Sunday, September 13, 2009

कथा- बिसाँढ़- जगदीश प्रसाद ‍मं‍डल


पछिला चारि-सालक रौदी भेने गामक सुरखिये बेदरंग भऽ गेल। जे गाम हरियर-हरियर गाछ-बिरीछ, बन्न स लहलहाइत खेत, पानि स इनार-पोखरि, सैकड़ो रंगक चिड़ै-चुनमुनी, हजारो रंगक कीट-पतंग स लऽ कऽ गाय, महीसि, बकरी स भरल रहैत छल ओ मरनासन्न भऽ गेल। सुन-मसान जेँका। बीरान। सबहक (गामक लोकक) मन मे एक्के टा विचार अबैत जे आब इ गाम नै रहत। जँ रहबो करत त सिर्फ माटिये टा। किऐक त जहि गाम मे खाइक लेल अन्न नहि उपजत, पीवैक लेल पानि नहि रहत, तहि गामक लोक कि हवा पीबि कऽ रहत। जहि मातृभूमिक महिमा अदौ स सब गबैत अएलाह ओ भूमि चारिये सालक रौदी म पेटकान लाधि देलक। मुदा तइओ लोकक टूटैत आशाक वृक्ष मे नव-नव फुलक कोढ़ी टुस्साक संग जरुर निकलि रहल अछि। किऐक त आखिर जनकक राज मिथिला छिअए की ने। जहि राज्य मे बाहर-बर्खक रौदीक फल सीता सन भेटल तहि राज मे, हो न हो, जँ कहीं ओहने फल फेरि भेटए। एक दिशि रौदीक (अकालक) सघन मृत्युवाण चलैत त दोसर दिशि स आशाक प्रज्वलित वाण सेहो ओकर मुकावला करैत। जेकर हसेरियो नमहर। ऐहनो स्थिति मे दुनू परानी डोमनक मन मे जीबैक ओहने आशा बनल रहल जेहने सुभ्यस्त समय मे। कान्ह पर कोदारि नेने आगू-आगू डोमन आ माथ पर सिंही माछ आ बिसाँढ़ स भरल पथिया नेने पाछु-पाछु सुगिया, बड़की पोखरि स आंगन, जिनगीक गप-सप करैत अबैत। चाइनिक पसीना दहिना हाथ स पोछि, मुस्कुराइत सुगिया बाजलि- ‘जकरा खाइ-पीबैक ओरियान करैक लूरि बुझल छैक ओ कथीक चिन्ता करत?’ पत्नीक बात सुनि डोमन पाछु घुरि सुगियाक चेहरा देखि बिनु किछु बजनहि, नजरि निच्चा कऽ आगू डेग बढ़बै लगल। किऐक त खाइक ओते चिन्ता मन म नहि, जते पीबैक पाइनिक। डोमन कऽ अपन खेत-पथार नहि मुदा दुनू बेकती तेहन मेहनती जे नहियो किछु रहने नीक-नहाँति गुजर करैत। गिरहस्तीक सब काजक लूरि रहितहुँ ओ कोनो गिरहस्त स बन्हायल नहि ओना समय-कुसमय, अपना काज नहि रहने, बोइनो कऽ लइत। अपना खेत नहि रहने खेती त नहिये करैत मुदा दस कट्ठा मड़ुआ, सब साल बटाइ रोपि लइत। जहि स पाँच मन अन्नो घर लऽ अबैत। मड़ुआ बीआ उपजबै मे बेसी मिहनत होइत अछि किऐक त सब दिन बीआ पटबै पड़ैत अछि। शुरुहे रोहणि मे बड़की पोखरिक किनछरि मे डोमन बीआ पाड़ि लइत। लग मे पानि रहने पटबैयोक सुविधा। आरु बीरार, तेँ बीओ नीक उमझैत। पनरहे दिन मे बीआ रोपाउ भऽ जायत। मिरगिसिया मे पानि होइतहि अगते मड़ुआ रोपि लइत। मुदा अहि (एहि) बेरि से नइ भेलइ। बरखा नहि भेने बीआ बीरारे मे बुढ़हा गेल। एक्को धुर मड़ुआक खेती गाम मे नहि भेलइ। आने कियो अखन धरि धानक बीरार क खेत जोतलक आ ने बीआ वाओग केलक। रौदीक आगम सबहक मन मे हुअए लगल। मुदा तइओ ककरो मन मे अन्देशा नहि! किऐक त ढ़ेनुआर नक्षत्र सब पछुआइले अछि।


जहिना रोहणि-मिरगिसिया फांेक गेल तहिना अद्रो। समय सेहो खूब तबि गेलइ। दस बजे स पहिनहि सब बाध स आंगन आबि जायत। किऐक त लू लगैक डर सबहक मनमे। मड़ुआ खेती नहि भेने दुनू परानी डोमनक मन मे चिन्ता पैइसै लगल। बड़की। पोखरि स दुनू परानी पुरैनिक पातक बोझ माथ पर नेने अंगना अबैत। बाट मे सुगिया बाजलि- ‘अइ बेरि एक्को कनमा मड़ुआ नइ भेल। बटाइयो केने आन साल ओते भऽ जायत छल जे सालो भरि जलखै चलि जाय छल। अइबेरि ते जलखइओ बेसाहिये कऽ चलत।’


माथ परक पुरैनिक पातक बोझ स पानि चुवैत। जे डोमनो आ सुगियो कऽ अधभिज्जु कऽ देने। नाक परक पानि पोछैत डोमन उत्तर देलक- ‘कोनो कि हमरे टा नइ भेल आ कि गामे मे ककरो नै भेलइ। अनका होइतइ आ अपना नै होइत तखन ने दुख होइत। मुदा जब ककरो नै भेलइ तऽ हमरे किअए दुख हैत। जे दसक गति हेतइ से हमरो हैत। अपना त रोजगारो (पुरैन-पातक विक्री) अछि आ जेकरा इहो ने छै?’ डोमनक उत्तर सुनि मिरमिरा कऽ सुगिया बाजलि- ‘हँ, से त ठीके। मुदा ठनका ठनकै छै ते कियो अपने माथ पर ने हाथ दइ अए। तखन तऽ इ (रौदी) इसरक (ईश्वरक) डाँग छी, लोकक कोन साध।’


अखन धरिक समय कऽ कियो रौदी नहि बुझलक। किऐक त सबहक मन मे यैह (अइह) होइत जे इ त भगवानक लीले छिअनि। जे कोनो साल अगते स पानि (बरखा) हुअए लगैत त कोनो साल अंत मे होइत। कोनो साल बेसिओ होइत त कोनो साल कम्मो। कोनो-कोनो साल नहिये होइत। जहि साल अगते बिहरिया हाल भऽ जायत ओहि साल समय पर गिरहस्ती चलैत मुदा जहि साल पचता पाइन होइत तहि साल अधखड़ू खेती भऽ जायत। मुदा जखन हथिया नक्षत्र धरि पानि नहि भेलि, तखन सबहक मन मे अबै लगल जे अइबेरि रौदी भऽ गेल। ओहिना जोतल-बिनुजोतल खेत स गरदा उड़ैत। घास-पातक कतौ दरस नहि। मुदा तेँ कि लोक हारि मानि लेत। कथमपि नहि। सब दिन स गामक लोक मे सीना तानि कऽ जीबैक अभ्यास बनल अछि ओ पीठि कोना देखाओत? भऽ सकैत अछि जे भगवान (दन्द्र) कोनो चीजक दुख भऽ गेल हेतनि। जहि स बिगड़ि कऽ ऐना केलनि। तेँ हुनका वौंसब (बओसबे) जरुरी अछि। जखने फेरि सुधरि जेताह तखने स सब काज सुढ़िया जायत। अइह (यैह) सोचि कियो अन्न दान (भुखल दुखल कऽ खुऔनाइ) त कियो कीर्तन (अष्टयाम, नवाह) त कियो यज्ञ-जप (चंडी, विष्णु) त कियो महादेव पूजा (लिंग) इत्यादि अनेको रंगक वौंसैक ओरियान शुरु केलक। जनिजाति सब कमला-कोशी कऽ छागर-पाठी कवुला सेहो करै लगलीह। किऐक त जँ हुनकर महिमा जगतनि त बिनु बरखोक बाढ़ि अनतीह। बाढ़ि आओत पोखड़ि-झाखड़ि स लऽ कऽ चर-चैरी, डोह-डावर सब भरत। रौदी कमत। अधा-छिधा उपजो हेबे करत।


बरखाक मकमकी देखि नेंगरा काका महाजनी बन्न कऽ लेलनि। किऐक त ओ बुझि गेलखिन जे अइ बेरक रौदी अगिला साल विसाइत। मुदा सोझ मतिया बौकी काकीक सब चाउर सठि गेलनि। ओना बौकी काकीक लहनो छोट। सिर्फ चाउरेक। सेहो पावनिये-तिहार धरि समटल। हुनकर महाजनी मातृ-नवमी, पितृपक्ष (खाइन-पीउन) स शुरु होइत। पाहुन-परकक लेल दुर्गापूजा, कोजगरा होइत दिवाली परवेब (गोवर्धनपूजा) भरदुतिया, छठि होइत सामा धरि अबैत-अबैत सम्पन्न भऽ जायत छलनि। किऐक त सामा केँ सब नवका चूड़ा खुआबैत। खुऐबे टा नहि करैत संग भारो दइत। ताधरि कोला-कोली धानो पकि जायत। मुदा से बात बौकि काकी वुझवे ने केलखिन जे अइबेर रौदी भऽ गेल। तेँ अपनो खाई ले किछु नहि रखलथि। जहिना बोनिहार, किसान तहिना महाजन वौकियो काकी भऽ गेलीह।


अगहन अबैत-अबैत सबकेँ बुझि पड़ै लगलैक जे अपने की खायब आ माल-जाल कऽ की खुआएब। किऐक त कातिक तकक ओरियान (अपनो आ मालो-जालक लेल) त अधिकांश लोक पहिनहि स कऽ कऽ रखैत। जे नेंगरा काका छोड़ि सबहक सठि गेलनि। धानोक बीआ सब कुटि-छाँटि कऽ खा गेल। धानक कोन गप जे हालक दुआरे रब्वियो-राई हैब, कठिन। सभहक भक्क खुजल। भक्क खुजितहि मन मे चिन्ता समाइ लगल। जना-जना समय बीतैत तना-तना चिन्तो फौदाइत। एक त ओहिना चुल्हि सब बन्न हुअए लगल तइ पर स सुरसा जेँका समय मुह बाँबि आगू मे ठाढ़। चिन्ता स लोक रोगाइ लगल। भोर होइतहि धिया-पूताक बाजा सौंसे गाम बजै लगैत। मौगी पुरुख कऽ करमघट्टू त पुरुख मौगी कऽ राक्षसनी कहै लगल। जहि स धिया-पूताक बाजाक संग दुनू परानीक (पति-पत्नीक) नाच शुरु भऽ जायत। मुदा ऐहन समय भेलो पर दुनू परानी डोमनक मन मे एक्को मिसिया चिन्ता नहि। किऐक त जूरे-शीतल स पुरैनिक पातक कोरोवार शुरु केलक। कोरोबार नमहर। बावन बीधाक बड़की पोखिरि। जहि मे सापर-पिट्टा पुरैनिक गाछ। बजारो नमहर। निरमली, घोघरडिहा, झंझारपुर स्टेशनो आ पुरनो बजार। असकरे सुगिया कते बेचत। किऐक त पुरैनिक पात कीनिनिहार हलुआइ स लऽ कऽ मुरही-कचड़ी वाली धरि। तइ पर स भोज-काज मे सेहो विकायत। तेँ आठ दिन पर पार लगौने रहए। भरि दिन डोमन पत्ता तोड़ि-तोड़ि जमा करैत। एक दिन कऽ सुगिया पत्ता सरिअवैत (गनि-गनि) तेसरा दिन भोरुके गाड़ी स वेचइ ले जायत। जे पात उगड़ि जाय ओकरा डोमन सुखा-सुखा रखैत। किऐक त सुखेलहो पातक बिक्री होइत।


निरमली स पात बेचि क सुगिया आबि पति (डोमन) कऽ कहलक- ‘रौदी भेने अपन चलती आबि गेल।’


चलतीक नाम सुनि मुस्की दइत डोमन पुछलक- ‘से की?’


‘सब बेपारी (पात बेचिनिहार) थस ल लेलक। सब गामक पोखरि सुखि गेलइ जहि (जइ) स सबहक कारे-बार बन्न भऽ गेलइ। अपने टा पात बजार पहुँचै अए। आइ त जहाँ गाड़ी स उतड़लहुँ कि दोकानदार सब सब पात छानि लेलक। टीशने पर छुह्हका उड़ि गेलि।’


डोमन- ‘अहाँ कऽ लूरि नइ छले जे दाम बढ़ा दीतिऐ एक क दू होइत।’

सुगिया- ‘अगिला खेप स सैह करब।’ आब त बड़िड़्यो जुआइत हैत की ने?’

डोमन- ‘गोटे-गोटे जुआइल हेँ। मुदा बीछि-बीछि तोड़ै पड़त। तेँ पाँच दिन आरो छोड़ि दइ छिअए।’

तेसर साल चढ़ैत-चढ़ैत गामक एकटा बड़की पोखरि आ पाँच टा इनार छोड़ि सब सुखि गेल। नमहर आँट-पेटक बड़की पोखरि। किऐक त दइतक (दैतक) खुनल छी कीने? लोकक खुनल थोड़े छिअए। देव अंश अछि। तेँ ने गामक सब अपन बेटा कऽ उपनयनो आ विआहो मे ओही पोखरि मे नहबै अए। ततबे नहि, छठि मे हाथो उठबै अए। हमरा इलाकाक पृथ्वियोक (धरतियोक) बनाबटि अजीव अछि। बुझू ते माइटिक पहाड़। पाँच स फुट निच्चा धरि ने बाउल (बौल) अछि आ ने पानि। शुद्ध माटि। जहि स ने एक्कोटा चापाकल आ ने बोरिंग गाम (इलाका) मे। पाइनिक दुआरे गामक-गाम लोक कऽ पराइन लगि गेल। माल-जाल उपटि गेल। चाहे त लोक बेचि लेलक वा खढ़ पाइनिक दुआरे मरि गेल। अधा स बेसी गाछो-विरीछ सुखि गेल। चिड़ै-चुनमुनी इलाका छोड़ि देलक। जे मूस अगहन मे अंग्रेजी बाजा बजा सत-सत टा विआह करैत छल, ओ या त बिले मे मरि गेल वा कतऽ पड़ा गेल तेकर ठेकान नहि। अधा स बेसिये लोक हमरो गामक पड़ा गेल। मुदा तइओ जिबठगर लोक गाम छोड़ै ले तैयार नहि। पुरुख सब गाम छोड़ि परदेश खटै ले चलि गेल। मुदा बालो-बच्चा आ जनि-जातियो गामे मे रहल। पोखरि-इनार कऽ सुखैत देखि, पानि पीवैक लेल बड़किये पोखरिक कतबाहि मे कुप खुनि-खुनि लेलक। अपन-अपन कुप सभकेँ। पाइनिक कमी नहि। तीनि सालक जे रौदी इलाकाक (परोपट्टाक) लेल वाम भऽ गेल ओइह डोमनक लेल दहिन भऽ गेल। काज त आने साल जेँका मुदा आमदनी दोबर-तेबर भऽ गेलइ। गामक जमीनोक दर घटल। जहि स डोमन खेत कीनए लगल। ओना सुगियाक इच्छा खेत (जमीन) कीनैक नहि। किऐक त मन मे होय जे एहिना रौदी रहत आ खेत सब पड़ता रहत। तेँ, अनेरे खेत ल कऽ की करब। मुदा मालो-जाल त, घास-पाइनिक दुआरे, नहिये लेब नीक हैत। मुदा डोमनक मन मे आशा रहए जे जहिना लुल्हियो कनियाँ बेटा जनमा कऽ गिरथाइन बनि जायत, तहिना त पानि भेने परतियो खेत हैत की ने।

योगी-तपस्वीक भूमि मिथिला, अदौ स रहल। जे अपन देह जीवि-जन्तुक कल्याणक लेल गला लेलनि। ओ कि एहि बात कऽ नहि जनैत छलथिन। जनैत छलथिन। तेँ ने गाम मे अट्ठारह गण्डा (72) पोखरि, सत्ताइस गण्डा (108) इनार क संग-संग चैरी मे सैकड़ो (सइओ) कोचाढ़ि (बिरइ) खुनि पाइनिक बखारी बनौने छलाह। सोलहो आना बरखे भरोसे नहि, अपनो जोगार केने छलाह।

तीनि साल त दुनू परानी डोमन चैन स बितौलक। मुदा चारिम साल अबैत-अबैत बेचैन हुअए लगल। किऐक त गामक सब पोखरि-इनार त पहिनहि सुखि गेलि छल। ल दऽ कऽ बड़की पोखरि टा बँचल। तहू मे सुखैत-सुखैत मात्र कठ्ठा पाँचे मे पानि बचल। सुखल दिशि पुरैनियो उपटि गेल। बीच मे जे पानि, ओही मे पुरैनिक गाछ रहए, मुदा जाँध भरि स उपरे गादि। पैसब महा-मोसकिल। किऐक त पाएर दइते सर-सरा कऽ जाँघ भरि गड़ि जायत। के जान गमबै पैसत। निराशाक जंगल मे डोमन वौआ गेल। मन मे हुअए लगलै जे जहिना गामक लोक चलि गेल तहिना हमहूँ चलि जायब। जानि कऽ परानो गमाएव नीक नहि। जिनगी बचत, समय-साल बदलतै त फेरि घुरि कऽ आयब नहि त कतौ मरि जायब। जहिना गामक सब कुछ बिलटि गेल, समाजक लोक बिलटि गेल, तहिना हमहूँ बिलटि जायब।

पति कऽ चिन्तित देखि सुगिया- ‘किछु होय अए? ऐना किअए मन खसल अछि?’ पत्निक प्रश्न सुनि डोमन आंखि उठा कऽ देखि पुनः आंखि निच्चा कऽ लेलक। आंखि निच्चा करितहि सुगिया दोहरा कऽ पुछलक- ‘मन-तन खराब अछि?’ नजरि उठा डोमन उत्तर देलक- ‘तन त नहि खराब अछि, मुदा तनेक दुख देखि मन सोगायल अछि। जइ (जहि) आशा पर अखन धरि खेपलहुँ ओ त चलिये गेल। जे अगिलोक कोनो आशा नहि देखै छी। की करब आब? सुगिया- ‘अपना केने किछु ने होइ छै। जे भगवान जन्म देलनि, मुह चीड़ने छथि अहारो त वैह ने देताह। तइ ले एत्ते चिन्ता किअए करै छी?’

डोमन- ‘गामक सब कुछ बिलटि गेल। ऐहेन सुन्दर गाम छल, सोहो उपटि रहलअछि। सिर्फ माटि टा बँचल अछि। की माटि खुनि-खुनि खायब? बिना अन्न-पानिक कइ-अ दिन ठाढ़ रहब?’

‘चिन्ता छोड़ू। जहिया जे हेवाक हेतइ से हेतइ। अखन त पानियो अछिये आ अन्नो अछिये। जाधरि एहि (अइ) धरती पर दाना-पानी लिखल हैत ताधरि भेटबे करत। जहिया उठि जायत तहिया ककरो रोकने रोकेबै (रोकेवइ)। तइ ले एत्ते चिन्ता किअए करै छी।’

कहि सुगिया भानसक ओरियान करै लागलि। पत्नीक बात सुनि डोमन मने-मन सोचै लगल जे हमरा त मरैयोक डर होय अए मुदा ओकरा (पत्नी) कहाँ होइ छै। ओ त मरैइयो ले तैयारे अछि। फेरि मन मे उठलै जे जीवन-मृत्युक (जिनगी-मौतक) बीच सदा स संघर्ष होइत आयल अछि आ होइत रहत। तहि स पाछु हटब कायरता छी। जे मनुष्य कायर अछि ओ कोन जिनगीक आशा मे अनेरे दुनियाँ कऽ अजबारने अछि। पुनः अपना दिशि तकलक। अपना दिशि तकितहि मन मे एलै जे जीबैक बाट हरा गेल अछि। तेँ एते चिन्ता दबने अछि। तमाकुल चुना कऽ खेलक। तमाकुल मुह मे लइते अपन माए-बाप स लऽ कऽ पैछला पुरखा (जते जनैत) दिशि घोड़ा जेँका नजरि दौड़लै। मुदा कतौ रुकलै नहि। जाइत-जाइत मनुष्यक जड़ि धरि पहुँच गेल। पुनः घुमि कऽ आबि नजरि माय लग अटकि गेल। मन पड़लै माएक संग बितौलहा जिनगी।


मन पड़लै माइयक ओ बात जे दस वर्खक अवस्था मे रौदी बीतौने छल। रौदी मन पड़ितहि बड़की पोखरिक बिसाँढ़ आ अन्है माछ आंखिक सोझ मे आबि गेलइ। कने काल गुम्म भऽ मन पाड़ै लगल। मन पड़लै, अही पुरैनिक (जे सुखि गेल अछि) जड़ि मे त बिसाँढ़ो फड़ैत अछि। अल्हुए जेँका। जहिना माइटिक तर मे अल्हुआक सिरो आ अल्हुओ (फड़) रहै छै तहिना पुरैनिक जड़ि मे सिरो आ बिसाँढ़ो रहैत अछि। अनायास मुह स निकललै- ‘बाप रे, बाबन बीघाक पोखरि मे कते बिसाँढ़ हेतइ। ओकरे खुनै मे माछो भेटत। खाधि बना-बना सिंही-मांगुर रहै अए। एक पथ दू काज। मन खुशी अविते पत्नी कऽ सोर पाड़ि कहलक- ‘भगवान बड़ी टा छथिन। जहिना अरबो-खरबो जीवि-जंतु केँ जन्म देने छथिन तहिना ओकर अहारोक जोगार केने छथिन।’

पतिक बात सुनि सुगिया अकबका गेलि। बुझबे ने केलक। मुह बाबि पति दिशि देखैत रहलीह। पुनः डोमन कहलक- ‘चुल्हि मिझा दिऔ। घुरि कऽ आयब तखन भानस करब।’

पतिक उत्साह देखि सुगिया मने-मन सोचए लगली जे मन ने ते सनकि गेलनि हेँ। अखने मुरदा जेँका पनि-मरु (पनिमरु) छलाह। आ लगले कि भऽ गेलनि। दोसर बात परखैक खियाल स चुप-चाप ठाढ़ रहली।

डोमन- ‘की कहलौ? पहिने आँच मिझा दिऔ। फटक लगा छिट्टा लऽ कऽ संगे चलू।’

सुगिया- ‘कत्तऽ।’

‘बड़की पोखरि।’

‘किअए?’

‘ऐहन-ऐहन सइओ रौदी कटैक खेनाइ (भोजन) पोखरि मे दाबल अछि। आनै ले चलू।’

सवाल-जबाव नहि कऽ सुगिया आगि पझा, फटक लगा छिट्टा लऽ तैयार भेलि। घर स कोदारि निकालि डोमन विदा भेल। आगू-आगू डोमन आ पाछु-पाछु सुगिया।

बड़की पोखरिक महार पर पहुँच डोमन हाथक इशारा स पत्नी कऽ देखवैत बाजल- ‘जते पोखरिक पेट सुखल अछि, ओहि मे तते खाइक वस्तु (भोज्य पदार्थ) गड़ायल अछि जे ने खाइक कमी रहत आ ने पीवैक पाइनिक। जना-जना पानि सुखैत जेतइ तना-तना कुप कऽ गहीर करैत जायब। जते पुरैनिक गाछ सुखायल अछि ओहि मे घुरछा जेँका बिसाँढ़ फड़ल हैत।’

पोखरि धँसि डोमन तीनि डेग उत्तरे-दछिन आ तीनि डेग पूवे पछिमे नापि कोदारि स चेन्ह देलक। एक घुर। उत्तर बरिया पूबरिया कोन पर कोदारि मारलक। माटि तते सक्कत जे कोदारि धँसवे ने कयल। दोहरा कऽ फेरि जोर स कोदारि मारलक। फेरि नै कोदारि धँसल। आगू दिशि देखि हियाबै लगल जे किछु दूर आगूक माटि नरम हैत। खुनै मे असान हैत। मनक खुशी उफनि कऽ आगू खसल- ‘अई ढ़ोरबा माए, हम पुरुख नइ छी। देखियौ हमरा माटि गुदानबे ने करै अए। अहाँ हमरा स पनिगर छी, दू छअ मारि कऽ देखियौ।’ सुगिया- ‘हमर चूड़ी-साड़ी पहीरि लिअ, आ हमरा धोती दिअ। तखन कोदारि पाड़ि कऽ देखा दइ छी।’

मुस्की दइत दुनू आगू मुहे ससरल। एक लग्गा आगू बढ़ला पर माटि नरम बुझि पड़लै। कोदारि मारि कऽ देखलक तऽ माटि सहगर लगलै। एक घुर नापि डोमन खुनै लगल। पहिले छअ मे एकटा विसाँढ़क लोली जगलै। लोल देखितहि उछलि कऽ बाजल- ‘हे देखियौ। यैह छी बिसाँढ़।’

सुगिया- ‘लोल देखने नइ बुझब। सौंसे खुनि कऽ देखा दिअ।’

पत्नीक बात सुनि डोमन कऽ हुअए लगल जे हो न हो कहीं अधे पर स ने कटि जाय। से नहि त लोल पकड़ि डोला कऽ उखाड़ि लइ छी। मुदा नै उखड़ल। कने हटि दमसा कऽ दोसर छअ मारलक। छअ मारितहि एक बीतक देखलाहा आ चरि-चरि ओंगरीक दू टा आरो देखलक। तीनू कऽ खुनि, दुनू परानी निग्हारि-निग्हारि देखए लगल।

उज्जर-उज्जर। नाम-नाम। लठिआहा बाँस जेँका गोल-गोल, मोट। हाथी दाँत जेँका चिक्कन (प्लेन) बीत भरि स हाथ भरिक। पाव भरि स आध सेर धरिक।

सुगिया दिशि नजरि उठा कऽ डोमन देखलक त पचास वर्षक आगूक जिनगी बुझि पड़लै। पति दिशि नजरि उठा कऽ सुगिया देखलक त चूड़ीक मधुर स्वर आ चमकैत मांगक सिनदुर देखलक।’

छिट्टा भरि विसाँढ़ आ सेर चारिऐक सिंही माछ नेने दुनू परानी विदा भेल।

2 comments:

  1. Rama Jha3:08 AM

    adbhut prastuti

    ReplyDelete
  2. aai kalhi gam se palayanak bat par chalait maithili kathak beech ee katha apan ant se ekta pratiman gadhait achhi, nik aa alag soch

    ReplyDelete

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...