Tuesday, September 01, 2009

पेटार २५

नवतुरिए आबओ आगां


कोनो रचनाकारक वैराट्य रचनाक संख्या सं नहि, रचनाकारक दृष्टिफलक केर विस्तार
सं आंकल जाइत अछि। इएह कारण थिक जे मैथिली मे मात्रा तीन उपन्यासक
बलें यात्राी जतेक महान लेखक छथि, ततेक दर्जन आ कि ताहू सं बेसी पोथी लिखि-छपा
क’ ढेरिया देनिहार लेखक नहि।

यद्यपि कोनो उपन्यासक रीढ़ ओकर कथा तत्वे होइत अछि, परंतु उपन्यासकमहत्व कथाक घटना-क्रमक उत्तेजनात्मक तत्व सं नहि, ओकर उद्देश्य सं प्रतिपादित
होइत अछि। रचनाकार साहित्य सृजन ‘स्वांतः सुखाय’ लेल अवश्य करैत अछि।
मुदा ओकर सुखक परिकल्पना वैयक्तिक सुखक ठठरी पर नहि होइत अछि। कोनो
महान लेखकक ‘स्व’ संपूर्ण समाज आ परिवेश मे व्याप्त रहैत अछि। समाज-सुख
ओकर वैयक्तिक सुख होइत अछि, वैयक्तिक पीड़ा कें ओ जन-समूहक पीड़ा बना
क’ देखैत अछि, जेना ‘सरोज स्मृति’ अथवा ‘चतुरी चमार’ निरालाक मनःलोक मे
आकार पओने हैत। जेना कबीरक मोन मे ‘सुखिया सब संसार है, दुखिया दास
कबीर’ अथवा ‘चलती चक्की देख के दिया कबीरा रोय’ सन-सन भाव उठल हैत।
यात्राीक सुख आ दुख अही भावक छल, हुनकर ‘स्वांतः सुखाय’ समाजक जागरण
लेल प्रतिबद्ध भावनाक सुख छल। जनशक्तिक प्रति आस्थावान यात्राीक मोन मेई भरोस छलनि जे आगिक लुत्तीक कमी समाज मे नहि अछि, ओहि लुत्ती पर पड़ल
छाउर कें हटायब आ आगि कें सुनगायब ओ अपन धर्म बुझलनि। एहि आगिक
बेगरता कबीरक ओत’ सेहो छल आ परवर्ती समस्त प्रतिकामी रचनाकारक ओत’
सेहो। अही आगि कें विविध नजरिएं देखल गेल आ कहल गेल ‘हो कहीं भी आग,
लेकिन जलनी चाहिए’। यात्राी ई आगि जरा क’ आधुनिक प्रगतिशील (?) जकां
मशालबाजी आ नाराबाजीक नाटक नहि कर’ चाहैत छलाह। यात्राीक आगिक ई
परिकल्पना मसीहा बनबा लेल नहि, समाज कें आलोकमय करबाक लेल छल। आगि

106 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


सं निकलल आलोक आ ऊष्मा जं उचित ढंगें ‘लोक’ धरि पहुंचि गेल, तं बुझू
जे आगि सार्थक भ’ गेल। आगिक चकाचैंध बला लपट आ आगिक दाहक ताप
आम नागरिक लेल उपयुक्त नहि थिक। से जं उपयोगी हेबो करय, तं ओ अन्हार
पसार’, मे लिप्त मुट्ठी भरि नरपिशाचक आंखि चोन्हराब’ लेल अथवा ओकर पाप-व्यूह
जराब’ लेल। यात्राी अही ‘सुख’ आ अही ‘आगि’क अन्वेषक वर्गक पुरोधा छथि,
पुरोधा रहलाह अपन रचनाकर्म मे सेहो आ अपन जीवनधर्म मे सेहो।

यात्राीक उपन्यास पर चर्चा करैत काल लोक कें ई बात ध्यान मे राखि लेबाक
चाही, जे ‘नवतुरिया’ आ ‘बलचनमा’ शुद्ध क’ क’ मैथिलीक उपन्यास थिक।
हिन्दी बला जं ‘नई पौध’ आ ‘बलचनमा’क चर्चा करैत छथि तं करैत रहथु। ई
हुनका लोकनिक समस्या थिक जे ओ एहि दुनू पोथी कें हिन्दीक रचना प्रमाणित
करबा लेल कोन हथकंडा अपनाबथि, प्रकाशन वर्षक आश्रय लेथि अथवा यात्राीक
हस्तलिपि मे ओकर पांडुलिपि प्रस्तुत करथि। मूल बात ई थिक जे ई दुनू पोथी
मैथिली मे लिखल गेल, हिन्दी मे दुनूक अनुवाद छपल अछि। लेखकक हाथें अनूदित
सामग्री जं लक्ष्य भाषाक साहित्य भ’ जाय तं एखन धरि ‘खट्टर काका’ कें हिन्दीक
रचना किएक नहि मानल गेल ? बात अवांतर नहि हो, तं एत’ ई पूछबाक उचित
अवसर अछि जे हरिशंकर परसाईंक आलावा हिन्दीक स्वातंत्रयोत्तर काल मे हरिमोहन
झाक समक्ष ठाढ़ होमय बला व्यंग्यकार कए टा छथि ?३

ओना, सत्य पूछल जाय तं हमरा नजरि मे यात्राीक सभ टा उपन्यास मैथिलीक
भने नहि हो, मिथिलांचलक अवश्य थिक। ई मैथिली पाठक-प्रकाशक-लेखकक दुर्भाग्य
थिक जे यात्राी कें अपना शरीरक रक्त-मांस-मज्जा बाहर देब’ पड़लनि। आ हिन्दी
समालोचनाक सौभाग्य थिक, जे अनकर दालि-चाउर पर ठकुराइन बनल। कहल
जयबाक चाही जे मिथिलांचलेक तीन टा उपन्यासकार यात्राी, रेणु, राजकमल हिन्दीक
कथा साहित्य मे नव अलख जगौलनि। मुदा अइ विवाद मे पड़ब एखन अभीष्ट
नहि३।

मैथिली मे यात्राीक मात्रा तीन टा उपन्यास अछि ‘पारो’ (1946), ‘नवतुरिया’
(1954), ‘बलचमना’ (1967)। ओना हिन्दी मे ‘नई पौध’ (1953) आ ‘बलचनमा’
(1952) पहिने छपि चुकल छल। मैथिलीक समस्त अध्येता परिचिते छथि जे मैथिली
मे प्रकाशनक समस्या सभ दिन सं रहल अछि ?

‘पारो’क प्रकाशन सं पूर्व ‘निर्दयी सासु’, ‘पुनर्विवाह’, ‘कन्यादान’, ‘द्विरागमन’,
‘सुशीला’, ‘मनुष्यक मोल’, ‘चंद्रग्रहण’, ‘अगिलही’ आदि महत्वपूर्ण उपन्यासक
प्रकाशन भ’ चुकल छल। चन्द्रग्रहण (1932) क अतिरिक्त प्रायः सभ उपन्यास
मे वैवाहिक समस्या, नारी जातिक दीनता, विवाह मे कौलिक मान-मर्यादाक दखलंदाजी
सं जीवन-क्रमक सांसत इएह सभ चित्रित होइत रहल। किरण केर उपन्यास मे
प्रायः पहिल बेर उपन्यास लेखनक जड़ि नव माटि पकड़बाक नव तरहें चेष्टा कयलक।

नवतुरिए आबओ आगां / 107

यात्राीक ‘पारो’ कें एहि सामाजिक स्थितिक समक्ष ठाढ़ होयबाक छलैक जतय
पैंतालीस बर्खक वयस मे लोक अपन बेटीक उमेरक कन्या सं विवाह करबा मे
संकोच नहि करैत छल, जतय नेनपने सं स्त्राीगण कें ई शिक्षा देल जाइत छैक जे
‘नांगर रहउक कि आन्हर, लुल्ह रहउक कि अधबैसू, पति थिकैक साक्षात परमेश्वर’
(पारो, पृ. 38)। जतय बेटी कें माइ, बिना कोनो अपराधक, अलच्छ आ अशुभ कथा
कहय। जतए बेटाक मान-सम्मान रत्न जकां आ बेटीक मोल टल्हा जकां हो, जतय
बेटीक बढ़ैत उम्र देखि क’ माय बूझय जे हमर कर्म जरल अछि, जतय कोनहुना
ककरो संग बेटीक विवाह भ’ गेनाइ उद्धार भ’ जायब मानल जाए, जतय एक टा
बेटा जन्माब’क प्रतीक्षा मे जनी जाति कें दस-दस टा बेटी जन्माब’ पड़ैक३सैह
छल मिथिला। ओना, आब पचास-साठि बर्खक समय बीत गेलाक बाद, शिक्षा आ
मानसिक सामथ्र्यक थोड़ेक वृद्धि भेलाक बाद स्थिति कनेक बदलल अवश्य अछि,
मुदा मौलिक चिंतन मे एखनहुं बहुत अंतर नहि भेलैक अछि।

तं, अही चरित्राक मिथिला मे ‘पारो’ उपन्यासक पृष्ठभूमि तैयार होइत अछि।
ओ समय छल जे समवयसी वरक आकांक्षा-अभिलाषा सामान्य घरक बेटी नहि करैत
छल। प्रतीक्षा कयल जाइत छल, नजरि खिराओल जाइत छल जे कोनो धन-पशुक
घरनीक अकाल मृत्यु भेल होइक, कहुना हुनक धन-बीत सम्हार’ लेल, हुनकर
बाल-बच्चा कें पोस’ लेल, हुनकर विधवा पीसि आ बूढ़ मायक सेवा-टहल लेल,
हुनक पैशाचिक वासनाक तृप्ति लेल लोक कोनहुना अपन बेटी कें सेट क’ लिअए।
बेटी एतय सं पठाओल तं जेतीह रानी बनि क’ राज कर’ लेल, मुदा पहुंचिते देरी
ओतय भ’ जेतीह बहिकिरनी, भनसिया, कठपुतरी, ओछाओन, पिकदानी३आदि।

‘पारोक’ ‘पार्वती’ अही अस्तित्वक संग मिथिला मे एक प्रकांड पंडितक घर
मे जन्म लेलथि। बिरजूक पीसि सन माइ छलथिन पारो कें। पिताक देहावसानक
पश्चात मायक माथ पर बोझ भ’ गेलि। बिरजू सन भावुक पिसिऔत भाइ छनि
जे परंपराक बान्ह-छेक मे ओझरायल प्रगतिशील छथि। विचार सं बिरजूक तुलना
मे पारो कनेक बेसिये प्रगतिशील, कल्पनाशील आ परिवर्तनक आग्रही छथि। मुदा
तैयो पंद्रह बर्खक पारोक लेल जाहि ब’रक प्रति पारोक माय प्रार्थना करैत छलीह,
से ‘दुतीय वर, अवस्था पैंतीसम (मुदा अवस्था छलनि पैंतालीस)। पढ़ल लिखल
मामूली, जमीन-जजात पर्याप्त। दलान पर गोर चारिएक बखारी। जूति चलै छनि
सतमाइएक, ओही दिस सं वैमात्रो बहिनि मात्रा ताहू बेचारोक कपार दुरागमनक
उपरांते जरि गेल छलनि। सासुर मे खगता कथुक नहि, तइयो माइए लग रहै छथिन्ह,
आर किछु नहि खाली तीर्थ करबाक वै छनि। थिकाह ओ लोकनि गामक डीही,
बुधवारे बघांत। चुल्हाइ चैधरि नाम थिकैन्ह, सोनमनि चैधरिक बालक। मातृक
ककरौड़, मातृमातृक पिलखबाड़। बहिनोइ छलथिन्ह से सौराठहिक आ सतमाय
थिकथिन्ह सुखसेनाक। महेशपुर पांजि छनि। देख’ सुन’ मे से महाभव्य, खैबा-पीबा

108 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


मे भोगीन्द्र। एहन घर-वर पड़ले पाबी।’

से, एहेन घर-वर पारो कें भेटिए गेलनि। जाहि वर कें परमेश्वर मानबाक
शिक्षा हुनका देल जाइत रहलनि, पारो हुनका सर्वथा नरपिशाच मानैत रहलीह। आ
तइ नरपिशाच लेल एकटा बेटा कें जन्म द’ क’ पारो परलोक गेलीह। चुल्हाइ चैधरि
दोसर कोनो पारो कें कीन-बेसाहि क’ घर अनबा लेल, ओकरा रानी आ कि बहिकिरनी
आ कि धौरबी बनब’ लेल मुक्त भ’ गेलाह। जं अइ उपन्यास कें आओर आगू
बढ़ाओल जाइत तं फेर सं कोनो पारो आ कि साबो आ कि लच्छो केर कथा तैयार
भ’ सकैत छल।

अइ व्यवस्थाक बीच गौरवान्वित आ अइ नाली मे सह-सह करैत कीट-जीवन
बितब’ वला मैथिलक लेल, ‘पारो’ सजीवन बूटीक रूप मे आयल। जतय पंद्रह
बर्खक धीया लेल पैंतालीस बर्खक दुती वर कें कन्याक माइ एना महिमामंडित करथि,
ततय यात्राी ‘पारो’ सन उपन्यास लिखबाक साहस कयलनि, ई कनी टा बात नहि
छल। जाहि उपन्यास (समाज) मे बिरजूक पीसा आ पिताक अलावा एको टा पुरुष
पात्रा दू-तीन सं कम विवाह नहि कयलनि, ताहि समाज मे ‘पारो’ आ ‘बिरजू’ सन
प्रगतिशील विचारक पोषक कें परंपराक आगू विवश देखायब स्वाभाविके छल।

‘पारो’ सं पूर्व वैवाहिक समस्या पर केंद्रित जतेक साहित्य सृजन मैथिली मे
भेल छल अथवा भ’ रहल छल, से मूलतः ओहि समयक स्त्राी दुर्दशा, जाति पांजिक
कारण बहुविवाह, बाल-विवाह, सासु-पुतौहुक आपसी व्यवहार आदि सं संबंधित
स्थितिक संकेत मात्रा छल। ‘पारो’ मे पहिल बेर नवताक संकेत अंकुरित भेल। संपूर्ण
उपन्यास मनोवेगक चित्राण मे सफल भेल अछि। घटनाक चित्राण कम अछि, घटना
सं उत्पन्न मनोभाव कें चित्रित करबा मे यात्राी बेसी यत्न केलनि अछि। अइ मनोभावक
उदये ई साबित करैत अछि, जे समय आ समाज बदलि रहल अछि, जं समाज
नहिओं बदलल अछि, तं समयक अनुसार समाज कें बदलि जयबाक चाही। पारोक
प्रकाशनक पांच दशक बादो आई जाहि मिथिला मे प्रेम-विवाह अपन स्थायी आस्वीकृत स्थान नहि बना सकल अछि, ताहि प्रेम-विवाहक संभावना दिस यात्राी
स्वतंत्राताक पूर्वहि संकेत कयने छथि। इस्लाम धर्मक कोनो वयःसंधिक बालिकाक
मोन कें पढ़बाक प्रयास कयल जाय तं स्पष्ट बूझि पड़ैत अछि ओकर भाव ‘अपन
जाहि पितिऔत, ममिऔत, मसिऔतक संग हम नंगटे माटि मे लोटाएल छी, सतघरिया
आ कनियां-पुतरा खेलाएल छी, से बालक सभ आब जवान भ’ रहल अछि आ ओ
सभ हमरा मे आब अपन मित्रा नहि अपन पत्नी होयबाक संभावना ताकि रहल
अछि आ ‘खुदा’ सं प्रार्थना क’ रहल अछि जे ओकर पिता कें हमरा पिता सं बात
चलेबाक सद्बुद्धि होउक।’ जें कि ई संभावना हिंदू धर्मावलंबन मे नहि अछि, तें
पारोक पुछला पर ‘भाइए बहिन मे जं बियाह-दान होइतैक तं केहेन दिब होइतै
! कत’ कहां दनक अनठिया कें जे लोक उठा क’ ल’ अबैए से कोन बुधियारी ?’३बिरजू

नवतुरिए आबओ आगां / 109

ओकरा डांटि दैत अछि।

‘पारो’ जखन प्रकाशित भेल छल, तं खूब हो-हल्ला मचल छल। नेत ई, जे
यात्राी अनर्थ कयलनि। ममियौत-पिसियौत मे प्रेम संबंध देखा क’ कुकर्म कयलनि।
‘सुरमा सगुन विचारै ना’ कथा पर राजकमल चैधरी पर सेहो एहने आक्षेप छल।
मुदा ओहि समयक मैथिलीक पाठक ई नहि बूझि सकलाह जे ‘पारो’ भाई-बहिनिक
प्रेम कथा नहि थिक, असल मे ई कथा थिक मिथिलाक मानवीय दारिद्र्यक, मैथिलकमानसिक अयोग्यताक, बेटी-पोतीक उमेरक कुमारि संग बियाह करबाक राक्षसी वृत्तिक,
अइ बियाहक दलाली खा क’ मौज-मस्ती कयनिहार घटकराजक नीयतक३।
भाइ-बहिनक प्रेम तं एहि उपन्यास में प्रसंगवश आयल अछि। ओना ताहू पर जं
सोचल जाय, तं विचारणीय बात ई थिक जे जं कोनो व्यक्तिक माइ, पितिआइन,
बहिन, भाउज, भावहु३कोनो तरहक यौन-संबंधक परहेज वाली स्त्राी अथवा परदा
राख’ वाली स्त्राी संग कतहु अत्याचार भ’ गेल हो, स्त्राी ओत’ नांगट आ बेहोश पड़ल
हो, तं की ओ व्यक्ति एहि सामाजिक शिष्टाचारक विचार कर’ लगताह जे भावहुक
शरीर मे स्पर्श नहि करब, आ कि माइ-बहिन कें नांगट नहि देखब, ओकर स्पर्श
नहि करब, ओकर यौनांग छुआ जायत ? मैथिलीक पाठक कें भाग मनेबाक चाही,
जे जाहि पाखंडक समय मे यात्राीक समवयसी आ समकालीन लेखकगण जखन मैथिली
मे कीर्तन-भजन आ रति-समागमक कविता-कथा लिखैत छलाह, ताहि विकराल
समय मे यात्राी ‘पारो’ लिखबाक साहस कयलनि। ‘किरण’ ओहि समयक अपवाद
रहथि, तकर प्रमाण ‘चंद्रग्रहण’ (1932) उपन्यासक विषय आ शिल्प अछि।

असल मे ‘पारो’ मैथिल समाज मे विवाह विसंगति आ बेटीक प्रति अमानुषिक
व्यवहार मेटेबाक लेल तथा राजनीतिक शिथिलता तोड़’ लेल एकटा प्रभावी स्वर
थिक। यद्यपि राजनीतिक गतिविधिक कोनो सकारात्मक प्रतिफल कतहु नहि
देखाओल गेल अछि। मुदा नव पीढ़ी ओहि दिश सक्रिय अछि, पुरान पीढ़ी एहि
गतिविधि कें ‘हु ले ले ले’ कहि क’ एकरा प्रति अपमानजनक धारणा प्रकट करैत
अछि। मुदा आन दू पक्ष पर्याप्त स्पष्टताक संग आ अपन परिणामक संग सोझां
अबैत अछि। संपूर्ण उपन्यास पढ़ि गेलाक बाद बिरजू कें डरपोक कहल जाय,
प्रगतिशील कहल जाय आ कि पाख्ंाडी कहल जाय से तय करब कठिन भ’ओ
सकैत छल। मुदा यात्राीक तीनू उपन्यास पारो, नवतुरिया, बलचनमाक विषय
विस्तारक प्रक्रिया पर ध्यान देला सं तय भ’ जाइत अछि, जे यात्राीक ‘बिरजू’ एकदम
सं ‘यात्राी’ए जकां पटु आ प्रवीण अछि। बिरजू कें एतबा बोध छैक जे एखन लोह
नीक जकां गरमायल नहि अछि, एखन एकरा पीटब व्यर्थ जायत। तें जखन-जखन
उपन्यास मे रूढ़िवादी गप उठल अछि, बिरजू मात्रा ओकर शालीन प्रतिकार कयलक
अछि। पीसि जखन पारो कें डांट-डपट करैत छथि, पारो कें अभागलि आ आओर
की-की ने कहैत छथि, पौती-पथिया बुनबाक लूरिवाली बालिकाक प्रशंसा करैत

110 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


आधुनिक समयक युवतीक निंदा करैत छथि, तं बिरजू हुनका शालीनताक संग सभ
बातक जवाब दैत अछि। घटनाक विरोध तामसक संग कतहु नहि करैत अछि।
ओना जं समग्रता मे देखी तं यात्राीक कोनो पात्रा भाषण आ आचरण सं तमसाइत
नहि देखाइत अछि। जहिना यात्राीक संपूर्ण तामस हिनकर भाषाक व्यंग्य मे ढरि
जाइत अछि, तहिना यात्राीक पात्रा केर तामस सेहो ओकर कूटनीति मे बदलि जाइत
अछि आ कार्यसिद्धिक बाद ओकर असरि सोझां अबैत अछि। बिरजू संपूर्ण कथा
मे बेसी ठां नाराजे रहैत अछि। मुदा सभ ठां परिस्थिति विपरीत रहलाक कारणें निकलि
जयबाक बाट ताकि लैत अछि। ध्यातव्य थिक जे पारोक वर जखन राति मे पारो
संग समागम लेल जबरदस्ती करैत छथि आ पारो लहू-लुहान भ’ क’ पड़ा जाइत
अछि, वर तैयो पारोक जान छोड़बा लेल तैयार नहि छथि, निसभेर नीन सं जागल
बिरजू जखन एहि दृश्य सं परिचित होइत अछि, तखन चैधरि कें पब्लिकली फज्झति
करबाक बदला हुनका धोपि क’ विदा करैत अछि आ पारो कें शांत भ’ क’ समझाब’
लगैत अछि।

ई सभ टा परिस्थिति यात्राीक दीर्घ रणनीतिक संकेत थिक। कहल जयबाक
चाही जे समयानुकूल विकासक प्रक्रिया मे समाजक विकासमान परिस्थिति पर यात्राीक
तीनू उपन्यास, तीन टा अलग-अलग उपन्यास नहि थिक, बल्कि तीन खंड में लिखलविकास-परंपराक इतिहास थिक। मिथिलाक विकास वृक्षक थरि बान्हल कृति थिक
‘पारो’। एतए सं पृष्ठभूमि बना क’ यात्राी आगू बढ़ल छथि।

दोसर दृष्टिएं विचार करी तं मिथिलाक समस्त जनपदक लोकाचार समृद्ध
आ समादृत भाषा मे एत’ प्रभावी ढंग सं चित्रित भेल अछि। ‘पारो’ रजस्वला भ’
गेलीह अछि ई बात खोलि क’ कहबाक कोनो विवशता यात्राी कें नहि भेलनि।
पारो कहैत छनि जे तेरहमे मे पंद्रहमक भ’ गेल छी आ पीसि कहलकनि जे खीराक
बीया बढ़िम्मा छलैक तैयो किए नहि जनमलै। आ, ई संकेत पर्याप्त भ’ गेल।
बलात्कारक सूचना देबा लेल पारो शोणित सं भीजल नूआ छुआ देलकनि, घटना
संप्रेषित भ’ गेल। मजदूर वर्गक जे महिला बिरजू कें नेनपन मे बेटा जकां संबोधित
करैत छलनि, से सभ दीअर जकां व्यवहार करैत छनि; पढ़’ लिख’ लागल बिरजू
तं गामक भाउज सभ आब पिरही पर बैसा क’ गप कर’ लागलनि।३अइ सभ
दृष्टांतक संग ‘पारो’ मैथिल जनपदक जीवन-प्रक्रियाक कोलाज थिक, जतय चूल्हि-चिनबार,
अध्ययन-अध्यापन, खेती-बाड़ी, पशु-पालन व्यवस्था, घटकैती, विवाह नीति, सामाजिक
प्रेम-घृणा, राग-द्वेष, विवाह- द्विरागमनक विधि-व्यवहार, राज-काजक स्थिति, कोट-कचहरी,
नोकर-चाकर, सौतिया डाह, ‘टोल-पड़ोसक हस्तक्षेप सं पारिवारिक झंझटिक निबटारा,
क’र-कुटुमक सहयोग सभटा अपन-अपन मूल्यवत्ता आ अपन-अपन वैशिष्ट्यक संग
एहि उपन्यास मे उपस्थित अछि। पारो गर्तगामी मैथिल जनपदक लेल एक टा ललकारथिक, जे सभ कें सीढ़ी देखा क’ ऊपर अयबाक प्रेरणा दैत अछि।

नवतुरिए आबओ आगां / 111

ममियौत-पिसिऔतक प्रेम-संबंध पर एते तं अबस्से कहल जयबाक चाही, जे
‘दोनों तरफ लगी है आग बराबर-बराबर’। मुदा बिरजू कें ई स्पष्टतः प्रदर्शित अथवा
संकेतित करबाक साहस नहि होइत छैक, बिरजू कतहु परिलक्षित नहि होमय दैत
अछि। मुदा पारोक चिट्ठी कें असंख्य बेर पढ़ैए। मनोवैज्ञानिक चित्राणक सहारा सं
ई बात यात्राी स्पष्ट क’ सकलाह अछि। मुदा बिरजूक प्रेमक उत्कर्ष कतेक अलौकिक
अछि, जे ओ पारोक जीवनक सुखमय-सुरमय माहौलक इंतजाम मे व्यस्त रहैत अछि।
दोसर दिस पारोक प्रेम मे साहस अछि। जतय बिरजू परंपरा कें आहत नहि करबाक
नेतें सभ आचरण करैत अछि, ओतहि पारोक प्रतिबद्धता जीवन-मूल्य सं जुड़ल अछि,
परंपरा जं जीवनक सुख-सौरभ, आकांक्षा-अभिलाषा, जिनगीक सहजता कें आहत
करए’, तं ओहि परंपरा कें आहत करबा मे पारो कें कोनो शास्त्राीय मतक सुरक्षा मान्य
नहि। ओहुना, स्वतः प्रमाणित अछि जे जोखिम उठेबाक दुस्साहस हमरा ओतय स्त्राी
कें जतेक अछि ततेक पुरुष कें नहि।

सर्वांशतः ‘पारो’ ई तय करैत अछि जे विवाह संबंधक उद्देश्य जखन प्रेमे थिक,
आ प्रेम-प्रसंग मे निषेधाज्ञा आ वर्जनाक गुंजाइश नहि अछि, तखन ई शास्त्राीय विधानजीवनक सहजता लेल कोना ग्राह्य। एकटा विकृत आ घृणास्पद परंपराक समानांतर
ममियौत-पिसियौतक ई प्रेम-प्रसंग राखि क’ उपन्यासकार पाठकक विवेक कें उद्बुद्ध
करबाक प्रयास कयलनि। अहू थाप सं जें कि मैथिल जनपदक आंखि नहि खुजल
तें ‘नवतुरिया’ आयल।

‘पारो’क प्रकाशनक पश्चात देश स्वतंत्रा भेल। मुदा मिथिला मे व्यापत बेमेल
विवाह, बेटी बेचबाक प्रथा, साठि बर्खक बूढ़ संग टाकाक लोभें आ कौलिक श्रेष्ठताक
लोभें पंद्रह बर्खक बेटी/भतीजी/पोती/नातिन कें बियाहि देबाक हरक्कति बन्न नहिभेल। स्वातंत्रयोत्रार काल मे देश केर आन-आन भाषा सभ मे जतय सामाजिक-सांस्कृतिक-
राजनीतिक उत्थानक तकनीकी प्रक्रिया, शोषण-उत्पीड़न आ सामंतशाही तथा बेकारी-
बेरोजगारी, अर्थाभाव-अन्नाभावक कुटिल नीति पर विचार होअए लागल छल,
राजनीतिक जागरणक बात होइत छल, ततए मिथिलाक लोक बेटी बेचबाक धंधा मेवित्र्त छल। एहेन विकराल समय मे ओहि बेटीक माइ आ ‘यात्राी’ दुनूक व्यथाक
कल्पना कयल जा सकैत अछि। यात्राीक स्थान पर जं कोनो शार्ट-टेम्पर्ड अकबालीसामाजिक कार्यकत्र्ता रहितथि तं ओ मिथिलाक एहेन कुटिल कीट सभ कें नांगट भ’
क’ गरिअबितथि अथवा कोनो अंग्रेज सिपाही जकां गोली सं दागि दितथि। मुदा
यात्राी तं से नहि छलाह। ओ तं नीतिपूर्ण ढंग सं समाज कें बदल’ चाहैत छलाह।

‘नवतुरिया’ मैथिली मे लिखल हिनकर दोसर उपन्यास थिक। अहू उपन्यासक
केंद्रीय कथा वैवाहिके समस्या थिक। मुदा अइ उपन्यासक नायक कोनो एक टा
युवक नहि, पूरा युवाशक्ति थिक। जतय ‘पारो’ मे समस्या ताकि क’ ओहि पर अंगुरी
राखि देब’ धरि यात्राी सीमित रहलाह ओतहि ‘नवतुरिया’ मे समस्याक विकल्प धरि

112 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


पहुंचलाह। खोखा पंडित सन निविष्ट लोक जे, बड्ड स’ख सं अपन नातिनक नाम
‘विश्वेश्वरी’ रखलनि, उच्चारण मे एहि नाम कें कियो ठेंठ करैत ‘बिसेसरी’ कहय
तं ओहि पर कुढ़ि उठथि। से खोखा पंडित, संस्कृत आ व्याकरणक निविष्ट विद्वानखोखा पंडित, जमीन पर अनधिकृत कब्जा कर’ मे, गारा-गारी कर’ मे, स्वार्थ-सिद्धिक
लेल अपन बाल-बच्चा, बेटा-बेटी, नाति-नातिनक गरदनि काट’ मे कनियो नहि
लजएलाह। उपन्यासकार क्षुब्ध छथि। एहि चरित्राक विश्लेषण ततेक शानदार ढंगें
उपन्यास मे भेल अछि जे पाठक छगुंता मे रहताह जे जं खोखा पंडित विद्वान, तं
कुटिल-कसाइक की परिभाषा ? जाहि नातिनक नामक उच्चारणक प्रति खोखा पंडित
एतेक सचेत छथि, ताहि विश्वेश्वरीक जीवनक प्रति ओ एतेक दानवीय आचरण
कोना करैत छथि, जे चैदह बर्खक नातिनक विवाह पचपन बर्खक बूढ़ चतुरा चैधरि
संग तय करैत छथि, जे पांच-पांच विवाह पूर्वहि क’ चुकल छथि !

‘बमपार्टी’ आ एहि पार्टीक नेता दिगम्बर मल्लिक आ एहि युवावर्गक आन
सदस्य महेश्वर झा, गोनउड़ा, हेहुआ, बलभद्र मिश्र, वाचस्पति३हिनका सभक
शालीनता, प्रगतिशीलता, उग्रता, हिनका सभक विद्रोही स्वर, अनाचारक प्रति हिनका
सभक विरोध३ई सभटा चित्रा एहि उपन्यास मे भकरार भ’ क’ सोझां आयल अछि।
अइ समय धरि हिन्दी मे हिनके उपन्यास ‘रतिनाथ की चाची’, ‘बाबा बटेसरनाथ’,
‘बलचनमा’ आदि आबि चुकल छल।भारतक बृहत् परिदृश्य मे जीवनक एहि प्राचीन
कुरीति सभ कें बिसरि क’ लोक पैघ-पैघ विसंगति सभ पर विचार कर’ लागल छल,
स्वाधीनताक छओ-सात बर्ख बितलाक बादो भारत मे स्वाधीनता सन कोनो बात
बुझाइत नहि छल।

असल मे मनुष्य वैयक्तिकता सं मुक्त भेने बिना व्यापक सामाजिक संदर्भ सं
जुड़ि नहि पबैत अछि। तें आत्महितार्थ मनुष्य सामाजिक अनुशासन स्वीकार करैत
अछि। मुदा जखन परिस्थिति ओकरा विवश क’ दैत छैक, विक्षुब्ध-कुंठित-अपमानित
आ समाज उपेक्षित क’ दैत छैक, तखन ओ विद्रोह करैत अछि। स्वाधीनता संग्राम
सं पूर्व भारतक नागरिक जे सभ सपना देखने छल, मुक्ति कामनाक जतेक पैघ महलबनौने छल, तकर पूर्ति स्वातंत्रयोत्तर भारत मे नहि भ’ सकल। आर्थिक वैषम्य, बेकारी,
अराजकता, अनैतिकता, अमानवीयता, सन विकृत दृश्य सोझां आब’ लगलैक। ई
समस्त स्थिति भविष्यक प्रति लोक कें आश्वस्त नहि क’ सकल। पूरा देश पुनः ओहि
स्थिति मे चल गेल, जतय एक दिस सकल सामथ्र्य सं परिपूर्ण अधिंसख्य जनता
व्यवस्थाजन्य सुविधा सं वंचित छल, ओतहि मुट्ठी भरि अधिकार प्राप्त व्यक्ति अपन
सुख सुविधा जुटब’ मे लिप्त छल। स्वाधीनता प्राप्तिक बादक उपन्यासक वस्तु,
विषय आ नायक इएह परिस्थिति, एहने घटना आ एहने व्यक्ति भ’ रहल छल।
ई समस्त स्थिति मिथिलो मे विद्यमान छल, मुदा ओत’ ओहू सं पूर्वक समस्या ओहू
सं विकराल मुंह बौने छल। यात्राीक स्थिति तं ई छलनि जे पहिने पोन पर फाटल

नवतुरिए आबओ आगां / 113

धोती मे चेफड़ी लगा क’ झंपताह, तखन ने अंगना मे टाट लगब’ दिस वित्र्त हेताह।

नवतुरिया उपन्यास अइ विकराल स्थितियो मे समकालीन आन विषय धरि
केंद्रित नहि भ’ पबैत अछि से बहुत गोटे कहत। मुदा यात्राी व्यूह मे बाझल आ
घेरायल अभिमन्यु जकां एक संग कतेक लड़ाइ लड़ि रहल छथि तकर संकेत ‘पारो’
मे सेहो देल गेल अछि, ‘नवतुरिया’ मे सेहो आ ‘बलचमना’ मे तं सहजहिं।
‘नवतुरियाक’ विषय पुरान अवश्य अछि, मुदा नवशक्ति पर यात्राीक आस्था एक टा
नव निर्माणक संकेत थिक। विश्वेश्वरीक प्रस्तावित व’र चतुरा चैधरि कें घुरा क’,
विवाह रोकि पुनः कन्याक अनुकूल वर वाचस्पति सं विवाह करौनिहार ‘बम पार्टी’क
नेता आ ओकर सदस्य सभक नैतिक उत्कर्ष कें एके संग कैकटा ओर-छोर देखौने
छथि। ‘पारो’ मे जतय सभ टा अनैतिक स्थिति कें जेना-तेना सेदि मारि क’ चलबाक
आग्रह देखाओल गेल, पैंतालिस बर्खक अधबेसू संग पंद्रह बर्खक पारो नित्य प्रतिबलत्कृता होइ लए चले गेल, पारो संतानवती भेल, मुदा स्वयं नहि रहल३ई सभटा
अघट घटल, उपन्यासक नायक अथवा उपन्यासकार किछु नहि क’ सकलाह। मुदा
‘नवतुरिया’ मे ओ सभ किछु क’ सकलाह, जे ओ कर’ चाहैत छलाह अथवा जे हुनका
करबाक चाही छल।

खोखा पंडित, घटकराज, चतुरा चैधरि, मुखिया३सभ कें यात्राीक नवतुरिया
पानि पिआ देलकनि, सभ कें नाक मे कौड़ी बान्हि देलकनि, सामाजिक आ वैधानिक
दुनू तरहें हिनकर तरुण वर्ग कुटिल पुरान पीढ़ी कें पराजित-अपमानित आ सचेतकयलकनि अछि। मुखियाक बैमानी पर प्रहार भेल, घटकराजक घिनौन कृत्य पर
प्रहार भेल, पंडितजीक कुकर्मक तांता टूटल, चतुरा चैधरि बिन बियाहे घुरलाह आ
विश्वेश्वरीक विवाह समाजवाद मे निष्ठा रखनिहार युवक वाचस्पति सं भेल।

तरुण पीढ़ीक ई विजय आ प्रसंगवश आयल अनेक घटना, उपघटना, युवाशक्तिक
संघटन ई सभटा, उपन्यासकारक भावी संकेत कें द्योतित करैत अछि आ हुनक
प्रगतिकामी चेतना कें पुष्ट करैत अछि। जतय ‘पारो’ मे सद्-असद् दुनू तरहक पात्रा
अपन-अपन मान्यता मे साफ छल, ककरो मोन मे कोनो द्वंद्व नहि छलैक, ओतहि
‘नवतुरिया’ मे आबि क’ परिस्थिति एक धाप आगू रखलक। एतय नवतुरिया
एकदम संशयमुक्त आ साहसी भ’ गेल। संगहि वृद्ध आ अराजक पीढ़ी द्वंद्वग्रस्त
होमय लागल अछि। मुखिया, पंडित, घटकराज आ चतुरा चैधरि चारू अंतद्र्वंद्वग्रस्त
सेहो छथि। हिनका लोकनि कें मोन मे आब संशय प्रवेश कर’ लागल छनि। भखरैत
पराक्रम कें समेटबाक उद्यम मे व्यक्त भने नहि होथि, मुदा मोन मे संशय होइत
छनि।

दोसर दिस यात्राीक नवतुरिया आब पूरा पूरी समाजक कमान अपना हाथ मे
ल’ नेने छनि। ओ आब पारिवारिक आ वैयक्तिक शोषण सं ल’ क’ राष्ट्रीय राजनीति
धरिक प्रति, वैयक्तिक अंतर्दमन सं ल’ क’ सामाजिक अनाचारक प्रति, अधिकार

114 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


हरण सं कत्र्तव्य बोध धरिक प्रति, सचेत रहैत छनि। तें आब ‘बलचनमा’ सन
‘पकठोस’ राजनीतिक स्वर वला पात्राक अवतरण मिथिला मे अनर्गल नहि हैत। आब
आन कोनहु तरहक पुरान आ रूढ़िग्रस्त समस्या हो तं ओकरा नवतुरिया देखि लेत।
‘बलचनमा’ आगू बढ़ए३

‘बलचनमा’ क प्रकाशन मैथिली मे 1967 मे भेल। हिन्दी में 1952 मे ई छपि
चुकल छल। सन् 1967 धरि तं देशक स्थिति की सं की भ’ गेल छल। मुदाकालजयी कृतिक समय कहियो समाप्त नहि होइत छैक। डाॅ. त्रिभुवन सिंह
यथार्थवादी साहित्यक परिभाषा निश्चित करैत बलचनमा कें यथार्थवादी उपन्यास
घोषित कयने छथिः ‘यथार्थवादी साहित्यक सभ सं पैघ विशेषता इएह होइत अछि
जे ओ समाजक मूल मे सक्रिय क्रांतिकारी शक्ति सभ कें चीन्हि क’ ओकरा द्वारा
बढ़ाओल आंदोलनक उल्लेख करैत पंूजीवादक नाश आ निम्न वर्गक विजय मे पूर्ण
आस्था व्यक्त करय, जाहि सं निराशा तथा जीवनक दा हारल निम्न स्तरक लोक में
आशाक संचार हो आ ओ लोकनि अपना कें ओहि योग्य बना सकथि, जे समाजक
विषम परिस्थति सभ सं वीरताक संग संघर्ष क’ सकथि (हिन्दी उपन्यास और
यथार्थवाद, पृ. 33)।’ अइ अर्थ मे बलचनमा सुच्चा यथार्थवादी उपन्यास थिक।

हेबा लेल अइ उपन्यास मे सामंती वर्गक महिला, मलिकाइनक क्रूरताकचित्राण; मुखियाक अप्राकृतिक मैथुनक हरक्कति, दलित वर्गक दैन्य, सामंत वर्गक
कुकर्म, समाजक सामान्य रहन-सहन सभ स्थितिक चित्राण भेल अछि। मुदा मूल
रूप सं ई उपन्यास बलचनमाक जीवन-कथाक बहन्ने मैथिली पाठक कें सामथ्र्य
देबाक कैप्सूल, दिशा देखेबाक मशाल आ संग रखबाक लेल हथियार थिक।स्वातंत्रयोत्तर भारतक जे दशा छल, निम्न वर्गक लोकक जे स्थिति छल, तकर चित्राणएहि उपन्यासक शरीर थिक, मुदा आत्मा थिक ओइ दैन्य मे सुनगैत लुत्ती, जे
बलचनमाक हृदय मे सुनगैत अछि। भारतक गरीब, शोषित आ पीड़ित जनताक स्वरथिक बलचनमा। ताकय चाही तं एतय यथार्थवाद, आंचलिकता, मनुष्यवाद, कृषि
आंदोलन, दलित आंदोलन, सामंती शक्तिक पराभव, सामाजिक वैषम्यक समाप्तिक
उद्यम सभ भेटि जायत। एहि उपन्यास मे श्रमशील समाजक प्रति आस्था व्यक्त
कयल गेल अछि। लेखक श्रमक प्रति आस्था रखनिहार समाजक निर्माण हेतु आग्रही
छथि। हिनकर निर्णय छनि, जे किछु भ’ जाउक, कमासुते टा खायत। आ, अइ लेल
किसान-मजदूर कें संगठित आ संघर्षशील होयबाक आह्वान कयल गेल अछि।
जमींदार सं डटि क’ रहबाक आ एहि संघर्ष मे जुटल रहबाक स्थितिक निर्माण
प्रारंभहि सं लेखक कयने छथि।

तुलना करबा लेल लोक ‘बलचनमाक’ तुलना ‘गोदानक’ होरी सं करैत कह’
लगैत अछि जे बनलचमा होरी जकां परिस्थितिक दास नहि होइत अछि, धार्मिक
अंधविश्वास आ पारंपरिक रूढ़ि मे बाझल नहि रहैत अछि, अपन बांहि पर भरोस

दृष्टिकोण आ काव्य वस्तुक सीमा / 115

रखैत अछि आ संघर्षक बलें अपन अधिकार हस्तगत कर’ चाहैत अछि, अर्थात
बलचनमा होरी सं आगू अछि। हमरा बुझने लोक कनेक त्राुटि क’ रहल अछि। असल
मे बलचनमा, होरी सं नइं, गोबर सं आगूक चरित्रा थिक। गोबरक चरित्रा विकास मे
होरी द्वारा जे-जे बाधा पहुंचल छलैक, तकर गुंजाइश यात्राी पहिनहि समापत क’ दैत
छथि, बलचनमाक पिता प्रारंभहि मे संसार छोड़ि देने रहैत अछि। तहिना बलचनमाक
माइ आधुनिक भारतीय नारीक प्रतीक ‘धनिया’क विकास क्रमक रूप मे सोझां अबैत
अछि। आ तखन तुलनात्मक ढंगे बलचनमा कें ‘गोबरक समाधि परक अंकुरी’ कहल
जायब उचित थिक।

मलिकाइन, फूल बाबू, मुखिया, छोटकी, मलिकाइन, गुनमंती, सुखिया नोकरनी,
सबूरी मंडल, दामो ठाकुर, छोटे मालिक, हमीदा, सादुल्ला खां, बंभोला झा, माइ, दादी,
रेबनी, रामखेलावन आदि पात्राक मदतिएं ‘बलचनमा’क कथा मे विकास आयलअछि। श्रम, कृषि, ईमानदारी, निष्ठा नैतिकता, विवेक, मानुषिकता, मानव-मूल्यक
श्रेष्ठता, मानवीय संबंधक उत्कर्ष सभ टा एहि उपन्यास मे नायक आ सहयोगी
चरित्राक चरित्रांकन मे व्यक्त भेल अछि। ओकर समस्त जीवन-चर्या, दैनिक
क्रियादिक संगें ततेक मनोरम ढंगें ई सब तत्व व्यक्त अछि जे सभ एके संग विकास
आ प्रगतिशीलताक प्रति उपन्यासकारक आग्रह, मिथिलाक सामाजिक प्रगति,
समाजक बदलैत मनःस्थिति, मिथिलाक जनपद मे बसल लोकाचार, सभक परिचय
दैत अछि। चरित्रा चित्राण मे यात्राीक लेखनी कें महारत प्राप्त छनि, ओ तं जखन
कवितो मे, जतय एकाध पंक्ति सं बेसीक गुंजाइश नहि रहैत अछि, ततहु अपन
नायकक चरित्रा घीचि दैत छथि, तखन उपन्यासक कोन कथा। खाहे बलचनमा हो
अथवा ओकर माइ, दादी, मालिकाइन, जमींदार केओ होउ, सभक चारित्रिक उत्कर्ष
आ क्षुद्रता जीवंत भ’ उठैत अछि।

‘पारो’ आ ‘नवतुरिया’क तुलना मे ‘बलचनमाक’ विषय भिन्न अछि, तें
स्वभावतः कथा आ चरित्राक संग ट्रीटमेंट सेहो भिन्न अछि। मुदा जेना कि यात्राीक
स्वभावक मूल दिशा श्रम, नैतिकता आ मनुष्यताक पक्षधरता दिश जाइत अछि, तें
अहू मे से स्पष्ट अछि। नेनपने सं बलचनमा निद्र्वंद्व आ अपन चरित्रा एवं संधान दिसउद्यत रहैत अछि। कृषि, पशुपालन, श्रम आ सामाजिक व्यवस्थाक प्रति आस्था,
यात्राीक भाषा मे टपकैत रहैत अछि। ‘पारो’ सं प्रारंभ भेल यात्राीक उपन्यास-यात्रा हल
‘बलचनमे’ पर किएक अटकि गेल एहि प्रश्नक जवाब मैथिलीक पाठक, प्रकाशक
आ कथित महंत-मठाधीशे द’ सकैछ।

ओना, एतबा अवश्य भेल, जे यात्राी अपन परवर्ती उपन्यास लेखकक लेल बाट
बनौलनि आ तें सभ तरहक विषय पर उपन्यास लिखल जाय लागल। नवतुरिया सं
ओ जाहि तरहक अपेक्षा कयने छलाह, से हुनकर नवतुरिया देखा देलकनि, मुदा
पुरनका तूर एखनहुं हारि मान’ लेल तैयार नहि अछि। देखा चाही३

116 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


दृष्टिकोण आ काव्य वस्तुक सीमा


1911 ई. मे वैद्यनाथ मिश्र ‘यात्राी’ आ आरसी प्रसाद सिंहक जन्म भेल। विचित्रा
साम्य अछि, जे दुनू गोटए हिन्दी आ मैथिली दुनू भाषा मे सृजनशील रहलाह; दुनूगोटए अपेक्षाकृत मैथिली मे परिमाणात्मक स्तर पर कम लिखलनि; कालक्रमे दुनूगोटए मैथिली मे साहित्य अकादमी सं पुरस्कृत भेलाह; मुदा, यात्राी जकां, आरसी
प्रसाद ने तं दुनू भाषाक विविध विधा मे रचनाशील रहलाह, ने हिन्दी मे यात्राी जकां
जमि सकलाह। यात्राी जकां आधुनिको हैब हिनका सं संभव नहि भ’ सकलनि, ने
भाषाक स्तर पर आ ने विषयक स्तर पर। प्रायः इएह कारण थिक, जे परवर्ती पीढ़ी
मे अपन काव्य दिशाक कोनो प्रभाव-òोत ई नहि छोड़ि सकलाह।

आरसी प्रसादक पहिल प्रकाशित रचना थिक ‘शेफालिका’, जे ‘भारती’
पत्रिकाक सातम अंक मे 1937 ई. मे प्रकाशित भेल। ई समय देशक नागरिक लेल
परतंत्राता प्रतारणाक समय छल। मुदा, आरसी प्रसाद अहू विकराल समय मे छंद,
शब्दाडंबर, शृंगार, वाक्जाल आदिक संग मैथिली साहित्य मे प्रवेश कएलनि।

साहित्य आम जनताक लेल जीवन-संधान-पथ मे किरणमालाक काज करैत
अछि आ साहित्यकार ओकर पथ प्रदर्शक होइत छथि। अथवा एना कही, जे
साहित्यकार जन सामान्यक दृष्टि होइत छथि, समाजक सजग प्रहरी होइत छथि। ई
तथ्य शाश्वत सत्य थिक आ आरसी प्रसाद एहि बात सं नीक जकां परिचित रहलहेताह। हिन्दी मे 1938 ई. मे हिनकर कृति ‘कलापी’ आएल। हिन्दीयहु मे 1936
ई. मे मुल्काराज आनन्द आ सज्जाद जहीरक उद्योग सं प्रेमचन्दक अध्यक्षता मे
प्रगतिशील लेखक संघक अधिवेशन भेल। छायावादक गर्भ सं नवीन सामाजिक
चेतनाक निस्सरण भेल। प्रगतिशील विचार धाराक काव्यसृजन प्रारंभ भ’ चुकलछल। किंतु बाट प्रशस्त भ’ गेलाक अछैतो, आरसी अपन भक्ति-भावना, कीत्र्तन-भजन,
प्रेम-परिकल्पना मे लागल रहलाह।

1958 मे हिनकर कविता मैथिली मे संकलित भ’ कए आएल ‘माटिक दीप’।

दृष्टिकोण आ काव्य वस्तुक सीमा / 117

ताधरि हिन्दी मे पांच-छओ गोट पोथी आबि गेल छलनि। 1958 धरि हिन्दी मे
तीसरा सप्तक’ प्रकाशित भ’ चुकल छल। हिन्दी कविता छायावाद, प्रगतिवाद आदिक
चैकठि नांघि कए प्रयोगवादक आंगन मे विचरण करैत छल। 1949 मे ‘चित्रा’
आ 1958 मे ‘स्वरगंधा’क प्रकाशन मैथिली कविता कें हिन्दीक समानांतर चलबाक
सामथ्र्य द’ चुकल छलैक, मुदा आरसी प्रसाद अपन प्राचीन आसन पर बैसल रहलाह।
‘माटिक दीप’, हिनकर ओहि मान्यता सं आगू नहि ससरल। 1967 ई. मे हिनकरदोसर कृति आएल ‘पूजाक फूल’। 1960 सं 1967 धरिक तीस गोट कविताक
संग्रह मे अधिकांश कविता 1967 ई. क थिक। एहि संग्रहक प्रायः तीन-चारिटा
कविता एहेन हैत, जाहि मे देशक प्रति समर्पण आ भक्तिभाव प्रदर्शित अछि, एकाधटा जीवनोपदेश सं संबद्ध सेहो, अन्यथा समस्त कविता मे ओएह कीत्र्तन-भजन आ
विरह-प्रेम आदि अछि। सन् साठिक पश्चात् हिन्दी आ मैथिली दुनू साहित्यक कविता
मे आओरो नवता आएल। हिन्दी मे नई कविता आ मैथिली मे नव कविताक युग
क्षिप्र गतिएं प्रारंभ भेल। राजकमल, नव ढंगें कविताक परिभाषा देलनि, ‘कविता
आब नहि अछि नायिका भेद, नख-शिख, सिंगार/कविता नहि अछि रति विपरीतक
उलटल ग्रीवाहार/कविता थिक जनजीवनक अग्निप्राण जयघोष’। मुदा कवि आरसी
प्रसाद ओतहि अवस्थित रहलाह। रोजी-रोटी लए भोतिआइत जन-जीवनक अंतःपक्ष
कें नहि पढ़लनि। स्वतंत्राता प्राप्तिक पूर्वक जनजीवनक अभिलाषाक प्रति अपनरचना मे संवेदनशील नहि भेलाह आ ने स्वातंत्रयोत्तर जनजीवनक शोषण-उत्पीड़नक
प्रति साकांक्षे भेलाह। मुदा..



मुदा, दोसर दृष्टिएं आरसी प्रसाद सिंहक मादे ई नहि कहल जा सकैए, जे
ई मनुष्यक संवेदना सं सर्वथा निरपेक्ष रहलाह। वस्तुतः मानव जीवनक व्यथा कें मात्रा
ओकर समस्ये टा सं नहि आंकल जा सकैए। एहि समस्त परिस्थितिक अछैतो
मानवीय संवेदना सं प्रेमतत्व कें नहि काटल जा सकैत अछि। राजकमल चैधरी,
जाहि मानवीय अंतरंगता, ओकर आत्मदमन, ओकर आत्मशृंगार आदिक चर्चा कएने
छथि, ताहि मे प्रेमतत्वक महत्व न्यून नहि अछि। आरसी प्रसाद अपन रचना-संसारमे एहि प्रेम-तत्त्व कें प्रच्छन्न रूपें देखने छथि। यद्यपि हिन्दी साहित्य मे प्रेम मार्ग
आ भक्ति मार्ग भारतेन्दु पूर्व आ मैथिली मे मनबोध सं पूर्वक चीज थिक। मुदा आरसीप्रसाद एहि दुनू तत्त्व कें अपना साहित्य मे नव दृष्टिकोणें चित्रित कएने छथि।

हिनकर रचना मे ‘प्रेम’ अपन विस्तृत आयामक संग आएल अछि आ अहीप्रेम सं हिनकर भक्ति भावना, शृंगार वर्णन आ प्रकृति चित्राण निस्सरित भेल अछि।
एहि तीनू दिशा मे प्रस्फुटित हिनकर उद्गार पूर्ण औदार्यक संग कोमलकांत भावनाक
सरल-सहज-सरस अभिव्यक्ति पओलक अछि। एहि समस्त चित्राण मे कवि अपन
अंतस् कें अभिव्यक्त करबा मे जाहि तरहें सफल भेल छथि, से हिनकर कला आ
साहित्यक प्रति समर्पण; छंदशास्त्राीय, अलंकारशास्त्राीय ज्ञानक उत्कर्ष; कल्पनाशीलताक

118 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


चातुर्य आ रचनाशीलता परिपक्वताक द्योतक थिक।

आरसी प्रसाद, वस्तुतः देशदशा आ समाज सापेक्षता कें किछु हद धरि अपन
सृजन-संसार मे अनलनि अछि। ‘अभियान’, ‘स्वदेश-वन्दना’, ‘बाजि गेल रणडंक’
आदि किछु एहेन कविता अछि, जाहि मे देशक प्रति कविक समर्पण भाव अपन
सुच्चा स्वरूप मे वर्णित भेल अछि, ‘आकाश-दीपक’, ‘आधुनिक’ आदि किछु एहेन
कविता अछि, जाहि मे समाजसापेक्ष क्रिया-अभिक्रिया कें चित्रित कएल गेल अछि।
नवीन गीतिमयता आ मानवीय प्रेम भावनाक चित्राण हिनकर कविताक विशेषता
थिक।

हिनकर भक्ति-रचना कें दू कोटि मे बांटल जा सकैत अछि। पहिल कोटि मे
ओ रचना सभ अबैत अछि, जतए कवि निर्लिप्त भावें अपना कें निरीह, अशक्य आ
शरणागत बना कए अपन उपास्यक प्रबल सामथ्र्यक, क्रिया-कलापक, पूर्व शौर्यगाथाक
संग जागतिक समस्या, अपन विवशता, दैन्य आदिक चर्चा करैत छथि। हिनकर एहि
कोटिक रचना मे ‘मंगलाचरण’, ‘गोहारि’, ‘शरणार्थी’, ‘अश्रुमोचन’ आदि कविता सभ
अबैत अछि; जतए कवि अपन अनाशक्त समर्पण, उत्कट आस्था अदिक संग ओही
देवता कें समस्त सृष्टिक कारण मानैत, हुनकहि शरण मे रत रहए चाहैत छथि। ई
समर्पण, विषयक दृष्टिएं यद्यपि हिनकर अंधविश्वास, भग्न क्रियाशीलता आदिक
द्योतक हैत, मुदा, कविताक संरचनात्मकता कें अपन समर्पणक उद्वेग मे आंच नहिलागए देलनि अछि। संस्कृत बहुल शब्द वाक्य-विन्यासक अछैतो कविताक श्रुति
माधुर्य, अक्षुण्ण अछि। भक्तिपरक हिनकर दोसर कोटिक रचना, ‘वीणा वादिनी’
कविताक कोटिक रचना थिक। जतए कवि अतिशय उदार भ’ जाइत छथि आ ‘स्व’
सं समष्टि मे प्रवेश करैत देशक निमित्त प्रार्थना करैत छथि। प्रकारांतर सं हिनकर
एहि कोटिक रचना मे छायावादक संस्कार ताकल जा सकैत अछि। भक्तिपरक
हिनकर दुनू कोटिक रचना मे कवि उपासक आ उपास्यक अभेद्य संबंध स्थापित
करबा मे सफल भेल छथि। भक्ति मे पूर्ण वात्सल्यक समावेश करबा मे सक्षम भेल
छथि।

प्रेमपरक रचना मे कविक अभिव्यक्तिक सराहना, कतबो कएला पर न्यूनहैत। यद्यपि एहि कोटिक बहुत रास रचना मे कवि शब्द-विन्यास मे संस्कृतानुरागी
भ’ गेल छथि, भावोद्रेकक अनुमाप ताहि तरहें असीम भ’ उठल अछि, जे हिनकर ई
अनुराग, रससंप्रेषण मे बाधक नहि बनैत अछि। सम्यक् रूपें कवि आरसी प्रसाद
सिंहक रचनाक अवलोकन सं ई तथ्य सोझां अबैत अछि, जे हिनकर कविता मे
भावनात्मक प्रेम जैव रूप मे सभठाम विद्यमान रहैत अछि, आ कविक काव्यकौशलक
स्पर्श सं सब ठाम अपन मौलिक स्वरूप मे जीवंत भ’ उठैत अछि। एक दिश अपन
किछु कविता मे विभाव, अनुभाव कें उपस्थित क’ कए तत्क्षण प्रेमभाव अंकुरित
करबैत छथि, तं दोसर दिश पूर्व संचित प्रेम मे वियोगक स्थिति उत्पन्न क’ कए

दृष्टिकोण आ काव्य वस्तुक सीमा / 119

कामदग्धा नायिकाक अंतरेच्छा कें उत्कर्ष दैत छथि। प्रेमपरक कविताक एहि
वर्गीकरणक पहिल कोटि मे हिनकर कविता ‘गीत’, ‘प्रतीक्षा’ आदि अबैत अछि।
एहि दुनू कविता मे राति सं भोर होइत अछि। दुनूक नायिका राति कें अपना-अपना
दृष्टिकोणें देखैत छथि। एक कें संयोग छनि, दोसर कें वियोग। कवि, दुनूक मनोभाव
कें अपन वाक्चातुर्यक बल पर पूर्ण जीवंतता प्रदान कएलनि अछि। ‘प्रतीक्षा’क
नायिकाक ‘मानक माली रहल मनोरथ बाग उजड़ैत राति भरि’, आ ‘गीत’क
नायिकाक ‘लूटल मनसिज चोर रे तन, मन, धन, मान’ दुनू भावना कविक
काव्य-कौशल सं अनुप्राणित भ’ उठल अछि। हिनकर दोसर कोटिक प्रेमपरक जे
कविता सभ अछि, ताहि मे मुख्य अछि ‘कोना रहि सकै छी’, ‘घटा देखि कारी’,
‘एकटा प्रेम-पात’ आदि। कविवर आरसी प्रसादक एहि कोटिक कविताक संप्रेषणीयता
असीम अछि। कवि एहि कविता सभ मे विरहिणी नायिकाक दग्ध हृदयक कोन सं
उठल उद्वेग कें अतीव मर्मस्पर्शी बनौने छथि।

कविक एहि कोटिक कविता कें विश्लेषित करबा काल उदात्त प्रेम आ
व्यवस्थाजन्य अभाव दुनू कें ध्यान मे राखि कए चलए पड़त। जे प्रश्न आधुनिक
कविताक प्रेक्षण मे मोन मे बेर-बेर उठैत रहैत अछि, तकर साकार स्वरूप हिनका कविता
मे उपस्थित अछि। आ ई प्रश्न थिक, जे की व्यवस्थाजन्य विद्रूपता, शोषण, अनाचार
प्रपंच, अभाव, बेकारी...एहि समस्त वस्तुनिष्ठताक कारणें आजुक मानव-जीवन सं
प्रेम अलोपित भ’ गेल ? ...जं से नहि, तं आजुक कविता मे प्रेमतत्वक लेल
प्रसंगानुकूलो जगह किएक नहि ? जखन कि आजुक साहित्य समकालीन मानव-जीवनकअनुकृति थिक। कवि आरसी प्रसादक एहि कविता सभक नायिका कें विपन्नता सं
बेसी दुःख विरह दैत छनि। हिनका लेल ‘प्रिय’ क अभाव सभ सं पैघ विपन्नता
थिकनि। कविक एहि तरहक चित्राण मनुष्यक रागात्मक संबंधक उत्कर्ष कें आओरो
बेसी उंचाइ दैत अछि। नायिकाक एकाकीपनक दर्द कें चित्रित करबा काल कविक
उपमान सभ अद्भुत चित्रा उपस्थित करैत अछि ‘लतरि गेल पानो/फुटल अछि
मखानो/सोहनगर लगै अछि गायक बथानो/पोसल छ’ल पड़वा, से भ’ गेल जोड़ा/हमहि
एसगर, आब चलि आउ अपने’। नारी सुलभ लालसा थिक ओकर मातृत्व, पियाक
संग ओकर वासण्ण्ण् आ तकरा कवि सद्यः प्रसूता गाय आ जोड़ा पड़बाक उपमान सं
द्योतित कएने छथि। पड़वाक जोड़ीक प्रेम अति प्रगाढ़ होइत अछि, जे प्रायः कोनहुं
परिस्थिति मे संगहि रहए चाहैत अछि आ गायक मात्सर्य प्रायः सभ प्राणी सं बेसी
भावुक होइत अछि। एहि तरहक बिंब उपस्थित करबाक कौशल, कविक अगाध
साधनाक द्योतक थिक। से, ई नायिका अही पड़वा जकां सभ किछु बर्दाश्त क’ लेतीह,
‘...मगर, जं अहां, तं, फाटलो पटंबर/करब हम गुजर...’। प्रेमक एहि उत्कर्ष कें कवि
अपन आनो कविता मे व्यक्त कएने छथि, जतए नायिकाक मोन प्राण कें मन्मथ
आहत कएने छथिन आ प्रवासी पियाक हेतु प्रलाप मे लागल छथि। ओहि वेदनामय

120 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


भावनाक एक-एक क्षण पहाड़ बुझाइत छनि। ‘अहां संग रहबै ओना तं हजारो/अभावक
अन्हरिया बिहुंसि खेपि देबै’ सन पंक्ति मे नायिकाक जे समर्पण देखाइत अछि, तकर
संपूर्ण विकास अगिला पंक्ति सभ मे होइत अछि ‘प्रणय जं प्रलय धरि परीक्षा करय
तं/परीक्षा अनल मे सदा दहि सकै छी/मुदा जं घटा पथ-विजन मे न मानय/कहू,
मौन-मन हम कोना रहि सकै छी ?’

एकर अलावे कविक किछु कविता व्यक्ति परक छनि, जाहि मे कवित्वक
आवा मे पूर्ण रूपें भावना पाकि नहि सकल अछि। मुदा शब्द-विन्यास सं अर्थोत्कर्षदेबाक प्रवृत्ति कें कवि ओतहु नुका क’ नहि रखलनि। ‘ललित-स्मृति’, ‘सान्त्वना’
आदि एहने कविता सभक प्रतिनिधित्व करैत अछि। ओना ‘आकाश दीपक’,
‘आधुनिका’, ‘मैथिली’ सन-सन कविता कें सेहो व्यक्तिपरक मानल जा सकैए, मुदा
एहि कविता सब मे कविक अनुभूति ततेक उत्कर्ष प्राप्त क’ लेलकनि अछि, जे ई
कविता सभ आब व्यक्तिवादी नहि भ’ कए वर्गवादी भ’ गेल छनि। ग्रामीण परिवेशक
कोनो हरजाहि बालाक चरित्रा निरूपण, आधुनिकताक रंगीनी कें अंगीकार कर’ मे
आ तज्जन्य नाटकीयता आन’ मे अपन मौलिकता बिसरि जाए वाली आधुनिकाकप्रवृत्ति, मिथिलाक ललनाक सौंदर्य, गांभीर्य आदिक चित्राण एहि कोटिक कविताकमूल भाव अछि। ‘प्रश्न-उत्तर’ आ ‘विद्यापति वन्दना’ सेहो व्यक्तिपरके कविता थिक;
मुदा महापुरुषक प्रति भक्ति भावना आ ताहि संगें स्वदेश गरिमाक चित्राण एहू
कविता सभ कें शाश्वतता प्रदान करैत अछि।

प्रकृति-प्रेम, कविक हार्दिक उद्गार कें सर्वाधिक प्रभावित कएने अछि। इएहकारण थिक, जे प्रकृति परक कविताक रचनाकाल मे कवि अपेक्षाकृत बेसी मुखर
भ’ जाइत छथि। ‘मेघ पड़ै छै’ आ ‘पावस-प्रसंग’ कविता हिनकर सर्व प्रसिद्ध कविता
थिकनि, जकरा सभ वर्गक लोक, लोक गीत जकां कंठ मे रखने अछि। निश्चित रूप
सं कविताक एहि सफलता आ प्रशस्तिक कारण, कविक जीवनानुभूतिक प्रति
परिपक्व दृष्टिकोण आ कल्पनाशीलताक श्रेष्ठतम कौशल थिक। हिनकर एहि
कोटिक कविता सभ मे सं किछु प्रमुख अछि ‘पुरिबा बसात’, ‘शारदीया’, ‘वर्षागम’,
‘मधुयामिनी’, ‘वसन्त आह्नान’, ‘फागुन’ आदि। पुनः ईहो कहब आवश्यक प्रतीत
होइत अछि, जे प्रेमक प्रति हिनकर उदार भावनाक गहनता असीम अछि। इएहकारण थिक, जे प्रकृति चित्राण करबा काल सेहो ई नैसर्गिके प्रेम मे बन्हाएल रहैतछथि। शृंगार ओतहु हिनकर पछोड़ नहि छोड़ैत छनि। आ, तें मुक्त रूपें ई प्रकृतिकसंग नहि रहि पबैत छथि। प्रकृतियहु कें हिनका प्रेमक उद्दीपनक रूप मे लेबए पड़ैतछनि। ओहि प्रकृतिक छटाक बीच कोनो प्रेम रससिक्त नायिकाक हृदयोद्गार केंचित्रित कर’ लगैत छथि अथवा ओहू मे हिनका विरहिनीक आंखि, कामोत्तेजक पवन,
मनसिजोद्रेक सं बेसम्हार भेल मोन, मन्मथक बाण सं क्षत-विक्षत भेल नायिका भेटैत
छनि। कविक एहि भावना सभक एकाध टा चित्रा एना अछि ‘कारी-कारी घटा उठै

विधात्मक तोड़फोड़क कथा / 121

छै, पाकल जामुन रंग केर/चमकै छै बिजुरी बिजुवन मे, सुधि न रहै छै अंग केर/छने
इजोत अन्हार छने मे, बुझि ने सांझ कि भोर रे...’

एहि समस्त चित्राणक अलावे कवि थोड़ बहुत ‘गजल’ सेहो लिखने छथि, मुदा
से सशंकिते भावें। गजलक जे धारा एखन मैथिली मे चलि पड़ल अछि, ताहि संभिन्न। हिनकर कृति ‘सूर्यमुखी’ कें साहित्य अकादमीक पुरस्कार सेहो देल गेल।

122 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्




विधात्मक तोड़फोड़क कथा


युग परिवर्तनक पहिल चोट मानव जीवन पर मुख्यतया दू दिशा सं पड़ैत अछि।
पहिल तं ई, जे देशक राजनीतिक स्थिति बदलि जाइत अछि आ दोसर, जे सामाजिक
परिवेश उधेसल चल जाइत अछि। अइ उधेसबाक क्रम मे ततेक व्याकुलता रहैत
छैक जे लोक आधुनिकताक चकाचैंध मे अपन जमीन बिसरि जाइत अछि, बेचैनी
मे कतोक नव-नव पद्धतिक अनुसरण क’ लैत अछि। अइ बेचैनी मे बेसी काल
इएह होइत अछि जे मनुष्यक अपन थाती हेरा जाइत छैक, दोसर जमीन पर कलमी
गाछ जकां पल’बढ़’ लगैत अछि, जेना नव धनाढ्यक बालकनी मे गमलाक माटि
मे गुलाबक डारि बढ़ैत अछि, फुलाइत अछि। अही क्रम मे संयोगवश किछु अपनहुं
विरासत ओकरा संग रहि जाइत छैक, मुदा से संयोगवश, सायास नहि। अइ
संयोगवशता आ प्रयत्नशीलताक प्रतिफलन मनुष्य कें जाहि प्रकारक जीवन दैत छैक,
से एकटा खींचा-तानी वला जीवन होइत छैक। गमलाक जीवनक संकुचन जखन-तखन
मनुष्य कें बेसी आसान बुझाइत छैक। मिथिलांचल मे प्रायः इएह होइत रहल अछि।

युग परिवर्तन सं मिथिलाक मानव जीवन पर इएह द्विमुख चोट पड़ल आ
एकर अनुषंग आनो कैक तरहक उनट-फेर भेल। अही उनट फेरक स्थिति मे अपन
जमीन तकैत आ गमलाक सुख दिश आकर्षित होइत मानसिक द्वंद्वक धरातल पर
गोविन्द झाक रचना संसार बसल अछि। संसारक कोनो भाषाक रचना किएक ने
हो, ओकर मूल उद्देश्य आइ इएह थिक जे सामान्य जनजीवन कें ओकर दुर्दशाक
दारुण्य ओ देखा दिअए, ओकरा ओकर शक्तिक बोध करा दिअए। विजयदेव नारायण
साहीक प्रसिद्ध व्याख्यान ‘साहित्य आ साहित्यकारक दात्यिव’ मे अइ विषय पर
फैल सं विचार कएल गेल अछि। भारतक विभिन्न भाषा कें समेटैत अपन एकटा
वक्तव्य मे यू.आर. अनंतमूर्ति कहैत छथि जे भारत देशक साहित्य बाइस भाषामे एके बात कहि रहल अछि। तमिल उपन्यासकार सु. समुत्तिरम केर ‘एक घेरे
से बाहर’ देखी अथवा ललितक ‘पृथ्वीपुत्रा’ अपन उद्देश्य मे ई कतहु अलग नहि

विधात्मक तोड़फोड़क कथा / 123

अछि। जेना कि उपर चर्चा भेल अछि, सामान्य जनजीवनक सर्वांगीन फलक
समाजनीति आ राजनीति अही दुनू सं प्रभावित, प्रताड़ित आ नियंत्रित होइत रहैत
अछि। देरिदा आ हावरमासक चर्चा करैत भारतक विभिन्न भाषाक साहित्य मेउत्तर संरचनावाद आ उत्तरआधुनिकता पर विचार होअए लागल अछि। मैथिली समाज
मे एखन धरि ठीक सं आधुनिकतो नहि आबि सकल अछि। सामाजिक जीवनक
आचार संहिताक निर्मातागण एखन धरि मैथिल कें एकटा सुलभ आ मनोनुकूल
जीवन जीबए देब’ लेल तैयार नहि छथि। ओ वर्ग जे समाज कें अपना नियंत्राण
सं चलब’ चाहैत अछि, वास्तविक अर्थ मे ओ नियंत्राण प्रताड़ना थिक। एहना मेमैथिल समाज पर उत्तरआधुनिक दृष्टिक कोन कथा, आधुनिक दृष्टि सं विचार करब
सेहो एखन अपराध थिक। कहबा लेल मिथिला मे आ मैथिल मे बहुतो परिवर्तन
आएल अछि। मुदा से परिवर्तनक भ्रम थिक। एहना मे मैथिली साहित्य जतेक
आधुनिक भ’ सकल अछि, से मैथिलीक रचनाकारक तीक्ष्ण प्रतिभा, प्रखर जीवनदृष्टि
आ प्रगतिशीलताक प्रति, जीवनक गतिकताक प्रति अदम्य साहसक फल थिक।
गोविन्द झा अपन वयसक आठम दशक मे आबियो कए ततबा प्रगतिकामी आ
आधुनिक छथि जतबा आजुक कोनो युवा रचनाकार छथि।

कोनो रचनाकारक दायित्व चारि स्तर पर बनैत अछि सामाजिक चेतना,
पारिवारिक चेतना, मानवीय चेतना, ब्रह्मांडव्यापी चेतना। गोविन्द झाक सृजनशीलताक,
दायित्व अइ चारू स्तर पर बेस सावधान छनि। पूर्व मे जाहि समाजनीति आ राजनीति
केर चर्चा कएल अछि, ताहि प्रसंग मे ई स्पष्ट क’ देब आवश्यक अछि जे केंद्रीभूत
भ’ कए हिनकर रचना संसार मे राजनीतिक सजगता नहि छनि। मुदा जे छनि,
अर्थात् समाजनीतिक सजगता, से ओही राजनीतिक दबावक अनुषंग थिक अथवा
ओकर प्रतिफल थिक। बिहारक वर्तमान राजनीतिक स्थितिक सूत पकड़ने गोविन्द
झाक बाल्यकालक राजनीतिक स्थिति धरि चल जाउ, तं स्पष्ट भ’ जाएत जे देशक
अइ उपेक्षित भूखंड मिथिलाक सामाजिक परिवेश की छल आ एखन की अछि.
.


गोविन्द झाक पहिल कथा सन् 1947 मे प्रकाशित भेल। जं प्रकाशन वर्षक
आधार पर गणना कएल जाए तं उनचास वर्षक सृजन-यात्रा मे हिनकर उपलब्धि
पर ध्यान देब’ पड़त। मैथिली कविता धारा मे हिन्दीक तर्ज पर अथवा अपन मौलिक
दृष्टि सं प्रगतिवाद, प्रयोगवाद, नव कविता आदि आंदोलन आएल। मुदा मैथिली
कथा साहित्य मे अइ तरहक कोनो आंदोलनक चर्चा नइं अछि। हिन्दीक ‘नई कहानी’
जकां मैथिली मे कोनो ‘नवकथा’ अथवा ‘नूतन कथा’ आदि पदबंधक प्रचार-प्रसार
नहि भेल। नामवर सिंह अपन पुस्तक ‘कहानी, नई कहानी’ मे लिखैत छथि, ‘रूपआ शिल्पक नवीनता सामान्यतः लोकक ध्यान सब सं पहिने आकृष्ट करैत अछि...शिल्प कें ल’ कए नव प्रयोग करबाक प्रवृत्ति आजुक कविए जकां कथाकारो मे

124 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


अछि आ कविता जकां किछु कथो मात्रा प्रयोगक लेल लिखल गेल।... शैलीक
अतिरिक्त कथाक आंतरिक रूपो मे बहुत परिवर्तन भेल अछि। अइ बीच कथाक
रूप एतेक विस्तृत भ’ गेल अछि जे बहुत रास निबंध, स्केच आ रिपोर्ताजो कथाक
सीमा मे आबि गेल अछि। कौखन अइ साहित्य-रूपक सीमा एक-दोसराक भीतर
एते दूर धरि चलि जाइत अछि जे ओकरा अलगाएब कठिन भ’ जाइत अछि। एक्के
रचना कखनहुं स्केच थिक आ कखनहुं निबंध। ...जे छोट-सन बात पुरान कथाकार
लेल अपर्याप्त छल, ओकरे नव कथाकार कथाक लेल पर्याप्त मानि लेलनि अछि
आ फेर ओकरा भीतर सं ओ लोकनि कथाक लेल कथानकक विभिन्न दिशाक विकास
कएलनि अछि।’

मैथिली कथा साहित्य मे साहित्य-रूपक ई सीमा हरिमोहने झा तोड़ि देने छलाह।
हुनकर गद्य लेखन पर जं ध्यान देल जाए तं अइ सूक्ष्म पठनक दर्शन भ’ सकैत
अछि। हुनकर अनेक निबंध अछि जकरा कथा कहबा मे कोनो भांगठ नहि। अहिना
हुनकर कथोक प्रसंग कहल जा सकैत अछि। तात्पर्य ई, जे जं हिन्दी जकां मैथिलीयहु
मे कथा-आंदोलन ताकल जाए तं शिल्पक स्तर पर आ विषयक स्तर पर ‘नई कहानी’
क तर्जक कथा हरिमोहन झाक रचना संसार मे भेटि जाएत। मुदा जें कि मैथिली
मे अइ सभ प्रकारक आलोचना नइं लिखल गेल अथवा मैथिलीक कथाकार लेखन
कार्यक संग-संग झंडा ल’ ल’ कए जुलूस नइं बहार कएलनि, तें मैथिली कथा,
मात्रा मैथिली कथा रहि गेल। बहुत भेल तं कतहु-कतहु ‘आधुनिक मैथिली कथा’
लिखा गेल।

सीमाक ई अतिक्रमण आ विधाक ई तोड़-फोड़ गोविन्द झाक गद्य लेखन मे
बेस जकां देखाइत अछि। आइ सभ भाषा मे एहेन रचनाकारक कमी नहि अछि
जे निरंतर अपन पोथीक संख्या बढ़ब’ मे आम-तेतरिक कोन कथा, गूलरि-कठजामुनक
कथा लिखि-लिखि ढेरि लगा रहल छथि। पोथीक अइ तरहें बढ़ैत कंकोरबियान देखि
कए एकटा विद्वान कहने छथि पहिने लोक एगारह गोट पोथी पढ़ि कए एक गोट
पोथी लिखैत छल आ आइ लोक एक गोट पोथी पढ़ि कए एगारह गोट पोथी लिखैत
अछि। ओना सत्य तं ई अछि जे आब ओहो एक गोट पोथी पढ़बाक आवश्यकता
लोक नइं बुझैत छथि। एक गोट पोथी देखि कए एकैस गोट पोथी लिखए बैसि
जाइत अछि। गोविन्द झा मैथिली लेखनक ओहेन रचनाकार मे सं छथि जे असंख्य
पोथी पढ़लाक बाद एक गोट पोथी लिखए सोचैत छथि। संस्कृत, मैथिली, हिन्दी,
अंग्रेजी भाषा पर समान अधिकार रखनिहार रचनाकार गोविन्द झाक दखल आनो-आन
भारतीय भाषा साहित्य आ लिपि पर छनि। उनचास वर्षक सृजन संधान मे मात्रा
दू गोट कथा संग्रह (सामाक पौती, नखदर्पण), तीन गोट नाटक (बसात, रुक्मिणी
हरण, अंतिम प्रणाम), एक गोट जीवनी (उमेश मिश्र), एक गोट उपन्यास (विद्यापतिक
आत्मकथा) तथा एक गोट मैथिली-अंग्रेजी शब्दकोश प्रकाशित छनि। अइ मे सं

विधात्मक तोड़फोड़क कथा / 125

कैकटा पोथी अथवा पोथीक अंश भिन्न-भिन्न भाषा मे अनूदितो छनि। ओना लिखबा
लेल ई ढेरी रास कविता सेहो लिखलनि। मुदा जें कि कविता प्रकाशित नइं करौलनि,
कविक रूप मे नइं जानल गेलाह। बहुत कम लिखि कए मान्यताक अइ शिखर
पर पहुंचि जाएब, गोविन्द झाक रचनाधर्मिताक स्तर कें रेखांकित करैत अछि।

विषयक स्तर पर पूर्वहु कहल जा चुकल अछि जे हिनकर रचना संसार बेसी
काल समाज, परिवार आ व्यक्तिक चारू कात घुमैत रहैत अछि। राजनीतिक परिवेश
पर हिनकर लेखनी नहिए जकां चलल अछि। जं कतहु चललो अछि तं नव धनाढ्यकफोंक अहंकार आ ओहि वर्गक सांस्कृतिक विकृति कें उघार कर’ लेल संक्षेप मे
ओकर कुरूपता, ओकर वीभत्सता उजागर क’ देने छथि। ई कहब आवश्यक होएत
जे एहि कार्य मे हिनका पर्याप्त सफलता भेटलनि अछि आ तकर मूल श्रेय हिनकरकथा शिल्प कें जाइत अछि। हिनकर कथा लेखनक बेसी विषय मिथिलाक सांस्कृतिक
Ðास, मानव मूल्यक लोप, अमानवीय वातावरणक निरंतर वृद्धि पर केंद्रित अछि।
अइ क्रम मे हिनका बेसी काल इतिहास, पुराणक नायक मोन पड़ैत रहैत छनि।अपन अति प्राचीन परंपरा आ समकालीन जीवनक विकृति कें मिलाकए कथाकारगोविन्द झा एकटा ईमानदार अन्वेषक जकां विकृतिक प्रेरणादायी सूत्रा तकैत रहैत
छथि। हिनकर अधिकांश कथाक अभिव्यक्ति शिल्प, कथावाचनक शिल्प मे अछि
जाहि मे वाचक अपन अनुभव सुनबैत रहैत अछि। ई शिल्प, एक्के संग कथाक
कथ्य आ शिल्प दुनू पर विचार कर’ लेल बाध्य करैत अछि। हिनकर कथाक कथावाचक
आओर कियो नहि, कथाकार स्वयं छथि, जे प्रथम पुरुष एक वचन मे बात कहैत
रहैत अछि। कथा मे अपन अनुभूत घटनाक विवरण सुनबैत कथाकार सतत अपना
कें आम जनताक स्थिति मे पेन्ट करैत बुझाइत रहैत छथि। गोविन्द झाक करीब-करीब
समस्त कथा हिनकर मित्रा, कुटुंब आदिक संग घटल हिनकर घटना जकां अछि।
एहेन कथा कमे अछि, जाहि मे स्वयं कथाकारक उपस्थिति नहि हो। जाहि कथा
मे हिनकर अपन उपस्थिति रहैत छनि, ताहि मे ई अपना कें सतत अकचकाएल,
क्षुब्ध, उपेक्षित, पिछड़ल, आधुनिकताक (?) छूति सं दूर, विकृतिक संक्रमण सं बांचल,
अत्याधुनिक आ सुविधासंपन्न नहि रहि पएबाक अपन स्थिति पर किंचित क्षुब्ध
मुदा संतुष्ट, तिलिस्मी ढंगें व्यवस्थाक यांत्रिकता मे प्रवेश पाबि लेनिहार कुटुंबादिक
चातुर्य पर छगुंतित मुदा स्वयं तेहेन नहि भ’ पएबाक कनेको मलाल नहि, एहि
चमत्कारक संग सुविधा संपन्न भेल कुटुंबादिक आंखि पर चढ़ैत चर्बी आ ओकर
बदलैत मोन पर व्यथित, अइ सुविधा संपन्न लोक द्वारा असहाय व्यक्तिक उड़ाओल
जाए वला मखौल पर द्रवित...प्रस्तुत कएने छथि। कथा मे हिनकर एहि तरहें निजी
उपस्थिति कथाकारक जीवन दृष्टिक चित्राणक अलावा आओर किछु नहि थिक।
अभिप्राय ई नहि जे ई आधुनिकताक प्रति कोनो उपेक्षाभाव आ परंपरा तथा पाखंडक
प्रति अपेक्षाभाव रखैत छथि। असल मे आधुनिकताक प्रति बेस झुकाव हिनकर सृजन

126 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


आ जीवन मे बुझाइत अछि। मुदा आधुनिकताक विकृतिक पाछू बेतहाशा दौड़बामे अपस्यांत नहि रहैत छथि, ओकर विकृत आ विद्रूप आचरण अथवा एप्रोच सं
परहेज रखैत छथि। तहिना पारंपरिक रूढ़ि, पाखंड, धर्मांधता सं सेहो असंक्रमित
रहए चाहैत छथि। किंतु हिनकर एहनो एप्रोच भेटैत अछि जाहि सं स्पष्ट भ’ जाइत
अछि जे ई सर्वथा परंपराक प्रति नकार बोध सं आक्रांत नहि छथि। परंपरा मे एखनहुं
एहेन बहुत किछु भरल अछि, जे बहुत उपयोगी आ आजुक जीवन कें सहज बनएबा
मे अत्यावश्यक साबित भ’ सकैत अछि।

गोविन्द झाक कथा लेखनक फलक विस्तार हरिमोहन झा सं रमेश धरिक
कथा लेखन मे ताकल जा सकैत अछि। कथ्य आ शिल्पक समस्त सीमाबंध कें
तोड़ैत आ विधात्मक बन्हेज कें फानैत हिनकर कथा संसार इतिहास, पुराण, गीता
सं ल’ कए बम, पिस्तौल, तमंचाक उपयोग धरि पसरल अछि। जादू-टोना, झाड़-फूक,
पीढ़ीक संघर्ष, युवा पीढ़ीक प्रगतिकामनाक प्रति सदयता, मानवताक समर्थन,
अमानवीयताक प्रति घृणा, धार्मिक पाखंडक खंडन, असहाय वर्गक प्रति सदाशयता,
सांस्कृतिक थाती कें सुरक्षित राखि सकबाक प्रयास हिनका कथा मे अपन संपूर्ण
शक्तिक संग उपस्थित रहैत अछि। सभ सं पैघ बात जे गोविन्द झाक कथा लेखन
एकटा सकारात्मक एप्रोचक कथा संसार थिक जतए अधिकांश कथाक परिणति
एकटा सुखद निर्णय पर होइत अछि। संपूर्ण विपरीत परिस्थितिक अछैत कथाक
अंत एकटा निर्णय सं होइत अछि आ ओहि निर्णयक एकटा तार्किक आधार होइत
अछि। ओ निर्णय चाहे आधुनिकतावादी युवावर्गक पक्ष मे हो अथवा परंपरावादी
बुजुर्गक पक्ष मे, ओकर तार्किक आधार सर्वथा मानवीय सरोकार आ मानवाधिकार
सं प्रेरित रहैत अछि। एतए एहि मानवाधिकार शब्दक अर्थग्रहण कोनो राजनीतिक
सूत्रा सं नहि कएल जएबाक चाही।

चर्चा भ’ चुकल अछि जे गोविन्द झा एकटा सफल कथाकारक संग-संग एकटा
सफल भाषाविद् सेहो छथि। आ तकर उदाहरण हिनकर कथाक भाषा शिल्प भ’
सकैत अछि। कथाक शिल्प निर्माण मे गोविन्द झा कतेक चिंतन कएलनि से तं
ओएह कहताह मुदा कथा स्वयं जे स्पष्ट करैत अछि ताहि मे शब्द प्रयोगक स्तरपर तं ई साफ देखाइत अछि जे बहुभाषाविद् हएबाक कारणें कतोक ठाम संस्कृत,
अंग्रेजी अथवा हिन्दीक शब्द आबि टपकल अछि। मुदा शब्दानुशासन ततेक साधल
छनि जे ओकर प्रयुक्ति कोनो ठाम अवैध अथवा अनुपयुक्त नहि बुझाइत अछि।
कैकटा कथाक प्रतीकात्मकता हिनकर गद्य कें काव्यमय बनबैत अछि, जे ओकरा
बेर-बेर पढ़बाक लेल बाध्य करैत अछि। सस्पेन्स (‘एक दुर्लभ जंतुक खोज’ सन
आओरो कैकटा कथा), निरंतर जिज्ञासा बढ़बैत रहबाक कला, संयोगवशताक तिरस्कार,
चित्राणक काव्यात्मकता, संवादक नाटकीयता ई सब मिलि कए कथा कें रोचक,
प्रभावोत्पादक आ आकर्षक बनबैत अछि। कहल जा चुकल अछि, जे जाहि विषय

जर्जर अतीत सं मुक्तिक कथा / 127

पर कतोक रचनाकार निबंध लिख’ लगताह ओहि विषय पर गोविन्द झा बेस आकर्षक
आ मनलग्गू कथा लिखि कए प्रस्तुत क’ सकैत छथि।

भाषाक स्तर पर हिनकर कथा सभ मे अपूर्व आकर्षण छनि। ओना कहबा
लेल किछु पूर्वाग्रही एहनो भेटि जाइत छथि जे कहैत छथि ‘गोविन्द झाक कथाक
विषये की रहैत छनि जे ओकरा पढ़ल जाए’। ओहेन पाठकक लेल इएह कहल
जएबाक चाही जे हुनका अपन सोच विकसित करबाक चाही। आधुनिकता मात्रा
आगू दौड़ि कए चल जाएब नहि थिक। दौड़ैत काल मोन राख’क चाही जे हम
जाहि जमीन पर दौड़ि रहल छी, से जमीन कतेक ठोस अछि। गोविन्द झा सतत्
अपन जमीनक निस्सनता मोन रखैत छथि आ निरंतर आगू लेल डेग उठौने रहैत
छथि। अइ क्रम मे अपन आंखिओ खोलने रहैत छथि जे अगिला डेग जतए राखब
ओतुक्का जमीन कतेक ठोस अछि। ओहि पूर्वाग्रही कें ई मानि क’ चल’क चाही
जे गोविन्द झा लेस्बियन एटीच्यूड पर आकि आधुनिकतम सभ्यता मे पत्नी बदलबाकप्रवृत्ति पर तं कथा नहि लिखताह। जाहि संसार सं हुनका ने तं कोनो सरोकार
छनि आ ने राखए चाहैत छथि, ताहि पर ओ रचना किएक करथु ? समकालीन
समय मे बहुतरास वयसाहु लोक एहेन छथि जे किशोर वयसक प्रेमी जकां प्रगतिशीलता
आ आधुनिकताक कहरिया बनल फिरैत छथि। एक राति लेल पत्नी बदलि कए
स्वाद बदलबाक प्रवृत्ति अथवा एहेने बहुतरास आधुनिक (विकृत) प्रवृत्ति कें ओहो
पसिन नइं करताह। मैथिलीक वर्तमान लेखन मे गोविन्द झा सभ सं जेठ पीढ़ीकरचनाकार छथि। परिष्कृत परंपराक रक्षा आ उपयोगी आधुनिकताक अनुगमनक आग्रही
रचनाकार गोविन्द झा अइ बातक समर्थक छथि जे ओ संपूर्ण आधुनिकता आ संपूर्ण
परंपरा शिरोधार्य हएबाक चाही जे एकटा स्वस्थ समाजक निर्माण करए आ आब’
वला पीढ़ी कें एकटा पारदर्शी तथा पवित्रा संस्कारक सीख दिअए। ई बात कतहु
हिनकर वक्तव्य मे नहि अछि, ई हिनकर रचनाक नवनीत थिक।

आब आबि कए गोविन्द झाक उनचास-पचास वर्षक लेखन पर चर्चा कएल
जा रहल अछि मैथिली साहित्यक ई विडंबने थिक। एहेन विडंबनाक मैथिली मे
कमी नहि अछि। कांचीनाथ झा ‘किरण’ क प्रसंग सेहो इएह कहल जा सकैत अछि।
तिकड़म तंत्रा मे जं ईहो सुरेन्द्र झा ‘सुमन’ जकां पटु रहितथि तं आइ धरि हिनको
कतोक पोथी छपल रहितए आ कतोक पुरस्कार लुटने रहितथि। मैथिली मे बिना
संकलित पुस्तक अएने चर्चा नहि होइत अछि आ से अएलनि बहुत बाद मे।
फलस्वरूप तीस बर्ख पुरान रचना पर लोक आधुनिक यंत्रा सं विचार करब शुरुह
कएलक। ओना मैथिली मे विचारे कहां होइत अछि ? दोसर, जे गिरोहवाद हावी
रहल, गोविन्द झा कहिओ गिरोह बनौलनि नहि...।

अपन परिवार, मित्रा, कुटुंबक संग बिताएल जीवनक एक-एक तंतु मे गोविन्द
झाक ओतए कथाक खजाना संगृहीत अछि। आ तकरा संगहि हिनकर प्रखर भाषा

128 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


शिल्प, श्रेष्ठ रचना-कौशल सेहो अछि। नाटकीय प्रस्तुति कथाकारक अभिव्यक्ति
कें अद्भुत रूपें सशक्त आ प्रभावोत्पादक बनौने अछि। शैल्पिक स्तर पर विधात्मक
तोड़-फोड़ हिनकर सृजन संसारक आयाम कें जतेक विस्तार देने अछि, से सहज
रूपें ककरहु लेल आकर्षणक विषय भ’ सकैत अछि। मिथिलांचलक सर्ववर्गीय,
सर्वदलीय आ सर्वजातीय जन समुदाय मे युग परिवर्तनक विकृति, सुकृति जाहि-जाहिविधिएं अपन प्रभाव छोड़लक, आधुनिकताक विकृतिक चोट जतए-जतए पड़ल आसुकृतिक फूल जतए-जतए फुलाएल, परंपरा आ आधुनिकताक खींचा तानी मे जे-जे
नस जतेक तनाएल, नैतिकताक जाहि सीमा धरि हनन भेल, प्रगतिक नाम पर
आ नव-नव योजनाक नाम पर पछिला उनचास वर्षक स्वाधीन भारत मे जतेक
बकवासपूर्ण कार्य भेल, मानवीय संवेदनाक Ðास आ मानवीय संबंधक विगलन जाहि
तरहक क्षुद्र तथा तात्कालिक स्वार्थक लेल भेल से सबटा विलक्षण भाषा-शिल्प मे
गोविन्द झाक कथा-संसार मे संचित अछि। हिनकर कथा अनुभूत सत्यक सहज
संवादक पेटारा थिक, जतए ने तं फोंक कल्पनाक कतहु गुंजाइश देखाइत अछि
आ ने संयोगवसात कोनो घटनाक अवतरण। चांस उत्पन्न क’ कए कथा मे चकाचैंधअनबाक प्रवृत्ति हिनका ओतए कतहु नहि देखाइछ। आम जन-जीवन सं कथाकारकसरोकार कें चिद्दित करैत गोविन्द झाक कथा, सतत कथा जकां आगूक कथा जानि
लेबाक जिज्ञासा बढ़बैत रहैत अछि, कविता जकां फेर-फेर पढ़बाक तगेदा करैत
रहैत अछि।

जर्जर अतीत सं मुक्तिक कथा / 129


जर्जर अतीत सं मुक्तिक कथा


कथाकार ललित केर संपूर्ण कथा संसार बहिरंग मे माक्र्सवादक स्थूल मांसलता,
अंतरंग मे फ्रायडक सूक्ष्मता आ लक्ष्य मे उपनिषदीय अमृत-पुत्रा हएबाक आधारभूत
संरचना पर ठाढ़ अछि। कहबा लेल तं ललित, राजकमल, मायानन्दक नाम एक
संग कहि कए मैथिली मे काज चलि रहल अछि। स्वयं ललित सेहो अइ तीन
मे एक नाम और जोड़लनि उग्रानन्द। मुदा हिनका सब गोटए मे मौलिक भिन्नता
अछि। ललित-राजकमल-मायानन्द कनिएं आगू पाछूक संग एक समय मे रचनाशील
छलाह से भिन्न बात, मुदा तीनू कें कतहु एक आरि-खेत नइं छनि। राजकमल
आ ललित कें तं एकदम्मे नइं। एके घटना कें तीनू, तीन नजरिएं देखलनि। कथा
पात्राक जीवनक सौविध्य लेल जे कोनो सामाजिक मान्यता राजकमलक ओतए बाधक
होइत अछि, राजकमल ओकरा तोड़ि ताड़ि कए आगू बढ़ि जाइत छथि, मान्यता
रहए ताख पर, मुदा ललितक स्थिति से नइं छलनि। हुनका अंत अंत धरि समाज
पर थोड़ेक विश्वास छलनि, यद्यपि हिनको ओतए समाजक घिनौन रूप बहुत अछि,
मुदा हिनका तैयो समाजक सत्य-शिव-सुंदर रूपक आवश्यकता छनि। अपन पात्राक
जीवनक सौविध्यक बाट आ समाजक किछु श्रेष्ठ अवधारणा हिनका ओतए समानान्तर
चलैत अछि। राजकमल जकां ई एकट्ठे नकार बला स्थिति मे नइं छथि। अइ क्रम
मे कही तं मायानन्द हिनकर बेसी लगीच छनि। ओना मायानन्दक पात्रा सब डेरबुक
बड्ड होइत छनि, समाज भय हिनका ओतए बड्ड रहैत छनि। एक्के टा प्रसंग,
‘पृथ्वी पुत्रा’ उपन्यास मे बिजली आ कल्पनाथक देह संबंधक लेल जाए जं ई प्रसंग
मायानन्दक ओतए रहितनि, तं दुनू खूब गुलछर्रा उड़बितए, आ ककरो भाफो नइं
लगितइ; राजकमलक ओतए रहितनि, तं ओ दुनूक बिआह करा देने रहितथिन,
सठम्-साठ्यम समाचरेत, अर्थात् तों समाज भ’ कए हमर सुख-सुविधाक ध्यान नइं
रखबें, तं हम व्यक्ति भ’ कए अप्पन नियम-केदा अपना लेब। मुदा ललित एहेन
स्वेच्छाचारी नइं भेलाह, ओ समाज कें समाजक ठाम रह’ देलखिन्ह आ सामाजिक

130 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


मान्यता सं इतर काज कएनिहार अपन कथा पात्रा कें अपना ठाम। हिनकर रचना मे
व्यक्ति-सुविधा जतेक फैल सं स्थान आ मान्यता पौने अछि, आ से बिना कोनो
हो-हल्ला मचैने, से लगैत अछि कथाकरक अद्भुत धैर्य, इच्छाशक्ति आ साहस
तथा लक्ष्य प्राप्तिक आस्थाक परिचायक थिक। सागर जकां शांत-धीर आचरण, नदी
जकां प्रवहमान-सलिल भाषा, अर्जुनक तीर जकां एकलक्ष्य संधान, नित नव विषयक
अनुसंधान ई सब मिलिकए ललितक कथा संसार कें एकटा आकर्षक फलक दैत
अछि, आ सत्ते हिनकर कथा सब मांसल, सूक्ष्म आ उपनिषदीय अमत-पुत्रा बनि
पड़ल अछि।

से ललित जखन बादक समय मे लिखब बंद क’ देलनि, तं तकर कारण
पुछला पर कहैत छथि, ‘३अद्यावधि हमरा मैथिलीक दलबंदी कोनो स्थान नइं देलक।
साहित्य अकादमीक संग्रह मे हमर कथा नइं, अन्य भाषा मे अनूदित होब’वला ग्रंथ
मे हमर रचना कें कोनो स्थान नइं३किऐ लिखू ? पाइक प्रयोजन नइं, जीविकाक
साधन नइं। तखन प्रोपर प्लेसमेंट, ताहू सं आउटकास्ट ? की अइ दमघोंटू बंध्या
स्थिति मे अहां लिखब चालू राखि सकैत छी’ (विभूति आनन्द कें इंटरव्यू मे देल
वक्तव्य)। ई वक्तव्य पढ़ि कए नइं लगैत अछि, जे मैथिलीक अइ चर्चाकार आ
संकलक सभक पतिया-प्रायश्चित सात जनम धरि गोंत-गोबर गिरियो क’ नइं छुटतै ?
अरे बाप रे, हत्यारा थिकथि ई सब३। जखन ललितक हत्या क’ दै जाइ गेलखिन्ह,
तखन आओर किनकर नइं करताह ? खैर३

ललित वस्तुतः एकटा कथाकार नइं, मैथिली कथा आंदोलनक पुरोधा छथि।
मैथिली कथा लेखन कें प्रौढ़ बनएबाक पहिल प्रयास ललितेक ओतए भेल अछि।
बिआह-दान, दिअर-भाउज आ उचिती-डहकन सं मुक्ति ललितेक ओतए मैथिली
कथा कें भेटलैक। आम जनजीवन, निम्नवर्गीय-निम्नजातीय जनजीवन, जीवन-यापनक
विस्तृत वृतांत, परंपरा सं वर्जित जीवनांश आदिक प्रवेश पहिल बेर हिनकहि कथा
मे भेल, राजकमल कें घीचि कए मैथिली मे अनबाक श्रेय हिनकहि छनि, मायानन्द
कें ‘भांगक लोटा’ सं विमुख क’ कए सही दिशा दिश प्रेरित करबाक श्रेय हिनके छनि।

ललितक कथालेखन वस्तुतः एकटा चमत्कार देखएबाक कथा थिक। कोनो
दैवी आ कि जादूगरीक चमत्कार नइं। मात्रा ई जे कथा अहां कें सम्मोहित कएने
नेने चल जा रहल अछि, चलल जा रहल अछि, अहंा मोने मोन सोचि रहल छी,
गुनिधुनि मे छी आब की हेतै ? आ कि अचानक ब्रेक, जाः, कथा खतम। ‘प्रतीक्षा’
कथा पढ़ब शुरू करू आ देख लिअ’, प्रतीक्षा टा किऐ प्रतिनिधि, रमजानी, स्वप्न
भंग आ कि ‘पृथ्वी पुत्रा’ उपन्यासे किऐक ने हो३सभक समाप्ति स्थल पाठक कें
एक टा नव प्रारंभक सनेश देलक अछि।

जे बात राजमोहन झा अपन निबंध ‘ललित अर्थात३’ मे कहि चुकल छथि,
तकरहि फेर सं दोहरएबाक प्रयोजनक नइं छल। मुदा ओही सं दोसर निष्पत्ति निकलैत

जर्जर अतीत सं मुक्तिक कथा / 131

अछि, तें बात ओतहि सं प्रारंभ करए पड़त। ललितक कथा भूमि विराट छनि, अत्यधिक
उदार छनि। हिनके समकालीन राजकमल आ मायानन्दक विषय-संसार जतेक घनीभूत
अछि, ततेक हिनकर नइं। हिनकर विषय-संसार विस्तृत छनि। हिनकर कोनो कथा
आपस मे एक दोसरा सं कोनो तरहें संबद्ध नइं रहैत अछि। सब कथा एक दोसर
सं अलग, आ भिन्न भूमि पर ठाढ़ अछि। मैथिली कथा मे पहिल बेर हिनके ओतए
अवर्ण जातिक आ निम्न वर्गक कथानायकक प्रवेश भेल, आ से प्रवेश एतेक वैराट्यक
संग, एतेक विस्तृत जीवन-फलकक संग, आ ताहू मे सवर्ण-संभ्रांत वर्गक पात्रा कें
कात-करट लगौने ई ललितक शैली आ लेखन दृष्टिक उत्कर्षे थिक, जे अइ प्रयोगक
स्थापना भ’ गेल। ललितक लेखन काल 1950-1964 धरिक अवधि थिक। भारत
स्वतंत्रा तं भ’ गेल छल, मुदा मिथिलाक जनपद मे लेखनक विषय लेल अहू समय
धरि पुराने आ जड़िआएले समस्या सब प्रबल छलैक। ताहि समय मे यौन अतृप्ति,
यौन कुंठा, अंतर्जातीय यौन संबंध, सरकारी तंत्राक अराजकता, सामंत विरोधी बातआदिक चर्चा सामान्यो वार्तालाप मे सर्वस्वीकृत नइं छल, साहित्य मे तकरा प्रमुखता
देब, पैघ साहसक काज छल। ई साहस ललित कएलनि, आ जेना कि ओहि समयक
विभिन्न लेखकक संस्मरणात्मक लेख सभ सं स्पष्ट होइत अछि, ललित अपना संग
एकटा जोरगर आ सहसगर पीढ़ीक निर्माण सेहो क’ लेलनि। ई दीगर बात थिक
जे किछु ‘खखड़ी’ (फोंकिल आ पाखंडी) सभ सेहो हिनका समय मे किछु जनोन्मुख
कथा गढ़ए लागल छल, जिनकर चरित्रा बाद मे आबि कए स्पष्ट भेलनि। मुदा,
राजकमल, मायानन्द, सोमदेव, धीरेन्द्र, उग्रानन्द प्रभृतिक संग हिनकर पीढ़ी, मैथिली
कथा कें बेस जकां अद्यतन कएलकनि।

तइ पीढ़ी मे जं राजकमल आ मायानन्दक रचनाक भावभूमि सघन आ ललितक
विस्तृत छनि, तं तकर मूल कारण लेखकक निजी जीवन-दृष्टि आ आत्मबोधे थिक।
राजकमल, मायानन्द जतए सेक्टर विशेष कें पकड़ि कए ओकर सर्वपक्षीय चित्रा
घीचि लेबए चाहैत छलाह। ओतहि ललित कम समय मे नमहर दूरी नापि लेबाक
अगुताहटि मे (मुदा हड़बड़ी मे नइं आ कोनो अधखडू नइं) अपन क्षेत्रा कें पर्याप्त
विस्तृत कएलनि। ओना अइ पीढ़ीक संग पैघ दुर्भाग्य तं रहल, जे राजकमल रहबे
नइं केलाह, ललित रहिओक’ नइं रहलाह, आ मायनन्दक कथा लेखन विरल भ’
गेल, मुदा, एखनहुं ई बात कहल जा सकैत अछि, जे ललितक रचना संसार जतेक
विस्तृत अछि, तकर अवलोकन आबहु लोक कें कर’क चाहिअनि। कथा हो कि
उपन्यास, ललितक रचनाक आकार बड़ छोट होइत छनि, एकदम उचित थिक, रचना
छोटे हएबाक चाही, मंत्रा शैली मे, मंत्रा छोट होइत अछि, सूत्रा छोट होइत अछि,
कुंजी छोट होइत अछि, ओकर प्रभाव विराट होइत अछि, ओकर व्याख्या विस्तृत
होइत अछि, ओ प्रकाश आ ज्ञानक एकटा विशाल बाट केर ताला खोलैत अछि।
रचनाक छोट हएबाक कारणें हालहि मे राजेन्द्र यादव अपन एकटा लेख मे बाबा

132 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


यात्राी पर फब्ती कसलनि अछि, मुदा हमरा जनैत, जाहि रचनाकार कें पाठकक संबंध
मे अन्यथा धारणा भरल रहैत छनि, जे पाठक कें बूड़ि बुझैत छथि, से की तं रचना
कें मोट करबा लेल वाक्जाल बढ़बैत छथि अथवा अपन उद्देश्यक व्याख्या मे अनेरे
पृष्ठ खर्च करैत छथि। मैथिली मे एहेन रचनाकार नइं छथि। मैथिलीक रचनाकार
अपन पाठकक ज्ञान क्षेत्रा पर पर्याप्त आस्थावान रहैत छथि।

ललितक समस्त रचना मंत्रा शैली मे अछि, आ हिनकर रचना संसार कथा
सृजनक नवीन भूमिक पायलट सर्वेक्षण थिक, आ एकटा संकेतो थिक: ‘आगूक
समयक रचनाकार लोकनि ! देखैत जाउ, कतए-कतए कथा अछि ?’ आ अइ मंत्राक
उपयोग आगूक कैकटा रचनाकारक सृजन मे भेल अछि। रमानन्द रेणु, प्रभास कुमार
चैधरी, धूमकेतु, सुभाषचन्द्र यादव, विभूति आनन्द, तारानन्द वियोगी आदि कथाकारक
ओतए ओइ मंत्रा, सूत्राक व्याख्या देखल जा सकैत अछि।

भावभूमिक विस्तृति ताक’ लेल हिनकर कथा लेखन कें कैक दृष्टिएं देखबाक
प्रयोजन अछि। एकदम ढलान पर बहैत लक्ष्य केंद्रित जलधारा सन बहैत आ पसरैत
भाषा (बाढ़िक उद्दाम प्रवाह सन नइं, जे बाटक सबटा माटि खंगहारि कए ल’ जाइत
अछि), जनपदीय शब्द समूहक चयन, शुद्ध पंचकोशीक भौगोलिक परिवेश, समाजसं उपेक्षित-तिरस्कृत आ अस्वीकृत व्यक्ति आ तकर जीवन-यापन पर केंद्रित विषय,
तदनुकूल वृत्ति-वातावरण, तदनुकूल चरित्रा आ घटनाक संघटन३सभ अर्थें तकैत
हिनकर रचनाक विस्तृति देखैत बनैत अछि। स्वयं कथाकार कहने छथि जे हिनकर
कथा मे ‘प्रेम अछि (लड़ाइ पर), दुर्दम्य क्रूरता मे मनुष्यता अछि (जंगल ओ रस्ता),
दुर्दांत दस्युक रक्तलिप्त मन-प्राण मे कोनो प्रेयसीक स्नेह भरल अछि (स्वप्न भंग),
कथाक मार्मिकता कें बूझ’ लेल पाठक स्वतंत्रा अछि।’ सत्ते, ललितक कथाक
आयाम हिनकर भिन्न-भिन्न कथाक विषय आ चरित-नायकक प्रस्तुतिक आधार
पर गनल जा सकैत अछि।

बेसी तं कतेक गनल जाए, पृथ्वीपुत्रा क ‘बिजली’ आ सारंगियाक ‘बेला’
कें अथवा ‘प्रतीक्षा’ आ ‘मुक्ति’क पत्नी कें नजरि पर ल’ कए देखी तं स्त्राी जाति
द्वारा एतेक सूक्ष्म, सार्थक आ तार्किक विवरण प्रस्तुत करब कनिए टा बात नइं
थिक। ‘बिजली’ विवाहित अछि, मुदा कल्पू मिसर संग ओकर दैहिक संबंध जतेक
साहसी, निर्लिप्त, निद्र्वंद्व आ ईमानदार (प्रबल इच्छा शक्ति आ आत्मीय स्वीकार
शक्तिक अर्थ मे) अछि, तकर रहस्य-लोक कें अनुभव कएल जा सकैए, एकर व्याख्या
असंभव अछि। बेला नृत्यांगना थिक, हरिचरण ओकरा संग ‘संगत’ करैत अछि,
मुदा जाहि प्रतिबद्धता, विचारधारा आ ग्लानिबोधक संग, दुनियाक मुंह पर थूक फेकि
कए ओ मरल, तकर व्याख्या कोन शब्द मे हो ? ‘मुक्ति’ कथा मे पत्नी जाहि हालत
मे रुग्ण आ अशक्य पति सं मुक्त होइत अछि आ ‘प्रतीक्षा’ मे जाहि तरहें स्वयं
रुग्न आ अशक्य पत्नी, पति कें मुक्त करैत अछि३अइ दार्शनिक विषय कें कोना,

मनोवैज्ञानिक सत्यक कथा / 133

आ के व्याख्यायित क’ सकत ? असंभव अछि३

चेखब कें उद्धृत करैत राजकमल चैधरी एक ठाम लिखने छथि, जे उत्तम
कोटिक कथा अपन समाप्ति थल सं शुरुह होइत अछि। ललितक समस्त कथा
असल मे समाप्त भेलाक बादे शुरुह होइत अछि। कारण, जा धरि कथा चलैत अछि,
ता धरि तं ललितक घटनाक्रम, भाषा आ शैली पाठक कें एतबा अवसरे नइं दैत
छैक जे ओ किछु सोचि सकए। घोड़ा आ सवारक संबंध अपना पाठकक संगे ई
बनौने रहैत छथि। जा धरि कथा चलैत रहत, कथाकार सवार रहताह, पाठक हिल
नइं सकैत छथि, आ जखन कथा समाप्त हएत, तं कथाकार लगाम पकड़ने रहताह,
अहां सोचैत रहू, जेना-जेना कथा अहांक भीतर भीजैत जाएत, अहां सोचैत रहू।
आ, ई चिंतनशीलता मात्रा स्त्राी पात्राक वैचित्रये टाक लेल नइं, पुरुख पात्राक विवशताक
लेल सेहो चालू रहत। सर्वशक्ति-संपन्न कल्पू मिसरक संस्कार सामंती छनि, बिजलीक
संग ‘यूज एंड थ्रो’ वला फरमूला लगा सकैत छला, कोनो स्वजातीय स्त्राी कें बियाहि
कए आनि सकैत छलाह, आ कि बिजलीए कें बियाहि कए घर बसा सकैत छलाहण्ण्ण्।
गजब बात अछि, जे ललितक कथाक चरित नायक अथवा नायिका मे समस्त क्षुद्रताक
अछैत एकटा संपूर्ण मानवता जीबैत रहैत अछि। अर्थात समाजक यथार्थ सं उद्भूत
क्षुद्रता सत्य थिक, अइ विकराल स्थिति मे नैतिकता आ मानवताक अवगाहन सुंदर
थिक। आ जें कि सत्य आ सुंदर दुनू विद्यमान अछि, तें ई सबटा कथा ‘शिव’
(कल्याण) केर सनेश सेहो दैत अछि। संपूर्ण अराजकताक अछैत एकटा संशोधित
संस्करणक समाजक स्थापना हिनकर कथा मे भेटैत रहैत अछि। ‘पृथ्वी पुत्रा’ मेबिसेखी, गेनालाल, सरूप, छत्तर, जंगबहादुर, बेनी आदि चरित्रा जाहि तरहें ललितअंकित कएने छथि, क्षुद्रता, उदारता, स्वीकृति, मान्यता, विवशता आदिक उपचार
जाहि ढंगें भेल अछि, भाउजक संग सरूपक बियाह, बिजली आ बेनीक वाक्संघर्ष;
पंच समुदाय, खेती-बाड़ी, चैर्य कर्मक व्याख्या, पुलिसिया वृत्तिक सूक्ष्मतापूर्ण अध्ययन
जाहि तरहें प्रस्तुत कएने छथि, तकर व्याख्या कोनो दर्शन शास्त्राक व्याख्याक संगेंसंभव अछि। ‘पृथ्वीपुत्रा’ उपन्यासे टा नइं, ललितक समस्त कथाकृतिक मूल्यांकन,
जं राष्ट्रीय क्षितिजक कोनहुं भाषा साहित्यक तुलना मे कएल जाए, तं रचना अपन
मनोविश्लेषणक प्रधानता आ समाजशास्त्राीय दृष्टिाकेणक आधार पर अगिला पांत
मे ठाढ़ होएत। भारतीय साहित्यक कोनो भाषा मे एहेन रचना कम अछि।

सन् सतहत्तरिक आम चुनावक बाद जयप्रकाश आंदोलनक परिणतिक
कारिख-चून लागल मुंह देखि भारतक युवावर्ग कें जाहि मोहभंगक सामना करए
पड़ल छलैक, ललितक कथा-सृजन मे तकर संकेत छठमे दशक मे भ’ गेल छल।
‘उड़ान’ कथाक कथावाचक आ गिरधर भाइक माध्यमे जाहि विचारधारा आ जाहि
कर्मधाराक गप भेल अछि से अइ बातक प्रमाण थिक। मोन मे क्रांतिक आगि
अइ पात्रा सब कें छैक, मुदा अभाव आ बेकारी कोन तरहें ओकरा लोकनि कें तोड़ैत

134 / आधुनिक साहित्यक परिदृश्य


अछि से देखि क्षुब्ध होअए पड़ैत अछि। पात्राक पतितपन आ पतितपनाक बीच
मे ‘कमल’ जकां फुलाइत एकटा संभावना, मनुष्यता आ नैतिकताक एकटा किरिण
कोना बिहुंसि उठैत अछि ई ललिते क’ सकैत छलाह। कहब अनुचित नइं होएत,
जे प्रभास कुमार चैधरीक ओतए जे सामंत वर्ग नांगरि सुटका लेलनि अछि आ
धूमकेतुक ओतए जे पतित वर्ग कें पावन हएबाक गरिमा भेटि गेल अछि, से ललितेक
कथा चिंतनक विस्तार आ ओइ चिनगी सं उठल धधरा थिक।

हिनकर ‘रमजानी’ कथा मे ‘किसान युग’ सं ‘मशीन युग’ मे प्रवेश ताकल
गेल। सत्य तं ई थिक, जे ई ‘मशीन युग’क आवाहन नइं, व्यापार दिश झुकावकआवाहन छल, जतए पारंपरिक òोत पर आश्रित कृषिकर्म आ राजा-दैवीय आपादाक
कारणें व्याप्त अविश्वसनीयता सं पराभूत मानव अपन आ अपन पशु मित्राक श्रम
पर विश्वास कएलक। जं आन कोनो समृद्ध साहित्यक आलोचना कर्म जकां मैथिलीकआलोचना कर्म समृद्ध रहितए, तं स्वातंत्रयोत्तर काल मे विकसित समस्त आलोचनात्मक
टूल्स केर उपयोग, ललितक कथा संसारक मूल्यांकन लेल कएल जा सकैत छल।समाजशास्त्राीय आलोचना पद्धति सं जं ललित केर कथा कृतिक मूल्यांकन हो, तंतय होएत, जे क्रूर आ निकृष्ट सामाजिक पद्धति सं बदहाल भेल मानव कोना-कोनादुर्वृत्ति दिश उन्मुख होइत अछि, ओइ दुर्वृत्ति मे ओ कतेक ईमानदारी सं आ कतेक-क्रूरता
सं प्रोफेशनल बनल रहैत अछि, आ ओहि प्रोफेशनलिज्मक अछैत ओ कोना अपनमानवता कें बचैने रहैत अछि, आ सब सं ऊपर, जे एहेन भयावहताक अछैत रचनाकार
कोन उद्योग सं एक नवनिर्माणक जोगाड़ फिट करैत रहैत अछि ! ‘प्रतिनिधि’ कथामे मनुष्यक दानवता, सर्पवृत्ति आदि कोन तरहें उगैत अछि आ ओही दानवताक
बीच ‘नेकी कर दरिया मे फेक’ कोना अपन प्रबलता अक्षुण्ण रखैत अछि !

ललितक कथा कर्म मे चर्चा खाहे कृषिकर्मक हो अथवा दुष्कर्मक, अपन विवरण
आ दृष्टांत मे कथाकार एकदम अद्यतन आ पूर्ण रूपें सावधान तथा व्याख्यात्मक
रहैत छथि। पटुआक खेती हो अथवा चैर्य-वृत्ति हो, पाकेटमारी हो आ कि आने
कोनो घटना, सौंसे रचनाक पाठक पश्चात लगैत रहैत अछि, जे कथाकार अइ कर्मक
सूक्ष्मतम जानकारी रखैत छथि। एहि सूक्ष्मतापूर्ण चित्राणक परिणाम ई होइत अछि,
जे कथा अपन जमीन पकड़ने रहैत अछि। अपन वातावरण आ अपन जमीन सं
उखड़ि गेलाक बाद, मनुष्य आ विचारधारा दुनू डगमगा जाइत अछि। ललित, अपन
कोनो रचना आ रचनाक पात्रा कें अइ दुर्घटनाक शिकार नइं होअए देलनि अछि।

आइ जखन ललित नइं छथि, तखनहुं हुनकर कृतिकर्म हमरा लोकनिक सोझां
राखल अछि। हुनक मूल्यांकन अइ समस्त आधार पर कएल जाएबाक चाही। एखन
धरि जं ललित पर कम लिखल गेल, तं से एकटा गोलैसीक प्रमाण थिक। अइ
गोलैसी सं बाहर आबि कए हुनकर मूल्यांकन हएबाक चाही। हमरा तं ‘पृथ्वीपुत्रा’
उपन्यास धरि मे संपूर्ण ‘विरचनावाद’ आ संपूर्ण उत्तर आधुनिकतावाद देखाइ पड़ैत

मनोवैज्ञानिक सत्यक कथा / 135

अछि। मुदा ताहि सं की, मैथिलीक मठाधीश ई मान’ लेल तैयार कहां छथि
?

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...