Saturday, September 12, 2009

पेटार ३१

जगदीश प्रसाद मंडल


86.रिक्शावला ‘ओरिक्शा,ओरिक्शा।’कनेफड़िक्केस जीबछ जोर स बाजल।हाथमेबम्बैयाबैग, जिन्सपेन्टआशर्टपहीरिने,दहिनाहाथमे चैड़गरघड़ी।फुलजुत्ता,मौजासेहोलगौने। बम्बैयेहिप्पीकटकेश,बुच्चामौछआआखि पर चश्मा। बचनू (रिक्शावला) अपन संगीक (ताशकसंगी)संगताशखेलाइत।ताशो वहिनानहिखेलैत,एकसेठपर,चारुगोटेक चाह-पान खर्च, हरलाहा पार्टी कऽ देमए पड़ैत।पाँचटालालबचनूकजोड़ाकऽ।तेँ एक्के टा सेठ होइ मे बाकी। एकटा लाल हैत, चाह-पानक जोगार लगत। तेँ एकाग्र भऽबचनूलालकपाछुदिमागलगौने।ताशक चैखड़ीलगआबिजीवछदुइभेपरबैगरखि रुमाल स मुह लग हौंकए लगल। कने काल हौंकिरिक्शावलाकऽचड़िअबैतकहलक-‘हौ भाइ, हमरा बहुत दूर जाइक अछि, झब दे चलह?’ ताश पर स नजरि उठा, जीबछ दिशि देखि,बचनूबाजल-‘भाइ,केहेनसुन्दरठंढ़ा छै,कनीसुसतालाय।तोरोदेखइछिअहजे पसीनासेतड़-बत्तरभेलिछह।हमरोएक्के टा लालबाकीअछि, दू-तीनखेपमे भइये जायत। अगर जँ अपन लाल नहियो हैत आ विरोधिये(दोसरपार्टीक)केदूटाकारीभऽ जेतइ,तइओजीतहेबेकरत। बचनूक बात सुनि जीबछ शर्टो आ गंजिओनिकालिकऽरौदमेपसारिदेलक। आसीन मास। तीख रौद। तइ पर स गुमकी सेहो।रेलबेस्टेशनसऽजीबछपाएरेआयल। किऐक त स्टेशनक बगले मे तेहेन खच्चा, बाढ़िमे,बनिगेलजेरिक्शोआटमटमोक रास्ताबन्नभऽगेलईपाएरेलोककहुनाकऽ थाल-पानिमेटपैत।बाढ़िततेहेनआयल छल जे जँ स्टेशन ऊँचगर जमीन पर नहि रहैत त ओहो भसि कऽ कतऽ-कहाँ चलि जायत।मुदातइओस्टेशनकपूबरियागुमती, पुलआआधकिलोमीटररेलबेलाइनदहाइये गेल।रेलवेकदछिनतेहेनमोइनफोड़िदेलक जेगाड़िओबन्नभऽगेल।डेढ़मासमेपुलो बनलआगाड़ियोचलबशुरुभेल। गाम मे रिक्शा बचनुए टा कऽ। जहि सकोनोतरहकप्रतियोगितानहि।प्रतियोगिता त शहर-बजार मे होइत, जहि ठाम सैकड़ो-हजारो रिक्शा रहैत। अनेरो रिक्शाबला सब रिक्शा पर बैसि, इमहर स उमहर (ओमहर) घुमबैत आ बजैत- ‘कोट-कचहरी......बैंक.......पोस्टआॅफिस...... कओलेज....स्कूल.....स्टेशन.....बसस्टेण्ड..... अस्पताल....बड़ाबजार.....सिनेमाचैक...... डाकबंगला.....भगतसिंहचैक.....आजादचैक।’ मुदासेतगाममेनहि।मुदातेँकि गामक रिक्शावला कऽ कमाइ नहि होइत। खूब होइत। एक त गामक कच्ची रास्ता, तइ परसजहाँ-तहाँटूटलोआगहूमपटौनिहार सब कटनौ। ऐहेन सड़क मे दोसर कोन इंजनवला सवारी सकत। तेँ गामक सवारी रिक्शा।जहिसगामकबेटी-पुतोहूकविदागरी निमहैत। धन्यवाद त रिक्शेवला कऽ दी जे वेचारा छाती पर भार उठा, कखनो चढ़ि कऽ त कखनो उतड़ि कऽ पार लगबैत। कठिन मेहनतक पाइ कमाइत। अखन धरि ताशक खेल नहि फड़िआइल। किऐक त कखनो लाल कमि जाय त कखनो कारी। अगुताइत जीबछ बाजल-‘भाइ,ताशनैफड़िऐतह।बहुतदुरस्त जाइ के अछि। झब दे चलह। नइ ते अन्हार भेनेतोरोदिक्कतहेतहआहमरोअबेरभऽ जायत।कहुना-कहुनातेऐठामसेसुग्गापट्टी पाँचकोसहैत।’ बचनू-‘हँ,सेतेपाँचकोससेकमनहिये हैत।मुदातइसेकी?इकीकोनोशहर-बजार छियैजेराइतिककोनबातजेदिनेदेखार पौकेटमारी, डकैती, अपहरण होइ छै। ने रस्तामेभीड़-भड़क्का आ नेकोनो चीजक डर। निचेन से जायब।’ गामक बीच मे चैबट्टी। जहि ठाम पान-सात टा छोट-छोट दोकान। जहि स गामोक आ आनो गामक लोक चैक कहै लगल। चैकक पछबरिया कोन पर एकटा खूब झमटगर पाखरिक गाछ। जहि पर हजारो चिड़ैक खेंता। दिन भरि चिड़ै सब चराउर करै बाहर जाइत आ गोसाइ निच्चा होइतहि पतिआनी लगा-लगा गाछ पर अबै लगैत। कतेको रंगक चिड़ै, तेँ सब जातिक चिड़ै अपन-अपन संगोर बना-बना अबैत। ततबे नहि, गाछक डारियो बाँटि नेने अछि। एक जाइतिक चिड़ै एक डरि पर खेंता बनौने अछि। तेँ एक जाइतिक चिड़ै स दोसर जाइतिक चिड़ैक बीच ने कहा-कही होइत आ ने झगड़ा-झंझट। मुदा अपना मे (एक जाइतिक बीच) नीक-अधलाक गप-सप जरुर होइत। कथा-कुटुमैती स ल कऽ रामायण-महाभारतक किस्सा-पिहानी जरुर होइत। पान-पुनक चरचा सेहो करैत। अधला काज केनिहार कऽ डाँटो-फटकार दइत आ जुरिमनो करैत। ओहि गाछक निच्चा मे बाटो-बटोही, रौद मे, ठंढ़ाइत आ पाइन-बुनी मेसेहो जान बँचबैत। ताशक चैखड़ीसेहोजमैत। बचनुक बात सुनि जीबछ पेन्टक पैछला पौकेट स सिगरेटक डिब्बा आ सलाइ निकाललक। एकटा सिगरेट अपनो लेलक आ एकटा बचनुओ कऽ देलक। दुनू गोटे सिगरेट लगा, रिक्शा पर चढ़ि विदा भेल। कनिये आगू बढ़ल कि बचनू जीबछ कऽ पूछलक- ‘भाइ तूबम्बैमेरहै छह?’ ‘हँ’ ‘मन ते हमरो बहु दिन से होइ अए मुदा पलखतियेनेहोइ अए जेजायब। ओइ ठीन मन त खूब लगैत हेतह?’ ‘एँेह, भाइ मन। की कहबह? जखैनिये डेरा से निकलबह कि रंग-बिरंगक छौड़ी सब के’ देखबहक। उमेरगरो सब जे कपड़ा लगौने रहतह से देखबहक ते बुझि पड़तह जे कुमारिये अछि। मुदा छउरो सब कि ओइ से कम अछि। एक त वहिना जे, छउरी सब दामी-दामी कपड़ा पीहीनने अछि आ सैाँसे देह झक-झक करै छै। तइ पर से छउरो सब करिक्का चश्मा पीहीन लेतह आ निग्हारि-निग्हारि देखैत रहतह। चश्मो कि कोनो एक्की-दुक्की रहै छै। जखैनिये आखि मे लगेबह कि देह पर कपड़ा बुझिये ने पड़तह।’ ‘ओहन चश्मा हमरा सब दिशि कहाँ छै, हौ।’ ‘ऐँह, ओइ ठीन विदेशी चश्मा सब बिकाइ छै कि ने। देहात मे ओहन चश्मा के कीनत।’ चैक स कनिये उत्तर एकटा ताड़ी दोकान। चारि-पाँच कट्ठाक खजुर बोनी। बीच-बीच मे ताड़क गाछ सेहो। उत्तर-दछिने रास्ता। पछबारि भाग ताड़ीक दोकान। ताड़ीक दोकान देखि जीबछ बचनुक पीठि मे आगुर स इशारा करैत रोकै ले कहलक। बचनुक मन मे भेलइ जे भरिसक पेशाब करत। रिक्शा रोकि उतड़ि गेल। जीबछ बाजल- ‘भाइ, ताड़ी दोकान देखै छियै। चलह दूघोट पीबि लेब, तखन चलब। हमही पाइयो देबइ।’ ताड़ीक नाम सुनि बचनू कहलक- ‘ओना ताड़ी हमहूँ पीबै छी, मुदा ताड़ी पीबि के ने रिक्शा चलबै छी आ नेताड़ी पीनिहार के रिक्शा पर चढ़बै छी। तेँ अखैन ताड़ी-दारु बन्न करह। जखैन घर पर पहुँचबह तखैन जे मन हुअह से करिहह।’ ‘भाइ, ओत’ भेटत की नै भेटत, अखैन ते आगूमेअछि।’‘तब अखैन नै जाह। ताड़ी कीनि क नेने चलह। गामे पर दुनू गोटे पीबि लेब आ राइत मे रहि जइहह।’ ‘अइठीन कत-अ रहब?’ ‘से की हमरा घर-दुआर नै अछि। ओतइ रहि कऽ राति बीता लिहह। भोरे पहुँचादेबह।’ ‘अच्छा, ठीक छै, चहल।’ दुनू गोटे ताड़ी दोकान दिशि बढ़ल। दोकान लग पहुँचते जीबछ घैलक-घैल ताड़ी फेनाइत देखलक। घैलक पतिआनी देखि मने-मन सोचै लगल जे हमरा होइ छले जे शहरे-बजारक लोक ताड़ी पीबै अए। मुदा से नहि गामो-घरक लोक खूब पीबै अए। पच्चीस-तीस गोटे दोकानक भीतरो आ बाहरो ताड़क पातक चटाई पर बैसि ताड़िओ पीबैत आ चखनो खाइत। कियो-कियो असकरे पीबैत त कियो-कियो दू-दू, तीनि-तीनि, चारि-चारि गोटेक संगोर मे। कियो खिस्सा कहैत त कियो गीति गबैत। कियो अन्हागाहिस गारियो पढ़ैत। सब उमंग मे। जहिना ताड़ीक फेन उधिआइत तहिना सबहक मन। ताड़ीक खटाइन गंध लगिते जीबछ के होय जे कखैन दूगिलास चढ़ा दिअइ। ताड़ी दोकान स कने हटि दू टा बुढ़िया चखनाक दोकान पसारने। एकटा दोकान मे मुरही, घुघनी (बदामक) कचड़ी आ दोसर मे चारि पाँच रंगक माछक तरुआ। आंगुरक (ओग्रिक) इशारा स मझोलका घैल (डाबा) देखबैत जीबछ बचनू कऽ कहलक- ‘भाइ, दुइये गोरे पीनिहार छी, तेँ ओइह डाबा लऽ लाय।’ बचनू- ‘पहिने दाम पूछि लहक?’ डाबाक कान पकड़ि जीबछ पासी (दोकानदार) कऽ दाम पूछलक। तोड़-जोड़ करैत पेंइतीस रुपैया मे पटि गेलइ। पेन्टक जेबी स नमरी निकालि ओ (जीबछ) दोकानदार कऽ देलक। नमरी पकड़ैत दोकानदार कहलकै- ‘तड़िये टा कऽ दाम कटै छिअह। डाबा घुरा दिहह।’ ‘बड़बढ़ियाँ’ कहि बचनू डाबा उठा लेलक। डाबा कऽ चखना दोकानक आगू मे रखि बचनू मने-मन सोचै लगल जे औझुका त कमाइओ ने भेल। धिया-पूता की खायत? से नइ त तना कऽ मुरही-कचड़ी कीनि ली ज सब तुर खायब। जेहने झुर क कऽ कचड़ी बनौने तेहने माछक कुट्टिया। एकदम लाल-बून्द। माछक कुट्टिया देखि जीबछ क मुह मे पानि अबै लगल। मन चट-पट करै लगलै। बचनू कऽ कहलक- ‘भाइ, कते चखना लेबह?’ मने-मन बचनू हिसाब जोड़ै लगल। दू-दू टा कचड़ी आ दू-दू टा माछ दुनू बच्चा ले आ अपना सब ले चारि-चारि टा। किऐक त गरम चीज होइ छै, तेँ बेसी खराब करतै। बाजल- ‘भाइ, एक किलो मुरही, एक किलो घुघनी, सोलह टा कचड़ी आ सोलह टा माछक कुट्टिया लऽ लाय। सैह केलक। ताड़ीक डाबा उठा जीबछ विदा भेल। रिक्शाा लग आबि बचनू चखनाक मोटरी सेहो जीबछे कऽ दऽदेलक। चैकक रस्ता छोड़ि बचनू घर परक रस्ता धेलक। लगे मे घर। दुइये टा घर बचनू कऽ। रिक्शा रखै ले एकचारी भनसेघरक पँजरामेदेने। एकटा घर मेभानसो करै आ जरनो-काठी रखै। दोसर मे सबतुर सुतबो करै आ चीजो-बौस रखै। अपना दरबज्जा नहि। मुदा घरक आगू मेधुर दसेक परती, जइ पर सरकारी चबूतरा बनल। घर लग अबिते बचनू रिक्शा ठाढ़ कऽ आंगन बारहनि (बाढ़नि) अनै गेल। बचनू कऽ देखि घरवाली कहलकै- ‘आइ जे भाड़ा नै कमेलौ, ते राइत खैब की? अपने दुनू गोरे ते ओहुना सुति रहब मुदा बच्चा सब कना रहत?’ बिना किछु उत्तर देनहि बचनू बारहनि लऽ अंगना स निकलि गेल। चबुतरा कऽ देहरा कऽ बहारलक। चबुतराक बनाबट सुन्दर, तेँ बहारितहि चमकै लगल। चबुतराक चमकी देखि जीबछ बाजल- ‘भाइ, जेहने मजगूत चबुतरा छह तेहने सुन्दर। संगमरमर जेँका चमकै छह।’ जीबछक बात सुनि बचनुकऽ ओ दिन मनपड़लै जइ दिन ओ ठीकेदार कऽ गरिऔने रहए। मुस्कुराइत कहलकै- ‘भाइ, ओहिना ऐहेन सुन्दर बनल अछि। जे ठीकेदार बनबाबैक ठीकेदारी नेने रहए ओ नमरी चोर। तीन नम्बर ईंटा आ कोसीकातक बाउल स बनवै चहैत रहए। हम गाम पर नै रही। जखैन एलौ ते देखलियै। देखिते सौँसे देह आगि लगि गेल। मुदा ऐठाम रहए क्यो ने। दोसर दिन नाओ कोडै़ ठीकेदारो आ जनो एलै। हमरा तगरमी चढ़ले रहै। जखने कोदारि लगौलक कि जनक हाथ से कोदरि छीनि ठीकेदार के गरिअबै लगलौ। जहाँ गारि पढ़लियै कि ठीकेदारो गहूमन साप जेँका हुहुआ कऽ उठल। जहाँ ओ जोर स बाजल कि हमहूँ गरिअबिते दुनू हाथे कोदारिक बेंट पकड़ि कहलियै, सार नाओ (नौ) लइ से पहिने तोरे काटि देबह। मुदा सब पकड़ि लेलक। डरे ठीकेदारो थर-थर कपै लगल। तखन जा कऽ एक नम्मर सब कुछ (ईंटा, सीमटी, बालु) आनि बनौलक। ‘जीबछ- ‘बाह।’ बचनू- ‘कनी उपर आबि कऽ देखहक जे की सब बनबौने छी। देखहक इ पच्चीसी घर (खेलाइ ले) छी, कौड़ी से खेलाइल जाइ अए। मुदा इ खेल समैया छी। एकर चलती सिर्फ आसिने टा मेरहै अए। कोजगरा दिन तलोक भरि राइत खेलते रहै अए। (दोसर कऽ देखबैत) इ मुगल पैठानक घर छी। हमरा गाम (अइ गाम) मे लोक एकरा मुगल-पैठान कहै छै मुदा आन-आन गाम मे एकरा कौआ-ठुट्ठी कहै छै। गोटी से खेलाइल जाइ अए। (तेसर घर देखबैत) इ बच्चा सभक छियै। एकरा चैरखी-चैरखी घर कहै अए। झुटका से खेलल जाइ अए।’ जीबछ- हौ भाइ, तू ते बड़ खेलौड़िया बुझि पड़ै छह।’ बचनू- ‘हौ, जिनगी मे आउर छै की? खाइत-पीबैत, हँसी-चैल करैत बीता ली। सब दिन कमेनाइ, सब दिन खेनाइ। कोनो हर-हर, खट-खट नै। धिया-पूता ले तेहम अपने इस्कूल खोलि देने छियै। खेती-पथारीक काज स ल कऽ रिक्शा चलौनाइ, ईंटा बनौनाइ सब लूरि हमरा अछि। धिया-पूता तेदेखिये के सीखि लेत।’ ओना जीबछ बचनुक गप सुनैत, मुदा मन ताड़ीक खटाइन गंध पर अँटकल। होइ जे कखन दू गिलास चढ़ाएब। नै त कम स कम आंगुर मेभीरा (भिड़ा) नाकोक दुनू पूरा मे लगा ली। जीबछ कऽ बचनू कहलक- ‘भाइ, ताबे तूसब कुछ सरिआबह, हम घर मे रिक्शा रखि दइ छियै। काज से निचेन भऽ जायब।’ जीबछ सब समान सरिअबै लगल। रिक्शा कऽ गुरुकौने बचनु एकचारी मेरखि आंगन जा दुनू बच्चो आ पत्नियो कऽ कहलक- ‘दुनू बाटिओ आ दुनू छिपलियो नेने चलू।’ कहि बचनू आगू बढ़ि गेल। पत्निक मन खुशी स झुमि उठल। दुनू बच्चा दुनू बाटी नेने आगू बढ़ल। दुनू छिपली नेने पत्नी डेढ़िया लग ठाढ़ भऽ, मुह पर नुआ (साड़ी)नेनेकनडेरिये आखिये दुनू कऽ देखैत। अपना दुनू गोटे ले बचनू चारि-चारि पीस माछ, चारि-चारि कचड़ी आ अधा किलो करीब मुरही-घुघनी मिला कऽ रखि दुनू बच्चा क एक-एक कचड़ी, एक-एक माछक कुट्टिया आ दू-दू मुट्ठी मुरही-घुघनी मिला कऽ देलक।दुनू बच्चा देखि कऽ चपचपा गेल। अपन-अपन बाटी वामा हाथे उठा दहिना होथे खाइत विदा भेल। माए लग पहुँच दुनू बच्चा अपन-अपन बाटी देखए देलक। बाटी मेघुघनीक मिरचाइक टुकड़ी आ कचड़ी मे सटल मिरचाइ कऽ देखि माए कहलक- ‘बौआ, मिरचाइ बीछि कऽ रखि दिहए। तोरा सब के करु लगतौ।’ तहि बीच बचनू गमछाक एक भाग मुरही-घुघनी कऽ मिला, चारि-चारि टा कचड़ी आ चारि-चारि टा माछक कुट्टिया फुटा दुनू गोटे ले रखलक। चबुतरे पर स बचनू घरवाली कऽ सोर पाड़ि कहलक- ‘इ सब लऽ जाउ।’ अदहा मुह झपने सरधा (बचनुक पत्नी) चबुतरा पर पहुँच दुनू छिपली बचनुक आगू मे रखि देलक। एकटा छिपली मे मुरही कचड़ी आ दोसर मेघुघनी-माछ बचनू दऽ देलक। झुर माछक तरुआ देखि सरधाक मन हँसै लगल। मन मे एलै जे कल्हुका जलखै तकक ओरियान भऽ गेल। दुनू छिपली तरा-उपरी रखि दुनू हाथ सऽ पकड़ि आंगन विदा भेलि। दुनू गोटे (जीबछ आ बचनू) दुनू भाग बैसि बीच मेताड़ीक डाबा, गिलास आ चखना रखलक। दुनू गिलास मेजीबछ ताड़ी ढ़ारि, आगू मे रखि आखि मुनि, ठोर पट-पटबैत मंत्र पढ़ै लगल। कनी काल मंत्र पढ़ि, आखि खोलि तीनि बेरि ताड़ी मे आंगुर डूबा निच्चा मेझाड़ि, बाजल- ‘हुअह भाइ, आब पीबह।’ छगाएल दुनू। तेँ एक लगाइते तीनि-तीनि गिलास पीबि लेलक। मन शान्त भेलइ। मन शान्त होइतहि जीबछ सिगरेट निकालि एकटा अपनो लेलक आ एकटा बचनुओक हाथ मे देलक। दुनू गोटे सिगरेट धरा पीबै लगल। बचनुओ लेलक सिगरेट पीबैत-पीबैत दुनू कऽ नशा (निसां) चढ़ै लगल। निसां चढ़िते गप-सप करैक मन दुन गोटे कऽ हुअए लगलै। एक मुट्ठी मुरही आ एक टुकड़ी माछ तोड़ि जीबछ मुह मे लेलक। बचनुओ लेलक। मुह महक घांेटि जीबछ बाजल- ‘भाइ, तोरा रिक्शा चला कऽ परिवार चलि जाइ छह?’ कचड़ी तोड़ि मुह मे लइत बचनू उत्तर देलक- किअए ने चलत। हमरा कि कोनो कोठा बनबैक अछि जे गुजर नै चलत। तहू मे कि हम रिक्शा बारहो मास थोड़वे चलबै छी। भरि बरसात चलबै छी। जहाँ बरखा बन्न भेलइ कि महाकान्त भाइयक चिमनी मे काज करै छी।’ ‘नोकरियो करै छह?’ ‘ऐहेन नोकरी ते भगवान सब के देथुन। अलबेला लोक छथि महाकान्त भाय। हुनकर सिर्फ पूँजी टा छिअनि। असली कारबारी हम दू गोटे छी। सरुप मुनसी आ हम। पजेबाक खरीद-बिकरी स ल कऽ कोयला मंगौनाइ, ओकर हिसाब बारी केनाइ, हुनकर काज छिअनि। आ हमर काज छी, पथेरीक देखभाल केनाइ, समय पर ओकरा दमकल चला, खाधि मे पाइन देनाइ स ल कऽ बजार से समान कीनि के अननाइ, आ चिमनी पर स घर-परक दौड़-बरहा केनाइ रहै अए।’ ‘तबतेखूब कमाइ होइत हेतह?’ ‘कमाइ जँ करै चाही ते ठीके खूब हैत। मुदा से नै करै छी। एक सय रुपैया रोज होइ अए। ओ घरवालीक हाथ मे दऽ दइ छियै। बाकी सिर्फ खेलौं-पीलांै। किऐक त नजाइज पाइ जँ घर मे देबइ ते ओइ से भाभन्स नै हैत।’ दुनूगोटेडबोभरिताड़िओआचखनो खा-पीबि गेल। एक दिशि निसां स दुनूक देह भसिआइत दोसर दिस जोर स पेशाब लगि गेलइ। उठैक मने ने होय। मुदा पेशाबो जोेरे होइत जाइत। दुनू गोटे उठि कऽ पेशाब करै गेल। जाबे पेशाब करै बइसै ताबे बुझि पडै़ जे कपड़ेमेभऽ जायत। मुदा कहुना-कहुना कऽ सम्हारि पेशाब करै बैसल। पेशाब बन्ने ने होय। बाड़ी कालक बाद पेशाबो बन्न भेलइ आ भक्को खुजलै। चबुतरा पर दुनू गोटे आबि कऽ बैसल। जीबछ कहलकै- ‘भाइ, हमरा डान्स करैक मन होइ अए।’ जीबछक बात सुनि बचनू पल्था मारि बैसि, ठेहुन पर दुनू हाथ स बजबै लगल। मुदा ओहि स अबाज नै निकलै। अबाज निकलै मुह स। जहिना-जहिना मुह स बोल निकले तहिना-तहिना दुनू ठेहुन पर हाथ चलबै। तहि बीच दुनू बच्चो चबुतरा पर आबि थोपड़ी बजबै लगल। अंगनाक मुहथरि पर सरधा बैसि देखै लगली। जीबछ डान्स करै लगल। थोड़े कालक बाद बचनुक मुह दुखा गेलइ। मुदा जीबछ डान्स करिते। दुनू बच्चो थोपड़ी बजबिते। जहिना बाइढ़िक रेत पर हेलिनिहार चीत गरे सुइत कतौ स कतौ भसिया कऽ चलि जाइत तहिना बैसलि बैसलि सरधाक मन भसिआइत। तहि बीच बचनु उठि क आंगन गेल। घैलची परक घैल स पाइन फेकि नेने आयल। उल्टा क घैल रखि, हाथ मे ओंठी रहबे करै, दुनू हाथे घैलक पेन पर बजबै लगल। लाजबाब बाजा। नचैत-बजबैत दुनू गोटे थाकि गेल। सुति रहल। भोरेहोइतेदुनूगोटेउठि,मुह-हाथध् ाोय चलि देलक। अइबेरि आसीन अपन चालि बदलि लेलक। किऐक त आन साल अधहा आसिनक उपरान्त हथिया नक्षत्र अबैत छल। से अइबेरि नइ भेलइ। पहिने हथिये चढ़ल। दू दिन हथिया बीतलाक बाद आसिन चढ़ल। ओना बूढ़-बुढ़ानुस क कहब छनि जे दुर्गापूजा मे हथिया पड़िते अछि, मुदा से नइ भेलइ। आसिनक इजोरिया पखक परीब कऽ दुर्गा पूजा शुरु होइत। अइबेरि अमबसिये दिन हथिया चलि गेल। तहिना बरखोक भेल। जइ दिन आसिन चढ़ल ओहि दिन घनघनौआ बरखा भेल आ तेकर बाद फुहियो नेपड़ल। झाँटक कोन गप। हथियाक लेल ओरिआओल (ओरिऔल) जरनो-काठी आ अन्नो-पानि सबहक घर मे रहिये गेल। मुदा तइओ किसान सबहक मन मे खुशी नै कमल। किऐक त जँ हथिया मे धानक खेत मे ठेंगाक हूर गरत त धान हेबे करत। मुदा किछु गोटेक मनमे शंका जरुर होय जे नीचला खेत मेने पानि लगल अछि मुदा उपरका खेतक धान कोना फुटत? किऐक त उपरका खेतक पानि टघरि कऽ नीचला खेत मे चलि गेल। किछु खेतक पानि काकोड़क बोहरि देने, त किछु खेतक पानि मूसक बिल देने बहि गेल। जहि स बरखाक तेसरे दिन उपरका खेत सब सुखि गेल। ओना दसमीक मेलो दखिनिहारक आ मेला मे दोकानो-केनिहारक मन मे खुशी। किऐक त रुख-सुख मे नाचो-तमाशा जमत आ देखिनिहारो कऽ भीड़ जुटत। ओना पैछला सालक सब छगाएल। किऐक त जइ दिन (सतमी) मेला शुरु भेलि ओहि दिन तेहेन झाँट आ पानि भेल जे मेलाक चुहचुहिये चलि गेलइ। सुखाड़ समय रहने महाकान्त ओछाइने पर पड़ल-पड़ल सोचै लगल। जहिया स चिमनी शुरु केलहुँ तहिया स ऐहेन समय नहि पकड़ाएल छल। आन साल दिआरीक पछाति चिमनीक काज मे हाथ लगबै छलहुँ, से अइबेरि भगवान तकलनि। कहुना-कहुना त दिआरी अबैत-अबैत दू खेप भट्ठा जरुर लगि जायत। सरकारोक योजना नीक पकड़ायल। एक दिशि खरन्जाक स्कीम त दोसर दिशि इन्दिरा आबासक घर। ततबे नहि स्कूल आ अस्पताल सेहो बनत। इ सब त अपने गाम टा मे बनत से नहि आनो-आन गाम मे बनत। सालो भरि ईंटाक महगीये रहत। ओते पुराइये नेपाएब। एते बात मन मे अबिते मुह स हँसी निकलल। तहि काल रागिनी (पत्नी) चाह (बेड टी) नेने आबि चुप-चाप (सिरमादिशि) ठाढ़ भऽ, पतिकेँ (महाकान्त) मुस्कुराइत देखलनि। पतिक मुस्की देखि रागिनी मने-मन सोचै लागलि जेकी बात छियै जे ओछाइने पर पड़ल-पड़ल मुस्करा रहल छथि। मुदा बिना किछु बजनहि टेबुल पर चाह रखि, ओरिया कऽ नाक पकड़ि डोला देलक। नाक डोलबितहि महाकान्त उठि कऽ बैसि रहल। आगू मे रागिनी कऽ ठाढ़ देखि चैबन्निया मुस्की दइत आखिक इशारा स पलंग पर बैइसै ले रागिनी कऽ कहलक। पतिक मूड देखि रागिनी ससरिये जायब नीक बुझलक। महाकान्त आ रागिनी, संगे-संग कओलेज मे पढ़ने। जखन (जहिये) दुनू गोटे बी.ए. मे पढ़ैत छल तहिये दुनूक बीच प्रेम भऽ गेल। दुनू सम्पन्न परिवारक। ओना पढ़ै म दुनू ओते नीक नहि जते दुनूक रिजल्ट नीक होय। दुनू केँ मैट्रिको आ इन्टरो मे फस्ट डिविजन भेल रहए। तेकर कारण मेहनत नहि पैरबी रहए। नीक रिजल्टक दुआरे संगियो-साथीक बीच आ शिक्षकोक बीच आदर दुनूक होय। दुनूक बीच संबंध बी.ए. आनर्सक क्लास मे भेलइ। किऐक त आनर्स मे कम विद्यार्थी रहने गप-सप करैक अधिक समय भेटइ। दुनूक बीच संबंध गप-सप स शुरु भेल। तेकर बाद किताबक लाथे डेरो मे ऐनाइ-गेनाइ शुरु भेल। संबंध बढ़िते गेलइ। संगे बजार बुलनाइ, किताब-कापी खरीदनाइ स ल कऽ कपड़ा, जुत्ता-चप्पल खरीदनाइ ध् ारि संगे हुअए लगलै। सिनेमा तमेटनियो शो मे देखै लगल। जहि स आंगिक संबंध सेहो शुरुह भऽ गेलइ। एकटा डबल रुम लऽ दुनू गोटे डेरो एकठाम कऽ लेलक। दुनूक बीचक संबंधक चरचा सिर्फ विद्यार्थिये आ शिक्षके ध् ारि नहि रहि दुनूक पिता धरि पहुँच गेलइ। मुदा दुनूक पिताक दू विचार। तेँ बुझियो कऽ दुनू अनठा देलक। सुधीर (महाकान्तक पिता) जुआन-जहानक खेल बुझैत त रमानन्द (रागिनीक पिता) सम्पन्न परिवार आ पढ़ल-लिखल लड़का बुझि बेटीक भार उतड़ब वुझैत। एम. ए. पास केला पर दुनू क विबाह भऽ गेलइ। सुधीरक परिवार एक पुरिखियाह। अपनो भैयारी मेअसकरे आ बेटो तहिना। ओना बेटी चारि टा, जे सासुर बसैत। परिवारक काज स महाकान्त कऽ कम्मे सरोकार। तेँ भरि-भरि दिन चैखड़ी लगा जुओखेलैतआशराबोपीबैत।जेपितोबुझैत। महाजनीक कारोबार, तेँ भरि दिन सुधीर रुपैयेक हिसाब-बारी आ धानेक लेन-देन मे व्यस्त रहैत। महाकान्तक क्रिया-कलाप देखि एक दिन खिसिया कऽ सुधीर कहलखिन- ‘बौआ, बड़ कठिन स धन होइ छै। एना जे भरि-भरि दिन बौआइल घुमै छह, तइ से कैक दिन लछमी रहतुहुन। तेँ किछु उद्यम करह।’ पिताक बात महाकान्त चुपचाप सुनि लेलक। किछु बाजल नहि। बेटा कऽ चुप देखि फेरि कहलखिन- ‘पाँच लाख रुपैया दइ छिअह, चिमनी चलाबह। उत्तरबरिया बाध मेअपने बीस बीघा ऊँच जमीन छह ओहि मे चिमनी बना लाय।’ ‘बड़बढ़ियाँ’ कहि महाकान्तो चुप भ गेल। पिताक मन मे जे जखने काज मे लगि जायत तखने चालि-ढ़ालि बदलि जेतइ। किऐक त काज ओहन कारखाना होइत जहि मेमनुष्य पैदा लइत। आने साल जेँका अपन काज बचनू करै लगल। पथेरीक देखभाल स ल कऽ हाट-बजार आ घर पर (महाकान्तक) जा रागिनी कऽ ब्राण्डीक बोतल पहुँचबै धरि। महाकान्तो अपन नियमित काज (आने साल जेँका) करै लगल। सबेरे आठ बजे मेजलखै खा मोटर साइकिल स चिमनी पर चलि अबैत। चिमनी पर आबि तीनू गोटे (महाकान्त, सरुप, बचनू) भरि मनगाँजा पीबि महाकान्त अॅाफिसे (चिमनीक कार्यालय) मेसुति रहैत। बारह बजे मे बचनू उठा दइत। उठितहि महाकान्त मुनसी स रुपैया मांगि बचनुए कऽ ब्राण्डी कीनैक लेल बजार पठा दइत आ अपने मुह-हाथ धोय खाइ ले घर पर विदा होइत। घर पर पहुँच धड़-फड़ क खाइत आ चोट्टे घुरि क चिमनी पर आबि सुइत रहैत, जे चारि बजे उठैत। बचनुओ बजार स शराब खरीद घर पर (महाकान्तक घर पर) जा रागिनी कऽ दऽ दइत। कओलेजे जिनगी स दुनू गोटे (महाकान्तो आ रागिनियो) शराब पीबैत। ओना रागिनी ब्राण्डीये टा पीबैत मुदा महाकान्त सब कुछ खाइत-पीबैत। गाँजा, भाँग, इंग्लीस, पोलीथिन, अफीम, ताड़ी सब कुछ। जखन जे भेटल तखन सैह। आइ जखन बचनू ब्राण्डीक बोतल लऽ रागिनी लग पहुँचल त रागिनीक नजरि मे नव विचार उपकलै। आन दिन रागिनी बचनू स बोतल लऽ रखि लइत। मुदा आइ आदर स बचनू कऽ हाथक इशारा स पलंग पर बैइसैक इशारा केलनि। दुनू गोटे, पलंग पर, आमने-सामने बैसि गेल। रागिनी- ‘बहुत दिन से मन मे छल जे अहाँ स भरि मन गप करितहुँ। मुदा अहाँ तते ध् ाड़फड़ाएल अबै छी जे किछु कहैक मौके ने भेटै अए।’ बचनू- ‘गिरहतनी, हम ते मूर्ख छी। अहाँ पढ़ल-लिखल छी। अहाँ गप्पक जबाव हमरा बुतेथोड़ेदेलहैत। रागिनी- ‘कोनो की हम अहाँ स शास्त्रार्थ करब जे जबाव देल नइ होएत। अपन मनक व्यथा कहब। जे सबकेँ होइ छै। मनक व्यथा सुनि बचनू मने-मन सोचै लगल जे हम सब गरीब छी, हरदम (सदिखन) एकटा नै एकटा भूर फूटले रहै अए। मुदा इ (रागिनी) त सब तरहे सम्पन्न छथि। नीक भोजन, दुनू परानी पढल-लिखल। तखन की मन मे बेथा छनि जे हमरा कहती। मुदा तइओ मन कऽ असथिर कऽ रागिनी दिशि देखै लगल। मन उत्सुकता बढै़। मुदा रागिनी चेहरा मे, डूबैत सूर्य जेँका, मलिनता बढ़ैत। रागिनी- ‘हमरा स अहाँ बहुत नीक जिनगी जीवै छी।’ अपन प्रशंसा सुनि बचनू गद-गद भऽ गेल। आखि चैकन्ना हुअए लगलै। मन मे ओहन-ओहन विचार सेहो उपकै लगलै जेहेन आइ धरि मन मे नहि आयल छलै। मुदा किछु बाजे नहि। बचनू कऽ चैकन्ना होइत देखि रागिनी कहै लागलि- ‘जहिना अकास मे चिड़ै कऽ उड़ैत देखइ छियै, तहिना अहूँ छी। मुदा हम पिजरा मे बन्न चिड़ै जेँका छी। जखन पढ़ै छलहुँ तखन यैह सोचै छलहुँ जे कोनो कओलेज मे प्रोफेसर बनि जिनगी बिताएव। से सब मने मे रहि गेल। भरि दिन अंगना मेघेराएल रहै छी। नेककरो से कोनो गप-सप होइ अए आ ने अंगना स निकलि कतौ जा सकै छी। तहू मे असकरुआ परिवार अछि। लऽ दऽ कऽ एकटा सासु छथि। ने दोसर दियादनी आ ने कियो दोसर। भरि दिन पलंग पर पड़ल-पड़ल देह-हाथ दुखा जाइ अए। जाधरि पढ़ै छलहुँ ताधरि दुनिया किछु आरो बुझाइत छल। मुदा आब किछु आर बुझाइत अछि। कखनो मन होइ अएतेकिछु पढ़ै छी नै त टी.बी. देखै छी। पिढ़ये कऽ की हैत। नेदोसर के बुझा सकै छी आ ने अपना कोनो काज अछि जहि ले सीखब। जानवरो स बत्तर जिनगी बनि गेल अछि। जहिना गाय-महीस भरि पेट खेलक आ खूँटा पर बान्हल रहल तहिना भऽ गेल छी। मुदा मनुक्ख त मनुख छी। जाधरि अपना मनक बात दोसर कऽ नहि कहबै आ दोसरक पेटक बात नहि सुनबै, ताधरि नीक लागत। अनेरे लोक किअए पढ़ै अए। जँ लकीर कऽ फकीरे बनि जीबैक छैक। बचनू- सुखल मुस्की दइत बाजल- ‘गिरहतनी, अहाँ के कोन चीजक कमी अछि जे कोनो तरहक दुख हैत?’ रागिनी- ‘अहाँ जे कहलहुँ ओ ठीके कहलौ। किऐक त ऐहनो बुझिनिहारक कमी नइ अछि। ऐहेनो बहुत लोक अछि जे धने कऽ सब कुछ बुझै छै। मुदा धन तसिर्फ शरीरक भरण-पोषण कऽ सकैत अछि, मनक तनहि। तीनि साल स बेसी ऐठाम ऐला भऽ गेल मुदा नेएक्को टा सिनेमा देखलहुँ आ ने एक्को दिन कतौ घुमै-फिरै ले गेलहुँ। जाधरि बेटी माए-बाप (नैहर) लग रहै अए ताधरि सब कुछ (धन-सम्पत्ति कुटुम्ब-परिवार) अपन बुझि पड़ै छै, मुदा सासुर पाएर दइतहि सब बीरान भऽ जाइ छै। तहिना माए-बापक बीच जे आजादी बेटीक रहै छै ओ सासुर ऐला पर एकाएक बन्न भऽ जाइ छै। बचनू- ‘जँ कतौ जाइक मन होइ अए वा देखैक मन होइ अए ते नैहर किअए ने चलि जाइ छी?’ रागिनी- ‘जहिना सासुर तहिना नैहरो भऽ गेल। जहिना सासुर मे पुतोहू बनि जीबैत छी तहिना नैइहरो मे पाहुन बनि जाइ छी। जना हम्मर किछु एहि घर मे अछिये नहि। जे घर अप्पन नइ रहत ओहि घर मे ककरा कहबै जे हम फल्लाँ ठीन जायब। जन्म देनिहारि माइयो आने बुझै अए। तइ पर स भाइ-भौजाइक जुइत। इ त नइहरक गप कहलौ आ अहिठामक जे होइ अए से हमहीं बुझै छी। बुरहा (ससुर) जखन आंगन औताह ते बुझि पड़त जे जना अस्सी मन पानि पड़ल छनि। बुढ़ी (सासु) से तऽकने हँसियो कऽ गप्प करताह मुदा हमरा देखिते कऽ झड़कबाहि उठि जाइत छनि। जँ कहियो माथ पर नुआ (साड़ी) नहि देखलनि तबुढ़ी कऽ अगुआ कऽ की कहताह की नहि, तेकर कोनो ठेकान नहि। भरि-भरि दिन, पहाड़ी झरना जेँका, आखि स नोर झहरैत रहै अए। कियो पोछिनिहार नहि। बचनू- ‘गिरहतनी, हमरा बड़ देरी भ गेल। महाकान्त भाइ बिगड़ताह।’ रागिनी- ‘अच्छा, चलि जायब। कहै छलौ जे सदिखन तरे-तर मन औंढ़ (अउढ़) मारैत रहै अए जे लछमी बाई जेँका तलवार उठा परदा-पौस कऽ तोड़ि दी, मुदा साहस नै होइ अए। केरा भालरि जेँका करेज डोलए लगै अए। आइ जखन अपन मनक बात अहाँ कऽ कहलौ ते मन कने हल्लुक बुझि पडै़ अए।’ बचनू- ‘तखन त गिरहतनी हमहीं नीक छी।’ रागिनी- ‘बहुत नीक। बहुत नीक। एते काल जे अहाँ से गप केलहुँ से जना बुझि पड़ै अए जे जना पाकल पीज (घाबक) निकलला पर जे सुआस पड़ै छै तहिना भऽ रहल अछि। आब सब दिन एक घंटा गप्प कएल करब अहाँ कियो आन छी। घरेक लोक छी की ने। एक टक स बचनू रागिनीक आखि पर आखि दऽ हृदय देखए लगल। तहिना रागिनियो बचनुक हृदय पढ़ै लगल। 87.डाॅक्टरहेमन्त स ब दिन चारि बजे मे उठैबला डाॅक्टर हेमन्त आइ छअ बजे मे उठल। अबेरे कऽ नीनो टुटलनि। ऐना किअए भेलनि? ऐना अइ दुआरे भेलनि जे आन दिन परिवार स लऽ कऽ अस्पताल धरिक चिन्ता दवने रहैत छलनि। तेँ, कहियो भरि-भरि राति जगले रहि जाइत त कहियो-कहियो लगले-लगले निन्न टुटि जाइन। कोनो-कोनो राति अनहोनी-अनहोनी सपना देखि चहा-चहा कऽ उठैत त कोनो-कोनो राति पत्नी स झगड़ैत रहि जाइत। छअ बजे नीन टुटिते हेमन्त घड़ी देखलनि। मुदा अबेरो कऽ निन्न टुटिने मन मे एक्को मिसिया चिन्ता नहि। मन हल्लुक। एकदम फुहराम। जना मन मे चिन्ताक दरस नहि। आन दिन ओछाइने पर ढ़ेरो चिन्ता घेरि लनि। आनेको समस्या, अनेको उलझन मन कऽ गछारि दनि। केसक की हाल अछि, बेटा कऽ नोकरी हैत की नहि। क्लीनिक मे कप्पाउण्डरक चलैत रोगी पतरा रहल अछि। चोट्टा सब दारु पीबि-पीबि अन्ट-सन्ट करैत रहैत अछि आ पाइयेक भँाज मे पड़ल रहैत अछि। जहि स मुह-दुबर रोगी सबहक कुभेला होइ छै। अस्पतालो स बेरि-बेरि सूचना भेटैत अछि जे ड्यूटी मे लापरवाही करै छियै। बातो सत्य छै, मुदा की करब? केस छोड़ि देब त पिताक अरजल सम्पत्ति बहि जायत। क्लीनिक मे कम्पाउण्डर सब कऽ जँ किछु कहबै त क्लीनिके बन्न भऽ जायत। जइ स जेहो आमदनी अछि सेहो चलि जायत। पुरान कम्पाउण्डर सब अछि। सब दिन छोट भाइ जेँका मानैत एलिएै, तेकरा किछु कहबै सेहो उचित नहि। मुदा हमही टा त डाॅक्टर नहि छी, बहुतो छथि। रोगी कऽ की, जैठाम नीक सुविधा हेतइ तइ ठाम जायत। ओझड़ायल जिनगी हेमन्तक। तेँ, सोझ-साझ बिचार मन मे अबिते नहि। मुदा आइ अबेर कऽ उठनहुँ मन मे कोनो ओझरी नहि। किऐक त काल्हिये कोर्ट मे लिखि कऽ दऽ देलखिन जे हमरा अइ (पिताक सम्पति) स कोनो मतलब नहि अछि, तेँ केस स अलग कएल जाय। दोसर बेटो कऽ नोकरी भऽ गेलनि जे ज्वाइन करै काल्हिये माए आ स्त्रीक संग गेल। पिताक देल सम्पत्तिक लड़ाई मे अपनो बीस बर्खक कमाई गेल रहनि। मुदा प्राप्तिक नाम पर जान बचा लड़ाई स अलग भेलाह। मन मे (हेमन्तक) उठलनि जे जहिना पिताक सम्पत्ति मे किछु नहि प्राप्त भेलि तहिना त रमेशो (बेटा) कऽ हमरा अरजल सम्पति मे नहि हेतइ। मुदा हमरा आ रमेश मे अन्तर अछि। हम तीनि भइ छी, जहिक बीच बिवाद भेलि मुदा रमेश त असकरे अछि। ओना हेमन्तक मनक चिन्ता काल्हिये समाप्त भऽ गेलि रहनि, मुदा काजक व्यस्तता मन कऽ असथिर हुअए नहि देलकनि। एक्के बेरि आठ बजे राति मे असथिर भेलाह। तेकर बाद पर-पखाना करैत, हाथ-पाएर धोइत, खाइत नअ बजि गेलनि। भरि दिनक झमारल तेँ ओछाइन पर पहुँचते, नीन अबै लगलनि। रेडियो खोलि समाचार सुनै चाहलनि, सेहो नहि भेलनि। रेडियो बजिते अपने सुति रहलाह। नीन टुटिते डाॅक्टर हेमन्त कऽ चाहक तृष्णा एलनि। मुदा घर मे कियो नहि। असकरे। नोकर अइ दुआरे नहि रखने जे काल्हि धरि पत्नी, बेटा-पुतोहू सब रहनि। जे सब घरक काज सम्हारैत। ओना चाहक सब समचा घरे मे, मुदा बनौनिहारे नहि। बिछान पर स उठि, नित्य-कर्म केलनि। मन मे एलनि जे चाह पीबि। मुदा चाह आओत कतऽ स। से नइ त पहिने दाढ़िये बना लइ छी, आ क्लीनिक जाय लगब तऽ रस्ते मे चाह पीबि लेब। मुदा भोरे-भोर चाहक दोकान पर त ओ जाइत, जकरा घर-परिवार नइ रहै छै। हमरा त सब कुछ अछि। ओह, से नइ त अपने चाह बना लेब। चाह बना, कुरसी पर बैसि चाह पीबै लगलाह। फाटक पर स आवाज आयल- ‘डाॅक्टर सहाएब, डाॅक्टर सहाएब।’ टेबुल पर कप रखि, फाटक दिशि बढ़ैत डाॅहेमन्त कहलखिन- ‘हँ, अबै छी।’ फाटकक बाहर डाकिया (प्यून) कन्हा मे झोरा लटकौने हाथ मे दू टा लिफाफ आ रसीद नेने ठाढ़। डाकिया कऽ ,देखि, मुस्की दइत हेमन्त पूछलखिन- ‘भोरे-भोर कोन शुभ-सन्देश अनलहुँ हेँ?’ मुदा डाकिया किछु बाजल नहि। खाँखी शर्टक उपरका जेबी स पेन निकालि, रसीदो आ पेनो बढ़ा देलकनि। दुनू रसीद पर हस्ताक्षर कऽ दुनू लिफाफ नेने फेरि कुरसी पर बैसि चाहक चुस्की लेलक। एकटा लिफाफ क टेबुल पर रखि, दोसर कऽ खोलि पढै़ लगलाह। सरकारी पत्र मे लिखल- ‘पत्र देखितहि डेरा छोड़ि दिअ। बाढ़ि स बहुत अधिक जान-मालक नोकसान भेलि अछि, तेँ आइये लछमीपुर पहुँच जायब अछि। तहि मे ज कोनो तरहक आनाकानी करब त पुलिसक हाथे पठाओल जायब। एक काॅपी पुलिसोक थाना मे भेजि देल गेल अछि।’ पत्र पढ़ितहि हेमन्त कऽ ठकमूड़ी लगि गेलनि। मने-मन सोचै लगलाह जे घर मे असकरे छी। कोना छोड़ि कऽ जायब। समय-साल तेहेन भऽ गेल अछि जे दिनो-देखार डकैती होइत अछि। कतौ डकैती त कतौ चोइर, कतौ अपहरण त कतौ हत्या सदिखन होइते रहै अए। एहना स्थिति मे घर छोड़ब उचित हैत। मुदा जखन नोकरी करै छी त आदेश मानै पड़त। जँ से नहि मानब त जहिना बीस बर्खक कमाइ कोट-कचहरीक ईंटा गनै मे गेल तहिना जे पाँच बरख नोकरी बचल अछि ओहो ससपेंड, डिस्चार्ज मे जायत। कहियो जिनगी मे चैन नहि। घोर-घोर मन होइत जाइत। चाहो सरा क पाइन भ गेल। गुन-धुन करैत दोसर पत्र खोललनि। पत्र मे लिखल- ‘डाॅक्टर हेमन्त। काल्हि चारि बजे, पछबरिया पोखरिक पछबरिया महार मे जे पीपरक गाछ अछि, ओहि गाछ लग पहुँच हमरा आदमी कऽ दू लाख रुपैया दऽ देवइ। नइ त परसू एहि दुनिया कऽ नहि देखि सकब।’ पत्र पढ़िते केराक भालरि जेँका हेमन्तक करेज डोलै लगलनि। सौँसे देह स पसीना निकलै लगलनि। थरथराइत हाथ स पत्र खसि पड़लनि। मनक बिचार विवेक दिशि बढ़ै लगलनि। जहिना कियो सघन बन मे पहुँच जाइत आ एक दिशि बाघ-सिंहक गर्जन सुनैत त दोसर दिशि सुरुजक रोशनी कम भेने अन्हार बढ़ैत जायत, तहिना हेमन्त कऽ हुअए लगलनि। खाली मन छटपटा गेलनि। की करब, की नै करब, बुझबे ने करथि। जहिना भोथहा कोदारि स सक्कत माटि नहि खुनाइत तहिना हेमन्तोक विचार समस्या कऽ समाधान नहि कऽ पबैत। रस्ते मे विलीन भऽ जायत। कियो दोसर नहि! जे मनक बात सुनैत, जहि स मन हल्लुक होइतनि। तहि काल एकटा कम्पाउण्डर (अस्पतालक) रिक्शा स आबि गेट पर पहुँच, बाजल- ‘डाॅक्टर सहाएब....। कम्पाउण्डरक अवाज सुनि, धरफड़ा कऽ उठि ,हेमन्त गेट दिशि बढ़लाह। गेट पर रिक्शा लागल। रिक्शा पर दू टा कार्टून लादल। कम्पाउण्डरो आ रिक्शोवला, रिक्शा स हटि, बीड़ी पीवैत। डाॅक्टर हेमन्त पर नजरि पड़ितहि कम्पाउण्डर हाथक बीड़ी फेकि, आगू बढ़ि प्रणाम करैत कहलकनि- ‘लगले तैयार भऽ चलू, नइ ते पुलिस आबि कऽ बेइज्जत करत। बेइज्जत तऽ हमरो करैत मुदा पुलिस अबै स पहिने हम कार्टून रिक्शा पर चढ़बैत रही। तेँ किछु ने कहलक। रस्ता मे अबै छलौं ते मोहनबाबू कऽ गरिअबैत सुनलियनि। तेँ, देरी नइ करु। नबे बजे गाड़ी अछि। सवा आठ बजै अए। अपना दुनू गोटे एक टीम मे छी।’ जहिना जूरशीतल मे मुइलो नढ़िया पर लाठी पटकैत तहिना कम्पाउण्डरक बात सुनि हेमन्त कऽ होइन। मिरमिराइत स्वर मे बजलाह- ‘दिनेश, हमरा त राइतिये से तते मन खराब अछि जे किछु नीके ने लगै अए। एक्को मिसिया देह मे लज्जतिये ने अछि। होइ अए जे तिलमिला कऽ खसि पड़ब।’ कम्पाउण्डर- ‘दवाइ खा लिअ। थोड़बे काल मे ठीक भऽ जायब।’ हेमन्त- ‘देहक दुख रहैत तखन ने, मनक दुख अछि। ओ कोना दवाइ स छुटत।’ हेमन्तक मन आगू-पाछू करैत देखि कम्पाउण्डर कहलकनि- ‘एक त ओहिना मन खराब अछि, तइ पर स पुलिसक गारि आ मारि लागत तखन बुझवै।’ कम्पाउण्डरक बात सुनि हेमन्तक मन आरो मौला गेलनि। मन मे अनेको प्रश्न उठै लगलनि। देरी हैत त पुलिसक डंटा खायब। मुदा घरो छोड़ब त नीक नहि हैत। जखने घर छोड़ब तखने उचक्का सब सबटा लुटि-ढ़गेरि कऽ लऽ जायत। अपने नै रहने क्लीनिको नहिये चलत। अखन ज रमेशो कऽ अबै ले कहबै, सेहो कोना हैत? काल्हिये त ओहो ज्वाइन केलक हेँ। अगर ज ओकरा माइये (पत्नी) कऽ अबै ले कहबनि त ओहो जपाले। किऐक त रोज देखै छियै अपहरणक घटना। हड़बड़बैत कम्पाउण्डर कहलकनि- ‘अहाँ दुआरे हमहूँ नै मारि खायब। हम जाइ छी।’ अधमड़ू भेलि हेमन्त- ‘दू मिनट रुकह। कपड़ा बदलै छी।’ हाँइ-हाँइ कऽ हेमन्त कपड़ा बदलि, बैग मे लूँगी, गमछा, शर्ट, पेन्ट, गंजी रखि विदा भेलाह। रिक्शा पर चढ़िते रहति कि पुलिसक गाड़ी पहुँच गेल। तते हड़बड़ा कऽ विदा भेलि रहति जे मोबाइल, घड़ी, दाढ़ी बनबैक वस्तु छुटिये गेलनि। पुलिसक गाड़ी देखि जे हड़बड़ा कऽ रिक्शा पर चढ़ति रहति कि चश्मा गिरि पड़लनि। जेकर एकटा शीशो आ फ्रेमो टूटि गेलनि। पुलिसक गाड़ी कऽ घुमैत देखि मन मे शान्ति एलनि। रिक्शा पर चढ़ि थोड़े आगू बढ़ला कि डाॅक्टर सुनील कऽ बच्चा सबहक संग बजार स डेरा जाइत देखलखिन। सुनील बावू कऽ देखि कम्पाउण्डर से पूछलखिन- ‘सुनीलबाबू सभ कऽ ड्यूटी नहि भेटिलनि अछि, की?’ कने काल चुप रहि कम्पाउण्डर कहलकनि- ‘नीक-नहाँति त नइ बुझल अछि, मुदा बुझि पड़ै अए जे जे सब अस्पताल मे बेसी समय दइ छथिन, हुनका सब केँ छोड़ि देल गेलनि अछि।’ कम्पाउण्डरक बात सुनि डाॅ. हेमन्त कऽ अपना पर ग्लानि भेलनि। मन पड़लनि सुनील बावूक परिवार आ जिनगी। सुनील बावू सेहो डाॅक्टर। दू भाइक भैयारी। पितो जीविते। चारि बहीनि। जे सब सासुर बसैत। बहीनि सबहक सासुर देहाते मे। जइ ठाम पढ़ै-लिखैक नीक बेबस्था नहि। ओना अपनो सुनीलबाबू गामे मे रहि पढ़ने रहथि। डाॅक्टरी पास केला पर गाम छोड़लनि। भाइयो, दरभंगेक हाई स्कूल मे शिक्षक। परिवारो नमहर। किऐक त माए-बापक संग दुनू भाइक पत्नी आ बच्चा। तइ पर स चारु बहीनिक पढ़ै-लिखैवला बच्चा सब। सुनीलबावूक जिनगी आन डाॅक्टर स भिन्न। मात्र दू घंटा अपन क्लीनिक चलबैत। आठ घंटा समय अस्पताल मे दथि। अपना क्लीनिक मे चारि टा कम्पाउण्डर आ जाँच करैक सब यंत्र रखने। जाँच करैक पाइ मे सब कम्पाउण्डर कऽ परसेनटेज दथि। जहि से काजो अधिक होइत। कम्पाउण्डरो कऽ नीक कमाइ भऽ जायत तेँ इमानदारी स श्रम करैत। ओना सब काज कम्पाउण्डरे कऽ लइत, मुदा हिसाब-बाड़ी आ जाँचक चेक अपने स करैत। जहि स अस्पतालोक जाँच करौनिहार दोहरा क अबैत। आ आन-आन प्राइवेट (खानगी) जाँच घरक काज सेहो पतरायल। ततबे नहि, डाॅ. सुनीलक चरचा सीतामढ़ी, दरभंगा, सुपौल आ समस्तीपुर जिलाक गाम-गामक लोकक बीच होइत। जहिना नदीक (धारक) पानि शान्ति आ अनबरत चलैत रहैत तहिना सुनीलक परिवार। कोनो तरहक हड़-हड़ खट-खट परिवार मे कहियो ने होइत। डाॅक्टर सुनीलक परिवारक संबंध मे सोचैत-सोचैत डाॅक्टर हेमन्त अपनो परिवारक संबंध मे सोचै लगलाह। मन पड़लनि पिता। जे बंगाल स डाॅक्टरी पढ़ि गामे मे प्रेक्टीश शुरु केलनि। किऐक त सरकारी अस्पताल गनल-गूथल। मुदा रोगीक कमी नहि। कमी इलाज आ इलाज कर्ताक। नमहर इलाका। दोसर डाॅक्टर नहि। (गाम-घर मे ओझा-गुनी, झाँड़-फूँक, जड़ी-बुट्टी स इलाज चलैत) ओना डाॅक्टर दयाकान्त (हेमन्तक पिता) सब रोगक जानकार, मुदा तीनिये तरहक रोगक (टूटल हाथ-पाएरक पलस्तर, सापक बीख उताड़ब आ बतहपन्नीक) इलाज स पलखति नहि। तेँ ओझो-गुनीक चलती पूर्ववते। कमाइयो नीक। जहि स दू महला मकानो आ पचास बीघा खेतो किनलनि। तीनू बेटो कऽ खूब पढ़ौलनि। जेठका वकील, मझिला डाॅक्टर आ छोटका प्रोफेसर। जाधरि दयाकान्त जीवैत रहलखिन ताधरि गामो आ इलक्को मे सुसभ्य आ पढ़ल लिखल परिबारक गिनती मे परिबार कऽ होइन। तीनू भाइयोक बीच अगाध स्नेह। जेठ-छोटक विचार सबहक मन मे। जहि स माइयो-बाप खुशी। ओना माए पढ़ल-लिखल नहि मुदा परम्परा स सब बुझैत। जबकि पिता आधुनिक शिक्षा पाबि आधुनिक नजरि स सोचैत। तीनू भाइक (बेटाक) मेहनत देखि पिता केँ इ खुशी होइत जे परिवारक गाड़ी आगू मुहे नीक जेँका ससरत। बेटा सबहक विआह इलाकाक नीक-नीक परिवार मे पढ़ल-लिखल लड़कीक संग केलनि। दहेजो नीक भेटिलनि। दयाकान्त मरि गेलखिन मुदा स्त्री (हेमन्तक माए) जीविते। तीनू भाइ अपन-अपन जिनगी मे ओझरायल। अपन-अपन परिवारक संग रहैत, घर पर सिर्फ माइये टा। तीनू भाइक परिवारक गारजनी स्त्रीक हाथ मे। एक-दोसर स आगू बढ़ैक सदिखन प्रयास करैत। जहि स गामक संपत्ति पर नजरि जाइ लगलनि। गामक सम्पत्ति अधिक स अधिक हाथ लगे, एहि भाँज मे बौद्धिक व्यायाम नीक-नहाँति करैत। मुकदमा बाजी शुरु भेल। एकटा कोठरी आ दू बीघा खेत माए कऽ कोट स भेटिलनि। बाकी घरो आ खेतो जब्त भ गेल। एक सय चैवालीस लगि गेलइ। पुलिसक ड्यूटी भऽ गेलइ। बीस बर्खक बाद डाॅक्टर हेमन्त लिखि कऽ कोर्ट मे दऽ देलखिन जे हमरा एहि सम्पत्ति स कोनो मतलब नहि। दरभंगा प्लेटफार्म पर डाॅ. हेमन्त देखलनि ज े दर्जनो डाॅक्टर जाइ रहल छी। दरजनो कम्पाउण्डरो छै। मुदा सबहक मुह लटकल। एक्को मिसिया मुह मे हँसी नहि। जहिना ठनका ठनकला पर सब अपने-अपने माथ पर हाथ रखि साहोर-साहोर करैत तहिना बाइढ़िक इलाकाक ड्यूटी स सबहक मन पर भारी बोझ, जहि स सब मने-मन कबुला-पाती करैत। हे भगबान, हे भगबान करैत। कियो-ककरो टोकथि नहि। आखि उठा कऽ देखि फेरि निच्चा कऽ लथि। निरमली जाइ बाली गाड़ी पहुँचल। गाड़ी पहुँचते सब, हड़बड़ करैत, अपनो आ समानो सब उठा-उठा गाड़ी मे चढ़ौलनि। हेमन्तो चढ़लाह। कम्पाउण्डर कऽ बीड़ीक तृष्णा लगलै। ओ समान (दुनू कार्टून) चढ़ा उतड़ि क पानक दोकान दिशि बढ़ल। तहि काल पनरह-बीस टा तरकारीबाली आबि, डिब्बा मे कियो छिट्टा चढ़बैत त कियो मोटा। तेसर यात्री सब, तरकारीबालीक काँई-कच्चर सुनि-सुनि, आगू बढ़ि जाइत। कम्पाउण्डरो हाँइ-हाँइ क चारि दम बीड़ी पीबि, दौड़ल आबि बोगीक आगू मे ठाढ़ भऽ गेल। तरकारीबाली सबहक झुण्ड देखि कम्पाउण्डर कऽ मन मे हुअए लगलै जे हमरा चढ़िये ने हैत। चुपचाप निच्चा मे ठाढ़। गाड़ीक भीतर बैसल एकटा पसिन्जर उठि कऽ आबि एकटा मोटा कऽ निच्चा धकेल देलक। जइ तरकारीबालीक मोटा खसल रहै ओ ओहि आदमी (पसिन्जर) क गट्टा पकड़ि निच्चा उताड़ल। निच्चा उतड़ितहि, घोरन जेँका, सब तरकारीबाली लुधकि गेल। गारियो खूब पढ़लक आ मारबो केलक। बोगीक मुह खाली देखि कम्पाउण्डर चढ़ि गेल। गाड़ी कऽ पुक्की दइतहि सब हाँइ-हाँइ कऽ चढ़ै लगल मुदा झगड़ा नै छुटलै। गारि-गरौबलि होइते रहल। जते हल्ला सैाँसे गाड़ी मे, लोकक बजला स होय, ओते सिर्फ ओहि एक्के डिब्बा मे होय। अकछि क, डाॅक्टर हेमन्त सीट पर स उठि उपरका (समान रखैवला) पर जा कऽ बैग क सिरमा मे रखि सुति रहलाह। ओघराइते अपना जिनगी पर नजरि गेलनि। मने-मन सोचै लगलाह जे पिताजी त हमरे सबहक सुख ले ने ओते सम्पत्ति अरजलनि। मुदा, की हमरा सब कऽ ओहि सम्पत्ति स सुख होइ अए? अपनो कमाइ त कम नहि अछि। मुदा चैबीस घंटाक दिन-राति मे चैन स कते समय बीतैत अछि? जहिना खाइ काल फोन अबै अए तहिना सुतै काल। की यैह छी सुख स जिनगी बिताएव? मुदा एहि प्रश्नक उत्तर सोच मे ऐबे ने करनि। फेरि मन उनटि क जिनगीक पाछु मुहे घुरलनि। मन मे एलनि जे जे माए, धाकड़ सन-सन तीनि बेटाक छी, बेचारी कऽ कियो एक लोटा पानि देनिहार नहि। किऐक नहि बेचारीक मन मे उठैत हेतनि जे एहि बेटा स बिनु बेटे नीक? हमरो ऐना नै हैत, तेकर कोन गारंटी। गाड़ी घोघरडिहा पहुँचल। यात्री सब उतड़बो करए आ बजबो करए जे किसनीपट्टी स आगू लाइन डूबि गेल छै, तेँ गाड़ी आगू नै बढ़त। कम्पाउण्डर उठि क हेमन्तक पाएर डोलबैत बाजल- ‘डाॅक्टर सहाएव, नीन छियै।’ ‘नै’ ‘सब उतड़ि रहल अछि। गाड़ी आगू (निरमली) नइ बढ़त। उतड़ि जाउ?’ कम्पाउण्डर बात सुनि हेमन्तक मन मे अस्सी मन पानि पड़ि गेलनि। मुदा उपाय की? अधमड़ू जेँका उतड़लथि। प्लेटफार्म पर रिक्शावला, टमटमवला हल्ला करैत जे कोसीक पछबरिया बान्ह पर जायब।’ एकटा रिक्शावला कऽ, हाथक इशारा स कम्पाउण्डर सोर पाड़ि पूछलक- ‘हम सब लछमीपुर जायब। तोरा बुझल छह?’ रिक्शावला- ‘हमरो घर लछमियेपुर छी। बाइढ़िक दुआरे ऐठाम रिक्शा चलबै छी।’ कम्पाउण्डर- ‘अइ ठीन स कना-कना रस्ता हेतइ? रिक्शावला - ‘अइ ठीन से हम बान्ह पर दऽ आयब। ओइ ठीन से नौ भेटत, जे लछमीपुर पहुँचा देत। अइ ठीन से हम नेने जायब आ अपने भाइयक नौ पर चढ़ा देब।’ कम्पाउण्डर- ‘बड़बढ़िया, कार्टून चढ़ाबह।’ सब कियो रिक्शा पर चढ़ि विदा भेल। पूबरिया गुमती लग, जहिठाम चाउरक बड़का मिलक खंडहर अछि, पहुँच रिक्शावला कऽ हेमन्त पूछलखिन- ‘लछमीपुर केहेन गाम अछि?’ रिक्शावला- ‘बड़ सुन्दर गाम अछि। सन्मुख कोसी से मील भरि पछिमे अछि। गामक सब मेहनती। बाइढ़िक समय मे हम सब रिक्शा चलबै छी आ जखैन पाइन सटकि जाइ छै तखैन जा कऽ खेती करै छी। गाइयो-महीसि पोसने छी। कते गोरे नौ चलबै अए आ कते गोरे मछबारि करै अए। हमरा गामक लोक पंजाब, डिल्ली नइ जाइ अए। आन-आन गाम मे ते पंजाब, डिल्लीक धरोहि लागि जाइ छै। से हमरा गाम मे नइ अए। माछक नाम सुनिते कम्पाउण्डर पूछलक- ‘तब ते माछ खूब सस्ता हेतह?’ ‘हँ, कोनो कि जीरा रहै छै। सब अनेरुआ। ऐहेन सुअदगर माछ शहर-बजार मे थोड़े भेटत। शहर-बजारक माछ त सड़ल-सुड़ल पाइनिक डबरा महक रहै अए।’ कोसीक पछबरिया बान्ह पर पहुँचते रिक्शावला अपन भाइयक घाट पर रिक्शा लऽ गेल। भाइयक रिक्शा देखितहि भागेसर नाव पर स बान्ह पर आयल। दुनू भाइ दुनू कार्टून नाव पर रखलक। अधा नाव पर तख्ता विछौने आ अधा ओहिना। तख्ता पर पटेरक पटिया विछाओल। नाव पर बैसि हेमन्त पूब मुहे तकलनि ते बुझि पड़लनि जे समुद्र मे जा रहल छी। सौंसे देह सर्द भऽ गेलनि। मन मे डर पैसि गेलनि जे कोना अइ पाइन मे जायब। मन पड़लनि दरभंगाक पीच परक कार। मुदा एक्सिडेंट त ओतउ होइ छै। ओतउ लोक मरैत अछि। फेरि मन मे एलनि जे महेन्द्रूक नाव जेँका नाव मे इंजनो ने छै। जँ कहीं बीच मे लग्गी छुटि-टुटि जेतइ त भसिये जायब। कतऽ जायब कतऽ नहि। अनायास मन मे एलनि जे अखन ध् ारि कम्पाउण्डर कऽ नोकर जेँका बुझै छेलियै ओ उचित नहि। इ त छोट भाइक तुल्य अछि। नव विचार मन मे उठितहि कम्पाउण्डर कऽ कहलखिन- ‘बौआ, धन्य अछि ऐठामक लोक। जे सचमुच देवीक पूजो करैत अछि आ लड़बो करैत अछि। किऐक ने जिबठगर हैत।’ नौ खुगलै। मांगि सोझ कऽ नइया (नाविक) कमलेसरीक गीति उठौलक। नइयाक लग्गी उठबैत आ पाइन मे रखैत देखि हेमन्त मने-मन सोचै लगलाह जे ऐहन मेहनत केनिहार केँ, कोन जरुरत दवाइ आ व्यायामक छैक। मन पड़लनि रामेश्वरम। समुद्रक झलकैत पानि। जहि मे लहरि सेहो उठैत। तहिना त ओहूठाम पाइनिक लहरि अछि। फेरि मन पड़लनि जेसलमेरक बौल। एहिना उज्जर धप-धप कतौ स कतौ बौल। कमलेसरीक गीत समाप्त होइतहि नाविक कोसीक गीति उठौलक। अजीब साजो। जहिना नाव मे खट-खटक अवाज तहिना लग्गीक। लग्गीक पाइन देहो पर खसै मुदा तेँ कि ओकर पसीना निकलब रुकलै। डाॅ. हेमन्तक मन फेरि उनटलनि। मिलबै लगलाह समुद्रक लहरि आ कोसीक धाराक। समुद्र रुपी समाज मे सेहो लहरियो (समुद्रजेँका) उठैत अछि आ धारक बेग जेँका सेहो रहैत अछि। कहियो काल समुद्रक लहरि जेँका सेहो लहरि समाज मे उठैत अछि, मुदा ओ धीरे-धीरे असथिर भऽ जाइत अछि। मुदा कोसीक धार जेँका जे बेग चलैत ओ पैघ स पैघ पहाड़ कऽ तोड़ि धारो बना दइत आ समतल खेतो। पुरान स पुरान गामक (अधला परम्परा) परम्परा कऽ तोड़ि नव मे बदलि दइत। जहिना मौसम बदलला पर गाछक पुरान पात झड़ि नव पात स पुनः लदि जाइत, तहिना। असीम विचार मे डूबल हेमन्तक मुह अनायास नाविक कऽ पूछलक- ‘कते दूर अहाँक गाम अछि?’ नइया- ‘छअ कोस। ‘कते समय जाइ मे लागत? ‘भट्ठा दिस जायब (जैब)। तेँ जलदिये पहुँच जैब।’ जल्दीक नाम सुनि हेमन्तक मन मे आशा जगल। मुदा ओ आशा लगले मेटा गेलनि। किऐक त सैाँसे पाइनिये देखथि, गाम-घरक कतौ पता नहि। चिन्तित भऽ चुपचाप भऽ गेलाह। अपना सुइढ़ मे नइया गीत गबैत। मन मे कोनो विकारे नहि। मुदा हेमन्त कऽ कखनो गीत नीको लगनि आ कखनो झड़कबाहियो उठनि। तहि काल एकटा मुरदा भसल जाइत। सबहक नजरि ओहि मुरदा पर पड़ल। मुरदा देखि हेमन्तक नजरि अस्पतालक मुरदा पर गेलनि। मुदा दुनूक दू कारण। एकक जिनगीक अंत रोग स त दोसराक बाढ़ि स। नब-नब समस्या उठि-उठि हेमन्तक मन कऽ घोर-मट्ठा कऽ देलकनि। मनक सब विचार हराइ लगलनि। तहि बीच एकटा किलो चारिऐक रौह माछ कुदि कऽ नाव मे खसल। माछ देखि हेमन्तोक आ कम्पाउण्डरोक मन चट-पट करै लगलनि। लग्गी कऽ मांगि पर राखि भागेसर माछ कऽ पकड़ि, पानि उपछैबला टीन मे रखलक। माछ कऽ टीन मे रखि नइया बाजल- ‘अहाँ सबहक जतरा बनि गेल।’ नइयाक शुभ बात सुनि हेमन्तक मन फेरि ओझरा गेलनि। मन मे उठै लगलनि जे यात्रा ककरा कहबै। घर स विदा भेलहुँ, तकरा कहियै आ कि कार्यस्थल तक पहुँचैक कहियै आ कि काज सम्पन्न कऽ घर पहुँचला पर, तकरा। तहू स आगू जे काजक बीचो मे नव काज उत्पन्न भऽ जाइत। फेरि नइया कऽ पूछलखिन- ‘आब कते दूर अछि?’ हाथ उठा आंगुर स दछिन दिस देखबैत कहलकनि- ‘वैह, हमर गाम छी। गोटे-गोटे जमुनीक गाछ देखै छियै। अधा कोस करीब हैत। अधा कोस सुनि कम्पाउण्डर चहकि क बाजल- ‘डाॅक्टर सहाएब, पाँच बजै अए। अधा घंटा आरो लागत। साढ़े पाँच बजे तक पहुँच जायब।’ भने सबेरे-सकाल पहुँच जायब। मुदा अकास मे चिड़ै सब नहि उड़ैत। किऐक त चिड़ै ओहि ठाम उड़ैत जहि ठाम रहैक ठौर होइत। मुदा से त नहि। सैाँसे बाढ़िये पसरल। मुदा तइओ गोटे-गोटे मछखौका चिड़ै जरुर उड़ैत। लछमीपुर दिशि अबैत नाव कऽ देखि गामक धियो-पूतो, स्त्रीगणो आ गोटे-गोटे पुरुखो घाट पर ठाढ़ भऽ एक दोसर स कहैत। ‘चाउर-आँटाबला छियै।’ ‘नुओ-बसतर हेतइ।’ ‘तिरपालो (पोलीथीन) हेतइ।’ ‘बड़का हाकीम सब छियै।’ घाट पर आबि नाव रुकल। मुदा पेंट-शर्ट पहिरने डाॅक्टर आ कम्पाउण्डर कऽ देखि जनिजाति सब मुह झपै लागलि। मरद सब सहमि गेल। घीया-पूता डरा गेल। नाव कऽ बान्हि नइया सुलोचना कऽ कहलक- ‘गै सुलोचना डाकडर सैब सब छथिन। बक्सा मे दवाइ छियै। हम दवाइ उताड़ै छी तू टीन उताड़। टीन मे एकटा नमहर माछ छौ। खूब नीक जेँका माछ के तड़ि डाकडर सहैब के खुआ दहुन।’ माछ उताड़ि सुलोचना अंगना लऽ गेल। टीन रखि बाड़ीक कल पर आबि हाथ धोय, आँचर स हाथ पोछि, स्कूलक ओछाइन झाड़ि बिछबै लागलि। बिछान बीछा, दौड़ि कऽ आंगन स बड़का जाजीम आ दू टा सिरमा आनि लगौलक। हेमन्तो आ दिनेशो आगू मे ठाढ़। मुदा ओते लोकक बीच हेमन्तोक आ दिनेशोक नजरि सुलोचनेक देह आ काज पर नचैत। बिछान बीछा सुलोचना हेमन्त कऽ कहलकनि- ‘डाॅक्टर सहाएव, बिछान बिछा देलहुँ, आब आराम करु।’ दिनेश चुप्पे। मुदा हेमन्त बजलाह- ‘बुच्ची, देह भारी लगै अए। ओना नाव पर आरामे से एलहुँ। मुदा तइओ देह भरिआयल लगै अए। पहिने नहाएब।’ ‘बड़बढ़िया’ कहि सुलोचना आंगन बाल्टी-लोटा अनै गेलि। आंगन सऽ बाल्टी-लोटा नेने कल पर पहुँचल। दुनू क माटि स माँजि, बाल्टी मे लोटा रखि, पाइन भरि, हेमन्त कऽ कहलक- ‘डाॅक्टर सहाएव, नहा लिअ।’ चहार देबाली स घेरल टंकी पर नहाइवला डाॅक्टर हेमन्त खुला धरती-अकासक बीच नहाइ ले जयताह। तेँ किछु सोचै-बिचारैक प्रश्न मन मे उठि गेलनि। मुदा बहुत सोचैक जरुरत नहि पड़लनि। अपना-अपना उमरवला सब कऽ डोरीबला पेंट आ तइ पर स ककरो लूंगी त ककरो चारि हत्थी तौनी पहिरने देखलखिन। ओहो सैह केलनि। मुदा बारह बर्खक सुलोचना कल पर स हटल नहि। मातृत्वक दुआरि पर पहुँचल सुलोचना मे फुलक टूस्सी जरुर अबि गेल छलै। मुदा हेमन्तोक मन मे डाॅक्टरक विचार। ओना डाॅक्टर हेमन्त शरीरक सब अंगक गुण-धर्म बुझैत मुदा ऐहनो त वस्तु अछि जे गर्म हवाक रुप मे रहैत। जहि मे आनन्द आ सृजनक गुण होइत। सुलोचनो मे फूलक कोढ़ीक, जे सुगंधक वाल्यावस्था मे प्रस्फुटित होइत, महमही हवा मे। एक लोटा माथ पर पानि ढ़ारलाक वाद हेमन्तक मन मे आयल जे अखन हम दुनियाक ओहि धरती पर छी जहि ठाम जीवन-मरण संगे रहैत अछि। मुदा तहिठाम ऐहेन सौम्य, सुशील अल्हड़ बाला कते खुशी स चहचहा रहल अछि। तीनि साल पहिलुका बात छियै। जहि बाढ़ि मे कतेक गाम, कतेको मनुष्य आ कतेको सम्पत्ति नष्ट भेलि छल। तेँ कि? जे बचल अछि ओ ओहि गाम कऽ छोड़ि देत। कथपपि नहि। मुदा बाढ़ि अनहोनी नै रहै। बरेजक फाटक खोलल गेलइ। फाटको खोलैक मजबुरी रहै। किऐक त बरेजक उत्तर तते पाइनिक आमदनी भऽ गेलइ जे दुर्दशाक अंतिम शिखर पर पहुँच सकैत छलै। मुदा, सुदूर गाम मे जानकारीक साधन नहि। ने बँचैक उपाय। दुनू बान्हक (कोसीक) बीच समुद्र जेँका पानि पसरि गेलइ। थाह स अथाह धरि। कुनौली स दछिन, कोसी धारक कात मे एकटा गाम। ओहि गामक सुलोचना। जेकर सब कुछ (मनुख स घर धरि) दहा गेलइ। मुदा सुलोचना जे बँचल से पढ़ै ले कुनौली गेलि छल। स्कूल स घर जाइ काल बाइढ़िक दृश्य देखलक। दृश्य देखि, बान्हे पर बपहारि कटै लागलि। तहि काल लछमीपुरक चारि गोटे, बजार स समान खरीद नाव लग अबैत रहए। सुलोचना कऽ कनैत देखि जीयालाल पूछलकै- ‘बुच्ची, किअए कनै छेँ?’ कनैत सुलोचना- ‘बाबा, हम पढ़ै ले गेल छेलौ। तै बीच हमर गामे दहा गेल। आब हम कत-अ रहब?’ जीयालाल- -‘हमरा संगे चल। जहिना बारह टा पोता-पोती कऽ पोसै छी तहिना तोरो पोसबौ।’ जीयालालक विचार सुनि सुलोचलाक हृदय मे जीवैक आशा जगल। कानब रुकि गेलइ। मुदा कखनो-काल हिचकी होइते। नाव पर सब समान रखि चारु गोटे बान्ह पर आबि चीलम पीबैक सुर-सार करै लगल। एक भाग मे सुलोचनो किताव नेने बैसलि। बटुआ खोलि रघुनी चीलम, कंकड़क डिव्वा आ सलाइ निकालि बीच मे रखलक। एक गोटे चीलमक ठेकी निकालि, चीलमो आ ठेकियो कऽ साफ करै लगल। दोसर गोटे डिब्बा स कंकड़ निकालि तरहत्थी पर औंठा स मलै लगल। चीलम साफ भेलइ। ओहि मे ठेकी द, कंकड़वलाक हाथ मे देलक। कंकड़वला चीलम मे कंकड़ बोझि दुनू हाथ स चीलमक पैछला भाग पकड़ि मुह मे भिरौलक। मुह मे भिरबितहि रघुनी सलाइ खररि कंकड़ मे लगबै लगल। दू-चारि बेरि मुहक इंजन स प्रेशर दइते चीलम सुनगि गेल। चीलम कऽ सुनगितहि तते जोर से दम मारलक जे धुआँक संग-संग धधरो उठि गेलइ। मुदा चीलमक दुषित हवा स धधरा मिझा गेल। बेरा-बेरी चारु चीलम पीवि, मस्त भ नाव दिशि विदा भेलि। साँझू पहर क जहिना गाय-महीसि बाध स घर दिशि अबैत। जकरा पाछु-पाछु छोट-छोट नेरु (लेरु) पड़ड़ू झुमैत, लुदुर-लुदुर मगन भऽ चलैत, तहिना सुलोचना लछमीपुरवला सबहक संगे पाछु-पाछु नाव पर पहुँचल। नाव पर चढ़िते लग्गा चलौनिहार कोसी महरानीक दुहाई देलक। सुलोचनो बाजलि- ‘जय।’ नाव खुगल। लछमीपुरक चारु गोटेक मन सुलोचनाक जिनगी पर। मुदा सुलोचनाक परिवारक विछोह दुख स सुख दिशि जाय लगल। जे सुलोचना गाम आ परिवार क कतौ अता-पता नइ देखलक, ओहि सुलोचनाक मन मे उठै लगल जे गाम-घर भलेही दहा गेल मुदा माए-बाप जरुर जीवैत हैत। किऐक त मनुक्ख निर्जीव (निरजीव) नहि सजीव होइत। बुद्धि-विवेक होइत। तेँ, ओ दुनू गोटे जरुर कतौ जीवैत हैत। जे आइ नै काल्हि जरुर मिलवे करत। तेँ मन मे जिनगी भरिक दुख नहि, किछु दिनक दुख अछि। जे कहुना नहि कहुना कटिये जायत। नाव लछमीपुर पहुँचल। जीयालालक बारहो टा पोता-पोती दौड़ि कऽ नाव लग आइल। पोता-पोती कऽ देखि जीयालाल कहलक- ‘बाउ, तोरा सब ले एकटा बहीनि नेने ऐलियह। सुलोचना सबहक (पोता-पोतीक) पहुन भऽ गेलि। दोसर दिन जीयालाल एकटा घर बना, सुलोचना कऽ गामक बच्चा सभकेँ पढ़बै ले कहलक। गामक बच्चा सब केँ सुलोचना पढ़बै लागलि। वैह सुलोचना। हेमन्तो दिनेशो नहायल। नहा कऽ, जाबे हेमन्त कपड़ा बदलि, केश सरिया, तैयार भेलाह ताबे सुलोचनो आ कमलियो (जीयालालक जेठकी पोती) चूड़ा भूजि, माछ तड़ि लेलक। दू टा थारी मे चूड़ाक भुजा आ तड़ल माछ साँठि दुनू बहीनि दुनू थारी नेने हेमन्त लग पहुँच आगू मे रखि देलक। बड़का फुलही थारी तइ मे चूड़ाक उपर मे माछक नमहर-नमहर तड़ल कुट्टिया पसारल। थारी रखि कमली पाइन अनै गेलि। सुलोचना आगू मे बैसि गेलि। दुनू गोटे खाइत-खाइत दसो माछक कुट्टिया आ थारियो भरि चूड़ा खा लेलनि। शुद्ध आ मस्त भोजन। पानि पीबि ढ़कार करैत दिनेश बाजल- ‘डाॅक्टर सहाएव, आइ धरि हम एते नइ खेने छलौ।’ हेमन्त- ‘से त हमरो बुझि पड़ै अए।’ सुलोचना- ‘डाॅक्टर सहाएव चाहो पीबै?’ हेमन्त- ‘पीबै त जरुर, मुदा दू घंटाक बाद। ताबे किछ काज करब। ओना साँझ पड़ि गेल मुदा जाबे फरिच (फरिच्छ) छै ताबे दसो-पाँच टा रोगी जरुर देखि लेब।’ सुलोचना- ‘अच्छा, अहाँ तैयार होउ, हम लोक सब (रोगी) कऽ बजौने अबै छी।’ कम्पाउण्डर कार्टून खोलि, दवाइ निकालि पसारि देलक। रोगी अबै लगल। रोगी देखि-देखि हेमन्त कम्पाउण्डर कऽ कहति जाथिन आ कम्पाउण्डर दबाइ दइत जाए। अस्पताल जेँका त सब रंगक रोगी नहि। किऐक त बाइढ़िक इलाका तेँ गनल-गूथल रोग। दवाइयो तेहने। तीनिये दिन मे सौँसे गामक रोगी कऽ देखि डाॅक्टर हेमन्त निचेन भऽ गेलाह। मुदा सात दिनक डयूटी। तहू मे कठिन रास्ता। मुदा पाइन टूटै लगलै। पाँचम दिन जाइत-जाइत रास्ता सूखि गेल। मुदा थाल-खिचार रहबे करै। आठम दिन भोरे हेमन्त सुलोचना कऽ कहलखिन- ‘बुच्ची, आइ हम चलि जायब।’ सुलोचना- ‘इ त मिथिला छियै डाॅक्टर सहाएव, बिना किछु खेने-पीने कना जायब?’ कहि सुलोचना चाह बनवै गेलि। एकटा दोस्त स भेेटि करए कम्पाउण्डर गेल। असकरे हेमन्त। मने-मन सोचै लगलथि जे सात दिनक समय जिनगीक सबसँ कठिन आ आनन्दक रहल। इ कहियो नै बिसरि सकै छी। बिसरैवला अछियो नहि। आइ धरि ऐहेन जिनगीक कल्पनो नइ केने छलहुँ, जे बीतल। ऐहेन मनुक्खक सेवो करैक मौका पहिल बेरि भेटल। मौके नहि भेटलि, बहुत किछु देखैक, भोगैक आ सीखैक सेहो भेटल। आइ धरि हम रोगीक (सचमुच जकरा जरुरत छै) सेवा नइ केने छलहुँ, सिर्फ पाइ कमेने छलहुँ। गाम-घर मे जकरा पाइ छै वैह ने दरभंगा इलाज करबै जाइत अछि। जकरा पाइ नइ छै ओ त गामे मे छड़पटा (छटपटा) कऽ मरैत अछि। तहि बीच सुलोचना चाह नेने आइलि। कप बढ़बैत बाजलि- ‘मन बड़ खसल देखै छी, डाॅक्टर सहाएव।’ हेमन्त- ‘नहि! कहाँ। एकटा बात मन मे आबि गेल तेँ किछु सोचै लगलहुँ।’ सुलोचना- ‘अइ ठीन केहेन लगै अए डाॅक्टर सहाएव?’ सुलोचनाक प्रश्नक उत्तर नहि दऽ हेमन्त चुप्प रहलाह। हेमन्त कऽ चुप देखि सुलोचना बाजलि- ‘हम त बच्चा छी डाॅक्टर सहाएव, तेँ बहुत नै बुझै छी। मुदा तइयो एकटा बात कहै छी। जहिना चीनी मीठ होइत अछि आ मिरचाइ कड़ू। दुनू मे कीड़ा (पिल्लु) फड़ै छै आ ओहि मे जीवन-यापन करैत अछि। मुदा चीनीक कीड़ा के जँ मिरचाइ मे दऽ देल जाय त एको क्षण नइ जीबित रहत। उचितो भेलइ। मुदा की मिरचाइक कीड़ा चीनी मे देलाक बाद जीवित रहत? एकदम नइ रहत। तहिना गाम आ बाजारक जिनगी होइत।’ सुलोचनाक बात सुनि डाॅक्टर हेमन्त मने-मन सोचै लगलथि जे बात ठीके कहलक। अहिना त मनुक्खो मे अछि। मुदा ओ हैत कना । जाधरि (जाबे) समाजिक जीबन मे समरसता नइ आओत ताधरि (ताबे) एहिना होइत रहत। दस बजे भोजन कऽ दुनू गोटे (हेमन्त आ दिनेश) लूँगी, गंजी पहीरि, सब कपड़ो आ जूत्तो कऽ बैग मे रखि, पाएरे विदा भेलाह। हेमन्तक बैग सुलोचना आ दिनेशक बैग कमली लऽ पाछु-पाछु चललि। किछु दूर गेला पर हेमन्त कहलखिन- ‘बुच्ची, आब तों सब घुरि जा।’ हेमन्तक बात सुनि सुलोचनाक आखि नोरा गेल। डाॅक्टर हेमन्त कऽ बैग पकड़बैत बाजलि- ‘अंतिम प्रणाम, डाॅक्टर सहाएब।’ एकाएक हेमन्तक हृदय स प्रेमक अश्रुधारा प्रवाहित हुअए लगलनि। मुह स प्रणामक उत्तर नइ निकललनि। मूड़ी निच्चा केने आगू बढ़ि गेलाह। मुदा किछुए दूर आगू बढ़ला पर बुझि पड़लनि जे चारि टा तीर (सुलोचना आ कमलीक आखि) पाछु स बेधि रहल अछि। पाछु उनटि कऽ तकलनि त देखलखिन जे दुनू गोरे ठाढे़ अछि। मन भेलनि जे हाथक इशारा स जाइ ले कहि दिअए मुदा अपना रुप पर नजरि पड़ि गेलनि। खाली पाएर, जाँध तक समटल (उलटा कऽ मोड़ल) लूँगी, देह मे सेन्डो गंजी, माथक केश फहराइत। तइ पर स थालक छिटका घुट्ठी स ल कऽ माथ धरि पड़ल। हाथक इशारा स सुलोचना कऽ सोर पाड़लखिन। दुनू (सुलोचनो आ कमलियो) हँसैत आगू बढ़ल। लग मे देखि हेमन्तोक हृदय मे हँसी उपकल। मुस्की दइत हेमन्त- ‘बुच्ची, हम अपन दरभंगाक पता कहि दइ छिअह। अविहह। सुलोचना- ‘हम त शहर-बजार मे हराइये जायब डाॅक्टर सहाएव। अहाँ जावे हमरा गाम मे छेलौ ताबे बुझि पड़ैत छल जे दरभंगा अस्पताल गामे मे अछि।’ कहि पाएर छुबि घुरि गेल। बान्ह पर आबि दुनू गोरे थाल-कादो धोय, पेन्ट-शर्ट पहीरि स्टेशन दिशि बढ़लाह। गाड़ी पकड़ि दरभंगा पहुँच गेलथि। डर, दुनूक मन मे रहनि। घरारी नापी होइ सऽ दस दिन पहिने श्रीकान्त गाम 88.अमानत अ अअअअअ मानतक दिन। चारि बजे भोरे स पूड़ी-जिलेबी आ तर- कारीक सुगंध गामक हवामे पसरि गेल। सैाँसे गामक लोक के बुझले छलै, तेँ ककरो सुगंध स’ आश्चर्य नै होइ। भोरे श्रीकान्तोक पत्नी आ मुकुन्दोक पत्नी फूल तोड़ि, नहा ब्रह्मस्थान पूजा करै ले जाइ गेलीह। हलुआइ दू-चुल्हिया पर तरकारियो बनवैत आ जिलेबियो छनैत। कुरसी पर बैसल श्रीकान्त मने-मन ब्रह्मबावा के कबुला केलक जे जँ हमरा मनोनुकूल नापी भेल त’ तोरा जोड़ा छागर चढ़ेवह। तहिना मुकुन्दो। गामक सुगंधित हवामे सभहक मन उधिआइत रहै। चाह बनवै वाला चाह बनवैमे व्यस्त रहय। पान लगबैवला पानमे। दुनू दिशि कट्ठा-कट्ठा भरिक टेंट लागल। दड़ी आ जाजीम विछाओल। एक भाग मे गाँजा पीनिहारक बैसार आ दोसर भागमे दारुक। जहिना बुचाइ कूदि क कखनो हलुआइ लग जा देखैत त’ कखनो दारुवलाक बैसारमे जा दू-गिलास चढ़ा दैत। तहिना सरुपो। सभ कथूक ओरियान काल्हिये दुनू गोटे, दुनू दिशि कऽ नेने तेँ अनतऽ जेबाक जरुरते नहि ककरो। चाह-पानक इत्ता नै। जकरा जते मन हुअए से तत्ते खाउ-पीवू। जलखैमे पूड़ी-जिलेबी डलना आ कलौ मे खस्सीक माँस आ तुलसीफुलक भात। तेँ भरि दिनक चिन्ता सभहक मन सऽ पड़ाएल। जीविलाह सभ दुनू दिशि टहलि-टहलि खाइत-पीवैत। श्रीकान्तो आ मुकुन्दो इंजीनियर। दुनू एक्के वंशक। दुनूक परदादा सहोदरे भाइ रहनि। पाँच कट्ठाक घरारी, जहि मे दुनू गोटेक अधा-अधा हिस्सा रहनि। जहिये सऽ दुनू गोटे नोकरी शुरु केलनि, तहिये सऽ गाम छोड़ि देलनि। एक पुरिखियाह वंश, तेँ परिवार मे दोसर नहि रहनि। पेंइतीस सालक नोकरीक बीच कहियो, दुनू मे से क्यो, गाम नहि आयलाह। जहि सऽ पहिलुका, बापक बनाओल, घर दुनूक खसि पड़ल। गामक स्त्रीगण सब ठाठ-कोरो, धरनि के उजाड़ि-उजाड़ि जरा लेलक। ढ़िमका ढ़िमकी के सरिया गामक छैाँड़ा सभ फील्ड बना लेलक। गामक जते खेलवाड़ी छैाँड़ा सब छल ओ सब अपन-अपन खेलक जगह बाँटि लेलक। एकटा फील्ड कबड्डीक, दोसर गुड़ी-गुड़ीक, तेसर चिक्का -चिक्काक, चारिम गुल्ली-डंटाक आ पाँचम रुमाल चोरक बनि गेलि। उकट्ठी छैाँड़ा सब एक दोसराक फील्ड मे, रातिके, झाँड़ा फीरि दइ। मुदा खेल शुरु करै स पहिने दस-बीसि टा गारि पढ़ि सब अपन-अपन फील्ड चिक्कन बना लिअए। ओना दुनू गोटे (श्रीकान्तो आ मुकुन्दो) बाहरे घर बना लेने छथि, मुदा बूूूूढ़ाढ़ीमे दुनू केँ गाम मन पड़लनि। साले भरिक नोकरी दुनूक बाचल तेँ तीनि मासक छुट्टी लऽ-लऽ गाम अयलाह। गाम अबै सऽ पहिने दुनू गोटे, फोनक माध्यम सऽ, अबैक दिन निर्धारित कऽ लेने रहथि। किऐक तऽ परोछा-परोछी नापी करौला सऽ आगू झंझटक ऐलाह। अपना तऽ घरो नहि रहनि मुदा अबैेकाल एकटा रौटी, सुतै-वैइसैक समानक संग भानसो करैक सभ किछु लेने अयलाह। गाम आबि पितिऔत भाइ के कहि सभ व्यवस्था केलनि। सब गर लगलाक वाद भाइ के पूछलथिन- ‘बौआ, गाम मे के सभ मुहपुरखी करैए?’ भाइ कहलकनि- ‘गाम मे त कियो राजनीति नहिये करैए, मुदा बुचाइ आ सरुप सभ धंधा करैत अछि।’ ‘की सभ धंधा?’ ‘जना कियो खेत कीनैए वा बेचइए, ओहिक बीच मे पड़ि किछु कमाइ अए। तहिना गायो-महीस मे करैए। भोट-भाँट सऽ लऽ कऽ कथा-कुटुमैटी धरि मे किछु नहि किछु हाथ मारिये लैत अछि।’ भाइक बात सुनि इंजीनियर सैहव कने काल गुम्म भऽ गेलाह। मने-मन सोचि-विचारि कहलखिन- ‘कनी बुचाइ के बजौने आबह?’ ‘बड़वढ़िया’ कहि भाइ बुचाइ कऽ बजवै विदा भेल। मने-मन श्रीकान्त सोचै लगलथि जे गाम मे तऽ सभहक हालत तेनाहे सन अछि। देखै छियै जे जेहने घर-दुआर छै तेहने बगए बानि। दू चारि टा जे इँटोक घर देखै छियै सेहो भीतघरे जेँका। तेँ, गाममे ओहन घर बना कऽ देखा देवै जे गामक कोन बात, इलाकाक (परोपट्टाक) लोक देखै आओत। पुरान लोक सभहक कहब छनि जे जेहेन हवा बहै ओहि अनुकूल चली। युग पाइक अछि। जकरा पाइ रहतै ओ बुद्धियार। जेकरा पाइ नै रहतै ओ किछु नहि। असकर बृहस्पतियो फूसि। जकरा पाइ छै ओएह नीक घर बनवैत अछि, नीक गाड़ी मे चढ़ैत अछि। ओकरे धिया-पूता नीक स्कूल-कओलेजमे पढ़ैत अछि। ओकरे परिवारक लोक नीक-लत्ता-कपड़ा पहिरैत अछि। बेटा-बेटीक विआह नीक परिवारमे होइ छै। आइक जे सुख-सुविधा, विज्ञान करौलकए, ओकर सुख भोगैत अछि। यैह ने युगक संग चलब थिक। समाजक बीच प्रतिष्ठा बनाएब तऽ वामा हाथक काज छी। अधला-सऽ अधलाह काज कऽ कऽ पाइ कमा लिअ आ समाज के भोज खुआ दिऔ, बस यशे-यश, प्रतिष्ठे-प्रतिष्ठा। हाथ मे पाइ अछि, सभ किछु कऽ कऽ गैाँआ के देखा देवइ। बेटो-बेटी के पढ़ा-लिखा, विआह-दुरागमन करा कऽ निचेने छी। तखन तऽ एकटा काज मात्र पछुआइल अछि, ओ अछि सामाजिक प्रतिष्ठा। सेहो बनाइये लेब। मने-मन श्रीकान्त विचारिते रहथि कि बुचाइक संग भाइ पहुँचलनि। लगमे अबिते वुचाइ दुनू हाथ जोड़ि कहलकनि- ‘गोड़ लगै छी कक्का। अहाँ तऽ गाम के बिसरि गेलियै। सरकारक एयर कंडीशन मकान भेटिले अछि, ते किअए थाल-कादो मे अबि मच्छर कटाएव?’ अपना कऽ नुकबैत श्रीकान्त बजलाह- ‘नै बौआ, से बात नै अछि। जखने नोकरीक जिनगी शुरु केलहुँ तखने दोसराक गुलाम बनि गेलहुँ। जे-जे हुकूम देत से से करै पड़त। तू सभ कम उमेरक छह तेँ नै देखलहक, मुदा हम तऽ अंग्रेजक शासन देखने छी की ने! शासन तरे-तर चलैत छै, जे सब थोड़े बुझैए। अंग्रेजक पीठिपोहु छल अइठामक राजा-रजबाड़ आ ओकरा सभहक फाँड़ी थिक जमीनदार सभ। ओ सभ जे एहिठामक लोकक संग बेबहार करैत छल आ करैत अछि से त तोहू सब देखते छहक। मुदा अइ सब गप कऽ छोड़ह। तोरा जे बजौलिहह से सुनह। साले भरि आब नोकरी अछि। नोकरी समाप्त भेला बाद गामेमे रहब। तेँ तीनि मासक छुट्टी लऽ कऽ एलहुँ हेँ जे घरारीक अमानत करा घर बनाएब। बिना घरे रहब कतऽ।’ वुचाइ- ‘हँ, ई तऽ जरुरिये अछि। मुदा हमरा किअए बजेलहुँ?’ पासा बदलैत श्रीकान्त कहलनि- ‘मुकुन्द जी केँ सेहो खबड़ि दऽ देने छिअनि। ओहो काल्हि सऽ परसू धरि ऐबे करताह। एहिठाम तऽ दुइये गोटेक घरारी खाली अछि, तेँ दुनू गोटे कऽ रहब जरुरी अछि। तोरा त नै बुझल हेतह, हमर परबावा आ मुकुन्दक परवाबा सहोदरे भाइ छलाह। अढ़ाइ-अढ़ाइ कट्ठाक हिस्सा जमीन दुनू गोरेके अछि। तेँ कोनो पेंच लगावह जे हमरा तीनि कट्ठा हुअए।’ श्रीकान्तक पेटक मैल वुचाइ देखि गेल। मुस्कुराइत बाजल- ‘ऐँ, अही ले अहाँ एते चिन्तित छी। ई तऽ वामा हाथक काज छी। अमीन के मिला लेब, सभ काज भऽ जायत। किऐक तऽ अमीनक गुनिया-परकालमे पाँच-दस धूर जमीन नुकाइल रहै छै। मुदा अइ ले खरचा करै पड़त। हम तऽ जोगारे ने वैसाइब, खर्च त अहींके करै पड़त।’ पाइक गरमी श्रीकान्त के रहबे करनि। मनमे इहो बात रहनि जे भलेही मुकुन्दो इंजीनियर छथि, दुनू गोटेक दरमहो एक्के रंग अछि मुदा पाइमे बरावरी कऽ लेता, से कोना हेतइ। मुस्की दैत कहलखिन- ‘तोहर मेहनत आ हम्मर पाइ। सैह ने। जते खर्च हैत। मुदा मैदान सऽ जीति कऽ अबैक छह।’ श्रीकान्तक बात सुनि बुचाइ मने-मन खुश भेल। मन मे अयलै जे नीक मोकीर हाथ लागलए। भरिसक राशि घुमल हेँ। ओह, बहुत दिन से अखवारो नै पढ़लौ जे कने राशि देखि लैतियै। खैर नहियो पढ़लौ तइओ शुभ राशि वुझि पड़ैए। जोश मे बाजल- ‘कक्का, रुपैया पूत पहाड़ तोड़ैए। ई तऽ मात्र अमानते छी। जे चाहबै, से हेतइ। मुदा अहाँ कंजूसी नै करबै।’ कंजूसीक नाम सुनि श्रीकान्त कहलखिन’ ‘मरदक बात छियै। जे बाजि देब ओ बिना पुरौने नहि छोड़ब।’ बैग सऽ पाँच हजार रुपैया निकालि श्रीकान्त बुचाइके देलखिन। रुपैया जेबीमे राखि बुचाइ प्रणाम कऽ विदा भेल। गामक पेंच-पाँचमे बुचाइ माहिर, मुदा समाजमे अनुचित हुअए, से कखनो नहि सोचय। जहिया कहियो उकड़ू काज अबै तखन गुरुकक्का सऽ पूछि लैत। मने-मन रस्ता मे, सोचै लगल जे अइबेरि हिनका तेहेन सिखान सिखेवनि जे मरै काल तक मन रहतनि। जहिना सरकारी खजाना सऽ लऽ कऽ ठीकेदार धरि सऽ समेटलाहा रुपैया केहेन होइ छै, से सिखताह। आंगन पहुँचि, बुचाइ चारि हजार पत्नीक हाथमे आ एक हजार अपना हाथमे रखलक। जहिना अगहन मे धानक ढ़ेरी देखि, दुनू परानी किसानक मन खुशी सऽ गद-गद होइछै, तहिना दुनू परानी बुचाइके भेलै। मुदा दुनूक खुशीमे अन्तर होइछै। किसानक खुशी मेहनतक फल देखि होइछै जखनकि वुचाइक खुशी दलालीक रहैक। मुस्की दैत बुचाइ घरवाली के कहलक- ‘खिड़की पर एकटा शीशी अछि, कने लेने आउ?’ मँुह चमकवैत घरवाली बजलै- ‘खाइ-पीबै रातिमे शीशी की करब?’ बुचाइ- ‘शीशियो लेने आउ आ खेनाइयो लेने आउ। दुनू संगे चलतै। जाबे भरि मन नै पीअब तावे मूड नै बनत। बहुत बात सोचैक अछि। अहाँ नै ने हमर बात बुझबै?’ पत्नी- ‘अहाँक बात बुझैक जरुरत हमरा कोन अछि। हमरा त अपने मन कोनादन करैत अछि। देह भसिआइ अए। ‘अच्छाा ठीक अछि, अहूँ दू घोट पीवि लेब।’ भोरे बुचाइ चैक पर पहुँचल। गामक बीचमे चैवट्टी। जहि चैबट्टी पर चारु भर सऽ तीस-पेंइतीस टा छोट-छोट दोकान बनौने। दस-बारह टा दू-चारी घर, बाँकी कठधरा। ओना एक्कोटा नमहर दोकान नहि, मुदा सभ कथुक दोकान। जहि स गामक लोक के हाट-बजार जेबाक जरुरत कम पड़ै। जहिया कहियो कोनो परिवार मे नमहर काज होइ जेना- विआह, श्राद्ध इत्यादि, तखने बजार जेबाक जरुरत पड़ै। ओना भरि दिन चैकक दोकान खुजल रहै, मुदा गहिकीक भीड़ साँझे-भिनसर होइ। भरि दिन लोक अपन-अपन काज-उद्यम करैत आ साँझू पहर के दोकानक काज के लैत। सिर्फ चाहे-पानक बिकरी भिनसरु पहर के बेसी होइत। चैक पर पहुँच बुचाइ दुनू चाहवला के एक-एक सय रुपैया दऽ, दोकान पर बैसल सबकेँ चाह पीअबै ले कहलक। गाँजा पिआकक सेहो तीनि ग्रुप चलै। चाह पीबि पान खा बुचाइ चिलमक ग्रुपमे पहुँच, दू दम लगा, तीनू ग्रुपमे पचास-पचास रुपैया गाँजा ले दऽ देलक। सभहक मन खुशीभऽ गेलै। मुस्कुराइत वुचाइ अमीन एहिठाम विदा भेल। गाम मे तीनि टा अमीन। रामचन्द्र, खुशीलाल आ किसुनदेव। कहै ले ते तीनू अमीन, मुदा पढ़ि कऽ अमीन रामचन्द्रे टा भेल। मिड्ल पास केलाक बाद रामचन्द्र हाइ स्कूलमे नाम नहि लिखा सकल। आब तऽ लगे मे हाइ स्कूल खुजि गेल मुदा ओहि समयमे एक्कोटा हाइ स्कूल परोपट्टामे नहि छल, जहि सऽ रामचन्द्र आगू नहि पढ़ि सकल। बाहर जा कऽ पढ़ैक ओकाइत रामचन्द्रक पिता के नहि। सर्वे अबै स दस-पनरह बर्ख पहिने, मुजफुरपुरक एकटा अमीन गाममे आबि अमानतक स्कूल खोललक। छह मासक कोर्स। चारि विषयक- पैमाइस, क्षेत्रमिति, कानून आ चकबन्दी-पढ़ाई। ओना समानो सब- गुनिया, परकाल, मास्टर स्केल, लेन्स, राइटऐंगिल, प्लेन टेबुल, कंघी, टाँक, थ्याजो रैटर, जंजीर, फीता रखने। पाँच रुपैया महीना फीस लैत। मधुकान्तक दरवज्जे पर स्कूल खोललक। मधुकान्ते खाइओ ले दै। जकरा बदलामे मधुकान्तके सेहो पढ़ा देलक। ओना गामोक आ गामक चारु भरक गामक विद्यार्थी सेहो पढ़लक। कुल मिला कऽ पनरह 2गोरे पढ़लक। मुदा जमीनक नापी-जोखी कम होइ, तेँ रामचन्द्र छोड़ि सब अमीनी छोड़ि देलक। सर्वे अबै सऽ महीना दिन पहिने बेगूसरायक एक गोटे आबि पाँच-पाँच सौ मे अमानतक सर्टिफिकेट बेचैले अयलै। ओकरे सऽ खुशीलालो आ किसुनदेवो सर्टिफिकेट कीनने रहय। गामे-गाम सर्वेक काज शुरु भेल। अमीन सभहक चलती आयल। नक्शा बनब शुरु होइतहि दलाली शुरु भेल। पाइ दऽ दऽ लोक अपन-अपन खेतक नक्शा बढ़वै लगल। लोकक दलाल अमीन आ सरकारक सर्वेयर। खुशीलालो आ किसुनदेवो उठि वैसल। मुदा रामचन्द्र कात रहल। गाय-महीस, गाछ-बिरीछ बेचि-बेचि लोक (किसान) रुपैया बुकै लगल। रामचन्द्र दबि गेल मुदा खुशीलाल आ किसुनदेव नाम कमा लेलक। जिमहर निकलैत तिमहर लोक सब चाहो-पान करवै आ अमीन सैहव, अमीन सैहव कहि परनामो करै। दुनू गोटे सर्वेक नांगड़ि पकड़ि, किस्तवार सऽ लऽ कऽ तसदीक खानापुरी, दफा-3, दफा- 6, 8, 9 धरि दौड़ि-बड़हा करैत रहल। जहि सऽ मोटर साइकिल मेन्टेन करै लागल। खुशीलाल ओहिठाम पहुँच वुचाइ श्रीकान्त दिशि सऽ नापीक अमीन मुकर्रर क लेलक। नापीक फीसक अतिरिक्त पक्ष लेवाक फीस सेहो गछि लेलक। दोसर दिन मुकुन्द जी सेहो गाम पहुँचलाह। रहैक सऽ ओरियान केनहि अयलाह। गाम अबिते दू टा जन राखि परती छिलवा रौटी ठाढ़ करौलनि। जखन जन जाइ लागल तखन पूछलथिन- ‘गाममे के सभ नेतागिरी करै अए?’ मुकुन्दजीक बात सुनि एक गोटे वुचाइक नाम कहलकनि। बुचाइक नाम सुनि बजा अनै ले कहलथिन। दुनू गोटे विदा भेल। दुनू कोदारि लऽ एक गोटे घर पर गेल आ दोसर गोटे वुचाइ एहिठाम। मुकुन्द जी पत्नी के कहलखिन- ‘कने चाह बनाउ? पत्नी चाह बनवैक ओरियान करै लगली। गैस चुल्हि पर ससपेन चढ़ा, बजलीह- ‘ककरा ले तीनि महला मकान बनेलहुँ।’ पत्नीक बात सुनि मुकुन्दजीक करेज दहलि गेलनि। करेज कऽ दहलितहि आखिमे नोर आबि गेलनि। आँखि उठा पत्नी दिशि देखि, आँखि निच्चा कऽ लेलनि। रुमाल सऽ नोर पोछि मुकुन्द जी मने-मन सोचै लगलाह जे अपन हारल ककरा कहवै। सपनो मे नइ सपनाइल रही जे पढल़-लिखल मनुक्ख एत्ते नीच होइत अछि। कत्ते मेहनत स बेटा कऽ पढ़ेलहुँ, नोकरी दिऐलहुँ। नीक घर नीक कन्याक (पढ़ल-लिखल) संग विआह करेलहुँ। मुदा फल उल्टा भेटल। पढ़ल-लिखल लोक जे अपन सासु-ससुरक संग ऐहेन बरताव (बर्ताव) करै, त लोक जीविये के की करत? अइ सऽ नीक मरनाइ। मुदा मृत्युओ तऽ ओते असान नहि होइछै। तखन तऽ जे भाग्य-तकदीरमे लिखल अछि, से भोगब। जँ बुढा़ढ़ी मे गनजने लिखल रहत ते क्यो बाँटि लेत। ओ त विधाताक रेख छी। के बदलि देत? मूड़ी गोतने मुकुन्द घुनघुना कऽ बजैत रहथि। पत्नीक आँखि तऽ ससपेन पर रहनि मुदा करेज पीपरक पात जेँका, जे बिनु हवोक डोलैत रहैत, डोलैत रहनि। आँखि स,ऽ समतल भूमिक पाइन जेँका, नोर टधरैत। चाह बनल। दुनू गोटे आमने-सामने वैसि चाह पीबऽ लगलाह। एक घोंट के चाह पीबि, दुनू गोटे दुनू गोटेक मुह दिशि देखलनि। मुदा क्यो किछु नहि बजलाह। जना हृदयक भीतर दुनू केँ विरड़ो उठैत रहनि। दुइये घोट चाह पीलनि, बाकी सब सरा कऽ पानि भऽ गेल। ओहि काल बुचाइ पहुँचल। अबिते वुचाइ, दुनू हाथ जोड़ि, दुनू गोटे के प्रणाम कऽ बैसल। बुचाइ के देखितहि, मुकुन्द मन कऽ थीर करैत पत्नी के कहलथिन- ‘भरि दिनक थकान देह के खण्ड-खण्ड तोड़ैत अछि। मन कोनादन करैए। कने एटैची सऽ एकटा बोतल लेने आउ। जावे पीबि नहि ताबे कोनो बाते ने कयल हैत।’ पतिक बात सुनि पत्नी एटैची स एकटा किलो भरिक ब्राण्डीक बोतल आ दू टा गिलास निकालि के आनि आगू मे राखि देलक। तीनू गोटे- मुकुन्द, पत्नी राधा आ बुचाइ- त्रिकोण जेँका तीनू दिशि सऽ बैसै जाइ गेलाह। बीच मे मोड़़़ूआ टेबुल लोहाक राखि देल गेलै। टेबुल पर गिलास बोतल रहै। बोतलक मुन्ना खोलि मुकुन्द दुनू गिलास मे ब्राण्डी देलथिन। एक गिलास अपनो लऽ एक गिलास वुचाइ दिशि बढ़ौलनि। ब्राण्डी देखि बुचाइक मन तऽ चटपटाइ लगलै, मुदा अनभुआर लोकक संग पीबैक परहेज करैत बाजल- ‘कक्का जी, ई सभ हम नै पीबै छी। गाम मे हमरा कतऽ ई चीज भेटत। गरीब-गुरवा लोक छी, जँ कहियो मनो होइए तऽ एक दम चीलम मे लगा लै छी। नै तऽ पीसुआ भाँगक एकटा गोली चढ़ा दइछियै।’ जिद्द करैत मुकुन्द कहलथिन- ‘ई तऽ फलक रस छियै। कोनो कि मोहुआ दारु आ कि पोलीथिन छियै जे अपकार करतह?’ मुकुन्दक मनमे रहनि जे शराब पीआ बुचाइ सऽ सभ बात उगलवा लेब। जाबे गामक तहक बात नै वुझवै ताबे किछु करब कठिन हैत। दुनू गोरे एक-एक गिलास पीलक। गिलास राखि मुकुन्द सिगरेटक डिब्बा आ सलाइ निकालि, एकटा अपनो हाथमे लेलनि आ एकटा वुचाइयो के देलथिन। दुनू गोटे सिगरेट पीबै लगल। सिगरेटक धुँआ मँुह सऽ फेकैत मुकुन्द कहलथिन- ‘बुचाइ, हम तऽ आब बुढ़ा गेलहुँ, तू सभ नौजवान छह। तोरे सब पर ने गाम सऽ लऽ कऽ देश तक के दारोमदार अछि। शहर मे रहैत-रहैत मन अकछा गेल। साले भरि नोकरियो अछि। तेँ, चाहैै छी जे जल्दी नोकरी समाप्त हुअए जे गाम आबि अपन सर-समाजक बीच रहब। मुदा गाम मे तऽ अपना किछु अछि नहि। लऽ दऽ कऽ थोड़े घरारी अछि। जेकरा नपा कऽ घर बनवै चाहै छी। तहि मे तू कने मदति कऽ दैह।’ एहिपर बुचाइ कहलक- हमरा बुते जे हैत से जरुर कऽ देब। अहाँ तऽ अपने तत्ते कमा कऽ टलिया लेने छी जे अनकर कोन जरुरत पड़त?’ मुकुन्द- तू तऽ जनिते छहक जे सभ दिन नीक घर मे रहै छी, नीक गाड़ी मे चढै़ छी, नीक लोकक बीच आमोद-प्रमोद करै छी, से कोना हैत? वुचाइ- अहाँ की कोनो खेती-पथारी करब आ कि माल-जाल पोसब, जे तइ ले खेत-पथार चाही। लऽ दऽ कऽ रहैक घर चाही। से त घरारी अछिये। मुकुन्द- कहलह से ठीके, मुदा रहै ले तऽ घर बनाबै पड़त। बिजली गाममे नै छै तइ ले जेनरेटर बैसेबै पड़त, पाइनिक टंकी नै छै तइ ले कलक संग-संग मोटर सेहो लगबौ पड़त। गाड़ी रखै ले घर आ साफ करै ले सेहो जगहक जरुरत हैत। पैखाना, नहाइ ले सेहो घर चाही, घरक आगू मे दसो धुरक फुलवारी, बैइसै ले चवुतरा सेहो चाही। चारु भर छहर-देवाली बनवै पड़त। सब ले ते जमीने चाही।’ बुचाइ हँ मे हँ मिलौलक- ‘हँ, से त चाहबे करी। मुदा हमरा की कहै चाहै छी? मुकुन्द बजलाह- तोरा यैह कहै छिअह जे अपना अढ़ाइये कट्ठा घरारी अछि, तइ मे सभ किछु कोना हैत? कहुना कऽ दसो धुर आरो बढ़वैक गर लगावह।’ मुकुन्दक बात सुनि बुचाइक मन मे हँसी उठल। हँसी के दबैत बाजल- ‘देखियौ कक्का, पाँच-दश धुर जमीन अमीनक हाथमे रहैछै, मुदा ओ तऽ तखने हैत जखन पंचो आ अमीनो पक्षमे रहत।’ मुकुन्द- एही ले ने तोरा बजेलियह। हमरा त ककरो सऽ जान-पहचान नै अछि। मुदा तोरा तऽ सभसऽ छह, तेँ, तू हमरा अप्पन बुझि मदति करह।’ मने-मन बुचाइ सोचलक जे पनहाइल गाय जेँका छथि, तेँ सरिया कऽ हिनका सिखवैक अछि। चोपाडा़ दैत बाजल- ‘देखियौ कक्का, गामक लोक गरीब अछि, ओ जे पक्ष लेत से ओहिना किअए लेत? गैाँआक लेल जेहने अहाँ तेहने श्रीकान्त कक्का। तखन त क्यो जे नेत घटाओत से बिना मीठ खेने किअए घटौत? मुकुन्द कहलनि- ‘तइ ले हमहुँ तैयारे छी। जेना जे तू कहवह से हम देबह।’ बुचाइ- ‘अच्छा हम भाँज-भूज लगबै ले जाइ छी। मुदा काल्हि खन श्रीकान्त कक्का सेहो कहने रहथि। ओना हम हुनका कहि देने रहिएनि जे अमानतक दिन हमहूँ रहब। तेँ, थोड़े दिक्कत हमरा जरूर अछि। मुदा तइयो दिन-देखार तऽ हम अहाँक भेटि नहि करब, साँझ मे जरूर करब। जेना जे हेतइ से सभ बात अहाँ के कहैत रहब आ अहूँ ओहि हिसाब सऽ अपन गर अँटबैत रहब। ओना, गाम मे अखन सरूपक संग बेसी लोक छै, तेँ अहाँ के ओकरा स भेटि करा दै छी। ओ जँ तैयार भऽ जायत तऽ क्यो ओकरा रोकि नहि सकतै।’ ‘बड़वढ़िया’ कहि मुकुन्द बैग स दस हजार रूपैया निकालि बुुचाइ के दऽ देलथिन। रूपैया गनि वुचाइ बाजल- ‘अइ से की हैत? मुकुन्द कहलनि- ‘‘गामक पेंच-पाँच हम नै बुझै छियै। काजो तऽ उकड़ू-ए अछि एते ताबत राखह। जेना-जना काज आगू बढै़त जायत तेना-तेना कहैत जहिहऽ।’ ‘बड़बढ़िया’ कहि वुचाइ प्रणाम कऽ विदा भऽ गेल। मने-मन मुकुन्द सोचै लगल जे भलेही श्रीकान्तो इंजीनियरे छथि मुदा जते पाइ हम कमेलहुँ तते हुनकर नन्ना सेहो ने देखने हेथिन। भऽ जाय पाइयेक भिड़ंत। मने-मन सोचबो करथि आ खुशियो होनि। मुुकुन्द ओहिठाम सऽ निकललाक बाद रस्ता मे बुचाइ विचारै लागल। आ-रौ बहिं, आइ धरि एहेन-एहेेन बुढ़बा चोट्टा नै देखने छलौं। जिनगी भरि पाइये हँसोसथि रहल मुदा सबुर नै भेलै। अच्छा, अइबेरि दुनू सिखताह। जइ गामक लोक, आइ धरि सहि-मरि अपन बाप-दादाक गाम आ घरारी धेने रहल, समाजक बेरि-बिपत्ति मे संगे प्रेम सऽ रहल ओहि गाम मे जँ ऐहेन-ऐहेन चोट्टा आबि कऽ रहत, तऽ क-ए दिन गाम केँ सुख-चैन से रहए देत। सबके टीक मे टीक ओझरा नाश करत की नहि?’ दोसर दिन, सबेरे सात बजे बुचाइ सरूप ऐठाम पहुँचल। दुनू कऽ बच्चे स दोस्ती, तेँ, धियो-पूतो भेलो पर दुनूक बीच रउऐ-रउ चलैत। सरूप कऽ दरवज्जा पर नहि देखि बुचाइ सोर पाडै़ लागल- ‘दोस छेँ रौ, रौ दोस।’ बुचाइ के मुकुन्द जे पाइ देने रहथिन ओहि मे सऽ पाँच सौ दऽ ओकरा मिला लेलक आ कहलक- ‘‘तों मुकुन्द कक्का दिश रहऽ आ हम श्रीकान्त कक्का दिश रहबौ, मुदा वैह करब जे नेत कहैए। पहिने चल गुरु कक्का ओहिठाम, हुनका सभटा बात वुझा दै छियनि।’ दोसर दिन, दुनू गोटे (बुचाइयो आ सरुपो) गुरु कक्का लग पहुँचल। गुरुकक्का दलाने पर। दुनू गोटे प्रणाम कऽ बैसल। दुनू गोटे केँ देखि गुरु कक्का पूछलथिन-‘की बात छियै हौ बुचाइ? दुनू भजार के संगे देखै छिअह?’ बुचाइ- ‘अहीं लग तऽ एलौ हेँ कक्का। श्रीकान्तो काका आ मुमुन्दो काका घरारी नपौताह। ओहि मे अपनो रहबै।’ गुरुकाका- ‘की करताह ओ सब घरारी नपा कऽ। केहेन बढ़िया त धिया-पूता सभ खेलाइए ओहि डीह पर।’ सरुप बाजल- ‘रिटायर केलाक बाद गामेमे रहताह। नोकरियो लगिचाइले छनि। तेँ एखने नपा कऽ घर मे हाथ लगौता। गुरुकक्का- ‘सुनै छी जे दुनू गोटे शहरेमे घर बनौने छथि, तखन गाम मे बना कऽ की करताह। हुनका सभ के गाममे थोड़े वास हेतनि। जिनगी भरि त बड़का-बड़का होटल देखलथिन, नीक रोड पर नीक सवारी मे चललाह, से सभ गाम मे थोड़े भेटितनि। अनेरे गाम मे आबि कऽ किए थाल-कादो मे चलता आ मच्छर कटौताह।’ गुरुकाकाक बात सुनि लपकि कऽ बुचाइ बाजल- ‘से नै बुझलियै कक्का, दुनू गोटे भारी चोट खा चोटाइल छथि। तेँ गाम दिशि झुकलाह।’ से की?’ बुचाइ- ‘तेसर सालक घटना छियै। श्रीकान्त काकाक पत्नी ड्राइवरक संग बजार गेलीह। बजार सऽ समान कीनि जखन घुमली तऽ दोसर गाड़ी सेहो पछुअवैत। जखन फाँक (पाँतर) मे गाड़ी पहुँचलनि त पछिला गाड़ी आगू आबि रोकि देलकनि। गाड़ी सऽ चारि गोटे उतड़ि हिनका गाड़ीमे बैसि ड्राइवर के ‘दोसर रस्ता से गाड़ी बढ़वै ले कहलक। बेचारा की करैत। बढ़ल। थोड़े दूर गेला पर गाड़ी रोकि, काकी कऽ उताड़ि ड्राइवर कऽ कहलक- ‘मालिक के जा कऽ कहियनु जे पाँच लाख रुपैया लेने आबथि आ पत्नी केऽ जाथि। दू घंटाक समय दैत छिअह।’ ड्राइवर विदा भेल। इम्हर काकी के चारि-पाँच ठूसी मँुह मे लगा देलकनि। जहि सऽ अगिला चारि टा दाँतो टुटि गेलनि। ठोहि फाड़ि कऽ कानै लगलीह। कनिते काल मोवाइल दऽ कहलकनि जे पति कऽ कहिअनु जे जल्दी रुपैया लऽ कऽ आउ, नै तऽ हम नै बाँचव। तावे ड्राइवरो पहुँच कऽ कहलकनि। अपना हाथमे दुइये लाख रुपैया रहनि, जे हालक आमदनी रहनि, ओना बैंक मे तऽ ढेर रहनि। ओइह दुनू लाख रुपैया लऽ कऽ गेला आ पैर-दाढ़ी पकड़ि कऽ पत्नी कऽ छोड़ा अनलनि।’ बुचाइक बात सुनि ठहाका मारि हँसि, गुरुकाका- ‘मुकुन्द किअए औताह?’ मुस्की दैत बुचाइ- ‘हुनकर तऽ आरो अजीव बात छनि। एक दिन एकटा ठीकेदारक पार्टी चललै। जते बड़का-बड़का हाकीम आ ठीकेदार सब छल, सभ रहए। इहो (मुकुन्द) अपन पुरना गाड़ी छोड़ि नवका गाड़ी, जे बेटा के सासुर मे देने रहनि, ल कऽ गेला। जखन पार्टी स घुमि कऽ अयलाह तऽ पुतोहू कहलकनि- ‘पुतोहूक गाड़ी पर चढ़ैत केहेन लागल?’ अइ बातक चोट हुनका खुब लगलनि। बेटा-पुतोहू सऽ मोह टूटि गेलनि। तेँ गामे मे रहताह।’ बुचाइक बात सुनि गुरुकक्का गुम्म भऽ गेलाह। कने काल गुम्म रहि, मने-मन बिचारि, कहलखिन- ‘गाम त गामे छी।’ अमानत भेल। कोनो बेसी झमेल रहवे नै करै। पाँच कट्ठा के दू भाग केनाइ। बँटवारा करैत रामचन्द्र अमीन कहलथिन- ‘जिनका संदेह हुअए ओ चाहे कड़ी स, वा फीता स, वा लग्गी सऽ वा डेग सऽ भजारि लिअ।’ मुकुन्द एक बेर बुचाइ दिश ताकथि आ दोसर बेर अमीन दिश। श्रीकान्तोक सैह हाल रहनि। किन्तु अमानत तऽ समाप्त भऽ गेल छल। प 89.अपराजित दुर्गानंदमंडल अ अअअअअन्हरगरे करियाकाका लोटा नेनहि मैदान दिशि स आबि रस्ते पर स बोली देलखिन.......। हमहूँ मैट्रिकक परीक्षा दइ ले जाइक ओरियान करैत रही। ओना हमर नीन बड़ मोट अछि मुदा खाइये बेरि (राति मे) मे माए कऽ कहि देने रहियै जे कने तड़गरे उठा दिहें नइ त गाड़ी छुटि जायत। किऐक त साढ़े पाँचे बजे गाड़ीक समय अछि। आध घंटा स्टेशन जाइयो मे लगैत अछि। तेँ, पौने पाँच बजे घर स विदा होएव तखने गाड़ी पकड़ाएत। जँ इ गाड़ी छुटि जायत त भरि दिन रस्ते मे रहब। निरमली स जयनगरक लेल एक्के टा डायरेक्ट गाड़ी अछि। नहि त सब गाड़ी सकरी मे बदलै पड़ैत अछि। तहू मे बसवला सब तेहेन चालाकी केने अछि जे एक्को टा गाड़ीक मेलि नहि रहए देने अछि। तीनि-चारि घंटा सकरीक प्लेटफार्म पर बैसू तखन दरभंगा दिशि स गाड़ी आओत। तहू मे तेहेन लोक कोंचल रहत जे चढ़बो मुश्किल। तेँ इ गाड़ी पकड़़ब जरुरी अछि। ततबे नहि, अपन स्कूलक विद्यार्थियो सब यैह (अइह) गाड़ी पकड़त। अनभुआर इलाका, तेँ असगर-दुसगर जाइबो ठीक नहि। सुनै छी जे ओहि इलाका मे उचक्को बेसी अछि। जँ कहीं कोनो समान उड़ौलक त आरो पहपटि मे पड़ि जायब। करिया कक्काक बोली सुनि चिन्है मे देरी नइ भेलि। किऐक त हुनकर अबाज तेहेन मेही छनि जे आन ककरोक बोली स नहि मिलैत। बोली अकानि हम दरबज्जेक कोठरी स कहलिएनि- ‘कक्का, आउ-आउ। हमहूँ जगले छी। पँचबजिया गाड़ी पकड़ैक अछि तेँ समान सब सरिअबै छी।’ रस्ता पर स ससरि काका दरवज्जाक आगू मे आबि कहलनि- ‘कने हाथ मट्टिया लइ छी। तखन निचेन स बैसवो करब आ गप्पो करब ।’ कहि पूब मुहे कल दिशि बढ़लाह। हमहूँ हाँइ-हाँइ समान सरिअबै लगलौ। कल पर स आबि काका ओसारक चैकी तर मे लोटा रखि अपने चैकी पर बैसलाह। चैकी पर वैसितहि गोलगोलाक (गोल गलाक) जेबी स बिलेती तमाकुलक पात निकालि तोड़ैत बजलाह- ‘भाय सहाएब कहाँ छथुन?’ ‘ओ काल्हिये बेरु पहर नेवानी (नवानी) गेला, से अखन धरि कहाँ ऐलाह हेन।’ ‘हमर बात सुनि, करिया काका चुनौटी स चून निकालि तरहस्थी पर लइत बजलाह- ‘अखन जाइ छी, हैत (होएत) त ओइ बोरि मे फेरि आयब।’ काकाक वापस हैब (होएव) हमरा नीक नहि लागल। किऐक त लगले ऐलाह आ चोट्टे घुरि जेताह। तेँ बैइसै दुआरे बजलहुँ- ‘अहाँ त कक्का गाम मे दगबिज्जो कऽ देलियैक। एत्ते खर्च कऽ कऽ कियो कन्यादान नहि केने छलाह। अहाँ रेकर्ड बना लेलियैक।’ अपन प्रशंसा सुनि करिया काका मुस्कुराइत बजलाह- ‘ बौआ, युग बदलि रहलि अछि। तेँ, सोचलहुँ जे नीक पढ़ल-लिखल बड़क संग बेटीक विआह करब। हमरो बेटी त बड़ पढ़ल-लिखल नहिये अछि। मुदा रामायण, महाभारत त धुरझार पढ़ि लइत अछि। चिट्ठियो-पुरजी लिखिये-पढ़ि लइत अछि। घर-आश्रम जोकर त ओहो पढ़नहि अछि। ओकरा कि कोनो नोकरी-चाकरी करैक छैक जे स्कूल-कओलेजक सर्टिफिकेट चाहियैक। अपना सब गिरहस्त परिवार मे छी तेँ बेटी कऽ बेसी पढ़ाएव नीक नहि।’ ‘किअए?’ अपना सबहक परिवर मे गोंत-गोबर स लऽ कऽ थाल-कादो धरिक काज अछि। ओ त घरेक लोक करत। तइ मे देखवहक जे जे स्त्रीगण पढ़ल-लिखल अछि ओ ओहि काजक भीड़ि नहि जाय चाहतह। आब तोंही कहह जे तखन गिरहस्ती चलतै कोना?’ काकाक तर्कक जबाव हमरा नहि फुड़ल। मुदा चुप्पो रहब उचित नहि बुझि कहलिएनि- ‘जखन युग बदलि रहल अछि तखन त सबकेँ शिक्षित होएव जरुरी अछि की न?’ सब पढ़त सब नोकरी करत। नीक तलब उठाओत। जहि स घरक उन्नति आरो तेजी स होएत। तहू मे महिला आरक्षण भेने नोकरियो मे बेसी दिक्कत नहिये होएत।’ करियाकाका- ‘कहलह त बड़ सुन्दर बात, मुदा एकटा बात कहह जे दुनू गोटे (मर्द-औरत) एक्के स्कूल वा आॅफिस मे नोकरी करत तखन ने एकठाम डेरा रखि परिवार चलौत। मुदा जखन पुरुष दोसर राज्य वा दोसर जिला वा दस कोस हटि क नोकरी करत तखन कोना चलतै। परिवार त पुरुष-नारीक योग स चलैत अछि की ने। परिवार मे अनेको ऐहेन काज अछि जे दुनूक मेल (सहयोग) स होएत। मनुष्य त गाछ-विरीछ नहि ने छी जे फलक बीआ (आँठी) कतौ फेकि देवइ त गाछ जनमि जायत। आब त तोहूँ कोनो बच्चा नहिये छह जे नै बुझबहक। मनुष्यक बच्चा नअ मास (270 दिन) माइक पेट मे रहैत अछि। चारि-पाँच मासक उपरान्त माइक देह मे (बच्चाक चलैत) कते रंगक रोग-व्याधिक प्रवेश भऽ जाइत छैक। किऐक त माइक संग-संग बच्चोक विकासक लेल अनुकूल भेजन, आराम आ सेवाक आवश्यकता होइत। तखन (माए) असकरे की करत? नोकरी करत आ कि पालन करत? एहि लेल त दोसरेक मदतिक जरुरत होइत।’ ‘आन-आन देश मे त मर्द-औरत सब नोकरी करैत अछि आ ठाठ स जिनगी वितबैत अछि।’ करियाकाका- ‘आन देशक माने इ बुझै छहक जे जत्ते दोसर देश अछि सबहक रीति-नीति जीवन शैली एक्के रंग छैक? नहि। एकदम नहि। किछु देशक एक रंगाहो अछि। मुदा फराक-फराक सेहो अछि। हँ, किछु ऐहन अछि जहि ठाम मनुष्य सार्वजनिक सम्पत्ति वुझल जाइत छैक। ओहि देशक व्यवस्थो दोसर रंगक अछि। सब तरहक सुविधा सबहक लेल अछि। तहि ठामक लेल ठीक अछि। मुदा अपना ऐठाम (अपना देश) त से नहि अछि। तेँ, एहिठामक लेल ओते नीक नहि अछि जते अधलाह।’ अपना कऽ निरुत्तर होइत देखि बात कऽ विराम दइक विचार मन मे उठै लगल। तहि बीच आंगन स माए आबि गेलीह। माए कऽ देखितहि हम अपन समान सरिअबै कोठरी दिशि बढ़ि गेलहुँ। करिया काका कऽ देखि माए कहलकनि- ‘बौआ अहाँ त गाम मे सब केँ उन्नैस कऽ देलियै। आइ धरि, गाम मे, बेटी विआह मे एते खर्च कियो ने केने छलाह।’ अपन बहादुरी सुनि मुस्कुराइत करिया काका कहलखिन- ‘भौजी अपराजित कऽ असिरवाद दिऔ जे नीक जेँका सासुर बसे।’ माए- ‘भगवान हमरो औरुदा ओकरे देथुन जे हँसी-खुशी स परिवार बनावे। पाहुन-परक त सब चलि गेल हेताह?’ करियाकाका- ‘हँ भौजी। कल्हि सत्यनारायण भगवानक पूजा कऽ हमहूँ निचेन भऽ गेलहुँ। पाहुन मे पाहुन आब एक्के टा सरहोजि टा रहि गेल अछि। ओहो जाइ ले छड़पटाइ अए। मुदा ओकरा पाँच दिन आरो रखै चाहै छी।’ माए- ‘जहिना एकटा काज कऽ (बेटीक विआह) खेलौना जेँका गुड़केलहुँ तहिना दोसर (सरहोजि) कऽ आब गुड़कबैत रहू।’ सरहोजि दिशि इशारा होइत देखि कक्का बुझि गेलखिन। मकैक लावा जेँका बत्तीसो दाँत छिटकबैत- ‘ध् ारमागती पूछी त भौजी एते भारी काज-जे ने खाइक पलखति होइत छल आ ने पानि पीबैक। तीनि राति एक्को बेरि आखि नहि मुनलौ। मुदा ओकरो (सरहोजि) ध् ान्यवाद दिअए जे धिरनी जेँका दिन-राति नचैत रहलि। ओते फ्रीसानी रहए तइओ कखनो मुह मलिन नहि। सदिखन मुह स लबे छिटकैत। तेँ सोचे छी जे पाँच दिन पहुनाइ करा दिअए।’ माए- ‘बच्चा कइ-ए टा छैक?’ ‘एक्को टा नहि। तीनिये साल स सासुर बसै अए। उमेरो बीस-बाइस बर्ख सऽ बेसी नहिये हेतइ।’ ‘आब त लोक कऽ बिआहे साल बच्चा होइ छै आ अहाँ कहै छी जे तीनि साल स सासुर बसै अए।’ ‘ऐँह, हमरा त अपने पान सालक बाद भेलि आ अहाँ तीनिये साल मे हदिआइ छी। अच्छा एकटा बात हमहीं पूछै छी जे भैया ने हमरा से साल भरि जेठ छथि मुदा अहाँ त साल छौ मास छोटे होएब। अहों कोन-कोन गहबर, आ ओझा-गुनी लग गेलि रही।’ अपना क हारैत देखि, बात (विषय) बदलैत माए बाजलि- ‘सब मिला कऽ कते खर्च भेल?’ करियाकाका- ‘धरमागती पूछी त भौजी हमहूँ कंजुआइ केलियै। मुदा तइओ पाँच लाख स उपरे खर्च भेल। तीनि लाख त नगदे गनि कऽ देने छलिऐक। तइ पर स डेढ़ लाखक समान (गहना, बरतन, लकड़ीक समान, कपड़ा) देलियै। पचास हजार स उपरे बरिआतीक सुआगत मे लागल। तइ पर स झूूठ-फूस मे सेहो खर्च भेल।’‘एते खर्च केलियै तखन किअए कहै छिअए जे हमहूँ कंजुआइ केलियै?’ ‘देखिओ भौजी, हमरा दस बीधा खेत अछि। तेकर बादो कते रंगक सम्पत्ति अछि। गाछ-बाँस, घर-दुआर, माल-जाल। अइ सब कऽ छोड़ि दइ छी। सिर्फ खेतेक हिसाब करै छी। अपना गाम मे दस हजार रुपये कट्ठा स लऽ कऽ साठि हजार रुपये कट्ठा जमीन अछि। ओना सहरगंजा जोड़बै त पेंइतीस हजार रुपये कट्ठा भेलि। मुदा हम्मर एक्कोटा खेत ओहन नहि अछि जेकर दाम चालीस हजार रुपये कट्ठा स कम अछि। बेसियोक अछि। मुदा चालिसे हजारक हिसाव स जोड़ै छी त आठ लाख रुपये बीधा भेलि। दस बीधाक दाम अस्सी लाख भेलि। तीनि भाइ-बहीनि अछि। हमरा लिये त जेहने बेटा तेहने बेटी। अनका जेँका त मन मे दुजा-भाव नै अछि। आब अहीं कहू जे कोन बेसी खर्च केलियै।’ बातक गंभीरता कऽ अंकैत माए- ‘अहाँ विचारे बेटीक विआह मे कते खर्च बाप कऽ करै चाहियैक?’ करियाकाका- ‘देखियौ भौजी, जे बात अहाँ पुछलहुँ ओकर जबाव सोझ-साझ नहि अछि। किऐक त जते रंगक लोक आ परिवार अछि तते रंगक जिनगी छैक। मुदा अनका जे होउ, हमरा मन मे इ अछि जे बेटा-बेटी एक-रंग जिनगी जीवए। मुदा समस्यो गंभीर अछि। धाँइ दे किछु कहि देने नहि हेतइ।’ ‘एते लोक सोचै छै?’ ‘से ज नहि सोचै छै तेँ ने एना होइ छै। जँ अपने कोनो बात नहि बुझियै त दोसर स पूछैइयो मे नहि हिचकिचेवाक चाही।’ अपराजितक विआह कन्हैयाक संग भेलि। जेहने रिष्ट (हिरिष्ट) पुष्ट शरीर अपराजितक तेहने कन्हैयाक। दुनूक रंग मे कने अन्तर। जहिठाम कन्हैया लाल गोर तहिठाम अपराजित पिंडश्याम। (ने अधिक कारी आ ने अधिक गोर) जहि स दाय-माएक अनुमान जे किछु दिनक उपरान्त दुनूक रंग मिलि जायत। अर्थात् एकरंग भऽ जायत। विआहक तीनि मास बाद कन्हैयाक बहाली कओलेजक डिमोसट्रेटरक पद पर भेल। नोकरी पबितहि सासुरेक रुपैया (दहेजवला) स दरभंगा मे डेढ़कट्ठा जमीन कीनि घर बना लेलक। गाम स शहर दिशि बढ़ल। जहि स जिनगी मे बदलाव हुअए लगल। एक दिशि आधुनिकता (बजारु आधुनिकता) जोर पकड़ै लगलै त दोसर दिशि ग्रामीण जिनगीक रुप टूटै लगलै। रंग-विरंगक भोग-विलाशक वस्तु स घर सजवै लगल। पाइयक अभावे ने बुझि पड़ैत। किऐक त भैयारी मे असकरे। तेँ गामक सब सम्पति (जमीन) बेचि-बेचि आनए आ मौज करए। मिथिला कन्या अपराजित। तेँ पतिक काज मे हस्तक्षेप नहि करै चाहैत। पति-पत्नीक बीच ओहने संबंध जेहेन अधिकांशक। शिक्षाक स्तर गिरल। अजाति सब सरस्वतीक मंदिर मे प्रवेश केलक। जहिठाम टयूशन (प्राइवेट) पढ़ाएव अधलाह काज बुझल जाइत छल, से प्रतिष्ठित भऽ गेल। परिणाम भेल जे टयूशन कऽ अधलाह (पाप) वुझनिहार शिक्षक स्वयं मूर्खक प्रतीक बनि गेलाह। अवसरक लाभ अज्ञानी कऽ बेसी भेलइ। पाइ-कौड़ीवला कन्हैया कोना नै अवसरक लाभ उठबैत। बीसे हजार मे एम.ए. सी (फिजिक्स) क सर्टिफिकेट कीनि लेलक। विश्वविद्यालयो कानून पास केने जे नवशिक्षकक बहाली मे कओलेजक डिमोसट्रेटर कऽ प्राथमिक देल जायत। कन्हैयो फिजिक्सक प्रोफेसर बनि गेल। हाइ स्कूल वा सरकारी आॅफिस जेँका प्रोफेसर कऽ ड्यूटियो नहि। साल मे कओलेज छह मास बन्ने रहत बाकी समय मे कहियो ड्यूटी (क्लास) होएत कहियो नहि होएत। तइ पर स अपन सी.एल. आ मेडिकल पछुआइले। पाँच बर्ख बीतैत-बीतैत कन्हैयाक माए-बाप मरि गेल। मरने लाभे। धरारी धरि बेचि कऽ बैंक मे कन्हैया जमा कऽ लेलक। मुदा एकटा बात जरुर केलक। ओ इ जे घरारीक रुपैआ (घरारीक दाम अखनो मिथिलांचल मे अधिक होइत। कारण नइ बुझै छी) स पाँच टा आलमारी आ जते किताव स आलमारी भरल, ओते किताव जरुर कीनि लेलक। एक त पाइक गर्मी दोसर किताबक गर्मी (अध्ययनक गर्मी नहि देखलाहा गर्मी) स कन्हैयाक मति ऐहेन बदलि गेल जेहेन ठंढ़ा पानि आ ठंढ़ा दूध स चाह बनैत। अखन धरि (छह बर्ख) दू टा सन्तान सेहो भेल। अपन दुनियाँक बीच0 अपराजित नचैत तेँ कन्हैयाक जिनगी कोना देखैत? दोसर उचितो नहि किऐक त हर युवा आदमी कऽ अपन जिनगीक बाट पर नजरि राखक चाहियैक। साँझू पहर कन्हैया होटल स सीधे आबि कोठरी मे कपड़ा बदलै लगल। देहक सब कपड़ा उताड़ि लेलक। उपर स ल कऽ भीतर धरि शरीर मे आगिक ताव जेँका लहकैत। पंखाक बटन दबलक। मुदा भगवानक मूर्तिक आगूक (जे कोठरीक दिवारक खोलिया मे रखने छल) बौल (बल्व) जरौने बिना अपन कोठरीक बौल कोना जरवैत। तेँ पहिने ओ बौल जरौलक। मुदा मूर्तिक आगू बौल जरौला बाद अपन कोठरीक बौल जरौनाइ बिसरि गेल। पियास स कंठ सुखैत। मुदा टंकी पर जाइक डेगे ने उठैत। लटपटाइत। कहुना कऽ कुरसी पर बैसल कि टेवुल तरक जग पर नजरि पड़लै। दिनुके पानि। जग उठा पानि पीलक। जग रखि कुरसी पर अंगोठि मने-मन अकासक चिड़ै हियासय लगल। उड़ैत मृगनयनी पर नजरि गेलइ। (कओलेजक छात्रा) किछु देरि मृगनयनी कऽ देखि अपराजित (पत्नी) पर नजरि देलक। मन मे उठलै दू बेटिक जिनगी। फेरि मन देखलकैक चहकैत मृगनयनी। निर्णय केलक जे अपना घर मृगनयनी कऽ जरुर आनब। रसे-रसे मन शान्त हुअए लगलै। दोसर दिन कोर्ट होइत कन्हैया मृगनयनीक संग घर पहुँचल। मृगनयनी कऽ देखि अपराजित घबड़यल नहि। मन पड़लै दादी मुहक सुनल खिस्सा। तेँ पुरुखक लेल दू टा पत्नी होएव कोनो अधलाह नहि। अपन दुनियाँ मे मस्त। काजक कोनो घटती नहि, कनी-मनी बढ़तिये। तेँ, जुआनीक आनन्द अपराजित मे। आठ बर्ख वाद (विआहक) जे कन्हैया डिमोसट्रेटर से प्रोफेसर बनल। ओ आइ स्त्रीक खिलौना बनि गेल। ऐहन-ऐहन लोकक कते आशा। आठ बजे साँझ। बजार स दुनू परानी (मृगनयनी आ कन्हैया) मोटर साइकिल स उतड़ि कोठरी मे पहुँचल। अगल-बगलक कुरसी पर बैसि ब्राण्डीक बोतल निकालि टेबुल पर रखलक। मुदा टेवुल कहै चाहै जे भाइ सोझा-सोझी बेइज्जत नइ करह, हम किताव रखै वला छी नइ कि बोतल। मुदा वेचाराक विचार, मिथिलाक कन्या जेँका, तेँ सब कुछ सहि लइत। जहिना राज-दरवार मे, मिथिलाक राजा जनक केँ जननिहार पंडित सहि लइत। असेरी गिलास स दुनू बेकती एक-एक गिलास ब्राण्डी चढ़ा, अपन दुनियाँ मे विचरण करै लगल। प्रश्न उठल अपराजितक। मृगनयनी- ‘हम्मर एकटा विचार सुनू।’ ‘बाजू।’ ‘पत्नीक सब सुख जँ एक पत्नी स पूर्ति हुअए तखन दोसर रखबाक की जरुरी?’ ‘कोनो नहि।’ ‘तखन अपराजित (सौतीन) कऽ रखि की फयदा? कने गुम्म भ कन्हैया सोचै लगल। मन पड़लै अपराजित। निस्सकलंक, कारी, कोमल-कोमल पंखुड़ी, गंध विहीन अपराजित। दोहरा कऽ मृगनयनी- ‘बस, यैह (अइह) पुरुखक कलेजा छी। अपराजित कऽ रस्ता स हटायव हम्मर जिम्मा भेल। मृगनयनीक रुप देखि विधात्तो अपन गल्ती पर सोचितथि। जे नारी-पुरुषक बीच जेहेन थलथलाह पुल बनोलिएै तेहेन नारी-नारीक बीच किअए ने बनोलियै। दुनू गोटेक (मृगनयनी आ कन्हैयाक) बीचक बात अपराजितो सुनैत। जहिना मृगनयनीक करेज मे अपराजितक प्रति आगि धधकैत तहिना मृगनयनियोक प्रति अपराजितक करेज मे आगि पजरि गेल। मुदा अपना कऽ सम्हारैत ओ (अपराजित) घर स निकलि जायब नीक बुझलक। किऐक त तीनि जिनगी प्रश्न आगू मे आबि ठाढ़ भऽ गेलइ। तहू मे दू टा ओहन जिनगी जे दुनिया मे अखन पाइरे रखलक अछि। चुपचाप अपराजित अपन कोठरी (रहैवला) आबि दुनू बच्चा (बेटी) क एक टक देखि, छह वर्खक रीता कऽ पाएरे आ तीनि वर्खक सीता कऽ कोरा मे नेने घर स निकलि गेलि। मन मे आगि लगल तेँ कोनो सुधि-बुधि नहि। स्टेशन आबि अपराजित गाड़ीक (ट्रेन) पता लगौलक। चारि घंटाक बाद गाड़ी। दुनू बच्चाक सेग ओ प्लेटफार्म पर, गाड़ीक प्रतिक्षा मे बैसि रहलि। मन मे अनेको रंगक प्रश्न उठै लगलैक। मुदा सब प्रश्न कऽ मन स हटबैत एहि प्रश्न पर अॅटकल जे जे माए-बाप जन्म देलक ओ जरुर गरा लगौत। जँ नहि लगौत (लगाओत) त बड़ी टा दुनियाँ छैक, वुझल जेतैक। तेँ सबसँ पहिने माए-बाप लग जायब। डेढ़ बजे राति मे गाड़ी पकड़ि, दुनू बच्चाक संग भोर मे अपना नैहरक स्टेशन उतड़ल। भुखे तीनू लहालोट होइत। मुदा ऐठामक नारी मे त सबसँ पैघ इ गुण होइत जे धरती जेँका सब दुख कऽ सहि लइत। मुदा दुनू बच्चाक (बेटीक) मुह देखि चिन्ताक समुद्र मे डूबै लगल। की ककरो स भीखि मांगि बच्चा कऽ खुआबी? कथमपि नहि। की बच्चा जिनगी क एतइ अन्त हुअए दिअए? अपन साध कोन। मुदा नाना ऐठाम तक पहुँचत कोना? जी जाँति कऽ एकटा मुरही (मूढ़ी) कचड़ीक दोकान पर अपराजित पहुँच मुरही बेचइ वाली बुढ़िया कऽ कहलक- ‘दीदी, हमर नैहर दुखपुर छी। ओतइ जाइ छी। दुनू बच्चा राति मे खेलक नहि, तेँ भुखे लहालोट होए अए। दू रुपैआ कऽ मुरही-कचड़ी उधार दिअ। काल्हि पाइ दऽ देव।’ बिना किछु सोचनहि-विचारने बुढ़िया बाजलि- ‘बुच्ची, तोरा पाइ नइ छह ते की हेतइ। हमरो ऐहेन-ऐहेन चारि गो पोता-पोती अछि। हम बच्चाक भुख बुझै छियै।’ कहि दुनू बच्चा कऽ मुरही-कचड़ी देलक। तीनू खा कऽ विदा भेलि। अपराजित कऽ नैहर पहुँचैत-पहुँचैत सूर्य एक बाँस उपर चढ़ि गेलि। दुखपुरक दछिनवरिया सीमा पर एकटा पाखरिक गाछ। पखरिक गाछ स आगू बढ़ैक साहसे ने अपराजित केँ होय। गाछक निच्चा मे बैसि ठोह फाड़ि कनै लगल। गामक (दुखपुरक) सइओ ढ़ेरबा बच्चिया घास छिलैत बाध मे। अपराजितक कानब सुनि सब पथिया-खुरपी नेनहि पहुँच गेलि। दुनू बच्चा कऽ दू गोटे कोरा मे लऽ अपराजित केँ संग केने घर पर आइलि।

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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...