Monday, September 07, 2009

की हमरा लोकनि सभ्य नहि होयबाक लेल अभिशप्त छी?

मैथिलेतर समाज मे भाषा आ संस्कृति एकटा एहेन सूत्र रूप मे ख्यात रहल अछि जे जाति, धर्म आ भौगोलिक देबाल केँ अर्थहीन बना देलक। हमरा देशक बगल मे बांग्लादेशक उदय एहि बातक प्रमाण अछि, जतए भाषा-संस्कृतिक प्रति प्रेम धर्म आ जाति सँ ऊपर साबित भेल। तहिना कइक टा मलयालम भाषी ईसाई आ मुसलमान आ हिंदू मित्र सब सँ भेंट भेल अछि जिनका लेल भाषा-संस्कृति सं बढ़ि कए और किछु नहि अछि। मुदा से मिथिलाक नाम पर कार्यक्रम कयनिहार, संस्कृतिक व्यापार कयनिहार आ भाषाक नाम पर भावनाक दोहन कयनिहार मैथिल सब एको रत्ती नहि बुझाइत अछि. हमरा लोकनि जहिना-जहिना सभ्य, सुशिक्षित आ आर्थिक रूप से नीक भेल जाइत छथि तहिना, तहिना मध्यकालीन मानसिकता आ जातिवादक रोगाह विषाणु सँ ग्रसित भेल जाइत छी?

काल्हि दिल्ली केर एलटीजी सभागार मे आयोजित कार्यक्रम मे जातिवादक एतेक घिनौन आ निर्लज्ज प्रदर्शन देखलहुं, जकरा बाद एहि तरहक तथाकथित सांस्कृतिक कार्यक्रम सब मे जयबाक कोनो उत्साह संभवतः आब भविष्य मे नहि होयत. मिथिलांगनक नाम पर जाहि अश्लील ढंग सँ ओहिठाम कायस्थांगन केर प्रर्दशन चलि रहल छल, से अत्यंत निराशाजनक छल। एहि संस्था केर पत्रिका, वेबसाइट सब ठाम लालदास, लाभ, मल्लिक, दास आ कर्ण जीक अलावा और कोनो जी नामो लेबाक लेल नहि छलाह। मंच पर होइत उदघोषणाक अनुसार मैथिली मे मात्र दू गोट साहित्यकार गणनीय छथि-ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्म आ श्रीमती शेफालिका वर्मा। एकर अलावा जँ जातियो धरि ओ सीमित रहितथि तँ हुनका उपेन्द्र दोषी, सोमदेव आ रमानंद रेणु मोन पड़ितथिन, मुदा सेहो नहि। ई कोन तरहक मानसिकता अछि जे मिथिला-मैथिलीक नाम पर एहेन-एहेन काज अत्यंत निर्लज्जतापूर्वक करैत अछि?

अत्यंत दुखक बात अछि कि हमरा लोकनि कायस्थ बनबाक लेल उताहुल छी, सोति बनबाक लेल अपस्यांत छी, ब्राह्मणत्व रक्षा लेल चिंतित छी आ संस्कृतिक नाम पर जातिवादि अस्मिताक खतरनाक खेल मे निमग्न छी. की एहि सब चीज के छोड़ि केँ मात्र मैथिल नहि भ सकैत छी हमरा लोकनि?

एहिना कोलकाता सँ एकटा पत्रिका बहराइत अछि-कर्णामृत। भगवानक चंद्रामृतक तर्ज पर कर्ण लोकिनक कर्णामृत। जा हे मैथिल। मिथिलामृत निकलितए तँ एकटा सार्थक बात होइतए। प्रशंसनीय काज होयतै, मुदा जातिक कट्टरता से थोड़े बुझैत छैक। ओ तँ जेना होयत तहिना स्वयं केँ सर्वश्रेष्ठ घोषित करबाक लेल, जातीय आत्मश्लाघा केर प्रदर्शन लेल कर्णामृत प्रकाशित करबै करत. काल्हि मिथिलांगनक स्टेज पर नामो लेबाक लेल एक्को गोटे कायस्थ छोड़ि आन क्यो जँ रहितथि तँ बुझितहु जे वास्तव मे मिथिला आ मैथिलीक लेल कोनो संस्था दिल्ली मे अलख जगा रहल अछि. मुदा से नहि भ रहल अछि. एतेक दिन मैथिलीक छाती पर मिथिलाक ब्राह्मण लोकनि (विशेष क कए दरभंगा-मधुबनी केर आ ओहो ठाम सोति बेशी) सवार रहलाह आ आब कायस्थ लोकनि ताहि लेल अश्वमेधक घोड़ा छोड़लनि अछि। एहि सँ जँ मैथिली भाषा बांचि गेल तँ बुझु जे गरीब आ देहातक आम जनता बड्ड जिद्दी छथि-जनिका दम पर भाषा बचल अछि। अन्यथा दिल्ली मे एहेन मैथिल परिवार बहुत कम अछि, जकर नेना मैथिली मे गप करए-व्याकरणहीन आ उच्चारणदोष सँ भरल हिंदीये टा मे जवाब भेटत।

5 comments:

  1. काल्हि हमहूं गेल रही मिथिलागंन के नाटक देखय लेल, आ ई बात हमरो अनुभव भेल। कुल मिलाकय एकटा बात तय अछि जे भाषा आ संस्कृति के नाम पर कयक टा गिद्ध मैथिली के लूटय में लागल अछि। ई जतेक संस्था रजिस्टर्ड के नाम सं अभरैत अछि सबटा सरकारी ग्रांट लयके पारिवारिक आ जातीय गिरोह थीक-मिथिलांगन के काल्हुका प्रदर्शन सं एतबे स्पष्ट होईत अछि। हमरा मैथिली के लेल काज करय बला दोसर संस्था सबके अनभव नहि अछि, लेकिन चेतना समिति के बारे में जतेक आलोचना सुनने रहियैक ओकरा एकटा दोसर रुप में मिथिलांगन दोहरौलक अछि।

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  2. नीक बिखय उठाओल, मुदा गँहीर धरि जएबाक जरुरति छल ताहि मे अपने संभवतः असफल छी एहि लेख मे। ब्राह्मणक सभा मे ब्राह्मणक
    आ कायस्थक सभा मे कायस्थ नहि रहतै तँ के रहतै यात्री आ राजकमल । मुदा कने बिलमू आ सोचू सभे-संस्था धरि इ गप्प नहि छैक,
    जँ कोनो दरभंगा बला सँ पुछबै जे मैथिलीक महान साहित्यकार के? तँ ओ तुरंत कहता जे सुमन जी तहिना सहरसा-सुपौल बला के ई प्रश्न पुछबै तँ जबाब भेटत किसुन जी । हमर ई उदाहरण जातीय कट्टरताक उदाहरण भने नहि हुअए मुदा भौगिलिक कट्टरताक इ अन्यतम उदाहरण होयत। कनेक आर गँहीर मे जेबैक त भेटत जे दरभंगा बेस पत्रिका सहरसा-सुपौलक सहित्यकार के बेसी जगह नहि दैत छैक त सहरसा-सुपौलक पत्रकिका सेहो दरभंगाबला के बारि राखैत छथि। भाइ साहेब हमर आग्रह जे कनेक एहू पर विचार करिऔ। गँहीर मे गेले सँ कोनो ठोस निष्पति भेटत।

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  3. हां से तऽ सच !
    कष्ट हॊइत छैक
    जातिक फांस मे ओझरायल
    कुहरैत-छटपटाइत लॊक कें देख कऽ

    मुदा जेकर जेहन भावना !

    कऽ तऽ रहल छथि ओहॊ रचनात्मके काज
    ई रचनात्मकता हुनका किछु न किछु इजॊत तऽ प्रदान करबे करतह्नि
    एहन अपसंस्कृति देख एतबा जरूर करी जे
    व्यक्तिगत स्तर पर हम सब संकल्प ली
    जे हम जीवनक कॊनॊ ठाम-कुठाम
    जातीयताक फांस मे नहि फंसब !

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  4. Want to read, but unable to read as after school, not in touch with Sanskrit. Feel sorry for that.

    Want to study Sanskrit again. Is in Internet, sanskrit learning materials are available, if yes, please send the link by e-mail.

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  5. MANAV MISHRA1:04 PM

    pankaj jee 'karnamritak' sandarbh me anhank tippani aneruak thik. karnamrit maithili bhasha aa sahitya ke samarpit nirvivad patrika thik.ki 'the hindu'-(angreji akhbar) apan dharm suchak naamak vajah san aprasangik bhai gelaik? ona kayasth sabhhak maithili sahityak prati yogdan ke kyo jhutha nahi sakait achhi.jan kono sansthak soochi me khalis brahmanak badla khalis kayasthak naam bheti jai ta chhagunta nahi lagbak chhahi.Manipadma aa shephalika dono gotek sahityak abdan shreshtha achhi. jan hunak naam sabsan paigh manal gelain ta brahman hebak karne ahanka kharab lagai gel. uchit hoyate jan ahan ahi tippani ke alochnatmak mani apan gambhir alochnak madhyame apan paksha raikhtie.ohino maithili sahitya ke santulit alochna ker darkar chhaik. jativadi jhagra san mukt rahal maithili sahitya me anerok agi lagebak prayas nahi kari. charcha me rahbak lel kurafati karba san bachbak chahi.

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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