Tuesday, September 01, 2009

पेटार २६

डाॅ. देव शंकर नवीन


136 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्




मनोवैज्ञानिक सत्यक कथा


स्वतंत्राता प्राप्तिक समय धरि राजकमल चैधरी पंद्रह-सोलह बर्खक भ’ गेल छलाह।
ई उम्र एकटा तरुणक उम्र थिक। मणीन्द्र नारायण चैधरी अर्थात् राजकमल चैधरी
नामक तरुण मे अही वयस मे असाधारणता, संवेदनशीलता परिलक्षित छल। उपेक्षा,
शोषण, तिरस्कार, असंतोष, आक्रोश...इत्यादि सभ झांट-बिहाड़ि सं टकराइत; सभ
अतिक्रमण कें भोगैत, एकटा क्रांतिपूर्ण मिजाजक लेखकक अवतरण भेल, सैह
छथि राजकमल चैधरी।

मैथिली साहित्यक आदिकाल सं आइ धरिक इतिहास मे विविध शताब्दीक
विविध दशकक विविध साहित्यकारक साहित्य मे काव्यधारा कैक बेर अपन करौट
फेरलक अछि, मुदा राजकमल चैधरीक रचनाधर्मिता मे साहित्य करौट नहि फेरिकए
एक्कहि बेर, सुरफुरा कए उठि गेल, क्रांतिक स्वर आ विद्रोहक नाराक संग सचिवालयक
किरानी मणीन्द्र चैधरी, राजकमल चैधरी बनि गेलाह। जे अपना कें कार्यालयक
ललका सालुक मे बान्हल फाइल सं सर्वथा मुक्त रखबाक आग्रही छलाह। ई राजकमल
चैधरी अपन असमयक बौद्धिकताक कारणें देशदशा सं अवगत छलाह। स्वतंत्राता
प्राप्तिक पश्चात् देश केहेन हो तकर एकटा मोटा-मोटी रूपरेखा आने जनता जकां
हिनकहु मे छलनिहें। असाधारण व्यक्तित्वक लोक, हिनकर चिंतन किछु अजूबा
ढंगक रहल हेतनि। इएह चिंतन पारंपरिक संस्कारक इनार सं निकालि कए हिनका
उन्मुक्त वातावरणक पोषक राजकमल चैधरीक रूप देलक। स्वतंत्राता प्राप्तिक पश्चात्
पूर्व रचल स्वप्न महल कें ढहैत देखलनि, मनुष्यक अंतस्तल मे जे एकटा नव ढंगक
उत्साह छल, शोषण सं मुक्ति पएबाक एकटा कल्पना छल; एहि सब तरहक धारणाक
क्षय भ’ गेल। पहिने समाज पर अत्याचार विदेशी करैत छल आ पाछां स्वदेशी करए
लागल। सामाजिक जन-जीवनक एहि अवमूल्यन कें राजकमल लगीच सं चिन्हलनि।
देश मे मात्रा टोपी बदलि कए रहि गेल, एकर अलावे आओर कोनो नव बात नहि
भेलैक। ई सभ स्थिति तरुण राजकमलक मोन कें व्यथित क’ कए राखि देलकनि।

मनोवैज्ञानिक सत्यक कथा / 137

आ हिनकर असाधारण प्रतिभा अपन तरुणाइए मे एहि सभ स्थिति पर गंभीर चिंतन
करय लागल, एहि सभ स्थितिक मार्मिक पक्ष कें देखए लागल। स्वतंत्राता नामक
कोनो चिड़िया, जे समाजक किछु खास वर्गक चीज छल आ समाजक अति न्यून
संख्याक लोकक हेतु आनल गेल छल, राजकमल कें पसिन नहि पड़लनि। सामाजिक
प्राणी मोन मे ओएह निराशा, ओएह कुंठा, ओएह असंतोष देखि ई व्यथित भ’ उठलाह।आ एकरा ई स्वतंत्राता प्राप्ति नहि कहि कए टोपीक बदलाव अथवा सत्ताक हस्तांतरण
बुझलनि। मनुष्य मे व्याप्त एहि असंतोषक निवारण ताक’ लगलाह। एहि चुनाव
तंत्रा, एहि अफसरशाही कें बदलबा लेल आवश्यक छल जन-जागरण, जनता मे,
जनताक विचारधारा मे आमूल-चूल परिवर्तन; वस्तुमूल्य, अर्थमूल्य, नीति-मूल्य,
वचन-मूल्य मे असाधारण परिवर्तन। चूंकि परिवर्तन एखन तुरंत भेले छल (चाहे
केहनो हो) आ ताहू सं पैघ बात जे, नेता, अफसर, पुलिस, शिक्षक, कर्मचारी, पत्राकार,
सभ अपन कत्र्तव्य सं विमुख भ’ कए सत्ता पक्षक लल्लो-चप्पो मे लगि गेल छल,
जाहि सं समाजक पथ-निर्देशक तत्त्व, नीति निर्धारक तत्त्व नांगर भ’ गेल छल।
एहि परिस्थिति मे आवश्यक छलैक जे समाज कें केओ निर्देशक भेटैक। आब ई
भार सम्हार’ जोगर मात्रा साहित्यकारे टा बांचल छलाह जे जन-जीवन कें उचित
निर्देश द’ कए उचित बाट पर चलबा लेल प्रेरित क’ सकैत छलाह। एकटा साहित्यकार,
सैकड़ो सिपाहीक काज करैत अछि। कोनो साहित्यिक संवेदना, चिंतन आ रचनाधर्मिता
सं संपन्न व्यक्ति राइफल ल’ कए युद्ध मे उतरि जाए अथवा मशाल ल’ कए जुलूस
मे चल जाए तं ओ मात्रा एक व्यक्तिक काज क’ सकत, मुदा जं ई व्यक्ति कलम
ल’ कए साहित्य मे उतरि जाथि तं अगणित ‘लाठी’ तैयार करबा मे हिनका कोनहु
परेशानीक सामना नहि कर’ पड़तनि। राजकमल चैधरी मे रचनाधर्मिता रहनि,
संवेदनशीलता रहनि आ एहि वस्तुस्थितिक विश्लेषण कर’ योग्य क्षमतो रहनि, तें
ई सभ काज छोड़ि कए लेखनी पकड़लनि आ जनताक अंतःपीड़ा, ओकर मोह-भंग,
ओकर आंतरिक वेदना, ओकर असंतोषक कारण, ओकर दुःस्थितिक चित्रा कें अंकित
कर’ लेल जनताक समीप चल अएलाह, जतए सं ई वस्तुस्थितिक मार्मिक चित्राण
करबा मे अपूर्व सफलता प्राप्त कएलनि। ई सफलता, हिनकर उदारवादी विचार,
संपूर्ण जन-मानस मे ‘स्व’ केर चित्रा तकबाक प्रवृत्ति, समाजक सर्वांगीन दुःस्थिति
कें अपना संग जोड़ि कए, ओकरा भोगि कए चित्रित करबाक परिचायक थिक।संपूर्ण समाजक एहि विकृति कें देखि कए, राजकमल सन विद्रोही रचनाकारक चित्राण
केहेन भ’ सकैत छल, से ताहि समय मे कल्पना करबा योग्य गप रहल होएत,
मुदा आइ देखबा योग्य गप थिक। समाजक एक-एक तंतु रोग सं जर्जर भ’ गेल
छल। व्यवस्था कुंठाग्रस्त भ’ गेल। चतुर्दिक शोषण-प्रपंच-अनास्था-
कुव्यवस्था-अविश्वास-असंतोषक दुर्गंध पसरल जाइत छल। मुदा सामाजिक प्राणी
निश्चिंत छल, निर्विकार छल, ओकरा लेल ई कोनो अनहोनी गप नहि छल, ठीक

138 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


ओहिना, जेना पाइरिया रोग सं ग्रसित मनुक्ख कें अपन मुंहक दुर्गंध अपना नहि
लगैत छैक। राजकमल अही दुर्गंध कें, अही रोग कें प्रकाश मे आन’क प्रयास सतत
करैत रहलाह। सूतल जनमानस कें ओकर दुर्दशा सं परिचित करबैत रहलाह।
राजनीतिज्ञक दृष्टिबोध एतबा बुझि गेल छल, जे आब जनता कें मात्रा प्रपंचहि टा
सं खुश कएल जा सकैए आ अइ प्रपंच सं परिचय कराकए जनमानसक आंखिखोलब ई अपन कत्र्तव्य बुझलनि। आ एकटा सफल सर्जनक (ठेठ मे सार्जन) रूप
मे हमरालोकनिक समाजक तंतु-तंतु कें चीड़ि कए ओकर भीतरी-रोगक डाइग्नोसिस
प्रस्तुत कएलनि।

जनमानस कें दृष्टिबोध देबा लेल एतबे यथेष्ट अछि, जे ओ अपन रोग जानि
जाए आ रोगक मूल जानि जाए। समाजक जागरण-पथक पहिल सीढ़ी इएह थिक।
राजकमल अपना जिनगी मे इएह करैत रहलाह। परंपरा सं अबैत साहित्य-धारा
युगीन दुःस्थिति, शोषण, कुव्यवस्था, अनाचार, स्वार्थ-नीति, मानवीय अवमूल्यनक
चित्राण नहि क’ पबैत छल। ई भारी बोझ उठाब’ मे प्राचीन काव्यधारा नंगराए लागल
छल। तें राजकमल एहि वाहक कें हटाकए, एकरा कपार पर सं एहि बोझ कें उतारि
कए नव काव्यधाराक स्थापना कएलनि, जे एहि गंभीर चिंतनक भाव-बोध कें उघि
सकबा मे समर्थ छल। विरोध अनेक तरहें भेल, मुदा जेहेन हुनकर प्रबल इच्छाशक्ति
छल, तेहने हुनकर स्थापित साहित्यधारा...कोनो विरोध, कोनो निंदाक बिना परवाहि
कएने बढ़ैत रहल...बढ़ैत रहल...बढ़ि गेल।

ओना तं राजकमलक समस्त साहित्यिक विधा मे इएह मोह-भंग, इएह दृष्टि
बोध, इएह आत्मदर्शन, इएह जिनगीक कटु सत्य व्यक्त भेल अछि, मुदा, मैथिली
साहित्य मे खास क’ कए सर्वाधिक सफल विधा कथा-साहित्य रहल अछि। कहबा
लए तं अनेक आलोचक लोकनि हिनका बेसी सफल कवि रूप मे मानैत छथि,
मुदा हमरा दृष्टिकोणें हिनकर कथा आ कविता दुनू उपरौंझ क’ रहल अछि।

भारतीय अन्यान्य साहित्य जकां मैथिली साहित्य कें सेहो, कथा विधा विरासतमे संस्कृतहि सं भेटलैक अछि। मुदा, राजकमलक कथा-साहित्य संस्कृत सं प्राप्त
मरौसी खिस्सा मात्रा नहि, बल्कि दीर्घकालीन कथात्मकताक विकास परंपरा, पाश्चात्य
कथा-साहित्यक प्रभाव आ हुनकर अपन असली जीवन-दर्शन तथा पकिया अनुभूतिक
चित्राणक त्रिवेणी थिक। अपन कोनो कथा लिखबा सं पूर्व राजकमल जिनगीक
जटिलतम-गहनतम खोह मे मात्रा हुलकी मारैत नहि प्रतीत होइत छथि, बल्कि ओकर
वास्तविक स्थितिक भोक्ता लगैत छथि। मानवीय संवेदनाक एक-एक तीत-मीठ कें
चाखि कए राजकमल अपन प्रत्येक कथा प्रस्तुत करैत बुझाइत छथि।

थातीक रूप मे संस्कृत साहित्य सं प्राप्त कथा-साहित्य प्रारंभहि सं जीवनक
एकटा विशेष अंगक रूप मे स्वीकारल जाइत रहल अछि। प्रत्येक बच्चा अपन
माइ-बाप-बहिन सं कोना तन्मयतापूर्वक कथा सुनैत अछि, सैह कथाक गुण कें प्रदर्शित

मनोवैज्ञानिक सत्यक कथा / 139

करैत अछि। सुनबा काल, कथाक प्रारंभ होइतहि ओ सब किछु बिसरि, अपन ध्यान
कें कथाक घटना पर केंद्रित क’ लैत अछि। अपना कें कथाक घटनाक प्रति अति
सचेत राखैत अछि। मोने-मोन एहेन धारणा बना लैत अछि जे, कथाक ई घटना
प्रायः ओकरा सोझहिं मे घटि रहल हो। कथा सुनलाक बाद ओकरा जे हार्दिक प्रसन्नता
रहैत अछि, से ओकर पूर्वक मनोविकारक शमन क’ दैत अछि। गल्प, आख्यायिका,
किंवा छोट-छोट कथा लिखबाक प्रथा प्राचीन कालहि सं चल आबि रहल अछि।
एहि कथनक पुष्टि धर्म-ग्रंथ मे वर्तमान आख्यायिका सं होइत अछि। काया-कल्प
सं छोट रहितहु ओ प्रासंगिक कथा सभ उच्च कोटिक अछि। महाभारत, उपनिषदसभ मे ई जनशिक्षाक लेल उपयुक्त साधन बुझल गेल अछि। ज्ञान आ तत्त्वक एहि
बात कें एतेक सहज रूप मे बुझा देबाक उद्देश्यहि सं प्रायः प्राचीन ऋषि एहि माध्यमकें अपनौने हेताह। ओ एहि दृष्टांत द्वारा मात्रा आध्यात्मिक आ नैतिक तत्त्व-निरूपण
करैत छलाह। अभिप्राय मनोरंजने टा नहि रहैत छलनि।

एम्हर आबि कए आख्यायिकाक अर्थ बहुत व्यापक भ’ गेल। प्रेम-कहानी,
भ्रमण-वृत्तांत, अद्भुत घटना, एते धरि जे मित्राक बीच भेल गप-सप कें सेहो
आख्यायिकाक माध्यमे कहल जाए लागल। जतए प्राचीन आख्यायिका कुतूहल-प्रधानहोइत छल, अध्यात्म विषयक होइत छल ओतए वत्र्तमान आख्यायिका मनोवैज्ञानिक
विश्लेषण आ जीवनक यथार्थ तथा स्वाभाविक चित्राण कें अपन ध्येय बुझलक। ओहि
मे कल्पनाक कमी आ अनुभूतिक बाहुल्य रहैत अछि। एतबे नहि, वस्तुतः अनुभूतिए
रचनाशील भावना सं अनुरंजित भ’ कए कथा बनि जाइत अछि।

अनुभूतिक आधार पर यथार्थ भोगिकए ओकरा रचनाशील भावना सं अनुरंजित
कएनिहार मे राजकमल अग्रगण छलाह। हिनकर कथा मे कल्पना कें जगह पएबाक
गुंजाइश नहि रहैत छलैक। हिनकर मान्यता छलनि, जे कल्पना क’ कए कोनो घटनाक
वास्तविक आ मार्मिक चित्राण नहि कएल जा सकैए। ओना तं वर्तमानो काल मे
साहित्यक प्रत्येक विधाक रचना मे कोनो-ने-कोनो तरहें मनोरंजनक उपयोगिता रहिते
अछि, संगहि-संग ई जीवनक गहन जटिलताक अंग सेहो बनि गेल अछि। साहित्य
मे जीवनक प्रत्यक्ष दर्शन उपस्थित करब खास क’ कए राजकमलक लेखनीकस्वाभाविक धर्म छलनि। हिनकर कथा मे मनोरंजनक तत्त्व सं बेसी विश्वसनीयताक
आग्रह देखल जाइत अछि। हिनकर कथा मे मनोरंजकताक उद्देश्यंे समाजक कल्पित
किंवा सतही चित्रा-चरित्रा नहि उपस्थापित कएल गेल अछि, अपितु विश्वसनीयताकधरातल पर समाजक नग्न आ कुत्सित चित्रा कें दत्तचित्त भ’ कए प्रस्तुत कएल
गेल अछि। अपन कथाक माध्यमे ई पाठकक आगां समाजक वर्तमान परिस्थितिक
चित्रा कें ततेक प्रभावोत्पादक ढंग सं प्रस्तुत केलनि जे पाठकक मोन तिलमिला
जाइत अछि। मैथिली मे अपन पहिल प्रकाशित कथा ‘अपराजिता’क शीर्षक सं
कथावस्तुक अंतरंग तादात्म्य उपस्थित कएने छथि। अपराजिताक संज्ञाधारी असली

140 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


तत्त्व एहेन की अछि जकर गुण नाम कें सार्थक करैत अछि...?...एहि प्रश्नकगंभीर तथा खोजपूर्ण उत्तर ‘अपराजिता’ मे भेटैत अछि। कोशी आ वागमतीक तांडव
मे भयाक्रांत जनताक स्थितिक चित्राण, सहजहिं पाठकक सोझां मे अषाढ़-साओनक
बाढ़िक दृश्य उपस्थित क’ दैत अछि। वेद मे नदी कें मनुक्खक सेविका, मनुक्खक
पत्नी कहल गेल अछि। तकरा पर विरोधाभास प्रस्तुत करैत राजकमल व्यंग्य कसैत
छथि ‘बहुओ भ’ क’ कोशी आ वागमती अपराजिता अछि...’ बाढ़िक कष्ट सं ग्रसित,
अधोगति सहैत जनता, आ जनता पर पुलिसक लालफीताशाहीक प्रहारक चित्रा
उपस्थित केने छथि। पुलिसक अनाचारक उपस्थापन मे कहैत छथि ‘फेर पुलिस
आबि-आबि कए हमरा सभ कें तंग कर’ लागल। जकरा संग पाइ-कौड़ी छलैक
से पाइ-कौड़ी द’ कें पुलिसक ठोकर सं बचल रहल। रातिखन क’ युवती सभ गाड़ीक
डिब्बा सं बिलाए लागलि।’

मैथिली मे तीन दर्जन सं बेसी कथा राजकमलक प्रकाशित छनि, जाहि मे
मनुष्यक बाह्य सं बेसी अंतरंगक वर्णन अछि। कथा चाहे ‘ललका पाग’हो कि ‘सांझक
गाछ’; ‘ननदि भाउज’ हो कि ‘वैष्णव’; ‘फुलपरासवाली’, हो कि ‘आवागमन’ सभ
ठाम नायकक मनोवेग आ मनोभाव कें पढ़बाक चेष्टा राजकमलक कथा मे अछि।
मनुष्यक एक-एक टा अभिक्रिया ओकर मनोवेगहि सं निर्देशित होइत अछि। अर्थात्,
एक-एक टा हरक्कति सं मनुष्यक ओहि कालक मनःयात्रा कें व्याख्यायित कएल
जा सकैए। मनोविश्लेषणे हिनकर शिल्प कें नूतनता देलकनि अछि से कहब प्रायः
अनर्गल नइं होएत। ‘खरीद-बिक्री’ कथा हो आ कि ‘सुरमा सगुन विचारै ना’ आ
कि आने कोनो कथा हो, हिनकर नायकक मानसिके यात्रा चलैत रहैत छनि। असलमे मैथिली मे अइ सत्य कें पहिल बेर राजकमले चैधरी चिन्हलनि, जे उत्तम कोटिक
कथा मनोविश्लेषणेक धरातल पर लिखल जा सकैए। ‘एकटा चम्पाकली: एकटा विषधर’
कथाक चम्पाकली भरि कथा मे मानसिके द्वंद्व सं परेशान रहैत अछि। हिनकर कोनो
कथाक पाठ काल कथाक पात्राक व्यस्तता देखि कए स्वयं पाठक परेशान भ’ जाइत
छथि। एकहि संगें, पात्रा कें मस्तिष्क मे अपन असली उद्देश्य पर नजरि राखए
पड़ैत छनि, तदनुकूल घटनाक मायालोक गढ़ए पड़ैत छनि, जे शिकार कहीं हमर
लक्ष्य कें बूझि नइं जाए, शिकारो अपना मोने अपन लक्ष्य तय कएने रहैत अछि।
तदनुकूल हरक्कतिक नाटक करैत रहैत अछि। शिकार आ शिकारीक ई मानसिक
द्वंद्वक चित्राण जाहि वैशिष्ट्यक संग हिनका ओतए उपस्थित अछि, तकर विधिवत
व्याख्या तं नंइ भ’ सकल, मुदा परवर्ती मैथिली कथा लेखन मे ओ प्रविधि प्रस्फुटित
भेल। आ से गंगेश गुंजन, राजमोहन, प्रभास आ तकर बादोक कथाकारक रचना
संसार मे व्यक्त भेल अछि।

‘साहित्य का उद्देश्य’ (पृष्ठ-44) मे प्रेमचन्द कहने छथि, ‘कथा ध्रुपदक ओ
तान थिक जाहि मे गायक महफिल शुरू होयबा सं पूर्वहि अपन संपूर्ण प्रतिभा देखा

परंपरा सं प्रगति धरिक अनुशीलन / 141

दैत अछि। एक क्षण मे चित्त कें एतेक माधुर्य सं परिपूरित क’ दैत अछि जतेक
राति भरि गीत सुनला सं नहि भ’ सकैत अछि।’ राजकमलक कथा मे ओ क्षमता
रहैत अछि जे कम सं कम समय लगाकए पाठक बेसी सं बेसी आनन्द प्राप्त क’
लैत अछि। कोनहु कथाकारक छोट सं छोट कथा अपन क्षीण काया सं पाठक कें
संतुष्टि तखनहिं द’ सकैत अछि जं ओ रचनाकार अपना रचना मे कल्पनाक तिरस्कार
केने होथि आ विश्वसनीयताक प्रति आग्रह देखओने होथि। कथाकार कें समाजक
पर्यवेक्षकक संग-संग स्वयं भोक्ता सेहो होएबाक चाही राजकमल एहि मे विश्वास
करैत छलाह। ओ कतहु सहृदयता वा भावुकतावश अपन पात्राक संग सहानुभूतिक
वर्षा नहि कयलनि। अपन आंतरिक वेदना कें मार्मिक ढंग सं उपस्थित करैत रहलाह।
सतत् अपन पात्राक कछमछी आ औनाहाटि कें अपन हृदयगत भाव सं संबद्ध कयलनि।
प्रत्येक साहित्यकार पहिने समाजक इकाइ होइत अछि। समाजक प्रतिबिंब कोनो
ने कोनो रूप मे हुनका जीवन मे रहिते टा अछि। पेशा आ सामाजिक स्तर दुनू
सं एक रहितहुं ‘किरतनियां’ मे चन्नरदासक कामुकी नजरि किरतनियां पर अटकल
रहैत अछि। आ प्रयास करैत अछि जे कहिआ किरतनियांक नानी मरि जाए,
किरतनियांक एसगर भ’ जाए, जे हम ओकर शीशा सन देहक भोग करब शुरू
क’ दी। शीशा सन झलकैत देह वाली किरतनियांक देह भीख मांगैत काल बाटक
उड़ैत गर्दा सं मलीन भ’ जाइत छैक, मुदा ओकर नानीक लहास लग दयावान लोक
द्वारा फेकल रैजकी कें गनि कए दूनूक जाहि रूपक क्रिया-कलाप होइत अछि तकर
मनोविश्लेषण करैत लिखैत छथि, ‘एह ! तीन टाका मे त’ हम दुनू आठ दिन ताड़ी
पी लेब।’ छोट-सं-छोट काया मे एतेक गंभीर बात कहि देनाइ हिनकर स्वाभाविक
धर्म भ’ गेल छलनि।

राजकमलक प्रायः सभ कथा मनोवैज्ञानिक सत्य पर आधारित अछि। कथा
‘एकटा चंपाकली एकटा विषधर’ मे टाकाक कारण दशरथ झा द्वारा अपन कुमारि
बेटी चंपाक तारुण्य कें आठम-सातम दशक मे पैर रखनिहार शशि बाबूक हाथ
मे सौंपबाक धारणा बनाएब, चंपाकली सन अपन चंपाक विवाहक प्रस्ताव शशि
बाबूक सोझां राखि दशरथक स्त्राी जखन शशि बाबूक आगां ठाढ़ रहैत छथि, तखन
शशि बाबू कें दशरथ झाक स्त्राी मे कोनो भयावह विषधरक बोध हैब...ई सभ
मनोवैज्ञानिक सत्य थिक, पेटक हेतु देह बेचब, कामुकतावश असहाय अबलाक
शीलहरण करब ई सभ सामाजिक यथार्थ आ मनोवैज्ञानिक सत्य थिक। पलंग पर
बैसल शशि बाबू लग चंपा द्वारा चाहक प्याली आनब आ ओहि कालक हुनका
चंपाक स्थितिक आभास हैब कतेक मनोविश्लेषणात्मक अछि, ‘चंपाक हाथ थरथरा
रहल छनि...चंपाक अंग-अंग कांपि रहल छनि। सौंसे कपार घाम सं भीजल...’ एहि
घटना सं, शशि बाबूक दिमाग मे उठैत प्रश्न हुनका मथि कए राखि दैत छनि।
पलंग पर ओंगठल शशि बाबूक सोझां मे नीचां पीढ़ी पर बैसल दशरथ झाक

142 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


निहोरा-मिनती करब, चंपा कें बड्ड अखरैत छैक। ओ सोचैत अछि, ‘...बाबूजी पलंग
पर किएक नहि बैसल छथि।...कोन स्वार्थक कारणें एखन शशि बाबूक लेल चाह
बनाओल जाइत अछि ?’ कथा ‘ननदि-भाउज’ मे टहलि-बूलि कए घुरल, चिंतित
पदुमा कें देखि रामगंजबालीक दिमाग मे ई प्रश्न उठब जे आइ बंगट नहि भेटल
हेतनि, भरिसक दुनू ननदि-भाउज कें आब भुखले रहय पड़त, सर्पदंश सं मुइल बंगटक
संग रति-प्रसंग कएला सं पदुमाक आतंकित हैब ई सभटा मनोविश्लेषणात्मक दृश्य
थिक। कथा ‘वैष्णव’ मे चारि बर्ख सं अपन विधवा पुतौहुक संग जीवन व्यतीत
कएनिहार श्रीमंत बाबूक चरित्राक उपस्थापन जेहन फरीछ क’ कए राजकमल प्रस्तुत
कयने छथि से अपूर्व छनि। पुतौहु द्वारा परसैत काल थारी मे माछ चल अयबाक
कारण जिनगीक हरेक क्षेत्रा मे मान्यता प्राप्त रूटीन कें तोड़ि देनिहार श्रीमन्त बाबू
बिगड़ि उठैत छथि, मुदा चारि बरख सं सूतल ज्वालामुखी एकहि बेर जगजियार
भ’ कए फुटैत अछि। ओ कमलपुरवाली अपन ससुरक सभ कुकर्मक बखिआ उघारैत
छथि। ई सभ दृश्य अपन-अपन गरिमाक संग विविध ठाम उपस्थित भेल अछि।
‘बाबू साहेबक टीक’ मे बाबू साहेबक जीवंत चरित्रा-चित्राण भेल अछि। शहरी
चटक-मटक सं रंगल युवती होस्पीटलक नर्स बरमा कें देखिकए ओकर शरीरक भोग
करबाक पाछां, ओकरा संग बियाह करबाक पाछां अपन पैतृक संस्कार बिसरि जाइत
छथि। मृग-मरीचिका मे पड़ल बाबूसाहेब ओहि छौंड़ीक कहला पर अपन टीक कटाबैत
छथि, पुनः जखन कामुकताक खुमारी टुटैत छनि तं ओ कटलहा टीकक गेठरी घाट
पर ताकए दौड़ैत छथि। आर्थिक जर्जरता मे टूटल परिस्थितिक नारीक भोग आजुक
पुरुष कोन तरहें करैत छथि, ओकर लाचारीक फायदा ई कुकर्मी समाजक तथाकथित
संभ्रांत लोक कोना लैत छथि, ताहि वस्तुक सजीव चित्राण तीन चारि वाक्य मे‘खरीद-बिक्री’ मे शरणार्थीक मुंह सं कराकए वर्णन शैलीक उत्कृष्टता देखौने छथि।
एहिना हिनक सभ कथा मे समाजक कोनो ने कोनो यथार्थक उद्घाटन होइत छनि।
हिनकर सभ कथा यथार्थक पोषक, दृष्टांतक रक्षक आ अभिव्यक्तिक सुंदरताक हेतु
महत्वपूर्ण अछि। कथा मे चित्रांकन सं नव रूपें मनोविश्लेषणक प्रभाव देखबैत छथि।
जीवनक आवश्यकताक प्रति निष्ठा, समस्याक समाधान वा तकर प्रयोगक प्रति आग्रही
राजकमल सगरे रहलाह अछि।

माक्र्स, एंजिल्स आ फ्रायड चिंतकक चित्राण सं प्रभावित राजकमल अपन
सभ कथा मे सत्यक नग्न चित्रा प्रस्तुत करैत रहलाह एहि तीन चिंतकक भावनाक
स्पष्ट चित्रा अपन कथा मे प्रस्तुत केलथि। हिनक कथा शीर्षक ‘ललका पाग’ कें
सर्वाधिक लोकप्रियता भेटलैक। जे किछु हो, जीवनक यथार्थ मूल्यक चित्राण कर’
मे, कत्र्तव्यबोधक प्रति साकांक्ष रह’ मे आत्मानुचिंतन मे वा नग्न वर्णनक पक्षपात
मे, हिनकर कथा सभक विशेष महत्व अछि। कम सं कम शब्दक प्रयोग क’ कए
बेसी सं बेसी बात कहि देबा मे ई माहिर छलाह। हिनका मे शब्दब्रह्माक गुण छलनि।

परंपरा सं प्रगति धरिक अनुशीलन / 143

परंपरा सं प्रगति धरिक अनुशीलन


लिखबा काल, लेखक कें जे किछु हाथ लागि जाए, ओ सबटा सार्थके नइं होइत
अछि, ठीक तहिना, जे किछु छूटि जाए, ओ सबटा निरर्थके नइं होइत अछि।
ऐतिहासिक विकास, वैज्ञानिक प्रगति आ सामाजिक परिवर्तनक क्रम मे विरोधी
शक्तिक पारस्परिक संघर्ष सं जिनगीक नवल-नूतन आयाम परिलक्षित होइत रहैतअछि। समय परिवत्र्तनक अइ धारा मे बहुत रास एहेन सामाजिक अंतर्विरोध सब
उठैत अछि, जे ध्यातव्य होइत अछि, व्याख्येय होइत अछि। स्वाधीनताक तत्काल
बादक जे समय छल, अर्थात छठम दशकक प्रारंभ, से मैथिली कथाक विचित्राताक
समय छल। मैथिलीक संपूर्ण कथा धारा, हास्य-करुण रसक सरिता में डूबल छल,
मिथिलाक वैवाहिक पाखंड मे ओझराएल छल। अही समय मे ललित-राजकमल-मायानन्द
सन सबल कथाकारक टीम मैथिली मे प्रगट भेल। आ, मैथिली कथा अपन रूढ़
भ’ गेल परिधान सं बाहर आबि गेल। अपना समयक विसंगति कें सूक्ष्मता सं जं
कथाकार ताकि लिअए, तं सैह ओकर सार्थकता थिक। ई टीम, से ताकि लेलक।
निरर्थक आ उपेक्षित साबित भेल विषय आ व्यक्ति, अइ कथाकारक टीम लेल सार्थक
आ अपेक्षित भ’ गेल। ललित, जतए सामाजिक रूपें अपैत भेल व्यक्तिक मनोभावकें चीन्हए बूझए लगलाह, ओकर हीनवृत्तिक पृष्ठभूमि ताकए लगलाह, राजकमलअइ समस्त हीनवृत्तिक उत्स ताकि ओकर भत्र्सना करए लगलाह आ दोसरक माथ
पर बोरसि राखि कए घूर तपनिहार कें नांगट करए लगलाह, ओतहि मायानन्द,
सामाजिक आ पारिवारिक संबंधक तनाव, पाखंड, विसंगति आदि कें उघार करए
लगलाह। अइ त्रिपुंडक तीनू शाखा तीन दिशाक अनुसंधान क’ कए अपना-अपना
गतिएं दिशा संकेत देबए लगलाह। ई कहब आवश्यक होएत, जे भाषाक प्रवाह,
शिल्पक नूतनता आ विषयक चमत्कारपूर्ण अनुसंधानक अछैत अभिव्यक्तिक आंतरिक
धारा मे मायानन्द पर हरिमोहन झा, मनमोहन झा आ बंगलाक शरदचन्द्रक असर

144 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


छलैन्हें। मुदा, से कोनो दोष नइं थिक। हिनकर पहिल कथा संग्रह ‘भांगक लोटा’
(1951) तं हास्ये कथाक संकलन छल। किंतु ओइ हास्यहु मे समयक यथार्थ आ
जीवन-यापनक विसंगति ठाम-ठाम अपन गर्वोन्नत माथ उठौने अछि, विवश जकां
नइं, जोश आ होश आ साहस सं। जे-से३

‘आगि, मोम आ पाथर’ (1960) दोसर कथा संग्रह थिक आ ‘चन्द्रबिन्दु’
(1983) तेसर। सन् 1960 में ‘बिहारि, पात पाथर’ आ सन् 1965 में ‘खोंता आ
चिड़ै’ उपन्यास सेहो आएल। सन् 1959-60 क लिखल हिनकर कविता सभक
एकटा संकलन ‘दिशांतर’ 1965 मे प्रकाशित भेल। अइ संकलनक परिशिष्ट मे
किछु गीतो अछि। सन् 1988 मे हिनकर गीत-गजलक संग्रह ‘अवान्तर’ प्रकाश
मे आएल। ‘माटी के लोग सोने की नैया’, ‘प्रथमं शैल पुत्राी च’, ‘मंत्रापुत्रा’ तथा
‘पुरोहित’ चारि टा हिन्दी उपन्यास राजकमल प्रकाशन सं आएल। पहिल हिन्दी
उपन्यासक पृष्ठभूमि ग्रामांचल थिक आ शेष तीनूक मानव सभ्यताक विकास संप्रारंभ भेल शृंखला। ‘मंत्रापुत्रा’ हिन्दी सं पूर्वहि मैथिली मे प्रकाशित भ’ गेल छल
आ अइ पर साहित्य अकादमी सम्मान सेहो देल गेल। मुदा, पुस्तकक गिनती कराएब
मायानन्द मिश्रक मूल्यांकन नइं थिक। हिनकर असल मूल्यांकन थिक ‘बीजारोपण’।
ज्योतिरीश्वर सं ल’ कए एखन धरिक मैथिली साहित्यक परंपरा सुदृढ़ स्थिति मे
चलैत रहल अछि, सब भाषाक साहित्यक दृष्टि-संपन्न इतिहास लिखाइत रहल।
मैथिली मे एखन धरि कोनो तार्किक दृष्टिक इतिहास नइं लिखल गेल। खास क’
कए काल विभाजनक तं कोनो दृष्टिए नइं देखाएल। मायानन्द मिश्र ओइ पहिल
व्यक्तिक नाम थिक, जे काल विभाजन पर सुनियोजित दृष्टिएं सोचलनि। एहि
सं बेसी तार्किक आ सुचिंतित काल निर्धारण एखन धरि आन नइं क’ सकल छथि
! आगू की हएत, से के कहत३ ! मैथिली मे गीति काव्यक प्राचीन परंपरा अछि।
विद्यापतिए सं प्रारंभ भेल ई परंपरा बीच-बीच मे विरल आ कि सघन रूपें चलैत
रहल अछि। मुदा विद्यापतिक गीत मे लोक-जीवनक मोनक कोमल आ सुकुमारभावनाक उत्कृष्ट प्रस्फुटन जाहि तरहें भ’ रहल छल, से बिचला दौर में लुप्त जकां
भ’ गेल छल, तकर नवारंभ फेर सं मायानन्देक ओतए संभव भ’ सकल ‘नभ आंगन
मे पवनक रथ पर कारी कारी बादल आएल’। मायानन्दक गीत शैली मैथिली मे
ततेक लोकप्रिय भेल, जे हिन्दीक संगीतकार शैलेन्द्र तक कें प्रभावित होअए
पड़लनि।३जाहि समय मे हिन्दी में प्रगतिवाद, प्रयोगवादक पश्चात नई कविता,
अकविता३नाना तरहक काव्यांदोलन चलि पड़ल छल, मैथिली मे सोमदेव ‘सहगतबाद’
कें स्थापित कए’ मे लागल छालाह, ताहि समय मे मायानन्द मैथिली काव्य मे
अभिव्यंजनावादक व्याख्या क’ रहल छलाह। हिनका संपादन मे बहराइत पत्रिका
‘अभिव्यजना’ मे अइ प्रकारक कविता प्रकाशित कएल जाइत छल। हिनकर मान्यता
छलनि जे अइ प्रकारक कविताक स्वभावे टा नवीन नइं, ओकर अभिव्यंजना प्रणाली

परंपरा सं प्रगति धरिक अनुशीलन / 145

सेहो, सर्वथा नवीन, आकस्मिक आ आकर्षक होइत अछि। आगू आबि कए अपन
संग्रह ‘दिशांतर’ क भूमिका मे समकालीन कविताक व्याख्या जाहि चमत्कारपूर्ण
शैलिएं कएलनि से ओहि समयक आ प्रायः एखनुको पाठकक लेल नव कविता
कें बूझ’क हेतु जादुई छड़ी थिक। राजकमलक ‘स्वरगंधा’ (1959) क प्रकाशनकपश्चात कीत्र्तन-भजन आ रति-समागम पर कविता लिखनिहार कवि लोकनि ओकर
निंदा कएलनि, मुदा जखन आगू आबि कए मायानन्दक ‘दिशांतर’ आ सोमदेवक
‘कालध्वनि’ देखलनि, तखन हुनका विरोध करबाक अपन क्षमता पर संदेह होअए
लगलनि। ‘दिशांतर’ संकलनक कविता सब जतेक महत्वपूर्ण अछि, ओइ समयक
काव्यधाराक सूत्रा पकड़’ लेल ओकर भूमिका ताहू सं बेसी महत्वपूर्ण। मंचक माध्यमे
मैथिली भाषाक अस्मिताक लेल जाहि तरहक आंदोलनात्मक रुखि मायानन्द ठाढ़
कएलनि सेहो प्रशंसाक बात थिक। मैथिलीक उपलब्ध सरकारी संसाधनक उपभोगमे एखन मैथिलीक कत्र्ता धत्र्ता जतए दिल्लीक साहित्य अकादमी सं ल’ कए पटनाक
मैथिली अकादमी आ चेतना समिति मे मधुमाछी जकां लुधकल अछि, ओतए मायानन्द
हालहु मे जखन किछु भाषा कें संविधानक आठम अनुसूची मे जोड़बाक चर्चा सुनलनि
तं धांइ सं दिल्ली पहुंचलाह आ सबटा राजनेता सब कें मैथिलीक अस्मिता आ संविधान
मे एकरा जोड़बाक औचित्य सं सहमत क’ गेलाह। एहेन भाषानुरागी, एहेन गीतकार,
मैथिलीक एहेन सिपाही, इतिहासदृष्टि आ काव्यदृष्टि एहेन सं संपन्न मायानन्द,
जखन ‘भांगक लोटाक’ प्रकाशनक बाद अपन कथा सृजनक बाट ताकि लेलनि,
तखन जाहि कथादृष्टिक कथा सब आएल, से मैथिली कथा साहित्यक पायोनियर
संधान साबित भेल।

मायानन्दक कथा संसार कुल मिला कए मध्यवित परिवारक आर्थिक-मानसिक
तनाव आ पीढ़ीक द्वंद्व पर केंद्रित रहल अछि। ओना, कहब आवश्यक अछि, जे
आठम दशकक अंत अबैत-अबैत हिनकर कथादृष्टि एक बेर फेर अंगेठी-मोड़ लेलक,
अर्थात राजनीतिक सूक्ष्मता आ राजनीतिक जोड़-तोड़क गुणसूत्रा एतए व्याख्यायित
होअए लागल। मुदा ओहि सं पूर्वक हिनकर कथा दांपत्य जीवनक कटु-मधुक स्मृति
आ पुरान पीढ़ीक अतीत स्मरणक व्याख्या थिक।

‘चन्द्रबिन्दु’ कथाक पंडित लक्ष्मीकांत झा अपन दुनू पुत्रा रमाकांत आ निशिकांत
कें उच्च शिक्षा द’ कए उच्च पदस्थ क’ देलनि, देश-दुनियां बदलि गेल, लोकक
जीवन क्रम बदलि गेल, मुदा लक्ष्मीकान्त खुट्टी गाड़ने अपन पुरान आ जड़ मान्यताकसंग जीबैत रहि गेलाह। पीढ़ीक इएह संघर्ष ‘उत्तरचरित’ कथा मे सेहो व्याप्त अछि।
धरणीधर झा अपन बालसंगी काशीकांतक संग बैसि कए जखन वार्तालाप करैत
छथि, दुनू अपन-अपन बेटा-पुतहु द्वारा कएल गेल सेवा-बरदासिक प्रशंसा मे पुल
बन्हैत अछि, मुदा भीतरे-भीतर अपना कें भाग्यहीन कहैत अछि। एक, दोसरक फूसि
कें सत्य बुझैत अछि आ दुनू अपन-अपन सत्य कें फूसि बना कए अभिव्यक्त

146 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


करैत अछि। चकित कर’ जोगर बात ई थिक जे अइ पीढ़ीक अंतरालक एहेन
मार्मिक व्याख्या मोन कें हिला देबा मे, आ दुनू पीढ़ीक पाठक कें नव ढंगें प्रशिक्षित
करबा मे सफल भेल अछि। दू मे सं कोनो पीढ़ीक बदमाशी कतहु नइं देखाइत
अछि। नव पीढ़ी कें पुरान पीढ़ीक प्रति पर्याप्त आदर छैक, पुरान पीढ़ी कें नव
पीढ़ीक प्रति पर्याप्त प्रेम छैक, मुदा दुनू अपना-अपना समयक मान्यताक संगें जीबए
चाहैत अछि। नव पीढ़ी पाखंड त्यागि रहल अछि, मुदा पुरान पीढ़ी रुढ़ि कें पकड़ने
अछि, जकरा ओ अपन परंपरा आ धर्म मानैत अछि। नव पीढ़ी पुरानक संग यथासाध्य
समझौता क’ कए अपन मान्यताक संगें आगू जाए चाहैत अछि, मुदा पुरान अपन
पुरान पिजड़ा मे घूरि जाए चाहैत अछि। ऐतिहासिक विकासक क्रम मे इएह अंतर्विरोध
मनुष्यक जीवन-यापन मे नव-नव आयामक दर्शन करबैत अछि आ मायानन्द अइ
अंतर्संघर्षक व्याख्या मे सार्थक आ सफल योगदान देने छथि।

हिनकर दोसर काोटिक कथा थिक जाहि मे दांपत्य जीवनक तनाव रेखांकित
होइत अछि। मुदा ई हिन्दीक नई कहानीक दांपत्य तनाव नइं थिक। ई तनाव शुद्ध
मैथिलीक आ शुद्ध मिथिलाक थिक, जतए चिनबार पर राखल डेकची (गोल पेनक
कारणें) कनेक ठोकर लागि कए हिलैत अछि आ दस बेर हिल कए अपनहि स्थिर
भ’ जाइत अछि। अर्थाभाव, मनोरथक अभिव्यक्ति, श्रमजन्य थकान, छोट-छोट
लालसाक अपूर्ति, साड़ी, चप्पल, गहना आदिक ठोकर सं दांपत्य जीवनक ई डेकची
हिनकर कथा मे हिल उठैत अछि आ स्वयमेव थिर भ’ जाइत अछि। दांपत्य जीवनकई वृत्त कोनो अर्थें रहस्यात्मक नइं अछि। जं एतए कोनो रहस्य अछियो, तं ओ
रहस्य ‘ओपेन टु आॅल’ अछि, पति-पत्नी कंें जीवन जीबाक लालसा छैक, दुनू कें
प्रेम लुटएबाक लालसा छैक, कर्म करबाक लालसा छैक, अधिकार लेल नारा लगएबाक
ने प्रयोजन छैक, ने लालसा। आइ नारीवादक नाम पर भारतवर्ष मे खूब नारेबाजी
भ’ रहल अछि, जे एतुक्का पारिवारिक जीवन कें तहस-नहस क’ देलक, अइ विकराल
स्थिति मे जं मिथिलाक पारिवारिक संबंध आ मानवीयता बचल रहत, तं मायानन्दकअइ कोटिक कथाक कारणें, फ्रांस सं उठल सिमोन द’ बुआक नारा सं प्रभावित
कोनो छद्म नारीवादी स्त्राी-पुरुषक कारण नइं। ‘हंसीक बजट’, ‘काल रेत’, ‘गाड़ीक
पहिया’ आदि अही कोटिक कथा थिक, जतए अल्प वेतनभोगी परिवारक संपूर्ण
लालसा कें घोकरी लगबए पड़ैत छैक। भरि मास मोन बंटने रहैत अछि, मुदा मासक
अंत होइते जखन ओछ भेल तौनी जकां ओ अपन लालसा कें एंड़ी सं चोटी धरि
नइं झांपि पबैए तखन, ओ ठेहुन मोड़ि कए अपन लंबाइ घटा लैए। अर्थतंत्राक अइ
चाक पर दांपत्य जीवनक थुम्हा आकार ग्रहण करैत अछि। सौंसे कथा मे पत्नीक
छोट-छोट मनोरथ आ पतिक पैघ विवशता लटा-पटी करैत रहैत अछि, तहिना
पति-पत्नीक लटापटी सेहो चलैत रहैत अछि आ अंत मे दुनू पाटी एक दोसराक
सुख-शांति लेल, एक दोसराक तृप्ति लेल, एक दोसराक पूर्णता लेल समागमरत

कंस सं डेराए गेलहुं बलराम / 147

जोड़ी जकां एकाकार भ’ जाइत अछि।

हिनकर तेसर कोटिक कथा शुद्ध मानवता आ संबंधक निर्वाह मे त्यागक
महत्वक व्याख्या थिक। ‘टुटैत कीलक जांत’, ‘एकटा सुखी लोकक डायरी’ अही
कोटि मे अबैत अछि। ओना सूक्ष्मता सं देखल जाए, तं दुनू एके कथाक दू खंड
थिक। पहिल मे जतए केंद्रीय शक्तिक अनुपस्थितियो मे जांत निके ना अपन दायित्व
निर्वाह करैत जा रहल अछि, ओतहि दोसर कथा मे एकसरे कील दूरस्थ घुमैत जांत
कें शक्ति द’ रहल अछि। वैयक्तिक लालसा, लोभ, लिप्सा, ऐश-आराम कें तिलांजलि
दैत अइ दुनू कथाक केंद्रीय आ परिधीय पात्रा अपन-अपन दायित्व निर्वाह मे एकटा
दुर्धर्ष संघर्ष मे जुटल अछि। संपूर्ण अभाव आ लिप्साविहीन जीवन जीबि लेबाकअइ सफलता मे ई कथा सब उत्कट मानवीय प्रवृत्तिक सनेश छोड़ैत अछि। ‘सतदेवक
कथा’ आ ‘ट्रान्सफर’ प्राचीन परिपाटीक शिल्प मे लिखल कथा थिक, जाहि मे सनेस
तं विलक्षण देल गेल अछि, मुदा एकर शिल्प ततेक व्याख्यात्मक आ एक सीमा
धरि उबाउ अछि, जे एकर प्रभावान्विति धरि पहुंचैत-पहुंचैत थकानक अनुभव होअए
लगैत अछि। अपंगता आ गरीबी आ अशिक्षाक कारणें नेनपन सं उपेक्षित व्यक्ति
कोन सीमा धरि अक्खड़, अहंकारी आ बाद मे प्रेम केनिहारक प्रति घृणा भाव कें
पोसैत अछि आ अंततः आदर भेटला पर आत्महत्या करैत अछि, तकरे विवरण
‘सतदेवक कथा’ मे आ परिश्रम, प्रेम, निष्ठा, व्यापार, प्रतिष्ठा, सरकारी विसंगतिआदिक संयुक्त प्रभाव सं उत्पन्न विकृत स्थितिक चित्राण ‘ट्रान्सफर’ कथा मे भेल
अछि।

‘रंग उड़ल मुरुत’ युग परिवर्तनक प्रतिनिधित्व कर’वला कथा थिक। मिलाकए
देखी तं ललितक ‘रमजानी’ सं एकर तुलना कएल जा सकैए। मुदा एतबा तं संपूर्ण
तुलना सं स्पष्टे अछि, जे जतए ललितक नायकक संपूर्ण मंडल आधुनिकता आ
प्रगतिक आग्रही छनि ओतहि मायानंदक पुरान पीढ़ी अपन रूढ़ि पर अड़ल रहैत
छनि। मुदा स्वयं मायानन्दक झुकाव नवपीढ़ी दिश देखल जाइत छनि। यद्यपि अइ
कथा मे जं कथाकार तटस्थ रहितथि, अर्थात् जखन अर्जुन पंडित प्लास्टिकक खेलौनासब कें इनार मे फेकि आएल, ओतहि कथाक अंत क’ दितथि, तं ई कथा परिवत्र्तन
संघर्ष कें बेसी निखारि सकितए। पलास्टिकक खेलौना जं प्रगतिक परिचायक थिक,
तं माटिक मुरुत पारंपरिक कलाक। पारंपरिक कलाक सुरक्षा सेहो साहित्यसेविए
लोकनिक दायित्व थिकनि। संपूर्ण कथा मे मायानन्द सांस्थानिक शिक्षाक दारुण
अभावक अछैतो लोककला कें जाहि तरहें वंशानुगत विकसित कएलनि अछि, से
कथाक अंत अबैत अबैत एक रती झूस भ’ जाइत छनि।

आठम दशक भारतक राजनीति मे उथल पुथलक दशक छल। मायानन्द अपना
टीमक एहेन रचनाकार मे सं छथि, जे गद्य-पद्य दुनू मे रचना कएलनि; हिनकर
रचना काल सब सं नमहर रहल आ तें ई समयक अनुसार अपन जीवन-दृष्टि आ

148 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


समय बोध कें सदति काल चोखगर करैत रहलाह। ई बात अलग सं कहबाक प्रयोजन
नइं अछि, जे राजनीतिक बोध सरि भ’ कए पहिल बेर मैथिली कविता आ कथा
मे सेहो, मायानन्देक ओतए आएल। आठम दशकक राजनीतिक हलचलक दुष्प्रभाव
मिथिलाक युवक कें डरपोक आ भविष्यक प्रति निराश तथा शंकित बना देलक,
प्रौढ़ पीढ़ी कें बैमान आ बुजुर्ग पीढ़ी कें शुक्राचार्य (कुकृत्यक ज्ञानदाता) बना देलक।ई स्थिति, मायानन्दक कथा ‘भय प्रगट कृपाला’(माटिपानि, दिसंबर-1984), ‘दीन
दयाला’ (माटिपानि, जनवरी-1985), ‘कौशल्या हितकारी’, ‘माध्यम’, ‘भैरव’ (रचना,
अगस्त-1984), ‘हर्रे लगे न फिटकिरी’ (बसात, दिसंबर-1985), ‘जिंजीर’ (मिथिला
मिहिर, कथाअंक, सितंबर-1987) आदि कथा सब मे देखल जा सकैत अछि। मैथिली
कथा साहित्यक लेल ई दुखद प्रसंग थिक जे एहेन प्रगतिकामी, विकासमुखी आअहू वयस मे अपना कें बदलि सकबाक ऊहि रखनिहार कथाकार मायानन्दक लेखन
आब कमि गेलनि अछि। हिनके पीढ़ीक कथाकार बलराम छनि, आन बातक लेल
जं तुलना नहिओं होअए, तं बलराम जकां लेखन विरल करबा लेल मैथिली पाठक
हिनका दोषी मानैत रहतनि।

गतिशील भाषा, जनपदक शब्दावली आ विवरणात्मक शिल्पक कारणें मंच
सं साहित्य धरि, सामाजिक वार्तालाप सं अध्यापन धरि प्रशंसित होइत रहलाह।
मुदा कथा मे ई कतोक ठाम अति विवरणात्मक भ’ गेल छथि। कथाक वातावरण
कें अनूदित करबा काल ततेक लीन भ’ गेल छथि, जे ओकर ‘डिटेल्स’ कनेक बेसी
कहा गेल छनि। ‘सतदेवक कथा’ आ ‘ट्रान्सफर’क जं चर्चा करी, तं कैक ठां बुझााएत
जे कथाक लक्ष्य दिश जाइत-जाइत कथाकार किछु अवांतरो कहि देबाक लोभ संवरण
नइं क’ सकलाह अछि। मुदा हिनकर भाषा हरिमोहन झा जकां संचरण मे अत्यंत
तरल आ मुलायम, गुदगुदी लगबै बला आ प्रभाव मे अत्यंत नोछराह छनि, तकरे
परिणाम थिक जे ओहि अवांतरो बात सब कें पाठक कथाक भरसहा मानि लैत
अछि।

मायानन्द मिश्रक साहित्यक मूल्यांकन नइं भेल अछि, से सत्य बात थिक,
मुदा मैथिली मे मूल्यांकन भेले किनकर अछि ? एतबा कहल जा सकैत अछि जेबहुमुखी प्रतिभा आ कैक फ्रन्ट पर एके संग क्रियाशील रहलाक कारणें मैथिलीक
रतिगामी मठाधीश, हिनकर जतेक उपेक्षा करए चाहैत छलाह, ततेक क’ नइं भेलनि।
आइ, जखन ‘विश्व-शांतिक द्रौपदी केर चीर/खिंचने जा रहल अछि/आन्हरक संतान’
आ ‘कौरवी-लिप्सा निरंतर आइ बढ़ले जा रहल/दिन-राति’ आ ‘वृद्ध सभ आचार्य
केर प्रज्ञा गेलनि हेराय’, तखन, अइ विकराल स्थिति मे मायानन्दक क्षिप्र आ तीक्ष्ण
लेखनक आवश्यकता मैथिली साहित्य कें छैक आ एहि आवश्यकताक पूर्ति
मायानन्दक कें करबाक चाहिअनि।

कंस सं डेराए गेलहुं बलराम / 149

कंस सं डेराए गेलहुं बलराम?


स्वातंत्रयोत्तर कालक मैथिली कथालेखन मे बेस प्रतिभावान लेखक सभ जुटल छलाह।
ललित, राजकमल, मायानन्द, धीरेन्द्र, सोमदेव, रामदेवक नाम ल’ओ कए अइ पीढ़ीक
पूर्णता बिना बलरामक नाम नेने नइं भ’ सकैत अछि। अगस्त 1955 मे हिनकर
पहिल कथा ‘दृष्टिदोष’ वैदेही मे प्रकाशित भेल। एखन धरिक सूचनाक अनुसार
करीब तीन दर्जन हिनकर कथा प्रकाशित भेल अछि। ‘संदर्भ’, मार्च 1986 मे
प्रकाशित कथा ‘कागचेष्टा’क बाद हिनकर कोनो कथा देखबा मे नइं आएल। मैथिली
अकादमी आ साहित्य अकादमी सं प्रकाशित प्रतिनिधि कथा संकलन सब मे हिनकर
‘औनपी’, ‘पुरान डीह परक न्यों’ आ ‘झुनझुना’ संकलित कएल गेल। कथापरक लेख
जे किओ लिखए लगलाह, से हिनकर नाम आ कथा पर चर्चो कएलनि। मुदा ई बात
चकित करैत अछि, जे सब किछुक अछइत बलराम कथा लेखन मे लगातार सक्रिय
किऐक नइं छथि। ओना ई सत्य बात थिक, जे एम्हर आबि कए हिनकर चर्चा-बर्चा
कम भ’ गेल आ अलग सं हिनका पर चर्चा कहिओ नइं भेल। मुदा ई तं मैथिलीआलोचकक प्रवृत्ति थिक। मैथिलीक आलोचक एहि ज्ञान सं अपरिचित छथि, जे
उपेक्षा आ अचर्चा, कोनो प्रतिभावान लेखकक हत्यो क’ सकैत अछि। स्वस्थ
समालोचना कोनो समर्थ रचनाकार कें आओर बेसी सामथ्र्यशाली बनबैत अछि, से
ज्ञान जाहि साहित्यक आलोचक कें नइं हो, तकर वक्तव्य आ तकर लेखनक
काग्निजेन्स लेब कोनो अर्थें उचित नइं थिक। ओहुना, बलराम अपनहि पीढ़ीक
कथाकारक हालत देखि लेथि, किनका पर की चर्चा भेल अछि ? ललित आ
राजकमल पर किछु भ’ओ सकल, तं से कहिआ, कोन स्थिति मे, आ किनका द्वारा ?
तें, जं बलरामक कथा-लेखन सुस्त अछि, तं एकर सर्वाधिक जिम्मेदारी स्वयं
बलरामक थिकनि।

पेशा सं संस्कृत विश्वविद्यालयक अधिकारी, रुचि सं साहित्यकार, स्वभाव सं
ईमानदार अर्थात् हरिश्चन्द्रक गुरु आ तखनहुं जं चाहब, जे चर्चा मे रही, से कोना
होएत ? मैथिलीक आलोचकक मुंह सं रोटीक टुकड़ी ठकि कए खएबा लेल लेखक

150 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य

कें नढ़िया बनब आवश्यक छैक। भने ओ कारकौआ होथि, हुनकर प्रशंसा करिअनु,
हुनकर बनि कए रहू आ कहिऔ आहा हा...अहांक गायन जे विलक्षण अछि ! एक
टा गाबि कए सुनाउ ! तखन ओ गौताह, रोटीक टुकड़ी खसि पड़लनि तकर कोनो


कथा शिल्पक विश्वकर्मा


बीसम शताब्दीक सातम दशक मैथिली साहित्यक लेल अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखैत
अछि। किछु महत्वपूर्ण बात मे सं पहिल ई थिक जे अही दशक मे ‘मिथिला मिहिर’
सन पत्रिकाक पुनरारंभ भेल। फलतः अइ दशकक प्रतिभाशाली रचनाकार सभ कें
अपन बात आम नागरिकक सोझां रखबाक पर्याप्त अवसर भेटलनि आ तें अइ दशक
मे मैथिली मे तीक्ष्ण आ सूक्ष्म दृष्टिक कथाकारक एकटा झमटगर पीढ़ी तैयार भेल।
राजमोहन झा अही पीढ़ीक श्रेष्ठ कथाकार छथि, जे अपन विशिष्ट जीवन-दृष्टि,
विलक्षण विषय बोध, आ प्रभावशाली कथन शैलीक कारणें अपन संपूर्ण पीढ़ी मे बेछप
छथि आ अपना तरहक एसगर कथाकार छथि। मैथिली मे जं हिन्दी अथवा कोनो
आन भाषा साहित्य जकां तटस्थ आलोचकक परंपरा रहितए, तं मैथिली कथा
लेखनक अइ काल कें कोनो ने कोनो नाम द’ कए आगू बढ़ाओल जइतए, मैथिलीक
‘नव कथा’ अथवा आने कोनो कथा कहि देल जइतए। ओना नीके भेल जे से सब
नामकरण नइं भेल आ आइ धरिक मैथिली कथा लेखन बिना नामेक चलल आबि
रहल अछि। ‘कथा’ कथा होइत अछि, ओ ने नव होइत अछि, ने पुरान होइत अछि।

ओना, ई विडंबने थिक, जे जाहि समयक गप ई भ’ रहल अछि, ओहि समय
मे मैथिली मे आलोचनाक नाम पर थोड़ेक प्राध्यापक वर्ग सब किछु-किछु चर्च-बर्च
कतहु-कतहु करैत छलाह, जाहि मे सं गनल-गूथल दू-चारि गोटए कें छोड़ि कए प्रायः
किनकहु मे साहित्यिक बोध विकसित नइं छलनि, अहंकार बोध परमान चढ़लछलनि आ अपना कें ओ लोकनि सृजनकत्र्ताक भाग्यविधाता बुझैत छलाह। ने तं एना
कोना होइतैक जे ललित, राजकमल, मायानन्द, धीरेन्द्र, सोमदेव, हंसराज, बलरामकपीढ़ी स्वातंत्रयोत्तर कालक जाहि मायालोक, पाखंड आ फरेब सं सावधान कएलक;
राजमोहन, प्रभास, गुंजन, रेणु आदिक पीढ़ी मैथिली कथालेखन मे नव-नव आयाम
तकलक, भारतीय राजनीतिक आंतरिक अस्थिरता आ बाहरी आक्रमण सं प्रभावित

जनजीवन पर पड़ल जाहि दुष्परिणाम सं परिचित भेल, तकरा व्याख्यायित करबाक
पलखति समीक्षक लोकनि कें नइं भेटलनि ?

मैथिली साहित्यक ई विडंबने थिक, जे एतए आलोचना साहित्यक कोनो
आवश्यकता नइं बूझल जाइत अछि। आलोचनाक गणना जं कएल जाए, तं बी. एण्,
एम. ए. क कक्षा मे प्राध्यापक द्वारा लिखाओल प्रश्नोत्तर अथवा कोनो नव पोथी
अएला पर या तं ओहि पोथीक भूमिका, संपादकीय, आशीर्वचन आदि अथवा कोनो
पत्रिका मे ओइ पोथीक सरंगोलिया समीक्षा, अथवा जं कोनो लेखक मरि गेलाह आ
कोनो संपादक कोनो तरहें हुनकर सरोकारी भेलखिन, आ ओ विशेषांक निकालए
लगलाह, तं ओइ मे विरुदावली, ओतहु रचनाक समालोचना नइं इएह परंपरा अछि।
एम्हर आबि कए गोधियांवादी परंपराक स्थापना भेल अछि, तकरा तत्वावधान मे किछु
पान-परसाद आलोचनाक नाम पर देखाइत अछि।

राजमोहन झा मैथिली मे अइ सब पान परसाद सं वंचित रहलाह। हमरा मोन
पड़ैत अछि, जे एम.ए.क कक्षा मे एकटा मैथिलीक प्राध्यापक राजमोहन झाक
संकलन ‘एक आदि: एक अंत’क पहिल कथा ‘ज्वारभाटा’क विवेचन करैत बाजल
छलाह एकटा कन्फ्यूज्ड लेखक द्वारा लिखल कन्फ्यूज्ड नायकक कथा थिक
‘ज्वारभाटा’। हम एखनहुं छगुंता मे छी, ओहू समय मे छलहुं। मुदा ओहि समय से
हमरा आ हुनका मे ‘तुम क्लास’ आ ‘आप क्लास’क अंतर छल, तें बहुत सार्थक
विरोध नइं क’ सकल रही। जाहि मैथिली मे एहेन ईष्र्यालु आ प्रतिभाहीन शिक्षकक
बहाली होइत अछि, ताहि मैथिलीक अध्येता कतेक कन्फ्यूज्ड भ’ सकैत छथि,
सहज¯ह कल्पनाक विषय थिक।

मैथिली मे चर्चा-बर्चाक परंपरा चुल्हा-चिनबार धरि कनेक बेसिए अछि।
मनुष्य केर वैयक्तिक समस्या आ चारित्रिक छवि कें उबारबाक आ डुबएबाक ठीका
कोनो एकटा समूह ल’ लेताह आ ओहि छविक कसौटी पर हुनकर साहित्यक परीक्षण
करताह। सेहो परीक्षण कतहु-कतहु मौखिके क’ लेताह। राजमोहनक कथा लेखनक
चर्चा करैत किछु गोटए कहताह जे ‘हिनकर कथा मैथिली भाषा मे अवश्य लिखल
अछि, मुदा ई मैथिलीक कथा नइं थिक।’ ण्ण्ण्कारण रोचक अछि ‘हिनकर कथाक
बैकग्राउंड जे थिक, से मिथिलाक नइं थिक।’ आब अइ मतिछिप्पू वक्तव्यवीर
लोकनि कें के बुझएतनि, जे महाश्वेता देवीक संपूर्ण सृजन-संसार छोटानागपुरक
आदिवासीक जीवन पर केंद्रित अछि, मुदा ओ बंगलाक साहित्य थिक, बोधिसत्व
मैत्रोयक उपन्यास ‘झुनिकेर पेट्टो मुक्तो’ दक्षिण भारतक समुद्री जीवन पर लिखल
अछि, मुदा ओ बंगलाक उपन्यास थिक, ‘आवारा मसीहा’ शरतचन्द्रक जीवन पर
अछि, मुदा ओ हिन्दीक उपन्यास थिक...। जे मैथिली मे एखन धरि, आलोचना दृष्टि
आ आलोचनाक प्रतिमान अंकुरित नहि हेबाक मुख्य कारण थिक अइ वृत्ति मे


संलग्न व्यक्ति मे ईमानदारी आ तटस्थताक दारिद्र्य, अध्ययनशीलताक दुर्भिक्ष, रूढ़ि
आ पाखंडक गुलाम हेबाक प्रवृत्ति। ओना, प्रतिभाक अभाव तं मूल कारण थिकहे।
मुदा, कतोक बेर अभ्यास आ श्रम सं सेहो प्रतिभा विकसित होइत अछि। मैथिलीक
आलोचना आ इतिहास लेखन दिश उद्यत हेबा मे आ स्वस्थ आलोचनाक प्रतिमान
स्थापित करबा मे मैथिली मे इएह बाधक तत्व सब अछि।

आखिर की कारण थिक, जे चारि दशक धरि दत्तचित्त भ’ कए मैथिलीक सेवा
मे जुटल रहनिहार कथाकार राजमोहन झाक गिनती एखनहुं आलोचक सब मात्रा
पंतियानी मे लैत छथि। ‘एक आदि: एक अंत’ (1965), ‘झूठ-सांच’ (1972),
‘एकटा तेसर’ (1984), ‘आइ काल्हि परसू’ (1993), ‘अनुलग्न’ (1996) पांच गोट
कथा संग्रह आ ‘गल्तीनामा’ (1983), ‘भनहि विद्यापति’ (1992) ‘टिप्पणीत्यादि’
(1992) तीनटा निबंध-समीक्षादिक पुस्तक प्रकाशित भेलाक बाद राजमोहन झा पर
अलग सं चर्चा करबाक फुरसति मैथिली साहित्य मे नइं निकालल जा रहल अछि !

साहित्य आ मानवीयता कें सर्वस्व समर्पित कएनिहार राजमोहनक कथाक
परिवेश एक खास स्वाद-गंध आ तेवरक अछि। अइ पीढ़ीक समस्त कथाकारक प्रायः
ई विशेषता थिकनि, लगैत अछि, जेना मंत्रालय जकां सब गोटे अपन-अपन
पोर्टफोलियो बांटि नेने होथि आ किनकहु अधिकार क्षेत्रा मे आन कियो दखल नइं
दैत होथि।

राजमोहन झाक निबंधे लेखन सं जं बात शुरुह कएल जाए, जे हुनकर ई मुख्य
विधा नइं छिअनि, तं एकटा स्थिति साफ-साफ सोझां अबैत अछि, जे एकदम
साफ-साफ, शुद्ध-शुद्ध, दोषमुक्त, निष्कलुष समाजक आ परिवारक कल्पना हिनका
मस्तिष्क मे बैसल अछि। कनेको टा त्राुटि, दाग, पाखंड, बैमानी, अहंकार, नीचता
व्याप्त अछि, तं चुट्टा सं ओकरा उठाकए बाहर क’ देताह। साहित्य आ साहित्यकारेक
दाग निकालए लगलाह, तं देख लिअ’, तीनू टा निबंध संग्रह सोझां अछि।

अइ स्वभावक राजमोहन, कथा लेखन कें अपन मुख्य धाराक रूप मे अपनौलनि।
यद्यपि प्रारंभ मे किछु कवितो लिखने छथि आ स्वयं एक दिन सामान्य बातचीत मे
कहने छथि, जे ‘हमरा लेल अनुभूतिक अभिव्यक्ति लेल कथा सर्वशक्त माध्यम
थिक। कविता मे बहुत रास राॅ मैटेरियल रहि जएबाक गुंजाइश रहैत अछि। जखन
कि कथा मे एकर अवकाश नइं होइत छैक।’ ई तथ्य आन तरहें अलग सं विचारणीय
थिक, मुदा एतए ई बात कतेक महत्वपूर्ण अछि जे आइ धरिक अपन रचना-संसार
मे राजमोहन मध्यवर्गीय समाजक बेचैनी, युयुत्सा आ मोनक व्याकुलता कें रेखांकित
करबा मे संलग्न रहलाह आ निरंतर कथाक कथन एवं कथन-शैली कें कुम्हारक घैल
जकां ठोकि-बजा कए दुरुस्त-तंदुरुस्त करैत रहलाह। दोषमुक्त समाज आ दोषमुक्त
व्यक्तिक परिकल्पना मे राजमोहनक रचना संसारक ओर-छोर सतत अन्वेषी बुझाइत

रहल। प्रमाणित सत्य थिक जे एक मनुष्य अइ धरती पर आत्मबुभुक्षा, यौन पिपासा
आ आत्मसुरक्षा इएह तीनटा प्रवृत्ति ल’ क’ अबैत अछि। मनुष्यक आन तरहक
प्रदूषण तं समाज मे होइत अछि। लोभ, मोह, लिप्सा, अहंकार, भय, द्वेष, अराजकता
आदि सब एतहि सिखैत अछि। अर्थात् मनुष्य अबैत तं अछि एकटा निष्कलंक आ
निष्कलुष जीवक रूप मे, मुदा एतए ओ तरह-तरह केर अवगुण सं युक्त भ’ जाइत
अछि। मानव जीवनक समस्त त्रासदीक मूल कारण इएह प्रदूषण थिक। ‘एक आदि:
एक अंत’ कथा संकलन सं ल’ क’ ‘अनुलग्न’ धरिक समस्त कथा मे राजमोहन
मानव जीवनक आ तकर आत्मस्थापनक सूक्ष्मतम तंतु सब कें पकड़बाक सफल
प्रयास अही मान्यताक संग कएने छथि। अपना पर रहस्यमयताक आरोप कें स्पष्ट
करैत राजमोहन स्वयं कहने छथि, ‘...अपन दुख वा पीड़ा कें ककरो आगां व्यक्त
करबाक कोनो प्रयोजन वा सार्थकता हम नहि बुझैत अयलहुं अछि।...एकटा सामान्य
सुखी पारिवारिक जीवन बितयबाक अवसर भेल रहैत, तं ई रहस्यमयताक प्रश्न नहि
उठैत...।’ मात्रा ई दू पांती, राजमोहनक रचना संसारक प्रायः एक-एकटा रहस्य कें
केरावक छिम्मड़ि जकां खोंइचा अलगा क’ राखि दैत अछि। कोनो सृजन केर ब्रह्मा,
अपन सृजन मे मात्रा ओएह क’ पबैत अछि, जे ओकर संपूर्ण अनुभव लोक आ
मनःलोक मे अर्जित रहैत छैक। राजमोहन, एकटा व्यवस्थित पारिवारिक जीवन नइं
बिता सकलाह, ई स्थिति हुनका मस्तिष्क मे ‘परिवार’ आ ‘घर’क एकटा विस्तृत
स्वरूप अंकित कएलकनि आ हिनकर कथा तें मनुष्यक ‘जीवन’, ‘घर’ आ ‘संबंध’
कें प्रमुखता सं स्पष्ट करैत अछि। जीवनक प्रति आसक्ति, दांपत्य जीवनक त्रासदी
आ संबंधक बिखराव इएह तीन टा हिनकर कथाक मूल स्वर थिक।

कौखन चर्चा होइत रहैत अछि, जे राजमोहन जखन कखनहुं संबंधक बिखरावक
गप करैत छथि, तं अपन कथाक स्त्राी पात्रा कें सर्वथा दोषी ठहरबैत छथि। ई वक्तव्य
हड़बड़ी मे देल गेल वक्तव्य थिक। असल मे, राजमोहन अपना पीढ़ीक सर्वथा बेछप
कथाकार छथि। नान्हि टा कथ्य कें ततेक सूक्ष्मता आ सावधानीक संग, ततेकउत्कृष्ट शैली मे ई चित्रित करैत छथि, जे प्रेक्षक कें कतोक बात पकड़ाइत नइं छनि।
कोनो संबंधक बिखरावक स्थिति हिनकर कथा मे मात्रा दू कारणें उपस्थित होइत
अछि मिथ्या आडंबर आ निरर्थक अहंकारक कारणें। अपन मौलिकता सं कटबाकप्रवृत्ति, मोने-मोन गुड़-चाउर खाइत रहबाक प्रवृत्ति, उदार आ ईमानदार दृष्टि सं एक
दोसराक समक्ष अपना कें नइं खोलबाक आ एक दोसरा पर विश्वास नइं करबाकप्रवृत्ति। अइ बिखरावक जड़ीभूत कारण होइत अछि। ई प्रवृत्ति सब मैथिलक मौलिकप्रवृत्ति थिक आ राजमोहनक कथाक पात्रा हरदम अही अवगुणक शिकार भेलनि
अछि। छोट-छोट नासमझी सं हिनकर पात्रा सभ सर्वदा घोर त्रासदी मे पड़ैत रहल
अछि, अशक्य मोंछ कें ठाढ़ करबाक फेरी मे संपूर्ण जीवन कें त्रासद बनबैत रहल


अछि। अर्थात् राजमोहनक कथा अइ बातक प्रमाण थिक, जे स्वातंत्रयोत्तर कालक
मैथिल कोयला हंसोथैक फेरी मे हीरा गमबैत रहल अछि। मैथिली मे राजमोहनक
कथा अपना तरह एसगर संसार बनबैत अछि, जतए कथा-तत्व कम आ विवरण-तत्व
बेसी अछि। सत्य पूछी तं, कथाक शैली मे राजकमल जतेक तरहक सूत्रा छोड़ि गेलाह,
ताहि मे एकटा सूत्राक समग्र व्याख्या हिनकहि ओतए भ’ सकल आ ई बिना
घटनाक्रमक विस्तार कएने, स्थितिक ‘डिटेल्स’ कें उजागर करबा मे संलग्न रहलाह।
एतहि सं मैथिलीक आधुनिक कथा-शैलीक दोसर डेग उठल अछि। पहिल डेग
राजकमलक ओतए उठल छल।

मात्रा शैलीक बल पर संपूर्ण रचना कें कथाक पूर्णता देबाक ई व्यवहार भारतक
आनो आन भाषाक साहित्य मे कम ठाम भेटैत अछि। छठम दशकक मोह भंगक
पश्चात्, विज्ञान आ भौतिकताक आक्रमण सं मिथिलाक जनता जाहि तरहें मूलोछिन्न
भेल, तकरे विवरण आ ओहि मूलोछिन्नताक कारणक अन्वेषण थिक राजमोहनक
कथा। अइ क्रम मे मनुष्यक आचार-विचार, रहन-सहन, आहार-व्यवहार, रीति-रेवाज
विकसित हेबाक बदला प्रदूषित भ’ गेल। स्पष्ट अछि, जे प्रदूषण कोनो स्थिति कें
सर्वांश मे आहत करैत अछि तें ‘ज्वारभाटा’, तें ‘दंश’, तें ‘भोजन’, ‘घर’, ‘अनर्गल’,
‘पहिल मृत्यु’ आदि कथाक स्थिति बनैत अछि। ई प्रदूषण समाज आ जीवन कें अइ
तरहें प्रभावित कएने अछि, जे कतहु आ कोनो तरहें मनुष्य अपना कें सुरक्षित अनुभव
नइं करैत अछि। असुरक्षाभाव, आतंकबोध, भयबोध हरदम मनुष्य मे व्याप्त रहैत
अछि, आ सएह राजमोहनक कथा मे मुखरित होइत रहल अछि।

राजमोहनक कथा सामान्यतया प्रथम पुरुषक वक्तव्य मे भेटत, जेना कथा
वाचकक संस्मरण हो। ‘भोजन’, ‘घर’ आकि ‘सांप छुछुन्नरि’ सन कोनो कथा उठालिअ’, तं ई बात स्पष्ट भ’ जाएत। ‘भोजन’ एकटा दंपत्तिक दैनिक जीवनक
दिनचर्या व्यक्त करैत, विपरीत विचारधारा आ विपरीतमुखी वेवलेंग्थक चिंतन-चित्रा
व्यक्त करैत अछि। जड़ि सं उखड़ल वर्तमान मात्रा कें केंद्र बुझनिहारि पत्नी द्वारा,
पतिक भावुकता आ ओकर श्रेष्ठ चिंतनशीलता उपेक्षाक कथा व्यक्त करैत अछि।
पति अपन पत्नी ममताक उग्रता आ मूलोच्छिन्नता सं परिचत रहैत ओकरा अपन
सब अनुभूति अत्यंत सोचि-गुनि कए कहैत अछि। मुदा पत्नीक उद्दंड अल्हड़पन
(निर्दोष अल्हड़पन तं गुणे होइत अछि) ओकर उपेक्षा क’ जाइछ। ई कथा आधुनिकसमाज मे परिवारिक सुखानुभूतिक घेंट पर नारीवादक तरुआरिक (विकृतिक) असरि
द्योतित करैत अछि। ‘सांप-छुछुन्नरि’ जं एकटा पैद्य पदाधिकारीक द्वैध चरित्राकआत्मप्रशंसी प्रवृत्तिक व्याख्या थिक, तं ‘घर’ एकटा यात्राीक यात्रा मे भोगल मानसिक
व्यथा। दुनू कथा थिक तं छोट सन घटनाक व्यापक व्याख्या, मुदा सही अर्थ मे ई
दुनू कथा भोक्ताक मानसिक चरित्रा चित्राण थिक। मनोविश्लेषण, दोषमुक्त परिवेशक

कल्पना आ औचित्यपूर्ण शिष्टाचार, राजमोहनक कथाक मूल लक्ष्य होइत अछि आ
अइ गति सं हिनकर समस्त कथाक वितान आगू बढ़ैत रहल अछि।

हिनकर कोनो कथा आजुक अतिक्रांतिकारी नायकक कथा जकां कूथि कए
नइं चिकरैत अछि। कथाकारक स्थितिबोध, संबंधबोध आ समाजबोधक ई उत्कर्ष
थिक, जे समस्त विपरीत परिस्थितिक अछैत हिनकर पात्रा चिकरा-भोकरी, लाठी-फरसा,
उठा-पटक नइं करैत अछि। कथाक नायक कें, अर्थात् कथाकार कें एतबा बोध छनि,
जे साहित्य सं समाजक निर्माण होइत अछि, तें स्वस्थ समाजक निर्माण हेतु अइ
परिस्थिति सभक दुष्परिणाम देखाएब पर्याप्त होएत। अर्थात् नानाविधि समस्या कें
सहैत, समाजक हित मे जेना राजमोहन अपना जीवन मे गुम्मी लधने छथि, अपन
व्यथाक प्रचार नइं करैत छथि, तहिना हिनकर पात्रा समस्त त्रासदी भोगलाक बादो
शिष्ट आ धीर रहैत अछि। समाज हित मे चुप रहैत अछि। मुदा कथा तं बहुत किछु
कहिए दैत अछि। आ, प्रायः इएह कारण थिक, जे राजमोहनक संपूर्ण रचना-संसार
पाठक कें हिला कए राखि दैत अछि। कथा समाप्तिक पश्चात् पाठक क्रोधित नइंहोइत अछि, व्यथित होइत अछि। उत्कृष्ट समाज-दृष्टि आ रचना-दृष्टिक प्रबुद्ध
कथाकारक ई अवदान विचारणीय अछि। कोनो खास कथा अथवा किछु कथाक नाम
गनाएब आवश्यक नहि अछि। कोनो कथा उठा लिअ’ नखलिस्तान, युद्ध-युद्ध-युद्ध,
एकटा तेसर, केंचुआ, भीड़ मंहक एकसर यात्राी, कायर, दर्द, चक्रव्यूह, आदंक, चिंता
आ चिंता, खोज...जकरे शुरू करी, ई स्वरूप ओतहि भेटत। राजमोहन केर शब्द
प्रयोग पर थोड़ेक आरोप लगाओल जाइत छनि। हम अइ बात सं सहमत छी।
शुद्धतावादीक छवि प्रस्तुत कएनिहार राजमोहन कें शब्द-प्रयोगक संबंध मे सेहो
सावधान रहबाक चाही। कतोक ठाम हिनका लेखन मे मैथिली सं अलग ओहेन
शब्दक प्रयोग होइत अछि, जकरा लेल मैथिली मे बेस उपयुक्त शब्द अछि। मुदा
लगैत अछि, ईहो प्रदूषणेक फल थिक। जे-से, राजमोहनक रचना-संसार व्यापक
समालोचनाक अधिकारी अछि। कहि नहि, मैथिली मे कहिआ होएत !


परंपराक रक्षक मुदा नवारंभक आग्रही


फरवरी 1967 मे राजकमल चैधरीक अध्यक्षता मे सुपौल मे तय भेल छल, जे रामकृष्ण
झा ‘किसुन’क संपादन मे मैथिली नव कविताक एकटा प्रतिनिधि संकलन प्रकाशित
हो। मुदा ई प्रकाशित भेल सन् 1971 मे, अर्थात् राजकमल आ किसुन दुनू गोटेक
अवसानक पश्चात्। हिन्दी मे सप्तक (तार, दूसरा, तीसरा) जहिना प्रमाण-पत्रा दात्राी
पुस्तक मानल गेल, तहिना जं ‘मैथिलीक नव कविता’ कें मानल जाए, तं कोनो
अनुचित नइं होएत। ओना प्रकाशनक जे दुर्दशा मैथिली मे आइ धरि रहल अछि,
तकरा कारणें मैथिली साहित्यक काल निर्धारण अथवा कोनो कृतिक ऐतिहासिकता
प्रमाणित करब कठिन अछि। तथापि..



अइ संकलन मे जाहि सोलह गोट कवि लोकनिक रचना संकलित अछि,
ताहि मे सं एकटा प्रमुख कवि छथि गंगेश गुंजन। गंगेश गुंजन, गीत, गजल, कविता,
कथा, उपन्यास, नाटक, एकांकी, नुक्कड़ नाटक आ किछु लेख आदि...सब लिखने
छथि, मुदा जें कि मैथिली साहित्यक माफिया सब कें साधबाक अवगति नइं छनि
अथवा मैथिलीक ‘नटवरलाल’, ‘सुखराम’ आदिक चोरि-चपाटी मे समर्थन देबाक
नैतिकता (?) नइं छलनि, तें कोनो खेमा मे चर्चित नइं भेलाह। कोनो उपकारी
पद पर नोकरी करैत होइ, पदस्थापना ओतए होअए जतए धरि पहुंचब मैथिलीक
लेखक-आलोचक लेल सहज आ खर्चमुक्त हो, नेत-धरम कें ताख पर राखि हुनका
लोकनि कें लाभान्वित क’ सकबाक सकरता होअए...अर्थात्, कोनो बैबें अहां हिनका
लोकनि लेल उपयोगी वस्तु होइअनि, तं ई अहां कें प्रतिभावान आ अहांक रचना
कें स्तरीय मानताह। जें कि गुंजन मे, ने तं अनिवार्य योग्यता छलनि, ने वांछनीय,
तें मैथिलीक आलोचक आ लेखकक नजरि मे नइं बसि सकलाह। ‘कर्म करू,
परिणामक चिंता जुनि करू...’ वला प्रवृत्ति राखि कए मैथिलीक आलोचक लोकनिक
लेल ई महत्वपूर्ण रचनाकार किएक हेताह ?

गुंजनक रचनात्मक यात्रा कुल चालीस वर्षक अछि। सन् 1961 मे हिनकर
पहिल रचना प्रकाशित भेल छलनि। स्पष्ट अछि, जे अभ्यास ताहू सं किछु पूर्व
सं करैत हेताह। आइ धरि मैथिली आ हिन्दी दुनू मे लगभग एगारह गोट पोथी
प्रकाशित छनि। मैथिली मे दूटा कथा संग्रह, एकटा नुक्कड़ नाटक आ एकटा हिन्दी
मे कविता संग्रह प्रकाशित छनि। ब्रज किशोर वर्मा मणिपद्म केर उपन्यास ‘नैका
बनिजारा’क हिन्दी अनुवाद आ ‘मिथिलांचल की लोक कथाएं’क संपादन सेहो कएने
छथि। मुदा गंगेश गुंजनक महत्व जान’ लेल हुनकर पुस्तकक संख्या महत्वपूर्ण नइंअछि, महत्वपूर्ण अछि ओहि पुस्तकक गुणवत्ता।

‘जाइत काल किछु नहि क’ गेलाह पिता हमरा नाम, घर ने खेत-खरिहान।
कहि गेलाह: बाट चलैत काल सतत् चलिह’ बाम, तकर रखिह’ ध्यान।’ जाहि
रचनाकार कें विरासत मे ई सनेश भेटैत हो, जे रचनाकार स्वभाव सं मुलायम आ
मान्यता मे अक्खड़ हो, तिनकर रचना संसारक आयाम सेहो निर्णायकक लेल एहने
श्रमसाध्य होएत। यात्राी आ राजकमलक पश्चात् मैथिली मे जे पीढ़ी क्रियाशील भेल,
ताहि मे गंगेश गुंजन अत्यंत महत्वपूर्ण रचनाकार छथि। हिन्दी मे नव भावबोधक
कविता जखन लिखल जाए लागल तं ओतहि सं दू जातिक कविताक विकास भेल,
एकटा जाति छल अज्ञेयक कविताक आ दोसर जाति छल मुक्तिबोधक कविताक।
मैथिली मे सन् 1949 (चित्राक प्रकाशन) आ सन् 1959 (‘स्वरगंधा’क प्रकाशन)क
पश्चात् एहेन कोनो दू जातिक कविता उल्लेखनीय नइं रहल। यद्यपि जाति दू अवश्य
छल एकटा जाति छल, यात्राी, राजकमलक कविताक; जे अपन आ परवर्ती पीढ़ी
कें दिशा संकेत दैत छल आ ओकर संघर्ष कें समर्थन दैत छल आ दोसर जातिछल, सुमन, अमरक कविताक; जे कीर्तन, भजन, रति शृंगारक विषय पर तुकबंदी
क’ कए मंच पर थपड़ी लुटैत छल। ओइ कविता सब कें देश-दुनियां, लोक-वेद
सं कोनो मतलब नइं छलैक। स्वभावतः सुमन, अमर कें अनुयायी नइं भेटलनि।
मुदा यात्राी, राजकमलक कविताक चिनगी अगिला पीढ़ी मे बेस जकां प्रज्वलित आ
प्रस्फुटित भेल। गंगेश गुंजन अही पीढ़ीक कवि छथि, कथाकार छथि, हिनका हिन्दी
साहित्यक ओर-छोर सेहो देखल छनि। आ कहबाक चाही, जे हिनकर रचना-संसार
मे, गद्य-पद्य दुनू मे, एकहि संग अज्ञेयक कलावाद आ मुक्तिबोधक वस्तुवाद दुनू
उपस्थित अछि।

ओना रचनाक विवेचन लेल व्यक्तित्वक विवेचन आवश्यक नइं होइत अछि,
मुदा जं जानकारी रहए, आ व्यक्तित्वक आलोक मे रचनाक चर्चा सेहो भ’ सकए,
तं अनुचित नइं हो। गंगेश गुंजन सदति काल, दोसर कें महत्व आ सम्मान देबाक
लेल तत्पर रहलाह अछि, अपन हानियो क’ कए दोसर कें प्रतिष्ठा देबा मे रुचिशील
रहलाह अछि। मुदा कोनो दुष्कर्म, कोनो अनिष्ट, अन्याय कें सहबाक क्षमता हिनकानइं रहलनि अछि। रोचक ई अछि, जे अइ दू प्रवृत्ति मे सं कोनो हिनका त्याज्य


नइं। अइ प्रवृत्तिक असरि हिनकर रचना पर सेहो पड़लनि अछि। आगि उगलब,
मुदा ओहि आगि सं किनकहु अनिष्ट नइं हो, सेहो ध्यान राखब इएह प्रवृत्ति गुंजनक
रचना संसारक रहल अछि, खाहे ओ पद्य हो आकि गद्य। ई स्थिति प्रायः अत्यंत
मानवतावादी रहलाक कारणें मैथिलीक लोक कें पसिन नइं पड़लनि। गुंजन बीसम
शताब्दीक सातम दशक मे अपन महत्व साबित तं क’ लेलनि, मुदा यथास्थितिवादी
पीढ़ीक वर्चस्व आ संबंधवादी खेमाक षड्यंत्राक कारणें अचर्चित रहि गेलाह।

ई तथ्य, सब कें स्वीकारि लेबाक चाही जे, मैथिली मे दीर्घ कविता (हम एकटा
मिथ्या परिचय) आ नुक्कड़ नाटक (बुधिबधिया) क संभावना सर्वप्रथम हिनके
अनुसंधान थिकनि। ‘नवगीत’ एकटा विधाक रूप मे हिन्दी मे नीक जकां विकसित
भेल। केदारनाथ सिंह सन महत्वपूर्ण कविक लेखनी सं सेहो ई विधा निःसृत भेल
अछि। मैथिली मे ई परंपरा ताकल जाए तं गुंजन सं पूर्वहु मायानन्द, भुवन आ
ताहू सं पूर्व भेटि सकैत अछि, मुदा गुंजन अहू चरित्राक पद्य मे पर्याप्त योगदान
देने छथि। ‘दुखक दुपहरिया’ गुंजनक किछु गीत-गजलक संकलन हालहि मे प्रकाशित
भेल अछि। अहू निबंध मे गुंजनक संपूर्ण साहित्य पर विस्तार सं चर्चा भ’ सकत,
तकर गुंाजइश नइं अछि। मात्रा हुनकर प्रवृत्ति मूलक किछु बात राखल जा रहल
अछि, जकर व्याख्या आगू भ’ सकैत अछि।

ई कहब अप्रासंगिक नइं होएत जे हिन्दी आ मैथिली मे अबाध गति सं रचनारत
आ प्रकाशनरत गुंजन जं परवर्ती काल मे हिन्दी मे प्रकाशन कम क’ देलनि तंसे मातृभाषाक प्रति उत्कट अनुरागे छल। वृत्ति सं सदति काल आकाशवाणी संसंबद्ध रहलाह अछि। रचना मे ध्वनिक महत्व पर सावधान रहबाक हिनकर प्रवृत्तिसंभवतः हिनकर वृत्तिगत प्रभावक फल थिक। हिनकर ‘उचितवक्ता’ कथा संग्रह
कें, वर्ष 1994 क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार देल गेल, ई ओतेक महत्वपूर्ण
बात नइं थिक। कारण, आइ भारतीय भाषाक कोनो साहित्य मे पुरस्कारक जे राजनीति
चलि रहल अछि, ताहि मे पुरस्कार कोनो रचनाक महत्व साबित नइं क’ सकैत
अछि।

वस्तुतः कोनो रचनाकार कोनो विधाक गुलाम नइं होइत अछि। असल बात
होइत अछि जे उक्त विधा मे रचनाकारक घनत्व, जनसंबंध कें कोन स्तर तक प्रमाणित
क’ सकल अछि। गुंजन वास्तविक अर्थ मे युगीन जन-जीवनक जटिल जीवन पद्धति
सं उपजल कुटिलता, त्रासदी आ विडंबनाक सोझराएल कथा शिल्पी छथि, जिनकर
गद्यो मे एकटा लयात्मकता आ पद्यो मे एकटा कथात्मकता अनुगुंफित रहैत अछि।

ओना तं आइ संपूर्ण साहित्ये व्यवस्थाक विरोध करैत अछि आ श्रमिक वर्गक
पक्षपात करैत अछि। आजुक साहित्य जं ईमानदार अछियो, तं तकर कारण इएह
थिक। ताहि मे व्यवस्थाक विरुद्ध ढाढ़ भेल गुंजन पैघ डिडीर कें मेटा कए छोट
करबाक फेर मे कहिओ नइं रहलाह, छोट डिडीर कें पैघ करबाक गुंजाइश तकैत

रहलाह अछि। हिनकर साहित्य मेहनती वर्गक दोहइ दैत अछि, ओकर अस्तित्वक
अनुसंधान करैत अछि आ ओकर अस्मिता बनएबाक न्यों पुख्ता करैत अछि। हिनकर
सभ पात्रा अपन शक्तिक समीक्षा करैत अछि। व्यवस्थाक यांत्रिकता मे ताल ठोकैत
सोंसि-नकार सं गुंजनक पात्रा डेराइत नहि अछि। एकांत मे बैसिकए बनावटी नोरो
नइं बहबैत अछि, एते धरि जे सीमान पर ठाढ़ भेल कुकूर जकां ओ भूकितो नइं
अछि, ओ इत्मीनान सं अपन जीवन प्रक्रिया मे लागल रहैत अछि। ओकरा अपन
शक्ति आ अपन कार्य पद्धति पर पूर्ण आस्था रहैत छैक। अभिप्राय ई नहि जे गुंजनक
पात्रा कें क्रोधाग्नि नइं छैक। से तं छैके, मुदा ताहि हेतु सभ सं पहिने ओ अपन
आलस्य सं संघर्ष करैत अछि। ई कहैत, एतए जं कबीर मोन पड़ैत छथि, तं बेजाए
कोन ? कबीर जीवन पर्यंत ओहि रक्तभोजी समुदायक तिरस्कार कएलनि आ अपन
युद्ध मे, अपन संधान मे, अपन मान्यताक संग अग्रसर रहलाह। विषयक स्तर पर
गुंजनक साहित्य जं एक दिश कबीरक स्मरण दिअबैत अछि, तं भाषा शिल्पक स्तर
पर अज्ञेयक।

हिनकर कृति मे खाहे ओ पद्य हो अथवा गद्य अथवा नाटक, सभठाम गहन
जीवन-दृष्टि परिलक्षित अछि। बारह गोट कथाक संकलन ‘उचितवक्ता’ मे अइ
शीर्षकक एकोटा कथा नइं अछि, मुदा अइ नामक सार्थकता ओइ समस्त कथा आ
रचनाकारक तीक्ष्ण दृष्टि मे अछि, जे बेपिरीत पड़ाइत मनुष्यक पतन, राजनीतिक
लोलुपता आ संक्रमणक कीड़ा जकां पसरैत हैवानीक पाछू आकर्षित लोक सभ कें
गंभीरता सं देखैत-गुनैत अछि। ‘संगी’ सन कथा, जकर केंद्रीय सरोकार प्रेम सं अछि,
मनुष्यक आदिम प्रवृत्ति आ समकालीन विवशताक संश्लिष्ट सूत्रा तकैत अछि आ
‘अपन समांग’ सन कथा युगीन अन्हर-बिहाड़ि मे सुखाएल पात जकां फड़फड़ाइत
मानवीय संबंधक खंडित अस्मिता कें चिन्हैत अछि। ई महत्वपूर्ण बात थिक जे
गुंजन अपन रचनात्मकता लेल आन कोनो चीज सं बेसी आवश्यक ‘मनुष्य’ कें
मानैत छथि। ‘मनुष्य, जे आइयो किछु ताकि रहल अछि, ओहि मनुष्यक परिचय
हम स्वयं ताकि रहल छीण्ण्ण्।’ हिनकर संपूर्ण रचना-संसार अही मनुष्य आ अही
मनुष्यक परिचय तकैत अछि। ‘हम एकटा मिथ्या परिचय’ वैह तकैत अछि, ‘अपन
समांग’ वैह तकैत अछि, ‘मनुक्ख आ गोबर’ वैह तकैत अछि आ आनो आन रचना
वैह तकैत अछि।

ओना तं प्रकाश, सत्यता, यथार्थ, खुशहाली इत्यादि हर्षातुर उपादान आम
जनजीवन मे कमे भेटैत अछि। गुंजनक कविता मे अन्हार, मिथ्या, परिचय, स्वप्न,
दमघोंटू वातावरण, पीड़ा, बौक-बहीर लोक, प्रतीक्षारत लोक, अपमान, निराशा, ताप,
रौद आदि शब्दक व्यवहार अधिक ठाम होइत अछि। रचनाकार अपन चारू कात
छिड़िआएल जाहि सूत्रा सं अपन रचनाक विषय लैत अछि, ओही मे अपन व्यक्तित्वो
गढ़ैत अछि आ ओही मे अपन दृष्टि कें मांजैत अछि आ ओही परिवेश मे अपन


काव्यपुरुषक छवि निर्मित करैत अछि। एहना स्थिति मे ई अकारण नइं भेल अछि,
जे हिनकर साहित्य मे एहेन बिंब आ प्रतीक प्रयुक्त भेल अछि आ ई प्रयुक्ति अपन
स्थान विस्तार सं बनबैत अछि। जं संदर्भपूर्वक अइ प्रयुक्तिक व्याख्या कएल जाए
तं स्पष्ट होएत ई सब शब्द हिनकर रचना मे अपन विराट् शक्तिक संग उपस्थित
अछि। गुंजनक रचना सं अपनैती करैत ओहि दृष्टांत आ संदर्भ सं परिचित हएब
आवश्यक अछि, अन्यथा हड़बड़ी मे मैथिलीक पाठक कें निर्णय देबा मे देरी नइं
होइत छनि, जे गंगेश गुंजनक रचना मे अर्थोत्कर्ष जटिल अछि। असल मे गंगेश
गुंजनक अनुभव संसार एकटा नव क्षितिज पर बनल अछि। स्पष्ट अछि जे किछु
पुरातनवादी लोक कें ई संसार प्रेषित नहि भेलनि। अइ संप्रेषण विमुख स्थितिक
दायित्व ओ लोकनि अपन अज्ञान कें कोना देताह ? तं कहि देब आसान भ’ गेलनि
जे गुंजनक रचनाक संप्रेषण बाधित अछि।

अंत मे ई कहब आवश्यक अछि, जे गुंजन अपन व्यवहार मे एक दिश अपन
पारंपरिक धरोहरिक रक्षक प्रतीत होइत छथि तं दोसर दिश मानवीय संवेदनाक बात
उठला पर सर्वथा एकटा नव धरातल पर नव परंपराक न्यों रखैत देखाइत छथि।
आ नवारंभक आग्रही ई अहू अर्थ मे देखाइत छथि जे हिनकर काव्य पुरुष सब
ठाम अपन जर्जर रूढ़ि कें त्यागि कए अपन जीवनक सुखमय बाट लेल नव संसारक
खोज क’ लैत अछि आ नव बाट पकड़ि लैत अछि। ई काज ‘आइ भोर’क नायक
सेहो करैत अछि, ‘पहिल लोक’क नायक सेहो आ एक सीमा धरि ‘अपन समांग’
आ ‘बुधिबधिया’क नायक सेहो।

जे-से, गुंजनक साहित्य अही नव धरातलक खोज मे एकटा नव प्रकाशक
काज करैत अछि।

कथा संसार मे कथाकारक जीवनी


प्रायः देखल जाइत रहल अछि, जे लेखक अव्यवस्थित जातिक लोक होइत अछि।
ई अव्यवस्था हुनकर जीवन-यापन सं ल’ कए लेखन धरि मे व्याप्त रहैत छनि आएहि अव्यवस्थाक दुष्परिणाम ओहि लेखकक परिवार, समाज तथा हुनकर मूल्यांकनकत्र्ता
धरि कें भोगए पड़ैत छनि। मुदा प्रभास कुमार चैधरी एकटा एहेन कथाकारक नाम
थिकनि जे व्यवस्थाक अनुपालन मे सर्वदा-सर्वथा उत्कर्ष पर रहलाह। व्यवस्थाक
अर्थान्विति एतए अभिधा मे अछि। भारतीय कोनो भाषाक रचनाकारक जीवन आ
लेखनक मूल्यांकन कएल जाए तं ई बात सोझां आओत जे, जे लेखक अपन रचनाशील
जीवन मे सफल आ यशस्वी छथि, जे सामान्यतया अपन नौकरी-पेशा मे दायित्वहीन
आ असफल व्यक्ति साबित होइत छथि। मुदा प्रभास बीमा कंपनीक नौकरी करैत
एहेन सर्वसफल प्रबंधन अधिकारी साबित भेलाह, जिनका सं हुनकर समस्त अध्
ाीनस्थ अधिकारी प्रेरणा लैत छलाह। ठीक तहिना लेखन-जीवन मे सेहो हिनकर
छवि रहलनि आ अपन समस्त अनुवर्ती पीढ़ीक रचनाकार कें प्रभावित कएलनि।
प्रभास मात्रा एकटा चीज मे असफल रहलाह, आ से असफलता थिक जे ई अपन
उदारता सं मैथिलीक एकोटा रचनाकार कें प्रभावित नइं क’ सकलाह, कारण जे
रहल हो।

सन् 1956-57 मे वैदेही मे प्रकाशित कथा ‘धरती कुहरि उठल’ आ ‘प्रतीक्षा’
तथा सन् 1961 मे मिथिला मिहिर मे प्रकाशित कथा ‘बाहर इजोत: भीतर धुआं’
सं प्रभासक कथा लेखनक समधानल संधान शुरू होइत अछि। भारतीय राजनीतिक
परिदृश्य लेल ई समय विचित्रा तरहक समय छल। हिन्दीक रचनाकार सब अपनरचनाकर्म मे अइ बिंदु पर चैकस छलाह, हिन्दी कविता मे ‘साठोत्तरी’ शब्दक
आविर्भावक भूमिका बनि रहल छल। तीसरा सप्तकक प्रकाशन भ’ चुकल छल।
कहानीक क्षेत्रा मे नव परिदृश्यक निर्माण भ’ चुकल छल। प्रभासक अध्ययनशीलताक


आयाम आ लेखन दृष्टि विराट छलनि। ओ देश-दशाक सब तरहें अवलोकन करैत
आ आन-आन साहित्य सं परिचय रखैत बहुत क्षमतावान रचनाकारक रूप मे अपन
उपस्थिति दर्ज कएने छथि। स्पष्ट अछि जे चीनी गणराज्यक धोखा, पाकिस्तानक
सीमा संघर्ष, देश मे राजनीतिक द्वंद्व आदिक व्याप्तिक पश्चात् राजनीतिपरक कथाक
रचना होइतए। मुदा मिथिलाक से दशा तखन धरि नहि छल। एहू समय धरि मिथिला
प्राचीन रूढ़ि सं, निर्धनता, निरक्षरता, अकाल, बाढ़ि आदि प्रतारणा सं, आर्थिक आ
शैक्षिक परतंत्राता सं, थोड़ेक सामंती स्वभावक दुष्परिणाम सं, अनुदार आ विषम
सामाजिक परिवेश सं उबरि नइं सकल छल। एहेन बात नइं छल जे मिथिला राष्ट्रव्यापी
राजनीतिक-आर्थिक-साहित्यिक समस्या सं प्रभावित नइं छल। असल मे जखन
स्थानीय समस्या विकराल रहैत अछि, तखन राष्ट्रीय समस्या दिश लोकक ध्यान
कम जाइत अछि। ओहुना घर बहारलाक बादे किओ अंगना आ दलान बहारबाक
चेष्टा करैत अछि। कथाकार प्रभासक प्रवेश-काल एहेन दारुण छल !

अइ विकराल समय मे प्रभासक कथा-लेखन प्रारंभ भेल। ई समय, मैथिली
कथाकार लेल एक दिश अइ तरहें चुनौतीपूर्ण छल तं दोसर दिश सुखकर ई छल
जे अही समय मे मिथिला मिहिरक पुनप्र्रकाशन प्रारंभ भेल। फलतः पर्याप्त
जोश-खरोशक संग एकटा सशक्त पीढ़ी कथा लेखन मे जुटल।

प्रभासक पहिल कथा संग्रह ‘नव घर उठय: पुरान घर खसय’ 1964 मे प्रकाशित
भेल। एगारह गोट कथाक ई संग्रह मैथिली पाठकक बीच खूब समादृत भेल। एकर
बाद पांचटा उपन्यास ‘अभिशप्त’ (1970), ‘युगपुरुष’ (1971), ‘हमरा लग रहब’
(1977), ‘नवारंभ’ (1979) तथा ‘राजा पोखरि मे कतेक मछरी’ (1981) प्रकाशित
भेल। आ कतोक बर्खक बाद 1988 मे हिनकर 28 गोट कथाक संकलन ‘कथा-प्रभास’
प्रकाशित भेल, जाहि मे दशकवार अपन रचनाकर्मक डाटा कथाकार स्वयं प्रस्तुत
कएने छथि। फेर एकटा बेस गतगर संकलन ‘प्रभासक कथा’ प्रकाशित भेल। पहिने
कहल जा चुकल अछि, जे प्रभासक प्रबंधन जीवन, वृत्ति आ लेखन तीनू मे कतेक
उत्कृष्ट छल, तकर प्रमाण ‘कथा-प्रभास’क लेखकीय वक्तव्य थिक। जे कोनोमूल्यांकनकत्र्ता हिनकर रचना संसार पर काज करब शुरुह करताह, तिनकर चारि
अना समस्या प्रभास सवयं हल क’ देने छथिन्ह।

विद्यापति, यात्राी आ राजकमलक बाद प्रभासे एकटा एहेन रचनाकार छथि,
जे भाषांतर मे सेहो ख्यात छथि। गंगेश गुंजन सेहो भाषांतर मे ख्यात छथि। ओना
अनुवादक माध्यमे आब तं कतोक रचनाकार आन-आन भाषा मे पहुंचि चुकलाह
अछि। मुदा प्रारंभिक समय मे प्रभास, गुंजन आ राजमोहन, हिन्दी मे मूलो लेखन
करैत छलाह। जे-से..



प्रभासक कथाक मूल केंद्र मध्यमवर्गीय मैथिल समाज थिक। जीवनक अधिकांश
भाग नगर-महानगर मे बितएलाक बादो हिनकर मोन हरदम गाम, घरक टोल-टापर,

डीह-डाबर, सर-कुटुम, पिता, बाबी, नानी, मौसीक बीच घुमैत रहलनि। ई बात विशेष
रूप सं उद्धरणीय थिक, जे आन कोनो भाषा साहित्यिक रचनाकार जखन प्रवासी
भ’ जाइत छथि तं हुनका लेखन मे गाम-घर नाॅस्टेल्जिया जकां उपस्थित होइत छनि।
मुदा प्रभासक ओतए गाम-घर, समाज-परिवार अपन संपूर्ण क्षमताक संग जीवित
रहैत अछि। सहज चरित्रा, आकर्षक कथन शैली, जनपदीय चरित्राक भाषा शिल्पक
आश्रय सं सामान्य जन-जीवनक इच्छा-आकांक्षा, स’ख-मनोरथ, जीवन-संघर्ष कें
चित्रित करबाकाल प्रभास एकटा शास्त्राीय गायक जकां सावधान रहैत छथि।
अनुष्ठानपूर्वक आ चैन सं कथा कहबाक पद्धति प्रभासक रहलनि अछि, जे एकटा
विशाल पाठक वर्ग अर्जित करबा मे सफल भेल अछि। प्रभास प्रायः अइ गूढ़ तथ्य
सं अवगत छलाह जे मात्रा घटना सूचित क’ देब ने तं पाठक कें संतुष्टे करत आ
ने जनपदीय विसंगति मेटएबा लेल ओकरा उद्वेलिते करत। तें, ओ घटनाक्रम आ
पात्राक ‘डिटेल्स’ कें गंभीरता पूर्वक रेखांकित कएलनि। समय-सीमा आ पृष्ठ सीमाक
अनुशासन सं कथा या तं विकलांग भ’ जाएत, लूल्ह-अपंग भ’ जाएत अथवा गोंग।
कथा जं बजंता नइं रहए, हथगर-गोड़गर नइं रहए, तं तकर प्रयोजन की ? प्रभासक
समस्त कथा आ उपन्यास बजंता अछि, हथगर अछि, गोड़गर अछि।

अपन रचना संसार मे कैक ठाम प्रभास फैंटेसी प्रेमी आ जीवन-मूल्यक स्तर
पर चित्राण मे असहजताबोधक दृश्यक चितेरा बुझाए लगै छथि। ‘एकालाप’ कथा
आ ‘नवारंभ’ उपन्यासक एकाध प्रसंग कें अइ कथनक पुष्टि हेतु देखल जा सकैत
अछि। मुदा, मूल कथाक अन्वितिक उत्कर्ष हेतु तथा मानवीय सपना, कल्पना आदिक
चित्राण हेतु प्रभासक लेल कोनोटा पद्धति त्याज्य नइं रहलनि अछि। असल मे, ई
स्थिति जे प्रभासक कथा शिल्प मे आएल अछि, तकर मूल कारण थिक मिथिलांचलकलोक-संस्कृति आ लोक-संवेदना सं हिनकर आत्मिक लगाव। हिनकर एक-एकटाकथा-कृतिक स्वभाव ई स्पष्ट करैत अछि जे नानी, बाबीक कथा-पिहानी सुनबाक
आदति सं आ तकरहि प्रेरणा सं हिनकर कथाकारक जन्म भेल अछि। लोक कथा,
लोकोक्ति आ मुहावरा हिनकर कथा-संवेदनाक सोइरी-घर थिक। निम्नवर्गीय कथा-पात्राक
प्रति हिनकर झुकाव सेहो अही गुणसूत्राक परिणाम थिक। ‘प्रतीक्षा’ (1957) सं
‘पतिबरता’ आ ‘अष्टावक्रक शेषकथा’ (1997) धरि मे प्रभासक लिखल लगाति
एक सय कथा मैथिली कें भेटलैक, जकर वस्तु आ शिल्पक आयाम बहुत विस्तृत
अछि। ‘क्लांत’, ‘सुभद्रा-हरण’, ‘सूर्यास्त’, ‘धमकी’, ‘पिता’, ‘बाबी’, ‘ढेप’, ‘मलाहकटोल’, ‘भयाक्रांत’, ‘युद्ध विराम’, ‘उत्तर काण्ड’, ‘एकालाप’, ‘इन्द्रधनुष’, ‘स्थानांतरण’,
‘बजंताक पोता’, ‘विकलांग’, ‘बाढ़ि’, ‘पतिबरता’, ‘एकटा दुराचारक कथा’, ‘जगबा
काल’, ‘टुस्सा आ बांझी’, ‘गय बिढ़नी: तोहर डंक’, ‘एक त्रिभुज: चारि कोण’
आदि कथा सब हिनकर कथा सृजनक विविध पक्ष कें द्योतित करैत अछि आ अपना
अपना समय मे बेस चर्चित रहल अछि।


प्रसंगवश एकटा घटना मोन पड़ैए, एकटा इन्टरव्यू मे मैथिलीक एकटा
ख्यातिनाम विभागाध्यक्ष प्रश्न कएने छलाह ‘राजकमलो सेक्स पर लिखै छल आ
प्रभासो सेक्स पर लिखैए, दुनूक सेक्स-आकर्षण मे की अंतर ?’ प्रश्न अहिना, एन-मेन
अहिना अपमानजनक क्रियापद मे पूछल गेल छल। ओहि समय मे तं हम क्रोध्
ों आगि उगल’ लागल रही, मुदा आइ, जखन कि ने तं ओ प्रश्नकत्र्ता जीवित छथिआ ने ई दुनू लेखक, तखन ओइ प्रश्न कें मोन पाड़ैत प्रश्नकत्र्ताक दृष्टिकोण पर
दया अबैत अछि, अहूं सभ कें दया अबैत होएत ! ओना प्रभास कें पढ़ैत काल
राजकमले टा किऐ, ललित, मंटो, चुगताई, शरत्, मोपासां, गोर्की सब स्मरण अबैत
रहैत छथि।

प्रभास मैथिली साहित्यक एकटा एहेन तुष्ट-दुरुस्त-समदर्शी आ उद्यमी कथाकार
छथि, जे कोनो तरहक कुंठा, उपेक्षा, अपमान आदिक आहार स्वयं नइं रहलाह,
लोभ-लालच कहिओ नइं दाबलकनि, रचनाकर्मक बलें धन लाभ या यश लाभ केर
तिकड़म नइं रचलनि (ई दीगर बात थीक जे रचनाक बलें हिनका बड़ बेसी यश
भेटलनि), मुदा तें आन किनकहु कुंठा, उपेक्षा आकि अपमानक सहन सेहो नइं
कएलनि। उपलब्धि आ ज्ञानक जाहि शिखर पर पहुंचि गेल छलाह, तकर एकन्नी
धरि एखन जे व्यक्ति सब नइं पहुंचलाह अछि, सेहो अहंकार मे सांढ़ जकां डिकरै
छथि। प्रभासक प्रभूत प्रशंसक छथि, मुदा तिकड़मबाजी, क्षुद्र विचार आ बेैमानी आ
अहंकार मे ‘दरभंगा स्कूल’क प्राचार्य हेबाक योग्यता रखैत छथि। व्यक्तित्व मे दूरो
दराज सं प्रभासक व्यक्तित्वक बसात नइं लागल छनि। जे हो..



तइ प्रभासक कथा-संसारक जखन विश्लेषण हो, तं ओकर आधार शास्त्राीय
बनाए कए नइं चलबाक चाही। प्रभासक कथाक विश्लेषणक दुइए टा आधार भ’
सकैत अछि समाजशास्त्राीय अध्ययन आ मानवीय (जीवन-यापन परक) अध्ययन।
आन कोनहु लक्षण ग्रंथक सहारा सं अथवा रजानीतिक प्रतिबद्धतापरक नाराबाजी
सं प्रभासक कथा नइं जंचा सकैत अछि। कतोक बात हिनकर कथा मे सूक्ष्मता
सं अबैत अछि, जकर नोटिस लेबा काल सावधान रहबाक स्थिति अबैत अछि।
प्रभासक कतोक एहेन कथा अछि जाहि मे निम्नजातीय अथवा निम्नवर्गीय स्त्राी
पुरुषक यौन शोषण आ श्रम शोषण सामंतवर्ग द्वारा देखाओल गेल अछि। मोट नजरि
मे ओ सामंत वर्गक अत्याचार अवश्य देखाइत अछि, मुदा ई प्रभासेक कथा थिक,
जतए ओ सामंत सभ डेराएल कुकूर जकां नांगरि सुटाकौने, मुदा झुकैत देखाएत।
ई प्रभासेक कथा थिक जइ मे सामंत वर्गक अइ डर कें शोषित वर्ग नोट क’ लैत
अछि आ तखन ओकरा अपन शक्ति पर भरोस होइत अछि। प्रभासक कथा अपन
मुक्तकामी शोषित कथानायक कें ई शिक्षा द’ दैत अछि, जे ‘भेड़िया गुर्राता है/तुम
मशाल जलाओ/उस में और तुममें /यही बुनियादी फर्क है/भेड़िया मशाल नहीं जला
सकता (सर्वेश्वर दयाल सक्सेना)।’ तें कोनो ‘पतिबरता’ सन स्त्राी, कोनो ‘बजंताक

पोता’सन पुरुष आकि आन कतोक पात्रा हिनकर कथा संसार मे ठाढ़ भेल अछि।

कथा हो अथवा उपन्यास, प्रभासक सृजन-देवताक जे सभ सं पैघ विशेषता
थिक ओ ई, जे हिनकर नायक संघर्ष-पथ पर हिलै नइं छनि। जीवन संग्राम मे
बेर-बेर पछाड़ खाइत छनि, सामाजिक-पारिवारिक कुचक्र मे बेर-बेर ओझरा कए धोखा
खाइत छनि, धांय भटका खसैत छनि, मुदा तत्काल उठि कए ठाढ़ होइत छनि।अपन नायक कें अथकित ऊर्जा òोत देबाक हिनका सन सफल आ लक्ष्य प्राप्तिकनिमित्त अपन नायक कें आस्थावान बनएबा मे निपुण कम कथाकार देखाइत छथि।

उपयोगी परंपराक रक्षा आ अनुपयुक्त रूढ़िक त्याग हिनकर जीवन आ
लेखन दुनूक विशेषता रहल अछि। कर्मकांडक आडंबर, धार्मिक पाखंड, पारंपरिक
लोकाचारक विसंगति आदि पर हिनकर कथा तीक्ष्ण व्यंग्य करैत अछि। शोषित,
सीदित वर्गक प्रति आत्मीयता आ प्रभु वर्ग कें चेतौनी, हिनकर कथा-सृजन मे मुखरभ’ कए आएल अछि। एकर अलावा, प्रेम तत्व, जे स्वातंत्रयोत्तर कालक मैथिलीक
प्रगतिशील रचना सं पृथक जकां होअए लागल छल; मात्रा संघर्ष, भोग, आतंक, पराक्रम,
सीदन, द्वेष, घृणा, भय आदि व्याप्त भेल चल जाइत छल; ताहू क्षेत्रा मे प्रभासक
कथा समधानल हस्तक्षेप कएलक अछि। पारिवारिक आ सामाजिक संबंधक आश्रय
सं सेहो, मैत्राीक आश्रय सं सेहो आ स्त्राी-पुरुषक संबंधक आश्रय सं सेहो प्रेम तत्व
हिनकर कथा मे पुनस्र्थापित भ’ सकल। मुदा, ई प्रेम शारीरिक उन्माद आ क्षणिक
उच्छवास धरि सीमित नइं अछि। अभिप्राय ई नहि, जे हिनका सं पूर्व मैथिली मे
‘प्रेम’ लुप्त भ’ गेल छल, बल्कि ई, जे हिनकर रचना मे ‘प्रेम तत्व’ अपन आयत
कें विस्तार देलक।

भाषा मे प्रतीकात्मकताक उपयोग क’ कए सेहो ई बेस जकां प्रभाव जमौलनि
अछि। ‘बाढ़ि’ सन कतोक कथा तकर प्रमाण थिक। जते तरहक विषय जन्य वैविध्य
प्रभासक रचना-संसार मे अछि, तकर एतेक उत्कृष्ट प्रभावान्वितिक मूल कारण हिनकर
कथन-शैली, भाषा-शिल्प तथा घटना-क्रमक संग कथाकारक भाषागत हरक्कति थिक।
कहल जा चुकल अछि जे लोक-शैलीक हिनकर खिसक्करी चमत्कारिक अछि आ
इएह बात हिनकर भाषा मे जादू भरैत अछि।

प्रभास अपन आत्मकथा नइं लिखलनि। मुदा एखन जं किओ सावधानी सं
प्रभासक रचना संसार पर काज करथि, तं बड़ आसान अछि प्रभासक जीवनी लिखब।
1957-1997 धरिक अवधि हिनकर रचनाकाल थिक। अइ अवधि मे लिखल अपन
समस्त कथा आ उपन्यास मे प्रभास अपन जीवन-यात्राक समस्त नोटेबुल प्वाइंट
द’ गेलाह अछि। हिनकर सब कथा किछु ने किछु हिनकर जीवनीक अंश थिक।
मुदा चिंताक विषय थिक जे प्रभास अपना सं संबद्ध सब व्यक्तिक जीवनी तं लिखि
गेलाह, आब हुनकर जीवनी के लिखत ?


पतित नायकक पावनकथाकार


‘जखन-जखन व्यक्ति आ ओकर करिक्का छाया, ताल ठोकि क’ आमने-सामने ठाढ़
भ’ जाइत अछि जखन-जखन झूठ, सत्य कें बलात् झांपय लगैत छैक तं हमर खिस्साक
शिरोदय होइत छैक।’ ई कथन थिकियनि मैथिली साहित्यक प्रखर कथाकार
धूमकेतुक। धूमकेतु आब सरिपहुं धूमकेतु भ’ गेलाह अछि, अपना नाम कें धन्य
क’ गेलाह अछि। डा. भीमनाथ झा लिखैत छथि, ‘धूमकेतु एकटा ज्योति-रेखा, एकटा
शक्तिशाली चमक, जे आकाश-पृष्ठ पर दृढ़तापूर्वक साफ-साफ आउट लाइन क’
क’ क्षितिज कें बेधैत पाताल-प्रवेश क’ जाइछ, एकटा आतंककारी चकचोन्ही जे

क्षण मे विलीन भ’ गेलो पर बड़ी काल धरि लोक कें अपन अनुभूति करबैत रहैछ।
आधुनिक मैथिली साहित्य मे सेहो एन-मेन एहने एकटा रश्मिपुंज धूमकेतु छिटकलै
आ कथा कविताक नीचां मोट सन लाइन खींचैत बढ़ि गेलै।’
धूमकेतु सन रचनाकारक जीवन आ लेखन आ मरण जाहि स्थिति मे भेल
से मैथिली साहित्यक अकबाली रचनाकार लोकनिक लेल, जे साहित्य अकादेमी
समेत अन्य सरकारी-गैरसरकारी अनुदानक अड्डा पर तस्करी क’ रहल छथि, आ
सामान्य जीवन व्यतीत कयनिहार कर्मनिष्ठ रचनाकार लेल सेहो, चुरू भरि पानि
मे डूबि मरबाक स्थिति थिक। भोलानाथ झा, अर्थात् धूमकेतुक पांति ‘भीख-दुख
मांगि क’ पढ़लौं आ जनकपुर मे चाकरी करैत छी’ हमरा लोकनिक शिला-धर्म कें
कोनहुना प्रभावित नहि करत। ओना प्रभावित ईहो बात कहां क’ सकल, जे आइ
धरिक कथापरक आ कवितापरक लेख मे धूमकेतुक नाओं टा गनाइत रहल अछि!
मार्च 1996 मे राजमोहन झाक मोन मे एक टा नव प्रयोग अंकुरित भेलनि तं धूमकेतुककथा ‘छठि परमेसरी’क पुनर्मुुद्रण ‘आरंभ’ पत्रिका मे कयलनि आ संगहि हरेकृष्णझाक एक टा समीक्षा सेहो। हरेकृष्ण एहि कथा पर विस्तार सं चर्चा कयलनि।
‘आरंभक’ अगिला अंक मे एहि कथा आ समीक्षा कें केंद्रित क’ क’ तीन टा लेख

फेर छपल। छओ मासक बाद अशोक द्वारा संपादित पत्रिका ‘संधानक’ प्रवेशांक
आयल तं ओहि मे मोहन भारद्वाज फेर सं अपन निबंध मे ओकर तकनीकी बिंदु
पर विचार कयलनि। ईहो बात सत्य थिक जे एना विस्तार सं मात्रा एकटा कथा
पर चर्चा मैथिलीक पहिल घटना थिक। मुदा, से धूमकेतुक लेल कोनो तारण-बोरन
वला बात सेहो नहि छल।

हमर अभिप्राय ई नहि, जे ई लेख लिखि क’ हमहीं तारण-बोरनक महान
कार्य क’ रहल छी। मुदा समग्रता मे ई चिंता अवश्य अछि, जे मैथिली मे आइ
धरि कोनो साहित्यकार कें हुनकर उचित बखरा नहि भेटलनि अछि, किनकहु बखरा
सं बहुत बेसी, किनकहु बखरा सं बहुत कम! बीच-बीच मे किनकहु जं संतोषजनक
बखरा भेटि गेलनि अछि, तं तकर कारण हुनकर स्तरीय लेखन कम आ हुनकर
अन्यथा सामथ्र्य बेसी। अर्थात् मैथिलीक जीर्ण पीढ़ीक आलोचक आ मान्यतादाता,
लेखक कें मान्यता दैत छलखिन्ह संबंधवाद पर आ मझोला पीढ़ीक आलोचक आ
मान्यतादाता, मान्यता दैत छथिन्ह गोधियांवाद, वंशवाद आ संभावित उपकारवाद
पर। मैथिलीक रचनाकार ई बात बूझैत छथि, जे आब मैथिली कें पाठक छैक नहि।
तीन सय पोथी रचनाकार छपा क’ बिलहि दैत छथि, कतहु सं एकटा पहुंचनामा
नहि अबैत छनि, पाठक दिस सं मान्यता भेटत नहि, तें ओ ‘आलोचकं शरणं गच्छामि’
भ’ जाइत छथि। धूमकेतु ने तं अइ प्रभु-संप्रदायक कुटुम छलाह, ने चेला भ’ सकलाह
आ उपकारक स्थिति मे तं नहिएं छलाह, तें उचित बखरा नहि भेटलनि, तं कोनो
बेजाय नहि...।

धूमकेतु कथा, कविता आ उपन्यास तीनू विधा मे लेखन कयलनि। कमलिखलनि, मुदा गुणवत्ता मे लिखलनि। सूचनानुसार हिनकर तीन टा उपन्यास
अप्रकाशित अछि ‘रने-बने’ आ ‘हम अहां’ एहि दुनू उपन्यासक सूचना लेखक
स्वयं अपना परिचय-पात मे ‘मैथिलीक नव कविता’ मे देने छथि। तेसर उपन्यास
‘मोड़ पर’ एही दशक मे लिखल गेल अछि। ओना एखनहुं धूमकेतुक रचना संसारक
मूल्यांकन अपूर्णे रहत, कारण कैक टा हुनकर कथो एखन धरि अप्रकाशिते अछि।
तैयो प्रकाशित रचनाक अवलोकन सं धूमकेतुक जे छवि स्पष्ट होइत अछि, से कथा
आ कविता, दुनू मे एक टा ‘पतित पावन’क अथवा कही तं अकादारुण बाढ़ि मे
भासैत जनपद लेल एक टा मजगुत खाम्हक, जकरा बलें किओ अपन कथित नीचता
कें पवित्रा क’ पबैए अथवा जकरा सं गराजोड़ी क’ क’ डूब’ सं बचि सकैए।

‘अगुरवान’ एखन धरि धूमकेतुक चर्चा कर’ लेल सभ समीक्षक कें सहारा
दैत रह’ वला कथा थिक आ बेस चर्चित कथा सेहो। तें बात एतहि सं शुरू करैत
छी। धूमकेतु कें ‘पतित पावन’ प्रमाणित करबा मे ‘अगुरवान’क केंद्रीय पात्रा बेस
सहायक होइत अछि। ‘अगुरवान’ शब्द मैथिली मे ‘अगुणवान’ सं उद्भूत अछि,
अर्थात् जकरा मे कोनो गुण नंइ हो। धूमकेतुक अगुरवान सा®से दुनियाक नजरि


मे महान पातकी, चोर, बदमाश, उचक्का, पितृनिंदक सभ अछि, मुदा धूमकेतुक
भाषाक विवरण पाबि क’ ओ उद्धृत भ’ जाइत अछि, ओकर उद्धार भ’ जाइत अछि।
समाजक आचार संहिता मे अगुरवान घोषित व्यक्ति मे मानवीय मूल्य कोन तरहें
ताकल जा सकैत अछि, तकर प्रमाण धूमकेतुक अधिकांश कथा द’ सकैत अछि।

अस्तित्व आ अस्मिताक कोन-कोन एहि कथा मे धूमकेतु स्पष्ट क’ देने छथि।संपूर्ण मिथिला आ मैथिल संस्कृति एहि कथाक पंक्ति-पंक्ति मे टनाटन बाजि रहल
अछि। अगुरवान छौंड़ाक स्वाभिमान आ विद्रोही तेवर, अपंग-अपाहिज पंडित कल्लर
मिश्र अर्थात् अगुरवान छौंड़ाक बापक जिजीविषा, जीहक तुष्टि लेल पत्नीक जांघ
अदना पुरुख लग उघार होयबाक प्रति उपेक्षाभाव, अर्थात् मिथिलांचल जकरा इज्जति
कहैत अछि, बहु-बेटीक देह-यष्टि, से इज्जति नइं थिक, सभ सं पैघ इज्जति थिक
पेट, सा®से परिवारक पेट भर’ लेल, परिवारक स्त्राीक पेट आन पुरुष सं भारी भ’
जाय, कोनो चिंता नहि। ओछाओन पर अपाहिज जकां पड़ल पंडित अपन परिचर्या
धरि मे असमर्थ छथि, मुदा बेटियो सं छोट वयसक जवान पत्नी हुनका संग सहवास
लेल नइं जाइत जथिन, तकर पुरुषोचित अहंकार आ आक्रोश, पंडिताइनक दहकैत
जवानी, गन्हाइत दारिद्र्य, सतबेटाक वर्जना आ पति द्वारा देह बेचि क’ सुभोजन
जुटयबाक अनुमति, आत्मसम्मान, सामाजिक मान्यता, व्यावहारिक विवशता...एहि
समस्त जाल मे ओझरा क’ पंडिताइन अपस्यांत छथि आ अंततः गर्भवती भ’ जाइत
छथि, फलतः सतबेटा कोदारि सं काटि दैत छनि। माट्सैब, सभ बात बुझैत छथि,
मुदा थोस थाम्ह लगब’ लेल हरदम अगुरवान छा®ड़ा कें परबोधै छथि। ओ छौंड़ा अइ
दुनिया मे मात्रा एक गोटेक बात कें मोजर दैत अछि, माट्सैबक बात कें, मुदा जखन
माट्सैब कनेको डंडी- पासंग मारय लगैत (नीतिवश) छथि, ओ बात काटि क’ चल
जाइत अछि।...ई कथाक सारांश नहि, जनपदीय जीवनक अस्तित्व रक्षा आ अस्मिताक
निर्माण केर सूक्ष्मतर गुणसुत्रा थिक, जकरा धूमकेतु, अइ चारि टा पात्राक आश्रय
सं जीवंत कयलनि अछि। कोनो पतित मे पावन तत्वक समावेश कोना रहैत अछि,
तकरा तकबाक आंखि अइ कथा मे कथाकार देलनि अछि। अगुरवानक चोर-उचक्का
होयब, लुच्चा-बदमाश होयब एक टा सामाजिक हरक्कति थिक, जकरा कथाकार
पंडिताइन आ पंडितक दैहिक उदारता सं जोड़ैत छथि। अगुरवानक शब्द मे ‘माट्सैब,
एकरा लेल हम की ने केला®? चोर बनला®, जीवन गार्त क’ लेला®। मुदा ई रंडिया
तैयो भसि गेल।’

कोनो एकटा कथा मे समाजक एतेक बिंदु कें उठा क’ एतेक छोट कथा
मे सफलता प्राप्त क’ लेब साधारण बात नइं थिक। भारतक समस्त आधुनिक भाषाक
कथा वितान लेल ईष्र्याक बात भ’ सकैत अछि।

मुदा, ई टेक्स्ट थिक सातम दशकक, आ मिथिलाक। आइ, जखन हम नव
सहस्राब्दि मे प्रवेश करबा लेल उताहुल छी आ मिथिलाक कोनो गाम भूमंडलीकरणक

विकृति सं अप्रभावित नहि रहि गेल अछि, तखन जं एहि कथाक पात्रा सभक विवेचनकयल जायत, तं निष्पत्ति मे थोड़ेक अंतर भ’ सकैत अछि। संभव अछि जे आजुक
स्थिति मे धूमकेतु पंडिताइन कें अपन देह तुष्टि लेल उदार बना दितथिन, हुनकाऊपर सतबेटाक वर्जना अथवा पंडितक स्वार्थपरक प्रेरणा नहि रहितय, पंडिताइन
स्वयं अपन दैहिक आवश्यकता सं कोनो पुरुष कें अंगीकार करितथि, भ’ सकैए
ओ पुरुष हुनकर सतबेटे होइतय, भ’ सकैए तखन स्वयं बापे-बेटा मे संघर्ष होइतय,
भ’ सकैए ...किछु भ’ सकैए, किछु भ’ सकैत छल...मुदा कोनो गर्भवती स्त्राीक हत्या
मात्रा पुरुषक छद्म प्रतिष्ठा आ फोंकिल पौरुषक कारण नहि होइतय।

बात एहनो नइं अछि जे धूमकेतु ततेक बेसी प्रतिक्रियावादी अथवा मर्यादावादी
छलाह जे एहेन अपैत-कुपैत (?) बात सोचि नहि सकैत छलाह। ‘बिड़रो’ कथा
तकर प्रमाण थिक। कथाक नायिकाक मनोवेग कें चित्रित करबाकाल कथाकार कतेक
तल्लीन छथि, से कथाक परायणक बादे किओ बूझि सकैत छथि। कैक बेर तं एहि
नायिका कें पाठक ‘पारो’ (यात्राी) आ ‘सुरमा सगुन बिचारै ना’ (राजकमल)क नायिका
सं आगू बुझ’ लगैत छथि। कोनो टा स्त्राीत्व वाली स्त्राी आ पौरुषपूर्ण पुरुषक बीच
एकांत मस्तिष्क एहेन बात सोच’ मे निश्चित रूप सं नहि धोखायत। आचार संहिता
तं समाज कें शिष्ट करबा लेल व्यक्ति द्वारा बनाओल जाइत अछि आ समष्टि द्वारा
धारण कयल जाइत अछि। आगू चलि क’ वैह धर्म भ’ जाइत अछि। मुदा एहिआधुनिक आकि उत्तर-आधुनिक युग मे आब मनुष्यक मस्तिष्क पर समाजक कब्जा
नहि अछि। सोच’ लेल ओ मुक्त अछि। तें ‘बिड़रो’ कथाक नायिका अपन पौरुषयुक्त
भाइक सुपुष्ट आ पुरखाह देह देखि क’ जं मोहित होइत छथि आ अन्हार तथा गुमार
मे सुतल-सुतल अपन भाइ संग मोने-मोन प्रणय-कल्पना दिस उद्यत होइत छथि,
तं ई स्वाभाविक थिक। कोनहु तरहक क्षुधा आ कामनाक अतृप्ति आचार संहिताक
निर्वाह नहि करैत अछि, कम सं कम चिंतन मे तं नहिएं। ई चिंतन भने ओकरा
कुंठित क’ दिअय, मुदा सोच’ लेल तं किओ नहिएं रोकि सकैत अछि। धूमकेतु
अहू कथा मे पथभ्रष्ट चिंतन करैत कथा नायिकाक मनोवेग कें सजीव क’ देने छथि।
ई कथा अयना जकां नायिकाक मानसिक यात्रा कें स्पष्ट करैत अछि।

कथा चाहे ‘टिटिम्हा’ हो कि ‘बिलाड़ि’, ‘कुलटा’, ‘लछमन’ आ कि ‘एक
टा मूल्यहीन कथा’ आ कि ‘देह’ कोनो हो सभ ठाम धूमकेतुक वैह पतित पावनएटीच्यूड देखाइ पड़ैत अछि। सा®से समाजक नजरि मे जे निकृष्ट अछि, ताहि व्यक्तिकअइ निकृष्टताक आधार तत्व ओही समाज कें देखबैत ओकर असली रूप सोझां
राखि देताह। आब अहीं तय करू, जे कुलटा के अछि, लछमन सन आकि अगुरवान
सन चोर के अछि, मिसेज खन्ना बिलाड़ि किऐ छथि, टिटिम्हाक भैया कोना बदललाह
आ भौजीक माथ कोना शांत भेलनि, ‘संबंध-बंध’ मे संबंधक की हाल होइत अछि ?
विषयक स्तर पर धूमकेतुक संपूर्ण लेखन अत्यंत आधुनिक आ चिंतनक स्तर पर


तं बल्कि कैक बेर अपना समय सं आगू लगैत अछि। मुदा ई अपन कैक टा रचना
मे अपनहि शिल्पक तुलना मे पछड़ि गेल छथि। ‘अगुरवान’, ‘बिड़रो’, ‘संबंध-बंध’,
‘टिटिम्हा’ आ ‘छठि परमेसरी’क कथा शिल्प कें आदर्श मानि क’ चलल जयबाक
चाही। से हिनकहि टा रचना संसार लेल नहि, आनो नव-पुरान रचनाकार लेल एहि
कथा सभक शिल्प अनुकरणीय अछि। मुदा ‘कुलटा’ कथाक कथ्य जतेक शानदार
छनि, शिल्प ततबे पारंपरिक आ अप्रभावी। किछु कथा मे तं पाठकक प्रवेश सेहो
थोड़े कालक लेल ‘हडल रेस’ भ’ जाइत अछि। यद्यपि भाषा एकदम पोछल-पाछल,
शब्द एकदम सं नीपल चिनबार पर सजाओल फूल सन, तथापि जं दू तीन अवतरण
धरि पाठक कें कथा मे आत्मीय प्रवेश नहि भेटय, तं तकर मूल कारण ओहि कथा
पर रचनाकारक विद्वताक आक्रमण भ’ सकैत अछि। मस्तिष्क मे विचारक बिहाड़ि,
सभटा कें उगलि देबाक छटपटाहटि, उगलि नहि सकबाक बेचैनी आ विवशता,
लिखल रचना कोनो उपयुक्त पत्रिका कें पठयबा लेल डाक व्यय धरिक अभाव,
लिखि क’ छोड़ि देलाक पश्चात ओकर अनुपयुक्तताक पश्चाताप, घर-परिवारक
खेवा-खर्चाक चिंता...एहि समस्त चिंताक जेल मे जे लेखक बाझल हो, जे घर-परिवार-समाज-
साहित्य सभ लेल अपन दायित्व कें चिन्हैत हो तकर बेचैनीक कल्पना करबा योग्य
नहि भ’ सकैत अछि। धूमकेतु अहू बेचैनी मे किछु लिखि सकलाह, तं तकर मुख्य
कारण भोलानाथ झा मे प्रविष्ट एक टा महान लेखक धूमकेतुक प्रतिभे थिक।

ओझराहटिक ई जाल आ दायित्व बोधक ई उत्कर्ष कोनो व्यक्ति कें कन्फ्यूज्डकरबा लेल, किंकत्र्तव्यविमूढ़ करबा लेल पर्याप्त होइत अछि। मुदा धूमकेतु कहियो
अपन कथानायके सभ जकां कन्फ्यूज्ड नहि भेलाह। हं, हिनक भिन्न-भिन्न कथाक
नायकक चरित्रांकन सं एतबा बुझाइत अछि जे अपना जीवनक कोनो डेग उठयबा
मे सभ दिन समतल नहि रहलाह। ई अकारण नहि अछि, जे कोनहुं कथाक हिनकरनायक-नायिका गांधीवादी बनि जाइत अछि, कतहु फ्रायडवादी, कियो भोगवादी, कियो
प्रतिक्रियावादी, कियो शोषित, कियो पराजित, कियो पश्चाताप करय लगैत अछि,
कियो एम.एल.वादी आदि बनि जाइत अछि। मुदा एतबा तय अछि, जे ई समस्त
पात्रा हमरा समाजे सं लेल गेल अछि आ एकरा सभ कें धूमकेतु जीवन दैत काल
एकदम ईमानदार आ तटस्थ रहलाह अछि। जाहि व्यक्ति कें स्थान-काल-जीवन एते
तरहक तबाही देने हो, तिनकर जीवन मे एकतानता कोना आओत ? अपन संपूर्ण
लेखन मे मुइल-टुटल लोक लेल अपन सहानुभूति ई बचा रखलनि।

‘छठि परमेसरी’ कथा ‘अगुरवान’ सन प्रसिद्ध भने नहि भेल हो, मुदा चर्चा
एहि पर ओकरा सं बेसी अवश्य भेल अछि। धर्म, जिजीविषा, कूटनीति आदि कतोक
दृष्टिएं अइ कथा पर विचार कयल गेल अछि। एक टा विद्वान कें पूछल गेलनि
जे अहांक सभ सं पैघ समस्या की थिक? ओ जवाब देलखिन स्त्राी आ ईश्वर।
एहू कथाक सभ सं पैघ समस्या यैह दुनू अछि। ध्यातव्य थिक जे एतय ‘स्त्राी’ कें

समस्या नहि कहल गेल अछि, ‘ईश्वरो’ कें नहि। बल्कि समस्त समस्याक कारण।
‘स्त्राी’ या तं बेटी होइत अछि या माइ, बहिन, पत्नी, दादी, सारि, सासु आदि। अर्थात्
स्त्राी इज्जति होइत अछि। इज्जति मतलब धन, वैभव, समृद्धि, प्रेम, प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य..
। ककरो इज्जति पर कब्जा क’ लिअ’, सभ किछु पर कब्जा भ’ गेल। आ अशिक्षिता
पर कब्जा करब आसान अछि, तें स्त्राी कें अशिक्षित राखू। अशिक्षित स्त्राी पर धर्मक
आश्रय सं कब्जा करब सभ सं आसान अछि। वर्तमान समय मे रामानंद सागर
आ बी.आर. चोपड़ा छाप सीरियल डाइरेक्टरक बाढ़ि असहज नहि अछि। ‘छठि
परमेसरी’ अही विमर्शक उदाहरण थिक। अइ कथा मे धर्मभीरु मिथिला आ अवसर
अयला पर भक्ति आ निष्ठाक संग लूप-लाइन निकालब, बाइपास ताकि लेबा मेदक्ष मैथिलक प्रवृत्ति कें प्रतीकात्मक रूप मे चित्रित कयल गेल अछि। मुदा एहि
कथाक बुनावटि, एकर शिल्प जतेक मजगुत अछि, ततेक शानदार एकर विषये नहि
अछि। दोकान सं घुरल गोपीनाथक जतेक समधानल चित्राण एहि कथा मे कयल
गेल अछि, ओकर समस्ये ततेक महत्वपूर्ण नहि अछि। धर्म आ पूजा मिथिलाक
सभ सं पैघ संकट अवश्य थिक। एहि नाम पर अपार अपव्यय मिथिला मे होइतअछि। मुदा पूजा-पाठ आ पावनि- तिहारक लघुत्तम उपाय सेहो प्रचलित छैक। हं,
जोतखी जीक तिकड़म आ नीच हरक्कति तथा गोपीनाथ दुनू बेकतीक हृदय परिवर्तन,
ईश्वर पर दया कर’ लेल पाठक कें अवश्य विवश करैत अछि। ई कथा गोपीनाथक
अभावक कथा नहि थिक आ एहि कथाक अनुसार मिथिला धर्मभीरु नहि अछि,
धर्मभीरुताक नाटक करैए ई दुनू बात प्रमाणित अछि। मिथिला मे ‘छठि परमेसरी’
कें बड़ टोटमाह देवता मानल जाइत रहल अछि। मुदा ताहि देवता कें चढ़ाओल
केरा, पांच पाइ प्रति छिम्मड़ि कमीशन पर बेचनिहार बाले, गोपीनाथक भक्ति सं
चैल कयनिहार जोतखी आ महाजन तथा पाइक कारणें अपन कबुला बदलनिहार
गोपीनाथ एहि बातक उदाहरण थिक, जे धर्म एकटा नाटक थिक, जकर संवाद
सुविधानुसार लोक कखनहुं बदलि सकैए। ई कथा मिथिला मे हिलैत धार्मिक आस्थाककथा थिक। ओना हरेकृष्ण झा, मोहन भारद्वाज आ अशोक एहि पर प्र्याप्त चिंतन
क’ चुकलाह अछि।

एकटा बात धूमकेतुक रचना पर विचार करैत अलग सं कहबाक थिक, जे
अर्थतंत्राक व्यूह आ यौन लिप्साक आगि हिनकर कथा सभ मे निर्णायक स्थिति
मे रहैत आयल अछि। यैह दुनू तत्व हिनकर रचना-संसारक नागर-नागरि कें संचालित
करैत अछि, ओकरा धार्मिक, अधार्मिक, पापी, पुण्यात्मा, चरित्राहीन आ चरित्रावान
बनबैत अछि। एकरहि कारण किओ चोर बनैत अछि आ किओ छिनारि अथवा
छिनार। अर्थात् आधुनिक समयक सूक्ष्म चिंतनधारा धूमकेतुक केंद्रीय विषय रहल
अछि। कविता मे सेहो धूमकेतुक नजरि अपना समाजक विसंगति पर छनि, मुदा
अभिव्यक्तिक तरीका दोसर छनि। यद्यपि कविता कमे प्रकाशित छनि। तथापि जे


छनि ताहि मे पौराणिक बिंब आ मिथकीय प्रतीकक संग समाजक जर्जर स्थिति
कें चित्रित कयने छथि। यौनाचार आ आर्थिक अराजकताक पौराणिक रूढ़िक संग
‘मुक्ति’, ‘सायुज्य’, ‘समाधिस्थ’ आदि कविता मे व्यक्त चित्रा चकित करैत अछि।
जतय व्यासक लेल धूमकेतु कहैत छथिः

जन्मे हुनक बोध थिकनि

जन्म लैत देरी भ’ जाइत छथि

हीनचेता मांसभक्षी पाराशर गिद्धक समाज सं बाहर

ओना वीर्य-दानक महत्व ओ बुझैत छथिन।

ओत’ हुनका ठीके बुझयलनि जेः

चालैन लेने अपस्यांत छी

मुदा आब ई आगि मिझाएत?

जरए दिऔक आब अइ बजार मे

कीनै जोकरक चीजे नै छैक।
आ तें बिना किछु किनने धूमकेतु चल गेलाह, मुदा बहुत किछु द’ गेलाह। बहुत
रास इजोत, बहुत रास बाट, बहुत रास आंखि...। प्रयोजन अछि जे हम सभ एहि
बजार कें बदलि दी।

अभिमन्युक एकालाप


जखन-जखन शिष्ट जनक काव्य पंडित लोकनि द्वारा बन्हा कए निश्चेष्ट आ संकुचित
भ’ जाएत तखन-तखन ओकरा सजीव आ चेतन प्रसार देशक सामान्य जनताकबीच स्वच्छंद रूप सं बहैत प्राकृतिक भावधारा सं जीवनतत्व ग्रहण कएला सं प्राप्त
होएत एहेन मान्यता आचार्य रामचन्द्र शुक्लक छनि। अइ ‘सामान्य जनता’ शब्द
पर जोर दैत केदारनाथ सिंह मानैत छथि जे मुद्रण कलाक विकासक फलस्वरूप
काव्यक प्रत्यक्ष श्रोता परोक्ष पाठक मे बदलि गेल छल आ कविता अपन अनुभूति
एवं अभिव्यक्ति प्राणाली, दुनू मे विशेषीकरण दिश बढ़ल जा रहल छल, आचार्य
शुक्ल द्वारा कविताक विकासक संदर्भ मे ‘सामान्य जनता’ शब्दक प्रयोग आ ओकर
स्वच्छंद बहैत भावधारा सं जीवनतत्व ग्रहण करबाक बात महत्वपूर्ण थिक। आचार्य
शुक्ल केर एहि मान्यता सं अजुको नव रचनाकार कोनो ने कोनो रूप मे अपना
कें संबद्ध महसूस क’ सकैत अछि।

वर्तमान शताब्दीक सातम दशक धरि ‘चित्रा’, ‘स्वरगंधा’, ‘आत्मनेपद’,
‘दिशांतर’, ‘कालध्वनि’, ‘अंततः’, ‘सीमांत’, ‘हम एक मिथ्या परिचय’ आदि महत्वपूर्ण
कविता संकलनक प्रकाशन भ’ गेल छल। हिन्दी साहित्यक परिदृश्य पर चर्चा करबा
काल नामवर सिंह आ विश्वनाथ त्रिपाठी अइ बात पर सहमत होइत छथि जे 1964
मे नेहरू युगक अंत भेल। भारत-चीन सीमा संघर्ष ओहि समयक अत्यंत महान
घटना छल। किछु गोटए नेहरूक मृत्युक कारण एकरहि मानलनि। अही समय मे
मोहभंगक स्थिति उत्पन्न भेल। सीमा संघर्षक पश्चात् भारतक कम्युनिस्ट पार्टी पहिने
दू भाग मे बंटल, फेर तीन भाग भेल। कम्युनिस्ट पार्टी सं अलग भेल एक अंश
आगू आबि कए हत्याक राजनीति चलओलक, जकरा नक्सल विप्लवक रूप मे स्मरण
कएल जाइत अछि। अही अंतराल मे पाकिस्तानक संग भारतक युद्ध भेल। राजनीतिमे गैर-कांग्रेसवादक हवा चलल। सत्ता मे कांग्रेसक एकाधिकार समाप्त भेल। अनेक


प्रांत मे अल्पकालिक संविद सरकार बनल। एक अर्थें ई राजनीतिक अस्थिरताक
युग छल। अइ वातावरण सं साहित्यक अप्रभावित रहब असंभव छल।

मैथिली साहित्य मे सेहो हिन्दीक अपेक्षा कोनो परिस्थितिजन्य भेद नहि छल।
अनेक कारण सं समस्याक फलक आ विषय वस्तु विस्तृत भ’ चुकल छल। नितांतपारिवारिक स्थ्तिि, आंचलिक समाज, निजी आ मात्रा क्षेत्राीय संस्कृति, रहन-सहन,
रीति-रेवाज आदि सं बढ़ि कए रचनाकारक दृष्टि विश्व घटना-चक्र दिश बढ़ि चुकल
छल। ‘चित्रा’ आ ‘स्वरगंधा’क प्रकाशन एकटा नव बाट प्रशस्त क’ चुकल छल।
तें उपर्युक्त समस्त स्थिति मैथिली साहित्यक लेल सेहो बहुत गंभीर रूप सं प्रभावीभेल। अइ अंतरालक साहित्य मे जे अनेक तरहक नकारवादी तथा उच्छृंखल प्रवृत्ति
देखाइछ ओकर òोत निश्चित रूप सं कतहु-ने-कतहु अइ राजनीतिक वातावरणो
मे अछि। यात्राी, राजकमल, किसुन, सोमदेव, मायानन्द, धीरेन्द्र, गुंजन, धूमकेतु,
कुलानन्द, रेणु, जीवकांत, महाप्रकाश प्रभृतिक कविता मे अइ राजनीतिक हड़कंप,
सामाजिक खंडित आस्था, मानवीय अवमूल्यन, सामूहिक असंतोष आदि स्पष्ट रूपें
परिलक्षित होइत अछि। अइ तथ्य सं प्रायः किओ असहमत नहि हेताह जे अइसभ परिस्थिति सं साहित्यक भाषा मे अपार परिवत्र्तन भेल। एतबे नहि, भाषा ध्
ारि बोल-चालक भाषा भ’ गेल, पंडिताउ नहि रहल, बल्कि भाषा मे एकटा खास
प्रकारक खौंझ, चोट, प्रहार आदि आबि गेल। ओना अइ सभक बीजारोपण यात्राी
पहिनहि क’ चुकल छलाह ‘अगराही लागउ, बरु बज्र खसउ...’।

मैथिली साहित्य मे खांटी राजनीति किछु उपेक्षित भ’ गेल छल, तकर
गंभीरतापूर्वक पुनप्र्रवेशक काल सेहो इएह थिक।

हिन्दी कविता पर चर्चा करैत नामवर सिंहक कहब छनि, ‘अइ बीच एकटा
गप इहो भेल जे कविताक दुनिया मे प्रयोगवाद, प्रगतिवाद, नयी कविता, अकविता
आदिक सीमा-सरहद एकदम टूटि गेल आ अइ प्रकारक समस्त लेबुल निरर्थक साबित
भेल। परिणाम ई भेल जे आजुक कविता पर कोनो लेबुल साटब संभव नइं अछि ने
विचारधाराक, ने काव्य-शिल्पक।’ मैथिलीक संदर्भ मे युवा आ युवतर कविगण मे
अइ बातक उदाहरण ताकल जाए लागए तं कहए पड़त जे किछु कविक कौशल
मे चकित कर’ वला संभावना विद्यमान अछि। उदाहरणक लेल ‘समकालीन भारतीय
साहित्य’क 48म अंक मे आएल मैथिली कविता पर राष्ट्रीय स्तरक टिप्पणी उल्लेखनीय
अछि। मैथिलीक अइ नव्यतम पीढ़ी कें जं समाज सं अनुभूतिक अवसर, निजी प्रतिभा
सं जीवनदृष्टि विकसित करबाक आधार भेटलैक अछि, तं अइ मे कोनो टा द्वैध
नहि, जे अइ पीढ़ी कें अपन अग्रजक रचनाशीलता सं बहुतरास सोझराओल बाटसेहो भेटलैक अछि। हरेकृष्ण, वियोगी, नारायणजी, सारंग कुमार, विद्यानन्द, कृष्ण
मोहन झा प्रभृति केर कविता मे चकित कर’वला एहने तत्व भेटैत अछि।

सामान्य जनताक बीच स्वच्छंद बहैत प्राकृतिक भावधारा साहित्यक लेल बहुत

महत्वपूर्ण होइत अछि। प्रायः सभ साहित्यक सभ पीढ़ीक संग इएह स्थिति होइत
अछि। कीर्तिनारायण मिश्र (जन्म 17-7-1936) मैथिली साहित्य मे बेस प्रतिष्ठित
नाम अछि। ई प्रायः कविते टा लिखलनि। 1967 ई. मे ‘सीमांत’ (काव्य संकलन)
प्रकाशित भेलनि। ‘ध्वस्त होइत शांतिस्तूप’क आच्छादप पृष्ठ पर लिखल गेल अछि,
‘सृष्टि सं पूर्व विध्वंस करब कीत्र्तिनारायण मिश्रक सामाजिक राजनीतिक चेतनाक
संगहि काव्य-चेतनाक अभिन्न अंग बनि गेल अछि। ‘सीमांत’ सं ‘ध्वस्त होइत
शांति स्तूप’ तकक काव्य-यात्रा बेर-बेर कवि द्वारा अपन कविताक प्रतिमान कें तोड़ैत
आ सर्जनाक लेल उपादेय काव्य-तत्वक अन्वेषणक यात्रा थिक। ओहि तंत्रा आ मंत्राक
निषेध थिक हिनकर कविता, जे मानव कें नागफांस मे निरंतर बन्हैत अछि आ
अंततः अपन चाकर आ चाटुकार बना लैत अछि।’ समाजक सर्वाधिक संवेदनशील
प्राणी कवि होइत अछि। स्वतंत्राता पूर्वक स्थिति सामान्य जनजीवन मे एकटा स्वप्निलवातावरणक लालसा भरि देने छल जे स्वातंत्रयोत्तर काल मे नहि भेल। अनेक वर्ष
धरि स्वतंत्रा भारतक नागरिक भ’ओ कए भारतीय मनुष्य अपना कें भारतीय अत्याचारीक
खेलौना बूझैत रहल। साठिक दशकक आगू-पाछू आओरो अनेक सामाजिक राजनीतिक
उथल-पुथल भेल आ जनमानस पर एकर निस्सन चोट पड़ल। अनेक तरहक
नीक-बेजाय अभिधारणाक जन्म भेल। अइ समस्त परिस्थिति सं कवि कें साक्षात्कार
भेलनि। स्वाभाविक रूप सं सृजनधर्मी लोकनि क्षुब्ध, व्यथित आ हतप्रभ भेलाह।
मोन मे आक्रोश उठलनि, विद्रोही भेलाह। अभाव, अवसरवादिता, चाटुकारिता आदि
दैनिक जन-जीवनक आवश्यक अंग भ’ गेल, जकरा बर्दाश्त करब कविक लेल संभव
नहि रहल। आ तें मोह भंगक स्थिति मे समस्त निषेधात्मक बान्ह-छान्ह कें तोड़ि-ताड़ि
कए कवि लोकनि विद्रोही भ’ गेलाह। अइ तूरक कवि लोकनिक चर्चा करैत रामकृष्ण
झा ‘किसुन’ लिखैत छथि, ‘साहित्यक मैदान मे जे बहुत दिन सं शामियाना तानल
अछि, तकर आब डोर सब सड़ि गेल अछि, घुनलग्गू भ’ गेल अछि, ओहि मे लागलझाड़-फनूस सब झरि-झखरि गेल अछि। जं एखनो किछु व्यक्ति ओहि चिरी-चित्ती
भेल शामियाना कें बड़े यत्न सं सीबाक, चेफड़ी पर चेफड़ी लगएबाक असफल प्रयास
मे व्यस्त छथि तं नवकवि लोकनि कें एहेन महानुभाव पर दया होइत छनि।’

अइ परिस्थिति मे नवकवि लोकनि मात्रा दया टा क’ कए नहि रहि गेलाह।अपन भोगल यथार्थक अनुभूति कें नवीन शब्दावली आ नूतन अर्थवत्ता संग प्रस्तुत
कर’ लगलाह। स्वाभाविक छल जे पारंपरिक विचारक लोक चैंकलाह। कलह गेल
अछि जे कीर्तिनारायणक ‘सीमांत’ क माध्यमे मैथिली मे पहिले-पहिल अकविताक
चर्चा भेल। कविता सुनबाक अथवा पढ़बाक अभ्यस्त पाठकक चैंकब अस्वाभाविकनहि छल। मुदा पाठकक चैंकब कीत्र्तिनारायणक काव्य सृजन मे कोनो व्यतिक्रम
उपस्थित नहि क’ सकल। कारण स्पष्ट अछि जे अइ पीढ़ी कें मोहभंगक पराकाष्ठा
सं साक्षात्कार भ’ गेल छल। दोसर बात जे साठि सं पूर्वहि ‘स्वरगंधा’ प्रकाशित


भ’ कए विरोधक अधिकांश अन्हर-बिहाड़ि झेलि चुकल छल। आ कीत्र्तिनारायण
अपन विचारधारा, अपन जीवनदृष्टि एवं अपन जीवनानुभूतिक संग काव्य-सृजन
करैत रहलाह।

साहित्यक समाजशास्त्राीय चिंतक मैनेजर पांडेयक कहब छनि, ‘कविता मे
जीवन-जगतक यथार्थ आ अनुभवक अभिव्यक्ति केवल प्रातिनिधिक रूपहि टा मे
नहि होइत अछि, प्रतीकात्मको ढंग सं होइत अछि। सत्य तं ई अछि जे उपन्यास
मे प्रातिनिधिक पद्धतिक प्रधानता भेटैत अछि तें कविता मे व्यंजनाक पद्धति प्रायः
प्रतीकात्मके बेसी होइत अछि। कविता मे यथार्थ आ अनुभवक साक्षात् अभिव्यक्ति
नहि होइत अछि। ओहि मे पुनर्रचित यथार्थ आ अनुभवक अभिव्यक्ति होइत अछि,
तें कविता यथार्थ, जीवनक यथार्थ सं भिन्न होइत अछि, कखनहुं ओहि सं किछु
बेसी कखनहुं ओहि सं किछु कम।’ प्रायः इएह कारण थिक जे कविताक समाजशास्त्राीय
तंतु समाजशास्त्राी लोकनिक पकड़ मे नहि अबैत छनि।

एहि सभ बिंदु कें ध्यान मे रखैत कविता मे चारूभर पसरल विडंबना स्पष्ट
होइत अछि आ कविक उपर पड़ैत अतिरिक्त दबावक स्तर तय होइत अछि। एहितरहें परिवेश मे व्याप्त विकृत आ घृणास्पद स्थिति देखबाक आ सहबाक, अइ स्थिति
मे जीबैत जन-समुदायक निश्चेष्टता आ अपन अस्मिताक प्रति उपेक्षा भाव अनुभव
करबाक तथा अन्य वर्णित जटिलता आदि समस्त पीड़ा कें भोगैत कविक औनाहटिक
कल्पना कएल जा सकैत अछि।

एहना स्थिति मे जं कीत्र्तिनारायण सृजन सं पहिने विध्वंसक स्थिति मोन
मे रखैत छथि आ हिनकर कविता ताहि दिशाक बात करैत अछि, तं ई कोनो आयातित
प्रसंग नहि थिक। ‘सीमांत’ (1967), ‘हम स्तवन नहि लिखब’ (1979) आ ‘ध्वस्त
होइत शान्ति स्तूप’ (1991) अपन तीनू काव्य संकलन मे कवि निरंतर अपन
जीवन-दृष्टि सं समाज आ व्यवस्थाक जांच-पड़ताल करैत रहलाह अछि। जेना कि
कवि स्वयं कहैत छथि, ‘परंपराक अध्ययन ज्ञान कें समृद्ध करैत छैक, मुदा परंपराक
प्रति विशेष व्यामोह सं कल्पनाशीलता एवं रचना शक्तिक Ðास होइत छैक। तें परंपरा
केर ओतबय अंश हमरा स्वीकार अछि, जे नितांत जीवंत एवं अनिवार्य हो शेष
हमरा लेल महत्वहीन, व्यर्थ ! परंपरा सं विद्रोह एवं ओकर अस्वीकृति हमरा लेलफैशन नहि।’ परंपराक प्रति परिष्कारवादी ई दृष्टिकोण कीत्र्तिनारायणक कविता सं
कनेक आओर स्पष्ट होइत अछि। हिनकर कविता मे परंपराक चर्चा किछु तेहेन
खौंझ आ व्यंग्योक्ति संग होइत अछि जे साफ-साफ स्पष्ट भ’ जाइत अछि जे कवि
कें कोनो समय मे परंपरा आ पारंपरिक मान्यता पर अतिरिक्त आस्था छलनि, ओहि
सं बहुत बेसी अपेक्षा छलनि, मुदा से फलित नहि भ’ रहल अछि। जेना कि पूर्वहि
कहल जा चुकल अछि, कोनो महान शक्ति अथवा मान्यता अथवा अवधारणा सं
जहन आस्था टुटैत अछि, तं आत्मबोध आ मोहभंग होइत अछि तथा ओहि समस्त

मान्यता सं निषेधात्मक रुख तत्काल शुरुह होइत अछि। सातम दशक मैथिली
साहित्यक लेल अहू कारणें बेसी महत्वपूर्ण अछि। जखन समस्त राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय,
राजनीतिक उथल-पुथल, सीमा-संघर्ष घटनादिक स्थिति तं छलैके; उपर सं एहि समस्तस्थितिक प्रभाव सं मिथिलांचलक लोक, लोक-संस्कृति आ लोक-मान्यता उपर्युक्तहलचलक प्रभाव सं एकटा विचित्रा सन काॅकटेल बनए लागल छल। कीत्र्तिनारायणक
काव्य सृजन अही स्थिति मे प्रारंभ भेल।

सन् 1967 मे अकवितावादक स्थापना भेल आ विश्लेषण कएनिहार सभ
1979 अबैत-अबैत नवकविताक गुणगान करए लगलाह आ नवकविता धरि अएबाक
एकटा कड़ीक रूप मे अकविता कें स्वीकारलनि। एहि तरहें मैथिली कविता मे नव
क्षितिजक निर्माण प्रक्रिया लेल अग्रसर होइत कविक अभिक्रिया ई मानल जा सकैत
अछि।

रचनाकारक दायित्व कें रेखांकित करैत कीत्र्तिनारायण कहैत छथि, ‘जाहि
व्यवस्था मे हम जीबि रहल छी, ओ अवमूल्यन, कुंठा, कापुरुषता, संत्रास आ आक्रोशक
जन्म द’ सकैत अछि। यदि हम ओकरा स्वीकार नहि करैत छी तं हम अपन समयक
संग, अपन परिवेशक संग, अपन स्थितिक संग इमानदार नहि छी।’

कीत्र्तिनारायणक कविताक परीक्षण अही परिस्थिति सभक आलोक मे आ कविक
जीवन-दृष्टिक परिप्रेक्ष्य मे करैत ई तय होइत अछि जे कवि कें पारंपरिक पाखंड,
व्यवस्थाक विद्रूपता, राजनीतिक कलुषता आ समाज मे समस्या उत्पन्न कर’वालीसत्ताक विकृत स्वरूप व्यथित करैत रहैत छनि। ‘ध्वस्त होइत शांति स्तूप’ संग्रहक
किछु कविता कीर्तिनारायणक अही तीक्ष्ण व्यथाक प्रतिफलन थिक। अइ संग्रहक
बहुतरास कविता शिल्पक स्तर पर आ एक सीमा धरि वस्तुनिष्ठताक स्तर पर सेहो
कविक कद कें छोट करैत अछि। कविक अवधारणा कें आ कविक अनुभूति कें
प्रभावात्मक अभिव्यक्ति देबा मे शिल्पक स्तर पर किछु कविता अपन ध्येय धरि
नहि पहुंचबैत अछि। दोसर दिस बिंब योजना आ प्रतीक चयन मे किछु कविता
ढील भ’ गेल अछि। खास क’ कए राजनीतिपरक कविता मे जखन कवि अपन
निषेधात्मक एटीच्यूड उपस्थित करैत छथि तं ओतए प्रतीक आ बिंब जगमगा नहि
पबैत अछि। कवि ओतए पारंपरिक अलंकार योजना सं काज निकालैत छथि, जे
कविताक प्रभावोत्पादकता कें कम करैत अछि आ एक सीमा धरि ओकर धार कुंद
करैत अछि।

कीत्र्तिनारायण स्वीकारैत छथि जे हुनकर बाल्यकाल या युवावस्था दुनू ‘रेत’
क सन्निध्य मे बितलनि अछि आ तें हुनकर रचना-प्रक्रिया रेत पर हस्ताक्षर करब
थिक। ई स्वीकारोक्ति जाहि कोनो धनात्मक अभिधेयात्मकता कें द्योतित करैत हो,
मुदा हमरा जनैत जं ई सत्य, तं कवि स्वयं अपन मान्यता अपन अभिक्रिया मे
द्वैध उपस्थित करैत छथि। कारण, कीर्तिनारायण स्वयं जीवनक जटिलतम यथार्थ


सं साक्षात्कार करैत आम जनताक आंखि मे अंगुरी क’ कए ओकर परिचय दिअएबा
मे तत्पर रहलाह अछि, जे हुनकर कविता सं सेहो स्पष्ट होइत अछि। हल्लुक बाटअपनएबाक आ अस्थायी प्रभाव छोड़बाक उपक्रम कीत्र्तिनारायण कहिओ नहि
कएलनि। तखन हिनकर अंगुरी बालु (जं रेतक अर्थ बालु थिक तं) सन हल्लुक
सतह पर हस्ताक्षर कोना करत आ बालु परक हस्ताक्षर सन अस्थायी काज कोना
करत ? जे-से..



कीत्र्तिनारायणक कविता मे प्रायः संबंधक अवमूल्यन, विकृति आ एक सीमाधरि हत्याक स्वरूप उपस्थित होइत रहैत अछि। अपन कतेको कविता कवि वात्र्तालाप
शैली मे प्रारंभ करैत छथि आ संबोधित व्यक्तिक संग संबंधक अंतरंगता पर अंगुरीउठबैत ओकर विकृत स्वरूप कें टांगि दैत छथि। ‘ध्वस्त होइत शान्ति स्तूप’,
‘यातना-शिविर’, ‘की अहीं छलहुं’, ‘किसुन जी’, ‘जादूक खेल’, आदि कविता हिनकर
अही उपक्रमक उदाहरण थिक। ‘पंजाबक चिट्ठी’, ‘जागल अछि’, ‘किसुन जी’,
‘इहागच्छ इहतिष्ठ’ आदि कविता मे शिल्प आ प्रस्तुतिक आनो आन उपादान मे
कवि पर महाकवि यात्राीक प्रभाव स्पष्ट देखल जा सकैत अछि।

‘पंजाबक चिट्ठी’, ‘जागल अछि’, ‘की अहीं छलहुं’, ‘कौआ-1’, ‘कौआ-2’ आदि
कैक टा कविता मे कविक गहन जीवनानुभूतिक परिचय भेटैत अछि। ओना तं
आधुनिक साहित्यिक मूल स्वर समग्रता सं व्यवस्थाक विरोध, प्रचलित मान्यताक
निषेध सैह थिक। ई व्यवस्था राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय, प्रांतीय, ग्रामीण, सामाजिक,
पारिवारिक, वैयक्तिक, राजनीतिक, आर्थिक आ अंततः अइ समस्त कारण संमनोवैज्ञानिक स्थिति सं संबद्ध रहैत अछि। मुदा कीत्र्तिनारायण जखन राजनीतिक
(हमर मतलब अछि खांटी राजनीतिक) विषय कें छूबैत छथि तं ओकरा ओ उपयुक्त
धार नहि द’ पबैत छथि। मुदा समाजक व्यवस्था आ प्रशासनिक दानवता सं उद्भूत
सामान्य जनजीवनक जटिलतम बाट कें कवि छूबैत छथि तं ओ चमकि उठैत अछि।
‘पंजाबक चिट्ठी’ कविक एहेन कविता थिक जकरा अनेक संदर्भक दृष्टांत स्वरूप
प्रस्तुत कएल जा सकैत अछि। ‘मित्राक पत्रा’ यद्यपि अपन संपूर्ण पीड़ा नहि ध्वनित
क’ सकल मुदा एकर अलावा आनो बहुत एहेन कविता अछि, जे कविक मानसिक
उद्वेग कें स्पष्ट करैत अछि। तय बात अछि जे आजुक विडंबना-चक्र, विज्ञानक
नाइट्रोजन-चक्र अथवा महाभारतक व्यूहचक्र सं बेसी अभेद्य अछि। अइ चक्रक सूत्रा
कें तोड़ब एतेक कठिन अछि, जे अपन समस्त स’ख-मनोरथ, सेहंता, मान्यता,
विचारधारा कें ताख पर राखि लैत अछि; अपन जीवन, अपन अंग-प्रत्यंग, एते धरि
जे जीबाक महत्वपूर्ण हथियार आंखि, हाथ, पैर, स्वास्थ्य आदि सं खेलौड़ क’ लैत
अछि; हाथ-पैर कटा लैत अछि, जीबा लेल सभ किछु क’ लैत अछि, मोन मारिलैत अछि। अइ परिस्थिति मे कीत्र्तिनारायणक कविता एक डेग आगूक बात कहैत
अछि। ‘पंजाबक चिट्ठी’क पत्रा लेखक कें एतेक भेलाक पश्चातहु एकरा उपलब्धि

मानैत अछि, जे ओकर आंखि फूजि गेलैक आ आब ओ दुनिया कें नव आंखिएंदेखि सकत, नव व्यवस्था आनि सकत। जेना कि कीत्र्तिनारायण लिखैत छथि लिख’
लेल जिअब, जिअ’क लेल रोटी, रोटीक लेल चाकरी, चाकरी मे बनल रह’क लेल
चैबीसो घंटाक दायित्व-वहन आ दायित्व-वहनक लेल प्रबंधकक रूप मे ओ सभ
काज करब अथवा कराएब अथवा ओकर सत्रा-संचालन-निदेशन करब जकर हम
हृदय सं विरोधी छी, जे हमर सिद्धांतक विपरीत अछि ई चक्राकार विडंबना हमर
लेखन कें गीड़ि रहल अछि आ हम अपनहि आंखि सं अपन नाश-लीला देखि रहल
छी।

ई आत्मकथात्मक टिप्पणी कविक मानसिक खैंचातानी आ औनाहटि कें कोन
प्रवेग देने अछि, तकर कल्पना कएल जा सकैत अछि। कहब आसान अछि जे
मनुष्य कें विरोध करबाक चाही। मुदा हमरा जनैत आजीविकाक उपेक्षा क’ कए
कविता लिख’ मे लागि जाएब ओहने क्रांति होएत जेना बिना आगिक मशाल लेसब
होइत अछि। अइ तरहक प्रक्रिया अपनाएब समुद्र मे सलाइ सं आगि लगाएब होएत।
जीविकोपार्जनक उपेक्षा, परिवारक उपेक्षा करब होइत अछि, ई अकाट्य सत्य थिक।आ जे व्यक्ति पारिवारिक नहि होअए ओकर सामाजिक व्यक्ति हएबाक प्रवृत्तिपर नीक जकां संदेह कएल जा सकैत अछि। कीत्र्तिनारायण अइ परिस्थितिक चरमोत्कर्ष
सं परिचित छथि, अपन वक्तव्यो मे आ कवितो मे। कविक उक्त स्वीकारोक्तियहिक
दृष्टांत थिक ‘पंजाबक चिट्ठी’ आ ‘मित्राक पत्रा’। एहेन विकट चक्राकार विडंबना
मे अथवा व्यूह मे जखन व्यक्ति कें निहत्थ क’ कए छोड़ि देल जाए, तं ओकर
समस्त आक्रोश आ विद्रोह एकालाप मे बदलि जाइत अछि। अइ परिस्थिति केंभोगैत आजुक समस्त प्राणी ‘अभिमन्यु’ थिक। कीत्र्तिनारायणक कविता आजुक
अभिमन्युक एकालाप थिक। ओहि अभिमन्युक एकालाप जे खैंक भरि सांस धरि
लड़ैत रहल मुदा ओकर अंतस् केर आगि नहि मिझेलै। पराजयक समस्त उपादानकसंभावनाक अछइतो कीत्र्तिनारायण आ कीत्र्तिनारायणक काव्यपुरुष परास्त नहि होइत
अछि। विज्ञान, युद्ध, विध्वंसक यंत्रा, शस्त्रास्त्रा आदि सं उत्पन्न विभीषिका, राजनेताक
घरियाली नोर आ हास्यास्पद वक्तव्य एवं क्रिया; मिथिलांचलक स्थानीय समस्या
आदि कविक कविता मे प्रमुखता सं रहैत अछि। जीविकोपार्जनक विवशता मे अपन
माटि-पानि सं अलग रहबाक पीड़ा कोन तरहें कवि कें मथि रहल छनि, अपनाअंचल मे अपन सांस्कृतिक थाती, मान्यता, लोकाचार आदिक संग होइत युगीन
अतिक्रमण कोन तरहें कवि कें व्यग्र आ उद्वेलित कएने छनि, ई स्थिति ‘भाषानुराग’,
‘किसुन जी’, ‘पंजाबक चिट्ठी’, ‘चन्द्रभागा आ मिथिला’, ‘मित्राक पत्रा’ आदि कविता
मे देखल जा सकैत अछि।

सारांशतः कीत्र्तिनारायणक काव्य संसार जिजीविषाक उपादान पर विश्व भरि
मे पसारल अभेद्य जाल मे बाझल अभिमन्युक एकालाप थिक, जे अपन अंतिम


सांस धरि अपन जोश कें अनत रखैत अछि।


पक्षी आ पिजराक संघर्षक कविता


‘परिवेश मे, एकटा शिकंजा मे कसल मनुक्ख, जीबाक लेल आ मुक्तिक लेल छटपटाइत
मनुक्ख, जखन अपन सार्थकता तकैत एकटा अयना कें टकटकी लगा क’ निहारैत
अछि आ ओहि रूप कें स्फुट-अस्फुट रूप मे बन्हबाक चेष्टा करैत अछि, से थिक
कविता।’ जीवकांतक कविता पर गप करबा काल हुनकर अइ वक्तव्य कें ध्यान
मे राखब उचित होएत। मैथिली मे 1964 ई. सं जीवकांतक लेखनक आरंभ भेल
अछि। यद्यपि हिन्दी मे 1953 सं लिखैत छलाह। हिन्दी मे ‘तीसरा सप्तक’ क
प्रकाशन 1959 मे भ’ चुकल छल, जखन प्रयोगधर्मी लोकनिक वक्तव्य संदर्भ होअए
लागल छल। 1943 मे जिनकर एप्रोच मे संभावना ताकल जाइत छल, से दू दशकक
उपरांत उपलब्धि साबित होअ’ लगलाह। मैथिली कविता मनबोध, चन्दा झा आ
भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’क सृजनधर्मिता सं आगू बढ़िकए यात्राी, राजकमलक लेखनीक
संस्पर्श पाबि चुकल छल। ‘चित्रा’ आ ‘स्वरगंधा’क प्रकाशन परवर्ती मैथिली कवि
कें बेस सन अवदान द’ चुकल छल। अपन काव्य सृजन प्रारंभ करबा सं पूर्व ई
समस्त उपलब्धि जीवकांतक सोझां मे छलनि। मुदा संगहि ईहो छल जे हिनकर
समवयस्क अनेक कवि लोकनि स्थापित भ’ चुकल छलाह। एहना स्थिति मे मैथिली
काव्य लेखन मे जीवकांतक अवतरण खूब पकठोस उम्र मे भेलनि अछि। कविताक
अतिरिक्त जीवकांत कथा, उपन्यास आ समालोचना सेहो लिखने छथि, लिखैत छथि;
मुदा ‘मैथिलीक नव कविता’ संकलन मे हिनका मूलतः कवि मानल गेल अछि।
वास्तविकता ई अछि जे सृजनात्मक लेखनक अतिरिक्त, जीवकांत जहिना कोनो
वस्तुनिष्ठ वक्तव्य दिश बढ़ैत छथि कि हुनकर द्वैध अथवा अनिर्णय साफ-साफ
झलक’ लगैत अछि। पुष्टि लेल अग्रज वर्ग (यात्राी, मधुप, सुमन) आ अनुज वर्गकक्षमता पर देल गेल हिनकर आपत्तिजनक टिप्पणी (मैथिली नवकविता/रमानन्द झा
‘रमण’/पृ.-159 मे उद्धृत) आ अही वर्गक उपलब्धि पर अन्यत्रा देल गेल आस्थावान


वक्तव्य (लिखित/मौखिक) देखल जा सकैत अछि। जे-से...जीवकांतक कविता आ
काव्य प्रतिभा पर गप करब अभीष्ट अछि।

नव कविता पर चर्चा करैत ई आवश्यक मानल जाएत जे काव्य यात्राक ई
मोड़ अबैत-अबैत मात्रा कविताक बाह्य स्वरूपे नहि बदलल, बल्कि नव-नव बिंब,
प्रतीक, नव-नव शब्दावलीक अनुसंधान भेल आ गहनतम स्तर पर काव्यानुभूतिक
संरचना मे अंतर आएल। अपन काव्य सृजनक मादे राजकमल वक्तव्य देलनि,
‘हमर कविता हमरा आंतरिक जीवन आ हमरा अस्तित्वक रहस्य, यथार्थ आयोजना
सब कें अभिव्यक्त एवं अंकित करैत अछि। यदि हमर कविता हमरा मुक्त नहि
करैत अछि, तं हम ओकरा एक वक्तव्य मात्रा मानैत छी; कविता नहि।’ आ तदनुरूप
अपन कविता मे ओ सेहो देखाइत छलाह। जीवकांत सेहो अही प्रक्रिया मे अपन
काव्य सृजन मे वक्तव्यक अनुकूल उतरि गेलाह। नव कविताक काव्यानुभूतिक जाहि
अंतस्संरचना मे परिवर्तन आबि गेल छल, नव कविता जाहि तरहें मनुष्यक मोन
आ मानवीय क्रिया अभिक्रियाक मानसिक पृष्ठभूमि मे नव-नव बिंब प्रतीकक संग
हुलक’ लागल, जीवकांतक कविता ओहि समस्त दिशा सं उद्बोधित होइत रहल।
जीवकांतक लेखनारंभक काल प्रायः नव तरहें एकटा अन्य मोहभंगक काल थिक।हिन्दीक ‘साठोत्तरी कविता’क प्रारंभिक चरण सेहो इएह थिक। साठिक बाद लिखल
जाए वला कविताक मादे केदार नाथ सिंहक मत छनि, ‘...साठिक बाद लिखल
जाए वला कविता वास्तविक अर्थ मे समकालीन उपकरण सभक द्वारा समकालीन
कविक दिश सं समकालीन पाठकक प्रति संबोधित कविता थिक, ओ अपना समयक
कोनो प्रौढ़ एवं संपूर्ण व्यवस्था भने नहि द’ पबैत हो, मुदा ओकरा प्रति एकटा
सोझ आ सुच्चा मानवीय प्रतिक्रियाक अविव्यक्ति अवश्य करैत अछि। इएह ओकर
उपलब्धि थिक आ एकटा एहेन समय मे, जखन सत्य बात कहब जोखिमक काज
हो, एतबा कम नहि थिक...।’

अज्ञेयक प्रमुख काव्य संकलन ‘आंगन के पार द्वार’ कें साहित्य अकादमी
पुरस्कार सं 1964 ई. मे सम्मानित कएल गेल। बंगला मे अही वर्ष सुभाषमुखोपाध्यायक काव्य संग्रह ‘यतो दुरेइ जाइ’ (बंगला मे) सेहो पुरस्कृत भेल। जाहि
भावबोध कें दशाधिक वर्ष सं लगातार संघर्ष कर’ पड़लैक ताहि भाव-बोधक कवितासंकलन कें राजकीय सम्मान सं पुरस्कृत कएल गेल ई निश्चित रूपें एकटा नवस्वीकृतिक प्रति आश्वस्ति छल। 1962 ई. क राष्ट्रीय संकट साहित्य आ राजनीति दुनू
मे एकहि संग बहुत रास आडंबर, मोहक आदर्श आ फोंकिल काव्याभिव्यक्तिक
प्रति विशाल अनास्था उत्पन्न केलक। ...ई समस्त परीक्षण जीवकांतक नजरिक सोझां
छलनि। अर्थात् मैथिली काव्य सृजन मे उतरबा काल जीवकांत कें एतेक हथियार
अथवा एतेक युगबोध प्राप्त छलनि। जीवकांतक कविता अही विकराल परिस्थिति
सं प्रारंभ भेल। ‘नाचू हे पृथ्वी’ (1971) आ ‘धार नहि होइछ मुक्त’ (1991) अपन

दुनू कविता संग्रह मे जीवकांत नव कविताक समस्त मानदंडक संग उपस्थित छथि।
जखन कवि ई बूझि रहल छथि जे हुनकर सृजन ने तं हुनका कोनो वैशिष्ट्य द’
रहल छनि आ ने हुनकर परिवेश मे व्याप्त तर्कहीन स्थिति कें कोनो युक्तियुक्तता
द’ रहल अछि; कविक लेल स्वयं सृजनशीलते एकटा भयावह स्थिति ठाढ़ करैत
अछि। आ ई भयवाहता एकटा नव तरहें मोहभंग उत्पन्न करैत अछि। ई मोहभंग
स्वाभाविक रूप सं कवि परंपरागत मान्यता कें खंडित करैत अछि। जीवकांत अही
खंडित मान्यताक कविक छथि जे परिवेशक स्थिति देखिकए ने तं निरपेक्ष भेल
ठाढ़ रहि सकैत छथि आ ने ओहि यांत्रिकता मे समा सकैत छथि। हं, दृष्टिबोध
छनि, आंखि छनि तें वस्तु स्थिति कें देखि सकैत छथि, चीन्हि सकैत छथि। अइ
देखबाक आ चीन्हबाक लेल जतेक जोखिम भ’ सकैत अछि, से उठब’ लेल नव
कविताक कवि तैयार भेलाह। मुक्तिाबोधक एकटा पंक्ति अछि ‘मैंने उसे नंगे देख
लिया/इसका मुझे दण्ड मिलेगा’। देखबाक आ चिन्हबाक अइ समस्त परिणति सं
निश्चिंत भेल नव कविक ओतए ‘स्व’ (हम) शैली मे अधिकांश गप होअए लागल।
जीवकांतक ‘कविता एक वस्तुक अस्वीकार थिक आ दोसरक स्वीकार। मुदा, ताहूसं पैघ ओकर उपलब्धि छैक जे ओ आत्मस्वीकृति (कन्फेशन) थिक। ...हम साहित्य
कें जीवन सं प्रतिबद्ध बुझैत छी। आधुनिक जीवनक विसंगति, असुविधा, पीड़ा आ
यांत्रिकता कें अभिव्यक्ति देब एहि कविताक लक्ष्य अछि। तें एहि कविता मे क्षण-क्षण
मे भोगल जाइत जीवनक प्रति कटुता आ आक्रोश, घृणा आ भत्र्सना, उदासीनता
आ निर्वेद अभिव्यक्त भ’ रहल अछि...।’

जीवकांतक कविता जीवनक प्रति अही कटुताक परीक्षण-रपट थिक। कवि
अपन मौलिक दृष्टिबोधक कारणें व्यवस्था कें नंगटे देखलनि, चिन्हलनि आ अइचीन्हि लेबाक परिणति सं बचबाक प्रयास नहि केलनि। एक वस्तुक अस्वीकृतिआ दोसरक स्वीकृति अर्थात् आत्मस्वीकृति हिनकर कविता मे स्पष्ट रूपें अबैत अछि।
जेना कि स्वयं जीवकांत कहैत छथि, ‘कविता मे नवताक विशेषण ओकर दृष्टिबोध
थिकैक। प्रत्येक तर्कसंगत वस्तु कें, खाहे ओ कतबो नवीन हो, खाहे ओ पहिलुका
केहनो महत्वपूर्ण बद्धमूल धारणाक भंजन करैत हो, अपन युक्तियुक्तताक बलक
कारणें ग्रहण करब नवीनता थिक।’ ओ अपन सृजन मे सेहो अइ नवीनताक पक्षधर
रहैत छथि। स्वानुभूति हिनकर कविता मे स्पष्ट रूप सं अबैत अछि।

प्रतिबंधक विवशता आ उन्मुक्तताक लालसा जीवकांतक कविता मे मात्रा
विषय-वस्तुएक स्तर पर नहि, हिनकर प्रतीक योजना मे सेहो बहुलता से निखरैत
रहैत अछि। जीवकांतक संपूर्ण सृजनशीलता प्रायः अही उपादान सं युक्त रहैत अछि।
नदी, पक्षी, नारी, गाछ-वृक्ष, मेघ आ बरखा बुन्नीक प्रति अतिरिक्त आग्रह हिनकर
अइ दृष्टि कें पुष्ट करैत अछि। ‘स्त्राीगण थिकीह चिड़ै/अनंत आकाश मे उड़बाक
लेल हुनक पांखि जनमैत तं अछि/मुदा दोसरे छन ओ टूटि जाइछ/आ ओ आकाशचारी


चिड़ै धमधमा क’/माटि पर खसि पड़ैछ/पिजड़ाक फूजल फाटक/चिड़ै कें बहारे टा
नहि करैत छैक/ओकरा पिजड़ा मे घुरा क’ बन्नो क’ दैछ।’

परतंत्राता आ पिंजरबद्धताक प्रति ई साम्य ताक’ मे जतए जीवकांतक दृष्टि
बीसम शताब्दीक अंतिम चरण मे जीवन-यापन करैत नागरिक आ एकैसम शताब्दी
मे गरदनियां द’ कए ठेल’ वाली व्यवस्थाक विडंबना तकलक अछि ओतहि अइ
व्यवस्था मे अपन अधोगति लेल विवश नारीक सूक्ष्मतर कारण सेहो मुदा शैक्षिक
तथा आर्थिक परतंत्राताक कारणें नारीक टूटल पांखि पर गेल जीवकांतक दृष्टि कोनो
नव बाट नहि तकैत छनि आ कवि एतबा कहि निश्चिंत भ’ जाए चाहैत छथि
जे ‘बहुत रास चिड़ै आकाश लेल नहि जनमैत अछि/बहुत रास चिड़ै माटि पर गुड़कबा
लेल जन्म लैत अछि/आ, बहुतो रास चिड़ै खुट्टा आ डोरी कें/सार्थक करबा लेल
लेद झाड़ैत अछि’।

स्त्राीगण आ चिड़ै कें अइ तरहें एक्के पलड़ा पर तौलैत काल जीवकांतक दृष्टिक
सूक्ष्मता तखन आओर बेस विवेकशील बुझाइत अछि जखन ओएह पक्षी जीववाची
नहि भ’ कए जातिवाची होइत अछि। गिद्ध आ बाजक रूप मे आएल पक्षी जीवकांतक
संपूर्ण समाज दृष्टि, जीवन दृष्टि आ वस्तुबोध कें उजागर करैत अछि। ‘...ककरो
गलती सं/इजोत सहसा फेल भ’ जाइछ/आ आदिम अंधकार/आइओ चिड़ै सभ कें
ग्रसने अछि/कोनो बहेलिया, कोनो बाज पक्षी/कोनो धामन सांप/कोनो बिलाड़ि कें
देखि/चिड़ै सभ अनघोल कर’ लगैछ...’।

समकालीन सामाजिक व्यवस्था, प्रशासनिक व्यवस्था, व्यक्ति-परिवार-समाज-राज्य-
देश धरिक पूरापूरी मैकेनिज्म मे चिड़ै, नारी, बाज, धामन, बिलाड़ि आ बहेलियाकसमस्त प्रतीकात्मकता एक दिश वत्र्तमान राजनीतिक परिस्थितिक वीभत्सता, विकृति
आदि पर घृणास्पद दृष्टि दैत अछि तं दोसर दिश कविक व्यंग्यक तीक्ष्णताक सीमा
आंकैत अछि। आइ जखन देश मे लिंग, जाति, वर्ग आदि सं निर्लिप्त भ’ कए
आगू बढ़बाक अविरल निमंत्राण अबैत अछि, ओतए एखनहुं मिथिलांचलक नारीक
स्थिति पिजराक सुग्गा सं भिन्न नहि भ’ रहल अछि। अइ सुग्गापन सं नारी कें
मुक्त होएबा मे शैक्षिक आ आर्थिक उन्मुक्ता जं कनेक मदति करतैक तं सामाजिक
मान्यता आ पाखंडपूर्ण मर्यादा ओकरा ओहि काजक अनुमति नहि देत। हमरा समाजक
सामान्य जनताक शोषण कोनो शोषक अही टा लेल क’ पबैत अछि, जे हमरहि
कोनो भाइ बंधु हमर शोषण करबा मे ओकर मदति करैत छैक। ओहि बहेलिया
कें जं बाज (जे स्वयं पक्षी थिक आ अपनहि जाति सं दोसरक लेल द्रोह करैत
अछि) कोनो आन पक्षी पकड़ि कए नहि आनि दैक तं ओ की लेत ?...जीवकांतक
काव्य दृष्टि सामाजिक आ राजनीतिक वीभत्सता कें अइ दृष्टिएं देखलनि अछि।

मुदा, हिनकर कविता सामाजिक विडंबनाक यथास्थितिक रोदन मात्रा थिक,
अपन सृजनशीलता मे ई व्यवस्था परिवत्र्तन हेतु कोनो जोखिम नहि उठब’ चाहैत

छथि, सूचना मात्रा द’ कए निश्चिंत भ’ जाए चाहैत छथि..



प्राचीन परंपराक वैशिष्ट्य आ रूढ़िक बीच एकटा सीमा रेखा घिचबाक लेल
फिरीसान कवि जीवकांतक परंपरा-मोह आ परंपरा-भंजकता विचित्रा सन द्वैध मे छटपटा
रहल छनि। पौराणिक प्रसंग कें समकालीन परिवेश मे चिन्हबा मे कवि बेस सफल
भेल छथि। संतान, पितर, कर्ण, भर्तृहरि, स्त्राी, नदी, धार, बरखा, पक्षी, चिड़ै, इजोत,
प्रकाश, सूर्य, आकाश, समय, मेघ, हरिण, जमीन, धरती, आगि, धधरा, दीप टेमी,
अन्हार, थाल, बगुला, गिद्ध, धामन, चांगुर, बिलाड़ि, बहेलिया, लाल-पीयर इच्छा..
आदिक प्रतीकात्मक प्रयोग जीवकांतक कविता मे नव-नव आ मौलिक अर्थयोजना
आ संप्रेषणीयताक संग भेल अछि। ई प्रयोग हिनकर कविता कें मात्रा संक्षिप्त आआकर्षके टा नहि अपितु विषय कें मूत्र्त, ग्राह्य आ वांछित रूपें प्रभावोत्पादक एवं
संप्रेषणीय सेहो बनौलकनि अछि। अपन अद्यावधिक सृजन यात्रा मे जीवकांत देशक
अनेक उनट-फेरक प्रत्यक्षदर्शी रहलाह अछि। जीवकांतक कविताक आक्रोश अही
उनट-फेरक प्रतिफल थिक।

वास्तविक स्थिति ई अवश्य अछि जे किताबी समालोचना करैत आधुनिक
समालोचक समकालीन कविक कविता मे तिलिस्मी तागत ताक’ लगैत छथि आ
कहैत छथि जे फल्लां कविक कविता मे विद्रोहक स्वर मुखर नहि अछि। मुदा सन्
उनैस सय सतहत्तरि ईसवीक राजनीतिक उथल-पुथल सं जखन संपूर्ण देशक समस्त
राजनीतिक दल एकजुट भ’ कए कांग्रेसी अत्याचारक विरोध कएलक आ अइ विरोधक
नेतृत्व लोकनायक जयप्रकाश नारायणक हाथ मे छल; अइ विरोधक सकारात्मक
प्रतिफल पाबि लेलाक बाद देश मे एक बेर फेर सं नवीन शुरुआतक संग अराजकता
प्रारंभ भेल। आ ई बात निःसंकोच स्वीकारि लेबाक चाही जे एक बेर फेर सं भारतीय
नवयुवकक मोहभंग भेल आ युवाशक्ति अइ तरहक आंदोलन सं कान्ह छिपए
लागल ई कोनो अचरजक बात नहि थिक। जतए पक्षीक जड़ि मे अइ तरहें बाज,
गिद्ध आ बगुला व्याप्त रहत ओतए जीवकांतक कविता जं यथास्थिति पर कनैत
रहए आ कहए जे ‘शताब्दी सभक पानि बहि गेल/बांचि गेल अछि थाल/उज्जर-उज्जर
पांखिवला/बगुला सभ/थाल मे/डेगाडेगी ससरैछ/आ/अपन-अपन लोल/भरैछ...’ तं
कोन आश्चर्य ?

मनुष्य आ बहेलिया, इजोत आ अन्हार, बरखा आ थाल, माछ आ बगुला,
सुग्गा आ पिजराक अही संघर्ष सं जीवकांतक कविता जनमैत अछि, व्यवस्थाक अही
कम्प्यूटराइज्ड बाजनीति पर गरजैत अछि आ कहैत अछि जे इजोतक ओरिआओन
लेल लड़ाइ लड़ब बड़ जरूरी छैक।

1949 मे यात्राीक कविता संग्रह ‘चित्रा’ प्रकाशित भेल। 1958 मे राजकमल
चैधरीक ‘स्वरगन्धा’ छपल। मैथिली कविताक एहि दस बर्खक यात्रा कें कवि
राजकमल मनुक्खक शारीरिक सामाजिक अपराध आ पीड़ाक अनुभूति सं निकलि


कए ओकर आत्मदमनक क्षेत्रा मे प्रवेश कयलनि। एहि प्रवेशक प्रतिनिधि कवि मे
जीवकांत कें प्रमुखता देल गेल। किसुन, यात्राी आ राजकमल कविताक जे नव आंदोलन
चलओलनि; से जीवकांतक काव्ययात्राक क्रम मे आओरो सुपुष्ट भेल।

जाहि समय मे देशक नागरिकक समस्त अभिलाषा वर्ग विशेषक मुट्ठी मे फरफरा
रहल छल, लोक अनुभव करब प्रारंभ कएलक जे हमरा लोकनिक ई स्वतंत्राता, वर्ग
विशेषक पिजराक सुग्गा थिक; मैथिली साहित्यक कविलोकनिक पुरान पीढ़ी कें एहि
पर नजरि देब आवश्यक नहि बुझाइत छलनि। यात्राी आ राजकमल, एकरा नव
दिशा देलनि, जीवकांत कें एहि सं बल भेटलनि।

1974 सं 1990 धरिक हिनकर प्रतिनिधि कविता ‘धार नहि होइछ मुक्त’
पुस्तक मे संकलित भेल। छियासठि कविताक एहि संग्रह मे अधिकांश कविता नवम
दशकक थिक। जतए कविक अद्यतन आत्मपरीक्षण, आत्मगौरव, स्थितिक भयावहता,
मनुष्यक कत्र्तव्य-निष्ठा, नागरिक सामथ्र्य आदि अपन सुच्चा स्वरूप मे स्पष्ट भेल
अछि। जीवकांत एक दिश, अपन काव्य-सृजन मे यात्राी जकां सामान्य जन-जीवनक
सहज शब्दावलीक आश्रय लेलनि आ ओही परिवेशक परिदृश्य कें अपन कथ्यक
कोषागार बुझलनि, तं दोसर दिश राजकमल जकां दिशाहारा जनताक अंतर्मन मे
पैसि कए ओकर दुःख-दर्द सं अवगत भ’ कए नूतन अभिव्यंजना शैली, नव-नव
प्रयोग, कौतुकपूर्ण बिम्ब-प्रतीक योजनाक माध्यमे अपन कविता कें उत्कर्ष देलनि।
सृजन कें मान्यताक देहरि सं अलगे रखलनि। प्रबल आत्मविश्वासक संग ई बुझैत
रहलाह, जे मान्यता भने इतिहासकार देथु, मुदा रचना-कर्म होइत अछि, जनताक
लेल। तें कवि जीवकांतक कविता शाश्वत भ’ पाओल, युग-यथार्थक गीत भ’ पाओल,
सामान्य-जन-जीवनक दुःख-दर्दक मीत भ’ पाओल। शोषण, श्रमक अवमूल्यन, रूढ़ि,
अराजकता आदिक विरोध आ मजदूर वर्गक प्रति सहानुभूति हिनकर कविताक मौलिक
विषय थिकनि।

आधुनिक मैथिली कविता मे युग-यथार्थक सुच्चा स्वरूप ताक’ लेल जीवकांतक
कविताक अनुशीलन आवश्यक मानल जाएत से बात निर्विरोध सत्य अछि।
मनसा-वाचा-कर्मणा कवि जीवकांत अपन सृजनधर्मिताक प्रति ईमानदारी रखने छथि।
सैद्धांतिक आ व्यावहारिक दुनू स्तर पर कवि मे स्पष्ट सामंजस्य छनि।

आजुक कविता आ प्रारंभिक कविता मे वस्तुतः एकटा सांस्कारिक अंतर बुझाइछ
जे कविता राजदरबारक मनोरंजन मे दिन-राति अपन घाम-पसेना बहबैत छलि, से
आइ जन-सामान्यक सुख-दुःखक संग रमि गेल अछि। आभिजात्य वर्गक विलासक
पलंग सं उतरि कए श्रमिक वर्गक संग खेतक आरि-धूर पर बौआए लागल अछि।एहि परिवत्र्तनक मूल कारण थिक, कवि समुदाय मे सांस्कृतिक-क्रांति, ईमानदार
संवेदनशीलता। महल आ खोपड़ीक असमानता रचनाकारक कारयित्राी प्रतिभा कें
जगओलक। फलतः सृजनधर्मी लोकनि, आभिजात्य वर्गक बीच श्रम आ कलाक

अवमूल्यन अनुभव करए लगलाह। ओ सामान्य जनताक बीच आबि ओकर दुःख-दर्द
सं जुटि गेलाह। एखन समाज मे चतुर्दिक असमानता, बेकारी, शोषण, अनाचार,
घूस, चोरी, अपहरण, ईष्र्या, द्वेष, षड्यंत्रा, लूटि, बलात्कार, अमानवीयता आदि पसरल
अछि।

एहि परिस्थिति मे नवचेतना, जाग्रत हएबाक नव बाटक प्रयोजन भ’ आएल
छल। सृजनधर्मीक जागरण, सामाजिक जागरणक प्रारंभ मानल जाइत अछि। सामान्य
जनता, सामाजिक अनुकरण सं बेसी प्रभावित होइत अछि। तें जीवकांत स्वयं सजग
हैब श्रेयस्कर बुझलनि अछि; दोसर कें लड़बाक लेल पीठ ठोकबा सं श्रेयस्कर, युद्धक
तैयारी मे स्वयं जुटि जाएब बुझलनि। यथेष्ट धैर्यक संग अपन युद्धक तैयारी मे
योजनाबद्ध ढंग सं संलग्न। हिनकर काव्य साधना अत्यंत आश्वस्त भ’ क’ आकांक्षाक
पूर्ति हेतु अग्रसर अछि, कोनो अगुताहटि नहि, कोनो उद्विग्नता नहि। ई धैर्य हिनकर
गंभीर चेतना आ परिपक्वताक द्योतक थिक। बीच मे थोड़ेक कविता मे हिनका
मे स्थगन आबि गेल छलनि, जे बादक रचना मे आ बादक संग्रह मे बदलल।

अपन अधिकांश कविता मे कवि समष्टि कें अपनहि मे समाहित कएने बुझाइत
छथि। एकता मानवीय उत्थानक लेल अति आवश्यक अछि, से संदेश जहां-तहां
हिनकर कविता मे भेटैत रहैत अछि। जनसमूहक पराक्रम कें उत्कर्ष दैत कवि अपन
जाहि आस्था पर टिकल छथि, से सहजहिं, हिनकर कविता मे देखल जा सकैत
अछि। एकता पर कविक बल बेसी काल पड़ैत रहैत अछि, जे हिनकर समूह सं
सटि कए रहबाक, ओकर दुःख-दर्दक अवगति लेबाक संग-संग लक्ष्य-प्राप्तिक मार्ग
पर अग्रसर हएबाक औत्सुक्य देखबैछ, ‘एहि रमना पर आउ/कनियो स्वाद लियौक
जे/हजार आ लाख भेला पर/कोना भ’ जाइछ खढ़क टुकड़ी इस्पातक तार...’

व्यवस्थाक अमानुषिकता समाज कें गुमसराइन बना चुकल अछि से बात
आब स्पष्ट रूप मे सोझां अछि। मुट्ठी भरि लोकक चांगुर ततबा मजगूत आ चोखगर
भ’ गेल अछि, जे विशाल जनसमूह ओकरा आगू नतमस्तक भ’ जाइछ। ओहि वर्गक
नीचता आ ओकर षड्यंत्राक आगू विशाल जनशंकुलक साहस पछड़ि जाइत अछि,
‘केहनो कोठली बना अबैत छी/एकटा सांप ओहि मे पैसबाक/बना लैत अछि ग’र’।अदौ सं अपन-अपन प्रवृत्ति मे रत राजपुरुष आ जनताक बीच स्पष्ट विडंबना पर
कविक व्यंग्य मुखर भ’ उठल अछि, ‘शहर मे बैसल भाग्यविधाता सभक/ह’र सरंग
मे बहैत अछि/ओत’ घीउक घैल ओंघराइत अछि/आ शेष जनता चुटकी भरि नोनो
लेल/बेलल्ला बनल रहैत अछि...’

एकर अतिरिक्त ‘एकसरि ठाढ़ि कदम तर रे’, ‘सूर्य गलि रहल अछि’, ‘करमी
झील’, ‘वस्तु’ (कथा संग्रह), ‘दू कुहेसक बाट’, ‘पनिपत’, ‘नहि कतहु नहि’,
‘अगिनबान’, ‘पीयर गुलाब छल’ (उपन्यास), ‘खांड़ो’, ‘तकैत अछि चिड़ै’ (कविता
संग्रह) क रचनाकार जीवकांतक संपूर्ण कविताक अनुशीलन सं इएह स्पष्ट होइत अछि,


जे ई आन कवि जकां नाराबाजी, ललकारा आदि मे विश्वास नहि राखि, पितमरू भ’
कए समूहक संग चल’ चाहैत छथि। अनावश्यक ललकारा द’ कए अपन कवितामे कल्पना कें प्रश्रय नहि दैत छथि। विशुद्ध मैथिली शब्द कें पुनर्जीवित करबाक प्रवृत्ति
मे ई सीताराम झा आ यात्राी सन अपन विराट आ उदाहरणीय व्यक्तित्व ठाढ़ कएलनि
अछि। लिक्खाड़पन मे हिनका राजकमलक टक्कर मे ठाढ़ कएल जाएत। अर्थात्
एकहि ठाम एहेन समन्वय स्पष्ट होइत अछि, जेना सृजनशीलता हिनका शोणित मे
बहैत हो।

जीवनक डायरिए असली कथा थिक


सुभाषचन्द्र यादवक कथा लेखन बीसम शताब्दीक सातम दशकक उत्तरार्द्ध सं शुरुह
होइत अछि। दशक बीतैत-बीतैत आधुनिक मैथिली कथाधाराक स्थापित कथाकारक
रूप मे हिनका मानि-मोजर देल जाए लगलनि। ललित, राजकमल, मायानन्द,
सोमदेव, बलराम, धीरेन्द्र, रामदेवक पीढ़ी आ गुंजन, प्रभास, रेणु, जीवकान्त, राजमोहनक
पीढ़ी मैथिली कथाक क्षेत्रा मे ता अपन चमत्कार देखा चुकल छल। वस्तुगत आशिल्पगत विकास मैथिली कथा मे पूर्णतया भासित होमए लागल छल। स्वातंत्रयोत्तर
भारतक जनताक जीवन-मूल्य संबंधी मोहभंग, राजनीतिज्ञक राजनीतिक मोहभंग सेहो
भ’ चुकल छल। सीमा-संघर्ष, चीन आ पाकिस्तानक धोखाधड़ी सं जन आ जन-प्रतिनिधि
चैंकि चुकल छल। नेहरू आ लालबाहादुर शास्त्राी कें कारगर झटका लागि चुकल
छलैक। अही तरहक विकराल समय मे सुभाष कलम धयलनि, जखन हिनका सोझां
भयावह परिस्थिति ठाढ़ छल। मुदा अहू समय मे मिथिलाक समस्या घरेलुए आ
सामाजिके छलैक। अशिक्षा, अभाव, शोषण पराकाष्ठा पर आबि गेल छल। मान-मर्यादा,
अचार-विचार, परंपरा-प्रगति, स्थापित मान्यता आ अर्जित विचारधाराक संघर्ष मे
बुद्धिजीवी फिरीसान छल। सुभाषचन्द्र यादवक बखरा मे इएह दारुण स्थिति पड़लनि,
अही तीत-मीठक संग अपन साहित्यिक जीवन सुभाष प्रारंभ कएलनि।

असल मे सभ रचनाकार कें कच्चा माल समाजे सं उठएबाक रहैत छैक आतें ईमानदार रचनाकार कें समाजक जाहि जनवृत्तक मौलिक अनुभव प्राप्त होइत छैक,
तही मे ओ अपन जीवन-दर्शन विकसित करैत अछि आ तही कोटिक जनताक
जीवन यापनक माध्यमे अपना कें अभिव्यक्त करैत अछि। ई एकटा सुखद आतोषप्रद स्थिति थिक जे समाजक जे जनवृत्त अदौ सं साहित्य आ आनो आन ठाम
अचर्चित, उपेक्षित, शोषित, दलित आ पराजित रहल अछि, मध्यकालीन साहित्य मे
अथवा आधुनिको कालक साहित्य मे कोनो तरहें कतहु आबियो गेल, तं दास,


अनुचर, भृत्य, सेवक आदिक रूप मे; ताहि जनवृत्त कें सुभाष अपना कथा-संसार मेस्वरूप देलनि, प्रतिष्ठा देलनि। उपेक्षित, अपमानित, तिरस्कृत आ कथित रूप सं
पतित संवर्ग कें प्रतिष्ठा भेटब तं ललितेक पीढ़ी सं प्रांरभ भ’ गेल छल, मुदा तकर
कोटि अलग छल। ललितक ओतए आचरण सं बदनाम वर्ग कें, प्रतिष्ठा बेसी
भेटलैक, मायानन्दक ओतए संपदा सं आ वेतन सं हीन वर्ग कें प्रतिष्ठा भेटलैक,
राजकमल सवर्ण समूहक वित्तजन्य, आचरणजन्य संघर्ष कें उघार करैत रहलाह।
गुंजन, प्रभास, धूमकेतु, रेणुक ओतए ई सभ चित्रा मिश्रित रूप मे उपस्थित होइत
रहल, राजमोहन शहरी सभ्यता मे रंगल आ जड़ि सं उखड़ल घर-परिवारक न्यों कें
व्याख्यायित करैत रहलाह, जखन कि सुभाष शुद्ध क’ कए जाति आ जीवन-यापनकपद्धति मे कथित रूप सं हीन समुदायक जनवृत्त कें अपन लक्ष्य बनौलनि।

सुभाषक अत्यंत प्रसिद्ध कथा थिक ‘घरदेखिया’। कतहु प्रतिनिधि कथाक
चयन करबाक बेगरता संकलक, संपादक, अनुवादक, आलोचक कें जहिना पड़ैक,
कि ‘घरदेखिया’क मनटीका साटि दिअए। एहि कथाक बेस चर्चा मैथिली मे भेल
आ सुभाष एहि लेल ख्यात भेलाह। ओना ‘काठक बनल लोक’, ‘फंसरी’, ‘एक
दिनक घर’, ‘डर’, ‘झील’, ‘कुश्ती’, ‘बात’, ‘कारबार’, ‘सिगरेट’ आदि कैकटा
हिनकर महत्वपूर्ण कथा सब अछि। जकर चर्चा मैथिली साहित्यक भेड़ियाधसानप्रवृत्तिक कारणें नइं भ’ सकल। कृति आ कृतिकार दुनूक लेल ई अपमानजनक
स्थिति थिक।

जं आंकड़ाबाजी करी तं सुभाष थोड़े सुस्त कथाकार सेहो बुझएताह। संख्या
हिसाबें कथा बेसी नइं छनि। सन् 1983 ते हिनकर कथाक एकटा संकलन
‘घरदेखिया’ मैथिली अकादमी सं प्रकाशित भेल। तकर बाद हिनकर लेखन आओर
सुस्त भ’ गेल। यद्यपि ‘बात’ आ ‘कारबार’ सनक किछु श्रेष्ठ कथा तकर बादे
लिखलनि, मुदा ‘नदी’ आकि ‘अपन-अपन दुख’ सन किछु औसत सं नीचांक कथा
सेहो लिखलनि। जे-सेण्ण्ण् ‘घरदेखिया’ संकलनो मे एकाध कथा सब एहेन अछि,
जकरा पढ़बा लेल प्रारंभक दू-तीन अवतरण धरि श्रमक आवश्यकता पड़ैत अछि।
हमरा बुझने, एकर मूल कारण होइत अछि बिना कोनो प्रयोजनक पात्रा-परिचय
नुकौने रहब, ताहि पर सं दर्शनक बघार करब आ कथ्य सं नमहर कथ्यक पीठिका
तैयार करब।

सुभाषक कथाक भाषा एकदम थिर गति सं चलैत अछि, कोनो तेजी नइं, कोनो
हलतलबी नइं, एकदम धीर आ शांत गति सं जाइत, मुदा अपन लग-पास,
देश-दुनियांक तीत-मीठ कें चीन्हैत जाइवला भाषा शिल्पक ई कथा सब ठेंठमिथिलाक उपेक्षित, तिरस्कृत जनताक तिरस्कृत हरक्कतिक डायरी थिक।

ललित, राजकमल आ मायानन्द अपन कथा-संरचना द्वारा जाहि तरहें मैथिली
कथाक नव न्यों रखलनि, ताहि मे मायानन्द एकटा खास संवर्ग कें उठौने छलाह।

सूक्ष्मता सं देखल जाए तं बात सोझां आओत, जे जाहि जनपदक जे भाग मायानन्दक
बुतें छूटि गेल छल, सुभाष तकरहि पकड़नि आ ओएह संवर्ग एतए अपन स्वरूप मे
आएल। कहल जा सकैत अछि, जे मायानन्द आ सुभाष दुनूक कथा-संसार
समाजक डस्टबीन सं निकलल अछि, गोनौर पर सं उठाओल गेल अछि। अर्थात्
जीवन-यापनक जे अंश बाहरन-सोहरन जकां फेकि देल जाइत रहल, मायानन्द आ
सुभाष तकरहि झाड़ि-पोछि कए अपन कौशल सं अमूल्य चीज साबित क’ देखौलनि।
अर्थात्, ललित-राजकमल-मायानन्द द्वारा कथा-संसारक बान्ह-छेक, बिना सुभाषक
कथा-संसारक पूर नइं होइत अछि।

सुभाषक साम्य मायानन्दक संग अहू अर्थ मे ताकल जा सकैत अछि, जेमायानन्दे जकां सुभाषोक कथा मे साधारणीकृत भ’ कए ताकब, तं कोनो घटना नइं
भेटत, सोझे-सोझ जीवनक डायरी भेटत, आकि कहू तं सोझे जीवन भेटत। एक पल,
दू पल, पांच पलक आकि पांच घंटाक जीवन पद्धतिक क्रिया-कलाप आ कथा-पात्राक
चिंतन-मनन...बस्स, अइ सं बेसी किछु नइं, खाली ओतबा कालक कमेन्ट्रीक संग
कथाकारक ट्रीटमेंट महत्वपूर्ण होइत अछि। समाजक सब संवर्गक ओतए ‘घरदेखिया’
अबैत अछि, बिमलोक घरदेखिया आएल। मुदा मानव जीवनक एतेक महत्वपूर्ण,
उल्लासपूर्ण आ निर्णायक घटना कोना उपेन, रघुनी आ ककाक लेल आयल पानि,
गेल पानि सन होइत अछि, चकित होअए पड़ैत अछि। घरदेखिया सभक स्वागत-सत्कार,
मान-सम्मान सब चीजक व्यवस्था भेल; विवशता, अभाव, तकरा पूर करबाक उद्योग,
सामाजिकता, कन्याक निरीक्षण-परीक्षण, घरदेखियाक विदाइ...सबटा घटना-उपघटना
होइत रहल, मुदा कथाकारक ट्रीटमेंट देखू, जे एकदम सं बुझाएत, जे कतहु किछु
नइं भेल अछि, कोनो अफरा-तफरी नइं अछि। मुदा एहिना मे बहुत किछु भ’ चुकलरहैत अछि। ‘साठोत्तरी मैथिली कथाकार’ पर चर्चाक क्रम मे ललितेश मिश्र सुभाष
पर विचार करैत हिनकर कथा कें समस्त वैशिष्ट्यक अछैत संघर्षहीन स्वरूपक कारणें
अपूर्ण आ असंतुलित कहलनि अछि। ओना सुभाषक ‘घरदेखिया’ कथा कें हमहूं,
सर्वोत्तम नइं मानैत छी, मुदा ‘काठक बनल लोक’ आ हाल मे प्रकाशित कथा ‘बात’
सर्वोत्तम भ’ओ कए संघर्षक ओ स्वरूप प्रस्तुत नइं करैत अछि, जे ललितेश ताकि
रहल छथि। किंतु, संघर्षक कोटि आ अपन समस्याक निराकरण हेतु संधान दुनू कें
सोझां-सोझी राखि क’ देखला पर किछु बात फरीछ होइत अछि। ‘घरदेखिया’ कें
अरिआति कए अयलाक बाद ककाक पड़ि रहब आ आंखि लागि जाएब तथा चिंतित
उपेनक बीड़ी पीब सेहो छोट-मोट संघर्षक स्वरूप नइं ठाढ़ करैत अछि। जे परिस्थिति
छल, ताहि मे कथा-पात्रा सब क’ए की सकैत छलाह ? कका कें बैसल नइं गेलै, ओ
पड़ि रहल, आ आंखि लागि गेलै ई घनघोर चिंताक संकेत थिक, चिंता मे आंखिलागि जाएब, मिथिला मे नव तरहक ऊर्जा-संचयक संकेत मानल जाइत रहल अछि।

‘काठक बनल लोक’ आ ‘बात’, सुभाषक एखन धरिक सर्वश्रेष्ठ कथा मे


गनल जा सकैछ, आ मैथिली कथाधारा मे ई दुनू कथा अपना लेल महत्पूर्ण स्थान
आरक्षित करैत अछि। ‘बदरिया’ कें काठक बनल लोक कहल गेल अछि, जकरा बड़
मारि मारल जाइत अछि, मुदा ओ अपन आदति सं बाज नइं अबैत अछि। आदतियो
ओकर की थिक, तं’ जे अन्न ओ खाय चाहैत अछि, सैह टा ओ खायत ! ताहि अन्न
कें नुका क’ रखबाक कोनो टा साधन, कोनो टा वर्जना बदरिया लेल गरू नइं अछि।
बौकूक घर मे बचल-खुचल तरकारी लोहिए मे खाय लागल, खा कए बहरा गेल,
बौकूक घरवाली देखि गेलैक, मुदा बदरिया निद्र्वंद्व, ओकरा मुखमंडल पर कोनो
अपराध बोध नइं। जे बदरिया एतेक छोट उम्र मे जीवनक एतेक पैघ दर्शन कें पकड़ि
लेलक अछि, जे ‘जाहि वस्तुक भोग हमरा करबाक अछि, से करब,’ अथवा दोसर
दृष्टिएं देखू तं एहि सत्य सं परिचय जाहि बदरिया कें भ’ गेलैक अछि, जे ‘पेट आ
जीह आ मोनक मांगक पूर्ति करबा लेल कोनो मान-सम्मान, गारि-मारिक चिंता नइं
करबाक थिक,’ ताहि बदरिया कें काठक बनल कहल जाइत अछि, मुदा सौंसे टोलक
लोक कें अइ सत्य सं परिचय नइं होइत छैक। असल मे काठक लोक तं अइ कथा
मे थोड़-बहुत सब अछि। ‘काठक बनल’ पदबंध सं व्यंजना अबैत अछि, जे ओ
व्यक्ति काठ सन संवेदन-शून्य, चेतन शून्य, चिंतनशून्य, बोधशून्य...सब अछि। आसे सत्ते, जखन घर खसबाक मोआवजा कें रामी पेटपूर्ति मे खर्च करबा लेल विवश
अछि, तखन कोन मान, कोन प्रतिष्ठा, कोन बोध, कोन चिंतन...? ‘काठक बनल
लोक’ एक विराट व्यंजना दिश संकेत करैत अछि, विषय-शिल्प-भाषा सब अर्थें ई
सुभाषक श्रेष्ठ कथा थिक।

सन् 1999 क आरंभ में प्रकाशित ‘बात’ सेहो श्रेष्ठ कोटिक कथा थिक।
एकटा दीर्घ अंतरालक पश्चात् प्रकाशित ई कथा सुभाषक नव तरहक भंगिमाक
परिचय दैत अछि आ एतए आबि कए लगैत अछि जे विषयक स्तर पर सुभाष अपने
बनाओल परिधि कें तोड़ि कए एकटा नव तरहक बात उठौलनि अछि। नेबो बेचैत
एकटा छौंड़ा पर फरेबक अत्याचार करैत कोनो तिकड़मीक कारी मुंह देखार कएलनि
अछि। अइ कथाक अंत मे ओहि तिकड़मीक जे हरक्कति चित्रित भेल अछि, ओ
प्रमाणित सत्य थिक जे कोनो ठक, बड़ियाठ कें देखलाक बाद अपन समस्त उग्रता
बिसरि जाइत अछि। ई कथा प्रमाणित करैत अछि, जे चोर इजोत नइं सहि सकैत
अछि। ओना, अइ कथाक शानदार अंत एक अवतरण पूर्वहि भ’ चुकल अछि।
अंतिम अवतरण बंद टोंटी सं टप-टप चुबैत पानि थिक, जे मूल धारा सं असंबद्ध
अछि। ‘सिगरेट’ सेहो सुभाषक बेस जानदार कथा छनि, जाहि मे घटना तं मात्रा एतबा
अछि: पाइक अभाव मे अपना खर्च सं कथानायक, सिगरेट नइं पीबि सकलाह, कोनो
नोकर सं मांगेलाक बादो सिगरेट नइं प्राप्त क’ सकलाह, कतेक-कतेक उद्योग सोचैत
रहलाह, आ अंततः, बीड़ी धरि पीबि कए तलब शांत कर’ चाहैत छलाह। मुदा, जखन
दोसरक खर्च सं सिगरेट पीबाक आश्वासन भेटि गेलनि, तं ओ सब सं महग सिगरेट

जरौलनि सामान्य रूप सं चिंतनपूर्ण घटना एतबे अछि, मुदा, जेना कि पहिनहुं कहल
जा चुकल अछि, सुभाष, अपन कथानायकक जीवनक अत्यंत छोट सन अंशक संगें
ट्रीटमेंट मे ततेक कलाबाजी देखबैत छथि, जे ओतए सामान्य जनताक दैवी-दानवी,
मानवीय-पाशविक...सभ प्रवृत्ति देखार भ’ जाइत अछि। अही क्रम मे मनुष्यक
अहंकार, स्वीकार, आशा, निराशा, प्रतीक्षा, नकार, श्रम, चिंता, अभाव, आपूर्ति,
ओरिआओन, व्यवस्था, संबंध-सरोकार, आदति, संस्कृति, आचार-विचार...सबटा
चीज व्याख्यायित भ’ जाइत अछि। ‘प्रलय’, ‘नदी’, ‘अपन-अपन दुख’ सन किछु
कथा एहेन अछि, जे सुभाषक विकासमान आ उंचाइ चढ़ैत ग्राफ कें समतल अथवा
अधोतल करैत अछि।

सुभाषक कथाक काया सामान्यतः छोट होइत अछि, भाषा थिर वेगक होइत
अछि, पात्रा सब बहुत मद्धम सांसें जीबैत अछि, पहिने तं बेसी काल गाम-घर पर
केंद्रित रहैत छल, आब शहरो दिश, हाट बजार दिश अग्रसर भेल अछि, हो-हल्ला आ
दंगा फसाद मे हिनकर पात्रा विश्वास नइं रखैत अछि, जीवनक सहजता मे पड़ल गेंठ
सब कें खोलबाक प्रयास मे लागल रहैत अछि, नइं खुजला पर ओतहि रुकि जाइत
अछि। विद्रोहक स्वर जं हिनकर कथा मे अएलनि अछि,तं तकरो कोटि एना जे
बदरिया दोसरक हांड़ी सं तरकारी खा आएल। शोर-शराबा, खून-खराबाक कोनो
प्रयोजन नइं। एहेन कथाकार सुभाष, अपन पूर्वक कथा सब मे मैथिली भाषाक शब्दसंसार कें सेहो पुनर्नवीकृत कएलनि अछि। हिनकर रचना मे कैक ठाम मैथिलीक
हेराइत शब्द सब, एते धरि जे ग्रामीणो जनपद सं लुप्त भेल शब्द सब जीवंत भ’ उठल
अछि। भाषा-संरचना ततबे सरल अछि। मुदा एम्हर आबि कए, हिनकर किछु कथा
मे शब्द-प्रदूषणक असरि देखाइ पड़ल अछि।

सुभाषक कथाक अवलोकन अवगाहनक पश्चात् एकटा बातक कचोट निरंतर
होइत रहैत अछि। से, ई जे देशक संपूर्ण राजनीतिक दुरवस्थाक अछैत, हिनकर कथा
मे राजनीतितक चेतनाक बहुत बेसी अभाव देखाइत अछि। ओना, कथाक माध्यमे
आठम दशक मे स्थापित कथाकारक ओतए राजनीतिक बात भकरार भ’सकल, आ
ताहि सं पूर्व गुंजन, राजमोहन आ महाप्रकाशक कथा मे राजनीतिक सजगता देखल
जाइत अछि। मायानन्द, प्रभास, धूमकेतुक ओतए सेहो बाद मे राजनीतिक सजगता
देखल जाए लागल। राजनीतिक सजगताक अभाव आ परिस्थितिक भयावहताक
अछैतो मद्धम पानिक पात्राक सृजन, अर्थात् प्रतिपक्षक भूमिका मे ठाढ़ पात्राक विरोधी
स्वरक अनुपस्थिति, सुभाषक कथाक महत्व कें कम करैत अछि। सामान्यतया
सुभाषक पात्रा दलित, दुखित, पीड़ित, शोषित, निर्धन, शापित लोक होइत अछि, मुदा
ओकरा लोकनिक एहि दशाक लेल प्रभावी घटक की थिक, तकर अनुसंधान नहिएं
जकां होइत अछि। आ, प्रायः सैह कारण थिक जे कतहु विरोधी स्वरक उद्गम
हिनकर कथा मे नइं देखाइत अछि। ‘बात’ कथा सं अइ अभावक पूर्तिक आशा बनैत


अछि।

समस्त नीक-बेजाएक अछैत, सातम दशक सं अपन कथा-यात्रा प्रांरभ
कएनिहार सुभाषचन्द्र यादव आधुनिक धाराक श्रेष्ठ कथाकार छथि, मैथिली साहित्य
कें हिनका सं एखन बेस अपेक्षा छैक।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...