Saturday, September 12, 2009

पेटार ३७

उमेश मंडल


कोवर गीतश् (1) कोने बाबा बान्हल इहो नव कोवन हे जनकपुर कोवर। कोने अम्मा लिखल पूरैन हे जनकपुर कोवर। फल्लाँ बाबा बान्हल इहो नव कोवर फल्लाँ अम्मा लिखू पूरैन हे। ताहि पैसि सुतय गेला फल्लाँ दुलहा सीता कोवर धय ठाढ़ि हे। बैसू सीता दाइ लाले रे पलंगिया बुझि लिय हमरो गेयान हे। जनकपुर (2) नव खटिया नव पटिया नव सब पुरहर हे। आहे नव नव जोड़ल सिनेह सोहाग राति निन्द नहि हे। ताहि पैसि सुतलाह फल्लाँ दुलहा संग सिया दाइ हे। सीताअति सुकुमारि सोहाग राति निन्द नहि हे। हटि सुतु हटि सुतु ससुर जी के बेटिया अहाँ धामे गरमी बहुत हे।   हम नहि घुरबै ककरो वचनियाँ कोवरक वर बड़ ठेकर हे। महुअक कालक गीतश् बर रे जतन सासु मौहक रान्हल खिरियो ने खाथि जमाय। गे माइ गौरी जाय दहिन भरि बैसलि थार बदल दुइ भेल। मनाइनि जाय पाँछा भय बैसलि वर करा एक देल। गे माइ सेहो करा हम कुकुर जिमायब से पान वर के देल। घरभरी कालक गीतश् माय मनाइनि पान लगाबथि सब मिलि कैल ओरियान। आइ थिकनि घरभरी सखि हे धीया जमैआ मोर जाय। धानश्पान देल हाथहि सखि हे दुनू मिलि देलि छिड़आय। भनहि विद्यापति गाओल सखि हे सब बेटी सासुर जाय। खोंइछ झाड़ैक गीतश् सगर जनम हम आस लगाओल, भैया करता बिआह गे माइ। भौजी के खोंइछा मे हीरा मोती आओत, ताहि लय गहना गढ़ायब गे माइ। तेहन घर ने भैया बिआहल, भौजी खोंइछ दुबिश्धान गे माइ। जनु कानू जनु खीजू बहिन दुलरुआ, हम देव गहना गढ़ाय गे माइ। कोवर परातीश् अब ने विलासक बेरि हे माधव, आब ने विलासक बेरि। मुखहुक पान बिरस सन लागत, दीपक जोति मलीन। श् हे माधवकृकृ चेरिया आय बहारय आंगन, चन्द्रक जोति मलीन। श् हे माधवकृकृ ग्वाला आय गौ दूहन लागे, बछड़ डगरि बन गेल। श् हे माधवकृकृकृ सूरदास प्रभु तुम्हारे दरस को, सुर्य उदय भय गेल। श् हे माधवकृकृकृ कनियाँ मुँह देखैक गीतश् सुनू हे सखिया सिया मुँह देखू षुभ काल। पहिने जे देखथि सासु कौषिल्या, देखू हे सखिया मोहर देखि षुभ काल।   देखू हे सखिया कंगना देथि षुभ काल। तखन जे देखथिन ननदि बड़ैतिन, देखू हे सखिया टाका देथि षुभ काल। तखन जे देखथि परश्परोसिन, आषीश देथि षुभ काल। सुनू हेे सखियाकृकृ कोबर नीपै कालक गीतश् नीक नीपू नीक नीपू दुलहिनिया। नहि नीक नीपब ते सुनब कहिनिया। कुम्हराक बेटी अहाँ थिकहुँ दुलहिनिया। माटि आनि नीपू नइ ते सुनब कहिनिया। जोलहाक जनमल थिकहुँ दुलहिनिया। पाट आनि नीपू नइ ते सुनब कहिनिया। बहियाक बेटी अहाँ थिकहुँ दुलहिनिया। पानि आनि नीपू नै ते सुनब कहिनिया। कोबर नीपै काल कनियाँ क ठकैक गीतश् देखू देखू हे सखि सीता रुसि रहली, आधा निपलनि कोबर आध छोड़ि बैसली। श् देखूश्देखू कृकृ सीताक बापकेँ बजाउ, सीता माए केँ बजाउ की सब सीता के सिखा क वदा कयली। श् देखूकृकृ सुनलनि सासु कौषिल्या हाथ मोहर धयली कंगना गढ़ायब टीका मंगायब सीता किए रुसली। श् दुखूश्देखूकृ गौरी पूजाक गीतश् गौरी पूजय चलल रुक्मिनि संग सखी दस पाँच यो। तीन फूल लय गौरी पूजल बेली चम्पा गुलाब यो। तीन सिन्दुर लय गौरी पूजल मोटिया पीपा अचीन यो। तीन नेवेद्य लय गौरी पूजल नेवो नारंगी अनार यो। तीन वस्त्र लय गोरी पूजल लाल पीयर पटोर यो। तीन बेरि कल जोरि पूजब लय गंगाजल नीर यो। हड़ीर पानक गीतश् रतन सिंहासन बैसथु सुलपाणि रवाथि ने हरीर पान पीवथु जूड़ी पानि। जेहने महादेव के गौरीदाइ परान तेहने फल्लाँ दुलहाके फल्लीं दाइ परान। जेहने रामचन्द्र के सीता दाइ परान तेंहने फल्लाँ दुलहा के फल्लों दाइ परान।   तेहने फल्लाँ दुलहाक फल्लों दाइ मधुर हे। मुट्ठी खोलैक गीतश् सखि मुट्ठियो ने खोलय जमैया हे हारि गेला रधुरैया। हमरो सीता मुट्ठी कसि के बान्हल खोलियो ने सकला जमैया हे।हारि गेलाकृ हमरो सिया दाइक कोमल आँगुर धीरे स खोलब जमैया हे। हारि गेलाकृ चतुर्थीक कालक गीतश् चलुश्चलु कामिनि कर असनान। प्रखर भानु मुख करत मलान। षीतल षुरभीत जल घट देल। पंकज नायक नभगत भेल। आजु चतुर्थीक अवसर थीक। किछुओ ने भिजतह लोहित सारि। लहु लहु जल हम ढा़रब बारि। दुहु जन रहु गय अमर कहाय। वरुण देव नित रहथु सहाय। कुमर चतुर्थीक उत्सव तोर। विधिकरी विधि करु भऽ गेल भोर। नहायकालक गीतश् राम लखन सन सुन्दर वर के जनु पढ़ियनु केओ गारि हे। केवल हास विनोदक पुछिअनु उचित कथा दुइ चारि हे। प्रथम कथा ई पुछिअनु सजनी कहता कनेक विचारि हे। गोरे दषरथ गोरे कौषल्या, भरत राम किएक कारी हे। सुनु सखि एक अनुपम घटना, अचरज लागत भारी हे। खीर खाय बालक जनमौलनि, अवध पुरी के नारी हे। अकथ कथ की बाजू सजनी, रघुकूल के गति न्यारी हे। साठि हजार बालक जनमौलनि सगरक नारि छिनारि हे। नेहलता किछु आब ने कहियनु, एतवे करथि करारी हे। हँसी खुषी मिथिला से जेता, पठा देता महतारी हे। वेदी उखारै कालक गीतश् सखि यदि एक बापक बेटा हेता   दू बापक बेटा हेताह तखने दोसर हाथ लगोता हे। दू कोन के वेदी उखारलनि तेसर आंगन मे ठाढ़ हे। कहियनु गऽ सासु ससुर सँ आंगन मे रुसल छथि जमाय हे। कहियनु जाय जमाय बाबू सँ औंठी देवनि गढ़ाय हे। पटिया समटय कालक गीतश् रघुववर पटिया देलनि ओछाय सीता फेकल जुमाय कोवर घर मे। गाइन मंगल गीत गाय विधिकरी विधि कराय। सखि सब करथि विनोद कोवर घर मे। कहथिन सरहोजि बुझाय जुनि अहाँ अगुताइ। विधि करियौ आइ कोवर घर मे। सौजनक गीतश् मेही भात जतन भनसीआ साँठि लयल भरि थारी जी, राहड़िक दालि बटा भरि उत्तम ताहि देल घी ढ़ारी जी। ओल पड़ोर तरल तरकारी खटरस भेग लगावै जी। महिसिक दही छाँछ भरि उत्तम परसय प्रेम पियारी जी। दही खयवा कालक गीतश् हे वर दही किये ने खाइ छी माय अहाँक गोआरक बहु छथि अहाँ संग किएक ने लयलहुँ संग संग अयली टीसन सँ घुरली टीकट मास्टर देखि डेरेयली हे वर चीनी किये ने खाइ छी माय अहाँक छथि बनियाक बहुआ स्ंाग किये नहि अनलहुँ स्ंागे अयली दरबजा सँ घुरली समधी देखि डेरेयली। हे वरकृ चित्ती साटक गीतश्   जाहि ठाम लागल सिन्दुर पिठार। जहाँ जहाँ सुमिरन करबे रे योगिया रखिहे हिरदय लगाय। नून तेल पैंच लेल सिन्दुर सपन भेल पिया भेल डुमरीक फूल। भितियाकृकृ मध् ाुश्रावनीश् गोसाउनिक गीतश् (1) विनती सुनियौ हे महरानी, हम सब षरण मे ठाढ़। अक्षत चानन अहाँ के चढ़ायब, आरती उतारव ना। बेली चमेलीक माँ के हार चढ़ायब अढ़ूल चढ़ायब ना। करिया छागर धूर बन्हायब, उजर चढ़ायब ना। (2) महिमा तोहर अपार हे जगजननी महिमा तोहर अपार हे। बामे रवप्पर दहिने कताबहै सोनितक घार हे।महिमाकृकृ पहिरन चीर गले मुण्डमाला पैर मे नुपुर अपार हे। सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस के सदा रहिय रखवार हे। महिमाकृकृ बिसहाराक गीतश् साओन मास नागपंचमी भेल। बिसहरि गहवर सोहाओन भेल। केओ नीपै गहवन केओ चैपारि। हमही अभागिन निपी दुआरि। केओ लोढ़े अढ़ूल केओ बेलपात। हमहू अभागिन हरिअर दूबि। केओ माँगे अनधन केओ माँगे पूत। हमहू अभागिन सिरक सिन्दुर। पावनिक गीतश् पाबनि पूजू आजु सोहागिन प्राण नाथ के संग मे। कारी कम्बल झारि गंगाजल काजर सिन्दुर हाथ मे। चानन घसू मेहदी पीसू लिखू मैना पात मे। पावनि साजि भरिश्भरि आनल जाही जूही पात मे। कतेक सुन्दर साज सजल अछि लिखल मैना पात मे। आँखि मूनै कालक गीतश् नहुँ नहुँ धरु सखी बाती, धरकय मोर छाती। नहुँ नहुँ पान पसारह, नहुँ नहुँ दष्ग दुहु झाँपह। मधुर मधुर उठ दाह मधुर मधुर अवगाहे।   टेमी कालक गीतश् क्दली दल सन थर थर कापय मधुश्रावनी आजे। स्कल सिंगार समारि साजथि सब मधुमय कैल समाजे। क्मल नयन पर पानक पट दै नागर जखनहि झाँपै। विधकरी हाथ चन्द्रकर बाती देखि सगर तन काँपै। आजु सोहागिन सहमल बैसल मुख किये पड़ल उदासे। अम्बा मुख हेरय कियै कामिनि पल पल लैह उसासे। कुमर नयन सँ नोर बहाबह गाइनि गाबथि गीते। बड़ अजगुत मधुश्रावनी विधि परम कठिन इहो रीते। बटसावित्रीश् बड़क पूजाक गीतश् जेठ मास अमावस सजनी गे सब धनि मंगल गाव। भूशण वसन ठीक करु सजनी गे रचि रचि आँग लगाव। काजर रेख सिन्दुर भेल सजनी गे पहिरथु सुबुधि सयानि। हरखित चललि अक्षयवट सजनी गे गवितहि मंगल गाने। घर घर नारि हकारल सजनी गे आदर सँ सभ गेलि। आइ थिक बड़साइति सजनी गे तैँ आकुल सभ भेलि। घुरुमिश्घुरुमि जल ढ़ारल सजनी गे बांटल अक्षत सुपारी। फतुर लाल देल आषिश सजनी गे जीबथु दुलह दुलारी। (2) कतेक जतन भरमाओल सजनी गे, दै दै षपथ हजारे। सपथहुँ छल जौं जनितहुँ सजनी गे, नहि करितहुँ अंकारे। आब जगत भरि मानिनि सजनी गे, केओ जनि करय पिरीते। मुँह सँ अधिक बुझावथि सजनी गे, वचन त राखथि थीर हुनक हिया दगधल मोर सजनी गे, जसु नलिनी दल नीर। गुन अवगुन सब बुझलहुँ सजनी गे, बुझलुँ पुरुशक रीत। मनहि विद्यापति गाओल सजनी गे, पुरुशक कपटी प्रीति। कोजगरा चुमाओनश् भैया के करियनु चुमाओन कोजगरा मे। बाबू जी पुछि पुछि परसथि मखान भोजघरा मे। आंगन चानन नीपल गेल अछि। गजमोती चैक पुराय देल अछि। भैया के कहिऔन चुमाओन कोजगरा मे। मानिक दीप जराओल दय दय। काँच बाँस के डाला लय लय।   पचीसी गीतश् खेलू खेलू यौ भैया बाजी लागइ के। सीता जीतथि रामजी हारथि बाजी लगाइ के। सखि सब देथिपिहकारी बाजी लगाई के। सीता हारथि रामजी जितथि बाजी लगाइ के। सखी सब गेल लजाय बाजी लगाइ के। धन्य धन्य सखी हम मिथिलावासी। रामजी भेला जमाय बाजी लगाइ के। जुआ खैलै लेल एल जनकपुर वाजी लगाइ के। हारला भाय बहिन पितिआइन हे वाजी लगाइ के। दुरागमनश्कनियाँ परिछनिश् सीता एली अंगना परिछन चलु सखि सब। कथी के महफा कथी के लागल ओहार हे। सोनाक महफा रेषमक लागल ओहार हे। सीता एली अंगना परिछन चलु सखी सब। कथी के साड़ी कथीक लागल किनारी हे। रेषमक साड़ी गोटा लागल किनारी हे। सीता एली अंगना परिछय चलू सखि सब। कतय गेली सासु ओ ननदि जी हे। सीता के अरिछिश्परिछि घर लय चलू हे। सीता एली अंगना परिछय चलू सखि सब। चमाओन गीतश् चुमाबहु हे राम सिया के चुमाबहु हे। आंगन चानन निपल कौषिल्या, गजमोती चैक पुराइ हे। अलष कलष लय पुरहर साजल, मानिक दीप जराय हे। काँचहि बाँस के डाला बनल अछि, दही ओ धान सजाई हे। दूभि अक्षत लय मुनि सब अयला, षुभ षुभ षब्द सुनाई हे। चुमबय बैसली मातु कौषिल्या, सखि सब मंगल गावे हे। देहरि छेकक गीतश् राम सिया मिलि अयला अवधपुर, बहिन छेकलनि दुआरि हे। हमरा दान देव जहन अहाँ भैया, तहन छोड़व हम दुआरि हे। सासु ससुर हमरा किछु नहि देलनि, कि देव अहाँ के देहरि छेकाइ हे। हाथक औंठी भैया खोलि देलखिन, बहिन लेलनि देहरि छेकाइ हे। खोंइछ झारक गीतश् सगर जनम हम आस लगाओल, भैया करताह विवाह गे माई।   भौजीक खोंइछ मे सोना चानी आओत, ताहि लय गहना गढ़ायब गेमाई। तेहना ठाम ने भैया बियहला, भौजीक खोंइछ दुभि धान गे माई। सगर जनम हम आस लगाओल, भैया करताह विवाह गे माई। मोरि बैसक गीतश् मोरि बैसल अहाँ अपन सासु, मुंह जनु अहाँ बाजब हे। पुतहुँ होयत गलजोर, मुंह जनु अहाँ बाजब हे। मोरि बैसल अपन पितिया सासु, मुंह जनु बाजब हे। पुतोहू होयती गलजोर, मुँह जनु अहाँ बाजब हे। कनियाँ मुँह देखैक गीतश् सुनु हे सखि सिया मंुह देखु षुभ काल। पहिने जे देखथि अपन सासु कौषिल्या। तखन जे देखथिन गोतिन बड़ेतिन। तखन जे देखथिन ननदि बड़ैतिन। तखन जे देखथि पर परोसिन सब। आषीश देथि सब मिलि षुभ काल। सुनु हे सखिकृकृ कोवर परातीश् आब न बिलासक बेर हे माधव आब न बिलासक बेर। मुखहुक पान निरस सन लागय, दीपक जोति मलीन। ग्वाला आबि गो दुहन लागे, गैया हमर बन गेल। चेरिया आबि झारु दियै, सुरुज उदय भय गेल। सूरदास प्रभु तुम्हारे दरस को चन्द्रक जोति मलीन। आब नकृकृ कोबरक गीतश् कोबर लिखय गेलि रानी कौषिल्या, चारु कात लिखल मयूर। ताहि कोबर सुतला फल्लाँ दुलहा, संग लागि सीता सुकुमारि। मुह उधारि सुन्दरि के पुछलनि कोन कोन अभरन हे। हाथ कंगना अपन बाबा देलनि, सिकरी लखन देओर हे। सिरक सिन्दुर प्रभु अहीं जे देलहु यैह तीन अभरन भेटल हे। कोबर नीपक गीतश् देखू देखू हे सखि सीता आइ रुसि रहली। आधा निपलनि कोबर आधा छोड़ि बैसली।   सीताक बापके बजाउ ओ भाय के बजाउ। की की सीता के सिखाय कइलनि विदा। सुनि सासु कौषिल्या मोहर लेलनि हाथ। कंगना गढ़ायब टीका गढ़ायब सिया किय रुसली। कन्या पक्षश् तुलासी गौड़ीक गीतश् फूल लोढ़य गेलि गौरी माली फुलबाड़ी बसहा चढ़ल षिव आइ गे माइ। लोढ़ल फूल षिव देलनि छिरिआइ। कनैत खीजैत गौरी अम्मा लग ठाढ़ि। के तोरा मारलक के पढ़ल तोरा गारि। हम नहि कहब अम्मा कहितहुँ लाज। पूछू गय सखि सभके कहत बुझाय। महेषवाणी हम नहि आजु रहब एहि आंगन, जौं वूढ़ होयत जमाय गे माई। एक त बैरिन भेल विधि विधाता, दोसर धिया के बाप गे माई। तेसर बैटी भेला नारद ब्राह्मण, हेरि लयला बूढ़ जमाय गे माई। धोती लोटा पोथी पतरा, सेहो सब लेबनि छिनाय गे माई। जौं किछु बजता नारद ब्राह्मण, दाढ़ी धऽ देबनि धिसिआइ गेमाइ। अरिपन लेपलनि पुरहर फोरलनि, फेकलनि चैमुख दीप गे माई। धिया लऽ मनाइनि मन्दिर पैसलीह, केओ जुनि गाबथि गीत गे माई। भनहि विद्यापति सुनु ए मनाइनि, इहो थिक त्रिभुवन नाथ गे माई। षुश्षुभ कऽ षिव गौरी विवाहू, इहो वर लिखल ललाट गे माई। समदाउनश् बारह बरस केर छल उमिरिया तेरहम बरस ससुरारि। कौने निरमोहिया दिनमा पठाओल कोन निरमोही मानि लेल। कौने निरमोहिया डोलिया पठौलक कौने निरमोही नेने जाय। ससुर निरमोहिया दिनमा पठौलक बाबा निरमोही मानि लेल। भैया निरमोहिया डोली पठौलकइ स्वामी निरमोही नेने जाय। कथी देखि धैरज धरबह हे सखिया कथि देखि रहब लोभाय। घरभरीक गीतश् माय मनाइनि पान लगाबथि सब मिलि कयल ओरियान। आइ थिकनि घरभरी सखि हे धिया जमैया मोर जाय। धान पान देल हाथहिँ सखि हेे दुनु मिलि देल छिड़िआय। भनहि विद्यापति गाओल सखि हे सब बेटी सासुर जाय।   अवसर विषेश वा समसामयिकश् पावसश् नव घन गरजत माला। एक सघन तिपिराछन रजनी कूजित दुतिय मराला। तेहर सेज सुनि लखि पहु बिनु उठल अन्तर ज्वाला। रहिश्रहि चहुदिषि चपला चमकत विहरिनि जन जिमि भाला। खेपब राति कौन विधि सखि हे चिन्ता हष्दय विषाला हे जलधर अहाँ जाउ ततय झट जहाँ बसथि नन्दलाल। करबनि विनय चरण धय लबि कऽ आबथु षीघ्र कृपाला जौं झट दऽ मोहन नहि औता करता निमिप अभेला। तौं ब्रज मे एको नहि जीउति विरहिनि सब व्रजवाला। कजरीश् सखी हे पिया नहि घर अयला, मेघवा वरिसन लागे ना। जौं हम जनितौं पिया नहि औंता रखितहुँ हष्दय लगाय। हमरा सँ की त्रुटि भेल सखि हे आइधरि नहि आय। जौं जनितौ पिया ऐहन करता दितियनि नहि हम जाय। सखी हे पिया नहि घर अयला। (2) सखिया सावन ने डर लागै जियरा धड़श्धड़ धड़कै ना। ष्याम घटा चहुँ ओर देखायत बिजुरी चमकै ना। पिया मोर परदेष गेला सुन सेजबा न भावै ना। झींगुर दादुर मोर पपिहरा कोइली कुहकै ना। सखिया सावन मे डर लागै ना। उदासीश् तिरहुत मधुपुर गेल मनमोहन रे मोर बिहरत छाती। गोपी सकंल बिसललनि रे जते छल अहिबाती। सुतलि छलहुँ अपन गष्ह रे निन्न गेलौ सपनाइ कर स छूटल परसमनि रे के लेल अपनाई कत सुमिरब कत झाँखब रे हम मरब गरानी। आनक धन लय धनबन्ती रे, कुबजा भेलि रानीश्तिरहुत। (2) जखन चलल हरि मधुपुर रे सब सुरति निहारि। आब कोना रहब हरि बिनु रे झाँखथि ब्रजनारी। वन मे डोलय पिपर पात रे बहय सेमरि। हम धनि डोलिय पिया बिनु रे बिनु पुरुशक नारी।   हरि बिनु भूशण भार भेल रे पलंगा ने सोहाई। (3) एते दिन भ्रमर हमर छल सखि हे, आब गेल सारंग देष। मधुपीबि भ्रमर लोभित भेल सखि हे। मोहि किछु कहियो ने गेल। ककराश्ककरा कहब, अपन दुख सखि हे, नयन निन दुरि गेल। जे बिरहे हम व्याकुल सखि हे भ्रमर हमर रुसि गेल। आंगन मोर लिये बिजुवन सखि हे, घर भेल दिवस अन्हार। पुरुशक वचन ऐहन थिक सखि हे, सपतक नहि विसवास। अवसर विषेशक गीतश् मलारश् (1) अलि रे प्रीतम बड़ निरमोहिया। आतुर वचन हमर नहि मानय, परम विशम भेल रतिया। काँपत देह घाम घमि आबत, ससरि खसत नव सरिया। आवत वचन थीर नहि आनन, बहत नीर दुहू अँखिया। रमानन्द भामिनि रहु थीर भय सुख बिच कहु दुख बतिया। (2) हे उधो लिखब कोन विधि पाती। अंचल पत्र नयन जल कज्जल नख लिखि नहि थीर छाती। चन्द्र किरण बध करत एतए पिय ओतए रहू दिनश्राती। रेषम वसन कनक तन भूशण तेसर पवन जीव घाती। कहथि रमानन्द सुनू विरहिनि आओत ष्याम विरहाती। (3) अलि रे हम रघुवर संग जायब भूखल पायब भोजन करायब निर्मल जल पियेबै। थाकल पायब चरण दबायब षीतल बेनिया डोलेबै। औंघैल पायब वन पत्र लायब तहि पर आँचर ओछेबै तुलसीदास प्रभु तुम्हरे दरस को रघुवर चरण लेपटेबै।   योगश् (1) भात खेआय मन मारलन्हि हे अपन सासु हे। जाय ने देथि अपन देष हे अपन सासु हे। अम्मा होयती बाट देखैत करवन बाबू औताह हे। पान खेआय मति मारलन्हि हे सरहोजिनि अपन हे। जाय न देथि निज देष बुझाय रखतीह हे। कर जोरि विनती करै छी सुनू रघनन्दन। बान्हत अहाँ के प्रेम अहाँ अपने छी जगवन्दन। (2) प्रिय पाहुन मन सँ जिमि लिअ। अपने योग बनल अछि किछु नहि सेहो मनहि विचारि लिय। बुझब तखन हम जौं किछु माँगव और दिअ। भावक भुखल स्वभाव अहाँ के तेँ हम सब हरसाइत छी। भनहि विद्यापति इहो मंगल मिथिला विधि जानि लिअ। (3) हमर अपन करिये छथि पाहुन ताहि सँ मतलब अनका की। अपन बल पर अपन खुषी थिक ताहि मे कानून जहाने की। अपन बहिनि यदि फेकिये देता ताइ सँ मतलब अनका की। साठि हतार जनभूलखिन पुरखिन तकर करै छी निन्दा की। प्रसव कास मे दषा जे भेलनि ताहि सँ मतलब अनका की। गटश्गट गारि सुनै छथि लालन मगर मरम्मति करताकी। स्नेहलता मुसकाथि लजाइत उचित बात मे बजता की। उचितिश्(1) ष्यामा वरन श्री राम हे सखि! देखैत मुख अभिराम। आइ हमर विध बाम हे सखि! मोहि तेजि पहु गेल आन। पढ़ल पंडित भान हे सखि! पहुक नहि करि अपमान। भनहि ‘विद्यापति’ भान हे! स्ुापुरुश गुणक निधान। (2) ष्याम गोकुल तेजि गेल रे, हमर कोन दोख भेल रे। हमरा सँ नित अपराध रे, तोहे प्रभु गुणक अगाध रे। कत गुणकरब बखान रे, जग भरि के नहि जान रे। भनहि ‘विद्यापति’ भान रे, सुपुरुश गुणक खान रे। (3) जओं करु सुजन सिनेह रे, उपला पाहुन नेह रे। हेमकर मण्डप हेम रे, चाानन वन कत नीम रे। हिंगु हरदि कत बीच रे, गुनहि चिन्हल ऊँच नीच रे।   अलि के कुसुम अनेक रे, मालति के अलि एक रे। काक कोइलि एक कांति रे, भेम्ह भ्रमर दुई भाँति रे। कह ‘बादरि’ अवधारि रे, सुपुरुश जन दुइ चारि रे। बारहमासाश् (1) चैत हे सखि मत्तकोकिल कुहुकि काम जगाव यो। कठिन ष्याम कठोेर मानस ऋृतु बसन्त विदेष यो। बैषाख हे सखि देखि उपवन ललित कुसुम विकास यो। देखि निज कुच कुसुम मौलल रहत चित्त न थीर यो। जेठ हे सखि तेल चन्दन पंक लेप षरीर यो। बिन नाथ चन्दन षीतलादिक धघकि जारत देह यो। आशाढ़ हे सखि झमकि झमकत नीर बिजुरी जोर यो। देखि काँपत देह थर नयन धारा नोर यो। आयल साओन मेघ बरिसत घुमुड़ि घोर समीर यो। सुमरि यौवन उमड़ि आबत प्राणमति नहि पास यो। भादब जलधर धड़कि ठनकत खसल चैकि अचेत यो। काहि कहु अब ष्याम बिनु सखि जात जीवन मोर यो। आस आसिन अन्त कय सखि बैसल कंत दुंरंग यो। षरद चन्द्रक चाँदनी देखि चित्त चंचल मोर यो। देखि कातिक नारि एकसरि तानि षर रतिनाथ यो। करत आंकुल जीव छनश्छन कठिन कन्त न बूझ यो। लबिजात धान समान अगहन कमल सन कुच मोर यो। झट नाथ-नाथ पुकार कय सखि पड़ल सेज अचेत यो। पूस ओस बेहोष भय सखि खसत प्रीतम पास यो। हम अकेलि सून पहु बिन काटब कोन विधि राति यो। माघहे सखि जाड़ लागत जुलुम करि गेल कंत यो। अंगश्अंग अनंग ज्वाला ताप तापित देह यो। रमानन्द रहु धीर कामिनि धीर धय मन मारि यो। आओत फागुन मिलत बालम खेलत हुनि संग फागु यो। (2) कहत मैना सुनू यो मुनि जन गौरी कोना रहत कुमारि यो।   जेठ नारद फिरति चहु दिषि जोहल भंगिया भिखारि यो। कहथि नारद सुनहु त्रिभुवनपति चलह व्याहन आज यो। अखाढ़ हेमन्त घर बरियात लायल देखल सकल समाज यो। काज राज सब छोड़ि सखिसब देखु हर बरियात यो। सावन वर बौराह आयल बसहा पीठ असवार यो। एहन उमत वर हेमन्त लायल पैर फाटल बेमाय यो। भादब मैना भेलि व्याकुल धुनथि माथ कपार यो। घटक के हम की बिगाड़ल की विधि लिखल लिलाट यो। आसिन मैना गेलि अंगना मन दुख अगम अपार यो। आब हम विश घोरि पीअब मरब जल बिच जाय यो। कातिक षंकर भस्म तेजल कयल गंगा स्नान यो। रगड़ि चानन अंग लेपल भेल सुन्दर रुप यो। अगहन मैना भेलि हरसित लावथि गाइनि बजाय यो। चलह सखि सब गीत गाबह त्रिभुवनाथ जमाय यो। पूस सखि सब छोड़ि बैसलि देखथि रुप अनूप यो। चलह सखि सब करह मौहक देखि नैन जुड़य यो। माघ षंकर भेल व्याकुल जोहथि आक धथुर यो। एहन उमत वर हेमन्त लायल भाँग हुनक अधार यो। फागुन षिव सँ कहथि गौरी सुनू षिव अरजी हमार यो। एक बेरि भस्म उतारु षंकर देखत हेमन्तक समाज यो। चैत मैना भेलि हरसित पूरल मनक अभिलाश यो। भनहि विद्यापति ई पद गाओल मिलल त्रिभुवन नाथ यो। (3) अगहन सीता के विवाह, पूस कोवर तैयार। माघ सीरक भराय देव रधुवर जी के। फागुन फगुआ खेलायब, चैत फूल लोढ़ि लायब, बैषाख बेनिया डोलायब रधुवर जी के। जेठ घाम परे भारी, आशाढ़ वुन्द झरे सारी, सावन झूलबा लगा दे, रधुवर जी के। भादव राति अन्हार, आसिन करब सिंगार कातिक आवि गेल मिथिला रधुवर जी के। (4) कातिक अयले कलकतिया जोहन बटिया। अगहन चुड़वा कुटायब पूस दही पौरायब। फागुन फगुआ खेलायब चैत फूल लोढ़ि लायब। बैषाख बेनिया डोलायब जोहन बटिया। जेठ हेठ भऽ गमायब अशाढ़ घर चल जायब।   सावन दुनु मिलि खेलब जोहन बटिया। भादब नहि घहराय आसिन आस लगायब। कातिक ऐलै कलकंतिया जोहन बटिया। छौमासाश्(1) साओन सर्व सोहाओन सखि हे फुलल बेलि चमेलि यो। रभसि सौरभ भ्रमर भ्रमि भ्रमि करय मधुरस केलि यो। आरे केलि करथु पहु मन दय सखि अधिक विरह मन उपजय। भादव घन घहराय दामिनि गरजि गरजि सुनाय यो। बरसु घन झहर बून्द रिमिझिमि मोहि किछु नहि भाय यो। आरे भामिनि भय घन दमसय सखि मुरुछि खसु महिमय। परिणाम कोन उपाय हे सखि करब कोन परकार यो। मास आसिन अधिक ज्वाला विरह दुख अपार यो। आरे कतेक सहब दुख पहु बिनु सखि ककरो नाह बिछड़ि जनु। नाह विछुड़ल मोर हे सखि होयत जीवक अन्त यो। अरुण कातिक धसिय धायब जतय लुबधल कंत यो। आरे कंत जोहय हम जायब सखि जतय उदेष हम पायब। अगहन हे सखि सारि लुबधल लबल जीवन मोर यो। योगिनि भय हम जगत जोहब जतय जुगल किषोर यो। आरे हमर प्रभु जौं अहोताह सखि कर गहि कंठ लगोताह। पूस धैरज धरय चाहिए भमर रहल विदेष यो। हुनि विदेषी सुखहि खेपत हमर तरुण वयस यो। आरे विदेसहि वैसि गमओताह सखि हमर गष्ह नहि अओताह। माध झिहिर पवन डोलय देह झाँझड़ मोर यो। हँसथि, बसन उधारि सखि सब कहथि मोहि विजोर यो। आरे षोक वियोग मनहि मन सखि चित्त नहि थिर रहे एको छन। (2) वैषाख मास तनि तलफत घाम चुबै अबिरल। वैसि बेनिया डोलायब कोठरिया मे। जेठ दहकत अकास, घाम सहलो न जात   अशाढ़ वुन्द अपार पावस बरसे हजार देखि हरशथ अपन कोठरिया मे। साओन बरखा बहार, झुला करब तैयार झुला झुलबै हम फुलवरिया मे। भादब भरु गदी नार, नैया करब तैयार अहाँ झिझरी खेलायब नदिया मे। आसिन षरद बहार चाँदनी के झलकार रास रचालेब कंचन महलिया मे। कातिक दुतिया मनायब सबके एतहि बजायब करब सब सुख साज कोठरियामे। अगहन पन्चचमी मनायब नवका चड़बा कुटायब प्यारे परसि खुआयब ससुररिया मे। चैमासाश् (1) माध मोहन नेह लगायल अपने चलल परदेष यो। ओहि रे परदेषिया रामा ओतहि गमाओल हम धनि बाड़ि बयस यो। फागुन हे सखि आम मजरल कोइली सबद घमसान यो। कोइली षब्द सुनि हिया मोर सालय नैना सँ झहरय नोर यो। चैत हे सखि चित्त चंचल यौवन भेल जीवकाल यो। आन धन रहितय बेचि हम खइतौं ई धन बेचलो न जाय यो। बैषाख हे सखि विशम ज्वाला घाम सँ भीजल षरीर यो। रगड़ि चन्दन अंग लेपितहुँ जौं गष्ह रहितथि कन्त यो। (2) कैसे खेपव बिनु कामिनि दामिनि दमसय रे। सखि री सुखक मास अशाढ़ आस नहि पूरल रे। दादुर करत पुकार झिंगुर झंझकारत रे। सखी री सावन चहुँ ओर घटा मयूर बन कुहकत रे। भादव मे मेघ झंहरत मोर मन झहरत रे। सखी री हरि बिनु मंदिर षून गुण कत सुमिरब रे। ‘सूरदास’ प्रभु गावल सखी समुझाओल रे। सखी री धैरज धरु चहु मास आसिन हरि आओत रे। वसन्त (1) सरस वसन्त समय भेल सजनी गे दखिन पबन बहु धीरे। सपनहुँ रुप वचन एक भाखिय मुखा सँ दूर करु चीरे।   कय वेरि काटि बनाओल नव के तदपि तुलित नहि होथि। लोचन तूल कमल नहि भय सक से नहि के जग जाने। तै पुनि जाय नुकायल ज लमे पंकल एहि अपमाने। मदन बदन परतर नहि पावथि जब भरि तोहरहि जोहि। भनहि विद्यापति सुनु वर यौवति उपमा सुझय न मोहि। (2) समय वसन्त पिया परदेष असह सहब कत विरह कलेष सुमरि पहु मन नहि थीर मदन दहन तन दगध षरीर षीतल पंकज चम्पाक माल हष्दय दहन करु विशधर ज्वाला श्रवण दहन करु कोकिल गान चान दहन तन अनल समान (3) रंगीली रंगश्महल मे खेलतु आज वसन्त। संगश्सखी श्रष्ंगारश्सजी सब सरस तरंग वसन्त। रंगीलीकृ सुश्कर कनक पिचकारीश्धारी, सोहत श्री सिय कन्त। भीजतश्भूशणश्वसनश्रमणश्तन, अनुपमश्छवि दर्षन्त। रंगीलीकृ तिरहुतश् (1) मधुपुर गेल मनमोहन रे मोर बिहरत छाती। गोपी सकल बिसरलनि रे जते छल अहिबाती। सुतल छलहुँ अपन गष्ह रे निन्द गेलौं सपनाइ। कर स छूटल परसमनि रे के लेल अपनाइ। कत सुमिरब कत झाँखब रे हम मरम गरानी आनक धन लय धनवन्ती रे कुबल भेलिरानी। (2) जखन चलल हरि मधुपुर रे सब सुरति निहारि। आब कोना रहब हरि बिनु रे झाँखथि ब्रजनारि। वन मे डोलय पिपर पात रे जल बहय सेमारि। हम धनि डोलिय पिया बिनु रे बिनु पुरुशक नारि। केहन कर्म विधि लिखलनि रे झाँखथि वष्जनारी ळरि बिनु भूशण भार भेल रे पलंगा ने सोहाई। (3)   राति जखन भिनसरवा रे पहु आयल हमार। कर कोषल कर कपइत रे मुखचन्द्र निहारे। केहन अभागलि बैरिन रे भागल मोर निन्द। विद्यापति कवि गाओल रे धनि मन धरु धीर। समय पावि तरुबर फरु रे कतबो सिंचु नीर। बटगवनीश् (1) तरुणी वयस मोर बीतल सजनी गे पिया पिया बिसरल मोर नाम। कुसुम फुलीय फूल मौलल सजनी गे भ्रमरो ने लेल विश्राम। सिर सिन्दुर नहि भावय सजनी गे मुखहि खसय एहि ठाम। उठ दूत परम व्याकुल सजनी गे नयन ढ़रकि खसु वारि। अधरस ओतय गमाओल सजनी गे दय गेल सौतिनक बारि। युगल नयन मन व्याकुल सजनी गे थिर नहि रहय गेयान। विद्यापति कवि गाओल सजनी गे ई थिक दुखक निदान। (2) चानन बुझि हम रोपल सजनी गे भय गेल सिमरक गाछ सजनी गे। ताहि रे गमक पिया जागल सजनी गे। चलि भेल पिया परदेष सजनी गे। बारह बरस पर आयल सजनी गे, लायल कंगही सनेस सजनी गे। ताहि कंगही लय आयल सजनी गे, कय लेल सोलह श्रष्ंगार सजनी गे। खोंइछ भरि लोढ़लहुँ चंगेरी भरि सजनी गे, सब फूल सेजिया लगैब सजनी गे। फगुआश् (1) मिथिला मे राम खेलथि होरी। श् मिथिला मेकृ अतर गुलाब कुम कुम केषरि, रंग अबीर भरल झोरी। सखि सब सजि धजि रधुवर के देल अबीर भरल झोरी। होइछ बाद्य विधान विविधश्विधि नाचश्गान ओ झिकझोरी। मारथि मर्स पूर्ण पिचकारी राम सकुचि जाइछ गोरी। सुरश्गण सुमन गगन सौ उझलथि, अबीर गुलाल बीच घोरी। कूदथि बालक वष्न्द मुदित मन, मिलाश्मिला निज-निज जोरी। धै फगुआ के रुप मिथिलापुर, घरश्घर मचि रहल होरी।   (2) गलिअन बिच धूम मचायो री, गलियनकृ ग्वालवाल संग लिये कन्हैया नित भोरे उठि आयो री। हाथ अबीर गुलाल पिचकारी सिर डारो री। वन्षी वीणा झाल बजाओ देत गारी गायो री। -गलियनकृकृकृ (3) गोरी संग कष्श्ण खेलय होरी ग्वाल वाल संग कष्श्ण कन्हैया सुन्दर रंग भरी झोरी। बाजत आबत झाल मष्दंग सब सब जन आबत रस बोरी। गिरिधर दास गाओल बाल संग युग युग जीबओ यह जोरी। गोरी संगकृ (4) परदेसिया लै अंगना निपावे गोरिया। परदेसियाकृ जब परदेसिया नगर बीच आयल खुटे खुट अंगना निपावे गोरिया। परदेसियाकृ जब परदेसिया आंगन बीच आयल रचि रचि केसिया बन्हावे गोरिया। परदेसियाकृ जब परदेसिया घर बीच आयल झाड़ि झाड़ि पलंग ओछावे गोरिया। परदेसियाकृ (5) परदेसिया के नारि सदा रे दुखिया। चारिम मास फागुन अब बीतल कहियो ने आयल पहुँ पतिया। श् परदेसियाकृ.पाचम मास चैत जब बीतल अपनो ने सूनल हुनि बतिया। श् परदेसियाकृ (6) होरी खेलत श्री रघुवर रसिया। धूम मचावत, डंफ बजाबत घाटश्बाट सब रोक लिया। श्री रघुवंषी छैल छबीले, श्री मिथिलेष दुलारी सिया। ललकारत दोऊ ओर परस्पर जीत लिया होरी जीत लिया अबीर उड़ावत रंग वरसावत जनक नगर के गलि गलिया। ‘प्रेमनिधि’ अबला प्रबला भऽ, उमड़ि चली हे रंगरलिया। (7) होरी मे लाज न करु गोरी। प्रेम ब्रजवासी तु गोरी भली बीनहै यह जोड़ी।   जौ इससे सीधे नहि खेलहुँ मार मार कर वरजोरी। सुरदास निकले सब बन मे लिये जाय वन मे जोड़ी। चैताबरश् (1) कष्श्ण तेजल मधुवनमा हो रामा कौन करनमा कष्श्ण तेजल मधुवनमा। यमुना तट पर वंषी वट पर सेहो नहि लागत सोहनमा कौतुक हास रास वष्न्दावन सेहो सब भेल सपनमा हो रामा कष्श्ण तेजल मधुवनमा। जौं हम जनितौं कष्श्ण नहि औता रहितौ अपन भवनमा। सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस को हरि मुख भेल सपनमा। हो रामा कष्श्ण तेजल मधुवनमा। (2) चैत रे महिनमा पिया बिनु आबै नहि निंदिया, हो रामाकृ पिया परदेष गेल सुधि बुधि हरि लेल भुलि गेल घर के सुरतियाश् हो रामा पिया बिनुकृकृ जब सुधि आबै पिया तोहरो सुरतिया कुहुकि उठय मोर छतियाश् हो रामा पियाकृ केहन कठोर भेल पिया के करेजवा एको नहि लिख भेजय पतियाश्हो रामा घर जब अइहे। पिया कोरा लै बैसिहें नखरा लगैंहें आधी रतियाश् हो रामाकृ कहत महानन्द सुनु हे सहेलिया ऐसे मे बितैं हें सारी रतियाश् हे रामाकृकृ (3) डिम डिम डमरु बजाबै हो रामा, षिव रंगरसिया। अपने सदाषिव पूजा पर बैसता गौरी सँ टहल कराबै हो रामाकृ अपने सदाषि भाँग उपजावै गौरी सँ भाँग पिसाबै, हो रामाकृकृ अपने सदाषिव बसहा चराबै गौरी सँ डोरी धरावै, हो रामाकृकृ अपने सदाषिव माँगिश्माँगि आनथि, गौरी स धान कुटावै, हो रामाकृकृ (4)   तेरी मीठी बोलिया। सगर रैनि हम कतेक मनाओल ओ नहि मानल मोर बतिया। केओ नहि हितश्बंधु ककरा जगायब के पिया देत मनैया। आमक गाछ पर तोही जे कुहुकब हम कुहुकब दिन रतियाश् हो रामाकृ सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस को कओन हरल हुनि मतिया। हो रामा तेरी मीठी बोलिया (5) कौन कयल योग टोनमा, हो रामा सब गेल वनमा राम लखन सिय वनहि सिधारल, दषरथ तेजल परनमा, हो रामाकृ मातु कौषिल्या रोदना पसारल सुन भेल नगर भवनमा, हो रामाकृ तुलसदास प्रभु तुम्हरे दरस को, धन इहो कोप भवनमा, हो रामाकृ झूलाश् (1) यमुना तीरे कदमक डारी झूला रेषम के डोर गे। षोभा देखि भेल चितबौरी ज्ञान हरन भेल मोर गे। एक दिष राधा एक दिष कन्हा दोउ कर झिकझोर गे। राधा वदनमा पर षोभे माला निरखत नंद किषोर गे। नभ धेरि अयलै कारी बदरिया भेलै गगन मे षोर गे। विरहिन के चित्त चंचल भेलइक नयना झहरे नोर गे। राधाकष्श्ण युगल अति सुन्दर एक ष्यामल एक गोर गे। (2) आयल सावनक मास, मन मे बढ़ल हुलास मनमा लागि गेलै वष्न्दावन नगरिया मे। झुला परम अनमोल, लागत रेषमक डोर झूलत नन्द किषोर इजोरिया मे। सखियन संग राधा रानी से छवि कोना के बखानी सुन्दर बाजन बाजै हुनका पैजनिया मे। झूलवै मिलिकय सखी सहेली, सुमुखी राधा अलबेली झूलत राधे ष्याम यमुना किनरिया मे। एक सखि लेने कर मे माला, कहाँ गेल नन्दलाला सूरदास पुछथिन्ह छोड़ि डगरिया मे। (3) झूला लगे कदम की डाली, झूले कष्श्ण मुरारी ना।   कौने काठ के बनल हिड़ोला कोन वस्तु के डोरी। झूलाकृ राध झूलय कष्श्ण झुलावय बारीश्बारी ना। झूलाकृ छठि (1) अंगना मे पोखरी खुनायल छठि मइया औती आइ। दुअरा पर तमुआ तनायल छठि मइया औती आइ। अँचरा सँ गलिया बहारब तैपर पियरी ओढ़ायब छठि मइया औती आइ। (2) डोमिन बेटी सुप नेने ठाढ़ छै उगै हो सुरुज देव। अरघ केर बेर हो पूजन केर बेर मालिन बेटी फूल नेने ठाढ़ छै उगै हो सुरुज देव। अरघ केर बेर हो पूजन केर बेर केओ ने छै लेसबैया परमेसरी मैया सोना के दियरा मइया, पाटश्सुती बाती हे अबला नारी लेसबैया परमेसरी मइया निर्धन कोढ़ी बाटे-घाटे ठाढ़ छै उगै हो सुरुज देव। अरघ केर बेर हो पूजन केर बेर पान सुपारी पकवान नेने ठाढ़ छै उगै हो सुरुज देव। (3) हमरो पर होइयौ सहाय, हे छठि मइया हमरो पर होइयौ सहाय। चारि पहर राति जलश्थल सेबलौं सेबलौ छठि गोरथारि, हे छठि मइया। हमरो पर होइयौ सहाय।   अपना ले मंगलौ अनश्धन लछमी जुगश्जुग मांगल अहिबात, हे छठि मइया हमरो पर होइयो सहाय। घोड़ा चढ़ै लेल बेटा एक मंगलौ हमरो पर होइयो सहाय। वयन बिलहै लेल बेटी एक माँगल माँगल पण्डित जमाय, हे छठि मइया हमरो पर होइयो सहाय। (4) केरवा जे फरल छै घौद सँ, ओइ पर सुग्गा मड़राय। मारबौ रे सुगवा धनुश सँ, सुगा खसल मुरुझाय। सुगनी जे कानय वियोग सँ, आदित होउ ने सहाय। काँचहि बाँस केर बहिंगा, ओइ मे रेषमक डोर भरिया जे फल्लाँ भरिया, भार नेने जाय छै बाटहि पूछै बटोहिया स, ई भार किनकर जाई। आन्हर होइबे रे बटोहिया ई भार छठि माई के जाइ। ई भार दीनानाथ के जाय। समदाउनश् (1) बड़ रे जतन सँ सिया जी के पोसल सेहो रघुवंषी नेने जाय। कौने रंग दोलिया कौने रंग ओहरिया लागि गेल बतीसो कहार। लऽ कऽ निकसल बिजुवन सखिया ओहि बन केओ ने हमार। केयो जे कानय राजमहल मे केओ कानय दरबार। केओ जे कानय मिथिला नगर मे जोड़ि सँ बिजोड़ि केने जाय। आजु धीया कोना अमा बिनु रहती छनश्छन उठति चेहाय। (2) भेल विवाह चलल षिवषंकर गौरी सहित कैलाष। बसहा पीठ षिव दोलिया पठाओल बाघ छाल पड़ल ओहार। बड़ रे जतन सँ गौरी के पोसल   घष्त मधु दूध पीआय। सोनाक मुरुति सन गौरी हमर छथि वर भेल तपसि भिखारि। हमर गौरी कोना तपोवन जैतीह झाँखथि राजदुलारि। (3) सुग्गा जौं पोसितहुँ भजन सुनविते धीया पोसि किछु नहि भेल। घीवक घैल जकाँ पोसलौं हे धीया बेटा जेँका कयल दुलार। सेहो धीया मोर सासुर जैतीह सुन भवन केने जाय। ओलतिक छाहरि जकाँ पोसलौं हे धीया मधुर जेँका राखल जोगाय। सेहो धीया मोर सासुर जैतीह सुन भवन केने जाय। (4) बारह बरस केर छल उमेरिया तेरहम बरस ससुरारि। कौने निरमोहिया दिनमा पठाओल कोन निरमोही मानि लेल। कोने निरमोहिया डोलिया पठौलक कौने निरमोही नेने जाय। ससुर निरमोहिया दिनमा पठौलक बाबा निरमोही मानि लेल। भैया निरमोहिया डोली पठौलकइ स्वामी निरमोही नेने जाय। कथी देखि धैरज धरबह हे सखिया कथी देखि रहब लोभाय। (5) जखन महादेव निज घर चललाह गौरी सहित कैलाष। बसहा चढ़ल षिव डोलिया पठौलनि बाघछाल कयल ओहार। घर सँ बाहर भेला हेमन्त ऋष्शि भय गेल बाप पीठी ठाढ़। घर सँ बाहार भेलि माय मनाइनि सुसुकि बहाबथि नोर। सब दिन खाथि गौरी माखन मिसरी सक्कर करथि अहार। से गौरी कोना धतुर भाँग खयती आन की हयत आधार। परातीश् (1) उठि भोरे कहू गंगाश्गंगा। उठि भोरे कहू गंगाश्गंगा। छल एक पापी महाबली जाय मगह मरि गेल। ओकरा तनके कौओ कुकुर ने खाय,   गिद्ध गीदर देखि डराय। उठिकृ गलि गेल माँस हाड़ भेल बाहर रोमश्रोम भेल विकलाई। कणिका एक उड़ि पद पंकज, सुर विमान लय धाई। उठिकृ पंछी एक उड़ल गंगा मे ऊपर पाँखि फहराई। देखू गंगाजी क महिमा जे ओ कोना तरि जाई। उठिकृ गेल बैकुण्ठ मुदित मन देखू, आरति सुर उतराई। भोलाजी गंगाक महिमा, कहइत अधिक लजाई। (2) कोन गति होयत मोर हो प्रभु कोन गति होयत मोर। जनम जनम हम पाप बटोरल कहिओ न भजलहुँ तोर। बेरि बेरि अँखिया कमल मुख हेरलहुँ सुधि नहि तोर एको बेर। अबहु सुमति गति दिय त्रिभुवन पति षरण रहब हम तोर। तुलसीदास प्रभु तुम्हरे दरस के दुख संकट हरु मोर। (3) रथ पर निरखत जात जटाईश् रथ पर निरखत जात। रथ के उपर बैठ वैदेही नाजत निठुराई। रथ परकृ है कोइ वीर राम के दलमे रथ के ले बिलमाई। कोन वंष के सूत रघुराई कौन हरने आई। श् रथ पर कृ सूर्यवंषक राजा नष्प दषरथ तनिके सुत रघुराई। तनिके प्रिया नाम जानकी निषचर हरने जाइ। श् रथ परकृ करुण वचन जब सूनेउ जटाई रथ चढ़ि कयल लड़ाई। अग्निवाण मारल सो धरती गिरल मुरदाई - रथपर मन सँ आषिश देल माता जानकी प्राण रहे घट छाई। एहि बाटे आओता रघुवर ताकय सव बात कहव बुझाई। रथ परकृ (4) जागहु राम कष्श्ण दोउ मूरति दषरथ नन्द दुलारे। उदय होय उदयाचल आवत जोति पलंग पसारि। जय जयकार करत सब आयो सुर नर मुनि तुअ दुआरे। जाकृकृ क्रीट मुकुट मकराकष्त कुण्डल मुरली धनुश सम्हारि। कब देखिहौं नयनन दोउ मुरति सन्तन केर रखबारे। - जाकृकृ पायो दरस परस पद पंकज पापी पुरुश निवारे।   रहे एक आस दास तुलसी के तीन लोक के न्यारे। सीता पति राधा वर जोरी लेइय सुधि न हमारे। - जागहुकृकृ (5) जुनि करु राम वियोग हे जननी। जुनिकृ सुतल छलहुँ सपन एक देखल, देखल अवधक लोक हे जननी। - जुनिकृकृ दुइ पुरुश पथ अबइत देखल, एक ष्यामल एक गोर हे जननी। - जुनिकृकृ कंचन गढ़ हम जरइत देखल, लंका मे उठल किलोल हे जननी। - जुनिकृकृ स्ेातु वान्ह हम बन्हाइत देखल, समुद्र मे उठल हिलोर हे जननी। - जुनिकृकृ नचारीश् (1) रहबौ हम तोहरे नगरिया हो भंगिया, रहबौ हम तोहरे नगरिया। झारी मझारी मे कुटिया बनायब, सब दिन बहारब डगरिया हौ भ्ंगिया। भांगो धथुर पीसि तोहरा पियायब, भोर साँझ दुपहरिया, हो भंगियाकृकृ। भांगक बाड़ी मे बसहा चराएव, जीवन भरि करबौ चकरिया, हो भंगियाकृ धथुर के फूल बेलपतिया चढ़एव, चानन चढ़ायब केषरिया, हो भंगियाकृकृ कतबो हटेला सँ हम नहि हटबह, कहियो ने छोड़वह दुअरिया, हौ भंगिया.कृ। सब दिन नवीने नचारी सुनाकय अप्पन बितायब उमरिया, हौ भंगियाकृ नेको अनेको जनम मे बसविहह, अपन घरक पछुअरिया, हो भंगियाकृ ‘मधकर’ सतत बाट हम तोरे ताकब कहियो त फेरबऽ नजरिया, हौ भंगियाकृ। (2) आइ मयना के अंगना सोहाग बहिना।   जेना जूटल छै षोभा के खान बहिना। गौरी ओ षंकर युगल रुप मोहन। कए के सकै अछि बखान बहिना। घरश्घर नगर ओ डगर पर विराजय। तानल वसन्त वितान जहिना। छवि के छटा पर कपिक घन घटा अछि। तै पर स्वर लय के जुटान बहिना। मोदो प्रमोदो प्रमोदो पाबि उमड़ल। उदधि देखि पूनम के चान जहिना। षिवराति षिवमय करय विष्व भरि कैं। ‘मधुकर’ सब फागुन के मास एहिना। (3) गौरी तोर अंगना बड़ अजगुत देखल तोर अंगना। एक दिस बाघ सिंह करै हुलना दोसर बड़द छैन सेहो बउना। पैंच उधार लय गेलहुँ अंगना सम्पत्ति के मध्य देखल भाँग घोटना। खेती ने पथारी सिव के गुजर कोना मंगनी के आस छनि वरिसो दिना। कातिक गणपति दुइ जन बालक एक चढ़ै मोर एक मूस लदना। भनहि विद्यापति सुनु उदना दारिद्र हरण करु घैल षरणा। गौराकृ (4) नारद बहुत बुझा हम कहलहुँ गौरी लय एहन वर अनलहुँ यो। हमरो गौरी छथि बारह बरख केर बुढ़वा वर लय अयलहुँ यो। नारद बड़ अजगुत अहाँ कयलहुँ। गौरी लय एहन बर लयलहुँ यो। तीनि भुवन बर कतहुँ न भेटल तँ घर घूरि फिरि अबितहुँ यो।   बेटि गौरी छथि अल्प वयस केर कनिको नहि बिचारलहुँ यो। भनहि विद्यापति सुनिय मनाइनि त्रिभुवन पति लय अयलहुँ यो। (5) जोगि एक ठाढ़ अंगनमा मे। भिखियो ने लिअय बाटो नहि छोड़य गौरी कोना जयती अंगनमा मे। देह अछि सह सह विशधर षतश्षत भूतश्प्रेत छनि संगवा मे। बरहा चढल षिव डमरु बजाबथि जटा बीच गंग तरंगना मे जोगि एक ठाढ़ अंगनमा मे। सामाक गीतश् (1) डाला लय बहार भेली बहिनो से फल्लाँ बहिनो फल्लाँ भैया लेल डाला छीनि, सुनु राम सजनीकृकृ समुआ बैसल तोहें बाबा बड़ैता तोर बेटा लेल डाला छीनिश् सुनु राम सजनीकृ कथी केर आहे बेटी डालवा तोहर छौ कथी बान्हल चारु कोनश् सुनु राम सजनीकृ काँचहि जे बाँस केर डलवा यौ बाबा बेलीश्चमेली चारु कोनश् सुनु राम सजनी कृ जौं तोरा आहे बहिनो डलवा जे दय देब हमरा के की देब दानश् सुनु राम सजनीकृकृ चढबाक घोड़ा देव पढ़वाक पोथी देब छोटकी ननदिया देब दानश् सुनुकृ (2) चानन बिरिछ तर भेलि बहिनो से फल्लाँ बहिनोश् ताकथि बहिनो भाइ केर बटिया   एहि बाटे औता भैया, से फल्लाँ भैया कृ दखि लेबनि भरि अँखिया पैर पकड़ि जनु कानू हे बहिनो, से फल्लाँ वहिनो फाटत मोर छतिया। (3) हमर भैया कोना आबै हाथी चढ़ल भैया हँसैत आवै पान खय मुह रंगैत आबै रुमाल लय मुह पोछेत आबै। दरपन लय मुह देखैत आबै चुगिला कोना के आवै गदहा चढ़ल हिहिआइत आबै कोइला सँ मुह रंगैत आबै गुदरी सँ मुह पोछैत आबै। (4) गे माइ कौने भइया जयता अटनाश् पटना कोने भैया जयता मुंगेर। कोने भइया जेता दिल्ली कलकत्ता कौने भइया जयता रंगून। कौने भइया लौता आलरिश्झालरि कौने भइया लौता पटोर कौने भइया लौता झिलमिल केचुआ। कौन भइया लौत कामी सिन्नुर कौने बहिना पहिरथि आलरिश् झालरि कौने बहिनी पहिरु पटोर। कौने बहिना पहिरथि झिलमिल केचुआ कौने भौजी कामि सिन्नुर। युगेश्युगे लीबथु इहो सब भैया, भौजी के बाहु अहिवात। (5) नदिया के तीरे तीरे फल्लँा भैया खेलथि सिकार। कहि पढ़ोलनि भाइ फल्लाँ बहिनो के समाद भैया आओताह पाहुन हे। कोठी नहि मोरा आरब चाउर बसनो नहि बीड़ा   पान हे। कौन विधि राखब माइ हे, फल्लाँ भाइक मान हे। हाट बजार सँ चाउर मंगायब, तमोली सँ बीड़ा पान हे। पटना षहर से धोतिया मंगायब, राखब भैया के मान हे। (6) गाम के पछिम ठुठि पाकड़ि रे ना ना रे ताहि पर बाबा बसेरा लेल ना। खेलितेश्धुपैते गेली फल्लाँ बहिनी ना। एक कोस गेली बहिनी दू कोस ना। तेसर कोस बहिनी हेराय गेलौ ना। तकैत तकैत गेलथिन फल्लाँ भौया ना। एक वन तकलनि भैया दुइ वन ना। कतहुँ ना भेटय बहिनिया मोर ना। देहरि बैसल भैली खुष भेली ना। ना रे भेल ननदी हेराय गेली ना। (7) गाम के अधिकारी भैया हे भैया हाथ दस पोखरी खुना दिय। चम्पा फूल लगा दिय हे। फुलवा लोढ़ैत बहिनी आयल हे। घमि गेल सिर के सिन्नुर नयन भरु काजर हे। छता लेने आवथि भैया से फल्लाँ भैया हे। बैसह बहिनी एहि छाह आषीश देहु हे। युगेश्युगे जीवथु फल्लाँ भैया तोरो अहिबात बढ़ू हे। राग संबंधी राग संबंधीराग संबंधीराग संबंधीराग संबंधीराग संबंधी ललित राग मेश् मेघ समय पर जलदान करे। पष्थ्वी धनश्धान्य सँ भरल रहे। पिसुन पाबि जनु नष्पतिक काने। गुन बुझि भूप करथु सनमाने। चिरै जिबथु हिन्दुपति देओ। गुन कीरथि गाबहि सब केओ।   राजविजय राग मेश् जय जय परिजात तरुराज। पाओल पुरुब पुन दरसन आज। सरगक भूखन गुनक निवास। सुरहुक तोहें परिपूरह आस। सेवक सब तुअ दानव देबा। मानव जानव की तुअ सेवा। सुरमति निअ कर करथि किआरी। सची देथि सुरसरि जल ढ़ारी। सुमति उमापति भन परमाने। माहेसरि देइ हिन्दुपति जाने। आसावरी राग मेश् जायब हरिक समाजे। पाओब नयन सुख आजे। कि आरेश्ध्रुवमद। जोगहुँ न जानिअ जन्ही। दिठीभरि देखब तन्ही। ब्रह्म सिव सेव जाही। काहि भजब तेजि ताही। मनहि भगति लेब माँगी। समय परमपद लागी। हिन्दुमति जिउ जाने। महेसरि देइ बिरमाने। सुमति उमापति भाने। पुनमति भजु भगमाने। वसन्त राग मे अनगिनत किंषुक चारु चम्पक वकुल बकुहुल फुल्लियाँ। पुनु कतहुँ पाटलि पटलि नीकि नेवारि माधबि मल्लियाँ। कर जोरि रुकुमिनि कष्श्ण संग वसन्त रंग निहार हीं। रितु रभस सिसिर समापि रसमय रमथि संग बिहार हीं। अति मज्जु बन्जुल बन्जुलबन्जुलबन्जुलबन्जुल बन्जुल पुन्ज मिन्जल चारु चूअ बिराजहीं। निज मधुहिं मातलि पल्लबच्छवि लोहितच्छवि छाजहीं। पुनु केलि कलकल कतहु आकुल कोकिल कुल कूजहीं। जनु तीनि जग जिति मदननष्पमनि विजयराज   सुराजहीं। नव मधुर मधु रसु मुगुध मधुकर निकर निक रस भावहीं। जनि मानिनि जन मान भन्जन मदन गुरुगुन गावहीं। बराडीराग मेश् अब तरु अबनी तेजि अकास। न थिक दिवाकर न थिक हुतास। धोती धबल तिलक उपबीत। ब्रह्म तेज अति अधिक उदीत। बैनब दण्ड वेद कर सोभ। आवथि नारद दरसन लोभ। परम जुगुत तिनि जगतक हीत। ब्रह्मासुत मोर सम्भुक मीत सुमति उमापति भंन परमान। जगमाता देवि हिन्दुपति जान। पंचम राग मेश् सखि हे रभस रस चलु फुलवारी। तहँ मिलत मोहि मदनमुरारी। किनक मुकुट महँ मनि भल भासा। मेरु सिखर जनि दिनमनि बासा। सुन्दर नयन बदन सानन्दा। उगल जुगल कुबलय लय चन्दा। बनमाला उर उपर उदारा। अन्जनगिरि जनि सुरसरि धारा। पिअर बसन तन भूखन मनी। जनि नव घन उगल दामिनि। जीवन धन मन सरबस देबा। से लय करब हरि चरनक सेवा। सुमति उमापति मन परमाने। जगमाता देइ हिन्दुपति जाने। नटराग मेश् कि कहब माधब तनिक बिसेसे। अपनहु तनु धनि पाब कलेसे। अशनुक आनन आरसि हेरि।   चानक भरम कोप कतबेरी। भरमहु निअ कर उर मर आनी। परम तरस सरसीरुह जानी। चिकुर निकर निअ नयन निहारी। जलधर जाल जानि हिअ हारी। अपन बचन पिकरब अनुमाने। हरि हरि तेहु परितेजय पराने। माधव अबहु करिअ समधाने। सुपुरुश निठुर ने रहय निदाने। सुमति उमापति भन परमाने। माहेसरि देइ हिन्दुपति जाने। मालव राग मेश् हरि सउँ प्रेम आस कय लाओल। पाओल परिभब ठामे। जलधर छाहरि तर हम सुतलहुँ आतप भेल परिनामे। सखिहे मन जनु करिय मलाने अपन करम फल हम उपभोगव तोहें किअ तेजह पराने। श् ध्रुवम् पुरुब पिरिति रिति हुनि जउँ विसरल तइओ न हुनकर दोसे। कतन जतन धरि जउँ परिपालिअ साप न मानय पोसे। कवहु नेह पुनु नहि परगासिअ केवल फल अपमाने। बेरि सहस दस अमिअ भिजाबिअ कोमल न होअ परवाने। श् ध्रुवम् गुरु उमापति पहु देव दरसन मान होएव अबसाने। सकल नष्पतिपति हिन्दुपति जिउ महरानि विरमाने। ध्रुवम्। केदारराग मेश् मानिनि मानह जउँ मोर दोसे। साँति करह बरु न करह रोसे।   बेधह बिधुमुखि कय समधाने। पीन प्योधर गिरिबर साधी। बहु मास धनि धरु मोहि बाँधी। की परिनति भय परसनि होही। भूखन चरनकमल देह मोही। सुमति उमापति मन परमाने। जगमाता देइ हिन्दुपति जाने। भल्ला राग मेश् माधब करह हमर समधाने। देह मोहि पारिजात तरु आने। एहिखन तोरित करिअ परयाने। नहि तइँ हमर अबस अबसाने। एहि परि हमर पुरत अभिमाने। हयत हसी नहि होअ अपमाने। सुमति उमापति भन परमाने। पटमहिखी देह हिन्दुपति जाने। विभास राग मेश् सहस पूर्णससि रहओ गगन बसि निसिबासर देओ नन्दा। भरि बरिसओ विस बहओ दहओ दिस मलय समीरन मनदा। साजनि आब जिबन किअ काजे पहु मोहि हिन करु अपजस जग भरु सहय न पारिअ लाजे। ध्रुवम् कोकिल अलिकुल कलरब आकुल करओ दहओ दुहु काने। सिसिर सुरभि जत देह दहओ तत हनओ मदन पचबाने। सुकवि उमापति हरि होए परसन मान होएत समधाने। सकल नष्पति पति हिन्दुपति जिउ महेसरि देइ विरमाने। ध्रुवम् कृकृकृकृकृकृकृकृकृकृकृकृकृकृ अप्पन बात अप्पन बातअप्पन बातअप्पन बातअप्पन बातअप्पन बात एहि बेरक बात थिक। विविधश्भारती रेडियो स्टेषन सँ गीत सुनैत छलौ। एखन धरि मैथिली साहित्य सॅ कम्मेश्सम्म सिनेह छल। ओना परिवार सॅ समाज धरि मैथिलिऐक बीच आठो पहर समय बीतैत अछि। कातिक पूर्णिमाक दिन रहने, समाजक माएश्बहिन लोकनि सामा भसा आंगन दिषि सोहर गबैत घुमलीह। एकाएक हमरो कान मे, गीतक ध्वनि हवा मे छिछलैत अबै लगल। रेडियो बन्न कऽ सोहर सुनै लगलहुँ। गीतक स्वर हृदय केॅ झकझोड़ए लगल। जेहने माएश्बहीनि लोकनिक स्वरक मधुर टाँस तेहने एकरुपता। जहिना बहीनि, माएश्बाप समाजक सखीश्सहेली छोड़ि, सासुर जेबा काल, अपन क्रन्दन स वातावरण केॅ शोकाकुल बनबैत आ सखीश्सहेली सोहरक स्वर सॅ विदा करैत, तहिना भऽ गेल। हृदय विदीर्ण हुअए लगल। अनायास मन मे सवाल उठै लगलश् (क) श् की हमर कलाश्साहित्य, भूमण्डलीकरण स, आगू बढ़त? (ख) श् आ कि जतय अछि ततय, अजेगर साॅप जेॅका थुसकुरिया मारि, बैसल रहत? (ग) श् आ कि हमर कलाश्साहित्य मटियामेट भऽ जायत? एहि प्रष्नक बीच उलझल मोन मे, डिबियाक टिमटिमाइत इजोत जेकाॅ, आयल जे अपनो मातष्भाशा आ मातष्भूमिक सेवा लेल किछु कयल जाय! एहि जिज्ञासाक संग अपने लोकनिक बीच, एकटा छोटश्छीन पोथी ‘संस्कार गीत’ राखि रहल छी। आषा अछि जे अधला पर ध्यान नहि दऽ, आगूक सेवा लेल पे्ररित आ प्रोत्साहित जरूर करब। गीतक संकलन किछु पोथिओक अछि आ अधिकतर माएश्बहीनिक कंठक सेहो अछि। जहि गीतिकार लोकनिक गीत संकलित अछि, हुनक आभारी छी। आ जे गीत माएश्बहीनि लोकनिक कंठक अछि, ओ जहिना कहलनि तहिना लिखलो गेल अछि तेॅ शब्दक फेड़िश्फाड़ आ टूटल सेहो अछि। गीतक संकलन करै मे अग्रज सुरेष मंडल आ अनुज मिथिलेष मंडलक भरपूर सहयोग रहल। अपनेक उमेष मंडल   पोथिक मादे पोथिक मादेपोथिक मादेपोथिक मादेपोथिक मादेपोथिक मादे संस्कार कल्पना थिक। हमरा सभक बीच संस्कारक प्रयोग विभिन्न रूप मे विभिन्न जगह पर होइत अछि। ओना जहि रूप मे संस्कारक प्रयोग हमरा सभक बीच होइत, ओ मन्द आ कुषाग्र रूप मे सेहो होइत। मुदा विचारणीय प्रष्न अछि जे मन्द तँ किऐक? आ कुषाग्र तॅ किऐक? एखन हम एहि प्रष्नक उत्तर नहि द षास्त्रीय प्रयोग दिषि नजरि दैत छी। गर्भजनित वातावरण जन्य कतिपय अपदार्थ के दूर करैक हेतु संस्कारक कल्पना कयल गेल अछि। कहल गेल अछि जे एहि सॅ षरीर आ मन परिश्कृत होइत अछि। शालीनता आ षिष्टता मनुश्यताक परम सिद्वि थिक आ ओकर प्राप्तिक साधन थिक संस्कार कर्म। दषर्न शास्त्रक अनुसार भोग्य पदार्थक अनुभूतिक छाप थिक संस्कार कर्म। मनुश्यक अव्यक्त मन पर अुभवक जे छाप पड़ैत छैक, समय अयला पर ओ प्रकट भऽ जायत छैक। यैह छाप थिक वासना आ यैह कहबैत अछि जन्मान्तक संस्कार। धर्मषास्त्री लोकनि संस्कार केॅ षारीरिक, मानसिक आ बौद्धिक गुणश्दोशक प्रक्रियाक रुप ग्रहण कयलनि अछि। आष्वलायन अपन गष्हसूत्र मे एगारह तरहक संस्कारक वर्णन केने छथि। जखन याज्ञवल्क्य बारह तरहक। गौतम भिन्नश्भिन्न दैवयज्ञ केॅ संस्कार मे परिगणित कऽ अड़तालिस संख्या धरि लऽ गेल छथि। भारत सरकारक 1901 इसवीक जनगणना प्रतिवेदनक अनुसार ओहि समय हिन्दू मे बारह संस्कार प्रचलित छल। मिथिला मे सोलह तरहक संस्कारक विधान मान्य अछि ई थिकश् गर्भधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निश्क्रमण, अन्नप्राषन, चूड़ाकर्म, कर्णबेध, उपनयन, वेदारम्भ, समावर्तन, विवाह, वानप्रस्थ, सन्यास आ अन्त्येश्टि। एखन सिर्फ पाँच तरहकश् जन्म,मूड़न,उपनयन,विवाह आ मष्त्यु संस्कारक चलनि अछि। मुदा इहो सभ जाति मे समान नहि अछि। जेना उपनयन सिर्फ समाजक अगुआइल जातिक बीच अछि। मूड़नोक रुपरेखा एकरंगक नहि अछि। तेँ जँ सभकेँ नजरि मे राखि देखैत तँ सिर्फ तीनिये टा संस्कार जन्म,विवाह आ मष्त्यु अछि। संस्कारक कल्पना आ ओकर चयन वा नामकरणक पाँछा सामाजिक कारण सोहो प्रमुख रहल। स्पश्ट अछि जे संस्कारक षासन जीवन पद्धति के खास ढ़ंग सॅ नियंत्रित आ आदर्षोन्मुखी बनयवाक लेल देल गेल। षुद्धताक अपेक्षा सुनियोजित जीवनश्व्यवस्थाक आवष्यकता अथवा स्थितिक उपस्थिति दिषि संकेत करैत अछि। कहैक तात्पर्य जे आर्यश्अनार्यक घालमेल सँ उपजल सामाजिक स्थिति मे संस्कारक माध्यम सॅ अपन अस्मिता के सुरक्षित रखवाक ब्राहम्णवादी चिन्तनक परिणाम थिक संस्कार। मध्यकाल मे संस्कारक पालन पर बेसी जोर देल गेल। ओना दोशक निवारण आ गुणक अंगिकार करब अधलाह बात नहि थिक। इतिहास साक्षी अछि जे भौतिक परिस्थितिक प्रभवक कारणे समाज मे कखनो बेटिक त कखनो बेटाक मोल बढ़ैत रहलैक अछि। आइ जकरा मैथिल संस्कष्ति कहल जा रहल अछि,से की वस्तुतः मिथिलाक संस्कष्ति थिक? एहि लेल मिथिलाक इतिहास दिषि देखए पड़त। मिथिलाक धरती हिमालयक माटिश्बालू सँ बनल अछि। नदी प्रदेषक एहि भूभाग पर किरात आ कोल रहैत छल। आर्यीकरणक अभियान मे जे किछु बहरबैया लोक सभ एहिठाम अयलाह ओ द्विज बनि के एहि प्रदेष पर सत्ता स्थापित केलनि। क्षत्रिय राजसत्ता कब्जा केलनि आ ब्राह्मणक हाथ मे समाज सत्ता आयल। वैष्वलोकनि अर्थसत्ताक स्वामी बनलाह। मूलवासी अर्थात आदिवासी अन्त्यज बनि गेलाह। बहरबैया लोक कम संख्या मे आयल रहथि तेँ कष्शि कर्यक लेल वा आनो प्रयोजन सँ प्रतिलोम विवाह जोर पकरलक। जकर चर्चा मनुस्मष्ति आ मिथिलाक इतिहास मे बिस्तार सँ अछि। द्विजक संख्या कम रहने, एहि ठामक आदिवासीक देवीश्देवता,पावनिश्तिहार आ नेमश्तेम अपनौलनि। जहि स ब्राह्मणीकरण भऽ गेल। समाजक सत्ता ब्राह्मणक हाथ मे छलनि तेँ हुनके जीवनश्षैली संस्कष्ति बनल। बहुसंख्यक मूलवासी पर एकटा नवश्संस्कष्ति आरोपित कयल गेल। औझुका जेँका प्रचारश्प्रसारक माध्यम त नहि छल, मुदा जे किछु छल ओ हुनके सभक बीच छलनि। लिखैकश्पढ़ैक   सुविधा आ सामथ्र्य रहने हुनके (द्विजिक) संस्कष्ति सम्पूर्ण मिथिलाक संस्कष्ति रसेश्रसे बनि गेल। मुदा मूलवासीक जीवनश्षैली आ रीतिश्नीतिक पूर्ण विलयन ने त संभव छल आ ने से भेल। आइयो ओ (मूलवासी) दूबि बनि माटि पकड़ने छथि। जकर संस्कष्ति लोक संस्कष्त कहल जाइत छैक। मूड़न आ उपनयन, आब सेहो काम्य संस्कारक कोटि मे अबैत जा रहल अछि। अखनो मिथिला मे ढ़ेरो जाति बसल अछि। किछु जाति छोड़ि बहुसंख्यक जातिक बीच उपनयन प्रथा नहि अछि तेॅ उपनयन के मिथिलाक संस्कार कोना मानल जाय? हाँ, खंडित संस्कार कहल जा सकैत अछि। तहिना मूड़नोक अछि। एक रुप मे मूड़नोक चलनि नहि अछि। केयो देवस्थान जा मूड़न करबैत त क्यो गंगाकात जा। केयो गामे मे कबुलाश्पाती द करबैत त केयो बिना गीतेश्नाद,पूजेश्पाठ केने, करैत। केयो समाज मे खीरश्टिकड़ी बाॅटि करैत त क्यो भोजश्भात कऽ। तेॅ सब मिला के देखला पर प्रष्न उठैत जे मुड़नक कोन रुप मानल जाय? तहिना विवाहोक संबंध मे प्रष्न उठैत? कुमार बर आ कुमारि कन्याक संग विवाह प्रचलित अछि। मुदा द्वितीय बर आ कुमारि कन्याक संग विवाह होइत जखन कि बहुसंख्यक जाति मे द्वितिय बरश्कन्याक विवाह सेहो होइत। द्वितिय कन्याक संग कुमार बर के सेहो होइत अछि तहिना मष्त्यु संस्कार मे सेहो एकरुपता नहि अछि। मष्त्यु के षोक बुझि गीतिश्नाद नहि होइत। मुदा प्रष्न उठैत जे मष्त्यु षोकेक संस्कार किऐक थिक? हाॅ, असामयिक मष्त्यु के षोकक श्रेणी मे राखल जा सकैत। मुदा उचित आयु बीतला परक मष्त्यु के षोक किऐक मानल जाय? जहिना प्रकष्ति मे देखैत छी जे अपन पूर्ण आयु पाबि स्वतः नश्ट भऽ जाइत अछि तहिना त मनुश्यो थिक। मुदा ढ़ोरो प्रष्न उठलाक उपरान्तो समाज, विवाह आ मष्त्यु के व्यवहारिक संस्कार रुप मे अपनौने अछि। छिटश्फुट ढ़ग सँ जे किछु होइत हो मुदा समुद्र रुपी समाज, सब कुछ अपना पेट मे समेटि लैत अछि। व्यक्तिगत जीवनक समस्या सँ ऊपर उठि कऽ सार्वजनिक जीवन जीवाक एहि अभ्यास कालक महत्व आइयो अछि। सन्यास यैह थिक। ब्रह्मचर्य जीवन ज्ञान अर्जनक होइत। गष्हस्ताश्रम व्यवहारिक जीनगी होइत, जे उपार्जन क जीवनश्जीवाक माध्यम होइत। नव परिवारक सष्जन होइत। जहि सॅ समाज आगूओ बढ़ैत आ समष्द्धो होइत। तेसर अवस्था वा अंतिम संन्यास अवस्था तक पहुँचैतश्पहुँचैत ज्ञान आ कर्म सँ पूर्ण मनुश्य केँ अज्ञान आ अबोध मनुश्यक सेवा मे लगि जायब, बेजाय नहि। वास्तव मे ओ जरुरियो अछि। संस्कार गीतक अर्थ थिक विभिन्न संस्कारक प्रसंग मे गाओल जायवला गीत। ई लोक प्रचलित गीत थिक। तेँ एहि मे लोक गीतक आत्मा बसैत अछि। लोक गीतक मनोहर फुलवाड़ी मे यदि संस्कार गीत के हटा देल जाय तँ ओ निश्प्राण भऽ जायत। यैह कारण थिक लोकगीतक, प्रायः समस्त विषेशता संस्कार गीत मे उपलब्ध अछि। मष्त्यु संस्कार केँ छोड़ि अन्य सभ संस्कार आनन्दोत्सवक माहौल मे मनाओल मे जाइत अछि। उमंगमय वातावरण मे नारी कंठ सँ निकलैत स्वरलहरी देह मे थिरकन, हष्इय मे झंकार आ मस्तिश्क मे चुलबुली उत्पन्न कऽ दैत अछि। गीति गायव मिथिलाक सभ नारश्नारीक सहजात गुण रहल अछि। जेना दखैत छी जे मूड़न, उपनयन, विवाह इत्यादिक समय सभ नारी समवेत स्वर मे गीति गबैत छथि। जे मिथिलाक धरोहर छी। तहिना पुरुशो पावनि आ ध् ाार्मिक कार्य मे सभ मिलि गबैत छथि। संस्कार गीत लाकगीतक अंग थिक। कहल जाइत अछि जे लोकगीतक रचनाकार नहि होइत छथि, ओ सार्वजनिक रचना होइत अछि। एकर वास लोक कंठ मे अछि। एक कंठ सँ दोसर कंठ धरि जाइतश्जाइत गीतक स्वरुप बदलि जाइत। ततबे नहि! गीतक भास सेहो बदलैत। एक्के गीत भास बदलिश्बदलि कत्ते रुप मे गाओल जायत। तेँ संस्कार गीत मे एकरुपताक अभाव भेटैत अछि। स्वभावगत एहि स्थितिक दोसर परिणाम थिक भनिताक बेलगाम प्रयोग। गीत गौनिहारि सभ अपने फुरने कोनो गीत मे कोनो रचनाकार नाम भनिताक रुप मे जोड़ि दैत छथि। विद्यापतिक रचना उमापतिक भ जाइत त कखनो उमापतिक चंदा झाक वा मनबोधक। ततबे नहि मैथिली क्षेत्र सँ बाहरोक रचनाकार जना तुलसी, सूर दास, मीरा इत्यादि मिथिलाक माएश्बहीनिक कंठ मे आबि मिथिलेक आ मैथिलिऐक गीतिकार बनि जाइत छथि। जे उचित आ अनुचित दुनू थिक। उचित एहि लेल जे हुनकर लोकप्रियता विनयपत्रिता,   रामायण, सुरसागर माध्यम सँ एतेक अधिक प्रचलित भऽ गेल अछि जे अपन बनि गेल छथि। जहाँ धरि षब्द टूटैक प्रष्न अछि ओ ज्ञानश्अज्ञानक बीचक बात थिक। भशाक जन्म आम जनक बीच होइत। किछु नव षब्दो जन्म लैत अछि आ षुद्व षब्द टूटि कऽ नवो बनि जायत अछि। तेँ कोन गीत किनकर लिखल थिकन्हि, संस्कार गीत मे वुझब कठिन भऽ जायत अछि। स्पश्ट अछि जे संस्कार गीत मैथिलश्महिलाक परिश्कृत सांस्कृतिक चेतनाक परिचायक थिक। मिथिला मे संस्कार गीत अनौपचारिक षिक्षाक माध्यम अछि। मैथिल समाज मे नारीक लेल औपचारिक षिक्षा वर्जित छल। सिर्फ नारिये नहि माटि परक लोकक लेल सेहो छल। कहल जाइत अछि जे वेद वा गीता पढ़ला सँ ओ बताह भऽ जायत। नारी मे विदुशी होइत छलीह। संस्कार गीतक संबंध संस्कष्ति आ साहित्य से त अछिये, समाज स सेहो अछि। संस्कष्ति, साहित्य आ समाजक अन्तरावलम्वन केँ जत्ते नीक जेँका संस्कार गीत प्रकट करैत अछि तत्ते एहि प्रकारक आन कोनो घटक नहि। संस्कार गीतक संकलनश्प्रकाषन सँ मौखिक परम्परा साहित्य समेटल जाइत अछि आ ओ साहित्य अघ्ययनश्विष्लेश्णक आधार प्रस्तुत करैत अछि मिथिला मे संस्कार गीतक श्रीगणेष होइत अछि गोसाउनिक गीत सँ। एहि स मैथिल समाजक धर्मभावनाक ज्ञान होइत अछि। किन्तु प्रष्न अछि जे संस्कारक अवसर पर ई धर्मश्भावना मुख्यतः गोसाउनिऐक गीत मे किऐक प्रकट होइत अछि? स्पश्ट अछि जे एहिठाम गोसाउनि गोसाई सँ बेसी महत्वपूर्ण छथि। भगवानोक गीत मिथिला मे गाओल जाइत अछि मुदा संस्कार कर्मक अवसर पर जे प्रधानता भगवती गीतक अछि से भगवानोक गीतक नहि! आब प्रष्न उठैत जे मिथिला मे देवीश्पूजाक प्रमुखता किऐक अछि? सभ जनैत छी जे देवीश्पूजा तंत्रसाधना सँ सम्बद्ध अछि। किछु इतिहासकारक मत छन्हि जे तंत्रसाधना असंस्कष्त जनजातिक समाज सँ आयल अछि। जकरा कालान्तर मे ब्राह्मणवादी लोकनि अपना लेलनि। बहुत दिन धरि तंत्रश्साधना अवैदिक कार्य बूझल जायत छल। रसेश्रसे अपनवैतश्अपनवैत सनातन धर्म मे जोड़ा गेल। वैदिक धर्मावलम्बी सभ सेहो तंत्रश्साधना अपना देवी पूजा दिषि आकष्श्ट भेलाह। एहि सँ अतिरिक्त मिथिलाक समाज मे षैवश्धर्मक प्रमुखता छल अथवा षाक्त धर्मक। जे विवाद विद्वत मंडली मे बहुत दिन धरि चलल। पनचैती सँ फरिआयल जे मिथिलाक लोक पंचदेवोपासक होइत छथि। ई मान्यता पुरानकालक समन्वयवादी धार्मिक जीवनक देन थिक। संस्कार गीतक मध्यकालीन चरित्र के देखार करैत अछि। गीत संस्कार मे मैथिली गीतक अपन इतिहास अछि। लोचनक ‘रागतरंगिणी’ मे मैथिल गीतक जे इतिहास लिखने छथि तदनुसार एकर जन्म तेरहमश्चैदहम षताब्दी मे भेल। षिव सिंह आ विद्यापति समकालिन छलाह। हुनके पितामह सुमति मैथिली गीतक परम्पराक प्रारंभकर्ता छलाह। एहि प्रकारे मिथिलाक देषी गीत परम्पराक स्थापना भेल। ऐतिहासिक आाधार पर यैह मानल जाइत अछि मुदा गीत गेवाक प्रवृति मनुश्यक विकासक संग जुड़ल अछि। जहि आधार पर आरो पुरान कहल जा सकैत अछि। गीत गेवाक ढ़ंग, जकरा राग कहल जाइत, मिथिला मे भास कहल जाइत छैक। मिथिला भासक अपन विषिश्टता छैक। संस्कार गीत एहि भासक भंडार छी। हँ, किछु त्रुटिपूर्ण बात सेहो अछि जे कम जनने एक्के गीत (समदाउन) खुषीक समय मे सेहो गवैत छथि आ षोकक समय सेहो जखन कि दुनूक लेल अलगश्अलग विशयवस्तु होइछ। तहिना बेटाक विवाह मे कुमार गीत आ बेटीक लेल कुमारि गीत मे सेहो अंतर होइत अछि। जनमक समय खेलौना आ सोहर मे सेहो अंतर अछि। अंत मे, संकलनकर्ता नवयुवक छथि, तेँ बहुत किछु त्रुटि रहलाक वादो धन्यवादक पात्र छथि, जे अपन मातष्भाशाक सेवा लेल डेग बढ़ौलनि अछि। - जगदीष प्रसाद मंडल   (1) सिंह पर एक कमल राजित ताहि उपर भगवती। उदित दिनकर लाल छवि निज रुप सुन्दर छाजती। दाँत खटश्खट जीह लहश्लह श्रवन कुन्डल षोभती। षंख गहिश्गहि, चक्र गहिश्गहि खर्ग गहि जगतारिणी। मुक्तिनाथ अनाथ के माँ भक्तजन के पालती। सिंह पर एक कमल राजित ताहि ऊपर भगवती। माँ ताहि ऊपर भगवती। (2) सभ के सुधि अहाँ छी अम्बा हमरा किए बिसरै छी हे। हमरा दिस सँ मुह फैड़े छी, ई नहि उचित करै छी हे। छी जगदम्बा जग अबलम्बा तारिणी तरणि बनै छी हे। छनश्छन पलश्पल ध्यान धरै छी दरसन बिनु तरसै छी हे। छी हम पुत्र अहीं केर जननी से तँ अहँा जनै छी हे। रातिश्दिन हम विनय करै छी पापी जानि ठेलै छी हे। सभ के सुधि अहाँ लै छी अम्बा हमरा किए बिसरै छी हे। (3) कोन दिन आहे काली तोहर जनम भेल, कोन दिन भेल छठियार। षुक्र दिन आहे सेवक हमरो जनम भेल, बुध दिन भेल छठियार। पहिर ओढ़िय काली गहबर ठाढ़ि भेली, करब मे काली के सिंगार। कोन फूल ओढ़न माँ के कोन फूल पहिरन, कोन फूल सोलहो सिंगार। चम्पा फूल ओढ़न, जूही फूल पहिरन, ओढ़हुल फूल सिंगार। भनहि विद्यापति सुनु माता काली, सेवक रहु रक्षपाल। कोन दिन आहे काली तोहर जनम भेल, कोन दिन भेल छठियार। (4) अब ने बचत पति मोर हे जननी, अब ने बचत पति मोर। चारु दिसि पथ हेरि बैसल छी, क्यो ने सुनै दुख मोर। हे जननीकृकृ एहि अवसर रक्षा करु जननी, पुत्र कहाएव तोर। श् हे जननीकृकृ अलटिश्बिलटि कऽ जँ मरि जायब, हँसी होयत जग तोर। श् हे जननीकृकृ अबला जानि षरण दीअ जननी, नाम जपत हम तोर। श् हे जननीकृकृ   (5) हम अबला अज्ञान हे ष्यामा, हम अबला अज्ञान। धन सम्पत्ति किछु नहि अछि हमरा, नहि अछि किछुओ ज्ञान। श् हम अबलाकृकृ नहि अछि बल, नहि अछि बुद्धि, नहि अछि किछुओ ध्यान। श् हम अबलाकृकृकृ कोन विधि भव सागर उतरब, अहिंक जपल हम नाम। श् हम अबलाकृ (6) जगदम्ब हे अबलम्ब मेरी, जननी जय जय कालिका। दष भुजा दष खड़ग राजित, पाष खप्पर विराजित। मुण्ड लयश्लय मगन नाचय, गाबय योगिन मालिका। भाइ भैरब मुण्ड छीनथि जय जय कालिका। (7) अहाँ कियै भेलहुँ कठोर हे जननी अहाँ कियै भेलहुँ कठोर। हम दुखिया माँ षरण अहाँ के अहाँ कियै भेलहु कठोरश् हे जननीकृ अतुल कश्ट सहि जनम देल अछि आब पोछत के नोरश्हे जननी कृ ककरा पर हम जनम गमायब के करती आब षोरश् हे जननीकृकृ ककरा पर हम रुसि परायब के आब रक्षक मोरश् हे जननी अहाँ कियैकृकृ (8) क्यो ने हमर रखबार हे जननी, क्यो ने हमर रखबार। चिन्ता विकल विवस मन मेरो, मन दुख होइए अपार। हे जननी क्योकृकृ बिनु अबलम्ब धार मे डुबलहुँ, सुझत नहि किनार। श् हे जननीकृकृ अहाँ किए देर लगेलहुँ जननी, हम डुबलहुँ मझधार। श् हे जननीकृकृ सष्श्टिक मालिक अहीं छी जननी, करहु सभक प्रतिपाल। श् हे जननीकृकृ माता के सब पुत्र बराबरि, पंडित मूर्ख गमार। श् हे जननीकृकृ कतेक विनय कय थाकि गेलहुँ हम, अब करिअ भव भार। श् जननीकृ   (9) कहाँ नहैली काली कहाँ लट झाड़लन्हि, कहाँ कयल सिंगार हे। गंगा नहैली काली बाट लट झाड़लन्हि, गहबर कयल सिंगार हे। पहिरि ओढ़िया काली गहबर ठाढ़ भेलि, करय लगली सेवक गोहारि हे। यष लिय यष लिय काली हे माता, अहाँ यष फिरु संसार हे। श् कहाँकृकृ (10) अयलहुँ षरण तोहार हे जगतारनि माता। लाले मन्दिरबा के लाले केवरिया, लाले ध्वजा फहराय हे जगतारनि माता। लाले चुनरिया के लाले किनरिया, लाले सिन्दुर कपार हे जगतारनि माता। राखि लिय मुख लाली हमरो, हम लेब अँचरा पसारि हे जगतारनि मता। अयलहुँ षरण तोहार हे जगतारनि माता। (11) हे जगदम्बा जय माँ काली प्रथम प्रणाम करै छी हे। नहि जानि हम सेवा पूजा अटपट गीत गबै छी हे। सुनलहुँ कतेक अधम के मैया मनवांछित फल दै छी हे। पुत्र सम जानि चरण सेवक के जन्मक कश्ट हरै छी हे। विपतिक हाल कहल की हे मैया आषा लागि जपै छी हे। सोना चानी महल अटारी ई सब किछु ने मँगै छी हे। मनक मनोरथ मनहि मे राखि मंदिर तक पहुँचे छी हे। अहाँक चरण के दास कहाबी एतवे हम मनबै छी हे। प्रेमी जन सँ पाबि निराषा नयन नीर बहबै छी हे। नोर बहा कऽ अहाँ लय मैया मोती माल गुथै छी हे। ’’’’’’   (1) गरजह हे मेध गरजह गरजि सुनावह रे। ललना रेश् ऊसर खेत पटाबह सारि उपजाबह रे। जनमह आरे बाबू जनमह जनमि जुड़ाबह रे। ललना रेश् बाबा सिर छत्र धराबह षत्रु देह आँकुष रे। हम नहि जनमब ओहि कोखि अबला कोखि रे। ललना रेश् भैलहि वसन सुतायत छौड़ा कहि बजायत रे। जनमह आरे बाबू जनमह जनमि जुड़ाबह रे। ललना रेश् पीयर वसन सुताबह बाबू कहि बजायब रे। (2) पलंगा सुतल तोहेँ पिया कि तोहें मोर साहेब रे। ललना रेश् बगिया जँ एक लगबितहुँ टिकुला हम चखितहुँ रे। भल नहि बोललिह धनी कि बोलहुँ न जानह रे। ललना रेश् बेटबा जँ एक तोरा होइत सोहर हम सुनितहुँ रे। भानस करैत तोहें गोतनी कि तोहें मोर हित बंधु रे। ललना रेश् अपन बालक दिअ पैंच पिया सुनु सोहर रे। नोन तेल पैंच उधार भेटय आर सभ किछु रे। ललना रेश् कोखिआक जनमल पुत्र सेहो नहि भेटय रे। मचिया बैसल तोरे सासु कि सासु सँ अरजि करु रे। ललना रेश् कओनश्कओन तप केलहुँ पुत्र फल पेलहुँ रे। गंगहि पैसि नहेलहुँ हरिवंष सुनलहुँ रे। ललना रेश् देवलोक भेला सहाय कि पुत्र फल पयलहुँ रे। आदित लगैत बिलम्ब भेल होरिला जनम लेल रे। ललना रेश् लाल के पलंगा सुता देल पिया सुनु सोहर रे। दषमासी सोहर (3) प्रथम मास जब आयल चित फरिआयल रे। जानि गेल सासु हमार चढ़ल मास दोसर रे। सासु मोर बसु नैहर ननदी बसु सासुर रे। घर छथि देबर नदान चढ़ल मास तेसर रे। बाट रे बटोहिया कि तोहि मोर भैया कि हित बंधु रे। हमरो समाद लेने जाउ चढ़ल मास चारिम रे। अन्न पानि किछु नहि भावय खटरस भावय रे। कहब हम कओन उपय चढ़ल मास पाँचम रे।   बिनु आमा नैहर विरान चढ़ल मास छट्ठम रे। आगुश्आगु आवय दोलिया पाछु भैया आवय रे। घुरिश्घुरि घर भैया जाउ चढ़ल मास सातम रे। तन भेल सरिसब फूल देह भेल पीयर रे। अब न बाँचत जीव मोर चढ़ल मास आठम रे। घरश्घर बाजत बधावा कि भेल बड़ आन्नद रे। अयोध्या मे जनमल राम चढ़ल मास नवम रे। तुलसीदास सोहर गाओल गाबि सुनाओल रे। भक्तवत्सल भगवान कि आजु प्रकट रे। (4) एक दिन छल बन झंझर आब बन हरियर रे। बड़ रे सीता दाई तपसी कि गरम सँ रे। के मोरा गरुअनि काटत खिनहरि बूनत रे। ललना रे मन होय पियरी पहिरतहुँ गोद भरबितहुँ रे। ललना रे राम दहिन भए बैसतथि कौषल्या चुमबितथि रे। (5) प्रथम समय नियराओल षुभ दिन पाओल रे। ललना रे देवकी दरदे वयाकुल दगरिन आयल रे। दोसरो वेदन जब आयल कष्श्ण जन्म लेल रे। ललना रे तेसर हरिक प्रवेष कलेष मेटायल रे। दगरिन आबि जगाओल केओ नहि जागल रे। ललना रे हरि देखि सभ मन अचरज सभ हित साधल रे। सूरदास प्रभु हितकर कष्श्ण जनम लेल रे। बाजन बाजय सभ ठाम देव लोक हरखित रे। (6) उतरि सावन चढ़े भादव चहुँ दिस कादब रे। ललना रे मेधवा झरी लगाबय दामिनि दमकय रे। जनम लेल यदुनन्दन कंस निकन्दन रे। ललना रे फुजि गेल वज्र केवाड़ पहरु सब सूतल रे। षंख चक्र युक्त हरि जब देवकी देखल रे।   ललना रे आइ सुदिन दिन भेल कष्श्ण अवतार लेल रे। कोर लेल वसुदेव कि यमुना उछलि बहू रे। ललना रे हरि देल पैर छुआय नन्द घर पहुँचल रे। नन्द भवन आन्नद भेल यषुमति जागल रे। ललना रे सूरदास बलि जाय कि सोहर गाओल रे। (7) घर से बहार भेली सुन्दरि, देहरि धय ठाढ़ भेली रे। ललना रे ओलती धय धनि ठाढ़ि कि, दरदे व्याकुल रे। कथि लय बाबा बिआहलनि, बलमु घर देलनि रे। ललना रे रहितहुँ बारि कुमारी, दर्द नहि जनितहुँ रे। अगाध राति बिराल पहर रति, बबुआ जनम लेल रे। ललना रे बाजय लागल बधाबा, कि गाओल सोहर रे। (8) पहिल परन सिया ठानल सेहो विधि पूड़ाओल रे। ललना रे भेटल अयोध्या राज ससुर राजा दषरथ रे। दोसर परन सिया ठानल सेहो विधि पूराओल रे। ललना रे भेटल कौषल्या सासु लखन सन देओर रे। तेसर परन सिया ठानल सेहो विधि पूराओल रे। ललना रे माँगल पति श्रीराम सेहो विधि पूरल रे। (9) गाँव के पछिम एक कुइयाँ सुन्दरि एक पानि भरु रे। ललना रे घोड़बा चढ़ल एक कुमर पानि के पियासल रे। पानि पीबू पानि पीबू कुमर सुरति नहि भुलह रे। तोरो सँ सुन्दर हमर स्वामी जे तजि विदेष गेल रे। कोन मास तोहरो वियाह भेल कोने गवन भेल रे। कोने मास जोड़ल सिनेह कि तजि परदेष गेल रे। फागुन हमरो विआह भेल कि चैत गवन भेल रे। बैसाख जोड़ल सिनेह कि तेजि विदेष गेल रे। (10) जीर सन धनि पातरि फूल सन सुन्दरि रे। ललना रे सुतल प्रेम पलंग पर दरदे व्याकुल रे। सासु जे हुनका अलारनि बहिन दुलारनि रे।   जाहक हे ननदी जाहक, भइया के बजाबह हे। ललना रे भइया ठाढ़ देहरि बीच कहु बात मनके रे। खेलौना (1) भैया के घर बेटा जनम लेलक बधैया माँगे एलै हो लाल। सोना खराम चढ़ि भैया एला की की मोर बहीन लेली हो लाल। सोनाक हम मट्ठा लेलौ रुपा केर हम लेलौ काड़ा हो लाल। रेषमी कपड़ाक अंगा लेलौ जड़ी लागल हम टोपी हो लाल। पचासक बदला सौ लऽ कए जेती रेषम साड़ी पहिरेबनि हो लाल। भनस कए कऽ भौजी अयली खादी साड़ी पहिरेबनि हो लाल। सयक बदला पचास लय कए जैती, मूड़ी मे डांड़ लगतनिहो लाल। कनैत खीजैत घर ननदि जेती हो लाल। (2) आइ छठि दिन घर मे सुदिन भेल घर मे भेल ललना, दुआरे वाजे बजना। बाबा लुटाबथि हाथी ओ घोड़ा बावी लुटावे गहना, दुआरे बाजे बजना। काका लुटाबे घड़ी ओ औंठी काकी लुटाबे कंगना, दुआरे बाजे बजना। पिसा लुटाबे मोटर गाड़ी पीसी लुटाबे यौबना, दुआरे बाजे बजना। (3) बाजे बाजे बधाबा नन्द के अंगना कथक नाचे पमरिया नाचे, छोटकी ननदिया नाचे अंगना। किये तोँ ननदी नाचह आंगन, तोरो भैया रहथि पटना। श् बाजेकृकृ भैया हमर पटना रहै छथि, ओतहि सँ आओत मोती के कंगना। भाई मोरा जीबौ भतीजबा जीबौ, देव पुराओल मन कामना। (4) ककरा के अंगना जमहिरा रे, मन रंजे के लाल।   मन रंजे के लाल। बाबा के अंगना जमहिरा रे, मन रंजे के लाल। पलंगा सुतल तोहे पिया हे, मन रंजे के लाल। बहिन मांगय इनाम रे, मन रंजे के लाल। तेरे सन्दुक मे कंगना रे,श् मन रंजेकृ कंगना हम नहि लेब रे, मनकृकृ हमहि त लेब नौ लाखा हार,श् मनकृकृ हँसैत जायब ससुरारि रे,श् मनकृकृकृ हम नहि देब नौ लाख के हार,श् मनकृकृ कनैत जाउ ससुरारि रे,श् मनकृकृ जँ नहि देब नौ लाख के हार,श् मनकृकृ बबुआ के लऽ जैब ससुरारि रे,श् मनकृकृ फेर कऽ बबुआ जनम लेब रे,श् मनकृकृ नैना मे नैना मिला लेब रे,श् मनकृकृ सुनु बचन अहाँ ननदी रे,श् मनकृकृ कोखिया लहरि नहि जाय रे, गन रंजे के लाल। गनियारि पिसबाक गीत कहमा केर जड़िया कहमा सिलौटिया रे। ललना रेश् कओन मुँह भय पीसब, कौषिल्या पीआयब रे। दछिन के इहो जड़िया, पछिम सिलौटिया रे। ललना रेश् पूब मुँह भय पीसब, कौषिल्या पीयाअब रे। पहिने जे पीलनि कौषिल्या रानी, सुमित्रा रानी रे। ललना रेश् सिल धोइ पीयल कैकेयी रानी तीनू गरभ सँओ रे। कौषिल्या के जनमत राम, सुमित्रा के लछमन रे। ललना रेश् कैकेयी के भरत, षत्रुघन, तीनू घर सोहर रे। तेलश्कसाय लगवैक गीत (1)   कौने बाबी पीसल कसाय, जे कि बरुआ ओंगारल हे। बड़का बाबा हरबा जोताओल, कि सरसो उपजाओल हे। ऐहब बाबी तेल पेरौलीह, बरुआ ओंगारथि हे। (2) काँचहि बाँस के मलिया हे, आकि ताहि मलिया तेल फूलेल हे। कौने बाबी लगेतीह तेल फूलेल, आकि कौन बाबी लगेती उबटन हे। आकि फल्लाँ बाबी लगेती तेल फुलेल, आकि फल्लाँ बाबी लगेती उबटन हे। मूड़न मूड़नमूड़नमूड़नमूड़नमूड़न गोसाउनि नोतक गीतश् जँ हम जनितौं काली मैया औती अगर चानन मंगबितौ हे। गंगा सँ मैया चिकनी मंगबितौ ऊँच के पीड़िया बनबितौ हे। नीर गंगाजल सँ पीड़िया निपबितौ अड़हुल फूल चढ़बितौ हे। पीअर पीताम्बर माँ के आँचर दीतौं सोन रुपे घूघरु लगाय हे। जोड़ा छागर धूर बन्हबितौ करिया दीतौं बलिदान हे। भनहि विद्यापति सुनु देबि काली सदा रहब सहाय हे। पितर नोतक गीतश् कौन बाबा आओत गजन हाथी ओ जे कौने बाबा लिल घोड़ा हे। कौने बाबी अओती दोलियहि कि बरुआ आषीश देती हे। बड़का बाबा आओता गजन हाथी   ऐहब बाबी अओती दोलियही कि बरुआ आषीश देती हे। मुड़न बेरक गीतश् समुआ बैसल तोहे बाबा कि बरुआ अरजि करु हे। लपटि झापय ललाट करह जगमूड़न हे। रहु बाबू रहु बाबू बरुआ कि होयत सुदिन दिन हे। नोतब सकल परिवार करब जगमूड़न हे। मूड़न करैत बरुआ क बाबा सँ अरजि करु हे। आनहु पीसि बोलाय कि अउरी पसारल हे। औती पीसी सोहागिन बैसति चैक चढ़ि हे। पीअर वस्त्र पहिरती केष परिछति हे। केष कटबै कालक गीतश् कौने बाबा छुरिया गढ़ाओल सोने मढ़ाओल हे। कौने अम्मा लेल जन्म केष कि षुभश्षुभ होयत हे। बड़का बाबा छुरिया गढ़ाओल रतने मढ़ओल हे। बड़की बाबी लेल जनमकेष कि षुभश्षुभ होयत हे। देब हे नौआ भैया लाल धोतिया सोनक कैंचिया हे। षुभ कऽ उतारऽ बाबाक केष बबुआ जीक मूड़न हे। नौआक गीत धीरेश्धीरे कटिहह नौआ केष, कि बौआ बड़ दुलारु छइ हौ। बौआक मामी नौआ तौरे देवह, कि बौआ छै बड़ दुलारु हौ। बौआक मामी भार पठौलखिन, ठकुआ तोरे देबह केरा तोरे देवह हौ। बौआक नाना घोती पठेलखिन, पीअर मे रंगि के तोरे देवह हौ। धीरेश्धीरे कटिहह केष, कि बौआ छै बड़ दुलारु हौ। नहेबा कालक गीतश् कोने बाबा पोखरि खुनाओल, कि घाट बनाओल हे। कोने बाबा भरथि जूड़ी पानि, कि बरुआ नहाबथि हे।   ऐहब बाबी भरु जुड़ि पानि, कि बरुआ नहावथि हे। चुमाओन गीतश् आजु माइ षोभा श्री रघुवर के मातु कौषल्या हकार पठाओल गाइन जतेक नगर के। कैकेयी आयलि सुमित्रा आयलि गाइनि सगर नगर के। दुबि अछत लय देवलोक आयल चर डोलय रघुवर के। तुलसीदास प्रभु तुम्हरे दरस के जीवन सफल दरस के। आजु माइ षेभा श्री रघुवर के। भगवतीक विनतीश् अयलहुँ सरन तोहर हे जगतारनि माता। श् अयलहुकृकृ लाले मन्दिरिया के लाले केबरिया। लाले घ्वजा फहराय हे जगतारनि माता। श् लाले चुनरिया के लाले किनरिया, लाले सिनुर कपार हे जगतारनि माता।। राखि लिऔ मुखलाली हमरो। हम लेब अचरा पसारि हे जगतारनि माता।। अयलहुँ सरन तोहारकृ गाम देवताक गीतश् बेरिश्बेरि बर बरजौं मालिनि बेटिया, बाट घाट जुनि रोपु फूल हे। एहि बाटे औता ब्राह्मण दुलरुआ, घोड़ टाप तोड़ि देत फूल हे। कानै लगली खीजै लगली मालिनि बेटी, आखि स बहै लागलि नोर हे। के निरमोहिया फूल गाछ तोड़त,   जुनि कानू जुनि खीजू मालिनि बेटिया, हमरा स लीअ वरदान हे। पहिल जे मंगलौ ब्रह्मण सिर के सिनुरबा, तखन कोर भरि पुत्र हे। जे पुत्र दीह ब्राह्मण हरि नहि लीह, बाँझी पद छूटत गोर हे। साँझश् साँझ दिय यसुमति मइया हे साँझ बीतल जाइये। जैता कन्हैया खिसिआय, हे साँझ बीतल जाइये। कथी केर दीप कथी केर बाती, हे साँझ बीतल जाइये। सोना केर दीप पाट सूत बाती, हे साँझ बीतल जाइये। सरसो तेल जरय सारी राती, हे साँझ बीतल जाइये। जरय लागल दीप चमकि गेल बाती, हे साँझ बीतल जाइये। खेलय लगलै साँझ मइया, हे साँझ बीतल जाइये। उपनयनक गीतश् उपनयनक गीतश्उपनयनक गीतश्उपनयनक गीतश्उपनयनक गीतश्उपनयनक गीतश् (उद्योग गीत) गोसाउनिक नोतक गीतश् अढ़ुल फूल देखि अयली गोसाउनि, दूधहि चरण पखारब हे। छुट्टा पान गोटा सुपारी, माँ काली नोतल जाथि हे। बरुआक माय बाप गोचर करै अछि, सुनु माता विनती हमार हे। सेबक बालक स्तुति नहि जानय, छमा करब सब अपराध हे। पीतर नोतक गीतश् दुअरहि बाजन बाजय स्वर्ग आवाज गेल हे। स्वर्ग मे पुछथिन बड़का बाबा कतय बाजन बाजू हे। अहाँ कुल जनमल फल्लाँ बरुआ ओतहि बाजन बाजू हे। स्वर्गहि पितर आनन्द भेल कि आब वंष बाढ़ल हे।   बँसकट्टीक गीतश् वष्न्दावन बाँस कटायब कि मड़बा बनायब हे। पहिने बाँस के पूजब तखन छऽ लगायब हे। आहे ई थिक काठ सुकाठ एही सँ मारब बान्हव हे। आकि वष्न्दावन बाँस कटायब कि मड़बा बनायब हे। मड़ठट्ठीक गीतश् जन्म सुफल आइ भेल की आंगन माड़ब भेल हे। जन्म सुफल ओहि बाबाक जिनका आंगन माड़ब हे। जन्म सुफल ओहि बाबीक जनिका कुल पुत्र भेल हे। पीयरहि खड़ छरायब कि लाल झालरि लगायब हे। ताहि माड़व बैसत फल्लाँ बरुआ जिनकर जनउ हैत हे। चहुदिस रहतनि सर सम्बन्धी की माड़ब सोहाओन हे। मड़वा छारैक गीत बाबा हे फल्लाँ बाबा मड़वा छारि मोहि दैह। बरिसत हे नन्हबुनिया मेघ, भाीजत हे मोरा बालक बरुआ, पीताम्बर ओढ़न को दैह। श् बाबा हेकृकृ बाबी हे फल्लाँ बाबी आँचर झाँपि मोहि लैह। बरिसत हे नन्हबुनिया मेघ, भीजत हे मोरा बालक बरुआ, आँचर झाँपि मोहि लैह। श् बाबा हेकृकृ मड़बा नीपक गीतश् बाबा दान दीअ यौ, मटिया कोड़ैक इनाम दीअ यौ। बाबा दान दीअ यौ, मड़बा नीपैक इनाम दीअ यौ। गइया जे देलौ बछिया लगाय, आर किछु दान बेटी आमा सँ लीअ? आमा दान दीअ यै, मड़बा नीतैक इनाम दीअ यौ। बाली जे देलौ बेटी झुमका लगाय, आर किछु दान बेटी भैया सँ लीअ। भैया दान दीअ यौ, मड़वा नीपैक इनाम दीअ यौ।   कंगना जे देल खीलन लगाय, आर किछु दान बहिन काकी सँ लीअ। बलिप्रदान कालक भगवती गीतश् बदन भयावन कान बीच कुण्डल विकट दषन घन पाँती। फूजल केष वेष तुअ के कह जनि नव जलधर काँती। काटल माथ हाथ अति षोभित तीक्ष्ण खड़ग्कर लाई। भय निर्भय बर दहिन हाथ लय रहिअ दिगम्बरि माई। पीन पयोधर ऊपर राजित लिधुर स्रावित मुण्डहारा। कटि किंकणि षब कर मण्डित सिक बह षोणित धरा। बसिय मसान ध्यान सब ऊपर योगिन गण रहु साथे। नरपति पति राखिअ जग ईष्वरि करु महिनाथ सनाथे। बेटा विवाह कुमरमक गीतश् (1) हम ते पोखरि खुनबै तेइ के घाट मढ़ैबै। छिनारो आयल करिहें ओहि रे पोखरिया मे। रसिया बात बाजू सम्हारि, छोड़ू हमरा से अरारि। हम त झुलफी धय घिसिआयब पोखरिया मे। हम त कोठवा उठैब तेइ मे खिड़की लगैब। छिनरो अबायल करिहें ओहि रे कोठरिया मे। रसिया बात बाजू सम्हारि छोड़ू हमरा से अरारि, हम त झुलफी धय घिसिआयब कोठरिया मे। हम त पलंगा लगैब तेइ मे तोसक ओछायब। छिनरो आयल करिहें ओहि रे पलंगिया मे। रसिया बात बाजू सम्हारि छोड़ू हमरा से अरारि। हम त झुलफी घय घिसिआयब पलंगिया मे। (2) रिमझिम रिमझिम बुन्दे बरसि गेल, अंगना मे पड़ल कजरिया। थरिया धोबै गेलि फल्लाँ छिनरिया, खसली टांग अलगइया। घेड़बा चड़ल एलखिन फल्लाँ रसिया उठ गै छिनो हरजैया। हम कोना उठबौ रसिया, तोहर बचनिया डरबा मे पड़लैमचकिया। डरबा मचकिया के की की दबैया, सोठि पीपरि मरचइया। सोठि पीपरि के बड़ रे जहरिया, अतर गुलाब ठंदैइया।   जुटिका बन्धनक गीतश् कोने बाबा केरा गाछ रोपल, केरा कोसाय गेल हे। कोने बाबीक बरुआ उमत भेल राति षहर बसु हे। फल्लाँ बाबा केरा गाछ रोपल केरा कोसाय गेल हे। फल्लाँ बाबी बरुआ उमत भेल राति षहर बसु हे। मड़बहि घीव ढ़रकि गेल स्वर्ग इजोत भेल हे। स्वर्गक पितर आनन्द भेल आब कुल रहत हे। आमश्महु विआहय लेल जयबा कालक गीतश् जाइत देखल पथ नागरि सजनी गे,आगरि सुबुधि सयानि। कनकलता सन सुन्दरि सजनीगे, विधि निरमाओल आनि। चलैत हस्ति गमन सन सजनी गे, देखैत राजदुलारि। जनिकर ऐहन सोहागिनि सजनी गे, पाओल पदारथ चारि। निल वसन तन घेरल सजनी गे, सिर लेल चिकुर सम्हारि। ओहि भ्रमर रस पीबह सजनी गे, बैसल पंख पसारि। आमश्महु विआहक गीत (1) आम बीछै गेली छिनरो, आँठी विछि लैली हे। पचास बेर मना देलियह, तैयो ने तो मानली हे। आम महु बिआहै छलै, तही से भुलेलियै हे। हजार बेर मना देलियह, तैयो ने तो मानली हे। (2) अमुआ मजरि गेल जमुआ मजरि गेल चम्पाकली ताहि तर छिनरो ठाढ़ि नयना सँ नीरे ढरी। घोड़बा चढ़ल एलखिन फल्लाँ रसिया किए अकेली ठाढ़ं, नयना सँ नीरे ढरी। सासु मोर बुढ़िया हे ननदी ससुररिया मोर पिया गेलै परदेष, नयना सँ नीरे ढ़री। छाड़ि दीअ आ गे छिनरो घरबा दुअरबा सुख सम्पति सगरी। छोड़ि दैह बिअहुआ के आष चल हमरो नगरी अगिया लगेबै रसिया के घरबा दुअरबा, सुख सम्पति सगरी।   उपनयन कालक गीतश् (1) चैतहि बरुआ विजय भेल बैषाख पाहुन भेल हे। घर पछुआर केबटा बसु पार उतारि देहु हे। जौं हम पार उतारब जायब कओन देष हे। जायब हम जाहि देष जहाँ अपन बाबी हे। बाबी के चरण पखारब लाल जनउआ देती हे। (2) काषी मे जाय बरुआ ठाढ़ भेल जनऊ पुकारय हे। आहे के थिका काषी के वासी जनऊ मोहि चाहिय हे। सुतल छला बाबा कवष्वनाथ सेहो उठि बैसला हे। आहे हम थिकौं काषी के वासी जनऊआ पहिरायब हे। झारिखंड जाय वरुआ ठाढ़ भेल जनऊआ माँगय हे। आहे के थिका झारिखंड वासी जनऊ मोहि चाहिय हे। हम थिकौं झारिखण्ड वासी जनऊआ पहिरायब हे। आंगन आबि ठाढ़ि भेल भिखि मांगय हे। हम थिकौं अहाँ के बाबी झोरी भरिय देव हे। भीख कालक गीतश् मिथिलाक रुसल बरुआ काषी कथि लेल जाय। आगे दाय कियो नहि हित बन्धु जे बरुआ लेल बिलमाय। आगे दाय बाबा से बड़का बाबा बरुआ लेल विलमाय। बाबी से अइहब बाबी भीख नेने ठाढ़ि। आगे माइ भिखो ने लियै बरुआ मुँहो सँ ने बजाय। पहिरय लय पीयर धोती ओढ़य लेल मांगल चादर। आगे माय हाथ दुनु मंट्ठा माँगे कान दुनु सोन। आगे माइ मिथिलाक रुसल बरुआ काषी कियै जाय। पुरोहित के गारिश् बकलेल बभना चूड़ा दही चाटय ऐला हमर अंगना। चाउर देलियनि दालि दलियनि धेलनि अंगना। एक रती नोन लय करै छथि खेखना।   एकटा गमछा ले करै छथि खेखना। सोन देलियनि चानी देलियनि धेलनि अंगना। एकटा पाइ ले कोना करै छथि खेखना। जनउ कालक गीतश् लाल पीयर अछि माड़ब पाने पात छारल हे। ताहि माड़ब बैसलाह बाबा से फल्लाँ बाबा हे। बगल भए बैसलखिन बाबी से ऐहब बाबी हे। कोरा बैसौलनि बरुआ से फल्लाँ बरुआ हे। बरुआ जे मँगै बाबी लाल पीयर जनऊ दिय हे। रहुश्रहु बाबू आइ अहाँ ब्राह्मण होएव हे। कि लाल जनऊआ देब हक कि पियर जनऊआ हक। चुमाओन कालक गीतश् आइ षिवक चुमाओन हेमन्त घर मे। सखि सब गाबै मंगलाचार हेमन्त घर मे। आंगन चानन निपू मनाइन गजमोती चैक पुराइ। काँचहि बाँस के डलबाँ बुनाओल। ताहि राखब दूभि धान हेमन्त घर मे। चुमबै बैसली सासु मनाइनि। गौरी सहित त्रिपुरारी हेमन्त घर मे। दुबि अक्षत लय मुनि सब आयल। जय जय षब्द सुनाय हेमन्त घर मे। दनही आ बिलौकी कालक गीतश् (1) अमुआ मजरि गौले महुआ मजरि गेलै। ताहि तर फल्लाँ छिनरो ठाढ़ि नयना सँ नीर झरे। घोड़बा चढ़ल एलखिन फल्लाँ रसिलवा, कियै छिनरो एकसरि ठाढ़ि। सासु मोरा आन्हर ननदि गेल निज घर, मोर पिया गेल परदेष। नयनाकृकृकृ   नयनाकृकृकृकृ (2) नामि नामि कोसिया मे जुटिया गूथविह लटका के चलिहह ना। छिनरो गोरी बदन बिछा के चलिहह ना। पतरी कमरिया मे डरकस पहिरि लचका के चलिहह ना। गोरे कलइया मे घड़ी पहिरि देखा के चलिहह ना। गोरेश्गोरे अखिया मे सुरमा लगाबिह मचका के चलिहह ना। बेटा विवाह विवाहक लेल जाय कालक गीत (कुमार) (1) जहि दिन आहे बाबू तोरो जनम भेल, अन्न पानि किछु ने सोहाय हे।, सेहो बाबू चलला गौरी विआहन, दुधबाक दाम दहु ने चुकाय हे। दूधक दाम अम्मा सधियो ने सकइछ, पोसाइक दाम दै देव हे। जाबत जीव अम्मा सध्यिो ने सकइछ, धनी हेती नौरी तोहार हे। नित दिन आहे अम्मा चरण दबेती, भोरे उटि करती प्रणाम हे। (2) पाकल पान के बिड़िया लगाओल नगर मे पड़ल हकार। आबथु देवलोक बैसथु माड़ब चढ़ि, सब मिलि साजु बरियात हे। कौने बाबा साजल आजनश्बाजन कौने बाबा साजु बरियात हे। कौने बाबी साजल दुलहा दुलरुआ, झलकैत जायत बरियात हे। (3) साँठह आहे आमा सिन्दुरक पुरिया, नगर मे पड़ल हकार हे। साजह आहो बाबा दुलहा दुलरुआ, दूर जायत बरियात हे। जखनहि रामजी कोबर बिच आयल, सरहोजि छेकल दुबारि हे। हमरा के दान दीअ ननदोसिया, तखन कोबर देव पैर हे। मोरा कुल आहे सरहोजि बहिनी ने जनमल, राम लखन दुहु भाइ हे। सेहो भाइ मोर संगहि अयलाह, सरहोजि मांगथि दहेज हे। बरियातीक गीतश्   (1) ऊँची महलिया मालिनि के घर, नीचा लागल फुलवारी हे। ले गे मालिनि सोनाक सूइया, बाबू के गूँथि दे मौरि हे। मौरि लय आयल मालिन, कहलक के देत मौरक दाम हे। घर सँ बाहर भेला फल्लाँ बाबा, हम देब मौरक दाम हे। (2) कौने बाबा सजल घोड़ हाथी कौने बाबा साजु बरियात हे। कौने दुलहा साजथु रहिमल घोड़ा साजि चलल बरियात हे। तिल एक आहे बाबू घोड़ा विलमाव अमा गोर लागि लिय हे। जुरहि जैहह बाबू जुरहि अबिह जुरहि होयत विवाह हे। रहमल घोड़ा सलामति रहतै षुभश्2 होयत विवाह हे। नगहर भरबाक गीतश् भरय चलली सखि सिरहर नव कलष मँगाइ। चानन सिरहर उर लय षुभ सिन्दुर लगाइ। सागर तट जब महुँचल सब नारी। सिर सँ कलष उतारल देल आमक डारी। लोचन प्रीत जुड़ायल सब मिलि मंगल गावे। सब के ई दिन होय विधाता लिखथि भागे। षुभ कार्य मे विदा होयबा कालक गीतश् षुभे ल बहार भेलि बेटीक माय, काहु हाथ नारियल काहू दूबि धान, काहू खोंइछा साँठल पाकल पान भैया हाथ नारियल भौजी दूबि धान। अमा खोंइछा साँठल पाकल पान। आजू मोरा आजू मोरा उचित कल्याण, बीलहह हे तरुणी सिनुर पिठार। बेटीक विआह (कुमारि गीत) (1) कौने बन बोले कारी कोइलिया कौने बन बोले मयूर हे। कौने घर बोले सीता हे दुलारी आब सीता रहति कुमारि हे। आनन्द बन बोले कारी कोइलिया   राजा जनक घर सीता बेटी बोले आब सीता व्याहन जोग हे। जाहक आहो बाबा राज अयोध्या जहाँ बसै दषरथ राज हे। राजा दषरथ के चारि पुत्र छनि राम लखन दुइ वीर हे। गोरहि देखि जनु भुलहि हो बाबा ष्यामहि तिलक चढ़ैब हे। अपन जोग बाबा समधि जोहब नगर जोकर बरिआत हे। सीता जोकर बाबा लायब जमैया देखत जनकपुरक लोक हे। (2) जहि दिन आहे बेटी तोहरो जनम भेल से दिन कहलो ने जाय। चिन्ता निन्द हरित भेल बेटी थीर नहि रहल गेयान। कथी लय आहे सियाक जन्म भेल से भेल व्याहन योग से सुनि बाबा उढ़ला चेहाय चलि भेला ताकयं जमाय। बाँध बनबिहह बाबा पोखरि खुनबिहह लगबिहह आमक गाछ। हँस जुटत आ कमल फुलायत जल मारत हिलकोर। ई सरोवर जैतुक नहि माँगत भैया होयता वेहाल। दरबाजा पर वरियाती ऐला परश् (1) आउ आउ आहे बहिना सखिया हमार हे। रतन पलकिया चढ़ि आयल चारु दुलहा। हाथी घनेरो आबे घोड़ा हजार हे। कतेक वरियाती आबे पाबी न पारे हे। जेहने कुमारि तेहने चारु कुमार हे। तिरहुत के नर नारी देखय मुँह उघारि हे। लग भऽ जाऊ बहिनि लाज बिसारि हे। गाओल सिनेहलता मन के उसारि हे। परिछनक गीत (1) षिव छथि जागल लागल दुआरी हे बहिना, षिव छथि लागल दुआरी।   साजि बरात हेमन्त घर आयल, नगर षोर भेल भारी। श् षिवकृ पुरहित ब्रह्मा चारु मुख लय, वेद ऋष्चा उचारी। दाढ़ी झुलबैत अगुआ नारद, ब्राह्मण वीणा धारी। श् षिवकृ परिछय चलली माय मनाइनि,लय कंचन दुइ थारी। श् षिवकृ पटकि आरती घर के पड़ली, नाग छोड़ल फुफकारी। श् षिवकृ योगन गण मण्डप बीच आयल, भरि गहना पेटारी। तखन ससरि मण्डप दिषि आयल, देखल सब नरश्नारी। श् षिवकृ हरहारा के काड़ा, पहुँची पनिया दरारी। ढ़ोढ़क जोसन सुगबा के मुनरी, मनटीका मनिहारी। ढ़ोरक करेत आ अजगर, अधसर के पटसारी। धामन करधन गेड़ुली गहुमन, नागक नथिया भारी। श् षिवकृ जेहने बर तेहने बरियाती, तेहने गहना सारी। षिव छथि लागल दुआरी, हे बहिना षिव छथि लागल दुआरी। (2) चलु सखि सब देहरि पर साजू डाला पान हे। आनि ठक बक दीप लेसू परिछु सीताराम हे। हरखि चलू बरियात बरियात आयल राज भवन समीप हे। आइ अछि बड़ भाग हे सखि राम दरषन देल हे। (3) सीता करथि बिलाप तन थरश्थर काँप। धनुशा केओ नहि तोरल जनकपुर मे। आब हम रहब कुमारि घर बैसल हिय हारि, बिनु पुरशक नारि जनकपुर मे। घर मे बैसब आब जाय, अपन वयस गमाय। मरब जहरश्बिख खाय, जनकपुर मे। (4) घीरेश्घीरे चलियौ दुलहा अंगना हमार हे। अंगना मे होयत दुलहा विधि व्यवहार हे। सरहोजि दाइ लेती नाक पकरि हे। लग कनी अबियौ दुलहा लाज बिसारि हे। धुनेष के झाँपल मुँह करियौ उधार हे। सिताजी के माय सुनयना आरती उतारु हे।   माइ हे नाक दबाय वरके जाँचू बहिना। दाइ हे योगी छथि कि भोगी से बुझबनि कोना? कपड़ा निकालि बनी देखियनु बहिना। दाइ हे रोगी छथि कि भोगी से बुझवनि कोना? माइ हे हाथ पैर नीक जकाँ जाँचू बहिना। हाथ पैर ठीक छनि कि नहि से बुझवनि कोना? घुमाय फिराय वर के देखियनु बहिना। माइ हे नांगर छथि कि ठीक से वुझबनि कोना? दाइ हे बजाय झुकाय बरके देखियनु बहिना। पण्डित छथि कि मूर्ख से वुझबनि कोना? पाग उतारै कालक गीतश् जे एहि बर के आंगन अनलनि हुनका देवनि गारि हे। धोती पहिरक लूरि ने हिनका पाग खसल जाय हे। देह परहक वस्त्रो जे छनि सेहो अनलनि माँगि हे। ठक बक किछुओ नहि चिन्हथि हिनका देबनि फेरि हे। अक्षरक ज्ञान कनियो ने हिनका नित करथि चरबाहि हे। मूसे कवि इहो पद गेलनि गौड़ीक बड़ दिअमान हे। चतुर घटक इहो वर अनलनि हिनके दियनु वियाहि हे। नाक धरक गीतश् सिर स पाग उतारल काँख दबाओल हे। लय डोपटा गिरमोहार नाक धय आनल हे। दुधहि चरण परवारल निहुरि निहारल हे। हिनको परिछि घर आनल परिछि देखओल हे। ठक बक चीन्हक गीतश् चलूश्चलू दुलहा अंगना हमार यो। अंगना मे होयत दुलहा विधि व्यवहार यो। ठक के कहलनि दुलहा माटिक मुरुत यो। दुलहाक माय केहन छिनारि इहो ने सिखेलखिन हे। हुनकर काकी केहन छिनारि इहो ने सिखेलखिन हे। बेसन के कहलनि दुलहा घाटि यो। दुलहाक पीसी केहन छिनारि इहो ने सिखेलखिन यो। भालरि के कहलनि दुलहा केरा के पात यो। दुलहाक बहिन केहन खेलारि इहो ने सिखेलखिन यो।   मूज के कहलनि दुलहा इ थीक कोर यो। हिनकर पितामही केहन खेलारि इहो ने सिखेलखिन यो। आंगन जायकालक गीतश् चलु घीरे धीरे ललन ललीक अँगना ई अंगना नहि बुझब अवध के दौड़ल चलब मन मानत जेना। चलुकृकृ गमकैत फूल कियारी लागल हीरा पन्ना गमला साजल बेली चमेली गुलाब दोना। चलूकृकृ एहिना फुल रहय मिथिला मे बारहो मास ओ तीसो दिना। चलूकृकृ देखथि दुलहा ठाढ़ अँगना। चलुकृकृ अठोंगर कुटै कालक गीतश् हम धनमा कुटैब एहि बरबा से। घुरि फिरि आयल अवधबा से। की बहिया की नष्पति बालक। बुझबनि उखरि मूसरबा से। घुमि घुमि धान कुटै छथि बालक। विवष भेल बेवहरबा से। चैदह भुवन ई अनका बन्है छथि। आइ बन्हियनु काँच डोरबा से। स्नेहलता ई गाओल अठोंगर। रानी बिलोकति घरबा से। नैनाश् योगिनिक गीतश् पहिल योगिनिया तोहे अपन सासु हे। आब दुलहा भेलहा योगिनिया बसी हे। आलरिश् झालरि कन्ह कारु सिर बेनिया हे। गीत स पहिनक फकड़ा थिकौ बंगालिनि बसी, बंगला सुरपुर स आयल छी सूखल नदिया नाव चलाबे, बिन लेसन के दधि जनमाबे। चुलहिक पुत्ता सारि उपजाबे, कोठी पर जे बड़द नचाबे। कन्या निरीक्षण कालक गीतश् देल आमक पल्लव आमक पल्लव हे। चिन्हू बाबू चिन्हू घनि, अपन चिन्हि जुनि भूलव हे।   चारु ललन चित्त चंचल करे डगमग हिय हे। आहे! आजु असल थिक जाँच नष्पति घर आयल हे। यद्यपि चारु कुमार कुलक पति(पैत) राखल हे। सब सखि देल हकार ललन कहि राखल हे। एहि अवसरक फकड़ाश् काँच बाँस काटि के, बंगला घर छाड़ि के, दहिन लट झाड़ि केवाम छथि कनियाँ दहिन छथि सारि, उठाउ प्रथम वर हष्दय विचारि। जौं नहि चिन्हब अप्पन नारि, हँसती सखी सब थपड़ी पाड़ि। आम महु विवाहक गीतश् उठु उठु कामिनि छोड़ह लाज, द्वार लागल छथि पाहुन समाज। आयल दषरथ साजि बरियात, फुलह फलह सखि नव जल जात। मन जे आँकल गेल तुलाय, सुनतहि सीता गेली फुलाय। गद्गद स्वर बड़ होइछ लाज, आजु देखत मोहि ससुर समाज। धोबिनक सोहागश् धोविनक बेटी झट दहिन सोहाग गे राजा जनकजी के एक गोट बेटी। सिन्दुर पिठार लय मुँगरी पुजबही, लय धो दहिन सोहाग गे। धोबिनकृगुर चााउर लऽ मुँह मे खुअबही कोचा धो दहिन सोहाग गे। धोविनकृकृ सुकुमारि धिया के सोहाग दही ने, खय के देबौ चूड़ा दही। पहिरय के देबौ सायाश्साड़ी जेवर देबौ लटकाय। सुकुमारीकृकृ देबौ मे देबौ गाय महिसबा, जोड़ा बड़द देबौ हकाय। सुकुमारी.कृ बेदी घुमय कालक गीतश् (1) गरदनि बान्हल चदरिया आगूश्आगू सिया माई। करथिन मण्डप परिकर्मा हे दुलहा और भाई।   बसहा जकाँ सभ घुमथिन हे न चलय प्रभुताई। गाबथि मंगल गाइनि हे सब मंगल छाई। हँसी अली मुसकाथि छनहि देथि पीहकारी। से सुनि हँसि कऽ जमाय हे देल परिक्रमा सारी। (2) नहु नहु दुलहा चलै छथि कोना। जेना कल्हुआ के बरदा घुमै जेना। बड़द के उपमा हुनका देलियनि कोना। माई हे चैरासीक फन्दा मे पड़लनि जेना। डेग नमहर कऽ दुलहा चलै छथि कोना। माई हे खुट्टा स बड़दा खुजै जेना। बरदाक उपमा हुनका देलियनि कोना। माई गे चैड़ासीक फन्दा मे पड़लनि जेना। अंगना मे ठाढ़ दुलहा लगै छथि कोना। जेना अंगना मे मेह गाड़ल हो जेना। मेहक उपमा हुनका देलियनि कोना। जेना चोरासीक फन्दा मे पड़ला जेना। कहथि सिनेहलता चलब कोना। माई गे आंगुरक इसारा देब जेनाश्जेना। कन्यादान कालक गीतश् कोनहि कुल मे सीता जनम लेल, कौनहि कुल श्रीराम हे। कौनहि आगे माइ वेद उचारल कौनहि कैल कन्यादान हे। राजा जनक घर सीता जनम लेल दषरथ घर श्रीराम हे। नारद ब्राह्मण वेद उचारल जनक कयल कन्यादान हे। राजा जनक देल हीरा मोती सोनमा आओर देलनि धेनु गाय हे। रानी सुनयना देल सीता सन बेटी राम लेल अंगुरी लगाय हे। कहमा छुटल सुपति मौनियाँ कहमा जनक ऋष्शि बाप हे। कहमा छुटल माय सुनैना जिनका झहरनि नोर हे। अंगनहि छुटल सुपति मौनियाँ दुआरे जनक ऋष्शि बाप हे। मंदिर छुटल माय सुनैना जनिका नैन नोर हे। सिनुरदान गीतश् पाहुन सिन्दुर लिय हाथ, सर सुपारीक साथ। सिता उधारल माथ सिन्दुर लिय अय। सुन्दर बितै अछि लगन, अहाँ धनुश कयल भगन। सब आनन्द मगन, आषिश दिय अय। रघुबर सिर षोभनि मौर, सीता नित पूजथि गौर। आइ पूरल मनोरथ नरपति होय लय।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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