Saturday, September 12, 2009

पेटार ३३

जगदीश प्रसाद मंडल

20.सद्विचार : कर्तव्यनिष्ठ एकटा न्यायप्रिय राजा साधुक भेस (वेष) मे अपन प्रजाक कुशल-क्षेम बुझैक लेल निकललथि। जहिया कहियो ओ (राजा) साधुक भेस मे निकलथि तहिया सिर्फ एकटा मंत्री क चेलाक रुप मे संग क लथि। ने अंगरक्षक रहनि आ ने अमिला-फमिला। आ ने ककरो जानकारी दथिन। बहुतो गोटे स सम्पर्क करति राजा एकटा बगीचा मे पहुँचलथि। ओहि बगीचा मे एकटा वृद्ध किसान नवका (बच्चा) गाछ रोपैत रहति। गाछ देखि राजा किसान कऽ पूछलखिन- ‘ई त अखरोटक गाछ बुझि पड़ैत अछि।’ मुस्कुराइत किसानकहलकनि- ‘हँ भैया! अहाँक अनुमान बिलकुल ठीक अछि।’ ‘बीस-पच्चीस बर्खक गाछ भेला पर अखरोट फड़ैत छैक, ताधरि अहाँ जीविते रहब?’ ‘एहि बगीचा क हमर बाप-दादा लगौने छथि। खून-पसीना एक क कऽ एकरा पटौलनि, देखभाल केलनि। जेकर फड़ हम सब खाइ छी। तेँ आब हमरो कर्तव्य बनैत अछि जे ओते हमहू रोपि दियैक। अपने टा ले गाछ लगौनाइ त स्वार्थक बात भऽ जाइत छैक। हम ई नहि सोचै छी जे आइ एहि गाछक उपयोगिता की छैक? भविष्य मे दोसर क फल दइ, वस यैह इच्छा अछि।’ किसानक विचार सुनि राजा मंत्री कऽ कहलखि- ‘जँ एहिना सब बुझै लगै जे हमरा लगबै स मतलब अछि त समाजो आ परिवारो मे सद्वियार पसरि जायत। जाध् ारि समाज मे सद्वृत्तिक प्रसार (पसार) नइ हैत ताधरि नीक समाज बनब, मात्र कल्पना रहत।’ पंडित गंगाधर शास्त्री संस्कृत विद्यालय मे शिक्षक रहथि। बेटा गोविन्द सेहो ओहि विद्यालय मे पढ़ैत छल। जेहने पिता शिष्ट आ कर्तव्यनिष्ठ तेहने बेटो। जहि स सहपाठीक बीच सिनेह आ सम्मान छलनि। एक दिन शास्त्रीजीक संग गोबिन्द विद्यालय नहि अयलाह। छुट्टी भेला पर जखन शास्त्री जी विदा भेला तखन एकटा शिष्य पूछलकनि- ‘गुरुदेव! आइ गोविन्द किऐक ने अयलाह?’ भरिआइल मने शास्त्री जी उत्तर देलखिन- ‘अचानक गोविन्द कऽ दिलक दौरा पड़लनि, जहि स ओ ओहिठाम चलि गेलाह जहि ठाम स क्यो घुरि क नहि अबैत अछि।’ पंडित जीक बात सुनि श्ष्यि सभ स्तब्ध भऽ गेला। सहपाठीक निधन स सभकेँ दुख भेलनि। संगे इहो आश्चर्य भेलनि जे ऐहेन दुर्घटनाक उपरान्तो गुरुदेव पढ़बै ले कोना अएलाह! अपसोच करैत एकटा श्ष्यि पूछलकनि- ‘ऐहन दुर्घटनाक बादो, अपने विद्यालय कोना एलिऐक?’ शास्त्री जी उत्तर देलखिन- ‘हमर एकटा परिवार ओ अछि आ दोसर त यैह (अहाँ सब लगा) आछि। ओहि परिवार मे बालकक विछोहक दुख अछि मुदा एहि परिवार मे नइ अयने (ऐने) अहाँ सबहक हक मरैत। जहि स दुख आरो बढ़ि जायत। हुनका (बेटा) लेल जे करैक छल से क कऽ अहाँ सभक लेल एलहुँ।’ 21.बरदास्त : भूल अब्राहम लिंकन अमेरिकाक राष्टपति रहथि। हुनक पत्नी चिड़चिड़ा आ कठोर स्वभावक छलथिन। जहि स लिंकनक परिवारिक जीवन दुःखमय छलनि। कैक दिन ऐहन होइत छलैक जे जखन परिवारक सब सुति रहैत छलै तखन ओ (लिंकन) चुपचाप पैछला दरवाजा स आबि सुइत रहैत छलाह। आ सुरुज उगै स पहिनहि तैयार भ निकलि आॅफिस चलि जाइत छलाह। दिन भरि अपन कार्य मे मस्त भऽ बीता लैत छलाह। संगी-साथीक संग हँसी-मजाक क मन बहला लैत छलाह। एक दिन परिवारक एकटा नोकर केँ हुनक पत्नी गारिओ पढ़लखिन आ फटकारबो केलखिन। ओहि नोकर कऽ बड़ दुख भेलैक। ओ कोठी स निकलि सोझे लिंकनक आॅफिस जा सब बात कहलकनि। नोकरक सब बात सुनि लिंकन कहलखिन- ‘अए भले आदमी! पनरह बर्ख स हम एहि परिस्थिति स मुकाबला करैत शान्ति स रहैत एलहुँ। आ अहाँ एक्के दिनक फटकार मे एत्ते दुखी भऽ गलहुँ। बरदास्त क लिअ।’ अचताइत-पचताइत वेचारा नोकर लिंकनक बात मानि लेलक। प्रख्यात दार्शनिक बरटेªण्ड रसेल अपन जीवनी मे लिखने छथि, हमर पहिल स्त्री सचमुच विचारबान छलीह। जखन ओ मन पड़ैत छथि तखन हृदय दहकि जाइत अछि। दुनू गोटेक बीच अगाध प्रेम छल। एक दिन कोनो बाते दुनू गोटेक बीच अनबन भऽ गेल। खिसिया कऽ हम बिनु खेनहि आॅफिस विदा भऽ गेलहु। रास्ता मे एकाएक मन मे उपकल जे अपन क्रोधक बात पत्नी कऽ कहि दिअनि। रस्ते स घुरि गेलाह। घुरि कऽ घर ऐला पर पत्नी घुरैक कारण पूछलखिन। हमर क्रोध आरो उग्र भऽ गेल। हम कहलिएनि- ‘आब अहाॅ लेल हमरा हृदय मे मिसिओ भरि जगह नहि अछि।’ पतिक बात सुनि पत्नी स्तब्ध भऽ गेलि, मुदा किछु बाजलि नहि। बेचारीक हृदय मे ई बात जरुर पकड़ि लेलकनि जे हमरा ओ (पति) कपटी बुझैत छथि। आइ धरि हम भ्रम मे छलहुॅ दुनूक बीच खाई बढ़़ैत गेलइ। होइत-होइत पति पत्नी क तलाक द देलक। वेचारी रसेलक घर स सदा-सदाक लेल चलि गेलि 22.धैय: मनुष्यकमूल्य इंग्लैंडक प्रसिद्ध विद्वान टामस कूपर अंग्रेजीक शब्दकोष तैयार करति रहथि। काज मे ओ (कूपर) तेना ने लीन भऽ गेल रहथि जे घरक कोनो सुधिये-बुधियो ने रहनि। पत्नी के घरक सरंजाम जुटबै मे परेशानी होइन, तेँ ओ पति पर खूब बिगड़थि। मुदा तकर कोनो असरि कूपर कऽ नहि होइन। एक दिन कूपर कतौ गेल रहथि, तहि बीच पत्नी खिसिया क शब्दकोषक सब काॅपि जरा देलकनि। जखन ओ घुरि क अयलाह ते देखलखिन जे बरसोक मेहनत जहि गेल। मुदा धैर्य एत्ते प्रबल रहनि जे एको मिसिया तामस नहि उठलनि। ने एकोरत्त्ी पत्नी पर बिगड़लखिन आ ने अफसोस केलनि। मुस्कुराइत सिर्फ एतबे कहलखिन- ‘आठ बर्खक काज अहाँ आरो बढ़ा देलहुँ।’ एक दिन सिकन्दर आ अरस्तू कतौ जाइत रहथि। रास्ता मे एकटा नदी छल। जहि नदी मे नाओ पर पार हुअए पड़ैत छलैक। पहिने अरस्तू पार हुअए चहैत छलाह मुदा सिकन्दर हुनका रोकि अपने पार भेलाह। जखन सिकन्दर दोसर पार गेलाह तखन अरस्तू कऽ पार हुअए कहलखिन। पार भेला पर अरस्तू सिकन्दर के पूछलखिन- ‘पहिने हमरा पार हुअए स किऐक मना केलहुँ?’ हँसैत सिकन्दर उत्तर देलखिन- ‘अगर हम नदी मे डूबि जइतहुँ तइओ अहाँ हमरा सन-सन दशो सिकन्दर पैदा क सकै छी, मुदा जँ अहाँ डूबि जइतहुँ त हमरा सन-सन दशो टा सिकन्दर बुते एकटा अरस्तू नहि बनाओल भऽ सकैत अछि।’ सिकन्दरक बिचार सुनि अरस्तू अपन जिनगीक मूल्य बुझलनि। मदति नइ चाही। 23.मेहनतक दरद ग्रीस (मिश्र) मे एकटा किलेन्थिस नामक लड़का एथेंसक तत्ववेत्ता जीनोक पाठशाला मे पढ़ैत छल। किलेत्थिस बड़ गरीब छल। ने खाइक कोनो ठेकान आ ने देह झाँपैक लेल वस्त्रक। मुदा पाठशाला मे सही समय पर फीस द दैत। पढ़ै मे चन्सगर रहने सुभ्यस्त परिवार सभक विद्यार्थी ओकरा स ईष्र्या करैत। किलेन्थिस क दबबैक लेल एकटा षड्यंत्र ओ सब रचलक। षड्यंत्र यैह जे ओ (किलेन्थिस) पाठशाला मे जे फीस दैत अछि ओ चोरा क अनैत अछि। चोरीक मुकदमा किलेन्थिस पर भेलै। पुलिस पकड़ि क जहल ल गेलै। जखन ओकरा न्यायालय मे हाजिर कयल गेलै तखन ओ जज केँ कहलक- ‘हम निरदोस (निर्दोष) छी। हमरा फँसाओल गेल अछि। तेँ हम अपन वयानक लेल दू टा गवाही न्यायालय मे देब।’ जजक आदेश स दुनू गवाही बजाओल गेल। पहिल गवाही एकटा माली छल आ दोसर वृद्धा औरत। माली स पूछल गेल। माली कहलकै- ‘सब दिन ई लड़का हमरा बगीचा मे आबि इनार स पाइन भरि-भरि गाछ पटा दैत अछि। जकरा बदला मे हम मजूरी दैत छियैक। तखन वृद्धा स पूछल गेल। ओ वृद्धा कहलकै- ‘हम वृद्धा छी। हमरा परिवार मे क्यो काज करैवला नहि अछि। सब दिन ई बच्चा आबि गहूम पीसि दैत अछि, जकरा बदला मे मजूरी दैत छियैक।’ गवाहीक वयान सुनि जज मुकदमा समाप्त करैत सरकारी सहायता स पढ़ैक लेल सेहो आदेश देलक। परन्तु किलेन्थिस सरकारी सहायता लइ स इनकार करैत कहलक- ‘हम स्वयं मेहनत क पढ़ब तेँ हमरा दान नहि चाही। हमरा माता-पिता कहने छथि जे मनुष्य कऽ स्वावलंबी बनि जीबाक चाही।’ एकटा लोहार छल। मेहनत आ लूरि स परिवार नीक-नाहाँति चलबैत छल। मुदा बेटा जेहने खर्चीला (खरचीला) तेहने कामचोर छलैक। बेटाक चालि-चलनि देख लोहार कऽ बड़ दुख होय। सब दिन दश टा गारि आ फज्झति बेटा कऽ करै मुदा तइयो बेटा कऽ धनि सन। कोनो गम नहि। लोहार सोचलक जे इ ऐना नै मानत। जाबे एकरा खर्च करै ले पाइ देनाइ नहि बन्न कऽ देवैक, ताबे एहिना करैत रहत। दोसर दिन स पाइ देब बन्न क कहलकै- ‘अपन मेहनत स चारियो टा चैवन्नी कमा कऽ ला तखन खर्च देवौक। नइ त एक्को पाइ देखब सपना भ जेतौक।’ बापक बात सुनि बेटा कमाइक परियास करै लगल। मुदा लूरिक दुआरे हेबे ने करै। अपन पैछला रखल चारि टा चैवन्नी नेने पिता लग आबि कऽ देलक। लोहार (पिता) भाँथी पजारि हँसुआ बनबैत छल। चारु चैवन्नी के लेाहार आगि मे दऽ कहलकै- ‘ई पाइ तोहर कमाइल नइ छिऔ। पिताक बात सुनि बेटा लजाइत ओतऽ स ससरि गेल। दोसर दिन बेेटा के कमाइक हिम्मते ने होय। चुपचाप माए स चारि टा चैवन्नी मंगलक। माए देलकै। चारु चैवन्नी नेने बेटा बाप लग पहुँचल। बेटाक मुहे देखि बाप बुझि गेल।। चारु चैअन्नी बेटा बाप केँ देलक। भीतर स बाप कऽ तामस छलैक। ओ चारु चैवन्नी हाथ मे ल पुनः आगि मे फेकैय लगल, कि हल्ला करैत बेटा बापक हाथ पकड़ि कहलक- ‘बाबू ई हमर मेहनतक पाइ छी। एकरा किऐक बेदरदी जेँका नष्ट करैत छियैक?’ बाप बुझि गेल। मुस्कुराइत बेटा के कहै लगल- ‘बेटा! आब तोँ वुझले जे मेहनतक कमाइक दरद केहेन होइ छै। जाधरि अन्ट-सन्ट मे हमर कमेलहा खरच करै छलै ताबे हमरो ऐहने दरद होइ छलै।’ पिताक बात बेटा बुझि गेल। तखने शपथ खेलक जे एक्को पाइ फालतू खर्च नइ करब। 24.मैक्सिमगोर्की : मूलधन बच्चे स मैक्सिम गोर्की निराश्रित भऽ गेल रहथि। ओहि दशा मे जीवैक लेल झाड़ू लगौनाइ स ल कऽ चैका-बरतन, चैकीदारी सब केलनि। कैक दिन त कूड़ा-कचड़ाक ढ़ेरी स काजक बस्तु ताकि-ताकि निकालि, बेचि क अपनो आ बूढ़ि नानीक पेटक आगि बुझावथि। ऐहन परिस्थिति मे पढ़ब-लिखब असाघ्य कार्य थिक। ऐहन असाध्य परिस्थिति स मुकावला क अनुकूल बनौनिहार मैक्सिम गोरकियो भेलाह। रद्दी-रद्दी पत्रिका, फाटल-पुरान अखबार सब एकत्रित क पढ़नाई सिखलनि। जखन पढ़ैक जिज्ञासा बढ़लनि तखन समय बचा क वाचनालय जाय लगलाह। रसे-रसे लिखैक अभ्यास सेहो करै लगलथि। कोनो-कोनो बहाना बना साहित्यकार सभ स संबंध बनबै लगलथि। जे किछु ओ (गोर्की) लिखथि ओकरा साहित्यकार सभ स सुधार करबथि। वैह मैक्सिम गोर्की रुसक महान् साहित्यकार भेला। अन्यायी शासनक विरुद्ध जनताक अधिकारक लेल सिर्फ लिखबे टा नहि करथि बल्कि हुनका सभक बीच जा संगठित आ संघर्षक नेतृत्व सेहो करथि। जखन हुनकर लिखल किताब तेजी स बिकै लगल तखन ओ अपन खर्च निकालि बाकी सब पाइ संगठन चलबै ले द देथिन। एकटा बृद्ध पिता, तीनि बरखक लेल तीर्थटन करै निकलै चाहथि। निकलै स पहिने चारु बेटा केँ बजा अपन सब पूँजी बरोबरि क बाँटि कहलखिन- ‘तीनि सालक लेल हम तीर्थटन करै जा रहल छी। अगर जीबैत घुमलहुँ ते अहाँ सभ पूँजी घुरा देब, नहि त कोनो बाते नहि।’ अपन हिस्सा रुपैआ क जेठका बेटा सुरक्षित रखि पिताक प्रतीक्षा करै लगल। मझिला बेटा सूद पर लगा देलक। सझिला ऐश-मौज मे फूँकि देलक। छोटका ओकरा पूँजी बुझि व्यवसाय (कारोवार) करै लगल। तीनि सालक बाद पिता आयल। चारु स पूँजी आपस मंगलक। जेठका घर स आनि वहिना रुपैआ घुरा देलक। मझिला सूद सहित मूलधन घुरौलक। सझिला त खर्च क नेने छल तेँ अगर-मगर करैत चुप भ गेल। छोटका व्यवसाय स खूब कमेने छल तेँ चारि गुणा घुमौलक। चारिम (छोटका) बेटा कऽ प्रशंसा करैत पिता कहलक- ‘रुपैआ त वियाजो पर लगा बढ़ाओल जा सकैत अछि, मुदा ऐहेन काज अधिक पूँजीवलाक छियै। मुदा जे अपने पूँजी दुआरे बेरोजगार अछि, ओकरा लेल नहि। ओकरा त जैह पूँजी छैक ओकरा अपन श्रमक संग जेड़ि जिनगी कऽ ठाढ़ करै पड़तैक। ताहू मे जँ परिवारक दायित्ववला केँ आरो सोचि-विचारि इमनदारी स चलै पड़तैक। तखने परिवार चैन स चलि सकै छैक।’ 25.कपटीदोस्त भीख्ा एकटा सज्जन खढ़िया छल। ओ (खढ़िया) कतेको स दोस्ती केलक। दोस्ती एहि दुआरे करैत जे बेरि पर हमहू मदति करबै आ हमरो करत। एक दिन शिकारीक कुत्ता ओकरा पकड़ै ले खेहारलक। खढ़िया भागल। भागल-भागल खढ़िया दोस्त गाय लग पहुँच कहलकै- ‘अहाँ हमर पुरान दोस्त छी। कुत्ता हमरा रबारने अबै अए। अहाँ ओकरा अपन सींग स मारि कऽ भगा, दिओ जहि स हमर जान बचि जायत।’ खढ़ियाक बात सुनि गाय कहलकै- ‘हमरा घर पर जाइक समय भ गेल। बच्चा डिरिआइत हैत। आब एक्को क्षण ऐठाम नइ अँटकब।’ गायक बात सुनि खढ़िया निराश भ गेल। कुत्ता सेहो पाछू स अबिते रहै। ओ (खढ़िया) ओइठाम स पड़ायल घोड़ा लग पहुँचल। घोड़ो पुरान दोस्त खढ़ियाक छलैक। घोड़ा लग पहुँच खढ़िया कहलकै- ‘दोस अहाँ अपना पीठि पर बैसाय लिअ। जहि स हमरा ओहि कुत्ता स जान बँचि जायत।’ घोड़ा कहलकै- ‘हमरा पीठि पर कोना बैसब? हम त बैसबे बिसरि गेलहुँ।’ घोड़ाक बात सुनि खढ़िया निराश भ पड़ायल। जाइत-जाइत गदहा लग पहुँच कहलकै- ‘दोस! हम मुसीबत मे पड़ि गेल छी। अहाँ दुलत्ती चलबै जनै छी। कुत्ता के मारि क भगा दिऔ, जहि स हमर जान बँचि जायत।’ खढ़ियाक बात सुनि गधा कहलकै- ‘घर पर जाइ मे देरी हैत ते मालिक मारत। तेँ हम जाइ छी।’ फेरि खढ़िया भागल। जाइत-जाइत बकरी लग पहुँच कहलकै- ‘दोस! हम मरि रहल छी। अहाँ जान बचाउ।’ अपन ओकाइत देखैत बकरी उत्तर देलकै- ‘दोस! झब दे ऐठाम से दुनू गोटे भागू नहि त हमहू खतरा मे पड़ि जायब।’ बकरीक बात सुनि खढ़िया आरो निराश भ गेल। मन मे एलै जे अनका भरोसे जीवि बेकार छी। अपने बूते अपन दुख मेटा सकै छी। भले ही मन-मुताबिक जिनगी नहि जीवि सकी। तखन खढ़िया छाती मजगूत क ब पड़ायल। पड़ायल-पड़ायल एकटा झारी मे नुका रहल। कुत्ता देखवे ने केलकै। दौड़ल आगू बढ़ि गेल। खढ़ियाक जान बँचि गेलै। एकटा मच्छर मधुमाछी छत्ता लग पहुँचल। छत्ता मे ढ़ेरो माछी छलै। छत्ता लग बैसि मच्छर माछी कऽ कहलकै- ‘हम संगीत विद्या मे निपुण छी। अहूँ सब संगीत सीखू। हम सिखा देब। जकर बदला मे थोड़े-थोड़े मधु देब जहि स हमरो जिनगी चलत।’ मधुमाछी सब अपना मे बिचार करै लगल। मुदा बिना रानी माछीक बिचार स क्यो किछु नहि कऽ सकैत, तेँ रानी स पूछब जरुरी छलैक। सब बिचारि एकटा माछी कऽ रानी लग पठौलक। रानी माछी सब बात सुनि कहलकै- ‘जहिना संगीत-शास्त्रक ज्ञाता मच्छर भीख मंगै ले अपना ऐठाम आइल अछि तहिना जँ हमहू सब मेहनत छोड़ि देब त ओकरे जेँका दशा हैत। तेँ मेहनतक संस्कार छोड़ि सस्ता संस्कार अपनौनाइ मुरुखपना हैत। अगर अहूँ सब कऽ संगीतक शौक होइ अए ते मेहनतो करु आ बैसारी मे संगीतों सीखू।’ 26.भगवान : एकाग्रचित सिद्ध पुरुष भऽ कबीर प्रख्यात भ गेल छलाह। दूर-दूर स जिज्ञासु सब आबि-आबि दर्शनो करैत आ उपदेशो सुनैत। मुदा कबीर अपन व्यवसाय (कपड़ा बुनब) नहि छोड़थि। कपड़ो बुनैत आ सत्संगो करथि। एकटा जिज्ञासु कबीरक व्यवसाय देखि पूछलकनि- ‘जाधरि अपने साधारण छलहुँ ताधरि कपड़ा बुनब उचित छल, मुदा आब त सिद्ध-पुरुष भऽ गेलिऐक तखन कपड़ा किऐक बुनै छी?’ जिज्ञासुक विचार सुनि मुस्कुराइत कबीर उत्तर देलखिन- ‘पहिने हम पेटक लेल कपड़ा बुनैत छलहुँ। मुदा आब जनसमाज मे समाइल भगवानक देह ढ़कैक लेल आ अपन मनोयोगक साधनाक लेल बुनैत छी।’ एक्के काज रहितहुँ दृष्टिकोणक भिन्नताक उत्पन्न होइवला अंतर कऽ बुझला स जिज्ञासुक समाधान भऽ गेलनि। इंग्लैडक इतिहास मे अल्फ्रेडक नाम इज्जतक संग लेल जाइत अछि। ओ (अल्फ्रेड) अनेको साहसी काज परजाक लेल केलनि। तेँ हुनका महान् अल्फे्रड (अल्फ्रेड द ग्रेट) नाम स इतिहास मे चरचा अछि। शुरु मे अल्फ्रेड साधारण राजा जेँका क्रिया-कलाप करैत छलाह। जहिना बाप-दादाक अमलदारी मे चलैत छल, तहिना। खेनाई-पीनाई, ऐश मौज केनाई, यैह जिनगी छलनि। जहि स एक दिन ऐहेन भेलैक जे हुनकर कोढ़िपना दुश्मनक लेल बरदान भऽ गलैक। दुश्मन आक्रमण कऽ अल्फ्रेड क सत्ता स भगा देलक। नुका क ओ एकटा किसानक ऐठाम नोकरी करै लगल। बरतन माँजब, पानि भरब आ चैकाक काज अल्फ्रेड करै लगल। नमहर किसान रहने अल्फ्रेडक देख-रेख हुनकर पत्नी करैत छलीह। एक दिन ओ (पत्नी) कोनो काजे बाहर जाइत छलीह। ओ बटलोही मे दालि चुल्हि पर चढ़ल छलै। औरत अल्फ्रेड कऽ कहि देलक जे दालि पर धियान राखब। अल्फ्रेड चुल्हि लग बैसि अपन जिनगीक संबंध मे सोचै लगल। सोचै मे एत्ते मगन भऽ गेल जे बटलोहीक दालि पर धियाने ने रहलै। बटलोहिक सब दालि जरि गेलै। जखन औरत घुरि क आइल त देखलक जे बटलोहिक सब दालि जरि गेल छल। क्रोध् ा स अल्फ्रेड केँ कहलक- ‘अरे मुरुख युवक! बुझि पड़ै अए जे तोरा पर अल्फ्रेडक छाप पड़ल छौक। जहिना ओकर दशा भेलै तहिना तोरो हेतौ। जे काज करै छेँ ओकरा एकाग्रचित भऽ कर।’ बेचारी औरत कऽ की पता जे जकरा कहै छियै ओ वैह छी। मुदा अल्फ्रेड चैंकि गेल। अपन गलतीक भाँज लगबैै लगल। मने-मन ओ संकल्प केलक जे आइ स जे काज करब ओ एकाग्रचित भऽ करब। सिर्फ कल्पने कयला स नहि होइत। अल्फ्रेड नोकरी छोड़ि देलक। पुनः आबि अपन सहयोगी सभ स भेटि कऽ धनो आ आदमियोक संग्रह करै लगल। शक्ति बढ़लै। तखन ओ दुश्मन पर चढ़ाई केलक। दुश्मन केँ हरौलक। पुनः सत्तासीन भेल। सत्तसीन भेला पर पैघ-पैघ काज कऽ महान भेल। 27.सीखैकजिज्ञासा महादेव गोविन्द रानाडे दछिन भारतक रहथि। ओ बंगला भाषा नहि जनैत रहथि। एक दिन रानाडे कलकत्ता गेलाह। कलकत्ता मे अपन काज-सब निपटा आपस होइ ले गाड़ी पकड़ै स्टेशन ऐलाह त एकटा बंगला अखवार कीनि लेलनि। बंगला अखवार देखि आश्चर्य स पत्नी कहलकनि- ‘अहाँ त बंगला नइ जनै छी तखन अनेरे इ अखवार किऐक कीनि लेलहुँ?’ मुस्कुराइत रानाडे जबाव देलखिन- ‘दू दिनक गाड़ी यात्रा अछि। आसानी स बंगला सीखि लेब।’ नीक-नहाँति रानाडे बंगला लिपि आ शब्द गठन पर ध्यान दऽ सीखै लगलथि पूना पहुँच पत्नी केँ धुर-झार अखवार पढ़ि क सुनवै लगलखिन। ऐहन छलनि साठि वर्षीय रानाडे क मनोयोग। तेँ अंतिम समय धरि हर मनुष्य केँ सीखैक जिज्ञासा रहक चाही। 28.अनुभव व्यक्ति अपन अनुभव स सीखवो करैत अछि आ दोसरोक लेल दिशा निर्धारित करैत अछि। एक दिन झमझमौआ बरखा होइत रहै। मेधो गरजै। बिजलोको चमकै। तेज हवो बहै। ओहि समय रास्ता पर भगैत एक आदमीक मृत्यु भ गेलैक। बरखा छुटलै। लग-पासक लोक जखन निकलक ते रास्ता पर ओहि आदमी केँ देखलक। चारु भर स लोक जमा भ क्यो कहै- ‘बादलक आवाज स मृत्यु भेलै।’ त क्यो किछु कहै त क्यो किछु।’ ओहि समय एक विद्वान आदमी सेहो पहुँचलथि। ओ कहलखिन- ‘जँ आवाज स मृत्यु होइत त बहुतो लोक आवाज सुनलक। सबहक होइतैक। तेँ मृत्यु आवाज स नहि लग मे ठनका गिरला स भेल।’ 29.असिरवादक विरोध्ा धर्मक असल रुप ईश्वर चन्द्र विद्यासागर अभाव आ गरीबीक बीच पढ़ि पचास टाकक मासिक नोकरी शुरु केलनि। हुनक सफलता देखि कुटुम्ब-परिवार सभ असिरवाद देमए पहुँचै लगलनि। एकटा कुटुम्ब कहलकनि- ‘भगवानक दया स अहाँक दुख मेटा गेल। आब आराम स रहू आ चैन स जिनगी बिताउ।’ ई असिरवाद सुनितहि विद्यासागरक अखि स नोर खसै लगलनि। नोर पोछैत कहलखिन- ‘जइ अध्यवसायिक बले हम ओहन भीषण परिस्थितिक मुकावला केलहुँ ओकरे छोड़ि दइ ले कहै छी। अहाँ कऽ ई कहैक चाहै छल जे जहि गरीबीक कष्ट स्वयं अनुभव केलहुँ ओहि परिस्थिति कऽ बिसरु नहि। अपन असाध्य श्रम स ओहि अवरुद्ध रास्ता क साफ करु।’ श्रावस्तीक सम्राट चन्द्रचूड़ कऽ अनेक धर्म आ ओकर प्रवक्ता सभ स नीक लगाव छलनि। राज-काज स जे समय बचनि ओकरा ओ धमरमेक अध्ययनो आ सत्संगे मे बितबथि। ई क्रम बहुत दिन स चलि अबैत छल। एक दिन ओ असमंजस मे पड़ि गेला। मोन मे एलनि जे जखन धरम मनुक्खक कल्याण करैत अछि तखन एतेक मतभेद एक दोसर प्रवक्ता मे किऐक अछि? अपन समस्याक समाधानक लेल ओ (चन्द्रचूड़) भगवान बुद्ध लग पहुँचलाह। ओहिठाम ओ अपन बात बुद्ध कऽ कहलखिन। चन्द्रचूड़क बात सुनि बुद्धदेव हँसै लगलखिन। सत्कारपूर्वक हुनका ठहरै ले कहि दोसर दिन भिनसरे समाधानक बचन देलखिन। एकटा हाथी आ पाँच टा आन्हर ओ जुटौलनि। दोसर दिन भिनसरे तथागत (वुद्धदेव) चन्द्रचूड़ कऽ संग केने ओहि हाथी आ अन्हरा लग पहुँचलथि। एकाएकी ओहि अन्हरा सभ के हाथी छुबि ओकर स्वरुप बुझबै ले कहलखिन। बेराबेरी ओ अन्हरा सब हाथी कऽ छुबि-छुबि देखै लगल। जे जे अंग हाथीक छूलक ओ ओहने स्वरुप हाथीक बतबै लगलनि। क्यो खूँटा जेँका त क्यो सूप जेँका त क्यो डोरी जेँका त क्यो टीला जेँका कहलकनि। सभक बात सुनि तथागत (बुद्ध) चन्द्रचूड़ कऽ कहलखिन- ‘राजन! सम्प्रदाय अपन सीमित झमताक अनुरुप धर्मक एकांकी व्याख्या करैत अछि। अपन-अपन मान्यताक प्रति जिद्द धऽ अपने मे सब लड़ैत छथि। जहिना एक्केटा हाथीक स्वरुप पाँचो अन्हरा पाँच रंगक कहलक तहिना धरमोक व्याख्या करैवला सभ करैत छथि। धर्म त समता, सहिष्णुता, उदारता आ सज्जनता मे सन्निहित अछि।’ 30.सौन्दय स्तब्ध्ा संगीतकार गाल्फर्ड लग पहुँच एकटा शिष्या अपन मनक व्यथा कहै लगलनि। कुरुपताक कारणे संगीतक मंच पर पहुँचते मन मे अवै लगैत अछि जे आन लड़कीक अपेक्षा दर्शक हमरा नापसन्द कऽ हँसी उड़बैत अछि। जहि स सकपका जाइ छी। गबैक जे तैयारी केने रहै छी ओ नीक जेँका नहि गाबि पबै छी। ओइह गीत घर पर बढ़ियाँ जेँका गबै छी मुदा मंच पर पहुँचते की भऽ जाइत अछि जे हक्का-बक्का भ जाइ छी। ओहि शिष्याक बात सुनि गाल्फर्ड एकटा नमगर-चैड़गर अयना ल, आगू मे रखि, गबैक विचार दैत कहै कहलखिन- ‘अहाँ कुरुप नहि छी, जना मन मे होइ अए। गीति गौनिहारि केँ स्वरक मिठास हेबाक चाही। जकरा कुरुपता स कोनो संबंध् ा नहि छैक। जखन भाव-विभोर भऽ गायब तखन अहाँक आकर्षण बढ़ि जायत। केयो सुनि निहार कुरुपता पर ध्यान नहि द स्वर पर ध्यान देत। जहि स मनक हीनता समाप्त भऽ जायत आ आत्म-विश्वास बढ़ि जायत।’ फ्रान्सक वैह गायिका मेरी वुडनाल्ड नाम स प्रख्यात भेलीह। दोसर विश्वयुद्ध समाप्त भ गेलैक। इंगोएशियन (आंग्ल-रुसी) संधि पर हस्ताक्षर करैक लेल चर्चिल मास्को अयलाह। संधि पर हस्ताक्षरो भऽ गेलैक। मास्को छोड़ै स एक दिन पहिने, अनायास स्तालिन आ मोलोटोव चर्चिल लग पहुँच कहलकनि- ‘लड़ाई-उड़ाई त बहुत भेल। नीक समझौतो भऽ गेल। काल्हि अहाँ जेबो करब तेँ आइ थोड़े मौज-मस्ती क लिअ। हमरा ऐठाम चलि भोजन करु।’ स्तालिनक आग्रह सुनि चर्चिल मने-मन सोचै लगलथि जे महान् तानाशाह स्तालिन नौत देवए अयलाह, आइ जरुर किछु अद्भुत वस्तु देखैक मौका भेटत। चर्चिल नौत मानि स्तालिनक संग विदा भेलाह। रास्ता मे सिपाही सब अभिावादन करनि। थोड़े दूर गेला पर एकटा पीअर रंगक दुमहला मकानक आगू मे कार रुकल। सभ केयो उतड़लथि। स्तालिनक संग चर्चिल मकानक भीतर गेला। भीतर जा चर्चिल कऽ बैसबैत स्तालिन कहलखिन- ‘ऊपरका तल्ला मे लेनिन रहैत छलाह। ओ गुरु छथि तेँ ओहि तल्लाक उपयोग हम नहि करै छी। ओ म्युजियम बनल अछि। चिच्चा मे तीनि टा कोठरी अछि एकटा मे दुनू परानी रहै छी। दोसर मे बेटी रहैत अछि आ तेसर मे पार्टी सदस्यक लेल बैठकी बनौने छी।’ स्तालिनक बात सुनि चर्चिल छगुन्ता मे पड़ि गेलाह जे जाहि तानाशाहक डरे पूँजीवादी जगत थरथराइत अछि ओहि तानाशाहक रहैक व्यवस्था ऐहने छैक। मने-मन सोचैत चर्चिल गुम्म रहथि कि स्तालिन कहलकनि- ‘थोड़े काल हमरा छुट्टी दिअ। भोजन बनबै जाइ छी।’ ई सुनि चर्चिल अचंभित होइत पूछलखिन- ‘अपने भानस करै छी? भनसिया नहि अछि?’ मुस्कुराइत स्तालिन उत्तर देलखिन- ‘नहि।’ अपने दुनू परानी मिलि भानस करै छी।’ स्तालिनक बात सुनि चर्चिल हतप्रभ होइत कहलखिन- ‘बड़ बढ़ियाँ।’ आइ घरेवाली केँ भानस करै कहिअनु। अहाँ गप-सप करु।’ ‘हम लाचार छी। पत्नी घर पर नहि छथि। ओ पाँच बजे कपड़ा मिल स औतीह।’ चर्चिल स्तब्ध भऽ गेलाह। 31.एकता विधवाविववाह एकटा पैघ भवनक निर्माण होइत छलैक। निर्माणस्थल लग एक भाग पजेबा, दोसर भाग बालू, तेसर लकड़ी, सीमेंट, चून इत्यादि जमा छल। ढ़ेरी स पजेबा बाजल- ‘अकास ठेकल कोठा हमरे स बनत, तेँ कोठाक श्रेह हमरे भेटक चाही।’ पजेबाक बात सुनि सिमटी आ बालू प्रतिवाद करैत कहलकै- ‘तोँ झूठ बजै छेँ। तोरा इ नहि बुझल छौ जे एक स दोसर पजेबाक बीच जँ हम नहि रहबौ त तू ढ़नमनाइते रहमे। संगे तोरा इहो नइ बुझल छौ जे जत्ते दूर तक तोँ जेमे तत्ते दूर तक हमहू संगे जेबौ आ तोरो स ऊपर हमही सुइत क रक्षो करबौ।’ बालू आ सिमटीक बात सुनि खिड़की आ केवाड़िक लकड़ी तामसे थरथराइत कहलकै- ‘तोरा तीनू बूते बर हेतौ त देबाल बनि जेमे, मुदा बिना हमरे ने छत बनि सकमे आ ने मुह-कान चिक्कन हेतौ। जाबे हम नइ रहबौ ताबे कुत्ता-बिलाईक घर रहमे।’ सब सामानक बीच कटौज चलैत छल। कारीगर चाह पीबि बीड़ी सुनगेलक। बिड़ियो पीबैत छल आ मने-मन हँसबो करैत छल। जखन भरि मन बीड़ी पीलक, मूड साफ भेलै, तखन तीनू कऽ चुप करैत कहलक- ‘अगर तू सब मिलाने क लेमे, तइ से की हेतौ? जाबे हम नहि इलम स तोरा सबके बनेवौ ताबे ओहिना माटि पर पड़ल रहमे। कौआ-कुकुड़ आबि-आबि गंदा करैत रहतौ।’ सभक विचार सुनि निर्णय करैत भवन कहलकै- ‘अपना-अपना जगह पर सबहक महत्व छौ। मुदा जाबे एक-दोसर स मेल क कऽ नहि रहमे तावे भवन नहि कहेमे। वहिना पजेवा, सिमटी, चून, लकड़ी रहमे। तेँ अपन-अपन बड़प्पन छोड़ि मिलानक रास्ता पकड़ जहि स कल्याण हेतौ।’ राजस्थानक इतिहास मे हठी हम्मीरक विशेष स्थान अछि। ओ ऐहन जिद्दी छल जे जकरा उचित बुझैत छलैक, ओ वैह करैत छल। भले ही कतबो विरोध आ निन्दा किऐक ने होय। जखन हम्मीर विआह करै जोकर भऽ गेल तखन विआहक चरचा शुरु भेल। विद्यार्थीये (छात्रे) जीवन मे हम्मीर विधवाक दुर्दशा क गहराइ स अध्ययन केने छल। पढ़ौयेक समय संकल्प क नेने छल जे हम विधवे औरत स विआह करब। हम्मीरक विआहक चरचा पसरलै। मुदा हम्मीर एकदम संकल्पित छल जे विधवे स विआह करब। कुटुम परिवार सब हम्मीर पर बिगड़ै मुदा तकर एक्को पाइ गम नहि। पंडित सभक माध्यम स परिवारबला कहबौलक जे विधवा अमंगल सूचक होइत तेँ ऐहन काज नहि करक चाही। मुदा हम्मीर ककरो बात सुनै ले तैयार नहि। एकटा बाल-विधवा क हम्मीर देखलक। विधवा देखि हृदय पसीज गेलै। तखने ओहि विधवा के हम्मीर कहलक- ‘हम अहाँस विआह करब। भले ही परिवारक कतवो विरोध हुअए।’ हम्मीरक बात सुनि विधवा खुशी स अह्लादित भ उठल। हम्मीर विआहक दिन तय क कुटुम्ब-परिवार आ पुरहित-पंडित केँ छोड़ि अपन संगी-साथी आ सैनिक सभ कऽ संग केने जा विआह क लेलक। जखन हम्मीर मेवाड़क शासक बनल तखन सभ विरोधी सहयोगी बनि गेलैक। पंडित सब घोषणा केलक- ‘विधवा नास्ति अमंगलम्।’ 32.देशसेवाकव्रत आत्मबल सुभाषचन्द्र बोस बच्चे रहथि। एक दिन, राति मे माए लग स उठि निच्चा मे सुतै लगला। बेटा कऽ निच्चा मे सुतैत देखि माए पूछलखिन जे ऐना किऐक करै छी? सुभाष जबाव देलखिन- ‘माए! आइ स्कूल मे मास्टर साहेव कहने छेलखिन जे हमर पूर्वज ऋृषि, मुनि जमीने पर सुतबो करथि आ कठिन मेहनतो करैत छलाह। हमहू ऋृषि बनव। तेँ कठिन जिनगी जीवैक अभ्यास शुरु कऽ रहल छी।’ सुभाषचन्द्रक पिता जगले रहथिन। सुभाषक बात सुनलखिन। सुभाष केँ पिता कहलखिन ‘बेटा! जमीने पर सुतब टा पर्याप्त नहि होइत। एहिक संग ज्ञानोक संचय आ मनुक्खोक सेवा आवश्यक अछि। आइ माये लग सुति रहू, जखन नमहर हैब तखन तीनू काज संगे करब।’ सिर्फ शिक्षकेक बात नहि पितोक बात केँ सुभाष गिरह बान्हि लेलनि। आईए स. सी. केलाक उपरान्त जखन नोकरीक बात सोझा मे एलनि तखन ओ (सुभाष) कहलखिन- ‘हम जिनगीक लक्ष्य तय कऽ नेने छी। नोकरी नहि करब। मातृभूमिक सेवा करब।’ फ्रान्सक कथा थिक। रास्ता बगलक पहाड़ी पर बैसि एक गोटे अपन जूत्ता मरम्मत करबैत रहए। एकटा ढ़ेरबा बच्चा जूत्ता मरम्मत करैत छल। ओहि बच्चाक बगए-बानि स गरीबी झलकैत रहए। मुदा आत्म-बल आ लगन मजगूत छलैक। जूत्ता मरम्मत करा ओ आदमी एक रुपैया पारिश्रमिक द चलै लगल। मुदा माएक बिचार ओहिना ओहि बच्चाक हृदय मे जीबैत छल। बच्चा अपन उचित पाइ काटि बाकी घुमाबए लगल। ओ महानुभाव (जूत्ता मरम्मत करौनिहार) सब पाइ राखि लइ ले कहलक। बच्चा कहलक- ‘हमर जतबे उचित मजूरी हैत, ओतबे लेब। माए कहने छथि जे जतबे श्रम करी ओतबे मजूरी लेब।’ बच्चाक बात सुनि ओ गुम्म भ, आहि बच्चा केँ ऊपर स निच्चा घरि निंग्हारै लगल। वैह बच्चाक फ्रान्सक राष्ट्रपति दगाल भेलाह। 33.स्वाभिमान कलंक स्कूलक पढ़ाई समाप्त क सुभाष चन्द्र बोस कओलेज मे नाओ लिखाओल। ओहि कओलेज मे अंग्रेजीक शिक्षक अंग्र्रेज छल। नाम छलनि सी.एफ. ओटन। ओहुना सत्ता मे रहनिहारक बोली जनताक बोली स भिन्न होइत। मुदा ओटन मे आरो बेसी रोब छलैक। बात-बात मे ओ (ओटन) भारतीय जिनगीक मजाक ठड़बैत। भारतवासीक जिनगीक प्रति घृणा पैदा करब ओ अपन बहादुरी बुझैत छल। सुभाष बाबू केँ ओटनक व्यवहार पसिन्न नहि होइन। मुदा विद्यार्थी रहने मन भसोसि क रहि जाथि। एक दिन वर्गे मे सुभाष बैसल रहथि। ओटन भारतबासीक प्रति व्यंग्य करै लगल। व्यंग्य सुनि सुभाषक हृदय मे आगि धधकै लगल। क्रोधे ओ बेकाबू भऽ गेला। अपन जगह स उठि, आगू बाढ़ि ओटनक गाल मे कसि क दू थापर लगबैत कहलखिन- ‘भारतवासी मे अखनो स्वाभिमान जीवैत छैक। जँ क्यो एहि बात क बिसरि चुनौती देत त एहिना मारि खायत।’ गामक कोन लेखा जे पचकोसीक लोक किसुन भाय केँ इमानदार बुझैत छनि। ओना ओ एकचलिया लोक छथि जबकि गामो आ परोपट्टाक लोक बहुचलिया। तेँ किसुन भाय कऽ जत्ते प्रशंसा होइत ओतवे निन्दो। ओना ज्ञान-अज्ञानक बीच, सुख-दुखक बीच, धरम-पापक बीच, उत्थान-पतनक बीच, प्रशंसा-निन्दाक बीच त पहिनहि स संघर्ष होइत आयल अछि। मुदा किसुन भाय अनकर प्रशंसा-निन्दा क ओते महत्व नहि दैत जत्ते अपन सैद्धान्ति जिनगी क। अपन जिनगीक रास्ता पर सदिखन सचेत रहैत छलथि। कैक दिन एहेन होइत जे किसुनभाइक बिचार स अलग सैाँसे गामक लोकक विचार होइत। मुदा तेकर एक्को पाइ गम हुनका नाहि। अपन रास्ता पर ओ असकरो निरभिक स ठाढ़ रहैत छलाह। मुदा बिचार बदलैक लेल तैयार नहि होथि। जिनगीक आरंभे किसुन भाय खेती स केलनि। खेत त बहुत नहि छलनि मुदा जतबे छलनि तहि स मेहनतक बले परिबार चला लथि। बाढ़ि, रौदी आ आरो-आरो प्राकृतिक आफत तथा उपद्रव जेँका मानवीय आफत क मुकावला करैक लूरि सीखि नेने छथि। तेँ आन परिवार जेँका परिवार मे चिन्ता नहि होइत। खानदानी खेती क कतौ बदलि त कतौ सुधारि क करति। जहि स गामोक खेतिहर अचता-पचता क हुनकरे अनुकरण करै लगल। तेसर साल टहलै ले पंजाब गेल रहथि। टहलै ले की जइतथि, खेती देखै ले गेल रहति। पंजाबक खेती अगुआइल तेँ देखब जरुरी बुझि पड़लनि। पंजाव मे झिगुनिक (झिमनिक) खेती देखलखिन। मिथिला क्षेत्र मे जत्ते-जत्ते घेड़ा (नेनुआ, घिया, झिंगा) होइत तत्ते-तत्ते झिंगुनी देखलखिन। फड़ो अटूट। झिगुनी देख किसुन भायक मन मे गड़ि गेल। मने-मन सोचलनि जे जहि पंजाबक माटि गोंग अछि (दब माटि) तखन जब ऐहेन अछि त अपन माटि (मिथिलाक माटि) मे केहन हैत, तत्काल ओ नहि सोचि सकलथि। मुदा ओ बीआ नेने एलाह। समय पर बीआ रोपलनि। ओहि चारि कट्ठा झिंगुनिक खेती स किसुन भाय एकटा जरसी गाय किनलनि। अपना ले ओते बीआ शुरुहेक फड़ रखि लेलनि जे छः कट्ठा खेती अगिला साल होइत। धुर-झाड़ जखन झिंगुनी बेचै लगलथि तखन गामोक लोक बीआ मंगलकनि। पचता फड़ बीआ लोक सब ले रखि देलखिन अगता फड़क समय त निकलि चुकल छल। एहि बेर, गाम मे, झिंगुनिक अनधुन खेती भेल। किसुन भायक उपजा ते पैछिलेसाल जेँका भेल मुदा गामक लोकक दब भ गेल। दब होइक कारण छलैक उपजवैक ढ़ंग आ पचता बीआ। सैाँसे गामक लोक हुनका ठक कहि कलंकित करै लगलनि। कतेक गोटे सोझहो मे कहलकनि। ठकक कलंक स किसुन भाय रोगाय लगलथि। जना कते भारी कुसंयम क नेने होथि। मन मे सदिखन यैह नचैत रहनि जे- ‘ऐना भेलै किएक?’ एहि प्रश्नक उत्तर मन मे जगवे ने करति। अनायास एक दिन हृदय स आवाज उठलनि- ‘किसुन! तोहर दोख एक्कोपाइ नइ छह। अनेरे सोगाइल छह। तोहर कलंकक कारण बीआक मुरहन आ दौंजी गुने भेल छह।’ हृदयक आवाज सुनि किसुन भाय पूछलखिन- ‘अगर हम एहि बात क मानि अपना क निरदोस बुझिये लेब तइयो आन कोना बुझत?’ -‘हँ, तोरा ओहि दिन तक कलंकक मोटरी कपार पर रखै पड़तह जहि दिन तक ओहो सब मुरहन आ दौजीक भेद बुझि नहि जायत।’ 34.बुलकी भद्रपुरुष्ा एकटा खेत बोनिहारक घरवाली नाकक बुलकी ले रुसी रहलि। बुलकी कीनैक उपाय पति क नहि। हर जोति क जखन ओ (बोनिहार) आयल त घरबाली केँ रुसल देखलक। मुह-तुह फुलौने ओसार पर बैसलि। धिया-पूता खाइ ले कनैत। बोनिहार अपन तामस क घोटि घरबाली लग जा कहलकै- ‘किअए रुसल छी? भूखे बच्चो सब लहालोट होइ अए। आबो भानस करु।’ अपन रोष झाड़ैत पत्नी बाजलि- ‘जाबे बुलकी नइ आनि देब ताबे ने खायब आ ने किछु करब।’ खुशामद करैत पति कहलकैक- ‘आइये साँझ मे हाट स कीनि क आनि देब। अखन भानस करु।’ पतिक बात पत्नी मानि गेलि। बोनिहार कर्ज रुपैआ अनै ले विदा भेल। दश रुपैआ, अना दर सूइद पर, अनलक। रुपैआ घरवालीक हाथ कऽ द देलक। भानस भेलै। सब खेलक। बेरु पहर दुनू परानी हाट स बुलकी कीनि अनलक। दोसरि साँझ मे बुलकी पहिर सुगिया दादी कऽ गोड़ लगै बोनिहारिन गेलि। सुगिया दादी ओसार पर बैसि पोता-पोती क नल-दमयत्नीक खिस्सा सुनबति रहति। दादी कऽ गोड़ लागि बोनिहारिन बुलकी देखै ले कहलक। बुलकी देख दादी कहै लगलखिन- ‘कनियाँ1 सोन चानी गरीब-गुरबा घर मे नइ रहै छै। जइ घर मे पेटेक भूख नइ मेटाइ छै ओइ घर मे सिंगारक चीज कन्ना रहतै। अनेरे अपन सख करै छह। कहुना-कहुना बच्चा सब के पालह जे कुल-खानदानक जीबैत रहतह।’ दादीक बात सुनि बोनिहारिन आंगन आबि पति केँ कहलक- ‘गलती भेल जे हम रुसि क अहाँ स बुलकी किनेलहुँ। अखैन रखि दइ छियै, काल्हि घुमा क कर्जवालाक रुपैआ द ऐबै।’ एक दिन एकटा वृद्धा कोठी स निकलैत एकटा भद्रपुरुष केँ पूछलखिन- ‘अहाँ, एहि कोठीक मालिक स, कने भेटि करा दिअ?’ ओ भद्र पुरुष कहलखिन- ‘कोन काज अछि कहू?’ वृद्धा- ‘हमरा बेटीक विआह छी। तीनि सय रुपैआक जरुरत अछि। अगर रुपैआ नइ हैत त विआह रुकि जायत।’ ‘चलू’। ओ भद्रपुरुष अपन कार मे बृद्धा क बैसाय ल गेलखिन। थोड़े दूर गेला पर कार स उतरि सामनेक मकान मे प्रवेश केलनि। वृद्धो कऽ संगे नेने गेलखिन। भीतर गेला पर वृद्धा केँ ओसार पर बैसाय अपने कोठरी मे गेला। कोठरी मे जा पाँच सय रुपैआ नोकर कऽ द, ओहि वृद्धा क द अबै ले कहलखिन। पाँचो सौ रुपैया नेने आबि नोकर वृद्धा केँ दैत कहलक- ‘भाई! पाँचो सौ रुपैआ अछि। तीनि सय मे बेटीक विआह सम्हारि लेब आ दू सय स कोनो धंधा शुरु क लेब। जहि स आगूक जिनगी आसानी स चलत।’ रुपैआ हाथ मे ल वृद्धा ओहि नोकरक मुह दिशि देखैत कहलक- ‘भाइ! कोठीक मालिक कहाँ भेटिलथि?’ नोकर- ‘जनिका संग अहाँ कार मे एलौ ओइह एहि कोठिक मालिक बावू चितरंजन दास छथि।’ जहि आदमीक लेल सैाँसे समाज परिवार होइत, जे अनको दुख क अपन दुख बुझि जीबैक प्रेरणा दैत ओइह त भद्रपुरुष होइत। 35.झूठ नइ बाजब आर्दशमाए बंगालक पूर्व मुख्यमंत्री डाॅक्टर विधानचन्द्र राय बच्चे स मानवीय गुणक अंगीकार करति रहथि। जे गुण हुनक पिता स भेटति रहनि। सत्य कऽ प्रति निष्ठा आ साहस दिनानुदिन बढ़ैत गेलनि। जखन विधानचन्द्र डाॅक्टरी पढ़ति रहति तखने अध् यापक मोटर एक्सिडैंटक संबंध मे झूठ गबाही देइ ले कहलकनि अध्यापकक इच्छा रहनि जे विधानचन्द्र छात्र छथि तेँ जे कहबैक से करत। मुदा झूठ नहि बाजैक संकल्प विधानचन्द्र केने रहथि। अध्यापकक कहला पर विधानचन्द झूठ बजै स इनकार करैत कहलकनि- ‘हम जे देखलिऐक सैह कहबै। मुदा झूठ नइ बाजब।’ जकर परिणाम विधानचन्द्र केँ भोगै पड़लैक। परीक्षा मे फेल क देल गेला। मुदा फेल होइ स ओ ओते दुखी नहि भेला जते खुशी अपन संकल्प निमाहै स भेलाह। आर्मेनियाक सर्वोच्च सेनापति सीरोज ग्रिथक व्यक्तित्व हुनक माइयेक बनाओल छलनि। जखन ग्रिथ बच्चे रहथि तखने पिता मरि गेलखिन। विधवा नार्विन ग्रिड कपड़ा सीबि-सीबि गुजरो करति आ बेटो क पढ़बति। गरीब परिबारक ग्रिथ अछि, ई बात स्कूलोक शिक्षक सभ जनैत। फीस माफ होइ ले ग्रिथ आवेदन देलक। फीस माफो भ गेलै। फीस माफक समाचार ग्रिथ माए केँ कहलक। माए बिगड़ि क कहलखिन- ‘हम मेहनत क कऽ गुजर करै छी, तखन फीस किऐक ने देबैक। हम मेहनती छी नहि की गरीब। हमर अपन स्वाभिमान कहैत अछि जे गरीब नइ छी।’’ स्वाभिमानी माए अपन बच्चाक ऐहन चरित्र बनौलक जे देशक सर्वोच्च सेनापति भेल। 36.नारीकसम्मान अनुशासन नेपोलियन बोनापार्ट अपन टुइ लेरिस नामक महल मे स्नान घरक मरम्मत करबै ले सचिब कऽ कहलखिन। सचिव महलक अधिकारी के फ्रान्सक कुशल कारीगर कऽ बजा मरम्मत करबै ले कहलखिन। कारीगर आबि मरम्मत करै लगल। जखन मरम्मत भ गेलै तखन नारीक नग्न चित्र सब सेहो बना देलकै। नेपोलियन नहाइ ले गेला। नहाइ स पहिने चित्र सब देखलखिन। चित्र देखि नेपोलियन चोट्टे घुरि क आबि अधिकारी कऽ बजौलखिन। अधिकारी आयल। हृृदयक क्रोध क दबैत नेपोलियन अंग्रेजी शासनक खिलाप आन्दोलन उग्र रुप धेने जा रहल छल। आन्दोलन चलबैक लेल क्रान्तिकारी दल केँ डकैतियो करै पड़ैत। एक दिन, राम प्रसाद विस्मिलक नेनृत्व मे, एकटा गाम मे डकैती करैक लेल पहुँचल। एकटा परिवार मे सब घुसल। जत्ते जे किछु दल कऽ भेटिलै ल कऽ निकलल। सभ एकत्रित हुअए लगल कि अपन साथीक गिनती करै लगल। गिनती मे एक गोटे कमैत छल। घरे मे चन्द्रशेखर एकटा बुढ़ियाक कैद मे पड़ल छल। ओ बुढ़िया अपन जेबर आ नगदीवला बक्सा पर बैसि चन्द्रशेखरक गट्टा पकड़ने छलि। चन्द्रशेखर चुपचाप आगू मे ठाढ़। ने बाँहि झमारैत आ ने किछु बजैत। सब केयो घर पैसि देखलक जे चन्द्रशेखर बुढ़ियाक पाला मे पड़ल छथि। क्रान्तिकारी पार्टीक बीच अनुशासन छल जे ने महिला पर हाथ उठाओल जाय आ ने ओकर जेबर लेल जाय। आजाद बुढ़िया कऽ बुझबति कहथिन- ‘माता जी! अहाँ बक्सा पर स हटि जाउ। हम सिर्फ नगद लेब। जेबर नहि लेब।’ आजादक विनम्र बात स बुढ़ियाक साहस बढ़ि गेल छलैक। जखन चन्द्रशेखर स संगी सब पूछल तखन ओ सब बात कहलखिन। आजादक बात सुनि सभ ठाहाका द हँसै लगल। गट्टा छोड़बै ले एक गोटे बढ़ै लगलथि कि चन्द्रशेखर कहलखिन- ‘माताजीक सब सम्पत्ति घुमा दिऔन।’ सम्पत्तिक नाम सुनि भावुक बुढ़िया चन्द्रशेखरक गट्टा छोड़ि देलकनि। तखन ओ घर स संगी सभक संगे निकललाह। 37.सादा जीवन : विचारक उदय सन 1949 ई0 क बात थिक। ओहि समय स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री उत्तर प्रदेश सरकार मे गृहमंत्री रहथि। एक दिन लोक निर्माण विभागक किछु कर्मचारी हुनका डेरा मे कूलर लगबै ले आइल। शास्त्री जी डेरा मे नहि रहथि। परिवारक बच्चो आ पत्नियो केँ कूलर देखि खुशी होइत रहै। साँझ मे लालबहादुर शास्त्री डेरा अयलाह। डेरा अविते देखलखिन जे कूलर लगबै लोक निर्माणक कर्मचारी सब छथि। कूलर स शास्त्री जी केँ खुशी नहि भेलनि। ओ कूलर लगवै स मना कऽ देलखिन। परिवारक सभ स्तब्ध भऽ गेल। पत्नी कहलकनि- ‘जे सुविधा सरकार द रहल अछि ओकरा मना किऐक करै छी?’ गंभीर स्वर मे शास्त्री जी उत्तर देलखिन- ‘ई जरुरी नइ अछि जे हम सब दिन मंत्रिये रहब। कूलर स सभक आदति बिगड़ि जायत। परिवार मे बेटियो अछि, जेकर बिआहो हेतैक। दोसर घर जायत। अगर जँ ओकरा ओहि परिवार मे जँ ऐहेन सुविधा नहि होय तखन त कष्ट हेतैक।’ गाँधीजी बच्चे रहथि। हुनक बड़का भाई हुनका मारलकनि। गाँधीजी कनैत माए लग आबि कहलखिन। गाँधीक बात सुनि माए कहलखिन- ‘तोहूँ किऐक ने मारलह?’ माएक बात सुनि गाँधीजी कानब छोड़ि कहलखिन- ‘जे गलती भैया केलनि सैह करै ले हमरो कहै छी। आ की हुनका मनाही करबनि।’ बेटाक बात सुनि माए कहलखिन- ‘बौआ, हम तोहर परीछा लेलिअह। अगर तोरा मे ऐहन विचारक विकास हेतह त आगू चलि क सैाँसे दुनियाँक प्रति सिनेह आ प्रेम पौबह।’ बच्चाक समुचित विकासक आरंभ परिवारे स शुरु होइत अछि। पुष्ट इकाइ स समर्थ राष्ट बनैत। फ्रान्स हालैंड पर आक्रमण क देलक। फ्रन्स नमहर देशो आ सम्पन्नो। जबकि होलैंड छोटो आ पछुआइलो। मुदा फ्रान्स हालैंड स जीति नहि पबैत। ई देखि, फ्रन्सक राजा लुई चैदहम बिगड़ि मंत्री कालवर्ट क बजा पूछल- ‘हमर देश एत्ते पैघ आ सामरिक सम्पन्न रहितहुँ पछड़ि किऐक रहल अछि?’ राजाक बात सुनि कालवर्ट नम्र भ उत्तर देलकनि- ‘महत्ता आ समर्थता। कोनो देशक विस्तार का बैभव पर निर्भर नहि करैत। ओ निर्भर करैत ओहि देशक देश भक्त आ बहादुर नागरिक पर। जे अपना देशक अपेक्षा हालैंड मे मजगूत अछि।’ मंत्रीक बात सुनि राजा अपन सेना वापस बजा लेलक। हालैंड मे बच्चा-बच्चाक राष्टक सराक्त इकाईक रुप मे ढ़लल जाइत। जहि स ओ शक्तिशाली बनि ठाढ़ अछि। 38.डर नहि करी उगैत सुरुज जेँका जिनगी अपन दिशा मे, अपना ढ़ंग स बढ़ैत जा रहल छलि। एक विराम पर जा जिनगी पाछू मुहे घुरि क तकलक ते चैंकि पड़लि। चंडालिनी सन कारी आ कुरुप छाया पाछू-पाछू अबैत छलि। छाया क देखि जिनगी ललकारि कऽ पूछलक- ‘अभागिनी! तोँ के छियै? हमरा पाछू-पाछू किऐक अबै छेँ? तोहर कारी आ कुरुप काया देखि हमरा डर होइ अए। जो भाग। हमरा स हटि कऽ रह।’ छाया छिप गेलि। मुदा जिनगी घिंघिआइत बढ़ल। पुनः छाया आबि कहलकै- ‘बहिन! हम तोहर सहचरी छिअहुँ। तोरे संग हमहू चलि रहल छी। आ अंत मे दुनू गोटे संगे रहब। तेँ डरैक कोनो बात नहि। तोँ हमरा नहि चिन्है छेँ, हमरे नाम मृत्यु थिक।’ मृत्यु क पाछु लगल अबैत देखि जिनगी डरि गेल। सकपका क गिर पड़ल। 39.असिरवाद उलटि गेल रत्नगमेवाकदुख्ा एक गाटे कऽ दू टा बेटा छलैक। दुनूक बीच तीनि बर्खक जेठाइ-छोटाइ छलैक। गामेक स्कूल मे दुनू भाई पढ़बो केलक। अपर प्राइमरी स्कूल रहने दुनू-भाइ पचमे तक पढ़लक। दुनू बेटाक विआह बाप-माए क देलक। जाबे धरि छोटका बेटाक दुरागमन नहि भेल छलैक ताबे धरि त परिवार शान्त रहलै, मुदा छोटकाक, दुरागमन होइते परिवार मे खटपट शुरु हुअए लगलै। एक्को दिन ऐहेन नहि होय जहि दिन दुनूक बीच झगड़ा नहि होइत। सब दिन दुनू दियादनी कऽ झगड़ा करैत देखि बाप कऽ बरदास नहि भेलैक। दुनू बेटा कऽ बजा बाप कहलकै- ‘बौआ, सब दिन झगड़ा केने घर स लछमी पड़ा जेथुन तेँ अखन हमहू जीविते छी दुनू भाइ भिन्न भ जा। जे चीज छह दुनू कऽ बाँटि दइ छिअइ।’ जेठका बेटा कऽ नगद आ जेवर-जात हिस्सा भेलै आ छोटका क दू बीघा खेत, आ बड़द भेलै। दुनू भाइ खुशी स भिन्न भऽ गेल नगद आ गहना-गुरिया पाबि जेठका खूब ऐश-मौज करै लगल। दुनू परानी छोटका दिन-राति मेहनत करै लगल। गामक लोक जेठका कऽ करमगर आ छोटका कऽ करमघटू कहै गललैक। समय बीतै लगलै। दुइये सालक बाद पाशा पलटै लगलै। जेठका बेटाक रुपैओ आ गहनो सठि गेलै मुदा छोटकाक उन्नति हुअए लगलै। नगद आ जेबर सठने जेठका चोरि करै लगल। एक दिन चोरि करै गेल त घरे मे पकड़ा गेल। जहि स मारिओ खूब खेलक आ जहलो गेल। गामक लोकक असिरवाद उनटै लगल। जेही मुह स जेठका कऽ करमगर आ छोटका कऽ करमघटू कहैत छलैक ओहि मुह स लोक जेठका कऽ करमघटू आ छोटका कऽ करमगर कहै लगलैक। एकटा गोताखोर, कैक दिन स असफल होइत आयल छल। भरि-भरि दिन परिश्रम करैत छल मुदा किछु हाथ नहि लगैत छलैक। जहि स परिवार चलब कठिन भऽ गेलै। आन काज करैक लूरि गोताखोर कऽ रहबे ने करै जे करैत। भोरे घर स नदीक मोहार पर बैसि रत्नक आशा मे टक-टक पाइन दिशि तकैत रहैत छल। निराश भ गोताखोर मन मे विचारलक जे आइ एहि काजक आखिरी दिन छी। जँ आइ किछु नहि भेटत त काल्हि स छोड़ि देब। जाल ल नदीक मोहार पर बैसि, मने-मन भगवान स कहै लगलनि- ‘अगर अहाँ मदति नहि करब त हम जीवि कोना?’ भगवान स प्रार्थना क गोताखोर पानि मे पैसि डूबकी लगौलक। एकटा पोटरी भटिलै। पोटरी नेने गोताखोर ऊपर भेल। किनछरि मे बैसि पोटरी खोललक। छोट-छोट पाथर ओहि पोटरी मे। पाथर देखि गोताखोर निराश भ गेल। मन मे क्रोधो उठलै। एकाएकी ओहि पाथर कऽ पानि मे फेकैय लगल। पाथरो फेके आ मने-मन अपना भागो कऽ कोसै। फेकैत-फेकैत एकटा पाथर बँचलै। ओहि पाथर कऽ जखन फेकैय लगल कि ओहि पर नजरि पड़लै। पाथर चमकैत रहैय। ओ निलम पत्थर रहै। गोताखोर चीन्हि गेल। मुदा ताघरि त सबटा फेकि देने छल। अपसोच करै लगल, मुदा सब त पानि मे चलि गेल छलैक तेँ अपसोच कइये कऽ की होयतैक। अपसोच करैत देखि भगवान चिड़ै बनि आबि कहै लगलखिन- ‘ऐ गोताखोर! सिर्फ तोँही टा ऐहन अभागल नहि छैँ, ढ़ेरो अछि जे जीवन रुपी रत्न राशि कऽ एहिना गमबैत अछि। जो, जैह बँचल छौक ओकरे बेचि क गुजर कर। मुदा ज्ञान बढ़ा। जहि स धनो पबैक लूरि भऽ जेतौ आ मनुक्खो बनि जीमे।’ 40.बाइसभोजन नशाा एकटा भिखमंगा भीख मंगै ले एकटा गिरहस्तक ऐठाम आयल। ओहि परिवारक पुत्रवधू (पुतोहू) यत्किंचित भीख द कहलकै- ‘हमरा कोनो कमाई नइ अछि तेँ अधिक कत्तऽ स देब।’ पुत्रबधूक बात सुनि भिखारी कहलकै- ‘अपने सब की खाइ छी?’ ‘बसिया-कुसिया जे अछि सैह सब खा कऽ काज चलबै छी।’ ‘जखन बसिया सठि जायत तखन की करबै? ‘अहीं जेँका हमहू सब भीख मंगबै।’ दुनू गोटेक गप ससुरो (पुत्रवधूक) सुनैत छल। ओ अढ़ स सोझ मे आबि तमसा क पुतोहू कऽ कहलक- ‘भिखारी लग परिवारक वेइज्जती करै छी।’ पुतोहू शीलवान छली। नम्र भ ससुर केँ कहल- ‘घर मे जे-जे चीज अछि ओ त पूर्वजक संचित कैल पुण्यक फलस्वरुप अछि। जे सब खाइ छी। एकरा बसिया नै कहबै त की कहबै? नव कर्म कइये ने रहल छी जे आगूओ चलत। तेँ एकरा सठला पर भीख छोड़ि दोसर उपाये की अछि?’ पुतोहूक बात स ससुरक भक्क टूटलै। एकटा व्यापारी अफीम खाइत छल। ओ अपना नोकरो कऽ अफीमक चहटि लगा देलक। एक दिन दुनू गोटे बाजार जाइक कार्यक्रम बनौलक। जे सामान सब दोकान मे सठल रहै ओकर पुरजी बनौलक। रुपैआ गनलक। दुरस्त बाजार रहने दुनू गोटे घरे पर भरि पेट खा लेलक। बाजार विदा भेल। किछु दूर गेला पर दुनू गोटे खेनाइ बिसरि गेल। रास्ता मे होटल छलै, दुनू गोटे घोड़ा स उतड़ि खाइ ले गेल। घोड़ा कऽ छानि चरै ले छोड़ि देलक। दोकान मे दुनू गोटे खा सोझे बजार विदा भेल। बजारक कात जखन पहुँचल त व्यापारी केँ मन पड़लै जे घोड़ा ओतै छूटि गेल। मनहूस भ दुनू गोटे माथ पर हाथ द बैसि रहल। थोड़े काल गुनधुन करैत घोड़ा आनै दुनू गोटे घुरि गेल। घुरि कऽ दोकान लग आयल त घोड़ा कऽ चरैत देखलक। लगाम लगा दुनू गोटे चढ़ि बजार दिशि विदा भेल। बाजार पहुँच दोकान मे सौदा-बारी कीनलक। सामान समेटि, मोटरी बान्हि जखन रुपैया देमए लगलै त रुपैआक झोरे नहि। दुनू गोटे मन पाड़ै लगल जे रुपैआक झोरा की भेल? किछु कालक बाद मन पड़लै जे झोरा त ओतै छूटि गेल जेतै बैसल छलौ। दुनू गोटे बपहारि कटै लगल। कनैत देखि, एकटा ग्रामीण महिला सामान कीनैत छलि व्यापारी कऽ कहलक- ‘ई गति सिर्फ अहीं दुनू गोटे टा क नहि, सब नसेरी कऽ होइ छै।’ 41.सामना एकटा बन छल। ओहि बन मे अनेको सुगर परिवार छल। आहि बन मे एकटा सिंह सेहो रहैत छलैक। जखन कखनो सिंह कऽ भूख लगै तखन टहलि सुगर क पकड़ि खा जाइत। दोसर-तेसर सुगर सिंह कऽ देखिते पड़ा जायत। एक दिन सब सुगर मिलि बैसार केलक। बैसार मे तय केलक- ‘जखन एकाएकी मरिये रहल छी तखन लड़ि कऽ किऐक ने मरब।’ एहि विचार स सब सुगर मे साहस जगलै। सब मिलि लड़ै ले विदा भेल। सब हल्लो करै आ चिकड़ि-चिकड़ि सिंह कऽ गरिऐवो करे। जत्ते जोरगर सुगर छल ओ आगू-आगू आ अबलाहा सब पाछू-पाछू जाइत। सिंह कऽ ऐखितहि सब जोर स हल्ला करैत दौड़ल। आइ धरि सिंह कऽ ऐहेन मुकाबला स भेंटि नहि भेल छल। सिंह डरा गेल। अपन जान बँचबै ले पड़ाइल। सिंह कऽ पड़ाइत देखि सुगर पाछु स खेहारलक। सिंह बन स बाहर भऽ गेलै। बन खाली भऽ गेलै। सब सुगर निचेन स रहै लगल। े 42.शिष्टाचार एकटा इनार पर चारि टा पनिभरनी पाइन भरै ले आइल छलि। एक्केटा डोल छलैक तेँ एक गोटे पानि भरैत छलि आ तीनि गोट गप-सप करैत छलि। सब अपन-अपन बेटाक बड़ाई करैत। पहिल औरत बाजलि- ‘हमर बेटाक आवाज एत्ते मधुर अछि जे रजो-रजवार मे ओकरा सम्मान भटितै।’ दोसर कहलकै- ‘हमरा बेटाक शरीर मे एत्ते तागत अछि जे नमहर भेला पर बड़का-बड़का पहलमान कऽ पटकत।’ तेसर बाजलि- ‘हमर बेटा ऐहेन तेजगर अछि जे सब साल इस्कूल मे फस्ट करै अए।’ मूड़ि निच्चा केने चारिम कहलक- ‘आने बच्चा जेँका हमर बेटा साधारण अछि।’ पनिभरती सभ इनार पर गप-सप करिते छलि कि स्कूल मे छुट्टी भेलै। अबैत-अबैत चारुक बेटा इनार लग आयल। एकटा गीति गबैत दोसर कूदैत-फनैत, तेसर किताब खोलि किछु पढ़ैत छल। चारिम पाछू-पाछू चुपचाप अबैत छल। इनार लग अबिते चारिम अपन माएक भरल घैल माथ पर ल लेलक आ माएक हाथ मे अपन बस्ता द देलक। आगू-पाछू दुनू माए-बेटा आंगन विदा भेल। इनारे लग एकटा बुढ़िया बैसलि सब बात सुनैत छलि। ओ चारु पनिभरनी कऽ रोकि कहलक- ‘ई चारिम लड़का जे अछि ओ सबसँ नीक अछि। एकर शिष्टाचार सबसँ नीक छैक।’ 43.ठक :पत्नीकअधिकार एकटा ठक लोमड़ी गाछक निच्चा मे छल। गाछ पर बैसल मुर्गा कऽ पट्टी द रहल छलै जे भाइ तूँ नइ सुनलहक जे सब पशु-पक्षी आ जानवरक बीच सभा भेल। जहि मे सर्वसम्मति स निर्णय भेल जे अपना मे कोइ ककरो अधला नहि करै तेाँ किऐक गाछ पर छह, निच्चा आवह आ दुनू गोटे अपन जिनगीक दुख-सुखक गप-सप करह। लोमड़ीक चालाकी मुर्गा बुझति छल तेँ गाछे पर स हूँ-कारी दैत मुदा निच्चा नहि उतड़ै। ताबे दू टा आवारा कुकूड़ कऽ दौड़ल अबैत लोमड़ी देखलक। कुत्ता कऽ देखिते पड़ायल। लोमड़ी कऽ पड़ाइत देखि गाछे पर से मुर्गा कहलकै- ‘भाइ, भगै किएक छह? जखन सबहक बीच समझौता भ गेलै तखन तोरा किऐक डर होइ छह?’ लोमड़ी भगबो करै आ उत्तरो दइ- ‘भ सकै अए जे तोरे जेँका ओकरो (कुत्तो के) नइ बुझल होय।’ गृहस्ताश्रम ओहन आश्रम होइत जहि मे आत्मसंयम, पारस्परिक सद्भाव आ सद्वृतिक अभ्यास आसानी स कैल जा सकैत अछि। एक दिन हजरत उमर स भेटि करै एक आदमी आयल। थोड़े काल बैसल त उमरक पत्नी कऽ जोर-जोर स उमर पर बजैत सुनलक। उमर चुपचाप सुनैत। किछु उत्तर नहि दैत। ओहि आदमी कऽ बड़ छगुन्ता लगलै जे पत्नी यत्र-कुत्र कहि रहल छनि मुदा किछुुुु उत्तर उमर नइ दैत छथिन। ओहि आदमी कऽ नहि रहल गेलै। ओ उमर केँ पूछल- ‘ अपनेक पत्नी यत्र-कुत्र कहि रहल छथि मुदा अहाँ मुड़िओ उठा क ओमहर नहि तकै छी?’ गंभीर स्वर मे उमर जबाबव देलखिन- ‘भाई! ओ (पत्नी) हमर गैल-कुचैल कपड़ा खिंचैत छथि, खाना बनबै छथि, सेवा करैत छथि आ सबसँ पैघ बात जे हमरा पाप करै स सेहो बँचबै छथि। तखन जँ ओ बिगड़ि क दू-चारि टा बाते कहै छथि त कि हुनका एतबो अध् ि ाकार नहि छनि।’ 44.शिनीचीकस्नेह : सिखबैकउपाय तीनि दिन स चुल्हि नहि पजरने, दुनू परानी सियान त बरदास केने रहति, मुदा बच्चा सब भूखे ओसार पर ओंघरनियो दैत आ हिचुकि-हिचुकि कनबो करैत। अनेको प्रयास सियान केलक मुदा कोनो गर खेनाइक नै लगलै। अंत मे निराश भ सियान, अपन जिनगी क बेकार बुझि, आत्महत्या करैक विचार मन मे ठानि लेलक। आत्महत्या करै ले विदा भेल। निराश मन दुखक अथाह सागर मे डूबै लगलै कि पाछू स एक आदमी कान्ह पर हाथ दऽ कहलकै- ‘मित्र! एहि अमूल्य जिनगी क गमौला स की हैत? हम मानै छी जे अहाँक विपत्ति अहाँ कऽ आत्महत्या क हँसैत-हँसैत पाछू नहि धकेल सकै छी?’ एकटा गरुड़ छल। ओकरा एकटा बच्चा छलै। बच्चा कऽ पीठि पर लऽ गरुड़ एकठाम स दोसर ठाम चराओर करैत छल। साँझू पहर कऽ बच्चा क पीठि पर लदने घर अबैत छल। उड़ै जोकर बच्चा भऽ गेल छलै मुदा पीठि पर बैसैक जे आदति लागि गेल छलै से छोड़बे ने करैत। कैक दिन गरुड़ बुझौलकैक मुदा ओ अपन बाइन छोड़बे ने करैत। मने-मन गरुड़ सोचलक जे सोझे कहने से नहि मानत तेँ रास्ता धड़बै पड़त। एक दिन बच्चा कऽ पीठि पर नेने गरुड़ उड़ैत विदा भेल। जखन खूब ऊपर गेल तखन आस्ते स अपन पाँखि समेटि बच्चा कऽ छोड़ि देलक। बच्चा निच्चा गिरै लगल। अपना कऽ निच्चा गिरैत देखि बच्चा पाँखि फड़फड़बै लगल। आस्ते स निच्चा उतड़ल। आखि उठा-उठा गरुड़ देखबो करै आ बँचवैक उपायो सोचै। निच्चा मे आबि बच्चा पाँखि चलबैक प्रयास करै लगल, जहि स उड़ब सीखि लेलक। सायंकाल जखन सब एकठाम भेल तखन बच्चा बापक शिकायत करैत माए केँ कहलक- ‘माए! आइ जँ पाँखि नहि फड़फड़ेने रहितहुुँ तऽ बाबू बिचहि रास्ता मे मारि दइते।’ माए बुझि गेलि। हँसैत बेटा कऽ कहलक- ‘बौआ! जे अपने स नहि सिखत, स्वावलंवी बनत, ओकरा सिखवैक एकटा इहो रास्ता छियैक।’’ 45: कर्तव्यपरायनतोता तस्वीर एकटा जमीनदार रहति। हुनका बहुत खेत रहनि। धानक खेती केने रहति। खेतक चारु कोण पर रखवार खोपड़ी बना ओगरबाहि करैत छल। रखवार कऽ रहितहुँ तोता सब उड़ैत आबि, धानो खाइत आ सीस काटि-काटि लइयो जाइत। एकटा ऐहन तोता छल जे अपने खेतो मे खा लैत आ उड़ै काल छह टा सीस काटि लोल मे ल उड़ि जाइत। एक दिन रखबार ओकरा जाल मे फँसा लेलक। तोता कऽ नेने जमीनदार लग रखवार ल गेल। तोता कऽ देखि जमीनदार पूछलकै- ‘धानक सीस काटि कतऽ जमा करै छेँ?’ निरभिक (निर्भीक) भ तोता उत्तर देलकनि- ‘दू टा सीस कर्ज सठबै ले, दू टा कर्ज लगबै ले आ दू टा परमार्थक लेल लऽ जाइ छी। कुल छह टा सीस, अपन पेट भरला पर, ल जाइ छी।’ अचंभित होइत जमीनदार पूछलकै- ‘की मतलब?’ तोता- ‘बृद्ध माए-बाप छथि जनिका उड़ी नहि होइत छनि, तनिका लेल दू टा सीस। दू टा बच्चा अछि तकरा लेल दू टा सीस आ दू टा पड़ोसिया दुखित अछि दू टा सीस तकरा लेल।’ तोताक बात ध्यान स सुनि जमीनदार गुम्म भऽ गेल। किछु समय मने-मन विचारि रखवार कऽ कहलखिन- ‘एहि तोता कऽ चिन्हि लहक। जँ कहियो धोखा स पकड़ाइयो जा त छोड़ि दिहक। एकटा चित्रकार तीनि टा तस्वीर बनौलक। एकटा सोच मे, दोसर हाथ मलैत आ तेसर माथ धुनैत। एक गोटे तीनू तस्वीर क देखि चित्रकार स पूछलक- ‘तीनू तीनि रंगक बुझि पड़ै अए?’ उत्तर दैत चित्रकार कहलक- ‘ई तीनू एक्के आदमीक तीनि अवस्थाक छी।’ ‘कोन-कोन अवस्थाक छी?’ ‘पहिल विआह स पहिलुका छी। जखन युवक कल्पना मे उड़ैत अछि। सोचैत अछि जे कत्ते सुन्नर कनियाँ भेटत। दोसर विआहक बादक छी। जखन पारिबारिक जिनगी शुरु होइत छैक आ जिम्मेबारी बढ़ैत छैक। जिम्मेबारी बढ़लाक बादे समस्या स टकराइ पड़ैत छैक। तखन बुझि पड़ैत छैक जे कोन जंजाल मे पड़ि गेलहुँ तेँ हाथ मलैत अछि। तेसर तस्वीर ओ छी जखन स्त्रीक वियोग वा विरोध होइत छैक। तखन माथ घुनैत सोचै पड़ैत छैक जे हमर कपार फूटि गेल। अपने किरदानी स अपन, परिवारक आ खानदनक नाक कटा देलिऐक। जँ हमहू सही रास्ता पर आबि चलैत रहितहुँ तऽ ऐहेन दिन नहि देखै पड़ैत।’ 46.दोस्तक जरुरत :स्वार्थपूर्णविचार एकटा पैध पोखरि छल। ओकर उत्तरबरिया महार मे मोर रहैत छल आ दछिनबरिया मे मोरनी। दुनू असकरे-असकरे रहैत। एक दिन मोर मोरनी ऐठाम जा विआहक प्रस्ताव रखलक। मोरक प्रस्ताव सुनि मोरनी पूछलकै- ‘अहाँ कऽ कैक टा दोस अछि?’ नजरि दौड़बति मोर उत्तर देलक- ‘एकोटा नइ।’ मोरक जबाव सुनि मोरनी विआह करै स इनकार क देलक। तखन मोरक मन मे एलै जे सुख स जीबैक लेल दोस जरुरी अछि। ओतऽ स विदा भ मोर पूबरिया महार होइत चलल। पूबरिया महार मे सिंह रहैत छल। आ पछबरिया मे कौछु। सिंह बैसल-बैसल झपकी लैत छल। मोर सिंहक आगू मे ठाढ़ भ गेलि। मोर कऽ बजैक साहसे ने होय। बड़ी खान धरि मोर कऽ ठाढ़ भेलि देखि सिंह पूछलकै निराश मने मोर कहलकै- ‘भैया! हम अहाँ स दोस्ती करै एलहुँ। किऐक त जिनगीक लेल दोस्तक जरुरत होइत छैक। सिंह मानि दोस्ती कऽ लेलक। सिंह स दोस्ती भेलाक बाद मोर पछबरिया महार आबि कौछु स सेहो दोस्ती केलक। पछबरिये महारक गाछ पर टिटही सेहो रहैत छल। जे अपन काज इमानदारी स करैत छल। जखन कखनो शिकारीक आगमन होय वा कोनो आफत अबैवला होय त टिटही सबकेँ जानकारी द दैत। दोस्ती केलाक बाद मोर मोरनी लग आबि सब बात कहलक। मोरनी विआह करैक लेल राजी भऽ गेलि। दुनूक बीच विआह भ गेलै। दुनू एक्के ठाम रहै लगल। एक दिन एकटा शिकारी शिकारक भाँज मे पहुँचल। भरि दिन शिकारी शिकारक पाछू हरान भेल रहै मुदा कतौ किछु नहि भेल रहैक। थाकियो गेल रहै आ भूखो लागि गेल रहै। गाछक निच्चा मे सुसताय लगल। गाछक निच्चा मे चिड़ैक चट देखि गाछ पर चढ़ि चिड़ै कऽ पकडै़क विचार केलक। गाछे पर स मोर-मोरनी सेहो शिकारी कऽ देखैत। शिकारी कऽ गाछ पर चढ़ैत देखि दुनू परानी (मोर-मोरनी) सोचै लगल जे आइ दुनूक जान जायत। मोर दौड़ल टिटही लग गेल। टिटही जोर-जोर स बोली देमए लगलै। सिंह बुझि गेल। शिकार पकड़ै ले सिंह विदा भेल। ताबे कछुआ सेहो पानि स निकलि किनछरि मे आबि गेल। सिंह कऽ देखि शिकारी भगैक ओरियान करै लगल कि कौछु पर नजरि पड़लै। कौछु कऽ पकड़ै शिकारी किनछरि मे गेला कि कौछु ससरि पानि मे चलि गेल। श्किारी पानि मे पैइसै लगल कि गादि (दलदल) मे लसकि गेल। ने आगू बढ़ि होय आ ने पाछू भ होय। ताबे सिंह आबि शिकारी कऽ पकड़ि लेलक। शिकारी कऽ पकड़ल देखि मोरनी मोर कऽ कहलक- ‘विआह करै स पहिने जे दोस्तक संख्या पूछने रही से देखलिऐक। आइ जँ दोस्ती नहि केने रहितहुँ त की होइत?’ एकटा बच्चाक मृत्यु भऽ गेलै। अभिभावक संग किछु गोटे ओकरा उठा कऽ असमसान ल गेल। बरखा होइत रहै। असमसान मे सब विचारै लगल जे ऐहेन दुरकाल समय मे लाश कऽ की कैल जाय? अपना मे सब विचारितहि छल कि बिल से एकटा सियार निकलि कहलकै- ‘ऐहेन समय मे लाश कऽ जरौनाइ से नीक माटि मे गारनाइ हैत। धरती माएक गोद मे समरपित करब सबसे नीक हैत।’ सियारक बात समाप्तो नहि भेलि छल कि कौछु कहै लगलैक- ‘धार मे फेकि दिऔ। अइ स नीक दोसर नै हैत।’ ताबे एकटा गीध उड़ैत आबि कहै लगलै- ‘सबसे नीक हैत जे ओहिना फेकि दिऔ, धारे मे नहा लिअ आ गाम पर चलि जाउ।’ कठिआरीवला सब तीनूक चलाकी बुझि गेल। तीनू क धन्यवाद दैत विदा केलक। पानियो छूटि गेलै। सब मिलि चीता खुनि जारन द जारा देलक। 47.संगीक महत्व उपहास एकटा गाछ लग एकटा फूलक लत्ती जनमि क लटपटाइत बढ़ैत गाछक फुनगी धरि पहुँच गेलि। गाछक आश्रय पाबि ओ लत्त्ी फुलाय-फड़ै लगल। लत्तीक फड़-फूल देखि गाछ कऽ मन मे द्वेष जगै लगलै जे हमरे बले ई लत्त्ी एत्ते बढ़ि फड़ै-फुलाय अए। जँ हम सहारा नइ दैतिऐक त कहिया-कतै माल-जाल चरि नष्ट क देने रहितैक। लत्ती पर रोब जमबैत गाछ कहलकै- ‘तोरा हम जे आदेश दिऔ से तू कर। नइ त मारि क भगा देबौ।’ वृक्ष लत्ती कऽ कहिते छल कि दू टा बटोही ओहि रस्ते जाइत छल। लत्ती स सुशोभित गाछ देखि एकटा राही दोसर स कहलक- ‘संगी! एहि वृक्ष कऽ दखियौक जे कत्ते सुन्दर लगे अए। निच्चा मे कत्ते-शीतल केने अछि। ऐठाम बैसि बीड़ी-तमाकुल क लिय, तखन आगू बढ़ब।’ लत्ती संग अपन महत्व सुनि गाछक रोब समाप्त भ गेलै। ओहि दिन स दुनू मिलि प्रेम स रहै लगल। कोनो अधलो (प्रचलन) चलैन वा ढ़र्रा कऽ तोड़ब अपने-आप मे कठिन कार्य होइत। जखन कखनो केयो समाज वा परिवार मे गलत कार्य कऽ छोड़ि स्वस्थ वा तर्कयुक्त कार्य आरंभ करैत त सिर्फ परिवारे टा मे नहि समाजो मे सब उपहास करैत अछि। जहि स धैर्यवान त स्थिर रहैत मुदा साधारण मनुष्य अधीर भ जाइत। पहिने इंग्लैंड मे छतरी (छत्ता) ओढ़नाइ गमारपन बुझल लाइत छलैक। जहि दुआरे लोक बरखो मे भीजैत चलैत मुदा छाता नहि ओढ़ैत। एहि गलत प्रथाक विरोध करैत हेनरी जेम्स छाता ओढ़ब शुरु केलनि। सदिखन ओ छाता संगे मे राखथि। जहि स जिमहर होइत चलैत व्यंग्यक बौछार हुुअए लगनि। मुदा तेकर एक्को पाइ परवाह नहि करथि। देखा-देखी लोक हुनकर अनुकरण करै लगल। किछु दिनक बाद सभ छाता रखै लगल। जहि स चलनि बनि गेल। चलैन एत्ते बढ़ि गेलैक जे स्त्रीगणो आ राजमहलोक सभ छाता ओढ़ै लगल। बाद मे जैह सभ व्यंग्य करैत वैह सभ हेनरी जेम्स कऽ बधाई देमए लगलनि। बधाई देनिहार केँ हेनरी जेम्स कहथिन- ‘जे केयो उपहास आ व्यंग्यक विरोध स नहि डरत, वैह छोट स पैध धरि परिवर्तन क सकैत अछि।’ चाहे शिक्षा हो वा खेती वा आन-आन जिनगीक पहलू, रुढ़िवादी पुरान प्रथा कऽ तोड़ै पड़त। जाबे ओ नहि टूटत ताबे नव समाजक निमार्ण कल्पना रहत। तेँ किछु प्रथा कऽ तोड़ि आ किछु केँ सुधारि चलै पड़त। एहि लेल सभमे साहस आनै पड़त। 48.महादान भााग्यवाद अज्ञानक निवारण करब सबसँ पैघ पुण्य परमार्थ थिक। जे स्वध्याय आ ज्ञानार्जन स होइत अछि। उत्तराखंड मे एकटा पुरान नगर मे सुबोध नामक राजा राज्य करैत छलाह। हुनक (सुबोधक) नियम छलनि जे राजक काज शुरु करै स पहिने, आयल याचक सभ कऽ छान दैत छलाह। एहि नियम मे कहियो भूल नहि भेलनि। एक दिन सब याचक क दान द देलखिन, मुदा विचित्र स्थिति पैदा भ गेलनि। एकटा याचक ओहन आइल छल जे दानक लेल त हाथ पसारैत छल मुदा मुह स किछु नहि बजैत। सभ हैरान होइत जे हिनका की देल जाइन? एतथर्द बुद्धियार सभक सलाहकार बोर्ड बनौलनि। क्यो विचार दन्हि जे वस्त्र देल जाय त क्यो अन्न देवाक सलाह देथिन। क्यो सोना-चानीक विचार देथिन। मुदा समस्याक यथार्थ समाधान हेबे ने करैत। सुबोध् ाक पत्नी उपवर्गो रहथिन। ओ (उपवर्गा) कहलकनि- ‘राजन! जइ आदमीक मुह स बोल नइ निकलै ओकरा आन कोनो चीज देब उचित नहि। तेँ ऐहन लोक कऽ मुह मे बोल देब सबसँ उत्तम हैत। अर्थात् ज्ञानदान। ज्ञान स मनुष्य अपन सब इच्छा-आकांक्षा पूर्ति क सकैत अछि आ दोसरो क मदति क सकैत अछि।’ उपवर्गाक विचार सभकेँ जँचलनि। ओहि आदमीक लेल शिक्षा व्यवस्था कयल गेल। ओहि दिन सुबोध अपन दानक सार्थकता बुझलनि। भाग्यवाद, राकुन, फलित, ज्योति जेँ अनेको प्रकरण अछि जे जनसमुदाय कऽ जंजाल मे ओझरा शोषणक रास्ता शोषकक लेल खोलि दैत अछि। एकटा ज्योतिषी सुख-दुख, जनम-मरणक बात कहि मनसम्फे धन जमा क ताड़ी-दारु खुब पीबैत। एक दिन एकटा जमीनदारक ऐठाम पहुँच, हुनक हाथ देखि कहलखिन जे एक बर्खक अभियनतरे अहाँक मृत्यु भ जायत। ज्योतिषीक बातक बिसवास क जमीनदार दिन व दिन सोगाइ लगलाह। जमीनदार केँ तीनि गोट बेटा। तीनू पिताक आज्ञापालक। पिता केँ रोगाइत देखि मझिला बेटा पूछलकनि- ‘बाबूजी! अपने दिनानुदिन किऐक रोगाइल जाइ छी?’ चिन्तित मने जमीनदार उत्तर देलखिन- ‘बौआ! हमर औरदा पूरि गेल। सालक भीतरे मरि जायब।’ - ‘ई, अहाँ कोना बुझलिऐक?’ - ‘ज्योतिषी हाथ देखि कहलनि।’ मझिला बेटा ज्योतिषी कऽ बजा पूछलखिन। पैछले बात कऽ ज्योतिषी देहरा देलक। मझिला बेटा ज्योतिषी केँ पुनः पूछल- ‘अहाँ अपने कत्ते दिन जीवि?’ हँसैत ज्योतिषी उत्तर देलखिन- ‘तीस बर्ख।’ ज्योतिषीक बात सुनि ओ घर स फरुसा आनि सोझे ज्योतिषीक गरदनि पर लगा देलक। ज्योतिषीक मूड़ी धर स अलग भ गेल। तखन ओ पिता कऽ कहलकनि- ‘हिनकर उमेर तीस बर्ख बचले छलनि तखन आइ किऐक मरलाह? ई सब ठक छी। ठकक बात मे पड़ि अहाँ अनेरे सोगाइल जाइ छी।’ जमीनदारक भ्रम टूटि गेल। धीरे-धीरे निरोग हुअए लगलाह। 49.आश्रमनहिस्वभावबदली सद्वृत्ति स्कन्दपुराणक कथा थिक। एक बेरि कात्यायन देवर्षि नारद स पूछलकनि- ‘भगवान! आत्म-कल्याणक लेल भिन्न-भिन्न शास्त्र मे भिन्न-भिन्न उपाय आ उपचार बताओल गेल अछि। गुरुजन सेहो अपन-अपन विचारानुसार कते तरहक साधन-विध् ाानक महात्म्य बतौने छथि। जना-जप, तप, त्याग, वैराग्य, योग, ज्ञान, स्वध्याय, तीर्थ, व्रत, ध्यान-धारण, समाधि इत्यादि अनेको रास्ता कहने छथि। जे सब करब असंभवे नहि असाध्यो अछि। सामान्यजन त निर्णये ने क सकैत अछि जे एहि मे ककरा चुनल जाय? कृपा क अपने एकर समाधान करियौक जे सर्वसुलभ सेहो होय आ सुनिश्चित मार्ग सेहो होय।’ ध्यान स नारद कात्यायनक बात सुनि कहलखिन- ‘हे मुनिश्रेष्ठ! सद्ज्ञान आ भक्तिक एक्के मार्ग अछि। जे थिक मनुष्य कऽ सत्कर्म मे प्रवृत्त करब। स्वयं संयमी बनि अपन सामथ्र्य स गिरल आदमी कऽ उठबै आ उठल केँ उछालै मे नियोजित करै। सत्प्रवृत्तिये असल देवी थिक। जकरा जे जत्ते श्रद्धा स सिंचैत अछि ओ ओते विभूति क अर्जित करैत अछि। आत्म-कल्याण आ विश्व-कल्याण समन्वित साधनाक लेल परोपकार रत रहब श्रेष्ठ अछि। चाहे व्यक्ति कोनो जाति वा धर्मक किऐक ने होथि।’ एकटा युवक उद्धत स्वभावक छल। बात-बात मे खिसिया कऽ आगि-अंगोड़ा भ जाइत छल। जँ क्यो बुझबै-सुझबै छलैक त ओ घर छोड़ि संयासी बनैक धमकी दैत छलैक। ओहि युवक स परिवारक सब परेशान रहैत। एक दिन पिता खिसिया कऽ संयासी बनै ले कहि देलक। घर स किछुऐ दूर हटि संयासीक आश्रम छलैक। जे ओकरा बुझल छलैक। घर स निकलि युवक सोझे संयासीक आश्रम पहुँच गेल। आश्रमक संचालक ओहि युवकक उदंडता स परिचित छल। युबक कऽ आश्रम मे पहुँचते, संचालक रास्ता पर अनै दुआरे पुचकारि कऽ लग मे बैसाय पूछलक। ओ युवक संयासक दीक्षा लैक विचार व्यक्त केलक। दोसर दिन दीक्षा दैक (दइक) आश्वासन संचालक द देलखिन। दीक्षाक विधान मे पहिल कर्म छल गोसाई उगै स पहिने समीपक धार मे नहा कऽ ऐनाई। आलसी प्रवृत्ति आ जाड़ स डरैवला युवक कऽ ई आदेश खूब अखड़लै। मुदा करैत की? नियम पालन त करै पड़तैक। कपड़ा कऽ देवालक खूँटी पर टांगि युवक नहाइ ले गेल। जखन युवक नहाई ले गेल कि संचालक कपड़ा कऽ चिरी-चोंट फाड़ि देलक। नहा कऽ थरथराइत युवक आयल त देखलक। तामसे आरो थरथराइ लगल। मुदा करैत की? दीक्षाक मुहूत्र्त संचालक सौंझुका बनौलक। ताधरि मात्र किछु फल-फलहरी खायब छलैक। तेँ ओहि युवकक लेल नोन मिलाओल करैला परोसि क थारी मे देल गेलै। एक त करैला ओहिना तीत दोसर छुछे। कंठ स निच्चा युवक कऽ उतड़वे ने करै। भोर मे उठब, जाड़ मे नहायब, फाटल-चीटल कपड़ा पहिरब आ तइ पर स तीत करैला खायब। युबक खिन्न हुअए लगल। संचालक सब बुझैत। युबक कऽ बजा संचालक कहलक- ‘संयासी बनब कोनो खेल नहि छियैक। एहि दिशा मे बढ़निहार कऽ डेग-डेग पर मन कऽ मारै पड़ैत छैक। परिस्थिति स ताल-मेल बैसाय, संयम बरति, अनुशासनक पालन करै पड़ैत छैक। तखन संयासी बनैत अछि।’ भरि दिन युवक अपन प्रस्ताब पर सोचैत-विचारैत रहल। तेसर पहर अबैत-अबैत ओ पुनः घुरि कऽ घर आबि गेल। संयम साधना आ मनोनिग्रहक नामे त संयास थिक। जे घरो पर रहि लोक पालन क सकैत अछि। स्वभाव बदलने बाताबरणो बदलि जाइत छैक। 50.पुरुष्ाार्थ नैष्ठिकसुधन्वा संसारक कुशल-क्षेम बुझै ले एक दिन भगवान नारद केँ पृथ्वी पर पठौलखिन। पृथ्वी पर आवि नारद एकटा दीन-हीन बूढ़ आदमी लग पहुँचला। ओ वेचारे (वृद्ध-आदमी) अन्न-वस्त्रक लेल कलहन्त छल। नारद जी कऽ देखितहि चीन्हि गेलखिन। कानैत-कलपैत कहै लगलनि- ‘अहाँ घुरि क जब भगवान लग जायब तखन कहबनि जे हमरा सन-सन लोकक लेल जीबैक जोगार करति।’ बूढ़क बात सुनि उदास मने नारद आगू बढ़ला। आगू बढ़ितहि एकटा धनीक आदमी स भेटि भेलनि। ओहो नारद कऽ चीन्हि गेलनि। ओ धनीक नारद केँ कहलकनि- ‘भगवान हमरा कोन जंजाल मे फँसौने छथि जे दिन-राति परेशान-परेशान रहै छी। कम धन दितथि जे गुजरो चलैत आ चैनो स रहितहुँ। तेँ भगवान कऽ कहबनि जे जंजाल कम क दथि।’ दुनूक बात सुनला पर नारद मने-मन सोचै लगला जे क्यो धने तबाह त क्यो क्यो निर्धने तवाह। सोचैत-बिचारैत नारद आगू बढ़ला। थोड़े आगू बढ़ला पर बबाजीक झुण्ड भेटिलनि। नारद कऽ देखि बाबाजी घेरि कऽ कहै लगलनि- ‘स्वर्ग मे तोँही सभ मौज करबह। हमरो सभ ले राजसी ठाठ जुटावह नहि त चुट्टा स मारि-मारि भुस्सा बना देवह।’ नारद घूमि कऽ भगवान लग पहुँचला। यात्राक वृतान्त भगवान नारद स पूछल। तीनू घटनाक वृतान्त नारद सुना देलखिन। हँसैत नारायण कहै लगलखिन- ‘देवर्षि! हम ककरो कर्मक अनुसार किछु दइ ले विवश छी। जे कर्महीन अछि ओकरा कत्तऽ स किछु देबैक। अहाँ फेरि जाउ। ओहि वृद्ध गरीब कऽ कहबै जे भाइ अपन गरीबी मेटिबै ले संघर्ष करु। अपन पुरुषार्थ कऽ जगाउ। तखन सब कुछ भेटत। दोसर ओहि धनीक कऽ कहबै जे अहाँ कऽ धन दोसरा क उपकार करै ले देलहुऽ। से नहि कऽ संग्रही बनि गलहु तेँ अहाँ धनक जंजाल मे फँसि गेल छी। आ ओहि बावाजी सभ केँ कहवै जे परमार्थीक वेष बना कोढ़ि आ स्वार्थी बनि गेल छी, तेँ अहाँ सभके नरक हैत।’ महाभारत मे सुधन्वा आ अर्जुनक बीच लड़ाइक कथा आयल अछि। दुनू महाबलि, युद्ध विद्या मे निपुन। दुनूक बीच लड़ाई छिड़ल। धीरे-धीरे लड़ाई जोर पकड़ैत गेलै। लड़ाई ऐहन भयंकर रुप ल लेलक जे निर्णयक दौरि आबिये ने रहल छलैक। अंतिम बाजी एहि विचार पर अड़ल जे फैसला तीनि वाण मे हुअए। या त एतबे मे क्यो हारि जाय वा लड़ाई बन्न क दुनू हारि कबूल क ली। जीवन-मरणक प्रश्न दुनूक सामने। कृष्ण सेहो रहथिन। कृष्ण अर्जुन कऽ मदति करैत रहथिन। हाथ मे जल ल कृष्ण संकल्प केलनि जे ‘गोवरधन उठौला आ ब्रजक रक्षा करैक पुण्य हम अर्जुनक वाणक संग जोडै़त छी।’ सुधन्वा संकल्प केलक- ‘पत्नी धर्म पालनक पुण्य अपन अस्त्रक संग जोड़ैत छी’ दुनू अस्त्र आकाश मार्ग स चलल। आकाशे मे दुनू टकरायल। अर्जुनक अस्त्र कटि गेल। सुधन्वाक अस्त्र आगू बढ़ल मुदा निशान चूकि गेलैक। दोसर अस्त्र पुनः उठल। कृष्ण अपन पुण्य अस्त्रक संग जोड़ैत कहलखिन- ‘गोहि (ग्राह) स हाथीक जान बचाएव आ द्रौपदीक लाज बँचबैक पुण्य जोड़ैत छी।’ अपन अस्त्रक संग जोड़ैत सुधन्वा बाजल- ‘नीतिपूर्वक उपारजन आ दोषरहित चरित्रक पुण्य जोड़ै छी।’ दुनू अस्त्र आकाशे मे टकरायल। सुधन्वा क वाण अर्जुनक वाण क काटि ध् ारासायी क देलक। तेसर अस्त्र बाकी रहल। एहि पर निर्णय आबि गेल। अर्जुनक बाणक संग जोड़ैत कृष्ण कहलखिन- ‘बेरि-बेरि एहि धरती पर अवतार ल धरतीक भार उताड़ैक पुण्य जोड़ै छी। अपन वाणक संग जोड़ैत सुधन्वा कहलक- ‘अगर स्वार्थक लेल धन कऽ एक्को क्षण सोचने होय वा सदति परमार्थ मे लगाओल पुण्य जोड़ैत छी।’ दुनू वाण आकाश मार्ग स चलल। अर्जुनक वाण कटि क निच्चा गिरल। दुनू पक्ष मे के अधिक समर्थ, इ जानकारी देवलोक मे पहुँचल। देवलोक स फूलक वर्षा सुधन्वा पर हुअए लगल। लड़ाई समाप्त भेल। भगवान कृष्ण सुधन्वाक पीठि ठोकि कहलखिन- ‘नरश्रेष्ठ! अहाँ साबित क देलौ जे नैष्ठिक गृहस्थ साधक कोनो तपस्वी स कम नहि होइत छैक।’ 51.सद्भााव सद्गृहस्त एकटा गृहस्त छला। संयम स जीवन-यापन करैत छला। परिवार कऽ सुसंस्कारी बनबै मे सदिखन लागल रहैत। नीतिपूर्वक आजीविका आ जिनगी बितबैत। परिवारक काज आ खरच स जे समय आ धन बँचैत छलनि ओ परमार्थ मे लगबैत। ओ गृहस्त कहियो तपोभूमि नहि गेला मुदा घरे मे तपोवन बना नेने छला। देवतो खुशी रहैत छलथिन। एक दिन, गृहस्तक क्रिया स खुशी भ इन्द्र आबि बर मांगैक लेल कहलखिन। गृहस्त असमंजस मे पड़ि गेला जे की मंगबनि। जखन असंतोषे नहि तखन अभावे कथीक? स्वाभिमानी गमौलाक उपरान्ते क्यो ककरो स किछु पवैत अछि। ई बात सोचि गृहस्त मने-मन विचारै लगलाह जे जहि स ऋृणो-भार नहि हुअए आ देवतो अपमान नहि बुझति। बड़ी काल धरि सोचैत-विचारैत गृहस्त मंगलक- ‘हमर छाया जतै पड़ै ओतए कल्याणक बरखा होय।’ दन्द्र वरदान त द देलखिन मुदा अचंभित भ गृहस्त स पूछलखिन- ‘हाथ रखला पर कल्याणों होइत आ आनंदो। प्रशंसो आ प्रत्युपकारक संभवनो होइत। मुदा छाया स कल्याण भेलो पर लाभ स बंचित रहै पड़ैत। तखन ऐहन विचित्र वर किऐक मंगलहुँ?’ मुस्कुराइत गृहस्त कहलखिन- ‘देव! सोझावलाक कल्याण भेने अपना मे अहंकार पनपैत अछि। जहि स साधना मे बाधा उपस्थिति होइत। छाया ककरा पर पड़ल, के कत्ते लाभन्वित भेल, ई पता नइ लगब जीवनक लेल श्रेयस्कर थिक।’ साधनाक यैह रुप पैघ होइत। यैह क्रम प्रगतिक रास्ता पर चलैत-चलैत व्यक्ति महामानव बनैत अछि। अपन शिष्यक संग महात्मा ईसा कतौ जाइत रहथि। साँझ पड़ि गेलै। राति बितवैक लेल एकठाम ठहरि गेला। संग मे पाँचे टा रोटी खाइ ले छलनि। रोटीक हिसाबे खेनिहार अधिक तेँ सभकेँ पेट भरब कठिन छलनि। अपना मे शिष्य सब यैह गप-सप करैत। ईसो सुनलखिन। मुस्कुराइत ईसा कहलखिन- ‘सब रोटी कऽ टुकड़ी-टुकड़ी तोड़ि एकठाम क लिअ आ चारु भाग स सभ बैसि खाउ। जहि स सभकेँ एक रंग भोजन भेटि जायत।’ महात्मा ईसाक विचार मानि सभ सैह केलक। संतोषक जन्म सभक हृदय मे भऽ गेलैक। सभ केयो खायब शुरु केलक। रोटी सठैत-सठैत सभक पेटो भरि गेलैक। तखन एकटा शिष्य बाजल- ‘ई गुरुदेवक चमत्कार छिअनि।’ शिष्यक बात सुनि ईसा कहलखिन- ‘ई अहाँ लोकनिक सद्भावक सहकार थिक नहि की चमत्कार। अगर अहाँ सभ अपना मे छीना-झपटी करितहुँ त ई संभव नहि होइत। जहिठाम सद्भाव स परिवारक संबंध होइत तहिठाम एहिना प्रभुक अयाचित सहयोग भेटैत अछि।’ 52.आलस्य वनाम पिशाच : स्वर्गआनर्क वन विहार करैक लेल वासुदेव, बलदेव आ सात्यकि घोड़ा पर चढ़ि निकललाह। घनघोर जंगल रहने तीनू गोटे रास्ता मे भटकि गेला जाइत-जाइत ऐहन सघन बन मे पहुँच गेलथि, जहिठाम सऽ ने पाछू होएब बननि आ ने आगू बढ़ब। मुन्हारि साँझ भ गेलै। अन्हार मे चलब आरो कठिन भऽ गेलनि। अचताइत-पचताइत तीनू गोटे अटकि गेला। एकटा झमटगर गाछ छलैक जहिक तर (निच्चा) मे घोड़ बान्हि तीनू गोटे राति बितबैक कार्यक्रम बनौलनि। खाइ-पीबै ले किछु रहबे ने करनि तेँ गाछेक निच्चा मे दूबि पर सुतैक ओरियान केलनि। मुदा मन मे शंका होइत रहनि जे जँ तीनू गोटे सुति रहब आ घोड़ा केयो खोलि कऽ ल जाय। तीनू गोटे बिचारलनि जे एक-एक पहर जागि अपनो आ घोड़ोक ओगरवाही क लेब आ सुतियो लेब। पहरा करैक पहिल पारी सात्यकिक भेल। वासुदेव आ बलदेव सुति रहल आत्यकि जगल रहल। थोड़े खानक बाद गाछ पर स पिशाच उतड़ि सात्यकिक संग मल्लयुद्ध करैक लेल ललकारलकनि। ओहने उत्तर सात्यकियो देलक। दुनूक बीच घुस्सा-घुस्सी हुअए लगल। सैाँसे पहर दुनूक बीच मल्लयुद्ध होइते रहल। कते ठाम सात्यकिक देह मे चोटो लगलैक। छालो ओदरलनि। पहर बीति गेल। दोसर पारी बलदेवक आयल। सात्यकि सुति रहल बलदेव पहरा करै लगल। थोड़े कालक बाद पिशाच पुुनः आबि चुनौती देलकनि। बलदेवो ओहने उत्तर देलखिन। पिशाचक आकार सेहो नमहर भ गेल। छलै। दुनूक बीच मल्लयुद्ध शुरु भेल। बलदेवो केँ पिशाच दुरगति क देलकनि। दोसरो पहर बीतल। तेसर पहरक पारी वासुदेवक छलनि। पुनः पिशाच आबि हुनको चुनौती देलक। मुदा वासुदेव हँसवो करति आ कहबो करथिन- ‘बड़ मजगर अहाँ छी। निन्न आ आलस स बँचैक लेल मित्र जेँका मखौल करै छी। पिशाचक बल घटै लगलै। आकारो छोट होइत गेलै। भिनसर भेल। नित्यकर्म स तीनू गोटे निवृत्ति भ चलैक तैयारी करै लगलथि। तखन सात्यकि आ बलदेव अपन रौतुका चरचाा करैत जतऽ-जतऽ चोट लगल रहनि सेहो देखोलखिन। हँसैत वासुदेव कहलखिन- ‘ई पिशाच आरो किछु नहि थिक। ई मात्र कुसंस्कार रुपी क्रोध छी। ओकरो ओहने प्रत्युत्तर भेटिलै तेँ बढ़ैत गेल। मुदा जखन ओकरा उपेक्षाक रुप मे देखलिऐक तखन ओ छोट आ दुर्बल भ गेल।’ विद्यालयक ओसार पर बैसि गुरु आ शिष्य गप-सप करति रहथि। एकटा शिष्य गुरु स स्वर्ग आ नर्कक संबंध मे पूछलकनि। शिष्य कऽ बुझबैत गुरु कहै लगलखिन- ‘स्वर्ग आ नर्क एहि धरती पर अछि। जे कर्मक अनुसार एहि जिनगी मे भेटैत छैक।’ गुरुक उत्तर स शिष्य संतुष्ट नहि भेल। शंका बनले रहलै। पुनः गुरु स अपन शंका व्यक्त केलक। गुरु बुझलनि जे बिना व्यवहारिक जिनगी देखौने शिष्य संतुष्ट नइ हैत। ओ (गुरु) उठि श्ष्यि सभ कऽ संग केने गाम दिशि विदा भेला। गाम मे एकटा बहेलियाक घर छलै।। ओहिठाम पहुँचते, सभ देखल जे पेट-पोसैक लेल बहेलिया जीव-हत्या क रहल अछि। ततबे नहि, जीब हत्यो केने ने देह पर वस्. छैक आ ने भरि पेट भेजन धीयो-पुतोक देह पर माछी भिनकै छै। एको क्षण ओतै रहैक इच्छा ककरो नहि होय। चुपचाप गुरुजी शिष्यक संग ओतै स विदा भ गेला। दोसर ठाम पहुँचला। ओ वेश्याक घर छलै। युवावस्था मे ओ बेश्या खूब पाइयो कमेने छलि आ भोगो केने छलि। मुदा बुढ़ढ़ी मे आबि अनेको रोगो स ग्रसित भ गेलि आ परिवारो समाजो स तिरस्कृत भ गेलि। पेटक दुआरे भीख मंगैत छलि। सभ केयो (गुरु-शिष्य) देखि ओतै स विदा भ गेला। तेसर परिवार गृहस्तक छल। जहिठाम जा सभ देखलखिन जे गृहस्त। जेहने संयमी छथि तेहने परिश्रमी। स्वभाव स उदार आ सद्गुणी सेहो छथि। जहि स परिवार सुख-समृद्धि स भरल-पूरल छलैक। गृहस्तक परिवार देखि गुरुजी शिष्यक संग आगू बढ़ि चारिम परिवार मे पहुँचल। पोखरिक मोहार पर एकटा संत कुटी बनौने रहथि। शिक्षा आ प्रेरणा पवैक लेल दिन-राति समाजक लोक अबैत-जाइत रहैत छल। संतजी मस्त-मौला जेँका जिनगी बितवैत। ने मन मे एक्को मिसिया क्रोध आ ने कोनो तरहक चिन्ता। चारु परिवार देखि शिष्यक संग गुरुजी विद्यालय दिशि चललाह। रास्ता मे श्ष्यि केँ कहलखिन- ‘पहिल जे दुनू परिवार देखलिऐक ओ नरकक रुप मे छल आ बादक जे दुनू परिवार देखलिऐक ओ स्वर्गक रुप मे।’ 53.यथाार्थकबोध् शिखिध्वज ब्रह्मज्ञानी बनै चाहति रहथि। ओ सुनने छला जे तियाग आ वैराग्य स मनुष्य ब्रह्मज्ञानी बनैत अछि। तेँ शिखिध्वज घर-परिवार छोड़ि जंगल मे कुटी बना रहै लगलथि। ओहि बन मे तपस्वी शतमन्यु सेहो रहैतछलथिन। शतमन्यु कऽ पता लगलनि जे एकटा नवांगतुक घर-परिवार छोड़ि कुटी बना रहैत अछि। शतमन्यु आबि शिखिध्वज केँ कहलखिन- ‘गामक घर-गिरहस्ती उजाड़ि बन मे वैह सब सरंजाम (रहैक व्यबस्था) जुटबै मे लागि गेलहुँ, ताहि स की लाभ? बैराग्य त अहंता आ लिप्सा स हेबाक चाही। जँ भ सकै त घरे मे तपोवन बना सकै छी।’ शतमन्युक विचार सुनि शिखिध्वज केँ वास्तविकताक बोध भ गेलनि। ओ घुरि कऽ घर आबि परिवारक बीच रहि सेवा-साधना मे जुटि गेला। शिखिघ्वज एकांकी मुक्तिक जगह सामूहिक मुक्तिक मार्ग अपनौलनि। हुनके वंश मे बाल्यखिल्य ऋृषि भेलखिन, जे सैाँसे जम्बूद्वीप कऽ देवभूमि बना देलखिन। 54. विद्वताकमद एक दिन महाकवि माघ राजा भोजक संग वन-विहार घुमल अवैत रहथि। रास्ता मे एकटा झोपड़ी देखलखिन। ओहि झोपरी मे एकटा वृद्धा टोकरी (तकली) कटैत रहथि। ओहि वृद्धा स माघ पूछलखिन- ‘ई रास्ता कत्ते जाइत अछि?’ बृद्धा माघ कऽ चीन्हि गेलीह। ओ हँसैत उत्तर देलखिन- ‘वत्स! रास्ता त कतौ नहि जाइत अछि। जाइत अछि ओहि पर चलैवला राही। अहाँ सभ के छी?’ माघ- ‘हम सभ यात्री छी।’ मुस्कुराइत वृद्धा बाजलि- ‘तात्! यात्री त सुरुज आ चान दुइये टा छथि। जे दिन-राति चलैत रहति छथि। सच-सच कहू जे अहाँ के छी?’ थोड़े चिन्तित होइत माघ कहलखिन- ‘माँ! हम क्षणभंगुर आदमी छी।’ थोड़े गंभीर होइत पुनः वृद्धा कहलकनि- ‘बेटा! यौवन आ धने टा क्षणभंगुर होइत। पुराण कहैत अछि जे एहि दुनूक बिसवास नहि करी।’ माघक चिन्ता आरो बढ़लनि। रोष मे कहलखिन- ‘हम राजा छी।’ हुनका मन मे एलनि जे राजाक नाम लेला स ओ सहमि जयतीह। मुदा ओ वृद्धा निर्भीक भऽ उत्तर देलकनि- ‘नई भाई, अहाँ राजा कोना भऽ सकै छी? शास्त्र त दुइये टा राजा- ‘यम आ इन्द्र’ मानने अछि।’ 55.श्रद्ध अनंत बच्चा मे स्वामी रामतीर्थ गामेक एकटा मौलवी सहाएव स पढ़ने रहथि। प्रारंभिक पढ़ाई पुरला उपरान्त पाठशाला मे नाम लिखौलनि। पाठशाला मे नाओ लिखबै स पहिने पिताक (रामतीर्थक) मन मे प्रश्न उठलनि जे मौलवी एहाएव केँ की देल जाइन। प्रश्न दू तरहक। पहिल जे उचित महीना (मजदूरी) आ दोसर ज्ञानक पुरस्कार। काजो दोसर जिनगी भरिक। पिताक चिन्तित मुद्रा देखि रातीर्थ पुछलखिन। पिता कहलखिन। पिताक बात सुनि रामतीर्थ कहलखिन। पिताक बात सुनि रामतीर्थ कहलखिन- ‘पिता जी, जहिना ओ (मौलवी सहाएव) हमरा ज्ञानक दूध पीबैक लेल देलनि तहिना हिनको दूध दइवाली बढ़िया गाय दऽ दिअनु।’ पिता सैह केलनि। ‘‘हरि अनंत हरि कथा अनंता’’ - तुलसी एक दिन भगवान बुद्ध आनंदक संग एकटा सघन बन स गुजरैत रहथि। रास्ता मे, दुनू गोटेक बीच ज्ञानक चर्चा चलैत रहनि। आनंद पूछलखिन- ‘देव, अपने तऽ ज्ञानक भंडार छिअए। अपने जे जनैत छी ओ हमरा बुझा देलहुँ?’ आनंदक बात सुनि उलटि कऽ बुद्धदेव पूछलखिन- ‘एहि जंगलक जमीन पर कते सुखल पत्ता पड़ल छै? हम जइ गाछक निच्चा मे ठाढ़ छी ओइ गाछ मे कते सुखल पात लागल छै? आ अपना सभक पाएरक निच्चा कते पड़ल छैक। सब मिला कते होएत?’ बुद्धदेवक प्रश्न स आनंद निरुत्तर भऽ गेलाह। आनंद कऽ उत्तर नहि दइत देखि तथागत कहलखिन- ‘ज्ञानक विस्तार ओते अछि जते एहि वन प्रदेश मे सुखल पातक परिवार। अखन धरि हमहूँ एतबे बुझलौ हेँ, जे जते वृक्षक उपर सुखल पात अछि। मुदा पाएरक निच्चा जे अछि ओ हमहूँ ने बुझै।’ 56.हँसैतलहास(मुरदा) जिनगी कऽ जिनगी बुझि मनुष्य कऽ जीबाक चाहिऐक। जँ से नहि भलि त जिनगीक कोनो महत्व नहि जायत। जे कियो जिनगी कऽ कमेनाइ-खेनाइ धरि रखैत, ओकर संस्कार मरलो पर ओहिना रहि जायत। एक दिन दू टा शव एक्के बेरि श्मशान पहुँचल। कठिआरीक लोक डाहैक ओरियान करै लगल। एकटा शव दोसर कऽ देखि ठहाका मारि हँसै लगल। हँसैत शव कऽ देखि दोसर शव पुछलक- ‘बंधु, ऐहन कोन बात भऽ गेल जे अहाँ हँसि रहल छी। जबकि दुनू गोटे एक्के स्थिति मे छी?’ हँसैत शव उत्तर देलक- ‘बंधु, अहाँ कऽ मन अछि की नाहि, मुदा हमरा त मन अछि। दुनू गोटे संगे गामक स्कूल मे पढ़ने रही। पढ़लाक वाद अहाँ वणिक वृत्ति मे लगि दिन-राति पाइयेक हिसाबो आ भोग-बिलास मे लगि गेलहुँ। आब अहाँक ओहन स्थिति भऽ गेलि अछि जे श्मशानो घाट पर पाइयेक हियाब आ भोगे-बिलासक गर लगबै छी।’ ‘आओर अहाँ’ - दोसर पूछलक। पहिल- ‘जाधरि जीवैत छलौ मस्त सऽ रहलौ। ने कहियो बेसी पाइक जरुरत भेलि आ ने तइ ले मन मे चिन्ता। जहिना चिन्ता मुक्त पहिने छलहुँ तहिना अखन छी। अच्छा आब ओहूँ जाउ आ हमहूँ जाइ छी। अछिया तैयार भऽ गेल। नमस्कार।’ कहि पहिल शव चिता दिशि बढ़ि गेल आ दोसर कनगुरिया ओंगरी पर हिसाब जोड़ै लगल। 57.अनगढ़चेतना ज्ञान (विद्या) अनगढ़ चित्त कऽ सुगढ़ बनबैत। जहि स सोचै आ चलैक दिशा निर्धारित होइत। ओना मनुष्यक अनगढ़ता त प्राप्त जन्मजात होइत। जहिना शरीरक रक्षाक लेल भेजनक प्रयोजन होइत तहिना मनुष्यता प्राम्त करैक लेल विद्याक। वशिष्ठ जी राम केँ, भयंकर वन मे विचरण करैवला उनमत्तक आखिक देखल कथा सुनवैत कहलखिन- ‘ओ (उनमत्त) देखै मे त निरोग (स्वस्थ) बुझि पड़ैत, मुदा ओकर जे क्रिया-कलाप होइत ओ विल्कुल पागलक सद्श्य होइत। सदिखन रास्ताक व्यतिक्रम करैत जहाँ-तहाँ बौआइलो घुमैत आ अन्ट-सन्ट रास्ता सेहो बनबैत। जहि स अपनो देह-हाथक नोकसान करैत आ काँट-कुश मे ओझराइलो रहैत। मुदा तइओ अपना कऽ बुद्धियार बुझि दोसराक नीको विचार कऽ मोजरो ने दइत। जहि स सदिखन भय, चिन्ता स मन त्रस्त रहैत। मुदा तइयो ने अधलाह रस्ता छोडै़त आ ने ककरो नीक करैत।’ वशिष्ठक विचार सुनि राम पूछलखिन- ‘भगवन! ओ उन्मादी कते रहैत अछि? ओकर नाओ की थिकैक आ ओकर कोनो उपचार छैक की नहि?’ वशिष्ठ- ‘वत्स, ओ कियो आन नहि, मनुष्यक अनगढ़ चेतना छी। जे जाल मे फँसल ओहि चिड़ैक सदृश्य अछि जे मरैक रास्ता देखि फड़फड़ाइत त अछि मुदा निकलैक रस्ते ने देखैत।’ 58.सत्य(विद्या) विद्याध्ययन साधना छी। जहि स अन्तः क्षेत्र शुद्ध आ पुरुषार्थक जन्म होइत। जकरा संपादित केने बिना मानव जीवनक सब उपलब्धि व्यर्थ। जिनगी भरि भरद्वाज मुनि तपस्या करैत रहलाह। जखन मरैक बेरि एलनि त देबदूत लेमए एलनि। देवदूत कऽ भारद्वाज मुनि कहलखिन- ‘हमरा अही लोक मे फेरि जनमै देल जाउ। स्वर्ग जा कऽ की करब?’ मुनिक बात सुनि, आश्चर्जित होइत देवदूत पूछलकनि- ‘तपक लक्ष्य त स्वर्ग प्राप्त करब होइत अछि, जे अहाँ कऽ भेटिये रहल अछि, तखन? भारद्वाज कहलखिन- ‘ज्ञान संचय आ पूर्ण सत्य तक पहुँचैक लेल। अखन हमर ज्ञान संपदा बहुत कम अछि। तेँ ओते जन्म धरि तपस्या करै चाहै छी जाधरि सत्य कऽ लग स नहि देखि सकियै। स्वर्ग स ज्ञान बहुत पैघ होइत अछि। स्वर्ग स सुविधा भेटैत जबकि ज्ञान स आनंद।’ 59.समता गुरुकुल मे जे विद्याध्ययन होइत ओ अमृत सदृष्य होइत। किऐक त ओ साध् ानाक नहि उच्च स्तरीय आदर्शक निर्माण करैत। एहि हेतु गुरुकुलक छात्र उपभोग कऽ नहि उपयोगक महत्व सत्-प्रयोजनक लेल अपन अगिला (भावी) दिशाधारा कऽ निर्धारित करैत अछि। एक दिन सम्पन्न घर स आयल छात्र गुरुकुल संचालक आत्रेय स पूछल- ‘भगवन! जे कियो अपना घर स नीक भोजन आ नीक वस्त्र मंगा सकै छथि ओ ओकर उपयोग किअए ने कऽ सकै छथि? ओहो किअए निर्धने परिवारक छात्र जेँका जीवन-यापन करथि?’ गंभीर मुद्रा मे आत्रेय कहलखिन- ‘छात्रो, श्रेष्ठ (उत्तम) मनुष्य जहि समाज मे रहैत छथि ओ ओहि समाजक अनुकूल जीवन-यापन करैत छथि। अइह (यैह) समता अपनो आ दोसरोक लेल सौजन्य उत्पन्न करैत अछि। सम्पन्नता प्रदर्शन ईष्र्या आ अहंकार कऽ उत्पन्न करैत अछि। जहि स विग्रहक जन्म होइत अछि। जे सहयोगक नींव कऽ डोला दइत अछि। विषमते स समाज मे कतेको (अनेको) विग्रह ठाढ़ होइत अछि। अपराध बढ़ैत अछि, जहि स अनाचारक जन्म सेहो होइत अछि। एहिठाम (गुरुकुल) समान जीवन जीवैक रास्ता सिखाओल जाइत अछि। धनिक अपन धन गरीब कऽ उठबै मे लगावह। नइ कि निजी सुविधा-संवद्धन मे।’ समताक दूरगामी सत्-परिणाम कऽ छात्र बुझि अधिक उपयोगक विचार कऽ बदलि लिअए। 60.जते चोट तते सक्कत कोशाम्बीक राजा शूरसेन स मंत्री भद्रक पुछलकनि- ‘राजन्, अपने श्रीमंत थिक। राकुमारक शिक्षाक लेल एक सय एक विद्वावन् रखि सकै छियै। तहन अपने एहि पुष्प सन बच्चा कऽ बन्य प्रदेश मे बनल गुरुकुल मे किऐक पठबैत छिअनि? जहि ठाम सुबिधाक घोर अभाव छैक। ऐहन कष्टमय जीबनचार्या मे बच्चा कऽ पठाएव उचित नहि?’ मंत्रीक विचार सुनि मुस्कुराइत शूरसेन उत्तर देलखिन- ‘हे भद्रक, जहिना आगि मे तपौला स सोना चमकैत तहिना कष्टपूर्ण जीवन चर्या स मनुष्य बनैत अछि। कष्टे मनुष्य कऽ धैर्य, साहस आ अनुभव दैत अछि। वातावरणक प्रभाव सबसँ बेसी नव उमेरक बच्चे पर अधिक पडै़त अछि। ऋृषि सम्पर्क आ कष्टमय जिनगी राजमहल मे थोड़े भेटि सकैत अछि। ऐठाम त हम ओकरा भोगिये-बिलासी बना सकै छी। जँ क्षणिक मोह मे पड़ब त ओकर भविष्ये चैपट्ट भऽ जेतइ। तेँ ओकर उज्जवल भविष्यक लेल गुरुकुल पठाएव उचित अछि।’ 61.परिष्कार गुरुकुल मे विद्याध्ययन सब जाति, सब वर्ण आ सब समुदायक लेल हितकारी अछि। अगर जँ किनको अपन पैत्रिके व्यवशाय करैक होइन, तिनको पैघ उपलब्धिक लेल संस्कारक शिक्षा देब अत्यन्त जरुरी अछि। एक गाम मे क्षत्रिय आ वैश्य रहैत छल। ब्राह्मणक बालक त गुरुकुल पढ़ै ले चलि गेलाह। दुनूक (क्षत्रियो आ वैश्योक) मन मे यैह जे हम योद्धा बनब त हम वणिक। अनेरे विद्याध्ययन मे समय किअए लगाएव। मुदा जखन कने असथिर भऽ सोचलक त अपना पर शंका जरुर भेलइ। मन मे खुट-खुटी उठल। मने-मन सोचलक जे से नहि त कुल पुरोहित स किअए ने पुछि लिअनि। दुनू जा कऽ पुरोहित स पुछलक। कुल पुरोहित उत्तर देलखिन- ‘ब्रह्मविद्याक तात्पर्य संयासी बनि भीख मांगव नहि होइत। ओ जीवनक अंतिम भग मे अधिकारी व्यक्तिक द्वारा ग्रहण कयल जायत छैक। ब्रह्मविद्याक तात्पर्य संयासी बनि भीख मांगव नहि होइत। ओ जीवनक अंतिम भाग मे अधिकारी व्यक्तिक द्वारा ग्रहण कयल जायत छैक। ब्रह्विमद्याक प्रयोजन गुण, कर्म, स्वभावक परिष्कार करब होइत छैक। जे सब स्तरक प्रगतिक लेल आवश्यक अछि।’ प्राचिनकाल मे गुरुकुल मे, कठिन स कठिन कार्यक भर छात्र केँ दइत जायत छल। जहि स भारी स भारी काज करैक अभ्यास छल। कुल पुरोहितक परामर्श मानि ओहो दुनू (क्षत्रिय और वैश्य) अपन-अपन बालक कऽ गुरुकुल भेजब शुरु केलक। गुरुकुल स अध्ययन कऽ लौटला पर ओहो अपना काज कऽ, बिनु अध्ययन केलहा स, अधिक सफल भेल। 62.कथनीनहिकरनी एकटा लोहार वाण (तीर) बनबैक विद्या मे निपुन छल। वाणो अद्भुत बनवैत छल। वाण बनबैक कला कऽ सीखैक लेल दोसर लोहार अबि पुछलक- ‘भाइ! तों कोना वाण बनबै छह। से हमरो कहह।’ पहिल लोहार जबाब देलक- ‘भाइ!, कहले टा स सब लूड़ि नै होइ छै। तेँ हम वाण बनवै छी, तू ध्यान स देखह।’ सुनि दोसर लोहार लग मे बैसि देखै लगल। तहि काल एकटा बरिआती बगलक रस्ता स गुजरै लगल। बरिआतियो खूब झमटगर। दर्जनो गाड़ी, रंग-बिरंगक बजो, सजाबटो सुन्दर। दोसर लोसर, बाण बनौनाइ देखब छोड़ि, बरिआती देखै लगल। जखन बरिआती आखिक अढ़ भऽ गेल, तखन ओ लोहार बाजल- ‘बड़ सुन्दर बरिआती छलै।’ वाण बनबैवला लोहार कहलक- ‘भाइ, ने तखन देखैक फुरसत छल आ ने अखन तोहर बात सुनैक अछि। जाधरि कोनो काज कऽ तत्परता स नहि कयल जायत ताधरि काजक सफलताक कोन आशा। तेँ जे काज तत्परता आ एकाग्रता स कयल जायत, ओइह काज सफल होएत।’ अफसोस करैत दोसर लोहार सोचै लगल जे एकाग्रताक अभ्यास करब सबसँ जरुरी अछि। जँ से नहि करब त जीवन मे कहियो कोनो काज मे सफल नहि होएब। ज्ञानक सूत्र कतौ स भेटए ओकर जरुर अंगीकार करक चाही। 63.श्ाालीनता विद्या व्यक्ति कऽ विनम्र बनबैत। ओकर अन्तरंगक स्तर कऽ उपर उठबैत। शिक्षा कतौ भेटि सकैत अछि मुदा विद्याक सूत्र कतौ-कतौ भेटैत अछि। जहि व्यक्ति कऽ विद्याक सूत्र भेटि जाइत ओहि व्यक्तिक काया-कल्प भऽ जायत। छान्दोग्य उपनिषदक छठम प्रपाठ मे उद्दालक आ श्वेतकेतुक संवाद अछि। विद्यालयक परीक्षा पास कऽ श्वेतकेतु आयल। मुदा ने ओकर आत्म परिष्कृत भेल आ ने उदंडता कमल। जहि स पिता (उद्दालक) केँ दुख भेलनि। खिसिया कऽ कहलखिन- ‘अगर व्यक्तित्व मे शालीनताक समावेश नहि भलि त अनेरे कियो किऐक पढ़ै मे समय नष्ट करत?’ महसूस करैत श्वेतकेतु कहलकनि- ‘अगर इ रहस्य जँ हमर शिक्षक जनितथि त जिनगी भरि शिक्षक जनितथि त जिनगी भरि शिक्षके किऐक रहितथि। आ वा त ऋृषि बनितथि वा द्रष्टा।’ श्वेतकेतुक विचार सुनि पिता मने-मन सोचै लगलथि जे पुत्रक प्रति पितोक दायित्व होइत। एकटा गुलरीक फड़ आनि उद्दालक फोड़लनि। गुलरीक तर (भीतर) मे छोट-छोट अनेको बीआ छलैक। ओहि बीआ कऽ देखबैत कहलखिन- ‘अहि नान्हि-नान्हि टा वीआक भीतर विशाल वृक्ष छिपल अछि। तहिना जेकरा आत्म-ज्ञान भऽ जाइत छैक ओ वृक्षे सदृश्य विकासो करैत आ फड़बो-फुलेबो करैत। तोहूँ ओहि तत्व कऽ चिन्हह।’ 64.मजूरी एक दिन गाड़ीक प्रतीक्षा मे लियो टाल्सटाय स्टेशन पर ठाढ़ रहथि। एकटा अमीर परिवारक महिला, साधारण आदमी बुझि, हुनका कहलकनि- ‘हमर पति सामनेवला होटल मे छथि। अहाँ जा क हुनका ई चिट्ठी द अबिअनु। एहि काजक लेल दू आना पाइ देब।’ चिट्ठी नेने टाल्सटाय होटल जा दऽ देलखिन। घुरि क आबि अपन कमेलहा दू आना पाइयो ल लेलनि। कने कालक बाद एकटा अमीर आदमी आबि, प्रणाम कऽ टाल्सटाय स गप-सप करै लगल। ओ आदमी हुनका स नम्रतापूर्वक गप्प करैत। गप-सपक क्रम मे ओ आदमी टाल्सटाय कऽ आदरसूचक शब्द ‘काउंट’ स सम्बोधित करति। बगल मे बैसलि ओ महिला सब कुछ देखैत-सुनैत। ओ महिला एक गोटे क पूछलक- ‘ई के छथि? ओ आदमी लियो टाल्सटायक नाम कहलखिन। टाल्सटइक नाम सुनि ओ महिला, टाल्सटाय लग आबि क्षमा मांगि अपन दुनू आना पाइ घुमा दइ ले कहलकनि। हँसैत टाल्सटाय उत्तर देल- ‘बहिन जी! ई हमर मजूरीक पाइ छी। एकरा हम किन्नहु नहि घुमाएव।’ 65.जीवन यात्रा गंगोत्री स गंगाजल धरती स बाहर निकलि चलि पड़ल। पहाड़ स नीचा आरो निच्चा होइत मैदान मे पहुँचल। एक गोटे एहि प्रक्रिया कऽ गंभीरता सऽ देखि रहल छल। आगू मुहे जल बढ़ैत गेल, बढ़ैत गेल। जहि मे अनेको जल-नद आबि-बाबि मिलैत गेल। जहि स एक विशाल नदी बनि गेल। ओ नदी जाइत-जाइत समुद्र मे मिलि गेल। जे व्यक्ति देखि रहल छल। ओहि व्यक्तिक मन मे भेल जे जलक इ मुरुखपना छी। किऐक त जे हिमालयक उच्च शिखर छोड़ि, अनेक प्रकारक दुख उठा, नोनगर पानि मे मिलल। एकरा मुरुखपना नै कहबै त की कहबै? ओहि व्यक्तिक मनः स्थिति कऽ नदी बुझिगेल। कहलक- ‘अहाँ हमर यात्राक मर्म नहि बुझि सकलहुँ। कतबो ऊँच हिमालय किअए ने हुअए मुदा ओ अपूर्ण अछि। पूर्णता त गहराई मे होइत छैक, जहि ठाम पहुँचला पर मनक सब कामना समाप्त भऽ जाइत छैक। हम हिमालय सन महान ऊँचाइक आत्मा छी जे पूर्णता पबैक लेल निरन्तर चलैत समुर्दक गहराइ मे पहुँचलहुँ। तेँ, हमरा बेहद खुशी अछि जे अप्पन लक्ष्य धरि पहुँच गेलहुँ।’ 66.ज्योति(प्रकाश) जनक आओर याज्ञवल्क्यक बीच ज्ञानक चरचा चलैत छल। जनक पुछलखिन- ‘सुर्यास्त भेला पर (सुर्य डुबला पर) अन्हारक सघन बन मे रास्ता कोना ढ़ूढ़ल जाय?’ जनकक प्रश्न सुनि, मुस्कुराइत याज्ञवल्क्य उत्तर देलखिन- ‘तरेगण रास्ता बता सकैत।’ याज्ञवल्क्यक उत्तर स असन्तुष्ठ होइत जनक पुछलखिन- ‘अगर मेघौन होय? संगे दीपकक प्रकाश सेहो नहि उपलब्धि होय, तखन?’ जनकक प्रश्नक गंभीरता कऽ बुझैत याज्ञवल्क्य कहलखिन- ‘अपना सुझि-बुझिक सहारा लेबाक चाही।’ विवेकक प्रकाश हर मनुष्य मे होइत। जे कहियो नइ बुझाइत। हे राजन, ओहि सुतल विवेक कऽ जगबे (जगायब) ऋृषि समुदायिक पवित्र कर्तव्य छी। 67.पवनक विवेक चन्द्रमा केँ दू सन्तान-एकटा बेटा आ एकटा बेटी। बेटाक नाओ पवन आ बेटी आँधी (अन्हर)। एक दिन बेटीक (आँधीक) मन मे उपकल जे पिता ज, सांसरिक पिता जेँका, हमरो दुनू भाइ-बहीनि मे भेदि करैत छथि। आँधीक व्यथा कऽ चन्द्रमा बुझि गेलखिन। बेटीक आत्मनिरीक्षणक लेल चन्द्रमा एकटा अवसर देवाक विचार केलनि। दुनू भाइ-बहीनि क बजा कहलखिन- ‘वाउ, अहाँ सभ, स्वर्गक इन्द्रक काननक परिजात नामक देववृक्ष केँ देखने छी?’ दुनू भाइ-बहीनि- ‘हँ।’ पिता- ‘अहाँ दुनू ओतए जाउ आ सात खेपि ओकर परिक्रमा कऽ कऽ आउ।’ पिताक आज्ञा मानि दुनू गोटे चलि देलक। आँधी हू-हू-आ कऽ दौड़ल। जहि स गरदा (धूल) खढ़-पात आ कूड़ा-कड़-कट उड़वैत लगले पहुँच, सात बेरि परिक्रमा क, चोट्टे घुरि क आबि गेल। मने-मन आँधी सोचैत जे हम्मर काज देखि पिता प्रशंसा करताह। पवन पाछु घुरि कऽ आयल। ओकरा संग सौंधी-सुगंध सेहो आयल। जहि स सौंसे घर गमकि उठल। मुस्कुराइत चन्द्रमा बेटी कऽ कहलखिन- ‘बेटी, अहाँ नीक जेँका बुझि गेल हेवइ जे जे अधिक तेज गति स चलत (दौड़िक) ओ खाली झोरा लऽ कऽ आओत, मुदा जे स्वाभाविक गति स चलत ओ मन कऽ मुग्ध करै वला सुगंध सेहो लाओत। जहि स सौंसे वातावरण सुगंधित होएत। वानप्रस्थक यात्रा पवन देवक सदृश्य उद्देश्यपूर्ण होइत। 68.आत्मबल जहि समय डाॅक्टर राधाकृष्णन कओलेज मे पढ़ति रहथि घटना ओहि समयक छी। काॅलेज मे पादरी शिक्षक (प्रोफेसर) अधिक। एक दिन एकटा प्रोफेसर क्लासे मे हिन्दू धर्मक निन्दा खुलायाम केलनि। बालक राधाकृष्णन सेहो क्लास मे रहथि। प्रोफेसरक बात स हुनका एते क्रोध भेलनि जे सम्हारि नहि सकलाह। उठि कऽ ठाढ़ होइत पुछलखिन- ‘महाशय, की ईसाई धर्म आन धर्मक निन्दा केनाइ सिखबैत अछि? राधाकृष्णन प्रश्न सुनि ओ तमसा कऽ बाजल- ‘आओर की हिन्दुधर्म दोसराक प्रशंसा करैत अछि? राधाकृष्णन जबाव देलखिन- ‘हँ, हम्मर धर्म ककरो (कोनो धर्मक) अधलाह नहि करैत अछि। गीता मे कृष्ण कहने छथिन जे कोनो देवता कऽ उपासना कयला स हमरे उपासना होइत अछि। आब अहीं कहू जे हम्मर धर्म ककर निन्दा करैत अछि।’ प्रोफेसर निरुत्तर भऽ गेल। 69.खुदीरामबोस स्वतंत्रता संग्रामक प्रखर सिपाही खुदीराम बोस केँ मुजफ्फरपुर जेल मे फाँसी भेलनि। जहि समय फाँसी भेलि ओहि समय खुदीरामक उम्र (वयस) मात्र अट्ठारह बर्ख आठ मासक छल। ओना हुनकर जन्म बंगाल मे भेलि छलनि मुदा ओ अपना कऽ भारत माताक बेटा बुझैत छलाह। हुनका पर अंग्रेज किंग फोर्डक हत्याक आरोप लगौल (लगाओल) गेल छलनि। ओ जेहने कर्मठ, तेहने हँसमुख छलाह। फाँसी स किछु समय पूर्व (पहिने) जेलर उदार पूर्वक आम आनि खाइ ले दैत (दइत) कहलकनि- ‘चुपचाप खा लिअ। कियो बुझए नहि।’ खुदीराम आम रखि लेलनि। साँझू पहर जखन दोहरा क जेलर आबि पुछलकनि तऽ ओ जबाव देलखिन- ‘जखन आइ फाँसिये होइवला अछि, त डर स किछु खाइ-पीबैक मन नै होइ अए। अहाँक आम ओहिना कोन मे राखल अछि।’ आमक गुद्दा खा कऽ बोस खोंइचा (छिलका) मे मुह स हवा भरि ओहिना रखि देने। कोन मे पहुँच जखन जेलर आम उठौलक त पचकि गेलइ। जहि पर जेलर भभा कऽ हँसल। जेलरक हँसी देखि खुदीरामो खूब जोर स हँसल। मृत्युक एक्को पाइ डर हुनका नहि छलनि। खुदीरामक फाँसीक चरचा, लोकमान्य तिलक अपन पत्रिका ‘केशरी’ मे ‘देशक दुर्भाग्य’ शीर्षक नाम स लेख लिखलनि। जहि पर हुनका (तिलक) छह मासक कारावास भेलनि। 70.गुरुकुल की? गुरुकुल मे विद्याध्ययन सब जाति सब वर्ण, आ सब समुदाइक लेल हितकारी अछि। अगर जँ किनको अपन पैतृक व्यवसाय दिशि बढ़ेवाक होइन तिनको लेल पैघ उपलब्धिक (श्रेष्ठ) लेल संस्कारक शिक्षण देव अत्यन्त अनिवार्य अछि। एकटा गाम मे क्षेत्रिय आ वैश्य रहैत छल। ब्राह्मणक बालक त गुरुकुल पढ़ै ले चलि गेलाह। दुनूक (क्षत्रियो आ वैश्योक) मन मे जे हम योद्धा बनब त हम वणिक अनेरे विद्याध्ययन मे समय किअए लगाएब। मुदा जखन कने स्थिर भऽ सोचलक त अपना पर शंका जरुर भेलइ। मन मे कने खुट-खुटी एलै। सोचलक जे कुल पुरोहित स किअए ने पुछि लिअनि। दुनू जा कऽ पुरोहित स पुछलकनि। कुल पुरोहित उत्तर देलखिन जे ब्रहमविद्याक तात्पर्य संयासी बनि भीखे मांगव नहि होइत छैक। ओ जीवनक अंतिम भाग मे अधिकारी व्यक्ति द्वारा ग्रहण कयल जाइत छैक। ब्रह्मविद्याक प्रयोजन-गुण कर्म, स्वभावक परिष्कार करब होइत छैक। जे सब स्तरक प्रगतिक लेल आवश्यक अछि। क्षत्रिय आ बैश्य जँ ओहि विद्या केँ ग्रहण करत त अपन-अपन जिनगीक कार्यक्षेत्र मे अधिक सफल आ सुन्दर ढ़ंग स सम्पादन करत।’ प्राचीनकाल मे गुरुकुल मे कठिन काज स छात्र केँ टकरायल जाइत छलै। जहि स भारी स भारी काज करैक अभ्यास बनि जाइत छलैक। कुल पुरोहितक परामर्श मानि ओहो दुनू अपन-अपन बालक कऽ, गुरुकुल भेजब शुरु केलक। गुरुकुल स पढ़ि अध्ययन कऽ लौटला पर ओहो अपना काज कऽ बिनु पढ़लक अपेक्षा अधिक सफल भेल। यैह कारण छल जे प्राचीनकाल मे समाजक सब समुदायक व्यक्ति अपना बच्चा कऽ गुरुकुल पढ़बैत छल। शिष्यकऽशिक्षेटानहिपरीक्षो। गुरुकुल मे इ अनिवार्य नहि जे नीक (आलीशान) मकानक बन्द कोठरिये टा मे शिक्षा देल जाय। अनिवार्य इ जे छात्रक मनः स्थितिक अनुरुप प्रकृतिक पाठशाला मे व्यवहारिक शिक्षा भेटइ। जहि स व्यक्तित्व मे प्रखरताक समावेश संवर्धन भऽ कऽ रहए। भऽ सकए। महर्षि जरत्कारुक गुरुकुल मे छात्र विद्रुध प्रवेश पौलक (पाऔलक)। किछुए दिनक उपरान्त विद्रुधक प्रतिभा स गुरु जरत्कारु प्रभावित होइत कहलखिन- ‘बाउ, पौरुषक (पुरुषत्वक) परीक्षा मे उतीर्ण भेले पर कियो बरिष्ठ (महान) बनि सकैत अछि। अहाँ पराक्रमक संग-संग पोथियो पढ़ू।’ महर्षिक परामर्श स सहमत होइत विद्रुध कहलकनि- ‘अपनेक जे आदेश होय, तैयार छी।’ विद्रुध कऽ एक सय गाय प्रभुदारण्य मे चरबैक आदेश दइत कहलखिन- ‘जखन हजार गाय भऽ जाय तखन घुरि कऽ आयब।’ पोथी सब सेहो लऽ लेलक। सय गाय कऽ हजार गाय बनवै मे विद्रुध कऽ बारह वर्ख लगल। बच्चो सब पुष्ट। किऐक त कोनो बच्चा कऽ दूध पीबै मे कोताही नै करैत। एहि बारह वर्खक बीच विद्रुध अनेको साधक, विद्वान सॅ सम्पर्क बना सीखवो केलक आ रास्ताक बाधा स सेहो निपटल। जहि स ओकर प्रतिभा मे आरो चारि चान लगि गेलइ। घुरि कऽ ऐला पर चेहरा स ब्रहमतेज टपकैत। किऐक त अपन बुइधिक प्रयोग स पढ़बो केलक आ बुझवो (सीखवो) केलक। विद्रुधक मेहनक आ साहस देखि जरत्कारु हृदय स आनन्दित होइत अपन आश्रमक भार दऽ नमहर काज करए अपने चलि गेलाह। 71.लौहपुरुष् इ घटना उन्नैस सय छियालिसिक छी। बम्बई बंदरगाह मे नौ-सैनिक विद्रोह केलक। अंग्रेज शासक ओकरा (नौ-सैनिक) गोलि स भुजि देवाक धमकी देलक। जेकरा जबाव मे भारतक नौ-सेना माटि मे मिला देब कहलक। स्थिति भयानक बनि गेल। पाछु हटै ले कियो तैयार नहि। ओहि समय सरदार वल्लभ भाइ पटेलक हाथ मे बम्बईक नेतृत्व छलनि। जनिका पर सब टकटकी लगौने। मुदा सरदार पटेलक मन मे एक्को मिसिया घबड़ाहट नहि। बम्बईक गवर्नर बजा कऽ मारे अन्ट-सन्ट कहलकनि। गवर्नरक बात सुनि, शेरक बोली सदृश्य गरजि कऽ सरदार पटेल उत्तर देलकनि- ‘ओ (गवर्नर) अपना सरकार स पुइछ लिअ जे अंग्रेज भारत स मित्र जेँका विदा होएत कि लाश बनि।’ अंगे्रज गवर्नर सरदार पटेलक जबाव स ठर्रा गेल। आखिर कार ओकरा समझौता करए पड़ल। ओइह सरदार पटेल स्वतंत्र भारतक पहिल गृहमंत्री बनलाह। कोनो आदमी मे साहस ओहिना नहि अबैत (बनैत)। पुरुषार्थक बल पर विकसित होइत। 72.जंगलागल एक बेरि भगवान वुद्धक समक्ष श्रेष्ठि पुत्र सुमंत आ श्रमिक पुत्र तरुण संगे प्रब्रज्या लेलक। दुनू गोटे भावनापूर्वक संघारामक अनुशासनक पालन करै लगल। किछु मासक (मासोपरान्त) प्रगतिक जानकारी दइत प्रधान भिक्षु (संघाराम) कहलकनि- ‘तरुणक अपेक्षा सुमंत अघिक स्वस्थ आ पढ़ल-लिखल अछि। भावनो प्रवल छैक। मुदा सौंपल गेल काज आ साधनोक (साधन) उपलब्धि तरुण मे सुमंतक अपेक्षा अधिक अछि। जेकर कारण वुझि मे नइ अबैत अछि।’ संधारामक विचार सुनि तथागत (बुद्ध) कहलखिन- ‘अखन सुमंत जंग लागल लोहाक औजार सदृश्य अछि। जंग छुटै मे किछु समय लागत।’ तथागतक बात संघाराम नीक-नाहाँति नहि बुझि सकल। तेँ प्रश्न वाचक नजरि स नजरि मिला बकर-बकर मुह दिशि तकैत रहलनि। स्पष्ट करैत बुद्ध कहलखिन- ओकर (सुमंतक नमहर) अधिक समय आलस्य आ प्रमाद मे बीतल अछि। जहि स व्यक्तित्व जंग लागल औजार सदृश्य भऽ गेल अछि। जबकि तरुण ऐहन उपकरण अछि जकरा मे जंग छूबो ने केलक अछि। तेँ, लगले फल पाबि रहल अछि। सुमंतक जंग छोड़बै मे पर्याप्त समय आ साधना लागत। तखन जा कऽ अभीष्ट फल निकलत।’ 73.जीवकक परीक्षा आदर्श शिक्षक सिर्फ अध्ययने नहि छात्र कऽ ओहि विद्या मे ऐहन पारंगत बना दइत, जहि स ओ स्वर्ण (सोन) बनि चमकि उठैत। तक्षशिला विश्वविद्यालय मे सात वर्ख आयुर्वेदक खिक्षा पाबि आचार्य वृहस्पति जीवकक परीक्षा लऽ कऽ विदा करैक समय निकालनि। समय निकालि गुरु (वृहस्पति) जीवक कऽ हाथ मे खुरपी दइत कहलखिन- ‘एक योजनक बीच एकटा ऐहन पौघा (बनस्पतिक) उपाड़ि (उखाड़ि) कऽ नेने आउ जेकर औषधि नहि बनैत होय।’ खुरपी लऽ जीवक विदा भेल। मास दिन घुमैत रहल मुदा एक्को टा ऐहन गाछ नहि भेटिलइ (भेटिलै) जेकर औषधि नहि बनैत होय। मास दिनक उपरान्त जीवक घुमि कऽ आबि कहलकनि- ‘गुरुदेव! हमरा एक्कोटा ऐहेन गाछ नहि भेटल जेकर औषधि नहि बनैत होय।’ जीवक केँ गरदनि लगवैत वृहस्पति कहलखिन- ‘वत्स! अहाँ सफल भेलहुँ। आब अहाँ जाउ, आयुर्वेदक प्रचार करु।’ 74.तप(साधना) श्रमे (मेहनत) ओ देवता छी जे सब सिद्धिक स्वामी छी। आयुष्य कऽ पूर्वाद्धे (पुवार्धे) मे एकर सम्पादनक लेल विधाता मनुष्य केँ शक्ति सम्पन्न बना दइत छथिन। जखन एकर (श्रमक) उपेक्षा होइत तखने समाज अव्यवस्थित हुअए लगैत। राजा विड़ाल मुनि वैवस्वत कऽ प्रणाम कऽ चुपचाप बैसि गेलाह। सूक्ष्मदर्शी गुरु (वैवस्वत) बुझि गेलखिन जे कोनो गंभीर चिन्ता मे विड़ाल पड़़ल छथि। पुछलखिन- ‘विड़ाल, आइ अहाँ अशान्त जेँका बुझि पड़ै छी। कथीक चिन्ता अछि से हमरो कहू?’ अपन अन्तर्वेदना कऽ प्रगट करैत विड़ाल कहलखिन- ‘देव, नहि जानि किऐक प्रजाजन अशान्त छथि। सब कियो धर्म आ शान्ति स विमुख भेल जा रहल छथि। जहि स धन-धान्यक अभाव आ प्रेम-भाव टुटि रहल अछि। अपराध वृत्ति बढ़ि रहल अछि।’ विड़ालक विचार ध्यान स सुनि वैवस्वत कहलखिन- ‘जहि देश मे लोक मेहनत स जी (देह) चोराओत, श्रम कऽ सम्मान जनक स्थान नहि देत, ओहि ठाम कोना समृद्धि भऽ सकैत अछि।’ श्रम ओहन तप छी जहि स समाजक सब दोष मेटा जाइत अछि। तेँ, श्रम कऽ साधना बुझि सभकेँ एहि मे लगि जेवाक चाही। जहि परिवार समाज आ देश मे श्रम कऽ जते महत्व देल जायत, ओ ओते उन्नति करत।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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