Saturday, September 12, 2009

पेटार ३०

जगदीश प्रसाद म‍ंडल

78.भेंटकलावा पछिला बाढ़ि। मोन पड़ितहि देह भुटुकि जाइत अछि। रोंइयाँ-रोंइयाँ ठाढ़ भ’ जाइत अछि। बाइढ़िक विकराल दृश्य आँखिक आगू नचै लगैत अछि। घोड़ो स’ तेज गति स’ पानि दौड़ैत। बाढ़ियो छोटकी नहि, जुअनकी नहि, बुढ़िया। बुढ़िया रुप बना ताण्डव नृत्य करैत। ककरा कहू बड़की धार आ ककरा कहू छोटकी, सभ अपन-अपन चिन्ह-पहचिन्ह मेटा समुद्र जेँका बनि गेल। जिम्हर देखू तिम्हर पाँक घोड़ाएल पानि, निछोहे दछिन मुहँे दौड़ल जाइत। कतेक गाम, घर पजेबाक नहि रहने, घर बिहीन भ’ गेल। इनार, पोखरि, बोरिंग चापाकल पानिक तर मे डुबकुनिया कटै लगल। ऐहन भयंकर दृश्य देखि, लोक केँ डरे छने-छन पियास लगलो पर, पीबैक पानि नहि भेटैत। जीवन-मरण आगू मे ठाढ़ भ’ झिक्कम-झिक्का करैत बूझाय। घर गिरल, घरक कोठी गिरल, कोठीक अन्न भसल। जेहने दुरगति घरक तेहने गाइयो-महीसि, गाछो-बिरीछ आ खेतो-पथारक। घरक नूआ-बिस्तर, आनो-आन समानक मोटरी बान्हि माथ पर ल’, अपनो डाँड़मे दू भत्ता खरौआ डोरी बान्हि आ बेटोक डाँड़ मे बान्हि, आगू-आगू मुसना आ पाछू-पाछू घरवाली जीवछी बेटी दुखनी क’ कोरामे ल’ कन्हा लगौने पोखरिक ऊँचका महार दिशि चलल। एखन धरि ओ मोहार बोन-झाड़ आ पर-पैखानाक जगह छल। जहि मे साप-कीड़ा बसेरा बनौने, बाढ़ि ओकरा घरारी बना देलक। जहिना इजोत मे छाँह लोकक संग नहि छोड़ैत तहिना बरखा बाढ़िक संग छोड़ै ले तैयार नहि। निच्चा पानिक तेज गति आ उपर स बरखाक नमहर बुन्न। मोहार पर मुसना क’ पहुँचै स पहिने बीस-पच्चीस गोटे अप्पन-अप्पन धिया-पूता, चीज-बस्तु आ माल-जालक संग पहुँच चुकल छल। मोहार पर पहुँच मुसना रहैक जगह हियाबै लगल। शौच करैक ढ़लान लग खाली जगह देखि, मुसना मोटरी रखलक। मोटरी रखि बिसनाइरिक डाढ़ि तोड़ि खर्ड़ा बनौलक। ओहि खर्ड़ा स खरड़ै लागल। एक बेर खरड़ि क’ देखलक त’ मन मे पड़पन नइ भेलइ। फेर दोहरा क’ खरड़ि चिक्कन बनौलक। चिक्कन जगह देखि दुनू बेकतीक मन मे चैन भेलइ। मोटरी खोलि मुसना एकटा बोरा निकालि चारि टा बत्तीक खूँटा गाड़ि, खरौआ जौर स’ चारु खूँट बान्हि, बत्तीमे बान्हि क’ घर बनौलक। दोसर बोरा निच्चा मे बिछा धियो -पूतो क’ बैसौलक आ मोटरियोक सामान रखलक। चिन्ता स’ दुनू परानीक मुह सुखैल रहै। एक दिशि दुनू बच्चा के मुसना देखए आ दोसर दिशि गनगनाइत बाढ़ि। माथ पर दुनू हाथ द’ जीवछी मने-मन कोसी-कमला महरानी क’ गरिऐबो करै आ जान बँचबै ले निहोरो करै। दुनू बच्चो, कखनो क’ बाढ़ि देखि हँसैत त कखनो जाड़े कनैत। बाढ़िक वेग मे एकटा घर भसैत अबैत देखि मुसना बाँसक टोन आ कुड़हरि ल’ दौड़ल। पानि मे पैसि हियाबें लगल जे कोन सोझे घर आओत। ठेकना क’ हाँइ-हाँइ पाँचटा खूटा ठोकलक। आस्ते-आस्ते घर आबि कऽ खूटामे अड़कल, खूटा मे अड़ल घर देखि घरवालीक’ सोर पाड़ि कहलक- ‘‘हाँसू नेने आउ। घरक समचा सब उघि- उघि ल जाउ।’’ घरक उपर मे एकटा कूकूर सेहो भसैत आयल। ओ लोकक सुन-गुन पाबि कुदि क’ महार पर चलि गेल। ठाठक बत्ती मे जहाँ मुसना हाँसू लगौलक कि एकटा साप लप द’ हाथे मे हबक मारि देलकै। घरक भार थाल मे गरल खूटा नहि सम्हरि सकल। पाँचो खूँटा पानि मे गिर पड़लै। घर भसि गेलै। खूब जोर स मुसना कनबो करैत आ हल्लो करैत जे, हौ लोक सभ दौड़ै जाइ जा हौ, हमरा साँप काटि लेलक। मुसना क कानब सुनि घरवाली सेहो बपहारि कटै लागलि। बपहारि कटैत घरवालीके मुसना कहलक- ‘‘हे, गए दुखनी माय नाग डसि लेलकौ। छाती लग बीख आबि गेल। कनिये बाकी अछि कंठ छुबै ले। घिया-पुताके सोर पाड़ि कनी मुह देखा दे। आब नै बँचवौ।’’ जीबछी हल्लो करै आ घरबलाक बाँहि पकड़ि उपरो करै लागलि। महारक किनछरि मे पहुँच जहाँ उपर हुअए लगल कि दुनू गोटे पीछड़ि क’ तरे- उपरे निच्चा मे खसल। दुनू परानी भीजल रहबे करए आरो नहा गेल। मुदा तइयो ओरिया-ओरिया क’ उपर भेल। महार पर आबि जीबछी चूनक कोही स’ चून निकालि दाढ़ मे लगौलक। सापक बीख झाड़निहार गाम मे एकोटा नहि। मुदा रौदिया एहि बेरि दसमी मे चनौरा गहबर मे चाटीं सीखने छल। सब कियो रौदियाक खोज करै लगल। ओ (रौदिया) माछ मारै ले, सहत ल क’ बाध दिशि गेल छल। एक गोरे ओकरा बजा अनलक। अबिते रौदिया सहत कात मे रखि हाथ-पाएर धोय मुसना लग आबि बाजल- ‘‘हौ भाइ, हमर चाटी सिद्ध नहि भेलि अछि किऐक त हम एखन धरि गंगा स्नान नइ केलहुँ हेँ। मुदा तइयो बिसहाराके सुमरि देखै छियै।’’ मुसनाके आगूमे बैसा रौदिया हाथे स’ जगहके झाड़ि चाटी रखलक। सब रौदिया दिशि देखैत। मुदा चाटी चलबे ने कयल। बाढ़िक दुआरे आन गाम स’ झाड़निहार आ चट्टिवाहके बजाएब महाग मोसकिल रहै। सभ निराश भ गेल। छाती पीटि-पीटि जीबछी कनबो करै आ देवी-देवताके कबुलो करै। मुदा ढ़ोढ़ साप कटने रहए तेँ बीख लगबेने केलइ। गोसाइ लुक-झुक करै लगल। गामक ढ़ेरबा, बूढ़ि आ जुआन स्त्रीगण, चंगेरीयो आ चंगेरो मे, काँच माटिक दिआरी ल’, पोखरिक घाट लग जमा भ’ कमला महरानीक साँझ द’, गीति गबै लागलि। बच्चा सभ जय-जयकार करैत। तहि बीच लुखिया, कमला महरानीके, पाठी कबुला केलक। सुबधी एक सेर मधुर। दोसरि साँझ धरि गीति-गाबि सब घुरि क’ आंगन आयलि। एक्क रफ्तारमे बाढ़ि पाँच दिन रहल। मुदा पौह-फटितहि छठम दिन पानि कमै लागल। बाढ़िक पानि, जहिना हू-हू-आ क’ अबैए तहिना जाइए। बेर झुकैत-झुकैत घर-अंगनाक पानि निकलि गेलइ। मुदा थाल- खिचार रहबे करै। सातम दिन स’ लोक घर ठाढ़ करै लगल। बाढ़ि सटकितहि लोक परदेश दिशि पड़ाय लगल। गाम मे ने एक्कोटा धानक गब बँचल आ ने खेत रोपै ले बीरार। नारक टाल सब कत’ भसि क’ गेल तेकर ठेकान नहि। गहुमक भूस्सी भूसकाँरेमे सड़ि-सड़ि गोबर बनि गेल। मनुक्ख स’ बेसी दिक्कत माल-जालकेँ भ’ गेलै। आमक पात, बाॅसक पात आन-आन गाछ सबहक पात काटि-काटि माल-जालके खुआबै लगल। आन-आन गाम स’ नार, भूस्सी कीनि-कीनि अनै लागल। मुदा माल-जाल तइयो अन-धुन मुइलै। जे बँचल रहै, ओहो सुखा क’ संठी जेँका भ गेलै। तइ पर स रंग-बिरंगक बीमारी सब सेहो आबि गेलै। ककरो खुरहा त ककरो पेटझड़्ड़ी। किछु गोटे अपन सभ मालके कुटुमैती सभ मे द’ आयल। चारिक अमल। भाँग (पीसुआ) पीबि श्रीकान्त मैदान दिशि स’ आबि, दलान पर बैसि चाह पीवति रहथि। सोग स’ अधमरु जेँका भ’ मने-मन सोचथि जे महाजनी त’ चलिये गेल जे अपनो साल भरि की खायब? अगते धान सबाइ लगा देलहुँ। बड़ पैध गलती भेल जे एक्को बखारी पछुआ क’ नहि रखलौं। मुदा एक बखारी रखनहि की होइत। के ककरा मदति करत। ठीके कहब छै जे सबकेँ अपना भरोसे जीवाक चाही। भने दुआर परक बखारीक धान सठि गेल। कियो दरवज्जा पर आअेात त’ देखा देबइ। मुदा अपनो त’ जरुरत अछि, से कत’ स आनब। ल’ द’ क’ घरक कोठी मे चाउर अछि; ओतबे अछि। एक्को धुर धान नइ बँचल अछि जे अगहनोक आशा होइत। आब अबाद कएल नै हैत। आगू रब्बीयेक आशा। जे सब दिन कीनि-बेसाहि क’ खाइत अछि ओकरा त’ कोनो नै, मुदा हमरा लोक की कहत? चाह पीविते-पीबिते श्रीकान्तके चैन्ह अबै लगलनि। मन पड़लनि जे बाबा कहने रहथि जे दरवज्जा पर जँ क्यो दू-सेर वा दू-टका मंगै ले आबए त ओकरा ओहिना नहि घुमबिहक। ओहि स’ लछमी पड़ाइ छथि। जीबछीके अबैत देखि श्रीकान्त सोर पाड़लथिन। सालो भरि जीबछी हुनके कुटाउन क’ गुजर करैत छलि। चाउर-चूड़ा कुटै मे जीबछी गाम मे सभसँ बेसी लुड़िगर। श्रीकान्त लग आबि जीबछी हँसैत कहलकनि- ‘‘एत्ते किअए सोगाइल छथि कक्का, हिनका एत्ते छनि तखन एते दुख होइ छनि, हमरा त किछु ने अछि, तेँ कि मरि जायब।’’ जीबछीक बात सुनि भखरल स्वर मे श्रीकान्त कहलथिन- ‘‘जहिना सभ किछु वाढ़ि मे दहा गेल तहिना जँ अपनो सभ तुर भसि जइतहुँ, से नीक होइत। जाबे परान छुटैत, ततबे काल ने दुख होइत। आगू त दुख नहि काटै पड़ैत।’’ मुस्की दइत जीबछी बाजलि- ‘‘एक्केटा बाढ़िमे एत्ते चिन्ता करै छथि काका, कनी नीक की कनी अधलाह दिन त’ बीतवे करतनि।’’ चीलम पीबैत मुसना ओसार पर बैसल। कसि क’ दम खींचि मुसना मने-मन सोचए लगल, जे दू मास, अगहन-पूस, मुसहनि खुनि-खुनि गुजर करै छलहुँ। दस सेर जम्मो भ’ जाइ छल आ गुजरो क’ लइत छलहुँ। ओहो चलि गेल। ने एक्को गब कतौ धान बँचल आ ने गाममे एकोटा मूस। दोसर दम खींचि धूँआके धोटतहि मनमे अयलै जे मूसक तीमन आ धुसरी चाउरक भात जँ जाड़क मास भेटए त’ एहि स’ नीक दोसर की हैत। ऐहेन खेनाइ त’ रजो-महरजो केँ सिहिन्ते लागल रहत। ओ-हो-हो, भगवान गरीबेक सुख छीनि लेलनि। मुसनाक पहिलुका नाम मकशूदन छल। मुदा मूस आ मुसहनि स’ बेसी सिनेह रहने लोक ओकरा मुसना कहै लगल। जीबछी, आंगनक चुल्हि पर रोटी पकबैत। इनार पर हाथ-पैर धोय मुसना लोटामे पानि नेने आंगन आबि जलखै करै ले बैसल। टीनही छिपलीमे रोटी-नून नेने जवछी घरवालाक आगूमे देलक। अंगना मे दुखबाके नहि देखि मुसना जोर स शोर पाड़लक। पिताक अवाज सुनितहि दुखबा दौड़ल आबि धुराइले हाथे-पाएरे खाइ ले बैसि रहल। दुनू बापूत खाइ लगल। चुल्हिये लग स’ मुस्की दइत जीबछी बाजलि- ‘‘ककरो किछु होउ, जकरा लूरि रहतै ओ जीवे करत। ऐठाम त’ देखै छियै जे एक्के दहार मे किदनि बहारक खिस्सा अछि। सब हाकरोस करै अए।’’ मुहक रोटी मुसना हाँइ-हाँइ चीबा, जीवछी दिशि देखि क’ बाजल- ‘‘तते ने माछ भसि-भसि आयल अछि जे खत्ता-खुत्ती मे सह-सह करैए। कने पानि त’ कम होउ। जखने पानि कमि क’ उपछै जोकर भेलि कि मछबारि शुरु क’ देब। खेबो करब आ बेचवो करब। ‘सदिखन दू पाइ हाथेमे रहत।’’ अपन नहिराक बात मन पड़ितहि, जीवछी कहै लागलि- ‘‘हमरा नैहर मे पूब स’ कोशी आ पछिम स’ गंडकक बाढ़ि सभ साल अबैत छल। एहि बीचक जे धार अछि ओकर पानि त’ घुमैत-फिरैत रहिते छल। सगरे गाम साउने स’ जलोदीप भ’ जाइ छल। टापू जेँका, एकटा परती टा सुखल रहैत छल। ओहि पर सौँसे गामक लोक खेत सभ जगै लगैत छलै। तकर बाद लोक खेती करैत छलै। गहीरका खेत आ खाधि-खुधिमे भेंटक गाछ, सोहरी लागल जनमै छल। अगहन बीतैत-बीतैत ओ तोड़ैवला हुअए लगैत छल। हम सभ ओहि भेंटके तोड़ि-तोड़ि आनी ओकरे दाना निकालि, सुखाके लावा भुजी। तते लावा हुअए जे अपनो खाइ आ बेचवो करी। काल्हि गिरहत कक्का ओहिठाम जायब आ कहबनि जे चैरी मे मनसम्फे भेंटि जनमल अछि, ओ हमरा द’ दिअ।’’ एखन धरि दुनू परानी मुसना चाउर आ चूड़ाक कुट्टी करैत छल। सेहो ढ़ेकी मे। किऐक त’ गाममे एक्कोटा छोटको मशीन धनकुटियाक नहि छल। अधिकतर परिवार अपन-अपन ढेकी-उखड़ि रखैत छल। मुसना सेहो कुट्टीक दुआरे अपन ढे़की-उखड़ि रखने अछि। नीक चाउर बनबैमे जीवछीक लोहा सब मानैए। एहि बेरि त’ धनकुट्टी चलत नहि। मुदा बाढ़िमे आन गाम स’ तते भेंट दहा क’ चैरी मे आयल जे सापरपिट्टा गाछ सौँसे चैरीमे जनमि गेल अछि। तेँ जीवछी मने-मन चपचपाइत। दोसरके भेंटिक भाँज बुझले नहि छलै। सभ दिन नहाइ बेरिमे जीवछी चैरी जा भेंटि देखि-देखि अबैत छलि। चैड़गर-चैड़गर पात सौँसे चैरीके छेकने। गोटि-पंग्रा फूल हुअए लगलै। फूल देखि जीवछीक मन मे होइ जे एत्तेटा फुलवारी इन्द्रो भगवानके, हेतनि की नहि। पाँचे दिन मे सौँसे चैरी फूल फूला गेल। अगता फूलक पत्ती झड़ि-झड़ि खसै लागल फूलमे नुकाइल फड़ निकल’ लागल। गोल-गोल, हरियर-हरियर। फड़ देखि जीवछी आमदनी बुझि, चैरी कात मे बैसि, नव-नव योजना मने-मन बनबै लागलि। अइ बेर एकटा खूब निम्मन महिस कीनब। जँ महीसि जोकर आमदनी नै हैत त’ दू टा गाये कीनि लेब। अप्पन त’ सम्पति भ’ जायत। ओकरे खूब चराएब-बझाएव। ओही स’ त’ चारु परानीक गुजर चलत। जिनगी भरि त’ कुटौने करैत रहलहुँ मुदा अहि बेरि कमलो महरानी आ कोशियो महरानी दुख हेरि लेलथि। मने-मन जीवछी दुनूके गोड़ लगलकनि। अपन धन हैत तइ पर स’ मेहनत करब त’ कोन दरिदराहा दुख आबि क’ हम्मर सुख छीनि लेत? मजगूत घर बान्हब, बेटा-वेटीक बिआह करब। नाति-पोता हैत, बाबा-दादी बनि क’ जते दिन जीवि, ओ कि देवलोक स’ कम भेलै। अही ले ने सब हेरान अछि। कयला स सभ किछु होइ छै, बरसाती घर बना कऽ रहैत छल। कातिक अबैत-अबैत 3बिनु केने पतरो फुसि। घनगर गाछ देखि जीवछीक मनमे अयलै जे बीच-बीचमे सँ जँ गाछ उखारि देबै त’ सौरखियो, करहर भ’ जायत आ छेहर गाछ रहने फड़ो नमहर हैत। जइ स दानो नीक हैत। एखने स’ आमदनी शुरु भ’ जायत। उत्साहित भ’ जीवछी कमठौन शुरु केलक। मुदा करहर उखारैमे तते डाँड़ दुखाइ जे हूबा कमि गेलै। कमठौन छोड़ि देलक। देखते-देखते फड़ मे लाली पकड़ै लगलै। अगता फूल अगता फड़ भेल। नमहर-नमहर, पोछल-पोछल, गोल-गोल, पुष्ट। रंगल फड़ देखि जीवछी बुझि गेल जे आब ई तोड़ैवला भ’ गेल। दोसर दिन स’ फड़ तोड़ैक विचार जीवछी मने-मन क’ लेलक। दोसर दिन, भोरे जीवछी रोटी पका, दुनू बच्चो आ अपनो दुनू परानी खा, प्लास्टिकक बोरा ल’ फड़ तोड़ै ले विदा हुअय लगल कि धक द’ मन पड़लै जे बोरा मे त’ फड़ राखब, मुदा पानि मे तोड़ि-तोड़ि कत्त’ राखब। फड़ तोड़ै ले त’ झोराक जरुरत हैत। झोरा त’ अपना अछि नहि! आब की करब? लगले जीवछी पुरना साड़ी के फाँड़ि दू टा झोरा सीलक। झोरा सीबि, बोरो आ झोरोके चैपेत एकटा झोरामे राखि, दुनू बच्चो आ दुनू गोटे अपनो चैर दिशि विदा भेलि। फड़क रुप-रंग स जीवछीक मन गद-गद। मुदा अनभुआर काज बुझि मुसना तर्क-वितर्क करैत। चैरक कात पहुँच, उपरका खेत, जे सुखैल छल, मे दुनू बच्चो, बोरो आ रोटी-पानिके रखि, दुनू परानी भेंट तोडै़ ले पानि मे पैसल। पानि मे पैसितहि, जीवछीक नजरि भेंटक फड़क उपरे-उपर नाचय लगल। जहिना ककरो रुपैआक थैली भेटला स’ खुशी होइ छै तहिना जीवछीक मन मे भेलै। एक टक स’ देखि जीवछी दुनू हाथे हाँइ-हाँइ फड़ तौड़ै लागलि। खिच्चा फड़ देखि जीवछी पतिके कहलक- ‘‘जुऐलके फड़ टा तोड़ब। अजोहा एखन छोड़ि दिऔ। पछाति तोड़ब।’’ झोरा भरिते जीबछी उपर आबि-आबि बोरा मे रखैत। मुसनो सैह करैत। दुनू बोरा भरि गेल। उपर आबि जीवछी पतिके कहलक- ‘‘कनी काल सुसता लिअ। पानि मे निहुड़ल-निहुड़ल डाँड़ो दुखा गेल हैत। अहाँ एतइ रहू, हम एक बेरि अंगना स’ रखने अबै छी।’’ कहि जीबछी एकटा बोरा उठा आंगन विदा भेलि। एक त’ पानिक भीजल दोसर ओजनगर बस्तु। मुदा जीबछी भारी बुझबे ने करए। किऐक त सम्पत्तिक मोटरी रहै किने। दिशि रमकल विदा भेलि। चैर पहुँच पतिके कहलक- ‘‘हम बोरा लइ छी, अहाँ दुनू बच्चो आ डोलो क’ सम्हारने चलू।’’ आगू-आगू मुसना बेटीके कोरा मे, दोसर हाथमे डोल आ बेटा के ल’ चलल। पाछू-पाछू जीवछी माथ पर बोरा लेने। थोड़े दूर बढ़ला पर जीवछी पतिके कहलक- ‘‘भगवान दुख हेरि लेलनि।’’ मुदा, स्त्रीक बात सुनि मुसनाके ओ खुशी नइ अयलै जे जीवछीके रहै। आंगन आबि जीबछी पहिलुके बोरा लग दोसरो बोरा रखि भानसक ओरियान करै लागलि। चारिम दिन, पहिलुके खेप भेंट तोड़ै काल मुसना के एकटा ठेंगी बाँहि मे पकड़ि लेलकै। जे ओ देखबे ने केलक। मुदा जखन ठेंगी भरि पोख खून पीबि भरिया गेलै, तखन मुसनाक नजरि पड़लै। ठेंगी क’ देखितहि ओकर परान उड़ि गेलइ। थर-थर कपै लगल। खूब जोर स’ घरवालीके कहलक- ‘‘बाप रे बाप! देहक सबटा खून ठेंगी पीबि लेलक। कोन पाप लागल जे अइ मौगियाक भाँज मे पड़लौ। एक त’ बाढ़िक मारल छी जे भरि पोख अन्न नै होइए। सुखा क’ संठी भेल छी। तइ पर जेहो खून देह मे छलै सेहो ठेंगिये पीबि गेल। झब दे आउ, ने-ते हम पानिये मे खसि पड़ब।’’ मुसनाक बातके अनठबैत जीवछी हाँइ-हाँइ फड़ो तोड़ैत आ मने-मन बजबो करैत- ‘‘जना नाग डसि नेने होइ, तहिना अड़ड़ाइ अए। भभटपन ने देखू। एहने-एहने पुरुख बुते परिवार चलत?’’ दुन झोरा भरिते जीवछी मुसना लग आबि हाथे स’ ठेंगी पकड़ि एकटा चिचोर मे बान्हि देलक। मुदा जइ ठाम ठेंगी पकड़ने रहै तइ ठाम स’ छड़-छड़ खून बहैत। अपन दहिना औंठा स’ जीवछी दाबि देलक। कनिये कालक बाद खून बन्न भ’ गेलइ। जीबछी फेरि फड़ तोड़ै पानिमे पैसल। कने काल तोड़ि जीवछी कहलक- ‘‘आउ ने, आब किछु ने हैत।’’ जीबछीक बात सुनि मुसना आँखि गुड़रि क’ बाजल- ‘‘ई मौगिया जान मारै पर लागल अछि। जे कहुना मरि जाय। हमरा की, दुनिया मे सँयक कमी छै? दोसर क’ लेब। मुदा (दुनू बच्चा दिशि देखैत) अइ टेल्हुक सभ क’ की हेतइ? बिलटि क’ मरत की नहि?’’ पति दिशि देखि पत्नी मुस्की दैत बाजलि- ‘‘नइ तोड़ब त’ नइ तोरु। ओतइ बैसि बच्चा आंगन आबि ओसार पर बोरा रखि पुनः जीवछी चैर 4सभके खेलाउ।’’ दुनू बोरा भरि जीवछी आंगन अनलक। सबकेँ सम्हारने मुसना सेहो आयल। आंगन आबि जीबछी चुल्हि पजारि, भानस क’ दुनू बच्चो आ अपनो दुनू परानी खेलक। खा क’ जीवछी हाँसू ल’ भेंटक फड़ चीरि-चीरि दाना निकालै लागलि। लाल-लाल, गोल-गोल। मुसना सेहो दाना निकालै लगल। दुनू बच्चा दुनू भाग बैसि दू टा फड़के गुड़कबैत। दाना क’ एकटा चटकुन्नी पर थोपि-थेापि रखैत जाय। मुदा कनिये काल बाद मुसनाके चीलम पीबैक मन भेलइ। ओ उठि क’ चुल्हि लग जा आगियो तपै लगल आ चीलमो पीबए लगल। दानाक ढ़ेरी देखि जीवछी गर अँटवै लागलि जे एत्ते कत्त’ के राखब। गुनधुन करैत। एकाएक नैहरक बात मन पड़लै। मन पड़िते मुह स हँसी फुटलै। जीवछी क’ हँसैत देखि मुसना अह्लादित भ’ कहलक- ‘‘आँइ गै(ऐँ गे), कोन सोनाक तमधैल तोरा भेटि गेलउ हेँ, जे ऐना खिखिआइ छेँ।’’ मुदा पाशा बदलैत जीवछी बाजलि- ‘‘एखैन ते अन्हार भ गेलइ, काल्हि भोरे एकटा खाधि, टाटक कात अंगने मे खुनि देबइ।’’ भोरे मुसना ढ़क (ठेक) जेँका गोल-मोल खाधि खुनलक। जीबछी दू-लेब क’ क’ लेबि, सुखौलक। ओहि मे भेंटक दाना सुखा-सुखा रखैत गेल। उपर स’ टाटक झँपना बना मुसना द’ देलक। मास दिनक मेहनत स’ जीवछीक आंगन भेंटक दाना स भरि गेल। अनभुआर चीज, तेँ चोरी-चपाटीक डरे नहि। भरल आंगन देखि जीवछीक मनमे समुद्रक लहरि जेँका खुशी हिलकोर मारै लगलै। कनडेरिये आखिये मुसना दिशि देखि जीवछी मुस्किया देलक। घरवालीक मुस्की देखि मुसना खिसिया क’ बाजल- ‘हमरा देख-देखि तोरा हँसी लगै छौ। हँसि ले जते हँसमे से हँसी ले। जाबे जीबै छियौ ताबे। भगवान केलखुन आ मरलियौ तखैन तोहर हँसी नगरक लोक देखितौ।’’ मुदा जीवछीक लेल धैन-सन। किऐक त खुशी स’ मन एते भरल रहै जे घरवलाक बात ओहिमे पैसिबे ने केलइ। मने-मन जीवछी लावा भुजैक विचार करै लागली। लावा भुजै ले एकटा नम्हर खापड़ि चाही। वाउल रखै ले एकटा कोहा चाही। लारनि त अपनो खरही स’ बना लेब। बाउलो नदी कात स’ ल’ आनब। जखन कुम्हनि ओहिठाम जायब त’ कचकुह ताकि क’ एकटा नमहर तौला ल’ लेब। ओकरे खापड़ि बना लेब। वाउलधिपबै ले मझोलको काज सेहो पड़त। किऐक त वाउल जे देवइ से त’ हाथ स’ नइ हैत। ओइ मे एकटा बत्तीक डाँट लगवै पड़त। लगा लेब। मुसनाके कहलक- ‘‘लाबा भुजै ले जारनक ओरियान करै पड़त।’’ लावा नाम सुनि मुसनाक मनमे खुशी भेल। मुस्कुराइत उत्तर देलक- ‘‘एखन टेंगारी सुढ़िया लइ छी। बेरु पहर गिरहत कक्काक गाछी स’ बाँझियो आ सुखल ठौहरियो सब आनि देब।’’ भरि दिन मे दुनू परानी जीवछी सब कथूक ओरियान क’ लेलक। लावा भुजब जीबछी शुरु केलक। दू चुल्हिया चुल्हि। एक मँुह मे खापड़ि, दोसर मे कोहा। खापड़ि मे भाटिक दाना भुजैत आ कोहा मे वाउल धिपैत। पहिल घानी भुजि जीवछी एक चुटकी चुल्हिमे द’ दोसर घानी भुजब शुरु केलक। दोसर घानीक लावा देखि जीवछीक मन तर-उपर करै लागलि। पहिलुका घानीक लावा चंगेरी मे ल’ दुनू बच्चो आ घरोवलाक आगू मे देलक। आगू मे लावा देखि मुसना मने-मन सोचै लगल जे ई मौगिया बड़ लुरिगर अछि। एहन स्त्री भगवान सभकेँ देथुन। कहू जे एखैन तक हम जे बुझितो ने छेलौ से आइ खाइ छी। धिया-पुताके पोसब कोन बड़का भारी बात छियै जे समाजो ले लोक बहुत किछु क’ सकैत अछि। लावाक गमक पूरबा हवा मे मिलि गामके सुगंधित क’ देलक। सुगंध पाबि टोलोक आ गामोक स्त्रीगण सब लावा कीनैक लेल एक्के-दुइये जीवछी क आंगन अवै लागलि। मुदा एक्के टा जबाव जीवछी सबकेँ दइत- ‘पहिने गिरहत कक्का क’ खुऐबनि, तखन ककरो देब। भरि दुपहर जीवछी लाबा भुजलक। दू छिट्टा। दुनू छिट्टा लावा घर मे रखि ओहि मे से एक मुजेला ल’ साड़ी सँ झाँपि जीवछी मुसनाके कहलक- ‘‘हम गिरहत कक्का ओहिठाम जाइ छी। अहाँ अंगने मे रहब।’’ कहि जीवछी माथ पर मुजेला लेने श्रीकान्त ऐठाम विदा भेल। जीवछीक माथ पर मुजेला श्रीकान्त गौर स’ देखि मुस्कुराइत कहलथिन- ‘‘बड़ खुशी देखै छी लछमी महरानी। मुजेला मे की चोरा क’ अनलहुँ हेँ। कने हमरो देखए दिअ?’’ अनसुनी करैत जीवछी मुस्की दइत आंगन जा गिरहतनीक आगू मे मुजेला रखि कहलकनि- ‘‘काकी, थोड़े क’ लाइ बना लिहथि। अखन थोड़े नोन-मरीच-तेल मिला क’ कोहा स’ काज चलि जायत। एकटा सरबाक देथु। जे कक्काके द’ अबै छियनि।’’ छिपलीमे लावा नेने जीवछी दरवज्जा पर जा श्रीकान्तक आगू मे देलकनि। ओ छिपलीमे उज्जर-उज्जर रमदानाक लावा जेँका, लावाके निहारि-निहारि देखए लगलाह। जीवछी कहलकनि- ‘‘काका, की निग्हारै छथिन, पहिने एक मुट्ठी मँुह मे द’ क’ देखथुन ने। भेंटक लावा छियै।’’ एक मुट्ठी उठा श्रीकान्त मुँहमे देलखिन। लावाक कोमलता आ सुआद वुझि श्रीकान्त पत्नीके सोर पाड़ि कहलथिन- ‘‘एते सुन्नर वस्तुके एखन धरि जनितहुँ नहि छलहुँ। धन्य अछि जीबछीक ज्ञान आ लूरि जे ऐहेन सुन्नर हराएल बस्तुके उपर केलक। साक्षात् देवी छी जीवछी। जाउ, सन्दुक मे से एक जोड़ साड़ी आ आंगी निकालने आउ। जीवछीके अपना ऐठाम स’ पहिरा क’ विदा करब। गरीब-दुखियाक देवी छी जीवछी।’’ सभ दिन जीवछी लावा भुजैत छलि आ अंगने सँ लोक सब कीनि-कीनि ल’ जाइत। पनरह दिनक जमा कएल रुपैयो आ फुटकुरियो जीवछी मुसनाके गनै ले आगू मे देलक। पाइ देखि मुसनाक मन उड़ि गेल। मँुह स’ ठहाका निकलल। एक टक सँ मुसना जीवछी दिशि देखि, कैँचा गनै लगल। 79.भैयारी मैट्रिक परीक्षा दऽ दीनानाथ आगू पढ़ैक आशा स, संगियो-साथी आ शिक्षको ऐठाम जा-जा विचार-विमर्श करैत। बिनु पढ़ल-लिखल परिवारक रहने, कॅालेजक पढ़ाइक तौर-तरीका नहि बुझैत। ओना ओ हाई स्कूल मे थर्ड करैत, मुदा क्लास मे सबसँ नीक विद्यार्थी। सब विषयक नीक जेँका परीक्षा मे लिखने, तेँ फेल करैक चिन्ता मन मे एक्को मिसिया रहबे ने करए। मूर्ख रहितो माए-बाप बेटा कऽ पढ़बै मे जी-जान अरोपने। ओना घरक दशा नीक नहि, मुदा पढ़बैक लीलसा दुनूक हृदय मे कूट-कूट कऽ भरल। जखन दीनानाथ परीक्षा दिअए दरभंगा सेन्टर (मैट्रिक परीक्षाक सेन्टर) जाइक तैयारी करै लगल, तखन माए अपन नाकक छक, जे छअ पाइ भरि (डेढ़ आना) रहए, बेचि कऽ देलकै। अगर जँ माए-बापक मन बेटा-बेटीक पढ़वैक रहत आ थोड़बो मेहनत स ओ पढ़त त लाख समस्योक बावजूद ओ पढ़बे करत। तेहि मे स एक दीनानाथो। काल्हि एगारह बजिया गाड़ी से परीक्षा दिअए जायत तेँ आइये साँझ मे रामखेलावन (पिता) पत्नी (सुमित्रा) कऽ कहलक- ‘काल्हि एगारह बजे बौआ गाड़ी पकड़त तेँ, अखने ककरो स आध सेर दूध आनि कऽ पौड़ि दिऔ। दहीक जतरा नीक होइ छै।’ माइयोक मन मे जँचलै। आध सेर दूध पौड़ैक विचार माए केलक आ मने-मन, ब्रह्म-बाबा कऽ, कबुला केलक जे अहाँ हमरा बेटा कऽ पास करा देब त कुमारि भोजन कराएब। संगे हाँइ-हाँइ कऽ चिकनी माटि लोढ़ी स फोड़ि, अछीनजल पानि मे सानि, दिआरी बना, साफ पुरना कपड़ाक टेमी बना, दिआरी मे करु तेल दऽ साँझ दिअए ब्रह्म स्थान विदा भेलि। रस्ता मे मने-मन ब्रह्म-बाबा केँ कहैत जे हे ब्रह्मबाबा कहुना हमरा बेटा कऽ पास कए दिहक। तोरे पर असरा अछि। स्कूल मे सबसँ नीक विद्यार्थी दीनानाथ, मुदा नीक रहितहुँ क्लास मे थर्ड करैत। एकर कारण रहए जे हाई स्कूल सेेक्रेटीªक मातहत चलैत। जहि स स्कूलक सर्वेसर्वा सेक्रेट्रिये। इज्जतोक दुआरे आ फीसोक चलैत स्कूल मे फस्ट सेक्रेट्रिऐक लगुआ-भगुआ करैत। जँ कहीं सेक्रेट्रीक समांग नइ रहैत तखन हेडमास्टरक सवांग फस्ट करैत। मुदा एहि बैच मे सेक्रेट्रियोक सवांग आ हेडमास्टरोक सवांग। तेँ सेक्रेट्रीक सवांग फस्ट करैत आ हेडमास्टरक सवांग सेकेण्ड, आ दीनानाथ थर्ड। जे फस्ट करैत ओकरा पूरा फीस आ सेकेण्ड-थर्ड कऽ आधा फीस माफ होइत। ओना आन शिक्षक सभ केँ एहि बातक क्षेाभ होइन मुदा कइये की सकैत छथि। किऐक त आन शिक्षक सभहक गति कोठीक नोकर स नीक नइ रहनि। सात घंटी पढ़ौनाई आ डेढ़ सय रुपैया महीना पौनाई, मात्र रहनि। मुदा तइयो ओ सब इमानदारी स काज करैत। असिसमेंटक चलनि सेहो रहए। बीस नम्बरक हिसाब स सब विषयक असिसमेंट होइत। सिर्फ समाजे-अध्ययनक हिसाव अलग रहए। असिसमेंटक नम्वर परीक्षाक नम्बर मे जोड़ि कऽ रिजल्ट होइत। जे नम्बर (असिसमेंटक) सेक्रेट्री आ हेडमास्टरक हाथक खेल रहए। परीक्षाक तीनि मासक उपरान्त रिजल्ट निकलै। मास दिन परीक्षाक बीति गेल। दू मास रिजल्ट निकलै मे बाकी। माघक अंतिम समय। सरस्वती पूजा पाँच दिन पहिने भऽ गेल। शीतलहरी चलैत। जहि स मिथिलांचल साइबेरिया बनि गेल। दिन-राति एक्के रंग। बरखाक बून्न जेँका ओस टप-टप खसैत। सुरुजक दरसन दू मास स कहियो ने भेल। दिन-राति कखन होय, ओ लोक अन्हारे स वुझैत। सब अपन-अपन जान बँचवै पाछू लागल। खेती-पथारीक काज सबहक बन्न। रब्बी-राई ठंढ़ स कठुआइल। बढ़बे ने करैत। बोराक झोली ओढ़ोलाक बादो माल-जाल थर-थर कपैत। जहिना महीसिक बच्चा तहिना गाइयक बच्चा कठुआ-कटुआ मरैत। बकरीक त फौतिये आबि गेल। गाछ सब परहक घोरन सूड्डाह भ गेल। चिड़ै-चुनमुनी स लऽ कऽ नढ़िया, खिखिर, साप मरि-मरिजहाँ-तहाँ महकैत। माघक पूर्णिमा स दू दिन पहिने रामखेलावन कऽ लकबा लपकि लेलक। सौंसे देहक एक भाग (अधा भाग) सुन्न भऽ गेलइ। क्रियाहीन। बिठुओ कटला पर किछु नहि बुझैत। चिड़ैक लोल जेँका टेढ़ मुह भऽ गेलइ। ओना उमेरो कोनो बेसी नहि, चालीस वर्ख स भीतरे। रौतुका समय। शीतलहरीक चलैत अन्हारेा बेसी। ओना इजोरिया पख रहए। मुदा भादबक अन्हार जेँका अन्हार। पिताक दशा देखि दीनानाथक मन घवड़ा गेलइ। तहिना माइयोक। मुदा तइयो मन कऽ थीर करैत दीनानाथ डाॅक्टर ऐठाम विदा भेलि। किछु दूर गेला पर पाएर तेना कठुआ गेलइ जे चलिये ने होय। मन मे भेलइ जे बावू से पहिने अपने मरि जाएब। घरो पर घुरि कऽ नइ जाइल हैत। बीच पाँतर मे दीनानाथ असकरे। दुनू आखि से दहो-बहो नोर खसै लगलै। मन मे एलै, आब की करब? मुदा फेरि मन मे एलै जे हाथ से ठेहुन रगड़ला पर पाएर हल्लुक हैत। सैह करै लगल। जाँघ हल्लुक भेलइ। हल्लुक होइते डाॅक्टर ऐठाम चलल। डाॅक्टर ऐठाम पहुँचते रोगीक भीड़ देखि दीनानाथ फेरि घबड़ा गेल। मन मे एलै, जे सौंसे दुनियाँक रोगी एतै जमा भऽ गेल अछि। असकरे डाॅक्टर सहाएव छथि आ दू टा कम्पाउण्डर छनि, कोना सबकेँ देखथिन। मुदा रोगो एकरंगाहे, तेँ बेसि मत्था-पच्ची डाॅक्टर कऽ करै नै पड़नि। धाँय-धाँय इलाज करति जाथि। मुदा मेले जेँका रोगी ऐबो करै। थोडे़ काल ठाढ़ भऽ कऽ देखि दीनानाथ सिरसिराइते डाॅक्टर लग मे जा बाजल- ‘डाॅक्टर सहाएब, कनी हमरा अइठीन चलियौ। हमर बावू एते बीमार भऽ गेलि छथि जे अबै जोकर नइ छथि।’ दीनानाथक बात सुनि डाॅक्टर कहलखिन- ‘बौआ, ऐठाम त देखिते छी कोना एते रोगी छोड़ि कऽ जाएब? जे ऐठाम पहुँच गेलि अछि ओकरा छोड़ि कऽ जाएव उचित हैत।’ ‘समय रहैत ज हमरा ऐठाम नै जायब त बाबू मरि जेताह।’ ‘अहाँ घबड़ाउ नै तत्खनात दू टा गोली दइ छी। हुनका खुआ देवनि आ एतै नेने अबिअनु।’ दीनानाथक मन मे पिताक मृत्यु नचै लगल। मन मसोसि दुनू गोलि लऽ विदा भेल। मुदा घर दिशि बढ़ैक डेगे ने उठए। एक त ठंढ़ दोसर मन मे निराशा, आ तेसर शीतलहरी स रातिओ अन्हार। मुदा तइयो जिबठ बान्हि कऽ विदा भेल। कच्ची रस्ता रहने जहाँ-तहाँ मेगर आ तइ पर स कते ठाम टुटलो। जइ स कए बेरि खसबो कएल मुदा तइयो हूबा कऽ उठि-उठि आगू बढ़िते रहल। घर पर अबिते दुनू गोली पिता कऽ खुऔलक। तहि बीच माए गोइठाक घूर कऽ सौंसे देह सेदैत। अपना खाट नहि। एते राति मे ककरा कहतै। मुदा पितिऔत भाइक खाट मन पड़लै?’ मन परिते पितिऔत भाइ लग जा कहलक- ‘भैया खाटो दिअ आ संगे चलबो करु। ऐहेन समय मे आनका ककरा कहबै। के जायत?’ दीनानाथक बात सुनिते पितिऔत भाइ धड़फड़ा कऽ उठि खाट नेनहि बढ़ल। खाट पर एक पाँज पुआर विछा सलगी विछौलक। दुनू पाइस मे बरहा बान्हि खाट तैयार केलक। खाट तैयार होइते दुनू गोरे रामखेलावन कऽ उठा ओहि पर सुतौलक। बरहा मे बाँस घोसिया दुनू गोरे कान्ह पर उठा विदा भेलि। पाछु-पाछु सुमित्रो (माइयो) विदा भेलि। थोड़े काल त दीनानाथ किछु नहि वुझलक मुदा थोड़ेकालक बाद कान्हा भकभका लगलै। कान्ह परक छाल ओदरि गेलइ। जइ स बाँस कान्ह पर रखले ने होय। लगले-लगले कान्ह बदलै लगल। मुदा जिबट बान्हि डाॅक्टर ऐठाम पहुँच गेल। डाॅक्टर एहिठाम पहुँचते डाॅक्टर सहाएव देखलखिन। बीमारी देखारे रहए। धाँय-धाँय पाँच टा इन्जेक्शन लगा देलखिन। इन्जेक्शन लगा डाॅक्टर दीनानाथ केँ कहलखिन- ‘हिनका खाटे पर रहए दिअनु। बेसी चिन्ता नै करु। तखन त नमहर बीमारी पकड़नहि छनि। किछु दिन त लगबे करत। रामखेलावन कऽ नीन आबि गेल। खाटक निच्चा मे तीनू गोटे (दीनानाथ, पितिऔत भाइ आ सुमित्रा) बैसल। सुमित्रा मने-मन सोचति जे समय-साल तेहने खराब भऽ गेल अछि जे बेटा-पुतोहू ककरा देखइ छै। जाबे पति जीबैत रहै छै ताबे स्त्रीगण गिरथाइन बनल रहैत अछि। पुरुख कऽ परोछ होइतहि दुनियाँ अन्हार भऽ जाइ छैक। बिना पुरुखक स्त्रीगण ओहने भऽ जाइत अछि जेहने सुखायल गाछ। कहलो गेल छै जे साँइक राज अप्पन राज बेटा-पुतोहूक राज मुहतक्की। मुदा की करब? अपन कोन साध। इ त भगवानेक डाँग मारल छिअनि। हे माए भगवती कहुना हिनका नीक बना दिअनु। जँ से नइ करबनि त पहिने हमरे ल चलू। दोसर दिन डाॅक्टर रामखेलावन कऽ देखि कहलखिन- ‘हिनका घरे पर लऽ जैअनु। (जइअनु) ऐठाम स नीक सेवा घर पर हेतनि। बीमारी आब आगू मुहे नहि बढ़तनि, मुदा इलाज बेसी दिन करबै पड़त। हमर कम्पाउण्डर सब दिन जा-जा सुइयो देतनि आ देखबो करतनि। तइ बीच जँ कोनो उपद्रव बुझि पड़त त अपनो आबि कऽ कहब।’ कहि दू टा सुइयाँ फेरि डाॅक्टर सहाएव लगा देलखिन। दवाईक पुरजा बना देलखिन। एकटा सूइयाँ आ तीनि रंगक गोली सब दिन दइ ले कहि देलखिन। गप-सप सब कियो करिते छलाह कि तहि बीच रामखेलावन पत्नी कऽ कहलक- ‘किछु खाइक मन होइ अए।’ खाइक नाम सुनिते दीनानाथक मुह स हँसी निकलल। लगले देाकान स दूध आ विस्कूट आनि कऽ देलक। दूध-बिस्कुट खुआ दुनू भाय खाट उठा विदा भेल। घर पर अबिते टोल-परोस सऽ लऽ गाम भरिक लोक देखै अबै लगल। शीतलहरी रहबै करै मुदा तइओ लोक अबैक ढ़बाहि लगल। दू घंटा धरि लोक अबैत रहल। दीनानाथ माए कऽ कहलक- ‘माए, बड़ भूख लगल अछि। पहिने भानस कर। भुखे पेट मे बगहा लगै अए।’ दीनानाथ बात सुनि माए भानस करै बिदा भेलि। भूख त आपनो लागलि मुदा कहती ककरा। बेर-विपत्ति मे ते एहिना होइते छैक। दीनानाथक बात पितिआइन सेहो सुनलक। वेचारी (पितिआइन) सोचलक जे सब भुखाइल अछि। बेरो उनहि गेलइ। आब जे भानस करै लगत ते साँझे पड़ि जेतैक। तहूँ मे सब भुखे लहालोट होइ अए। से नइ ते घर मे जे चूड़ा अछि ओ दऽ दइ छियै, जइ से तत्खनात त काज चलि जेतइ। सैह केलक। दीनानाथ आ सुमित्रा चूड़ा भिजा कऽ खाइते छल कि माम (सुमित्राक भाए) आयल। भाए कऽ देखितहि सुमित्राक आखि मे नोर आबि गेल। बिना पाएर धोनहि मकशूदन (भाय) बहिनोइ लग पहुँच देखै लगल। बहिनोइक दशा देखि दुनू आखि स दहो-बहो नोर खसै लगलनि। नोर पोछि, वेचारा सोचै लगल जे हम त सियान छी तहू मे पुरुख छी। जँ हमही कानबै त बहीनि आ भागिनक दशा की हेतइ। धैर्य बान्हि बहीनि कऽ कहलक- ‘दाइ, ई दुनियाँ एहिना चलै छै। रोग-व्याधि सह-सह करैत अछि। जइ ठीन गर लगि जाइ छै पकड़ि लइत अछि। अपना सब सेबे करबनि की ने मुदा.......। रुपैयाक लेल दवाइ-दारु मे कोताही नइ होनि। आइ भोरे पता लागल। पता लगिते दौड़ल एलहुँ। अपने गाय बिआइल अछि। काल्हि गाइयो आ जहाँ धरि हैत तहाँ धरि रुपैइयो आनि कऽ दऽ देवउ। अखन हम जाइ छी, काल्हि आयब।’ चारि दिनक बाद रामखेलावनक मुह सोझ भऽ गेल। उठि कऽ ठाढ़ सेहो हुअए लगल। मुदा एकटा पाएर नीक नहि भेल। कनी-कनी झखाइते डेग उठबै लगल। सब दिन, भोरे आबि कऽ कम्पाउण्डर सूइयो दइत आ चला-चला (टहला-टहला) देखवो करैत। दू मासक बाद दीनानाथक रिजल्ट निकलल। फस्ट डिबीजन भेलइ। नम्बरो नीक। छह सौ तीन नम्बर। हेडमास्टरक सवांग कऽ सेहो फस्ट डिबीजन भेलइ। मुदा नम्बर कम। पाँच सौ पेंइतालिस आइल छलै। सेक्रेट्रीक सवांग कऽ सेकेण्ड डिवीजन भेलइ। मुदा नम्बर बढ़िया, पाँच सय चैंतीस। आगू पढै़क आशा दीनानाथ तोड़ि लेलक। किऐक त घर मे कियो दोसर करताइत नहि। एक त पिताक बीमारी, दोसर घरक खर्च जुटौनाइ तइ पर स छोट भाइ आठमा मे पढै़त। मुदा दीनानाथ कऽ अपन पढ़ाई छोडैैैैै़क ओते दुख नै भेलइ जते परिवार चलौनाइ सऽ लऽ कऽ पिताक सेवा करैक सुख भेलइ। जे बेटा बाप-माइक सेवा नै करत ओ बेटे की? अपन पढ़ैक आशा दीनानाथ छोट भाइ (कुसुमलाल) पर केन्द्रित कऽ देलक। अधिक काल मकशूदन बहीनेक ऐठाम रहै लगल। गाइयोक सेवा आ खेतो-पथारक काज सम्हारै लगलै। अपना ऐठाम से अन्नो-पानि आनि-आनि दिअए लगलै। अपना घर जेँका भार उठा लेलक। अपन दशा देख रामखेलावन मकशूदन कऽ कहलक- ‘हम त अबाहे भऽ गेलौ। जाबे दाना-पानी लिखल अछि ताबे जीवै छी। मरैक कोनो ठीक नहि अछि, तेँ अपना जीवैत कतौ दीनानाथ कऽ विआह करा दिओै। बेटा-बेटीक विआह-दुरागमन कराएब त माए-बापक धरम छियै। मुदा हम ते कोनो काजक नै रहलौ। कम स कम देखियो त लेबइ।’ बहनोइक बात सुनि मकशूदन गुम्म भऽ गेल। मने-मन सोचै लगल जे समय-साल तेहने खराब भ गेल अछि जे नीक मनुख घर मे आनव कठिन भ गेल अछि। सब खेल रुपैइया पर चलि रहल अछि। मनुखक कोनो मोले ने रहलै। ऐहेन स्थिति मे नीक कन्या कोना भेटत? तखन एकटा उपाय जरुर अछि जे रुपैया-पैसाक भाँज मे नहि पड़ि, गुनगर कन्याक भाँज लगाबी। जइ से घरक कल्याण हेतइ। पाहुन जखन हमरा भार देलनि त हम दान-दहेज नहि आनि नीक कन्या आनि देबनि। बहिनोइ कऽ कहलक- ‘पाहुन, रुपैयाक पाछू लोक भसिआइत अछि। अगर अहाँ हमरा भार दइ छी ते हम रुपैया भाँज मे नहि पड़ि नीक मनुक्ख आनि कऽ देव। से की विचार?’ मकशूदनक बात सुनि बहीनि धाँय दऽ बाजलि- ‘भैया, रुपैया मनुक्खक हाथक मैल छिअए। मुदा मनुक्ख तपस्या स बनैत अछि।’ तेँ, हमरा नीक पुतोहू हुअए। रुपैयाक भुख हमरा नै अछि।’ बहीनिक बात सुनि मकशूदनक मन मे सबुर भेल। बाजल- ‘बहीनि, जहिना तोरा सबहक पुतोहू तहिना त हमरो हैत की ने। के ऐहेन अभागल हैत जे अपन घर अबाद होइत नै देखत?’ अपन पढ़ाइक आशा तोड़ि दीनानाथ मने-मन अपना पाएर पर ठाढ़ होइक बाट तकै लगल। संकल्प केलक जे जहिना नीक रिजल्ट पबैक लेल विद्यार्थी जी-तोड़ि मेहनत करैत अछि तहिना हमहूँ परिवार कऽ उठवैक लेल जमि कऽ मेहनत करब। बिऔहती लड़कीक भाँज मकशूदन लगवै लगल। मुदा मन मे एलै जे हम त बड़ पक्ष छी तेँ, लड़की ऐठाम पहिने कोना जाएब? कने काल गुनधुन करैत सोचलक जे बेटा-बेटीक विआह परिवारक पैध काज होइत अछि तेँ, ऐहेन-ऐहेन छोट-छीन बेवहार पर नजरि नहिये देव उचित हैत। तहू मे त हम लड़काक बाप नहि, माम ै छी। पाहुन जखन भार देलनि त नहियो करब, उचित न हैत। अपना गामक बगलेक गाम मे लड़कीक भाँज मकशूदन कऽ लगल। परिवार त साधारणे, मुदा लड़की काजुल। काज मे तपल। किऐक त माए सदिखन ओकरा अपने संग राखि खेत-पथारक, घर-आंगनक काज सऽ लऽ कऽ अरिपण लिखब, दुआरि मे पूरनि, फूलक गाछ, कदमक फुलाइल गाछक संग-संग पावनि-तिहार मे गीत गौनाइ सब सिखबैत। बड़द कीनैक बहाना स मकशूदन भेजा विदा भेल। पहिने दू-चारि गोटेक ऐठाम पहुँच बड़दक दाम करैत कन्यागतक दुआर पर पहुँचल। कन्यागत दुआर पर नहि। मुदा लड़की बाल्टी मे पाइन भरि अंगना अबैत। लड़की कऽ देखि मकशूदन पुछल- ‘बुच्ची, घरवारी कत्ते छथि?’ बाल्टी रखि सुशीला बाजलि- ‘बाड़ी मे मिरचाइ कमाइ छथि। अपने चैकी पर बैसिऔ। बजौने अबै छिअनि।’ बाल्टी अंगना मे रखि सुशीला बाड़ी स पिता केँ बजौने आइलि। पड़ोसी होइ दुआरे दुनू गोटे दुनू गोटेक चेहरा स चिन्हैत, मुदा मुहा-मुही गप नै भेने, अनचिन्हार। कन्यागत पूछल- ‘किनका स काज अछि?’ मुस्कुराइत मकशूदन- ‘अखन दुइये गोरे छी, तेँ मनक बात कहै छी। हमरो घर बीरपुरे छी। हमरा भागिन अछि। काल्हि खन पता चलल जे अहाँ कऽ विऔहती बच्चिया अछि, तेँ ओइठाम कुटुमैती कऽ लिअ।’ कुटुमैतीक नाम सुनि कन्यागत गुम्म भ गेलाह। कनी-काल गुम्म रहि कहलखिन- ‘हम गिरहस्त छी। सेहो नमहर नै छोट। अइठीनक गिरहतक की हालत अछि से अहाँ जनिते छी। तेँ, अइबेरि बेटीक विआह नै सम्हरत।’ कन्यागतक सुखल मुह देखि मकशूदन बाजल- ‘मन मे जे दहेजक भूत पकड़ने अछि, ओ हटा लिअ। अहाँ कऽ जहिना सम्हरत तहिना विआह निमाहि लेब।’ मकशूदन विचार सुनि कन्यागतक मुह हरिआइ लगल। दरवज्जे पर स बेटी केँ सोर पाड़ि कहलक- ‘बुच्ची, सरबत बनौने आवह?’ बड़का लोटा मे सरबत आ गिलास नेने सुशीला दरवज्जा पर आबि चैकी पर रखै लागलि। तहि बीच पिता बाजल- ‘बुच्ची, इहो कियो आन नहि छथि। पड़ोसिये छिआह। बीरपुरंे रहै छथि। दहुन सरबत।’ दुनू गोटे सरबत पीलनि। सरबत पीबि पिता कहलखिन- ‘बुच्ची, चाहो बनौने आबह।’ सुशीला चाह बनबै गेलि। दरवज्जा पर दुनू गोरे गप-सप करै लगलाह। मकशूदन- ‘जेहने अहाँक कन्या छथि तेहने हमर भागिन। अजीब जोड़ा बिधाता बना कऽ पठौने छथि। काल्हिये अहूँ लड़का कऽ देखि लिओ। संयोग नीक अछि तेँ शुभ काज मे विलंब नहि करक चाही।’ मकशूदनक विचार स जते उत्साहित कन्यागत कऽ हेबाक चाहिएनि तते नहि होइत। कियेक त मन मे घुरिआइत जे कहुना छी त बेटीक विआह छी। फुसलेने काज थोडे़ चलत। मुदा कन्याक माए, दलानक भीतक भुरकी देने अढ़े से गप्पो सुनैत आ दुनू गोटे कऽ देखबो करैत। मने-मन उत्साहितो होइत, जे फँसल शिकार छोड़ब मुरुखपाना छी। माए-बापक सराध आ बेटीक विआह मे ककरा नै करजा होइ छै। जानिये कऽ तऽ हम सब गरीब छी। गरीबक जनम स लऽ कऽ मरै धरि करजा रहिते छै। तइ ले एते सोचै विचारैक कोन काज। करजो हाथे बेटीक विआह कइये लेब। फस्ट डिवीजन स मैट्रिक पास लड़का अछि। ऐहेन पढ़ल-लिखल लड़का थोड़े भेटत। कहबियो छै जे पढ़ल-लिखल लोक ज हरो जोतत तऽ मुरुख से सोझ सिराओर हेतइ। आइक युग मे मूर्खो बड़क बाप पचास हजार रुपैया गनबैत अछि। खुशी सऽ मन मे होय जे छड़पि कऽ दरवज्जा पर जा कहिअनि जे अगर अहाँ आइये विआह करै चाही त हम तैयार छी। मुदा स्त्रीगणक मर्यादा रोकि दइत। तेँ बेचारी अढ़े मे अहुरिया कटैत। मुदा पतिक मन बदलल। ओ मकशूदन कऽ कहलक- ‘देखू , हम भैयारी मे असकरे छी, मुदा गृहिणी त छथि। हुनका स एक बेरि पूछि लइ छिअनि। किऐक त हम घरक बाहरक काजक गारजन छी ने, घरक भीतरी काजक गारजन त वैह छथि। जँ कहीं बेटी विआहक दुआरे किछु ओरिया कऽ रखने होथि त कइये लेब।’ भोला (कन्यागत) उठि कऽ आंगन गेल। आंगन पहुँचते पत्नी झपटि कऽ कहै लगलनि- ‘दुआर पर उपकैर कऽ लड़कावला ऐला हेँ, तेँ अहाँ अगधाइ छी। जखैन लड़का भाँज मे घुमैत-घुमैत तरबा खियाइत आ बेमाइ स खूनक टगहार चलत, तखन बुझवै। तीनि-तीनि साल बेटीवला घुमै अए तखन जा कऽ कतौ गर लगै छै। जा कऽ कहि दिअनु जे अखैन हमर हालत नीक नइ अछि, मुदा जँ अहाँ तैयार छी त हमहूँ तैयार छी। बड़ देखैक दिन कौल्हुके दऽ दिअनु। पत्नीक बात स उत्साहित भऽ भोला आबि कऽ बाजल- ‘पत्नीक विचार सोलहो आना छनि। मुदा कहबे केलहुँ जे अखैन हमर हालत बढ़ियाँ नै अछि।’ मकशूदन- ‘काल्हि अहाँ लड़का देखि लिऔ। जँ पसिन्न हैत त जहिना कुटुमैती करै चाहब तहिना कऽ लेब। असल मे हमरा लोकक जरुरत अछि नै की रुपैया-पैसाक।’ आठे दिनक दिन मे विआह भऽ गेल। भोलाक बहिनो आ साउसो नीक जेँका मदति केलकनि। अपना घर स सिर्फ एकटा सोनाक सुक्की (नअ टा चैवन्नीक छड़) भोला कऽ, निकलल।’ पनरह दिनक उपरान्त दीनानाथ पूबरिया ओसार पर बैसि, पिता स छीपि कऽ, माए कऽ कहलक- ‘माए, घरक दशा जे अछि से तोहूँ देखते छीही। जेना घर चलै अए तेना कते दिन चलत। साले-साल खेत बिकाइत। जइ से किछुए सालक बाद सब सठि जायत। छोड़ैवला काज एक्को टा नइ अछि। जहिना कुसुमलालक पढै़क खर्च, तहिना बावूक दवाइ आ पथ्यक। मुदा आमदनी त कोनो दोसर अछि नहि। लऽ दऽ कऽ खेती। सेहो डेढ़ बीघा। तहू मे ने पाइनिक जोगार अपना अछि आ ने खेती करैक लूरि। एते दिन तऽ बाबू कहुना-कहुना कऽकरैत छलाह, आब तऽ सेहो ने हैत। हमहूँ ज कतौ नोकरी करै जायब सेहो ने बनत, किऐक त बावूक देखभाल सेहो करैक अछि। तखन तऽ एक्के टा उपाय अछि जे घरे पर रहि, आमदनीक कोनो काज ठाढ़ करी।’ बेटाक बात सुनि माए गुम्म भऽ गेलीह। जइ घर मे आमदनी कम रहत आ खरचा बेसी हैत, ओ घर कोना चलत। एते बात मन मे अबिते माइक आखि स दहो-बहो नोर खसै लगलनि। आँचर स नोर पोछि बाजलि- ‘बौआ, हम त स्त्रीगणे छी। घर-अंगना मे रहैवाली। तू ज बच्चो छह ते पुरुखे छह। जखैन भगवाने बेपाट भेल छथुन तखन त किछु करै पड़तह।’ दुनू गोटेक (माइयो आ बेटोक) मुह निच्चा मुहे खसल। ने बेटाक नजरि माए दिशि उठैत आ ने माइक नजरि बेटा दिशि। जहिना मरुभूमि मे पियासल लोकक दशा होइत, तहिना दुनूक दशा होइत। केबाड़ लग ठाढ़ सुशीला दुनू कऽ देखैत। जोर स कियो अहि दुआरे नहि बजैत जे रोगाइल, पिता वा पति ज सुनताह ते सोग स आरेा दुख बढ़ि जेतनि। केबाड़ लग स घुसकि ओसार पर आबि सुशीला बाजलि- ‘माए चिन्ता केला से दुख थोड़े भगतनि। दुख कऽ भगवै ले किछु उपाय करै पड़तनि। छोटका बौआ बच्चे छथि, बाबू रोगाइले छथि, मुदा अपने तीनू गोरे त खटैवला छी। खटला सऽ सब कुछ होइ छै।’ सुशीलाक बात सुनि सासु बजलीह- ‘कनियाँ, कहलियै त बड़बढ़िया, मुदा ओहिना त पाइन नै डेंगाएब।’ सासुक बात सुनि पुतोहू बाजलि- ‘हमर एकटा पित्ती धानक कुट्टी करै छथि। जहिना अपन परिवार अछि तहू स लचड़ल हुनकर परिवार छलनि। तइ पर स चारि-चारि टा बेटिओ छलनि। मुदा जइ दिन से धानक कुट्टी करै लगलथि तइ दिन से दिने-दुनिया घुरि गेलनि। चारु बेटिओक विआह केलनि, बेटेा के पढ़ौलनि। ईंटाक घरो बनौलनि आ पाँच बीघा खेतो कीनि लेलनि। अखन हुनकर हाथ पकडै़वला गाम मे कियो ने अछि।’ पत्नीक बात सुनि दीनानाथक भक्क खुजल। भक्क खुजिते दीनानाथ खुशी स उछलि अंगना मे कूदल। दरबज्जा पर आबि कागज-कलम निकालि हिसाब जौड़े लगल। डेढ़ सेर (किलो) धान मे एक सेर चाउर होइत अछि। ओना धानक बोरा अस्सिये किलोक होइत अछि, जबकि चाउरक सौ किलोक। चारि सय रुपैये बोरा धान बिकैत अछि। त पान सौ रुपैये क्वीन्टल भेल। एक क्वीन्टल धानक सड़सठि किलो चाउर भेल। दू-चारि किलो खुद्दियो हैत। जेकर रोटी पका कऽ खाएब। एक किलो चाउरक दाम साढ़े दस रुपैया सऽ एगारह रुपैया होइत। अइ हिसाब स एक क्वीन्टल धानक चाउर कऽ लगभग सात सौ रुपैया भेल। पान सउक पूँजी स सात सउक आमदनी भेल। तइ पर स तीस किलो गुड़ो भेल। जेकर दाम साठि रुपैया भेल। खर्च मे खर्च सिर्फ जरना, कुटाइ आ गाड़ीक भाड़ा भेल। बाकी सब मेहनतक फल भेल। अगर जँ एक बोराक कुट्टी सब दिनक हिसाव स करब त पाँच हजारक महीना आमदनी जरुर हैत। हिसाव जोड़ैत-जोड़ैत दीनानाथक मन मे शंका उठल जे हिसावे ते ने गलती भ गेल। कागज-कलम छोड़ि उठि कऽ टहलै लगल। मने-मन हिसाबो जोड़ैत। मन मे कखनो हिसाव सही वुझि पड़ैत ते कखनो शंका होइत। आंगन जा पानि पीलक। दू-चारि बेरि माथ हसोथलक। फेरि आबि कऽ हिसाब जोड़ै लगल। मुदा हिसाव ओहिना कऽ ओहिना होय। मन मे बिसवास जगलै। जहि स काजक प्रति आकर्षण सेहो भेलइ। फेरि आंगन जा माए कऽ पूछलक- ‘एक बोरा धान उसनै मे कते समय लगतौ?’ माए बाजलि- ‘एक बोरा धान त दसे टीन भेल। दूचुल्हिया पर पाँच खेप भेल आ चरिचुल्हिया पर अढ़ाइये खेप भेल। एक्के घंटा मे उसनि लेब।’ माइक बात सुनि दीनानाथ तय केलक जे हमहूँ यैह रोजगार करब। पूँजीक लेल पत्नीक सोना सुक्की मे स पाँच टा निकालि (सबा भरि) बेचि, धान कीनि कुट्टी शुरु केलक। जहि स परिवार मे खुशहाली आवि गेलइ। कुशुमलाल बी. ए. पास कऽ, मधुबनी कोर्ट मे किरानीक नोकरी शुरु केलक। केार्टेक बड़ाबाबूक बेटी स विआह सेहो केलक। मधुबनिये मे डेरा राखि दुनू परानी रहै लगल। तीनि-चारि वर्ख त संयमित जीवन वितौलक। सिर्फ वेतने पर गुजर करैत। मुदा तेकर बाद पाइ कमाइक लूरि सीखि लेलक। जहि स खाइ-पीवैक संग-संग आउरो लूरि भऽ गेलइ। घरोवाली पढ़ल-लिखल। जहिना कमाई तहिना खर्च। शहरक हवा मे उधियाइ लगल। सिनेमा देखैक, शराब पीबैक, नीक-नीक वस्तु कीनैक आदति बढ़ैत गेलइ। एक दिन पत्नी कहलकै- ‘गाम मे जे खेत अछि, ओ अनेरे किअए छोड़ने छी। ओहि से की लाभ होइ अए। ओकरा बेचि कऽ अहीठाम जमीन कीनि अपन घर बना लिअ।’ स्त्रीक बात कुसुमलाल कऽ जँचल। रवि दिन, छुट्टी रहने गाम आबि भाय (दीनानाथ) कऽ कहलक- ‘भैया, हम अपन हिस्सा खेत बेचि लेब। मधुबनिये मे दू कट्ठा खेत ठीक केलहुँ हेँ। ओ कीनि ओतइ घर बनाएब। भाड़ाक घर मे तते भाड़ा लगै अए जे एक्को पाइ बँचवे ने करै अए जे अहूँ सब कऽ देब।’ कुसुमलालक बात सुनि दीनानाथ कहलक- ‘बौआ, अखन बावू-माए जीविते छथुन, तेँ, हम की कहबह? हुनके कहुन।’ दीनानाथक जबाब सुनि कुसुमलाल पिता सऽ कहलक। रोगाइल रामखेलावन, खिसिया कऽ कहलक- ‘डेढ़ बीधा खेत छौ। दस कट्ठा हमरा दुनू परानीक भेल, दस कट्ठा दीनानाथक भेलइ आ दस कट्ठा तोहर भेलउ। अपन हिस्सा बेचि कऽ लऽ जो।’ खेत कीनै-बेचैक दलाल गामे-गाम रहिते अछि। ओ (कुसुमलाल) जा कऽ एकटा दलाल कऽ कहलक। पाँच हजार रुपैये कट्ठाक हिसाव स दलाल दाम लगा देलक। कुसुमलाल राजी भऽ गेल। मुदा बेना नै लेलक। तरे-तर दीनानाथो भाँज लगबैत। साझू पहर, जखन कुसुमलाल मधुबनी विदा भेल तखन दीनानाथ कहलकै- ‘बौआ, जते दाम तोरा आन कियो देतह तते हमही देबह। बाप-दादाक अरजल सम्पत्ति छी, आन कियो जे आबि कऽ घरारी पर भट्टा रोपत ओ केहेन हैत? मुदा, दीनानाथक बात कुसुमलाल मानि गेल। पचास हजार मे जमीन लिखि देलक। मधुबनिये मे कुसुमलाल घर बना लेलक। अपना गामक लोक स ओते संबंध नहि रहलै जते सासुरक लोक स। सासुरक दू-चारि गोटे सब दिन अबिते-जाइत रहैत। आदरो-सत्कार नीक होय। बीस बर्ख बाद, दीनानाथक बेटा मेडिकल कम्पीटीशन मे कम्पीट केलक। बेटी आइ. एस. सी मे पढ़िते। पढै़ मे दुनू भाइ-बहीनि उपरा-उपरी। तेँ, परिवारक सभकेँ आशा रहै जे बेटिओ मेडिकल कम्पीट करबे करत। माए-बापक सेवा आ बेटा-बेटीक पढ़ाई देखि, दुनू परानी दीनानाथक मन खुशी स गद-गद। परिवारोक दशा बदलि गेल। मुदा तइयो दीनानाथ धानक कुट्टी बन्न नइ केलक। आरो बढ़ा लेलक। मन मे इहो होय जे धनकुट्टिया मिल गड़ा ली, मुदा सवांगक दुआरे नहि गड़वैत। टायरगाड़ी कीनि लेलक। जहि स खेतिओ करै आ भड़ो कमाय। कुसुमलाल कऽ सेहो दू टा बेटा। दुनू पब्लिक स्कूल मे पढ़ैत। जेठका आठवँा मे आ छोटका छठा मे। मधुबनिये मे डेरा रहितहु दुनू होस्टले मे रहैत। तइ पर स सब विषयक ट्यूशन सेहो पढ़ैत। तेँ, नीक खर्च होय। शराब पीवैत-पीबैत कुसुमलालक लीभर गलि गेलइ। किछु दिन मधुबनिये मे इलाज करौलक, मुदा ठीक नहि भेने दरभंगाक अस्पताल मे भर्ती भेल। चारि मास दरभंगो ुँ मे रहल मुदा ओतहुँ लीभर ठीक नै भेलइ। तखन पटना गेल। पटनो मे ठीक नै भेलइ, संगहि शरीर दिनानुदिन खसिते गेलइ। अंत मे दिल्लीक एम्स मे भर्ती भेल। ओतह ठीक नइ भेलइ। शरीर एते कमजोर भ गेलइ जे अपने स उठियो-वैसि नइ होय। हारि-थाकि क मधुबनीक डेरा पर आबि गेल। मुदा एते दिनक बीमारीक बीच दीनानाथ कऽ जानकारीयो ने देलक। सारे-सरहोजिक संग घुमैत रहल। ओछाइन पर पड़ल-पड़ल सैाँसे देह मे धाव भऽ गेलइ। ढ़ाकीक-ढ़ाकी माछी देह पर सोहरे लगलै। कतबो कपड़ा ओढ़बै तइओ माछी घुसि-2 असाइ द दइ। दिन-राति दर्द स कुहरैत। सदिखन घरवालीक मन तामसे लह-लह करैत। गरिऐवो करैत। दुनू बेटा मे से एक्कोटा लग मे रहै ले तैयार नहि। जेठका बेटा कहए- ‘पप्पा जी, महकता है।’ जखन कखनो लग मे अबैत त नाक मूनि क अवैत। छोटका बेटा सेहो तहिना। सदिखन बजैत-‘पप्पा जी, अब भूत बनेगा। लग मे रहेंगे तो हमको भी पकड़ लेगा।’ जइ आॅफिस मे कुसुमलाल काज करैत ओहि आॅफिसक एकटा स्टाफ दीनानाथ कऽ फोन स कहलक- ‘कुसुमलाल अंतिम दिन गनि रहल अछि तेँ, आबि कऽ मुह देखि लिऔ।’ फोन सुनि दीनानाथ सन्न भऽ गेल। जना दुनियाँक सब कुछ आखिक सोझ स निपत्ता भऽ गेलइ। सुन-मशान दुनिया लगै लगलै। मन मे एलै, कियो ककरो नहि। दुनू आखि स नोर टधरै लगलै। नोर पोछि सोचै लगल जे कियो झुठे ने ते फोन केलक। फेरि मन मे एलै जे ऐहेन समाचार झूठ किअए हैत? अनेरे कियो, पैसा खर्च कऽ, फोन किअए करत? ऐहेन अवस्था मे कुसुमलाल पहुँच गेल मुदा आइ धरि किछु कहबो ने केलक। खैर, जे होय। मुदा हमरो त किछु धर्म अछि। अपना कर्तव्य स कियो मनुख एहि दुनिया (धरती) मे जीवैत अछि। अखन त अबेर भऽ गेल। काल्हि भेारुके गाड़ी सऽ मधुबनी जाएब। एते विचारि माए कऽ कहलक- ‘माए, एक गोटे मधुबनी से फोन केने छेलाह जे कुसुमलाल बहुत दुखित छथि तेँ, आबि कऽ देखिअनु।’ दीनानाथक मुहक बात सुनिते माए कऽ देह मे आगि लगि गेलनि। जरैत मने बाजलि- ‘कुसुमा, हमर बेटा थोड़े छी जे मुह देखबै। उ ते ओही दिन मरि गेल जइ दिन हमरा दुनू परानी (बाप-माए) कऽ छोड़ि चलि गेल। जँ अइ धरती पर धरमक कोनो स्थान हेतइ त ओइ मे हमरो कतौ जगह भेटत। जँ कोनो शास्त्र-पुराण मे पतिब्रता स्त्रीक चरचा हेतइ, त हमरो हैत। आइ बीस वर्ख स, एहि (अइ) हाथ-पाएरक बले, बीमार पति कऽ जीबित राखि अपन चूड़ी आ सिनुरक मान रखने छी।’ माइक बात सुनि दीनानाथ मने-मन सोचलक जे कुसुमलाल अगर हमरा कमा कऽ नहिये देलक ते की हमर बिगड़ल। माइयो-पिताक दर्शन भोरे-भोर होइते अछि, बालो-बच्चा आनंदे स अछि। तखन ते एक-वंशक छी जा कऽ देखि लिअए। दोसर दिन भोरुके गाड़ी स मधुबनी पहुँच, कुसुमलालक डेरा पर पहुँचल। बाहरेक कोठरी मे कुसुमलाल। चद्दरि स सौँसे देह झापल। मुह उधारितहि कुसुमलाल बाजल- ‘भ-इ-अ-अ।’ कहि सदाक लेल अखि मूनि लेलक। दीनानाथ- ‘बौआ कुसुम, वौआ.....बौआ..... बउआ।’























80.बोनिहारिन: मरनी छोट-छीन छोट-छीनछोट-छीनछोट-छीनछोट-छीनछोट-छीन गाम छतौनी। तीनिये जाइतिक लोक गाम मे। साइये घरक बसतियो। छेहा बोनिहारक गाम। ओना पास-परोसक गामक लोक छतौनी कऽ प्रतिष्ठित गाम नहि बुझैत। किऐक त ओहि गाम सबहक लोकक विचारे प्रतिष्ठित गाम ओ होइत, जहि मे छत्तीसो जाइतिक लोक बसैत। जहि स समाजक सब तरहक जरुरतक पूर्ति गामे मे होइत। मुदा से छतौनी मे नहि। तेँ, छतौनी जमाबंदी गाम भऽ सकैत अछि, प्रतिष्ठित नहि। मुदा एहि विचार कऽ छतौनीक लोक मानए ले तइयारे नहि। छतौनीक लोकक कहब जे जहिया स हमर गाम बनल, तहिया सऽ ने कहियो अपना मे झगड़ा-झंझट भेलि आ ने माइर-पीटि। जहि स ने कहियो कियो कोट-कचहरी देखलक आ ने थाना-बहाना। ततबे नहि, तीनि जाइतिक लोक रहितहुँ सब मिलि एकठाम वैसि खेबो-पीबो करै छी आ तीनि जाइतिक तीनिू देवस्थानो मे पूजो-पाठ आ परसादियो खाइ छी। सब जाइतिक लोक संगे-संग कमेबो करै छी आ एक-दोसरा कऽ, मौका-मुसीबत पड़ला पर, संगो पूरै छी। आन-आन गामवला हमरा गाम कऽ अहि दुआरे गाम नै मानै अए जे ओ सब बहरवैया छी, आ हमरा सबहक पूर्वज अदौ स रहल अछि। छतौनीक वासी, सब दिन स, बोनिहारे नहि रहल अछि। पहिने ओकरो सब कऽ अपन-अपन खेत-पथार छलै। खेत-पथार गेलइ कोना? एहि संबंध मे छतौनीक बूढ़-पुरान लोकक कहब छनि जे हमरा सबहक पूर्बज, रौदीक चलैत, खेतक बाकी (मालगुजारी) राज दरभंगा कऽ समय पर नहि दऽ सकलनि, तेहि स ओ सब जमीन निलाम कऽ अबधिया, छपरिया हाथे बेचि लेलक। हमरा सबहक मलिकाना हक जमीनक खतम भऽ गेल। ओ अबधियो आ छपरियो राज मे नोकरी करैत छल, जे एहि इलाका मे आबि जमीनो हथिया लेलक आ मुखियो सरपंच बनि मैनजनी करैत अछि। मुदा एकटा चलाकी ओ सब जरुर केलक जे जेना अंग्रेज आबि सत्ता हथिऔलक तेना चलि नहि गेल, बलकि मुगल जेँका बसि गेल। जहिया स देश अजाद भेलि आ सत्ता ले भोट-भाँट शुरु भेल, तहिया से ने एक्कोटा नेता (कोनो पार्टीक) भोट मंगै ले एहि गाम आयल आ ने एक्को बेरि गैाँआ भोट खसोलक। किऐक त आइ धरि एहि गाम मे भोटक बूथ बनबे ने कएल। तेँ, नेतो किअए आउत? गाम मे ने चरिपहिया गाड़ी चलैक रास्ता छै आ ने सार्वजनिक जगह (स्कूल, अस्पताल)। जहि ठाम भाषण-भुषण हैत। जहि गाम मे छतौनीक बूथ बनैत ओहि गामक लोक सब छतौनियोक भोट खसा लइत। छतौनीक लोकक जिनगियो छोट। ने पढ़ै-लिखैक झंझट, ने चोर-चहारक झंझट, ने रोग-व्याधिक झंझट। किऐक त गामक सब वुझैत जे जेकरा कपार मे विद्या लिखल रहत, ओ डूबियो-मरि कऽ पढ़िये लेत। चोर-चहार ऐवे कथी ले करत। रोग-वियाधिक लेल पूजो-पाठ आ झाड़ो-फूक अछिये। तहू स पैध बात जे जे एहि धरती पर रहै ले आयल अछि ओ जीवे करत। पाइन, पाथर, ठंका ओकर की बिगाड़ि लेतइ। आ जे नइ रहै वला अछि ओकरा फूलोक गाछ पर साप काटि लेतइ आ मरि जायत। तेँ, की, छतौनीवला कऽ भगवान पर बिसवास नै छै? जरुर छै। जँ से नइ रहितै ते देवस्थान मे, साल मे एक बेरि, एत्ते धुमधाम पूजा किअए करै अए? उपास किअए करै अए? दसनमो स्थान (देवस्थान) आ अपनो-अपनो घर मे गोसाउनिक पीड़ी किअए बनौने अछि? साले-साल कामौर लऽ कऽ बैजनाथ किअए जाइ अए? सब अभाव रहितहुँ छतौनीक लोक हँसी-खुशी स जीवन बितबैत अछि। अगर जँ कियो गाम मे मरैत वा साप-ताप कटैत वा आइग-छाइ लगैत त सब कियो दासो-दास भऽ लगि जाइत। पचास वर्खक मरनी सेहो तेहि मे से एक। जे अपना आखि स अपन पति, बेटा आ पुतोहू कऽ गाछक तर मे खून बोकरि कऽ मरैत देखने। आइ वेचारी पाँच बर्खक पोता आ आठ बर्खक पोतीक बीच आशाक संग जीवि रहल अछि। कारी झामर एक हड्डा देह, ताड़-खजुर पर बनाओल चिड़ैक खोंता जेँका केश, आंगुर भरि-भरिक पीअर दाँत, फुटल धैलीक कनखा जेँका नाक, गाइयक आखि जेँका बड़का-बड़का आखि, साइयो चेफड़ी लागल साड़ी, दुरंगमनिया आंगी फटलाक बाद कहियो देह मे आंगीक नसीब नहि भेलि, बिना साया-डेढ़ियाक साड़ी पहिरने, अइह छी मरनी। चारि साल पहिने सुबध, मनोहर आ तौनकी धान रोपए बाध गेल। जाधरि तौनकी कऽ दोसर सन्तान नहि भेलि ताधरि मरनिये पति सुबध आ बेटा मनोहरक संग करै जाइति। धन रोपनी, धनकटनी, कमठाउन, रब्बी-राइ उखारै-काटै संगे जाइत। पुतोहू (तौनकी) अंगनाक काज सम्हारैत। मुदा जखन दू टा पोता-पोती भेलइ तहिया स मरनी अंगनाक काज सम्हारै लागलि। अंगनो मे कम काज नहि। भानस-भात करब, पोता-पोती खेलाएव, खूँटा परक बाछीक सेवा करब। आने परिवार जेँका मरनियोक परिवार भरल-पूरल। तीनि-तीनि जोड़ा (दस आँटीक जोड़ा) बीआ उखाड़ि सुबध आ मनोहर पटै पर टंगलक आ राड़ीक जुन्ना बना तौनकी बीआक बोझ बान्हि माथ पर लऽ कदवा खेत पहुँचल। कदबा एक दिन पहिने गिरहत करा देने। तेँ तीनू गोटेक मन मे खुशी होइत जे सबेर-सकाल रोपि कऽ चलि जायव। आन दिन, कदवे दुआरे, अबेर भऽ जाइ छलै। मने-मन सुबध सोचैत जे बेरु परह अपनो जे कट्ठा भरिक खेत अछि ओहो सब तूर मिलि क हाथे-पाथे रोपि लेब। कदवा मे बीआ रखि सुबध, आड़ि पर बैसि, तमाकुल चुनवै लगल। मनोहर आ तौनकी खेत मे बीआ पसारै लगल। सैाँसे खेत बीओ पसरि गेलइ आ सुवधो तमाकुल ख लेलक। तीनू गोटे एक-एक आँटी खोलि खुज्जा पसारि एक-एक खुज्जा रोपै ले वामा हाथ मे रखलक। पछिम स (आइरिक कात) तौनकी बीच मे मनोहर आ पूब स सुवध पाहि धेलक। एक पाँती रोपि दोसर धेलक कि पूब दिशि एक चिड़की मेघ उठैत देखलक। मेघक छोट टुकड़ी देखि ककरो मन मे पाइनिक शंका नै उठलै। कने-कने सिहकी सेहो चलै लगलै। जहिना-जहिना हवा तेज होइत जाइत तहिना-तहिना करिया मेघक टुकड़ी सेहो उधिया-उधिया उपर चढ़े लगले। उपर चढ़ि-चढ़ि ओ टुकड़ी एक-दोसर मे मिलै लगल। मुदा पछिम दिशि रौद उगले। कनिये कालक बाद सुरुज झपा गेल। हबो तेज हुअए लगलै। बिजलोका चमकै लगलै। बुन्दा-बुन्दी पाइन पड़ै लगलै। जते मेघ सघन होइत जाइत तते पाइनियोक बुन्न जोर पकड़ैत। संगे बिजलोको बेसिआइल जाइत। घन-घनौआ बरखा हुअए लगल। पाइन मे भीजै दुआरे तीनू गोरे, दौड़ि क, आमक गाछ लग पहुँचल। खेत स बीघे भरि हटि कऽ आमक गाछ। खूब झमटगर। चारि हाथ उपरे मे दू फेंड़ भऽ गेल। सरही आम। गाछक पँजरे मे पछिम स तौनकी बैसलि आ पूब स सुवध आ मनोहर। तौनकी साड़ी ओढ़ि दुनू हाथक मुट्ठी बान्हि काँख मे ल लेलक। मुदा सुवधेा आ मनोहरो छुछे देहे। गमछाक मुरेठा बान्हि लेलक। मुदा तइयो, जाड़े दुनू बापूत थर-थर कपैत। नमहर-नमहर वुन्न सेहो देह पर खसै। सैाँसे देहक रुइयाँ भुलकि कऽ ठाढ़ भऽ गेलइ। मुदा की करत? कोनो उपाय नहि। पछिमो मेघ पकड़ि बरिसै लगल। जहि स दूर-दूर ध् ारि बरखा हुअए लगलै। रहि-रहि कऽ मेघो गरजै आ बिजलोको चमकै। एक बेरि, खूब जोर स, बिजलोका चमकलै। मुदा आन बेरक चमकलहा स बिजलोकाक रंग बदलल। आन बेरि पिरौंछ इजोत होइत जबकि एहि बेरि लाल टुह-टुह। दुरकाल समय देखि तौनकी मने-मन खैांझा भगवान कऽ कोसैत जे कोनो काजक समय होइ छै। अखैन पाइनिक कोन काज छै। जहिना तगतगर लोक सदिखन बलउमकी करैत अछि तहिना इ टिकजरौना इन्द्रो भगवान करै अए। अनेरे काज कऽ बरदा जाड़े कठुुअबै अए। लोक सब कहै छै जे देवता-पितर कऽ बड़का-बड़का आखि होइ छै जे एक्के ठीन बैसल-बैसल सगरे दुनिया देखै अए। से आखि अखैन कतऽ चलि गेलइ। देवियो-देवता गरीबे-गुरबा कऽ जान मारै पाछु लागल रहै अए। जन-बोनिहारक काज करैक दू उखड़ाहा होइ अए। भिनसुरका आ दुपहरिया। भिनसुरका उखड़ाहा मे जँ एगारहो बजे पाइन भेलि वा कोनो बाधा भेलि त गिरहत थोड़े बोइन देत। अगर जँ जलखै भऽ गेल रहलै त बड़वढ़िया नइ तऽ जलखैइयो पार। यैह त ऐठामक चलनि छै। इ टिकजरुआ भगवान गिरहते कऽ मदति करै छै। जाड़ स कपैत सुवध मनोहर कऽ कहलक- ‘बौआ, सोचै छलौ जे आन दिन रोपैन करै मे अबेर भऽ जाइ छलै जइ से अपन काज नइ सम्हरै छलै, मुदा आइ सबेरे-सकाल रोपैन होइत त अपनो बाड़ीक खेत रोपि लइतौ। से सब भगंठि गेल। कखैन पाइन छुटत कखैन नै, सेहो ठीक नहि। दुनू बापूत गप-सप करिते छल कि तड़-तड़ा कऽ ठनका ओहि गाछ पर गिरल। जइठीन से दुनू डारि फुटल छलै तकरा चिड़ैत माइट मे चलि गेल। चीड़ा कऽ गाछ दुनू भाग खसल। एक फँाकक तर मे तौनकी आ दोसर फाँकक तर मे दुनू बापूत मोटका डारिक तर मे पड़ि गेल। पाइन छुटल। सैाँसे गाम मे हल्ला हुअए लगलै जे बाध मे जे आमक गाछ छलै से खसि पड़लै। भरिसक ओही पर ठनका खसलै। एक्के-दुइये लोक देखै ले जाइ लगल। काते मे ठाढ़ भऽ भऽ लोक देखैत। गाछो पर आ गाछक निच्चो मे (जमीनो पर) तते घोरन पसरि गेलै जे लोक गाछक भीर जाइक हिम्मते ने करैत। मुदा, जीवठ बान्हि करिया गाछक जड़ि देखै बढ़ल। घोरन त खूब कटै, मुदा तइयो हिम्मत कऽ करिया जड़ि लग पहुँचल। ठनकाक आगिक चेन्ह ओहिना दुनू फाँक मे। जड़ि लग ठाढ़ भऽ ओ हिया-हिया देखै लगल। देखैत-देखैत मनोहरक टाँग पर नजरि पड़लै। टाँग पर नजरि पड़िते हल्ला करै लगल जे एक गोरे तर मे पिचाइल अछि। दौड़ि कऽ अवै जाइ जा एकरा बहार करह? करियाक बात सुनि चारु भर स लोक बढ़ल। देखैत-देखैत तीनू गोरे पर नजरि पड़लै। हल्ला करैत करिया कुड़हरि अनै घर पर दौड़ल। तीनू खून बोकरि-2 मरल। मुदा तइओ सब बचा-बचा कऽ डारि काटै लगल। डारि काटि सील उनटौलक त तीनू थकुचा-थकुचा भेल। पहिने त कियो नै चिन्हलक, किऐक त तीनू बेदरंग भऽ गेल। मुदा भाँज लगौला पर पता चललै जे दुनू बापूत सुवध कक्का छी आ पुतोंहू छियै। अखन धरि मरनी, अंगने मे, दुनू बच्चा कऽ खेलबैत। गौरिया आबि कऽ कहलकै- ‘दादी, तोरे अंगनाक सब गाछक तर मे दवा कऽ मरि गेलउ।’ गौरियाक बात सुनितहि मरनी अचेेत भऽ खसि पड़ल। दुनू बच्चा सेहो चिचिया लगलै। मरनी कऽ अचेत देखि अलोधनी मुह पर पानि छीटि बिअनि हौंकै लागलि। कनिये कालक बाद होश भेलइ। होश मे अबितहि मरनी फेरि बपहारि कटै लगल। बच्चा कऽ कोरा मे लऽ मरनीक संग अलोधनी देखै ले विदा भेलि। गाछ लग पहुँचते, तीनू गोरे केँ मुइल देखि मरनी ओंघरनिया कटै लागलि। ओंघरनिया कटैत देखि करिया पजिया कऽ पकड़ि मरनी कऽ कात लऽ गेल। मरनीक दशा देखि सब सन्त्वना दिअए लगल। मुदा मरनीक करेज थीरे ने रहै। विचित्र स्थिति मे पड़ल। एक दिशि परिवार कऽ नाश होइत देखए त दोसर दिशि दुनू बच्चाक मुह देखि कनी-मनी आशा मन मे जगै। चारि साल पहिलुका नहि, आब नव मरनीक जन्म भेल। जहिना आगि मे तपै स पहिने सोनाक जे रंग रहैत तपला पर जहिना चमकि उठैत तहिना। ओना समाजोक वेवहार जे पहिलुका छलै अहू मे बदलाव एलै। कियो खाइक बौस दऽ जाइत त कियो बच्चो आ अपनो ले नुआ- बस्तर। जखन ककरो भाँज मे कोनो काज अबै तऽ ओ मरनियो कऽ लइत। जहिना परिवार मे बूढ़ आ बच्चाक प्रति जे सिनेह ओहने सिनेह मरनीक प्रति समाजोक बीच हुअए लगलै। अपनो जीबैक आशा आ बच्चोक, मरनी कऽ नव स्फूर्ति सेहो पैदा केलक। एते दिन मरनीक हाथ मे पुरने औजार (खेतीक) टा रहै छलै ओ आब बढ़ि क दोवर भ गेल। हँसुआ, खुरपी, टेंगारी, कोदाइरिक संग-संग हथौरी, गैंचा सेहो आबि गेलइ। समय आगू बढ़ल। देशक विकासक गति सेहो, बहुत तेज नहि मुदा किछु गति त जरुर पकड़लक। गाम-गाम मे बान्ह-सड़क, पुल-पुलिया, स्कूल, अस्पताल सेहो बनै लगल। जहि स खेतिहर बोनिहार कऽ सेहो काज बढ़ल। मरनियो छिट्टा मे माटि उघब, पजेबा उघब, गिट्टी फोड़ब, सुरखी कुटब सीखि लेलक। जहि स बेकारी मेटाएल। रोज कमेनाइ रोज खेनाइ घरि गरीबो पहुँच गेल। भलेही जिनगी मे बहुत अधिक उन्नति नइ एलै मुदा जीवैक आशा जरुर जगलै। मुदा इ सब काज छतौनी मे नहि, पास-पड़ोसक आन-आन गाम मे हुअए लगलै। जहि मे छतौनियोक बोनिहार सब काज करै लगल। छतौनियोक दिन घुरलै। सात किलोमीटर पक्की सड़क (पीच), जे एन.एच. स लऽ कऽ रेलवे स्टेशन क जोड़ैत, छतौनिये होइत बनैक शुरु भेल। जहिये स प्रधान मंत्री ‘ग्राम सड़क योजनाक’ छतौनी होइत बनैक चरचा भेलि, तहिये स छतौनीक लोकक मन मे खुशी अबै लगलै। गामक लोकक त ओहन दशा नहि जे बस, ट्रक कीनैक विचार करैत। मुदा तइओ एते बात जरुर एलै जे बरसात मे जे घर स बहराएव कठिन छलै ओ आब नै रहतै। किछु गोटेक मन मे इ बात जरुर होइत जे एते दिन बिना जूत्तो-चप्पल कऽ काज चलैत छल, से आब नै चलत। आड़ि-घुर (माटि) पर चलला स, बेसी स बेसी काँट-कुश गरैत छल मुदा पीच भेने शीशाक टुकड़ी, लोहाक टुकड़ी सेहो गरत। जहि स पाएरक नोकसान बेसी हैत। मुदा फेरि मन मे अबै जे एते दिन कम आमदनी रहने जूत्ता-चप्पल नै कीनि पबै छलौ से आब नै हैत। नइ वेसी त एक्को जोड़ा जरुरे कीनि लेब। जइ से पाएर मे बेमाइयो ने फँटत। प्रधानमंत्री योजनाक सड़क बनै लगल। मुदा जते आशा बोनिहार सब कऽ छलै तते नै भेलइ। किऐक त माइटिक काज शुरु होइते रंग-विरंगक गाड़ी सब पहुँचै लगल। जे माइटिक काज बोनिहार करैत ओ ट्रेक्टर करै लगल। ओना काजक गति तेज रहै मुदा बोनिहारक बेकारी बरकरारे रहलै। सड़क पर माटि पड़िते रौलर आबि सरियाबै लगल। खेनाइ-पीनाइ छोड़ि धियो-पूतो आ जनिजातियो भरि-भरि दिन देखते रहैत। ओना बूढ़ो-पुरान देखैत मुदा घरक चिन्ता खीचि कऽ काज दिशि लऽ जायत। पनरहे दिन मे सातो किलो-मीटर सड़क पर माइटिक काज सम्पन्न भऽ गेलइ। एकदम चिक्कन, उज्जड़ धप-धप। घर एते ऊँच सड़क बनि गेलि। माइटिक सड़क बनिते बड़का-बड़का ट्रक चिमनी स ईंटा खसवै लगल। ऐँह, अजीब-अजीब ट्रको सब। एते दिन छह पहिये ट्रक टा गामक लोक देखने मुदा एहि सड़क केँ बनने दस पहिया स लऽ कऽ अट्ठारह पहियावला ट्रक सब कऽ सेहो देखलक। तीनिये दिन मे सातो किलोमीटरक ईंटा खसा देलक। मुदा पजेवा पसारैक काज त इंजन नहि करत। ओ त लोके करत। मुदा ओहिक लेल त अनुभवी (एक्सपर्ट) लोकक जरुरत हैत। जे छतौनी मे नहि। तेँ, बाहरे स अनुभवी मिसतिरी आओत! मुदा तेहेन बड़का ठीकेदार सड़क बनवैत जे अनेको सड़क एक चलवैत। एक्के दिन तते अनुभवी मिसतिरी ईंटा पसारै ले आयल जे सबके बुझि पड़लै जे दुइये दिन मे सातो किलो-मीटर पजेवा पसारि देत। मुदा ईंटा उघै ले ते मजदूर चाहियै। पहिले-पहिल दिन छतौनीक बेनिहार कऽ काज भेटिलै। पजेबा पसरै लगल। धुरझाड़ काज चलै लगल। छतौनीक सब बोनिहार खुशी स काज करै लगल। तहि बीच पजेबा पर पसारै ले फुटलाह पजेवा ट्रक स अबै लगल। दोहरी काज देखि छतौनीक बोनिहारक मन खुशी स नचै लगल। किऐक त गिट्टी फोड़ै ले गामेक बोनिहार कऽ काज भेटितै। मुदा ठीकेदारक मुनसी, अपने खाई-पीबै दुआरे, सस्ते दर सऽ गिट्टी फोड़ैक रेट लगा देलक। एक ट्रेक्टर पजेबा फोड़ैक दर साठिये रुपैया दइ ले तैयार भेल। एक-दू दिन त लोक (बोनिहार) गिट्टी फोड़ब बन्न केलक, मुदा पेटक आगि मजबुरन सबकेँ ल गेलइ। मरनी सेहो गिट्टी फोड़ै लागलि। एक ट्रेक्टर गिट्टी फोड़ै मे वेचारी कऽ चारि दिन लगैत। मुदा की करैत? एहि सड़क स पहिने जे सड़क बनइ, ओ रिआइत-खिआइत रहि जाय। किऐक त माइटिक काज भेला पर साल-दू साल पजेबा वैइसै मे लगइ। जहि स माटि ढ़हि-ढ़ूहि उबड़-खाबड़ बनि जाय। बड़का-बड़का खाधि सड़क पर बनि जाइत। तहू मे तीनि नंबर पजेवा फुटि-भाँगि कऽ गरदा बनि जायत। गामक धियो-पूतो उठा-उठा खेत-पथार मे फेकि देइत। कोठीक गोरा बनवै ले स्त्रीगण सब नीकहा ईंटा उठा-उठा ल जाइत। मुदा अइबेरि से नै हैत। दुइये मास मे सड़क बनवै शर्त ठीकेदार कऽ अछि। जाबे बरखा खसत-खसत ताबे सड़क बनि जाएब छैक। पचास बर्खक मरनी, जे देखै मे झुनकुट बूढ़ि बूझि पड़ैत। सैाँसे देहक हड्डी झक-झक करैत। खपटा जेँका मुह। खैनी खाइत-खाइत अगिला चारु दाँत टूटल। गांगी-जमुनी केश हवा मे फहराइत। तहू मे सड़कक गरदा स सब दिन नहाइत। मुदा तइओ मरनी अपन अखि बचैने रहैत। किऐक त जखन पुरबा हवा बहै त पछिम मुहे घुरि क गिट्टी फोड़ै लगैत आ जखन पछवा बहै लगैत त पूब मुहे घुरि जाइत। बीच-बीच मे सुसताइयो लइत आ खैनियो खा लइत। मुदा तइओ ओकर मुह कखनो मलिन नै होय। किऐक त हृदय मे अदम्य साहस आ मन मे असीम विसवास सदिखन बनल रहैत। तेँ, मुह कखनो मलिन नहि होय, सदिखन हँसिते रहए। भिनसुरके उखड़ाहा। करीब नअ बजैत। पूब मुहे घुरि मरनी गिट्टी फोडै़त। तहि बीच, पच्चीस-तीस बर्खक सुगिया माथ उधारने, छपुआ बनारसी साड़ी आ ओहि रंगक आंगी पहिरने, घुमौआ केश सीटि जुट्टी लटकौने, ऐँड़ीदार चमड़ौ-चप्पल आ मोजा लगौने, मुह मे पान सौ नम्बर पत्ती देल पान खेने, डोलची मे नूनक पौकेट, कड़ूतेलक शीशी, मसल्लाक पुड़िया, साबुन रखि हाथ मे लटकौने, आबि क मरनीक लग ठाढ़ भऽ गेलि। मरनीक मेहनत आ बगए देखि दिल खोलि मने-मन हँसै लागलि। मरनी गिट्टी फोड़ै मे मस्त। किऐक किम्हरो ताकत! सुगियाक हृदयक खुशी मुह स हँसी होइत निकलै चाहैत। मुदा मुहक पानक पीत ठोरक फाटक कऽ बन्न केने। तेँ पानक पीत फेकब सुगिया कऽ जरुरी भेलइ। जइ पजेबाक ढ़ेरी पर बैसि मरनी गिट्टी बनवैत, ओहि ढ़ेरी पर सुगिया भरि मुहक पीति फेकि देलक। पीतक दू-चारि बुन्न मरनीक देहो पर पड़लै। देह पर पड़िते ओ उनटि कऽ तकलक। टटका पीत चक-चक करैत। कनडेरिये आखिये मरनी सुगियाक मुह दिशि तकलक। सुगिया कऽ पान चिबबैत देखि मरनीक मन मे आगि पजड़ि गेलइ। पजेवाक ढ़ेरी देखलक। सैाँसे थूक पड़ल। मने-मन सोचलक जे आब कना गिट्टी फोरब। ढ़ेरियो आ देहो अँइठ कऽ देलक। आखि गुड़ारि कऽ मरनी सुगिया कऽ कहलक- ‘गइ रनडिया, तोरा सुझलौ नै जे ढ़ेरी पर थुक फेकिले? गरीब मरनीक कटाह बात सुनि सुगिया तमकि कऽ उत्तर देलक- ‘तोरे बान्ह छिऔ जे हम थुक नै फेकब। सुगियाक बोल कऽ दवैत मरनी बाजलि- ‘एते टा बान्ह छै, तइ मे तोरा कतौ थूक फेकैक जगह नै भटिलौ जे ऐठाम फेकले।’ सुगिया- ‘जदी एतै फेकलियै ते तू हमर की करमे?’ मरनी- ‘की करबौ। आँइ गै निरलज्जी, तोरा लाज होइ छौ जे सात पुरखा के नाक-कान कटौलही। जेहने कुल-खनदान रहतौ तेहने ने चाइल चलमे।’ सुगिया- ‘अपन देह-दशा नै देखै छीही?’ मरनी- ‘की देखबै। इ देह बोनिहारनिक छियै। तोरा जेँका कि हम कहियो बमैवला छैाँड़ा सेने, ते कहियो डिल्लीवला छैाँड़ा सेने बौआइ छी। एक चुरुक पानि मे डूबि के मरि जो। तीमन चिक्खी (चिख्खी) नहितन। जहिना सात घरक तीमन चिक्खै छैँ तहिना सात टा मुनसा देखै छैँ। हमर पड़तर सातो जिनगी मे हेतउ। जेकरा संगे बाप हाथ पकड़ा देलक, सहि मरि कऽ तेइ घर मे छी। छुछुनरि कहीं कऽ। आगि लगा ले अइ फुललाहा देह मे। मरनीक बात स सुगिया सहमि गेलि। मन मे डर पैसि गेलइ जे हो न हो कहीं मारबो ने करै। मुह सकुचबैत, मूड़ी गोति विदा भेलि। सुगिया कऽ जाइत देखि मरनी साड़ीक खूँट से तमाकुल-चून निकालि चुनबै लागलि। मुदा तइओ मन असथिर नइ भेलइ। मूड़ी उठा-उठा सुगियो दिशि देखै आ मने-मन बजबो करए ‘देह केहेन सीटने अछि, उढ़ढ़ी। जना रजा-महराजाक बोहू हुअए। हाथ-पाएर मे लुलही पकड़ने छनि जे कमा कऽ खेतीह। जेहने छुछुनरि छउरा सब तेहने छउरी सब।’ तमाकू खा मरनी ईंटा फोडै़ ले घुमल कि दादी-दादी करैत पोता दौड़ल आबि दुनू दुनू जाँघ पकड़ि ठाढ़ भ गेल। पाछू से पोतियो एलै। पोता कऽ कोरा मे उठा मुह मे चुम्मा ल पोती कऽ कहलक- ‘दाय, बौआ के रोटी नै देलही।’ दुनू गोरे चलि जाउ, मोरा मे रोटी रखने छी, लऽ कऽ दुनू गोरे खाए लेब। हम अखैन काज करै छी। कनीकाल मे आबि कऽ भानस करब।’ पोता-पोती, आंगन दिशि विदा भेल। पूब मुहे घुरि कऽ मरनी गिट्टी फोड़ै लगल। चारि टा बन्दूकधारी बड्डी-गार्डक संग सड़कक ठीकेदार उत्तर स दछिन मुहे सड़क देखैत जाइत आगू-आगू ठीकेदार पाछु-पाछु बन्दूकधारी। ठीकेदारक नजरि मरनी पर पड़ल। मरनी पर नजरि पड़ते ठीकेदारक डेग छोट-छोट हुअए लगल। ठीकेदारक आखि मरनी पर अटकि गेल। डेंग त आगू मुहे बढ़वैत, मुदा आखिक ज्योति हृदय मे प्रवेश कऽ हृदय कऽ हड़बड़बै लगल। मन मे अन्हर-तूफान उठै लगलै। जहि स मने-मन विचारै लगल जे जेकारा कमाइ पर हमरा चारि टा बड्डी गार्ड अछि, करोड़ो-अरबोक आमदनी अछि, तेकर इ दशा छैक। ओ त हमर ओहन समांग छी जे कमासुत अछि। ओहन त नहि जे ऐश-मौजक जिनगी बना कमेलहे सम्पत्ति कऽ भोगैत अछि। मुदा अँटकल नहि। आगू मुहे बढ़िते रहल। किछु दूर आगू बढ़ला पर जना मरनीक आत्मा आगू स रोकि देलक। बिचहि सड़क पर ओ (ठीकेदार) ठाढ़ भऽ गेल। ठाढ़ भऽ ओ एकटा सिपाही कऽ कहलक- ‘ओइ गिट्टी फोड़िनिहारि केँ कने बजौने आउ?’ ठीकेदारक बात सुनि एकटा सिपाही मरनी दिशि बढ़ल। मरनी लग जा ओ (सिपाही) कहलक- ‘मालिक (सरकार) बजबै छथुन। से कने चल?’ गिट्टी फोड़ब छोड़ि मरनी उनटि कऽ सिपाही दिशि तकलक। सिपाही कऽ देखि मने-मन सोचै लगल जे ने हम कोनो मैमला मे फँसल छी आ ने कोनो बैंकक करजा नेने छियै, तखैन किअए हमरा सिपाही बजवै आयल। मन सक्कत कऽ कऽ मरनी कहलक- ‘तू नै देखे छहक जे अखैन हम काज करै छी। जेकर बोइन लेबइ ओकर काज नै करबै। अखैन जा। काजक बेरि उनहि जेतइ, तब ऐबह।’ मरनीक बात ठीकेदारो आ सिपाहियो सुनैत। एक-दोसर कऽ देखि आखि निच्चा कऽ लिअए। मुदा ठीकेदारक मन पीपरक पात जेँका डोलैत। कखनो मरनीक इमानदारी पर मन नचैत त कखनो ओकर अवस्था पर। जहि देशक श्रमिक एते श्रम मे विसवास करैत अछि ओहि देशक विकास जँ बाधित अछि त जरुर कतौ नै कतौ संचालनकर्ताक बेइमानी छैक। इ बात मन मे अबिते ठीकेदार अपना दिशि घुरि कऽ तकलक, त अपन दोख सामने अबि ठाढ़ भऽ गेलइ। सिपाही कड़कि कऽ मरनी केँ कहलक- ‘नइ जेवही ते पकड़ि कऽ लऽ जवउ? सिपाहीक गर्म बोली सुनि मरनी कहलक- ‘तोहर हम कोनो करजा खेने छिअह जे पकड़ि कऽ लऽ जेबह। अपन सुखलो हड्डी के धुनै छी, खाइ छी।’ मरनीक बात सुनि सिपाहियोक मन उनटै-पुनटै लगलै। एक दिशि मालिकक आदेश दोसर दिशि मरनीक विचार। आखिर, ऐहेन लोकक बीच ऐहेन सक्कत विचार अबैक कारण की छै? अनका देखै छियै जे सिर्फ सिपाहीक बरदी (वर्दी) देखि डरा जाइत अछि, भलेही ओ सरकारक सिपाही नहियो रहए। मुदा हमरा त सब कुछ अछि तइओ अइ बुढ़िया कऽ डर नै होइ छै। फेरि मन मे एलै जे हम किछु छी त नोकर छी, मुदा इ किछु अछि त स्वतंत्र ओनिहारि। स्वतंत्र देशक स्वतंत्र श्रमिक। जे देशक आधार छी। आखिर देश ते ऐकरो सबहक छिअए। सिपाही कऽ ठाढ़ देखि ठीकेदारे पाछु ससरि कऽ मरनी लग आयल। मरनियो सब केँ देखैत आ मरनियो कऽ सब। ठीकेदार, मरनीक अखि देखैत। आखि मे सुरुजक रोशनी जेँका प्रखर ज्योति। ललाट स आत्म-विश्वास छिटकैत। मधुर स्वर मे ठीकेदार पूछलक- ‘चाची, अहाँक परिवार मे के सब छथि?’ ठीकेदारक प्रश्न सुनि मरनीक आखि मे नोर अबै लगलै। मन पड़ि गेलइ अपन पति, बेटा आ पुतोहूक मृत्यु। टघरैत नोर कऽ आँचर स पोछि, बाजलि- ‘बौआ, हमर घरवला, बेटा आ पुतोहू ठनका मे मरि गेल। अपने छी आ पिलुआ जेँका दू टा पोता-पोती अछि।’ ठीकेदार- ‘बच्चा सब स्कूलो जाइ अए?’ ‘नै। एक त गाम मे इस्कूल नै छै। तहू मे, पहिने गरीब लोकक धिया-पूता के पेट भरतै, तब ने जायत। ने भरि पेट अन्न होइ छै, आ ने भरि देह वस्त्र, ने रहैक घर छै, तखन इस्कूल कना जायत।’ मरनीक बात सुनि ठीकेदार सहमि गेल। मने-मन सोचै लगल जे आखिक सोझ मे देखै छियै, ओ झूठ कोना भऽ सकैत अछि। एत्ते भारी (कठिन) काज केनिहारिक देह पर कारी खट-खट कपड़ा छै, तोहू मे सइओ चेफड़ी लागल छै, काज करै जोकर उमेर नै छै, तइ पर एते भारी हथौरी पजेबा पर पटकैत अछि। ठीकेदारक मन दहलि गेलइ। जहिना अकास आ पृथ्वीक बीच छितिज अछि, जाहि ठाम जा चिड़ै-चुनमुनी लसकि जाइत अछि, तहिना ठीकेदारक मन सुख-दुखक बीच लसकि गेल। जना सब कुछ मनक हरा गेलइ। शून्न भ गेलइ। ने आगूक बाट सूझै आ ने पाछुक। मरनी स आगू की पूछब से मन मे रहवे ने केलइ। साहस बटोरि पूछलक- ‘भरि दिन मे कते रुपैया कमाइ छी?’ ठीकेदारक प्रश्न सुनि मरनीक मन मे झड़क उठल। बाजलि- ‘कते कमाएव! जेहने वइमान (बैमान) सरकार अछि तेहने ओकर मनसी छै। चारि दिन मे एकटा ढ़ेरी (पजेवाक) फोड़ै छी ते तीनि-बीस (साइठ) रुपैया दइ अए। अइ से तीनि तूर के पेट भरत। भरि दिन ईंटा फोड़ैत-फोडै़त देह-हाथ दुखाइत रहै अए, मुदा एकटा गोटियो कीनव से पाइ नै बँचै अए। ठीकेदारक आखि मे नोर आबि गेलइ। मनुष्यता जागि गेलइ। मुदा, इ मनुष्यता कते काल जिनगी मे अँटकतै? जिनगी त उनटल छै। जहि मे मनुष्यता नामक कोनो वस्तु नहि छैक। अइ छौड़ा केँ कोना किछु करै ले कहबै। ओकरे देखैले ने 81.घरदेखिया नीन्न टुटितहि लुखियाक नजरि दिन भरिक काज पर पड़लै। काज देखि मन मे अबूह लाग’ लगलनि। असकता गेलीह। मुदा तइओ हूबा क’ क’ उठ’ चाहलनि कि आंखि पूबरिया घरक छप्पर पर गेलनि। बिहाड़ि मे मठौठपरक खढ़ उड़िया गेल छलैक। हड्डी जेँका बाती झक-झक करैत। मन मे एयलनि जे ‘‘की कहत ब’रतुहार?’’ कहत जे मसोमातक घर छियै, तेँ मठौठ उजड़ल छैक। खौंझ उठलनि। ठोर पटपटबैत- ‘‘जेहने नाशी डकूबा बिहाड़ि तेहने झड़कलहा कारकौआ। जुट बान्हि-बान्हि आओत आ लोल स खढ़ उजाड़ि-उजाड़ि छिड़िऔत’।’’ नजरि निच्चा होइतहि दछिनबरिया टाट पर पड़लनि। बरसातमे टाटक आलन गलि क’ झड़ि गेल छलैक। मात्र कड़ची-बत्ती टा झक-झक करैत। जहि स’ ओहिना दछिनबरिया बँसबिट्टी देखि पड़ैत। बेपर्द आंगन। मन खिन्न होवय लगलनि। मनमे एयलनि जे पुरना साड़ी टाटमे टांगि देबइ। मुदा ब’रतुहारक आंखिमे की कोनो गेजर भेलि रहतइ जे नहि देखत। तहूमे साड़ी स’ कते अन्हरायत। ओहिना सब किछु देखत। आरो मन निच्चा खसैत जायत। बाप रे की कहत ब’रतुहार? नागेसर(दिओर) पर तामस उठै लगलनि। कोन जरुरी छलनि जे कौल्हुके दिन द’ देलखिन। घर-अंगना चिक्कन क’ लैतहुँ तहन अबैक दिन दैत’थिन। कोनो की हमर बेटा बाढ़ि मे दहाइल जाइत छलैक। पाँच दिन आगुएक दिन भेने की होइतै? तामस बढ़लनि। तहि बीच आंखि टाट पर स’ निच्चा उतड़लनि। नजरि पड़लनि अंगनाक पनिबट पर। झक-झक करैत झुटका। उबड़-खाबड़ सौँसे आंगन। तहूमे जे झुटका सरिआम मे अछि ओ त’ नहि, मुदा जे अलगल अछि ओ त’ चुभ-चुभ गरैत अछि। सौँसे अंगना सरिअबैमे, कम स’ कम, दस छिट्टा माटि लागत। दस छिट्टा माटि उघि, ढ़ेपा फोड़ि, सरिया क’ पटबै मे त भरि दिन लगि जायत। तखन आन काज कोना हएत? काजक तर मे दबा लगलीह। तामस आरो लहरै लगलनि। अबूहो लगनि। ओछाइने पर पड़ल-पड़ल भार स’ दबैत जायत। दुइये माय-पूत की सब करब? तहू मे आइ घरदेखिया आओत। छौँड़ा केँ ते अपने मारिते रास काज हेतै। कानी छटौत। अंगा-घोती खीचत। आइरन करबैले गंज पर जायत। गमकौआ साबुन स’ नहायत। तेल लेत। बाबरी सीटत। तेहेन ठाम कोदारि-खुरपी चलबै ले कोना कहबै। लोहे छिअए, जँ किनसाइत लागिये जाय। तखन त’ आरो पहपटि हैत। कथकिया जे हाथ-पाएर मे पट्टी बान्हल देखितै, तँ की कहत? मनक तामस निच्चा मुहे ससरै लगलनि। तामस उतड़ितहि नजरि घरदेखियाक खेनाइ-पीनाइ पर पहुँचलनि। आन काज त रहियो-सहि क’ भए सकैत अछि मुदा दूध त एक दिन पहिने पौड़ल जायत। जँ से नहि पौड़ब त दही कोना हएत। शुभ काज मे ज दहिये नहि होएत त काजक कोन भरोस। एक त महीसिबला सब तेहेन अछि जे दूध से बेसी पानिये मिला दइत छैक। नबका मटकुरियो ने अछि, जे पानियो सोखि लइतैक। मन मे खौंझ उठै लगलनि। मुदा नजरि चाउर-दालि दिशि बढितहि तामस दबलनि। बेटाक घरदेखिया आओत, हुनका कोना खेसारी दालि आ मोटका चाउरक भात खाइ ले देबनि। लोको दुसत आ अपनो मन की कहत। कियो किछु कह’ वा नहि मुदा कुल-खानदानक त नाक नहि ने कटा लेब। जँ इज्जतिऐ नहि त जिनगिये की? मन पड़लनि घैल मे राखल कनकजीर चाउर। कनकजीर चाउरक भात आ नवका कुटुम मन मे अबितहि लुखिययाक हृदय पघिलल केरा जेँका पलड़ै लगलनि। मने-मन भातक प्रेमी दालिक मिलान करै लगलीह। मेही भात मे मेही दालिक मिलान नीक हएत। मुदा खेरही-मसुरी दालि त भोज-काज मे नहि होइत। होइत त बदाम-राहड़िक। मुदा राहड़ि त घर मे अछि नहि। बांेग्मरना बाढ़ियो तेना दू साल स अबैत अछि जे एक्को डाॅट राहड़ि नहि होइत अछि। तत्-मत् करैत फेरि मन झुझुआ गेलनि। बिना आमिले राहड़िक दालि केहेन हएत? आमक मास रहैत त चारि फाँक कँचके आम द’ दीतिऐ। सेहो नहि अछि। फेरि मन आगू बढ़लनि, पहिल-पहिल समैध-समधीन बनब आ एगारहो टा तरकारी खाइ ले नहि देबनि, से केहेन हएत। गुन-धुन करै लागलीह। गुन- धुन करितहि बर-बरी-अदौरी मन पड़लै। एक्के दिन मे कोना ओरियान हएत? घाटिये-बेसन बनवै मे त तीनि दिन लागत। तखन कोना होयत? फेरि तामस पजरै लगलनि। मन फेरि खौंझा गेलनि। बजै लागलीह-‘‘ इ सबटा आगि लगौल नगेसराक छी। जाबे ओकरा छितनी स चानि नहि तोड़ब ताबे ओकरा बुद्धि नहि हेतइ। तमसाइले नागेसरक आंगन दिशि बजैत बढ़लीह। पुरुख छी कि पुरुखक झड़। जहि पुरुख केँ काजक हिसाबे नहि जोड़’ आओत ओहो कोनो पुरुखे छी। ओहि स नीक त मौगी। नागेसर नदी दिशि गेल छल। नागेसरकेँ नहि देखि लुखिया डेढ़िये पर अनधुन बजै लागलि। मुदा भुरकुरिया(नागेसरक पत्नी) चुप-चाप सुनैत। किछु बजैत नहि। किऐक त मने-मन सोचैत जे दिओर-भौजाइ बीचक बात छी, तहि बीच हम किऐक मुंह लगबी। बजैत-बजैत लुखियाक पेटक बात सठल। बात सठितहि तामसो उतड़ल। बोलीक गरमी क’ कमैत देखि भुरकुरिया बाजलि- ‘‘अंगना चलथु दीदी। बीड़ी पीबि लेथु, तखन जइहथि।’’ घर स बीड़ी-सलाइ निकालि दुनू गोटे ओसार पर बैसि गप-सप करै लागलि। सलाइ खरड़ैत भुरकुरिया बाजलि- ‘दीदी, आब पीहुओ केँ जुआन होइ मे देरी नइं लगतनि। कंठ फुटि गेलै।’ भुरकुरियाक बात सुनि लुखिया हरा गेलीह। जुआन बेटाक सुख मन मे नचै लगलनि। लुखिया क’ आनन्दित होइत देखि पुनः भुरकुरिया बाजलि- ‘‘भइयो स बेसी भीहिगर जवान पीहुआ हेथिन।’’ खुशी स लुखियाक हृदय बमकि गेलनि बजलीह- ‘‘कनिव्माँ, खाइ-पीबैमे की कोनो कोताही छौँड़ा केँ करै छियै। एक त’ भगवान नउऐं-कउऐं क’ एकटा बेटा देलनि। तेकरो ज’ सुख नै होय त’ एते खटबे ककरा ले करै छी। बापक मन त’ परुँके वियाह करैके रहै मुदा तइ बीच अपने चलि गेल। आब साल लगलै तेँ अइ बेरि जेना-तेना वियाह कइये देबइ।’ कहि आंगन दिशि विदा भेलि। अंगना स निकलितहि मन नागेसर पर गेलनि। सोचै लागलीह, ओहि(नागेसरक) बेचाराक कोन दोख छैक। ओहो की कोनो अधलाह केलक। हुनको मनमे ने होइत हेतनि जे झब दे पुतोहू घर आबै। एखन त वैह ने बाप बनि ठाढ़ छथिन। मुदा काज अगुताइल केलनि। गरीब छी, तेकर माने ई नहि ने जे इज्जति नहि अछि। इज्जति केँ त’ बचा क’ राखै पड़ैत छैक। नव कुटुमैती भ’ रहल अछि। नव कुटुम्ब दुआर पर औताह। हुनका जँ पाँच कौर खाइयो ले नहि देबनि, से केहेन हएत। स्वागत की कोनो धोतिये-टाका टा स’ होइत छैक? आ कि दू टा बोल आ दू कौर अन्नो स होइत छैक। जेहेन पाहुन रहताह तेहने ने बेबहारो(व्यवहारो) करै पड़त। फेरि मन मे तामस उठै लगलनि। ऐहेन पुरुखे की जिनका धियो-पूतोक वियाह करैक लूरि नहि होइन। तहि बीच मन पड़लनि चाह-पान। चाहो-पानक ओरियान त करै पड़त। ऐहन नहि ने हुअए जे एक दिशि करी आ दोसर दिशि छुटि जाय। चाहे-पान टा किअए, बीड़ीओ-तमाकुलक ओरियान करै पड़त ने। ईं की कोनो शहर-बजार छिअए जे लोक एक्के- आधे टा अम्मल रखैत अछि। ई त गाम छियैक, एहिठाम त एक-एक आदमी पनरह-पनरह टा अमल डेबैत अछि। अपनहि विचार मे लुखिया ओझरा गेलीह। किछु फुड़बे ने करै। बुकौर लगै लगलनि। आंखि मे नोर ढ़बढ़वा गेलनि। मन मे उठै लगलनि जे घर त पुरुखेक होइत छैक। एते बात मन मे अवितहि लुखिया बाट पर आबि नागेसरक बाट देखए लगलीह। नदी दिशि स अवैत नागेसर पर नजरि पड़लनि। नजरि पड़ितहि बजलीह- ‘‘काल्हि घरदेखिया औताह आ अहाँ निचेन स टहलान मारै छी।’’ नागेसर- ‘‘अच्छा चलू। बैसि केँ सब विचारि लइत छी।’’ दुनू गोटे आंगन दिस बढ़ल। ओचाओन खरड़ैत पीहुआ क’ देखि नागेसर कहलखिन- ‘‘एखन तू ऐंठार चिक्कन करै छेँ की जा क’ बाबरी छँटा अयमे? काजक अंगना छिऔ, तेँ पहिने बाहरक काज समेटि लेमे की घरे-अंगनाक काज करै छेँ। जो, जल्दी जो।’’ खरड़ा राखि पीहुआ विदा भेेेेेेेेेेेेेेेेेेल। लुखियाक नजरि बदलल। जहिना चश्माक शीशाक रंग दुनियाँक रंग क बदलि दै छै, तहिना लुखियाक नजरि नागेसरक बदलल रुप कें देखलनि। बदलल रुप देखितहि सिनेह उमड़ि पड़लनि। सिनेह स बजलीह- ‘एते लगक दिन किअए देलियै? चारि दिन आगूक दीतिएनि। भरिये दिन मे सब काज सम्हारल हैत?’’ लुखियाक समस्या कें हल्लुक बनबैत नागेसर कहलखिन- ‘‘आइ पहिल दिन घरदेखिया घर-बर देखै औत आ कि खाइन-पीउन करै ले? पसिन्न हेतनि त’ खेता-पीताह, नहि त’ अपना घरक रस्ता धरताह। एखन ओ बटोही बनि औताह। तेँ हमरो ओते सुआगतक जरुरत नहि। जखन पीहुआ पसिन हेतनि, बियाह करब गछताह, तखन ने किछु, आ कि समधीन बनै ले बड़ अगुताइल छी? होइए जे कखैन समैधिक संग होरी खेलाइ?’’ समधिक संग होरी खेलाएव सुनि लुखियाक मन उड़िया लगलनि। बजलीह- ‘‘हम कि कोनो समैधिये भरोसे फगुआ रखने छी, दिअर कोन दिन ले रहत?’’ लुखियाक मन स’ चिन्ता पड़ा गेलनि। मुस्की दैत बजलीह-‘‘ बाटो-वटोही ज’ दुआर पर औताह त’ एक लोटा पानियो नहि देबनि?’’ नागेसर- ‘‘से त देबे करवनि। यैह इज्जति त’ हमरा सभक बाप-दादाक देल अमोल धरोहर छी। खुशी स भसिआयत लुखिया कहलनि- ‘‘पुरुषक थाह हम नहि पाएब।’’ नागेसर- ‘‘कनी कालमे बजार जायब। जे सब जरुरीक बस्तु अछि से सब कीनि आनब। तइ ले एते माथा-पच्ची करैक कोन जरुरी। अतिथिक सुआगत मात्र नीक-निकुति खुऔनहि होइत? आ कि प्रेम-पूर्वक समय(तुक) पर खुऔने होइत। बैसैक (बैसिबाक) लेल चद्दरि साफ केलहुँ? सिरमो खोल खीचि लेब।’’ ‘‘सिरमामे खोल कहाँ अछि? ओहिना पुरना साड़ीक बनौने छी।’ ‘ओहू ले दू टा खोल कीनने आयब।’’ ‘‘बड़बढ़ियाँ।’’ दोसरि साँझि, आंगन मे बैसि नागेसर पीहुआ केँ पुछलक- ‘‘तोरा जे नाम पुछथुन्ह त’ की कहबुहुन?’’ पीहुआ- ‘‘से कि हमरा नाम नइं बुझल अछि। बउओक, माइयोक आ गामोक नाम बुझल अछि।’’ ‘‘ओते नै पुछै छिऔ। अपने टा नाम बाज?’’ ‘‘पीहुआ’’ ‘‘धुर बुड़िबक। पीहुआ नहि पुहुपलाल कहिहनु।’’ ‘‘ से हमर नाम पुहुपलाल कहाँ छी। पहिने सब कहैत रहए आब त सब पीहुऐ कहैत अछि। एहिना ने लोकक नाम बदली होइत रहै छै।’’ मुह विजकबैत लुखिया कहलक- ‘‘हँसी-चैल मे लोक तोरा पीहुआ कहै छौ आ कि जनमौटी नाओ छिऔ।’’ छठियार राति, दाय-माय पुहुपलाल नामकरण केलखिन। जखन ओ आठ-दस बर्खक भेल, तखन जाड़क मास बाध मे फानी लगबै लगल। गहीर खेत सब मे सिल्लियो आ पीहुओ आबि-आबि धान चभैत। जकरा ओ फानी लगा-लगा फँसवैत। अपनो खाइत आ बेचवो करैत। किछु दिनक बाद स्त्रीगण सभ पीहुआवला कहै लगलैक। फेरि किछु दिनक पछति(भौजाइ सभ) पीहुआ कहै लगलैक। मुदा तेकर एक्को मिसिया दुख ने पीहुऐ केँ होयत आ ने पीहुआ माये-बापकेँ। तेँ पुहुपलाल बदलि पीहुआ भए गेल। मने-मन नागेसर बिचारलक जे ई(पीहुआ) ऐना नहि सुधड़त। अखन सिखाइयो देबइ तइओ बजै काल मे बजिये देत। से नहि त दोसर गरे काज लिअए पड़त। लुखिया क’ कहलक- ‘‘मोटरी खोलि सब सामान मिला लिअ।’’ दुनू दिओर-भौजाइ सब समान मिलबै लगल। धोती देखि दुनूक बीच मतभेद भए गेल। कन्यागतक विदाइक लेल एक्के जोड़ धोती नागेसर कीनि क’ अनने छले। किएक त’ बुझलक जे बेटीवला धोती नहि पहिरैत अछि। मुदा से बात लुखिया बिसरि गेलि छलीह। तेँ बजलीह- ‘‘दू गोटे औताह, तखन एक जोड़ धोती स की हएत? कम से कम तँ जोड़ो क’ केँ करबनि। जकरा बेसी रहै छैक ओ पाँचो टूक कपड़ा विदाइ करैत अछि।’’ सामंजस्य करैत नागेसर- ‘‘हमरो सासुरक धोती रखले अछि। काज पड़त त’ द’ देबनि।’’ ‘‘गुलाबिये रंग मे रंगल अछि। एकरो गुलाबिये मे रंगि लेब। रंगो कीनि क’ नेनहि आयल छी।’’ दोसर दिन, सवेरे सात बजे कन्यागत दुनू बापूत पहुँचल। कन्यागत क’ अबै स पहिनहि नागेसर एकचारी मे बिछान बिछा, तैयार छल। नबका खोलक सिरमो सिरा दिशि देने। कन्यागत केँ अबितहि नागेसर ठेेंगा-छत्ता रखि पैर धोय ले लोटा बढ़ौलकनि। चाह-पान आनै लुखिया पछुआरे बाटे लफड़ल चैक दिशि विदा भेलि। जाधरि दुनू बापूत डोमन हाथ-पाएर धोय, कुशल-क्षेम करैत, विछान पर बैसिलाह ताधरि लुखियो चैक पर स चाह-पान कीनि अनलक। नागेसरक दुनू आँखि दुनू दिस। तँ देखि लेलक जे चाह आबि गेल। पीहुआ के कहलक- ‘‘बौआ, चाह नेने आबह?’ पीहुआ- ‘‘पानो।’’ ‘‘पहिने चाह लाबह। पछाति पान अनिहह।’’ पीहुआक बोली डोमन सुनि लेलनि। तेँ नाम-गाम पूछैत जरुरते नहि रहलनि। दोहारा, नमगर देह। मने-मन डोमन लड़िका पसन्द क’ लेलनि। आंखिक इशारा स’ डोमन बेटा बुचन के पुछलखिन। आंखिऐक इशारा स वुचन सेहो स्वीकृति द’ देलकनि। दुनू बापूतक मुह मे हँसी नाचि गेलनि। मुदा लगले डोमनक मन मे एकटा शंका पैसि गेलनि। शंका ई जे मरदा-मरदी परिवार नहि अछि तेँ हो ने हो कोनो छोट-छीन बाधा ने बीच मे आबि भंगठा दिअए। चाह पीवि पान खा डोमन नागेसर के कहलथिन- ‘‘समैध, जाबे भानस होइत अछि ताबे बाध दिशि स घुमि अबै ले चलु। हँ, एकटा बात त कहबे ने केलौ, तीमन-तरकारी बेसी नै करब। किऐक त सात-आठ दिन से लगातार माछ खेलहुँ, पेट गड़बड़ भ’ गेल अछि। गाम मे रहितहुँ त मड़बज्झू भात आ केेरा चाहे भांटाक सन्ना संगे खइतहुँ। मुदा से त ऐठाम नहि हएत। तेँ दालि-भात एकटा तरकारी(सजमनि चाहे झिंगुनीक) बना लेब। तहू मे बेसी मसल्ला नै देबैक।’’ बीड़ी, सलाइ गोलगलाक जेबीमे रखि नागेसर लुखिया केँ कहै आंगन गेल। ओना टाटक अढ़ स लुखियो सुनि लेने छलीह। तेँ जबाव दइ ले मन उबिआयत रहनि। अवसर पाबि लुखिया बजलीह- ‘‘एते रास जे तीमन-तरकारीक ओरिआन केने छी से की हएत। अपने नै खेताह त’ आंगनवाली ले मोटरी बान्हि देवनि।’’ अपिआरी मे फँसैत माछ जेँका लड़िकाक माय केँ फँसैत देखि डोमन बजलाह- ‘‘तइ ले की हेतैक, हिनको मोटरी बान्हि कन्हा पर नेने जेबनि।’’ आँखि दाबि नागेसर लुखिया क’ बोली(बाजव) रोकै चाहलक। मुदा लुखिया मुहक बात बरतुहार दिशि नहि बढ़ि नागेसरे दिशि खसल- ‘‘बड़ वुद्धियार छथि। बुझव जे बेटाक विआह केलहुँ त’ गामो-घर आ समधियो नीक भेटिलाह। तेँ जेना-तेना कुटमैती कइये लेब।’’ लुखियाक बात सुनि नागेसरक मन हल्लुक भेलनि। किऐक त लुखिया अपन भार द’ बाधा हटौलक। नहि त बेरि-बेरि बाता-बाती होइत। समय पाबि डोमन जोर स बजलाह- ‘‘अहाँ, समधीने लग नुड़िआइल रहब कि चलबो करब?’’ लुखियाक मन भीतर स चप-चप। बजैक लेल लुस-फुस करैत। डोमनक बात सुनि बजलीह- ‘‘हिनके टा समधीन लगड़गर छन्हि। आन केँ कि किछु छैक?’’ मुस्की दइत नागेसर आंगन स निकलि बाध दिशि विदा भेल। आँखि उठा-उठा डोमन गाम-घर देखैत जायत। टोल स निकलि पछिम मुहेक एक पेड़िया धेलनि। गाछी टपि हाथक इशारा स पच्छिम मुहे देखबैत नागेसर कहलकनि- ‘‘पछबारि भाग जे चतड़लाहा गाछ देखै छियैक ओइह गामक सीमा छी।’’ दुनू बापूत देखि डोमन पुछलखिन- ‘‘उत्तरबरिया सीमा?’’ ओंगरी स देखबैत नागेसर- ‘‘ओ ढ़िमका जे देखै छियै, सएह छी।’’ ‘‘दछिनबरिया।’’ ‘‘तीनि चारि टा जे छोटका गाछ एक ठाम देखै छियै, ओ सीमे पर अछि। पीरारक गाछ छियैक।’’ बाध क’ हियासि डोमन आंखिक इशारा वुचन केँ देलक। दुनू गोटे मने-मन अन्दाजलनि जे दू सय बीघा स उपरेक बाध अछि। तहि बीच नागेसर बाजल- ‘‘बुझलहुँ, बाबूक अमलदारी मे त’ सम्मिलिते छल मुदा हमरा दुनू भाइ मे बँटबारा भए गेल। उत्तर स’ हमर छी आ दछिन स भातिजक।’’ डोमन- ‘‘खोपड़ी कत’ बनौने छी?’’ नागेसर क’ पैछला घटना मन पड़लनि। ओंगरी स’ देखबैत कहै लगलखिन- ‘‘ओहि बँसबाड़ि आ गाछीक बीच एकटा खाधि छैक। जहि मे बिसनारिक गाछ सब छैक। भदवारि मे पानि भरि जाइत छैक। बाँसोक पात आ गाछो सबहक पात ओहि मे खसि-खसि सड़ैत अछि। बिसनारियोक गाछ सब सड़ि जायत छैक। जहि स कारी खट-खट पानि भ’ जायत छैक। ढ़ाँकीक-ढ़ाँकी मच्छर फड़ि जायत अछि। ओहि खाधि मे भैया केँ कालाज्वरक मच्छर काटि लेलकनि। कतबो दवाई-बिरो भेलनि, मुदा नहि ठहड़लखिन।’’ डोमन पुछलथिन- ‘‘अहाँ सभ केँ सरकारी अस्पताल मे दवाइ नहि(नै) दइए?’’ नागेसर कहलथिन- ‘‘से ज दैतैक त’ एत्ते लोक मरबै करैत। बीस आदमी से उपरे हमरा गाममे कालाजार से मरलहेँ। अस्पतालमेँ किछु छैक थोड़े, ओहिना ईंटाक घर टा ठाढ़ अछि। दवाइके के कहे जे कुरसियो-टेबुल बेचि नेने अछि।’’ बजैत-बजैत नागेसरक आँखि नोरा गेल। गमछा स आँखि पोछि आगू बढ़ि गेल। तीनू गोटे खोपड़ी लग पहुँचलाह। बाधक बीच मे कट्ठा दुऐक(दुइऐक) परती, परतिये पर दुनू फरीकक खोपड़ियो आ पाँच टा अनेरुआ गाछो। दू टा साहोरक, दू-टा पितोझिया आ एकटा बज्र-केराइक। साहोरक गाछ सबसँ पुरान मुदा देखै मे सबसँ छोट। ब्रज-केराइ सबसँ कम दिनक, मुदा सबसँ नमहर। पितोझिया गाछक निच्चा मे तीनू गोटे दुबि पर बैसि, गप-सप करै लगलाह। डोमन पुछलथिन- ‘‘रखबाड़ि(राखी) कोना गिरहत सब दइत अछि?’’ नागेसर बजलाह- ‘‘बीधा मे पाँच घुर घानो आ गहूमो।’’ ‘‘रब्बी(दलिहन)-राइ(तेलहन)?’’ ‘‘अंदाजे स देलक। अपनो सब उखाड़ि दइ छिअए। जहि स बोइनो भेलि आ राखियो।’’ दुनू बापूत डोमन मने-मन हिसाब जोड़ै लगलाह। अगर कट्ठा मे एक क्बीन्टल उपजत त पच्चीस किलो बीघा मे भेल। जँ से नहि पचासो किलोक कट्ठा हैत, तइयो साढ़े बारह किलो बीघा भेल। सय बीघा स’ उपरेक बाध अछि। तहि स’ या त’ पच्चीस क्वीन्टल, नहि त साढ़े बारह क्वीन्टल राखी(धान) सालमे, जरुर होइतहि हेतनि। तेकर बाद गहूम भेल, मड़ूआ भेल आरो-आरो दलिहन-तेलहन भेल। दुइये माय-पूत कते खायत? हमरो बेटी केँ अन्नक दुख नहि हेतइ। मुस्की दैत डोमन बेटा दिशि तकलक। बेटो बाप दिशि ताकि आंखिये स’ गप-सप क-ए लेलक। कनी काल चुप रहि डोमन नागेसरकेँ पुछलथिन- ‘‘कथी-कथीक खेती बाध मे होइत अछि?’’ नागेसर बजलाह- ‘‘पान साल पहिने तक त अन्ने टाक खेती होइत छल। टो-टा क’ सेरसो-तोड़ीक खेती। मुदा आब खेती बदलि रहल अछि। (मुस्की दैत) की कहब, बुझू त राजा छी। दू सय बीघा क’ अपन बपौती सम्पत्ति बुझैत छी। दुनू सय बीघा के मालिक छी। एक बेरि टाँहि दैत छलियैक त जुआन-जुआन घसवहिनी सब नांगरि सुटुका क’ पड़ा जाइत छलि। मुदा आब से नहि करैत छी। खसल-पड़ल खेत, आड़ि पड़क घास कटै ले ककरो मनाही नहि करैत छिअए। किछु मन पाड़ि- हँ त’ कहै छलौ जे जहि दिन स’ लोक बोरिंग गरौलक आ कोशियो नहरि एलैक तहि दिन स’ त बुझि पड़ैत अछि जे घर स’ बाध धरि लक्ष्मी(लछमी) सदिकाल नचितहि रहैत छथि। ककरो देखबै धानक बीआ पाड़ैत अछि ते कियो रोपए ले बीआ उखाड़ैत अछि। कियो कमठौैन करैत अछि त कियो(धान) कटैत अछि, ते कियो बोझ उघैत अछि। कियो दाउन(दौन) करैत अछि। ते कियो धान ओसबैत अछि। ते कियो अँगो रखैत अछि। कियो धान उसनियो करैत अछि त’ कियो पथार सुखवैत अछि। कियो मिल पर धान कुटबैत अछि त’ कियो चाउर फटकैत अछि। कत कहब।’’ डोमन बजलाह- ‘‘आनो-आनो चीजक खेती हुअए लागल होइत हएत?’’ नागेसर बजलाह- ‘‘ऐँह की कहब! पचासो किस्मक त ध् ाानेक खेती हुअए लगल अछि। ओते धानक की नामो मन अछि। धानक संग-संग खाद-पानि द’ क’ गहूम, दलिहनक खेती सेहो होअए लगल अछि। एते दिन त सरिसोए-तोड़क खेती होइत छल। आब सूर्यमुखीक खेती सेहो होइत अछि। राशि-राशिक तीमन-तरकारी सेहो हुअए लगल अछि। बीघा दसेक मे पनरह-बीस गोटे नवका आमक कलम सेहो लगौलक अछि। ऐँह, की कहब, आन्ध्राक आम, मद्रासी आम सब सेहो लोक लगौलक हेन। अजीब-अजीब आमो सब अछि। अइवेरि रोपू त पौरुकेँ स फड़ै लगत। जेहने देखै मे लहटगर लागत तेहने खाइयो मे।’’ डोमन पुछलथिन- ‘‘आमक ओगरबाहि कोना दइत अछि?’’ नागेसर कहलथिन- ‘‘तीनि आम मे एक आम सरही आ चारि आम मे एक आम कलमी। से जहि दिन तोड़ल जायत तहि(तइ) दिनक कहलौ, तहि बीच खसल-पड़ल आमक हिसाब नहि। तेहेन आम सब अछि जे टुकले स’ धिया-पूता खाइ लगैत अदि। खटहो आम केँ चून लगा क’ मीठ बना लैत अछि। धियो-पूतो तते बुद्धियार भ’ गेल अछि जे अंगने से चून नेने जायत आ आम मे लगा क’ खायत।’’ डोमन पुछलथिन- ‘‘आरो की सब आमदनी बाध स’ अछि?’’ नागेसर बजलाह- ‘‘सबटा कि मनो अछि। (ओंगरी स देखबैत) दछिनबारि भाग बीधा बीसेक गहीर खेत छल। चैरी। गोटे साल नहि ने ते पहिने सब साल धान दहाइये जाइत छलैक। मुदा आब, जहिया स पानिक सुविधा भेल, सब गिरहत अपन-अपन खेत क’ आरो खुनि क, पोखरि जेँका बना-बना माछ पोसए लगल हेँ। आन्ध्र प्रदेशक एकटा माछ छै ‘इलिस’। ऐँह, की कहब, (मुह चटपटबैत) अपना सब कहै छिअए रौह, मुदा ओइ(इलिस) आगू मे किछु नहि(ने)। जहिना बढै़ मे तहिना सुआद। हमरा कि कोनो रोक अछि, हमही ओगड़ै छिअए ने, जहिया मन भेलि तहिया बन्सी मे दू टा मारि लेलहुँ। आ सब खेलहुँ। सबसँ मुश्किल आब बनौनाइ भ’ गेल। काजे से ने छुट्टी। के ओते मेठैन(मेंठनि) क’ क’ खायत। आब सुर्ज, माथ पर आबि गेल। चलू। भानसो भ’ गेल हएत। गरमे-गरम खाइ मे नीक होइ छै।’’ तीनू गोटे बाध स घर दिसक रास्ता धेलक। थोडे़ आगू बढ़ल त बँसवारि मे एकटा चिड़ै बजैत। बाजबो अजीब ढ़ंगक। मुस्की दइत नागेसर डोमन क’ पुछलथिन- ‘‘कहू त’ ई चिड़ै की बजैत अछि?’’ कने अकानि क’ डोमन बजलाह- ‘‘ई त’ पान-बीड़ी सिगरेट बजैत अछि।’’ बात सुनि नागेसर ठहाका द’ हँसल। कने काल हँसि, बजलाह- ‘‘ई चिड़ै अहाँ गाम सब दिशि नहि अछि। जहिया कोशीक बाढ़ि अबैत छलैक तहिये स ई चिड़ै हमरा गाम मे अछि। ई बजैत अछि, बढ़मा(ब्रह्मा) विसुन(विष्णु) महेश।’’ विचारक भिन्नताक कारणे डोमन पुनः चिड़ैकबोली अकानए लगल। वुचन सेहो अकानए लगल। अपना बात मे मजबूती अनैक लेल नागेेसर सेहो अकानए लगल। दुनू चुप। दुनू अपन-अपन दुविधा(द्वन्द) मे। डोमन वुचन क’ पुछलक- ‘‘बौआ, तू त’ इसकुलो देखने छहक, तांेही कहह?’’ मामूली सवाल मे हारि मानव, ककरा पसिन्न हैत। डोमनक मन विचार क’ मथैत। डोमनक बात सुनि वुचन बाजल- ‘‘बाबू, हमरा बुझि पड़ैत अछि जे ‘तुलसी, सूर, कबीर’ कहैत अछि।’’ तीनूक तीनि मत। तेँ विवादक प्रश्ने नहि। तीनू अपन-अपन रमझौआ मे ओझड़ाएल(ओझड़ायल)। तेँ तीनू चुपचाप आगू-पाछू घर दिशि विदा भेल। घर पर अबितहि डोमन बाजल- ‘‘लोटा नेने आउ। कनी डोल-डाल दिशि स’ भए अबैत छी।’’ नागेसर आंगन जा दू लोटा पानि आनि केँ देलकनि। लोटा मे पानि देखि वुचन बाजल- ‘‘बाबू, आगू मे कल-तल नै छैक?’’ डोमन बजलाह- ‘‘एखन तू बच्चा छह, नहि बुझल छह?’’ कहि आगू मुहे गाछी दिशि विदाह भेल। गाछी पहुँच एकटा सरही आमक गाछक निच्चा मे दुनू बापूत बैसि विचार-विमर्श करै लगल। वुचन- ‘‘बाबू, कुटुमैती करै जोकर परिवार अछि। समलाइके मे वियाह, दुश्मनी आ दोस्ती छजैत छैक। लड़िका क’ बाप नहि छैक, त’ की हेतइ। गाम-घर मे लोक मइटुगर के अधलाह बुझैत छैक।’’ डोमन, वुचनक बातो सुनैत आ मूड़ियो डोलबैत, मुदा मने- मन परिवारक आमदनी आ ओहि आमदनीकेँ समटैक लूरि सोचैत। जहि हिसाब स’ आमदनीक जड़ि देखि रहल छी ओहि हिसाब स’ सम्हारैक लुरि नहि छैक। जँ दुनू एक सतह पर आबि जाय त परिवार केँ आगू मुहै ससरै मे बेसी समय नहि लगत। एतेटा बाध छैक। अलेल धास सब दिन रहतै। बाध ओगड़ै मे की लगैत छैक? एक-दू बेरि अइ भाग स’ ओइ भाग घुमब मात्र छैक। अगर जँ अपनो काज ठाढ़ कए लिअए त बैसारियो नहि रहतैक आ आमदनियो बढ़ि जयतैक। हमरा बेटी के एहि घर अयला स’ एकटा काजूल आ बुद्धियार समांग बढ़ि जेतइ। जानकी(बेटी) केँ सब हिसाब- कनमा, अधपेइ, पौवा, असेरा, सेर, अढ़ैया, पसेरी, धारा, मन स ल’क’ बोरा-क्वीनटल धरि, जोड़ैक लूरि छै। तहिना कोड़ी(बीस वस्तु) सोरे(सोलह) सोरहा(सोलह सोरे) दर्जन(बारह) ग्रुस(बारह दर्जन) जोड़ा (धानक आँटी) (दस), गाही(पाँच) गंडा(चारि) जोड़ा(दू) पल्ला(एक) सब बुझैत अछि। मन मे खुशी एलै। बाजल- ‘‘बौआ, ओना जानकी(बेटी) गिरहस्तीक काज सम्हारि दू टा गाइयोक सेवा क’ लेत। मुदा तहि स’ दूधे टाक आमदनी बढ़त। जरुरत छैक खेतिओ बढ़बैक। तेँ, नीक हएत जे एकटा गाय आ एकटा वड़द द’ दियैक। एकटा बड़द आ एकटा हरबाह भेने दू समांग अपन भ’ जेतइ। जहि स बीघा दू बीघा खेतियो क’ सकैत अछि।’’ वुचन पुछलथिन- ‘‘अपना खेत जे नहि छैक?’’ वुचनक बात सुनि डोमन हँसल। हँसैत बजलाह- ‘‘बौआ, समय ऐहन आबि गेल अछि जे खेतोवला सब खेती छोड़ि नोकरियेक पाछु बोआ रहल अछि। जहि स’ खेती केनिहारक अभाव भ’ रहल छैक। गिरहस्तीक हाल विगड़ि गेल छैक। जबकि जरुरत छैक खेत मे मेहनतक। जे सभ(किसान) नहि बुझि रहलाह अछि।’’ वुचन पुछलथिन- ‘‘कोना बुझत?’’ डोमन बजलाह- ‘‘बौआ खेती मे बड़ बुद्धिक काज छै, मुदा खेती दिन-दिन मूर्खेक हाथमे पड़ल जाँइ छै, से सोचलहक हेँ?’’ तर्क-वितर्क कए दुनू बापूत तय कए लेलक जे कुटुमैती करबे करब। मुदा एकटा जटिल प्रश्न अबि क’ आगू मे ठाढ़ भ’ गेल। ओ ई जे विआह उट-पटाँग ढ़ंग स नहि होय? रस्ता स’ पाइक उपयोग होअय। गुन-धुन करैत दुनू बापूत घर दिशि विदा भेल। जाधरि डोमन पैखाना दिशि स अबैत-अबैत ताधरि लुखिया चारि-पाँच बेरि(खेपि) दौड़ि-दौड़ि आंगन स बान्ह पर जा-जा देखलक। मन मे उड़ी-बीड़ी लागल छलै जेना। जे कुटमैतीमे कोनो तरहक गड़बड़-सड़बड़ नहि हुअए। नहि त लोक पीकी मारत। कहत जे मौगीक मुख्तिआरी छी ने। बिनु मरदक मौगी बेलगामक होइते अछि। कहलो गेल छै -‘‘राँड़ मौगी साँढ़।’’ फेरि मन मे उठल जे किछु होउ वियाह त’ हमरे बेटाक होएत। तेँ ककरो ओंगरी बतवैक रस्ता नहि रहै देवैक। जहिना बड़तुहार कहताह तहिना हमहू करब। जँ दुनू गोटेक मिलान रहत त’ किअए कोइ आँखि उठाओत। एते बात मन मे अबितहि बड़तुहार क’ लुखिया अबैत देखलक। वान्ह पर स दौड़ले आंगन आबि हाँइ-हाँइ क’ थारी साँठै लगल। हाथ-पाएर धोइतहि नागेसर डोमन के कहलक- ‘‘आव। पहिने भोजने क’ लिअ। आगू-आगू लोटा नेने नागेसर आ पाछु-पाछु दुनू बापूत डोमन आंगन गेल। पीढ़ी पर बैसितहि नागेसर थारी आनि आगू मे देलकनि। आंखि घुमा क’ देखि डोमन बजलाह- ‘‘समैध, समधीनियो क’ अढ़ मे बजालिअनु। विआहक सब गप पक्का-पक्की कइये लेब। बैसार पर जखने गप उठाएब कि चारु दिस स लोक आबि अन्टक-सन्ट गप चालि देत।’’ आंखिक इशारा स नागेसर भौजाइ के सोर पाड़ि बैसै ले कहलक। तहिबीच डोमन कहलनि- ‘‘समैध, समधीन के पुछिअनु जे कोना बेटाक बिआह करतीह?’’ नागेसर क’ अगुआ लुखिया बजलीह- ‘‘अहाँ सभ मरदा-मरदी गप करु। हमरा कोनो चीजक लोभ नहि अछि। नीक मनुक्ख घर आबए, बस एतबे लोभ अछि।’’ मने-मन नागेसर सोचैत जे हमरा कतबो मोजर अछि, तइ स’ की? कोनो की हमरा बेटा-बेटीक विआह हएत? तेँ, हम अनेरे मुँह दुरि किअए करब। बाजल- ‘‘समैध, अहाँ अपने मुह स’ बजियौक जे कोना करब?’’ नागेसर टाटक अ’ढ़ मे बैसलि भौज दिशि तकैत बाजल- ‘‘खर्च-वर्च करै लेल किछुत’ चाहबे करी....।’’ नागेसरक बातके कटैत लुखिया बजलीह- ‘‘नै! हम ककरो बेटी क’ पाइ ल’ क’ अपना घर नै आनब।’’ नागेसर भौजक गप्प सुनि चुप भ’ गेल। भात-दालि सनैत डोमन बजलाह- ‘‘समैध, जहिना अहाँक भातिजक विआह हएत तहिना त हमरो बेटीक हएत। (लुखिया क’ खुश करै दुआरे) हमर बेटी साक्षात् लछमी छी। साल भरि कि दसोसाल घुमि क’ लड़की ताकब त ओहन नहि भेटत। तहू मे आब? आब त लोक मनुक्ख थोड़े घर अनैत अछि, अनैत अछि रुपैआ।’’ मुस्की दइत लुखिया बजलीह- ‘‘जखन दुआर पर आबि बेटा मंगलनि त’ हम द’ देलिएनि। आब हमरा की अछि। दू कौर अन्न आ दू बीत कपड़ा टा चाही। घर त आब ओकरे सवहक(बेटे-पुतोहूक) हेतइ।’’ डोमन बजलाह- ‘‘समैध, पाँच गोटे जे बरिआती चलब, हुनकर सुआगत हम नीक जेँका करबनि। बड़-कनियाँकेँ, जे नव घर ठाढ़ करैक वस्तु अछि, से त देबे करब। तेकर अतिरक्ति एकटा बड़द आ एकटा लगहरि गाय सेहो देब।’’ सबहक मुह स हँसी निकलक। बिआहक दिन तय भ’ गेल। मुस्की दइत लुखिया बाजलि- ‘‘आब की हम कहबनि जे समधीनो हमरे द’ दोथु।’’ ठहाका दइत डोमन उत्तर देलकनि- ‘‘बाह-वाह, तब त दुनू रोटी चाउरे क’।’’ चारि बजे, सुति-उठि चाह पीबि, पान खा डोमन नागेसर केँ कहलखिन- ‘‘समैध, सब बात त तइये भए गेल। आब चलब।’’ दुनू जोड़ धोती नागेसर आंगन स आनि आगू मे रखि देलकनि। धोती देखि डोमन बजलाह- ‘‘समैध, कतबो गरीब छी तेँ कि मुदा इज्जति बचा क’ रखने छी। बेटीक दुआर पर कोना धोती पहिरब?’’ टाटक भुरकी देने लुखिया देखैत रहथि। डोमनक बात सुनि दोग स बाजलीह- ‘‘समैधकेँ कहिअनु जे जखन बेटी आओत तखन ने बेटीक घर हेतनि, ताबे त हमर छी कीने। हम दैत छिअनि।’’ ठहाका दइत डोमन बजलाह- ‘‘जखन हमर बेटी एहि घर आओत तखन ने ओ (ई) समधीन हेतीह आकि अखने?’’ तहिबीच पीहुआ सभकेँ गोड़ लगलक। एक्कैस रुपैआ डोमन पीहुआ हाथ मे देलखिन। थोड़े दूर अरिआति नागेसर घुमैत बाजल- ‘‘समैध, आब बढ़िऔक। नवम् दिनक दिन भेल। अहाँ काज मे लगि जाउ आ हमहूँ लगि जाइ छी।’’ डोमन दूनू बापुत विदा भेलाह। आगू बेटीक वियाहक ओरिआओन रहनि किन्तु मन पर नचैत रहनि लुखियाक गप्प- ‘‘ककरो बेटी के पाइ ल’ क’ अपन घर नै आनब।’’ देह सिहरि गेलनि बेटा दिश तकलनि। ओहो आब वियाह जोगर भ’ गेल रहय। अइ छौड़ा केँ कोना किछु करै ले कहबै। ओकरे देखैले ने 82.हारि-जीत चारिमे दिन दुनू प्राणी सोमन विचारलक जे आब एहि गाम मे जीयब कठिन अछि, तेँ गाम स’ चलिये जायब नीक हैत। दुनियाँ बड़ी टा छैक। जतय जीबैक जोगार लागत ततय रहब। सामान सब बान्हि, करेज पर पाथर राखि गाम स’ जेबाक लेल दुनू प्राणी तैयार भ’ गेल। भुखल पेट! सुखायल मुँह! निराश मन! ओसार पर बैसल दुनू प्राणी क’ आँखि सँ दहो-बहो नोर टघरैत रहै! दुनियाँ अन्हार देखि, उठैक साहसे नहि होइत छलै। सोमनक मनमे होइत जे कि छलहुँ आइ की भय गेलहुँ? रंग-बिरंगक विचार, पानिक बुलबुला जेँका, दुनूक मनमे उठैत आ विलीन भ’ जायत! आगूमे मोटरी राखल रहै। जहिना सीमा परहक सिपाही, छाती मे गोली लगला सँ घायल भ’ जमीन पर खसि, छटपटायत, तहिना दुनू प्राणी सोमन, दुखक अथाह समुद्र मे डुबैत-उगैत। भिनसर स’ बारह बजि गेलैक। सहरसा जिलाक गाम मैरचा। पूब स’ कोशी आबि गाम क’ कटनिया करै लागल। गर लगा-लगा गामक लोक जहाँ-तहाँ पड़ाय लगलाह। ओना सरकार पूबरिया बान्हक बाहर पुनर्वासक व्यवस्था सेहो करैत रहय, मुदा ओहि स’ बोनिहार केँ की सुख हैत? ओकरा सभहक त’ रोजगारो छिना गेल रहै। पत्नी, बेटा-पुतोहूक संग फुलचनो पंडित गाम छोड़ि पछिम मुहे विदा भेलाह। घरारी छोड़ि अपना एक्को बीत जमीन-जायदाद नहि छलनि। मुदा अपन व्यवसायिक सभ लूरि छलनि तेँ मनमे चिन्तो ओतेक नहि रहनि। चिन्ता मात्र रहनि ठ’रक भेटबाक। कखनो-कखनो मन मे होइन जे अपन गाम त’ बुझल- गमल अछि, आन गाम केहन होयत केहन नहि? मुदा उपाये की? जीबैक लेल त’ मनुष्य सभ किछु करैत अछि। पछबरिया बान्ह स’ मील भरि पाछुये रहथि कि बान्ह पर नजरि पड़लनि। बान्ह देखितहि आशा जगलनि। किएक त’ ओइ बान्हक पछिम कोनो धार-धुर नहि अछि। मुस्कुराइत फुलचन पत्नी सँ पुछलक- ‘‘भगवान रामक खिस्सा बुझल अछि?’’ फुलचनक मुँह दिशि देखि मुनिया बजलीह- ‘‘बहु दिन पहिने सुनने रहियै, आब ओते धियान नै अइ।’’ ‘‘जहिना अपना सभ गाम छोड़ि क’ जा रहल छी तहिना ओहो सभ गेल रहथि। अपना सभ के ते बटखरचो अछि, हुनका सभके ते सेहो नै रहनि।’’ तहि बीच फुलचनक पुतोहू, कपली सासुक बाँहि पकड़ि पाछु मुहे घुमा कहलक- ‘‘ऐँड़ीके डोका काटि देलक। खुन बहैए। कनी कतौ बैसथु जे लत्ता बान्हि देबै।’’ ऐँड़ी देखि मुनिया कहलथिन- ‘‘कनियाँ, कतौ गाछो ने देखै छियै जे कनी सुस्ताइयो लैतौ। हमरो पियासे कंठ सुखै अए।’’ सासु-पुतोहूक बात सुनि फुलचन बाजल- ‘‘कनियाँ, जानिये के ते दैवक डाँग लागल अछि, तखन तँ कहुनाके बान्ह धरि चलू। एक त’ रौदायल छी तइ पर स’ जत्ते काल अँटकब तते रौदो बेसिये लागत।’’ बान्ह पर पहुँचतहि सभ निसाँस छोड़लनि। बान्हक पछिम स’ एकटा आमक गाछ रहै। छाहरि देखि सभ केओ गाछ तर पहुँचै गेलाह। एकटा बटोही पहिनहि स’ तौनी बिछा पड़ल छल। कने काल सुस्तेलाक बाद बटोहीकेँ फुलचन पुछलखिन- ‘‘भाइ, तमाकू खाइ छह?’’ जेबी स’ चुनौटी निकालि फुलचनक आगू मे फेकैत, ओ बटोही बाजल- ‘‘कोन गाम जेबह?’’ कोन गामक नाओ सुनितहि फुलचनक हृदय सिहरि गेलनि। मिरमिरा क’ कहलथिन- ‘‘भाइ, कोन गाम जायब तेकर त’ ठेकान नहि अछि। मुदा मैरचा से एलौ हेँ। धार मे गाम कटि रहल अछि। तेँ गाम छोड़ि जा रहल छी। जइ गाम मे कुम्हार नइ हैत तइ गाम मे बसि जायब।’’ कुम्हारक नाओ सुनितहि बटोही उठि क’ बैसैत, कहलखिन- ‘‘हमरो गाम मे कुम्हार नै अछि। चलह, हमरे गाम मे रहि जइए’।’’ आशा देखि सोमन पुछलकनि- ‘‘ऐठाम स’ कत्ते दूर अहाँक गाम अछि?’’ ‘‘अढ़ाइ कोस। हमहूँ बहीनिये अइठीन स’ अबै छी। गामे जायब।’’ बेर झुकैत पाँचो गोटे विदा भेलाह। लछमीपुर पहुँचतहि बटोही-रतीलाल फुलचन केँ कहलक- ‘‘भाइ, यैह हमर गाम छी।’’ गाछी, बँसबाड़ि देखि फुलचन पंडित मने-मन खुश! मने मन आकलन कयलनि जे जारनक अभाव कहियो नहि हैत। गाम मे प्रवेश करितहि बीघा दुइयेक पोखरि देख फुलचन मने-मन ताय कयलनि जे नहि कतहुँ रहैक ठ’र भेटत त’ पोखरिक मोहार त’ अछि। पोखरिक बगले मे सभ क्यो रुकि जाइ गेलाह। रत्तीलाल आगू बढ़ि गेलाह। जहिना गाम मे नट-किच्चक केँ आबितहि धिया-पूता देखै अबैत तहिना फुलचनो सभ तुर केँ देखए गामक धिया-पूता आबै लागल। गाम मे कुम्हार आयलाक समाचार पसरल। थोड़े कालक बाद फुलचन पंडित बेटा सोमन केँ हाथ पकड़ि कहलथिन- ‘‘बौआ, तू सब एतै बैसह। हम कने गामक बावू-भैया सब स भेटि केने अबै छी।’’ कहि फुलचन गाम दिशि विदा भेलाह। इजोरिया पख रहै तेँ सूर्यास्त भेलो पर दिने जेँका लगै। जाधरि फुलचन घुरि केँ अयबो नहि कयलाह तहि सँ पहिनहि गामक पनरह-बीस टा नवयुवक पहुँच गेल। सभहक मन मे नव उत्साह रहै। किएक त’ एखन धरि जे अभाव कुम्हारक गाम मे रहल ओ पूर्ति भए रहल अछि। जहिना आवश्यकताक वस्तु पूर्ति भेला स’ किनको मन मे खुशी होइछै, तहिना फुलचनक अयला सँ गामक लोकक मन मे खुषी रहै। पोखरि स’ थोड़े हटि कट्ठा तीनियेक परती छलै। सब युवक विचारलक जे ओहि परती पर बसाओल जाय। ताधरि गाम फुलचनो घुरि क’ आयलाह। फुलचन दुनू बापूत परती देखलनि। परती देखि सोमन पिता दिषि धुमि बाजल- ‘‘कुम्हारक बसै जोकर परती अछि मात्र पियैवला पानिक दिक्कत अछि।’’ तइ पर पिता फुलचन पंडित जबाव देलनि- ‘‘एखन ने पानिक दिक्कत अछि, मुदा जखन अपने इनार खुनैयोक आ पाटो बनबैक लूरि अछि तखन दिक्कत किए रहत?’’ घरारी पसन्द होयतहि हो-हा करैत युवक सभ बाँस काटै विदा भेलाह। जे-जेहन बाँसवाला तिनका मे तहि हिसाब सँ बाँस काटि पच्चीस टा बाँस जमा केलनि। इहो दुनू बापूत संग दैत रहथिन। हाथे-पाथे सभ घरक काज मे जुटि गेलाह। रातिक बारह बजै-बजैत तेरह हाथक घर ठाढ़ भ’ गेलैक। प्रात भने दुनू बापूत विचारलनि जे एक त नव गाम, तहू मे नव बास तेँ काज त बहुत अछि। तेँ काज क’ सोझरा केँ चलै परत। रहै जोकर घर भलेही ही नहि भेलि मुदा दिन कटै जोकर त भइये गेल। घर-आंगन बनबै स’ ल’ क’ कारोवार धरिक काज मे हाथ लगबै पड़त। फुलचन सोमन सँ पुछलखिन- ‘‘बौआ, मैरचा स कोन-कोन समान अनने छह?’’ सोमन बाजल- ‘‘बावू, सोचलहुँ जे आन गाम मे लगले सब कुछ थोड़े भ’ जायत। तेँ चाक बनबैक शिला, तख्ता, फट्ठा, जौर, बेलक कील सभ किछु अनने छी।’’ खुशी स’ गद-गद होयत फुलचनक मुँ स’ निकलल- ‘‘बाह-बाह। चाकक ओरियान त’ भइये गेलह। आरो की सभ अनने छह?’’ चकैठ, हथमैन, पीटना, पीरहुर, मजनी, छन्ना सेहो अनने छी।’’ मुस्कुराइत फुलचन बाजल- ‘‘काजक त’ सब किछु अछिए। आइए चाको बनवैमे हाथ लगा दहक। एक गोरे पात खरड़ि अनिहह। एक गोरे घरक लेबिया-मुनिया मे हाथ लगा दहक। हमरा त’ समचे सब ओड़िअबै मे समय बीति जेतह।’’ दस दिनक मेहनति स’ रहै जोकर एकटा घर बनि गेलै। चाको सुखा गेलै। जारनोक ओरियान भ’ गेलैक। चाक गारि, माटि बना सोमन चाक लग बैसल। जहिना उद्योगपति केँ नव कारखानाक उद्घाटन दिन मन मे खुशी रहैछै, आइ तहिना सभ प्राणी फुलचनो केँ रहनि। हँसैत फुलचन पंडित बेटा दिषि देखैत बजलाह- ‘‘ बौआ, जते सामान बनवैक लूरि अछि सब सामान बना, पका केँ खरिहान मे पसारि, सैाँसे गौवाँ केँ हकार दए देखा देबनि। जिनगीक परीक्षा छी।’’ आबा उघारि चारु गोटे खल लगा-लगा सब वस्तु- कूड़, हाथी, ढकना, कोशिया, दीप, पाण्डव, गणेश, लक्ष्मी, मटकूर छाँछी डाबा, घैल, सामा-चकेबा, पुरहर, अहिवात, कोहा, फुच्ची, सरबा, सीरी, भरहर, आहूत, धुपदानी, पातिल, तौला, मलसी, बसनी, उन्नेैसमासी कोही, लाबनि, कलश, कराही, रोटिपक्का, अथरा, कसतारा, लग्जोरी, धिया-पूता खेलैक जाँत, नादि, लोइट, मांट, टारा, टारी, बधना इत्यादि। चारि-चारि खल पावनिक, वियाहक, उपनयनक, श्राद्धक, पोखरिक यज्ञ-कीर्तनक आ घरैलूकाजक वस्तु सभ अलग-अलग सजा क’ राखि। फुलचन दुनू बापूत जा’ गौवाँ केँ देखैक हकार देलनि। चारु प्राणी फुलचनके अपना लूरिक ठेकान नहि छलन्हि किन्तु सभ काजक लेल एकबेर सभ समान कहियो नहि बनौने छलाह। किन्तु आइ सभटा बना सभकेँ ई विश्वास भए गेलनि जे जहिना बड़का व्यापारिक दोकान मे अनेको किस्मक सौदा रहैछै तहिना त’ हमरो अछि! समय बीतैत गेल। अधिक बयस भेने दुनू प्राणी फुलचन शरीर सँ कमजोर हुअए लगलाह। सोमनो केँ एकटा बेटा एकटा बेटी भेलै। परिवार बढ़लै। खरचो बढ़लै। समय आगू मुहे ससरैत गेल। दुनू प्राणी फुलचन मरि गेलाह। ....बेटीक वियाह सेहो सोमन कए लेलक। सोमनक बेटा रामदत दुर्गापूजा देखय मात्रिक गेल। ओतहि स’ बौर गेल। माटिक बरतनक जगह द्रव्यक बर्तन सभ परिवार मे धीरे-धीरे बढ़ै लगलै। जहि स’ माटिक बर्तनक मांग कमै लागल। घटैत-घटैत माटिक बरतन परिवार छोड़ि देलक। रहि गेल मात्र पावनि, उपनयन, वियाह आ श्राद्ध धरि। अपन घटैत कारोबार आ टूटैत परिवार स’ दुनू प्राणी सोमन चिन्तित होअए लागल। आगूक जिनगी अन्हार लाग’ लगलै। कोनो रस्ते नहि देखइ। सोचैत-बिचारैत सोमनक नजरि एकटा काज पर पड़लै। खपड़ा बनौनाइ। खपड़ा पर नजरि पहुँचतहि मुस्कुराइत सोमन पत्नी केँ कहलक- ‘‘एकटा बड़ सुन्दर काज अछि। कमाइयो नीक आ काजो माटियेक।’’ अकचकाइत कपली(पत्नी) पुछलकनि- ‘‘कोन काज?’’ सोमन- ‘‘खपड़ा बनौनाइ।’’ कने काल गुम रहि कपली बाजलि- ‘‘थोपुआ खपड़ा त’ हमहूँ बना सकै छी मुदा नड़िया नै हैत।’’ जोर दैत सोमन बाजल- ‘‘हँ, हैत! चाक परक भलेही नइ हूअए मगर मुंगरी परक किअए नै हैत।’’ ‘‘हँ, से त’ हैत।’’ दुनू प्राणी खपड़ा बनवै लागल। लोक केँ बुझल नहि रहै तेँ अगुुरबार क्यो खोज नहि केलक। मुदा जखन एकटा भट्ठा लगौलनि तखन गामक लोक देखलखिन। खपड़ो नीक पाको बढ़ियाँ। गिनतियेक हिसाब स’ खपड़ा बेचए लागल। बढ़िया आमदनी हुअए लागलनि। बढ़िया कारोबार चलल। मुदा सिमटिक एस्वेस्ट्स केँ अबितहि खपड़ाक मांग कमै लागल। खपड़ा बनौनिहार केँ मंदी आबि गेलनि। ओना सोमनक परिवारो छोट रहै। मात्र दुइये गोटे परिवार मे रहै। मुदा तइयो गुजर मे कटमटी हुअए लगलै। फेर जिनगी भारी हुअए लगलै। हँसी-खुशी स’ जीवन-यापन करय बला परिवारक एहन स्थिति मे पहुँच गेल जे साँझक-साँझ चुल्हि नहि पजरैत रहै। दोसर कोनो लूरि नहि रहै। अपन खसैत जिनगी देखि कपली पतिकेँ मुँह दिषि तकैत बाजलि- ‘‘ऐना कते दिन दुख काटब? जखन हाथ-पाएर तना-उताड़ अछि आ काज करै चाहै छी तखन की एही गाम केँ सीमा-नाङरि छैक? चलू एहि गाम स’।’’ पत्नीक विचार सुनि सोमनक आँखि नोरा गेलै। किछु बजैक हिम्मते नहि होइ। मने-मन सोचै लागल जे जाहि लूरिक चलते एखन धरि जीअलहुँ ओ लूरि आब मरि रहल अछि। दोसर लूरि त’ अछि नहि। की करब? असमंजस मे पड़ल पति केँ देखि कपली बजलीह- ‘‘दुनियाँ बड़की टा छै। जतै पेट भरत ततै रहब। जहिना मैरचा से आबि लछमीपुर मे एते दिन रहलौं तहिना अइ गाम छोड़ि दोसर गाम मे रहब।’’ पत्नीक विचार स’ सहमत होयत सोमन बाजल- ‘‘अहाँक विचार मानि लेलौ। अइ गाम स’ चारिम दिन चलि जायब। बीचमे जे दू दिन बाँचल अछि तइ मे अहूँ आ हमहूँ गाम मे टहलि क’ सभकेँ जना दिअनु जे जहिना एक दिन हँसी-खुशी स’ छाती लगेलहुँ तहिना आब जा रहल छी। चुपचाप गाम स’ चलि जायब नीक ने हैत। गाम से ते चुपचाप ओ भगैत अछि जे अध् ालाह काज केने रहैत अछि।’’ दुआरिए-दुआरिए दूनू प्राणी गाममे घुरि सभकेँ कहि देलकै- ‘‘गाम स’ चलि जायब।’’ प्रात होइतहि दुनू प्राणी घरक सभ सामानकेँ मोटरी बान्हि ओसार पर रखलक। भुखल पेट! सुखायल मँुह! निराश मन! तेँ आगू बढ़ैक डेगे नै उठैत रहै। ओसारा पर बैसल एक-दोसराक मँुहो देखैत आ कनबो करैत रहय। दुनूक करेज छहोछीति भ’ गेल रहै। सबा बारह बजैत। टहटहौआ रौद। हवा शान्त। साफ मेघ। घाम सँ तर-बत्तर माथ पर मोटरी हाथ मे वी. आइपी. वैग नेने रामदत(सोमनक बेटा) आंगन पहुँचल। माय-बापक दशा देखि छाती कपै लगलैक। मेह जेँका आगू मे ठाढ़। सोगे दुनूक आॅखि बन्न। बन्न आँखि सँ नोर टघरैत! दुनू अधीर। करेज क’ थीर करैत रामदत बाजल- ‘‘बाबू।’’ बाबू शब्द कान मे पड़ितहि दुनू बेकतीक आँखि खुजलै। मुदा नोर टघरितहि रहै। किन्तु आब नोरक रुप बदल’ लगलनि। एखन धरि जे नोर सोग स’ खसैत ओ स्नेह मे बदलि गेलै। अकचकाइत सोमनके मुँह स’ निकलल- ‘‘बौआ।’’ बिचहि मे झपटि कपली बाजलि- ‘‘बे ट-ट-अ-आ।’’ ओसारा पर बैग-मोटरी राखि रामदत पिताकेँ गोड़ लाग’ झुकल कि तहि बीच कपली उठि क’ दुनू हाथे पजिया क’ पकड़ि चुम्मा लैत पुनः बाजलि- ‘‘भाग नीक छेलौ बेटा, जे हमसब भेटि भेलियौ, नइ ते तोँ कत’ रहितेँ आ हम सभ कत’ रहितौं......!’’ मायकेँ गोड़ लागि रामदत मोटरी खोलि दू किलो भरिक रसगुल्लाक पोलीथिन, किलो भरि कटलेट, किलो भरिक बीकानेरी भूजियाक झोरा निकालि, घुसुका क’ रखलक। दुनू प्राणी क’ भुख स’ जरल मन रहै। जहिना गायक गौजुरा बच्चा मायक थन दिशि आखि गड़ा देखैत रहैत, तहिना रसगुल्ला, भुजिया दिशि दुनूक नजरि एकाग्र भ’ गेलै। दुनूक लेल नव वस्त्र निकालि फुटा-फुटा रखलक। चमकैत स्टीलक थारी, लोटा, गिलास, बाटी एक भाग मे रखलक। चाह बनवैक केटली, कप, छन्ना, आयरन, नारियल तेलक डिब्वा आरो-आरो सामान निकालि चद्दरि केँ झाड़लक। जहिना चुल्हिक आगि मे उपर स थोड़बो पानि पड़ला स’ उपर ठंढ़ापन अबै लगैत तहिना दुनूक नजरि चीज-वस्तु देखि शीतल हुअए लगलै। एकदम स्नानोपरान्तक षीतलता जकाँ! सोमनक षीतल मन सँ मधुर षब्द निकललै- ‘‘बच्चा गरमायल छह। पहिने नहा लाय। तखन मन चैन हेतह।’’ माय-बापक मँुह देखि रामदत बाजल- ‘‘बावू हमरो भुख लागल अछि। पहिने कनी-कनी खा लिअ’। पछाति नहाएव।’’ कहि रसगुल्लाक पोलीथिनक गिरह खोलि दू बाकुट सोमनक आगू स्टीलक थारी मे आ दू बाकुट कपलीक थारी मे दए कटलेट, भुजियाक गिरह खोलि बाजल- ‘‘जते मन हुअए तते खाउ। नहायक कोनो धड़फड़ी थोड़े अछि?’’ अपनो मँुहमे रसगुल्ला दैत, बैग खोलि, मनी बैग निकालि, रामदत सोमनक आगू मे देलकनि। रुपैआ देखि कपलीक मन, टिकुली जेँका, पहाड़ पर चढ़ि गेल। धरतीके गोड़ लगलनि। खायत-नहाइत बेेर टगि गेलै। पछवरिया घरक छाहरि अधा आंगन पसरि गेल छलै। घरक कोन मे जहिना मोथीक पुरना बिछान बिछौल छल तहिना बिछौले रहै। घर स’ बिछान निकालि कपली पछबरिया ओसार लगा बिछौलक। उपर सँ नवका जाजीम बिछौलक। नवका सिरमा रखलक। तीनू गोटे बैसि गप-सप करै लगलाह। सोमन- ‘‘बौआ, तू बौर कोना गेलहक?’’ मन पाड़ैत रामदत बाजल- ‘‘बाबू, हम बौरुलहुँ कहाँ! मामा गाम मे मुजफ्फरपुरक छलगोरिया दुर्गाक मुरती बनबै आयल रहै। ओहो कुम्हारे रहए। तीन गोरे रहै। ओकर छोटका बेटा हमरे एते टा रहै। ओकरा स’ हमरा दोस्ती भ’ गेल। ओकरे संगे चलि गेलियह।’’ बिचहि मे कपली टपकलीह- ‘‘रौ डकूबा, तोरा चिठियो-पुरजी नइ पठौल भेलौ।’’ अपना के स्मरण करैत रामदत बाजल- ‘‘माय काज सिखै मे’ सभ किछु बिसरि गेल रहियौ। तोरो सभहक हालत त’ बॅढ़िये रहौ। तखन चिन्ते कथीक करितहुँ।’’ सामंजस्य करैते सोमनके मुँह स’ निकलल- ‘‘जहिया जे दुख लिखल छल से भोगलहुँ। यैह त भगवानक लीला छिअनि। कखनो दुख त’ कखनो सुख।’’ रामदत- ‘‘बाबू, एहन दशा भेलह कोना?’’ बेटाक बात सुनि सोमनक आँखि भरि गेलनि उत्तर देलखिन- ‘‘बौआ, अखन धरिक जते लूरि-बुद्धि छलै, से सभ पुरान भ’ गेल। नवका सिखलौ नै।’’ पिताक बात सुनि रामदत नमहर साँस छोड़ि मुस्कुराइत कहलक- ‘‘बाबू, हमरा ते छुट्टिये नै दैत रहए। बीस-बीस हजार रुपैआ महीना मे कमाइ छी। तइ पर से मूर्ति बनबौनिहारक कतार लागल रहैए।’’ बिचहि मे कपली टोकलकनि- ‘‘बेटा, की सब लूरि छौ?’’ मुस्कुराइत रामदत कहै लगलनि- ‘‘माय, माटि स’ ल क’ सिमटी धरिक मुरती, नाच-तमाशाक परदा, घर सब मे चित्र सब बनबैक लूरि अछि।’’ बेटाक बात सुनि सोमनक अहं जागलै। बाजल- ‘‘बौआ, जहन एते कमाइक लूरि छह, तहन नोकरी किए करै छह?’’ मुस्कुराइत रामदत कहलकनि- ‘‘एते दिन जे नोकरी केलौ ओ नोकरी नइ भेल। साल भरि त’ माटिये सनै मे लागि गेल। साल भरि खढ़ बन्हैमे आ पहिल माटि लगबैमे चलि गेल। तेसर साल मुरती बनवैमे लागल। चारिम साल मुरतीक आँखि बनबै मे लागल। एहि साल, पाँचम बर्ख, गुरु दैछना चुका अयलहुँए हन। आब अपन कारोबार करब। जखने अपन कारोबार हैत, तखने ने, दू-चारि गोटे सीखबो करत!’’ अपन मजबूरी देखबैत सोमन बजलथि- ‘‘बौआ, अपन चिन्ता जते शरीर के नै खेलक तइ से बेसी तोहर चिन्ता खेलक। किअए त’ हरदम मन मे नचैत रहय जे वंश अंत भ’ गेल। जाबे दुनू परानी छी ताबे धरि....। मुदा आइ सबुर भ’ गेल जे जाबे बीट मे बाँसक चढ़न्त रहैछ,ै ताबे उन्नैस से बीस होइत जाइछै, मुदा निच्चा मुहे होइते सरसरा क’ कोपरो सुखै लगैछै। आशा भ’गेल जे हमरो वंश एक सय एक्कैस हैत!’’ बेटाकेँ आधुनिक मुर्तिकार पाबि, सोमन गद्-गद् भ’ गेल। हृदय अह्लादस’ भरि गेलै! नजरि, सहजहि बेटाकेँ नजरि मे गड़ि गेलै। ध्यान, बढ़ंत बाँसक बीट मे बिचरण कर’ लगलै...! मनमे भेलै जे बेटा सँ इहो नव गुण सीखत। एखनो ई दुनू व्यक्ति बहुतो काज क’ सकैए। 84.रुपैआक ढेरी फुदकैत फुलिया किताब-कापीक बस्ता माटिक रैक पर राखि माय केँ ताकै लगलीह। माय आंगन मे नहि रहै। पछुआर मे गोरहा पाथैत रहै। ओना गोरहा पाथैक समय नहि छल तेँ फुलियाक मन मे गोरहा पाथैक बात ऐबे नहि कयल छल। मुदा तकबो करैत आ षोरो पाड़ैत रहथि। आंगन सँ निकलि जखने फुलिया डेढ़िया लग आइलि कि गोरहा मचान लग स’ मायक बाजब सुनलक। गोरहा मचान लग पहुँचते फुलिया देखलनि जे माय गोरहा पाथि रहली हेन। मन मे तामस उठै लगलनि जे एक त कातिक मास तहू मे सूर्यास्तक समय, इ कोन समय भेल। अनेरे ठंढ़ लगतनि। मन खराब हेतनि। मुदा किछु बाजलि नहि। अप्पन बात बाजलि- ‘‘माय, परसू मधुबनी जायब। लड़की(छात्रा) सबहक बीच ‘‘महिला सषक्तीकरण’’ बिपयक प्रतियोगिता छी। सैाँसे जिलाक छात्रा सभ रहत। हमहूँ जायब। तहि ले कम सँ कम पच्चीस टा रुपैआक ओरियान कए दे।’’ मधुबनीक नाम सुनि माय अपन सभ सुधि-बुद्धि बिसरि गेलीह। हाथ गोबर पर रहनि, आँखि बेटी बेटी आँखि पर आ मन अकास मे कटल धागाक गुड्डी जेँका उड़ै लगलनि। पँजरा मे बैसि फुलिया कहै लगलनि- ‘‘माय, हमरा जरुर इनाम भेटत।’’ अकास स मायक मन धरती पर खसि सोचए लगलीह जे पच्चीस रुपैआ कत’ स’ आनब? कहलखिन- ‘‘बुच्ची, ताबे ककरो से पैंइच ल’ लेह किएक त जुग-जमाना बदलि रहल अछि, बिनु पढ़ल-लिखल लोककेँ कोनो मोजर रहतै? तेँ कोनो धरानी रुपैआक ओरियान क’ लेह। गाय बिआयत त’ दूध बेचि क’ द’ देबैक।’’ मायक बात सुनि फुलिया मुस्कुराइत कहलकनि- ‘‘धुर बुढ़िया नहितन, तीनि रुपैये गोरहा बिकाइछै, दसे टा बेचि लेब तेहिमे त’ तीस रुपैआ भ’ जायत। तइ ले ककरो स’ मुह छोहनि किएक करब। ई त’ रुपैआक ढेरी छिअउ। जखैन जत्ते रुपैआक काज हेतउ, तखैन तते बेचि लिहें। तोरा कि कोनो हेलीकेप्टर कीनैक छओ?’’ 85.जीविका वरात्रिक प्रात। मध्य मास। जहि डेढ़ मासकशि शीतलहरी मे सूर्य मरनासन्न भऽ गेल छलाह तहि मे जीबैक नव शक्ति सेहो आबि गेलनि। तेँ रौद मे धीरे-धीरे गरमी अबैत। चारि बजे भोर मे उमाकान्तक नीन टुटल। निन्न टुटितहि देवाल घड़ी पर नजरि देलक। चारि बजैत। ओछाइने पर पड़ल-पड़ल अपन आगूक जिनगी दिशि नजरि देलक। ओना काल्हिये दिन मे, दुनू दोस्त विचारि नेने छल। विचारि नेने छल जे दुनू गोटे टेम्पू कीनए भोरुके गाड़ी स दरभंगा जायब। बदलैत जिनगीक संकल्प उमाकान्तक मन मे। किऐक त जिनगी मनुष्य केँ किछु करैक लेल भेटैत अछि। मन मे एलै जे पाँच-पचपन मे गाड़ी अछि, तेँ पाँच बजे घर स निकलि देब। ओना अधे घंटाक रास्ता स्टेशनक अछि मुदा किछु पहिनहि पहुँचब नीक रहत। ओना काहियो कोनो गाड़ी अपना समय पर नहिये अबै अए, एक-आध (एकाध) घंटा लेट रहिते अछि मुदा तइ स हमरा की? हम समय पर जायब। शुभ काज सदिखन समय स पहिनहि करैक कोशिश करक चाही। एते बात मन मे अबितहि उमाकान्त ओछाइन छोड़ि उठि गेल। उठितहि मन मे एलै जे हमर ने नीन टुटि गेल, मुदा जँ दोसक (शोभाकान्त) नीन नहि टुटल होय, तखन त गड़बड़ होएत। से नहि त पर-पैखाना जाइ स पहिने ओकरो जा कऽ उठा दिअए। फेरि मन मे एलै दतमनि करिते जाय। किऐक त एकटा काज त अगुआइल रहत। हाथ मे दतमनि लइतहि मन मे एलै जे किछु खा-पी कऽ घर स निकलब। रास्ता-बाटक कोन ठेकान। तहू मे लोहा-लक्कड़क सवारी। कखन नीक रहत कखन बगदि जायत, तेकर कोन ठेकान। एक बेरि एहिना भेलि रहए की ने। दरभंगे जाइत रही कि मनीगाछी लोहनाक बीच गाड़ीक इंजिन खराव भऽ गेलइ। भोरुके गाड़ी, तेँ सोचने रही जे दरभंगे पहुँच किछु खायव-पीबि। ले बलैया, दू बजे तक गाड़ी ओतए अटकि गेलइ। कखनो गाड़ीक डिब्बा मे जा बैइसी त कखनो उतड़ि क, इंजिन लग पहुँच, ड्राइवर कऽ पूछियै। ओहू वेचाराक मन घोर-घोर भेलि। हमहूँ आशा-बाटी मे रहि गेलहुँ। से ज पहिने बुझितियै त गाड़ी छोड़ि विदेसर चैक पर चलि जैतहुँ आ बस पकड़ि सबेर सकाल दरभंगा पहुँच जैतहुँ। सेहो ने केलहुँ। तेकर फल भेलि जे भूखे-पियासे खूब टटेलहुँ। तेँ बिना किछु मुह मे देने घर स नै निकलब। इ बात मन मे अबिते उमाकान्त पत्नी कऽ उठबैत कहलक- ‘जाबे हम दोसक (शोभाकान्त) ऐठाम से अबै छी ताबे अहाँ चारि टा रोटी आ अल्लूक भुजिया बना लेब।’ कहि उमाकान्त शोभाकान्तक ऐठाम दतमनि करैत विदा भेल। दाँत मे घुस्सो दिअए आ मने-मन विचारवो करए। मन म एलै जे काजे ऐहेन छी जे मनुक्ख कऽ मनुक्खो बनबै अए आ जानवरो। दुनियाँक सब मनुक्ख त किछु नहि किछु करितहि अछि। मुदा कियो देव बनि जाइत अछि त कियो दानव। तेँ, काज कऽ परिखब सबसँ मूल बात छी। शोभाकान्त ऐठाम पहुँचते उमाकान्त रस्ते पर स बोली देलक- ‘दोस छेँ रौ (रओ), रौ दोस।’ ओछाइन पर स उठैत शोभाकान्त बाजल- ‘हँ। दोस छिअए रौ, हमरो नीन टुटले अछि। अखन ते अन्हारे छै।’ उमाकान्त- सवा चारि बजै छै। तैयार होइत-होइत पाँच बजिये जायत। कने पहिले स्टेशन जायब।’ उमाकान्त आ शोभाकान्त एक्के बतारी। दुनू मे के छोट (उमेरक हिसाब स) के पैघ से त ने अपने दुनू गोरे बुझए आ ने कियो टोले-पड़ोसक। किएक त टिपनि (जन्म-कुण्डली) दुनू मे से ककरो नहि। बच्चे स दुनू गोटे, बेसी काल, एक ठाम रहैत तेँ समाजोक लोक बिसरि गेल। अपना दुनू गोटेक माइयो-बाप मरिये गेल, आन मने किऐक राखत। मुदा दुनू गोटे एहि मौकाक लाभ उठबैत। लाभ इ उठबैत जे दुनू, दुनू गोटेक स्त्री स हँसी-चैल करैत। तइ ले दुनू मे स ककरो मलाल नहि। मुदा गामक बूढ़ो-बुढ़ानुस आ नवकियो कनियाँ दुनू (स्त्रीगण) केँ निरलज कहैत। तेकर गम, दुनू मे स ककरो नहि। किऐक त सब स्त्रीगण केँ होइत जे अधिक सऽ अधिक पुरुखक संग गप-सप, हँसी-मजाक हुअए। बच्चे स दुनू गोटे- उमाकान्त आ शोभाकान्त- एक्के ठाम गुल्लियो-डंडा खेलए आ गामेक स्कूल मे पढ़बो करए। बच्चा मे दुनू गोरे दुनू कऽ नामे धऽ-धऽ बजैत। मुदा चेष्टगर भेला पर, कनगुरिया ओंगरी मे ओंगरी भिरा, दोस्ती लगा लेलक। मिडिल तक गामेक स्कूल मे दुनू गोटे पढ़लक। मुदा हाइ स्कूल मे उमाकान्ते टा नाओ लिखेलक। शोभाकान्त गरीब, तेँ पढ़ाइ छोड़ि देलक। मुदा उमाकान्त कऽ दू-तीनि बीघा खेतो आ पितो गामेक स्कूल मे नोकरी करैत। ओना शोभाकान्त उमाकान्त स बेसी चड़फड़ो आ पढ़ैइयो मे नीक। तेँ अपना क्लासक मुनिटिराइयो करैत। मुनीटरक बात शिक्षको अधिक मानैत आ चट्टियाक बीच धाखो। पढ़ाई छोड़लाक बाद शोभाकान्त नोकरी करए पटना गेल। गाम से त अइह सोचि निकलल जे जइह (जैह) काज भेटत सइह (सैह) करब। मुदा रस्ता मे बिचार बदलि गेलइ। विचार इ बदलल जे ने चाहक दोकान मे नोकरी करब आ ने होटल मे। ने कोठी मे काज करब आ ने ताड़ी-दारुक दोकान मे। अगर ज नोकरी नै हैत त रिक्शे चलाएव वा मट्टिये मे काज करब। सरकारी नोकरीक त कोनो अशे नहि। किऐक त उमेरो नै भेल हेँ। गाम स शहर शोभाकान्त पहिले-पहिल पहुँचल। मुदा जे आकर्षण शहर-बजार देखि लोक केँ होइत ओ आकर्षण शोभाकान्त कऽ नै होइत। जहिना सोना-चानीक दोकान दिशि गरीबक नजरि नहि पड़ैत, तहिना। स्टेशन स उतड़ि ओ उत्तर दिशक रास्ता धेलक। कोठा-कोठी पर नजरि पड़वे ने करै। किछु दूर गेला पर एकटा साइकिल मिस्त्रीक दोकान देखलक। रास्ता पर ठाढ़ भऽ दोकान हियासै लगल। दोकानदारोक (मिस्त्रीक) नजरि पड़ल। शोभाकान्त पर नजरि पड़ितहि दोकानदारक मन मे आयल जे छोटो-छोटो काज मे अपने बरदा जाइ छी, जहि स नमहर काज पछुआ जाइ अए। से नइ त अइ बच्चा कऽ पूछियै जे नोकरी रहत। जँ रहत त रखि लेब। हाथक इशारा स सोर पाड़ि मिस्त्री पूछलक- ‘बाउ, की नाम छी? ‘शोभाकान्त।’ ‘कत्त’ घर छी?’ ‘मधुबनी जिला।’ ‘कत्त’ जायब?’ ‘नोकरी करए एलहुँ।’ ‘ऐठाम रहब?’ ‘हँ। रहब।’ जहिना अतिथि-अभ्यागत कऽ दुआर पर अबितहि घरबारी लोटा मे पानि आनि आगू मे दइत, खाइक आग्रह करैत तहिना शोभाकान्त कऽ मिस्त्री केलक। आठ आना पाइ दइत, आंगुरक इशारा स मुरही-कचड़ीक दोकान देखबैत कहलक जे ओहि दोकान स जलखै केने आउ। झोरा रखि शोभाकान्त विदा भेल। ओना गाड़ीक झमार स देहो-हाथ दुखाइत आ भूखो लागल, मुदा नोकरी पाबि देहक दरदो आ भूखो कमि गेलइ। मुरही-कचड़ीक दोकान पर बैसितहि, बगए-बानि देखि दोकानदार पूछलक- ‘बौआ, अहाँक घर कत्तऽ छी?’ शोभाकान्त- ‘मधुबनी जिला।’ ‘गामक नाम कहू।’ ‘लालगंज।’ ‘हमरो घर त अहाँक बगले मे अछि, रुपौली। बीस-पच्चीस बर्ख सऽ हम ऐठाम रहै छी।’ बिना पाइ नेनहि दोकानदार शोभाकान्त कऽ भरि पेट खुआ देलक। खा कऽ शोभाकान्त साइकिलक दोकान पर आबि मिस्त्री कऽ पाइ घुमबैत कहलक जे दोकानदार पाइ नइ लेलक। मुदा गहिकीक झमेल दुआरे मिस्त्री आगू किछु नहि पूछलक। साइकिल ट्यूबक पनचर बनौनाइ, छोट-छोट भंगठी स शोभाकान्त अपन जिनगी शुरु केलक। छोट-छोट काज भेने दोकानदारो कऽ आगू बढ़ैक अवसर हाथ लगल। साइकिल, रिक्शाक संग मोटर साइकिल आ टेम्पूक मरम्मत केनाइ सेहो शुरु केलक। शोभाकान्तो कऽ मौका भेटिलै। उपारजनक लूड़ि अबै लगलै। दुनियाँ कऽ बिसरि शोभाकान्त रिन्च-हथौरी मे मगन (मग्न) भऽ गेल। छह मास बीतैत-बीतैत शोभाकान्त साइकिल, रिक्शाक मिस्त्री बनि गेल। संगहि मोटर साइकिल आ टेम्पू चलाएव सेहो सीखि लेलक। मेहनत केने शरीरो (देहो) फौदा गेलइ। साले भरि मे जवान भऽ गेल। ड्राइवरीक लाइसेंस शोभाकान्त बना लेलक। ड्राइवरीक लाइसेंस बनवितहि शोभाकान्त कऽ मन मे द्वन्द्व उत्पन्न हुअए लगल जे ड्राइवरी करी आ कि अपन दोकान खोलि मिसतिरिआइ करी। मुदा अपन दोकान खोलैक लेल घर भाड़ाक संग सामानो (मरम्मत करैक) लिअए पड़त। फेरि मन मे एलै जे एक त मेनरोड मे घर नै भेटत दोसर पाइयो ओते नइ अए जे सामानो कीनब। तइ स नीक जे ड्रइबरिये करी। सैह केलक। ड्राइवरी मे दरमहो नीक आ बाइलियो आमदनी। महीना दिन त अव्यवस्थिते रहल मुदा दोसर मास बीतैत-बीतैत असथिर भऽ गेल। दरमाहा जमा करै लगल आ बाइली आमदनी घर पठबै लगल। सालभरिक दरमाहा स शोभाकान्त टेम्पू कीनि लेलक। टेम्पू कीनि, अपन सब सामान लादि, शोभाकान्त सोझे गाम चलि आयल। सेकेण्ड डिबीजन स उमाकान्त बी.ए. पास केलक। ओना पढ़लो-लिखल लोक कम, मुदा ओहू स कम नोकरी। खेती-पथारी आ कारोवार कियो (पढ़ल-लिखल) करए नहि चाहति। जहि स गाम-सबहक दशा दिनो-दिन (दिनानुदिन) पाछुऐ मुहे ससरैत। गामक लोको तेहने जे पढ़ल-लिखल लोक केँ खेती करैत देखि, दिल खोलि कऽ हँसबो करैत आ लाख तरहक लांछना सेहो लगबैत। जहि स गामक पढ़ल-लिखल लोक केँ नोकरी करब मजबूरी भऽ जायत। नोकरीक भाँज मे उमाकान्त दौड़-धूप करै लगल। मुदा मन मे संकल्प रखने जे घूस दऽ कऽ नोकरी नइ करब। चाहे नोकरी हुअए वा नहि। दौड़-धूप स मन विचलित हुअए लगलै। संकल्प डोलए लगलै। मन मे अनेको (ढ़ेरो) प्रश्न औंढ़ मारै लगलै। कखनो मन मे होय जे पाँच कट्ठा खेत बेचि कऽ नोकरी पकड़ि लेब। फेरि मन मे होय जे जखन घूस दऽ कऽ नोकरी लेब त घूस लऽ कऽ लोकक काज किअए ने करवै? फेरि मन मे होय जे तखन जिनगी केहेन हैत? अछैते जीबिने मुरदा बनल रहब। लोक शरीर तियागक बाद मृत्यु धारण करैत अछि आ हम जीबिते मे मरल रहब। फेरि मन मे एलै जे पत्नी त जीवन-संगिनी छी तेँ एक बेरि हुनको स पूछि लिअनि। मन मे कने शान्ति एलै। पत्नी स पूछलक- ‘बिना घूस-घास कऽ नोकरी भेटब कठिन अछि, से अहाँक की विचार?’ मुस्की दइत पत्नी बाजलि- ‘आइक युग मे नोकरी भेटब जिनगी भेटब छी। तेँ हमरो गहना-जेबर अछि आ जँ ओहि स नइ पूड़ै तऽ थोड़े खेतो बेचि कऽ नोकरी पकड़ि लिअ। देखते छिअए जे साले भरि मे लोक की सऽ की क-ए लइत अछि। एक त ओहिना उमाकान्तक मन घोर-घोर होइत, तइ पर स पत्नीक बात आरो मरनासन्न बना देलक। जिनगीक आशा टूटए लगल। आँखिक रोशनी क्षीण हुअए लगल। आशाक ज्योति कतौ बुझिये ने पड़ैत। जहिना अन्हार मे सगतड़ि भूते-प्रेत, चोरे-डकैत, सापे-छुछुनरि बुझि पड़ैत, तहिना उमाकान्त कऽ सेहो हुअए लगल। डूबैत जिनगीक आशा मे कने टिमटिमाइत इजोत बुझि पड़लै। इजोत अबिते शक्तिक संचार हुअए लगलै। मन मे संकल्पक (व्रत) अंकुर अंकुरित हुअए लगलै। जहि स दृढ़ताक उदय सेहो हुअए लगलै। मने-मन विचार करै लगल। विचार केलक जे जिनगीक किछु लक्ष्य हेवाक चाही। मनुष्य त चुट्टी-पीपरी नहि होइत जे साधारण ककरो पाएर पड़ला स मरि जायत। मनुष्य त ब्रह्मक अंश छी। ओकरा मे विशाल शक्ति छिपल छै। जिनगी मे एहिना हवा-बिहाड़ि अबै छै, तहि स कि मनुष्य मनुष्यता गमा लेत। मनुष्येता त मनुष्यक धरोहर सम्पत्ति छी। जेकरा लोक ओहिना कतौ फेकि देत। कथमपि नहि। मने-मन विचारलक जे हमरा नोकरी नै भेटत। तेँ कि हाथ पर हाथ दऽ कऽ बपहारि काटब। एते कमजोर छी। की हमरा मे मनुष्यक सब गुण (शक्ति) मरि चुकल अछि। हमरा बुते किछु कयल नै हैत? जरुर हैत। नोकरी दिशि स नजरि हटा उमाकान्त राशनक (कोटा) दोकान चलबैक विचार केलक। विचार एहि दुआरे केलक जे जीवैक लेल अर्थक उपार्जन जरुरी होइत। जिनगीक अधिकांश काज अरथे स चलैत। तेँ बिना अर्थे जिनगी जिनगी नहि रहि जाइत। हँ, इ बात जरुर जे अर्थक उपार्जन आ उपयोगक ढ़ंग नीक हेवाक चाही। राशनक दोकानक जरुरत सब गाम मे अछि। सरकार आ समाजक बीचक कड़ी सेहो छी। ओना लाइसेंसो (डीलरीक) बनबै मे पाइयेक खेल चलैत। मुदा तइयो जी-जाँति कऽ ओ (उमाकान्त) लाइसेंस बनबै दिशि बढ़ल। डीलरीक लाइसेंस बनौलाक उपरान्त उमाकान्त, समान उठबै स पहिने, मिश्रीलाल स कारोबारक तौर-तरीका बुझैक लेल गेल। मिश्रीलाल पुरान डीलर। मुदा जहिना गाम मे (समाज मे) अपन इज्जत बनौने तहिना सरकारियो आॅफिस मे। इज्जत बनबैक अपन तरीका। तेँ ब्लौकक पेंइतालिसो डीलर मिलि ओकरा यूनियनक सेक्रेट्री बनौने। जहिना सब डीलर मिश्रीलाल कऽ मानैत तहिना मिश्रीलालो सबकेँ। अइह बुझि उमाकान्त भेंटि करब आवश्यक बुझलक। मिश्रीलाल ऐठाम उमाकान्त पहुँचल तऽ देखलक जे चारि-पाँच टा धिया-पुता रजिष्टर पर दस-खतो करै अए आ निशानो लगबै अए। किऐक त पछिला मासक समान बँटबारा भऽ गेल छल। तेँ बिना रजिष्टर तैयार भेने अगिला समान कोना उठत? जरुरी काज बुझि मिश्रीलाल मगन भऽ अमन काज करैत। उमाकान्त कऽ देखितहि मिश्रीलाल रजिष्टरक बीचहि मे, जइ पेज मे निशान आ हस्ताक्षर करबैत, पेनो आ कार्बनो रखि, मोड़ैत बेटा कऽ कहलक- ‘बौआ, चाह बनबौने आबह?’ (उमाकान्त दिशि होइत पुछलक) किमहर किमहर ऐनाइ भेलई, बौआ।’ निरबिकार (निर्बिकार) भऽ उमाकान्त बाजल- ‘भैया, अहाँ पुरान डीलर छी। डीलरीक सब कुछ जनै छियै। बीए. केलाक बाद हम दू साल नोकरीक पाछु बौऐलहुँ मुदा कतौ गर नै धेलक। आब त उमरो (नोकरीक उम्र) लगिचाइले अछि, तेँ नोकरीक आशा तोड़ि डीलरीक लाइसेंस बनेलहुँ हेन।’ नोकरीक गर नहि लागब सुनि मिश्रीलाल- ‘बौआ, जहिना कोनो परिवार मे चारि-पाँच भाइक भैयारी रहैत अछि। सब कुछ सामिले (शामिले) रहै छै। मुदा स्त्रीगण (सब भाइक पत्नी) केँ अप्पन-अप्पन सम्पत्ति सेहो छै। जहि मे भाइयो सब चोरा-नुका शामिल भऽ जाइत अछि। जेकर फल होइ छै घर मे आगि लागब तहिना नोकरियो सब मे भऽ गेल अछि। जे कुरसी पर अछि ओ अपने सार-बहिनोइक जोगार मे रहै अए। कहीं-कतौ बिकरियो होइ छै। जेकर परिणाम बनि गेल अछि जे नाकरी केनिहारोक बंश बनि गेल अछि। देशक विकास केहेन अछि से त तू पढ़ले-लिखल छह, सब कुछ जनिते छहक। जँ कनी-मनी एक रत्ती आगूओ बढ़ि रहल अछि त ओहि स वेसी ओहि वंश (नोकरिहाराक वंश) मे नोकरी केनिहार बढ़ि रहल अछि। तेँ देखबहक जे डाक्टरक बेटा डाक्टरे बनत। इंजीनियरक इंजीनियरे। कते कहबह। जे जत्ते अछि ओ बपौती वुझि ओकरा पकड़ने अछि। तहि बीच तेसरक (जे ओहि स अलग अछि) जे गति हेवाक चाही सैह तोरो भेलह। तहू स बेसी जुलुम अछि जे किछु गनल-गूथल लोक अछि जे नोकरियो करैत अछि, खेतो हथिऔने अछि आ जे कोनो सरकारी योजना बनै छै ओकरो हड़पैत अछि। जइ स देखबहक जे ककरो सम्पत्ति राइ-छित्ती होइ अए आ कियो सम्पत्ति लेल लल्ल अछि। उमाकान्त- ‘भैया, दुनिया-दारीक गप छोड़ू। अपना काजक विषय मे कहू।’ मिश्रीलाल- ‘बौआ, अखन तू जुआन-जहान छह। मुदा जइ काज क अपना जीवै चाहै छह ओ गल्ती भेलह। तोरा सन आदमी कऽ डीलरी नइ करक चाही। हम त सब घाटक पानि पीनाइ सीखि नेने छी। की नीक की अधला, से बुझिते ने छिअए। बुझह तऽ नड़ढ़ा हेल हेलैत छी। तेँ हमर कारबार ठीक अछि। मुदा तोरा बुते नै हेतह? उमाकान्त- ‘किअए?’ तहि बीच चाह एलै। दुनू गोटे हाथ मे गिलास लेलक। एक घोंट चाह पीवि मिश्रीलाल- ‘देखहक, डीलरी दू दुनियाँक सीमा परक काज छी। एक दिशि सत्ताक दुनियाँ अछि आ दोसर दिशि आम लोकक। गड़बड़ दुनू अछि।’ उमाकान्त- ‘से की?’ मिश्रीलाल- ‘पहिने पब्लिकेक बात कहै छिअह। राशनक वस्तु (चीनी मटियातेल) तऽ हिसाबे सऽ भेटैत अछि। नामे छिअए कोटा। जँ मनमाफित भेटिते त खुल्ला बजार होइतै। से त नइ अछि। गाम मे किछु ऐहेन-ऐहेन रंगबाज सब बनि गेल अछि जेकरा खाइ-पीबै ले नै देबहक तऽ भरि दिन अपनो आ अनको उसका-उसका रग्गड़े करैत रहतह। रग्गड़ केँ त कोनो सीमा नै होइ छै। जँ कहीं गोटे दिन लाठिये-लठौबलि भऽ जेतह तखन तऽ लेनी कऽ देनी पड़ि जेतह। दू पाइ कमाइ ले धंधा करवह आ कि कोट-कचहरीक फेरि मे पड़बह। बुझिते छहक जे कोट-कचहरी लोकेक पाइ पर ठाढ़ अछि। ओइ साला (रंगबाज) सब कऽ की अछि। अपने किछु करतह नहि आ अनका काज मे सदिखन टांगे (टाँगे) अड़ौतह। गामक उत्पात स ल कऽ थाना-पुलिस, कोट-कचहरीक दलाली भरि दिन करैत रहतह। आब तोंही कहह जे बरदास हेतह? नीक लोकक लेल अइ दुनियाँ मे कतौ जगह नहि अछि। ओइ साला सब केँ की छै, भरि दिन ताड़ी-दारु पीबि ढ़हनाइत रहतह। ने छोट-पैघक विचार करतह आ ने गाड़ि (गारि) माइरिक। तइ पर स मुखियो (पंचायत मुखिया) आ वार्डो-मेम्बर सब केँ कमीशन चाहबे करियै। पब्लिको तेहने अछि। देखबहक जे कतेक ऐहेन परिवार अछि जेकरा कोटा (राशनक) वस्तुक जरुरत नै अछि (जना चीनी) मुदा ओहो कोटा स चीनी उठा दोकान मे, किछु नफ्फा लऽ कऽ, बेचि लेतह। जबकि किछु परिवार ऐहेन अछि जेकरा कोटाक वस्तु स खर्च नै पूड़ै छैक। अपनो आखि स देखवहक जे दस-बीस कप चाह आने पीबैत अछि। की ओकरा सब कऽ फाजिल नै देवहक। जखने एक गोटे कऽ फाजिल देवहक तऽ दोसराक हिस्सा कटवे करत। ऐहेन स्थिति मे डीलरे की करत? आखिर ओहो त समाजेक लोक छी।’ उमाकान्त- ‘सब गोटे ते कोटा (वस्तु) उठबितो (उठैबतो) नै हेतै?’ मिश्रीलाल- ‘हँ, सेहो होइ अए। मुदा ओ तखन होइ अए जखन कोटाक वस्तुक दाम आ खुल्ला बजारक (थ्तमम डंतामज) दाम मे अन्तर नै रहैत अछि। मुदा जखन दुनूक दाम मे अन्तर रहैत अछि तखन जेकरो ने अपना पाइ रहै छै ओहो दोकानदार सब स, अधा-अधी नफ्फा पर, पाइ लऽ कऽ समान उठा लइ अए आ बेचि लइ अए। ततबे नै ओहो चाहतह जे किछु फाजिले कऽ समान भेटए। मुह बिजकबैत उमाकान्त- ‘तब तऽ बड़ ओझरी अछि।’ उमाकान्तक सोच कऽ गहराई दिशि जाइत देखि, मुस्की दइत मिश्रीलाल- ‘बौआ, एतबे मे छगुन्ता लगै छह। इ त एक दिसक बात कहलिहह। अहू मे कते ओझरी छुटिये गेलह। जँ सरिया कऽ सब बात कहबह तऽ सैकड़ो ओझरी आरो अछि। आब सुनह आॅफिस, बैंक, एफ.सी.आइक (गोदाम) संबंध मे। दौड़ि-बरहा जे करै पड़तह ओकरा छोड़ि दइ छिअह। किऐक त मोटा-मोटी यैह (अइह) बुझह जे एक दिनक काज मे पनरहो दिन स बेसिये लगतह। जइ मे समयक संग पच्चीस-पचास पौकेटो खर्च हेबे करतह।’ उमाकान्त- ‘तब त बड़ लफड़ा अछि?’ मिश्रीलाल- ‘लफड़ा कि लफड़ा जेँका अछि। जखने ब्लौक पाएर देबहक कि गीध जेँका, चारु भर सऽ, (अफसर सऽ लऽ कऽ चपरासी धरि) नोंचए लगतह। कियो कहतह जे चाह पिआउ, ते कियो कहतह पान खुआउ। कियो कहतह सिगरेट पिआउ ते कियो मिठाइ खुआउ। सुनि-सुनि मन मोहरा जेहत। मुदा की करबहक? भीखमंगो से गेल-गुजरल चालि देखबहक। जना अपना दरमाहा भेटिते ने होय। मुदा डीलरे की करत? अगर जँ सबके खुशी नै राखत ते काजे लटपटेतै। काजो तेहेन अछि जे एक्के टेबुल से नइ होइ छै। जत्ते टेबुल तते खर्च। अखन हमहू अगुताइल छी, तेँ नीक-नाहाँति नहि कहि सकबह। देखते छहक जे रजिष्टर तैयार करै छी। ब्लौक जायब। मुदा तइयो एक-दू टा बात कहि दइ छियह। सबहक तड़ी-घटी ने हम बुझै छियै।’ उमाकान्त- ‘कनी-कनी सबहक बात कहि दिअ?’ मिश्रीलाल- ‘अगुताइल मे की सब बात मनो पड़ै छै। मुदा जे मन पड़ै अए से कहि दइ छिअह। पहिने बैंकक सुनह। कोरियापट्टी मे दुनियाँलाल डीलर अछि। बेचारा बड़ मुह सच। जहिना-जहिना समान बिकाइल रहए तहिना-तहिना पाइ रखने रहए। खुदरा समानक बिक्री तेँ खुदरा पाइ। जखन बैंक मे जमा करए गेल(अगिला कोटाक लेल) ते खुदरा पाइ देखि बैंक मे लेबे ने केलकै। कहलकै जे ओते हमरा छुट्टी अछि जे भरि दिन तोरे पाइ गनैत रहब। भरि दिन वेचारा छटपटा कऽ रहि गेल। बैंक से निकलबो ने करए जे पौकेटमार सब ने कहीं पाइ उड़ा दिअए। दोसर दिन आबि क हमरा कहलक। तामस त बड़ उठल। किऐक त जना मोटका पाइ सरकारक होय आ खुदरा नै होय, तहिना। जखन पाइयेक लेन-देन बैंक मे होइ छै ते गनै ले स्टाफ राखह। मुदा की करितियै। दोसर दिन गेलौ। मनेजर के कहलियै। तखन दू प्रतिशत कमीशन पर फड़िआयल। आब तोंही कहह जे इ दू प्रतिशत कोन बिल मे चलि गेल। तहिना दोसर बात लाय, इन्सपेक्टरक (सप्लाइ इन्सपेक्टर)। इन्सपेक्टर बदली भेलइ। नव इन्सपेक्टर वुझि पनरह-बीस गोटे (डीलर) ओकरा पाइ नै देलकै। ओना पचास रुपैये (रुपैइये) प्रति डीलर प्रति मास इन्सपेक्टर कऽ दइत अछि। सबकेऽ मन मे भेलइ जे नव हाकिम छथि तेँ छओ मास त इमानदारी रखवे करताह। ले बलैया, जहाँ डीलर सब समान (दोसर कोटाक) उठौलक कि दोसर दिन भेरे विश्वनाथ (डीलर) ऐठाम पहुँच गेल। विश्वनाथो कऽ कोनो डर मन मे नहि। किऐक त समान ओहिना रहए। विश्वनाथ कऽ इन्सपेक्टर चीनी काँटा करै ले कहलक। ओहो तैयार भऽ काँटा करै लगल। पाँचो बोरा मिला कऽ चैदह किलो चीनी कमि गेलइ। विचहि मे उमाकान्त कहलक- ‘चीनी तौलि कऽ नइ नेने रहए?’ मिश्रीलाल- ‘इ एफ.सी.आइ. गोदामक खेल छी। एफ.सीआइ गोदाम त ब्लौके-ब्लौके नै अछि। तेँ देखबहक जे डीलर सबहक नम्बर लगल अछि। सबकेँ धड़फड़ करैत देखहक। किऐक त अपन गाड़ी (टायर) त सब डीलरक रहै नै छै। अधिक डीलर भड़े पर गाड़ी लऽ जाइ अए। तेँ मन मे होइत रहै छै जे जते जल्दी समान हैत तते कम भाड़ा लगत। तेँ कियो समान तौलबै नै अछि। जे कियो पच्चीस रुपैइये बोरा मनेजर कऽ दऽ देने रहलै ओकरा त नीक समानो आ पुड़ल बोरो देलक। जे पाइ नइ देने रहल ओकरा समानो दब आ घटल बोरो देलक। चोर पर चोर अछि।’ छुब्ध (क्षुब्ध) होइत उमाकान्त- ‘हद लीला सब अछि।’ मिश्रीलाल- ‘आब एम.ओक (मार्केटिंग अफसरक) बात सुनह। अखुनका जे एम.ओ. अछि ओ पीआक अछि। ओना काज करै मे भुते अछि। रस्तो-पेरा मे मोटर साइकिल लगा फाइल (कागज) पर लिखि दइत अछि। मुदा ओहिना नहि। पहिले एक बोतल पीआ देबहक, तखन।’ उमाकान्त- ‘अफसर भऽ कऽ रस्ता-पेरा पर बोतल पीबै अए?’ ठहाका मारि हँसि, मिश्रीलाल- ‘बौआ, तू गाम-घरक बात बुझै छहक। गाम-घर मे जे छोट-पइघीक (पैघीक), इज्जत-आबरुक विचार अछि ओ कत्तऽ पेबह। मुदा तइओ ओकरा मे दू टा गुण जरुर छलैक। पहिल गुण छलैक जे आन कोनो स्त्रीगण दिशि नहि तकितह। आ दोसर गुण छलै जे ककरो स एक्को पाइ नइ लइतह। मुदा एहि सऽ पहिलुका (एम.ओ) जे रहए ओ भारी पाइ (पैखौक) खौक। सब काजक रेट बनौने रहए। जे सब बुझै। तेँ जेकरा जे काज रहै ओ ओइ हिसाव से पाइ दऽ दइ आ लगले काज करा लिअए। मुस्कुराइत उमाकानत- ‘तब तऽ पक्का नटकिया सब अछि।’ मिश्रीलाल- ‘नटकिया कि नटकिया जेँका अछि। रंग-बिरंगक चोर सब पसरल अछि। कियो धनक चोर अछि त कियो धरमक। कियो बुइधिक चोर अछि त कियो विवेकक। कते कहवह। तेसराक (ओहि स पहिलुका) सुनह। अंदाज करीब, पचपन छप्पन बर्खक उमेर ओकर रहए। मुदा फीट-फाट करै मे जुआनक कान कटैत। जेहने हीरोकट कपड़ा पहिरैत तेहने हिप्पीकट केश रखैत। रंग-बिरंगक तेल आ सेंट लगवे। सदिखन उपरका जेबी मे ककही देखबे करितहक। रातियो मे कैक बेरि केश सीटए। चैबीस घंटा मे दू बेरि दाढ़ी बनबे। ओ (एम.ओ.) भारी नंगरचोप (नरचोप) जेहने अपने तेहने बहूओ। दिन भरि मे पच्चीसो बेरि कपड़ा (साड़ी-ब्लाउज) आ जूत्ता-चप्पल बदले। केश मे कते रंगक क्लीप लगबे तेकर ठेकान नहि। भरि दिन रिक्शा पर अइ डेरा से ओइ डेरा, अइ बजार से ओइ बजार घुमिते रहैत छलि। संयोगो ओकरा नीक भेटिलै। एक्के बेरि बी.डी.ओ., सी.ओक बदली भऽ गेलइ। ओकरे दुनू गोटे चार्ज दऽ कऽ गेल। ओही बीच शिक्षा मित्रक भेकेन्सी भेल। लड़की सब कऽ आरक्षण भेटिलै। जहि मे जाति प्रमाणपत्रक जरुरत पड़ल। (अपसोच करैत) बौआ की कहबह, ओइ सालाक डेरा बेश्यालय बनि गेल। कखनो आॅफिस (ब्लौक) मे नइ बैइसे। जखन बैसबो करै ते आन-आन कागज देखए, मुदा एक्कोटा जाति प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर नइ करए।’ उमाकान्त- ‘परिवारक कियो किछु ने कहए?’ मिश्रीलाल- ‘स्त्रीक विषय मे त कहिये देलियह। जेठकी बेटी बी.ए. मे पढ़ैत रहए। ओकरो चालि-ढ़ालि बापे-माए जेँका। कओलेजेक एकटा छौड़ाक (आदिवासी क्रिश्चन) संग चलि गेलइ।’ उमाकान्त- ‘बाप-माए कऽ लाज नै भेलै?’ मिश्रीलाल- ‘लाज ते तेहेन भेलइ जे राता-राती ऐठाम (अइठीन) से भागल।’ उमाकान्त- ‘अहूँ कऽ बहुत काज अछि आ हमरो मन भरि गेल। आखिरी मे एकटा बात बुझा दिअ।’ मिश्रीलाल- ‘की?’ उमाकान्त- ‘अहाँ कोना अप्पन प्रतिष्ठा समाजो आ आॅफिसो मे बना कऽ रखने छी?’ मिश्रीलाल- ‘(मुस्कुराइत) समाज मे जकरा ऐठाम सराध, विआह, उपनैन (उपनयन) मूड़न, भनडारा वा आन कोनो तरहक काज होइ छै ते ओकरा हम जरुर चीनियो आ मट्टियो तेलक पूर्ति कइये दइत छियै। भले ही अपना लग नहियो रहल तइयो जहाँ-तहाँ से आनि पुराइये दइत छियै। जइ से समाजक सब खुशी रहै अए। आॅफिसक बात त पहिने कहि देलियह।’ उमाकान्त- ‘हमरा की करक चाही? किऐक ते जइ हिसाबे अहाँ कहलौ तइ से हम्मर मन भटकि रहल अछि।’ मिश्रीलाल- ‘बौआ, जखन लाइसेंस बना लेलह तखन कम स कम एक खेपि समान उठा कऽ बाँटि लाय। जइ (जहि) स समाजोक चालि-ढ़ालि आ आॅफिसोक चालि-ढ़ालि देखि लेबहक। बेवहारिक (व्यवहारिक) ज्ञान भऽ जेतह। व्यवहारिके ज्ञान असली ज्ञान छिअए। अखन हम एते मदति जरुर कऽ देवह जे तोरा कतौ अड़चन नै हेतह। मुदा दोसर खेपक भार हम नै लेबह। किऐक त बुझिते छहक जे, विलाइ जे मूस से दोस्ती करत ते खायत की? तोरो सीखैक अवसर भेटि जेतह।’ उमाकान्त- ‘बड़वढ़िया! जहिना अहाँ कहलौ तहिना हम करब।’ मिश्रीलाल- ‘बाउ, आब ते हम बूढ़ भेलहुँ। जहिया हम सोलहे बरखक रही तहिये से डीलरी करै छी। मुदा पहिलुका आ अखुनका मे अकास-पतालक अंतर भऽ गेल अछि। जते धन आ शिक्षाक प्रसार भेलि जा रहल छै ओते घटिया मनुक्ख सेहो बढ़ि रहल अछि। पहिने इमानदार लोक बेसी छल मुदा आब आंगुर पर गनै पड़तह। हम त डीलरी मे रमि गेलौ। सब घाटक पानि पीनाइ सीखि नेने छी, तेँ नीक छी।’ उमाकान्त- ‘चलैत-चलैत किछु........।’ मिश्रीलाल- ‘जहिना आमक गाछ होइ छै, जे आमक आँठी स जनमैत अछि। तहिना त मनुक्खोक होइ छै। दुनियाँ मे जते मनुक्ख अछि, सब त मुरुखे भऽ कऽ जन्म लइत अछि। मुदा एहिठाम जकरा जेहेन परिवार, समाज, वातावरण भेटैत छैक ओ ओहन बनैत अछि। जहिना आमक छोट-छोट (सरही) गाछ क नीक-नीक (कलमी) आमक गाछक डारि मे बान्हि (कलम लगा) नीक-नीक आम बना लइत, तहिना मनुक्खोक होइत। मुदा नीक परिवार, नीक समाज अछिये कतेक। अधिकांश त गेले-गुजरल अछि। ने सबकेँ भरि पेट खेनाइ भेटै छै आ ने नीक बात-विचार। तखन नीक मनुष्य बनत कोना? जाधरि नीक मनुष्य नहि बनत ताधरि नीक समाज कोना बनत? तखन त जइह अछि तेहि मे अपना कऽ जते नीक बना जीबि सकी, बइह संतोषक बात। तोहूँ अखन सादा कागज जेँका साफ छह, तेँ हम चाहब जे ओ गन्दा नहि हुअ। जेहेन विचार हाथ होइत (कर्म) निकलतह तेहेन जिनगी हेतह। कियो शरीरांत कऽ मृत्यु बुझैत अछि आ कियो आत्माक हनन कऽ। मनुष्य मे असीम शक्ति छिपल छैक, ओकरा जगबैक अछि। जे हमहू सरिया कऽ नहिये बुझै छियै।’ जहिना तेज हथियार हाथ मे ऐला स सक्कत-सक्कत वस्तु कटैक हूबा बनि जाइत तहिना उमाकान्तो कऽ भेल। ओ विचार केलक जे आब बैलगाड़ीक युग नइ रहल। मशीनक युग आवि गेल। तेँ हमहूँ अपना हाथ स इन्जिने चलाएब।’

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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...