Saturday, September 12, 2009

पेटार ३६

1. उमेश मंडल 2. रमानन्द झा रमण
अप्पन बात एहि बेरक बात थिक। विविधश्भारती रेडियो स्टेषन सँ गीत सुनैत छलौ। एखन धरि मैथिली साहित्य सॅ कम्मेश्सम्म सिनेह छल। ओना परिवार सॅ समाज धरि मैथिलिऐक बीच आठो पहर समय बीतैत अछि। कातिक पूर्णिमाक दिन रहने, समाजक माएश्बहिन लोकनि सामा भसा आंगन दिषि सोहर गबैत घुमलीह। एकाएक हमरो कान मे, गीतक ध्वनि हवा मे छिछलैत अबै लगल। रेडियो बन्न कऽ सोहर सुनै लगलहुँ। गीतक स्वर हृदय केॅ झकझोड़ए लगल। जेहने माएश्बहीनि लोकनिक स्वरक मधुर टाँस तेहने एकरुपता। जहिना बहीनि, माएश्बाप समाजक सखीश्सहेली छोड़ि, सासुर जेबा काल, अपन क्रन्दन स वातावरण केॅ शोकाकुल बनबैत आ सखीश्सहेली सोहरक स्वर सॅ विदा करैत, तहिना भऽ गेल। हृदय विदीर्ण हुअए लगल। अनायास मन मे सवाल उठै लगलश् (क) श् की हमर कलाश्साहित्य, भूमण्डलीकरण स, आगू बढ़त? (ख) श् आ
उमेश मंडल


कि जतय अछि ततय, अजेगर साॅप जेॅका थुसकुरिया मारि, बैसल रहत? (ग) श् आ कि हमर कलाश्साहित्य मटियामेट भऽ जायत? एहि प्रष्नक बीच उलझल मोन मे, डिबियाक टिमटिमाइत इजोत जेकाॅ, आयल जे अपनो मातृभाषा आ मातृभूमिक सेवा लेल किछु कयल जाय! एहि जिज्ञासाक संग अपने लोकनिक बीच, एकटा छोटश्छीन पोथी ‘संस्कार गीत’ राखि रहल छी। आषा अछि जे अधला पर ध्यान नहि दऽ, आगूक सेवा लेल पे्ररित आ प्रोत्साहित जरूर करब। गीतक संकलन किछु पोथिओक अछि आ अधिकतर माएश्बहीनिक कंठक सेहो अछि। जहि गीतिकार लोकनिक गीत संकलित अछि, हुनक आभारी छी। आ जे गीत माएश्बहीनि लोकनिक कंठक अछि, ओ जहिना कहलनि तहिना लिखलो गेल अछि तेॅ शब्दक फेड़िश्फाड़ आ टूटल सेहो अछि। गीतक संकलन करै मे अग्रज सुरेष मंडल आ अनुज मिथिलेष मंडलक भरपूर सहयोग रहल। अपनेक उमेष मंडल पोथिक मादे संस्कार कल्पना थिक। हमरा सभक बीच संस्कारक प्रयोग विभिन्न रूप मे विभिन्न जगह पर होइत अछि। ओना जहि रूप मे संस्कारक प्रयोग हमरा सभक बीच होइत, ओ मन्द आ कुषाग्र रूप मे सेहो होइत। मुदा विचारणीय प्रष्न अछि जे मन्द तँ किऐक? आ कुषाग्र तॅ किऐक? एखन हम एहि प्रष्नक उत्तर नहि द शास्त्रीय प्रयोग दिषि नजरि दैत छी। गर्भजनित वातावरण जन्य कतिपय अपदार्थ के दूर करैक हेतु संस्कारक कल्पना कयल गेल अछि। कहल गेल अछि जे एहि सॅ शरीर आ मन परिष्कृत होइत अछि। शालीनता आ शिष्टता मनुष्यताक परम सिद्वि थिक आ ओकर प्राप्तिक साधन थिक संस्कार कर्म। दषर्न शास्त्रक अनुसार भोग्य पदार्थक अनुभूतिक छाप थिक संस्कार कर्म। मनुष्यक अव्यक्त मन पर अुभवक जे छाप पड़ैत छैक, समय अयला पर ओ प्रकट भऽ जायत छैक। यैह छाप थिक वासना आ यैह कहबैत अछि जन्मान्तक संस्कार। धर्मशास्त्री लोकनि संस्कार केॅ शारीरिक, मानसिक आ बौद्धिक गुणश्दोषक प्रक्रियाक रुप ग्रहण कयलनि अछि। आष्वलायन अपन गृहसूत्र मे एगारह तरहक संस्कारक वर्णन केने छथि। जखन याज्ञवल्क्य बारह तरहक। गौतम भिन्नश्भिन्न दैवयज्ञ केॅ संस्कार मे परिगणित कऽ अड़तालिस संख्या धरि लऽ गेल छथि। भारत सरकारक 1901 इसवीक जनगणना प्रतिवेदनक अनुसार ओहि समय हिन्दू मे बारह संस्कार प्रचलित छल। मिथिला मे सोलह तरहक संस्कारक विधान मान्य अछि ई थिकश् गर्भधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राषन, चूड़ाकर्म, कर्णबेध, उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन, विवाह, वानप्रस्थ, सन्यास आ अन्त्येष्टि। एखन सिर्फ पाँच तरहकश् जन्म,मूड़न,उपनयन,विवाह आ मृत्यु संस्कारक चलनि अछि। मुदा इहो सभ जाति मे समान नहि अछि। जेना उपनयन सिर्फ समाजक अगुआइल जातिक बीच अछि। मूड़नोक रुपरेखा एकरंगक नहि अछि। तेँ जँ सभकेँ नजरि मे राखि देखैत तँ सिर्फ तीनिये टा संस्कार जन्म,विवाह आ मृत्यु अछि। संस्कारक कल्पना आ ओकर चयन वा नामकरणक पाँछा सामाजिक कारण सोहो प्रमुख रहल। स्पष्ट अछि जे संस्कारक शासन जीवन पद्धति के खास ढ़ंग सॅ नियंत्रित आ आदर्षोन्मुखी बनयवाक लेल देल गेल। शुद्धताक अपेक्षा सुनियोजित जीवनश्व्यवस्थाक आवष्यकता अथवा स्थितिक उपस्थिति दिषि संकेत करैत अछि। कहैक तात्पर्य जे आर्यश्अनार्यक घालमेल सँ उपजल सामाजिक स्थिति मे संस्कारक माध्यम सॅ अपन अस्मिता के सुरक्षित रखवाक ब्राहम्णवादी चिन्तनक परिणाम थिक संस्कार। मध्यकाल मे संस्कारक पालन पर बेसी जोर देल गेल। ओना दोषक निवारण आ गुणक अंगिकार करब अधलाह बात नहि थिक। इतिहास साक्षी अछि जे भौतिक परिस्थितिक प्रभवक कारणे समाज मे कखनो बेटिक त कखनो बेटाक मोल बढ़ैत रहलैक अछि। आइ जकरा मैथिल संस्कृति कहल जा रहल अछि,से की वस्तुतः मिथिलाक संस्कृति थिक? एहि लेल मिथिलाक इतिहास दिषि देखए पड़त। मिथिलाक धरती हिमालयक माटिश्बालू सँ बनल अछि। नदी प्रदेषक एहि भूभाग पर किरात आ कोल रहैत छल। आर्यीकरणक अभियान मे जे किछु बहरबैया लोक सभ एहिठाम अयलाह ओ द्विज बनि के एहि प्रदेष पर सत्ता स्थापित केलनि। क्षत्रिय राजसत्ता कब्जा केलनि आ ब्राह्मणक हाथ मे समाज सत्ता आयल। वैष्वलोकनि अर्थसत्ताक स्वामी बनलाह। मूलवासी अर्थात आदिवासी अन्त्यज बनि गेलाह। बहरबैया लोक कम संख्या मे आयल रहथि तेँ कृषि कर्यक लेल वा आनो प्रयोजन सँ प्रतिलोम विवाह जोर पकरलक। जकर चर्चा मनुस्मृति आ मिथिलाक इतिहास मे बिस्तार सँ अछि। द्विजक संख्या कम रहने, एहि ठामक आदिवासीक देवीश्देवता,पावनिश्तिहार आ नेमश्तेम अपनौलनि। जहि स ब्राह्मणीकरण भऽ गेल। समाजक सत्ता ब्राह्मणक हाथ मे छलनि तेँ हुनके जीवनश्षैली संस्कृति बनल। बहुसंख्यक मूलवासी पर एकटा नवश्संस्कृति आरोपित कयल गेल। औझुका जेँका प्रचारश्प्रसारक माध्यम त नहि छल, मुदा जे किछु छल ओ हुनके सभक बीच छलनि। लिखैकश्पढ़ैक सुविधा आ सामथ्र्य रहने हुनके (द्विजिक) संस्कृति सम्पूर्ण मिथिलाक संस्कृति रसेश्रसे बनि गेल। मुदा मूलवासीक जीवनश्शैली आ रीतिश्नीतिक पूर्ण विलयन ने त संभव छल आ ने से भेल। आइयो ओ (मूलवासी) दूबि बनि माटि पकड़ने छथि। जकर संस्कृति लोक संस्कृत कहल जाइत छैक। मूड़न आ उपनयन, आब सेहो काम्य संस्कारक कोटि मे अबैत जा रहल अछि। अखनो मिथिला मे ढ़ेरो जाति बसल अछि। किछु जाति छोड़ि बहुसंख्यक जातिक बीच उपनयन प्रथा नहि अछि तेॅ उपनयन के मिथिलाक संस्कार कोना मानल जाय? हाँ, खंडित संस्कार कहल जा सकैत अछि। तहिना मूड़नोक अछि। एक रुप मे मूड़नोक चलनि नहि अछि। केयो देवस्थान जा मूड़न करबैत त क्यो गंगाकात जा। केयो गामे मे कबुलाश्पाती द करबैत त केयो बिना गीतेश्नाद,पूजेश्पाठ केने, करैत। केयो समाज मे खीरश्टिकड़ी बाॅटि करैत त क्यो भोजश्भात कऽ। तेॅ सब मिला के देखला पर प्रष्न उठैत जे मुड़नक कोन रुप मानल जाय? तहिना विवाहोक संबंध मे प्रष्न उठैत? कुमार बर आ कुमारि कन्याक संग विवाह प्रचलित अछि। मुदा द्वितीय बर आ कुमारि कन्याक संग विवाह होइत जखन कि बहुसंख्यक जाति मे द्वितिय बरश्कन्याक विवाह सेहो होइत। द्वितिय कन्याक संग कुमार बर के सेहो होइत अछि तहिना मृत्यु संस्कार मे सेहो एकरुपता नहि अछि। मृत्यु के शोक बुझि गीतिश्नाद नहि होइत। मुदा प्रष्न उठैत जे मृत्यु शोकेक संस्कार किऐक थिक? हाॅ, असामयिक मृत्यु के शोकक श्रेणी मे राखल जा सकैत। मुदा उचित आयु बीतला परक मृत्यु के शोक किऐक मानल जाय? जहिना प्रकृति मे देखैत छी जे अपन पूर्ण आयु पाबि स्वतः नष्ट भऽ जाइत अछि तहिना त मनुष्यो थिक। मुदा ढ़ोरो प्रष्न उठलाक उपरान्तो समाज, विवाह आ मृत्यु के व्यवहारिक संस्कार रुप मे अपनौने अछि। छिटश्फुट ढ़ग सँ जे किछु होइत हो मुदा समुद्र रुपी समाज, सब कुछ अपना पेट मे समेटि लैत अछि। व्यक्तिगत जीवनक समस्या सँ ऊपर उठि कऽ सार्वजनिक जीवन जीवाक एहि अभ्यास कालक महत्व आइयो अछि। सन्यास यैह थिक। ब्रह्मचर्य जीवन ज्ञान अर्जनक होइत। गृहस्ताश्रम व्यवहारिक जीनगी होइत, जे उपार्जन क जीवनश्जीवाक माध्यम होइत। नव परिवारक सृजन होइत। जहि सॅ समाज आगूओ बढ़ैत आ समृद्धो होइत। तेसर अवस्था वा अंतिम संन्यास अवस्था तक पहुँचैतश्पहुँचैत ज्ञान आ कर्म सँ पूर्ण मनुष्य केँ अज्ञान आ अबोध मनुष्यक सेवा मे लगि जायब, बेजाय नहि। वास्तव मे ओ जरुरियो अछि। संस्कार गीतक अर्थ थिक विभिन्न संस्कारक प्रसंग मे गाओल जायवला गीत। ई लोक प्रचलित गीत थिक। तेँ एहि मे लोक गीतक आत्मा बसैत अछि। लोक गीतक मनोहर फुलवाड़ी मे यदि संस्कार गीत के हटा देल जाय तँ ओ निष्प्राण भऽ जायत। यैह कारण थिक लोकगीतक, प्रायः समस्त विषेषता संस्कार गीत मे उपलब्ध अछि। मृत्यु संस्कार केँ छोड़ि अन्य सभ संस्कार आनन्दोत्सवक माहौल मे मनाओल मे जाइत अछि। उमंगमय वातावरण मे नारी कंठ सँ निकलैत स्वरलहरी देह मे थिरकन, हृइय मे झंकार आ मस्तिष्क मे चुलबुली उत्पन्न कऽ दैत अछि। गीति गायव मिथिलाक सभ नारश्नारीक सहजात गुण रहल अछि। जेना दखैत छी जे मूड़न, उपनयन, विवाह इत्यादिक समय सभ नारी समवेत स्वर मे गीति गबैत छथि। जे मिथिलाक धरोहर छी। तहिना पुरुषो पावनि आ धार्मिक कार्य मे सभ मिलि गबैत छथि। संस्कार गीत लाकगीतक अंग थिक। कहल जाइत अछि जे लोकगीतक रचनाकार नहि होइत छथि, ओ सार्वजनिक रचना होइत अछि। एकर वास लोक कंठ मे अछि। एक कंठ सँ दोसर कंठ धरि जाइतश्जाइत गीतक स्वरुप बदलि जाइत। ततबे नहि! गीतक भास सेहो बदलैत। एक्के गीत भास बदलिश्बदलि कत्ते रुप मे गाओल जायत। तेँ संस्कार गीत मे एकरुपताक अभाव भेटैत अछि। स्वभावगत एहि स्थितिक दोसर परिणाम थिक भनिताक बेलगाम प्रयोग। गीत गौनिहारि सभ अपने फुरने कोनो गीत मे कोनो रचनाकार नाम भनिताक रुप मे जोड़ि दैत छथि। विद्यापतिक रचना उमापतिक भ जाइत त कखनो उमापतिक चंदा झाक वा मनबोधक। ततबे नहि मैथिली क्षेत्र सँ बाहरोक रचनाकार जना तुलसी, सूर दास, मीरा इत्यादि मिथिलाक माएश्बहीनिक कंठ मे आबि मिथिलेक आ मैथिलिऐक गीतिकार बनि जाइत छथि। जे उचित आ अनुचित दुनू थिक। उचित एहि लेल जे हुनकर लोकप्रियता विनयपत्रिता, रामायण, सुरसागर माध्यम सँ एतेक अधिक प्रचलित भऽ गेल अछि जे अपन बनि गेल छथि। जहाँ धरि शब्द टूटैक प्रष्न अछि ओ ज्ञानश्अज्ञानक बीचक बात थिक। भषाक जन्म आम जनक बीच होइत। किछु नव शब्दो जन्म लैत अछि आ शुद्व शब्द टूटि कऽ नवो बनि जायत अछि। तेँ कोन गीत किनकर लिखल थिकन्हि, संस्कार गीत मे वुझब कठिन भऽ जायत अछि। स्पष्ट अछि जे संस्कार गीत मैथिलश्महिलाक परिष्कृत सांस्कृतिक चेतनाक परिचायक थिक। मिथिला मे संस्कार गीत अनौपचारिक षिक्षाक माध्यम अछि। मैथिल समाज मे नारीक लेल औपचारिक षिक्षा वर्जित छल। सिर्फ नारिये नहि माटि परक लोकक लेल सेहो छल। कहल जाइत अछि जे वेद वा गीता पढ़ला सँ ओ बताह भऽ जायत। नारी मे विदुषी होइत छलीह। संस्कार गीतक संबंध संस्कृति आ साहित्य से त अछिये, समाज स सेहो अछि। संस्कृति, साहित्य आ समाजक अन्तरावलम्वन केँ जत्ते नीक जेँका संस्कार गीत प्रकट करैत अछि तत्ते एहि प्रकारक आन कोनो घटक नहि। संस्कार गीतक संकलनश्प्रकाषन सँ मौखिक परम्परा साहित्य समेटल जाइत अछि आ ओ साहित्य अघ्ययनश्विष्लेष्णक आधार प्रस्तुत करैत अछि मिथिला मे संस्कार गीतक श्रीगणेष होइत अछि गोसाउनिक गीत सँ। एहि स मैथिल समाजक धर्मभावनाक ज्ञान होइत अछि। किन्तु प्रष्न अछि जे संस्कारक अवसर पर ई धर्मश्भावना मुख्यतः गोसाउनिऐक गीत मे किऐक प्रकट होइत अछि? स्पष्ट अछि जे एहिठाम गोसाउनि गोसाई सँ बेसी महत्वपूर्ण छथि। भगवानोक गीत मिथिला मे गाओल जाइत अछि मुदा संस्कार कर्मक अवसर पर जे प्रधानता भगवती गीतक अछि से भगवानोक गीतक नहि! आब प्रष्न उठैत जे मिथिला मे देवीश्पूजाक प्रमुखता किऐक अछि? सभ जनैत छी जे देवीश्पूजा तंत्रसाधना सँ सम्बद्ध अछि। किछु इतिहासकारक मत छन्हि जे तंत्रसाधना असंस्कृत जनजातिक समाज सँ आयल अछि। जकरा कालान्तर मे ब्राह्मणवादी लोकनि अपना लेलनि। बहुत दिन धरि तंत्रश्साधना अवैदिक कार्य बूझल जायत छल। रसेश्रसे अपनवैतश्अपनवैत सनातन धर्म मे जोड़ा गेल। वैदिक धर्मावलम्बी सभ सेहो तंत्रश्साधना अपना देवी पूजा दिषि आकृष्ट भेलाह। एहि सँ अतिरिक्त मिथिलाक समाज मे शैवश्धर्मक प्रमुखता छल अथवा शाक्त धर्मक। जे विवाद विद्वत मंडली मे बहुत दिन धरि चलल। पनचैती सँ फरिआयल जे मिथिलाक लोक पंचदेवोपासक होइत छथि। ई मान्यता पुरानकालक समन्वयवादी धार्मिक जीवनक देन थिक। संस्कार गीतक मध्यकालीन चरित्र के देखार करैत अछि। गीत संस्कार मे मैथिली गीतक अपन इतिहास अछि। लोचनक ‘रागतरंगिणी’ मे मैथिल गीतक जे इतिहास लिखने छथि तदनुसार एकर जन्म तेरहमश्चैदहम शताब्दी मे भेल। षिव सिंह आ विद्यापति समकालिन छलाह। हुनके पितामह सुमति मैथिली गीतक परम्पराक प्रारंभकर्ता छलाह। एहि प्रकारे मिथिलाक देषी गीत परम्पराक स्थापना भेल। ऐतिहासिक आाधार पर यैह मानल जाइत अछि मुदा गीत गेवाक प्रवृति मनुष्यक विकासक संग जुड़ल अछि। जहि आधार पर आरो पुरान कहल जा सकैत अछि। गीत गेवाक ढ़ंग, जकरा राग कहल जाइत, मिथिला मे भास कहल जाइत छैक। मिथिला भासक अपन विषिष्टता छैक। संस्कार गीत एहि भासक भंडार छी। हँ, किछु त्रुटिपूर्ण बात सेहो अछि जे कम जनने एक्के गीत (समदाउन) खुषीक समय मे सेहो गवैत छथि आ शोकक समय सेहो जखन कि दुनूक लेल अलगश्अलग विषयवस्तु होइछ। तहिना बेटाक विवाह मे कुमार गीत आ बेटीक लेल कुमारि गीत मे सेहो अंतर होइत अछि। जनमक समय खेलौना आ सोहर मे सेहो अंतर अछि। अंत मे, संकलनकर्ता नवयुवक छथि, तेँ बहुत किछु त्रुटि रहलाक वादो धन्यवादक पात्र छथि, जे अपन मातृभाषाक सेवा लेल डेग बढ़ौलनि अछि। - जगदीष प्रसाद मंडल (1) सिंह पर एक कमल राजित ताहि उपर भगवती। उदित दिनकर लाल छवि निज रुप सुन्दर छाजती। दाँत खटश्खट जीह लहश्लह श्रवन कुन्डल शोभती। शंख गहिश्गहि, चक्र गहिश्गहि खर्ग गहि जगतारिणी। मुक्तिनाथ अनाथ के माँ भक्तजन के पालती। सिंह पर एक कमल राजित ताहि ऊपर भगवती। माँ ताहि ऊपर भगवती। (2) सभ के सुधि अहाँ छी अम्बा हमरा किए बिसरै छी हे। हमरा दिस सँ मुह फैड़े छी, ई नहि उचित करै छी हे। छी जगदम्बा जग अबलम्बा तारिणी तरणि बनै छी हे। छनश्छन पलश्पल ध्यान धरै छी दरसन बिनु तरसै छी हे। छी हम पुत्र अहीं केर जननी से तँ अहँा जनै छी हे। रातिश्दिन हम विनय करै छी पापी जानि ठेलै छी हे। सभ के सुधि अहाँ लै छी अम्बा हमरा किए बिसरै छी हे। (3) कोन दिन आहे काली तोहर जनम भेल, कोन दिन भेल छठियार। शुक्र दिन आहे सेवक हमरो जनम भेल, बुध दिन भेल छठियार। पहिर ओढ़िय काली गहबर ठाढ़ि भेली, करब मे काली के सिंगार। कोन फूल ओढ़न माँ के कोन फूल पहिरन, कोन फूल सोलहो सिंगार। चम्पा फूल ओढ़न, जूही फूल पहिरन, ओढ़हुल फूल सिंगार। भनहि विद्यापति सुनु माता काली, सेवक रहु रक्षपाल। कोन दिन आहे काली तोहर जनम भेल, कोन दिन भेल छठियार। (4) अब ने बचत पति मोर हे जननी, अब ने बचत पति मोर। चारु दिसि पथ हेरि बैसल छी, क्यो ने सुनै दुख मोर। हे जननी..... एहि अवसर रक्षा करु जननी, पुत्र कहाएव तोर। श् हे जननी..... अलटिश्बिलटि कऽ जँ मरि जायब, हँसी होयत जग तोर। श् हे जननी..... अबला जानि शरण दीअ जननी, नाम जपत हम तोर। श् हे जननी.... (5) हम अबला अज्ञान हे श्यामा, हम अबला अज्ञान। धन सम्पत्ति किछु नहि अछि हमरा, नहि अछि किछुओ ज्ञान। श् हम अबला.... नहि अछि बल, नहि अछि बुद्धि, नहि अछि किछुओ ध्यान। श् हम अबला...... कोन विधि भव सागर उतरब, अहिंक जपल हम नाम। श् हम अबला... (6) जगदम्ब हे अबलम्ब मेरी, जननी जय जय कालिका। दष भुजा दष खड़ग राजित, पाष खप्पर विराजित। मुण्ड लयश्लय मगन नाचय, गाबय योगिन मालिका। भाइ भैरब मुण्ड छीनथि जय जय कालिका। (7) अहाँ कियै भेलहुँ कठोर हे जननी अहाँ कियै भेलहुँ कठोर। हम दुखिया माँ शरण अहाँ के अहाँ कियै भेलहु कठोरश् हे जननी... अतुल कष्ट सहि जनम देल अछि आब पोछत के नोरश्हे जननी ... ककरा पर हम जनम गमायब के करती आब शोरश् हे जननी.... ककरा पर हम रुसि परायब के आब रक्षक मोरश् हे जननी अहाँ कियै.... (8) क्यो ने हमर रखबार हे जननी, क्यो ने हमर रखबार। चिन्ता विकल विवस मन मेरो, मन दुख होइए अपार। हे जननी क्यो.... बिनु अबलम्ब धार मे डुबलहुँ, सुझत नहि किनार। श् हे जननी..... अहाँ किए देर लगेलहुँ जननी, हम डुबलहुँ मझधार। श् हे जननी.... सृष्टिक मालिक अहीं छी जननी, करहु सभक प्रतिपाल। श् हे जननी.... माता के सब पुत्र बराबरि, पंडित मूर्ख गमार। श् हे जननी.... कतेक विनय कय थाकि गेलहुँ हम, अब करिअ भव भार। श् जननी... (9) कहाँ नहैली काली कहाँ लट झाड़लन्हि, कहाँ कयल सिंगार हे। गंगा नहैली काली बाट लट झाड़लन्हि, गहबर कयल सिंगार हे। पहिरि ओढ़िया काली गहबर ठाढ़ भेलि, करय लगली सेवक गोहारि हे। यष लिय यष लिय काली हे माता, अहाँ यष फिरु संसार हे। श् कहाँ..... (10) अयलहुँ शरण तोहार हे जगतारनि माता। लाले मन्दिरबा के लाले केवरिया, लाले ध्वजा फहराय हे जगतारनि माता। लाले चुनरिया के लाले किनरिया, लाले सिन्दुर कपार हे जगतारनि माता। राखि लिय मुख लाली हमरो, हम लेब अँचरा पसारि हे जगतारनि मता। अयलहुँ शरण तोहार हे जगतारनि माता। (11) हे जगदम्बा जय माँ काली प्रथम प्रणाम करै छी हे। नहि जानि हम सेवा पूजा अटपट गीत गबै छी हे। सुनलहुँ कतेक अधम के मैया मनवांछित फल दै छी हे। पुत्र सम जानि चरण सेवक के जन्मक कष्ट हरै छी हे। विपतिक हाल कहल की हे मैया आषा लागि जपै छी हे। सोना चानी महल अटारी ई सब किछु ने मँगै छी हे। मनक मनोरथ मनहि मे राखि मंदिर तक पहुँचे छी हे। अहाँक चरण के दास कहाबी एतवे हम मनबै छी हे। प्रेमी जन सँ पाबि निराषा नयन नीर बहबै छी हे। नोर बहा कऽ अहाँ लय मैया मोती माल गुथै छी हे। ’’’’’’ (1) गरजह हे मेध गरजह गरजि सुनावह रे। ललना रेश् ऊसर खेत पटाबह सारि उपजाबह रे। जनमह आरे बाबू जनमह जनमि जुड़ाबह रे। ललना रेश् बाबा सिर छत्र धराबह शत्रु देह आँकुष रे। हम नहि जनमब ओहि कोखि अबला कोखि रे। ललना रेश् भैलहि वसन सुतायत छौड़ा कहि बजायत रे। जनमह आरे बाबू जनमह जनमि जुड़ाबह रे। ललना रेश् पीयर वसन सुताबह बाबू कहि बजायब रे। (2) पलंगा सुतल तोहेँ पिया कि तोहें मोर साहेब रे। ललना रेश् बगिया जँ एक लगबितहुँ टिकुला हम चखितहुँ रे। भल नहि बोललिह धनी कि बोलहुँ न जानह रे। ललना रेश् बेटबा जँ एक तोरा होइत सोहर हम सुनितहुँ रे। भानस करैत तोहें गोतनी कि तोहें मोर हित बंधु रे। ललना रेश् अपन बालक दिअ पैंच पिया सुनु सोहर रे। नोन तेल पैंच उधार भेटय आर सभ किछु रे। ललना रेश् कोखिआक जनमल पुत्र सेहो नहि भेटय रे। मचिया बैसल तोरे सासु कि सासु सँ अरजि करु रे। ललना रेश् कओनश्कओन तप केलहुँ पुत्र फल पेलहुँ रे। गंगहि पैसि नहेलहुँ हरिवंष सुनलहुँ रे। ललना रेश् देवलोक भेला सहाय कि पुत्र फल पयलहुँ रे। आदित लगैत बिलम्ब भेल होरिला जनम लेल रे। ललना रेश् लाल के पलंगा सुता देल पिया सुनु सोहर रे। दषमासी सोहर (3) प्रथम मास जब आयल चित फरिआयल रे। जानि गेल सासु हमार चढ़ल मास दोसर रे। सासु मोर बसु नैहर ननदी बसु सासुर रे। घर छथि देबर नदान चढ़ल मास तेसर रे। बाट रे बटोहिया कि तोहि मोर भैया कि हित बंधु रे। हमरो समाद लेने जाउ चढ़ल मास चारिम रे। अन्न पानि किछु नहि भावय खटरस भावय रे। कहब हम कओन उपय चढ़ल मास पाँचम रे। रचिश्रचि पतिया लिखाओल नैहर पठाओल रे। बिनु आमा नैहर विरान चढ़ल मास छट्ठम रे। आगुश्आगु आवय दोलिया पाछु भैया आवय रे। घुरिश्घुरि घर भैया जाउ चढ़ल मास सातम रे। तन भेल सरिसब फूल देह भेल पीयर रे। अब न बाँचत जीव मोर चढ़ल मास आठम रे। घरश्घर बाजत बधावा कि भेल बड़ आन्नद रे। अयोध्या मे जनमल राम चढ़ल मास नवम रे। तुलसीदास सोहर गाओल गाबि सुनाओल रे। भक्तवत्सल भगवान कि आजु प्रकट रे। (4) एक दिन छल बन झंझर आब बन हरियर रे। बड़ रे सीता दाई तपसी कि गरम सँ रे। के मोरा गरुअनि काटत खिनहरि बूनत रे। ललना रे मन होय पियरी पहिरतहुँ गोद भरबितहुँ रे। ललना रे राम दहिन भए बैसतथि कौषल्या चुमबितथि रे। (5) प्रथम समय नियराओल शुभ दिन पाओल रे। ललना रे देवकी दरदे वयाकुल दगरिन आयल रे। दोसरो वेदन जब आयल कृष्ण जन्म लेल रे। ललना रे तेसर हरिक प्रवेष कलेष मेटायल रे। दगरिन आबि जगाओल केओ नहि जागल रे। ललना रे हरि देखि सभ मन अचरज सभ हित साधल रे। सूरदास प्रभु हितकर कृष्ण जनम लेल रे। बाजन बाजय सभ ठाम देव लोक हरखित रे। (6) उतरि सावन चढ़े भादव चहुँ दिस कादब रे। ललना रे मेधवा झरी लगाबय दामिनि दमकय रे। जनम लेल यदुनन्दन कंस निकन्दन रे। ललना रे फुजि गेल वज्र केवाड़ पहरु सब सूतल रे। शंख चक्र युक्त हरि जब देवकी देखल रे। ललना रे आइ सुदिन दिन भेल कृष्ण अवतार लेल रे। कोर लेल वसुदेव कि यमुना उछलि बहू रे। ललना रे हरि देल पैर छुआय नन्द घर पहुँचल रे। नन्द भवन आन्नद भेल यषुमति जागल रे। ललना रे सूरदास बलि जाय कि सोहर गाओल रे। (7) घर से बहार भेली सुन्दरि, देहरि धय ठाढ़ भेली रे। ललना रे ओलती धय धनि ठाढ़ि कि, दरदे व्याकुल रे। कथि लय बाबा बिआहलनि, बलमु घर देलनि रे। ललना रे रहितहुँ बारि कुमारी, दर्द नहि जनितहुँ रे। अगाध राति बिराल पहर रति, बबुआ जनम लेल रे। ललना रे बाजय लागल बधाबा, कि गाओल सोहर रे। (8) पहिल परन सिया ठानल सेहो विधि पूड़ाओल रे। ललना रे भेटल अयोध्या राज ससुर राजा दषरथ रे। दोसर परन सिया ठानल सेहो विधि पूराओल रे। ललना रे भेटल कौषल्या सासु लखन सन देओर रे। तेसर परन सिया ठानल सेहो विधि पूराओल रे। ललना रे माँगल पति श्रीराम सेहो विधि पूरल रे। (9) गाँव के पछिम एक कुइयाँ सुन्दरि एक पानि भरु रे। ललना रे घोड़बा चढ़ल एक कुमर पानि के पियासल रे। पानि पीबू पानि पीबू कुमर सुरति नहि भुलह रे। तोरो सँ सुन्दर हमर स्वामी जे तजि विदेष गेल रे। कोन मास तोहरो वियाह भेल कोने गवन भेल रे। कोने मास जोड़ल सिनेह कि तजि परदेष गेल रे। फागुन हमरो विआह भेल कि चैत गवन भेल रे। बैसाख जोड़ल सिनेह कि तेजि विदेष गेल रे। (10) जीर सन धनि पातरि फूल सन सुन्दरि रे। ललना रे सुतल प्रेम पलंग पर दरदे व्याकुल रे। सासु जे हुनका अलारनि बहिन दुलारनि रे। ललना रे तिल एक दरद अंगेजह, होरिला जनम लेत रे। जाहक हे ननदी जाहक, भइया के बजाबह हे। ललना रे भइया ठाढ़ देहरि बीच कहु बात मनके रे। खेलौना (1) भैया के घर बेटा जनम लेलक बधैया माँगे एलै हो लाल। सोना खराम चढ़ि भैया एला की की मोर बहीन लेली हो लाल। सोनाक हम मट्ठा लेलौ रुपा केर हम लेलौ काड़ा हो लाल। रेषमी कपड़ाक अंगा लेलौ जड़ी लागल हम टोपी हो लाल। पचासक बदला सौ लऽ कए जेती रेषम साड़ी पहिरेबनि हो लाल। भनस कए कऽ भौजी अयली खादी साड़ी पहिरेबनि हो लाल। सयक बदला पचास लय कए जैती, मूड़ी मे डांड़ लगतनिहो लाल। कनैत खीजैत घर ननदि जेती हो लाल। (2) आइ छठि दिन घर मे सुदिन भेल घर मे भेल ललना, दुआरे वाजे बजना। बाबा लुटाबथि हाथी ओ घोड़ा बावी लुटावे गहना, दुआरे बाजे बजना। काका लुटाबे घड़ी ओ औंठी काकी लुटाबे कंगना, दुआरे बाजे बजना। पिसा लुटाबे मोटर गाड़ी पीसी लुटाबे यौबना, दुआरे बाजे बजना। (3) बाजे बाजे बधाबा नन्द के अंगना कथक नाचे पमरिया नाचे, छोटकी ननदिया नाचे अंगना। किये तोँ ननदी नाचह आंगन, तोरो भैया रहथि पटना। श् बाजे.... भैया हमर पटना रहै छथि, ओतहि सँ आओत मोती के कंगना। भाई मोरा जीबौ भतीजबा जीबौ, देव पुराओल मन कामना। (4) ककरा के अंगना जमहिरा रे, मन रंजे के लाल। ककरा बहिनि आबय रे, मन रंजे के लाल। बाबा के अंगना जमहिरा रे, मन रंजे के लाल। पलंगा सुतल तोहे पिया हे, मन रंजे के लाल। बहिन मांगय इनाम रे, मन रंजे के लाल। तेरे सन्दुक मे कंगना रे,श् मन रंजे... कंगना हम नहि लेब रे, मन.... हमहि त लेब नौ लाखा हार,श् मन..... हँसैत जायब ससुरारि रे,श् मन...... हम नहि देब नौ लाख के हार,श् मन.... कनैत जाउ ससुरारि रे,श् मन..... जँ नहि देब नौ लाख के हार,श् मन.... बबुआ के लऽ जैब ससुरारि रे,श् मन.... फेर कऽ बबुआ जनम लेब रे,श् मन.... नैना मे नैना मिला लेब रे,श् मन.... सुनु बचन अहाँ ननदी रे,श् मन.... कोखिया लहरि नहि जाय रे, गन रंजे के लाल। गनियारि पिसबाक गीत कहमा केर जड़िया कहमा सिलौटिया रे। ललना रेश् कओन मुँह भय पीसब, कौषिल्या पीआयब रे। दछिन के इहो जड़िया, पछिम सिलौटिया रे। ललना रेश् पूब मुँह भय पीसब, कौषिल्या पीयाअब रे। पहिने जे पीलनि कौषिल्या रानी, सुमित्रा रानी रे। ललना रेश् सिल धोइ पीयल कैकेयी रानी तीनू गरभ सँओ रे। कौषिल्या के जनमत राम, सुमित्रा के लछमन रे। ललना रेश् कैकेयी के भरत, शत्रुघन, तीनू घर सोहर रे। तेलश्कसाय लगवैक गीत (1) कौने बाबा हरबा जोताओल, मेथिया उपजाओल हे। कौने बाबी पीसल कसाय, जे कि बरुआ ओंगारल हे। बड़का बाबा हरबा जोताओल, कि सरसो उपजाओल हे। ऐहब बाबी तेल पेरौलीह, बरुआ ओंगारथि हे। (2) काँचहि बाँस के मलिया हे, आकि ताहि मलिया तेल फूलेल हे। कौने बाबी लगेतीह तेल फूलेल, आकि कौन बाबी लगेती उबटन हे। आकि फल्लाँ बाबी लगेती तेल फुलेल, आकि फल्लाँ बाबी लगेती उबटन हे। मूड़न गोसाउनि नोतक गीतश् जँ हम जनितौं काली मैया औती अगर चानन मंगबितौ हे। गंगा सँ मैया चिकनी मंगबितौ ऊँच के पीड़िया बनबितौ हे। नीर गंगाजल सँ पीड़िया निपबितौ अड़हुल फूल चढ़बितौ हे। पीअर पीताम्बर माँ के आँचर दीतौं सोन रुपे घूघरु लगाय हे। जोड़ा छागर धूर बन्हबितौ करिया दीतौं बलिदान हे। भनहि विद्यापति सुनु देबि काली सदा रहब सहाय हे। पितर नोतक गीतश् कौन बाबा आओत गजन हाथी ओ जे कौने बाबा लिल घोड़ा हे। कौने बाबी अओती दोलियहि कि बरुआ आषीष देती हे। बड़का बाबा आओता गजन हाथी छोटका बाबा लिल घोड़ा हे। ऐहब बाबी अओती दोलियही कि बरुआ आषीष देती हे। मुड़न बेरक गीतश् समुआ बैसल तोहे बाबा कि बरुआ अरजि करु हे। लपटि झापय ललाट करह जगमूड़न हे। रहु बाबू रहु बाबू बरुआ कि होयत सुदिन दिन हे। नोतब सकल परिवार करब जगमूड़न हे। मूड़न करैत बरुआ क बाबा सँ अरजि करु हे। आनहु पीसि बोलाय कि अउरी पसारल हे। औती पीसी सोहागिन बैसति चैक चढ़ि हे। पीअर वस्त्र पहिरती केष परिछति हे। केष कटबै कालक गीतश् कौने बाबा छुरिया गढ़ाओल सोने मढ़ाओल हे। कौने अम्मा लेल जन्म केष कि शुभश्शुभ होयत हे। बड़का बाबा छुरिया गढ़ाओल रतने मढ़ओल हे। बड़की बाबी लेल जनमकेष कि शुभश्शुभ होयत हे। देब हे नौआ भैया लाल धोतिया सोनक कैंचिया हे। शुभ कऽ उतारऽ बाबाक केष बबुआ जीक मूड़न हे। नौआक गीत धीरेश्धीरे कटिहह नौआ केष, कि बौआ बड़ दुलारु छइ हौ। बौआक मामी नौआ तौरे देवह, कि बौआ छै बड़ दुलारु हौ। बौआक मामी भार पठौलखिन, ठकुआ तोरे देबह केरा तोरे देवह हौ। बौआक नाना घोती पठेलखिन, पीअर मे रंगि के तोरे देवह हौ। धीरेश्धीरे कटिहह केष, कि बौआ छै बड़ दुलारु हौ। नहेबा कालक गीतश् कोने बाबा पोखरि खुनाओल, कि घाट बनाओल हे। कोने बाबा भरथि जूड़ी पानि, कि बरुआ नहाबथि हे। अपन बाबा पोखरि खुनाओल, घाट बनाओल हे। ऐहब बाबी भरु जुड़ि पानि, कि बरुआ नहावथि हे। चुमाओन गीतश् आजु माइ शोभा श्री रघुवर के मातु कौषल्या हकार पठाओल गाइन जतेक नगर के। कैकेयी आयलि सुमित्रा आयलि गाइनि सगर नगर के। दुबि अछत लय देवलोक आयल चर डोलय रघुवर के। तुलसीदास प्रभु तुम्हरे दरस के जीवन सफल दरस के। आजु माइ शेभा श्री रघुवर के। भगवतीक विनतीश् अयलहुँ सरन तोहर हे जगतारनि माता। श् अयलहु..... लाले मन्दिरिया के लाले केबरिया। लाले घ्वजा फहराय हे जगतारनि माता। श् लाले चुनरिया के लाले किनरिया, लाले सिनुर कपार हे जगतारनि माता।। राखि लिऔ मुखलाली हमरो। हम लेब अचरा पसारि हे जगतारनि माता।। अयलहुँ सरन तोहार... गाम देवताक गीतश् बेरिश्बेरि बर बरजौं मालिनि बेटिया, बाट घाट जुनि रोपु फूल हे। एहि बाटे औता ब्राह्मण दुलरुआ, घोड़ टाप तोड़ि देत फूल हे। कानै लगली खीजै लगली मालिनि बेटी, आखि स बहै लागलि नोर हे। के निरमोहिया फूल गाछ तोड़त, के रे देत वरदान हे। जुनि कानू जुनि खीजू मालिनि बेटिया, हमरा स लीअ वरदान हे। पहिल जे मंगलौ ब्रह्मण सिर के सिनुरबा, तखन कोर भरि पुत्र हे। जे पुत्र दीह ब्राह्मण हरि नहि लीह, बाँझी पद छूटत गोर हे। साँझश् साँझ दिय यसुमति मइया हे साँझ बीतल जाइये। जैता कन्हैया खिसिआय, हे साँझ बीतल जाइये। कथी केर दीप कथी केर बाती, हे साँझ बीतल जाइये। सोना केर दीप पाट सूत बाती, हे साँझ बीतल जाइये। सरसो तेल जरय सारी राती, हे साँझ बीतल जाइये। जरय लागल दीप चमकि गेल बाती, हे साँझ बीतल जाइये। खेलय लगलै साँझ मइया, हे साँझ बीतल जाइये। उपनयनक गीतश् (उद्योग गीत) गोसाउनिक नोतक गीतश् अढ़ुल फूल देखि अयली गोसाउनि, दूधहि चरण पखारब हे। छुट्टा पान गोटा सुपारी, माँ काली नोतल जाथि हे। बरुआक माय बाप गोचर करै अछि, सुनु माता विनती हमार हे। सेबक बालक स्तुति नहि जानय, छमा करब सब अपराध हे। पीतर नोतक गीतश् दुअरहि बाजन बाजय स्वर्ग आवाज गेल हे। स्वर्ग मे पुछथिन बड़का बाबा कतय बाजन बाजू हे। अहाँ कुल जनमल फल्लाँ बरुआ ओतहि बाजन बाजू हे। स्वर्गहि पितर आनन्द भेल कि आब वंष बाढ़ल हे। स्वर्ग सँ आबि पितर बरुआ के आषीष देल हे। बँसकट्टीक गीतश् वृन्दावन बाँस कटायब कि मड़बा बनायब हे। पहिने बाँस के पूजब तखन छऽ लगायब हे। आहे ई थिक काठ सुकाठ एही सँ मारब बान्हव हे। आकि वृन्दावन बाँस कटायब कि मड़बा बनायब हे। मड़ठट्ठीक गीतश् जन्म सुफल आइ भेल की आंगन माड़ब भेल हे। जन्म सुफल ओहि बाबाक जिनका आंगन माड़ब हे। जन्म सुफल ओहि बाबीक जनिका कुल पुत्र भेल हे। पीयरहि खड़ छरायब कि लाल झालरि लगायब हे। ताहि माड़व बैसत फल्लाँ बरुआ जिनकर जनउ हैत हे। चहुदिस रहतनि सर सम्बन्धी की माड़ब सोहाओन हे। मड़वा छारैक गीत बाबा हे फल्लाँ बाबा मड़वा छारि मोहि दैह। बरिसत हे नन्हबुनिया मेघ, भाीजत हे मोरा बालक बरुआ, पीताम्बर ओढ़न को दैह। श् बाबा हे.... बाबी हे फल्लाँ बाबी आँचर झाँपि मोहि लैह। बरिसत हे नन्हबुनिया मेघ, भीजत हे मोरा बालक बरुआ, आँचर झाँपि मोहि लैह। श् बाबा हे.... मड़बा नीपक गीतश् बाबा दान दीअ यौ, मटिया कोड़ैक इनाम दीअ यौ। बाबा दान दीअ यौ, मड़बा नीपैक इनाम दीअ यौ। गइया जे देलौ बछिया लगाय, आर किछु दान बेटी आमा सँ लीअ? आमा दान दीअ यै, मड़बा नीतैक इनाम दीअ यौ। बाली जे देलौ बेटी झुमका लगाय, आर किछु दान बेटी भैया सँ लीअ। भैया दान दीअ यौ, मड़वा नीपैक इनाम दीअ यौ। कंगना जे देल खीलन लगाय, आर किछु दान बहिन काकी सँ लीअ। बलिप्रदान कालक भगवती गीतश् बदन भयावन कान बीच कुण्डल विकट दषन घन पाँती। फूजल केष वेष तुअ के कह जनि नव जलधर काँती। काटल माथ हाथ अति शोभित तीक्ष्ण खड़ग्कर लाई। भय निर्भय बर दहिन हाथ लय रहिअ दिगम्बरि माई। पीन पयोधर ऊपर राजित लिधुर स्रावित मुण्डहारा। कटि किंकणि शब कर मण्डित सिक बह शोणित धरा। बसिय मसान ध्यान सब ऊपर योगिन गण रहु साथे। नरपति पति राखिअ जग ईष्वरि करु महिनाथ सनाथे। बेटा विवाह कुमरमक गीतश् (1) हम ते पोखरि खुनबै तेइ के घाट मढ़ैबै। छिनारो आयल करिहें ओहि रे पोखरिया मे। रसिया बात बाजू सम्हारि, छोड़ू हमरा से अरारि। हम त झुलफी धय घिसिआयब पोखरिया मे। हम त कोठवा उठैब तेइ मे खिड़की लगैब। छिनरो अबायल करिहें ओहि रे कोठरिया मे। रसिया बात बाजू सम्हारि छोड़ू हमरा से अरारि, हम त झुलफी धय घिसिआयब कोठरिया मे। हम त पलंगा लगैब तेइ मे तोसक ओछायब। छिनरो आयल करिहें ओहि रे पलंगिया मे। रसिया बात बाजू सम्हारि छोड़ू हमरा से अरारि। हम त झुलफी घय घिसिआयब पलंगिया मे। (2) रिमझिम रिमझिम बुन्दे बरसि गेल, अंगना मे पड़ल कजरिया। थरिया धोबै गेलि फल्लाँ छिनरिया, खसली टांग अलगइया। घेड़बा चड़ल एलखिन फल्लाँ रसिया उठ गै छिनो हरजैया। हम कोना उठबौ रसिया, तोहर बचनिया डरबा मे पड़लैमचकिया। डरबा मचकिया के की की दबैया, सोठि पीपरि मरचइया। सोठि पीपरि के बड़ रे जहरिया, अतर गुलाब ठंदैइया। जुटिका बन्धनक गीतश् कोने बाबा केरा गाछ रोपल, केरा कोसाय गेल हे। कोने बाबीक बरुआ उमत भेल राति शहर बसु हे। फल्लाँ बाबा केरा गाछ रोपल केरा कोसाय गेल हे। फल्लाँ बाबी बरुआ उमत भेल राति शहर बसु हे। मड़बहि घीव ढ़रकि गेल स्वर्ग इजोत भेल हे। स्वर्गक पितर आनन्द भेल आब कुल रहत हे। आमश्महु विआहय लेल जयबा कालक गीतश् जाइत देखल पथ नागरि सजनी गे,आगरि सुबुधि सयानि। कनकलता सन सुन्दरि सजनीगे, विधि निरमाओल आनि। चलैत हस्ति गमन सन सजनी गे, देखैत राजदुलारि। जनिकर ऐहन सोहागिनि सजनी गे, पाओल पदारथ चारि। निल वसन तन घेरल सजनी गे, सिर लेल चिकुर सम्हारि। ओहि भ्रमर रस पीबह सजनी गे, बैसल पंख पसारि। आमश्महु विआहक गीत (1) आम बीछै गेली छिनरो, आँठी विछि लैली हे। पचास बेर मना देलियह, तैयो ने तो मानली हे। आम महु बिआहै छलै, तही से भुलेलियै हे। हजार बेर मना देलियह, तैयो ने तो मानली हे। (2) अमुआ मजरि गेल जमुआ मजरि गेल चम्पाकली ताहि तर छिनरो ठाढ़ि नयना सँ नीरे ढरी। घोड़बा चढ़ल एलखिन फल्लाँ रसिया किए अकेली ठाढ़ं, नयना सँ नीरे ढरी। सासु मोर बुढ़िया हे ननदी ससुररिया मोर पिया गेलै परदेष, नयना सँ नीरे ढ़री। छाड़ि दीअ आ गे छिनरो घरबा दुअरबा सुख सम्पति सगरी। छोड़ि दैह बिअहुआ के आष चल हमरो नगरी अगिया लगेबै रसिया के घरबा दुअरबा, सुख सम्पति सगरी। बज्र खसेबै तोरे माथ मोर पिया आते रही। उपनयन कालक गीतश् (1) चैतहि बरुआ विजय भेल बैषाख पाहुन भेल हे। घर पछुआर केबटा बसु पार उतारि देहु हे। जौं हम पार उतारब जायब कओन देष हे। जायब हम जाहि देष जहाँ अपन बाबी हे। बाबी के चरण पखारब लाल जनउआ देती हे। (2) काषी मे जाय बरुआ ठाढ़ भेल जनऊ पुकारय हे। आहे के थिका काषी के वासी जनऊ मोहि चाहिय हे। सुतल छला बाबा कवष्वनाथ सेहो उठि बैसला हे। आहे हम थिकौं काषी के वासी जनऊआ पहिरायब हे। झारिखंड जाय वरुआ ठाढ़ भेल जनऊआ माँगय हे। आहे के थिका झारिखंड वासी जनऊ मोहि चाहिय हे। हम थिकौं झारिखण्ड वासी जनऊआ पहिरायब हे। आंगन आबि ठाढ़ि भेल भिखि मांगय हे। हम थिकौं अहाँ के बाबी झोरी भरिय देव हे। भीख कालक गीतश् मिथिलाक रुसल बरुआ काषी कथि लेल जाय। आगे दाय कियो नहि हित बन्धु जे बरुआ लेल बिलमाय। आगे दाय बाबा से बड़का बाबा बरुआ लेल विलमाय। बाबी से अइहब बाबी भीख नेने ठाढ़ि। आगे माइ भिखो ने लियै बरुआ मुँहो सँ ने बजाय। पहिरय लय पीयर धोती ओढ़य लेल मांगल चादर। आगे माय हाथ दुनु मंट्ठा माँगे कान दुनु सोन। आगे माइ मिथिलाक रुसल बरुआ काषी कियै जाय। पुरोहित के गारिश् बकलेल बभना चूड़ा दही चाटय ऐला हमर अंगना। चाउर देलियनि दालि दलियनि धेलनि अंगना। एक रती नोन लय करै छथि खेखना। धेती देलियनि तौनी देलियनि धेलनि अंगना। एकटा गमछा ले करै छथि खेखना। सोन देलियनि चानी देलियनि धेलनि अंगना। एकटा पाइ ले कोना करै छथि खेखना। जनउ कालक गीतश् लाल पीयर अछि माड़ब पाने पात छारल हे। ताहि माड़ब बैसलाह बाबा से फल्लाँ बाबा हे। बगल भए बैसलखिन बाबी से ऐहब बाबी हे। कोरा बैसौलनि बरुआ से फल्लाँ बरुआ हे। बरुआ जे मँगै बाबी लाल पीयर जनऊ दिय हे। रहुश्रहु बाबू आइ अहाँ ब्राह्मण होएव हे। कि लाल जनऊआ देब हक कि पियर जनऊआ हक। चुमाओन कालक गीतश् आइ षिवक चुमाओन हेमन्त घर मे। सखि सब गाबै मंगलाचार हेमन्त घर मे। आंगन चानन निपू मनाइन गजमोती चैक पुराइ। काँचहि बाँस के डलबाँ बुनाओल। ताहि राखब दूभि धान हेमन्त घर मे। चुमबै बैसली सासु मनाइनि। गौरी सहित त्रिपुरारी हेमन्त घर मे। दुबि अक्षत लय मुनि सब आयल। जय जय शब्द सुनाय हेमन्त घर मे। दनही आ बिलौकी कालक गीतश् (1) अमुआ मजरि गौले महुआ मजरि गेलै। ताहि तर फल्लाँ छिनरो ठाढ़ि नयना सँ नीर झरे। घोड़बा चढ़ल एलखिन फल्लाँ रसिलवा, कियै छिनरो एकसरि ठाढ़ि। सासु मोरा आन्हर ननदि गेल निज घर, मोर पिया गेल परदेष। नयना...... छोड़ि दिहो छिनरो घरबा दुअरबा, छोर विहुआ के आस। नयना........ (2) नामि नामि कोसिया मे जुटिया गूथविह लटका के चलिहह ना। छिनरो गोरी बदन बिछा के चलिहह ना। पतरी कमरिया मे डरकस पहिरि लचका के चलिहह ना। गोरे कलइया मे घड़ी पहिरि देखा के चलिहह ना। गोरेश्गोरे अखिया मे सुरमा लगाबिह मचका के चलिहह ना। बेटा विवाह विवाहक लेल जाय कालक गीत (कुमार) (1) जहि दिन आहे बाबू तोरो जनम भेल, अन्न पानि किछु ने सोहाय हे।, सेहो बाबू चलला गौरी विआहन, दुधबाक दाम दहु ने चुकाय हे। दूधक दाम अम्मा सधियो ने सकइछ, पोसाइक दाम दै देव हे। जाबत जीव अम्मा सध्यिो ने सकइछ, धनी हेती नौरी तोहार हे। नित दिन आहे अम्मा चरण दबेती, भोरे उटि करती प्रणाम हे। (2) पाकल पान के बिड़िया लगाओल नगर मे पड़ल हकार। आबथु देवलोक बैसथु माड़ब चढ़ि, सब मिलि साजु बरियात हे। कौने बाबा साजल आजनश्बाजन कौने बाबा साजु बरियात हे। कौने बाबी साजल दुलहा दुलरुआ, झलकैत जायत बरियात हे। (3) साँठह आहे आमा सिन्दुरक पुरिया, नगर मे पड़ल हकार हे। साजह आहो बाबा दुलहा दुलरुआ, दूर जायत बरियात हे। जखनहि रामजी कोबर बिच आयल, सरहोजि छेकल दुबारि हे। हमरा के दान दीअ ननदोसिया, तखन कोबर देव पैर हे। मोरा कुल आहे सरहोजि बहिनी ने जनमल, राम लखन दुहु भाइ हे। सेहो भाइ मोर संगहि अयलाह, सरहोजि मांगथि दहेज हे। बरियातीक गीतश् (1) ऊँची महलिया मालिनि के घर, नीचा लागल फुलवारी हे। ले गे मालिनि सोनाक सूइया, बाबू के गूँथि दे मौरि हे। मौरि लय आयल मालिन, कहलक के देत मौरक दाम हे। घर सँ बाहर भेला फल्लाँ बाबा, हम देब मौरक दाम हे। (2) कौने बाबा सजल घोड़ हाथी कौने बाबा साजु बरियात हे। कौने दुलहा साजथु रहिमल घोड़ा साजि चलल बरियात हे। तिल एक आहे बाबू घोड़ा विलमाव अमा गोर लागि लिय हे। जुरहि जैहह बाबू जुरहि अबिह जुरहि होयत विवाह हे। रहमल घोड़ा सलामति रहतै शुभश्2 होयत विवाह हे। नगहर भरबाक गीतश् भरय चलली सखि सिरहर नव कलष मँगाइ। चानन सिरहर उर लय शुभ सिन्दुर लगाइ। सागर तट जब महुँचल सब नारी। सिर सँ कलष उतारल देल आमक डारी। लोचन प्रीत जुड़ायल सब मिलि मंगल गावे। सब के ई दिन होय विधाता लिखथि भागे। शुभ कार्य मे विदा होयबा कालक गीतश् शुभे ल बहार भेलि बेटीक माय, काहु हाथ नारियल काहू दूबि धान, काहू खोंइछा साँठल पाकल पान भैया हाथ नारियल भौजी दूबि धान। अमा खोंइछा साँठल पाकल पान। आजू मोरा आजू मोरा उचित कल्याण, बीलहह हे तरुणी सिनुर पिठार। बेटीक विआह (कुमारि गीत) (1) कौने बन बोले कारी कोइलिया कौने बन बोले मयूर हे। कौने घर बोले सीता हे दुलारी आब सीता रहति कुमारि हे। आनन्द बन बोले कारी कोइलिया निकुंज बन बोले मयूर हे। राजा जनक घर सीता बेटी बोले आब सीता व्याहन जोग हे। जाहक आहो बाबा राज अयोध्या जहाँ बसै दषरथ राज हे। राजा दषरथ के चारि पुत्र छनि राम लखन दुइ वीर हे। गोरहि देखि जनु भुलहि हो बाबा श्यामहि तिलक चढ़ैब हे। अपन जोग बाबा समधि जोहब नगर जोकर बरिआत हे। सीता जोकर बाबा लायब जमैया देखत जनकपुरक लोक हे। (2) जहि दिन आहे बेटी तोहरो जनम भेल से दिन कहलो ने जाय। चिन्ता निन्द हरित भेल बेटी थीर नहि रहल गेयान। कथी लय आहे सियाक जन्म भेल से भेल व्याहन योग से सुनि बाबा उढ़ला चेहाय चलि भेला ताकयं जमाय। बाँध बनबिहह बाबा पोखरि खुनबिहह लगबिहह आमक गाछ। हँस जुटत आ कमल फुलायत जल मारत हिलकोर। ई सरोवर जैतुक नहि माँगत भैया होयता वेहाल। दरबाजा पर वरियाती ऐला परश् (1) आउ आउ आहे बहिना सखिया हमार हे। रतन पलकिया चढ़ि आयल चारु दुलहा। हाथी घनेरो आबे घोड़ा हजार हे। कतेक वरियाती आबे पाबी न पारे हे। जेहने कुमारि तेहने चारु कुमार हे। तिरहुत के नर नारी देखय मुँह उघारि हे। लग भऽ जाऊ बहिनि लाज बिसारि हे। गाओल सिनेहलता मन के उसारि हे। परिछनक गीत (1) षिव छथि जागल लागल दुआरी हे बहिना, षिव छथि लागल दुआरी। इन्द्र चन्द्र दिक्पाल वरुण सभ, चढ़िश्चढ़ि निज असबारी। साजि बरात हेमन्त घर आयल, नगर शोर भेल भारी। श् षिव... पुरहित ब्रह्मा चारु मुख लय, वेद ऋृचा उचारी। दाढ़ी झुलबैत अगुआ नारद, ब्राह्मण वीणा धारी। श् षिव... परिछय चलली माय मनाइनि,लय कंचन दुइ थारी। श् षिव... पटकि आरती घर के पड़ली, नाग छोड़ल फुफकारी। श् षिव... योगन गण मण्डप बीच आयल, भरि गहना पेटारी। तखन ससरि मण्डप दिषि आयल, देखल सब नरश्नारी। श् षिव... हरहारा के काड़ा, पहुँची पनिया दरारी। ढ़ोढ़क जोसन सुगबा के मुनरी, मनटीका मनिहारी। ढ़ोरक करेत आ अजगर, अधसर के पटसारी। धामन करधन गेड़ुली गहुमन, नागक नथिया भारी। श् षिव... जेहने बर तेहने बरियाती, तेहने गहना सारी। षिव छथि लागल दुआरी, हे बहिना षिव छथि लागल दुआरी। (2) चलु सखि सब देहरि पर साजू डाला पान हे। आनि ठक बक दीप लेसू परिछु सीताराम हे। हरखि चलू बरियात बरियात आयल राज भवन समीप हे। आइ अछि बड़ भाग हे सखि राम दरषन देल हे। (3) सीता करथि बिलाप तन थरश्थर काँप। धनुषा केओ नहि तोरल जनकपुर मे। आब हम रहब कुमारि घर बैसल हिय हारि, बिनु पुरषक नारि जनकपुर मे। घर मे बैसब आब जाय, अपन वयस गमाय। मरब जहरश्बिख खाय, जनकपुर मे। (4) घीरेश्घीरे चलियौ दुलहा अंगना हमार हे। अंगना मे होयत दुलहा विधि व्यवहार हे। सरहोजि दाइ लेती नाक पकरि हे। लग कनी अबियौ दुलहा लाज बिसारि हे। धुनेष के झाँपल मुँह करियौ उधार हे। सिताजी के माय सुनयना आरती उतारु हे। कपड़ा उतारै कालक गीतश् माइ हे नाक दबाय वरके जाँचू बहिना। दाइ हे योगी छथि कि भोगी से बुझबनि कोना? कपड़ा निकालि बनी देखियनु बहिना। दाइ हे रोगी छथि कि भोगी से बुझवनि कोना? माइ हे हाथ पैर नीक जकाँ जाँचू बहिना। हाथ पैर ठीक छनि कि नहि से बुझवनि कोना? घुमाय फिराय वर के देखियनु बहिना। माइ हे नांगर छथि कि ठीक से वुझबनि कोना? दाइ हे बजाय झुकाय बरके देखियनु बहिना। पण्डित छथि कि मूर्ख से वुझबनि कोना? पाग उतारै कालक गीतश् जे एहि बर के आंगन अनलनि हुनका देवनि गारि हे। धोती पहिरक लूरि ने हिनका पाग खसल जाय हे। देह परहक वस्त्रो जे छनि सेहो अनलनि माँगि हे। ठक बक किछुओ नहि चिन्हथि हिनका देबनि फेरि हे। अक्षरक ज्ञान कनियो ने हिनका नित करथि चरबाहि हे। मूसे कवि इहो पद गेलनि गौड़ीक बड़ दिअमान हे। चतुर घटक इहो वर अनलनि हिनके दियनु वियाहि हे। नाक धरक गीतश् सिर स पाग उतारल काँख दबाओल हे। लय डोपटा गिरमोहार नाक धय आनल हे। दुधहि चरण परवारल निहुरि निहारल हे। हिनको परिछि घर आनल परिछि देखओल हे। ठक बक चीन्हक गीतश् चलूश्चलू दुलहा अंगना हमार यो। अंगना मे होयत दुलहा विधि व्यवहार यो। ठक के कहलनि दुलहा माटिक मुरुत यो। दुलहाक माय केहन छिनारि इहो ने सिखेलखिन हे। हुनकर काकी केहन छिनारि इहो ने सिखेलखिन हे। बेसन के कहलनि दुलहा घाटि यो। दुलहाक पीसी केहन छिनारि इहो ने सिखेलखिन यो। भालरि के कहलनि दुलहा केरा के पात यो। दुलहाक बहिन केहन खेलारि इहो ने सिखेलखिन यो। मूज के कहलनि दुलहा इ थीक कोर यो। हिनकर पितामही केहन खेलारि इहो ने सिखेलखिन यो। आंगन जायकालक गीतश् चलु घीरे धीरे ललन ललीक अँगना ई अंगना नहि बुझब अवध के दौड़ल चलब मन मानत जेना। चलु..... गमकैत फूल कियारी लागल हीरा पन्ना गमला साजल बेली चमेली गुलाब दोना। चलू.... एहिना फुल रहय मिथिला मे बारहो मास ओ तीसो दिना। चलू.... देखथि दुलहा ठाढ़ अँगना। चलु.... अठोंगर कुटै कालक गीतश् हम धनमा कुटैब एहि बरबा से। घुरि फिरि आयल अवधबा से। की बहिया की नृपति बालक। बुझबनि उखरि मूसरबा से। घुमि घुमि धान कुटै छथि बालक। विवष भेल बेवहरबा से। चैदह भुवन ई अनका बन्है छथि। आइ बन्हियनु काँच डोरबा से। स्नेहलता ई गाओल अठोंगर। रानी बिलोकति घरबा से। नैनाश् योगिनिक गीतश् पहिल योगिनिया तोहे अपन सासु हे। आब दुलहा भेलहा योगिनिया बसी हे। आलरिश् झालरि कन्ह कारु सिर बेनिया हे। गीत स पहिनक फकड़ा थिकौ बंगालिनि बसी, बंगला सुरपुर स आयल छी सूखल नदिया नाव चलाबे, बिन लेसन के दधि जनमाबे। चुलहिक पुत्ता सारि उपजाबे, कोठी पर जे बड़द नचाबे। कन्या निरीक्षण कालक गीतश् देल आमक पल्लव आमक पल्लव हे। चिन्हू बाबू चिन्हू घनि, अपन चिन्हि जुनि भूलव हे। रघुकूल के एक रीति, तकर सुधि राखब हे। आहे! हेरथि नहि परनारि, से तखनहि जानब हे। चारु ललन चित्त चंचल करे डगमग हिय हे। आहे! आजु असल थिक जाँच नृपति घर आयल हे। यद्यपि चारु कुमार कुलक पति(पैत) राखल हे। सब सखि देल हकार ललन कहि राखल हे। एहि अवसरक फकड़ाश् काँच बाँस काटि के, बंगला घर छाड़ि के, दहिन लट झाड़ि के. वाम छथि कनियाँ दहिन छथि सारि, उठाउ प्रथम वर हृदय विचारि। जौं नहि चिन्हब अप्पन नारि, हँसती सखी सब थपड़ी पाड़ि। आम महु विवाहक गीतश् उठु उठु कामिनि छोड़ह लाज, द्वार लागल छथि पाहुन समाज। आयल दषरथ साजि बरियात, फुलह फलह सखि नव जल जात। मन जे आँकल गेल तुलाय, सुनतहि सीता गेली फुलाय। गद्गद स्वर बड़ होइछ लाज, आजु देखत मोहि ससुर समाज। धोबिनक सोहागश् धोविनक बेटी झट दहिन सोहाग गे राजा जनकजी के एक गोट बेटी। सिन्दुर पिठार लय मुँगरी पुजबही, लय धो दहिन सोहाग गे। धोबिन... गुर चााउर लऽ मुँह मे खुअबही कोचा धो दहिन सोहाग गे। धोविन.... सुकुमारि धिया के सोहाग दही ने, खय के देबौ चूड़ा दही। पहिरय के देबौ सायाश्साड़ी जेवर देबौ लटकाय। सुकुमारी.... देबौ मे देबौ गाय महिसबा, जोड़ा बड़द देबौ हकाय। सुकुमारी.... बेदी घुमय कालक गीतश् (1) गरदनि बान्हल चदरिया आगूश्आगू सिया माई। करथिन मण्डप परिकर्मा हे दुलहा और भाई। बसहा जकाँ सभ घुमथिन हे न चलय प्रभुताई। गाबथि मंगल गाइनि हे सब मंगल छाई। हँसी अली मुसकाथि छनहि देथि पीहकारी। से सुनि हँसि कऽ जमाय हे देल परिक्रमा सारी। (2) नहु नहु दुलहा चलै छथि कोना। जेना कल्हुआ के बरदा घुमै जेना। बड़द के उपमा हुनका देलियनि कोना। माई हे चैरासीक फन्दा मे पड़लनि जेना। डेग नमहर कऽ दुलहा चलै छथि कोना। माई हे खुट्टा स बड़दा खुजै जेना। बरदाक उपमा हुनका देलियनि कोना। माई गे चैड़ासीक फन्दा मे पड़लनि जेना। अंगना मे ठाढ़ दुलहा लगै छथि कोना। जेना अंगना मे मेह गाड़ल हो जेना। मेहक उपमा हुनका देलियनि कोना। जेना चोरासीक फन्दा मे पड़ला जेना। कहथि सिनेहलता चलब कोना। माई गे आंगुरक इसारा देब जेनाश्जेना। कन्यादान कालक गीतश् कोनहि कुल मे सीता जनम लेल, कौनहि कुल श्रीराम हे। कौनहि आगे माइ वेद उचारल कौनहि कैल कन्यादान हे। राजा जनक घर सीता जनम लेल दषरथ घर श्रीराम हे। नारद ब्राह्मण वेद उचारल जनक कयल कन्यादान हे। राजा जनक देल हीरा मोती सोनमा आओर देलनि धेनु गाय हे। रानी सुनयना देल सीता सन बेटी राम लेल अंगुरी लगाय हे। कहमा छुटल सुपति मौनियाँ कहमा जनक ऋृषि बाप हे। कहमा छुटल माय सुनैना जिनका झहरनि नोर हे। अंगनहि छुटल सुपति मौनियाँ दुआरे जनक ऋृषि बाप हे। मंदिर छुटल माय सुनैना जनिका नैन नोर हे। सिनुरदान गीतश् पाहुन सिन्दुर लिय हाथ, सर सुपारीक साथ। सिता उधारल माथ सिन्दुर लिय अय। सुन्दर बितै अछि लगन, अहाँ धनुष कयल भगन। सब आनन्द मगन, आषिष दिय अय। रघुबर सिर शोभनि मौर, सीता नित पूजथि गौर। आइ पूरल मनोरथ नरपति होय लय। महिमा दुनूक अनूप, सब आनन्दित भूप। आइ पूरल मनोरथ आनन्दित होय लय। लावा छिटबा कालक गीतश् मैना देखहुँ जाय, त्रिभुवन पति भेल अहाँक जमाय। षिव गौरी मिलि लावा छिड़िआय। भूखल वासुकि बिछिश् बिछि खाय। सोनाक बट्टा भरि घोरल कसाय। उमत सदाषिव भसम लोटाय। जटा मे देल अंकुसी लगाय। झिकतहि सुरसरि गेलि बहराय। विआहक गीतश् मचिया बैसल तोहे राजा हेमन्त ऋृषि, सुनू अहाँ बचन हमार यो। गौरी कुमारि कते दिन रहती, ई नहि उचित विचार यो। एतबा वचन जब सुनल हेमन्त ऋृषि, पंडित अनलनि बजाय यो। आबथु पंडित बैसथु पलंग चढ़ि, मुनि देथु धीया के विआह हे। एक पोथी तकलनि दोसर पोथी तकलनि, तेसर मोथी तकलनि पुरान यो। ओहि रे जंगल मे योगी एक वसै छथि, तनिके संग धिया के विआह यो। अरही वन के खड़ही कटाओल, वृन्दावन बिट बाँस यो। देव पितर मिलि माड़व ठानल, होबय लागल धिया के विआह यो। एक दिस बैसला नारद ब्राह्मण, दोसर दिषि गौरीक बाप यो। बाघक छाल पर वैसला महादेव, होअय लागल धिया के विआह यो। कन्यादान कय उठला हेमंत ऋृषि, मोती जेंका झहरनि नोर यो। किए जे खेलौ बेटी किए पहिरलौ, कथी ले भेलहुँ वीरान यो। खीर जे खेलौ बाबा चीर पहिरलौ, सिन्दुर लै भेलहुँ वीरान यो। देहरि छेकक गीतश् छोड़ब नहि दुआरि सुनियौ रघुनन्दन। जौं रघुनन्दन चलला कोवर घर सरहोजि छेकल दुआरि। नेग बिना दय पैर बढ़ायब देब गारि हजार यौ, सुनियौ रघुनन्दन ... पाँच पदारथ हरि जीक संग मे एक सरहोजि एक सारि यौ, सुनियौ... जौं नहि देता सात पदारथ बेचता बहिन भाय यौ। सुनियौ.... बरियाती खेबा कालक गीतश् (1) समधि गारि नइ दै छी विनती करै छी, समधिक माए पितिआइन गोअरबा के दै छी। गोअरबा सँ दूध मंगबै छी, लके समधि जिमबै छी। समधि... समधि के दादी नानी ल बनियाँ के दै छी बनियाँ सँ चीनी मंगा समधि के दै छी। श् समधि.... समधि क मौसी पीसी ल मड़बड़िया के दै छी। मड़बड़िया स धेती कीनि समधि के दै छी। श् समधि गारि.... (2) निज कुल कामिनि समधिन छिनरो महिमा अगम अपार। सगर नगर घर एको ने छोड़लनि के थिक अपन परार। बनियाँ मे जे फल्लाँ के गछलनि जिनका टाका हजार। पढ़ूआ मे जे डाक्टर के गछलनि जे भोकतनि सूई बारम्बार। राजपूत मे जे फल्लाँ के गछलनि जनिका ढ़ालश्तलवार। गोआर मे जे फल्लाँ के गछलनि जिनका धेनु हजार। सोनरा मे जे फल्लाँ के गछलनि जनिका जेवर भण्डार। तमोलिन मे जे फल्लाँ के गछलनि के करतनि उपर लाल। कोवर गीतश् (1) कोने बाबा बान्हल इहो नव कोवन हे जनकपुर कोवर। कोने अम्मा लिखल पूरैन हे जनकपुर कोवर। फल्लाँ बाबा बान्हल इहो नव कोवर फल्लाँ अम्मा लिखू पूरैन हे। ताहि पैसि सुतय गेला फल्लाँ दुलहा सीता कोवर धय ठाढ़ि हे। बैसू सीता दाइ लाले रे पलंगिया बुझि लिय हमरो गेयान हे। जनकपुर (2) नव खटिया नव पटिया नव सब पुरहर हे। आहे नव नव जोड़ल सिनेह सोहाग राति निन्द नहि हे। ताहि पैसि सुतलाह फल्लाँ दुलहा संग सिया दाइ हे। सीताअति सुकुमारि सोहाग राति निन्द नहि हे। हटि सुतु हटि सुतु ससुर जी के बेटिया अहाँ धामे गरमी बहुत हे। एतबा वचन सुनि कनियाँ सुहवे रुसि बाहर चलि जाइ हे। हम नहि घुरबै ककरो वचनियाँ कोवरक वर बड़ ठेकर हे। महुअक कालक गीतश् बर रे जतन सासु मौहक रान्हल खिरियो ने खाथि जमाय। गे माइ गौरी जाय दहिन भरि बैसलि थार बदल दुइ भेल। मनाइनि जाय पाँछा भय बैसलि वर करा एक देल। गे माइ सेहो करा हम कुकुर जिमायब से पान वर के देल। घरभरी कालक गीतश् माय मनाइनि पान लगाबथि सब मिलि कैल ओरियान। आइ थिकनि घरभरी सखि हे धीया जमैआ मोर जाय। धानश्पान देल हाथहि सखि हे दुनू मिलि देलि छिड़आय। भनहि विद्यापति गाओल सखि हे सब बेटी सासुर जाय। खोंइछ झाड़ैक गीतश् सगर जनम हम आस लगाओल, भैया करता बिआह गे माइ। भौजी के खोंइछा मे हीरा मोती आओत, ताहि लय गहना गढ़ायब गे माइ। तेहन घर ने भैया बिआहल, भौजी खोंइछ दुबिश्धान गे माइ। जनु कानू जनु खीजू बहिन दुलरुआ, हम देव गहना गढ़ाय गे माइ। कोवर परातीश् अब ने विलासक बेरि हे माधव, आब ने विलासक बेरि। मुखहुक पान बिरस सन लागत, दीपक जोति मलीन। श् हे माधव..... चेरिया आय बहारय आंगन, चन्द्रक जोति मलीन। श् हे माधव..... ग्वाला आय गौ दूहन लागे, बछड़ डगरि बन गेल। श् हे माधव...... सूरदास प्रभु तुम्हारे दरस को, सुर्य उदय भय गेल। श् हे माधव....... कनियाँ मुँह देखैक गीतश् सुनू हे सखिया सिया मुँह देखू शुभ काल। पहिने जे देखथि सासु कौषिल्या, देखू हे सखिया मोहर देखि शुभ काल। तखन जे देखथिन गोतनि बड़ैतिन। देखू हे सखिया कंगना देथि शुभ काल। तखन जे देखथिन ननदि बड़ैतिन, देखू हे सखिया टाका देथि शुभ काल। तखन जे देखथि परश्परोसिन, आषीष देथि शुभ काल। सुनू हेे सखिया.... कोबर नीपै कालक गीतश् नीक नीपू नीक नीपू दुलहिनिया। नहि नीक नीपब ते सुनब कहिनिया। कुम्हराक बेटी अहाँ थिकहुँ दुलहिनिया। माटि आनि नीपू नइ ते सुनब कहिनिया। जोलहाक जनमल थिकहुँ दुलहिनिया। पाट आनि नीपू नइ ते सुनब कहिनिया। बहियाक बेटी अहाँ थिकहुँ दुलहिनिया। पानि आनि नीपू नै ते सुनब कहिनिया। कोबर नीपै काल कनियाँ क ठकैक गीतश् देखू देखू हे सखि सीता रुसि रहली, आधा निपलनि कोबर आध छोड़ि बैसली। श् देखूश्देखू ..... सीताक बापकेँ बजाउ, सीता माए केँ बजाउ की सब सीता के सिखा क वदा कयली। श् देखू.... सुनलनि सासु कौषिल्या हाथ मोहर धयली कंगना गढ़ायब टीका मंगायब सीता किए रुसली। श् दुखूश्देखू... गौरी पूजाक गीतश् गौरी पूजय चलल रुक्मिनि संग सखी दस पाँच यो। तीन फूल लय गौरी पूजल बेली चम्पा गुलाब यो। तीन सिन्दुर लय गौरी पूजल मोटिया पीपा अचीन यो। तीन नेवेद्य लय गौरी पूजल नेवो नारंगी अनार यो। तीन वस्त्र लय गोरी पूजल लाल पीयर पटोर यो। तीन बेरि कल जोरि पूजब लय गंगाजल नीर यो। हड़ीर पानक गीतश् रतन सिंहासन बैसथु सुलपाणि रवाथि ने हरीर पान पीवथु जूड़ी पानि। जेहने महादेव के गौरीदाइ परान तेहने फल्लाँ दुलहाके फल्लीं दाइ परान। जेहने रामचन्द्र के सीता दाइ परान तेंहने फल्लाँ दुलहा के फल्लों दाइ परान। जेहने हड़ीर खेने मधुर पानि तेहने फल्लाँ दुलहाक फल्लों दाइ मधुर हे। मुट्ठी खोलैक गीतश् सखि मुट्ठियो ने खोलय जमैया हे हारि गेला रधुरैया। हमरो सीता मुट्ठी कसि के बान्हल खोलियो ने सकला जमैया हे।हारि गेला... हमरो सिया दाइक कोमल आँगुर धीरे स खोलब जमैया हे। हारि गेला... चतुर्थीक कालक गीतश् चलुश्चलु कामिनि कर असनान। प्रखर भानु मुख करत मलान। शीतल शुरभीत जल घट देल। पंकज नायक नभगत भेल। आजु चतुर्थीक अवसर थीक। किछुओ ने भिजतह लोहित सारि। लहु लहु जल हम ढा़रब बारि। दुहु जन रहु गय अमर कहाय। वरुण देव नित रहथु सहाय। कुमर चतुर्थीक उत्सव तोर। विधिकरी विधि करु भऽ गेल भोर। नहायकालक गीतश् राम लखन सन सुन्दर वर के जनु पढ़ियनु केओ गारि हे। केवल हास विनोदक पुछिअनु उचित कथा दुइ चारि हे। प्रथम कथा ई पुछिअनु सजनी कहता कनेक विचारि हे। गोरे दषरथ गोरे कौषल्या, भरत राम किएक कारी हे। सुनु सखि एक अनुपम घटना, अचरज लागत भारी हे। खीर खाय बालक जनमौलनि, अवध पुरी के नारी हे। अकथ कथ की बाजू सजनी, रघुकूल के गति न्यारी हे। साठि हजार बालक जनमौलनि सगरक नारि छिनारि हे। नेहलता किछु आब ने कहियनु, एतवे करथि करारी हे। हँसी खुषी मिथिला से जेता, पठा देता महतारी हे। वेदी उखारै कालक गीतश् सखि यदि एक बापक बेटा हेता दोसर हाथ ने लगेता हे। दू बापक बेटा हेताह तखने दोसर हाथ लगोता हे। दू कोन के वेदी उखारलनि तेसर आंगन मे ठाढ़ हे। कहियनु गऽ सासु ससुर सँ आंगन मे रुसल छथि जमाय हे। कहियनु जाय जमाय बाबू सँ औंठी देवनि गढ़ाय हे। पटिया समटय कालक गीतश् रघुववर पटिया देलनि ओछाय सीता फेकल जुमाय कोवर घर मे। गाइन मंगल गीत गाय विधिकरी विधि कराय। सखि सब करथि विनोद कोवर घर मे। कहथिन सरहोजि बुझाय जुनि अहाँ अगुताइ। विधि करियौ आइ कोवर घर मे। सौजनक गीतश् मेही भात जतन भनसीआ साँठि लयल भरि थारी जी, राहड़िक दालि बटा भरि उत्तम ताहि देल घी ढ़ारी जी। ओल पड़ोर तरल तरकारी खटरस भेग लगावै जी। महिसिक दही छाँछ भरि उत्तम परसय प्रेम पियारी जी। दही खयवा कालक गीतश् हे वर दही किये ने खाइ छी माय अहाँक गोआरक बहु छथि अहाँ संग किएक ने लयलहुँ संग संग अयली टीसन सँ घुरली टीकट मास्टर देखि डेरेयली हे वर चीनी किये ने खाइ छी माय अहाँक छथि बनियाक बहुआ स्ंाग किये नहि अनलहुँ स्ंागे अयली दरबजा सँ घुरली समधी देखि डेरेयली। हे वर... चित्ती साटक गीतश् भितिया मे चितिया सटि हे योगिया जाहि ठाम लागल सिन्दुर पिठार। जहाँ जहाँ सुमिरन करबे रे योगिया रखिहे हिरदय लगाय। नून तेल पैंच लेल सिन्दुर सपन भेल पिया भेल डुमरीक फूल। भितिया.... मधुश्रावनीश् गोसाउनिक गीतश् (1) विनती सुनियौ हे महरानी, हम सब शरण मे ठाढ़। अक्षत चानन अहाँ के चढ़ायब, आरती उतारव ना। बेली चमेलीक माँ के हार चढ़ायब अढ़ूल चढ़ायब ना। करिया छागर धूर बन्हायब, उजर चढ़ायब ना। (2) महिमा तोहर अपार हे जगजननी महिमा तोहर अपार हे। बामे रवप्पर दहिने कताबहै सोनितक घार हे।महिमा..... पहिरन चीर गले मुण्डमाला पैर मे नुपुर अपार हे। सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस के सदा रहिय रखवार हे। महिमा.... बिसहाराक गीतश् साओन मास नागपंचमी भेल। बिसहरि गहवर सोहाओन भेल। केओ नीपै गहवन केओ चैपारि। हमही अभागिन निपी दुआरि। केओ लोढ़े अढ़ूल केओ बेलपात। हमहू अभागिन हरिअर दूबि। केओ माँगे अनधन केओ माँगे पूत। हमहू अभागिन सिरक सिन्दुर। पावनिक गीतश् पाबनि पूजू आजु सोहागिन प्राण नाथ के संग मे। कारी कम्बल झारि गंगाजल काजर सिन्दुर हाथ मे। चानन घसू मेहदी पीसू लिखू मैना पात मे। पावनि साजि भरिश्भरि आनल जाही जूही पात मे। कतेक सुन्दर साज सजल अछि लिखल मैना पात मे। आँखि मूनै कालक गीतश् नहुँ नहुँ धरु सखी बाती, धरकय मोर छाती। नहुँ नहुँ पान पसारह, नहुँ नहुँ दृग दुहु झाँपह। मधुर मधुर उठ दाह मधुर मधुर अवगाहे। कुमर करह विधि आजे, मधुश्रावनी भेल आजे। टेमी कालक गीतश् क्दली दल सन थर थर कापय मधुश्रावनी आजे। स्कल सिंगार समारि साजथि सब मधुमय कैल समाजे। क्मल नयन पर पानक पट दै नागर जखनहि झाँपै। विधकरी हाथ चन्द्रकर बाती देखि सगर तन काँपै। आजु सोहागिन सहमल बैसल मुख किये पड़ल उदासे। अम्बा मुख हेरय कियै कामिनि पल पल लैह उसासे। कुमर नयन सँ नोर बहाबह गाइनि गाबथि गीते। बड़ अजगुत मधुश्रावनी विधि परम कठिन इहो रीते। बटसावित्रीश् बड़क पूजाक गीतश् जेठ मास अमावस सजनी गे सब धनि मंगल गाव। भूषण वसन ठीक करु सजनी गे रचि रचि आँग लगाव। काजर रेख सिन्दुर भेल सजनी गे पहिरथु सुबुधि सयानि। हरखित चललि अक्षयवट सजनी गे गवितहि मंगल गाने। घर घर नारि हकारल सजनी गे आदर सँ सभ गेलि। आइ थिक बड़साइति सजनी गे तैँ आकुल सभ भेलि। घुरुमिश्घुरुमि जल ढ़ारल सजनी गे बांटल अक्षत सुपारी। फतुर लाल देल आषिष सजनी गे जीबथु दुलह दुलारी। (2) कतेक जतन भरमाओल सजनी गे, दै दै शपथ हजारे। सपथहुँ छल जौं जनितहुँ सजनी गे, नहि करितहुँ अंकारे। आब जगत भरि मानिनि सजनी गे, केओ जनि करय पिरीते। मुँह सँ अधिक बुझावथि सजनी गे, वचन त राखथि थीर हुनक हिया दगधल मोर सजनी गे, जसु नलिनी दल नीर। गुन अवगुन सब बुझलहुँ सजनी गे, बुझलुँ पुरुषक रीत। मनहि विद्यापति गाओल सजनी गे, पुरुषक कपटी प्रीति। कोजगरा चुमाओनश् भैया के करियनु चुमाओन कोजगरा मे। बाबू जी पुछि पुछि परसथि मखान भोजघरा मे। आंगन चानन नीपल गेल अछि। गजमोती चैक पुराय देल अछि। भैया के कहिऔन चुमाओन कोजगरा मे। मानिक दीप जराओल दय दय। काँच बाँस के डाला लय लय। भैया के करियौन चुमाओन कोजगरा मे। पचीसी गीतश् खेलू खेलू यौ भैया बाजी लागइ के। सीता जीतथि रामजी हारथि बाजी लगाइ के। सखि सब देथिपिहकारी बाजी लगाई के। सीता हारथि रामजी जितथि बाजी लगाइ के। सखी सब गेल लजाय बाजी लगाइ के। धन्य धन्य सखी हम मिथिलावासी। रामजी भेला जमाय बाजी लगाइ के। जुआ खैलै लेल एल जनकपुर वाजी लगाइ के। हारला भाय बहिन पितिआइन हे वाजी लगाइ के। दुरागमनश्कनियाँ परिछनिश् सीता एली अंगना परिछन चलु सखि सब। कथी के महफा कथी के लागल ओहार हे। सोनाक महफा रेषमक लागल ओहार हे। सीता एली अंगना परिछन चलु सखी सब। कथी के साड़ी कथीक लागल किनारी हे। रेषमक साड़ी गोटा लागल किनारी हे। सीता एली अंगना परिछय चलू सखि सब। कतय गेली सासु ओ ननदि जी हे। सीता के अरिछिश्परिछि घर लय चलू हे। सीता एली अंगना परिछय चलू सखि सब। चमाओन गीतश् चुमाबहु हे राम सिया के चुमाबहु हे। आंगन चानन निपल कौषिल्या, गजमोती चैक पुराइ हे। अलष कलष लय पुरहर साजल, मानिक दीप जराय हे। काँचहि बाँस के डाला बनल अछि, दही ओ धान सजाई हे। दूभि अक्षत लय मुनि सब अयला, शुभ शुभ शब्द सुनाई हे। चुमबय बैसली मातु कौषिल्या, सखि सब मंगल गावे हे। देहरि छेकक गीतश् राम सिया मिलि अयला अवधपुर, बहिन छेकलनि दुआरि हे। हमरा दान देव जहन अहाँ भैया, तहन छोड़व हम दुआरि हे। सासु ससुर हमरा किछु नहि देलनि, कि देव अहाँ के देहरि छेकाइ हे। हाथक औंठी भैया खोलि देलखिन, बहिन लेलनि देहरि छेकाइ हे। खोंइछ झारक गीतश् सगर जनम हम आस लगाओल, भैया करताह विवाह गे माई। भौजीक खोंइछ मे सोना चानी आओत, ताहि लय गहना गढ़ायब गेमाई। तेहना ठाम ने भैया बियहला, भौजीक खोंइछ दुभि धान गे माई। सगर जनम हम आस लगाओल, भैया करताह विवाह गे माई। मोरि बैसक गीतश् मोरि बैसल अहाँ अपन सासु, मुंह जनु अहाँ बाजब हे। पुतहुँ होयत गलजोर, मुंह जनु अहाँ बाजब हे। मोरि बैसल अपन पितिया सासु, मुंह जनु बाजब हे। पुतोहू होयती गलजोर, मुँह जनु अहाँ बाजब हे। कनियाँ मुँह देखैक गीतश् सुनु हे सखि सिया मंुह देखु शुभ काल। पहिने जे देखथि अपन सासु कौषिल्या। तखन जे देखथिन गोतिन बड़ेतिन। तखन जे देखथिन ननदि बड़ैतिन। तखन जे देखथि पर परोसिन सब। आषीष देथि सब मिलि शुभ काल। सुनु हे सखि.... कोवर परातीश् आब न बिलासक बेर हे माधव आब न बिलासक बेर। मुखहुक पान निरस सन लागय, दीपक जोति मलीन। ग्वाला आबि गो दुहन लागे, गैया हमर बन गेल। चेरिया आबि झारु दियै, सुरुज उदय भय गेल। सूरदास प्रभु तुम्हारे दरस को चन्द्रक जोति मलीन। आब न.... कोबरक गीतश् कोबर लिखय गेलि रानी कौषिल्या, चारु कात लिखल मयूर। ताहि कोबर सुतला फल्लाँ दुलहा, संग लागि सीता सुकुमारि। मुह उधारि सुन्दरि के पुछलनि कोन कोन अभरन हे। हाथ कंगना अपन बाबा देलनि, सिकरी लखन देओर हे। सिरक सिन्दुर प्रभु अहीं जे देलहु यैह तीन अभरन भेटल हे। कोबर नीपक गीतश् देखू देखू हे सखि सीता आइ रुसि रहली। आधा निपलनि कोबर आधा छोड़ि बैसली। सीताक बापके बजाउ ओ भाय के बजाउ। की की सीता के सिखाय कइलनि विदा। सुनि सासु कौषिल्या मोहर लेलनि हाथ। कंगना गढ़ायब टीका गढ़ायब सिया किय रुसली। कन्या पक्षश् तुलासी गौड़ीक गीतश् फूल लोढ़य गेलि गौरी माली फुलबाड़ी बसहा चढ़ल षिव आइ गे माइ। लोढ़ल फूल षिव देलनि छिरिआइ। कनैत खीजैत गौरी अम्मा लग ठाढ़ि। के तोरा मारलक के पढ़ल तोरा गारि। हम नहि कहब अम्मा कहितहुँ लाज। पूछू गय सखि सभके कहत बुझाय। महेषवाणी हम नहि आजु रहब एहि आंगन, जौं वूढ़ होयत जमाय गे माई। एक त बैरिन भेल विधि विधाता, दोसर धिया के बाप गे माई। तेसर बैटी भेला नारद ब्राह्मण, हेरि लयला बूढ़ जमाय गे माई। धोती लोटा पोथी पतरा, सेहो सब लेबनि छिनाय गे माई। जौं किछु बजता नारद ब्राह्मण, दाढ़ी धऽ देबनि धिसिआइ गेमाइ। अरिपन लेपलनि पुरहर फोरलनि, फेकलनि चैमुख दीप गे माई। धिया लऽ मनाइनि मन्दिर पैसलीह, केओ जुनि गाबथि गीत गे माई। भनहि विद्यापति सुनु ए मनाइनि, इहो थिक त्रिभुवन नाथ गे माई। शुश्षुभ कऽ षिव गौरी विवाहू, इहो वर लिखल ललाट गे माई। समदाउनश् बारह बरस केर छल उमिरिया तेरहम बरस ससुरारि। कौने निरमोहिया दिनमा पठाओल कोन निरमोही मानि लेल। कौने निरमोहिया डोलिया पठौलक कौने निरमोही नेने जाय। ससुर निरमोहिया दिनमा पठौलक बाबा निरमोही मानि लेल। भैया निरमोहिया डोली पठौलकइ स्वामी निरमोही नेने जाय। कथी देखि धैरज धरबह हे सखिया कथि देखि रहब लोभाय। घरभरीक गीतश् माय मनाइनि पान लगाबथि सब मिलि कयल ओरियान। आइ थिकनि घरभरी सखि हे धिया जमैया मोर जाय। धान पान देल हाथहिँ सखि हेे दुनु मिलि देल छिड़िआय। भनहि विद्यापति गाओल सखि हे सब बेटी सासुर जाय। अवसर विषेष वा समसामयिकश् पावसश् नव घन गरजत माला। एक सघन तिपिराछन रजनी कूजित दुतिय मराला। तेहर सेज सुनि लखि पहु बिनु उठल अन्तर ज्वाला। रहिश्रहि चहुदिषि चपला चमकत विहरिनि जन जिमि भाला। खेपब राति कौन विधि सखि हे चिन्ता हृदय विषाला हे जलधर अहाँ जाउ ततय झट जहाँ बसथि नन्दलाल। करबनि विनय चरण धय लबि कऽ आबथु शीघ्र कृपाला जौं झट दऽ मोहन नहि औता करता निमिप अभेला। तौं ब्रज मे एको नहि जीउति विरहिनि सब व्रजवाला। कजरीश् सखी हे पिया नहि घर अयला, मेघवा वरिसन लागे ना। जौं हम जनितौं पिया नहि औंता रखितहुँ हृदय लगाय। हमरा सँ की त्रुटि भेल सखि हे आइधरि नहि आय। जौं जनितौ पिया ऐहन करता दितियनि नहि हम जाय। सखी हे पिया नहि घर अयला। (2) सखिया सावन ने डर लागै जियरा धड़श्धड़ धड़कै ना। ष्याम घटा चहुँ ओर देखायत बिजुरी चमकै ना। पिया मोर परदेष गेला सुन सेजबा न भावै ना। झींगुर दादुर मोर पपिहरा कोइली कुहकै ना। सखिया सावन मे डर लागै ना। उदासीश् तिरहुत मधुपुर गेल मनमोहन रे मोर बिहरत छाती। गोपी सकंल बिसललनि रे जते छल अहिबाती। सुतलि छलहुँ अपन गृह रे निन्न गेलौ सपनाइ कर स छूटल परसमनि रे के लेल अपनाई कत सुमिरब कत झाँखब रे हम मरब गरानी। आनक धन लय धनबन्ती रे, कुबजा भेलि रानीश्तिरहुत। (2) जखन चलल हरि मधुपुर रे सब सुरति निहारि। आब कोना रहब हरि बिनु रे झाँखथि ब्रजनारी। वन मे डोलय पिपर पात रे बहय सेमरि। हम धनि डोलिय पिया बिनु रे बिनु पुरुषक नारी। केहन कर्म विधि लिखलनि रे झाँखथि वृजनारि। हरि बिनु भूषण भार भेल रे पलंगा ने सोहाई। (3) एते दिन भ्रमर हमर छल सखि हे, आब गेल सारंग देष। मधुपीबि भ्रमर लोभित भेल सखि हे। मोहि किछु कहियो ने गेल। ककराश्ककरा कहब, अपन दुख सखि हे, नयन निन दुरि गेल। जे बिरहे हम व्याकुल सखि हे भ्रमर हमर रुसि गेल। आंगन मोर लिये बिजुवन सखि हे, घर भेल दिवस अन्हार। पुरुषक वचन ऐहन थिक सखि हे, सपतक नहि विसवास। अवसर विषेषक गीतश् मलारश् (1) अलि रे प्रीतम बड़ निरमोहिया। आतुर वचन हमर नहि मानय, परम विषम भेल रतिया। काँपत देह घाम घमि आबत, ससरि खसत नव सरिया। आवत वचन थीर नहि आनन, बहत नीर दुहू अँखिया। रमानन्द भामिनि रहु थीर भय सुख बिच कहु दुख बतिया। (2) हे उधो लिखब कोन विधि पाती। अंचल पत्र नयन जल कज्जल नख लिखि नहि थीर छाती। चन्द्र किरण बध करत एतए पिय ओतए रहू दिनश्राती। रेषम वसन कनक तन भूषण तेसर पवन जीव घाती। कहथि रमानन्द सुनू विरहिनि आओत श्याम विरहाती। (3) अलि रे हम रघुवर संग जायब भूखल पायब भोजन करायब निर्मल जल पियेबै। थाकल पायब चरण दबायब शीतल बेनिया डोलेबै। औंघैल पायब वन पत्र लायब तहि पर आँचर ओछेबै तुलसीदास प्रभु तुम्हरे दरस को रघुवर चरण लेपटेबै। योगश् (1) भात खेआय मन मारलन्हि हे अपन सासु हे। जाय ने देथि अपन देष हे अपन सासु हे। अम्मा होयती बाट देखैत करवन बाबू औताह हे। पान खेआय मति मारलन्हि हे सरहोजिनि अपन हे। जाय न देथि निज देष बुझाय रखतीह हे। कर जोरि विनती करै छी सुनू रघनन्दन। बान्हत अहाँ के प्रेम अहाँ अपने छी जगवन्दन। (2) प्रिय पाहुन मन सँ जिमि लिअ। अपने योग बनल अछि किछु नहि सेहो मनहि विचारि लिय। बुझब तखन हम जौं किछु माँगव और दिअ। भावक भुखल स्वभाव अहाँ के तेँ हम सब हरसाइत छी। भनहि विद्यापति इहो मंगल मिथिला विधि जानि लिअ। (3) हमर अपन करिये छथि पाहुन ताहि सँ मतलब अनका की। अपन बल पर अपन खुषी थिक ताहि मे कानून जहाने की। अपन बहिनि यदि फेकिये देता ताइ सँ मतलब अनका की। साठि हतार जनभूलखिन पुरखिन तकर करै छी निन्दा की। प्रसव कास मे दषा जे भेलनि ताहि सँ मतलब अनका की। गटश्गट गारि सुनै छथि लालन मगर मरम्मति करताकी। स्नेहलता मुसकाथि लजाइत उचित बात मे बजता की। उचितिश्(1) श्यामा वरन श्री राम हे सखि! देखैत मुख अभिराम। आइ हमर विध बाम हे सखि! मोहि तेजि पहु गेल आन। पढ़ल पंडित भान हे सखि! पहुक नहि करि अपमान। भनहि ‘विद्यापति’ भान हे! स्ुापुरुष गुणक निधान। (2) श्याम गोकुल तेजि गेल रे, हमर कोन दोख भेल रे। हमरा सँ नित अपराध रे, तोहे प्रभु गुणक अगाध रे। कत गुणकरब बखान रे, जग भरि के नहि जान रे। भनहि ‘विद्यापति’ भान रे, सुपुरुष गुणक खान रे। (3) जओं करु सुजन सिनेह रे, उपला पाहुन नेह रे। हेमकर मण्डप हेम रे, चाानन वन कत नीम रे। हिंगु हरदि कत बीच रे, गुनहि चिन्हल ऊँच नीच रे। मणि कादब लेपटाय रे, तैओ ने तनिक गुण जाय रे। अलि के कुसुम अनेक रे, मालति के अलि एक रे। काक कोइलि एक कांति रे, भेम्ह भ्रमर दुई भाँति रे। कह ‘बादरि’ अवधारि रे, सुपुरुष जन दुइ चारि रे। बारहमासाश् (1) चैत हे सखि मत्तकोकिल कुहुकि काम जगाव यो। कठिन श्याम कठोेर मानस ऋृतु बसन्त विदेष यो। बैषाख हे सखि देखि उपवन ललित कुसुम विकास यो। देखि निज कुच कुसुम मौलल रहत चित्त न थीर यो। जेठ हे सखि तेल चन्दन पंक लेप शरीर यो। बिन नाथ चन्दन शीतलादिक धघकि जारत देह यो। आषाढ़ हे सखि झमकि झमकत नीर बिजुरी जोर यो। देखि काँपत देह थर नयन धारा नोर यो। आयल साओन मेघ बरिसत घुमुड़ि घोर समीर यो। सुमरि यौवन उमड़ि आबत प्राणमति नहि पास यो। भादब जलधर धड़कि ठनकत खसल चैकि अचेत यो। काहि कहु अब श्याम बिनु सखि जात जीवन मोर यो। आस आसिन अन्त कय सखि बैसल कंत दुंरंग यो। शरद चन्द्रक चाँदनी देखि चित्त चंचल मोर यो। देखि कातिक नारि एकसरि तानि शर रतिनाथ यो। करत आंकुल जीव छनश्छन कठिन कन्त न बूझ यो। लबिजात धान समान अगहन कमल सन कुच मोर यो। झट नाथ-नाथ पुकार कय सखि पड़ल सेज अचेत यो। पूस ओस बेहोष भय सखि खसत प्रीतम पास यो। हम अकेलि सून पहु बिन काटब कोन विधि राति यो। माघहे सखि जाड़ लागत जुलुम करि गेल कंत यो। अंगश्अंग अनंग ज्वाला ताप तापित देह यो। रमानन्द रहु धीर कामिनि धीर धय मन मारि यो। आओत फागुन मिलत बालम खेलत हुनि संग फागु यो। (2) कहत मैना सुनू यो मुनि जन गौरी कोना रहत कुमारि यो। गौरी जोग बर खोजि आनू चढ़ल मास बैसाख यो। जेठ नारद फिरति चहु दिषि जोहल भंगिया भिखारि यो। कहथि नारद सुनहु त्रिभुवनपति चलह व्याहन आज यो। अखाढ़ हेमन्त घर बरियात लायल देखल सकल समाज यो। काज राज सब छोड़ि सखिसब देखु हर बरियात यो। सावन वर बौराह आयल बसहा पीठ असवार यो। एहन उमत वर हेमन्त लायल पैर फाटल बेमाय यो। भादब मैना भेलि व्याकुल धुनथि माथ कपार यो। घटक के हम की बिगाड़ल की विधि लिखल लिलाट यो। आसिन मैना गेलि अंगना मन दुख अगम अपार यो। आब हम विष घोरि पीअब मरब जल बिच जाय यो। कातिक शंकर भस्म तेजल कयल गंगा स्नान यो। रगड़ि चानन अंग लेपल भेल सुन्दर रुप यो। अगहन मैना भेलि हरसित लावथि गाइनि बजाय यो। चलह सखि सब गीत गाबह त्रिभुवनाथ जमाय यो। पूस सखि सब छोड़ि बैसलि देखथि रुप अनूप यो। चलह सखि सब करह मौहक देखि नैन जुड़य यो। माघ शंकर भेल व्याकुल जोहथि आक धथुर यो। एहन उमत वर हेमन्त लायल भाँग हुनक अधार यो। फागुन षिव सँ कहथि गौरी सुनू षिव अरजी हमार यो। एक बेरि भस्म उतारु शंकर देखत हेमन्तक समाज यो। चैत मैना भेलि हरसित पूरल मनक अभिलाष यो। भनहि विद्यापति ई पद गाओल मिलल त्रिभुवन नाथ यो। (3) अगहन सीता के विवाह, पूस कोवर तैयार। माघ सीरक भराय देव रधुवर जी के। फागुन फगुआ खेलायब, चैत फूल लोढ़ि लायब, बैषाख बेनिया डोलायब रधुवर जी के। जेठ घाम परे भारी, आषाढ़ वुन्द झरे सारी, सावन झूलबा लगा दे, रधुवर जी के। भादव राति अन्हार, आसिन करब सिंगार कातिक आवि गेल मिथिला रधुवर जी के। (4) कातिक अयले कलकतिया जोहन बटिया। अगहन चुड़वा कुटायब पूस दही पौरायब। फागुन फगुआ खेलायब चैत फूल लोढ़ि लायब। बैषाख बेनिया डोलायब जोहन बटिया। जेठ हेठ भऽ गमायब अषाढ़ घर चल जायब। सावन दुनु मिलि खेलब जोहन बटिया। भादब नहि घहराय आसिन आस लगायब। कातिक ऐलै कलकंतिया जोहन बटिया। छौमासाश्(1) साओन सर्व सोहाओन सखि हे फुलल बेलि चमेलि यो। रभसि सौरभ भ्रमर भ्रमि भ्रमि करय मधुरस केलि यो। आरे केलि करथु पहु मन दय सखि अधिक विरह मन उपजय। भादव घन घहराय दामिनि गरजि गरजि सुनाय यो। बरसु घन झहर बून्द रिमिझिमि मोहि किछु नहि भाय यो। आरे भामिनि भय घन दमसय सखि मुरुछि खसु महिमय। परिणाम कोन उपाय हे सखि करब कोन परकार यो। मास आसिन अधिक ज्वाला विरह दुख अपार यो। आरे कतेक सहब दुख पहु बिनु सखि ककरो नाह बिछड़ि जनु। नाह विछुड़ल मोर हे सखि होयत जीवक अन्त यो। अरुण कातिक धसिय धायब जतय लुबधल कंत यो। आरे कंत जोहय हम जायब सखि जतय उदेष हम पायब। अगहन हे सखि सारि लुबधल लबल जीवन मोर यो। योगिनि भय हम जगत जोहब जतय जुगल किषोर यो। आरे हमर प्रभु जौं अहोताह सखि कर गहि कंठ लगोताह। पूस धैरज धरय चाहिए भमर रहल विदेष यो। हुनि विदेषी सुखहि खेपत हमर तरुण वयस यो। आरे विदेसहि वैसि गमओताह सखि हमर गृह नहि अओताह। माध झिहिर पवन डोलय देह झाँझड़ मोर यो। हँसथि, बसन उधारि सखि सब कहथि मोहि विजोर यो। आरे शोक वियोग मनहि मन सखि चित्त नहि थिर रहे एको छन। (2) वैषाख मास तनि तलफत घाम चुबै अबिरल। वैसि बेनिया डोलायब कोठरिया मे। जेठ दहकत अकास, घाम सहलो न जात पैस बैसब भीतर मन्दिरिया मे। अषाढ़ वुन्द अपार पावस बरसे हजार देखि हरषथ अपन कोठरिया मे। साओन बरखा बहार, झुला करब तैयार झुला झुलबै हम फुलवरिया मे। भादब भरु गदी नार, नैया करब तैयार अहाँ झिझरी खेलायब नदिया मे। आसिन शरद बहार चाँदनी के झलकार रास रचालेब कंचन महलिया मे। कातिक दुतिया मनायब सबके एतहि बजायब करब सब सुख साज कोठरियामे। अगहन पन्चचमी मनायब नवका चड़बा कुटायब प्यारे परसि खुआयब ससुररिया मे। चैमासाश् (1) माध मोहन नेह लगायल अपने चलल परदेष यो। ओहि रे परदेषिया रामा ओतहि गमाओल हम धनि बाड़ि बयस यो। फागुन हे सखि आम मजरल कोइली सबद घमसान यो। कोइली शब्द सुनि हिया मोर सालय नैना सँ झहरय नोर यो। चैत हे सखि चित्त चंचल यौवन भेल जीवकाल यो। आन धन रहितय बेचि हम खइतौं ई धन बेचलो न जाय यो। बैषाख हे सखि विषम ज्वाला घाम सँ भीजल शरीर यो। रगड़ि चन्दन अंग लेपितहुँ जौं गृह रहितथि कन्त यो। (2) कैसे खेपव बिनु कामिनि दामिनि दमसय रे। सखि री सुखक मास अषाढ़ आस नहि पूरल रे। दादुर करत पुकार झिंगुर झंझकारत रे। सखी री सावन चहुँ ओर घटा मयूर बन कुहकत रे। भादव मे मेघ झंहरत मोर मन झहरत रे। सखी री हरि बिनु मंदिर शून गुण कत सुमिरब रे। ‘सूरदास’ प्रभु गावल सखी समुझाओल रे। सखी री धैरज धरु चहु मास आसिन हरि आओत रे। वसन्त (1) सरस वसन्त समय भेल सजनी गे दखिन पबन बहु धीरे। सपनहुँ रुप वचन एक भाखिय मुखा सँ दूर करु चीरे। तोहर बदन सन चान होथि नहि यदपि जतन विधि देथि। कय वेरि काटि बनाओल नव के तदपि तुलित नहि होथि। लोचन तूल कमल नहि भय सक से नहि के जग जाने। तै पुनि जाय नुकायल ज लमे पंकल एहि अपमाने। मदन बदन परतर नहि पावथि जब भरि तोहरहि जोहि। भनहि विद्यापति सुनु वर यौवति उपमा सुझय न मोहि। (2) समय वसन्त पिया परदेष असह सहब कत विरह कलेष सुमरि पहु मन नहि थीर मदन दहन तन दगध शरीर षीतल पंकज चम्पाक माल हृदय दहन करु विषधर ज्वाला श्रवण दहन करु कोकिल गान चान दहन तन अनल समान (3) रंगीली रंगश्महल मे खेलतु आज वसन्त। संगश्सखी श्रृंगारश्सजी सब सरस तरंग वसन्त। रंगीली... सुश्कर कनक पिचकारीश्धारी, सोहत श्री सिय कन्त। भीजतश्भूषणश्वसनश्रमणश्तन, अनुपमश्छवि दर्षन्त। रंगीली... तिरहुतश् (1) मधुपुर गेल मनमोहन रे मोर बिहरत छाती। गोपी सकल बिसरलनि रे जते छल अहिबाती। सुतल छलहुँ अपन गृह रे निन्द गेलौं सपनाइ। कर स छूटल परसमनि रे के लेल अपनाइ। कत सुमिरब कत झाँखब रे हम मरम गरानी आनक धन लय धनवन्ती रे कुबल भेलिरानी। (2) जखन चलल हरि मधुपुर रे सब सुरति निहारि। आब कोना रहब हरि बिनु रे झाँखथि ब्रजनारि। वन मे डोलय पिपर पात रे जल बहय सेमारि। हम धनि डोलिय पिया बिनु रे बिनु पुरुषक नारि। केहन कर्म विधि लिखलनि रे झाँखथि वृजनारी ळरि बिनु भूषण भार भेल रे पलंगा ने सोहाई। (3) सुतल छलहुँ हम घरवा रे गरवा भोतिहार। राति जखन भिनसरवा रे पहु आयल हमार। कर कोषल कर कपइत रे मुखचन्द्र निहारे। केहन अभागलि बैरिन रे भागल मोर निन्द। विद्यापति कवि गाओल रे धनि मन धरु धीर। समय पावि तरुबर फरु रे कतबो सिंचु नीर। बटगवनीश् (1) तरुणी वयस मोर बीतल सजनी गे पिया पिया बिसरल मोर नाम। कुसुम फुलीय फूल मौलल सजनी गे भ्रमरो ने लेल विश्राम। सिर सिन्दुर नहि भावय सजनी गे मुखहि खसय एहि ठाम। उठ दूत परम व्याकुल सजनी गे नयन ढ़रकि खसु वारि। अधरस ओतय गमाओल सजनी गे दय गेल सौतिनक बारि। युगल नयन मन व्याकुल सजनी गे थिर नहि रहय गेयान। विद्यापति कवि गाओल सजनी गे ई थिक दुखक निदान। (2) चानन बुझि हम रोपल सजनी गे भय गेल सिमरक गाछ सजनी गे। ताहि रे गमक पिया जागल सजनी गे। चलि भेल पिया परदेष सजनी गे। बारह बरस पर आयल सजनी गे, लायल कंगही सनेस सजनी गे। ताहि कंगही लय आयल सजनी गे, कय लेल सोलह श्रृंगार सजनी गे। खोंइछ भरि लोढ़लहुँ चंगेरी भरि सजनी गे, सब फूल सेजिया लगैब सजनी गे। फगुआश् (1) मिथिला मे राम खेलथि होरी। श् मिथिला मे... अतर गुलाब कुम कुम केषरि, रंग अबीर भरल झोरी। सखि सब सजि धजि रधुवर के देल अबीर भरल झोरी। होइछ बाद्य विधान विविधश्विधि नाचश्गान ओ झिकझोरी। मारथि मर्स पूर्ण पिचकारी राम सकुचि जाइछ गोरी। सुरश्गण सुमन गगन सौ उझलथि, अबीर गुलाल बीच घोरी। कूदथि बालक वृन्द मुदित मन, मिलाश्मिला निज-निज जोरी। धै फगुआ के रुप मिथिलापुर, घरश्घर मचि रहल होरी। ‘हरेकिृष्ण’ शोभा लखि सकुचित, शेषश्षारदाश्षत् जोरी। (2) गलिअन बिच धूम मचायो री, गलियन... ग्वालवाल संग लिये कन्हैया नित भोरे उठि आयो री। हाथ अबीर गुलाल पिचकारी सिर डारो री। वन्षी वीणा झाल बजाओ देत गारी गायो री। -गलियन...... (3) गोरी संग कृष्ण खेलय होरी ग्वाल वाल संग कृष्ण कन्हैया सुन्दर रंग भरी झोरी। बाजत आबत झाल मृदंग सब सब जन आबत रस बोरी। गिरिधर दास गाओल बाल संग युग युग जीबओ यह जोरी। गोरी संग... (4) परदेसिया लै अंगना निपावे गोरिया। परदेसिया... जब परदेसिया नगर बीच आयल खुटे खुट अंगना निपावे गोरिया। परदेसिया... जब परदेसिया आंगन बीच आयल रचि रचि केसिया बन्हावे गोरिया। परदेसिया... जब परदेसिया घर बीच आयल झाड़ि झाड़ि पलंग ओछावे गोरिया। परदेसिया... (5) परदेसिया के नारि सदा रे दुखिया। चारिम मास फागुन अब बीतल कहियो ने आयल पहुँ पतिया। श् परदेसिया.... पाचम मास चैत जब बीतल अपनो ने सूनल हुनि बतिया। श् परदेसिया... (6) होरी खेलत श्री रघुवर रसिया। धूम मचावत, डंफ बजाबत घाटश्बाट सब रोक लिया। श्री रघुवंषी छैल छबीले, श्री मिथिलेष दुलारी सिया। ललकारत दोऊ ओर परस्पर जीत लिया होरी जीत लिया अबीर उड़ावत रंग वरसावत जनक नगर के गलि गलिया। ‘प्रेमनिधि’ अबला प्रबला भऽ, उमड़ि चली हे रंगरलिया। (7) होरी मे लाज न करु गोरी। प्रेम ब्रजवासी तु गोरी भली बीनहै यह जोड़ी। जौ इससे सीधे नहि खेलहुँ मार मार कर वरजोरी। सुरदास निकले सब बन मे लिये जाय वन मे जोड़ी। चैताबरश् (1) कृष्ण तेजल मधुवनमा हो रामा कौन करनमा कृष्ण तेजल मधुवनमा। यमुना तट पर वंषी वट पर सेहो नहि लागत सोहनमा कौतुक हास रास वृन्दावन सेहो सब भेल सपनमा हो रामा कृष्ण तेजल मधुवनमा। जौं हम जनितौं कृष्ण नहि औता रहितौ अपन भवनमा। सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस को हरि मुख भेल सपनमा। हो रामा कृष्ण तेजल मधुवनमा। (2) चैत रे महिनमा पिया बिनु आबै नहि निंदिया, हो रामा... पिया परदेष गेल सुधि बुधि हरि लेल भुलि गेल घर के सुरतियाश् हो रामा पिया बिनु..... जब सुधि आबै पिया तोहरो सुरतिया कुहुकि उठय मोर छतियाश् हो रामा पिया... केहन कठोर भेल पिया के करेजवा एको नहि लिख भेजय पतियाश्हो रामा घर जब अइहे। पिया कोरा लै बैसिहें नखरा लगैंहें आधी रतियाश् हो रामा... कहत महानन्द सुनु हे सहेलिया ऐसे मे बितैं हें सारी रतियाश् हे रामा.... (3) डिम डिम डमरु बजाबै हो रामा, षिव रंगरसिया। अपने सदाषिव पूजा पर बैसता गौरी सँ टहल कराबै हो रामा... अपने सदाषि भाँग उपजावै गौरी सँ भाँग पिसाबै, हो रामा.... अपने सदाषिव बसहा चराबै गौरी सँ डोरी धरावै, हो रामा.... अपने सदाषिव माँगिश्माँगि आनथि, गौरी स धान कुटावै, हो रामा.... (4) रुसल पियबा मना दे कोइलिया तेरी मीठी बोलिया। सगर रैनि हम कतेक मनाओल ओ नहि मानल मोर बतिया। केओ नहि हितश्बंधु ककरा जगायब के पिया देत मनैया। आमक गाछ पर तोही जे कुहुकब हम कुहुकब दिन रतियाश् हो रामा... सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस को कओन हरल हुनि मतिया। हो रामा तेरी मीठी बोलिया (5) कौन कयल योग टोनमा, हो रामा सब गेल वनमा राम लखन सिय वनहि सिधारल, दषरथ तेजल परनमा, हो रामा.. मातु कौषिल्या रोदना पसारल सुन भेल नगर भवनमा, हो रामा.. तुलसदास प्रभु तुम्हरे दरस को, धन इहो कोप भवनमा, हो रामा.. झूलाश् (1) यमुना तीरे कदमक डारी झूला रेषम के डोर गे। षोभा देखि भेल चितबौरी ज्ञान हरन भेल मोर गे। एक दिष राधा एक दिष कन्हा दोउ कर झिकझोर गे। राधा वदनमा पर शोभे माला निरखत नंद किषोर गे। नभ धेरि अयलै कारी बदरिया भेलै गगन मे शोर गे। विरहिन के चित्त चंचल भेलइक नयना झहरे नोर गे। राधाकृष्ण युगल अति सुन्दर एक श्यामल एक गोर गे। (2) आयल सावनक मास, मन मे बढ़ल हुलास मनमा लागि गेलै वृन्दावन नगरिया मे। झुला परम अनमोल, लागत रेषमक डोर झूलत नन्द किषोर इजोरिया मे। सखियन संग राधा रानी से छवि कोना के बखानी सुन्दर बाजन बाजै हुनका पैजनिया मे। झूलवै मिलिकय सखी सहेली, सुमुखी राधा अलबेली झूलत राधे श्याम यमुना किनरिया मे। एक सखि लेने कर मे माला, कहाँ गेल नन्दलाला सूरदास पुछथिन्ह छोड़ि डगरिया मे। (3) झूला लगे कदम की डाली, झूले कृष्ण मुरारी ना। कौने काठ के बनल हिड़ोला कोन वस्तु के डोरी। झूला.. राध झूलय कृष्ण झुलावय बारीश्बारी ना। झूला.. छठि (1) अंगना मे पोखरी खुनायल छठि मइया औती आइ। दुअरा पर तमुआ तनायल छठि मइया औती आइ। अँचरा सँ गलिया बहारब तैपर पियरी ओढ़ायब छठि मइया औती आइ। (2) डोमिन बेटी सुप नेने ठाढ़ छै उगै हो सुरुज देव। अरघ केर बेर हो पूजन केर बेर मालिन बेटी फूल नेने ठाढ़ छै उगै हो सुरुज देव। अरघ केर बेर हो पूजन केर बेर केओ ने छै लेसबैया परमेसरी मैया सोना के दियरा मइया, पाटश्सुती बाती हे अबला नारी लेसबैया परमेसरी मइया निर्धन कोढ़ी बाटे-घाटे ठाढ़ छै उगै हो सुरुज देव। अरघ केर बेर हो पूजन केर बेर पान सुपारी पकवान नेने ठाढ़ छै उगै हो सुरुज देव। (3) हमरो पर होइयौ सहाय, हे छठि मइया हमरो पर होइयौ सहाय। चारि पहर राति जलश्थल सेबलौं सेबलौ छठि गोरथारि, हे छठि मइया। हमरो पर होइयौ सहाय। अपना ले मंगलौ अनश्धन लछमी जुगश्जुग मांगल अहिबात, हे छठि मइया हमरो पर होइयो सहाय। घोड़ा चढ़ै लेल बेटा एक मंगलौ हमरो पर होइयो सहाय। वयन बिलहै लेल बेटी एक माँगल माँगल पण्डित जमाय, हे छठि मइया हमरो पर होइयो सहाय। (4) केरवा जे फरल छै घौद सँ, ओइ पर सुग्गा मड़राय। मारबौ रे सुगवा धनुष सँ, सुगा खसल मुरुझाय। सुगनी जे कानय वियोग सँ, आदित होउ ने सहाय। काँचहि बाँस केर बहिंगा, ओइ मे रेषमक डोर भरिया जे फल्लाँ भरिया, भार नेने जाय छै बाटहि पूछै बटोहिया स, ई भार किनकर जाई। आन्हर होइबे रे बटोहिया ई भार छठि माई के जाइ। ई भार दीनानाथ के जाय। समदाउनश् (1) बड़ रे जतन सँ सिया जी के पोसल सेहो रघुवंषी नेने जाय। कौने रंग दोलिया कौने रंग ओहरिया लागि गेल बतीसो कहार। लऽ कऽ निकसल बिजुवन सखिया ओहि बन केओ ने हमार। केयो जे कानय राजमहल मे केओ कानय दरबार। केओ जे कानय मिथिला नगर मे जोड़ि सँ बिजोड़ि केने जाय। आजु धीया कोना अमा बिनु रहती छनश्छन उठति चेहाय। (2) भेल विवाह चलल षिवषंकर गौरी सहित कैलाष। बसहा पीठ षिव दोलिया पठाओल बाघ छाल पड़ल ओहार। बड़ रे जतन सँ गौरी के पोसल घृत मधु दूध पीआय। सोनाक मुरुति सन गौरी हमर छथि वर भेल तपसि भिखारि। हमर गौरी कोना तपोवन जैतीह झाँखथि राजदुलारि। (3) सुग्गा जौं पोसितहुँ भजन सुनविते धीया पोसि किछु नहि भेल। घीवक घैल जकाँ पोसलौं हे धीया बेटा जेँका कयल दुलार। सेहो धीया मोर सासुर जैतीह सुन भवन केने जाय। ओलतिक छाहरि जकाँ पोसलौं हे धीया मधुर जेँका राखल जोगाय। सेहो धीया मोर सासुर जैतीह सुन भवन केने जाय। (4) बारह बरस केर छल उमेरिया तेरहम बरस ससुरारि। कौने निरमोहिया दिनमा पठाओल कोन निरमोही मानि लेल। कोने निरमोहिया डोलिया पठौलक कौने निरमोही नेने जाय। ससुर निरमोहिया दिनमा पठौलक बाबा निरमोही मानि लेल। भैया निरमोहिया डोली पठौलकइ स्वामी निरमोही नेने जाय। कथी देखि धैरज धरबह हे सखिया कथी देखि रहब लोभाय। (5) जखन महादेव निज घर चललाह गौरी सहित कैलाष। बसहा चढ़ल षिव डोलिया पठौलनि बाघछाल कयल ओहार। घर सँ बाहर भेला हेमन्त ऋृषि भय गेल बाप पीठी ठाढ़। घर सँ बाहार भेलि माय मनाइनि सुसुकि बहाबथि नोर। सब दिन खाथि गौरी माखन मिसरी सक्कर करथि अहार। से गौरी कोना धतुर भाँग खयती आन की हयत आधार। परातीश् (1) उठि भोरे कहू गंगाश्गंगा। उठि भोरे कहू गंगाश्गंगा। छल एक पापी महाबली जाय मगह मरि गेल। ओकरा तनके कौओ कुकुर ने खाय, गिद्ध गीदर देखि डराय। उठि... गलि गेल माँस हाड़ भेल बाहर रोमश्रोम भेल विकलाई। कणिका एक उड़ि पद पंकज, सुर विमान लय धाई। उठि... पंछी एक उड़ल गंगा मे ऊपर पाँखि फहराई। देखू गंगाजी क महिमा जे ओ कोना तरि जाई। उठि... गेल बैकुण्ठ मुदित मन देखू, आरति सुर उतराई। भोलाजी गंगाक महिमा, कहइत अधिक लजाई। (2) कोन गति होयत मोर हो प्रभु कोन गति होयत मोर। जनम जनम हम पाप बटोरल कहिओ न भजलहुँ तोर। बेरि बेरि अँखिया कमल मुख हेरलहुँ सुधि नहि तोर एको बेर। अबहु सुमति गति दिय त्रिभुवन पति शरण रहब हम तोर। तुलसीदास प्रभु तुम्हरे दरस के दुख संकट हरु मोर। (3) रथ पर निरखत जात जटाईश् रथ पर निरखत जात। रथ के उपर बैठ वैदेही नाजत निठुराई। रथ पर... है कोइ वीर राम के दलमे रथ के ले बिलमाई। कोन वंष के सूत रघुराई कौन हरने आई। श् रथ पर ... सूर्यवंषक राजा नृप दषरथ तनिके सुत रघुराई। तनिके प्रिया नाम जानकी निषचर हरने जाइ। श् रथ पर... करुण वचन जब सूनेउ जटाई रथ चढ़ि कयल लड़ाई। अग्निवाण मारल सो धरती गिरल मुरदाई - रथपर मन सँ आषिष देल माता जानकी प्राण रहे घट छाई। एहि बाटे आओता रघुवर ताकय सव बात कहव बुझाई। रथ पर... (4) जागहु राम कृष्ण दोउ मूरति दषरथ नन्द दुलारे। उदय होय उदयाचल आवत जोति पलंग पसारि। जय जयकार करत सब आयो सुर नर मुनि तुअ दुआरे। जा.... क्रीट मुकुट मकराकृत कुण्डल मुरली धनुष सम्हारि। कब देखिहौं नयनन दोउ मुरति सन्तन केर रखबारे। - जा.... पायो दरस परस पद पंकज पापी पुरुष निवारे। रहे एक आस दास तुलसी के तीन लोक के न्यारे। सीता पति राधा वर जोरी लेइय सुधि न हमारे। - जागहु.... (5) जुनि करु राम वियोग हे जननी। जुनि.. सुतल छलहुँ सपन एक देखल, देखल अवधक लोक हे जननी। - जुनि.... दुइ पुरुष पथ अबइत देखल, एक श्यामल एक गोर हे जननी। - जुनि.... कंचन गढ़ हम जरइत देखल, लंका मे उठल किलोल हे जननी। - जुनि..... स्ेातु वान्ह हम बन्हाइत देखल, समुद्र मे उठल हिलोर हे जननी। - जुनि.... नचारीश् (1) रहबौ हम तोहरे नगरिया हो भंगिया, रहबौ हम तोहरे नगरिया। झारी मझारी मे कुटिया बनायब, सब दिन बहारब डगरिया हौ भ्ंगिया। भांगो धथुर पीसि तोहरा पियायब, भोर साँझ दुपहरिया, हो भंगिया....। भांगक बाड़ी मे बसहा चराएव, जीवन भरि करबौ चकरिया, हो भंगिया... धथुर के फूल बेलपतिया चढ़एव, चानन चढ़ायब केषरिया, हो भंगिया.... कतबो हटेला सँ हम नहि हटबह, कहियो ने छोड़वह दुअरिया, हौ भंगिया...। सब दिन नवीने नचारी सुनाकय अप्पन बितायब उमरिया, हौ भंगिया... नेको अनेको जनम मे बसविहह, अपन घरक पछुअरिया, हो भंगिया... ‘मधकर’ सतत बाट हम तोरे ताकब कहियो त फेरबऽ नजरिया, हौ भंगिया...। (2) आइ मयना के अंगना सोहाग बहिना। जेना जूटल छै शोभा के खान बहिना। गौरी ओ शंकर युगल रुप मोहन। कए के सकै अछि बखान बहिना। घरश्घर नगर ओ डगर पर विराजय। तानल वसन्त वितान जहिना। छवि के छटा पर कपिक घन घटा अछि। तै पर स्वर लय के जुटान बहिना। मोदो प्रमोदो प्रमोदो पाबि उमड़ल। उदधि देखि पूनम के चान जहिना। षिवराति षिवमय करय विष्व भरि कैं। ‘मधुकर’ सब फागुन के मास एहिना। (3) गौरी तोर अंगना बड़ अजगुत देखल तोर अंगना। एक दिस बाघ सिंह करै हुलना दोसर बड़द छैन सेहो बउना। पैंच उधार लय गेलहुँ अंगना सम्पत्ति के मध्य देखल भाँग घोटना। खेती ने पथारी सिव के गुजर कोना मंगनी के आस छनि वरिसो दिना। कातिक गणपति दुइ जन बालक एक चढ़ै मोर एक मूस लदना। भनहि विद्यापति सुनु उदना दारिद्र हरण करु घैल शरणा। गौरा... (4) नारद बहुत बुझा हम कहलहुँ गौरी लय एहन वर अनलहुँ यो। हमरो गौरी छथि बारह बरख केर बुढ़वा वर लय अयलहुँ यो। नारद बड़ अजगुत अहाँ कयलहुँ। गौरी लय एहन बर लयलहुँ यो। तीनि भुवन बर कतहुँ न भेटल तँ घर घूरि फिरि अबितहुँ यो। बेटि गौरी छथि अल्प वयस केर कनिको नहि बिचारलहुँ यो। भनहि विद्यापति सुनिय मनाइनि त्रिभुवन पति लय अयलहुँ यो। (5) जोगि एक ठाढ़ अंगनमा मे। भिखियो ने लिअय बाटो नहि छोड़य गौरी कोना जयती अंगनमा मे। देह अछि सह सह विषधर शतश्षत भूतश्प्रेत छनि संगवा मे। बरहा चढल षिव डमरु बजाबथि जटा बीच गंग तरंगना मे जोगि एक ठाढ़ अंगनमा मे। सामाक गीतश् (1) डाला लय बहार भेली बहिनो से फल्लाँ बहिनो फल्लाँ भैया लेल डाला छीनि, सुनु राम सजनी.... समुआ बैसल तोहें बाबा बड़ैता तोर बेटा लेल डाला छीनिश् सुनु राम सजनी... कथी केर आहे बेटी डालवा तोहर छौ कथी बान्हल चारु कोनश् सुनु राम सजनी... काँचहि जे बाँस केर डलवा यौ बाबा बेलीश्चमेली चारु कोनश् सुनु राम सजनी ... जौं तोरा आहे बहिनो डलवा जे दय देब हमरा के की देब दानश् सुनु राम सजनी.... चढबाक घोड़ा देव पढ़वाक पोथी देब छोटकी ननदिया देब दानश् सुनु... (2) चानन बिरिछ तर भेलि बहिनो से फल्लाँ बहिनोश् ताकथि बहिनो भाइ केर बटिया एहि बाटे औता भैया, से फल्लाँ भैया .. दखि लेबनि भरि अँखिया पैर पकड़ि जनु कानू हे बहिनो, से फल्लाँ वहिनो फाटत मोर छतिया। (3) हमर भैया कोना आबै हाथी चढ़ल भैया हँसैत आवै पान खय मुह रंगैत आबै रुमाल लय मुह पोछेत आबै। दरपन लय मुह देखैत आबै चुगिला कोना के आवै गदहा चढ़ल हिहिआइत आबै कोइला सँ मुह रंगैत आबै गुदरी सँ मुह पोछैत आबै। (4) गे माइ कौने भइया जयता अटनाश् पटना कोने भैया जयता मुंगेर। कोने भइया जेता दिल्ली कलकत्ता कौने भइया जयता रंगून। कौने भइया लौता आलरिश्झालरि कौने भइया लौता पटोर कौने भइया लौता झिलमिल केचुआ। कौन भइया लौत कामी सिन्नुर कौने बहिना पहिरथि आलरिश् झालरि कौने बहिनी पहिरु पटोर। कौने बहिना पहिरथि झिलमिल केचुआ कौने भौजी कामि सिन्नुर। युगेश्युगे लीबथु इहो सब भैया, भौजी के बाहु अहिवात। (5) नदिया के तीरे तीरे फल्लँा भैया खेलथि सिकार। कहि पढ़ोलनि भाइ फल्लाँ बहिनो के समाद भैया आओताह पाहुन हे। कोठी नहि मोरा आरब चाउर बसनो नहि बीड़ा पान हे। कौन विधि राखब माइ हे, फल्लाँ भाइक मान हे। हाट बजार सँ चाउर मंगायब, तमोली सँ बीड़ा पान हे। पटना शहर से धोतिया मंगायब, राखब भैया के मान हे। (6) गाम के पछिम ठुठि पाकड़ि रे ना ना रे ताहि पर बाबा बसेरा लेल ना। खेलितेश्धुपैते गेली फल्लाँ बहिनी ना। एक कोस गेली बहिनी दू कोस ना। तेसर कोस बहिनी हेराय गेलौ ना। तकैत तकैत गेलथिन फल्लाँ भौया ना। एक वन तकलनि भैया दुइ वन ना। कतहुँ ना भेटय बहिनिया मोर ना। देहरि बैसल भैली खुष भेली ना। ना रे भेल ननदी हेराय गेली ना। (7) गाम के अधिकारी भैया हे भैया हाथ दस पोखरी खुना दिय। चम्पा फूल लगा दिय हे। फुलवा लोढ़ैत बहिनी आयल हे। घमि गेल सिर के सिन्नुर नयन भरु काजर हे। छता लेने आवथि भैया से फल्लाँ भैया हे। बैसह बहिनी एहि छाह आषीष देहु हे। युगेश्युगे जीवथु फल्लाँ भैया तोरो अहिबात बढ़ू हे। राग संबंधी ललित राग मेश् मेघ समय पर जलदान करे। पृथ्वी धनश्धान्य सँ भरल रहे। पिसुन पाबि जनु नृपतिक काने। गुन बुझि भूप करथु सनमाने। चिरै जिबथु हिन्दुपति देओ। गुन कीरथि गाबहि सब केओ। राजविजय राग मेश् जय जय परिजात तरुराज। पाओल पुरुब पुन दरसन आज। सरगक भूखन गुनक निवास। सुरहुक तोहें परिपूरह आस। सेवक सब तुअ दानव देबा। मानव जानव की तुअ सेवा। सुरमति निअ कर करथि किआरी। सची देथि सुरसरि जल ढ़ारी। सुमति उमापति भन परमाने। माहेसरि देइ हिन्दुपति जाने। आसावरी राग मेश् जायब हरिक समाजे। पाओब नयन सुख आजे। कि आरेश्ध्रुवमद। जोगहुँ न जानिअ जन्ही। दिठीभरि देखब तन्ही। ब्रह्म सिव सेव जाही। काहि भजब तेजि ताही। मनहि भगति लेब माँगी। समय परमपद लागी। हिन्दुमति जिउ जाने। महेसरि देइ बिरमाने। सुमति उमापति भाने। पुनमति भजु भगमाने। वसन्त राग मे अनगिनत किंषुक चारु चम्पक वकुल बकुहुल फुल्लियाँ। पुनु कतहुँ पाटलि पटलि नीकि नेवारि माधबि मल्लियाँ। कर जोरि रुकुमिनि कृष्ण संग वसन्त रंग निहार हीं। रितु रभस सिसिर समापि रसमय रमथि संग बिहार हीं। अति मज्जु बन्जुल पुन्ज मिन्जल चारु चूअ बिराजहीं। निज मधुहिं मातलि पल्लबच्छवि लोहितच्छवि छाजहीं। पुनु केलि कलकल कतहु आकुल कोकिल कुल कूजहीं। जनु तीनि जग जिति मदननृपमनि विजयराज सुराजहीं। नव मधुर मधु रसु मुगुध मधुकर निकर निक रस भावहीं। जनि मानिनि जन मान भन्जन मदन गुरुगुन गावहीं। बराडीराग मेश् अब तरु अबनी तेजि अकास। न थिक दिवाकर न थिक हुतास। धोती धबल तिलक उपबीत। ब्रह्म तेज अति अधिक उदीत। बैनब दण्ड वेद कर सोभ। आवथि नारद दरसन लोभ। परम जुगुत तिनि जगतक हीत। ब्रह्मासुत मोर सम्भुक मीत सुमति उमापति भंन परमान। जगमाता देवि हिन्दुपति जान। पंचम राग मेश् सखि हे रभस रस चलु फुलवारी। तहँ मिलत मोहि मदनमुरारी। किनक मुकुट महँ मनि भल भासा। मेरु सिखर जनि दिनमनि बासा। सुन्दर नयन बदन सानन्दा। उगल जुगल कुबलय लय चन्दा। बनमाला उर उपर उदारा। अन्जनगिरि जनि सुरसरि धारा। पिअर बसन तन भूखन मनी। जनि नव घन उगल दामिनि। जीवन धन मन सरबस देबा। से लय करब हरि चरनक सेवा। सुमति उमापति मन परमाने। जगमाता देइ हिन्दुपति जाने। नटराग मेश् कि कहब माधब तनिक बिसेसे। अपनहु तनु धनि पाब कलेसे। अषनुक आनन आरसि हेरि। चानक भरम कोप कतबेरी। भरमहु निअ कर उर मर आनी। परम तरस सरसीरुह जानी। चिकुर निकर निअ नयन निहारी। जलधर जाल जानि हिअ हारी। अपन बचन पिकरब अनुमाने। हरि हरि तेहु परितेजय पराने। माधव अबहु करिअ समधाने। सुपुरुष निठुर ने रहय निदाने। सुमति उमापति भन परमाने। माहेसरि देइ हिन्दुपति जाने। मालव राग मेश् हरि सउँ प्रेम आस कय लाओल। पाओल परिभब ठामे। जलधर छाहरि तर हम सुतलहुँ आतप भेल परिनामे। सखिहे मन जनु करिय मलाने अपन करम फल हम उपभोगव तोहें किअ तेजह पराने। श् ध्रुवम् पुरुब पिरिति रिति हुनि जउँ विसरल तइओ न हुनकर दोसे। कतन जतन धरि जउँ परिपालिअ साप न मानय पोसे। कवहु नेह पुनु नहि परगासिअ केवल फल अपमाने। बेरि सहस दस अमिअ भिजाबिअ कोमल न होअ परवाने। श् ध्रुवम् गुरु उमापति पहु देव दरसन मान होएव अबसाने। सकल नृपतिपति हिन्दुपति जिउ महरानि विरमाने। ध्रुवम्। केदारराग मेश् मानिनि मानह जउँ मोर दोसे। साँति करह बरु न करह रोसे। भौंह कमान बिलोकन बाने। बेधह बिधुमुखि कय समधाने। पीन प्योधर गिरिबर साधी। बहु मास धनि धरु मोहि बाँधी। की परिनति भय परसनि होही। भूखन चरनकमल देह मोही। सुमति उमापति मन परमाने। जगमाता देइ हिन्दुपति जाने। भल्ला राग मेश् माधब करह हमर समधाने। देह मोहि पारिजात तरु आने। एहिखन तोरित करिअ परयाने। नहि तइँ हमर अबस अबसाने। एहि परि हमर पुरत अभिमाने। हयत हसी नहि होअ अपमाने। सुमति उमापति भन परमाने। पटमहिखी देह हिन्दुपति जाने। विभास राग मेश् सहस पूर्णससि रहओ गगन बसि निसिबासर देओ नन्दा। भरि बरिसओ विस बहओ दहओ दिस मलय समीरन मनदा। साजनि आब जिबन किअ काजे पहु मोहि हिन करु अपजस जग भरु सहय न पारिअ लाजे। ध्रुवम् कोकिल अलिकुल कलरब आकुल करओ दहओ दुहु काने। सिसिर सुरभि जत देह दहओ तत हनओ मदन पचबाने। सुकवि उमापति हरि होए परसन मान होएत समधाने। सकल नृपति पति हिन्दुपति जिउ महेसरि देइ विरमाने। ध्रुवम् ............................ महिमा दुनूक अनूप, सब आनन्दित भूप। आइ पूरल मनोरथ आनन्दित होय लय। लावा छिटबा कालक गीतश् मैना देखहुँ जाय, त्रिभुवन पति भेल अहाँक जमाय। षिव गौरी मिलि लावा छिड़िआय। भूखल वासुकि बिछिश् बिछि खाय। सोनाक बट्टा भरि घोरल कसाय। उमत सदाषिव भसम लोटाय। जटा मे देल अंकुसी लगाय। झिकतहि सुरसरि गेलि बहराय। विआहक गीतश् मचिया बैसल तोहे राजा हेमन्त ऋष्शि, सुनू अहाँ बचन हमार यो। गौरी कुमारि कते दिन रहती, ई नहि उचित विचार यो। एतबा वचन जब सुनल हेमन्त ऋष्शि, पंडित अनलनि बजाय यो। आबथु पंडित बैसथु पलंग चढ़ि, मुनि देथु धीया के विआह हे। एक पोथी तकलनि दोसर पोथी तकलनि, तेसर मोथी तकलनि पुरान यो। ओहि रे जंगल मे योगी एक वसै छथि, तनिके संग धिया के विआह यो। अरही वन के खड़ही कटाओल, वष्न्दावन बिट बाँस यो। देव पितर मिलि माड़व ठानल, होबय लागल धिया के विआह यो। एक दिस बैसला नारद ब्राह्मण, दोसर दिषि गौरीक बाप यो। बाघक छाल पर वैसला महादेव, होअय लागल धिया के विआह यो। कन्यादान कय उठला हेमंत ऋष्शि, मोती जेंका झहरनि नोर यो। किए जे खेलौ बेटी किए पहिरलौ, कथी ले भेलहुँ वीरान यो। खीर जे खेलौ बाबा चीर पहिरलौ, सिन्दुर लै भेलहुँ वीरान यो। देहरि छेकक गीतश् छोड़ब नहि दुआरि सुनियौ रघुनन्दन। जौं रघुनन्दन चलला कोवर घर सरहोजि छेकल दुआरि। नेग बिना दय पैर बढ़ायब देब गारि हजार यौ, सुनियौ रघुनन्दन कृ पाँच पदारथ हरि जीक संग मे एक सरहोजि एक सारि यौ, सुनियौकृ जौं नहि देता सात पदारथ बेचता बहिन भाय यौ। सुनियौकृकृ   बरियाती खेबा कालक गीतश् (1) समधि गारि नइ दै छी विनती करै छी, समधिक माए पितिआइन गोअरबा के दै छी। गोअरबा सँ दूध मंगबै छी, लके समधि जिमबै छी। समधिकृ समधि के दादी नानी ल बनियाँ के दै छी बनियाँ सँ चीनी मंगा समधि के दै छी। श् समधिकृकृ समधि क मौसी पीसी ल मड़बड़िया के दै छी। मड़बड़िया स धेती कीनि समधि के दै छी। श् समधि गारिकृकृ (2) निज कुल कामिनि समधिन छिनरो महिमा अगम अपार। सगर नगर घर एको ने छोड़लनि के थिक अपन परार। बनियाँ मे जे फल्लाँ के गछलनि जिनका टाका हजार। पढ़ूआ मे जे डाक्टर के गछलनि जे भोकतनि सूई बारम्बार। राजपूत मे जे फल्लाँ के गछलनि जनिका ढ़ालश्तलवार। गोआर मे जे फल्लाँ के गछलनि जिनका धेनु हजार। सोनरा मे जे फल्लाँ के गछलनि जनिका जेवर भण्डार। तमोलिन मे जे फल्लाँ के गछलनि के करतनि उपर लाल।



2. रमानन्द झा रमण

1
सगर राति दीप जरय
मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति
डा.रमानन्द झा ‘रमण‘
बहुत दिनक बाद मिथिलाक ग्रामांचल मे सगर राति दीप जरयक
आयोजन भेल अछि। ओना एहिसँ पूर्व हटनी (19.05.2001) आ ओहूसँ पहिने
घोघरडीआ ( 22.10.1994) आ’ डयैाढ ़(29.04.1990)मे आयोजित भेल छल।
शहरे शहरे बौआए सगर राति गाम दिस एक बेर आएल अछि। एहि लेल
डा. अषोक कुमार झा ‘अविचल’धन्यवादक पात्र तँ छथिहे। हुनक गौंआँ
लोकनि सेहो ओहिना धन्यवादक पात्र छथि।
मुजफ्फरपुरसँ रहुआ-संग्राम धरिक सगर रातिक यात्रामे कतेको बेर
निराशाजनक स्थिति आएल। कतेको गोटय एहि रति जग्गा पिकनीकके ँ
बन्द करबाक परामर्श देल, मुदा काठमाण्डूसँ कोलकाता, विराटनगरसँ
वनारस जनकपुरसँ राँची, देवघरसँ पूर्णियाँ, सुपौलसँ जमशेदपुर धरि सगर
रातिक दीप जरैत रहल। नव नव कथाकार अपन नवनव कथाक संग अपना
के ँ जोडै़त गेलाह। विभिन्न स्थानक मातृभाषा अनुरागीक स्नेह आ सहयोग
एकरा भेटैत गेलैक। सगर रातिक दीप अवाधित रूपे ँ जरैत रखबा लेल ओ
ओलोकनि टेमी बातीक ओरिआओन सुरुचिपूर्वक करैत रहलाह। जे सब
एकरा अजगूत बुझैत छलाह, सहटि लग आबि अपने आॅंखिए देखल, विश्वास
भेलनि।
सगर राति दीप जरय कोन पृष्ठभूमिमे आ प्रयोजनवश शुरू भेल
छल, आयोजन हेतु कोन कोन शर्त आवश्यक छलैक, तकरा स्पष्ट करबाक
हेतु हम प्रथम तीन संयोजक द्वारा प्रेषित आमंत्रण पत्रक सारांश प्रस्तुत
करब।
सगर राति दीप जरयक अवधारणाक जन्म किरण जयन्तीक अवसर
पर 01 दिसम्बर,1989के ँ लोहनामे साहित्यकार लोकनिक बीच भेल। मुदा
साकार भेल प्रभास कुमार चैधरीक माध्यमसँ। ओहि अवधारणा के ँ साकार
करबाक उद्देश्यसँ प्रभास कुमार चैधरी साहित्यकार लोकनिकेँ आमन्त्रित करैत
छओ जनवरी 1990क पत्र द्वारा अनुरोध कएने छलाह-आदरणीय, अपने के ँ
विदित होएत जे किरण जयन्तीक अवसरपर लोहनामे एकत्रित साहित्यकार
लोकनि निर्णय लेलनि जे पंजाबी साहित्यकार लोकनि द्वारा आयोजित ‘दीवा
जले सारी रात‘ जकाँ भरि राति कथा पाठक आयोजन घूमि-घूमि कए
विभिन्न स्थान पर साहित्यकार लोकनिक आवास पर होअय। पहिल आयोजन
24 दिसम्वर,1989 के ँ कटिहारमे अशोकक डेरा पर राखल गेल छल जे
स्थगित भए गेल एक दुखद घटनाक कारणे ँ।
आगू ओ लिखैत छथि-हमरा पत्र द्वारा ई समाचार भेटल आ एहि
आयोजनक प्रारम्भ मुजफ्फरपुरमे करबाक आग्रह सेहो। हम एहि निर्णयक
स्वागत करैत दिन राति कथा पाठ आ परिचर्चाक अष्टयामक आयोजन 21
जनवरी 1990, रविदिन राखल अछि। सादर आमंत्रित छी। अपनेक
उपस्थितिये पर आयोजनक सफलता निर्भर अछि। अपने 21 तारीखके ँ भोरे
दस बजे पहुँचि जाए हमर कार्यालय जकर पाछाँ हमर निवास सेहो अछि। ई
स्थान मुजफ्फरपुरक प्रसिद्ध देवी स्थानक सामने अछि। कोनो तरहक
असुविधा नहि होएत। 21 तारीखके ँ दिनुका भोजनोपरान्त कार्यक्रम शुरु
होएत, जे प्रातधरि चलत। कथापाठ (नव लिखल कथा ) ओ ओहिपर विशेष
चर्चा होएत।
अपन अएबाक सूचना पत्र द्वारा पहिनहि दए दी तँ विशेष सुविधा
रहत। अगिला कार्यक्रमक स्थान आ तिथिक निर्णय एहीठाम कार्यक्रममे लेल
जाएत। डेओढ, कटिहार, दरभंगा,पटना आ जनकपुरमे कार्यक्रम करबाक
विचार अछि। अहाँक आगमनक प्रतीक्षा मे‘‘- प्रभास कुमार चैधरी।
एही प्रकारे ँ सगर रातिक अवधारणाके ँ प्रभास कुमार चैधरी साकार
कएल। हुनक पत्नी ज्योत्सना चैधरी करतेबताक आंगनक गृहपत्नी जकाॅं
आगत साहित्यकारक स्वागत करैत भरि राति टेमी उसकबैत रहलीह। पति
द्वारा आयोजित साहित्यिक कार्यक्रममे पत्नी द्वारा भरि राति टेमी उसकाएब
आ अतिथिक स्वागतमे तत्पर रहबाक दोसर आ सेहो दू बेर उदाहरण प्रस्तुत
कएलनि अछि काठमाण्डूक दूनू आयोजनमे श्रीमती रूपा धीरू। पहिल सगर
रातिक आयोजनमे रमेश (थाक), शिवशंकर श्रीनिवास (बसात मे बहैत लोक),
विभूति आनन्द (अन्यपुरुष), अशोक (पिशाच),सियाराम झा ‘सरस‘ (ओहि
साँझक नाम), प्रभास कुमार चैधरी (खूनी) रवीन्द्र चैधरी, आदि कथा पढल।
डा.नन्दकिशोर हिन्दी कथाक पाठ कएने छलाह। अध्यक्षता कएल रमानन्द
रेणु। कथाकार लोकनिक अतिरिक्त कथाचर्चामे भाग लेलनि जीवकान्त,

2
भीमनाथ झा, मोहन भारद्वाज, डा. रमानन्द झा ‘रमण‘। पठित कथापर चर्चाक
उपरान्त डा.रमण अपन कथा विषयक आलेख शैलेन्द्र आनन्दक कथा यात्राक
पाठ कएल।
साहित्यकारक स्वाभिमानक रक्षाक हेतु चर्चाक क्रममे निर्णय भेल जे
समाद पर सगर रातिक आयोजनक भार लेबाक अनुरोध स्वीकार नहि कएल
जाएत। आमंत्रित कएनिहार लेल स्वयं उपस्थित भए सहभागी बनब आवश्यक
कए देल गेल। एकर निर्वाह अद्यावधि भए रहल अछि। एक शब्दमे कहि
सकैत छी, इएह शर्त सगर रातिक प्राण थिकैक। जीवकान्तक अनुरोध पर
दोसर सगर राति डेओढमे तीन मासक बाद करबाक निर्णय भेल।
एहिठाम हम दोसर (डेओढ) आ तेसर (दरभंगा)क संयोजक द्वारा
प्रेषित पत्रक अंश प्रस्तुत करब जाहिसँ सगर रातिक लक्ष्य तँ स्पष्ट होएबे
करत पत्र लिखबाक क्रम कोन स्थितिमे सम्प्रति अछि, सेहो बुझा जाएत।
डेओढ आयोजनक संयोजक जीवकान्त लिखैत छथि-मैथिली भाषाक
कथाकार लोकनि एकठाम बैसथि अपन नव रचना पढथि आ ओहि पर टीका
विश्लेषण करथि कथाक गति देबामे सामूहिक प्रयन्त करथि। एहि उद्देश्यसँ
कथा रैलीक आयोजन डेओढमे कएल जाइछ-सृजनात्मक उपलब्धि लेल
एकरा स्मरणीय बनेबा मे अपन योगदान करी।
दोसर आयोजनमे प्रो.रमाकान्त मिश्र, कीर्तिनारायण मिश्र, डातारानन्द
वियोगी, नवीन चैधरी आदि संग भए गेलाह। डा.भीमनाथ झा आ
प्रदीप मैथिलीपुत्र दूनू गोटे संयुक्तरूपे ँ आयोजनक भार लेल जे श्री
विजयकान्त ठाकुरक सौजन्यसँ चिनगी मंच द्वारा दरभंगामे सम्पन्न भए
सकल। तेसर सगर रातिक संयोजक डा.भीमनाथ झा लिखैत छथि-पत्र
पत्रिकाक एहि संक्रान्ति कालमे साहित्यमे संवादहीनताक स्थिति आबि गेल
अछि, कथाक स्थिति तँ आर दयनीय। स्पष्टतः कथा लेखनमे गतिरोध देखल
जा रहल अछि। एकरे दूर करबाक इच्छुक किछु युवा साहित्यकर्मी कथा
संवाद लेल गोष्ठीक आयोजनक निर्णय लेलनि।
दरभंगाक आयेाजनमे एकटा नव अध्याय लिखाएल। से थिक एहि
अवसर पर पोथीक लोकार्पण। सगर रातिक अवसर पर लोकार्पित पोथीक
नामावली विवरण मे देल गेल अछि। तथापि ई उल्लेखनीय अछि जे एहि
अवसर पर लोकार्पित होअए बला पहिल पोथी थिक पण्डित श्री गोविन्द
झाक कथा संग्रह सामाक पौतीं।
प्रभास कुमार चैधरी, जीवकान्त आ भीमनाथ झाक पत्रसँ सगर
रातिक आयोजनक, लक्ष्य आ कोन परिस्थितिमे सगर राति दीप जरय सन
कार्यक्रम शुरू भेल छल, स्पष्ट अछि। सगर रातिक नियमक अनुसार
दरभंगाक आयोजनमे चारिम सगर राति तीन मासक बाद जनकपुरमे डा.
धीरेन्द्रक अनुरोध पर आयोजित करबाक निर्णय भेल। मुदा कोनो कारणवश
आयोजनमे विलम्ब होइत देखि पण्डित दमनकान्त झाक पटना आवास पर
पण्डित श्रीगोविन्द झाक संयोजकत्वमे चारिम आयोजन भेल। प्रसिद्ध
कथाकार उपेन्द्रनाथ झा ‘व्यास‘ अध्यक्षता कएल आ कथा पाठ कएल। निशा
भाग रातिमे व्यासजी अध्यक्षताक भार राजमोहन झाके ँ सौपि देने छलाह।
प्रदीप बिहारी पहिल बेर एहीठाम सम्मिलित भए अगिला आयोजन बेगूसरायमे
करबाक भार लए लेलनि । दमन बाबू आ व्यासजी नहि छथि। दूनू गोटे
मोन पड़ि रहल छथि। प्रभास कुमार चैधरीक अन्तिम सहभागिता बेगूसरायमे
सम्पन्न उनतीसम सगर रातिमे छल। डा. धीरेन्द्र अन्तिम बेर बिट्ठो मे कथा
पढ़ने छलाह। वनारसमे सगर रातिक उदघाटन कएने छलाह हिन्दीक
प्रख्यात साहित्यकार ठाकुर प्रसाद सिंह। एहिठाम हमर आँखिक समक्ष हुनका
लोकनिक स्मृति साकार भए गेल अछि।
ओना मुजफ्फरपुरसँ प्रभास कुमार चैधरीक संशेजकत्वमे सगर
रातिक यात्रा आरम्भ भेल छल । मुदा केन्द्र रहल पटने। पटनामे सात खेप
सगर राति अयोजित भेल अछि। सगर रातिक यात्राक विस्तृत वर्णन आ
खण्ड खण्डमे विश्लेषण प्रस्तुत अछि। ओकर संक्षिप्त उल्लेख प्रस्तुत अछि।
कटिहार सगर रातिमे नवानीमे आयोजनक निर्णय भेल छल। संयोजक मोहन
भारद्वाज प्रो. सुरेश्वर झाके ँकथाकार रूपमे प्रस्तुत कएल। ओतय श्यामानन्द
चैधरी आ झंझारपुरक तात्कालीन डी.एस.पी. सरदार मनमोहन सिंह
सम्मिलित भेलाह। ओ बरोबरि सम्मिलित होइत रहलाह। पंजाबक कलमके ँ
मिथिलाक फूलबाड़ीमे चतरल देखि प्रमुदित होइत छलाह। सुरेश्वर झा डाराम
बाबूक सौजन्यसँ सकरीमे आयोजन कएल। सकरीमे ए.सी.दीपक
अएलाह। नेहरामे आयोजन भेल। नेहरामे मन्त्रेश्वर झा सम्मिलित भेलाह।
विराटनगरसँ जीतेन्द्र जीत अएलाह। नेहरामे सगर रातिक अवसरपर पठित
कथाक एक प्रतिनिधि संग्रह प्रकाशित करबाक निर्णय भेल। डा.तारानन्द
वियोगी एवं रमेश सहर्ष दायित्व ग्रहण कएल। कथा संग्रह श्वेत पत्र
प्रकाशित भेल। श्वेत पत्र मे पैटघाट धरि पठित कथासँ बीछल कथा संगृहीत

3
अछि। सगर राति दीप जरय कार्यक्रमके ँजीतेन्द्र जीत नेहरासँ
विराटनगर,नेपाल पहुॅंचाओल। विराटनगरसँ बनारस आ बनारससँ पटना।
पटनामे बुद्धिनाथ झा, अर्धनारीश्वर, रा.ना.सुधाकर केदार कानन, अरविन्द
ठाकुर संग भेलाह तॅं सगर राति सुपौल पहुॅंचि गेल। सुपौलसँ
बोकारो,ओतयसँ पैटघाट आ पैटघाटसँ रमेश रंजन जनकपुरधाम लए गेलाह।
जनकपुरधामसँ इसहपुर। इसहपुरसँ श्यामानन्द चैधरी झंझारपुर आनल।
ओतयसँ घोघरडीहा, बहेरा सुपौल आ फेर सुपौल सँ धीरेन्द्र प्रेमर्षि काठमाण्डू
लए गेलाह।काठमाण्डूसँ रामनारायण देव राजविराज आ ओतयसँ कोलकातामे
प्रभास कुमार चैधरी सगर रातिक रजत जयन्ती आयोजित कएल। कहबाक
तात्पर्य जे नव-नव लोकक अबैत रहलासँ सगर रातिक आयोजन बढैत गेल
। किन्तु जतय कतहु अग्रिम प्रस्तावक संकट होइत छलैक प्रभास जी आ
फेर कमलेश जी ठाढ़ छलाह। किछु आयोजकक अनुरोध बरोबरि अशोकजीक
पाकेटमे पेंडिंग रहैत छलनि। बेगूसरायसँ श्याम दरिहरे संग भेलाह अछि।
ओहो कौखन आ कतहु आयोजन लेल तत्पर छथि।
जेना जेना किछु लोक संग होइत गेलाह अछि, ओहिना किछु गोटे
अपनाके ँ असम्वद्ध सेहो करैत गेलाह अछि। एकर मुख्यतः तीनि टा कारण
अछि-
1.अस्वास्थ्य,
2.पठित कथाक प्रतिक्रिया पर खौझा कए असंगत प्रहार, आ‘
3.प्रतिक्रिया सूनि हतोत्साहित होएब, एवं
4.कार्यालयीन व्यस्तता।
एहि बीच नियमित एवं सक्रिय रूपसँ सहभागी बनैत कतेको
साहित्यकार अस्वास्थ्य अथवा वार्धक्यक कारणे ँ आब सम्मिमलित नहि भए
पाबि रहल छथि। जाहि मे प्रमुख छथि पण्डित श्री गोविन्द झा, रमानन्द रेणु,
सोमदेव, जीवकान्त, मोहन भारद्वाज आदि। पठित कथा पर अपन स्पष्ट
मंतव्यसँ चर्चाके ँ जीवन्त बनौनिहार प्रो. रमाकान्त मिश्र कथाकार शिवशंकर
श्रीनिवासक प्रतिक्रियासँ आहत भेला पर सकरीक बाद अपनाके ँ पूर्णतः
समेटि लेलनि। विविधा पर साहित्य अकादमीक पुरस्कारक विरोधमे केदार
काननक नेतृत्वमे कलमल सुपौलक साहित्यकारक प्रतिक्रियाक कारणे ँ डा.
भीमनाथ झा जाएब छोड़ि देलनि। जे प्रभास जीक मनौअलि पर पण्डित
गोविन्द झाक गाम इसहपुर जएबाक लेल तैआर भेल छलाह। तकर बाद
कमे ठाम गेलाह अछि। श्वेतपत्र मे अपन कपचल कथासँ आहत जीतेन्द्र
जीत अपन बाट काटि लेलनि। किछु गोटे एहि आशाक संग संवद्ध भेल
छलाह जे लोक प्रशंसाक महल ठाढ कए देत, तकर पूर्ति नहि भेला पर
उत्साह कमि गेलनि। किछु गोटेक मास्टरी नव आगन्तुक लेल आतंककारी
एवं अनुत्पादक भए गेल अछि।
सगर रातिक प्राण थिक अप्रकाशित आ अपठित कथाक पाठ। ओहि
पर श्रोता अपन प्रतिक्रिया व्यक्त करैत छथि। ई प्रतिक्रिया तात्कालिक होइछ
ते ँ सम्भव रहैत छैक जे पुनः सुनला वा पढला पर भिन्न प्रतिक्रिया हो। एहि
सक्रियताक तीन प्रकारक सकारात्मक प्रभाव अछि-
1.रचनात्मक सक्रियतामे वृद्धि,
2.कथाक शिल्पमे सुधारक अवसर आ‘
3.व्यक्तित्वमे सहनशीलताक गुण बढेबाक अवसर।
पहिल सगर रातिमे प्रायः आठ टा कथाक पाठ भेल छल। कथाक
संख्या क्रमशः बढैत गेल। सबसँ बेसी कथाकारक सहभगिता महिषीमे भेल
छल। एहि बीच जतेक कथा संग्रह छपल अछि, अधिकांश कथा सगर रातिक
अवसर पर पठित आ चर्चित अछि। वयोवृद्ध साहित्यकार श्यामानन्द ठाकुर
बहेरामे संग भेलाह। ओहिठामसँ संग छथि। हुनक सक्रियताक अनुमान एहीसँ
कए सकैत छी जे ओ प्रत्येक आयोजन लेल दू टा कथा लिखैत छथि।
एमहर आबि पठित कथाक चर्चाक स्वरूप बदलि गेल अछि। पहिने पठित
कथाधरि अपन प्रतिक्रिया सीमित राखल जाइत छल। मुदा आब व्यक्त
विचारके ँ कटबा पर विशेष ध्यान रहैत अछि। एहिसँ पक्ष विपक्षक स्थिति
बनि जाइछ। कतेकोठाम अप्रीतिकर स्थिति उत्पन्न भए गेल अछि । चर्चा
बहकय नहि एहि लेल प्रभासजी पूर्ण सतर्क रहैत छलाह। हुनक अभाव खूब
खटकैत रहैत अछि।
कवि सम्मेलन मनोरंजनक हेतु आयोजित होअय लागल अछि।
रचनात्मक स्पर्धा अथवा सक्रियताक महत्व गौण छैक। ते ँ कवि लोकनि
गओले गीत गबैत छथि। मुदा सगर रातिक अवसर पर अप्रकाशित एवं
अपठित कथा पढबाक वाध्यताक कारणे ँ रचनात्मक सक्रियता बढल अछि।
एक बेर व्यासजी गोविन्द बाबूके ँ परामर्श दैत कहने छलथिन्ह जे धूमि घूमि
भरि राति जागब अहाँक स्वास्थ्य लेल ठीक नहि अछि। गोविन्द बाबूक उत्तर
छल जे हमरा एहिसँ उर्जा प्राप्त होइत अछि। आॅंकडा़ कहैत अछि ओ सबसँ

4
बेसी भरि राति ओएह बैसलाह अछि तथा सबसँ बेसी हुनके व्यक्तिगत
पोथीक लोकार्पण एहि अवधिमे भेल अछि। ई थिक सगर रातिक रचनात्मक
प्रभाव। रचनाकारके ँ उर्जस्वित रखबाक महान अवसर।
कवि सम्मेलनमे आयोजकके ँ विदाइक व्यवस्था करय पडै़त छनि ।
सगर राति एहि व्याधिसँ मुक्त अछि। सहभागी सत्यनारायणक पूजाक हकार
जकाँ अबैत छथि आ भोर होइते घूमि जाइत छथि। एहिमे व्यावसायिकता
नहि अछि, ई मातृभाषा प्रेमक सन्देश दैत अछि।
सगर रातिक आयोजन विभिन्न स्थान पर भेलासँ स्थानीय विद्वत
समाज आकर्षित होइत छथि। एकर प्रभाव ओहि स्थानक मैथिलीक सक्रियता
पर पड़ैत अनुभव कएल गेल अछि। सगर राति दीप जरय समानधर्माके ँ भरि
राति एकठाम रहबाक अवसर दैत अछि। विचारक आदन प्रदानक केन्द्र स्वतः
मैथिली भाषा आ साहित्य भए जाइत अछि। एहिसँ परिचय आ अनुभवक
क्षेत्रक विस्तार होइछ। मैथिलीक रचनाकारमे भावात्मक संवद्धता बढैत अछि।
सगर राति दीप जरयक निरन्तर आयोजनसँ मैथिली कथा लेखनक
क्षेत्रमे शान्तिपूर्ण क्रान्ति आबि गेल अछि। आन भाषाभाषी आ सात्यिकारक
बीच मैथिलीक कथाकारक प्रतिष्ठा बढ़ल अछि। विशेषतः एहि हेतु जे
मैथिलीक कथाकार दूर-दूरसँ अपन पाइ खर्च कए पहुॅचैत छथि। कथा पढैत
आ सुनैत छथि। अपन कथा पर लोकक प्रतिक्रिया धैर्यपूर्वक सुनैत छथि। आ
फेर अग्रिम आयोजनमे सम्मिलित होएबाक संकल्पक संग घूमि जाइत छथि।
जे सगर राति कथाकार लेल कल्पित भेल छल,समाजक सुधी समाजक
अन्तःकरण मे प्रवेश कए मैथिली भाषा साहित्यक पक्षमे अनुकूल वातावरण
बनेबामे सार्थक भूमिकाक निर्वाह कए रहल अछि। जहिआ सगर राति प्रारम्भ
भेल छल आ एखनुक जे स्थिति अछि ओहि मे गुणात्मक आ परिमाणात्मक
दूनू प्रकारक परिवर्तन स्पष्ट अछि। विकासक ई दिशा आ गति निश्चिते शुभ
लक्षण थिक। एहि शुभ लक्षणक उदाहरण तँ इएह थिक जे दरभंगाक पहिल
आयोजनमे पहिले पहिल दू टा पोथीक लोकार्पण भेल छल आ स्वर्ण
जयन्तीक अवसर पर 36 टा पोथी लोकार्पित भेल। विद्वानलोकनि कहि सकैत
छथि कोन भाषाक मंच पर एकबेर 36 टा पोथीक लोकार्पण भेल अछि।
दरभंगामे एकटा अमेरिकन नागरिक मैथिलीमे कथाक पाठ कएने छलाह।
सगर राति दीप जरयक दृष्टिसँ बोकरो उर्वर छल, एम्हर आबि राँची,
जमदेशपुर देवघर पूर्णियाॅं आदि स्थान मैथिली लेल जगरना कएलक अछि,
इहो शुभ लक्षण थिक।
मुदा, सगर रातिक लोकप्रियता आ बिना वर.विदाइक साहित्यकार
एवं साहित्यानुरागीक उपस्थितिक उपयोग कतहु कतहु कथा पाठ एवं ओहि
पर चर्चासँ भिन्न प्रयोजन सिद्धि लेल सेहो भए गेल अछि। जे सगर रातिक
मूल अवधारणाक अनुकूल नहि अछि। ओहिसँ बचबाक चाही।
सहरसामे दोसर खेप सगर रातिक आयेजन 21 जुलाई, 2007 के ँ
भेल छल। सगर राति आयोजनक एक प्रमुख आकर्षण अछि भेटघाँट।
ओहिसँ बाहरक साहित्यकार वंचित रहलाह। उपस्थितिक प्रसंग सूनि
जीवकान्त जी 22 जुलाई, 2007क अपन पोस्ट कार्डमे लिखलनि अछि-
‘सहरसा कथा गोष्ठीक खबरि भेल। कथा गोष्ठी भूतकालक वस्तु
भेल। लेखन काज लेखक सभ छोड़ने जाइत छथि। सेमिनार, तकर प्रचलन
बढ़ल अछि। टी.ए./डी.ए./भेटघाँट ई सभ भए गेल तँ बुझू जे लेखकीय
अस्मिताक अहंकार पुष्ट भेल आ‘ एक दोसराके ँ बल देल।
सरकारी मान्यताक बाद भाषामे अनेक राजरोग उत्पन्न होइत छैक।
मैथिली निरपवाद रूपे ँे पहिनेसँ बेसी रोगाहि भेल छथि। जिबैत रहओ।‘
हमरा विश्वास अछि सगर रातिक नियमित आयोजन मैथिलीके ँ
राजरोगसँ मुक्त रखबामे सफल होएत।
साहित्य अकादेमी सँ वर्ष 2007 लेल पुरस्कृत प्रहरी प्रदीप बिहारीक
कथा संग्रह सरोकारक प्रायः समस्त कथा सगर राति दीप जरयक अवसर
पर लोक सुनने अछि। आ‘ ओहि पर अपन-अपन प्रतिक्रिया व्यक्त कएने
अछि। सगर रातिक ई पहिल उपलब्धि थिकैक। एहि उपलब्धि पर मैथिली
एहि शान्ति क्रान्तिक एक प्रतिभागीक रूपमे गर्व अनुभव करैत छी आ‘
कामना करैत छी इतिहास दोहराइत रहय। -
सम्पर्क-फलैट सं.75ए, रिजर्व बैंक स्टाफ क्वार्टर्स, राजेन्द्रनगर,
पटना-800016,फोन-0612-2664502 मो-9334335482

21.01.1990-पहिल सगर राति दीप जरय,मुजफ्फरपुर
64म-सगर राति दीप जरय
मैथिली कथा लेखनक क्षेत्रमे शान्त क्रान्ति
रहुआ-संग्राम-11 नवम्बर, 2008
डा.रमानन्द झा ‘रमण‘

सगर राति दीप जरय (कथा पाठ एवं परिचर्चा) संकलन-डा.रमानन्द झा ‘रमण‘
क.सं. स्थान तिथि स्ंायोजक अध्यक्षता/उदघाटन पेाथी लेाकार्पण ल्ेाखक लेाकार्पणकर्ता अन्य
1 2 3 4 5 6 7 8 9
1 मुजफ्फरपुर 21.01.1990 प्रभास कुमार चैधरी रमानन्द रेणु - - शैलेन्द्र आनन्दक कथा
यात्रा-डा.रमानन्दझा रमण’
2 डेओढ़ 29.04.1990 जीवकान्त प्रभास कुमार चैधरी - - - -
3 दरभंगा 07.07.1990 डा.भीमनाथ झा/प्रदीपमैथिली पुत्र,
व्यवस्था-विजयकान्त ठाकुर
गोविन्द झा
1.सामाक पौती
2.मोम जकाॅं बर्फ जकाॅं
गोविन्द झा
अमरनाथ
डा.मुनीश्वर झा
प्रभासकुमारचैधरी
4 पटना 03.11.1990 गोविन्द झा
व्यवस्था-दमनकान्त झा
उपेन्द्रनाथ झा‘व्यास’
एवं राजमोहन झा
- - - -
5 बेगूसराय 13.01.1991 प्रदीप बिहारी प्रो.रमाकान्त मिश्र 3.हमर युद्धक साक्ष्य मे डा.तारानन्द वियोगी उपेन्द्र दोषी -
6 कटिहार 22.04.1991 अशोक उपेन्द्र दोषी 4.ओहि रातुक भोर
5.अदहन
अशोक
शिवशंकर श्रीनिवास
डा.भीमनाथ झा
डा.रमानन्दझा रमण
विभूति आनन्दक कथा
यात्रा-डा.रमण
7 नवानी 21.07.1991 मोहन भारद्वाज प्रो.सुरेश्वर झा 6.समाड. रमेश कुलानन्द मिश्र -
8 सकरी 22.10.1991 प्रो.सुरेश्वर झा
व्यवस्था-डा.राम बाबू
ए.सी.दीपक 7.साहित्यालाप डा.भीमनाथ झा गोविन्द झा
-
9 नेहरा 11.10.1992 ए.सी.दीपक मन्त्रेश्वर झा - - - -
10 विराटनगर 14.04.1992 जितेन्द्र जीत डा.गणेश प्रसाद कर्ण
उद- गोविन्द झा
- - - नेपालमे मैथिली कथा -
डा.रमण
11 वाराणसी 18.07.1992 प्रभास कुमार चैधरी मायानन्दमिश्र/गंगेश गुंजन
उद-ठाकुर प्रसादसिंहएवं
पं.रमाकान्त मिश्र
- - - -
12 पटना 18.10.1992 राजमोहन झा स्ुाभाषचन्द्र यादव - - - -
13 सुपौल 09.01.1993 केदार कानन बुद्धिनाथ झा 8.पुनर्नवा होइत ओ छौंड़ी विभूति आनन्द महाप्रकाश -
14 बोकारो 24.04.1993 बुद्धिनाथ झा गोविन्द झा - - - -
15 पैटघाट 10.07.1993 डा.रमानन्द झा‘रमण‘ प्रो.उमानाथ झा 9.विद्यापतिक आत्मकथा गोविन्द झा प्रभासकुमारचैधरी -
16 जनकपुरधाम 09.10.1993 रमेश ंरंजन गोविन्द झा
उद-डा.रामावतार यादव
10.श्वेतपत्र
11.मिथिलावाणी-पत्रिका
12.गामनहि सुतैत अछि
13.मर्सिनी-उपन्यास
स.ंवियोगी एवं रमेश
मिलाप,जनकपुरधाम
महेन्द्र मलंगिया
डा.अरुणकुमार झा
डा.धीरेन्द्र
धूमकेतु
गोविन्द झा
डा.रामावतार यादव
-
17 इसहपुर 06.02.1994 डा.अरविन्द कुमार ‘अक्कू’ डा.भीमनाथ झा - - - -
18 सरहद 23.04.1994 अमियकुमार झा प्रेमलता मिश्र ‘प्रेम’ - - - -
19 झंझारपुर 09.07.1994 श्यामानन्द चैधरी जीवकान्त - - - -
20 घोघरडीहा 22.10.1994 जीवकान्त राजमोहन झा 14.कथा कुम्भ स्ंा.बुद्धिनाथ झा गोविन्द झा -
21 बहेरा 21.01.1995 कमलेश झा श्यामानन्द ठाकुर
उद-चन्द्रभानु सिंह
15.सत्य एकटा काल्पनिक
विजय
सारस्वत जीवकान्त -
22 सुपौल,दरभंगा 08.04.1995 कमलेश झा प्रो.रामसुदिष्ट राय ‘व्याधा
उद-गोविन्द झा
- - - -
23 काठमांडू 23.09.1995 धीरेन्द्र प्रेमर्षि डा.धीरेन्द्र 16.नख दर्पण गोविन्द झा डा.यादव -
24 राजविराज 24.01.1996 रामनारायण देव डा.धीरेन्द्र
उद-डा.योगेन्द्र प्र.यादव-
मुख्य-गजेन्द्रनारायणसिंह,
मन्त्री, नेपाल सरकार
- - - -
25 कोलकाता
रजत जयंती
28.12.1996 प्रभास कुमार चैधरी गोविन्द झा
उद-यमुनाधर मिश्र
17.निवेदिता
18.कथाकल्प
सुधांशु‘शेखर’ चैधरी
डा.देवकान्त झा
गोविन्द झा
प्रभासकुमारचैधरी
-
26 महिषी 13.04.1997 डा.वियोगी/रमेश-
प्रायोजित
मायानन्द मिश्र 19.अतिक्रमण
20.हस्तक्षेप
21.शिलालेख
22.परिचिति
डा.तारानन्द वियोगी
डा.तारानन्द वियोगी
डा.तारानन्द वियोगी
सुस्मिता पाठक
गोविन्द झा
कुलानन्द मिश्र
सुभाषचन्द्र यादव
मोहन भारद्वाज
-
2
सगर राति दीप जरय (कथा पाठ एवं परिचर्चा)
कसं.
स्थान तिथि स्ंायोजक अध्यक्ष पेाथी लेाकार्पण ल्ेाखक लेाकार्पणकर्ता अन्य
1 2 3 4 5 6 7 8 9
27 तरौनी 20.06.1997
यात्रीजन्मदिन
शोभाकान्त जीवकान्त - - - -
28 पटना 18.07.997 प्रभास कुमार चैधरी हरिनारायणमिश्र/रामचन्द्र खान 23.समानान्तर रमेश प्रभास कुमार चैधरी -
29 ब्ेागूसराय 13.09.1997 प्रदीप बिहारी प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ 24.कुक्करूकू आ कसौटी चन्देश प्रभास कुमार चैधरी प्रभास कुमार चैधरीक
अन्तिम सहभागिता
30 खजौली 04.04.1998 प्रदीप बिहारी रमानन्द रेणु - - - -
31 सहरसा 18.07.1998 रमेश डा.महेन्द्र 25.ओना मासी डा.देवशंकर नवीन कुमारी ऋचा -
उद-गोविन्द झा 26.चानन काजर डा.देवशंकर नवीन मायानन्द मिश्र -
27.प्रतिक्रिया रमेश गोविन्द झा -
32 पटना 10.10.1998 श्याम दरिहरे राजमोहन झा
उद-गोविन्द झा
28.भरि राति भोर के.डी.झा,श्यामदरिहरे एवं प्रदीप
बिहारी
उपेन्द्रनाथझा‘व्यास’
33 बलाइन, नागदह 08.01.1999 पदम सम्भव जीवकान्त - - - -
34 भवानीपुर 10.04.1998 डा.जिष्णु दत्त मिश्र कामिनी 29.काल्हि आ आइ डा.धीरेन्द्र जीवकान्त -
35 मधुबनी 24.07.1999 सियाराम झा ‘सरस‘
व्यवस्था-डा.कुलधारी सिंह
राजमोहन झा
उद-डा.जयधारी सिंह
30.काजे तोहर भगवान शैलेन्द्र आनन्द विभूति आनन्द -
36 अन्दौली 28.10.1999 क्मलेश झा चन्द्रभानु सिंह - - -
37 जनकपुरधाम 25.03.2000 रमेश रंजन डा.धीरेन्द्र
उद-डा.राजेन्द्र विमल
- - - -
38 काठमांडू 25.06.2000 .धीरेन्द्र प्रेमर्षि डा.रमानन्द झा‘रमण‘ 31.मकड़ी प््रादीप बिहारी महेन्द्र मलंगिया
उद-महेन्द्र कुमार मिश्र, सांसद 32.मिथिलांचलक लोक क्रथा डा.गंगा प्रसाद अकेला डा.रमानन्दझा‘रमण‘
33.शिरीषक फूल-‘अनुवाद अकेला डा.रमानन्दझा‘रमण‘
34.हम मैथल छी-कैसेट सियाराम झा‘सरस‘ डा.रामावतार यादव
35.मंडनमिश्र अद्वैतमीमांसा रमेश/दीनानाथ/सुरेन्द्रनाथ डा.रामावतार यादव
39 धनबाद 21.10.2000 श्याम दरिहरे एवं रामचन्द्र लालदास राजमोहन झा
उद-कीर्तिनारायण मिश्र
36.मनक आड.नमे ठाढ़ डा.भीमनाथ झा राजमोहन झा
40 बिटठो 21.01.2001 डा.अक्कू बलराम 37.मातवर अशोक डा.धीरेन्द्र म्ैाथिली कथाक
व्यवस्था-प्रो.विद्यानन्द झा उद-कुलानन्द मिश्र 38.दृष्टिकोण सुरेन्द्रनाथ डा.भीमनाथ झा समस्या डा.भीमनाथ झा
41 हटनी,घोघरडीहा 19.05.2001 प्रो.योगानन्द झा/अजित कुमार
आजाद
सोमदेव - - - -
42 बोकरो 25.08.2001 गिरिजानन्दझा‘अर्धनारीश्वर दयानाथ झा 39.निष्प्राण स्वप्न दयाकान्त झा हरेकृष्ण मिश्र
व्यवस्था-मिथिला सां.परिषद उद-हरेकृष्ण झा,भा.आ.सेवा 40मिथिलादर्पण(1925/2001) पुण्यानन्दझा
स.डारमानन्द झा ‘रमण‘
फूलचन्द्र मिश्र ‘रमण‘
43 पटना
किरण जयन्ती
01.12.2001 अशोक सोमदेव 41.प्रलाप गोविन्द झा सोमदेव
च्ेातना समिति, पटना 42युगान्तर विश्वनाथ गोविन्द झा
43एकैसम शताब्दीकघोषणा पत्र रमेश/श्याम दरिहरे/मोहन यादव राजमोहन झा
44 राँची 13.04.2002 कुमार मनीष अरविन्द साकेतानन्द 44चानन घन गछिया विवेकानन्द ठाकुर मोहन भारद्वाज
उद -परमानन्द मिश्र 45.शुभास्ते पन्थानः परमानन्द मिश्र साकेतानन्द
45 भागलपुर 24.08.2002 धीरेन्द्र मोहन झा योगीराज 45.कथा सेतु स्ंा.प्रशान्त डा.बेचन
उद-डा.बेचन 47.प्ृाथा नीता झा राजमोहन झा
48.आउ, किछु गप्प करी कुलानन्द मिश्र डा.करुणाकर झा
3
सगर राति दीप जरय (कथा पाठ एवं परिचर्चा)
क.सं. स्थान तिथि स्ंायोजक अध्यक्ष पेाथी लेाकार्पण ल्ेाखक लेाकार्पणकर्ता अन्य
1 2 3 4 5 6 7 8 9
46 विद्यापतिभवन,
पटना
16.11.2002 अजित कुमार आजाद मोहन भारद्वाज
उद.राजनन्दन लाल दास
49.काठ विभूति आनन्द डा.तारानन्द वियोगी -
50.एक फाॅंक रौद योगीराज गोविन्द झा -
51.तीन रंग तेरह चित्र डा.सुधाकर चैधरी सोमदेव -
52.उदयास्त धूमकेतु सोमदेव -
53.सांझक गाछ राजकमल,
सं.डा.दे.नवीन
रामलोचन ठाकुर -
54.सर्वस्वांत सकेतानन्द सोमदेव -
55.अभियुक्त.. राजमोहन झा सोमदेव -
56.यात्री समग्र सं.शोभाकान्त गोविन्द झा -
57.मैथिलीबाल साहित्य डा.दमन कुमार झा गोविन्द झा -
58.ज्ीम ब्वसवदपंस च्मतपचीमतलरू
प्उंहपदह डपजीपसं ; 1875.1955द्ध
डा.पंकज कुमार झा डा.हेतुकर झा -
59.मैथिल समाज
पत्रिका, नेपाल
स.ंधीरेन्द्र प्रेमर्षि - -
47 कोलकाता 22.01.2003 कर्णगोष्ठी, कोलकाता डा.रमानन्द झा‘रमण‘
उद-रमानन्द रेणु
60.आत्मालाप गोविन्द झा रमानन्द रेणु मैथिली कथाकवर्तमान
समस्या-.डा.वियोगी
48 खुटौना 07.06.2003 डा.महेन्द्रनारायण राम सोमदेव/उद-खुशीलाल
झा एवं रामलोचन ठाकुर
61.लाख प्रश्नअनुत्तरित रामलोचन ठाकुर सोमदेव
49 बेनीपुर 20.09.2003 कमलेश झा डा.फूलचन्द्र मिश्र‘रमण‘
उद-प्रो.रामसुदिष्ट राय ‘व्याधा‘
- - - -
50 दरभंगा
स्वर्ण जयन्ती
21.02.2004 डा.अशोक कुमार मेहता गोविन्द झा
उद-चन्द्रनाथ मिश्र‘अमर‘
62.दिदबल प्रभास कुमार चैधरी गोविन्द झा -
63.चितकावर हंसराज सोमदेव -
64.गंगा यन्त्रनाथ मिश्र गोविन्द झा -
65बाबाक विजया उमाकान्त मार्कण्डेय प्रवासी -
66.सरिसब मे भूत श्याम दरिहरे राजमोहन झा -
67.गहवर डा.महेन्द्रनारायण राम जयनारायण यादव -
68.हाथी चलय बजार डा.देवशंकर नवीन राजमोहन झा -
69.उगैत सूर्यक धमक सियाराम झा‘सरस’ डा.रमानन्द झा‘रमण‘ -
70.आदमी के ँ जोहैत कीर्तिनारयण मिश्र मोहन भारद्वाज -
71.ओना कहबा लेल बहुत
किछु हमरा लग
कुलानन्द मिश्र कीर्तिनारयण मिश्र -
72.गाछ झूलझूल जीवकान्त गोविन्द झा -
73.खंजन नयन निरंजन अनंत बि.लाल.इन्दु’ चन्द्रनाथ मिश्र‘अमर‘ -
74.हम भेटब मार्कण्डेय प्रवासी गोविन्द झा
75.चिन्तन प्रवाह डा.धीरेन्दनाथ मिश्र्र राजमोहन झा
76.दुर्वासा जयनारायण यादव गोपाजी त्रिपाठी
77.पाथर पर दूभि रमेश डा.शिवशंकर श्रीनिवास
78.कोशी घाटी सभ्यता रमेश डा.शिवशंकर श्रीनिवास
79जागि गेल छी डा.महेन्द्र ना.राम डा.रामदेव झा
4
सगर राति दीप जरय (कथा पाठ एवं परिचर्चा)
क.सं. स्थान तिथि स्ंायोजक अध्यक्ष पेाथी लेाकार्पण ल्ेाखक लेाकार्पणकर्ता अन्य
1 2 3 4 5 6 7 8 9
50 दरभंगा 21.02.2004 डा.अशोक कुमार मेहता गोविन्द झा
उद-चन्द्रनाथ मिश्र‘अमर‘
80.हमरा मोनक खंजन चिडैया फूलचन्द्र मिश्र प्रवीण‘ मार्कण्डेय प्रवासी
81.जयमाला जयानन्द मिश्र चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर‘
82.माटिक आबाज मंजर सुलेमान मोहन भारद्वाज
83.इजोरियरक अंगैठी मोर स.ं माला झा अशोक
84.बेसाहल डा.रमानन्द झा‘रमण मार्कण्डेय प्रवासी
85.यदुवर रचनावली डा.रमानन्द झा‘रमण गोविन्द झा
86सगरराति दीप जरयक इतिहास डा.रमानन्द झा‘रमण रमेष
87.अभिज्ञा डा.फूलचन्द्र मिश्र‘रमण‘ डा.रमानन्द झा‘रमण
88.विमर्श डा.भीमनाथ झा डा.देवेन्द्र झा
89.स्मरणक संग डा.विभूति आनन्द रतीष चन्द्र झा
90.कथा काव्य आ द्वादशी डा.अरुण कुमार कर्ण रमानन्द रेणु
91.तात्पर्य डा.अशोक कुमार मेहता अंजलि मेहता
92हेमलेट प््रोा.रमाकान्त मिश्र नीलमणि बनर्जी
93.लोरिक मनियार चन्दे्रश गोविन्द झा
94.कनुप्रिया अनु.श्याम दरिहरे श्यामसुन्दर मिश्र
95.मन्दाकिनी प्रभास कुमार चैधरी चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर‘
96.सीता व्यथा कथा अनन्त बि.लाल दास‘
इन्दु’
डा.रामदेव झा
97.नागार्जुन के उपन्यास मोहित ठाकुर डा.सुरेश्वर झा
98.ैमसमबजमक च्वमउे व ि।उंत रमम म्ुारारि मधुसूदन ठाकुर .
99.अंतरंग हिन्दी पत्रिका.मैथिली
विशेषाक
स.ंप्रदीप बिहारी रमानन्द रेणु
51 जमशेदपुर 10.07.2004 डा.रवीन्द्र कुमार चैधरी स्ुारेन्द्र पाठक
उद-राजनन्दनलाल दास
मु.अति..सत्यनारायण लाल
- - - -
52 राॅंची 02.10.2004 विवेकानन्द ठाकुर डा.रमानन्द झा‘रमण 100.स्वास स्वास मे विश्वास विवेकानन्द ठाकुर डा.रमानन्द झा‘रमण
उद-राजनन्दन लाल दास 101.सम्पर्क-4 स.-सियाराम झा ‘सरस‘ राजनन्दन लाल दास
53 देवघर 08.01.2005 श्याम दरिहरे एवं
अविनाश
दयानाथ झा
उद-यन्त्रनाथ मिश्र
- - - -
54 बेगूसराय 09.04.2005 प्रदीप बिहार रामलोचन ठाकुर
उद-सत्यनारासयण लाल
102.भजारल डा.रमानन्द झा‘रमण कीर्तिनारयण मिश्र
103.सरोकार प्रदीप बिहार राजमोहन झा
104.औरत म्ेानका मल्लिक ज्योत्सना चन्द्रम
105.अन्तरंग पत्रिका स.ं प्रदीप बिहारी डा.आनन्दनारायण शर्मा
55 प्ूार्णियाॅं 24.06.2005 रमेश साकेतानन्द
56 पटना 03.11.2005 अजीत कुमार आजाद उद.गोविन्द झा 106.अतीतालोक गोविन्द झा राजमोहन झा
डा.फूलचन्द्र मिश्र ‘रमण’ 107.गामक लोक शिवशंकर श्रीनिवास डा.रमानन्दझा‘रमण’
108.मैथिली कविता संचयन सं.डा.गंगेशगंुजन छठज् गोविन्द झा
109.मैथिली कथासंचयन छठज् स.ंशिवशंकरश्रीनिवास राजमोहन झा
110.बड अजगुत देखल शरदिन्दु चैधरी फूलचन्द्र मिश्र ‘रमण’
111.किछ ुपुरान गप्प ,किछु
नव गप्प
कीर्तिनाथ झा गोविन्द झा
57 जनकपुरधाम 12.08.2006 रमेश रंजन महेन्द्रमलंगिया,उद-डा.रेवतीरमण
लाल वि.अ.-डा.रमानन्दझा‘रमण‘
- ’ - -
5
सगर राति दीप जरय (कथा पाठ एवं परिचर्चा)
क.सं. स्थान तिथि स्ंायोजक अध्यक्ष पेाथी लेाकार्पण ल्ेाखक लेाकार्पणकर्ता अन्य
1 2 3 4 5 6 7 8 9
58 जयनगर 02.12.2006 श्री नारायण यादव
अध्य.-डा.कमलकान्त झा
उदघाटन-रामदेव पासवान
मु.अ.-भगीरथप्रसाद
अग्रवाल
. . . .
59 बेगूसराय 10.02.2007 प्रदीप बिहारी नवीन चैधरी 112.स्नेहलता डा.योगानन्द झा डा.तारानन्द वियोगी
60 सहरसा 21.07.2007 किसलय कृष्ण उद.डा.मनोरंजन झा
अध्य.डा.रमानन्द झा‘रमण‘
113.अक्षर आर्केस्ट्रा अनु-प्रदीप बिहारी डा.रमानन्द झा ‘रमण‘
61 सुपौल 01.12.2007 अरविन्द ठाकुर उद-डा.धीरेन्द धीर
अध्य. अंषुमान सत्यकेतु
114.अन्हारक विरोध मे अरविन्द ठाकुर अजित कुमार आजाद
62 जमषेदपुर 03.05.2008 डा.रवीन्द्र कुमार चैधरी उद-विद्यानाथ झा‘विदित’
अध्यक्ष-विवेकानन्द ठाकुर
- - - -
63 राँची 19.07.2008 कुमार मनीष अरविन्द उद-.डा.विदित
अघ्य. विवेकानन्द ठाकुर
एवं डा.रमानन्द झा‘रमण’
115.समय षिला पर सुरेन्द्रनाथ डाविद्यानाथझा‘विदित’
64 रहुआ संग्राम 08.11.2008 डा.अषोक कुमार झा‘
अविचल’
1
सगर राति दीप जरय ( कथा पाठ एवं परिचर्चा) आयोजक- तीन वा बेशी बेर
प्रभास कुमार चैधरी कमलेश झा प््रादीप बिहारी श्याम दरिहरे रमेश
1.मुजफफरपुर 21.01.1990 1.बहेरा 21.01.1995 1.बेगूसराय 13.01.1991 1.पटना 10.10.1998 1.महिषी (सह) 13.4.1997
2.वाराणसी 18.7.1992 2.सुपौल 08.04.1995 2.बेगूसराय 13.09.1997 2.धनबाद 21.10.2000 2.सहरसा 18.7.1998
3.कोलकाता 28.12.1996 3.अन्दौली 28.10.1999 3.खजौली 04.04.1998 3.देवघर 08.01.2005 3.पूर्णियाॅं 24.6.2005
4.पटना 18.07.1997 4.बेनीपुर 20.09.2003 4.बेगूसराय 09.04.2005
5.बेगूसराय 10.02.2007
सगर राति दीप जरय ( कथा पाठ एवं परिचर्चा )-अध्यक्षता/उदघाटन मे तीन वा बेशी बेर
पण्डित गोविन्द झा राजमोहन झा रमानन्द रेणु डा.धीरेन्द्र डा.रमानन्द झा ‘रमण‘
1.दरभंगा 07.07.1990 1.पटना 03.11.1990 1.मुजफफरपुर 21.01.1990 1.काठमाण्डू 23.09.1995 1.काठमाण्डू 25.06.2000
2.बिराटनगर 14.04.1992 2.घोघरडीहा 22.10.1994 2.खजौली 04.04.1998 2.राजविराज 24.01.1996 2.कोलकाता 22.01.2003
3.बोकारो 24.01.1993 3.पटना 10.10.1998 3.कोलकाता 22.01.2003 3.जनकपुरधाम 25.03.2000 3.राॅंची 02.01.2004
4.जनकपुरधाम 09.10.1993 4.मधुबनी 24.07.1999 4.सहरसा 21.07.2007
5.सुपौल 08.04.1995 5.धनबाद 21.10.2000 5.राँची 19.07.2008
6.कोलकाता 28.12.1996
7.दरभंगा 21.01.2004
8.पटना 03.11.2005
सगर राति दीप जरयक अवसर पर आलेख पाठ
डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ डा.भीमनाथ झा डा.तारानन्द वियोगी
1.शैलेन्द्र आनन्दक
कथा यात्रा
1.मुजफफरपुर 21.01.1990 1.मैथिली कथाक समस्या बिट्ठो 21.01.2001 मैथिली कथाक वर्तमान
समस्या
कोलकाता 22.01.2003
2.विभूति आनन्दक
कथा यात्रा
2.कटिहार 22.04.1991
3.नेपालमे मैथिली
कथा
3.विराटनगर 14.04.1992
सगर राति दीप जरयक अवसर पर पठित
कथाक संग्रह
जतय एक सँ बेशी बेर आयोजित भेल अछि
नाम सम्पादक वर्ष 1.पटना 2.जनकपुरधाम 3.बोकारो 4.दरभंगा 5.राँची
1.श्वेत पत्र तारानन्द वियोगी/रमश 1993 1. 03.11.1990 09.10.1993 24.04.1993 07.07.1990 13.04.2002
2.कथा कुम्भ बुद्धिनाथझा/तुलानाथमिश्र 1994 2. 18.10.1992 25.03.2000 28.03.2001 21.02.2004 02.10.2004
3.कथादिशा महा
विशेषांक
प््रभासकुमार चैधरी/गंगेश
गुंजन
1997 3. 18.07.1997 12.08.2006 19.07.2008
4.भरि राति भोर के..डी.झा/श्याम दरिहरे प्रदीप
बिहारी
1998 .4. 10.10.1998 6.काठमाण्डू 7.कोलकाता 8.बेगूसराय 9.सहरसा
5एकैेसम शताब्दीक
घोषणा पत्र
रमेश/श्याम
दहरहरे/मोहनयादव
2001 5. 01.12.2001 23.09.1995 28.12.1996 1.13.01.1991 18.7.1998
6.संधान-4
कथा विशेषांक
अशोक 2000 6. 16.11.2002 25.06.2000 22.01.2003 2.13.08.1997 21.07.07
7.कथा सेतु प््राशान्त 2002 7. 03.11.2005 3.09.04.2005 सुपौल
4.10.02.2007 09.01.1993
01.12.2007
एहि अवसरपर पठित कथाक कतेको व्यक्तिगत संग्रह छपल अछि तथा समस्त पठित कथाक संख्या 1500 सँ अधिक होएत ।

2
विभिन्न नामे आयोजित सगर
राति
सगर राति दीप जरय- संचालक
1.कथा रैली डेओढ स्थान नाम स्थान नाम
2.क्था सम्वाद दरभंगा 1.मुजफफरपुर 1.प्रभास कुमार चैधरी 20.भागलपुर 20.अशोक
3.कथाचेतना रैली घोघरडीहा 2.प्ैाटघाट 2.अशोक 21.कोलकाता 21.रामलोचनठाकुर/नवीन चैधरी
4.सृजनकेरदीपपर्व सुपौल 3.इसहपुर 3.शैलेन्द्र आनन्द 22.बेनीपुर 22.अजित कुमार आजाद
5.गंगासँ हिमालय कठमाण्डू 4.सरहद 4.शिवशंकर श्रीनिवास 23.नवानी 23.मोहन भारद्वाज
6.कथा कुम्भ पर्व बोकारो 5.झंझारपुर 5.शिवशंकर श्रीनिवास 24.दरभंगा 24.डा.भीमनाथ झा
7.कथा कौमुदी बोकरो 6.घोघरडीहा 6.शिवशंकर श्रीनिवास 25.देवघर 25.प्रदीप बिहारी
8.कथा गंगा पटना 7.काठमाण्डू 7.रमेश रंजन 26.पूर्णियाॅं 26.अजित कुमार आजाद
9.कथा कारिख खुटौना 8.राजविराज 8.रमेश 27.पटना 27.डा.देवशंकर नवीन
10.कथा पर्व राँची 9.राँची 9.अजित कुमार आजाद 28.जनकपुर 28.रमेश रंजन
11.भरि राति भोर पटना 10.मधुबनी 10.सरस 29.जयनगर
30.बेगूसराय
29.प्रदीप बिहारी
30. अजित कुमार आजाद
12.कथा लोरिक बेनीपुर 11.राँची 11.सरस 31.जमशेदपुर 31.डा.अशोक अविचल
13.कथा अमृत कोलकाता 12.महिषी 12.शिवशंकर श्रीनिवास 32.सहरसा 32.अजित कुमार आजाद
14.कथा सेतु भागलपुर 13..तरौनी 13.प्रदीप बिहारी 33.सुपौल 33.अजित कुमार आजाद
15.स्वर्ण दीप दरभंगा, 14.बलाइन 14.शिवशंकर श्रीनिवास 34.राँची 34. कु.मनीष अरविन्द/सरस
16.कथा कमला-कथा
सलहेस
जयनगर 15.काठमाण्डू 15.रमेश रंजन
17.कथा बहुरा बेगूसराय 16.धनबाद 16.अशोक
18.कथा संगम ज्मशेदपुर 17.बिट्ठो 17.अशोक
19. कथा वर्षा राँची 18.हटनी 18.डा.फूलचन्द्र मिश्र‘रमण‘
19.पटना 19. अजित कुमार आजाद
सगर राति दीप जरय-तीन सँ बेशी लोकार्पित पोथीक लेखक/सम्पादक
1.पण्डित श्री गोविन्द झा 2.रमेश 3.डा.तारानन्द वियोगी
पोथीक नाम स्थान तिथि पोथीक नाम स्थान तिथि पोथीक नाम स्थान तिथि
1.सामाक पौती दरभंगा 07.07.1990 1.स्माड़ नवानी 21.07.1991 हमर युद्धक
साक्ष्य
बेगूसराय 13.01.1991
2.विद्यापतिक
आत्म कथा
प्ैाटघाट 10.07.1993 2.श्वेतपत्र (सहसम्पा) जनकपुरधाम 1993 2श्ष्वेतपत्र
(सहसम्पा)
जनकपुरधाम 1993
3.नखदर्पण काठमाण्डू 23.09.1995 3.समानान्तर पटना 18.07.1997 3.अतिक्रमण महिषी 13.04.1997
4.प्रलाप पटना 01.12.2001 4.प्रतिक्रिया सहरसा 18.07.1998 4.हस्ताक्षर महिषी 13.04.1997
5.आत्मालाप कोलकाता 22.01.2003 5.मण्डन मिश्र अद्वैत
मीमांसा(सहसम्पा
काठमाण्डू 25.06.2000 5.शिलालेख महिषी 13.04.1997
6.अतीतालाप पटना 6.एकैसम शताब्दीक
घोषणा पत्र (सह सम्पा
पटना 01.12.2001
7.पाथर पर दूभि दरभंगा 21.02.2004
8.कोशी घाटी सभ्यता दरभंगा 21.02.2004
4.डा.रमानन्द झा ‘रमण 5.श्याम दरिहरे 6.प्रदीप बिहारी
1.मिथिला दर्पण
पुण्यानन्दझा-सबोकारो
25.08.2001 1.भरि राति भोर सहसम्पापटना
10.10.1998 1.भरि राति भोर
सह.सम्पापटना
10.10.1998
2.बेसाहल दरभंगा 21.02.2004 2.एकैसम शताब्दीक
घोषणा पत्र-सह सम्पा
पटना 01.12.2001 2.मकड.ी काठमाण्डू 25.06.2000
3.यदुवर
रचनावली
दरभंगा 21.02.2004 3.सरिसब मे भूत दरभंगा 21.02.2004 3. सरोकार ब्ेागूसराय 09.04.2005
4.सगर राति
दीप जरयक
इतिहास
दरभंगा 21.02.2004 4.कनुप्रिया-अनुवाद दरभंगा 21.02.2004 4. अक्षर
आर्केस्ट्रा-अनुवाद
बेगूसराय 21.07.2007
5.भजारल बेगूसराय 09.04.2005

3
सगर राति दीप जरय-तीन सँ बेशी बेर लोकार्पणकर्ता
1.पण्डित श्री गोविन्द झा 2.प्रभास कुमार चैधरी
पोथी ल्ेाखक स्थान तिथि पोथी ल्ेाखक स्थान तिथि
1.साहित्यालाप डा.भीमनाथ झा सकरी 22.10.1991 1.मोम जकाँ बर्फ
जकाँ
अमरनाथ दरभंगा 07.07.1990
2.गामनहिसुतैत अछि महेन्द्र मलंगिया जनकपुाधाम 09.10.1993 2.विद्यापतिकआत्मकथा गोविन्द झा पैटघाट 10.07.1993
3.कथा कुम्भ सं-बुद्धिनाथ झा घोघरडीहा 22.10.1994 3.कथाकल्प डा.देवकान्त झा कोलकाता 28.12.1996
4.निवेदिता स्ुाधांशुशेखर‘चैधरी कोलकाता 28.12.1996 4.समानान्तर श्रमेश पटना 18.07.1997
5.अतिक्रमण डा.तारानन्द वियोगी महिषी 13.04.1997 5.कुकूरू.कूआकसौटी चन्दे्रश ब्ेागूसराय 19.09.1997
6.प्रतिक्रिया श्रमेश सहरसा 18.07.1998 3.सोमदेव
7.युगान्तर विश्वनाथ पटना 01.12.2001 1.प्रलाप गोविन्द झा पटना 01.12.2001
8.एक फाँक रौद योगीराज पटना 16.12.2002 2.तीन रंग तेरह
चित्र
डा.सुधाकर चैधरी पटना 16.11.2002
9.यात्री समग्र स.ंषोभाकान्त पटना 16.12.2002 3.उदयास्त धूमकेतु पटना 16.11.2002
10.मैथिलीबालसाहित्य डा.दमन कुमार झा पटना 16.12.2002 4.अभियुक्त राजमोहन झा पटना 16.11.2002
11.दिदबल प्रभास कुमार चैधरी दरभंगा 21.02.2004 5.सर्वस्वान्त सकेतानन्द पटना 16.11.2002
12.गंगा प.ं यन्त्रनाथ मिश्र दरभंगा 21.02.2004 6.लाखप्रश्नअनुत्तरित रामलोचन ठाकुर खुटौना 07.06.2003
13.गाछ झूल झूल जीवकान्त दरभंगा 21.02.2004 7.चितकावर हंसराज दरभंगा 21.02.2004
14.हम भेटब मार्कण्डेय प्रवासी दरभंगा 21.02.2004 5.डा.रमानन्द झा ‘रमण‘
15.यदुवर रचनावली डा.रमानन्द झा ‘रमण‘ दरभंगा 21.02.2004 1.अदहन डा.शिवशंकर
श्रीनिवास
कटिहार 22.04.1991
16.कनुप्रिया अनु.श्याम दरिहरे दरभंगा 21.02.2004 2मिथिलांचलक लोक
कथा
डा.गंगाप्रसाद अकेला काठमाण्डू 25.06.2000
17लोरिक मनियार चन्द्रेश दरभंगा 21.02.2004 3.शिरीषक फूल अनु.डा अकेला काठमाण्डू 25.06.2000
4.राजमोहन झा 4.उगैत सूर्यक धमक सियाराम झा ‘सरस‘ दरभंगा 21.02.2004
1.मनकआडनमेठाढ़ डा.भीमनाथ झा धनबाद 21.10.2000 5.अभिज्ञा डा.फूलचन्द्रमिश्र‘रमण‘ दरभंगा 21.02.2004
2..एकैसमशताब्दीक
घोषणा पत्र
रमेष/श्यामदरिहरे/मोहनयादव
.
पटना 01.12.2001 6.स्वास स्वासमे
विश्वास
विवेकानन्द ठाकुर राँची 02.10.2005
3 पृथा नीता झा भागलपुर 24.08.2002 7.अक्षर आर्केस्ट्रा अनुवाद- प्रदीपबिहारी बेगूसराय 21.07.2007
4.सरिसब मे भूत श्याम दरिहरे दरभंगा 21.02.2004
5.हाथीचलय बजार डा.देवशंकर नवीन दरभंगा 21.02.2004
6.चिन्तन प्रवाह डा.धीरेन्द्रनाथ मिश्र दरभंगा 21.02.2004
7.सरोकार प््रादीप बिहारी ब्ेागूसराय 09.04.2005

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...