Tuesday, September 01, 2009

पेटार २४

डाॅ. देव शंकर नवीन

समकालीन उपन्यास: प्रयास आ परिणाम

मैथिली उपन्यासक चर्चा करैत ई स्वीकारि लेबा मे संकोच नहि होयबाक चाही जे
परिमाणात्मक रूप सं मैथिली साहित्यक ई विधा बड़ पाछू अछि आ एकर भंडार
बड़ छुछून अछि। गुणात्मकताक प्रसंग ई कहब उचित नहि होयत, मुदा जं लिखलेनहि जाय, तं ओकर गुणवत्ताक परीक्षण की होयत ?

स्वतंत्राता प्राप्ति सं पूर्वे मैथिली मे उपन्यास लेखन दिस रचनाकारक आसक्ति
परिलक्षित होइत अछि। व्यक्ति-व्यक्तिक हृदय मे आत्म-कुंठा बढ़ि रहल छल।
प्रशासकीय उत्पीड़न सं जन-सामान्यक अंतर्मन व्यथित छल। भौतिक विकास आ
मानसिक स्तर एहि दू दृष्टिकोणें, मिथिला बहुत बेसी पछुआएल प्रक्षेत्रा छल। एत’
शास्त्राीय ज्ञानक विपुल धरोहरि छल, ज्ञानार्जनक असीम उद्देश्य बिंदु छल, मुदा नागरिक
अपन रूढ़िक जाल मे ओझरायल छल। एहि परिस्थिति मे, जनताक आगू दू तरहक
समस्या छल व्यवस्थाजन्य आ परंपराजन्य। मनुष्य जातिक ई स्वभाव होइत अछि
जे ओ अपन लड़ाइ छोट स्तरक प्रतिपक्षी सं प्रारंभ करैत अछि। व्यवस्थाजन्य समस्या
आ विदेशी शासकक दानवताक सीमा विस्तृत छल। मैथिली उपन्यास मे प्रायः एहि
व्यवस्था कें ओहि समय मे व्यक्त नहि कयल गेल। तत्कालीन समाज मे मिथिलाक
जनजीवन बेमेल विवाह, बहुविवाह, बाल विवाह, सासु-पुतौहु, हास-परिहास, निरक्षरता,
नारी-दमन आदि-आदि रीति-कुरीति सं भरल छल। कोनो कालक साहित्य समकालीन
समाजक परिभाषा होइत अछि। ओहि कालक उपन्यास एहि सभ बिंदु कें चित्रित
करबा मे लागल रहल। मिथिलाक नारीक अज्ञान आ दैन्य कें चित्रित करैत रहलअथवा जातीय वैषम्य, पंजीबद्ध अहंकार आदि सं उद्भूत विकृति कें द्योतित करैत
रहल। आजुक संदर्भ मे एहि कालक उपन्यासक परीक्षण क’ कए एक पंक्ति मे
कहि देल जायत जे ई अंतराल मैथिली उपन्यासक लेल शिल्प आ काव्य दुनू दृष्टिएं
अपरिपक्व काल थिक। मुदा, से आलोचनाक ईमानदारी नहि होयत। कारण उपन्यास
लेखन आ उपन्यासक अध्ययन दुनू दिशा मे लोकासक्ति कें हम सामंती संस्कार

समकालीन उपन्यास: प्रयास आ परिणाम / 57 58 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


सं मुक्त भ’ क’ निम्न-मध्यवर्गीय लोकक एकतापूर्ण जीवन जीबाक आग्रह मानैत
छी। महाकाव्यक नायकक सीमा शर्त सं मुक्ति पाबि क’ समाजक सभ कोटिक
नागरिक कें अपन काव्यपुरुष बनयबाक अधिकार रचनाकार प्राप्त तं क’ लेलनि,
मुदा कथा, मुक्तक, एकांकी आदि मे समाज कें, जीवन कें टुकड़ी-टुकड़ी मे देखबाक
जे आग्रह परिलक्षित होइत अछि तकरा उपन्यास आ नाटक दुनू अर्थ मे एकटा
दिशा दैत प्रतीत होइत अछि। ई बात सभ साहित्यक लेल मान्य भ’ सकैत अछि।
एहि कालक मैथिली उपन्यासक कमजोर तंतु कें गीजब उचित नहि। ओना एहिअवधिक किछु महत्त्वपूर्ण उपन्यास कें उक्त तथ्य सं फराक बूझ’क चाही। कांचीनाथ
झा ‘किरण’क ‘चन्द्रगहण’, हरिमोहन झाक ‘कन्यादान’, द्विरागमन’, वैद्यनाथ मिश्र
‘यात्राी’क ‘पारो’ आदि एहने उपन्यास थिक, जकरा पर कथानकक बुनावटिक प्रसंग,
जलफांफी होयबाक कलंक नहि थोपल जायत।

समकालीनता आ सौंदर्यबोध ई दुनू शब्द समय सापेक्ष अछि। रचनाकालकहिसाब सं समकालीन होइतो कतिपय कृति विषय आ उपस्थापनाक दृष्टिएं समकालीननहि भ’ पबैत अछि। मुदा किछु कृति एहेनो होइत अछि, जे शाश्वत रूपें अपनमहत्त्व अक्षुण्ण रखने रहैत अछि। किछु कृति एहनो होइत अछि, जे अपन समयक
अभूतपूर्व प्रभावक कारणें जनमानस मे तेहन स्थान बना लैत अछि, जाहि सं सदैवओकर महत्त्व सुरक्षित रहि जाइत अछि, पैतृक संपत्ति जकां ओकर प्रशस्ति पुश्त-दर-पुश्त
चलैत रहैत अछि। ‘कन्यादान’ आ ‘द्विरागमन’ मैथिली साहित्य मे एकर उदाहरण
थिक। हरिमोहन झाक ‘कन्यादान’ मैथिली साहित्यक इतिहास मे आइए नहि, भविष्यो
मे एतबे समादृत होयत आ एकर सृजन एकटा युगक रूप मे जानल जायत। एहि
उपन्यासक विषय यद्यपि आजुक समय मे ततेक संदर्भयुक्त नहि अछि, तथापि
अपन प्रभावोत्पादकता, उपस्थापन आदि-आदि गुणक कारणें बेस जकां प्रतिष्ठितअछि। युग आ युगीन दृष्टिकोण, दुनू मे परिवत्र्तन होइत रहैत अछि। एहि परिवत्र्तनसं व्यक्तिक रुचि आ दृष्टिबोध दुनू मे परिवत्र्तन अबैत अछि। पचीस बर्ख पहिने
जाहि दलान पर काली, लक्ष्मी, शिव आ रामक आदमकद फोटो टांगल रहैत छल,
ओत’ पांच बर्ख पहिने विद्यापति, यात्राी, निराला आ सिमोन द बुआक फोटो आ
आइ कोनो सिनेमाक हिरोइनक प्रणयलिप्त कलेंडर टांगल जाय लागल। व्यक्तिक
सौंदर्य प्रेक्षण एहि हिसाबें परिवर्तित भेल। एहना स्थिति मे सौंदर्यबोध कें समकालीन
सत्य आ वैयक्तिक दृष्टिकोण सं काटि क’ नहि देखल जा सकैत अछि। वैयक्तिक
दृष्टिकोण प्रत्येक रचनाकारक सृजनशीलता कें प्रभावित करैत अछि। ई प्रभाव
रचनाकारक सौंदर्यबोधक माध्यमे सेहो रचना मे उतरैत अछि।

सुविधाक दृष्टिएं मैथिलीक प्रतिनिधि उपन्यास कें लेखनकाल अथवा प्रकाशन
कालक स्तर सं दू कोटि मे बांटल जा सकैत अछि। ई विभाजन उपन्यासक विषय
चेतनाक प्रसंग मे विशेष प्रयोजनीय साबित होइत अछि। ई विभाजक बिंदु थिक

समकालीन उपन्यास: प्रयास आ परिणाम / 59

छठम दशकक अंत। सन साठि सं पूर्व प्रकाशित उपन्यास सभ मे सं प्रतिनिधि
कृतिक रूप मे गनल जायत कन्यादान, द्विरागमन, पारो, नवतुरिया, कुमार, मधुश्रावणी,
विद्यापति, आदिकथा, चानोदाइ, बिहाड़ि पात पाथर आदि। एहि समस्त कृति सभ
मे ‘पारो’ आ ‘विद्यापति’ कें छोड़ि क’ अन्य सभटा मिथिलाक वैवाहिक संदर्भ सं
संबद्ध अछि। ‘पारो’ ममिऔत-पिसिऔत भाइ-बहिनक प्रेमकथा पर आ ‘विद्यापति’
ऐतिहासिक कथा पर आधारित उपन्यास थिक। जेना कि पहिने कहलहुं, रचनाकार
अपन युगबोध, सौंदर्य-बोध सं अनुप्राणित रचनाशीलता कें समकालीन कथा-प्रसंगक
माध्यमे स्पष्ट करैत छथि, उक्त सभ उपन्यास मे सैह मुखर होइत अछि। युगबोधक
स्तर पर आ समकालीन समााजिक रहन-सहन तथा व्यक्ति-व्यक्तिक मानवता-दानवताक
स्तर पर प्रेक्षकक सौंदर्य चेतना परिवर्तित होइत रहैत अछि। तत्कालीन मिथिला
जाहि प्रकारक वैवाहिक विसंगति सं युद्ध क’ रहल छल, दहेज, अशिक्षा, मानसिक
वैषम्य, बहु-विवाह, प्रेम-विवाह, प्रेमहीन विवाह, धन लोलुप विवाह, पंजीबद्धताक
कारणें प्रस्तुत समस्या आदि-आदि सं एत’ जतेक विडंबना उत्पन्न छल, ताहि
परिस्थिति मे कोनो भावुक आ प्रबुद्ध लोक कोनो सुवर्णा, सुरूपाक भृकुटि विलास
आ अलक जाल दिस जा कए नहि ओझरा सकैत छथि। एहि स्थितिक अवलोकन
सं अपन हृदय मे गुदगुदी नहि उठा सकैत छलाह। कोनो संवेदनशील व्यक्तिक
नेत्रा अपना परिवेशक एहि विडंबना पर केंद्रित होइत हेतनि। आ तें एहि अंतरालकअधिकांश कृति एहि सभ समस्या पर आधारित अछि। मुदा जें कि युगबोधक संग-
संग वैयक्तिक दृष्टिकोण बेसी महत्त्वपूर्ण होइत अछि, एहि समस्त उपन्यासक कथा-
संदर्भ एक रहितो अपन-अपन उद्देश्य मे भिन्न-भिन्न अछि। जतए हरिमोहन झा
अंग्रेजी संस्कारक संक्रामक रोग सं ग्रसित सी. सी. मिश्रक विवाह करा दैत छथि,
ओतहि ‘कन्यादान’क प्रकाशनक तेरह वर्षक बाद उपेन्द्रनाथ झा ‘व्यास’क ‘कुमार’
मे नायक प्रेम-प्रसंग मे असफल भेला पर टूटि जाइत अछि। निराशाक जाल मे
ओझरा कए अपन किछु राखि नहि पबैत अछि। पछाति हिनकर कथा नायक अपन
प्रतिज्ञा पर पछताइतो छनि, फेर विवाहो करैत छनि। एहि समस्त स्थिति सं संग्राम
करैत व्यक्तिक मनोदशा ‘कुमार’ मे चित्रित भेल अछि। एहि चित्राण मे हिनकर
उपस्थापनक प्रविधि निश्चित रूप सं अतीव आकर्षक अछि। मुदा कथानायककमानसिकता हताश रहैत छनि। जखन कि हरिमोहनक नायक विकृत आधुनिकताक
चटक-मटक मे गृहीत अपन जिद्द पर अड़ल रहए वला। ‘कन्यादान’क बुच्चीदाइकमूढ़ता आ देहाती प्रवृत्ति कें खतम क’ कए सी. सी. मिश्रक अहंकार मर्दन लेल
अगिला उपन्यास ‘द्विरागमन’ मे बुच्चीदाइक संबंधी मे जागरूकता देखबैत छथि,
जखन कि ‘सोमदेव’ अपन ‘चानोदाइ’ मे अशिक्षाक कारणें नारी जातिक दुरवस्था
कें चित्रित करैत छथि। नारी कें पुरुषक भोग्याक रूप मे ठाढ़ करैत छथि, मुदातकर समाधानो अपन ओही कृति मे निकालि दैत छथि। वस्तुतः ‘कन्यादान’क

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अगिला भागक रूप मे ‘द्विरागमन’ कें गनल जयबाक चाही। से मात्रा एहि लेल
नहि, जे कन्यादानक प्रमुख पात्रा द्विरागमनो मे विद्यमान छथि। अपितु एहि लेल,
जे उपन्यासकारक प्रगतिशीलता आ हिनकर दृष्टिबोध, एहि दुनू कृति कें मिला
क’ देखबा मे पूर्ण स्पष्ट होइत अछि। यात्राीक ‘नवतुरिया’ आ मायानंदक ‘बिहाड़ि
पात पाथर’ एके रंगक समस्या कें ल’ क’ चलैत अछि। मुदा, रचनाकारक वैयक्तिक
दृष्टिकोण दुनू उपन्यास कें दू दिशा मे मोड़ि दैत अछि। यात्राी कें नवतुरियाक साहस
आ शक्ति पर ततबा भरोस छनि, जे एकटा बूढ़ वर सं विसेसरीक विवाहक संपूर्ण
सरंजाम कयले रहि जाइत छनि, समाजक रूढ़ि टेंटिआइत रहि जाइत अछि आ
नवतुरिया एहि समस्त ढाठ कें तोड़ि क’ विसेसरीक यथोचित विवाह करा दैत अछि।
एत’ यात्राीक आत्मविश्वास, हिनकर आस्था नवशक्तिक प्रति आशा आदि दर्शित
अछि। जखन कि मायानंद मे सामाजिक यथास्थिति विद्यमान रहैत छनि। ‘बिहाड़ि
पात पाथर’क तिरबेनी कें रुद्रनाथ मिश्रक हाथें बिकयबा सं रोक’ लेल कोने नवांकुर
ठाढ़ नहि होइत अछि। ‘नवतुरिआ’क प्रकाशनक छओ बर्ख बादो मायानंदक समाजक
नवतुरिआ एतबा साहस नहि क’ पबैत छनि। अर्थात् मायानन्द एखन धरि अपनसमाजक एहि विकृति कें, एहि विडंबना कें मेटयबाक लेल ठाढ़ होअ’ वाला कोनोआंदोलनक लुत्ती नहि देखि सकलाह आ हिनकर तिरबेनी असमय मे विधवा भ’
गेलनि। उम्र जन्य यौवनोन्मादक झांट-बिहाड़ि सहैत रहलनि। सामाजिक मर्यादा
आ दैहिक आवश्यताक रस्साकशी मे तनाइत रहलनि, किकिआइत रहलनि। एत’
निश्चित रूप सं ई कहल जयबाक चाही, जे मायानन्द कें जखन अपन समाजक
एहि पाखंडी मर्यादाक आवरण मजगूत बुझयलनि, हिनकर नायिका जीवनक एहि
अन्हर-बिहाड़ि कें अंगेजि लेलकनि, तखन यात्राी कें ई सभटा पाखंड नवशक्तिक
आगू फोंकिल बुझयलनि आ हिनकर नवतुरिया ओहि फोंकिल पाखंड कें फोड़ि क’
विसेसरी कें मुक्त क’ देलनि। यात्राी एतबा जोखिम ने केवल विषयक संदर्भ मे,
अपितु भाषा आ उपस्थापन आदिक संदर्भ मे सेहो उठौने छथि। वस्तुतः यात्राीक
चेतना मात्रा वातावरण मे व्याप्त प्रत्यक्ष दृश्य धरि सीमित नहि रहैत छनि, अपितुमहत्त्वहीन अहंकार, षड्यंत्रापूर्ण सामाजिक मर्यादा आदिक सीड़कक कोन उठा क’
ओकरा त’र मे होइत क्रियाकलाप धरि बढ़ि जाइत छनि। अपन एहि प्रवृत्तिक कारणें
ओ बिरजू आ पारोक प्रोमाकर्षण कें चित्रित क’ सकलाह। ओना एहि उपन्यासक
ई संबंध अधिकांश पाठक कें नहि अरघलनि। कारण समाज कें ओएह चीज सुंदर
लगैत छैक, ‘जे होयबाक चाही’। मुदा, रचनाकार कें ओ चीज बेसी सुन्नर लगैत
छैक जे होइत अछि। जत’ ‘होयबाक चाही’ एकटा खास वर्गक बनाओल आदर्शक
नमूना थिक, ओत’ ‘होइत अछि’ सत्य। सत्य कें आदर्शक पर्दा त’र झांपि क’ रखबाक
षड्यंत्रा दीर्घकालिक परंपरा थिक। मिथिला मे एहि परंपरा कें संरक्षण भेटैत रहलैक
अछि। यात्राी एकरा खंडित कयलनि आ सत्य पर सं आदर्शक ओढ़ना घीचि लेलनि।

समकालीन उपन्यास: प्रयास आ परिणाम / 61

हिनका सत्य सभ सं बेसी सुंदर बुझाइत रहलनि अछि। सत्य मायानन्द कें सेहो
सुंदर बुझयलनि, बल्कि एहि कालक समस्त उपन्यासकारक आधार तत्व समकालिक
जनसत्ये थिक। मुदा, ओहि सत्यक संग रचनाकारक बौद्धिकता आ साहस कोनस्तरक संबंध स्थापित क’ पबैत अछि, से महत्त्वक विषय थिक। मायानन्द अपन
कथा नायिका कें सामाजिक अनुशासनक पटरी पर चलबैत-चलबैत थका दैत छथि,
ओकरा अपन भाग्य बलें जीवन संधान करबा लेल छोड़ि दैत छथि, जखन कि यात्राी
अपन कथा नायिकाक भविष्य सुधार’ लेल नवशक्तिक निर्माण करैत छथि, पुरान
शक्ति कें ध्वस्त करैत छथि आ ओकरा समुचित रूपें दृढ़ करैत छथि।

‘मधुश्रावणी’ उपन्यास सेहो बहुलांश मे वैवाहिक संदर्भ सं जुड़ल अछि। शैलेन्द्र
मोहन झा एहि मे कमल आ नलिनीक संयोग-वियोग कें चित्रित करैत करुणाक
आधिक्य उत्पन्न करैत रहलाह अछि। वियोगादिक अतिरिक्त चित्राण एहि उपन्यास
कें अत्यधिक कारुणिक बना देलक अछि। ठाम-ठाम किछु अप्रासांगिक आ अनुपयुक्त
चित्रा सभ परिलक्षित होइत अछि। मुदा एहि उपन्यास मे वर्णन, विश्लेषण आ खास
क’ चरित्रा-चित्राण सं जाहि त्रासदीक जन्म भेल अछि, विरेचन प्रक्रिया ओही संप्रारंभ होइत अछि। मनोविश्लेषण कें उपन्यासकार अधिक महत्त्व देने छथि। हिनको
दृष्टिकोण मिथिलाक एहि विवाह परंपरा आ दैविक संयोगादिक बीच प्रताड़ित जीवन
कें उबार’ लेल कोनो जोखिम नहि उठा सकलनि। मिथलाक एहि विकराल दुरावस्था
मे ब्रजकिशोर वर्मा ‘मणिपद्म’ मिथिलाक विभूति, साहित्यसेवी, इतिहास प्रसिद्ध
भाषाविज्ञ विद्यापतिक जीवन क्रम कें केंद्र मे आनि उपन्यास लिखलनि ‘विद्यापति’।
मुदा उपन्यास मे ऐतिहासिक तथ्यक उपेक्षाक संग- संग औपन्यासिक संरचनात्मकताक
उपेक्षा सेहो भेल अछि। 1954 ई. मे ‘नवतुरिआ’ प्रकाशित भेल आ 1958 मे प्रकाशितभेल ‘आदिकथा’। नवतुरिआक प्रकाशन मैथिली उपन्यासक क्षेत्रा मे महत्त्वपूर्ण घटनाछल। महत्त्वपूर्ण घटना ‘कन्यादान’क प्रकाशन सेहो छल। मुदा, मैथिली उपन्यासक
जाहि प्रशस्त बाट दिश हरिमोहन झा इशारा क’ देलनि, क्रमानुसार ओ बाट भोतिआय
लागल। ‘नवतुरिआ’क प्रकाशन सं उपन्यासक आयाम कें जे विस्तार देल गेल, तकरा
एत’ सं नव मोड़ मानल जायत। मैथिली उपन्यासक समृद्ध चेतनाक उदाहरण मानल
जायत ‘आदिकथा’। ‘आदिकथा’ मे राजकमल चैधरीक युगबोध, आत्मबोध, दृष्टिबोध
आ यथार्थबोध सभ सम्मिलित भ’ क’ आयल अछि। युग-यथार्थक चित्राणे टामहत्त्वपूर्ण नहि होइत अछि, महत्त्वपूर्ण होइत अछि रचनाकारक आत्मबोध आ दृष्टि
बोध सं अनुप्राणित युग-यथार्थक चित्राण, रचनाकारक सौंदर्यचेतना। हुनकर आत्मबोध
उत्प्रेरणा सं जाग्रत होइत अछि आ ताहि पर युग-सत्यक भंडार सं अपूर्व आ गुप्ततथ्य कें जगजियार करबाक प्रवृत्ति निखरैत अछि। राजकमलक ‘आदिकथा’ समसामयिक,
सामाजिक जीवनक व्यक्तिनिष्ठ विडंबना नहि थिक, ओहि कालक समाजनिष्ठफोंकिल यथार्थ सं आवृत्त व्यक्ति-व्यक्तिक अंदरूनी त्रासदी थिक। एकर एक-एक

62 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


पात्रा समाजक वर्ग विशेषक प्रतीक थिक। देह, मोन, परिवेश, संपदा, आदर्श
आदि-आदिक अपन-अपन अस्मिता मे व्यक्ति कोना विवश होइत अछि, तकर भकरार
चित्राण कए राजकमल एहि उपन्यास कें अपूर्व उत्कर्ष देलनि। पूर्वे चर्चा भेल अछि
जे समकालीन सौंदर्यबोध व्यक्ति-व्यक्तिक दृष्टिकोण पर निर्भर करैत अछि।
संवेदनशील सृजनधर्मीक लेल साहित्य लेखन ओकर विवशता होइत अछि। कोनोसमयक व्यवस्थाजन्य विसंगति, विकृति ओहि समयक साहित्य लेल अपेक्षाकृतअधिक महत्त्वक चीज होइत अछि। कारण ई नहि, जे ओहि समयक सुसंगति आसुकृति रचनाकार कें दुःख दैत होइन, अपितु कारण ई, जे सामान्य जनता जाहि
विडंबना सं निरपेक्ष रह’ चाहैत अछि, जकरा भोगैत अछि, परंच ओहि पर सोचब
आ ओकरा बूझब व्यर्थ बुझैत अछि, रचनाकार अरबैध क’ ओ दृश्य पुनर्पुनः ओकरा
आगू राखि, एहि परिस्थितिक निराकरण दिश उत्सुक होयबक प्रेरणा दैत छथि।
साधारण व्यक्तिक सौंदर्यबोध आ एकटा रचनाकारक सौंदर्यबोध मे यैह तात्विक
अंतर अछि। ‘आदिकथा’क नायकक मातृकक संपदा सामान्य नागरिक लेल दृश्य
बिंदु भ’ सकैत अछि, नायकक माम आ सुशीलाक देहयष्ठि, हुनकर दृग चापल्य,
भृकुटि विलास, अलक छटा आदि-आदि सौंदर्यक खान लागि सकैत अछि; मुदा
एकटा दृष्टि संपन्न रचनाकार कें एहि सौंदर्यक प्रति ओहन आकर्षण, ओहन जुड़ाव
नहि रहि सकैत छनि, जेहन एहि परिवेश मे जीबैत व्यक्तिक अंतस मे उठैत-खसैत
द्वंद्वक प्रति, मानसिक ज्वारक प्रति, ओकर आंतरिक खौंझ आ छटपटी आ व्याकुलताक
प्रति। सामाजिक आरोपित आदर्शक रक्षार्थ व्यक्ति कोना विवश रहैत अछि, समाज
मे रहबाक लोभ मे व्यक्ति कोना अपन सर्वस्व स्वाहा क’ दैत अछि, अपना कें
बन्हक राखि दैत अछि, कोना अपन एक-एक सांस मे नाटक करैत अछि, समाज
मे रहि क’ जाहि सुखक संविधान रटि लैत अछि, तकर लक्षांशोक पूर्ति दुर्लभ होइत
छैक, मुदा तैओ एहि समाज सं मुक्त होयबाक प्रयास नहि करैत अछि, एहि समाजक
विकराल व्यथा सं मुक्त भ’ क’ जंगली जीवनक उन्मुक्तता दिस अग्रसर नहि होइत
अछि। ई सभटा परिस्थिति रचनाकार कें बेसी आकर्षित करैत अछि। आकर्षित
करैत अछि, एकर अवलोकन सं प्रसन्न होयबा लेल नहि, बल्कि व्यथित होयबा
लेल आ एहि व्यथाक सहयोगी बनि क’ दायित्वपालनक संतुष्टि प्राप्त करबा लेल।
रचनाकार अपन सौंदर्य बोधक क्रम मे व्यक्तिक बाह्याडंबर, ओकर असार-पसार,
ओकर वेश-भूषा सं बेसी महत्त्व ओकर अंतस्जगत सं संचालित ओकरा मुखाकृति
पर निखरैत भाव कें दैत छथि। राजकमलक ‘आदिकथा’ मैथिली उपन्यासक यात्रापथ पर एकटा विशिष्ट कृति थिक, जकर अवदानक चर्चा मे चुप भ’ जायब बेसी
अपेक्षित बात होयत।

‘निर्दयी सासु’ सं ‘बिहाड़ि, पात पाथर’ धरिक उपन्यास अपना समयक
युगबोधक संग उपस्थित भेल अछि। अद्यावधि प्रकाशित सभ उपन्यासक चर्चा करबाक

समकालीन उपन्यास: प्रयास आ परिणाम / 63

सुयोग एकटा निबंध मे भेटब असंभव अछि, तें ‘कन्यादान’ सं पूर्वक उपन्यास लेखन
कें अभ्यास काल मानि क’ आगू बढ़ल जा सकैत अछि। सन् 1933 सं 1960
धरि, अर्थात् ‘कन्यादान’ सं ‘बिहाड़ि पात पाथर’ धरिक उपन्यास लेखन कें प्रयोगकाल
कहल जायत। एहि अवधि मे हरिमोहन झा, उपेन्द्रनाथ झा ‘व्यास’, शैलेन्द्र मोहन
झाक दृष्टि-दिशाक सूक्ष्म अवलोकन यात्राी, राजकमल, सोमदेव आ मायानन्द सं भिन्न
बुझाइत छनि। पहिल वर्गक उपन्यासकार नायक कें प्रवासक जीवन देब आवश्यक
बुझैत छथि, अपन कें उच्च शिक्षा सं अभिभूति करब आवश्यक बुझैत छथि।उपन्यासकारक ई प्रवृत्ति पुरुष शिक्षाक प्रति अपूर्वलगावक द्योतिका मानल जायत।
मुदा ठामहि ईहो देखाइत अछि जे स्त्राी शिक्षाक प्रति हरिमोहन झाक अलावे आन
किनको तेहन आपकता नहि छनि। शिक्षा अनेक अंधकार सं मुक्ति दिआ सकैत
अछि, तें शिक्षाक प्रति जागरूकता, मैथिली उपन्यासकारक उपलब्धि मानल जायत।
मुदा नारी शिक्षाक प्रति उदासीनता हिनका लोकनिक प्रगतिशीलता कें कलंकित
करतनि। दोसर वर्गक उपन्यासकार कें अपन कथ्य, अपन दृष्टिबोध सामान्य जनता
धरि पहुंचयबा लेल कथाक बुनाबटि मे कोनो काॅलेज, कोनो विश्वविद्यालय, कोनो
महानगर आदि सं उच्च शिक्षित युवक कें पकड़ि आनब आवश्यक नहि बुझयलनि।हिनका लोकनि कें ग्रामीण परिवेशक एहि विकृति कें ग्रामीणे स्तर पर सोझरायब
उचित प्रतीत भेलनि। वस्तुतः हिनका लोकनिक ई तथ्य, सामाजिक जीवनक गाछकजड़ि मे लागल घून हटयबाक प्रकृति कहल जायत। यात्राीक ‘नवतुरिआ’ एहि बातक
संकेत दैत अछि, जे आंदोलनक जुआ शिक्षिते व्यक्ति टा उठा सकत, से आवश्यक
नहि। जखन कि ‘बिहाड़ि, पात आ पाथर’ तथा ‘आदिकथा’ सामाजक मर्यादाकजनघाती प्रवृत्तिक संकेत थिक। समाज मनुष्य कें किछु नहि द’ सकैत अछि, दुःखक
अतिरिक्त आन किछु नहि।

वर्ष 1960क पश्चात् मैथिली उपन्यासक उपवन खूब पल्लवित-पुष्पित भेल।
ललित, सुधांशु शेखर चैधरी, रमानन्द रेणु, धीरेन्द्र, जीवकांत, मार्कण्डेय प्रवासी, गंगेश
गुंजन, विभूति आनंद, प्रदीप बिहारी, नवीन चैधरी, उषाकिरण खान प्रभृति लोकनिक
उपन्यास प्रकाश मे आएल। पहिलुको उपन्यासकार लोकनिक नव-नव उपन्यास सोझांआयल। उत्तरोत्तर उपन्यासक संख्या बढ़ैत गेल। उपर वर्णित-चर्चित प्रतिनिधिउपन्यासकारक अतिरिक्त आर बहुत रास उपन्यासकारक कृति मैथिली साहित्यक
उपन्यास विधा कें पुष्ट कयलक अछि। सन् 1960 सं 1965 धरिक काल मैथिली
उपन्यासक सर्वविधि प्रगति लेल विरल काल कहल जायत। कारण, एक त’ एहिअंतराल मे उपन्यास आयल कम, दोसर जेहो आयल ताहि मे विकास आ प्रकृतिक
संभावना कमे दृष्टिगोचर भेल। सोमदेवक दृष्टि, एहि समय मे देशक राजनीति आ
अराजकता पर केंद्रित भ’ चुकल छलनि। ब्रह्मपिचासक नामे धारावाहिक रूप मे
प्रकाशिक हिनकर उपन्यास सन् 1964 मे ‘होटल अनारकली’क नाम सं प्रकाशित

64 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


भेल। मैथिली मे ई प्रथम जासूसी उपन्यास कहल जायत। मुदा मैथिली मे ई परंपरा
आगू चलि नहि सकल। परंपरा सूत्राक ई विच्छेद एहि बातक द्योतक थिक, जे एहू
समय धरि मिथिलाक जनमानस अपन सतही समस्या सभ सं उबरि नहि सकल
छल। एहि राजनीतिक षड्यंत्रा सं बेसी चिंतनीय एहि वातावरण मे व्याप्त प्रत्यक्ष
उत्पीड़न छल। फलतः रचनाकारक लेल सेहो, मूल आकर्षणक केंद्र ग्राम्य जीवने
भेल। ओना, ब्रज किशोर वर्मा ‘मणिपद्म’क कोब्रागर्ल मे ई परंपरा सुपुष्ट होइत
अछि आ विषयक विस्तार देशांतर धरि चल जाइछ। मणिपद्म, लोक साहित्यकउद्गाताक रूप मे मानल जायवला महान व्यक्तित्व छथि। लोकसंस्कृति, लोककथा,
लोकगाथा हिनकर जीवनक अंग बनल प्रतीत होइत अछि। हिनकर अपन भाषाशैली छनि, अपन विश्लेषण पद्धति छनि, परिवेश सं संश्लिष्ट संस्कृतिक प्रति गहन
जुड़ाव छनि, अपन परिवेशक शब्द भंडार छनि...ई समस्त तथ्य मिलि क’ हिनकर
औपन्यासिक उत्कर्ष कें असीम करैत अछि। ‘विद्यापति’ सन उपन्यास आ एहि
विधा मे प्रवेश करैत ‘राजा सलहेस’ ‘नैका बनिजारा’, ‘लोरिक विजय’, ‘लवहरि-कुशहरि’,
‘राइ-रणपाल’ आदि-आदि लोककथात्मक उपन्यास सं ने केवल मैथिली उपन्यासक
भंडार पुष्ट कयलनि अछि, अपितु मैथिलीक उपन्यास-लेखन कें एक टा नव आयाम
देलनि अछि। मैथिलीक लोकसाहित्यक चर्चा मणिपद्मक चर्चा सं फराक भ’ क’
नहि भ’ सकैए। तंत्रा पर केंद्रित उपन्यास ‘अर्द्धनारीश्वर’ सेहो बेस चर्चित भेल
मुदा ‘कोब्रा गर्ल’ (जासूसी उपन्यास) आ ‘भारतीक बिलाड़ि’ (प्रसिद्ध बाल उपन्यास)कप्रकाशन, मणिपद्मक अतिरिक्त प्रतिभाक परिचय दैत अछि। एहि दुनू कृतिक
पाठ सं एकर कथ्यगत, विचारगत, भाषागत, चित्रागत, घटनागत विश्लेषण सं हिनकर
लोककथात्मक स्वरूप कतहु सं बाधित नहि होइत अछि आ एकर वैशिष्ट्य, एकर
सौंदर्य मणिपद्मक औपन्यासिक चेतनाक परिचय दैत अछि।

बीसम शताब्दीक सातम दशकक अर्द्धभाग बीतैत-बीतैत ‘पृृथ्वीपुत्रा’, ‘भोरुकबा’
तथा ‘खोंता आ चिड़ै तीन टा महत्त्वपूर्ण उपन्यास प्रकाश मे आयल। स्वतंत्राता
प्राप्तिक अठारह बर्खक पश्चात् एकाएक रचनाकारक ध्यान वर्ग-संघर्ष दिश गेलनि।
पांच वर्ष पूर्व जे मायानन्द मिथिलाक वैवाहिक विसंगतिक सड़ल-गन्हायल तंतु सभ
कें ताकि रहल छलाह, हुनकर नजरि समाजक वर्ग-संघर्ष दिश उन्मुख भेलनि। ललित
आ धीरेन्द्र एहि चेतनाक संग उपन्यास लेखन मे प्रविष्ट भेलाह। एत’ हिनका लोकनि
कें समाजक निम्नवर्गीय जनजीवनक दैन्य असह्य भ’ गेलनि। श्रमशील नागरिकक
दुर्दशाक चित्राण हिनका लोकनिक सूक्ष्म दृष्टि कें चिन्हबा मे सहायक भेल अछि।
यद्यपि तीनू उपन्यासक कथा परिवेश एक्के अछि, मुदा रचनाकारक वैयक्तिक चेतनाक
कारणें तीनू उपन्यासक उद्देश्य भिन्न-भिन्न भ’ जाइत अछि। तीनू उपन्यासक निम्नवर्गीय नायक जुझारू अछि आ अपन शोषक मंडलक विरोध करबाक प्रवृत्ति रखैत
अछि। मुदा जतए ‘खोंता आ चिड़ै’क विरोध समन्वय सं शांत होइत अछि, ‘पृथ्वीपुत्रा’

समकालीन उपन्यास: प्रयास आ परिणाम / 65

आ ‘भोरुकबा’क विरोध विजय सं। ललित आ धीरेन्द्र कें अपन श्रमशील पात्राक
साहस आ अस्तित्वबोध पर जतेक विश्वास छनि, मायानन्द कें ततेक नहि। ठामहि
ललितक निम्नवर्गीय स्त्राी पात्रा दैहिक जाल मे जतेक ओझराइत छनि, मायानन्दक
नहि। दांपत्य जीवनक प्रेमसूत्रा कें मायानन्द जतेक मोलायम बनौलनि अछि, ततेक
ललित नहि बना सकलथि। मायानन्दक नारी पात्राक हृदय मे उठल पत्नीत्वक लहरि,
वासनाक समस्त विकार कें जरा दैत अछि, ललितक स्त्राीपात्रा से नहि क’ पबैत
अछि। मायानन्द जत’ खेत-पथार सं राजनीतिक भवन धरिक दृश्य कें ताल-मेल
कराब’ मे लागल रहैत छथि, धीरेन्द्र अपन नायक कें सहयोग दिया क’ विजयी
बनबै छथि आ ललित अपन पात्राक पारिवारिक सद्भाव तथा साहसक बल पर
ओकरा सं समरशेष करा लैत छथि, स्खलित चरित्राक नायिका सेहो, हिनका नजरिमे अपन गुण विशेषक कारणें महत्त्वपूर्ण भ’ जाइत अछि।

अगिला डेग मे मैथिली उपन्यासक फलक स्वतः विस्तृत भ’ जाइत अछि।गाम सं शहर धरिक जीवन प्रक्रिया, देश सं विदेश धरिक संस्कृति, आत्म-स्थापनक
शिखर धरि पहुंचबाक लेल उत्सुक युवावर्गक पीड़ा आ विवशता तथा एहि क्रम मेसाक्षात्कार करैत अन्धखोहक कुत्सा, यौन विकृति, जीवन विकृति, संस्कार विकृति..
आदि-आदि तत्व मैथिली उपन्यासक कथाभूमि बनल। स्वराज्य क्रांतिक भावभूमि
पर केंद्रित भ’ क’ लिखल यात्राीक ‘बलचनमा’ आ प्रवासी मैथिल बंधुक षड्यंत्राकारी
नीतिक बहन्नें, समाजक विविध बिंदु कें उजागर करैत राजकमलक ‘आंदोलन’ ईस्पष्ट करैत अछि, जे सातम दशकक उत्तरार्द्ध मे मैथिली उपन्यासकार संपूर्ण समाजक
कोन-कोन कें ध्यान मे राखि सृजनशील होअ’ लागल छलाह। स्वराजक पश्चात्
सिद्धांत आ आदर्शक नाम पर देशक तथाकथित कर्णधारक विकृत मानसिकता
‘बलचनमा’क पृष्ठ पर फरीछ भेल अछि। आत्मस्थापनाक समस्या सं अपस्यांत एकटा युवक कें कथा-नायकक रूप मे प्रस्तुत क’ राजकमल मैथिल लोकनिक विकृत
आ कुत्सित विचार कें चित्रित कयलनि अछि, जत’ मैथिल बंधु भाषा-प्रेमक नाटक
करैत अछि, मुदा मन मे आन बगल मे मे छूरी रखैत अछि। प्रसंगानुकूल मैथिल
नारीक अस्तित्व आ देहसंबंधक विवशता आदिक सांगोपाग चित्राण भेल। अछि।
मैथिली उपन्यास लेखनक ई दौड़ रचनाकार लोकनिक सौंदर्यबोध कें मोचारि क’
राखि देलक। नारी जातिक भ्रू-विलास, नयन कटाक्ष, चिकुर विन्यास, नख-शिखशृंगार आदि-आदि सं विमुख भ’ क’ सौंदर्यबोधक सीमा-निर्धारण रचनाकार लोकनि
सामाजिक विसंगति मे कयलनि तं पहिने मैथिलीक उपन्यासकारक नजरि समाजक
वैवाहिक विसंगति पर केंद्रित भेलनि। एहि समयक उपन्यासकार लोकनि नारी
जीवनक दैन्य, दहेजक अभाव मे ओकर दुर्दशा, ओकर दुर्गति आ सर्वोपरि समाजद्वारा नारी जाति कें वस्तु बुझबाक प्रवृत्ति आदि कें मूल बिंदु मानलनि। एत’ सं
क्रम आगू बढ़ल, तं फेर नारी देहक समर्पण अथवा क्रय अथवा पीड़न अथवा शोषण


66 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


..सामाजिक विडंबना बनि गेल। हं, ई बात अवश्य, जे समकालीन समस्या मात्रा
नारी-देह आ नारी मोन पर केंद्रित नहि रहल। एहि कालक समाज विविध राजनीतिक,
सामाजिक, प्राकृतिक, वैज्ञानिक, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय आदि-आदि परिस्थिति सं
परिचित आ प्रभावित भेल। फलस्वरूप समाजक संगति-विसंगति विविधमुखी भ’
गेल। एहि विविधमुखी परिस्थितिक परिणाम थिक ‘बलचनमा’, ‘आंदोलन’, ‘दूधफूल’,
‘दू-पत्रा’, ‘कादो आ कोयला’, ‘ई बतहा संसार’, ‘पनिपत’, ‘दू कुहेसक बाट’,
‘अगिनबान’, ‘पीअर गुलाब छल’, ‘अभिशप्त’, ‘युगपुरुष’, ‘हमरा लग रहब’, ‘नवारंभ’,
‘पहिल लोक’, ‘मरीचिका’, ‘गाम सुनगैत’, ‘विसूवियस’, ‘बाट आ बटोही’, ‘हसीना
मंजिल’ आदि।

रमानन्द रेणुक ‘दूध-फूल’ आ धीरेन्द्रक ‘कादो आ कोयला’ निम्नवर्गीय जीवनक
विराट समस्या सं भरल उपन्यास थिक। दुनू उपन्यासक नायक अपन पारिवारिक
जीवनक पीड़ा सं आक्रांत भ’ क’ दिशाहारा पथिक जकां गाम सं शहर धरिक दूरी
नापि पबैत अछि, सभ ठाम टौआ अबैत अछि; क्लिष्ट, उलझन युक्त, रहस्मय आ
अबूझ जीवन एवं जीवन व्यवस्थाक भिन्न-भिन्न परिवेश-परिस्थिति कें भोगैत अछि,
सभ परिस्थिति सं लड़ैत अछि, संघर्ष करैत अछि आ अंत मे थाकि जाइत अछि,
एहि सभ परिस्थति सं लड़ैत-लड़ैत निराश भ’ जाइत अछि। ‘दूध-फूल’क नायक
बबाजी बनि जाइत अछि, ‘कादो आ कोइला’क नायक कें जीवन, समस्या सं भरल
बुझाइत छैक। रेणुक नायक एक दिस जं आत्म-स्थापन अर्थोपार्जन आदिक समस्या
सं लड़ि क’ थाकि भ’ जाइत छनि, संघर्षशील रहि क’ निराश भ’ जाइत छनि, तं
दोसर दिश धीरेन्द्रक नायक नारी देहक प्रति पुरुष जातिक लोलुपता आ दानवताक
अवलोकन सं निराश जाइत छनि। ‘दूध-फूल’क नायक कें अपन संघर्ष मे सर्वदा
आनंद भेटैत रहलैक अछि। एकर पात्रा रामसरन, अपना जीवनक सभ अन्हर-बिहाड़ि
कें बड्ड साहस आ औदार्य सं सहलक अछि। कोनो नारीक पीड़ा अथवा यौन-संबंध,
धीरेन्द्रक विरनी जकां एकरा नहि सतबैत छैक। ई सभ टा घटना, रचनाकारक दृष्टिकोण
कें सेहो ध्वनित करैत अछि।

जीवकांत आ प्रभासक उपन्यास-लेखनक अवधि क्रमशः 1967-1971 तथा
1970-1979 थिक आ उपन्यास विधा कें दुनू सं परिमाणात्मक तथा गुणात्मक दुनू
अवदान पूर्ण रूप सं भेटलैक अछि। हिनका लोकनि कें अपन उपन्यास कला कें
पुष्ट करबाक यथेष्ट अवसर भेटलनि। एक टा व्यवस्थित औपन्यासिक परिवेश, उक्तविषय, तोड़ल रूढ़ि, स्वतंत्रा देश, वैज्ञानिक आ राजनीतिक परिवत्र्तन, शिक्षोन्मुख समाज,
विकृत व्यवस्था, सृजित समस्या, जीवनक तंगी, शोषण, बेरोजगारी आदि-आदिक
अवदान सं जन-जीवन कें देखबाक-बुझबाक फरीछ दृष्टि भेटलनि, ई अवसर हिनका
लोकनिक अनुभूति आ दृष्टिकोण कें प्रामाणिक बनौलकनि। आ, ई समस्त दृश्य
हिनका लोकनिक उपन्यास मे उतरि आयल। गाम सं शहर धरिक जीवनक तीत-मीठ

समकालीन उपन्यास: प्रयास आ परिणाम / 67

कें चाटि क’ देशक युवावर्ग जाहि तरहक सुरंग मे अपन संघर्ष-क्षमताक क्षय कयलनि
अथवा अपन संघर्ष-शक्ति कें परिपक्व कयलनि, से साफ भ’ क’ हिनका लोकनिक
उपन्यास मे आयल। नारी देह आ आत्म-स्थापनक समस्या हिनका लोकनिक उपन्यासमे उत्तरोत्तर मुखर होइत गेल। यात्राीक जे नवतुरिआ पूर्ववर्ती पीढ़ीक ढोंग, पाखंड
आ रूढ़ि सं लड़िकए ओहि पर विजय प्राप्त केलक, से सुधांश शेखर चैधरी, जीवकांत,
प्रभास, गंगेश गुंजन, विभूति, प्रदीप, नवीन चैधरी, उषाकिरण खान प्रभृतिक उपन्यास
मे युगधर्म आ युगचक्रक जांत मे पिसाय लागल। समाजक शिक्षा पद्धतिक आंतरिकफोंक आ एकर सड़ल-गन्हायल आंत सं उठैत दुर्गंध हिनका लोकनिक कृति मे
नीक जकां चित्रित भेल। गंगेश गुंजनक ‘पहिल लोक’ एक दिश शिक्षा अरजने
नवतुरिआक व्यथा कहैत अछि, तं मार्कण्डेय प्रवासीक ‘अभियान’, शिक्षा-माफियाकविक दन्त कथा। विभूतिक ‘गाम सुनगैत’ शिक्षित नवयुवकक आन्दोलनी प्रवृत्तिक
गुत्थी सोझराबैत अछि, तं प्रदीपक ‘विसूवियस’ आंदोलनक धधरा पर पूंजीक पानि
फेंकबाक विवशता पबैत अछि। नवीन चैधरीक ‘बाट आ बटोही’ वैवाहिक विसंगतिकें टिपैत अछि तं उषाकिरण खानक ‘अनुत्तरित’ आ ‘दूर्वाक्षत’ सर्वथा अक्षत, अछूत
विषय कें स्वर दैत अछि। जेना कि र्चा भ’ चुकल अछि, वैवाहिक समस्या पर प्रारंभे
सं उपन्यास लिखाइत छल। मुदा नवम दशक मे आबि कए जखन अइ विषय परई पुस्तक आएल, तं सर्वथा नव गंध, स्वाद आ भंगिमा मैथिली उपन्यासक गुणवत्ताक
प्रति आश्वस्त केलक। स्वतंत्रा भारतक जाग्रत, मुदा निरीह भूखंड मे पैंतालीस वर्षकस्वाधीनताक अवदान सौंदर्य बोधक मानदंड कें कोन अर्थें विकृत कयलक अछि,
तकर ब्लू-प्रिंट थिक ई सभ उपन्यास।

व्यासजीक ‘दू-पत्रा’ नव शिल्पक प्रयोगात्मक उपन्यास थिक, जाहि मे दूसंस्कृतिक रस्साकस्सी मे कात लागैत युवक आ भारतीय नारीक मान्यता स्पष्ट भेल
अछि। रचनाकारक दृष्टि फलकक ई विस्तार मैथिली उपन्यास कें एक टा नव चेतनादेलक अछि। ‘मरीचिका’ उपन्यास मे लिली रे वत्र्तमान संदर्भ सं बहुत पाछू जा
क’ सामंती व्यवस्थाक समालोचना कयलनि। ‘पटाक्षेप’ मे नक्सलवादी आंदोलनकें महत्त्व देनिहारि लिली रे, ‘मरीचिका’ मे सामंती संस्कारक गुणावगुणक विश्लेषण
खूब मनोयोग सं कयलनि। विषयक स्तर पर अतीतगामी हिनकर दृष्टि शिल्प आ
विश्लेषणक स्तर पर अग्रगामी कहल जयतनि।

मैथिली उपन्यास लेल नवम दशक बहुत खराब मानल जायत, दशम तं
एकदम्मे। मैथिली उपन्यासक वेग एहि तरहें अवरुद्ध होयब दुखकर थिक। आठम
दशकक पश्चात् उपन्यासकार लोकनि कें अपन दृष्टिकोण कें आर विस्तार देबाक
अवसर भेटलनि, तकर सदुपयोग होयबाक चाही छल। पंडित जनार्दन झा ‘जनसीदन’
सं प्रदीप बिहारी आ नवीन चैधरीक उपन्यास लेखनक यात्रा क्रम मैथिली उपन्यास
कें जतेक विषय-विस्तार, शिल्प-प्रयोग, बिंब-विधान, सौंदर्य-बोध आदि देलक, से

68 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


आगूक उपन्यास लेखन लेल प्रेरणाक òोत थिक। नारी जीवनक दैन्य सं चलल
विषयक फलक विस्तृत होइत-होइत, आंदोलन आ क्रांति धरि पहुंचि गेल, परंच
एखन धरि उपन्यास विधा, मैथिली मे अपन धाख नइं जमा सकल।

1993 मे गोविन्द झाक ‘विद्यापतिक आत्मकथा’ आ 1995 मे उषाकिरण
खानक ‘हसीना मंजिल’ नंइ आएल रहितए तं वर्तमान शताब्दीक अंतिम दशकक
इज्जति नइं बचितए। एतेक उपलब्धिक पश्चातो बीच-बीच मे एना गबदी मारब
मैथिली उपन्यासक लेल अशुभ सूचना थिक। एही दशक मे गोविन्द झा लिखित
‘विद्यापतिक आत्मकथा’ ऐतिहासिक उपन्यास थिक। स्वयं विद्यापतिए कें पात्रा बना
कए हुनकहि सं हुनकर जीवनी कहाओल गेल अछि। ‘हसीना मंजिल’ उपन्यासकैक अर्थें महत्त्वपूर्ण अछि। मैथिली रचनाक नायक-नायिका सामान्यतया मुस्लिम
संप्रदाय सं नइं अबैत अछि। ललित आकि राजकमल सन अपवादक गणना नइं
हो ! भाषा सेहो पात्राक अनुकूल आ विषय तथा विषयक संग रचनाकारक व्यवहार
ममत्वपूर्ण अछि। मानवीय संबंध आ मानव जीवनक त्रासदी एतए मार्मिक ढंगें उभरल
अछि।

मैथिलीक समस्त उपन्यास आ उपन्यासकारक चर्चा करब, आब एक टा निबंध
मे संभव नहि रहि गेल अछि, तैओ ई कहले टा जायत, जे मैथिली कविता आ
कथाक तुलना मे उपन्यास बड़ पछुआयल अछि। एहि विधा मे आरो नव-नव प्रयोग
कें पुष्टि देबाक प्रयोजन छैक।

आजुक मैथिली कविता / 69


आजुक मैथिली कविता


शताब्दीक चारिम दशकक पूर्वार्द्ध बीतैत-बीतैत हिन्दी साहित्य मे छायावादक टांग
युगीन भावबोधक भार वहन मे लड़खड़ाए लागल छल। 1935 मे ई. एम. फास्र्टरक
सभापतित्व मे पेरिस मे प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशनक प्रथम अधिवेशन भेल। यूरोपीय
देशक लेल ई काल ओहि स्थितिक थिक, जखन ओतुक्का समाज मे आ साहित्य
मे एक प्रकारक स्थिरता आबि गेल छल। एही दमघोंटू वातावरण कें फरीछ करबा
लेल ओतुक्का रचनाकार लोकनि प्रगतिक नारा देलनि। 1936 क लगाति भारतहु
मे छायावादक विकास थम्हि गेल छल आ कवि लोकनि नूतन विचाराभिव्यक्तिक
माध्यम ताक’ लगलाह। महाकवि निराला बिना कोनो घोषणाक, कविता कें बहुजीवनक
छवि मानि कए सामाजिक यथार्थ कें अपन रचना मे पहिनहि सं प्रश्रय देबए लागल
छलाह। मुल्कराज आनन्द आ सज्जाद जहीरक प्रयास सं 1936 मे प्रेमचन्दक अध्यक्षतामे लखनऊ मे प्रगतिशील लेखक संघक पहिल अधिवेशन भेल। एही समयांतराल
मे भुवनजी, मैथिली कविता मे नवीन भावनाक स्थापना क’ कए प्रगतिशीलताक
नारा बुलंद क’ देलनि। 1936 मे हिनकर ‘आषाढ़’ कविता-संग्रह प्रकाशित भेल।

मैथिली साहित्यक नैसर्गिक सृजनधर्मी कवि लोकनि परतंत्रा भारतक विभीषिकाक
अंतिम क्षण कें भोगलनि। एम्हर भारत मे स्वतंत्राताक किरिण फूटल, ओम्हर जनता
द्वारा स्वतंत्राताक फूजत बसात मे उन्मुक्त सांस लेबाक आकांक्षा पोसि लेब एकदम
स्वाभाविक छल। से लोक पोसने छल। मैथिलीक कवि लोकनिक अद्वितीय प्रतिभा
ततबा प्रखर छल जे समान्य जनजीवनक व्याकुलता, अकुलाहटि, निराशा आदि कें
चिन्हबा-बुझबा मे कोनो कोताही नहि रहनि।

स्वाभाविक बात थिक, जे कोनो आंदोलनक नेतृत्व गनले-गूथल लोक सम्हारैत
छथि। आ, आंदोलनक सफलताक पश्चात् आम जनजीवन ओहि वर्ग कें जनसेवक
मानि अपन नेतृत्व हुनकहि लोकनिक हाथ मे सौंपि दैत अछि। से भारतो मे भेल।
देश स्वतंत्रा भेल। नागरिक अपन आकांक्षा पूर्तिक प्रति आश्वस्त भेल। मुदा राजनेता

70 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


वर्ग मे दानवताक प्रवेश, छल-छद्मक बीजारोपण, स्वार्थक प्रादुर्भाव सत्ताक संगहि
भ’ गेल। लोक निराश, उदास आ क्षुब्ध भ’ गेल। मात्रा ओकर मोहभंगे टा, होइतए,
तं एक बात छल; अप्पन देश आ भाषाक लोक द्वारा सभ अनाचार होइत देखिकए
ओ ग्लानिक महासमुद्र मे डूबए लागल। फलस्वरूप जोश-खरोशक बदला ओकराकुण्ठा दाब’ लागल। सत्ता वर्ग कें एकटा नीक बाट आओर सुझलनि। अही गर्म
लोह पर चोट करब उचित बुझएलनि। अभाव आ बेकारीक सृजन आरंभ क’ देलनि।
काज कएनिहार कें काज नहि आ पदासीन कें क्रियाशीलता नहि। घूस, बैमानी,
शोषण क्षिप्र गतिएं पराकाष्ठा दिश भाग’ लागल। जन-जीवन आओर बेसी कमजोर
होइत गेल। एहने विद्रूप व्यवस्था मे मैथिलीक नव कविताक विकास भेल।

मैथिली मे एखन जे कविता लिखल जा रहल अछि, तकर मूल ‘स्वर’ आ‘प्रवृत्ति’ जाहि महत्वपूर्ण बात कें रेखांकित करैत अछि, से थिक जनहित विरोधी
मान्यता आ व्यवस्थाक खंडन, जनशक्तिक प्रति आस्था आ विज्ञानक सुखद, शुभदअवदान सं समृद्ध भविष्यक आशा। आजुक मैथिली कवि (जे सत्ते कवि छथि) अपनपरंपरा, अपन परिवेश आ देश-दुनियांक ताजा-तरीन विकास-परिवत्र्तन सं अवगत
छथि। अन्हार घर मे सांप नइं मारै छथि अथवा आन्हर आंखिएं सूर्य देखबाक लालसा
नइं करै छथि। तें, आजुक मैथिली कविताक मूल स्वर ओएह थिक, जे एखन देशक
आन कोनो समृद्ध भाषाक स्वर अछि। आन्हर आंखिएं अथवा अन्हार मे लाठी
चलएबाक लौल, जे लोकनि क’ रहलाह अछि (मैथिली मे बहुत गोटए एहेन क’
रहलाह अछि) से अनेरे लागल छथि। दोसर धंधा करताह तं बेसी टिकताह।

‘मैथिली साहित्यक इतिहास’ मे जाहि विद्वान लोकनिक मत काल विभाजन
पर प्रकट भेलनि अछि, हुनकर तर्क मे ओतबो संगति नइं अछि जतबा एक टा
गाय आ एक टा महींस कें दू भाइ मे बांट’ काल गामक पंच सब रखै छथि। किनकहु
जिम्मा मे आदिकाल, मध्यकाल, आधुनिक कालक प्रारंभ आ अंतक लेल कोनो तर्क
नहि छनि। अइ मे सं कविता कें छांटि कए गप करबा काल विद्यापतिक पश्चात्
पहिल मोड़ चन्दा झाक ओतए देखाइ पड़ै अछि। ओना भाषा आ विषय परिवत्र्तनक
दृष्टिएं मनबोध सेहो अपना ढंगें नवीन साबित भेलाह। मुदा जन चेतना आ जन
जीवनक चित्रा विद्यापतिक पश्चात् चन्दा झाक साहित्य मे नव करौट फेरलक।भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’क सृजन-संसार मे ई परिवत्र्तन नव दिशा पकड़लक। फेर
यात्राी, राजकमल आ तखन आगूक कविगण। मुदा समय-समय पर मैथिली काव्य
यात्रा मे ओएह अकर्मण्यता आ परजीविता अबैत रहल अछि जे आम मैथिलक
स्वभाव मे अछि। अर्थात् दू-पीढ़ी, चारि पीढ़ीक बाद खानदान मे केओ कमासुत
जनमि गेल, अगिला किछु संतति ओही टोपें जीबि लैत अछि। किछु नव करबाक
अथवा अपना बलें करबाक साहस नइं जुटबै छथि। दादा कें हाथी छल, दलान पर
सिक्कड़ि टांगल अए। अइ मे सब सं लड़भड़ाएल स्थिति रहल चन्दा झा सं भुवनजी

आजुक मैथिली कविता / 71

होइत यात्राी-राजकमल धरि। अइ चारि नामक अलावा कतोक नामी-उपनामी कवि
अइ अंतराल मे मैथिली मे भेलाह। मुदा कीर्तन-भजन आ उचिती-डहकनक अलावा
किनकहु ध्यान साहित्यिक गतिकता दिश नइं गेल। सीताराम झा, काशीकान्त मिश्र
‘मधुप’, तंत्रानाथ झा आ कांचीनाथ झा ‘किरण’ कें अइ अस्थाभर सं अलग कएल
जएबाक चाही।

मोटा-मोटी जं गप शुरुह कएल जाए तं प्रगतिशील लेखक संघक पहिल
अधिवेशन जे भारत मे भेल, तकर बाद विभिन्न साहित्यक लोक, काव्य धारा मेआंदोलन आ परिवत्र्तन सभक नाम देबए लगलाह; छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद,
नई कविता, अकविता, समकालीन कविता आदि-आदि नामक अनुवाद होअए लागल।
मुदा असल गप ई थिक जे मैथिली मे ई सबटा बात गड्डमड्ड अछि। चन्दा झा संभुवन होइत यात्राी-राजकमल धरिक मैथिली कविताक परिवत्र्तन-प्रवृत्ति कोनो भाषाक
रचनाकार कें चैंका सकैत अछि। जं आंखि रहितनि तं ‘स्वरगंधाक’ प्रकाशन पर
नाक मुननिहार उपनामी कवि कें आबो गोंत-गोबर गीड़ि कए प्रायश्चित कर’क
चाहिअनि। हुनका लोकनिक वश चलितनि तं मैथिली कें ओ एखनहुं कीर्तन भजनक,
साहित्य बनौने रहितथि। जे-से..



असल मे चन्दा झाक साहित्य मे देश-दशा आ आम जनजीवनक जे छवि
देखाइ पड़ैछ, भुवनक गीति आ कविता मे ओ खन छायावाद आ खन प्रगतिवादक
उपरौंझ होअए लगैत अछि। यात्राीक ‘चित्रा’ सं एकटा समधानल डेग उठल आ
राजकमलक ‘स्वरगंधा’ तं एकबाइगे, बहुत-बहुत पछुआएल मैथिली कविता कें ‘चित्रा’
सं जे आधुनिकता भेटल छलैक, तकरा अद्यतन क’ देलकै। अर्थात् दहेज आ बियाहआ पूजा पाठ पर फकड़ा-डहकन सन चीज लिखबाक प्रवृत्तिक संभवना बनौनिहार
कवि सब धानक भुस्सी जकां बेरा गेलाह।

स्वरगंधाक प्रकाशनक पश्चातो बहुत दिन धरि मैथिली कविता मे राजनीतिक
समझ बहुत विरल रहल। मैथिली मे राजकमलक कविता मे तं नहिएं, यात्रियोक
कविता मे राजनीतिक जागरूकता नहिएं जकां छल। परवर्तियो कालक किछुए कविक
किछुए कविता मे राजनीतिक चेतना मुखर भेल। मायानन्द, गंगेश गुंजन, जीवकांत,
महाप्रकाश आ महेन्द्रक ओतए राजनीतिबोधक किछु कविता भेटए लागल। आठम
दशक मे जाहि सशक्त पीढ़ीक कवि अपन पहिचान बना सकलाह, हुनका सं ई
शिकाइत नहि कएल जा सकैए। यात्राी आ राजकमलक प्रयासें मैथिली कविता जतबा
अद्यतन भ’ सकल ताहि मे रेखांकित कर’ जोगर ई योगदान थिक जे ई नवीनतम
पीढ़ी मिथिलाक क्षेत्राीय आ पारिवारिक, सामाजिक समस्याक अतिरिक्त राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय
घटनाचक्र आ वैज्ञानिक युगक आक्रमण तथा अवदान कें सेहो महत्व देलक।
फलस्वरूप मैथिली कविता आइ वस्तु-बोध, भाव-बोध आ भाषा-बोध सभ तरहें
अद्यतन अछि आ कोनो भाषा कें कदमताल द’ सकैत अछि। अति प्रयोगशील हएबाक

72 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


खतरा एकाध रचनाकार कें अवश्य अछि। मैथिली कविताक तं ओ किछु नइं बिगाड़ि
सकथिन, हुनकर अवश्य बिगड़ि जेतनि।

आइ मैथिली मे जे कविता लिखा रहल अछि, तकर हमरा बुझने कोनो नामकरण
नइं हएबाक चाही। अही प्रक्रिया सं साहित्य मे जातिवाद, वर्गवाद, लिंगवाद आ
समूहवाद आएल अछि। कविता, कविता होइत अछि आ सब समयक कविता अपना
समयक समकालीन होइत अछि। साहित्य अपना समयक आम जनताक समकालीनहोइत अछि, आम जनताक चित्तवृत्तिक वाहक होइत अछि। एकरा अपन युगबोध
सं परिपूर्ण समकालीन कविता कहल जएबाक चाही। कोनो आन तरहक नामकरण
नइं क’ कए मैथिली कें भावी खतरा सं बचाओल जाएबाक चाही। ओहिना तं कैकखतरा ऊघि रहल छथि बेचारी।

विकासक क्रम दीर्घ भेला सं आकलन बड़ा जटिल भ’ जाइत अछि। चिम्पैंजी
सं विकसित मनुष्यक विकासक्रम पर के विश्वास करत ? मुदा सत्य तं थिक !
भाषाक विकास क्रम कोनो अर्थें अइ सं सहज नइं अछि। ‘साहसी’ शब्दक प्रयोग
लूटि-मारि कएनिहार लेल होइत छल, से के विश्वास करत ? साढ़े छओ सय बर्खक
परंपरा मे सं हम की ग्रहण कएलहुं आ कतेक कोन बिंदु कें विकसित कएलहुं;
भात आकि दालि उधिअएला सं उछलैत झपना देखि कए रेल इंजिन बना सकलहुं..
बड्ड कठिन अछि कहब। जे अछि आ जतए अछि, से ने तं शुद्ध रूप सं परंपरा
थिक, ने शुद्ध रूप सं प्रयोग। सभटा प्रयोग, अपन पछिला प्रयोगक विकास होइतअछि। अर्थात् अपन पूर्ववर्तीक उपलब्धि मे योगदान दैत अछि। मेंडलीफ केर आवत्र्त
तालिका ओहि रूप मे भ’ए जइतनि, बिना पूर्ववर्ती तालिकाक परिणाम देखने, से
कहब कठिन अछि। कवितोक संबंध मे ई बात सत्य अछि। साहित्यक विकासक्रम,
रिलेरेश थिक ! पूर्ववर्ती जतए धरि मशाल पहुंचा देलनि, अनुजवर्ती तकर आगू
पहुंचैताह। बेसी प्रतिभा हेतनि तं किछु जल्दी आ किछु बेसी दूर धरि पहुंचा देताह।

युग यथार्थ आजुक रचनाकारक रक्त मे रचि-पचि गेल अछि। ई लोकनि
मानवीय अंतः पीड़ा कें विषपायी सदृश पीलनि अछि। एहि अंतः पीड़ा सं उबिआएल
मनुष्यक कछमछी, अपन समस्त दुर्दशा पर कनैत आ ओकरा अपन नियति बनबैतमनुष्यक पुसंत्त्वहीनता अथवा विवशता, व्यक्ति-व्यक्ति कें अलग करबाक षड्यंत्रा,
मानव-मूल्यक लोप आदि संपूर्ण परिदृश्य, हिनका लोकनिक दृष्टि फलक सं गुजरल
अछि। ई समस्त स्थिति समाज-सत्य आ युग-सापेक्ष अछि। एकरा अतिरंजित क’
कए काल्पनिक बनएबाक बैमानी, ईमानदार आ समूहक प्रति निष्ठावान रचनाकार
नहि क’ सकलाह। इएह नहि क’ सकबाक आदति हिनकर कवि कें आम पाठकक
बीच पैघ बनबैत अछि आ रचना कें शाश्वत बनबैत अछि।

प्रवृत्तिगत विश्लेषण करैत आजुक कविता सं मानवक प्रभेद सभ जे बहराइत
अछि, ताहि मे सं एकटा वर्ग ओ वर्ग थिक, जे सदति काल अपन स्वार्थ-साधनाक

मैथिली नाटक: प्रयोग आ प्रवृत्ति / 73

निमित्त षड्यंत्रा रचैत रहैत अछि। जनशक्तिक पराक्रमक आभास हुनका रहैत छनि।
तें ओ व्यक्तिक आत्मिक सद्भाव कें खंडित करबाक लेल कखनहुं चूकए नहि
चाहैत छथि।

आजुक कविता आ कवि, समाज, राजनीति आ विज्ञान तीनू खंड सं परिचितअछि। कृषि, वाणिज्य आ प्रशासनक तंतु आ तंत्रिका सभ सं अवगत छथि। प्रतिभाक
तर्कपूर्ण सदुपयोग लेल कवि आ समाजक विवेक काज करत। एकैसम शताब्दीक
संहारक कल्पनाक जे पाखंड किछु धनपशु आ राजनीतिक सांढ़ सभ पसारलनि अछि,
वैज्ञानिक उपादानक जाहि जोखिम आ उपलब्धिक संभावना अछि, राजनीतिक नृशंसता
तथा प्रशासनिक भ्रष्टाचारक जे ओर-छोर अछि, सामाजिक पशुताक जे कोनो स्वरूप
अछि...आजुक कवि ओहि सभ संभावनाक प्रति सचेत, विवेकशील, सुबुद्ध आ तैनात
छथि। आ, जें कि कवि, तैनात छथि, तें आजुक कविताक अछैत, अबैत शताब्दीकसमाज आ समय, दुर्मुख आ दुर्वृत्ति सं बचल रहत, तकर विश्वास कएल जा सकैत
अछि।

मैथिली कविते किऐ, मैथिलीक संपूर्ण साहित्यक सीमा थिक जे ओ ने पढ़ल
जाइत अछि आ ने ओकर मूल्यांकन होइत अछि। संबंधवाद, स्कूलवाद, वर्गवाद,
जातिवाद सं मैथिली साहित्य मुक्त होअए से प्रयास कएल जएबाक चाही।

मैथिलीक कविगण कें एखन धरि एतेक साहस नइं भेलैक अछि, जे कोनो
पाठक अथवा समीक्षकक सत्यवचन सूनि लिअए। जं दूटा प्रतिनिधि कविक नाम
पूछल जाए, आ कहि देल जाए यात्राी, राजकमल। तं मैथिलीक गुमनाम कवि छटंकी
लाल नोन सातु बान्हि कए पटना स्टेशन पर ठाढ़ रहताह जे ‘पटना उतरिते नवीन
कें फांसी चढ़ा देबनि। हमर नाम छोड़ि कए राजकमलक नाम लेलनि अछि ! कविता
बूझए अबै छनि ?’..



कहबाक लेल तं बहुत किछु रहैत छैक, स्वयं नवागंतुक रहैत, अपनहुं सं
बेसी नवागंतुक लेल एकटा शालीन सलाह जे मैथिली रचनाकारक स्कूलबाजी सं
बचथि। किऐक तं मैथिली साहित्यक सर्वनाश करबा लेल प्रणबद्ध जे स्कूल
सेन्टरलाइज्ड छल, तकर ब्रांच आब कैक ठाम खुजि गेल छैक। तत्काल चमकबाक
होइन तं ओइ स्कूल सभ मे दीक्षित होथि। मुदा जं मोन सं किछु करए चाहैत छथि,
तं साहित्यिक षड्यंत्रा सं बचथि। मैथिली मे एकर, अर्थात् एहि एड्स केर पर्याप्त
संभावना छैक।

74 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्




मैथिली नाटक: प्रयोग आ प्रवृत्ति


सर्वविदित बात अछि, जे साहित्यक आन कोनहुं विधा सं बेस रमनगर विधा नाटक
थिक। दृश्यात्मक आ श्रव्यात्मक अपन दुनू क्षमताक कारणहिं एकर श्रेष्ठता
स्वीकारल गेल अछि प्रायः। वस्तुतः अपन अही विशेषताक कारणें ई प्रेक्षकक लेल
अत्यधिक हृदयग्राही प्रभावोत्पादक आ संप्रेषणीय बनि जाइत अछि ! प्रायः तें, आचार्य
लोकनि एकर रम्यता कें स्वीकारैत कहने छथि ‘काव्येषु नाटकं रम्यम्’। किंतु,
नाटकक जे तीनटा अनिवार्य अंग अछि वस्तु, नेता, रस ताहि मे वस्तु, एहेन
आधारभूत तथ्य थिक, जे नाटकक मेरुदंड मानल गेल अछि। चूंकि एतए बहुत
व्याख्या करबाक सावकाश नहि अछि, तें मोटा-मोटी ई मानि कए चलबाक थिक,
जे नाटकक कथावस्तुए, वस्तु थिक। आधुनिक मैथिली नाटक मे कथा-तत्त्वक मादेकिछु प्रवृत्ति मूलक विश्लेषणात्मक गप्प करबा सं पूर्व संक्षेप मे कथावस्तुक सैद्धांतिक
परिभाषा कें एक नजरि देखि लेब अनुपयुक्त नहि हैत।

कथावस्तुक उपयोग नाटककार लोकनि प्रारंभ सं जेना करैत अएलाह अछि,
तकरा आचार्य लोकनि व्युत्पत्तिक हिसाबें तीन कोटि मे बंटने छथि प्रख्यात, उत्पाद्य
आ मिश्रित। अहिना व्यवहारक दृष्टिकोणें सेहो सूच्य, श्रव्य आ दृश्य तीन कोटि
मे बंटने छथि। पुनः एकर भेदोपभेद अछि, मुदा, से हमर अभीष्ट नहि।

मैथिली मे मौलिक रूपें नाटक-लेखन, वत्र्तमान शताब्दीक संगहिं प्रारंभ भेल।
1904 ई. मे जीवन झाक ‘सुंदर-संयोग’ प्रकाश मे आएल। तहिआ सं दहाइक दहाइ
नाटक अबैत गेल, मुदा, एक तं समालोचकक बीच चर्चा मे गनल-गूथल नाटक
रहल आ दोसर, जे जनसामान्यक बीच ओकर संख्या आओरो कमि गेल। हमरा
बुझने एकर मौलिक कारण दू टा भेल नाट्य वस्तु आ नाट्यवस्तुक उपस्थापन शैली।
वस्तुतः कथावस्तुक जाहि दू तरहें भेदोपभेद उपर देखाओल गेल अछि, से आब समीक्षाक
आधार नहि बनि सकैत अछि। प्रारंभ मे कोनो प्रख्यात कथा पर, ऐतिहासिक अथवा
पौराणिक आख्यान पर अथवा मनोरंजकता उत्पन्न करबा लेल कोनो मनगढ़ंत कथा

मैथिली नाटक: प्रयोग आ प्रवृत्ति / 75

पर अथवा दुनू कें मिलाकए नाटकक कथावस्तु तैयार कएल जाइत छल। ओही
मे किछु एहेन शुष्क अथवा अश्लील अंश जं रहैत छल, तं तकरा विषकंभक, प्रवेशक,
चूलिका आदि द्वारा प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूपें सूचित क’ देल जाइत छल। मुदा,
आब युगक मांग से नहि अछि।

आब प्रेक्षकक जीवन जतबा व्यस्त आ वैविध्यपूर्ण भ’ गेल अछि, विडंबनाक
तेहेन-तेहेन उत्कर्ष ओ भोगि चुकल अछि, यातना आ समस्याक संकीर्ण सुरंग संततेक बेर आबा-जाही क’ चुकल अछि, जे लोकरुचि मे विशाल परिवत्र्तन आबिगेल अछि, अपरिमित परिवत्र्तन। आब नाटक मे लोक अनकर कथा नहि, अपन
कथा देखए चाहैत अछि, अपन जीवन-प्रक्रिया तकैत अछि, नाटकक मंचन मे अपना
कें तकैत अछि, वस्तुतः ओतबा काल ओ नाटक देखैत नहि छथि, नाटक भोगैत
छथि। एहि परिप्रेक्ष्य मे नाटकक कथावस्तु मे नवताक अपेक्षा छलैक, जकरा कम
गोटए चिन्हलनि। फलस्वरूप नाटककारक रूप मे विपुल लोकप्रियता कम गोटए
कें भेटलनि। जीवन झा आकि लालदासक नाटकक उपेक्षा, तें कएल जा रहल अछि,
से नहि। से तं ई कहल जेबाक चाही, जे ई लोकनि ओहि समय मे नाटक विधा
मे जे प्रयोग कएलनि, से इएह क’ सकैत छलाह, मैथिली नाटक कें ई प्रारंभ आओर
केओ कहां देलनि ?

वस्तुतः वत्र्तमान शताब्दीक प्रवेश एकटा झंझावातक संग भेल। मानव जीवनक
बाह्यांतर बहुत क्षिप्र गतिएं परिवर्तित होअए लागल। लोकरुचिक रेस ततेक तेज
गति सं भेल, जे बहुत कम समय मे लोक पूजा-पाठ, शास्त्रा-पुराण, विश्वास, रूढ़ि
आदि सं मुक्ति ल’ कए जन-जीवनक दैन्य, ओकर यातनाक पृष्ठाधारक अन्वेषण
आदि पर आबि गेल। एहि स्थिति मे किछु रचनाकार अपन कतोक विवशताक
कारणें अपन पुरान सीमा सं नहि बहरएलाह। उपर कथावस्तुक जाहि तीन कोटिक
(प्रख्यात, उत्पाद्य आ मिश्रित) चर्चा भेल अछि, से आजुक कथावस्तुक विभाजनक
प्रक्रिया नहि भ’ सकैत अछि। आजुक नाटकक कथावस्तु कें जीवनमूलक दृष्टिकोण
सं विभाजित कएल जा सकैत अछि। मुदा, से विभाजन कथी लेल ?

मैथिली मे नीक जकां आधुनिक नाटक लिखबाक पुरजोर उत्साह कने मने1960क पश्चाते देखल जाइत अछि। एहि सं पूर्व मैथिली नाटकक कथातत्त्व वेद,
पुराण, रामायण, महाभारत इतिहास आदि सं उठाओल जाइत छल आ स्थापित लीक
पर मैथिलीयहु मे नाटक लिखा जाइत छल। ओना एहि काल मे तीन गोट नाटककारक
नाम श्रद्धापूर्वक लेल जेबाक चाहिअनि, जिनका ओही काल मे, मानव-जीवन मे
नाट्य वस्तु भेटि गेलनि। ई लोकनि छथि मुंशी रघुनन्दन दास (मिथिला नाटक),
ईशनाथ झा (चीनीक लड्डू) आ गोविन्द झा (बसात)। मूलतः ई कहल जाए, जे
ई तीनू नाटककार जाहि तरहें कथ्य आ शिल्प दुनू स्तर पर मैथिली नाटक मे नवीनताभरलनि, तकरे आगू विस्तार भेल। एहि तीनू नाटकक कथा तत्त्व समकालीन समाजक

76 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


स्थिति-परिस्थितिक तानी-भरनी सं बुनल गेल। सामाजिक जागरण, ईष्र्या आ द्वेषवश
मानव-हत्याक षड्यंत्रा आ वैवाहिक असंतुष्टिक प्रकरण सं उठल समस्या आदिक
चित्राण रमणीय ढंग सं एहि नाटक सभ मे आबि सकल अछि। हिनका लोकनिकअद्वितीय अवदान ईहो मानल जाएत, जे कथा-तत्त्व कें ई लोकनि ततबा मंजलनि,
जे सहज रूपें मंचित हएबाक शैली मे लिखएबा सं एकर प्राणतत्त्व अक्षुण्णे रहल।

ओना, 1960क पश्चात् सेहो मिथिला विभूति आदिक जीवनक खंड-विशेषपर आधारित कथा तत्त्व बुनल गेल। मुदा एहि काल मे बरोबरि चर्चाक क्रम मे
जे नाटककार लोकनि रहल छथि, से छथि सुधांशु शेखर चैधरी, ब्रजकिशोर वर्मा
‘मणिपद्म’, गोविन्द झा, नचिकेता, गंगेश गुंजन, महेन्द्र मलंगिया, विभूति आनन्द,
अरविन्द अक्कू, लल्लन प्रसाद ठाकुर प्रभृति।

मणिपद्मक तीन गोट नाटक ‘कंठहार’, ‘झुमकी’ आ ‘तेसर कनियां’ आदि
चर्चाक क्रम मे अबैत अछि। तीनू नाटकक लेखन आ प्रकाशन काल भिन्न-भिन्न
अछि। ‘कंठहार’, विद्यापतिक कथा पर आधारित नाटक थिक। अन्य दुनू नाटकक
कथातत्व नाटककार समाज सं उठौने छथि। मणिपद्मक देन, मैथिली साहित्यक
लेल शाश्वत रूपें अनुपमेय रहत। मुदा नाट्यशिल्पक स्तर पर मणिपद्म एहि नाटक
सभ मे असफलतम नाटककारक रूप मे परिलक्षित होइत छथि। हं, हिनकर रचनाक
संख्या बढ़ेबा काल एहि नाटक सभ कें गनि लेब उचिते हएत। ‘तेसर कनियां’
दहेज सन घसल-पीटल विषय पर लिखल गेल नाटक थिक, जकर कथा-तत्त्व कें
बुनबा मे मणिपद्म असाधारण त्राुटि सभ कएने छथि। ‘झुमकी’क कथातत्त्व सेहो
ताहि दोष सं बचल नहि अछि।

वस्तुतः ‘कथा-तत्त्व’ नाटकक रीढ़ थिक से बात असगरे कथा-तत्त्व सं
निष्पादित नहि भ’ जाइत अछि। नाटक कें जा धरि नाट्य-शिल्प, चरित्रा-चित्राण,
कथोपकथन, घटना संकलन, रस-परिपाक आदि तत्त्वक पूर्ण सहयोग नहि भेटतैक,
कथा-तत्त्व उत्कर्ष नहि पाबि सकत। आ तखन, जखन कि नाटकक रीढ़े कमजोर
रहत, नाटक सोझ भ’ कए कोना बैसत ? ओकरा कूबर बहरएबे करतैक। मणिपद्मकनाटकक एक तं कथा-तत्त्वे जर्जर छनि, ताहि पर ओकर समस्त सहयोगी तत्त्व
अपना-अपना दिशा मे जाइत छनि। तें हिनकर नाटक मे सगरे कूबर बहराएल
छनि। हरदम बुझाइत रहैत अछि, जेना नाटक मे ई अंश नाटकीयता आन’ लेल
देल गेल अछि।

सुधांशु शेखर चैधरीक ‘भफाइत चाहक जिनगी’, ‘लेटाइत आंचर’ आ ‘पहिल
सांझ’ तीनू नाटक सातम दशकक बादे प्रकाश मे आएल। मैथिलीक आधुनिक
नाटककारक रूप मे ओइ काल धरिक पूर्ण सफल नाटककार शेखर अद्वितीय
नाट्य-कौशल क मालिक छथि। हिनकर नाटकक प्रेक्षण, अनुशीलन, मैथिली नाट्य
लेखनक लेल चुनौती नहि, प्रेरणादायक òोत बनि सकैत अछि, जतए एक-एक

मैथिली नाटक: प्रयोग आ प्रवृत्ति / 77

टा नाट्य तत्त्व अपन मौलिकताक संग उपस्थित अछि। तीनू नाटकक कथातत्त्व
सामाजिक परिवेश मे बुनल गेल अछि। बेरोजगारी, दहेजक कुप्रभाव आ पीढ़ीक
अंतराल पर मैथिलीयहु मे आ आनहु साहित्य मे कतोक रचना भेल अछि।

मुदा एहि विषय कें देखबाक दृष्टिकोण रचनाकार केहेन रखैत छथि, ई बहुतमहत्त्वपूर्ण बात होइत अछि। दृष्टिकोणक इएह मौलिकता, इएह नूतनता पुरानो विषय
सं विलक्षण कथ्य निकालि अनैत अछि। शेखर, एहि तीनू विषय सं विशिष्ट कथ्यक
नेनु बहार कएने छथि। आ ओहि कथ्य कें सर्वांश रूपें प्रेक्षक धरि पहुंचा देबाक
लेल जेहेन विलक्षण कथा गढ़ने छथि, तें हिनकर असाधारण प्रतिभा, कथ्य आ शिल्पक
मौलिकताक परिचायक थिक। छोट-छोट वाक्य विन्यासक संग लघुसंवाद, सहज
शब्दावलीक प्रयोग, सहज उपकथा एवं घटना संकलन, पात्राक सहज अभिक्रिया एवंसहज चारित्रिक विकास आदिक मदति सं नाटककार एहि नाटक सभक कथा-तत्त्व
कें स्वस्थ आ सामथ्र्यवान बनौने छथि। कथाक कथ्य युगानुकूल ढंगें उठाओल गेल
अछि। सृजित बेकारीक समस्या मे सरिसो जकां पिसाइत युवा पीढ़ीक संपूर्ण मनोदशा
कें प्रतीकात्मकताक संग द्योतित करब, दहेज-लोलुप व्यक्तिक प्रतिक्रियावादी अभिक्रिया
सं उद्भूत दारुण समस्या आ दू पीढ़ीक मानसिक स्तर मे होइत युद्ध, शालीनताक
आवरण त’र व्यथित होइत व्यक्तिक मनोदशाक चित्राण आदि-आदि, शेखरक नाटकककथातत्त्व कें उत्कर्ष दैत अछि। कथा-तत्त्वक सौष्ठव मे शिल्पक केहेन महत्त्व होइतअछि, तकरे उत्तर थिक शेखरक नाटक। हिनकर नाटकक कथा-तत्त्व बरख, दू बरखक
जीवन सं छानि कए नहि आनल गेल अछि। वस्तुतः जतबा काल प्रेक्षक हिनकर
नाटक कें भोगए, ततबहि कालक घटना पूर्ण कौशल सं हिनका नाटक मे चित्रित
रहैत अछि से हिनकर नाट्य शिल्प आ कथा विन्यासक अतिरिक्त गुण थिक।
गोविन्द झाक वक्तव्य, ‘मैथिली मे आधुनिक नाटकक जन्म...प्राचीन नाटक सभक
गर्भ सं नहि, बल्कि ओकर समाधि पर भेल अछि’ हिनकहि नाटकक लेल सर्वांशमे सत्य होइत अछि। शेखर, आधुनिक मैथिली नाटकक कथा-तत्त्व कें सर्वथा नवीन
दिशा देने छथि आ एकरा सभ अर्थें मंचोपयोगी बनाएबाक बाट प्रशस्त कएने छथि।
ई दुर्भाग्य थिक, जे पछाति काल मे खूब नाटक लिखाएल, मुदा अधिकांश नाटककार
शेखरक बैरियर धरि पहुंचि नहि सकल छथि।

‘बसात’ नाटक लिखि कए मैथिली नाटकक क्षेत्रा मे आधुनिकताक पृष्ठभूमि
तैयार करबा मे वरेण्य स्थान प्राप्त कएनिहार गोविन्द झाक ‘अंतिम प्रणाम’ क अतरिक्तआओरो नाटक छनि। मुदा, कथातत्त्वक दृष्टिएं एतए ‘अंतिम प्रणाम’ विशेष रूपें
उल्लेख्य थिक। नाटकक कथा ग्रामीण परिवेशक स्वार्थपरक षड्यंत्रा, एकटा निरक्षर
आ बोनिहार व्यक्तिकें गामक प्रति आकर्षण आ फेर वस्तुस्थिति सं अवगत भेलाक
बाद विकर्षणक आधार पर गढ़ल गेल अछि। एहि छोट सन कथा कें नाटकक रूप
मे सजएबाक लेल दहेज समस्या, अल्प-वेतन भोगी व्यक्तिक समस्या, प्रेम-प्रसंग

78 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


आदि कें आनुषंगिक कथाक रूप मे आनल गेल अछि। लघुसंवाद, सहज शब्द आदिक
कारणें एहि नाटकक प्रशंसा कएल जा सकैत अछि। मुदा एकटा नीक नाटकक
कथा-संरचनाक लेल जाहि तरहें सहज आ विश्वसनीय उपकथाक संयोग हएबाक
चाही, जाहि तरहें पात्राक अवतरण हएबाक चाही, तकर अभाव एहि नाटक मे अछि।फलस्वरूप, एकटा नीक कथा-शिल्पीक कथा-तत्त्व दुर्बल भ’ गेल छनि। असहज
ढंगें पात्राक अवतरण आ अविश्वसनीय घटना क्रमक कारणें एकटा दिव्य-सन कथ्य
अपन अभीष्ट धरि जएबा मे उचित उत्कर्ष नहि पाबि सकल अछि।

‘एक छल राजा’ नचिकेताक बेस प्रशंसित नाटक मे परिगणित होइत अछि।हिनकर एहि नाटकक कथा तत्त्वक दिशा आन कोनहुं नाटककारक लेल सर्वथा
स्पर्शहीन रहल अछि। वैज्ञानिकताक प्रवेश सं उद्योगीकरण बढ़ल आ ओम्हर सरकारी
हस्तक्षेप सं जमींदारी-प्रथाक अंत भेल। मुदा तें शोषण-प्रतारणक अंत भ’ गेल, से
किन्नहुं सत्य नहि। वस्तुतः ओहि सामंती प्रथाक हस्तांतरण भ’ गेल अछि। ई समस्या
सेहो हमरा समाजक पैघ समस्या थिक। समस्या मात्रा गाम घर मे नहि शहरी परिवेश
मे सेहो अछि। नचिकेता एहि कथ्य कें अत्यंत गंभीरता सं पकड़लनि आ सर्वथानव तरहक कथा-तत्त्व नव शिल्पक संगें मैथिली नाटक कें देलनि। मुदा, ओ से
क्रम बनौने नहि राखि सकलाह।

गंगेश गुंजन, मैथिली नाटकक क्षेत्रा मे एकटा अद्भुत प्रयोगकत्र्ताक रूप मे
परिगणित छथि। नुक्कड़-नाटकक प्रयोग मैथिली मे पूर्ण सफलताक संग हिनकहि
सं पहिल बेर संभव भेल, से कहबा मे कोनो व्यवधान नहि हएबाक चाही। नुक्कड़
नाटक, हिन्दी मे खूब लिखल आ खेलल जाइत अछि। मैथिली मे एकर सर्वथा
अकाल छल, जकर प्रयोग क’ कए गुंजन, मैथिली नाटक-लेखनक नव दिशा प्रशस्त
कएलनि। सामान्यतया नुक्कड़ नाटक विविध सामाजिक समस्या कें एक संग उठबैक
प्रयास करैत अछि। हिनकर नाटक ‘बुधिबधिया’ ताहि दृष्टिकोणें सफल नाटक
अछि। नाटकक कथा, सामाजिक परिवेश मे राजनीतिक विडंबनाक आविष्कार संउठाओल गेल अछि। नाटकक कथावस्तु समाजक विविध विघटन, संबंध विकृतिआदि कें दर्शएबाक निमित्ते टा नहि अपितु देशक राजनीतिक स्तर, राजनीतिज्ञक
आत्मकेंद्रित दृष्टिकोण, ओकर छद्म, जनताक प्रति ओकर निरपेक्षता, क्षीण स्वार्थकलोलुपता मे सामान्य नागरिकक चमचइ प्रवृत्ति, देशक अर्थनीति, अंतर्राष्ट्रीय नीति,
विश्व स्तरक वैज्ञानिकताक दुर्वृत्ति आदि कें एकत्रित क’ कए पात्रा-सभक संवाद
गढ़ने छथि। विपुल घटनाक्रमक समूह मे केओ छोटो सन गप कहि सकबा मे असमर्थ
भ’ जाइत अछि। जखन कि गुंजन, छोट-सन घटना-क्रम मे विश्व-देश-राज्य-गाम-व्यक्तिसभक बात खुशफैल सं क’ नेने छथि। कथा-तत्त्वक अभाव रहितहुं, राजनीतिक
चिंतनपरक संभाषण रहितहुं, नाटक कतहु बोझिल नहि भेल अछि, से गुंजनक
अनुभूतिक परिपक्वता आ शिल्पक मौलिकताक द्योतक थिक। जे कथा नहि थिक,

मैथिली नाटक: प्रयोग आ प्रवृत्ति / 79

तकरा कथा बना देब लूरिक उत्कर्ष थिक।

महेन्द्र मलंगियाक नाट्य-लेखनक अनुशीलन करैत, जं ई कहल जाए, जे
शेखर जाहि तरहक नाट्य नूतनता मैथिली मे अनलनि तकरा एक दिशा मे सफलतम
ढंगें ल’ जाए वला केओ एकटा नाटककार मैथिली मे छथि, तं से थिकाह महेन्द्र
मलंगिया, तं कोनो अतिशयोक्ति नहि हैत। ‘लक्ष्मण रेखा खंडित’, ‘एक कमल
नोर मे’, ‘जुआएल कनकनी’, ‘ओकरा आंगनक बारहमासा’ आदि हिनकर प्रसिद्ध
नाटक सभ थिकनि। अपन नाटकक कथा-तत्त्व ई प्रायः निम्नवर्गीय समुदायक दैनिक
जीवन मे बीछैत छथि। जतए शेखरक कथाक परिवेश सामान्यतया मध्यमवर्गीय
समुदायक पारिवारिक आ आर्थिक समस्या होइत छलनि, ओतए महेन्द्र मलंगिया
निम्नवर्गक चूल्हा-चिनबार सं परिचित भेलाह। ओकर समस्त सुख-दुख कें अपन
कथा मे स्थान देलनि। पात्राक चारित्रिक विश्लेषण, मनोविश्लेषण, लघुतर संवाद,
सरल भाषा, सहज शब्दावली, छोट-छीन वाक्य, कथोपकथनक अंतरंगता आदि संकथा-तत्त्वक सौष्ठव कें ई बल देने छथि। नाटक सभक कथा संरचना, एतेक
विश्वसनीय घटना-क्रम आ उपकथा सभक द्वारा भेल अछि, जे ओ नाटकक लेलसहजहिं उत्कृष्टक बात भ’ जाइत अछि आ ओकर संप्रेषणीयता मे निखार अनैत
अछि। हं, ई कहल जएबाक चाही जे महेन्द्र मलंगिया अपन नाट्य-लेखनक दिशा
मात्रा एकमुखी रखलनि। निम्नवर्गक लोक पर तथाकथित उच्चवर्गीय लोकक
अत्याचारक कथाक संरचना विविध आयाम ल’ कए महेन्द्र करैत छथि आ तें नाटक
मे ओही वर्गक जीवनक आओरो पक्ष सभ उभरि अबैत अछि। सामाजिक विषमता,
निम्नवर्गक यातना, अत्याचार, भ्रष्टाचार, कुरीति आदि समस्त विडंबनाक लेल महेन्द्रक
कथा, उच्च वर्ग (तथाकथित) कें दोषी मानैत अछि आ निम्न वर्ग सर्वथा निर्दोषरहैत अछि। जे हिनकर कथा-तत्त्वक लोकप्रियता भनहि बढ़ा दइन, मुदा न्यायप्रियता
नहि कहल जेतनि।

परवर्ती पीढ़ी मे नाटककारक जे एकटा समूह बनल, तकर मूल श्रेय विविध
क्षेत्राक रंगशाला कें देल जाएत। एहि काल मे आबि कए नाटकक लेखन-प्रकाशन
आ मंचन यथेष्ट रूपें होअए लागल अछि। विभिन्न श्रेष्ठ कथाकारक, उपन्यासकारक
कथा एवं उपन्यासक नाट्य रूपांतरण होअए लागल। कतोक रूपांतरण मे कथाकप्राण तत्त्व रहि सकल, कतोक मे परिवर्तित भ’गेल, कतोक मे स्खलित भ’ गेल।
एहेन कमे रूपांतरण भ’ पाओल, जाहि मे कथाकार आ रूपांतरकार दुनू अपन-अपन
मौलिकताक संग होथि। एम्हर आबिकए रूपांतरण अथवा मौलिक नाटक लेखन
मे संलग्न नाटककार मे प्रमुख छथि विभूति आनन्द, अरविन्द अक्कू, लल्लन प्रसादठाकुर प्रभृत्ति। विभूति आनन्दक नाटक ‘समय संकेत’ शिक्षित युवकक बेरोजगार
जीवन पर आधारित नाटक थिक, जकर कथा ओहि युवकक संपूर्ण परिवारक परिवेश
मे गढ़ल गेल अछि। विभूति अपन नाटकक कथात्मकता कें संपूर्ण मनोयोग सं

80 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


विस्तार देने छथि। बेरोजगार जीवन कें भोगैत संघर्षरत ओहि युवकक धैर्य आ ओकरनियति तथा संपूर्ण परिवारक अपेक्षाक मौलिक ढांचा पर कथा-तत्त्व कें उत्कर्ष देबा
लेल प्रासांगिक रूपें अन्य पारिवारिक संदर्भक चित्रा सेहो सहज आ विश्वसनीय ढंग
सं जोड़ि सकलाह अछि। बेरोजगारीक समस्या पर अरविंद अक्कूक नाटक ‘एना
कते दिन’ सेहो अछि। एकरो कथा एकटा बेरोजगार युवकक समस्या सं जनमैत
अछि। मुदा छोट सन नाटक मे ततेक रास उपकथा अक्कू भरि देने छथि, जे
मूल प्रभाव मंद भ’ जाइत अछि आ आने प्रबल।

बेरोजगारीक समस्या पर लिखल ‘भफाइत चाहक जिनगी’, ‘समय संकेत’
आ ‘एना कते दिन’ तीन टा नाट्य शिल्प आ कथात्मक मौलिकताक कारणें तीन
दिशा दिश ल’ जाइत अछि। शेखरक बेरोजगार आत्मरत भ’ कए संघर्ष करैत छनि,
विभूति क बेरोजगार अपन तात्कालिक उद्देश्य कें छोड़ि व्यवस्था परिवत्र्तनक कामना
रखैत अछि, जखन कि अक्कूक बेरोजगार खौंझाह भ’ कए भगवतीक फोटो फोड़ए
लगैत छनि। नाटक मे पात्राक ई अभिक्रिया, ई मनोदशा नाटककारक वैयक्तिक
चिंतनशीलताक द्योतक होइत अछि। अक्कू एकटा निविष्ट स्वतंत्राता सेनानीक
ईमानदारी आ पवित्राताक चर्चा करैत जाहि उपकथा सभक समावेश कएने छथि,
ताहि मे अविश्वसनीयताक पुट ताकल जा सकैत अछि। ओना कथातत्त्वक आन-आन
सहयोगी घटकक संयोजन मे ओ औसत रूपें सफल भेलाह अछि। ‘अन्हार जंगल’
ग्रामीण पाखंड, रूढ़िग्रस्तता, दानवीयता, दुष्टता, बैमानी, षड्यंत्रा, लोभ आदिक आश्रय
सं लिखल गेल नाटक अछि। जखन कि ‘आगि धधकि रहल छै’, एकटा पागलखानाक
दृश्य मे उपस्थित बताह सभक पृष्ठभूमि पर चोट करैत अछि। नाटकक लोकप्रियता
आ नाटकक विश्वसनीयता हमरा बुझने दुनू दू स्तरक बात थिक। कोनो नाटकककथातत्त्व समाजक सभ दिशा सं ई अनैत छथि, मुदा तकर प्रस्तुतीकरण मे जखन
अविश्वसनीयता ल’ अबैत छथि, तं मोन खिन्न हैब स्वाभाविक। वस्तुतः नाटक
कें विविध आयाम इएह टा मैथिली से द’ सकलाह अछि। मुदा कथा मे अविश्वसनीयता
सं बचबाक अपेक्षा हिनका सं कएल जाइत अछि। ‘पातक मनुक्ख’क रूपांतरण
मे सेहो ई ओही त्राुटिक लेल दोषी छथि।

लल्लन प्रसाद ठाकुरक नाटक ‘लौंगिया मिरचाइ’ आ ‘बकलेल’ दू टा महत्त्वपूर्ण
सामाजिक विडंबना कें केंद्र मे राखि कए लिखल गेल अछि। समृद्ध परिवारक बेटीक
विवाह जखन कोनो ईमानदार, कर्मनिष्ठ आ शिष्ट परिवार मे भ’ जाइत अछि, तखनुक
दुतरफा समस्या पर ‘लौंगिया मिरचाइ’ आ उच्च शिक्षा प्राप्त पुत्राक द्वारा बाप-भाइक
बहिष्कार आदिक घटना सं संबद्ध ‘बकलेल’ नाटक प्रशंसित भ’ सकैत अछि, लोकप्रिय
भ’ सकैत अछि, मुदा विश्वसनीय नहि। एकर उपकथा सभ मे अविश्वसनीयता
भरि कए एहि नाटकक प्रभावोत्पादकता कें बाधित कएल गेल अछि। ‘लौंगिया
मिरचाइ’ मे किछु घटनाक्रमक असहज आ असमय संयोजन सं बचल जइतए तं

मैथिली गजल: स्वरूप आ संभावना / 81

एकर कथावस्तु श्रेष्ठ प्रभावोत्पादकता द’ सकैत छल। ‘बकलेल’ नाटक मे अविश्वसनीयताअपेक्षाकृत बेसी ठाम बजरैत अछि। मुदा, दुनू नाटकक कथातत्त्व अनटच्ड समस्याक
आड़ि पर बुनल गेल अछि, जकरा लल्लन चलताउ शीर्षक द’ कए झुझुआन क’
देलनि अछि। सात वर्षक बकलेल बालक गणित पर रामानुजम जकां तर्क नहिक’ सकैत अछि। भयानक रूपें टी.बी. ग्रस्त लोक ईंटा नहि ऊघि सकैत अछि।

कुल मिला क’ ई तं स्पष्ट होइत अछि, जे आजुक नाटककार कें विषयकविस्तार खूब देखल छनि, मुदा अगुताइ मे ओ ओकर कथातत्त्व कें सायास अविश्वसनीय
बना दैत छथि, जाहि सं बचबाक अपेक्षा अछि।

82 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्




मैथिली गजल: स्वरूप आ संभावना


मैथिली गजलक वत्र्तमान स्थिति आ संभावना पर विचार करैत, गजलक पृष्ठभूमि
पर विस्तृत चर्चा करब आवश्यको नहि, आ से हमर अभीष्टो नहि। तखन, एक
बेर ओम्हर हुलकि लेब, युक्तिसंगते बुझाइछ।

मूल रूप सं, हेबनि धरि, गजल उर्दू-फारसीक रचनात्मक विधा मानल जाइत
छल। हिन्दी मे दुष्यन्त कुमार कें हमरा बुझने गजलक पिता कहल जएबाक चाहिअनि।
उर्दू-फारसी मे तं एतेक अधिकार पूर्वक कोनो एक व्यक्ति कें श्रेय द’ देब कठिन
अछि। काल निर्धारण पर सेहो जं दृष्टिपात कएल जाए, तं उर्दू-फारसी मे गजलकप्रशस्ति शताधिक वर्ष सं अछि, हिन्दी मे एकर प्रादुर्भाव वत्र्तमान शताब्दीक पांचम-छठमदशक मे मानल जाएत, मुदा, मैथिली गजलक प्रारंभ जीवन झाक रचना मे वत्र्तमान
शताब्दीक पहिल आ दोसर दशक मे भ’ गेल छल। स्पष्ट अछि, जे मैथिली गजल
हिन्दीक अपेक्षा वृद्ध किंतु उर्दूक अपेक्षा शिशु अछि। तथापि, उर्दू तं दूर, हिन्दीओक
गजल जकां क्षीण स्वागतक पिरही एकरा नहि भेटि पओलैक अछि। ओना ईहो बात
ध्यान राख’क थिक, जे हिन्दी गजल कें सेहो एखन धरि मंचेक चीज बूझल जा
रहल अछि आ तहू मे, जाहि गीत मे कनेक प्रेमपरक व्यथा, नायिकाक सौंदर्यक
मदिरा, आंखिक बंकिम कनखी आदिक चर्चा हो, तकरहि टा गजलक संज्ञा देल
जा रहल अछि। आ, मैथिली मे तं सहजहिं। एहि साहित्य मे तं सभ सं पैघ विडंबनाई अछि, जे अशक्य पहलमान जकां अखाड़ा कें नकारि देबाक प्रवृत्ति ओहि समस्त
व्यक्ति मे समा गेल छनि, जे एकर श्रेय लेबा सं चूकि गेलाह। चूंकि एकर श्रेय
हुनका नहि भेटि सकलनि, तें ओ कहैत छथि, जे ई किछु थिकिहे नहि।

जतए धरि ‘गजल’क अर्थ ‘प्रेमिकाक आंचर’ आ मैथिलीक गजल-रचना मे
तकर चित्राणक अभावक बात उठैत अछि, ताहि प्रसंग दू टा बात ध्यातव्य थिक।
पहिल, जे भाषा विज्ञानक अर्थ-संकोच आ अर्थ-विस्तार प्रक्रिया सं आ सामाजिक
मान्यताक हिसाब सं कोनहु शब्द कें आशातीत अर्थ भेटि जाइत अछि। एकटा शब्द

मैथिली गजल: स्वरूप आ संभावना / 83

‘स्याही’ (कारी रंग) सं जं हम लाल आ हरियर दुनू रंगक रोशनाइक बोध प्राप्त
क’ लैत छी, तखन बिना प्रेमिकाक अलक-कपोल-कटि वर्णनक एहि साहित्यिक
विधा कें हम गजल किऐक नहि कहब ? दोसर बात ई, जे आइ धरिक समस्त
लक्षण ग्रंथक रचना लक्ष्य-ग्रंथक रचनाक पश्चाते भेल अछि। तय बात अछि, जे
ओहि समयक रचना-विधानक आधार पर गजलोक अनुशासनावली बनाओल गेल
हैत। स्पष्ट ईहो अछि, जे प्रारंभ मे विशुद्ध रूप सं ई उर्दू फारसी मात्राक विधा प्रभेद
छल आ ओना तं हेबनि धरि, मुदा प्रारंभिक काल मे आओरो बेसी, ई संप्रदाय ऐय्याशी,
सुरापान, सुंदरीक सान्निध्य आदिक बेसी बुभुक्षु रहैत छल। ओना जं मोटा-मोटीकही, तं श्रेयष्कर हैत, जे ओहि समयक संपूर्ण समाजे एहि दिश बेसी आकृष्टछल, आ तें आन साहित्यिक विधाक संग-संग एहू विधा-प्रभेद मे शृंगारिक-चित्राणहोइत रहल। समय बीतल, समाज बदलल, परिवेश बदलल, संस्कृतिक एकटा जोरगर
परिवर्तन आएल। पैदल चल’ वला आदमी हवाइ-जहाज सं चलए लागल, चंद्रमा
कें देवता कहनिहार लोकक पुत्रा-पौत्रा चंद्रमा पर सं भ्रमण क’ आएल आ ई परिवर्तन
समाज कें बहुत रास वरदानक संगे आओरो बेसी अभिशाप द’ गेल। ई द’ गेल,
शोषण, बेरोजगारी, कुंठा, आत्मदमन, समस्या, भूख, असुरक्षा, सांप्रदायिक दंगा,
प्रजातांत्रिक सरकार, जातीय दंगा, अपनत्वक विगलन आदि-आदि। आब एतए
विचारणीय अछि, जे प्रत्येक गजलकार अही माटि पानि मे जनमल-बढ़ल-पोसल
रहैत छथि। हुनका नजरिक सोझां मे इएह समस्त अभिशाप सिनेमाक रील जकां
घुमैत रहैत अछि, तखन हुनका कोनो सुनितंबिनीक कटाक्ष कोना नीक लागओ ?
भूखक धाह सं जरैत पेटक चमड़ी कें, प्रेमिकाक आंचर कतेक शीतलता देत ? तें
गजलक मतला

जहर केर घोंट भरि सजनी जं पीबी अहांक हाथें हम

तं सत्ते जीबि लेब जिनगी अमर भ’ अहांक हाथें हम

नहि राखि कए ई लोकनि रखैत छथि

हमर विषपान सं जुनि होउ प्रमुदित, हम ने एसगर छी

अहां केर शान ढाहत मृत्यु हमरे, हम ने एसगर छी

गजल कें मात्रा प्रेमिकाक आंचरक अर्थ द’ कए एकरा प्रेम-विरहक अभिव्यक्तिक
माध्यम कहनिहार विद्वान लोकनि एकरा संगें एकटा आओरो अन्याय कएलनि।
आ से ई, जे एकर ‘फार्म’ क संग-संग एकर वण्र्य-विषयक सेहो निर्धारण क’ देलनि
(ई बात भिन्न, जे ई निर्धारण लक्षण ग्रंथक पृष्ठ पर उल्लिखित नहि भ’ कए, किछु
आलोचकक माथे मे उल्लिखित अछि)। मुदा एतए विचारणीय बिंदु ई अछि, जे
जं कथा, कविता, उपन्यास, नाटक आदि समस्त विधाक वण्र्य-विषय, समाजक बदलैतपरिवेश-परिस्थितिक संगें बदलि गेल, तखन बदलैत भाषा-संस्कृति आ परिवेशक
संगें गजलक वण्र्य-विषय किएक नहि बदलओ। दोसर बात ईहो, जे अन्यान्य समस्त

84 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


भाषाक गजल एकर साक्षी अछि, जे प्रेमक अतिरिक्त, देशभक्ति, जन-दशा आदि सभ
बिंदु कें एहि मे समाहित कएल गेल अछि। बहादुरशाह ‘जफ र’क गजल केर एकटा
शेर अछि

हिन्दियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की

तख्ते-लंदन पर चलेगी तेग़ हिन्दुस्तान की

ओना, एकर अर्थ ई नहि, जे आब ‘प्रेम’, गजल अथवा आनो साहित्यिक
विधा-उपविधाक चीज नहि रहि गेल अछि। जें कि जीवने प्रेमक प्रतीक थिक, प्रेमो,
साहित्यक वण्र्य-विषय छल, अछि, आ रहत। मुदा, संगहि ईहो कहब आवश्यक,
जे जनजीवनक एक-एक बिंदु सेहो, गजलक वण्र्य-विषय हैत। एतए हम, सियाराम
झा ‘सरस’ सं पूर्णतः सहमत छी, ‘आजुक तीत-मीठ साहित्यिक अनुभूतिक सफल
अभिव्यक्ति हेतु एक सशक्त माध्यमक रूप मे गजलो किएक ने?’श्

हमर एकटा धारणा अछि, जे कोनहु साहित्यिक कृति कें मान्यता भेटैत छैक
आलोचना साहित्य सं। प्रमाण-स्वरूप अनेक उदाहरण ताकल जा सकैत अछि।
गजलक संग एकटा ईहो दुर्भाग्य अबैत रहल अछि। वर्तमान शताब्दीक पहिल दशक
सं मैथिली मे गजल लिखाओल जाइत रहल अछि, मुदा एकर समालोचना पर कहिओ,
कोनो विद्वानक लेखनी नहि उठलनि। फलस्वरूप सात दशक धरि एकरा अपन
संज्ञा नहि भेटि सकलै आ सहानुभूतिक आसनी टा पबैत रहल। आठम दशक मे
आबि कए एहि पर पहिल बेर कलम उठौलनि तारानन्द वियोगी। ‘मिथिला-मिहिर’
मे एहि पर यथेष्ट प्रतिक्रिया व्यक्त कएल गेल। पाछां एकाध टा आओरो निबंध
आएल। मुदा ताहि मे ई देखल गेल, जे ओ लोकनि गजलक प्रति आग्रही छथि,
किंतु व्यक्तिपरक द्वेष हुनका जकड़ने छनि, तें एहि फेर मे अपन निबंध मे गजल
पर चर्च करबा सं बेसी शब्द व्यक्तिए लेल खर्च कएलनि। पुनः रामदेव झाक
आलेख आएल। एहि निबंध मे दू टा अनर्गल बात ई भेल जे गजलक पंक्ति लेल,
छंद जकां मात्रा निर्धारित करए लगलाह आ किछु एहेन व्यक्तिक नाम मैथिली
गजलकारक सूची मे जोड़ि देलनि, जे कहिओ कोनो गजल नहि लिखलनि। मात्रा
निर्धारण प्रायः रामदेव कोनो खास रचनाकारक खास गजलक मात्रा गनि कए कएने
हेताह। मुदा हमरा बुझने गजलक लेल मात्राक कोनो बंधन नहि अछि। एकरा लेल
आवश्यक शर्त रदीफ, काफिया, मतला आ शेरक अतिरिक्त आओर किछु नहि अछि।
एकर अतिरिक्त, मैथिली गजल पर आओर कतहु जं किछु चर्च भेल अछि, तं से
थिक एम्हर प्रकाशित एक-दूटा गजल-संग्रहक भूमिका अथवा पत्रिका मे गजल-सवक्तव्य
छापबाक प्रयोग।

ओना हिन्दी-मैथिलीक सफल गजलकार नरेन्द्रक अनुसार ‘गजलों के मुंह-कान,
नाक-नक्श, कद-काठी, चाल-ढाल या बोली-वचन पर मुझे कोई बहस नहीं करनी
है कि वह बुर्का डालती है या धोती, हनुमान चालिसा पढ़ती है या कलमा।...बहस

मैथिली गजल: स्वरूप आ संभावना / 85

मुझे केवल उसकी सोचों पर करनी है, लगावों पर करनी है और कारगुजारियों परकरनी है। यानी, गजलों को अभी भी, बिकाऊ-अंदाज़ मे शोषकों की विलासिता
के लिए मुजरा गाना चाहिए। बचकाने और भावुक प्रेम-प्रसंगों में प्रेम-पत्रा का कोटेशन
बनना चाहिए। फैशनपरस्त, लंपट-व्यभिचारों में शिलाजीत की गोली बननी चाहिए।
भोले-भाले निरीह को कैबरे-हाव-भाव और वाग्मैथुन द्वारा बीमार बनाना चाहिए।
या जनता के बीच आकर सामान्य जीवन व्यतीत करना चाहिए।...यह एक बहस
का मुद्दा है...’

मुदा, नरेन्द्र तं एकटा प्रश्ने टा ठाढ़ कएलनि अछि, हम एहि बहस मे अपन
भागीदारी सं ई कहब, जे निश्चित रूप सं गजल कें जनताक बीच आबि कए सामान्य
जीवन व्यतीत करबाक चाही। एहि जीवन प्रक्रिया मे एकरा प्रेमिकाक भ्रू-विलासक
प्रसाधन गृह मे सेहो जाए पड़तैक, खेतक आड़ि पर सेहो जाए पड़तैक, संपूर्ण समाजक
छल-छद्म, आचार-विचार, नीति-अनीति सभ देखए पड़तैक आ एहि सभ क्षेत्राक
प्रतिनिधित्व करए पड़तैक। एहेन प्रतिनिधित्व विविध काल-खंड मे विविध भाषाक,
विविध रनाकारक गजल करैत रहल अछि। गालिब, फैज, मोमिन, इन्शा, जुरअत,
जफर, दुष्यन्त कुमार, नरेन्द्र, महाप्रकाश, महेन्द्र, कलानन्द भट्ट, सरस, विभूति आनन्द,
धीरज, नवीन, वियोगी, रमेश प्रभृति लोकनिक रचना एकर साक्षी अछि।

मैथिली मे, जीवन झाक पश्चात् गजलकार लोकनिक नामक सूची तैयार कर’
मे पहिल नाम अओतनि आरसी प्रसाद सिंहक। गजल लिखेैत रहलाह, मुदा अलग
सं एहि प्रकारक रचनाक लेल कोनो टा चर्च नहि कएल गेल। आओर लोकनि
मे सं रवीन्द्रनाथ ठाकुर, मार्कण्डेय प्रवासी, बुद्धिनाथ मिश्र, महाप्रकाश, केदारनाथ
लाभ, महेन्द्र, कलानन्द भट्ट, तारानन्द वियोगी, विभूति आनन्द, राम भरोस कापड़ि
‘भ्रमर’, नरेन्द्र, धीरज, बाबा वैद्यनाथ झा, रमेश, देवशंकर नवीन प्रभृति प्रमुख छथि।
एकर अतिरिक्त किछु एहनो नाम अछि, जे पूर्वक आलोचनात्मक निबंधकारक उक्ति
कें सत्य करबा लेल एकाध टा गजल सायास लिखि देलनि। एहि सूची मे किछु
एहेनो नाम अछि, जिनकर गजल विशुद्ध रूप सं प्रेमिकाक निबि-बंध निहारि रहल
अछि, किछु एहनो, जिनकर गजल जेठक रौद मे हरबाहक संगें खेतक रेह मे दौड़ि
रहल अछि, ओकर भूख-प्यास आ थकानक अनुमान क’ रहल अछि, बेकारी-भुखमरीक
चट्टान त’र दाबल लोक कें निकाल’क प्रयास क’ रहल अछि; आ किछु एहनो,
जिनकर रचना एहि समस्त क्षेत्रा मे दौड़-बरहा क’ रहल अछि। जे किछु हो, मुदा
गजल लिखा रहल अछि। ओना एहि मे सं किछु गोटए एहनो छथि, जे गजल
लिखबा काल दू टा असावधानी राखब रचना-कर्म जकां अनिवार्य बूझि लैत छथि।
पहिल, जे अपन भाषाक शब्द-सौष्ठव कें बिसरि जाइत छथि आ जाहि अभिव्यक्ति
लेल मैथिली मे पर्याप्त शब्दावली अछि, तकरहु लेल अन्य भाषाक शब्द-प्रयोग मे
पाछू नहि हटैत छथि। महेन्द्र आ विभूति आनन्द, तकर अपवाद थिकाह। दोसर

86 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


नग्नता, नकल, प्रगतिशीलता


नवंबर 1981क प्रथम सप्ताह मे टोकियो मे एशिया, अफ्रिका आ अमेरिकाक
अंतर्राष्ट्रीय लेखक सम्मेलन भेल छल। भारतक प्रतिनिधित्व प्रसिद्ध कथाकार
काशीनाथ सिंह क’ रहल छलाह। जापानीक प्रसिद्ध लेखक तथा आलोचक एवं भारतक
अनन्य प्रेमी, तातियो वातानवे, काशीनाथ सिंह कें कहलथिन जे ओ हुनका ओ
चीज देखेबा हेतु ल’ जा रहल छथि जे भारत मे दुर्लभ अछि। उत्सुकतावश काशीनाथ
सिंह गेलाह। मुदा एहेन दुर्लभ चीज देखेबा लेल हुनका एकटा सिनेमा घर मे आनल
गेलनि, जतय बिना कहानी, संवाद आ अभिनयक दृश्य परदा पर भेटैत रहलनि।
भरि हाॅल दर्शक। परदा पर नांगट जनानीक देह। पुरुषक ओहि पर पाशविक अत्याचार।
मूड़ीक बलें उनटा कए लटकल नांगट जनानीक संवेदनशील अंग, आ गुप्तांग परमोमबत्ती बरका क’ ठोपे-ठोपे खसएबा मे आनंदित होइत परिवार।..



ई घृणित दृश्य सब देखि काशीनाथ सिंहक मोन तिलमिलायल जाइत रहनि।
मुदा ताहि पर घीढार करैत, तातियो वातानवे पूछि देलकनि जे जं भारतो मे एहिना
सिनेमा अथवा दोकान सब मे काॅफी पिअबैत नांगट, शिक्षित छौंड़ी, सब पर नजरि
पड़ए लागए, तं केहेन सोचबै ?

काशीनाथ जी चिकरैत, डपटैत मात्रा दू चारि शब्द बाजि सकल छलाह हमरादेशक पवित्रा संस्कृति एहि अश्लीलता कें बर्दाश्त नहि क’ सकैत अछि !

यूरोपक कहानी सुनबैत वातानवे पुनः कहलखिन जे आधुनिकीकरणक परिणति
यैह सभ छियै। तें भारत कें ओतहि रह’ दिऔ जत’ ओ छै, अन्यथा ई सभ देखबा
लेल आंखि आ मनःस्थिति कें एडजस्ट क’ लिअ’। तखन हुनका बनारसक हनुमान
घाट पर डा. ईवान इलिचक उक्ति मोन पड़लनि मात्रा भारत ! जं एखनहुं संसार
कें कोनो देश बचा सकैत अछि, तं ओ थिक भारत। देखबाक अछि जे आधुनिकता
एहि पर केहेन रंग चढ़बैत छै। अपन एहि भूमिका कें बिसरि जं ईहो ओहि देशक
नकल केनाइ शुरुह क’ देलक तं डर होइत अछि।

नग्नता, नकल, प्रगतिशीलता / 87

मुदा वातानवेक भविष्योक्ति आ डाॅ. इलिचक डर आब भारत मे साकार होअए
लागल अछि। पाश्चात्य संस्कृतिक अश्लीलता, उद्दंडता आ भ्रष्टता सं दग्ध चिंतकलोकनि एक दिस भारतक पवित्रा संस्कृति मे आबि क’ शीतलता प्राप्त कर’ चाहैत
छथि तं दोसर दिस अपन पवित्राता, शीतलता कें हीनताक निशानी बूझि भारतीय
एकरा त्यागि ओहि उष्णता मे तेजी सं प्रवेश क’ रहल अछि।

नारीक नग्न शरीर देखबाक रुग्न मानसिकता एतुक्का पुरुष मे तेजी सं समा
रहल अछि। ब्लू फिल्मक बाजार एत’ गर्मे टा नहि, अपितु खौलि रहल अछि।
धनक बलें निर्धन जनानीक इज्जति, देह, यौवन कीनब; बाट चलैत भिखमंगनी,
निरीह इत्यादि कें धनक प्रलोभन द’ कें ओकर देहक मात्रा भोगे टा नहि, अपितु
कुभोग करब, एतुक्का पुरुषक हवस भेल चल जा रहल अछि। नशा सेवन क’
कए नारीक भोग मे पाशविक अत्याचार करबाक प्रवृत्ति तीव्र गतिएं बढ़ि रहल अछि।

ई सभटा पाश्चात्य संस्कृतिक नकल मे फिरीसान, बताह मानसिकता थिक।नारीक अस्तित्व कें प्रधानता देनिहार, पवित्रा संस्कृतिक धनी, सभ्यता मे विश्वक
आन कोनहुं देश कें धिक्कार देनिहार, एहि भारत मे पुरुष वर्ग द्वारा नारीक एहेन
रद्दी प्रस्तुतीकरण भ’ रहल अछि, पुरुष ओहि नारी समाजक अस्तित्व कें बिसरि
रहल अछि जकरा पेट मे ओ कीटाणु सं जीव बनल, अपन संक्रमणकालक नौ
मास बितौलक, जकरा स्तन कें चूसि क’ आइ एहेन बलिष्ठ भ’ गेल, जे ओकरहि
पर अत्याचार क’ रहल अछि। ई सभ आर किछु नहि, मात्रा एतबा कहैत अछि,
जे एतुक्का नस्ल मे पुरुषक बीमार मानसिकता आबि गेल अछि।

मुदा एहि सभ टा कुप्रवृति कें संरक्षण भेटि रहल छै, व्यवस्था आ बाजार द्वारा
तैयार कयल एकटा विशेष नारी वर्ग द्वारा। जकरा पाछां निर्दोष नारीक सेहो पैघ
समूह अछि। ई नारी समाज स्वयं अपन अस्मिताक प्रति जबावदेह नहि अछि।
ओ ओहेन सभ्यताक नकल मे बेचैन अछि, जकरा सं उबिया क’ डाॅ. इलिच भारतक
संभावित दुर्दशाक बात सोचने रहथि। भारतक नौजवानक ई आकर्षक चेहरा, मस्त
शरीर, कांति, तेजस्विता, चारित्रिक पवित्राता सब टाक पाछां रहस्य अछि ओकर ‘माइकदूधक’। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा कयल गेल अध्ययनक अनुसार प्रत्येक
माइक दूध मे व्यापक रूप सं कीटनाशक औषधि रहैत छै, जकरा पीबि क’ हमरा
देशक बच्चा स्वस्थ आ बलिष्ठ होइत छल ! मुदा आब एत’ माइक दूध पीबाकसौभाग्य पचहत्तरि प्रतिशत बच्चा कें भेटैत छैक कहां ? एहि संबंध मे लोक मे भ्रामक
धारणा ई रहैत छै, जे सब शहरी माय अपन यौनाकर्षण कें कायम राख’क लेल
बच्चा कें दूध नहि पीब’ देबाक एकटा फैशन बना लेने अछि। मुदा बात ई छै,
जे सामान्य स्थिति मे जं माइक स्तन मे दूध रहतै तं ओकरा बिना बच्चा कें पिअओने
नहि रहल जा सकैत छै। एकर मुख्य कारण छै, ओकर लाचारी। प्रारंभ मे मे स्त्राीक
ड्रेस एतेक लहक-चहक वला नहि छल। ‘ब्रेसियर’क प्रचलन एतेक नहि छलै।

88 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


किओ नहि पहिरैत छल। सोवियत संघक वैज्ञानिकक निर्णयक अनुसार हरेक प्रबुद्ध
माए कें एहेन चेतावनी देल गेल छै, जे ओ अपन बेटी कें प्रारंभिक वयस मे ब्रेसियर
नहि पहिर’ दैक। करीब सतरह वर्षक वयस धरि बेटीक स्तन विकासमान रहैत
अछि। मुदा प्रायः 12-13 वर्षक उम्रहि सं खूब शिकस्त पहिरबाक परिपाटी देखल
जाइत अछि। प्रारंभिक अवस्था मे बढ़ैत स्तन कें ब्रेसियर सं दाबि कें एना जबरदस्ती
राखब ओहने अछि, जेना कोनो अंकुरैत बीया कें। एही कारण सं एकर रूप बिगड़ि
जाइत छै। लगभग आठ सय स्तन-पान कराब’ वाली महिलाक सर्वेक्षण सं ई ज्ञात
भेलै जे, जे महिला सब बच्चा कें दूध पियाब’ मे सक्षम नहि अछि, ओहि मे सं
छब्बीस प्रतिशत बारह-तेरह बर्खक उम्र मे ब्रेसियर पहिरब शुरुह क’ देने छल।
सिन्थेटिक, पैड वला तथा रंगीन ब्रेसियरक संबंध मे, एक अमेरिकन पांच सय ‘वक्ष
कैंसर’ रोग सं ग्रसित महिलाक जांच क’ क’ निर्णय देलनि-जे एहि सभक व्यवहार
सं वक्षक तापमान बढ़ि जाइत अछि, जाहि सं कैंसरक डर रहैत अछि। मुदा नकलक
पाछां बताह बनल ई फैशनपरस्त नारी समाज ई सभ खूब करैत अछि।

व्यापारक दिशा मे सेहो महिला लोकनि अपन अस्तित्व मेटेबा मे पाछां नहि
छथि। किछु गोटा अंग प्रदर्शनक व्यापार करैत अछि, तं किछु अंग गमनक। किछु
गोटा स’ख सं करैत अछि तं किछु लाचारी देखबैत। मुदा, चाहे नारीक स’ख हो
अथवा लाचारी, ई सभ नारीक अपना प्रति अन्याय छियनि। ई कोन स’ख जे ई
प्रदर्शित करए जे नारी, पुरुषक भोग्य वस्तुक अलावे आर किछु नहि थिक ? ओ
कोन लाचारी जकरा नारी पसीना बेचि के’ नहि मेटा सकैत अछि, ओकरा खाली
देहे बेचि क’ मेटा सकैत अछि ?

विज्ञापनक बाजार मे नारी उच्च राशि प्राप्त क’ क’ अपन नग्न-अर्द्धनग्न
शरीर देखबैत अछि। आ ई फोटो जनाना सं मर्दाना कोनो वस्तु हो, ओहि पर सटैत
अछि। दमित इच्छा शक्ति वला उपभोक्ताक बीमार मानसिकता प्रेरित भ’ क’ कीनैत
अछि। एहि सं ओ माॅडलिंग कर’ वाली, व्यवस्था, बाजार आकि ओ नारी ई कखनहुं
नहि सोचैत अछि जे, एना केला सं समाज मे हमर महत्व घटैत अछि। लोक ई
बुझि लैत अछि जे नारी देह मूरै-भांटा जकां बिकाए वला वस्तु थिक। लिपिस्टिकक
माॅडलिंग मे स्त्राीक हैब आवश्यक अछि, मुदा ट्रकक टायरक प्रचार मे अर्द्धनग्न छौंड़ीक
ठाढ़ हैब ?

आखिर नारी मात्रा सुन्नरि आ समर्पिते टा किएक अछि ? ई विद्रोही आ गुणवती
किएक नहि अछि ? आकर्षित करबा लेल एकरा सुंदरताक अलावे आरो बहुत किछु
छै। लक्ष्मीबाई कें, मीराबाई कें, इन्दिरा गांधी कें, सुन्नरि जनानीक रूप मे के जनैत
छै ? मोटा-मोटी अपना देशक महिला समाज अपन अस्तित्वक अभेला अपनहि क’
रहल अछि। नकलक पाछां अपने संस्कृति कें छोड़ि आन संस्कृतिक नर्क मे प्रवेश
कयने चल जा रहल अछि। पवित्राता त्यागि अश्लीलता कें अपनौने जा रहल अछि।

नग्नता, नकल, प्रगतिशीलता / 89

निकट भविष्य मे एहि फूजल बाजार मे, नारीक एहि अधोगति कें रोकब असंभव
लागि रहल अछि।

एम्हर आबि क’ भारतक बुद्धिजीवी लोकनि ‘नारीवाद’क झंडा उठौलनि अछि।
सिमोन द बुआ क पोथी ‘द सेकेंड सेक्स’ पढ़ि क’ आ पश्चिमक ‘ब्रा बर्निंग’ जुलूसक
समाचार सं प्रेरणा ल’ क’ नारीवादक नारा बुलंद करब प्रारंभ कयलनि अछि। एते
धरि जे साहित्यो सृजन मे नारीवादी साहित्यक आरक्षण प्रारंभ कयलनि अछि। हिन्दी
मे ई स्वर कनेक बेसिए फैशन सं आयल अछि। बल्कि, हिन्दीक जे साहित्यकारअपेक्षाकृत पैघ स्त्राीभक्षी छथि, से ई स्वर बेसी जोर सं बजैत छथि आ लिखैत छथि।
हमरा ई कहबा मे संकोच नइं होइत अछि जे ‘द सेकेंड सेक्स’ पोथी सं बहुतोदिन पूर्व महादेवी वर्माक पोथी ‘शृंखला की कड़ियां’ लगभग ओही मुद्दा पर प्रकाशित
छल, तखन ई चर्चा नइं होइत छल। कारण तय अछि, जे भारतक बुद्धिजीवी कें
स्पून फीडिंगक अभ्यास छैक, थोड़ेक स’ख सेहो। पश्चिमी देश सं आयल प्रधानमंत्राी
राजपथ (दिल्ली) सन सड़क (पद्मिनी नायिकाक जांघ सन चिक्कन-चकमक) पर
कार सं जाइत काल कहि देलकै जे भारत मे गंदगी बड्ड अछि, तं दिल्लीक सफाइ
होअय लागल। जं ओ प्रधानमंत्राी कोनो झुग्गी काॅलोनी अथवा भारतक कोनो गामक
अन्नहीन-क्रियाहीन टोल (?) पर जइतथि तं की कहितथि ?

भारतक राजनीतिज्ञ सं मिसियो भरि कम एतुक्का कथित साहित्यकार आ
बुद्धिजीवी नइं छथि, जिनकर आचार संहिता मे एहेन दिग्भ्रमित नारी सभ कें समेटि
क’ बाट पर अनबाक बात लिखल हो। प्रगतिक अइ उन्मुक्त बाट पर ई बुद्धिजीवी
लोकनि हमरा देशक नारी कें अस्तित्वबोधक पाठ तं नहि पढ़ा सकलाह, नारीक
बौद्धिक आ मानसिक विकास तं नहि क’ सकलाह, ओकरा लड़बाक अवगति सिखा
क’ तालीम क’ लेलनि, अर्द्धनग्न भ’ क’ माॅडलिंग करबाक निर्लज्जता सिखा
लेलनि। अर्थात्, पारिवारिक स्नेह सं टूटल रहत महिला, तं परिवार सं घृणा राखत;
नग्नताक प्रति रुचिशील रहत महिला, तं ओहि स्त्राीभक्षी कें बेस सुअवसर भेटैत
रहतनि; रूप, राशि, प्रतिष्ठा अर्थात् स्त्राी, धन आ प्रशस्ति सं घेरायल पुरुष अपनाकें गौरवशाली बुझैए। कृष्ण सन गौरवशाली। सोलह सय गोपी सं घेरायल, कौरव
पांडव कें लड़बैत, धर्मयुद्ध करबैत, दोसरक खानदान कें नष्ट करबैत...। अर्थात्,
अइ स्त्राी कें कतहु बाट नइं..



90 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्




मूल्यांकन



असावधनी, जे कतोक गजल मे छंद भंगक बाहुल्य रहैत अछि। मात्राक सीमा गजल
मे भने नहि हो मुदा मात्रा सुनिश्चित क्रम मे तं अबस्से रहबाक चाही। ताहि क्रमक
निर्वाह बेसी रचनाकार नहि क’ पबैत छथि। एहि दुनू असावधानीक कारणें रचनाक
अस्मिता कमजोर भ’ जाइत अछि। रचनाकार कें एहि सं बचबाक चाहिअनि। ओना
किछु नाम एहनो गनाओल जा सकैत अछि जे गजल लिखबाक लौल करैत छथि,
बल्कि रचनाधर्मिते अपनएबाक लौल करैत छथि। मैथिलीक संपादक लोकनि (किछु
संपादक) ततेक बेसी उदार छथि, जे हिनका लोकनि कें मनवांछित मान्यता द’
चुकल छथि। आ ईहो कहब आवश्यक, जे गजलकारक सूची एतबे सं पूर्ण नहि
भ’ गेल। जिनकर नाम नहि गना सकलहुं, तिनका सं कोनो दुश्मनी अथवा पूर्वाग्रह
नहि अछि।

जहां धरि गजलक मान्यताक प्रश्न अछि, हम तं एकरा श्रव्यकाव्य मे पद्यकएकटा उपविधा मानैत छी। एकर स्थापनाक अस्वीकृति लेल पूर्व मे एकटा कारणक
चर्च तं कएल, दोसरो कारण अछि; आ से थिक गजल संग्रहक अभाव। प्रायः अलग
सं गजल संग्रह क’ कए कालानन्द भट्टक ‘कान्ह पर लहास हमर’ विभूति आनन्द
क ‘उठा रहल घोघ तिमिर’ सरसक ‘शोणिताएल पैरक निशान’ तारानन्द वियोगीक
‘अपन युद्धक साक्ष्य’, रमेशक ‘नागफेनी’ आ एकटा संपादित गजल संग्रह ‘लोकवेद
आ लालकिला’क अतिरिक्त कोनो गजल संग्रह नहि अछि। ‘अवान्तर’ कविता संग्रह
मे मायानन्दक किछु एहि तरहक रचना सब छनि, जकरा ओ ‘गीतल’ कहैत छथि।
यद्यपि ई गजले थिक। ‘गीतल’ तं मायानन्दे शुरूह कएलनि आ हुनकहि धरि ओ
सीमित रहल। ओहू रचना सभ कें हम गजले मानैत छी। एतद्रिक्त मात्रा पत्रा-पत्रिका
मे प्रकाशित भ’ कए अपन असंगठित प्रभान्वितिक कारणें सम्हरि कए क्षमता देखब’
मे सफल नहि भ’ सकल अछि। ओना एतए एकटा प्रश्न उठाओल जाएत, जं मौलिक
संग्रहक अभाव मे कथा आ उपन्यास कें मान्यता भेटि चुकल छल, तखन एकरा
किएक नहि ?

वस्तुतः कथा, उपन्यास आ कविता साहित्यक मौलिक आवश्यकता छल।
आवश्यकता ईहो थिक, मुदा दारुण भूख सं आक्रांत व्यक्ति कें एकटा मिठाइ खोआ
दी, तं हुनकर भूख मरि जाइत छनि आ पुनः बड़ी काल धरि भरि मनसुबा सं नहि
खा होइत छनि। सैह स्थिति एहू ठाम गजल आ लघुकथाक संग भ’ रहल अछि।
ओना एकर मतलब ई नहि, जे गजलक स्थापना-मूलक बात कें घोंकैत-घोंकैत हमआन विधा सभक अवमानना क’ रहल छी। तखन एतबा अवस्से विशेष महत्त्वक
बात थिक, जे मैथिली साहित्य मे जन-जीवनक संग अंतरंगता, आन विधाक अपेक्षा
गजले मे शीघ्र आ मौलिक रूपें आबि सकल। 1920-35 ई. हिन्दी साहित्य मे
छायावादक काल थिक। अही अंतराल मे रहस्यवाद कें नांघैत हिन्दी कविता 1936-52
ई. क बीच प्रगतिवादक क्षेत्रा मे विचरण केलक। 1936 मे वामपंथी साहित्यकार

पुरान आ नव युगक सेतु / 93

लोकनि द्वारा प्रगतिशील लेखक संघक स्थापना भेल। तारसप्तक प्रकाशित भेल।
मुदा मैथिली मे एहि सभ तरहक चित्राण हौंच-पौंच ढंग सं 1958 धरि होइत रहल।
आ तखन ‘स्वरगंधा’ प्रकाशित भेल। मुदा, गजल मे आधुनिक वातावरणक चित्रा
आनबा मे रचनाकारक अनुभूति कें एतेक सीढ़ी पार नहि करए पड़लैक। एक्कहि
बेर अपन पूर्ण तेवरक संगें आबि गेल। ई गजलक विशेष पहुंच केर बात बूझल
जएबाक चाही।

हमरा लोकनिक वर्तमान समाज मे मूल रूप सं एहेन व्यक्ति कम अछि,
जे आर्थिक दृष्टिएं समृद्ध हो। मुदा, विडंबना ई थिक, जे ई मुट्ठी भरि लोक, विशाल
जन-समुदायक शोषक बनल ठाढ़ अछि। वस्तुतः उत्पादन आ वितरण एही वर्गकहाथ मे अछि। अपार धनराशि सेहो अही वर्गक हाथ मे अछि। आ तें धर्म, संस्कृति,
साहित्य आ कानूनक विधान-निर्माता सेहो इएह लोकनि छथि। अस्तु, ई लोकनि
एहि तरहें पाप आ पुण्यक परिभाषा सुस्थिर कएलनि, जाहि सं हिनकर विपुल धनराशि
पर किनकहु नजरि नहि पड़ए। पूंजीवादक ई विशाल नागराज फेन काढ़ने असंख्य
लोक कें छाहरि देबाक भ्रम द’ रहल अछि। एकटा ब’ड़क गाछ पचास टा आमक
गाछक जगह छेकि कए ठाढ़ अछि। एकरा छाहरि मे आन कोनो लता, वृक्ष नहि
बढ़ि सकत। इएह एहि समयक यथार्थ थिक। आ गजल एही यथार्थक चित्रा थिक।
एकर स्वरूप आ संभावना दुनू उज्ज्वल अछि। गजलकार कें उपर्युक्त किछु
असावधानी सं बचए पड़तनि आ समालोचक कें एहि पर लेखनी उठाब’ पड़तनि।
मुदा सभ सं पैघ विडंबना तं ई थिक जे, जे लोकनि गजलक आंदोलन चलौलनि,
सैह सभ आब गजल सं विमुख भ’ गेलाह अछि। विभूति, वियोगी, रमेश आदि सभक
गजल लेखन एखन ठप्प छनि।

94 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्




पुरान आ नव युगक सेतु


मैथिली साहित्यक इतिहास मे परिमाणात्मक आ गुणात्मक दुनू दृष्टिएं वर्तमानशताब्दीक विशेष महत्व अछि। बीसम शताब्दीक पहिल चतुर्थांशक उत्तर भाग आ
द्वितीय चतुर्थांशक पूर्वभाग मे मैथिली साहित्यक जाहि रचनाकार लोकनिक द्वारा
एहि साहित्यक देहरि नव ढंगें झाड़ल-बहारल गेल, ताहि मे तंत्रानाथ झाक स्थान
अग्रगण्य छनि। यद्यपि काव्य-विषयक आधार पर अपन आन समकालीन कविगण
जकां बहुत आधुनिक नहि छथि; मुदा पुराने विषय पर अपन दृष्टिकोणक कौशलसं ततेक कलात्मक काव्य साधना कएने छथि, जे कृति स्वतः अपन पारंपरिक धारा
सं फराक भ’ जाइछ। यात्राी जकां ई आपादमस्तक जनवादी नहि भ’ गेलाह, किरण
जकां देवता लोकनि कें हुनकर सामथ्र्यहीनताक बोध नहि करौलनि, सुमन जकां
पौराणिक विषय पर आओरो पुरान विचारधारा रखैत रचनाशील नहि रहलाह; रहलाह
अपन साफ आ सोझ मान्यताक संग, अपन नूतनतावादी दृष्टिकोणक संग, अपन
मौलिक चिंतनक संग, पूर्वाग्रहहीन, सर्वत्रा एकरस, एकरंग। विचारक आ दृष्टिकोणक
वैषम्य कतहु हिनकर रचना मे नहि अबैत अछि।

काव्य साधनाक लेल कोनो रचनाकार लग एटा फरीछ दृष्टिकोण हएबाक
चाही। दृष्टिकोणेक अनुसार कोनो घटना विशेषक प्रति व्यक्तिक धारणा बनैत अछि।
वर्तमान शताब्दीक तेसर दशक प्रायः हिनकर रचनाशीलताक स्थापना काल रहल
हेतनि। एहि समय मे भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’ बेस आधुनिक दृष्टि सं साहित्य मे
अवतरित भ’ चुकल छालाह। एहि समय धरि यद्यपि मिथिला अंग्रेजी शासनक अंतर्गत
छल, तथापि सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक परिवेश मे आ व्यक्तिक मानसिकतामे परिवत्र्तन आबि गेल छलैक। रचनाकार लोकनि सेहो अपन पुरान विचारधारा त्यागि
आधुनिक होअ’ लागल छलाह। से, शिल्प आ कथ्य, दुनू दृष्टिएं। अर्जित अनुभूति
कें प्रभावोत्पादकताक संग अभिव्यक्ति देल जाए लागल, भावोद्रेक कें कोनो बान्ह-छान
मे बान्ह’क प्रक्रिया घटए लागल, नव-नव छंद विन्यास सं रचना होअए लागल।

पुरान आ नव युगक सेतु / 95

भुवनजी तकर अग्रदूत भेलाह। 1936 मे भुवनक कविता-संग्रह ‘आषाढ़’ प्रकाशित
भेल, जकर, भूमिका मे कवि परंपरा सं मुक्तिक घोषणा कएलनि आ नव ढंगें काव्य
सृजन मे लागि गेलाह। मैथिली कविता मे भाव आ शिल्प-दुनू स्तर पर ई नव-नव
प्रयोग करए लगलाह। व्यक्तिक अंतःपक्ष हिनका रचना मे स्थान पाब’ लागल।मैथिली कविता, कीत्र्तन-भजन, नख-शिख वर्णन, रति-विलास आ राज-प्रवासक चैकठि
सं बाहर आबि गेल। मुदा, दृष्टिकोणे एहने चीज थिक, जकरा कारणें यात्राी पूर्ण
साहसक संग अपन रचना-प्रक्रियाक एकटा दिशा निर्धारित कएलनि, शब्द-योजना,
विषय-वस्तु आ अभिव्यक्ति शैली तीनू अर्थ मे। सुमन परंपराक खुट्टी मे बान्हल‘उत्तरा’ आ ‘दत्तवती’ लिखैत-लिखैत त’रे-त’र ‘हलधरो’ लिखि लेलनि। संस्कृत मे
मैथिलीक कविता लिखैत रहलाह। मैथिली कें दुरूह-सं-दुरूहतर बनबैत रहलाह।
एहि सभ सुअवसर, कुअवसरक अछैत, तंत्रानाथ झा अपन संतुलित विचारधाराक
संग दृढ़ रहलाह। अपन चयनित बाट मे अग्रसर रहलाह। संपूर्ण साहित्य एकर
प्रमाण थिक, जे ई ‘मुसरी झा’ कथाकाव्य मे जतबे आधुनिक आ ढोंगक प्रति व्यंग्यात्मकछथि, ‘कृष्णचरित’ मे सेहो ओतबे। ‘कीचक वध’ अथवा ‘कृष्णचरित’ मे जतबे
पारंपरिक छथि, अपन आनो कविता मे ततबे। ई नहि कहल जा सकैए, जे हिनका
पर किनकहु प्रभाव नहि छनि; मुदा ई कहब अनुचित नहि हैत, जे ई सभक प्रभाव
सं मुक्त छथि, किंतु अपना दृष्टिकोण सं ताल-मेल बैसओला पर उपयुक्त स्थान
सं प्रेरणा ग्रहण अवश्य करैत छथि। हिनकर अही प्रभावमुक्तता आ प्रेरणाग्राह्यताकफल थिक, हिनकर रचनाक उत्कर्ष। इएह दूटा बात हिनकर कृति कें पारंपरिक
रहितहु आन पारंपरिक रचना सं फराक करैत अछि। हिनकर प्रमुख रचना
थिक ‘कीचक-वध’, ‘कृष्णचरित’, पराशर (महाकाव्य); ‘नमस्या’, ‘मंगल पंचाशिका’
(कविता संग्रह), एकांकी चयनिका (एकांकी संकलन)।

‘कीचकवध’ तंत्रानाथ झाक ओहेन कृति थिकनि, जकर महत्व सभ अर्थें,
सभकाल मे, अनेक कृतिक बराबर रहत। मैथिली साहित्यक इतिहास मे एहि कृतिक
महत्व, विषय लेल कम, उपस्थापन शैली लेल सर्वदा अक्षुण्ण रहत। महाभारतक
षड्यंत्रा आब हमरा लोकनिक लेल इतिहास भ’ गेल अछि। मैथिलीक आधुनिक
कालक रचना सभक प्रारंभिक òोत सभ विधा मे पुराणे, महाभारत रहल अछि।
खास क’ कए महाकाव्यक òोत तं रामायण, महाभारत अछि। संभव अछि, एहि
विवशताक कारण महाकाव्यक शास्त्राीय अनुशासन हो। जे से...। मुदा, तंत्रानाथ झा
महाभारत सं पांडवक अज्ञातवासक एकटा प्रसंग कें उठाकए कीचकक वध केर कथा
ताहि कौशल सं कहने छथि, जे ओ शाश्वत मूल्यक चीज भ’ गेल अछि। एकर
प्रस्तुतिक कलात्मकताक कारणें ई आजुक सामाजिक आ राजनीतिक माहौल लेल
सेहो प्रासंगिक भ’ गेल अछि। अमिताक्षर छंद मे तंत्रानाथ झा, विराट राज मे पांडवक
अज्ञातवास काल मे भेल कीचकवधक कथा कें नौ सर्ग मे प्रस्तुत कएलनि अछि।

96 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


‘कीचक-वध’ महाकाव्य चरित्रा-चित्राण, अभिव्यक्ति कौशल, उपस्थापन चातुर्य आ
घटना संकलनक दृष्टिएं मैथिलीक श्रेष्ठ महाकाव्य साबित होइत अछि। यद्यपि
अलंकार, रस आदिक निरूपण मे कवि पौराणिकताक उपेक्षा नहि कएने छथि, मुदा
छंदक वैविध्य मे अद्भुत वैशिष्ट्य, रस-अलंकार आदिक निरूपण मे कलात्मक उत्कर्ष,
शब्द संयोजन मे समकालीनता आदिक कारणें ई आन महाकाव्यक अपेक्षा बेसी
सफल भ’ पाओल अछि। कवि एहि पुस्तक मे अपन समन्वयात्मक स्वरूप मे संतुलित
ढंगें ठाढ़ छथि आ समन्वयक एहि बिंदुक चयन ई ततेक सावधानी सं कएने छथि,
जतए सं संदेहक कोनो टा गुंजाइश नहि रहि जाइत अछि। एक दिश अपन पात्राक
सौेकुमार्य कें ठोस धरातल प्रदान कएने छथि तं दोसर दिश ओकर मनोविश्लेषणात्मकचित्राण सं कृति कें नवीनता देने छथि। महाकाव्यक लेल शास्त्राीय समस्त स्थापनाक
प्रतिपालन करैत महाकवि, कथाक महाभारतीय मर्यादा कें अक्षुण्ण रखबा मे सेहो
सफल छथि आ प्रस्तुति मे युगानुकूल वातावरणक पुट देबा मे सेहो। अर्थात्, सूक्ष्म
वर्णन कौशलक प्राच्य परंपरा आ शिल्पगत विन्यासक पाश्चात्य परंपरा दुनू केंसंश्लिष्ट क’ कए कृति कें उत्कर्ष प्रदान कएलनि अछि। माइकेल मधुसूदनक
मेघनादवध’क शिल्पक झांकीक कारणहिं प्रायः हिनका मैथिलीक ‘माइकेल’ कहल
जाइत छनि।

‘कीचकवध’ महाकाव्यक प्रमुख वैशिष्ट्य थिक कथावस्तुक चयन मे महाकविककौशल आ कृति मे पात्राक चारित्रिक अंकन। नारी कें आदिकालहि सं सूक्तिवाक्य
मे पूज्या कहल जाइत रहल अछि आ व्यवहार मे ओकरा असूर्यम्पश्याक, भोग्याक
रूप मे देखल जाइत रहल अछि। कवि, एहि पोथी मे सैरन्ध्री कें मध्ययुगीन भारतीय
नारी जकां भोग्या नहि, अपितु पुरुषक जीवन-पथ आलोकित केनिहारि सहचरिणीक
रूप मे चित्रित कएने छथि। ई चित्राण नारीक प्रति हिनकर दृष्टिकोण निर्धारित
करैत अछि। नारीक प्रति हिनकर उदार आ श्रेष्ठ धारणाक साक्ष्य, नारी-चित्राणक
एक-एक पंक्ति मे भेटैत अछि, जतए सैरन्ध्रीक आत्मविश्वास, शौर्य आ साहस कें
चित्रित करैत लिखैत छथि, ‘शार्दूली की कखनहुं पाबए त्रास/जम्बूकक ? की कतहु
ज्वलित अंगार/तृणचय सकए झांपि ? की चम्पकवास/भ्रमर तुच्छ कए सकए कतहु
उपभोग ?’ एहि ठाम नारीक लेल व्यवहृत एक-एकटा बिंब स्पष्ट करैत अछि, जे
नारीक प्रति हिनकर धारणा महान छनि आ पुरुषक लेल तुच्छ बिंबक प्रयोग हिनकर
व्यावहारिक यथार्थ बोध कें द्योतित करैत अछि। एक दिश जं नारीक सौंदर्य, दक्षता,
क्रियाशीलता, एकनिष्ठता, धर्म-परायणता, पातिव्रत्य, स्वाभिमान, साहस आदिक प्रति
कवि जाग्रत छथि; तं दोसर दिश कीचक सन दुष्ट पुरुषक कामुकता, धृष्टता,
विवेकहीनता आदिक प्रति घृणित भाव रखैत छथि, तं सुदेष्णाक दया, सहिष्णुता,
सहानुभूति आदि सद्गुणक संग हुनकर ईष्र्या भावक चर्चा कर’ मे सेहो नहि चूकैत
छथि।

पुरान आ नव युगक सेतु / 97

कनेको टा अवसर भेटलनि, तं प्रकृति कें बड़ा जाग्रत रूपें उठेबाक प्रयास
सेहो कएलनि अछि। से खाहे ‘कीचकवध’ मे राजा विराटक जनपदक चर्चा करैत
काल हो, कोनो पात्राक लेल बिंब उपस्थित करबाकाल हो, मुक्तक काव्य लिखबाकहो अथवा ‘कृष्ण-चरित’ मे विविध दृश्य-परिदृश्य उपस्थित करबाक हो। वर्षा-ऋतुक
प्रति तं कवि बेसी उदार भ’ जाइत छथि। वर्षाक प्रति ई औदार्य, कविक जनसंश्लिष्टताक
परिचायक थिक।

तंत्रानाथ झाक दोसर महत्वपूर्ण कृति थिकनि ‘कृष्ण चरित’ महाकाव्य। साहित्य
अकादमी द्वारा सम्मानित ई कृति, महाकविक अंतिम अवस्थाक प्रतिफल थिक।बारह सर्ग मे विभाजित एहि कृति मे मंगलाचरणक पश्चात् गुरु संदीपनिक आश्रमकपरिवेश, व्यवस्था, अनुशासन, शिष्टता आदि सं ल’ कए गुरुकुल मे कृष्ण-बलरामक
आगमन, अध्ययन आ शिक्षार्जन समाप्तिक पश्चात् गृहगमन धरिक कथा कें अत्यंत
सावधानी सं गुंफित कएने छथि। अपन अनेक मौलिकता आ अनेक वैशिष्ट्यककारणें ‘कृष्णचरित’ महाकाव्य सेहो मैथिली साहित्यक इतिहास मे नव स्वरूप बनाकए रखने अछि। कृष्ण परंपरा मे अनेक रचना मैथिली साहित्यहु मे भेल अछि।मुदा से बाल कृष्ण आ युवा कृष्ण पर बेसी। किशोर कृष्ण पर अपेक्षाकृत कम रचनाभेल अछि, तें कृष्ण चरितक नूतनता आ भिन्नता पाठक कें बेसी प्रभावित करैछ।
खास क’ कए महाकाव्यक कथा-विन्यास आ वर्णन कौशल एकरा आओर बेसी नूतन
आ आधुनिक बना दैत अछि। परंपरा आ आधुनिकताक कौशलपूर्ण समन्वय महाकवि
रंग आ पानि जकां कएने छथि। ताहू मे हिनकर सफलता, हिनकर तीक्ष्ण दृष्टिसंपन्नताक
परिचायक थिक।

कृष्णक आने वयस खंड जकां कैशोर्य सेहो बेस वैविध्य सं पूर्ण अछि। मुदागुरु-कुलक कथा कहबाक क्रम मे आश्रम मे कृष्णक आगमन सं ल’ कए गृहगमन
धरिक कथा अत्यंत छोट सन काया मे कहि देल गेल, अवसर भेटितहि पात्राक चारित्रिकविकास, वर्षा वर्णन, प्रकृति वर्णन, नगर वर्णन... आदि कोनहुं तत्व कें नहि छोड़ल
गेल ई कोनो प्रकांड शिल्पीयहि सं संभव अछि। कोनो प्रसंगक वर्णन उठौलनि आजतए जतबे आवश्यक, ततबे कहि क’ चुप भ’ गेलाह। ‘कृष्ण चरित’ महाकाव्य
मे मौलिक रूपें महाकविक उद्देश्य, कृष्णक शिक्षण-कालक चित्राण रहलनि, मुदा
प्रसंगानुकूल जतेक पात्रा आएल छथि, किनकहु चित्राण मे, कवि कंजूसी नहि कएने
छथि। जे जतबे काल लए कथासूत्रा मे आएल छथि, हुनका अपन संपूर्णता मे देखाओल
गेल अछि। चाहे ओ गुरुपत्नी होथु अथवा देवकी; कुलपति होथु अथवा गुरुपुत्रा कें
ताक’क क्रम मे आएल ब्राह्मण...सभक चारित्रिक विकासक सीमा खूब विस्तार
पओलक अछि। घटनाक विन्यास आ पात्राक औत्सुक्यक चित्राण रसगर, सुदामा आकृष्णक मैत्राीक वर्णन सेहो पूर्ण रूपें चर्चित भेल अछि।

लोक व्यवहार आ लोकजीवन सं कविक संश्लिष्ट संबंधक सर्वाधिक आ

98 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


प्रभावकारी उदाहरण थिक, सातम सर्ग मे खेती-बारी, घर-आंगन, वनिता-ललनाक
विरह, पावनि-तिहार, विधि-व्यवहार, आचार-विचार, व्रत-उपासना आदिक वर्णन मे
सर्वांश रूपें मिथिलाक नारीयहुक आ पुरुषहुक प्रतिनिधित्व। पितर पक्षक चर्चा हो
अथवा सुखरातीक, जितिआ हो अथवा भ्रातृद्वितीया...पूर्ण रूपें फरिछाकए कएने छथि।

मनुष्यक मनोवेगक कोन प्रश्न, जखन जीव-जंतुक मनोवेगक चर्चा प्रारंभ करैत
छथि, तं ओतहु अपन चमत्कारिक स्वभाव सं पृथक नहि रहैत छथि। ‘नमस्या’ मे
संगृहीत कविता शीर्षक ‘वर्षा-घोष’ घोर-वृष्टिक कारण व्याप्त वातावरणक दृश्य-चित्रा
थिक, जतए कोन-कछेर मे उपोउप पानि भरल अछि, मेघ गरजि रहल अछि, ठनका
ठनकि रहल अछि, जनपद अस्त-व्यस्त अछि, मुदा बेंग खुशी सं हर्षनाद क’ रहल
अछि, मनुष्यक पराभवक ओकरा कोनो ज्ञान नहि, कोनो संवेदना नहि। कविताक
एहि लघुकाया मे वर्षा, इन्द्र, बेंग, सांप, गर्जन, तर्जन...आदि-आदि समस्त वस्तु
प्रतीक अर्थ मे आएल अछि।

तंत्रानाथ झाक एकटा सर्वप्रचलित, सर्वप्रशंसित कविता थिक ‘मुसरी झा’।
एहि कविताक स्थान मैथिली साहित्य मे हरिमोहन झाक ‘कन्यादान’ जकां अछि।
जकरा गामघरक हरबाह-चरबाह धरि मोन रखने अछि। ई मोन रहबाक कारण मात्रा
एहि कविताक सहजता आ पदलालित्य नहि, एकर विषय सेहो थिक। आधुनिक
काल मे आबि कए रूढ़िक, अंधविश्वासक, धर्म आ पाखंडक जे स्वरूप पसरल छल,
जे कि थोड़-बहुत एखनो अछि, से नव दृष्टिकोणक लोक कें नहि रुचलैक। आ
तें पाखंडक पर्दाफाश करैत ई कविता लोक कें बेसी चहटगर लगलैक।

अपन रचना मे उपहासात्मक दृश्य आन’ लेल महाकवि अन्योक्ति रीतिक
प्रयोग करैत छथि। ई अन्योक्ति रीति हिनकर ‘वर्षा घोष’, ‘मुसरी झा’, ‘प्रयाणालाप’
सन-सन किछु प्रमुख कविता मे आएल अछि। यद्यपि हिनकर गद्य रचना परिमाणात्मक
रूपें बड्ड कम अछि, मुदा ‘एकांकी चयनिका’ हिनकर पांच गोट एकांकीक संग्रहथिक। ई एक्केटा कृति अपन गुणात्मकताक कारणें आन अनेक कृतिक बराबर
अछि। हिनकर एहि समस्त एकांकीक मूल मे सामाजिक विडंबना अपन सूक्ष्म रूपें
बैसल अछि। जकरा एकांकीकार दू दिशा देने छथि। पहिल दिशा थिक हास्य-व्यंग्य;
जतए व्यक्ति वास्तविकता सं आंखि मूनि कए फैंटेसी मे जीबए चाहैत छथि आ
एहि फैंटेसीक क्रम मे अपन मूल बाट बिसरि जाइत छथि। सफलताक लेल सर्वप्रथम
चाही उद्देश्यकामना आ तदुपरांत तदुद्योग। मुदा एकटा एहेन युवक, जे मात्रा फल
प्राप्तिक सपना बुनैत रहैत छथि आ फैंटेसी मे जीबैत रहैत छथि, तिनकर मनोदशा
कें अतीव सावधानी सं लेखक अपन प्रशंसित एकांकी ‘कओलेजक प्रवेश’ मे गुंफित
कयने छथि। व्यंग्यपूर्ण उपहासात्मक शैली, सहज शब्दावली, काॅलेज परिसर मे
नवागंतुक छात्राक कल्पनालोकक निर्माण आदि-आदि बिंदुक प्रस्तुति मनमोहक ढंगंे
आएल अछि। ‘उपनयनक भोज’ एकांकी मे गामक भोजनभट्टक लोलुपता, तदर्थ

मधुप आ द्वादशी / 99

षड्यंत्रा, ग्रामीण जनताक अंधविश्वास आदि-आदि कें अत्यंत सहज ढंगें चित्रित
कएलनि अछि, मुदा, लेखकक उपहासात्मक रुखि नुकाएल नहि रहि पबैत अछि,
ओहो ओतबे सहजताक संग उभरैत अछि। एकांकीक रचना मे लेखक सामाजिक
विडंबना कें एकटा दोसरो दिशा देलनि अछि, आ से थिक ‘आत्मसंघर्ष’। हिनकर
एकांकी संग्रह मैथिली साहित्यक पहिल एकांकी संकलनक थिक।

मुक्तक सं प्रबंध काव्य धरि, कथाकाव्य सं एकांकी धरि...जे किछु रचना
हिनकर छनि, ताहि मे ई, सर्वांश मे ने तं परंपराक विरोधी छथि आ ने पोषक,
आधुनिकताक देखौंस मे बताह नहि छथि। मुदा एहि सं धकज’रो नहि उठैत छनि,
तें पाखंडक चित्राण मे हाथ नहि क्ं$पैत छनि। वस्तुतः जे छथि, से संतुलित विचारकसंग। ने जनवादक मशाल ल’ कए अपने घर डाहि लैत छथि, आ ने मुहूत्र्त देखि
कए नित्य क्रिया मे जाइत छथि। तंत्रानाथ झा, युगीन समस्त तंत्रा-कुतंत्राक सद्-असद्
पक्षक नैयायिक
छथि...।

100 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्




मधुप आ द्वादशी


मैथिली साहित्य मे मुक्तक-काव्य लिखबाक परंपरा विद्यापतिए सं तथा प्रबंध-काव्य
लिखबाक परंपरा मनबोधहि सं प्रारंभ भेल अछि। काशीकान्त मिश्र ‘मधुप’ एहि विधा
मे एकटा नव प्रयोग कएलनि। ई प्रयोग थिक, कविताक माध्यमे कथा कहबाक
परंपरा बनाएब। अगहन 1940 ई. मे लिखल कविता ‘नवान्न’ हिनकर एहि
परंपराक प्रायः पहिल कविता हैत। एही तरहक बारह गोट कविताक संग्रह ‘द्वादशी’
प्रकाशित अछि। एहि मे 1940 सं 1950 धरिक कविता संगृहीत अछि।

ई कालावधि मिथिलांचलक सामाजिक परिवेश कें अद्भुत ढंगें प्रभावित कएने
छल। विदेशी शासन सं त्रास्त जनमानसक हृदय मे विद्रोही भावनाक उदय सं ल’ कए
स्वतंत्राताक प्राप्ति अही कालावधि मे भेल। मधुप जनवजीवनक एहि प्रतारणा कें
लगीच सं देखलनि। अर्थाभावक जांत मे पिसाइत जनसमूहक अस्मिता, ओकर
भावनाक एक-एक चीत्कार कें सुनलनि। सामंती प्रथा सं प्रतारित निम्नवर्गीय
लोकक दुर्दशा देखलनि। ई तकरा अपन कविताक कथ्य बनौलनि। एहि समस्तकविता मे कविक विचारोत्तेजना, हिनकर चिंतन-शैली, हिनकर यथास्थितिक अंकन सभ
पर विचार करबा सं पूर्व कनेक ओहि अवधिक सामाजिक, साहित्यिक परिवेश पर
चिंतन क’ लेब अपेक्षित बुझाइत अछि।

कोनो रचनाकारक रचनाधर्मिता युगीन वातावरण आ सामाजिक परिस्थितिक
वाहक होइत अछि। मधुप सेहो ओही परिवेशक अवलोकन कएलनि, जाहि परिवेशक
अवलोकन ओहि समय किरण, सुमन, यात्राी, भुवन प्रभृति लोकनि कएलनि। 1949
अबैत-अबैत यात्राीक ‘चित्रा’क प्रकाशन भेल। निश्चित रूप सं एहि मे संगृहीत
कविता 1947 सं पूर्वक लिखल थिक, जे मधुपक ‘द्वादशी’ संग्रहक कविता सभक
समकालीन थिक। 1936 सं भुवनक सोलह गोट कविताक संकलन ‘आषाढ़’ सेहो
प्रकाशित भ’ चुकल छल। 1943-1944 ई. मे ‘मिथिला मिहिर’ मे भुवनक किछु
कविता ‘काल-प्रवाह’, ‘अन्तर्नाद’, ‘युगवाणी’ इत्यादि प्रकाशित भेल। जाहि मे कवि

मधुप आ द्वादशी / 101

समाज मे व्याप्त आर्थिक विषमताक प्रति अपन प्रबल आक्रोश कें व्यक्त कएलनि
अछि, ‘मुख मे ज्वालामय प्रगति गान’ सं ‘समताक शंख’ फुकबाक आह्नान कएलनि
अछि। 1938 ई. मे हिन्दी साहित्य मे रोमांटिक युगक अंत सेहो कहल जाइत अछि।
पंत केर युगवाणी (1937) तथा ग्राम्या (1940) मे वस्तुवादी चित्राण खूब भेल, जखन
कि कविता बहुत उच्च श्रेणीक नहि अछि। निरालाक ‘भिक्षुक’ (1921) तथा ‘तोड़ती
पत्थर’ (1935) वस्तुवादी चित्राणक संग-संग श्रेष्ठताक सेहो बोध करबैत प्रकाशित
भ’ चुकल छल। 1943 ई. मे अज्ञेयक संपादकत्व मे ‘तार सप्तक’क प्रकाशन भ’
चुकल छल तथा 1951 मे प्रकाशित होअ’ वला ‘दूसरा सप्तक’ मे संग्रहणीय
कविताक रचना भ’ रहल छल। बंगला साहित्य मे प्रसिद्ध त्रौमासिक पत्रिकासुधीन्द्रनाथ दत्तक ‘परिचय’ (1931) यूरोपीय साहित्य (अंग्रेजी आ फ्रेंच) सं बंगलाक
पाठक कें परिचय करएबाक क्रम मे नव कविताक स्थापना भ’ चुकल छल। 1933
ई. मे इंगलैंड मे ‘नव कविताक दल’ कहि कए एकटा नव दल गठित भ’ चुकल
छल। एतेटा पैघ परिवेश मे मधुपक मानसिकता स्वच्छंद विचरण करैत छलनि आ
अही वातावरणक चित्राण, कवि अपन एहि संग्रह मे कएलनि।

एहि समयक कविताक मूल प्रवृत्ति रहल यर्थाथक चित्राण। यथार्थ कें दू रूपें
एहि समय मे चित्रित कएल गेल अछि। पहिल रूप थिक जे निम्नवर्गीय लोक कें,
शोषित समुदाय कें अपन दुर्दशाक, अपन शोषणक अभिज्ञान होइत छनि आ ताहि
पर ओ व्यथित भ’ कए अपन दुर्दशाक गान करैत अछि तथा दोसर रूप थिक जे
एहि शोषित समुदाय कें अपन दुर्दशा देखि कए अस्तित्वबोध होइत छनि, स्नायु मे
शक्तिक आभास होइत छनि, जाहि सं हुनका शोषकक ढहैत अस्तित्व, जर्जर बुझाए
लगैत छनि आ ओ क्रांतिक आह्नान करैत छथि, अपन सामथ्र्यक दोहाइ दैत छथि।सूक्ष्मता सं अवलोकन कएला उत्तर मधुप आ भुवन, किरण, यात्राीक रचना मे अंतर
भेटैछ। जखन यात्राी कहैत छथि, ‘फूसि ब्रह्मा-विष्णु दश दिक्पाल/फूसि श्रुति-स्मृति/
...सत्य थिक मानव समाजक क्रमिक उन्नति/क्रमिक वृद्धि-विकास/सत्य थिक
संघर्षरत जनताक ई इतिहास...’ तखन भुवन कहैत छथि, ‘गौरवक गर्व-गढ़ ढाहि
देब/नहि क्षमा करब, प्रतिशोध लेब...की कए सकैत अछि लघु निर्बल/देखत लोचन
भरि स्वार्थी, खल/ठेहुन टेकत तेजो हिटलर/..., समताक शंख हम फूकि देब...’ आ
जखन ‘माटिक महादेव’ कविता मे किरण कहैत छथि, ‘बलवान मानवक हाथक बल
सं/बैसल छह तों सराइ पर...’ तखन मधुप कहैत छथि, ‘सविषाद हास मे चन्द्रमाक/ओ
घसल अठन्नी बाजि उठल/हम कतए जाउ/अवलंब पाउ/के शरण, घसल जनिकर
अदृष्टि...’ एहि संपूर्ण कविता मे उद्वेलित होइत कविक माक्र्सवादी चेतना एतए
परास्त भ’ जाइत अछि आ ओ भाग्य (अदृष्टि) क हथउठाइ पर आश्रित भ’ जाइत
अछि। द्वादशी संग्रहक प्रायः सभ कविता मे करुणेक चित्राण अछि। कविताक
समाप्ति सेहो नोरहि सं होइत अछि। एहि संग्रहक बारहो कविता मे निम्नवर्गीय

102 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


चरित्राक संग कविक संवेदना ई साबित करैत अछि जे कवि कें समाज मे पसरल
कुरीति, अर्थ-संकट, अभाव, समस्या आदि विशेष रूपें प्रभावित कएने छनि।
जनसाधारणक दुर्दशाक हेतु हिनका मोन मे सहानुभूति छनि। मुदा किरण, यात्राीक
रचना मे जेना शोषणक परंपराक प्रति व्रिदोह छनि, रचनाक पंक्ति-पंक्ति मे क्रांतिक
आगि उठैत छनि, भावक बसात पर विद्रोहक झंडा फहराइत छनि तेना मधुपक रचना
मे नहि। मधुप शोषित वर्गक लेल केवल कानइ छथि, अनुनय विनय करै छथि,
ओकालति करै छथि। हिनकर सर्जना, हिनक विचार द्रोहात्मक नहि भ’ कए हकन्न
कनैत परिस्थिति कें यथावत स्वीकारि लैत छनि। हिनकर पात्रा शोषणक प्रतिरोध मे
झंडा उठौने संघर्षरत नहि भ’ कए समस्याक आगां गरदनि झुका लैत छनि,
आत्म-समर्पण क’ दैत छनि। चाहे ओ ‘नवान्न’ क नीरस झा होथि अथवा ‘होरी’क
मदनबाबू, ‘दौनिबाह’क सुकना हो अथवा ‘सेवाक फल’क जितना गोंढ़ि...सब
समयक दास थिकनि। समय सं संघर्ष करब किनकहु नियति नहि भ’ पबैत छनि।
सब, समस्याक आगू अपन प्राणांत क’ दैत छनि। नीरस झा सन प्रबुद्ध, शिक्षित पात्रा
सं ल’ कए बुचनी आ सुकना सन निरक्षर व्यक्ति सभक संघर्षशील चेतना मेटाएल
छनि। अर्थात् कवि यथार्थक पहिल पक्ष मात्रा कें अपना रचना मे साकार क’
सकलाह। यथार्थक इएह चित्राण रचना कें विद्रोहात्मक नहि बना कए आक्रोशात्मक
बना दैत अछि। आक्रोश आ विद्रोह मे सूक्ष्म अंतर अछि। उदय दुनूक होइत अछि
असंतोषहि सं, मुदा एहि असंतोष कें देखि जकर पौरुष जागि उठैत अछि, कोनो पुरान
स्थापित मान्यता अथवा विश्वास सं मोह भंग भेला पर जकरा आत्मबोध होइत छैक,
जकर भुजबल प्रतिशोधक हेतु फड़कि उठैत अछि, ओ विद्रोही कहबैत अछि आ जे
अपन क्रोध कें ओकालतिक जामा पहिराबैत अछि, विलाप-प्रलापक परदा दैत अछि,
विद्रोहक झंडा नहि उठा पबैत अछि ओ आक्रोशी होइत अछि। विद्रोह नहि करब
महाकवि मधुपक पात्रा कें कारुणिक बना दैत अछि, दयनीय बना दैत अछि,
सहानुभूति पएबा योग्य बना दैत अछि। कविक लेखनी सं चित्रित पात्राक दशा पर
पाठक ‘आहा’ कहबा लेल बाध्य भ’ जाइत छथि।

ई तं भेल महाकविक एहि कविता संग्रहक ओ पक्ष जकरा कारण कविक
माकर््सवादी विचारधारा कमजोर पड़ैत अछि, मुदा एकरा कारणें ई नहि सोचबाक थिक,
जे कथाकाव्यक ई संग्रह निंदनीय अछि। संग्रह कैक दृष्टिएं प्रशंसनीय अछि।

कोनहु रचनाक आलोचना मे ओकर आपादमस्तक आॅपरेशन होइत अछि।
ओहि आॅपरेशन मे शोणितो बहराइत अछि आ पीजो बहराइत अछि। समुद्र मंथन मे
अमृतो बहाराइत अछि आ विषो बहराइत अछि। सफलतम माक्र्सवादी विचारधाराक
इएह अभाव एहि रचना-मंथनक अमृत नहि भ’ सकल, मुदा तें चन्द्रमा, ऐरावत,
लक्ष्मी, इत्यादिक अभाव नहि अछि। मैथिली साहित्यक सेवा मे ई अपन अनेक पोथी
सं मैथिलीक भंडार भरैत रहलाह अछि। जाहि मे सं प्रमुख थिक अपूर्व रसगुल्ला,

मधुप आ द्वादशी / 103

टटका जिलेबी, शतदल, त्रिवेणी, ताण्डव, त्रिकुशा, कोबर गीत, राधा विरह (महाकाव्य),
झंकार, विद्यापति (महाकाव्य) इत्यादि। एक दिश जं शृंगार रस सं ओत-प्रोत हिनक
रचना पाठक कें सराबोर क’ दैत अछि तं दोसर दिश करुण रस सं परिपूर्ण रचना
सभ सेहो हृदय मे साधारणीकरण क’ कए ओकरा रचनाक पात्राक संग एकात्मकता
स्थापित करबा मे पूर्ण सहयोग दैत अछि। गीत-रचना मे चमत्कार पूर्ण अलंकारिकभाषा-शैलीक प्रयोग करब, हिनकर प्रवृत्ति जकां बुझाइत अछि। अनुप्रास ओ यमक
अलंकारक बाहुल्य, पांडित्यपूर्ण शब्द-विन्यासक छटा इत्यादि उपस्थित करबा दिशहिनक विशेष ध्यान रहलनि अछि। अपेक्षाकृत अपन आन रचनाक तुलना मे द्वादशी
मे बेसी सरल होएबाक चेष्टा कवि कएने छथि, मुदा एकदम सहज भ’ गेल छथि
से नहि। तखन छंदबद्ध रचनाक अपेक्षें ई बेसी स्पष्ट अछि। स्पष्टताक सभ सं पैघ
कारण अछि रचना मे कथातत्वक सहज प्रवाह। कथातत्व कें कवि एतेक मार्मिक
आ नाटकीयताक संग उपस्थित कएलनि अछि, जे पढ़बा काल परिस्थिति जन्य कोनो
व्यवधान उपस्थित भेलहुं पर एकाग्रता भंग होयबाक संभावना नहि रहैछ। ओना एहि
बारहो कविता मे सं अधिकांश कविता पांडित्यपूर्ण शब्द-विन्यास आ अलंकार
बाहुल्यक कारण दुरूह जकां साबित होम’ लगैत अछि, मुदा तुरंतहि कथातत्व मे
करुण रसक हिलोर मारैत धारा, विवशताक सजीव चित्राण, दैन्य-कुंठा-आत्मवेदना आ
संत्रासक अविकल उपस्थापन पाठक कें घीचि कय बाट पर ल’ अबैत अछि। ‘घसल
अठन्नी’ कविता मे करुणाक चित्रा कवि जतेक मार्मिक ढंगें उपस्थित कएने छथि,
से स्पृहणीय अछि। मधुपजीक रचनाक सब सं बलगर पक्ष थिक हिनकर वर्णन शैली।
अपन वर्णन शैलीक कारण ई कोनहु रचना मे ततेक ने नाटकीयता ल’ अबैत छथि,
जे पाठकक समक्ष ओ घटना-चित्रा स्पष्ट रूपें उपस्थित भ’ जाइत अछि आ पाठक
कें रसबोध मे कोनहु टा कमी नहि रहि जाइत छनि। कविता शीर्षक ‘नवान्न’ मे
नीरस झाक चित्रा उपस्थित करैत ओकर अल्प वेतनक बखरा कें देखबैत छथि। घर
घुरला पर ओकर मनोदशा कें चित्रित करैत छथि, ‘बच्चाक माइ कें की कहिअनु/ओ
हमर दुःख कें की बुझती ?/चैबीस टका अइ छमाहीक/आधा किरानियें कें देलिऐ/आधा
सं डिप्टी साहेब केर कैलहुं पूजा...’

संकलनक बारहो कथाकाव्य ‘नवान्न’, ‘दौनिवाह’, ‘पापक परिणाम’, ‘होरी’,
‘कोनो घर कानब कोनो घर गीत’, ‘मधुर-मिलन’, ‘घसल अठन्नी’, ‘तृप्त-पिपासा’,
‘सेवाक फल’, ‘लाइ पर बज्र’, ‘कोजागराक मखान’ तथा ‘पुरस्कार’ इत्यादि करुणा
सं परिपूर्ण अछि। अंत प्रायः सब कविताक करुणहि सं भेल अछि, ‘तृप्त-पिपासा’क
अलावे। ‘तृप्त-पिपासा’क कावेरी एखन मिथिलांचलक घर-घर मे अछि। कावेरीक
हृदय मे उठैत अंतर्नाद मिथिलांचलक समस्त कुमारि बेटीक अंतर्नाद थिकै। कावेरीक
पिता जगन्नाथ बाबू आ शशिकान्तक पिता श्यामनन्दन बाबूक सेहो कोनो कमी नहि
अछि, कमी अछि मात्रा शशिकांत सन विद्रोही युवकक, जिनका हृदय मे एहेन बात

104 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


उठैत छनि, ‘सन्तति विक्रयी पिताक बात/मानबो मानवोचित नहिएं/पशु जकां
मनुष्यक हो विक्रय/ओ जरौ राष्ट्र पात्राक कारी...।’ आ अंत सेहो, एहि कविताक
मिलने सं होइत अछि। संग्रहक सब सं सुकोमल कविता इएह अछि।

एहेन प्रायः पाओल गेल जे कवि प्रकृति चित्राणक बेसी आग्रही छथि, संग्रहकअधिकांश कविता मे तं प्रकृतिक सजीव चित्रा अछिए, आनो-आन ठाम प्रकृति-चित्राघिचबा मे कवि आगू रहै छथि। द्वादशीक प्रायः सभ कविता मे ई प्रकृति कें कोनो
ने कोनो रूप मे अवश्य उपस्थित कएलनि अछि। ‘सेवाक फल’, ‘घसल अठन्नी’,
‘दौनिवाह’, ‘कोनो घर कानब कोनो घर गीत’, ‘कोजागराक मखान’ इत्यादि कविता
मे समाजक दुष्चरित्राताक नांगट चित्रा उपस्थित कएल गेल अछि। शोषकीय प्रवृत्ति,
अस्पृश्यताक भावना, निम्नवर्गीय लोकक प्रति क्रूरता इत्यादिक चित्रा स्पष्ट भेल
अछि। समस्त कविता अभाव, दैन्य, दुष्चरित्राता, शोषण, अनीति इत्यादिक ‘शो-पीस’
थिक।
नवतुरिए आबओ आगां / 105

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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...