढ़
होइत छथि तँ परिवारक आनलोक गंजनसँ तर कए दैत छनि। तथापि ओ डेरा कए चुप्प नहि
भए जाइत छथि। ओहि तत्वसभक भत्र्सना सँ बाज नहि अबैत छथि। धीरेन्द्रक एहि कोटिक
कथामे नारीक शोषण चित्रित अछि। किन्तु शोषितामे अपन आक्रोश व्यक्त करबाक आत्मबल
छैक।



धीरेन्द्रक कथाक संवेदना क्षेत्र व्यापक अछि। ओ मनुष्येत्तर प्राणीधरि व्याप्त अछि।
मनुष्ये जकाँ पशुओक संग आत्मीयता स्थापित आ व्यंजित अछि। मनुक्ख आ बकरीक एकटा
बच्चा, सूगरक बाप, टूना, घंटी आदि एही प्रकारक कथा थिक। पुत्रक स्वास्थ्य कामना निमित्त
सुवैया कमला महारानीकें पाठी चढ़ेबाक कबुलातँ कए लैत अछि, किन्तु कोरामे पाठीक
मेमिआएब सूनि, ह्मदय आर्तनाद कए उठैत छैक। तर्क वितर्क चलैत अछि। द्वन्द्व होइत छैक-
बलेलहा बचितौ, यदि कमला माइकें कबुला नहि करितहुन्ह? चढ़ा आ जो........।' किन्तु सुबैया
पाठीकें कोरामे कसने जाइत छैक। ओ कबुला बिसरि पाठीक संगे पड़ा जाइत अछि। एहि
कथामे धीरेन्द्र मनुष्येतर प्राणीक संग आत्मीयता आ दयाक चित्रणक संग, लोकक धर्मभीरुता
पर सेहो प्रहार कएल अछि। मनचनमाक आशाक बिन्दु अछि चारू पाऊर (सुगरक बाप)।
ओहिमे सँ दू टा बेचि दुकौड़ियाक माए लेल ललका नूआ कीनत, अपना लेल कलगैयाँ लोटा
लेत, दुकौड़िया लेल जामा लेत, आ बसबिट्टी जोकर जमीन कीनत। किन्तु, बेचल पाऊर
पड़ाकए जखन रातिमे पुनः खोभारीक कमची तोड़ि प्रवेश कए जाइत छैक तँ गहकी आ
समाजक गारि फज्झति सूनिओ कए ओ बेचब नहि गछैत अछि। दाम फिरबैत कहैत छैक-'नइ
बेचबौ कतबो देबह तैयौ ने। कहयो ने बेचबै। जखन ओ हमर दुआरि ने छोड़य चाहैत अछि तँ
कहियो ने बेचबै।' सूगरक जे बच्चा ओकर आशा-आकांक्षा आ आवश्यकताक पूर्तिक एक मात्र
साधन छैक, से ओकर ह्मदयक अंग बनि जाइत अछि।



धीरेन्द्रक कथाक नायक-नायिका हारैत नहि अछि। ओकरा अपन शक्तिक प्रति आस्था
छैक। अपना पर भरोस छैक। जीवनक प्रति वि•ाास छैक। प्रतिकूल परिस्थितिमे संघर्ष लेल
तत्पर रहैत अछि। सात मानवीय कायाक जननी बुधनी (मादा काँकोड़) भरि दिन रोड़ा फोड़ि
सन्तानक प्रतिपाल करैत अछि। ओ मनमे निर्णय कएलैत अछि, काँकोड़ नहि मनुक्खक बेटी छी
आ ओकर बच्चा सभ मनुक्खक बच्चा। जकरा नेह छोह छैक।' मायक मुँह देखि जेठका बेटा
बुधनी कें कहैत छैक कनिके दिन रहलौए माए ! वेसीसँ वेसी दी वरख। जखन हम जनमे जाए
लगबौक तँ तोरा थोड़बे हरान होबए देबौक।' अल्प वेतन भोगी सुन्दर (इजोतक प्रतीक्षा)
इजोतक बटाबटीमे अन्हारक कष्टकें बिसरि बैसल अछि। जेठ बालकक बेकारीक दुख सँ आहत
चरणदास छोटको बेटाकें पढ़ाइक खर्च देबाक निर्णय कए लैत अछि। 'ओ फेर सिमरक फरक
प्रतीक्षा करत। ओ एक गोट सुग्गा थिक जे प्रतीक्षा करबाक हेतु, निराश होएबाक हेतु बनल
अछि। के जानय जाहि प्रकारें छिड़िआएल तूर लोकक काज अबैत छैक, तहिना तूर सन
ओकरो बेटा सभ धरतीक कोनो काजमे आबि जाइक (सिमरक फर)छ कठखोधीक एक गाछसँ
दोसर गाछ पर उड़ि बैसब आ आहार लेल परिश्रम करब जीवनक प्रति आस्था कें व्यक्त करैत
अछि। तात्पर्य जे कथा नायक आ नायिका मे जीवनक प्रति आस्था छैक। एकहि संगमे नेका


प्रतिकूल परिस्थितिक आबि जाएब ओकर वि•ाासकें तोड़ैत नहि अछि। ओ पराजित नहि होइत
अछि (अपराजित)। चरणदासक ई कहब जे छिड़िआएल तूरसन ओकरो बेटा धरनीक कोनो
काजमे आबि जाएत,

लेखकक सामाजिक दृष्टि आ संलग्नताक द्योतक थिक।



धीरेन्द्रक कथामे राजनीतिक विसंगतिक चित्रणक अपेक्षा आर्थिक आ सामाजिक
शोषणक स्थिति विशेष मुखर आ प्रधान अछि। सोझ शब्दमे कहि सकैत छी, धीरेन्द्रक कथामे
राजनीतिक चेतनाक अभाव अछि। परंच, सामाजिक, आर्थिक आ राजनीतिक क्षेत्र ततेक
संश्लिष्ट आ अन्तरावलम्बित अछि जे एक कें दोसरासँ फूटा कए देखब उचित नहि अछि।
चेतना सम्पन्न रचनाकार लेल असम्बद्ध रहब, असंभवो भए गेल अछि। गामक राजनीति ओकर
फगुआ मे अछि, तँ देशक राजनीतिक विसंगति मनुक्खा विकाएत आ हड्डीक माय सन कथामे
भेटैत अछि। हड्डीक मायक कारुणिक अन्तसँ समाज चिन्तित नहि अछि। चिन्ताक कारण छैक
एक खण्ड नूआ आ चारि सेर अल्हुआ व्यर्थ भए गेल, किएक तँ ओ वोट देबासँ पहिने समाप्त
भए गेल। (हड्डीक माय) धीरेन्द्रक कथामे ओहि स्थितिक चित्रण वि•ासनीय अछि 'जकर' बीचसँ
संघर्षक तेज पुंज निकलबाक चाही। परंचा जे किछु बाहर होइत अछि, तकर धाह ताप उत्पन्न
नहि करैत अछि। शोषणक पात्र बनल रहितो कतहु शोषित वर्ग एकठाम होइत नहि भेटैत
अछि। घरड़ीसँ बेदखल भए जाइछ, जाल फरेबसँ कर्जक बोझ कहियो समाप्त नहि होइत
अछि। फगुनिया सन समर्थ आ काजुल ग्रामीण युवककें मरबा देल जाइत अछि। (ओकर
फगुआ) किन्तु ककरो मे कोनो सुगबुगी नहि भेटैत अछि। झालि-मृदंग ठोकैत फगुआ गबैत रहैत
अछि। मरबा लेल गाम आएल बूढ़ा (गामक ठठरी) सहयात्रीक प्रश्न-'बाबा। तों झोटहू बाबू सँ
तकरार किएने कएलह! घराड़ी छोड़ि किएक चल गेलह? तोरा जखन धरती सँ एतेक मोह
छलह, तँ खून भए जएतह ओकरा लेल-सूनि मना करैछ-'एना नहि बाजी'। अगिला जन्ममे
लड़बाक निर्णय करब आ एहि जन्ममे शान्तिसँ अपन गामक धरतीपर मरबाक इच्छा राखब-
कोनादन लगैत अछि। एहि स्थितिकें देखि कए लगैत अछि जे धीरेन्द्रक कथामे शोषण,
उत्पीड़न आ डराएब-धमकाएबाक स्थितिक चित्रण अबैत अछि, तँ कथाकारक व्यक्ति मन पर
सामाजिक मन पर सामाजिक मन आरूढ़ रहैत अछि। परंच, जखनहि सम्मिलित प्रयासँ एकटा
तेज पुंज फूटबाक बेर अबैत छैक, कथाकारक व्यक्तिमन प्रबल भए उठैत अछि सामाजिक मन
गौण। एहिना कथाकारक व्यक्तिमन 'पीराआम' तथा 'कलाकार आ प्रतिमा' मे सेहो प्रबल भए
गेल अछि।



धीरेन्द्रक कथामे गामक धरतीक मोहक स्थितिक चित्रणक प्रमुख कारण अछि गामे नहि,
देशो छोड़ि, विदेशमे जीविकापन्न होएबाक विवशता। ओ एहन देश जाहिठाम भारत जकाँ
लेखककें अभिव्यक्तिक स्वतंत्र्ता नहि रहलैक अछि। ई मानसिक पीड़ा कोनहुँ लेखकक लेल
दारुण होइत अछि आ ज विशेष संवेदनशील एवं भावुक रहला पर आर अधिक। तें सृजनक
स्थितिमे बेर-बेर गामक धरती मोन पड़ैत भेटैत अछि। तें की धरतीक मोहक अभिव्यक्तिकें
धीरेन्द्रक व्यक्तिमनक मोहवादी कथा मानि बेरा देल जाए! वस्तुस्थिति ई अछि जे कोनो व्यक्ति
गाममे रहैत छथि अथवा गामक धरतीक निकट रहैत छथि गामक धरतीक प्रति आकर्षण कम
रहैत छनि, आ जे शहरक कृत्रिम जीवनकें अपन जीवनक नियति मानि लेल अछि, गामक


धरतीक सोह नहि अबैत छनि। महत्वपूर्ण प्रश्न अछि जे धीरेन्द्रक कथामे आ कि आने
कथाकारक कथामे कथानायककें गामक सोहनगर धरती छोड़िकें नगर-उपनगक कृत्रिम बसातमे
जीवन गुदस्त करबाक विवशता किएक छैक? धीरेन्द्रक कथाक एहि सन्दर्भमे ई विशेषता मानल
जाएत जे हिनक एको कथा नायक सामाजिक मर्यादाक उल्लंघन अथवा चोरि-डकैती कए गाम
छोड़ि नहि पड़ैत अछि। पारिवारिक कलहो कारण नहि होइत अछि। धीरेन्द्र जाहि क्षेत्रक कथा
कहैत छथि आर्थिक दृष्टिसँ नितान्त लसकल अछि। उद्याग धंधा छैक नहि। ओहि परसँ प्रत्येक
वर्ष रौदी-दाहीक प्रकोप होइते छैक। जीवनक आधार लेल कृषिकर्मकें छोड़ि आन कोनो साधन
नहि छैक। किछु व्यक्तिक मुट्ठीमे गामक सम्पूर्ण धल-सम्पदा बन्द अछि। सम्पत्तीक एहि प्रकारें
एकठाम भए जाएब, शोषण आ अत्याचार कें बढ़बैत अछि। जे शिक्षित छथि जीविकाक साधन
नहि छैक, जे अशिक्षित अछि प्राकृतिक एवं मानवीय कोपक भाजन बनल रहैत अछि।
परिणामतः, आजिज भए गामक धरतीकें छोड़ि बिदा भए जाइत अछि। परंच, गामक धरतीकें
छोड़बाक मोह कतहु चैनसँ रहय नहि दैत छैक। इएह कारण थिक जे

बीसवर्ष पूर्व, मालिकक अत्याचारसँ बचबालेल पड़ाएल बूढ़ एहि वि•ाासक संग गाम अबैत अछि
जे गामक धरतीपर मरलासँ स्वर्ग भेटैत छैक। 'अपन धरतीपर सरग होइत छै ने आ परदेशमे
मरबत तँ आतमा बुझलहक ने वउ। परेत भए जाइत छै। हम अपन धरती पर मरब बौआ।'
पिताक गरीबीक कारणें गाम छोड़ि बाहर गेल छौड़ा, शहरक सभ सुखसुविधाकें त्यागि गाम
घूमि आबैत अछि (गामक बेटा)। तथापि गामक वातावरण पहिने जकाँ निश्छल आ निर्मल नहि
रहल। स्वार्थ आ आत्मकेन्द्रित होइत विचार, लोककें समेटने जा रहल अछि। आत्मीयता घटि
रहल छैक। दाव-पेंच बढ़ि रहल छैक। गामसँ विवश भए शहर पड़ाएल छल। किन्तु, शहरक
कृत्रिम जीवनसँ त्राण पएबा लेल आब कतए जाएत। गाममे जीविका नहि छलैक। परंच किछु
दिन आत्मीयजनक संगव्यतीत करबाक सुविधा तँ छलैक। तकरो ग्रहण लागि रहल अछि। गर्मी
छुट्टी सान्तिपूर्वक कटबालेल गाम आएल कथानायक भारीमोनसँ सोचैत अछि, रोटीक जोगाड़
धरयबाक लेल विवश भए अपन माटितँ छोड़िए देने अछि, मुदा की एहि माटिक रूप एहन
विकृत भए जएतैक जतय आबि मरण काल वितयबाक इच्छा नहि होइक? (बदर) । बापक
कर्जकें चुकेबालेल सोनमा गाम अबैत अछि। किन्तु, नित्तू बाबू दोसर चिट्ठा बाहर कए लैत
छथि। सभटा कर्ज अदा कए एकदम अन्हरोखे हाथमे टीनक बाकस लटकौने सोझे टीशन बिदा
भए जाइत अछि। शहरक कृत्रिम जीवनक प्रति आसक्ति नहि छैक। गामक धरतीक मोह खंडित
भए रहल छैक। एहि मनःस्थिति कें धीरेन्द्रक कथामे स्पष्ट स्वर भेटल अछि।



धीरेन्द्रक शिल्पक चर्चाक क्रममे बहुत रास बिन्दु एकहिसंग नाचय लगैत अछि।
धीरेन्द्रक प्रायः प्रत्येक कथा गामक धरती पर, गामक खुरूरबट्टी पर, गामक खेत पथारमे आ
गामक जन बोनिहारक स्वेदकणसँ जन्म लैत अछि। तें धीरेन्द्रक कथाकें ग्राम्य कथा मानि लेल
जाए, आकि आंचलिक कथा कहल जाए। हमरा जनैत दूनू टूटा भिन्न तत्व थिक। ग्राम्य कथाक
आधार थिक विषय-वस्तु जखन कि आंचलिकता थिक एकटा शिल्प। कहबाक एकटा ढंग।
ग्राम्यकथाक विषय-वस्तु गामेक रहब आवश्यक। परंच आंचलिकता मे गामो आबि सकैछ आ
शहर नगरक कोनो एकटा मोहल्ला सेहो, जकर अपन वैशिष्ट्य छैक अपन रंग ढंग छैक। जँ
कि हमर प्रतिपाद्य धीरेन्द्रक कथाक शिल्पविधान अछि तें आंचलिकता, जे एक प्रकारक शिल्प
थिक, ततहि धरि चर्चा सीमित राखब उचित। कथामे कथाकारकें ओतेक स्वाच्छन्न नहि रहैछ जे


ओ अंचल विशेषक रीति-रेबाज, धर्म, संस्कृति, रुचि आ परंपरा, पावनि-तिट्टार लोकक उठब-
बैसब गप्प-सरक्काक वर्णन विस्तारसँ करए। आंचलिकताक सभगुणकें एकहि कथामे समाहित
कए सकय। किन्तु, धीरेन्द्रक कथाक शिल्पक अध्ययन ई अवश्य प्रमाणित करैछ जे ओकर
गरहनि आंचलिक छैक। ओहिसँ अंचल विशेषक गुणक महमही निःसृत होइत रहैत अछि।



डा0 धीरेन्द्रक कथाक प्रारम्भ कथ्यक परिणतिक अनुरूप वातावरण निर्माणक संग होइत
अछि। उदाहरणार्थ सिमरकफड़ (कुहेस आ किरण) शीर्षक कथा देखल जा सकैछ। 'पछबाक
तोर पर ढेरी ढाकी सिमरक तूर एम्हर ओम्हर छिरिया गेला टें-टें करैत सुग्गा क झुंड पुबरिया
आकाश मे उड़ैत-उड़ैत क्षितिज लग पसरल जमुनियाँ गाछी मे बिला गेल।' सुग्गा क झुंड
फलक प्रत्याशा मे सिमरक फड़ पर लोल मारैत अछि, किन्तु चोंच मे आबि जाइत छैक तूर।
कथाक चरण दास प्रथम पुत्र रामकिसुन कें शिक्षित करबाक व्रत लैत अछि। शिक्षित रामकिसुन
नौकरीक फिराक मे दरबज्जे-दरबज्जे बौआइत अछि। अन्त मे सुग्गा जकाँ ओहो उड़ि जाइत
अछि। चरणदास प्रथम पुत्रक असफलता आ जीविकाक तलासमे गाम छोड़बासँ अवश्य आहत
होइत अछि। तथापि दोसरो पुत्र पर पुत्रकें मंगल कामनासँ खर्च करब गछि लैत अछि।
धीरेन्द्रक प्रायः अधिकांश कथाक प्रारम्भ एही प्रकारें वातावरण निर्माणसँ भेल अछि। कथाक
प्रारम्भ अन्तसँ करबाक ई पहिल शिल्प थिक।



समाप्ति सँ कथाकें आरम्भ करबाक शिल्पक दोसर प्रविधिमे कथाक अन्तक सूक्ष्म आ
वाक्य विशेषक

यथावत अथवा एनमेन ओहने प्रस्तुति कएल जाइछ। एहिसँ प्रतीत होइछ जेना कथा गोलाकार
हो। ई शिल्प शुरुसँ अन्त करबाक अपेक्षा अथवा अन्तक स्थितिसँ कथा प्रारम्भ करबाक शिल्पक
अपेक्षा विशेष लूरिक प्रयोजन रखैत अछि। तें वेशी कठिन अछि। ई शैली कथाकारक रचना
प्रक्रिया कें सेहो स्पष्ट करैछ। धीरेन्द्रक कथा गुम्मा थापड़ कंठा, धर्मात्मा, आदि एही शिल्पक
कथा थिक। 'गुम्मा थापड़क प्रारंभ एहि प्रकारें होइछ-दीपेन कें लागि रहल छलनि मने
पश्चिमाकाश सूर्य हुनकर मुँह दूसि रहल होथि। साइकिलक पैडिल पर राखल पयर थरथरा
गेल आ ओ साइकिल परसँ उतरि गेलाह।' कथाक अन्त एहि प्रकारें होइछ-'भाउज मोख
लगधरि अरिआइत देलथिन। अपन सीमा धरि आ फेर आंगन चल गेलीह आ दीपेन बिदा होइत
होइत आकाश दिस देखलथिन तँ बुझना गेलनि माने पश्चिमाकाश सूर्य हुनकर मुँह दूसि रहल
होथि।'



धीरेन्द्रक कथाक आकार छोट होइत अछि। छोट आकारक कथामे कथ्यकें विश्लेषित
करबाक गुंजाइश नहि रहैत अछि। तखन कथाकार लेल आवश्यक भए जाइछ जे ओ संकेतसँ
काज चलाबए। सांकेतिकतासँ भाषा सूक्ष्म आ सर्जनात्मक सेहो होइत अछि। संकेत सूक्ष्म
होइतहु प्रभावे व्यापक आ धरगर होइछ। धीरेन्द्रक कथाक सांकेतिता मैथिली कथा साहित्यक
उपलब्धि मानल जा सकैछ। 'गुम्मा थापड़ एहि शिल्पक एक विशिष्ट कथा थिक।



गुम्मा थापड़ क सरल सौम्य ह्मदया भौजीक हास्य विनोद सूनि नवे नव बीडीओ बनल
दीपेन बूझि लैत अछि जे, भौजी पचकल गाल आ थकुचल मपत्वाकांक्षाक गोपी भाइसँ संतुष्ट


नहि छथि। भ्रमछनि जे नारी टाकावलाक छैक। दिओरक प्रति व्यक्त हास्य विनोदकें दीपेन
भौजीक आमंत्रण मानि, मने मन गूड़ चाउर फंकैत कहैत अछि-'चाह' अहाँतँ जे जे लाएब से
लाऊ। सबहक लेल तैयार छी।' पुनः सस्मित आनने भौजी दीपेन दिस तकैत छथि। भौजीक
हावभाव आ दृष्टि निक्षेप पर दीपेन मस्त भए गुनगुनाए लगैत अछि। किछु कालक वाद भौजी
चाह दैत छथिन आ पटिया पर समक्षहि बैसि एक वर्षक अध जागल नेनाक मुँहमे इतमिनानसँ,
आंगीक बटन खोलि, दूधक टुरनी मुँहमे लगबैत कहैत छथिन-'ई पांचो पोथी हुनके लिखल
छनि। पाँचम हमरे समर्पित कएने छथि। मुदा अहाँ आब विआह कए लिय। हाकिम होएब दोसर
गप्प भेल आ संसार डेबब दोसर। बूझलिएक छोटका बाबू। नीक लागत।' भौजीक ई गुम्मा
थापड़ छल। दीपेन कें चटाक दन लगलनि। बूझबामे भाङट नहि भेलनि। हबड़-हबड़ चाह घोंटि
चोटे विदा भए गेलाह। ओतेक साहस नहि रहलनि जे गोपी भाइक धूमि अएबाक प्रतीक्षा
करितथि। ई थिक कथाक सांकेतिकता। भौजी संकेत सँ सभकिछु कहि दैत छथि हँसी मजाक
क माध्यमे। दीपेनक हावभाव पर भौजी तमसा सकैत छलीह। फज्झति कए सकैत छलीह।
किन्तु से सब बिना कएने हास्य-विनोदमय वातावरणमे दीपेनकें अपन बहकबसँ परिचित
करादेल।



धीरेन्द्रक कतेको कथामे प्रतीकात्मक शिल्पक प्रयोग अछि। ओना संकेत आ प्रतीकमे
बड़बेशी अन्तर नहि अछि। अन्तर अछि, अर्थव्याप्तिक। अर्थ विस्तार आ अर्थ संकुचनक कथामे
प्रतीकक प्रयोग अनुभूतिकें अर्थ ओ सम्प्रेषण बनेबा लेल कएल जाइछ। नव नव प्रतीक अन्वेषण
आ तकर माध्यमसँ कथ्यक सम्प्रेषण रचनाकारक सर्जनात्मकताक द्योतक थिक। एकरा नव
माध्यमक अन्वेषण सेहो कहि सकैत छी। धीरेन्द्रक प्रतीकात्मक शिल्पक कथामे प्रमुख अछि
बादुर, गीध, 'कठखोधी, भादा कांकोड़, फतिंगा आदि। हिनक प्रतीक परिचित होइत अछि तथा
ओकर माध्यमसँ कोनो मनोवैज्ञानिक सत्यक नहि, सामाजिक यथार्थक उद्घाटन कएल जाइछ।
बादुर समाजक ओहि वर्गक प्रतीक थिक जकर कोनो सिद्धान्त नहि छैक। जे सदिखान
अवसरक ताकमे रहैछ। जाबतधरि गोल बनल रहैत अछि सुतरैत छैक आ भेद-भाव एवं आपसी
झंझट समाप्त होइतहि ओ देखार भए जाइत अछि। गीध समाजक महाजन थिक। जे मुइले
नहि जीवितो लोकक रक्त मज्जा चूसबा लेल ताकमे रहैत अछि। कठखोधी साधन आ
आश्रयहीन व्यक्तिक प्रतीक थिक जे आहारक खोजमे जीवन भरि खट-खट करैत रहि जाइछ
अछि। कतहु किछु भेटैत छैक, कतहु परिश्रम व्यर्थ होइत छैक आ

कतहु बैसितहि केओ ढेपा मारि भगादैत छैक। फतिंगा समाजक ओहि वर्गक प्रतीत थिक जे
गामक किछु वर्गक अत्याचार सँ आजिज भए दूर देश पड़ा जाइत अछि। बोनि बूतात लेल
राति-दिन खटैत अछि, तथापि महाजनक जाल-फरेब सँ उवरि नहि पबैत अछि। आ अन्तमे
फतिंगे जकाँ झरकि प्राणान्त भए जाइत छैक। मादा काँकोड़ मातृत्वक प्रतीक थिक।
आसन्नप्रसवा वुधनीकें दरवरिया छोड़ि उड़नमा पंछी भए जाइत छैक। किन्तु ओ अपन सन्तानक
भरण-पोषणक हेतु देहतोड़ि खटैत अछि, आ ई असत्य घोषित करए चाहैत अछि जे कंकोड़बा
वियान कंकोड़बे खाए।' एहि प्रकारें डा0 धीरेन्द्र मादा कांकोड़क नवअर्थमे प्रयोग सेहो कएल
अछि। ओकर अर्थ विस्तार भेलैक अछि। प्रतीक क एहि नव प्रयोगमे मातृत्व अछि, संघर्षशीलता
अछि आ अछि जीवनक प्रति अटूट आस्था।




पत्रात्मक शैलीक किछु कथा सेहो अछि। ओहिमे प्रमुख अचि विधवा आ इजोतक
प्रतीक्षा। हिनक प्रायः अधिकांश कथामे एहन स्थिति अबितेटा अछि ने जखन कथाक कोनो
कोनो पात्रक आँखि डबडबा नहि जाइत हो। यद्यपि एकर संबंध शिल्पसँ वेशी व्यक्त भावना सँ
छैक किन्तु जँ कि आँखिक डबडबाए धीरेन्द्रक कथाक कौमन फैकटर थिक, तें एहि स्थितिकें
एकटा शिल्पक रूपमे किछु काल लेल मानि सकैत छी। उपर वर्णित शिल्पक अतिरिक्तो
प्रकारक शिल्पक प्रयोग धीरेन्द्र कथामे भेटैत अछि जे कथाकारक शिल्प निर्माणक निपुणता कें
द्योतित करैत अछि।



जून 1988

.. .. .. ..



प्रभासक कथा यात्रा



सभसँ पहिने आवश्यक प्रतीत भए रहल अछि कथाकार प्रभास कुमार चौधरी (ज0
1941)क पृष्ठभूमिक मूल्यांकन। मैथिली कथाक पृष्ठभूमिक अन्वेषण कएलासँ ओकर
प्राचीनरूपक विश्लेषण, प्रभावक तत्व आ दिशाकें निर्धारित करैत काल तीन विभिन्न कोण आ
साहित्यसँ प्रभावित अनुप्राणित भेल पबैत छी। ओ तीन विभिन्न साहित्य थिक-संस्कृत, अंग्रेजी आ
बंगला।



मैथिलीक प्रारम्भिक कथापर संस्कृत साहित्य कथाक पूर्ण प्रभाव अछि। आरो स्पष्ट
होएबा लेल कहल जा सकैछ जे संस्कृत साहित्यक विभिन्न आख्यायिका, उपाख्यान आदिक
मैथिली अनुवाद मैथिली कथाक प्रथम चरणक कथाक रूपमे मान्य अछि। मुदा, एखनो ई
प्रेरणा-रुाोत सुखायल नहि अछि। ई प्रक्रिया दू रूपमे भेटैछ-प्रथम रूप मे संस्कृत कथाक एनमेन
अनुवाद तँ दोसर रूपमे संस्कृत साहित्यक विभिन्न पात्रक वत्र्तमान युगक अनुरूप चित्रांकन। तें
एक दिस जँ ओहिमे धार्मिक आ पौराणिक कथाक आस्वादक कें विशेष आस्था आ रूचि रहैछ,
तँ दोसर रूपमे युगक अनुरूप चित्रांकन, अर्थक सम्प्रेषण सँ युगक स्पन्दन सेहो व्यंजित भेल
भेटैछ।



संस्कृतक गह्वर मिथिलामे अंग्रेजी शिक्षाक प्रचार-प्रसार अन्य प्रान्तक अपेक्षापूर्ण विलम्ब
सँ भेल। परंच, एक बेर प्रचार-प्रसार भए गेलापर ओकर व्यवहारिक, साहित्यिक मपत्त्व एवं
अनिवार्यता कें नहि मानब असंभव छलैक। कारण स्पष्ट छलैक। भारतीय शासन व्यवस्था मे
अंग्रेजीक प्रमुखता, अंग्रेजक हाथमे देशक शासनभार। जाहि मिथिला मे सात समुद्रक पारक
भाषा कें घृणा सँ देखल जाइत छल, चिनवार धरि से पहँचि गेल। 'गल्पांजलि'क भूमिका
स्पष्टतः एहि तथ्यक उद्घाटन करैछ-'किन्तु, समयक प्रभावें हमसभ क्रमिक

विदेशी वस्तु सभक वहिष्कार छोड़ि रहल छी। आइ-काल्हि एहन केओ नहि होएताह जे आलू
नहि खाइत होथि, किन्तु बहुत कम गोटेकें ई बुझल छनि जे आलू विदेशी वस्तु थिक। ई तँ
कथ्यक प्रसंग भेल। शिल्पक प्रसंगमे स्पष्ट अछि-'विदेशी वस्तु आ विचारक वहिष्कार क कारणें
मिथिला मे गल्प रूपी विदेशी वस्तुक पहिने व्यवहार नहि छल। प्रारम्भमे, एहि शताब्दीक दसम


बीसम वर्ष धरि उपाख्यान-अख्यानक वादे स्वतंत्र रूपें कथा लिखबाक परिपाटी आरम्भ होइछ।
एहि साक्ष्यक आधार पर ई स्पष्ट भए जाइछ जे मैथिली मे कथा (आधुनिक अर्थ मे) लिखबाक
परिपाटी अंग्रेजी साहित्यक अध्ययन अनुशीलनक उपरान्त भेल। एहि संदर्भ मे उमानाथ झाक
योगदान स्मरणीय अछि। अपन रेखाचित्रक 'ओहे माहे' मे विदेशी शिल्पक अंगीकार कें मुक्त
कण्ठें स्वीकार कएलनि अछि-'बुच्चीदाइ लोकनिक समक्ष उपस्थित भेल छी, परन्तु हुनका
अनरसाक हिस्सख, माल-पूआ रुचिकर, ऐहबक, फड़ ओ बगेया सँ परिचय। विस्फुट
सएण्डविच, केक, नीक, लगतनि। के कहय? मयदा, आँटा, घी, चीनी, ई सभ वस्तु आना हमर
केक आ विस्फुटक नहि। अर्थात् कथाकार उमानाथ झा (ज0 1 जून 1923) पाश्चात्य विधिक
अनुसरण कए मानवीय संवेदनाकें शब्द देबाक प्रयास कयलनि। अनरसा आ ऐहबक फड़ तथा
विस्फुट आ सएण्डविचमे रचनात्मक भिन्नता छैक संघटनात्मक नहि। अर्थात् दूनूक आधार एक्के
छैक। दूनू वस्तु एक्के वस्तुसँ निर्मित अछि। परंच, बनएबाक विधि मे अन्तर। ओहिना, केवल
स्थान आ भाषाक भिन्नता सँ जीवन कें देखबाक, ओकर आलोचना करबाक मानवीय संवेदनाक
प्रति अथवा मानवीय प्रवृतिक प्रति दृष्टिकोण मे विशेष अन्तरक संभावना नहि छैक। पेटक भूख
हो अथवा जैविक विवशता-मिथिलामे स्थानक भिन्नताक कारणें विशेष अन्तर नहि पड़ि सकैछ।
ओकरा पूरा करबाक प्रक्रिया ओतेक महत्त्वपूर्ण नहि, जतेक भूखक सर्वजनीनता। एहि प्रकार सँ
अंग्रेजी साहित्य मैथिली कथाकें तीन प्रकारें अनुप्राणित कएलक अछि। प्रथमतः कथ्यक चयन
अर्थात् कथाक माध्यम सँ जीवनक अभिव्यक्ति, मनःस्थितिक विश्लेषण, सामाजिक आ
राजनीतिक जीवन मे भ्रष्टाचार, बइमानी तथा स्वार्थक रणनीति क विरोध मे बाजि सकबाक
साहस। एहि प्रसंग डॉ0 शैलेन्द्र मोहन झा (2-6-64) स्पष्टतः स्वीकार कएने छथि-'मिथिला मे
अंग्रेजी शिक्षाक प्रचार भेने कुहेस फाटि गेल तथा मैथिलीक प्रांगण मे नव आलोक पसरए
लागल।' एहि आलोकक प्रभावें कथाकार अपन अभिप्रेतकें नीक ढंगसँ कहि सकबाक 'टेकनिक'
सेहो प्राप्त कएलनि।



ई निर्विवाद अछि जे मैथिली किंवा अन्य भारतीय भाषाक साहित्यकार अंग्रेजी भाषा-
साहित्य सँ प्रेरित-अनुप्राणित भेल छथि। पाश्चात्य दार्शनिक साहित्यकार माकर्स, एंजिल्स,
फ्रायड, युंग, नित्शे, काफका, कामू अथवा इलियटक जीवन-दर्शन अथवा सम्प्रेषण-प्रणाली सँ
प्रभावित भए लिखबा मे अथवा हिनका लोकनिक नामो लए लेबामे किछू गोटे अपना कें
गौरवान्वित बूझैत छथि। भलें, हुनका लोकनिक परिवेश आ मिथिलाक मे साम्य नहि रहय।



आधुनिक वैज्ञानिक युगमे रेडियो, टेलिविजन तथा पत्र-पत्रिकाक माध्यमसँ वि•ाक एक
कोण सँ दोसर कोण धरि कोनो घटनाक खबरि तुरन्त पहुँछि जाइछ। एक देशक घटनासँ
दोसरो देश दलमला उठैछ। वियतनामक युद्ध हो अथवा पश्चिम एशियाक युद्ध, दक्षिण
आफ्रिकाक रंग-भेद नीति हो अथवा बंगलादेशक नरमेध, वि•ाक प्रत्येक सचेत मानस झनझना
उठैछ। अमानवीय आचरण एवं अत्याचार देखि, आत्मा हाहाकार कए उठैछ। परंच, पोखरिमे
फेकल गेल ढ़ेपसँ उत्पन्न हिलकोर जकाँ एहि घटनाक प्रभाव क्रमशः क्षीण होइत विलीन भए
जाइछ। तें क्रमशः क्षीण होइत घटनाक प्रभावकें पूर्णरूप मे अनुभव करब कलाकारक
संवेदनशीलता पर निर्भर करैछ। अर्थात् दोसराक स्थिति कें अपने भोगल जकाँ अनुभव कए
अनुभूति पाबि, सम्प्रेषित करबाक प्रक्रिया पर निर्भर करैछ, जे एक सचेत जागरूक आ


संवेदनशील सिद्धहस्त कलाकार लेल संभव अछि।



संस्कृत आ अंग्रेजी साहित्यक अतिरिक्त बंगला साहित्य सेहो मैथिली कथाकार कें
प्रभावित कएलक

अछि। पूर्वमे जाहि बलपर मिथिलाक साहित्य बंगला मे ग्राह्र होइत छल, ओ रुाोत सुखा गेल
अथवा ओहिमे आब ओहन किछु अंश नहि रहल, जे ओहिठाम ग्राह्र भए सकय। एकर विपरीत,
बंगाल मे अंग्रेजी शिक्षाक प्रचार-प्रसार, मुद्रण आदिक सुविधा तथा अनेको औद्योगिक प्रतिष्ठानक
स्थापना मैथिलकें विशेष आकर्षित कएलक। बंगला साहित्यक व्यापक प्रभावशीलताक समक्ष
मैथिल अपनाकें अप्रभावित नहि राखि सकलाह। एहि मे सभसँ विशेष प्रभाव शरद'क कारुण्य-
धाराक अछि। अन्तःसाक्ष्यक लेल मनमोहन झाक (ज. 1920 कथा संग्रह 'अश्रुकण' पर्याप्त
अछि। एकर अतिरिक्त सुधांशु 'शेखर' चौधरीक (1922-1990 कथा 'भारती' (गल्पांजलि') सेहो
देखल जा सकैछ (राजकमल चौधरी (1929-67) अपना कें अप्रभावित नहि राखि सकलाह।
शेखर जीक 'भारती' आ राजकमल चौधरीक 'ललका पाग' मे तत्त्वतः कोनो अन्तर नहि अछि,
जे मैथिली कथाक दू पीढ़ी कें प्रभावित कयनिहार शरदक साहित्यक परिणाम थिक। ओना,
'शेखर'जी कतेको बेर अपन प्रारम्भिक साहित्य पर बंगला साहित्यक, मुख्यतः शरदक
कारुण्यक धार प्रभाव मुक्तकण्ठे गछलनि अछि।



तात्पर्य, जे मैथिली कथा साहित्यकें समृद्ध होएबाक लेल तीन दिशासँ न्यूनाधिक्य रूपमे
प्रेरणा, प्रभाव आ दृष्टि-भेटल अछि। मुदा, पचास धरि अबैत प्रो0 उमनाथ झा अपन कथामे
जाहि परिवेशक निर्माण कएने छलाह से मिथिलांचलक सुदूर गामो मे व्याप्त भए गेल। अर्थात्
अंग्रेजी शिक्षाक प्रसार-विस्तार, ओकर आहार-व्यवहार, शहरक सीमाकें लाँघि गामो पहुँचि गेल
आ आइ स्थिति ई अछि जे जँ कोनो कथाकार महींसवारक कनहामे ट्रांजिस्टर लटकल अथवा
हरबाहकें चाह पीबि लागनि पकड़ैत देखैत छथि तँ ओकरा अभारतीय अथवा अमैथिल परिवेशक
कोना मानल जाएत? अर्थात् सभ विजातीय अथवा विदेशी प्रवृत्ति कें आत्मसात कए जेना
व्यवहारिक जीवनमे आलू आ तमाकू विदेशीमूलक होइतो विदेशी नहि लगैछ, एक स्वतंत्र
उद्भावनाक रूपमे मैथिली कथा अबैत अछि।



कथामे जाहि आधुनिकताक अस्पष्ट ज्योति प्रो0 उमानाथ झाक 'रेखा-चित्र' मे भेटैछ
अथवा जाहि यथार्थक बोध शोखरजीक 'एक सिंघारा एक चाय' मे अथवा कुलानन्द 'नन्दन'क
(मृ.जून 80) धारि आना कैंचा मे होइछ, आगू बढ़ि ललित, राजकमल, सोमदेव, (ज0 5 मार्च
1934) धीरेन्द्र मायानन्द, इन्द्रानन्द, हँसराज (ज0 22-10-1932) आदिक कथामे आबि पूर्णतः
प्रस्फुटित भए जाइछ। पूर्ववत्र्ती कथाकार मे जाहि वस्तुकें व्यक्त करबाक साहस नहि छलनि,
समाजमे व्याप्त व्यर्थक आभिजात्य बोध अथवा परम्परावादक जड़ताक विरोधमे किछुओ लिखि
सकबाक साहसि नहीं छलनि, नैतिक-अनैतिक पाप-पुण्य, आचार-अनाचारक मान्यता आ
दृष्टिकोणमे जनिक कथा फँसि अभिव्यक्ति पएबा लेल छटपटाइत रहैत छल, से बिना कोनो
रोक-टोकक अभिव्यक्त होअए लागल। सभसँ बेसी प्रगति तँ कथ्य-चयनक स्वतंत्रता मे भेटैछ।
जकर पृष्ठभूमि मे राष्ट्रीय स्वतंत्रता सँ प्राप्त अभिव्यक्तिक स्वतंत्रता अछि। परंच, स्वतंत्रता पूर्वक


जे आशा छलैक, पूर्णतः स्वाधीन आत्मनिर्भर भारतक कल्पना छलैक, क्रमशः विलीन होमए
लागल। ठाम-ठाम बेइमानी, धुरफंदी, स्वार्थ आ जातिवादक नग्न नाच, नेतृत्व वर्ग द्वारा
धनीकक रक्षा आ गरीबक दुर्दशा अनुपयोगी शिक्षा व्यवस्था सँ बैसारी मे वृद्धि, जमीन्दारी
व्यवस्थाक अन्त सँ एक प्रकारक आर्थिक रिक्तता, अफसरशाही मे बृद्धी, राष्ट्रीय नेता आदिक
नामपर धन-जन एकत्रित कए स्वार्थ सिद्धक प्रपंच, आदिसँ भारतीय परिवेश पूर्णतः आक्रान्त भए
गेल एहि प्रकारक घिनौन परिवेशक परिणामे गठित मानसिक स्थितिक कथाकार मे, वत्र्तमान
व्यवस्थाक विरोध में तीव्र स्वर तथा अजीवन आ अमृत्युक बीच मे काहि कटैत सर्वसाधारणक
प्रति विशेष उम्मुक्तता आबि गेल।



एही आधुनिक भाव-बोधक पृष्ठभूमि मे प्रभास कुमार चौधरी अपन प्रथम कथा धरती
कुहरि उठल (वैदेही-56) संग उपस्थिति होइत छथि। हिनकार दोसर कथा प्रतीक्षा (वैदेही-57)
मे प्रकाशित भेल। वैदेहीक 'बालमण्डली'मे स्थान पाबि वाल कथाकार किछु वर्ष चुप्प भेल
लगैछ। मुदा, मौन रहब संभव नहि छल। अपन चारूकातक परिस्थिति सँ नीक जकाँ परिचित
भए पुनः पाँच वर्षक बाद मार्च 1961 सँ अपन तेसर कथाक

संग 'मिथिला-मिहिर' मे उपस्थित होइत छथि। हिनक कथा-लेखनक दोसर चरण अक्टूबर
1965 धरि चलल। एहि अवधिमे धुरझार लिखबाक अतिरिक्त प्रथम कथा संग्रह 'नवघर उठय-
पुरान घर खसय' (1964) सेहो प्रकाशित भेल। कथा लेखनक तेसर चरण जुलाई (1966) सँ
चलल जे चलि रहल अछि।



जखन प्रभासकें कथा लिखबा दिस उत्प्रेरित कएनिहार व्यक्तिक तलाश करैत छी तँ
परिवारक साहित्यिक वातावरणक अतिरिक्त कथाक माध्यमसँ बिना कोनो लाइ-लेपटाइक
जीवनक सूक्ष्म सँ सूक्ष्म स्थितिक, आ व्यक्तिक आन्तरिक संघर्षक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण
उपस्थिति कएनिहार कथाकार ललितक नाम पबैत छी। दूनूक कथा पढ़ला पर स्पष्ट भए
जाइछ, जे दूनूक दृष्टिकोण आ अभिव्यंजना कौशल मे कतेक साम्य अछि। वहिर्साक्ष्य तँ ई अछि
जे प्रभास विद्यालयक शिक्षा ललितो सँ प्राप्त कएने हछथि, ओ प्रभासक सुप्त कथाकारकें
प्रेरित-उतप्रेरित कएने छथि तँ एहिमे असंगत की?



प्रभासक कथाक प्रेरणा रुाोत क कथाकारक संवेदनाशीलताक प्रश्न सहजे उठि जाइछ।
कथाकार की देखल, की भोगल आ अनुभव कें कोना संप्रेषित कएल तकर प्रश्न अछि। एकर
चारि स्थिति संभव अछि- (1) कलाकार अपन अनुभूति कें कला द्वारा अभिव्यक्त करैछ, (2)
कलाकारक संवेदना कलाक रूप धारण कए पाठक धरि जाइछ। (3) कलाकार कोनो युग-
विशेषक प्रतिनिधि होइछ अथवा युग-विशेष कें अभिव्यक्ति दैछ। (4) साहित्य समाजक दर्पण
होइछ। प्रत्येक साहित्यिक कृति तात्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक चेतनाकें मुखरित करैछ।
पहिल आ दोसर कारण सँ कलाकार विशेषकर्मक सूचना भेटैछ तँ तेसर आ चारिम सँ युगीन-
चेतनाक। अर्थात् युग-चेतनाक 'पोकस' ओतेक तीव्र होइछ जे कथाकारक अन्तस पर पड़ि,
अभिव्यक्ति पएबा लेल विवश कए दैछ। एहि दृष्टिसँ प्रेरणा रुाोतक दू अंग भेल। पहिल मे
कथाकारक व्यक्तित्व प्रधान अछि तँ दोसर स्थान पर युग-चेतना प्रधान। प्रभासक कथामे दूनू
प्रकारक प्रेरणा-रुाोत वत्र्तमान अछि। हिनक कथाक प्रेरणा-रुाोतक प्रसंग डॉ0 जयधारी सिंह (ज0


16-1-1929) लिखैत छथि 'प्रभास कुमार चौधरीक कथा-भूमि बड़ उर्वर, व्यापक आ वर्धिष्णु
छनि। इएह कारण अछि जे हिनक ध्यान गामक संग जहिना, तहिना नगरक संग, युवकक वा
प्रतिष्ठित व्यक्तिक सम्पर्क दिस जा सकल। बाबी, अरगनी, पिनकी, पिता आदि कथाकारक
व्यक्तित्वक गम्भीरताक द्योतक थिक तँ 'सुरक्षित' आ ढेप युग चेतनाक।



जैविक विवशता सँ बर्भर भोगवाद धरि



काम भावना आदिम प्रवृत्तिक रूपमे मान्य अछि, स्त्री आ पुरुष मे समान रूपें वत्र्तमान
अछि। मुदा, एहि प्रवृत्ति पर परिवेशक अंकुश सेहो रहलैक अछि आ धर्म-अधर्म, पाप-पुण्य,
आचार-अनाचारक कठघरा मे बन्द राखि चित्रित होइत आएल अछि। आधुनिक युगमे
उद्योगीकरण, वैज्ञानिक रुचि, विकासक कारणें अन्धवि•ाासक अन्तसँ, सामाजिक प्रतिबंध मे
ह्यात, काम भावनाकें एक सहज विवशताक जैविक आवश्यकताक रूपमे पेटक भूख जकाँ,
पानिक पियास जकाँ मान्यता प्रदान कएलक अछि। जे स्वतंत्र, अकुंठित व्यक्तित्वक विकास लेल
आवश्यक अछि। खास कए फ्रायडक मान्यता सेक्स मानवक प्रत्येक क्रिया-उपक्रिया कें प्रेरित-
प्रभावित करैछ, विशेष प्रभावित भेल प्रतीत होइछ। प्रभासक कथा मे काम भावना कोन रूपक
अछि, ओकर उपयुक्तता की छैक, परिस्थितिक तगेदा की छैक, तकर सम्यक विश्लेषण लेल
आवश्यक अछि-कोटि-विभाजन पुरुषमे काम भावना आ स्त्री मे काम-भावना।



पुरुष मे काम भावनाः : सामन्तवादी साहित्य आ समजामे पुरुष अपन काम कें तृप्ति
देबा लेल स्वतंत्र छल। ओकरा पर शतशः नायिका लटुआएल रहैत छलैक। धीरोदात्तकें स्थायी
रखबाक लेल, काम-ज्वर पीड़ित चित्रित करब शास्त्रीय मानय्ताक विरुद्ध छल। परंच, आब
एहन कोनो प्रतिबंध नहि छैक। परिस्थितिक

अनुरूप चित्रित करब आधुनिक कथाकारक मुख्य लक्ष्य अछि। प्रभासक दोसर चरणक कतेको
कथा-नायक कामज्वर पीड़ित अछि। ओकरा लेखे 'सेक्स' आरोपित छैक, स्वाभाविक भूख नहि
छिकैक। कोनो-ने-कोनो प्रकारक उत्तरदायित्व, विवशता, सामाजिकता अथवा पाप-पुण्यक मतें,
ओकर व्यक्तित्व कें उन्मुक्त नहि होमए दैछ आ ओ यौन-कुण्ठा सँ पीड़ित प्रभावहीन कथा-नायक
प्रमाणित भए जाइछ। टूटल कलम आ लेभरल आखर (अभियान)क 'हम' ममताक समर्पण सँ
घरबा उठैछ। ममताक आक्रोश 'एतेक राति कें अकसरि हम कोन वि•ाासपर अहाँक कोठली मे
आयलि छी, से अहाँके नहि सुझैत अछि? आन्हर छी?, -सुनि कथानायक लोहछि उठैछ। जा
जखन ओ अपना कें एहि स्थिति लेल सदाक हेतु तैयार करैछ तँ राष्ट्र-प्रेम ओकर स्वाभाविक
भूख कें मारि दैछ। 'गिरगिट (मिहिर 19-4-64)क उद्धेगहीन, तनावहीन, आदर्शवादी कथा-
नायक पौरुषहीनताक कारणें मित्रक काकीक कोपभाजन बनैछ। मित्रक बदिनक गर्म साँस आ
गर्म हाथक स्पर्शे सँ किंकत्र्तव्यविमूढ़ भए जाइछ। शीतयुद्ध (मिहिर 18-10-68)क कथानायक
चरित्र अत्यन्त हास्यास्पद अछि। निशाभाग राति मे आतुर पत्नीकें अपना लग आएलि देखि
भयभीत होइत पुछैछ "अहाँ? कोना अएलहुँ? माय जागलि तँ नहि छलि?" लगैछ जेना कोनो
बड़का समस्या आबि गेल हो। आतुर पत्नीसँ भयभीत, संत्रस्त कथानायकक स्थइति पर दया
होइछ। कथा नायकक मनःस्थिति व्यर्थक मर्यादा मे पड़ि कुंठित भेल लगैछ। प्रकाश (व्यतीत-


मिहिर 14-7-63) जातीय बंधन सँ मुक्त नहि अछि। ओकरा तोड़बाक साहस नहि छैक। एकर
बदला मे अपन प्रेम कें तोड़ि लैछ आ पाप-बोध सँ ग्रस्त भए, कुंठित रहैछ। मुदा, प्रभासक
तृतीय चरणक कथा नायक एक कमजोर, आत्मबल-पौरुषहीन नहि अछि। ओकरा मे कामक
प्रति दृष्टि मे स्पष्ट परिवत्र्तन अएलैक अछि। जे कथाकारक परिवर्त्तित दृष्टिकोणक परिचायक
थिक। एहि चरणक कथानायक लेल 'सेक्स' नैतिक अनैतिक, पाप-पुण्य आचार-अनाचारक
समस्या उत्पन्न नहि करैछ आ ने एहि स्थिति मे कोनो प्रकारक बाह्र आरोपित प्रतिबंध
स्वीकारैछ। केवल प्रश्न रहैछ, जैविक-विवशताक, त्वचा-संवेदनक। मित्रक बद्दीनक गर्म हाथक
स्पर्श सँ डेरायल प्रभासक कथानायक सुख (मिहिर 13-3-70) मे आबि मित्रक अनुपस्थिति मे
मित्र-पत्नीक शारीरिक आवश्यकताक पूर्त्ति करबाक लेल प्रतिबद्ध भए जाइछ। -'अहाँ नीक,
सभसँ नीक'क सर्टिफिकेट पाबि, अपन पौरुष पर गर्व अनुभव करैछ। समीकरण (मिहिर 28-3-
81) मे समस्त नारीक समीकरण भए जाइछ। अमिता आ दीवा मे कोनो अन्तर नहि अनुभव
करैछ आ एहि दर्शनपर कथाकार आगू बढ़ैछ। परंच उत्तरकाण्ड (मिहिर 21-4-65) मे पुनः
पाप-बोध सँ ग्रस्त भए जाइछ। यथार्थ कें सहबाक साहस नहि रहैछ। मात्र एहि डर सँ कि
लाल काका बूझि जएताह, राम गाम छोड़ि बागि जाइछ। सीता मे पतिसँ साफ-साफ कहि
देबाक साहस छैक, जकर ओ जीवन भरि फलो भोगैछ। परंच, राम डरे कलकत्तावासी भए
जाइछ। कलकत्ता मे यौन कुंठा मुक्त भए जाइछ। ओहिठाम लाल काका नहि छथिह। गामक
समाज नहि छनि। एक व्यक्ति एक बोध, आ एक प्रवृति केवल स्थानक भिन्नता कथानायकक
चरित्रकें विवादास्पद बना दैछ आ लगैछ जे जाहिठाम सँ प्रभासक कथानायक चलल छल, पुनः
ओहि पाप बोध लग धूरि आएल हो।



नारीमे काम भावना--प्रभासक कथा नायिकाक यौन-भावनाक विश्लेषणक लेल यौन-
व्यापार दिस प्रेरित होएबाक कारणक वा कथाकारक दृष्टिकोण मे विकासक रेखा कें अंकित
करबा लेल आवश्यकता अछि कोटि विभाजन। प्रभासक कथा मे दू प्रकारक नारी वर्ग अछि,
अशिक्षिता आ शिक्षिता। अशिक्षिता मे गाम घरक स्त्रीगण छथि तँ शिक्षिता मे शहरक पढ़लि-
लिखलि आधुनिका। प्रत्येक वर्ग मे यौन-व्यापारक दू कारण संभव अछि। दू प्रकारक प्रेरक तत्त्व
कार्यशील रहैछ। प्रथम स्थान मे नारी पेटक भूखकें शान्त करबा लेल यौनक व्यापार करैछ।
अर्थात् विपन्नता नारीकें देह बेचबा लेल विवश कए दैछ। दोसर स्थान पर अबैछ जैविक
विवशता। अर्थात् नारी यौन-व्यापरअथवा त्वचा-संवेदन कें पानिक पियास आ पेटक भूखक
समान आवश्यक मानैछ। ओ रुचि परिवत्र्तनक लेल निरपेक्ष भए जाइछ। एहि चेतना सँ सम्पन्न
आधुनिकाक समक्ष अर्थ उपार्जनक स्थान पर शारीरिक तृप्तिक महत्ता रहैछ। सभ प्रकारक
प्रतिबंध सँ मुक्त भए, सभ प्रकारक प्राचीन रूढ़िवादिता कें तोड़ि, जैविक विवशताक तृप्ति ओ
चाहैछ।



जखन नारी पेटक ज्वालाकें, अपन आर्थिक आवश्यकता कें पूरा करबा लेल यौन-व्यापार
करैछ तँ पाप-बोध सँ ग्रस्त रहैछ। ओकरा मे सामाजिक प्रतिबन्ध कें तोड़बाक साहस नहि रहैछ
आ ने कटु सत्य कें सुनबाक धैर्य। तें ओ अपना कें जीवित रखबा लेल पेटक स्थायी व्यवस्था
लेल गाम छोड़ि, अपरिचित शहर दिस भागि जाइछ। सुभद्राहरण (मिहिर 5-5-63) तथा
झकझक इजोत (मिहिर 15-9-63)क सुभदरा आ सकली एही प्रकारक प्रभासक नारी पात्र


छनि। एहि दूनू कथाकें पढ़लापर अनायास राजकमल चौधरीक कथा 'दमयंती हरण' (वैदेही
7-7-56) स्मरण आबि जाइछ। बाढ़िक विभीषिका सँ उत्पन्न दारुण स्थिति मे गुलबिया
मालिकक ओहिठाम जयबा लेल विवश भए जाइछ (आगू मे ठाढ़ एकटा पछिला लोक'-मिहिर-
15.9.75)। निर्धताक कारणें लांछित प्रताड़ित बाप, समाजक तथाकथित संभ्रांत व्यक्ति, अपन
वासनाक पूर्तिक हेतु यौन-व्यापार दिस बलात् उन्मुक्त कए दैछ तथा समाज रुचि लैत टुक्रु-टुक्रु
देखैत रहैछ। सुनयना निरीह भए स्वीकारि लैछ। परंच समाजक सम्मुख ओकर विकृति आ
प्रपंचकें खोलि राखि देबाक साहसक संग समाजक अस्तित्व पर प्रश्न करैत आक्रोश करैछ-'कने
जल्दी जाउ। बेटी-पुतोहु अहूँ सभक घर मे अछि। काल्हि ई तमाशा अहूँक आङन मे भए सकैत
अछि (ककरो आङन मे) प्रभासक कथा यात्राक महत्त्वपूर्ण दर्शन कें जगजियार करैत अछि।



सुगिआ मे पेटक भूखकें शान्त करबाक बेगरता नहि छैक। मुदा, मालिकक जिरतिया
जखन अपन अनेक संगीक संग ओकरा बेहोश कए दैछ तँ पतिक मनौतीक बादो संबंध करबामे
नहि बिलमैछ (संबंध-नव घर उठय पुरान घर खसय)। दाम्पत्य जीवन मे फाटल दरारि, (यात्रा-
हेरायल बाट पर-मिहिर 20-7-69) शारीरिक अवश्यकताकें नहि मारि सकैछ। मुदा बेटी-जमाय
द्वारा पकड़ल गोलापर गाम सँ भागि पतिक स्मरण करैत गाड़ी मे कटि आत्म हत्या कए लैछ।
यद्यपि सुगिया आ हीरा मे यौन-भावना निरपेक्ष छैक, ओ यथार्थकें सहबामे असमर्थ अछि तथा
पाप-पुण्यक मान्यता सँ ग्रस्त अछि। हीरा द्वारा आत्महत्या सँ कोनो प्रकारक ओकर व्यक्तित्वक
निर्माण मे विलक्षणता नहि अबैछ, अपितु खण्डित भए जाइछ। सुगिआ जतए परिवेश बदलि
जीवए चाहैछ, हीरा जीवनक अन्त श्रेयष्कर मानैछ। परंच, गुलबिया मे यथार्थकें सहन करबाक
साहस छैक। ओ परिणाम कें भोगवालेल तत्पर रहैछ। संगहि मुक्त भए पतिक कमजोरी पर
प्रहार करबाक साहस छैक। दागलि देहक लहरि कें बिसरि, तमकि, ठाढ़ि भए जाइछ-'ई छोड़ि
दौ काका ! आइ एकरा फैसला करए दौ बड़ पुरुख बनैलए आइ। दस दिन सँ दूनू परानी
भूखल हली ओइमे मरदानगी नहि रहलै। आइ फुफकार मारे है। बड़ पुरुख रहलैतऽ अनलकै
किएक ने कमा.......।" एहि प्रकारसँ सुगिआ, हीरा आ गुलबियाक चरित्रक गुणात्मक भेद
कथाकारक दृष्टिकोणक विकासक परिचायक प्रतीत होइछ। किसानक पत्नी (सहमल-विद्रोह-
सोनामाटि-जनवरी'70) अपन पतिक कमजोरी सँ परिचित अछि। खखना अपन पत्नीकें सुरक्षित
रखबा लेल की नहि करैछ? की नहि सकैछ, परंच, आमक गाथीक रखवारी करैत पतिक
दिनचर्यासँ उबिआयलि पत्नी फटक खोलि कए लिकलिए जाइछ (टुस्सा आ बाँझी-मिहिर-10-9-
72)।



सुख (मिहिर 13-9-70) मे पत्नी पतिक अनुपस्थिति अथवा शारीरिक असमर्थताक
स्थितिमे अपन शारिरिक आवश्यकताक पूर्त्तिक व्यवस्था करबा मे पाँछा नहि हटैछ। कथाकारक
यौन-दर्शन 'समीकरण' (मिहिर 29-3-71) मे आरो विकसित होइछ। जैविक विवशताक तृप्ति
लेल विवाह अनिवार्य नहि मानैछ। अमिता आ दीपा मे कोनो अन्तर नहि रहैछ। दूनू अविवाहित
रहि त्वचा संवेदना चाहैछ। दीर्घकालिक शारिरिक सम्पर्क कें स्थायी बन्धन मे बन्हबाक इच्छा सँ
आएल वैवाहिक प्रस्ताव कें पूर्णतः अमिता अस्वीकार कए दैछ। जेठ बहीनक बाद दीप सेहो
निवेदन करैछ-'खाली हमरा अयबासँ मना नहि करब।'




प्रभासक कथामे यौन-दर्शनक अध्ययन विश्लेषणक उपरान्त स्पष्टतः कहल जा सकैछ
जे हिनक

द्वितीय चरणक कथा मे सेक्स असामाजिक आ अनैतिक अछि। तें एकरा बेसी सँ बेसी दबा कए
राखब उचित। परंच, तृतीय चरणक कथामे कथाकारक मान्यता मे परिवत्र्तन अबैछ। एहि
परिवत्र्तन सँ यौन भूख, स्वाभाविक मानवीय भूखक स्थान लए लैछ। परंच, कथाकार प्रभास स्त्री
आ पुरुषक यौन भावना मे, सेक्सक प्रति दृष्टिकोण मे एकात्मकता अनबामे असमर्थ छथि।
दूनूक यौन-भावना कें ई दू प्रकारें देखैत छथि। दूनूक लेल दू प्रकारक मान्यता कथाकारक
अछि। दू प्रकारक दर्शन छनि। जँ यौन-भूख मनुष्य जातिक एक स्वाभाविक भूखक रूपमे
स्वीकारैत छी तँ स्त्रीक लेल भिन्न आ पुरुषक लेल भिन्न, से कोना भए सकैछ? जखन नारीमे
यौन भावनाक प्रश्न अबैछ, ओकरा आधुनिक चेतनासँ जोड़ि जैविक विवशताक रूपमे कथाकार
चित्रित करैत छथि, जाहि सँ पुरुष कें अधिकसँ अधिक अपना वासना-तृप्तिक अवसर भेटैक।
अर्थात् एक पुरुष कें अनेको विवाहित अथवा अविवाहिता स्त्रीक जैविक विवशताक चिन्ता रहैछ।
ई आधुनिक चेतनासँ सम्पन्न युग-बोधक अभिव्यक्ति नहि थिक। दोसर दिस, जखन कोनो कथा-
नायकक पत्नी कथानायकक अनुपस्थितिमे, (सुख, टुस्सा आ बाँझी) अथवा शारीरिक
असमर्थताक कारणें (सुख) अथवा रुचि-परिवत्र्तनक लेल अथवा आर्थिक विपन्नताक कारणें अपन
पेटक ज्वाला कें शान्त करबाक लेल यौन-व्यापार करैछ तँ पतिक कोप-भाजन बनैछ। एक दिस
जँ प्रभासक कथानायिक छोट डोरीमे खुटेसल गायक स्थिति (शीत-युद्ध) सँ टुस्सा आ बाँझी क
उन्मुक्त आकाश धरि पहुँचि जाइछ तँ कथा नायक सामंतवादी मनोवृत्तिक परिचायक प्रमाणित
होइछ। प्रभासक कथामे ललितक कथा मुक्ति समान यथार्थ कें, अपन कमजोरी कें वा, अपन
शारीरीक असमर्थता कें स्वीकार करबाक साहस नहि छैक। जे हिनक कथानायक के कुंठित आ
हीन भावनासँ ग्रस्त बना दैछ। धमकी (मिहिर 4-1-70) मे भोगवादक बर्बर रूप विस्फोट कए
उठैछ जखन बाल-विधवा पुतोहुकें रोगशय्या पर पड़ल ससुर अपना दिस खीचैछ।



एक दिस जँ प्रभासक कथाक नारी अधिकसँ अधिक भोग्या छथि तँ दोसर दिस ओकर
वैचारिक स्वतंत्रता सेहो असह्र अछि। नवधर उठय पुरान घर खसय क पत्नी पतिक अत्याचार
सहैत सहैत विद्रोह कए उठैछ आ नैहर जा अपन सन्तानक प्रति आशान्वित भए जीवैछ। पति
हीनताबोध सँ ग्रस्त रहैछ। एकटा दुखान्त चलचित्र (मिहिर 1-6-63) क आदर्शवादी प्रशान्त
स्वतंत्र आचार-व्यवहार आ विचारक सुजाता सँ अपना कें आधुनिक मानैत आ अन्तर मे दयाक
भाव पोसैत विवाह कए लैछ। मुदा सामंतवादी मनोवृत्तिक ऊपर सँ ओढ़ल आधुनिकताक चादरि
फाटि जाइछ। तें ओ सुजाता कें एकसरि छोड़ि भागि जाइछ। मुदा कथाकार स्वतंत्र विचारक
आधुनिकाकें पतिक पछोड़ धरा दैछ। पुनरावृत्ति (मिहिर 21-5-72)क डाक्टर सेहो अपन
आदर्शवादिता पर असोथकित भए झखैत रहैछ। प्रभासक कथामे विभिन्न परिस्थिति मे जीवैत
नारीक चित्रण अछि। कोन प्रकारें नारी 'नर्स'क काज करैछ (आयल पानि गेल पानि), कोन
कारणें यौन व्यापार दिस आकृष्ट होइछ अथवा ककर प्रेरणासँ सामाजिक जीवन मे प्रवेश करैछ,
तकर सम्यक् चित्रण भेटैछ। हँसी (मिहिर) मे नीरू अपन प्रेमी प्रीतम कें एही खातिर छोड़ि,
सुनील सँ विवाह कए लैछ जे प्रीतम प्रोफेसरी करैछ तथा ओकरा पर एक विशाल परिवारक
भार छैक। सुनील हजार टाका महीना कमाइछ। ओकरा कोनो उत्तरदायित्व नहि छैक। लगैछ


जेना कथाकार नारी-जातिक प्रति न्याय नहि कएने होथि अथवा पुरुषक एकाधिकारक किंचितो
हनन स्वीकार नहि हो।



भावुकता सँ यथार्थबोध धरि -



आहतक प्रति दया होएब, अस्वाभाविक नहि। परंच, आहतकें घेरि कनैत रहला सँ
शोणित बहब बन्द नहि भए सकैछ। आ ने दर्दे किंवा जानक खतरे टरि सकैछ। अतएव,
व्यक्तिक प्राणरक्षा निमित्त आवश्यक रहैछ, उपचार करब, अस्पताल लए जएबाक व्योंत करब।
दया, करुणा आ सहानुभूतिक अतिशयताक स्थितिमे आहत व्यक्तिकें घेरि कनैत रहब, नोंर
चुबबैत रहब, भावुकता भेल तथा उपचार करबाक ओहिआओन करब

बौद्धिकता। भावुक क्षणमे आँखि बन्द भए जाइछ, आगू देखि डेग उठेबाक विचार नहि जनमैछ,
यथार्थकें यथार्थ रूपमे सहन करबाक साहस नहि बटोरल होइछ। अतएव, आहतक प्राणरक्षा
निमित्त आवश्यक छैक, सहानुभूतिपूर्ण बौद्धिक आचरण। एकक अनुपस्थिति मे दोसरक स्थिति
प्रभावपूर्ण नहि होइछ। केवल विचार-विमर्श करिते रहला पर समयक ध्यान हटि जा सकैछ।
संगहि अतिशय बौद्धिक किंवा दार्शनिक भेला पर निर्लिप्तता आबि जाइछ, अमृत्यु आ अजीवनक
बीच काहि कटलासँ अस्तित्व रक्षार्थ सामाजिकता नहि आबि पबैछ।



व्यवहारिक जीवने जकाँ साहित्य सर्जना मे भाव आ बुद्धिक समान महत्व छैक। स्वयं
भावुक रहि, स्थितिक प्रति सहानुभूतिशील बनल रहब कलाकारक लेल परमावश्यक। मुदा,
कलाकृतिक परिवेश कें आ ओकर पात्रकें भावुक बनादेव उचित नहि। भावुक पात्र आ परिवेशक
निर्माणसँ पाठकक भावगत संस्कार जागि जाइछ। पाठक भावुकताक प्रबल वेगमे भसिया
जाइछ। भसिया गेला सँ किंवा यथार्थक भावभूमि परसँ पएर उखड़ि गेलापर, पाठक नोर
पोछैत-पोछैत कलाकृतिक सविधि मूल्यांकन करबाक क्षमता सँ बलात् विमुख भए जाइछ।
तात्पर्य ई जे अनावश्यक रूपें भावुक परिवेश आ चरित्रक निर्माण करबाक पाछाँ कलाकारक
चिन्तनगन शैथिल्य तँ रहिते छैक, अपन कमजोरीकें नुकेबाक नेत सेहो झलकि उठैछ।



प्रभासक कथा प्रतीक्षा (वैदेही 57)क वातावरण भावुक अछि। वर्षा, बिजुली आ मेघ,
गर्जन सँ निर्मित भावुक परिवेशमे कथाकार कथा नायिकाक ह्मदय-प्रदेशमे उठैत तरंग कें देखि
प्रश्न करैछ युगसँ पियासलि की ई वरखा एकर अवरुद्ध कण्ठ कें सरस कए सकलैक? ओकर
ह्मदयमे प्रज्वलित विरहाग्नि कें ई जल मिझा सकतैक'? परंच, दोसरहि क्षण जखन खखनाक
नवयौवना पत्नी तारक प्रसंग मे चिकरि कए गट्टा पकड़ि जिज्ञास करैछ, की छइ? वजइ ने
किए छी?" तँ कथानायकघबरा कए-'नीके अछि दशमी छुट्टीमे आओत' कहि अन्हरिया राति मे
भीजैत भागि जाइछ। अतिशय भावुक भए किंवा संभावित व्यथाक अनुमान सँ मोटर दुर्घटनामे
खखनाक मृत्युक सूचना नहि दए पबैछ आ ओकर पत्नीकें सदाकलेल् अन्हार मे प्रतीक्षा
करबाक हेतु छोड़ि दैछ।



प्रभासक द्वितीय चरणक कथा मे यथार्थ सँ परा जएबाक प्रवृत्ति मे तँ कमी अबैछ, मुदा
रोमानी आ काल्पनिक उड़ानमे विशेष परिवत्र्तन लक्षित नहि होइछ। फलस्वरूप प्रकाश आ


किरण (व्यतित-मिहिर-14.7.63)क भेंटघाट यथार्थपर आदारित नहि रहलाक कारणें स्थायी नहि
भए पबैछ। जातीय बन्धन मे गछारल प्रकाश दोसर जातिक किरणक समर्पण कें कोना स्वीकारि
सकैछ। दोसर दिस किरणक आँखिक नोर अन्यत्र विवाह भए गेलोपर नहि सुखाइछ। पाँच
वर्षक उपरान्त गाड़ी मे पतिक संग जाइत किरण द्वारा ओहि डिब्बा सँ उतरल प्रकाश पर चिट्टी
फेकि कए अग्रिम जन्म मे संग होएबाक कामना करब अनसोहातक स्तर धरि भावुक भए
जाइछ। तथापि प्रकाश द्वारा डिब्बा मे वा उतरलो पर उत्तर नहि देबा मे प्रकाशक अभिजात्य-
बोध बाधक भए जाइछ? कालान्तर (मिहिर 31-5-64) मे बात-बात पर कानल जाइछ। मुदा,
प्रभासक कथाक परिवेश एवं चरित्र मे भाविकता क्रमशः कम भेल जाइछ। भावुकताक बदलामे
बौद्धिकता वा व्यर्थता बोध अएबाक पर्याप्त कारण अछि-कालेज जीवनक उत्तरदायित्वहीन
वातावरण आ ओहि सँ गठित जीवन-दृष्टि जनित कथाकें सर्जना। परंच ई स्थिति अधिक दिन
धरि नहि रहैछ। कथाकारके कटु यथार्थ सँ साक्षात्कार होइछ। जीवन आ जगतक तीत अनुभव
सँ वस्तुस्थितिक प्रति सजगता बढ़ैछ। दिनचर्या ('दिनचर्या' मिहिर 5-7-64) मे परिवत्र्तन होइछ।
दिनचर्या मे परिवत्र्तन होइतहि कथाकार एक अपराध एक दण्ड फाँक आ चिता एक मुर्दा तीन
क भावुक परिवेश एवं काल्पनिक धरातल कें पार कए जाइछ। कथाकारक रोमानी आ
उत्तरदायित्वहीन दृष्टि पर अगरनी (मिहिर-21265)क टूटला सँ आघात होइछ। आ ओ सद्यः
नवका अरगनीक आवश्यकता अनुभव करैछ। तखन, ओ देखैछ अपना संगे चारूकात
वि•ाविद्यालयक उपाधि लेने अनजनुआँक

जनमल (मिहिर-15-11-64) जकाँ जीविकाक तलाशमे फिफिआइत युवावर्गकें, जातिवादक
पांकमे आकण्ठ डूबल व्यवस्थाकें, स्वार्थक जाँतमे पीसाइत असहाय आ निरुपायकें। ओ देखैछ
भ्रष्टाचार, घूसखोरी एवं महंगी सँ उत्पन्न सामाजिक व्यवस्थामे काहि कटैत समाजक प्रत्येक
व्यक्तिकें। कथाकार देखैछ, टूटैत गाम, शिथिल होइत सामाजिक आ पारिवारिक संबंध स्वार्थक
राजनीतिमे ऊपर फांटू (मिहिर-2-2-64) भेल देशक भविष्यकें।



प्रश्न उठैछ जे कथाकार' चिता एक मुर्दा तीन क सहयोगी छल, दिनचर्यामे सदिखन
प्रतीक्षा छलैक, ओकरे बूते निष्क्रियता बोधक भाव-भूमि पर अपन कथाक महल जोड़वा कतयसँ
आएल? जकर कथानायक मे जीवट छलैक, सम्पूर्ण परिवारक भार उठेबा लेल अरगनी बनबा
हेतु तैयार छल, शिक्षक पिताक', आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया'क भयावह स्थिति सँ परिचित
भए (लिफाफ बन्द चिट्टी खुजल-अभियान-63) बोझ कम करबा लेल अहुँछिया कटैत छल।
ओहि कथाकारक कथानायक एक दशकक बाद 'ढ़ेप' (मिहिर 19-5-74) मे आबि ओहिना
निष्क्रिय भए जाइछ, जेना चरीक लोभ मे घमल अलकतरा कें पार करैत काल फँसल बकरीक
निकलबाक प्रत्येक प्रयास, अन्ततः ओकरा निष्क्रिय बना दैछ। सामाजिकताक प्रति प्रतिबद्ध
कथानायक (अरगनी, बाबी) कोना समक्षहि मे जरैत चौमहला परसँ प्राण रक्षा निमित्त कूदलि
माय आ नवजात शिशुकें आहत होइत देखैत रहैछ। अन्यायक विरोध मे अपन स्वर मुखरित
कयनिहार, कोना ब्लेक सँ चीनी, डालडा आ सिनेमा टिकट कीनैत काल मूक रहैछ। ओकर
सामाजिक चेतना कतय हेरा जाइछ? प्रभासक कथा यात्राक अध्ययन विश्लेषण पर कथाकारक
जीवन-दृष्टि आ चिन्तन-प्रणाली मे परिवत्र्तन अननिहार प्रेरक तत्त्व स्पष्ट भए जाइछ।




स्वार्थवृत्तिक अनवरत परिक्रमा-'निरधन बापुर पूचय ने कोय' औखन ओतबे सत्य अछि
जतेक कवि कोकिल विद्यापतिक समयमे छल। आर्थिक विपन्नताक स्थितिमे समाज द्वारा
अवहेलना यथार्थ थिक। स्वार्थसिद्धिक समावेश नहि देखि स्वार्थ-वृत्तिक अनवरत परिक्रमा
कएनिहार समाजक तथाकथित 'संभ्रान्त जन्तु' मने मन अवसरक तलाशमे रहैछ। कथाकार
प्रभासक तेज दृष्टि समाजक एहि जन्तुक कुकृत्यकें देखि लैछ। ओ सुनि लैछ, खगल व्यक्तिकें
सोंखबाक प्रवृत्ति कें जन्म आ आश्रयदाता, स्वार्थी समाजक अन्तरक धुकधुकी। बीमारीक अवस्था
मे प्राण रक्षा निमित्त अनुनय-विनय पर सए रुपैयाक कर्ज आ श्राद्धक हेतु, ब्राहृोत्तर कें ध्यान मे
राखि पाँच हजारक पोटरी देनिहार समाजक तथाकथित संभ्रान्त ठीकेदारक द्धैध रूपसँ परिचित
भए जाइछ (बाबी)। माइक स्थान पर पोसनिहारि लालकाकी चैदह वर्षक बाद घूमल रामूकें
देखि आक्रोश करैछ-'ई कहाँ सँ बज्र खसल हमर नेना सभक कपार पर।' बाहर वर्ष मे लोक
श्राद्धो कए दैत छैक। अहूँकें ने कहने रही जे करबा दियौक श्राद्ध नहि मानलहुँ, तें ने मुर्दा
जीविकए आबि गेल' (उत्तर काण्ड-मिहिर 7-4-74)। कतेक पैघ विडम्बना अछि, जे लालकाकी
रामूकें पोसलथिन, सएह ओकर श्राद्धक कामना अपन पुत्रक हकमे करैछ। मैट्रिकक फीसक
बदलामे पितृहीन चन्दर मातृक मे उपेक्षापूर्ण उत्तर सूनि अवाक् भए जाइछ-तो एतहि रहि जो
चन्दर। हमरा लोकनि कें एकटा आदमी चाहबोकरी दौड़-धूप करबा लेल। फेर तों तँ अपन
लोक छैं (ऊपर फाँटू)। कथाकार देखैछ, समाज आ परिवारक समस्त मानवीय संबंध-सूत्रकें
स्वार्थक वेरमे खूस-खूसा कए टुटैत। अपन स्वार्थक खातिर दोसराक अभ्युदयक कामना करबामे
असमर्थ अपन गतात कें, दोसराक गरदनि छोपि अपन माथ ऊँच करबामे हेबाल लोककें।



त्याज्य घटनाक मनोनुकूल विस्तार--त्याज्य घटनाक मनोनुकूल विस्तार कए
स्वार्थसिद्धिक ओरिआओन करब नितान्त नव टेकनिक थिक (सुरक्षित मिहिर-9-12-73)। जाहि
घटनाकें घटना स्थले पर निबटाओल जा सकैछ, ओकर मनोनुकूल विस्तार होइछ। नव-नव
समस्याकें जन्म दए अपन चालि सुतरबाक प्रवृति आ व्यवस्थाक सह पर प्रतिफल कें अपना पक्ष
मे कए लेबाक चक्रचालिसँ कथाकार परिचित भए जाइछ। एकर प्रभाव निष्पक्ष लोक पर पड़ैछ।
सत्य पर असत्यक विजय अनसोहांत लगैछ। एहि प्रक्रिया पर प्रतिबंधक बदला

मे विकसित होइत देखि, कथाकारक अन्तश्चेना प्रभावित भेल अछि।



शोषितक प्रति शोषकक नकली सहानुभूति--शोषितक प्रति शोषकक नकली सहानुभूति
आ शोषित-प्रताड़ितक स्थिति मे कोनो परिवत्र्तन नहि आएल देखि, कथाकारक मनःस्थिति पर
आघात होइछ। कथाकार देखैछ, न्यायक लेल अहूँछिया कटैत शोषित प्रताड़ित खखना कें-'अहूँ
तँ बाजू बंकू बाबू। एही निसाफ लेल भोरे बजौने छलौ, नेता बनै छलौं, न्याय आ बरोबरिक गप्प
करैत छलहुँ। आइ किएक एना मूड़ी गोतने बैसल छी'। (टुस्सा आ बाँझी-मिहिर 19-9-72)
न्यायक नेता माननिहार बेर पर शोषकक हेंज मे मिल अपन असली रूपकें जगजिआर कए
दैछ। प्रगतिशीलता क बाना धयने ('गुण्डपनी', 'चाङुर' कथा अंक) लोकक द्वैंध रूप सँ
कथाकार परिचित भए जाइछ।



पांजिक गर्व--जमीनदारी व्यवस्थाक अन्त सँ उच्च वा मध्यम वर्गक आर्थिक स्थिति
डगमगा गेल। शान-सौकतक जीवन जीनिहार पेटक भूखक चिन्ता सँ आक्रान्त भए उठल।


पिंजड़ा मे बन्द बटेरक लड़ाइ देखि समय बितबयवला तथाकथिन वर्ग बचल जमीन जायदाद
कें पेट पूजाक अतिरिक्त व्यर्थक मर्यादा आ प्रतिष्ठा खातिर वोहाबए लागल, बदलैत युगक
अनुरूप अपन चरित्र विकासमे असमर्थ अभिजात वर्गक धनहीन निरक्षर व्यक्ति नौकरीक तकैत
आ डंका पीटैत चलैछ जे हमर बाबाक दरबाजा पर हाथी छलनि, घोड़ा छलनि, बखारी छलनि,
सगर परोपट्टा मे नाम आ धाख छलनि। हमरा नहि अछि ताहिसँ की, कुलक मर्यादा क
प्रतिकूल कोना कोनो काज करब समाज में हँसी होएत। एहि प्रकारक अकाजक आत्म गौरव
कतहु स्थिर नहि होमय दैछ। शारीरिक परिश्रम कें कौलिक मर्यादा क प्रतिकूल मानैछ। पैघ
लोक छोट लोक (सोना माटि-'जून' 69) क कथा नायक पांजिक गर्वपर आँजी सिद्धी नहि
सिखनिहारि व्यर्थक मर्यादा कें बचेबा लेल अपस्यांत वर्गक प्रतिनिधित्व करैछ। एहन एहन पैघ
लोक कें अल्हुओतर ने गुदानैत छिऐक हम, कहलकैक जे किदन, बड़-बड़ गेलाह तें मोछ वला
अलाह (पिनकी)। व्यामोह ग्रस्त मनःस्थिति क उद्घाटन प्रभावक ढ़ंग सँ करैछ। संगहि बदलल
परिस्थिति मे धन आ समाजिक मर्यादाक केन्द्रक प्रति उठल उजाहि(उजाहि-'मिथिला दर्शन-
दिसम्बर 73) देखि अभिशप्त (अभिशप्त-आखर) सेहो भए जाइछ।



स्थापित मूल्य क विघटन- एक निश्चित काल खण्ड क राजनीतिक, समाजिक, आर्थिक
आ धार्मिक मान्यता संवेदनशील कलाकारक मनःस्थिति कें कोनो-ने-कोनो प्रकारें प्रभावित करिते
अछि। मनुष्य क मनोजैविक विकास क संग जीवन मूल्य क अविच्छिन्न संबंध रहैछा प्रचलित
नैतिक व्यवस्था आ वर्जितोन्मुखी अन्तश्चेतनाक निरन्तर द्वन्द्व, प्रत्येक युगक मूल्य दृष्टिक अपन
युगक आदर्श प्रति समर्पण आ वैचारीक जगत मे मनुष्यक नवोन्वेषणप्रियता क निरन्तर प्रयास
सँ स्थापित मूल्य क विघटनाक वा नव निर्माणक प्रक्रिया कें अवरुद्ध नहि कएल जा सकैछ। ई
सत्य जे कथाकार कोनो पूर्व निर्धारित जीवन दृष्टि क खाँका पर मनुष्य जीवन कें नहि अंकैछ।
ओ जे देखैछ, अनुभव करैछ, ओकरहि आधार पर मानवीय संबंधक विश्लेषण करबाक प्रयास
करैछ। कथाकार प्रभास देश क विभिन्न स्थिति मे परिवत्र्तन सँ भेल जीवन-मूल्यक विघटन कें
देखल अछि। एक दिसजँ हिनक कथा मे पारंपरिक मूल्य क विघटनजन्य उपस्थित स्थिति क
प्रति संवेदनात्मक अभिव्यक्ति भेटैछ, तँ, दोसर दिस नव मूल्य क निर्माण प्रक्रिया मे छटपटाइत
धुकधुकी।



शहर क एक छोट भाड़ा क कोठली मे गुजर करबा लेल विवश गाम क पैघ परिवार सँ
छिटकल एक लघु परिवार क समक्ष गाम क सामाजिकता क बदला मे शहर क कृत्रिम
आत्मीयता क मेघ छैक। कृत्रिम आत्मीयता क घटाटोपसँ आच्छन्न पुत्रक मनः स्थिति क प्रति
सामाजिकता क सरस परिवेश क अभ्यासी पिता निरपेक्ष रहैछ। फलतः शहर क आसन्न
खतराक प्रति साकांक्ष रहितो पुत्र मानसिक स्तर पर अरगनी बनबासँ अपना कें कात नहि कए
सकैछ। अनचिन्हार (मिहिर-14-9-69) आबि कथाकार अपन परिवार आ पिता क

परिवार क अस्तित्व कें अनुभव करैछ। दू स्थान दू परिवारक प्रति उत्तरदायित्व बेध कें पिता
दुख (मिहिर 5-4-74) मे आबि अनुभव करैछ। पिता आ पुत्र क उत्तरदायित्व मे समानता आबि
जाइछ। पिता अपन गामक परिवार क लेल बेहाल तँ पुत्र शहर क कृत्रिम जीवन जीवा मे
अपस्यांत। परंच 'ढेप मे दू परिवारक उत्तरदायित्व बेध सँ पूर्णतः मुक्ति अछि।




पति-पत्नी--नारी शिक्षा क विकास एवं संविधान प्रदन समान अधिकार एवं उत्तरदायित्व
क बोध कएबाक प्रयास सँ पारंपरिक किंवा स्थापित पति-पत्नी क मानसिकता मे परिवत्र्तन आबि
गेल अछि। पति-पत्नी एक चारी मे रहितो अपन पृथक व्यक्तित्व कें प्रक्षेपित करबा लेल तत्पर
अछि। एहि प्रयत्न क समक्ष राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्र मे प्रवेश कें नारी निषिद्ध नहि
मानैछ। परंच सामंतीय परंपराक जड़िआयल पुरुष क मनोवृत्ति नारी मुक्ति आन्दोलन क अगुआ
अपना कें देखबितो नहि बदलि सकल के अछि। मानसिक स्तर पर एहि यथार्थ कें स्वीकार बा
मे असौकर्य होइछ (पुनरावृति)।



कामभूख कें जैविक विवशता क रूप मे स्वीकारि त्वचा संवेदन क रूचि परिवत्र्तन कें
अपना वेर मे आचार-अनाचार, पाप-पुण्य, नैतिक-अनैतिक फेरा सँ बाहर रखैछ। परंच, पत्नी क
रूचि-परिवत्र्तन वा पति क अस्वस्थता क स्थिति मे सांमतीय मनः स्थिति क ऊपर ओढ़ाओल
आधुनिकता क तौनी उड़िया जाइछ (सुख)-। पति आ पत्नी क मन आ शरीर दू भिन्न स्थान पर
समर्पित रहला सँ पति-पत्नी क पारंपरिक संबंध मे विघटित भए गेल अछि।



पिता-पुत्र, पति-पत्नी एवं परिवारिक मूल्य क विघटन क संग कथाकार सामाजिक मूल्य
क विघटन अनुभव करैछ। समाज मे आत्मीयता क स्थान पर दाब पेंच क फंदा गेल देखैछ
(पिता-)। वैज्ञानिक रूचि विकास किंवा प्रत्येक पारंपरिक मान्यता कें उपादेयता क आधार पर
जाँचि अनुसरण करबाक प्रवृत्ति, धार्मिक अंध वि•ाासक खण्डन कए देलक अछि। धर्मक नाम
पर चलि रहल अधर्मक प्रसार, भ्रष्टाचारक विस्तार सँ उत्पन्न विकृति आ विडम्बना सँ परिचित
लोक आँखि मूनि अनुकरण नहि करैछ। जाहि सँ अनेक पारंपरिक मानय्ता विधटित भए गेल
अछि।



संत्रास-युग क संक्रमण शीलता अनस्थिरता आ तीव्र गति क परिवत्र्तन धर्मिता सँ
अनिश्चयक वातावरण मे जीवैत लोक संत्रस्त अछि। कखन की भए जाएत? कोन स्थिति मे
फँसि जाएब तकर पूर्वज्ञान नहि भए पबैछ। स्वतंत्रता सँ पूर्वक कंडिशन्ड परिवेशक अभ्यस्त,
स्वातंत्र्योत्तर सामाजिक क्रान्ति सँ आच्छन्न अछि। पारंपरिक मर्यादा किंवा प्रतिष्ठा अथवा धन
सम्पदा क मोह सँ ग्रस्त मध्यवर्गीय लोक नव सामाजिक परिवेश मे अपना कें फिट करबा मे,
असमर्थ अछि। असमर्थता जन्य क्लेशसँ सीदित अछि। शिक्षित किंवा अशिक्षित युवा वर्ग मे
बैसारी आ ऊपर सँ परिवार क उत्तरदायित्वक बोध एवं अनिश्चित भविष्यक अछैतो क्षमता छैक,
मनमे उत्साह छैक, धैर्य छैक तथापि क्षमता, उत्साह आ धैर्यक उपयोग करबाक क्षेत्र सँ बंचित
अछि। कलुआ (आगू मे ठाढ़ एकटा पछिला लोक-) अपन चारू कात क धरती कें जलमग्न
देखैछ। यथार्थ क धरती आंखिक सीमा सँ बाहर छैक, अदम्य उत्साह, धैर्य आ लगनशीलताक
अछैतो बाट तकबा मे असमर्थ, घृणित परंपरावादक जड़ता सँ उबिआएल कलुआ अनिश्चयक
प्रबल वेग मे भसिया जाइछ।



भावुकता सँ व्र्थता बोध धरिक यात्रामे प्रभास क कथा दू दशकक समय लैछ। एहि दू
दशक क अन्तराल मे प्रभास क कलाकार विभिन्न परिस्थिति मे जीवि, अपन परिवेश कें
आत्मसात कए, ओकर प्रत्येक स्थिति क आरोह-अवरोह कें व्यंजित करैछ। कतय आबि


कथाकार क मान्यता, जीवन दृष्टि आ वैचारिक स्तर अथवा कथा-संवेदना मे परिवत्र्तन भेल
अछि, कथा-यात्रा कें देखला पर स्पष्ट भए जाइछ। प्रायः अधिकांश

कथा अपना सँ अथवा अपन घर सँ चलैछ, गाम मे घुमैछ, घर सँ अथवा गाम सँ चलबा मे
कथाकार क जे संवेदना काज करैत छलैक, ओहि परिवेश क परिभ्रमण करितो भावगत
निर्लिप्तता क स्थिति धरि पहुँछि क्रमशः निष्क्रियता बोधक भए जाइछ।



मि.मि. 1886

.. .. .. ..



संदर्भ संकेत



मैथिलीक पहिल कथाकार पं0 श्री कृष्ण ठाकुर आ 'चन्द्र प्रभा'



1. क़्द्ध. ख्.ख़्. ग्त्द्मण्द्धठ्ठ-क्तत्द्मद्यदृद्धन्र् दृढ ग्ठ्ठत्द्यण्त्थ्त् ख्र्त्द्यड्ढद्धठ्ठद्यद्वद्धड्ढ ध्दृथ्.क्ष्क्ष्

2. प्रो0 आनन्द मिश्र-मैथिलीक आरम्भिक कथा (सं0 रमानन्द झा रमण)

मैथिलीक प्रथम उपन्यासकार पं0 जीबछ मिश्र आ 'रामे•ार'

1. क्र.ॠ. क्रद्धत्ड्ढद्धद्मदृद-च्र्ण्ड्ढ ख्दृद्वद्धदठ्ठथ् दृढ द्यण्ड्ढ ङदृन्र्ठ्ठथ् ॠद्मत्ठ्ठद्यत्ड़ द्मदृड़त्ड्ढद्यन्र् दृढ क्रद्धड्ढठ्ठद्य
एद्धत्द्यठ्ठत्द ः क्ष्द्धड्ढथ्ठ्ठदड्ड

ढदृद्ध 1919, द्रठ्ठढ़ड्ढ ददृ. 235

2-4 जीबछ मिश्र-मिथिला मोद (अंकुर-सं0 हरिष्चन्द्र मिश्र)

रास बिहारी लाल दास आ उपन्यास 'सुमति'

1. क़्द्ध. ख्.ख़्. ग्त्द्मण्द्धठ्ठ-क्तत्द्मद्यदृद्धन्र् दृढ ग्ठ्ठत्द्यण्त्थ्त् ख्र्त्द्यड्ढद्धठ्ठद्यद्वद्धड्ढ ध्दृथ्.क्ष्क्ष्. द्र.ददृ. 35-36

2. मिथिला मिहिर, दरभंगा- 29 जनवरी 1916

3-5-सुमति (भूमिका)

6. क़्द्ध. ख्.ख़्. ग्त्द्मण्द्धठ्ठ

7. घ्द्धदृढ. ङ.ख़्. क्ण्ठ्ठद्वड्डण्ठ्ठद्धन्र्-ॠ द्मद्वद्धध्ड्ढन्र् दृढ ग्ठ्ठत्द्यण्त्थ्त् ख्र्त्द्यड्ढद्धठ्ठद्यद्वद्धड्ढ घ्.ग़्दृ.229

8. डॉ दुगिनाथ झा श्रीश-मैथिली साहित्यक इतिहास पृ0 सं0 144

9. जीवछ मिश्र मिथिला मोद (अंकुर-सं0 हरिश्चन्द्र मिश्र)

जनार्दन झा 'जनसीदन' आ 'निर्दयी सासु'

1. प्रो0 हरिमोहन झा-मिथिला भारती, अंक-1 मैथिली अकादमी

2. प्रो0 हरिमोहन झा-प्रो0 गंगा पति सिंह - प्रवेशिका मैथिली गद्य पद्य संग्रह

3. मिथिला मिहिर, दरभंगा 29 दिसम्बर 1916

4. जनसीदन-नीति पद्यावली, पुस्तक भंडार

पं0 जनार्दन झा एक बिसरल साहित्य सेवी

1-3-मिथिला मोद् उद्गार 45/47-1910-11 ई0


पं0 त्रिलोचन झा (बेतिया) बिसरल मातृ भाषानुरागी

1. आदित्य सामबेदी-साहित्य तपस्वी पं0 त्रिलोचन झा, मैथिली अकादमी पत्रिका

2. क़्द्ध. ख्.ख़्. ग्त्द्मद्मण्द्धठ्ठ--क्तत्द्मद्यदृद्धन्र् दृढ ग्ठ्ठत्द्यण्त्थ्त् ख्र्त्द्यड्ढद्धठ्ठद्यद्वद्धड्ढ ध्दृथ्.क्ष्क्ष्

3. प्रो0 गंगापति सिंह-मैथिली भाषाक साहित्य-मि0 मोद 1914 ई0

4. यदुवर-मैथिली साहित्य दिग्दर्शन--मि0 मोद 1914 ई0

5.-9. मिथिला मोद/मिथिला गीताञ्जलि

10. आदित्य सामवेदी--मैथिली अकादमी पत्रिका

राष्ट्रीय चेतनाक पुरोधा कवि यदुनाथ झा 'यदुवर'

1. ललितेश मिश्र मि0 मिहिर 11/1989

2. रमानन्द झा रमण-नवीन मैथिली कविता

3. परमेश-मिथिला गीताञ्जलि (सं0 यदुवर)

4. पं0 हीरा लाल झा 'हेम' - मिथिला भारती, मैथिली अकादमी

कवि सेनानी छेदी झा 'द्विजवर'

1. डॉ0 मनोरंजन झा-छेदी झा द्विजवर आ हिनक रचना-अप्रकाशित शोध प्रबंध, पटना वि0
वि0

2. मिथिला मोद, उद्गार-93, 1321 साल

145/अखियासाल

3.-4. मिथिला मिहिर, दरंभंगा 18 नवम्बर 1916 ई0

5. नरसिंह पद्यावली, मिथिला मोद, उद्गार -91, 13 21 साल

6. चरखा चौमासा-मिथिला अंक-11

कुमार गंगानन्द सिंहक कथा संवेदना

1. कुमार गंगा नन्द सिंह-मैथिली गद्य कुसुम माला (सं0 म0 म0 उमेश मिश्र)

कवी•ारी हरिलताक वैष्णवता

श्री मती अरुन्धती देवी, विदुषी महिला, सम्वत् 1933

कविवर श्यामानन्द झाक काव्य वस्तु

1. श्यामानन्द रचनावली-सं0 डॉ0 रमानन्द झा 'रमण'

2. पं0 कमल नाथ चौधरी-मिथिला मोद-उद्गार-100, 1322 साल

3. पं0 गणे•ार झा गणेश-प्रवेशिका मैथिली गद्य पद्य संग्रह-सं0 प्रो0 हरि मोहन झा/गंगा
पति सिंह

बाबू लक्ष्मी पति सिंह आ मैथिली पत्रकारिता

1. लक्ष्मी पति सिंह-मैथिली पत्रकारिताक विकास-मैथिली साहित्यक रूप रेखा चेतना
समिति

कवि चूडामणि मधुपक गीति साहित्य

1.. उपेन्द्र ठाकुर मोहन-बाजि उठल मुरली

2. मैथिली सन्देश (सं0 श्यामानन्द झा)


3. मधुप--- चौकि चुप्पे

4. मधुप--झाङ्कार

5. मधुप कोवरगीत

6. मधुप-शतदल

7. कविता कुसुम स0 रामानाथ झा

भट्टि काव्यक परम्परा आ मधुपजी

1. मधुप-कोवर गीत

2. मधुप-प्रेरणा पुञ्ज

मैथिली उपन्यासक आलोक मे चन्द्र ग्रहण कं नारी पात्र

1.--2. चन्द्र ग्रहण प्रसंग किरण जीसॅ भेंट-भेटकर्ता-रमानन्द झा 'रमण'-मिथिला मिहिर अगस्त
1988 ई0

प्रो0 हरिमोहन झा एवं हुनक-चर्चरी

1. सुधांशु 'शेखर' चोधरी-संदर्भ

2. प्रो0 श्रीकृष्ण मिश्र-प्रो0 हरिमोहन झा अभिनन्दन ग्रंथ

3. प्र0 आनन्द मिश्र-मि0 नि0 10.4 1977

4. प्रो0 जयदेव मिश्र-विवेचना-सं0 सुधांशु 'शेखर' चौधरी

5. डॉ0 जयकान्त मिश्र हिस्ट्री ऑफ मैथिली लिटरेचर, साहित्य अकादमी

6. कुलनन्द मिश्र प्रो0 हरिमोहन झा अभिनन्दन ग्रंथ

7. डॉ0 वासुकी नाथ झा-ओएह

8. प्रो0 निगमानन्द कुमार-अखिल भारतीय लेखक सम्मेलन, रचना संग्रह भाग-चारि, वैदेही
समिति, दरभंगा

कविवर यात्रीक स्तम्भ लेखन

1.. वैदेही जुलाई 1960

2. वैदेही मार्च 1960

3. वैदेही अगस्त 1957

4. मिथिला दर्शन अक्टूबर 1957

5. वैदेही अगस्त 1957

6. मिथिला दर्शन मई 1960

7. वैदेही

8 मिथिला दर्शन-जनवरी फरवरी 1961

कविवर आरसी

1. मिथिला मिहिर-6 जनवरी 1974

2. आरसी-पूजाक फूल

3. आरसी-माटिक दीप


4. देसकोस, कलकत्ता-मई 1981



उपेन्द्र ठाकुर 'मोहन' आ0 हुनक कविता

1. मोहन-बाजि उठल मुरली

2. मोहन-इतित्री

3. मार्कण्डेय प्रवासी--मिथिला मिहिर, मई 1980

4. डॉ0 जे0 के0 मिश्र-हिस्ट्री ऑफ मैथिली लिटरेचर

5. कविता कुसुम-सं0 रमानाथ झा

6. दुर्गानाथ झा श्री मैथिली साहित्यक इतिहास

7. कविता कुसुम--सं0 रमानाथ झा



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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...