Tuesday, September 01, 2009

पेटार १९

शैलेन्द्र मोहन झा- गद्य संग्रह
नील कमल ओ नील गगन

प्रो0 श्री राधाकृष्ण चौधरी



नीरवताक विशालतामे सूतल गहन रत्रि ! घनघोर अन्हरियाक निन्न जेना कौखन
बिजुरीक छटा भंग कऽ दैत छैक। गहन अन्हरियाक सौन्दर्यक कल्पनामात्र आनन्ददायक।
काजर-कलापक कमनीयताक कृपा जे अन्हरिया रातुक नीरवताकें एहन चिक्कण बनौलक
अछि। जँ अन्हरियाक वैशिष्टय नहि होइत तँ सर्प एवं साधु एकर माहात्म्यक प्रशस्ति गबितथि
किएक? मिझाएल बिजुलीक इजोत सँ जहिना एक बेर लोक भको-भंग भऽ जाइत अछि तहिना
अचानक अन्हरियाक अवसान सँ कतेको काज मे भाङठ पड़ि जाइत अछि। कमलक कोमलताक
कमनीयता अन्हरियाक कोरा मे क्रीड़ा करैत सूर्यक प्रकाशक प्रतीक्षा मे रहैत अछि।



घनीभूत विचारक स्थापनाक लेल अन्हरियाक नीरवताक आवश्यकता। गहन रात्रिक
नीरवताक मध्य बेसि कऽ प्राचीन ऋषिलोकनि शान्तिक कल्पना कयने छलाह। ओहि शान्तिक
कल्पना कोनो आध्यात्मिक रूप मे नहि, प्रत्युत् पार्थिव रूप मे ओ लोकनि कयने छलाह। 'अन्नम्
ब्राहृ'क उद्घोषणा यदि ताहि दिन मे नहि भेल रहैत तँ को अजुका तिनहत्था जवान थोड़े
भगवानक अस्तित्व पर सन्देह करैत? औंघी कें शान्त करबाक लेल गम्भीर निद्राक
आवश्यकता। शान्तावस्थाक लेल नीरव वातावरण अपेक्षित। बेला-माहात्म्यक पुजारी

कुसुमसायक बेलाक नीरव स्थितिक अध्ययनक हेतु रातिक राति जागि तपस्या कयने छलाह,
मुदा तैयो ओकर विशालताक पूर्ण ज्ञान हुनका नहि भेल छलनि।



राधाक लेल व्यग्र कृष्ण ! बतहबा कृष्णक लेल भेल छथि बताहि राधा। दुहू गोटे अपन
जीवनक शान्तिक खोज मे व्यग्र। नीलगगनक दिस दुहु गोटे टकटकी लगौने छथि, मुदा
नीलगगन अपन अहंकारमे एतेक मदान्ध भेल अछि जे ओ हिनका लोकनि दिस मटकीयो
मारिकऽ नहि देखैत अछि। नीलकमल, अपन सौन्दर्य पर मुग्ध आ'र 'राधा-कृष्ण' अपन 'कारी-
गोर' रंगक सम्मिश्रण पर, आ'र ई दुहू गोटे नीलगगन कें हीन बुझि ओकर उपेक्षा कऽ रहल


छथि। तथापि अपन-अपन विरहाग्नि कें शान्त करबाक हेतु ओ लोकनि नीलगगनसँ जलक
अपेक्षा रखैत छथि। नीलगगन हिनका लोकनिक रूप गर्वक उपेक्षा करैत हिनकालोकनिक
विरहाग्नि कें बढ़ेबा मे योगदान कऽ रहल छथिन। एक दोसराक उपहास और उपेक्षा ! स्निग्ध
प्रेमक अभाव आ'र उपेक्षित स्नेहक बिक्री !! यैह भेल संसारक दैनन्दिन नियम आ'र
वास्तविकता। मुदा मत्र्यलोकक तिनहत्था भगवानक उपेक्षा भने कऽ लियय मुदा एहि घृणित
वातावरण सँ अपनाकें मुक्त करबामे अद्यावधि असमर्थ रहल अछि। राधाकृष्णक नाम मात्र
प्रतिकात्मक ! व्यावहारिक जीवनक संकेत मात्र। मिथिलाक माँटि, जे कहियो पिण्ड बनौने छल,
ताहि आधार पर अवतरित भेल छलाह मर्यादा पुरुषोत्तम राम; तों अद्यावधि ई वि•ाास बनल
अछि जे पुनः-पृथ्वी पर एहि मिथिला अंचल मे मैथिलीक आविर्भाव होयत, जे संसार कें पुनः
पूर्ण शान्ति प्रदान करतीह आ'र अगत्ती तीनहत्था जवान कें आगा बढ़बाक बल देथिन। राधा-
कृष्ण, सीतारामक प्रतिमूर्त्ति मात्र युग प्रतिनिधि, आ'र किछु नहि। प्रकृति पुरुष कोनो अदृश्य
ई•ार नहि, प्रत्युत् युगक कम एवं क्रियाशील व्यक्ति ! आदर्श पर चलनिहार व्यक्तिये युग-पुरुष
वा प्रकृति-पुरुष। मानव संकल्प युग-पुरुषक महान गुण। संकल्प के दृढ़ कैनिहार वैह कुसुम,
जकर प्रस्फुटन आ'र विलयन प्रतिदिन मनुष्यक ह्मदय मे नवीन आशाक संचार करैत अछि।
कुसुमक कतेक रूप-धीर, स्थिर, शान्त, सुन्दर, आकर्षक, कमनीय, कोमल, सुगन्धित, सुभाषित,
सर्वगुणसम्पन्न, सौन्दर्यवध्र्धक आशा संचारक आ'र संगहि संग प्रेरक सेहो।



बहिर्जगतक सौन्दर्य--कुसुम ! अन्तर्जगतक आत्मा-कुसुम ! अमरआत्माक आधारशिला-
कुसुम ! कुसुमक कियारी मे कतोके वर्ग, मुदा कुसुमक प्रेमी सभ क्यो। जीवन आ'र संसारक
प्रेमी भेल कुसुमक प्रेमी। कुसुमावलीक नीलकमलक पाछाँ भगवानो बौआइत छथि। किएक ?
नीलकमल वीतराग। नीलकमल मे नीलगगनक दुर्गुण नहि। नीलकमलक कियारी चारूकात
मँह-मँह करैत अछि जेना नवविवाहित कनियाँक आँचर!



नीलकमल कें देखिते नीलगगनके डाह होइत छैक, किएक तँ नीलगगनक सौन्दर्य
नीलकमलक समक्ष निष्प्राण बुझना जाइत अछि।



ताराक सजल बरियाती चलल अछि नील कमलक बियाह करयबाक लेल। तिमिराच्छन्न
मेघ ताराक बरियातीक लेल मार्ग प्रशस्त कऽ रहल अछि। 'आषाढ़स्य प्थम दिवसे'क अभ्युत्थान
मे एखन अनेक बिलम्ब छैक। नीलगगनक आँखि नोर सँ डबडबायल अछि ! मेघो अपना पेट मे
ताराक अमार लगौने अछि। तारा बिनु शोभे कोन? नीलकमलक बियाहक श्रृंगारक हेतु समस्त
कुसुम समाज उठि कऽ आयल अछि। बरियाती मे ताराक झुण्ड; साक्षीक रूप मे नीलगगन
आ'र मंत्रक रूपमे ऋग्वेदक ऋचा उपस्थित छल। नीलकमलक हाथ-माथ लाल होमऽ बला
छैक। सभ किछु जेना पूर्व निर्धारित हो ! ज्येष्ठक महिम मास ! ग्रीष्म-वर्षाक संधिस्थल मे
नीलकमलक हाथ नोतल जायत, यैह प्रकृति कें मंजूर। मेघक भाँभट देखि कऽ कालिदास सेहो
कानऽ लगलाह जे सभटा मेघ बरसिये जायत तँ हमर दूत भऽ कऽ कोन मेघ जायत? मुदा एहि
मे ककरो दोष नहि। नीलकमल वैह मैथिलीक स्वरूप, जकरा पर कहियो आधारित भेल छल


रामक मर्यादा, कृष्णक प्रतिष्ठा

आ'र पुरुषक विराट् रूप। अधुना आवश्यकता छल केवल शा•ात आस्था कें नीलकमल कोमल
कर सँ कर्नठ बनायब--प्रकृतिक अदृश्य एवं अज्ञात प्रदेश पर जे तिनहत्था जवानक आक्रमण
शुरु भेल छल ताहि अभियान मे ओकरा आ'र कर्मठ बनायब। किएक तँ कर्मठ हाथे सँ
नीलकमलक जड़ि सँ मोथाक जंगल साफ कऽ कऽ ओकरा चतरबाक अवसर देल जयतैक।
प्रकृति पर विजय सँ नीलकमल, नीलगगन धरि पहुँचि ओकरा ओतऽ शान्ति संदेशक शंखनाद
कऽ सकत। नीलकमलक विजय नीलगगन मे मनुष्यक प्रगतिक संकेत मात्र।



.. .. .. ..



शिव सच्ल्प

श्रीचन्द्रनाथ मिश्र 'अमर'



मानवक सजात प्रवृत्ति ने सद्गुण दिस रहैत छैक, ने दुर्गुण दिस। मात्र एक औत्सुक्य
ओकरा ह्मदयमे अवश्य रहैत छैक, जकर निवारणार्थ, जे कोनो नवीन वस्तु ओ देखैत अछि,
तकर रहस्य बुझबाक जिज्ञासा अन्तरमे उत्पन्न होइत छैक। तात्पर्य ई जे जाहि प्रकारक
प्राकृतिक, सामाजिक ओ परिवारिक परिवेशमे रहि, ओ प्रकृति, समाज ओ परिवारसँ परिचय
प्राप्त करत ताही प्रकारक जिज्ञासा ओकरा ह्मदयमे उत्पन्न होयतैक आ तदनुकूले प्रवृत्तिक
विकासो होयतैक। ओही ठामसँ निर्विशेषण गुण सत् अथवा दुर् विशेषणसँ युक्त होमय लगैत
अछि। अतः संसारक शिक्षाशास्त्री वा मनोविज्ञान-विशेषज्ञ मानव शिशुक समुचित विकासक हेतु
वातावरणकें सबसँ महत्त्व-पूर्ण स्थान दैत छथिन। प्रायः एही मनोवैज्ञानिक तथ्यकें दृष्टि-पथपर
राखि प्राचीन युगमे ऋषि-मुनिलोकनि गुरुकुलक व्यवस्था कयने छलाह, जतय मानव जीवनक
जे मुख्य उद्देश्य, श्रेय प्राप्ति, तदनुकूले वातावरणक सृष्टि कयल रहैत छलैक। स्वाभावतः
सद्गुणक प्रति ओकरामे जिज्ञासा उत्पन्न होइत छलैक आ ओहि जिज्ञासाक पूर्त्ति ओ केनिहार
विचक्षण, आत्म-तत्त्वदर्शी विद्वान रहैत छलथिन, जाहि कारणें सद्गुणेक प्रति आकर्षणो उत्पन्न
होइत छलैक।



सद्गुणेक विकाससँ विवेकक जन्म होइत छैक। विवेककें पुस्तकीय ज्ञानसँ नहिं, अपितु
सद्धिचारसँ सम्बन्ध छैक। सद्विचार उत्पन्न होइत अंक शिवसंकल्पसँ। आहार-निद्रा-भय-मैथुन
आदि पाञ्चभौतिक तत्वसँ प्रादुर्भूत प्राणिमात्रमे समाने रूपमे विद्यमान रहैत छैक, किन्तु
प्राणिमात्रमे सर्वश्रेष्ठ जें हेतु मनुष्य होइत अछि तें ओकरा प्राकृतिक दौर्बल्यपर विजय प्राप्त कऽ
एक एहन अलौकिक गुणक विकास करबाक दिस अग्रसर होयब आवश्यक छैक जे ओकरा
'स्व'क परिधिसँ बाहर कऽ समस्त मानव जाति अथवा अखिल-जीव-लोकक कल्याणार्थ
नियोजित कऽ सकैक। तखने ओ अपन मानव जीवनकें सार्थक कऽ सकैत अछि। तें वेद मे
'तन्मे मनः शिव सच्ल्पमस्तु' कहल गेल अछि।



विद्याक सम्बन्धमे भारतीय मान्यता रहल अछि 'सा विद्या या विमुक्तये' अर्थात् अहंच्र्रिक


जे क्षुद्र परिधि, प्राकृतिक जे सहजात दुर्बलता, संसर्ग दोषसँ उत्पन्न जे स्वार्थक संकीर्णता तथा
अज्ञान ताहिसँ मुक्तिए विद्या प्राप्तिक मूल उद्देश्य रहल अछि।



दोसर ठाम कहल अछि 'विद्ययाऽमृतमश्नुते' विद्या द्वारा अमृतत्व व्याप्त होइछ छैक आ
अमृतत्व तखने प्राप्त कऽ सकैत अछि जखन 'स्व'क परिधिसँ बाहर भऽ सकय, अहंकारसँ मुक्त
भऽ सकय। जाहि ठाम विद्याप्राप्तिक एहन महान् उद्देश्य राखल गेल छलैक ताहिठाम वत्र्तमान
युगमे विद्याक की उद्देश्य रहि गेल अछि से अवश्य चिन्तनीय थीक।



महाकवि श्रीसीतारामझा लिखन छथि--



'पेट भरक टा हेतु क्यो पढ़ि जनु होथु हरान

ओ संगहि सिरजैत छथि सबहिक श्री भगवान।'



यद्यपि एहि भौतिकता-प्रधान युगोमे सद्गुण आदिक प्रति प्रत्येक व्यक्तिक अन्तरमे श्रद्धा
विद्यमान छैके; कोनो चरित्रवान व्यक्ति, जे भौतिक दृष्टिएँ साधन-हीन अछि, निर्धनतामे अपन
जीवन यापन कऽ रहल अछि, जकरा बाह्र चाकचिक्यसँ नितान्त दूरे रहय पड़ैत छैक,
सामाजिक प्रतिष्ठा ओ नहि प्राप्तकऽ पबैत अछि, किन्तु से सब होइतो, भने वातानुकूलित
भवनमे रहैत होथि, चेभरलेट कारसँ चलैत होथि, रत्न-जटित अङुठी पहिरैत होथि, रेशमी
वस्त्राच्छादित रहैत होथि, लाख टाका बैंक बैलेन्स रखैत होथि, किन्तु ओहि निर्धन व्यक्तिक
चारित्रिक बलक सोझाँमे, नहि प्रगट रूपमे, भीतरो-भीतर, अपनाकें हीन मानिते छथि, तथापि
स्वयं ओहि सद्गुणक आश्रयण कऽ अपनामे अथवा अपन उत्तराधिकारीमे सद्विचार ओ
सद्विवेकक विकास करबाक ओ करयबाक दिशामे डेग उठयबासँ अपनाकें अक्षम, असमर्थ पबैत
छथि। तकर मूल कारण थीक शिव सच्ल्पक अभाव।



आइ चारू भागसँ ध्वनि आबि रहल अछि जे जाहि विद्यार्थी वर्गपर देशक भविष्य निर्भर
अछि, ताहि वर्ग मे अनुशासन पालन करबाक स्थानपर अनुशासनक उल्लंघन करबाक प्रवृत्तिक
विकास तीव्रतासँ भऽ रहल अछि। एहि हेतु देशक नेतृत्व कैनिहार कर्णधार लोकनि घोर चिन्ता
व्यक्त करैत छथि। एकर निराकरणक हेतु अनेक प्रकारक आयोग, समिति आदि गठित होइत
अछि; अनेक प्रकारक गोष्ठी आयोजित होइत अछि आ एहि हेतु दोषारोपण कयल जाइत अछि
वत्र्तमान शिक्षा-पद्धतिपर तथा शिक्षक समुदायक योग्यतापर, किन्तु ई नहि सोचल जाइछ जे
अनुशासन शब्दक वास्तविक तात्पर्य की होइछ। आजुक समाजक अपनाकें निर्माता कहनिहार,
राष्ट्रीय शासन यन्त्रकें संचालित कैनिहार तथा जनिका अभिभावकत्वमे आजुक छात्र
स्वाविकासक प्रक्रियामे अपनाकें संलग्न कयने छथि, हुनका समक्ष ओ अपनाकें कोन आदर्श
रूपमे उपस्थित कऽ रहलाह अछि, अपन पारिवारिक ओ सामाजिक परिवेश केहन बना कऽ
रखने छथि।



पहिने शासन तखन ओहिमे 'अनु' उपसर्गक योगसँ अनुशासन शब्द निष्पन्न होइत अछि।
अतः अपेक्षित अछि जे जाहि पवित्रताक, जाहि उत्तर-दायित्वक, जाहि अनुशासन शीलताक,


जाहि चारित्रिक सबलताक आशा अपन प्रभविष्णु छात्र समुदायसँ देश, जाति, समाज करैत
अछि तेहन परिवेशक निर्माणमे अपनाकें पहिने संलग्न करय। ओ पवित्रता, ओ
अनुशासनशीलता, ओ चारित्रिक सबलता शासन यन्त्रमे विकसित हो। तकरे अनुगमन वस्तुतः
अनुशासन कहाओत।



वस्तुतः अनुशासनक पालन ने पुस्तकीय शिक्षा द्वारा, ने दण्ड विधान द्वारा आ ने मंचस
ठाढ़ भऽ उपदेश-वाक्य छँटलासँ संभव भऽ सकैछ। ओ अभ्यासक वस्तु थीक, जकर विकास ने
एक दिनमे अथवा कोनो निश्चत स्थान ओ अवधिमे सीमित राखि संभव अछि, अपितु यदि हम
ककरोसँ अनुशासन पालन करबऽ चाहैत छी तँ हमरा अपन व्यक्तिगत व्यवहारमे अनिवार्य रूपें
आनय पड़त; ओकरा समक्ष अपनाकें अनुशासित देखबऽ पड़त।



अनुशासन तँ एक क्रम थीक, एक पद्धति थीक, जकर क्रमिक विकास भऽ सकैछ, जाहि
पद्धतिसँ जीवनक विकासमे स्वतः सौन्दर्य उद्भूत होइत छैक। अर्थात् अनुशासन मानसिक
स्वस्थता थीक जे स्वस्थता

लाभ कयला सन्ता हम अपनाकें समाजक समक्ष अनुकरणीय व्यक्तिक रूपमे उपस्थित कऽ
सकत छी। मानसिक स्वस्थता मनकें सद्वृत्ति दिस नियोजिते कयलासँ भऽ सकैछ।



मनकें शिव संकल्पक हेतु अनुप्रेरित करैत रहब, सेहो शाब्दिक मात्र नहि, अपितु क्रिया
द्वारा, तखने ओहिमनमे उत्पन्न विचार विवेक पूर्ण भऽ सकैछ आ विवेक पूर्ण विचार मनमे अयले
सन्ताँ संकल्पक हेतु दृढ़ता आबि सकैछ। यदि अपन आचरण द्वारा साधन अल्प रहितो हम
अपनाकें प्रसन्न ओ सुखी राखि सकब तँ स्वतः हमरा द्वारा सृष्ट वातावरणमे पालित भेनिहार
बालक हमर अनुकरण करत आ ओकर जीवन स्वतः अनुशासित भऽ जयतैक।



की अपना ह्मदयपर हाथ राखि आजुक अनुशासन-हीनताक हेतु सार्वजनिक मंचसँ चिन्ता
व्यक्त कैनिहार आ शिक्षक समुदाय तथा शिक्षापद्धति पर दोषारोपण कैनिहार आत्म-निरीक्षण
करबाक हेतु उद्यत छथि? की अपना अन्तरकें हँथोड़िकऽ ओ देखबाक हेतु प्रस्तुत छथि जे ओ
शिवसंकल्प हुनका अन्तरमे छैनि अथवा नहि?



ई सब होइतो छात्र समुदाय अपनाकें सर्वथा निर्दोष नहिं सिद्ध कऽ सकैत छथि। कारण
जखन ओ अपन सुन्दर भविष्यक निर्माणमे लागल छथि तँ समाजमे विनु विद्या प्राप्त कयनहुँ
एहन लोकक अभाव नहि देखबामे औतनि जे सांसारिक सुखसुविधामे कतेको विद्या--विभव
सम्पन्नो व्यक्तिसँ ओ आगाँ छथि। अतः सांसारिके सुखसुविधा प्राप्त करब विद्या अर्जनक उद्देश्य
नहिं भऽ सकैछ। निश्चित रूपें एहूसँ किछु उत्तम वस्तु एहि संसारमे छैक जे ओ विद्ये द्वारा
प्राप्त कऽ सकैत छथि। तें ओहि शिव संकल्प दिस अपनाकें जीवनमे अग्रसर करबाक हेतु एक
एहन पद्धतिक अनुसरण करक चाहिऐनि जे लक्ष्यधरि लऽ जाइनि, जीवनक श्रेय प्राप्तिमे
सहायक होइनि आ सैह थीक अनुशासन जकर उपेक्षा कथमपि वांछनीय नहि।



.. .. .. ..




पीअर आँकुर

श्री ब्राजकिशोर बर्मा



से ओ खूब विशाल ढेंग छल। कतोक दिन सँ पड़ल। बेश चाकर-चौरस आ' भरिगर।
से ढेंग आइ सहसा उठा लेल गेल। देखैत छी ओकरा तर मे मुरझायल, मरइमान पीयर-पीयर
घास आ' कते तरहक सुन्नर-सुन्नर बीजक पीयर-पीयर आँकुर। मुदा सभटा मिरमिराइत।
आलोक लेल बेलल्ला भेल। आइ जखन ओ ढेंग हटि गेलैक त आँकुर सभ टुकुर-टुकुर ताकि
रहल अछि। आब एहि सभ मे नवजीवनक संचार हैतैक। ई आँकुर सभ आलोक पाबि सबल हैत
आ' रंग-विरंगक पत्र-पुष्प आ' फलक संग प्रकट हैत।



की एहिना युग-युगक दासत्वक ढेंग हमरा लोकनिक धरतीक प्रवृत्तिक आँकुर कें नहि
दबने रहल? की हमरालोकनिक जन-समाजक उच्चभावनाक आँकुर आलोकक लेल बेलल्ला
होइत युग-युगसँ मिरमिराइत नहि रहल?



ई धरतीक प्रवृत्ति की? आ' ओकर आँकुर ककरा कहब?



गेल छलहुँ एकबेर सरकस देखैक हेतु। बाघ-सिंह आदि हिंरुा पशुक बड़े भयानक खेल
देखल। रस्सा

पर शून्य मे बड़े-बड़े डेराओन तमाशा देखल। मोटर-साइकिल, घोड़सवारी आ' अस्त्र संचालनक
एहेन दृश्य आँखिक आगू मे आयल जकरा मोन पाड़ि अखनहु काँपि जाइत छी। उत्सुकतावश
सरसियालोकनिक परिचय बुझल त ज्ञात भेल जे सभके सभ मराठा छला--गोट-गोट क।



महाराष्ट्रक भूमिक वीरताक प्रवृत्ति, गुलामीक ढेंग तर दबि सरकशक खेलक रूप मे
प्रकट भऽ रहल छल। वीरताक एहि प्रवृत्ति कैं जखन उपर्युक्त वायु-प्रकाश नहि भेटि सकलैक त
ओ लोक कैं बाघ-सिंहक भयानक खेल देखा कय सन्तुष्ट हैबा लेल बाध्य कैलक। मुदा ओ
वीरत्वक भावना मुइल नहि छल, केवल विकासक सुविधाक अभाव मे मिरमिराइत छल। ओहू
गुलामीक ढेंग तर जँ दोग-दाग भेटि गेलैक तँ भगवान तिलक सनक व्यक्तित्व, आलोकक
अन्वेषण मे बहराइत प्रयत्न करैत, होमरूल आन्दोलन आ' गीता रहस्य सन पुष्प आ' फल
देलथिन्ह।



वैह सुनू सैनिकक बिगुल ! 'राइट-लेफ्ट' प्रारम्भ भय गेल। गोरखा फौज कवायद क
रहल अछि। बाघ-भालु, उभड़-खाभड़, चोटी-घाटी आ' बोन-झारक भूमि हिनका लोकनि मे
असीम साहस भरने अछि। हिनका मे अनुशासनक भावना एहि कोटिक अछि जे संसार मे कमे
ठामक लोक हिनका सभ सन आदर्श सैनिक भ पबैत अछि। मुदा विकासक असुविधाक ढेंग तर
पिलपिलाइत हिनका चपरासी, दरवान सन्तरी, होटलक नोकर आ' साम्राज्यवादी अंग्रेजक
सैनिक बनि सन्तोष करय पड़त छन्हि।




आ' लगक बात थीक। चन्द्रगुप्तक वाहिनीक जे सैनिक, वि•ाविजयिनी ग्रीक सेना कें
पराजित कैलक, जतयक वीर लोकनिक तरुआरी, समुद्रगुप्तक नेतृत्व मे समस्त आर्यावत्र्त मे
चमकल, जतयक वीर भावना शेरशाहक आगू-आगू चलि दिल्ली पर विजय पौलक, जाहि
ठामक स्वातन्त्र्य-प्रियता सन् सत्तावन मे वीर कुँअर सिंहक कंठ सँ रणहुँकार बनि प्रकट भेल
ओहि आरा, छपरा आ' पटना जिलाक सैनिक भावनाक आंकुर परतन्त्रताक ढेंग तर नेता
दबकल रहल जे हुनकालोकनि कें, कान्सटेबुल, जमादार, दरवानजी आ' जमीन्दारक मजकूरी
सिपाही बनबा लेल बाध्य होमय पड़ल।



मध्यप्रवेशक एकटा गाम मे छलहुँ। किछु साहित्यिक बन्धुक अनुरोध पर रामलीला देखय
गेलहुँ। अरे ई की? रामलीला बला त सभकेओ गौंवे-घरुआ छलाह--अपने जवारक लोक। गाम
परक महिष-मोढ़ सभहक मुँह सँ आन प्रान्तक स्टेज पर गीत गोविन्द, विद्यापति, तिरहुत आ'
बटगमनी सुनि, आन भाषा-भाषी कें मुग्ध भऽ भऽ लोटि देखलहुँ। नयनाभिराम एÏक्टग, कोकिल
कंठ, साधारण स्टेज, कुल तीन गोट चिर्री-चोंथ भेल परदा, बिनु स्कूलक मुँह देखने ऐक्टर,
जर्जर वस्त्र-भूषा--मदा हजार-हजार दर्शकक मन्त्रमुग्ध भीड़।



मिथिलाक माँटि-पानि मे युग-युग सँ साहित्य, कला आ' दर्शनक बीज संचित छैक
जहिया कहियो विकासक सुविधा भेटलैक ओ बीज, वृक्ष बनि अयाची, मंडन वाचस्पति,
उदयनाचार्य आ' विद्यापतिक रूप मे पत्र-पुष्प सँ युक्त भेल। दर्शन, कला ओ साहित्यक फल
तकरहि परिणाम थीक।



मुदा गुलामी आ' प्रतिकूल वातावरणक दाबनि पड़ि गेला सँ ओहि अमर बीज सभहिक
आंकुर पीयर पड़ि गेलैक तथा ओकर बाढ़ि अवरुद्ध भऽ गेलैक अछि।



विकसित नहि भऽ सकबाक कारण ओ रामलीला बला नटकीया, भनसिया, कीर्त्तिनिया
आ' कथावाचकक रूप लऽ लेलक तथा एहि भूमिक चित्रकला कोबरक भीत पर कनैत रहि
गेल; नृत्यकला कें मनचुभ्भी आ' जालिमसिंहक रूप लेमय पड़लैक; साहित्य एकर नारीक कंठ
सँ समदाउनि बनि कानि उठलैक;

संगीत ओकर डोमक ओड़नीक स्वर मे कुसुमा-दोनाक विलाप बनि चित्कार क उठलैक,
ज्योतिष एकादशी ओ अतिचारक निर्णय करैत कुण्ठित भऽ गेलैक आ' दर्शन श्राद्धस्थली मे
शास्त्रार्थ करैत-करैत हपसै लगलैक।



अहाँक की वि•ाास अछि?--एकटा वृद्ध विद्वान कें पुछलिऐन्ह-स्वतंत्र भारतकें मिथिलाक
की देन हैतैक?



वृद्ध मुस्कैला--जँ विकासक समुचित अवसर भेटैत मिथिलाक धरतीक ई आंकुर सभ


कवि, दार्शनिक, अभिनेता, लेखक, चित्रकार ओ कलाकारक रूप मे प्रस्फुटित भऽ उठत। फेर
एकर पुष्पक मधुरगन्ध संसार भरि मे व्याप्त भऽ उठत।



ओ कनियें ठमकि कऽ कहलन्हि--सभ सँ बेशी प्रगति करती मैथिलानी। सीता, गार्गी
आ' भारतीक परम्परा नष्ट नहि भऽ गेलैक अछि--केवल सुषुप्त छैक। ओकरा जाग्रत हैबा मे
कनियो काल नहि लगतैक।



अंग्रेज सभ विभिन्न स्थानक माँटि-पानिक एहि आंकुर विशेष कें बहुत हद धरि चिन्हैत
छल। ओ एहि स्थानीय विशेषता सँ अपना ढंग पर लाभो उठौलक। सिक्ख कें भारतक
खज़्हस्त, गोरखा कें राइफलधारी, भोजपुरी कें पुलिस, मद्रासक शास्त्रधुरीण कें आइ0 सी0
एस0, बंगालक भद्रलोक कें किरानी आ' स्टेशनमास्टर बनौलक। मुदा ठोकि-ठाकि क ओतबे
दूरधरि उठबाक अबसर देलकन्हि जतेक दूर धरि ओ ओकरा लेल उपयोगी भ सकितथि। हँ-ई
भिन्न बात जे एहि देशक संस्कृतिक जड़ि, दर्शनक माँटि मे एतेक गँहीर तक गेल छलैक जे एहू
विपन्न स्थिति मे महात्मा गाँधी, महाकवि टैंगोर, महावैज्ञानिक रमण आ' महादार्शनिक
राधाकृष्णक आविर्भाव भऽ सकलन्हि जखन कि आन उपनिवेश--अफ्रिका, आस्ट्रेलिया आ'
कनाडा सनक देश एकोटा उल्लेखनीय कवि, कलाकार, वैज्ञानिक आ' दार्शनिक नहि द
सकल।



मुदा आइ त अंग्रेज नहि अछि। गुलामीक भरिगर ढेंग आब हटि गेल अछि। देखैत छी
ओकरा तर मे सुन्नर-सुन्नर बीजक आंकुर। मुदा साहित्य, दर्शन आ' कलाक ई आंकुर युग-युग
सँ अन्हार मे रहैत-रहैत कनेक अधिक पीयर पड़ि गेल अछि--मिरमिरा रहल अछि।



एहि आंकुर सभलेल आ लोक चाही, जल चाही आ' खाद चाही। से कोना प्राप्त हैतैक?



सभसँ पहिने समाज मे ई चेतना चाही जे आलोक, जल आ' खादक अभाव मे ई आंकुर
सभ नष्ट भ जैत। बिना उपयुक्त वातावरण नहि भेटने ओकर विकास नहि भऽ सकतैक।



एहन आंकुर सभक विकासक लेल सभ सँ आवश्यक छैक स्थानीय वि•ाविद्यालय सभक
जाहि मे ओहि ठामक विशेषता सँ युक्त विषय कें सभ सँ अधिक प्रोत्साहन देल जा सकैक।
मगध वि•ाविद्यालय मे सैनिक प्रमुखता आ' मिथिलावि•ाविद्यालय मे कला आ' दर्शन विषयक
प्रधानता, नहि जानि कतेक 'महान' के उत्पन्न क सकत।



हमर कथनक ई अर्थ कथमपि नहि जे मिथिला मे करियप्पा अथवा नेपालक गोरखा मे
विद्यापति नहि भ सकैत छथि। मानव अद्भुत आ' असाधारण जीव थीक। ओ कतै, कखन आ'
कोना, कोन रूप मे अपन विकास करत से कहब कठिन। मुदा विभिन्न माँटि-पानि मे जे स्थानीय
विशेषता होइछ तकरा अस्वीकार नहि कयल जा सकैछ। केरलक नीरिकेर-कुंज आ' मिथिलाक
आम्र-वन अपन-अपन विशेषता क सहज परिणाम


थिकैक। ई के कहत नहि।



से वैह देखियैक ने, कला, साहित्य ओ दर्शनक अमर-बीजक पीयर-पीयर आंकुर।
पिलपिलाइत, क्षीण आ' मौलायल--जेना चिकरि-चिकरि क कहि रहल हो--स्थान, अधिक स्थान
चाही; आलोक, अधिक आलोक चाही।







संस्कृति

श्री दामोदर झा, एम0 ए0



आइ-काल्हि, संस्कृतिक चर्चा अत्यधिक भए रहल अछि। कतोक व्यक्ति प्राचीन
संस्कृतिकेर पुनरुत्थानक गप्प कए रहलाह अछि, तँ किछु प्रगतिशील लेखक लोकनि अव्र्वाचीन
संस्कृतिक निम्र्माणक हेतु सचेष्ट छथि। सूनल अछि जे यूरोपीय ओ अमरिकीय संस्कृति
भौतिकवादी अओर पूर्वीय देशकेर धाÐम्मक अछि। यदि संस्कृति राष्ट्रीयताकेर पय्र्यायवाची हो तँ
संस्कृतिकेर क्षेत्र अतिशय संकुचित भए जाइछ। एतबए नहि, हम तँ इहो सुनल अछि जे
भारतीय संस्कृति धार्मिक, आधुनिक जर्मनीकेर अधिनायकवादी एवं संयुक्तराष्ट्रकेर प्रजातन्त्रात्मक
संस्कृतिकेर परिचय भेटैछ--बिहारक संस्कृति, बंगालक संस्कृति एवम् मिथिलाक संस्कृति।



उपरोक्त कथनकेर आधार पर आब ई बुझवामे भाज़्ठ नहि जे संस्कृतिकेर सम्बन्धमे
लोकक विभिन्न धारणा छैक। जखन बहुतो विद्वानहु लोकनिक विचार एतद् सम्बन्धमे स्पष्ट एवम्
सुव्यवस्थित नहि, तखन जन साधारण कें एकर रूप-रेखाक समुचित ज्ञान होएबाक सम्भावने
कोन? ई सत्य; जे कोनहु समूहकेर संस्कृति ओकर कला, धर्म एवम् रीति-नीति सँ घनिष्ट
सम्बन्ध रखैछ; परञ्च, संस्कृति ओहि समूहकेर धर्म एवम् कलात्मक भावने धरि सीमित नहि,
एकर क्षेत्र बड़े व्यापक सज़्हि क्रियाशील अछि। ई कोनहु समूहकेर विकाशोन्मुख धाराकेर प्रतीक
थिक, मानव जाति वा ओहूसँ भिन्न कोनहु समूह, विशेषतः संस्कृतिक इतिहास ओकर प्रगतिशील
सामाजिक अवयव केर इतिहास थिक। संस्कृति ओ एकर विकासकेर प्रश्न पर विचार करबासँ
पूर्व, एही सम्बन्ध मे हमर विचारकेर स्पष्टीकरण आवश्यक। अंगरेजी मे संस्कृति शब्दकेर स्थान
पर कलचर (क्द्वथ्द्यद्वद्धड्ढ) शब्द प्रयुक्त होइछ। बहुतो यूरोपीय तथा अमरिकीय उद्भट विद्वान
लोकनि एहि 'कलचर' शब्द केर व्याख्या कए एकर अवयव स्थिर करबाक प्रयत्न कएल अछि,
मुदा हिनकहु लोकनिक परिभाषा परिष्कृत, परिमार्जित एवम् सन्तोषजनक नहि। हँ, एतेक धरि
अवश्य जे हमर विचारकें विशेष सुव्यवस्थित सज़्हि सुदृढ़ बनएबा मे एकर किछु प्रश्रय सापेक्ष !
रावर्ट रेडफिल्ड, शिकागों वि•ाविद्यालयीय समाज-विज्ञानकेर अध्यापकक मते,--"संस्कृति मानब
विशेष समूहक ओहि रूढ़िगत धारा सभैक एक संगठित रूप थिक, जकर आभास ओकर जाति
परम्परागत कला-कौशलमे भेटैछ।" हिनक ई परिभाषा दोष युक्त होइतहुँ संस्कृतिक रूप-रेखा
स्थिर करबामे सहायक भए सकैछ। हिनक परिभाषामे प्रथम, दोष देखना जाइ'छ जे ई
संस्कृतिक क्षेत्र मानव समूहेधरि स्थिर कए देल अछि, परञ्च ई दोश गौण कहल जाए सकैछ


कारण जानवरहुमे अपन संस्कृति होइत छैक अवश्य, मुदा तकर विकसित ओ संगठित रूप
मानव समूहेटामे उपलब्ध होइछ। प्रधान रूपें ई दोष कहल जाए सकैछ जे ई संस्कृतिक
कलात्मक अज़्हि पर विशेष जोर देल अछि, मुदा मूलतत्त्वकेर आभास हिनक परिभाषाकेर
अन्तर्गते भेटि जाइछ। ई थिक मानव समूहकेर रूढ़िगत धारा, जे परम्परासँ चलि आबि रहल
अछि। परम्परासँ सम्बन्धित होएबासँ हमर ई तात्पर्य जे संस्कृति एक विशिष्ट समूहकेर ओहि
धारा

सभैक संगठित रूप थिक जे युगक प्रवृत्यानकूल बाह्ररूपें परिवर्तित होइतहुँ मूलमे पूव्र्ववते स्थिर
रहैछ।



अमरिकाक प्रसिद्ध समाज शारुाी 'टाइलर'क परिभाषा किछु विशेष संतोषजनक अछि।
हिनक विचारें संस्कृतसँ बोध होइछ विशिष्ट समूहकेर ज्ञान, वि•ाास, कला नैतिकता, नियम,
प्रचलित विधि व्यवहार एवम् अन्यो कोनहु गुण जे मनुष्य समूह-विशेष सँ प्राप्त करैछ। हिनक ई
परिभाषा व्यापक अछि किऐक तँ संस्कृतिक मूल आधार समूह वा समाजक महत्ता पर एहिमे
विशेष जोर देल अछि। रेड फिल्ड, टाइलर वा अन्य विद्वानहु लोकनिक अनुसारें संस्कृतिक
आधार सामाजिक गुण विशेष थिक। संस्कृति समाजक ओ मूलधारा थिक जे अनेक युगसँ
अबछिन्न गतिएँ प्रवाहित होइत चल आबि रहल अछि, आओर जे अपन परम्पराकेर प्रबल
शक्तिसँ प्रत्येक युगक छोट-छीन धाराकें आत्त्मसात् कएलक अछि। उपरान्त दुइगोट निष्कर्ष
भेटैछ--



(1) संस्कृति समूहकेर रूढ़िवादी धारा थिक।

(2) संस्कृतिक विकास, समाजक विकासक अन्तर्गत निहित अछि तें हेतु संस्कृति
दुइगोट परस्पर विरोधी धारा केर समन्वय थिक।



आब हमरा ई देखवाक थिक जे कोनहु विशिष्ट समूह केर संस्कृति सँ व्यक्ति विशेषकेर
सम्बन्ध कोनरूप अछि, ओकर व्यक्तित्व केर विकास कतेक दूर धरि एक निश्चित संस्कृतिक
अन्तर्गत भऽ सकैछ? दोसर इहो विचारणीय थिक जे समूहकेर संस्कृति कहाँ धरि एकर
सामाजिक प्रगति मे साधक वा बाधक भए सकैछ?



प्रथम प्रश्न किछु विशद् अछि कारण एकर सम्बन्ध जीव-विज्ञान, समाज-शास्त्र एवम्
मनोविज्ञानसँ अछि। कोनो व्यक्ति केर व्यक्तित्वक विकासमे संस्कृतिक कतगोट हाथ रहैत छैक,
एकर उत्तर सरल नहि, किएक तँ मानव चरित्रकेर संगठनमे ओकर जन्मजात संस्कार,
भौगोलिक वातावरण, सामूहिक जीवन ओ संस्कृति आदि सभैक महत्वपूर्ण सम्मिलित योगदान
रहैछ। एतबए नहि, ई चारू ताहि रूपें परस्पर रहैछ जे कोनहु एक गोटकेर भाग स्थिर करब
कठिन प्रायः अछि। परञ्च मानव केर व्यक्तित्वक विकासमे संस्कृतिक स्थान प्रमुख रहैछ एकर
त आभास भेटिए जाइछ।



कहल जाइछ जे साधारणतया एक भारतीय भाग्यवादी आओर अंगरेज समयक विशेष
दायित्व रखनिहार होइछ। एहि स्थान पर आबि चरित्र-विशेषताकेर विश्लेषण आवश्यक। एक


भारतीय भाग्यवादी अछि जकर विवेचना कएलाक पर ज्ञात होइछ जे ओकर चरित्र गुणमे
जन्मजात संस्कार, भौगोलिक वातावरण। सामूहिक जीवन एवम् संस्कृति आदि सबहिक हाथ
अछि ओ जन्म लैत अछि तथा अन माए-बापकेर गुणकें सूक्ष्मरूपें ग्रहण करैछ। ओकर माए-बाप
जँ दुर्बल मनःस्थितिक रहैतक तँ विशेष सम्भव जे सन्तानों दुर्बल मनोबृत्तिक होएबेटा करतैक, ई
भेल जन्म विशेष केर कारण ! किछु बढ़ला ओ ज्ञान भेलाक पर देखैछ जे जनसमूहकेर जीवन
विशेष रूपसँ वर्षा पर निर्भर करैछ आओर एहि भागक वर्षा अवलम्बित अछि वायुपर जे
अनियमित अछि। कहिओ जँ अतिवृष्टिएँ दाहर भए जाहत छैक तँ कहिओ अनावृष्टिएँ रौदी।
दिनराति भाग्यक ई झिझिर-कोना देखैत-देखैत ओकरा पर भाग्यवादक अमिट छाप पड़ि जाइत
छैक। ई भेल भौगौलिक कारण ! एहि सँ ई नहि बुझबाक थिक जे चरित्र केर एहि विशेषता केर
गठनमे सामूहिक जीवनक कमम हत्व अछि। ई एहि रूपक एकगोट समूहक अज़् थिक जे
मूलतः दार्शनिक अछि, जीवनक निःसारता, क्षणभंगुरता एवम् परमात्माकेर सार्वभौम सत्तामे
आस्था छैक जकर कोनहु परिवारक एक सदस्यक असामयिक निधन पर ओ सुनैछ--'ई•ारेच्छा
गरीयसी' ओ ई नहि सुनैछ जे ओकर मृत्यु समुचित चिकित्सादिकेर अभावें भेलैक अछि। अतः
भाग्यवादी होएब ई व्यक्तित्वकेर एक गुण प्रादुर्भूत होइछ सामूहिक, भौगोलिक एवम् जन्मजात
गुणकेर

सम्मिलित प्रभावकेर कारणे। ई कहब कठिन जे एहि मध्य ककर कतेक हाथ छैक।



आब लेल जाओ दोसर उदाहरण--हम पूर्वहि कहलहुँ अछि जे अंगरेज समयक बड़
पक्का होइछ। एहू जातीय-गुणक मूलमे एहि जातिक भौतिक एवम् सामूहिक गुणनिहित अछि।
एकर घनिष्ट सम्बन्ध घड़ीसँ अछि। हमर कहबाक अभिप्राय ई नहि जे जकरालग घड़ी रहैछ
ओकरा सभमे समयकेर मूल्यक भावना रहितहि छैक। मुदा एतेक धरि मानए पड़त जे समयक
मूल्य बुझबाक हेतु ई एकगोट प्रमुख एवं आवश्यक साधन थिक। तें ई कहब अनुचित नहि जे
अंगरेजक जातीय गुणकेर विकास ओ ओकर व्यक्तित्व निर्माण ओहि समूहक भौतिक गुण निर्भर
करैछ। संस्कृति आओर समूहमे परस्पर कोनरूपक सम्बन्ध अछि तकर आओरो पूर्णतया
स्पष्टीकरण एहीसँ भए जाएत। जे केओ भारतीय पाश्चात्य देशकेर भ्रमण कएल अछि एवम्
ओकर सबहिक सम्पर्क मे रहबाक संयोग प्राप्त कएल अछि ओहो लोकनि एहि विषय पर प्रकाश
देल अछि जे ओकरा सभक जीवन भौतिकता प्रधान छैक। एकर विपरीत ई कहल जाइछ जे
एक भारतीय दार्शनिक आओर धार्मिक होइछ। भारतीयक एहि धार्मिक व्यक्तित्वक निम्र्माणमे
सभसँ पैघ हाथ सांस्कृतिक जीवन कें छैक। उदाहरणस्वरूप एक ब्रााहृण परिवारक नवजात
शिशुक चरित्र निम्र्माण कोनरूपें होइत छैक सव्र्वप्रथम तकरहि अबलोकन कएल जाओ। एक
ब्रााहृणक नेना आँखि-पाँखि भेला पर देखैछ जे ओकर पिता सूय्र्योदयाहुँसँ पूर्व ब्रााहृणमूहूर्तमे
उठि नित्य-प्रति अञ्जलि उठाय सूर्यक आराधना ओही मन्त्रें करैछ जाहि सँ कतोक हजार वर्ष
पूर्व पुरुषा करइत आएल छथिन्ह, पुन देखैछ हुनका पवित्रासन पर बैसि स्वस्थचित्तंा जप तपमे
तल्लीन। अपन माय दिशि देखैछ, आइ रविक अनुष्ठान, काल्हि मंगलवारी, परसू हरिवासरक
उपवास ! एवम् क्रमे व्रतक एकगोट धारी। पितासँ शिक्षा पबैछ 'पितृदेवो भव मातृदेवोभव' नेनाक
ह्मदय कोमल होइत छैक दिन-प्रतिदिन धार्मिकताक भावनासँ ओतप्रोत होइत ओकरा ऊपर अपन
अमिट आधिपत्य स्थापित कए लैछ। एकगोट अंगरेज वा अमरीकनकेर सांस्कृतिक जीवन होइत
छैक ठीक एकर विपरीत।




कतिपय पाश्चात्य विद्वान तँ इहो दावा करइत छथि जे मानव-स्वभाव अपरिवर्तन शील
अछि, परञ्च ई सिद्धान्त भ्रमसँ रिक्त नहि। हुनक कथन छैन्हि जे मानव स्वभाव तथा ओकर
व्यक्तित्वकेर निर्माण सांसारिक वातावरण केर भित्तिपर होइत छैक। एकर ई अर्थ कदापि नहि
जे जँ केओ मनुष्य लोभी अछि तँ ओकर लोभ पूर्णतया विलुप्त भए जएतैक अपितु लोभकेर
मात्रा ओकर साधन, प्रकट होएबाक रूप सामूहिक जीवनक अनुसारें होएतैक। अतः हम एहि
निष्कर्षपर पहुँचैत छी जे मानव चरित्रकेर संगठनमे सभसँ पैघ हाथ संस्कृतिक छैक। यद्यपि
संस्कृतक महत्व स्वीकार करितहुँ, व्यक्तित्व केर विकासक हेतु कोनो प्रचलित रीति परम्पराकेर
विरोध आवश्यक। भारतवर्ष केर कतोक भागमे बाल-विवाह प्रचलित अछि। ई हिनका लोकनिक
सांस्कृतिक जीवनकेर एकगोट अंगहि भए गेल अछि परञ्च आब ई निर्विवाद सिद्ध भए गेल
अछि जे बाल विवाह निश्चितरूपें पूर्ण विकासमे बाधक अछि। एहि अवस्थामे हमर कत्र्तव्य की?
तर्क कयला सन्ताँ हम एहि निष्कर्षपर पहुँचैत छी जे जँ बालविवाह व्यक्तित्वकेर विकासमे बाधक
अछि तँ कदापि ई समूहक मूलधारा नहिं भय सकैछ मूलधारा जे हजारो वर्षसँ विद्यमान अछि,
विकासोन्मुख हएत, बाधक नहि। ओ संस्कृति मृत-प्राय भए गेल जकर मूल धारा पतनोन्मुख
छल अछि, निर्विवाद 'वाल विवाह' सन घातक धारा बादक रुाोत थिक जकर नाश कएल जाए
सकैछ। कोना? एकर उत्तर हमर दोसर प्रश्नक उत्तरमे निहित अछि।



व्यक्तित्वकेर विकास प्रश्न हमरा द्वितीय प्रश्नपर विचार करबाक हेतु विवश करैछ--कोनो
समूहकेर संस्कृति कतेक दूर धरि सामाजिक प्रगतिमे बाधक वा साधक भए सकैछ? एहि
प्रश्नकेर उत्तर सांस्कृतिक विकासेमे निहित अछि। कोनहु समूहकेर संस्कृतिक विकास कोन
सिद्धान्तपर होइत अछि ई जनबाक हेतु आवश्यक जे हम ओहि समूहकेर सांस्कृतिक इतिहासक
अवलोकन करी। पहिने भारतीय संस्कृति लेल जाओ। संस्कृतिक उद्भव आइसँ हजारो वर्ष पूर्व
मन्त्रद्रष्टा ऋषि लोकनिक द्वारा प्रकृतिक शान्त वातावरण मे भेल,

परञ्च हमर संस्कृतिक आधार सामाजिके जीवन रहैत आएल अछि। जेना-जेना हमर सामाजिक
जीवनकेर विकास होइत गेल आओर हमर आवश्यकताक पलरा उनटैत पुनटैत रहल, हमर
सांस्कृतिक विकासो तदनुसारे होइत आएल। संस्कृतिक विकासक प्रथम सोपान थिक
व्यावहारिकता। हमर संस्कृतिक सभसँ पैघ विशेषता रहइत आएल अछि आवश्यकतानुसार अपन
ब्रााहृरूपमे सीखल अनकहुसँ सीखल। हम बौद्ध, जैनकेर संस्कृतिकें आत्मसात् करइत, ग्रीक-
यवन आओर अंगरेजहुँकेर कतोक व्यवहारादि सीखल इएह कारण अछि जे हमर संस्कृतिकें
कोनो अन्धर-बिहाड़ि हिलाए-डोलाए नहि सकल अछि, अपितु स्तम्भके आओरो बलिष्ठे
बनओलक अछि। हमर संस्कृति महासागर थिक, जाहिमे अनेको दहाइत भसिआइत टुटपुजिया
धारक जलसंस्कृति सभ आबिकें विलीन भए गेल अछि। हँ, तखन, संस्कृतिक रक्षाकेर प्रश्न
ओकर विकाससँ सम्बन्धित अछि। जखन समूहक नवीन धाराकेर संख्या रूढ़िगत प्राचीन धाराक
अपेक्षा अधिक भए जाइछ तहिखन संस्कृतिकेर विकास होइत छैक। नवीन धाराक उद्गम होइछ
की तँ नवीन चिन्तन, अनुसन्धानसँ वा अन्यान्य संस्कृतिक संसर्गसँ। संस्कृतिकेर विकास वा
ह्यास चक्रमेमिक्रमेण होइतहि रहइत छैक ओ यथापूव्र्वे स्थितिमे कदापि नहि रहि सकैछ। अतः
जखन कोनो समूहकेर संस्कृतिक कोनहु रूढ़गत धारा व्यक्तित्वक विकासमे बाधक भए जाइछ,
तखन ई आवश्यक जे हम अन्य प्रगति शील धाराकेर संसर्गसँ नूतन धारा उत्पन्न करी। एहि


नूतन धाराकेर प्रादर्भावमे राष्ट्रीयता वा धम्र्मक प्रश्न आत्मवाती सिद्ध हएत। हमर संस्कृतिक
मूलधारा जे अनादि कालसँ प्रवाहित भए रहल अछि, अन्य संस्कृति वा ओकर गुण सभक ग्रहण
कएलासँ नष्ट कदापि नहि भए सकैछ। आब हमर संस्कृतिक क्षेत्र कथमपि संकुचित नहि भए
सकैछ। हमर संस्कृति ने कोनहु वर्ग विशेषक हएत ने क्षेत्र विशेषहिक। आधुनिक, युगमे ब्रााहृण
अथवा अभिजातीय धरि ई संस्कृति सीमाबद्ध नहि रहि सकैछ। आओर ने मैथिल, वर्गीय
संस्कृति वत्र्तमान रूपहिमे रहि सकैछ आजुक युग वा कहिओक कोनहु युगमे ओएह संस्कृति
पुष्पित-पल्लवित रहि सकैछ जे विकासोन्मुख एवम् आवश्यकतानुसार परिवर्तित भेनिहार होअए।
आइ वि•ामानव ओहि संस्कृति दिसि द्रुतगतिसँ दौड़ि रहल अछि। मानवक दानवीय प्रवृत्ति
एतेक संघाती भए गेल अछि जे एहि सँ बचबाक आओर कोनहुटा मार्ग नहि। जाहि समूहक
संस्कृति जतेक मानव संस्कृतिक निकटवर्ती हएत ओतबहि ओ संस्कृति विकासोन्मुख एवम्
शक्तिशाली हएत। अतः हम एहि निष्कर्ष पर पहुचैत छी जे कोनहु संस्कृति-ओकरा मैथिल
संस्कृति बंग संस्कृति वा भारतीय संस्कृति कही, हमरा लोकनिक विकासमे बाधक नहि होएबाक
चाही। व्यक्तित्व विकास बहुत किछु संस्कृतिक वातावरण पर निर्भर करैछ। जतेकआगाँ धरि
हमर संस्कृतिक आदर्श मानव आदर्श हएत, ततवहि दूर धरि हमर व्यक्तित्व आओर संस्कृतिहुक
विकास हएत।



.. .. .. ..



अलका

प्रो0 श्री हितनारायण झा



अलका यक्ष लोकनिक नगरी छल। ओकर स्वामी छलाह धनपति कुबेर। मेघ दूतक मर्म-
द्रावक-प्रणय ओकरहि कोर मे पालित भेल, कान्ता-विश्लेषित-यक्ष अपन सुकुमारि भार्याक लेल
मेघ कें दूत बनाकए ओतहि पठौने छलाह। धुआँ, प्रकाश, सलिल एवं पवनक सम्मिश्रण सँ
बनल मेघ भला ओ संदेश कोना पहुँचा सकैत छल जे अत्यन्त कुशल एवं पटु प्राणोक द्वारा
पहुँचाओल जा सकैछ--



"घूम ज्योतिः सलिलमरुतां संनिपातः क्वमेघः

सन्देशार्थाः क्व पटुकरणैः प्राणिभिः प्रापणीयाः।"



अलका मे पालित प्रणय पाथरहु कें पघिला सकैत छल; मेघ तँ 'कामरूप-प्रकृति-पुरुष'
रहल। प्रकृति-पुरुषक लेल विरह-विह्वला प्रणयीक निवेदनक अवहेलना करब सर्वथा असम्भव
छल। फेरि, अलकाक नैसर्गिक चारुता प्रत्येक व्यक्ति कें आकृष्ट करबा मे सक्षम छल।
कैलासक कोर मे अवस्थित ओ नगरी स्वतः आकर्षणक केन्द्र छल।



ओहि कैलास शिखर पर बसल स्वर्ग-सुषमाक खण्ड-अलका चन्द्रिकाक रजत-आभा सँ
चकमक करत छल। कैलासक कोर मे अलका ओहने सुन्दरि लगैत छल जेना प्रणयीक कोर मे
कामिनी बैसलि सुन्दरि लगैत छथि। ओहि ठाम सँ बहराइत गंगाक धार एहन प्रतीत होइत छल


जेना ओहि रम्यांगनाक शरीर सँ शुभ्र-साड़ी ससरि गेल हो। भव्य भवन सँ युक्त अलकाक उपर
वर्षकाल मे मेघ ओहिना लगैत छल जेना कामनीक सुन्दर-स्निग्ध वेणी पर मोतीक जाल गाँथल
हो।



ओहिठाम संगीत, विलास एवं वैभवक मधुर-मन्दाकिनी सदिखन प्रवाहित होइत छल।
ओतक भूमि नील-मणि सँ जड़ल छल। कामिनी लोकनिक भव्य-भवन मे रंग-विरंगक चित्र
टांगल छल। ओहि ठामक निवासी यक्ष लोकनिक आँखि सँ आनन्दाश्रुए बहैत छल। प्रेमी तथा
प्रेमिकाक वियोगक ताप कें छोड़ि दोसर कोनो प्रकारक ताप ओतए नहि छल। प्रेम-कलह कें
छोड़ि दोसर प्रकारक कलह नहि होइत छल। कामिनी सबहि कें श्रृंगार-प्रसाधनक सभ वस्तु
ओतए कल्प-क्षवृहि सँ भेटि जाइत छलैन्ह। युवावस्था कें छोड़ि दोसर कोनो अवस्था ओहि ठाम
नहिं अबैत छल। रंग-विरंगक वस्त्र, आँखि मे विभ्रम उत्पन्न केनिहार मदिरा, कोमल पान तथा
नाना प्रकारक फूल, चित्र-विचित्रक आभूषण, पाएर रंगवाक लेल लाहक रस सभ ओहि ठाम
कामिनी लोकनि कें कल्पतरु प्रदान करैत छल। एकर अतिरिक्त अलका मे एक सँ एक वीर एवं
पराक्रमी व्यक्ति छलाह।



अलकाक आकर्षण एक महान आकर्षण आ' ओकर सुषमा एक नैसर्गिक-सुषमा छल।
देवदारुक सघन-जंगल मे घुमैत जखन कवि 'यात्री' अलका पहुँचलाह आ' बिरहिनी यक्ष-
प्रियाक अस्थिसंचित देह देखलन्हि तखन हुनका ओहि ठाम मेघ पर तामस उठलैन्हि जे
महाकवि कालिदासक निष्कपट आशीष प्राप्त कएनहु मेघ ओतए नहि पहुँचि सकल। विरही यक्ष
जखन ओकरा स्पष्ट रूप सँ कहि देने छलैक जे:-



"गन्तव्या ते बसतिरलका नाम यक्षे•ारणाम्।

पुष्पोद्यान-स्थित-हरशिरश्चन्द्रिका धौत हम्र्यम्।।"



"उत्तर-मेघ" मे महाकवि कालिदास धनपति कुबेरक ओहि अलका पुरीक यक्षणी सबहिक
बड़ विलक्षण चित्रण कएने छथि। अलका वैह स्थान थीक जतए महापद आदि नवोनिधि बरोबरि
निवास करैत छथि; जाहि ठामक भूमि मणि-जड़ित अछि। जतए गगन-चुम्बी-कोठा सभ
सुव्यवस्थित ढंग सँ ठाढ़ अछि; जतए सित-मणिक हम्र्यस्थल अछि, कणकमय सिकता अछि
तथा जतए कामिनी लोकनि दिन-राति मणि सँ खेलाइत छथि। एतबे नहि, जाहि अलका मे
रातुक समयमे रत्न-प्रदीप जरैत अछि, चन्द्रकान्ता शिलाक बाहुल्य अछि, पोखरिक सीढ़ी सभ
मरकत आदि मणिक बनल अछि आ' देब दुर्लभ सम्पति चहुँ दिशि पसरल अछि। ओहि ठामक
अमर प्रार्थित अप्सराक श्रृंगारक सामग्री प्रकृतिक विभूति अछि--निर्जीव शिला खंडे नहि--

--

जहिना बृन्दावन महर्षि वेदव्यासक देन अछि, तहिना अलका महाकवि कालिदासक।
बृन्दावन हमर भक्ति-प्रवण मानसक विचरण-भूमि थीक आ' अलका हमर लोक-प्रवण चित्रक
विरहस्थली। सौन्दर्य एवं विलास

दुहुक प्राण-तन्त्री अछि। जँ एक मे पुरुष तथा प्रकृति, ब्राहृ तथा जीवक शा•ात लीला चलइत


रहैत अछि तँ दोसर मे यक्ष सबहिक अव्याहत-सुख-विलास अपन मादक सौरभ अहर्निश विकीर्ण
करैछ। श्रृंगारक मधुर रुाोतस्विनी मे दुहुक निवासी निमज्जित रहैत छथि; किन्तु एक भक्ति-
रसक सागर अछि आ' दोसर लोक-रसक अक्षय-सरोवर।



.. .. .. ..



आधुनिक मैथिली कवितामे देश-प्रेमक स्वर

डा0 श्री शैलेन्द्र मोहन झा



आधुनिक मैथिली काव्यक एक प्रधान विषय थिक जन्मभूमि एवं देश-प्रेम। कविगण
जन्मभूमिक रूपमे मिथिलाक वर्णन कयलनि अछि। एकरा हम कंसर्ण दृष्टिकोणक परिचायक
नहि कहबैक। मैथिलीक कविलोकनिक दृष्टिमे मिथिला भारतक लघु प्रतिमा थिक। अतः
जन्मभूमिक रूपमे मिथिलाक महत्त्व-प्रतिपादन एक व्यापक दृष्टिकोणसँ सम्न्वित अछि। श्री
सुरेन्द्र झा 'सुमन' अपन 'मिथिलामहिमा' मे एहि दिस इंगित करत लिखलनि अछि--



लघु प्रतिमा भारतक ई विधि शिल्पी कर कौशलें

दर्शनीय रूपें रचल जनक जन पदक छविछलें,



भारतक अन्य प्रान्त जकाँ मिथिलाकें अपन संस्कृति, सभ्यता, भाषा एवं कलाक
गौरवपूर्ण परम्परा प्राप्त छैक। यैह कारण अछि जे मैथिली कवितामे मिथिलाक प्राचीन संस्कृति
एवं गौरव-गरिमाक प्रति भाव निवेदन सर्वाधिक उपलब्ध अछि।



मैथिली काव्यमे मातृभूमि मिथिलाक गुणगान चन्दा झासँ प्रारम्भ होइत अछि; अपन
रामायणमे तँ ओ मिथिलाक वर्णन मनोयोगपूर्वक करिते छथि, एकर संगहि ओ अपन एक पदमे
मिथिलाक भौगोलिक सीमाक जे निर्देश कयने छथि से अत्यन्त प्रसिद्ध अछि।



मैथिली कवितामे मातृभूमि मिथिला संबंधी रचनाक बहुलता अछि। परन्तु एकर संगहि
भारत संबंधी रचनोक अभाव नहि अछि। पुलकित लालदास 'मधुर' (मातृ-वन्दना), छेदी झा
(मातृ वंदना), हीरालाल झा 'हेम' (मिथिला महिमा), जनार्दन झा 'जनसीदन' (मिथिलादेश),
जनार्दन झा 'द्विज' (मातृ-वंदना), सुरेन्द्र झा 'सुमन' (मिथिला-महिमा), आरसी प्रसाद सिंह
(जन्मभूमि) वैद्यनाथ मिश्र 'यात्री' (माँ-मिथिले) आदि अनेक कविलोकनिक मिथिला ओ भारत
संबंधी रचना उपलब्ध अछि। कविलोकनि पूर्ण भावुकताक संग अपन रचना कयलनि अछि।
साधारणतः एहि कवितासभमे देशक गौरवमय इतिहासक निर्बंध गान अछि। सांस्कृतिक गरिमामे
पूर्ण निमग्न भऽ कऽ ई कविगण देशक महिमाक विह्वल कंठसँ गान कयलनि अछि।
'जनसीदन' जी लिखैत छथि--

धन्य हमर ई पुण्य भूमि अछि सुन्दर मिथिला देश।

जतय जनक राजत्व कालमे छल नहि क्लेशक लेश।

वाणी संग रमा घरमे छलीहि करत बिहार।


धन जनसँ छल सुखी प्रजागण कयनित धर्म प्रचार।



कविलोकनि देशक अतीत गौरवक स्मारणक संगहि ओकर प्राकृतिक सौन्दर्यक भव्य
चित्र अंकित कयलनि अछि। देश-प्रेमक सूक्ष्म भावनाक आधार निस्संदेह ओकर आकाश, ओकर
पर्वत ओकर नदी, ओकर वन-उपवन, खेत-खरिहान आदि अछि। कोनो कवि देशक कल्पना
करिते ओकर प्राकृतिक सुषमा-सौन्दर्यसँ विस्मित-विमुग्ध भऽ अठैत अछि। कोनो कविक रचनामे
हम एकर उदाहरण ताकि सकैत छी। आ जखन देशक एहि रूपकें हम प्रेमसँ देखऽ लगैत छी
तँ अनायासे जन्मभूमिक कल्पना देशमाताक रूपमे करऽ लगैत छी। श्री आरसी प्रसाद सिंहक
एहि पंक्तिमे देशमाताक ई दिव्य ओ अलौकिक रूप दर्शनीय अछि...

जन्मभूमि जननी

पृथ्वी सिर मौर मुकुट

चन्दन संतरिणी

जन्म भूमि जननी

न् न् न्

शक्ति ओज प्राणमयी

देवी वरदानमयी

प्रतिक्षण कल्याणमयी

दिवा और रजनी

जन्म भूमि जननी



आ 'यात्री' जी एहि भव्य रूपा जननीक गौरवपूर्ण इतिहासकें देखवाक लोभ संवरण नहि
कऽ पबैत छवि....

माँ मिथिले,

मुनिक शांतिमय पर्णकुटीमे

तापसीक अचपल भृकुटीमे

सामश्रवणरत श्रुतिक पुटीमे

छल अहाँक आवास

बिसरि गेल छी से हम

किन्तु ने झापल अछि इतिहास,



श्री सुरान्द्र झा 'सुमन' भारतक लघु प्रतिमाक रूपमे माँ मिथिलाक कल्पना-कलित श्रृंगारक चित्र
अंकित करैत छथि.....



चारु चिकुर अछि जनिक हिमवतक वन हरीतिमा।

उर माला कमलाक भरल स्वर्णाचल महिमा।

दहिन गंडकी भुजा वाम कोशी असीम बल।

हलधर अवनी अमर सिन्धु जलधौत चरण तल।



प्रकृति-श्रीसँ सुसम्पन्न एवं उज्ज्वल इतिहाससँ गौरवपूर्ण देशमाताकें जखन कवि


परतंत्रताक बेड़ीमे देखैत अछि तँ ओ शोकाकुल भऽ उठैत अछि। हमर देश-प्रेमक कविताक एक
पक्ष ओहनो अछि जखन कविगण अपना रचना द्वारा देशक राजनीतिक मुक्तिक कामना प्रकट
कयलनि अछि। स्वतंत्रता हमर जन्म सिद्ध अधिकार अछि, परन्तु अंग्रेजी शासनमे हमरा
लोकनिकें यैह स्वतन्त्रता प्राप्त नहि छल। समस्त देश अपमान

एवं उपेक्षाक जीवन व्यतीत कऽ रहल छल। एही भावनासँ देश-माताक ओ रूप उपस्थित भेल
जे कोनो बन्दिनी दुखियाक होइत अछि। यात्रीजीक कविके हुनक कविता सरस्वती एहि दिस
संकेत करैत कहैत छथिन....



ओम्हर देखह हथकड़ीसँ बद्धकर देशमाता छथि झुकौने माथकें आ'र बन्दिनी माताक
भावना कवि-कंठसँ प्रतिध्वनित भऽ उठैत अछि.....



किए टूटल जननि धैर्यक सेतु ?

कानि रहलहुँ अछि अकी हेतु?

अहा जागल आइ कटु स्मृतिकोन।

जाहिसँ भऽ गेल व्याकुल मोन।

न् न् न् न्



केहन उज्ज्वल माँ अहाँक अतीत,

भेलहुँ अछि पुनि कोन भयसँ भीत

जलधि-वसने हिम-किरीटिनि देवि,

तव चरण-पंकज-युगलकें सेवि

लोक कहबै अछि अरे तिहु लोक,

अहीकें चिन्ता अहींकें शोक !!



ई देशक युवकक दायित्व छलनि जे ओ अपन अमर-शक्तिक बोध कऽ जननीक नोर
पोछबा लय कटिबद्ध होइतथि। उपेन्द्र ठाकुर 'मोहन' अपन युवक वीर शीर्षक कवितामे देशक
युवककें एकरे स्मरण दियोलनि अछि....



हम अमर शक्ति छी युवक वीर।

देशक अभिलाषक हमहि केन्द्र करबाक पड़ल अछि बहुत काज।

साहित्य विपद् गत हन्त आइ पतनोन्मुख अछि दुर्गत समाज।

रे जन्मभूमि जननीक नीर।

पोछत के हमरा बिना वीर ! हम अमर शक्ति छी युवक वीर।



एही तरहें देशक स्वाधीनता आन्दोलनमे-योगदान देबाक उद्देश्ये अनेक आह्वान एवं
उद्बोधनात्मक कविता रचल गेल जाहिमे मातृभूमिकें मुक्त करयबाक स्वर छल। जगदीश मिश्र
रचित उद्बोधनक एहि पंक्तिमे हुनक ओजस्वी वाणी पढ़ू....



उठू उठू कने देखु देश दीन हीनकें


कनैत मातृभूमिकें कुवेश शोक लीनके

विचारु आइकाजकें न व्यर्थ आलसी बनू

सशीघ्र युद्धभूमि मध्य फाँड़ बान्हिकेंठनु

करू उपाय जे अनीति आइ शेसँ टरय

अनन्त नाम ओ करै स्वदेश हेतु जे मरय,



आर एही लेल कवि, निज जन्मसिद्ध अधिकार प्राप्त करबाक लेल शासकसँ संघर्ष
करबाक प्रेरणा दैत छथि। ईशनाथ बाबूक स्वर मे...



की केहरि शिशु केहनो निर्वल नहि कुदि पड़य कुदि पड़य गज-वर सिरपर निज
जन्मसिद्ध अधिकार हेतु यदि लड़ब मरब नहि बनब अमर;



देशक स्वाधीनता-संग्राममे युग-पुरुष महात्मा गांधी जाहि सत्याग्रहक सूत्रपात कयलनि
ओ अंतमे अभिनव अस्त्र सिद्ध भेल। ओ चर्खा चलाकऽ जाहि स्वदेशी आन्दोलनक संचालन
कयलनि ओ सुदर्शन चक्र बनिकऽ परवशताक पाशकें काटबामे समर्थ भेल। गांधीजी राजनीतिक
आन्दोलन द्वारा हमरा सम्मुख राष्ट्रीयताक मूत्र्त एवं व्यावहारिक रूप रखलनि। फेर कविगण एक
दिस चरखा चौमासा (छेदी झा 'मधुप' मिथिला अंक 1) लिखकिकऽ जनजागरणक संदेश देलनि
तँ दोसर दिस देशमाताक बेड़ीकें काटबाक लेल मूली धरिपर चढ़बाक उत्तेजना देलनि। देश
हितक लेल आत्मबलिक अधीरता कवि-कंठसँ फूटि पड़ल....



परवशताक पाश कटइत जीवन बन्दीक अधीर

बलिदानक सूली पर गबइत कविता गाबय गीत

('सुमन' जी)



आर अंततः देश स्वतंत्र भेल। परन्तु भारतक अखंडताकें बलि दऽ कऽ। निश्चय ई
घटना राष्ट्रक इतिहासमे एक दुखद अध्याय बनिकऽ रहत। एहि विभाजनक परिणाम ममस्पर्शी
अछि। देशक ई विरूपित रूप सवाधीनताक हर्षकें नोरमे डुबा दैत अछि....



पूर्वा चलसँ सुन्दर बनक विहंगम उड़ि-उड़ि आबि

सिंधु संगिनी राबी कनइछ खंडित रसना दाबि,

उदित भानु रजनी तम तिरइत नव नव लय आलोक

किन्तु हमर अछि रूप विरूपित हर्षहु बोरल नीर

('सुमन' जी)



1947 ई0 मे भारत स्वतंत्र भेल। युगक परवशताक बंधन कटि गेल। स्वराज्य उपलब्ध
भेल, परन्तु सुराजक कामना बनले रहल। साम्प्रतिक कवितामे राष्ट्रीय कविताक रूप एही
सुराजक स्थापनसँ अछि। अतः सामाजिक-आर्थिक विषमताकें व्यक्त करऽबला रचना एही
कोटिक बुझल जायत।




राष्ट्रीय कविताक एक पक्ष मातृभाषासँ संबंधित अछि। वस्तुतः मातृभाषा-प्रेम देश-प्रेमक
एक अंग थिक। फलतः मैथिलीक प्रत्येक कवि मैथिलीक उद्धार एवं प्रचारक लेल चिन्ता व्यक्त
कयलनि अछि। चन्दा झासँ लऽ कऽ आइ धरिक कवि मातृभाषाक प्रति उदासीन जनसमूहक
ह्मदयमे मातृभाषाक प्रति अनुराग उत्पन्न कराबक चेष्टा कयलनि अछि। कविवर सीताराम झा
अपन मातृभाषाक प्रति उदासीन शिक्षित समुदायसँ व्यंग्य करैत लिखलनि अछि.....



पढ़ि लाखि जे न बजैछ हा निज मातृभाषा मैथिली

मन ह्वैछ झिटुकीसँ तनिक हम कान दूनू एेंठ ली

एहना कपूतक जीभ छाउर लेपि सट दय खेंचि ली

पर खेद जे अधिकार ई हमरा ने देलन्हि मैथिली



परन्तु वत्र्तमान परिस्थितिमे मैथिलीक प्रति सरकारी उपेक्षा नीति कम दुखद नहि अछि।
प्रत्येक व्यक्तिकें अपन मातृभाषाक प्रति सहज ममत्व होइत छैक....



जाहि भाषामे बजइ छी सत्त थीक से बोल

आन वाणी थीक दूरक डोल,

(यात्री)



एतेक पैघ जनसंख्याक उपेक्षा अधिक दिन धरि नहि कयल जा सकैछ। जनताक
अधिकारक माँग कविकंठसँ विगलित भऽ उठैछ.....





माँगि रहल छी प्रथम आइ अपन मातृजन वाणी।

माँगि रहल छी हम विदेह भू भाषा चिर कल्याणी।

माँगि रहल छी हम कवि विद्यापतिक साधना वैभव।

माँगि रहल छी हम हिमवानक अमृत रुाोत चिर अभिनव।

बैसि कंठ पर केओ बरजोरी स्वर नहि दाबि सक अछि।

मूंग दररि सदिखन छातीपर मुँह नहि जाबि सकै अछि।

(आरसी)



आइ जे मातृभाषा-अनुरागीलोकनिक विशाल समुदाय एकर विकास-प्रचारमे संलग्न
छथि, हुनके देखि जेना कवि वि•ाासपूर्ण स्वरमे प्रश्न करैत छथि.....



आबहु की रहतीह मैथिली बनलि वन्दिनी?

तरुक छाँहमे बनि उदासीनी जनक नन्दिनी?

(आरसी)



.. .. .. ..






गाड़ीक पहिया

प्रो0 श्री मायानन्द मिश्र



कातिकक ध्यान टूटि गेलैक। आगूमे स्टेशन-रोडक अपार जन-समुदायक प्रवाहकें
देखलक; पड़ाइत मोटर, रिक्सा, टमटम आ स्कूटरकें देखलक। कोलाहल, व्यस्तता आ
आत्मकेन्द्रित गति।



ओ दहिना हाथमे लटकल सागक झोड़ा दिस तकलक।



सभ दिन, रवि छोड़ि, एहि बेरमे ओ एही देने जाइत रहैत अछि, सभ दिन एहिना
गाडिंनर रोडक घुमानपर कीनल सागक झोड़ा रहैत छैक; सभ दिन ओ एहिना थाकल
ठेहिओयल रहैत अछि। सभ दिन भोजनक पश्चात् दस बज्जी आफिसक यात्रा, एक जेबीमे
रुमाल आ तमाकू आ दोसर जेबीमे तरकारीबला झोड़ा आ तरकारीबला पाइ, मात्र तरकारीबला
पाइ।



मुदा तरकारीबला पाइ आ तरकारीबला झोड़ा ई दुनू संज्ञा मिथ्या थिक, आधारहीन
फूसि। सत्य थिक सागबला झोड़ा आ सागबला पाइ। कोनो विशेष प्रकारक पाहुने अयलापर
परिवारक तरकारी-बजटमे परिवर्तन होइत छैक, तखने झोड़ाक आकार छोट, सटकल आ
चोकड़ल रहैत छैक। अन्यथा सभ दिन सागसँ झोड़ाक पेट भरल रहैत छैक।



औफिसमे बैसल-बैसल लोक सभकें कैंटीन दिस जाइत देखि जखन-जखन पियास
लागि जाइत छैक, तखन-तखन एक बेर हाथ घोंसियाकऽ झोड़ा टो लैत अछि। पियास मेटा
जाइत छैक। भूख ओकरा नहि लगैत छैक असमयमे; बस, एक बेर दसे बजे दिन आ दोसर बेर
सात बजे साँझ।



पाँच बजे औफिससँ छुट्टी होइत छैक आ पैदल डेरा अयबामे लगैत छैक सवा घंटा। फेर
कने काल गप्प सप्प, फेर भोजन, फेर छोटका बच्चाकें खेलायब, चुप्प करब। थारी-बासनसँ
पत्नीक अयलाक पश्चात् बच्चासँ मुक्ति, फेर विश्राम आ निन्न।



औफिस आ सागक झोड़ा आ पत्नी आ कनैत बच्चा। कार्तिकक जीवनक अस्तित्व-बोध
पछिला सात वर्षसँ एतबे धरि सीमीत छैक।



कार्तिक एक बेर मानसरोवर होटलक बड़का साइवोर्ड दिस देखलक। आ•ाासनक
एकटा साँस लेलक; बस, आब स्टेशन रोडक घुमान रहलैक, तकरा बाद कालटेक्स, तकरा
बाद डाक बंगला रोड, तकरा बाद आयुवदिक कालेज, तकरा बाद साहित्य-सम्मेलन-भवन आ
तकरा बाद तीन मिनटपर अपन डेरा।




डेरापर दू टा कोठली आ तीनटा बच्चा आ पत्नी आ पत्नीक उदासी आ व्यस्तता....।



डेरापर अबैत देरी कार्तिकक भरि दिनुका-पियास आ तीन माइलक ठेही आ युग-युगक
उदासी जेना सभटा मेटा गेलैक ! ओकरा मोनमे जेना पहिल तारीखबला उल्लास भरि
अयलैक।



आइ आ अबैत देरी कनैत चिररुग्न तीन वर्षक बेटाक स्वर नहि सूनि सकल, बेटा
सभपर पत्नीक झझकार नहि सूनि सकल, दुआरिपरक फाटल-चीटल कागतक अरकच-बधुआ
नहि देखि सकल, खाटपर ओछाओल मैल-चिकाइठ चद्दरि नहि देखि सकल। देखलक बहारल-
सोहारल कोठरी-दुआरि, देखलक बच्चासभकें हँसैत-खेलाइत, देखलक पत्नीक बहुत दिन पर
बान्हल केस, धोबीक धोल आनु, कपारपर ललका बड़का टिकुली, आ.... ठोरपर स्वागतात्मक
करु मुसुकान.....आँखिमे एकटा जिज्ञासात्मक आग्रह...गोरि ....सिन्नरि....मोहक।



भरि दिनुका थकनी आ निराशाक मैल मुस्कीक गंगासँ धोखड़िकऽ बहि गेलैक। मोनमे
पवित्रताक उल्लास आ आशाक उद्दाम गति आबि गेलैक।



कार्तिक कने मुसकियायल आ हाथक झोड़ा पत्नीक हाथमे दऽ देलकैक।

'जिरबै'? कि खा लेबै' जल्दिये? भानस भऽ गेल छैक....।

'बच्चा सभ खा लेलक?

'सभ। अहींटा बाँकी छी।'

'की गप्प थिकै'? आइ बड़ देखै' छी.... !'

'ऊहूऽऽ मुँह ने देखू बाउके.....से नहि होयत, आइ बिसेरने काज नहि चलत....की
कहने रही काल्हि?'

करपूरक ठोरपरक हँसी आँखिमे जिज्ञासा बनिकऽ उमड़ि अयलैक आ आँखिक आग्रह
ठोरपर शंकाक कंपन बनिकऽ हिलकोर लऽ उठलैक। कार्तिककें धड़ दऽ मोन पड़ि गेलैक।
कौतुकसँ हँसल आ बाजल--'ओहो, आब मोन पड़ल, सुआइत...मुदा आइये चलबै?'



--'आइ तँ दू तारीख बीति गेल, काल्हिसँ कोइलाबला, चाउरबला आ मकानबला....आ
एहिमे कोना को लागत से तँ अहीं जानब...।,

--'बेस तँ होउ, काढ़ू।'

कार्तिक अपन खरपा ताकऽ लागल आ करपूर चल गेलि भनसा-घर।



करपूर जेहने लक्ष्मीक अबडेरलक बेटी तेहने ससूरक पुतोहु आ तेहने पतिक पत्नी।
नेहरमे भाउजीक कर्ण फूल पहिरिकऽ बियाह भेल छलैक, ससुर मुँह देखाइमे देने छलथिन आठ
आना भरि कनपासा। मुदा संयोग जे द्विरागमनक राति सासुरमे एक कानक हेरा गेलैक। पटना
अयलाक बाद नकली कनपासा चारि पाँच वर्षसँ पहोरि रहलि अछि। आब मुदा ओकरो रंग उड़ि
गेलैक। पछिला पाँच-छऽ माससँ जोर लगैने अछि पति लग। अपनो कोसलिया आठ दस टका
जमा छैक। चारि आना भरि एकटा कनपासा छैक, चारि आना भरि आर कीनिकऽ...। कोन


तीस पैंतीसे टका लगतैक...। ताहिमे दस टका तँ अपने छैक। आब अनठौने कोना काज
चलतैक? आबि रहल छैक दुर्गापूजा, कतेक दिनसँ गाम जयबाक नेयार-भास कयने
अछि....लोक सून कान देखिकऽ की कहतैक? लोक तँ नहि बुझैत छैक जे सहरक...।



ता काढ़ल भऽ गेलैक। करपूर पतिक आगूमे थारी आनिकऽ राखि देलकैक।

--'ई झिङुनी के आनि देलक?'

--के आनि देत...एकटा तरकारीबाली आयल छलैक, बेचारीके आठम मास आ तैपर
आध मोनक कपारपर छिट्टा....बड़ दया भेल, लऽ लेलिऐ पा भरि, पाँचे आने
कहलकै...विचारलिऐ' जे अहूं तँ अबेरे कऽ आयब।'.....



--'नीक कयलहुँ। कोना महगो नहि...अहूँ ता खा लियऽने दोकान सभ नबे बजे बन्न भऽ
जाइत छैक।

--'होउ ने, हमरा कते' देरी लागत, नहि हेतै तँ हम आबिये कऽखायब...।'

--ऊद पैसि गेल अछि कि?'

--'कोनो बेजाय'--करपूर कने मुसकायलि आ बाजलि--'कते दिन सोन पहिरना भेल !
कते दिनसँ कहैत छी। ता' बिसनपुरबाली एकटा गरदेनियोमे लेलक आ एकटा कानोमे....।

--'कोना नहि, बेचारी दुइये परानी अछि आ सवा दू सय दरमहा आ ताहिपर सरकारी
नोकरी....हमरासँ एक सय टका बेसी भेटैत छैक आ हमरा जकाँ प्राइवेट नोकरियो नहि....?'

--'एकटा कही?'

--की?

--ऐ बेर हमर आपरेशन करा दियऽ...की हेतै' एते लदर-फदर अरजाल--खरजाल?'



करपूर बाजिकऽ पति दिस प्रश्नवाचक दृष्टिसँ ताकऽ लागलि। कार्तिक बाजल नहि
किछु। एक बेर पत्नी दिस आ•ाासनीय मुद्रासँ ताकि खाय लागल।



बच्चा आ पत्नीकें रिक्शापर चढ़ाकऽ कार्तिक जखन मेन-रोडपर आयल तँ सोझामे पड़ि
गेलैक औफिसक चपरासी। चपरासियोक नजरि पत्नीपर पड़लैक, कार्तिकक नजरिसँ
टकरयलैक, मुदा आइ ओ नमस्कार लेल हाथ नहि जोड़लकैक। नहि जोड़लैक हाथ। कार्तिक
प्रणामक स्वीकारात्मक मुसुकान नहि मुसुकि सकल। पत्नी प्रणाम पबैत नहि देखि सकलैक।



हठात् कार्तिककें ओहि चपरासी पर तामस उठि गेलैक। किएक नहि प्रणाम कयलकैक?
किएक नहि पत्नी देखि सकलैक?



--हे एम्हर देखियौ केहन-केहन साड़ी सब लटकि रहल छैक दोकान मे...अहा ! ई
ललका साड़ी देखियौ...पाढ़ि केहन छैक?.... एहने मखमली कोरबला सोलूक माय ओहि दिन
अनने रहथिन....।'



कार्तिक एक बेर दोकानक अगुआतिमे लटकल फहराइत-उधिआइत साड़ी दिस
देखलक, फेर पत्नीक इच्छाकुल मखाकृति दिस, फेरि टोकऽ उरका जेवी देखि लेलक। ओ


एतेक टका पहिलीये तारीख टा कऽ सङमे राखि सकैत अछि, आन खन, आन दिन नहि। तें
भय भेलैक जे कतहु उड़िया तँ ने गेल। बाजल--'तः कते दिनसँ नहि देलहुँ एकोटा, चलू
ओम्हरसँ घुमब तखन एकटा....ता कोना की लागत....सङमे चालिसे पैतालिस अछि...कि ने?'



--हँऽ हँऽ एखन कोना। मुदा घुमती काल अवश्ये। ओ मखमली कोरबला बड़ दीब
छलै... हे पाढ़िक रंग कहियो नहि उड़ैत छैक, बरू नुआ किए ने फाटि जाय...।



ता रिक्शा बढ़िकऽ अशोकराजपथ पर आबि गेलि छलैक। मरकरी आ विभिन्न बिजली
इजोतमे रिक्शापरसँ पड़ाइत जन-प्रबाह बड़ कौतुकपूर्ण लगलैक करपूरके।



ओ अपन चिर रोगी बेटाक कनैत स्वर बिसरि गेलि, अपन मासिक बजट बिसरि गेलि,
सबा सय दरमहा आ सहरक एतेटा खर्च बिसरि गेल, कोइलावलाकें बिसरि गेलि, मकान
बलाकें बिसरि गेलि आ पतिक जेबीक पैंतालिस टकाक सीमित मूल्यकें बिसरि गेलि। मोन
रहलैक मात्र चारि आना भरि सोन, मोन रहलैक ओहि दोकानपरक उधिआइत साड़ी सभ आ
मोनमे रहलैक रिक्शाक घंटीसँ बाट छोड़ैत भयाकुल जन-प्रवाह।



करपूरकें एक प्रकारक निसाँ जकाँ लागि गेलैक। लगलैक, जेना दौड़ल, जाइत लोक
नहि, जेना चुट्टी पिपरी हो। लगलैक, जेना ओ रिक्शा पर नहि, हाथीपर चढ़लि हो। कते
दिनपर एहि खेपी रिक्शापर चढ़लि अछि, आब ओकरा नीक जकाँ मोनो नहि छैक।



ता रिक्शा बाटाक दोकान लग आबि गेलैक।

-हे ! एहि ठाम कते चट्टीसभ बिकाइत छैक...केहनरंग-विरंगक।'

--'सत्ते कहै छी, अहाँकें...एकटा करब?'

--'की?

--'धुरती काल एक जोड़ लऽ लियऽ, जे होयतैक, से देखल जयतैक....बरु, मकान-
मालिककें एहि मास...।

--'तः..बरु साड़िये नहि लेब..तेहन कीनि दियऽ जे जाड़ीमे पहिरी आ बरिसकालोमे आ
कतहु जाइ-आबैत काल...रामा जे पछिला मास किनलनि...ललका सन, रबड़क...।'

कार्तिक करपूरक पयर दिस ताकि देलक, गोर, नमछुरिये, कोमलल मुदा खालिये।

बड़ कचोट भेलैक कार्तिककें।



ता रिक्शा सब्जीबागक घुमान टपिकऽ अशोक राज-पथपर आगू बढ़ि गेल छलैक। जन-
प्रवाहक बेग तरंग बढ़ले जा रहल छलैक। मोटर, रिक्शा स्कूटरक कोलाहल बढ़ले जा रहल
छलैक। दोकानसभक चकमकी बढ़ले जा रहल छलैक। खाली छोट भेल जाइत छलैक
कार्तिकक मोन। खाली घटल जाइत छलैक कार्तिकक उत्साह। कतेक असमर्थ अछि ओ। केहन
अभागल, जे चारूकात पसरल एतेक सुख-सुविधा, एतेक, साज-सिङार, मुदा ओ उपभोग नहि
कऽ पबैत अछि, नहि कऽ सकैत अछि।

हठात् पत्नीक स्वर सूनि ओ चौंकि उठल। पत्नी कहि रहल छलैक--देखलिये?'

--'कथी?'


--अहाँ तँ सुराह छी, नहि देखलिऐ। ओहि कपड़िया-दोकानक अगुआतिमे केहन-केहन
कपड़ाक टुकड़ा सभ बिकाइत रहैक? सीलूक माय कहै छली जे ओहिमे ब्लाउजो-पीससभ रहैत
छैक, उनयो ब्लाज पीस रहैत छैक आ सेहो कम्मे दाममे...थानमे जे टुकड़ासभ बाँचि जाइत
छैक सैह सस्तामे बेचि दैत छैक...जाड़ मास एकटा ऊनी ब्लाउज पहीरि लियऽ तँ एक्को रत्ती
जाड़ नहि....बिसुनपुर वाली परुकाँ एहिना बनबौने रहथि...गोर देहमे करिया ऊनि चक्कदऽ
उठैत छनि...एखन तँ जाड़ नहि अयलै, बड़ सस्ता दैत हेतै....ओहो सैह कहलनि...कते सस्ता
दैत हेतै....?



कार्तिक पत्नीक बढ़ैत इच्छा आ उत्साह आ अपन विवशता देखिकऽ सिहरि जकाँ
उठल। एहि बेर किछु नहि बाजब पत्नीपर एक प्रकारकें भीषण अत्याचार बुझना गेलैक। मुइल
स्वरमे बाजल --'नहि कहि, मुदा सस्त अवश्ये दैत होयतैक...कोन हर्ज, घुरतीकाल बूझि
लेबैक...।'



--'हँ, जँ सस्त भेलै तँ लऽ लेब एकटा, बरू साड़ी-चट्टी छोड़ि दियौ एखन, पाछू बूझल
जयतै...साड़ी तँ दू तीनटा पेटियोमे अछि। ता बहार कऽ लेब....कि ने?'



कार्तिक मात्र एकटा भटरंग हँसी हँसिकऽ रहि गेल। किछु बाजि नहि सकल। ओकरा
अपन पत्नीक अविराम मौन-स्वभाव आ उदास आकृति आ करुण भंगिमा आ निरुत्साह स्वरक
एहि प्रकारक मोहक परिवर्तन घोर विस्मय भऽ रहल छलैक।



कार्तिक हठात् जेबी टो लेलक, टका हेरा तँ ने गेलैक। मुदा छलैके। आ•ाासनक साँस
लेलक।



रिक्शाक गति कम भेलैक आ 'अलंकार'क गेटपर आबिकऽ ठाढ़ भऽ गेलैक।



बच्चा आ पत्नीक संग कार्तिक दोकानमे पैसल। पछिला बेर तीन मास पूर्व औफिसक
बड़ाबाबूक सङ आयल छल। एके बेर तीन चारिटा सेल्समैन कल जोड़िकऽ प्रणाम कयने
छलैक। बड़ाबाबू स्वीकारात्मक मुसुकी मुसकियायल छलैक। ओकरो दिस कल जोड़ने छलैक।
गुदगुदी लागि गेल छलैक। ओ मात्र

मुसकियाइये टा कऽ नहि रहि सकल छल, ओकरालोकनिक कुर्ता आ एक गोटाक चश्मा
देखिकऽ कल जोड़ि देने छलैक।



मुदा आइ क्यो कल नहि जोड़लकैक। ओ एक निमिष मे सभक मुह दिस ताकि गेल,
क्यो प्रणाम नहि कयलकैक। पत्नीकें ओ अपन गुरुता नहि देखा सकल। अप्रतिभ भऽ उठल
कार्तिक।



'अलंकार'मे गेलाक पश्चात् दुनू परानीक विचार बदलि गेलैक। ई कही जे दोकानदार
बदलि देलकैक। एक जोर रोल्ड गोल्डक रिंग पसिन्न पड़ि गेलैक, आ सेहो साते आने भरि,
देखबामे बेस मड़कदार। आशासँ पन्द्रह-सोलह टका कम्मे लगलैक।




घुरतीमे रिक्शापर चढ़ैतकाल कार्तिक शेष टाका अपन जेबीसँ बहार कऽ करपूरक
हाथमे दऽ देने छलैक। कहलकैक--'अहीं अपना सङमे राखू, आब तँ अहींकें
खर्चऽपड़त....हमरासँ हेरा जायत...।' आ हँसि देने छल।



करपूर बच्चाके दू पैसाबला एकटा फुकना कीनि देलकक।

रिक्शा पुनः अशोक राज-पथ-पर तेजीसँ दौड़ि रहल छलैक। सड़कक कोलाहल आ
व्यस्तता नँहू-नँहू मद्धिम पड़ि रहल छलैक।

--'ऐ रिक्सा, रोको।'

--'किए?' करपूर प्रश्नक दृष्टिसँ पति दिस ताकऽ लागलि। रिक्शा ठाढ़ भऽ गेलैक।

--'ब्लाउज-पीसबला दोकान आबि गेलैक...।'

--'बढ़ाबऽ हौ रिक्शा।'

रिक्शा चलि पड़ल

--'किए?'

--अह्। छोड़ू। आब ऐ मास बहुत खर्च अछि, आगू देखल जयतै, एखन तँ जाड़ो
मास...।

--'मुदा पाछू तँ महग देत....?'

--'तँ नहि लेब....कोन सभा-सोसाइटीमे जाय पड़ैत अछि जे...। जाड़ मे चुल्हे लग बैसि
जायब, पहिने तीनू बच्चाकें एक-एकटा पेंट सिया दियौ, फाटि गेलैक।'

करपूर बाजि कऽ एक बेर गफ्फीमे राखल टका दिस ताकि लेलक, फेर गफ्फीकें कने
आरो सक्कत कऽ लेलक। बच्चा फुकनासँ खेला रहल छलैक। कार्तिक चुप्पे रहल।

आ रिक्शा भागल जा रहल छल।

--'बाटाबला दोकान'--किछु दूर बढ़लापर कार्तिक बाजल--'आबि रहल छैक, रोकबा
दैत छी, चट्टी तँ अवश्ये....।'

--'बताह भऽ गेल छी, पछिलो मासमे मकानबलाकें कम्मे देने छलिऐ, मान नहि अछि?
फेर कोइलाबला...धोबियोक किछु हेबे करतै...फेर दोकानबला तँ सौंसे पड़ले अछि...।'



कार्तिक अवाक् रहि गेल। मात्र पत्नी दिस तकैत रहि गेल। विरोध आ समर्थन दुनू
भावसँ मोन सुन्न भऽ गेल छलैक। खालली मोनक कोनो कोनमे उमड़ि आयल छलैक करुणाक
हिलकोर जाहिमे ममत्व ओ विवशताक तरंग सभ उठैत-खसैत छलैक।



रिक्शा सब्जीबागक घुमान टपि गेल, बाटाक दोकान टपि गेल। आ भागले जा रहल
छल आगू मुँह।

--'ऐ रोको...।'



साड़ीबला दोकान आबि गेल छलैक। कार्तिक रिक्शा राकबा पत्नी मिस ताकऽ लागल।
करपूर मुदा कपड़ाबला दोकान नहि प्रत्युत ओकर बगलबला दोकान दिस ताकि रहल छलि।
दोकान छलै लोहा-लक्कड़क।




रिक्शा ठाढ़ भेल। दुनू परानी उतरल। आगू भेलि करपूर। मुदा कपड़ाक दोकान दिस
नहि जा लोहाक दोकान दिस बढ़ि गेलि। बढ़ि गेलि आ एकटा छोलनीक मोल करऽ लागलि।



छोलनी कीनि करपूर जखन चोटहि रिक्शा दिस घूमऽ लागलि तँ कार्तिककें नहि रहल
गेलैक। पुछलकै--'जाह..अय ! आ साड़ी...?'



करपूर रिक्शापर बैसैत बाजलि--'अहाँक कहल करी तँ काल्हि डूबि मरी, अहाँके तँ सूर
धऽलैत अछि....मुदा हमरा तँ दिन-दुनियाँ सभटा देखऽ पड़ैत अछि। ..देखल जयतै अगिला
मास....एखन तँ दोकान बला, मकानबला, कोइलाबला सभटा बाँकिये अछि....चलू आब भूखी
लागि गेल।'.....



कार्तिक किछु बाजि नहि सकल। मोन दा आ करुणासँ भरि गेलैक। पत्नी दिस
तकलक।



करपूरक आकृतिपर अभिबावकीय गरिमा छलैक आ आँखिमे मोहक कुटिलता।



कार्तिक देखलक आ देखैत रहल।



.. .. .. ..



लघुताक महत्व

प्रो0 श्री केदारनाथ लाभ



तीर आ तरंग



जेठक दुपहर। धह-धह रौद। समुद्रक कातक पसरल बालुकाराशि भुभुर आगि जकाँ
धीपल रहैक। सागरक तट एहि बालुकाराशिसँ पटल छल आ बीचमे संधुक तरज़् उठत छल।



धारक लहरि तटसँ आबिकऽ टकरा गेल। तट स्थितप्रज्ञ जकाँ अनुभवशून्य भेल रहल।



लहरिकें नहि रहल गेलैक। कहलकैक--'औ बूढ़ ! तमसीयल हरबह जकाँ किएक तरे-
तरे जरि रहल छी? आउ, बाँहि पसारिकऽ हमरा भरि लियऽ। मुदा से शक्ति अहाँके कहाँ?
शुष्कह्मदय ! निर्बल ! जर्जर !!! हमर उच्छल यौवन तरज़् देखि कनेको जीवनक देखि कनेको
जीवनक आनन्द उठेबाक कामना नहि होइछ? देखू तँ हमर जीवन। एम्हर-ओम्हर केहन मस्त
भेलि हिलकोर उठबैत रहैत छिऐक। केहन स्वतंत्र जीवन अछि हमर ! आ एकटा अहाँ छी !
छिः !"




तटक ठोरपर मन्द मुस्की आबि गेलैक। लहरिसँ कहलकैक--"गै दाइ ! जकर तों बूढ़
कहि उपहास करैत छहिक, ओकर स्थित-प्रज्ञताक महत्त्व तों की बुझवहिक ! हमरे शुष्कतासँ
तोहर सरसता अक्षुण्ण छहु। यैह बूढ़ तट तोहर उद्दाम तरज़्क मर्यादा छहु। हम नहि रही तँ तों
संसारकें अपनामे आत्मसात् कऽ लेबहिक। तखन तोहर स्वतंत्रताक की परिणाम होयतैक? ओ
तोहर यौवनक हिलकोरक केहन घोर परिणाम होयतैक सेहो बुझैत छहिक? आर थाकल
लहरिकें शरणों तँ हमही दैत छिऐक।"



लहरि खिलखिला उठलि। तटक उपदेश सुनबाक धैर्य ओकरा नहि छलैक। ओ तटकें
यौवन मधुमातल अपन धक्का दैत आगाँ हिलोरि उठबैत चली गेलि।



चान आ तरेगण



चतुर्दशीक राति रहैक। तारागणक मध्य चन्द्रमा बैसल छल चकमक करैत। सर्वत्र शांति
छलैक। चान-कहलकैक तारागणसँ--"औ तारागण ! अहाँ लोकनिक जीवन व्यर्थ थिक। झुट्ठे
टिमटिम-टिमटिम की करैत रहैत छी? जखन आकाशमे हम छीहे तखन अहाँलोकनिक की
प्रयोजन? हमर प्रकाशसँ संसार दीपित अछि। कामिनीक ह्मदयमे आगि वा पानि दूनू हम ही
ढारि सकैत छिऐक। कविगणक काव्यक उपादान हमही छियनि। तखन अहाँलोकनि व्यर्थें ने
सौंसे आकाश भरिराति छेकने रहैत छिऐक? लोक पूजो हमरे करत अछि, अहाँ सभक नहि।"



किछु क्षणक हेतु तारागणक समाजमे निस्तब्धता पसरि गेलैक। मुदा शुक्रतारासँ नहि
रहल गेलैक। ओ बाजि उठल--"औ कुमुदपति महोदय, अहाँक पूजा होइत अछि तँ ई कोन
गौरवक बिषय ! एहि हेतु एना नितराइ तँ ने ! ई नहि बुझैत छिऐक जे आइ काल्हि ओकरे पूजा
होइत छैक जकर ह्मदय तँ कारी होइत छैक मुदा बहारसँ जे उज्जरे-उज्जर रहैत अछि। किन्तु,
तें की? अहाँके अपन सत्ता रखबाक हेतु कतेक काट--छांट करऽ पड़ैत अछि। पड़ीबसँ पूर्णिमा
धरि आ पूर्णिमासँ चतुर्दशी धरि अहाँक रूप कहियो एक रज़् रहैत अछि? कहियो शांति अछि?
आ अमावस्यो अहीं देखैत छिऐक। हमरा लोकनि अपन लघुतेमे महान छी। अशांति नहि अछि।
प्राप्यमे संतोष आ तें आनन्दो। मुदा की करबैक? ई युगे राजनीतिक छैक। कारियो ह्मदय वाला
बाहरी टोमटामपर चानी काटि लैत अछि आ निष्कलुष व्यक्ति ओहिना रहि जाइत अछि। तथापि
ईहो तँ मोन राखू जे हमरा सभक हेतु अमावस्या कहियो नहि होइत अछि।



तावत पूबसँ छौंड़ा अरुण भभाक हँसि देलकैक। चानक मुँह बिधुआ उठल। ओ मलिन
पड़ि गेल।



बिन्दु आ सिन्धु



सागरक दूर तटपर दूर्वादलकनोक पर भोरुका पहर ओसक बिन्दु मोतीक दाना सन


चकमक करैत छल। सागर अपना मस्तीमे घहरि रहल छल।



सागर कहलकैक ओसक कणसँ--"हौ जी, एना किएक कनहा गायक भिन्ने बथान जकाँ
एम्हर-ओम्हर छिटकल रहैत छह? एक घड़ीक जीवन छह। एखने सूर्य महाराज यमराज जकाँ
अयथुन आ सोखि लेथुन। हमरेमे समाजहि। जीवन अमरे भऽ जयतह। हजारो सूर्य नहि सोखि
सकथुन।"



बिन्दु बाजल--"से तँ ठीक। मुदा अहाँमे आविकऽ हम कहाँ रहि पायब ! सूर्य आ सिन्धु
हमरा सन छोटक हेतु दूनू डाकूए। पैघ कतहु छोटकें बचौलकैक अछि? सूर्य सोखि लेत आ
अहाँ अपन शक्ति बढ़ा लेब। हमर तँ दूनू स्थितिमे अन्ते; मुदा जावत् सूर्य आओत तावत हमर
पृथक सत्ता आ सौन्दर्य तँ बँचल रहत? जीवन छोटे किएक नहि होईक, मुदा जँ ओहिमे अपन
बिशिष्टता आ सौन्दर्य छैक, अपन सत्ता आ शक्ति छैक तँ वैह महत्त्वक बात। लघुता आ महत्ता
व्यक्तित्वक सत्ता आ सौन्दर्यपर निर्भर करैत छैक; दीर्घायु आ अल्पायु होयबापर नहि।"



ताबत सूर्यक किरण ओहि ओस-बिन्दुपर नहूँ-नहूँ उतरऽ लागल।



.. .. .. ..



युग-पुरुष

प्रो0 श्री दिने•ार झा 'दीन'



वि•ाक राजनीतिक रंगमंच पर 'युग-पुरुष' जनसम्राट नेहरु जीक प्रातःकालीन सूर्य
सदृश उदय होएब, वि•ाक सामाजिक, राजनीतिक इतिहासक महत्वपूर्ण घटना मानल जा
सकैछ। भारतीय जनताक ह्मदय-सम्राट नेहरूजीक व्यापक एवं उदार दृष्टि मे वि•ाक मानवता
निश्छल रूप सँ आश्रय करैत छल। विशाल ह्मदयता, जन मानसक संग अखण्ड आत्योयता,
वि•ाक समक्ष पंचशीलन उदार भावना, एवं अन्तरराष्ट्रीय वा मानवीय वृत्तिक कारणें वि•ाक एक
'मूर्धन्य युग पुरुष'क रूपमे सुयश एवं प्रतिष्ठा प्राप्त कएलन्हि।



'युग पुरुष' राष्ट्रनायक नेहरु जी मात्र भारतक प्रधान मंत्रीए टो नहि छलाह, प्रत्युत
स्वाधीनता संग्राम, धर्मक्षेत्रक वीर सेनानी, जनतन्त्रक पुजारी, समाजवादक प्रवत्र्तक एक एहन
सपूत छलाह जे सहरुा वर्षहु मे एक उत्पन्न होइछ। जीवनक सहज वैभव, सुख आओर विलास
कें त्यागि देश सेवाक ब्रात लए कतेको बेरि कारागारक यातना सहलैन्हि, वि•ा मानवताक सुख
शान्तिक हेतु जीवन पर्यन्त विषम सँ विषम परिस्थितिक सामना करैत रहलाह। बुद्ध आओर
महावीर मानव-जाति कें सुख शान्ति प्रदान करवाक हेतु बहुत कार्य कएलैन्हि, धर्मोपदेश
देलैन्ह। एहि सुख शान्तिक हेतु दूनू देव पुरुषकें तपस्या आओर साधनाक आश्रय लए एकान्त
स्थलमे जाए पड़लन्हि। किन्तु नेहरूजी जे कएलन्हि ओ इतिहासक अभूत पूर्व घटना कहल जा


सकैछ। वि•ा शान्ति एवं मानव-कल्याणक हेतु वैभव केर तिलाञ्जलि देलैन्ह किन्तु एकान्त
साधना, तपस्या एवं धर्मोपदेश द्वारा नहि प्रत्युत्त कर्मवीर बनि, कायरत्त भए मानव जातिक सेवा
कएलन्हि। फलस्वरूप नेहरूजी अपन कार्य आओर कर्मठता, त्याग आओर तपस्या एवं
तेजस्विता सँ भारत आओर वि•ाक जे प्रेम श्रद्धा एवं भक्ति पओलन्हि ओ वि•ाक आधुनिक
इतिहास मे अद्वितीय थीक।



नेहरूजीक सूक्ष्म दृष्टि, व्यक्तित्व, बहुमुखी प्रतिभा, अदम्य साहस एवं विशाल ह्मदय-
भावना देखि एक वेरि महात्मा गाँधी कहने छलाह जे "ई भारत एवं भारतक जनताक अहो
भाग्य थिक जे 'जवाहर लाल' सदृश 'रत्न' प्राप्त भेल अछि"। ई विषय गाँधीजी स्नेहवश नहि
कहने छलथिन्ह प्रत्युत नामक अनुरूपहिं हुनक कार्य रक्षता एवं तीक्ष्ण बुद्धिमत्ता देखि भविष्य
वाणी कएने छलाह।



'असम्भव केर समन्वय' रूपमे नेहरूजीक चरित्र एक दिश जँ शान्ति केर पुजारीक रूप
मे देखवामे अबैछ तँ दोसर दिश क्रान्तिक अग्रदूतक रूप मे सेहो भेटैछ। अहिंसाक उपासक,
वि•ाक मानवताकें युद्धक

समग्र संहार सँ सुरक्षित रखबाक हेतु बुद्ध, महावीर, अशोक आओर गाँधीजीक मन्तव्य ग्रहण
कए वि•ाक राजनीतिक रंगमंच पर पंचशीलक जयघोष कएलन्हि किन्तु स्वाधीनता आओर
सम्मानक रक्षार्थ अपनाकें वलिवेदी पर उत्सर्ग कएदेब वा शास्त्रक प्रयोग अवरणीय मानलन्हि।



जन सम्राट नेहरूजी 'स्वराज्य' शब्दकें साकार बनएबा मे गणतान्त्रिक परम्परा सभकें
पुष्ट एवं सुदृढ़ करबाक हेतु अपनाकें अपन अन्तिम समय धरि अर्पित रखलन्हि। गाँधीजीक
'रामराज्य'क कल्पनाकें जतय जगत व्यक्तिक हेतु नहि रहत, जगतमे व्यक्तिक समाहार होएत,
जतय सभकें समान शुभ अवसर भेटतैक--अपन भौतिक आकांक्षाक परितृप्ति करबाक हेतु,
भौतिक उन्नति करबाक हेतु; जतय नहि कोनो वर्गक भेद भाव रहत; सभ मानव थीक, सभ
समान थीक केर भावनाकें साकार करब, मूत्र्तरूप देब हुनक जीवनक प्रधान लक्ष्य छलन्हि।



नेहरूजी केवल गाँधीजीक प्रेरणाक अन्तर्गत भारतक स्वाधीनताक भव्य एवं गौरव पूर्ण
प्रासादक महान निर्माता मात्र नहि छलाह प्रत्युत ओ एशिया आओर अफ्रीकाक अनेक देशक
जनताकें साम्राज्यवाद आओर विदेशी दासताक जुआ कें कान्ह सँ उतारि फेकवाक प्रेरणा देने
छलाह, आओर पथ निर्देशन कएने छलाह। अपन निर्गुट नीति सँ ओ अन्तरराष्ट्रीय क्षेत्र मे एक
नवीन कर्मनीति केर आविष्कार कएलन्हि जाहिस ओ शान्ति, संयम, विवेक आओर मानव
समृद्धिक अग्रदूत तथा वि•ा नेता बनि गेल छलाह।



ब्रिाटेन केर अनुदार दलक एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्टेनले वाल्डविन अपन युगक चर्चा
करैत कहने छलाह जे 'आजुक युग बड़ कठिन युग थिक। कठिन एहि हेतुक जे ओ अधलाह
थिक। एहि देशक कें अधिक पूंजी नहि छैक।'




किन्तु कर्मनीतिज्ञ नेहरूजी एकर विपरीत लिखने छलाह--'आजुक युग इतिहासक
गतिमय युग थिक, एहिमे जीवित आओर कर्मरत होएब उत्तम थिक।' जीवनक प्रति एहन
दृष्टिकोण हुनक व्यक्तित्व एवं लक्ष्य बुझवाक हेतु पर्याप्त थिक। इएह भावना हुनका वि•ाक नेता
लोकनि सँ फराक करैछ।



भारतमे नायकक पूजाक प्रथा आदिकाल सँ रहल अछि। राम, कृष्ण, बुद्धदेव आदि
ई•ार जकाँ पूजल जाइत छथि तें यदि नेहरूजीकें आइ अवतार कहल जाइन्हि तँ अतिशयोक्ति
नहि भए सकैछ। भारतीय जनताक प्रति भक्ति, एवं स्नेहक कारणें ओ गत पैंतालीस वर्ष सँ
अपन निःस्वार्थ राष्ट्र सेवा सँ एहि राष्ट्रजीवनक अंग तथा एहि विशाल उपमहाद्वीपक प्रत्येक
भारतीय परिवारक सदस्य मात्र नहि बनल छलाह प्रत्युत प्रत्येक परिवारक घर-घरमे उपास्यदेव
सदृश पूजित छलाह।



ई•ार आओर महान पुरुषक परिभाषा वा दार्शनिक चिन्तन एवं विवेचन सँ अनभिज्ञ
अबोध बालक समुदाय द्वारा 'चाचा नेहरु' बनि गेल छलाह जे कि लोकप्रियताक प्रतीक बुझना
जाइछ। एहन सौभाग्य प्रायः कोनहु अन्य देशक नेताकें नहि प्राप्त भेल छलन्हि। थोड़मे इएह
कहल जा सकैछ जे भारतकें जाहि तरहें ओ सत्रह वर्ष राजनीतिक स्थिरता तथा लोकतंत्रक
आधार देलथिन्ह तथा पंच वार्षीय योजना, धर्मनिरपेक्षता तथा सामाजिक परिवर्तन द्वारा जाहि
तरहें भारतक स्वरूप बदललन्हि ओकर तुलना इतिहासमे प्रायः कोन एक नेतासँ नहि भए
सकैछ।



भारतक विषय मे जखन कखनहु ओ किछु लिखलन्हि आ सोचलन्हि, ओ सतत् एशिया
आओर वि•ाक सम्पृक्त मानलन्हि। ओ लिखने छथि जे इतिहास एक संगठित इकाई थिक
आओर कोनहु देशक इतिहास

ताधरि बुझबा मे नहि आब सकैछ जा धरि ई नहि ज्ञात कए लेल जाइछ जे संसारक अन्य
भागमे की सभ घटित भेल अछि वा की घटि रहल अछि। उपर्युक्त कथन सँ ज्ञात होइछ जे
नेहरूजी मे एक इतिहासकारकक सूक्ष्म अन्र्तदृष्टि छलनि। प्रत्येक घटनाक तह मे ओ मनुष्यक
स्वरूप आओर उद्देश्य कें तकैत छलथिन्ह।



नेहरूजीक कथन छलन्हि जे अपना ह्मदय कें जतेक सम्भव हो विशाल राखक चाही।
अनन्तक भाषा मे सोचवाक चाही। नेहरु जी एही अनन्त, विराट व्यापकताक उपासक छलाह
अतः ओ घृणा आओर भय कें जीति सकलाह। क्षणिक आओर शा•ात मे भेद करवाक क्षमता
आबि सकलन्हि। यथार्थतः हुनक ह्मदय विशाल छलनि। कवि ह्मदय छलनि। जतय द्वैतक स्थान
नहि छल।



आत्मबल एवं अदम्य साहसक धनी, निर्भीक नेहरुजी कें कखनहुँ अनियमितता,
अशिष्टता, अनैतिकता, अनुशासन हीनता एवं अव्यवस्था सह्र नहि छलन्हि। हुनक अभिप्राय
छलनि जे एहि सभ सँ देश, समाज वा व्यक्ति कखनहु आगाँ नहि बढ़ि सकैछ, प्रगति नहि कए
सकैछ। देशक संस्कृति जे कोनहु देशक हेतु गौरव एवं प्रतिष्ठाक वस्तु थिक, नष्ट भए जा


सकैछ।



नेहरूजी समस्त सि•ाक पीड़ित, शोषित आओर दलित जनकेर आशा आओर
आकांक्षाक केन्द्र छलाह। पीड़ित मानवताक पीड़ा अनाचार एवं असमानताक भावना हुनका
व्यथित कए दैत छलनि। इएह सूक्ष्म संवेदनशीलता हुनक महानता एवं लोकप्रियताक द्योतक
छल।



नेहरूजीकें ई अखण्ड छलन्हि जे एकता आओर अखण्डता स्वाधीनताक रक्षाक हेतु एवं
विकासोन्मुख होएबाक हेतु एकमात्र मार्ग थिक। एकता हमरा लोकनिकें निरक्षरता, निर्धनता एवं
वाह्र शत्रु सदृश प्रवल शत्रु कें पराजीत करबामे क्षमता एवं शक्ति प्रदान करैछ।



नेहरूजीक प्रतिभा वा विद्वता मात्र राजनैतिक क्षेत्रमे देखबामे नहि अबैछ प्रत्युत्
व्यक्तिगत जीवनक आनहु क्षेत्रमे हुनक क्षमता एवं बहुमुखी प्रतिभा सहजहि आकृष्ट कएलैछ।
नेहरूजी मे ज्ञानक पिपासा छलनि। ज्ञानक कोनहु क्षेत्र हुनका हेतु अगम्य नहि छल। ज्ञानक
वि•ामे ओ ओही अभिलाषा, उत्सुक, उमंग आओर सख्य भावसँ परिभ्रमण करैत छलाह जाहि
प्रकारें संसारक लोकसँ भेंट करवाक, परिचय करवाक एवं वि•ाक विषयमे ज्ञात करवाक हेतु
जिज्ञासु रहैत छलाह।



वैज्ञानिक युगमे देशक सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक उत्थानक हेतु विज्ञानक
विकास एवं प्रयोग आवश्यक बुझि सम्पूर्ण भारतवर्षकें वैज्ञानिक रूपमे देखए चाहैत छलाह।



वैज्ञानिक युगमे देशक विकासोन्मुख भावना सँ प्रेरित भए विज्ञानक प्रगति दिश जँ
आकर्षण छलन्हि तँ साहित्य एवं कलाक हेतु ह्मदयमे अनुराग स्नेह एवं अभिरुचि सेहो छलन्हि।
साहित्यिक ह्मदय सँ सौन्दर्यक दुरवीन लगाए सत्यक अनुसंधान करत छलाह।



हिनक साहित्यिक कीर्ति, विद्वता एवं कवि ह्मदय-भावना देखि विदेशक विद्वान आलोचक
कहने छथि जे 'वि•ामे एहन नेता दोसर केओ नहि छथि जनिका राजनीति आओर साहित्य दुनू
पर समान अधिकार होन्हि।"



नेहरूजीकें देशक विभिन्न भाषा पर यथा अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू, फारसी एवं अन्य क्षेत्रीय
भाषाक संग-संग किछु विदेशी भाषा पर समान अधिकार छलन्हि जे कि आन कोनहु देशक
नेतामे एक संग-विभिन्न भाषाक ज्ञान

होएब नहि पाओल जाइछ।



नेहरूजीक भाषामे संगीतमयताक संग-संग एक वैज्ञानिकक सत्यान्वषी आग्रह सेहो
देखबामे अबैछ। जनता हुनक भाषणमे व्याकरण पर ध्यान नहि दैत छल अपितु हुनक ह्मदयक
भावना पर। अपार जन समूह हुनक भावनाक तरंगमे तरंगित होमय लगैत छल।




नेहरूजीक जीवनक सम्पूर्ण इतिहास देखला उत्तर ई निर्विवाद भए जाइछ जे ओ 'जन
विराट' वैदिक कल्पनाकें अमर आकृति देलन्हि। फलस्वरूप ई•ारीय लीला जँ पारलौकिक सुख,
सम्पदा क प्रतीक बुझना गेल तँ नेहरूजी एहि लौकिक मानव मात्रक मुक्ति आओर शान्तिक
साकार स्वप्न बनि गेलाह अछि।



वि•ामे एखन धरि जे कोनो नेता, विजेता, प्रणेता भए गेलाह अछि, हुनका लोकनिक
जीवन मात्र एकांगी जीवन लीला छल। सम्राट अशोक कलिंग केर मैदान मे तरुआरि फेकि
देलन्हि। वाशिंगटन अमेरिकाक स्वतंत्रताक हेतु तरुआरि उठौलन्हि, लेनिन, माक्र्स केर मन--
मस्तिष्क कें अभिव्यक्ति देलन्हि, महात्मा गांधी स्वतंत्रताक यज्ञवेदीक रचना कएलन्हि आओर
रवीन्द्रनाथ टैगोर स्वतंत्रताक आह्वान गीत गओलन्हि। किन्तु 'युग पुरुष' नेहरूजी जँ एक दिश
अशोकक वीरता पओलन्हि तँ दोसर दिश गाँधीजीक उदार विशाल एवं अदम्य साहसक सम्बल
अपनौलन्हि, लेनिनकेर बुद्धि प्राप्त कएलन्हि तँ टैगोरक भावुकता सेहो पओलन्हि। एतवहि नहि
इतिहास ईहो सिद्ध कए देलक अछि जे निष्काम, कर्मयोगी 'युग पुरुष' मे कृष्ण-वासुदेवक
राजनीति, समस्त शरीर एवं मस्तिष्क मे व्याप्त छलन्हि।



अतः तीन-मूर्ति भवन मे रहैत रहैत नेहरूजी स्वयं तीन-मूर्ति भए गेल छलाह-एक महान
व्यक्तित्वमे सत्यं, शिवं-सुन्दरम केर तीनू विभूति समाहित भए गेल छल।



.. .. .. ..

पिपासा

प्रो0 श्री रामदेव झा



पात्र--



उत्तंक -- एक तपस्वी

चाण्डाल -- छद्मवेशमे इन्द्र

कुष्ण --

भद्रमुख -- उत्तंक क शिष्य



(दूर-दूर धरि परसल असीम वालुका-राशिक बीच स्थान-स्थान पर ठुट्ठ बबूरक गाछ।
मध्याह्न कालक प्रखर सूर्यक किरण सँ उत्तप्त धरती।



मुनि उत्तंक अपन शिष्यक संग अबैत छथि। कुन्द कुसुम सन उज्ज्वल जटा, वल्कल
धारण कयने, हाथमे एक दंड ओ कमंडलु। मुख-मंडल श्रम ओ स्वेद बिन्दुसँ भरल। तीव्र गतिसँ
•ाास चलि रहल छनि। शुष्क ओ चंचलतासँ बोध होइछ जे ओ पिपासासँ आकुल छथि। हुनके
पाछाँ युवा ब्राहृचारी-वेशमे शिष्य भद्रमुख

छथिन हुनको हाथमे कमंडलु छनि। ओहो गुरुवते श्रान्त छथि।




उत्तंक--ओह, आब कतेक दूर अछि मरुभूमि पार करब?



भद्रमुख--गुरुदेव, एखन सप्त योजन धरि हमरा सभकें चलबाक अछि।



उत्तंक--आब नहि चलि सकब। आह, एतेक उत्ताप ! बूझि पड़ैत अछि जेना प्रलयकालीन
सूर्यक प्रचण्ड किरण आइए अवतीर्ण भऽ जायत। पृथ्वी यज्ञक हवन-कुंड जकाँ प्रज्वलित भऽ
रहल अछि आ' ओहिमे सम्पूर्ण सृष्टि हवि बनि रहल अछि।



भद्रमुख--मरुभूमिक धूलिकणसँ भरल उष्ण वायुक प्रवल वेगमे पड़ि ई शरीर सिद्ध भऽ
रहल अछि। गुरुदेव ! बूझि पड़ैत छैक जेना सम्पूर्ण वायुमंडल मे सूर्य चूर्ण भऽ कऽ विकीर्ण भऽ
गेलैक अछि।



उत्तंक--भद्रदेव ! ओ जे वात्याचक्र उठि रहल छैक से तँ जेना हुताशक धधरा जकाँ
बूझि पड़ै छैक। जेना आकाशकें स्पर्श करबाक लेल जाइत हो। भद्रमुख ! आह, आब पिपासा सँ
त्राण नहि भेटि सकत। जल चाही, जल। जीवन-रक्षाक लेल चुरुओ भरि जल चाही।



भद्रदेव--क्षमा हो गुरुदेव ! कमंडलुक जल तँ समाप्त भऽ गेलैक। जे कनेक छलैक से
एहि उष्णतामे वाष्पीभूत भऽ गेलैक।



उत्तंक--विन्दुओ भरि जल नहि छैक?

भद्रमुख--(कमंडलु देखैत) नहि छैक गुरुदेव !



उत्तंक--(निराश होइत) हमरा ज्ञात छल वत्स, जे ओहिमे जल नहि छैक। किन्तु एकटा
भ्रम छल। ओहि भ्रममे कनेक तृप्ति जकाँ भेटल छल।



भद्रदेव--(एक दिस दूर दृष्टि दऽ कऽ) गुरुदेब ! गुरुदेब !! वैह देखल जाओ--दक्षिण
दिशामे वृक्षसँ कनेक हटि सरोवर बूझि पड़ैत अछि। आह (प्रसन्न भऽ) केहन तरंगित भऽ रहल
छैक स्वच्छ जल राशि ! गुरुवर, हम एखने लऽ अनैत छी। (उद्यत होइत अछि।)



उत्तंक--भद्र, ओ जल नहि थिकैक। जेना संसारमे माया छैक--असत्य, अस्तित्वहीन--
तथापि मानव ओकरा पाछाँ भ्रान्त भेल रहैत अछि। तहिना ई थिकैक मरुभूमि माया, मरीचिका।
बालुका समूहपरसँ परावर्तित किरणसँ ओ कम्पायमान बूझि पड़ैत अछि।



भद्र0--आचार्य......!



उत्तंक--तथापि अहाँ जा सकैत छी। कमसँ कम अहाँक आगमनक काल धरि तँ जलक
आशा बनल रहत ! ओहो आशा तँ कनेक सान्त्वना दऽ सकत। किन्तु मोन राखब, जाहि ठामसँ


हमर शरीर कम्पायमान दृष्टिगोचर हो, ओहिठामसँ आगाँ नहि बढ़ब।



भद्र0--आचार्यक जेहन आज्ञा। (जाइत छथि)

उत्तंक--(आकुल होइत) एहि निर्मम प्रकृतिक तियामक भगवान, अहाँ कतऽ छी? (किछु
स्मरण भऽ अबैत छनि) भगवान् ! भगवान् कृष्ण ! महाभारतक युद्ध समाप्त कऽ कऽ द्वारका-
गमनक पथमे रही--ओहि समय दर्शन भेला पर अहाँ स्वयं वर देने रही जे जखन पिपासु होयब
तँ जल उपस्थित भऽ जायत। आइ ओ अवसर उपस्थित भऽ गेल अछि, तैओ अहाँ मौन छी?
भगवान् बासुदेव, आउ आ' अपन वचन पूर्ण कऽ जाउ (वन्दनामे मस्तक नत भऽ जाइत छनि)



(किछु क्षणक उपरान्त एक चाण्डालक वेश--मलिन, घृणित, अद्र्धनग्न शरीर। जीर्ण -
शीर्ण, मैल फाटल अधोवस्त्र। हाथमे तीन चारि शिकारि कूकुरक डोरी धयने। हाथमे तीर-धनुष,
पीठपर चर्म-मशकमे जल भरल, ओहीमे डोरीसँ लटकैत बाँसक एक चोड़ा)



चाण्डाल--महामुनि ! अपनेक मुखमण्डलपर जे अस्त-व्यस्तता अछि, जे आकुलता अछि
से सिद्ध करैत अछि जे अपने पिआससँ व्यग्र छी।



उत्तंक--पिपासा...पिपासा ! एहि निर्जल मरुभूमिक मात्र एहि निर्जन मरुभूमिमे मात्र एके
टा वस्तु सत्य छैक पिपासा। एहि ठाम एहि पिपासाक महाजालसँ क्यो निस्तारक नहि पाबि
सकैछ।......ओह, कतेक दूर चल गेलाह भद्रमुख?



चाण्डाल--एहि जनविरहित प्रान्तरमे अपने सन तेजवानक दर्शन पाबि हम कृतार्थ भऽ
गेलहुँ। महामुनि, अपने एहि भूमिक महामात्य अतिथि छी, तें एहि तुच्छ सेवकके सेवा करबाक
अवसर देल जाओ। (मशकसँ चोङामे पानि ढारि उतच् दिस बड़बैत) जल ग्रहण कयल जाओ
महामात्य !



उत्तच्--(ओकरा दिस ताकि) तों....तों के छह एहि विचित्र वेशमे ? कतऽसँ ई जल लऽ
कऽ उपस्थित भेलाह अछि?



चाण्डाल--पंचम वर्णक एक साधारण मृगया-जीवी ! वन्यजन्तुक अहेर कऽ कऽ उदरपूर्त्ति
करैत छी। मृगयाक विभिन्न आवश्यक वस्तुक संग जलो रखैत छी संगमे। एमहरसँ जाइत
अपनेकें व्यग्र देखल। (कनेक रुकि) जल लेबामे अपने किऐक तारतम्य कऽ रहल छी? लेल
जाओ, कंठ सिक्त कयल जाओ।



उत्तच्--चाण्डाल ! तों चांडाल छह? हम तोरा हाथक पीब? जल विना तड़पि-तड़पि कऽ
मरि जायब से स्वीकार, मुदा तोरा हाथक जल पीबि कऽ जातिच्युत नहि होयब, संस्कारभ्रष्ट
नहि होयब।




चाण्डाल--व्यर्थ शंका करैत छी। अपनेक तपस्याक ज्योतिमे वि•ाक समग्र मलिनता जरि
जा सकैत अछि आ हम तँ हमही छी। यदि एकबेर एको विन्दु जल हमरा हाथ सँ ग्रहण कऽ
लेब तँ हमर सम्पूर्ण कुलक उद्धार भऽ जायत। कृपा करू। हमर आतिथ्य स्वीकार करू।



उत्तंच्--तो अस्पृश्य भऽ कऽ एक ब्रााहृणसँ आग्रह कऽ रहल छह। साधारण शिष्टाचारक
सीमाक उल्लंघन कऽ कऽ धृष्टताक परिधिमे परिणत भऽ रहल छह। शास्त्रमे जकरा स्पर्शों
करब निषेध छैक, जे अस्पृश्य अछि तकर छुइल जन कोना ग्रहण करू?



चाण्डाल--अपने तँ महान् ज्ञानी छी। तथापि एक बात अवश्य कहि सकैत छी जे हमहू
मनुष्य छी। प्रत्येक मानवक धमनीमे एके रंगक रक्त प्रवाहित होइत छैक। एके रंग क्षुधा,
पिपासा, भय प्रसन्नता होइत छैक। अपने अनुभव करी वा नहि करी, मुदा हम अनुभव कऽ रहल
छी जे मृगयामे दौड़ैत-दौड़ैत जहिना हम जल पीबाक लेल आकुल भऽ उठैत छी तहिना अपनहुँ
अकुलाइत होयब। की ई असत्य थिकैक मुनिवर ! की एखनो अपनेक अन्तर्मन एहि मशकमे
भरल जलकें लुब्ध आँखिएँ नहि देखि रहल अछि? की एक अदम्य तृष्णा नहि जागि गेल अछि?



उत्तच्--तों सत्यसँ दूर नहि छह आगन्तुक !



चाण्डाल--मनुष्यक अन्तर्वेदनाक अनुभूति एक मनुष्ये कऽ सकैत अछि। ताहूमे ओ मनुष्य
जे साधारण मानवत्वक धरातलसँ ऊपर ऊठि महामानवक पथपर जा रहल अछि। ओकरामे तँ
सम-भावक उदय होयबाक चाही।



उत्तच्--आगन्तुक ! एक साधारण मनुष्यक विचार ओ विवेकसँ परिप्लावित रहितो तोहर
जल लेबासँ विवश छी हम। युग-युगक सामाजिक आ शास्त्रीय परम्पराक विरुद्ध हम चलिए
कोना सकैत छी?



चाण्डाल--मुनिवर ! हम जातिसँ अवश्य अस्पृश्य छी, मुदा जल नहि अपावन अछि।
गंगाक जल भ्रष्ट नहि होइत छैक। गंगामे जाकऽ समग्र कलुष प्रवाहित भऽ जाइत छैक।
अपनेक तपस्या-रूपी गंगाक स्पर्श भैओ कऽ ई जल अपावन रहि जायत ! पीबिकऽ देखिऔक,
एहिमे अमृतक आनन्द भेटत।



उत्तच्--चाण्डाल ! तों एतेक हठ धर्मी किएक भेल जाइत छह? एना दुराग्रह किएक कऽ
रहल छह? एक तपस्वीक वचनक उपेक्षा किएक?



चाण्डाल--एक टा मानव-धर्मक आह्वान छैक तें मुनिवर ! संभवक छैक, अपनेक परीक्षे
भऽ रहल हो? अपनेक साधना, तपस्या ओ व्यक्तित्वक आधार कतेक गंभीर, कतेक उदात्त,
कतेक विशाल अछि तकरो परीक्षण तँ भऽ सकैछ?




उत्तच्--(क्रुद्ध भऽ कऽ) हमर परीक्षा?....हमर परीक्षा !!... एक चाण्डाल द्वारा महर्षि
उत्तंकक तपोबलक परीक्षा !!! एक ब्रााहृणक अपमानक कुफल प्रत्यक्षे भेटि जयतह।



(शाप देबाक हेतु हाथ उटाकऽ तत्पर होइत छथि, चाण्डाल माथ झुका लैत अछि।
दोसर दिससँ कृष्ण अबैत छथि। पीताम्बर धारण कयने, माथपर मयूर-पांखिक पंक्ति, अजानु
पुष्पमाला लटकैत--मुखपर मुस्की, मुदा गंभीर व्यक्तित्वक आभास भेटैत।)



कृष्ण--शान्त महामुनि ! क्रोध अहाँके शोभा नहि दैत अछि। (एहि बीच चाण्डाल जेम्हरसँ
आयल छल तेम्हरे चल जाइत अछि।)



उत्तंक--(और क्रोधित होइत) ओह कृष्ण ! अट्ठारह अक्षौहिणी मानव-समुदायकें अपन
कुटिल नीतिसँ युद्धक अग्निमे झोंकिकऽ हमरो सँ कुटिलता देखा रहल छी? यैह थीक अहाँक
वचन? कहाँ अछि अहाँक वरदान? मिथ्यावादी, अवि•ाासी, ब्रााहृणक अपमान-कत्र्ता ! अहूँकें एहि
चाण्डालक संग भस्मीभूत कऽ दैत छी।

(अपन कमंडलुसँ जल ढारबाक प्रयास करैत छथि।)



कृष्ण--व्यर्थ अछि ओहि रिक्त कमंडलुसँ जल ढारब। ओहिमे जल नहि अछि जकरा
अभिमन्त्रित कऽ कऽ शाप दऽ सकब। मुनिवर ! यदि ओहिमे जलो रहैत तँ ताहिसँ दू व्यक्तिकें
अभिशाप कऽ कऽ प्राणापहरणसँ बेसी उचित, उपयोगी कार्य होइत एक व्यक्ति प्राणरक्षा। महान्
व्यक्तिक अलंकरण क्रोध नहि, क्षमा होइत छनि। उदात्त ओ उदार भावना मानवकें महामानवक
सिंहासनपर बैसा दैत छैक मुनिवर !



उत्तंक--(उत्तंक औरो क्रुद्ध भऽ उठैत छथि) वासुदेव.... !!!



कृष्ण--युग-युगक कठोर साधना ओ तपस्या कोन कार्यक यदि मनुष्य-मनुष्य नहि बनि
सकल? यदि अपना अन्तरमे सहानुभूतिक भागीरथी नहि बहा सकल? यदि अपना ह्मदयमे
दानवी भावनाक दमन कऽ कऽ देवत्वक स्थापना नहि कऽ सकल?



उत्तंक--(उत्तंक एक बेर चौंकि उठैत छथि) क्षमा हो वासुदेव, क्षमा। पिपासाक आकुलता
ओ तपोबलक अभिमानक कारणें विवेक हमर संग छोड़ि देने छल। हम अन्ध भऽ गेल छलहुँ,
दृष्टिहीन, ज्योतिहीन, ज्ञानहीन...!



कृष्ण--द्विजवर, हमर कथन असत्य नहि अछि। वस्तुतः हमरे आग्रहपर ओ व्यक्ति अहाँके
जल पीबाक आग्रह कयने छल।



उत्तंक--लीलाधर, हम तँ साधारण मनुष्य छी। की एहि तरहें हमर परीक्षा लेब उचित


छल? एतेक विचार तँ अवश्य करितहुँ जे एक ब्रााहृण विआससँ मरि जायत, मुदा चाण्डालक
जल नहि पीत? युग-युगसँ बनल जातिगत संस्कार ओकरा से करऽ देतैक? भगवान् ! अहाँ
द्वारा प्रेषित ओहि व्यक्ति एवं जलक अपमान अज्ञानतावश निरीह भावें भऽ गेलैक। हम निरपराध
छी। (पाछाँ घूमि, चांडालकें नहि देख) अरे ! ओ तँ देखि नहि पड़ैत अछि ! विलुप्त भऽ गेल !



कृष्ण--शापक ज्वालामे भस्म होयबाक लेल ठाढ़ कोना रहैत?

उत्तंक--हम जा रहल छी। वि•ाक जाहि कोनो कोनमे भेटत ओहि मनुक सन्तानसँ क्षमा
माङि ओकर प्रदत्त जल अवश्य पीब।

कृष्ण--ओकरा आब ताकि नहि सकब मुनिवर ! ओ भेटि नहि सकैत अछि। ओ स्वयं
इन्द्र छलाह।

उत्तच्--देव...राज--इन्द्र--!!! (आश्चर्यक भाव)

कृष्ण--हँ, मुनिवर ! हुनका हाथमे साधारण पानि नहि, स्वर्गक अमृत छलनि, अमृत।

उत्तच्-पुरुषोत्तम, मानसपरसँ एक टा आवरण हटल जा रहल अछि। एक अलौकिक
तेजोमय रश्मि अवतरित भऽ रहल अछि, जकर प्रकाशमे पहिल वस्तु दृश्यमान भऽ रहल अछि
जे ह्मदयक सम्पूर्ण स्नेह ओ सद्भावनासँ देल साधारणो मनुष्यक जलमे अमृतक स्वाद ओ गुण
रहैत छैक।



कृष्ण--अहाँकें पिपासा आक्रांत कयने छल ई देखि हम देवराजसँ आग्रह कयनिअनि जे
ओ अहाँकें अमृत पिआबथि। हुनक उत्तर भेटल जे मनुष्यकें अमृत नहि भेटि सकैछ। कोनो आन
वस्तु पिअबिअनु।



उत्तच्--तँ की ओ इन्द्र नहि छलाह? हुनका हाथमे अमृत नहि छलनि?



कृष्ण--इन्द्र छलाह। हुनका हाथमे अमृते छलनि। अहाँके साधारण जल कोना दितहु
पीबाक लेल। तें बहुत आग्रह कयलिअनि तँ ओ चाण्डाल बनिकऽ पानिक रूपमे अमृत पिआयब
स्वीकार कयलनि, यदि उत्तच् नहि पीताहतँ नहि पिअयबनि।

उत्तच्--चांडालो तँ एहि अनन्त सृष्टिक अंगे थिक। ओहि मानवसन्तानक एक मानव-
संतान भऽ अनादर कऽ कऽ एक महान अक्षम्य अपराध कयलहुँ हम।

कृष्ण--मुनि, हम इन्द्रक कथन स्वीकार क लेलहुँ जे अहाँ तँ महान् ज्ञानी छी, महात्मा
छी। उदारचेता छी। अहाँ तँ ऊँच-नीच, अवर्ण-सवर्ण, निज-अन्यक भावनासँ बहुत ऊपर ऊठि
गेल होयब। अहाँक लेल सम्पूर्ण वि•ो अपन कुटुम्बक परिसीमामे आविगेल होयत। अहाँ ओहि
चांडालक हाथक जल ग्रहण करबामे संकुचित नहि होयब। मुदा हमर से धारणा सिद्ध नहि भऽ
सकल।



उत्तंक--वासुदेव ! आइ हमरा जीवनमे जाहि महान् सत्यक उद्घाटन भेल अछि, युग-
युग धरि एहि सत्यक रक्षा करैत रहब। (कृष्णक पैरपर खसैत छथि।)




कृष्ण--उठू मुनिवर, भद्रमुख जल लेने आबि रहल छथि (अन्तर्धान भऽ जाइत छथि।)



भद्रमुख--(जल लेने प्रवेश भऽ कऽ उत्तंककें पड़ल देखि) अरे गुरुदेव पिपासासँ आकुल
भऽ मूÐच्छत भऽ गेलाह। आह, गुरुदेव जल पीअल जाओ।



(उत्तंक चौंकि कऽ उठैत छथि, चारू कात चकित दृष्टिएँ ताकि भद्रमुखक हाथसँ
कमंडलु लऽ लैत छथि। एक बेर आकाश दिस ताकि जल पीबऽ लगैत छथि।)



.. .. .. ..



परिशिष्ट

टिप्पणी

पक्षधर मिश्र



चन्दा झा (जन्म 1830, मृ0 1907) मिथिला-भाषा-रामायणक रचना कय अमर भऽ गेल
छथि। कविरूप मे त ओ यशस्वी छथिये संगहि आधुनिक मैथिली साहित्य मे गद्यक सूत्रपात
हुनकहि सँ होइछ। हिनक गद्य रचना मे विद्यापति कृत पुरुष-परीक्षा क अनुवाद प्रसिद्ध अछि।
प्रस्तुत गद्य रचना मे कवी•ार, म0 म0 पक्षधर मिश्र क वंश ओ कृतित्व पर प्रकाश देलन्हि
अछि। ई अंश हुनक मौलिक गद्य-शैली क उदाहरण-स्वरूप द्रष्टव्य अछि।



अमरावती-महाराज हरसिंह देवक समय मे कोइलख क दक्षिण भाग सँ लय बहेड़ी प्रान्त
धरि तेरह-चौदह कोस, लाम, डेढ़-दुई कोस चाकर 'अमरावती' नामक महानगरी बसाओल मेल
छल। पक्षधर मिश्रक जन्म स्थान भटपुरा ग्राम एकरहि अन्तर्गत छल।





सुकन्या



लालदास (जन्म 1873 मृ0 1920)क लिखल रमे•ार चरित मिथिला रामायण प्रसिद्ध
अछि। अपन रामायणक रचना कय ओ जाहि तरहें चन्दा झा क गद्य लेखन कार्य कें आगू
बढ़ौलन्हि। प्रस्तुत गद्य हुनक स्त्री-धर्म शिक्षा सँ अवतरित अछि। ब्रााहृण ग्रन्थ एवं पुराण सभ मे
च्यवन-सुकन्याक कथा देल गेल अछि जकर सार इयह जे बूढ़ झुनकुट्ठ च्यवन ऋषि कें अ•िानी
कुमार फेर सँ युवक बना देलथिन्ह, जाहि सँ ओ सुकन्या क संग भोग-विलास मे समर्थ भेलाह
और एकर पुरस्कार स्वरूप अ•िानी-कुमार च्यवन द्वारा देवता लोकनिक यज्ञ मे सोमपान क
अधिकारी बनाओल गेलाह। च्यवन-सुकन्याक ई उपाख्यान भारतीय जनताक निकट पूर्ववते
आदृत एवं महत्व पूर्ण अछि एवं प्रस्तुत गद्यावतरण मे तकरहि उल्लेख अछि।



मिथिला-भाषा-विचार




म0 म0 मुरलीधर झा (1868-1929)क ई विचार-प्रधान रचना मिथिला मोद मे प्रकाशित
भेल छल। मैथिल गद्यक विकास मे एहि पत्रिकाक अभूतपूर्व योगदान रहल। एहि दिशा मे
'मोद'क संस्थापक-सम्पादक योगदान रहल। एहि दिशा मे 'मोद'क संस्थापक-सम्पादक म0 म0
मुरलीधर झा क सेवा स्तुत्य छन्हि। म0 म0 मुरलीधर झा, संस्कृत-साहित्यक अमित ज्ञानराशि
लय मातृभाषाक सेवा कैलन्हि एवं मैथिली गद्यक अभिवृद्धि मे लगन, निष्ठा एवं आस्थापूर्वक
योगदान देलन्हि। सर्वप्रथम 'शैली' (वर्ण-विन्यास) क विविधता पर इयह विचार कैलन्हि तथा
मैथिलीक विकासक लेल उदार दृष्टिकोण ग्रहण करबाक विचार देलन्हि। प्रस्तुत निबन्ध मे से
द्रष्टव्य अछि।



ग्रीष्म वर्णन



म0 म0 डा0 श्री उमेश मिश्र, मैथिली क महान उन्नायक एवं विशिष्ट गद्य लेखक छथि।
प्रस्तुत रचना, वैदेही समिति द्वारा प्रकाशित रचना संग्रहक पहिल भाग सँ एतय लेल गेल अछि।
ज्योतिरी•ार क वर्णरत्नाकर मे देल गेल 'ऋतु वर्णना'क पश्चात् ऋतुक एतेक व्यापक ओ सूक्ष्म
वर्णन अन्यत्र उपलब्ध नहि अछि। महामहोपाध्याय जी क रचनामे वर्णनात्मक गद्यक विकसित
रूप पबैत छी और प्रस्तुत गद्य कें तकर उदाहरण स्वरूप राखल जा सकैछ।



हव्यउदेवता निमित्तक। कव्यउपितर निमित्तक।

पाठोन, रोहित, राजीव, सिंहतुण्डउमाछक भेद।



श्रमक महत्त्व



ज्यो0 बलदेव मिश्र, संस्कृति, रामायण शिक्षा, भारत शिक्षा, गपशप-विवेक आदिक नामे
अनेक गद्य ग्रन्थक रचना कैने छथि। अवतरित गद्य हुनक नव प्रकाशित पोथी 'समाज' क
थीक। एहि निवन्ध मे विद्वान लेखक मिथिलाक सामाजिक जीवनक पृष्ठभूमिक जीवनक पृष्ठभूमि
मे श्रमक महत्त्व क प्रतिपादन कैने छथि।



निबन्धक स्वरूप विवेचन



कुमार श्री गज़्र्निन्द सिंह जी क प्रस्तुत गद्य, बैदेही समिति द्वारा आयोजित प्रथम
मैथिली लेखक

सम्मेलनक निवन्ध विभागक अध्यक्षपद सँ देल गेल भाषण क अंश थीक। आधुनिक साहित्य मे
बढ़ैत निबन्धक महत्त्व कें ध्यान में रखैत, विद्वान लेखक निबन्धक भारतीय परम्परा ओ तकर
वत्र्तमान स्वरूप पर प्रकाश देने छथि।



आर्य क आदि भूमि आर्यावत्र्त



मातृभाषाक अनन्य अनुरागी ओ विद्वान स्व0 अच्युतानन्द दत्त जी (मृ0 1944) मैथिली मे


रघुवंश, महाभारत आदि ग्रन्थक रचना कय अमर भऽ गेल छथि। 'दत्त' जी क ई निबन्ध अपन
विषयगत उपयोगिता क कारणें अनेक संग्रह-ग्रन्थ में संकलित होइत रहल। एहि मे एहि
सिद्धान्त क खण्डन कैल गेल अछि जे आर्य लोकिन अन्यत्र सँ आबि भारतमे बसलाह एवं अपन
पौराणिक एवं ऐतिहासिक परम्परा सँ सबल दृष्टान्त दय, तर्क संगत विवेचन, आर्यावत्र्तहि कें
आर्यक आदिभूमि सिद्ध कैल गेल अछि।



वैज्ञानिक आविष्कार मे आकस्मिकताक प्रभाव



पं0 श्री जगन्नाथ प्रसाद मिश्र जी, राष्ट्रभाषाक विशिष्ट विद्वान ओ यशस्वी लेखक छथि।
मातृभाषा मे लिखित हिनक ई निबन्ध छात्रेपयोगी अछि। 'विशेषज्ञान' कहि, विज्ञान क जे
परिचय देल जाइछ तकरहु विकास मे आकस्मिकताक प्रबल हाथ रहलैक अछि। प्रस्तुत निबन्ध
मे अनेक उदाहरण दय एही तथ्य कें प्रकाशित कयल गेल अछि।



ग्राम सेविका



नारी जागरण, श्री हरिमोहन झा जी क कथा-साहित्यक प्रधान स्वर रहलन्हि अछि।
प्रस्तुत कहानी 'ग्राम सेविका' मे जाग्रत नारी क आहि मंजुल, मगलमय मूर्ति कें प्रतिष्ठापित
कैल गेल अछि जे अपन शिक्षा ओ सेवा-साधना क बलें सभक ह्मदय कें जीति लत अछि तथा
बूढ़-बुढ़ानुसक आशीर्वादक पात्र बनैत अछि। भाषाक प्राञ्जल प्रवाह हिनक गद्य शैलीक विशेषता
अछि। व्यंग्य-विनोदक प्रयोग एकरा प्रभावोत्पादक बनबैछ।



महाकवि चन्दा झा



श्री रमानाथ झा जीक नाम मैथिलीक प्रमुख शैलीकार मे लेल जाइत अछि। मातृभाषा क
सेवा विविध प्रकारें सम्बद्ध रहि ओकर बिकास मे महत्त्वपूर्ण योगदान दैत रहलाह अछि। एतय
विद्वान लेखक महाकविक मैथिली सेवा-साधना कें प्रकाशित कय मैथिलीक नवयुवक
अनुसन्धित्सु कें प्रेरणा दैत छथि।



साहित्यिक शिक्षक भविष्य



न्यायमूर्ति श्री सतीश चन्द्र मिश्र मातृभाषाक अनन्य अनुरागी आ पृष्ठ पोषक छथि।
हिनक प्रस्तुत निबन्ध, मैथिली नवीन साहित्यक प्रथम भाग सँ लेल गेल अछि। वत्र्तमान
वैज्ञानिक युग मे साहित्य शिक्षाक भविष्य पर चिन्ता व्यक्त करैत, विद्वान लेखक एहि शा•ात
समस्या दिश ध्यान आकर्षित कैलन्हि अछि तथा साहित्य-शिक्षा कें मानसिक विकासक अनिवार्य
साधन कहलन्हि अछि।





मिथिला




'सुमन' जी क ई गद्य रचना, साहित्यक गरिमा सँ समृद्ध अछि। एतय पौराणिक ओ
ऐतिहासिक युग मे मिथिलाक गौरव ओ समृद्धिक उल्लेख कय ओकर वत्र्तमान अधोगति क
मार्मिक संकेत भेटत। शाब्दिक सारल्यक अभावहु मे भाषा-सौष्ठवक परिष्कृत रूप द्रष्टव्य।
आलोचक लोकनिक दृष्टि मे 'सुमन' जी संस्कृत कें गलाक मैथिलीक श्रृंगार करैत छथि।



काव्य



प्रो0 श्री कृष्ण मिश्रक ई निबन्ध रचना संग्रहक पहिल भाग सँ लेल गेल अछि। एहि मे
भारतीय काव्य-शास्त्रक आलोक मे काव्यक परिभाषा एवं ओकर प्रयोजन पर विचार कैल गेल
अछि। सरल एवं सुस्पष्ट शैली मे अभिव्यक्त एहि विचारणीय निबन्ध मे ठाम-ठाम साहित्यक
मूलभूत आदर्शक विषय मे विद्वान लेखकक निजी बिचारक सेहो निदर्शन कछि।



बन्दी राजकुमार



श्री काञ्ची नाथ झा 'किरण' क अवतरित अंश, हुनक ऐतिहासिक नाटक 'विजयी
विद्यापति' क एक दृश्य थीक। प्रस्तुत अंश मे व्यक्ति स्वातन्त्र्य ओ देश प्रेमक उदाहरण प्रस्तुत
कैल गेल अछि। दिल्लीक पाठान सुलतान द्वारा शिवसिंह कें बन्दी बना कऽ दिल्ली लऽ जैबाक
जन श्रुति कें एतय वस्तु रूप में ग्रहण कैल गेल अछि। पात्रोचित भाषा-प्रयोग ध्यान देबाक
विषय अछि।



सलिला-देवी सरस्वती



डा0 महाश्वरी सिंह 'महेश' राष्ट्रभाषाक विशिष्ट विद्वान एवं मातृभाषाक अनन्य अनुरागी
छथि। प्रस्तुत निबन्ध, भारतीय संस्कृति, धर्म ओ साहित्यक प्रति हिनक गहन परिचय कें
प्रतिबिम्बित करैत अछि। वत्र्तमान मे वसन्तकालीन कला पूजा क रूप मे जाहि सरस्वतीक पूजन
होइछ तनिक महान्म्य-स्तोत्र वैदिक युग सँ प्रख्यापित कय, लेखक भारतीय संस्कृति ओ
वाङमय के प्रेरक अर्थ-गतिक प्रति पाठक कें जिज्ञासु बनबैत छथि। अतः अतीतक ज्ञान-
भण्डारक जे प्राणवन्त पक्ष अछि तकर कलापूर्ण-उद्घाटन प्रस्तुत निबन्धक विशेषता अछि।

साहित्य क आवेश



बाबू श्री बुद्धिधारी सिंह 'रमाकर', मैथिली क प्राध्यापक रूपें त प्रसिद्ध छथिये, संगहि
अनेक ग्रन्थ क रचना कय यशस्वी भेलह अछि। संकलित निबन्ध मे साहित्यक मूल उद्देश्य
आनन्दक उपलब्धिक लेल, विद्वान लेखक साहित्यक प्रति आवेश उत्पन्न करबाक परमार्श दैत
छथि। वस्तु प्रतिपादन मे निबन्धकारक मौलिक दृष्टिकोण द्रष्टव्य थीक।



नीलकमल ओ नीलगगन




प्रो0 श्री राधाकृष्ण चौधरी, पुरातत्वक विशेषज्ञ, विशिष्ट विद्वान ओ मातृभाषा क उन्नायक
छथि। प्रस्तुत रचना हुनक विचार-प्रधान निबन्धक कोटि मे आओत। विद्वान लेखक, भगवान क
भरोसे बैसल अकर्मण्य

लोकक उपहास कय कर्मठता पर जोर दैत ई विचार व्यक्त कैलन्हि अछि जे मानवता ओ कर्म
सचेष्टता, सैह जीवनक वास्तविक लक्ष्य होमक चाही। गम्भीर विचार सँ युक्त रहितहुँ, रोचक
उपस्थापन शैली मे विषय वेश सरस भऽ गेल अछि।



शिव संकल्प



प्रस्तुत निबन्धक लेखक श्री चन्द्रनाथ मिश्र 'अमर' मानवक सहजात प्रवृत्ति सद्गुणक
विकासक लेल शिवसंकल्प कें प्रतिपादित करैत छथि। विद्वान लेखकक दृष्टि मे, वत्र्तमान समय
मे राष्ट्रीय चरित्र क ह्यास ओ विशेषतः छात्रलोकनिक मध्य अनुशासनहीताक हेतु, एहो शिव
संकल्पक अभाव थीक। विवेचकक उपयुक्त शैली मे व्यापक राष्ट्रीय हितक चिन्तन, निबन्ध कें
प्रेरक अर्थ-गति सँ संयुक्त करैत अछि।



तन्वे मनः शिव सच्ल्पमस्तु उ हमर मनक संकल्प कल्याणकारी होअऽ।



पीयर आंकुर



अनुकूल वातावरण अभाव मे राष्ट्रीय प्रतिभा कोना कुंठित भेल अछि ओकर विकासक
मार्ग कोन तरहें अवरुद्ध भेल छैक, तकर निदर्शन मैथिलीक संवादनशील कलाकार श्री
ब्राजकिशेर बर्मा, प्रस्तुत निबन्ध मे कैने छथि। प्रतिपादन शौली मे सरलता ओ तथ्य निरूपण मे
हार्दिकता हिनक निबन्धक प्रमुख विशेषता थीक। एक कथाकार सदृश अपन निबन्ध कं आरम्भ
करैत छथि तथा अपन ह्मदयक समस्त भावुकता ओहि मे उझीलि दैत छथि। ललित निबन्धक
रचयिता मे बर्मा जी क विशिष्ट स्थान छन्हि।



संस्कृति



श्री दामोदर झा, अंग्रेजी साहित्यक विशिष्ट विद्वान ओ मैथिलीक सुलेखक छथि।
संस्कृति ओ कला क अतिरिक्त विभिन्न साहित्यिक मतवाद सँ सम्बद्ध हिनक प्रबन्ध मैथिली
साहित्य कें समृद्ध बनौलक अछि। प्रस्तुत रचना मे विद्वान लेखक संस्कृतिक प्रति विभिन्न धारणा
कें मन मे रखैत, भारतीय ओ पाश्चात्य मनीषी लोकनिक विचारक आलोक मे ओकर पुनव्र्याख्या
कैने छथि। संस्कृति सदृश बहुचर्चित विषय पर विभिन्न दृष्टियें विचार कय मानव व्यक्तित्वक
विकास मे ओकर योगदानक सम्यक् विवेचन प्रस्तुत निबन्ध कें विषयगत विशिष्टता प्रदान करैत
अछि।



अलका




श्री हितनारायण झा, मैथिलीक अनन्य अनुरागी ओ पुरान लेखक छथि। मैथिली मे
विविध विषयक रचना कय ई यशक भागी भेलाह अछि। प्रस्तुत रचना मे ओ कविगुरु
कालिदासक मेघदूतक अनुसरण करैत, कैलास शिखर पर अवस्थित 'अलका' क नैसर्गिक
चारुता ओ अव्याहत-सुख-विलास क सम्मोहक वर्णन कैलन्हि अछि। कालिदासक कविकल्पना
एतय एक सह्मदय गद्यकारक कोमल-बारीक शब्द-तन्तुक आवरण मे विशेष चमत्कार सँ युक्त
भऽ उठल अछि।





आधुनिक मैथिली कविता मे देश प्रेमक स्वर



प्रस्तुत निबन्ध मे आधुनिक कविता धारा क ओहि रूप पर प्रकाश देल गेल अछि जे
कविक देश प्रेम, राष्ट्रीय हित चिन्तना ओ अविरल मातृभाषा प्रेमक सम्मिलित सहयोग सँ
गतिशील अछि। मैथिली कविक विचार धारा कतेक जीवन्त, जगरूक ओ व्यापक हित सँ
समन्वित अछि तकर अनुभव एहि निबन्धक अवगाहन सँ हैत। प्रस्तुत गद्य रचनाक शब्द
सुकुमारता ओ प्रवाह युक्त शैली कविताक ह्मदयग्राही भाव सम्प्रेषण क समुचित वाहक भेल
अछि।



गाड़ीक पहिया



श्री मायानन्द मिश्र क कहानी मे आधुनिक जीवनक संवेदना व्यापक रूपें व्यञ्जित भेल
अछि। प्रस्तुत कहानी मे अभावग्रस्त जीवनक ह्मदयग्राही विश्लेषण भेटत। जीवन-यापनक लेल
नित्यप्रतिक आवश्यकता मे, सुख-शौखक पूर्ति कतऽ सँ होअऽ? इयह कारण अछि जे कहानीक
नायिका कें सोनक इयरिंग सँ वेशी सन्तोष लोहक छोलना कीनिक होइत छन्हि।



लघुताक महत्त्व



श्री केदानाथ लाभक तीनू लघुकथा मे लघुताक महत्त्वक प्रतिपादन भेल अछि। 'जीवन
छोटे किएक नहि होइक, मुदा जँ ओहि मे अपन विशिष्टता आ सौन्दर्य छैक तँ वैह महत्त्वक
बात। लघुता आ महत्ता व्यक्तिक सत्ता आ सौन्दर्य पर निर्भर करैत छैक; दीर्घायु आ अल्पायु
हैबा पर नहि।"



युगपुरुष



श्री दिने•ार झा 'दीन' क प्रस्तुत निबन्ध मे 'युगपुरुष' जवाहरलाल नेहरूक महान
व्यक्तित्व पर प्रकाश देल गेल अछि। 'नेहरू' निस्सन्देह एक विशिष्ट प्रतिभा सँ युक्त छलाह जे
यदा-कदा एहि धरती पर जन्म लैछ। ओहो युग विभूति जीवनक विभिन्न रूपक विवेचन प्रस्तुत
लेखक के अभिप्रेत छन्हि।




पिपासा



श्री रामदँव झाक प्रस्तुत एकांकी महाभारत मूलक अछि। परन्तु एहि प्राचीन घटनाक,
नाटककार युगानुरूप व्याख्या कैने छथि। महाभारत सँ गृहीत एहि कथावस्तु मे वत्र्तमान समाज
व्यवस्था मे प्रचलित अस्पृश्यता क निदान बड़ काशल सँ देखाओल गेल अछि।



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कविता करब हमरा लेल सहल छल परन्तु गद्य लिखब बड़ कठिन

बुझि पड़ैत छल। गद्य लेखक बनबा लेल बड़ तीक्ष्ण दृष्टिक

प्रयोजन पड़ैत छैक। एहि दृष्टिमे ओहि वस्तुक सभ

कें देखबाक क्षमता होइछ, जकरा दोसर केओ

नहि देखि पबैत छथि। नीक गद्य लिखवाक

लेल लेखकक के अपन शैलीयो हैब अनिवार्य

अछि; और एहि लेल शब्दक चयन

करव सरल नहि अछि।

मैक्सिम गोर्की



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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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