Tuesday, September 22, 2009

गन्ध- हंसराज

गन्ध, गन्ध, गन्ध
ने पुरबा-पछबाक गन्ध
ने कोनो फूल-पातक गन्ध
खाली घामक गन्ध
मनुक्खक चामक गन्ध
सुखा गेल अछि फूल-पात
ठाढ़ अछि बसात
हमहूँ जेना भ’ गेलहुँ अछि बूढ़ आन्हर
झलफलमे सभटा रंग लगैत अछि पीयर।

तैयो सभ नव फूल-पात
नबका बसात अनबामे सक्रिय अछि अपस्याँत
नव लोक, नब आलोक पएबा लेल
एहि, घाम-गन्धक कोठा पर भेटत नव लोक,
नव आलोक
फुलाएत फूल
नाचक पात, बहत शीतल बसात!
सुखाएल फूल-पात नहि
थाकल बसात नहि
हमरा आँखिमे अछि एकटा आभास
एकटा नव आकाश
अथच हमरा नीक लगैत अछि गन्ध
मनुक्खक चामक, घामक ई गन्ध।

4 comments:

  1. manukkhak chamak aa ghamak gandh kavi ke nik lagab, pratikul paristhiti me manav shramak prati atoot astha lel shraddha thik.

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  2. bhut phine ee kvita pdhne rhi. dosr ber pdhebak lel anha ke dhanyvad.

    ReplyDelete
  3. Arun Kumar Pathak2:49 PM

    Bahut nik Lagal

    ReplyDelete

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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

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