Tuesday, September 01, 2009

पेटार १५

रमानाथ झा
(9)



अतः मिथिलाक त्रैभाषिक नाटक, संस्कृत-प्राकृत-मैथिली नाटककें हमरा विचारें मैथिली
नाटक कहब

आग्रह मात्र थिक, शुद्ध प्रचार थिक। एहिसँ मैथिली नाटकक पुरान परम्पराक खण्डन भए
जाइत अछि ओ तें सम्भव थिक जे हमर विचार कतोक मैथिली साहित्यक प्रेमीकें मैथिलीक
विरोधी प्रतिभासित होइन्ह, कारण, एहिसँ हमरा साहित्यक गौरवमे, ओ गौरव मिथ्ये गौरव
किएक नहि हो, किछु हीनता बूझि पड़त। परन्तु हम जाहि कथाक एतए प्रतिपादन कएल अछि
से निष्पक्ष भए विचारणीय थिक। इतिहासमे सत्यक महत्त्व अपरिमेय छैक ओ सत्यक समक्ष
हानि वा लाभक हिसाब नहि हो। तथा किछु गनल गूथल कृतिकें छोड़ि अधिकांश ई नाटक सब
एहन अछिओ नहि जकरा अपनओने नाटकक क्षेत्रमे हमरा साहित्यकें गौरव होएत। एहि नाटक
सबमे जे वस्तु सत्ये हमर थिक से थिक गीत ओ से सबटा गीत प्रत्येकें उत्तम अछि जाहिसँ
कोनहु साहित्यकें गौरव होएत। हमरा जनैत एहि नाटक सबहिक यथार्थ स्वरूप स्वीकार कए
लेने हानि होइत अछि बहुत रास काचक; हमर जे हीरा अछि से हमरे रहैत अछि। अतएव हम
तँ बुझैत छी जे आग्रहकें छोड़ि यदि सत्यकें मानि लैत छी तथापि हमरा लोकनिक साहित्यक
उत्कर्षमे कोनो विशेष हानि नहि होइत अछि, कारण, हमरा साहित्यक सङ्गीतक परम्परा
अक्षुण्णे धरि नहि रहैत अछि प्रत्युत ओ आओर पुष्ट भए जाइत अछि। वि•ाक साहित्यमे
तथाकथित मैथिली-नाटक नगण्य अछि किन्तु मैथिली गीतकाव्य वि•ाक कोनहु साहित्यक
गीतकाव्यसँ न्यून नहि अछि। ई गौरव छोट नहि भेल ओ तेहन भेल जाहिमे कोनहु सन्देहक
अवकाश नहि अछि किएक तँ ओ सत्य थिक।



.. .. .. ..





3

विद्यापतिक शिवसिंह



अपन अनुपम कृति कीतिलताक प्रस्तावनामे विद्यापति कहने छथि जे



तिहुअन खेत्तहिं काञि तसु कित्ति-वल्लि पसरेइ।

अक्खर खम्हराम्भ जइ मञ्चा-बन्धि न देइ।।



आशय स्पष्ट अछि। संस्कृतमे कहबी छैक जे "कीर्त्तिरक्षरसम्बद्धा"। ताहिमे कीर्त्तिमे
वल्लीक आरोप कए कवि साज़् रूपकक विच्छित्ति दए अपन उक्तिकें कविताक स्वरूप देल


अछि। एहिमे सन्देह नहि जे काव्यप्रतिभा जन्मजात होइत अछि ओ कविक ह्यदयक उमड़ैत भाव
स्वतः भावानुकूल वाणी द्वारा कवितारूपें निःसृत होइत अछि। भवभूति कहने छथि जे "पूरोत्पीड़े
तड़ागस्य परीवाहः प्रतिक्रिया" ओ शोक एवं क्षोभमे भलहिं प्रलापहिं ह्यदय धैर्य प्राप्त करओ परन्तु
कविता-रूप परीवाह अनायास ओहि ह्यदयक हेतु होइत छैक जे आनन्दक भावसँ उमड़ल रहैत
अछि। बहुजनसुखाय बहुजनहिताय अवश्ये कविताक रचना होइत अछि मुदा ई मानए पड़त जे
ओकर प्रथम लक्ष्य रहैत अछि स्वान्तः-सुखाय। तें ई मानबामे कोनो विप्रतिपत्ति नहि जे विद्यापति
अपन बहुविध कविताक रचना अपनहि आनन्दक अतिरेकमे कएल। तथापि ओहि स्वान्तःसुखाय
लाभक सज़् सज़् अपन आश्रय, अपन मित्र, अथवा अपन हितैषीकें अमरत्व प्रदान करब सेहो
हुनका उद्देश्य अवश्य छलैन्हि, नहि तँ अपन गीतक भनितामे एतेक व्यक्तिक नाम दए दए ओहि
सबहुँ व्यक्तिक कीर्त्तिवल्लीकें पसरबाक हेतु ओ अक्षरक खाम्ह बनाए मचान नहि बान्हि जैतथि।



मिथिलाक इतिहासमे शिवसिंह ओ विद्यापतिक साहचर्य बड़ मधुर प्रसज़् अछि। शिवसिंह
जँ राजकुलमे

उत्पन्न भेल छलाह तँ विद्यापति राजमन्त्रीक कुलमे, ओ सए वर्षसँ अधिक दिन धरि मिथिला-
राज्यक शासनसूत्र ओ मैथिल समाजक नेतृत्व हिनकहि घरमे छलैन्हि। महाराज शिवसिंहक ओ
बालसखा छलाह, अन्तरज़् मित्र छलाह, वि•ास्त सचिव छलाह,महाराज-पण्डित छलाह,
राजकवि छलाह। शिवसिंह बड़ प्रतापी राजा भेलाह। मिथिलामे कहबी छैक जे



पोखरी रजोखरि आ'र सब पोखरा।

राजा शिवैसिंह आ'र सब छोकरा।।



परन्तु शिवसिंहक सभटा प्रताप विस्मृतिक गर्तमे गड़ि गेल रहैत ओ ई फकड़ा मात्र
हुनक प्रतापक गौरवकें ख्यापित करैत हुनक नामकें मन पाड़ैत रहैत यदि विद्यापति अपन
अनेकानेक रचनामे हुनका अमर नहि कए गेल रहितथि। पुरुष-परीक्षाक अवसन्न-बिद्य-कथामे
विद्यापति राजा ओ कविक सम्बन्धक प्रसज़्मे कहैत छथि जे सृष्टिक आदिकालहिसँ जे राजा
लोकनि वाक्कलागौरवक हेतु कवि लोकनिकें आराधि आराधि गैल छथि



तेषां नाम सरस्वती-परिणतावद्यापि संगीयते।

जाताः के न मृता न के तदितरे ज्ञाता न गेहाद् बहिः।।



वस्तुतः "यशसां स्थापनस्थानं कविभाषितं" ई कथा जतेक शिवसिंह-विद्यापतिक प्रसज़्मे
चरितार्थ भेल अछि ततेक आओर कहाँ देखैत छी?



ओना तँ विद्यापति अपन प्रभु शिवसिंहक कीर्तिकपताका सएह फहराए गेल छथि परन्तु
कीर्त्तिपताका नष्ट भए गेल लुप्तप्राय अछि। कीर्त्तिपताका कहि जे ग्रन्थ प्रकाशित भेल अछि
तकर प्रस्तावनामे "जगतसिंह"क कीर्तन अछि! परन्तु जतबओ विद्यापतिक रचना उपलब्ध अछि,
निश्चित रूपसँ विद्यापतिक रचना प्रमाणित होइत अछि, ततबहुसँ शिवसिंहक सम्बन्धमे बहुतो
ज्ञातव्य विषय ज्ञात भए जाइत अछि। आश्चर्य होइत अछि जे शिवसिंह जे किछु विद्यापतिक हेतु


कएने होइथिन्ह ताहिसँ ओ बुझने होएताह जे ओ अपन बाल-सखाकें उपकृत करैत छथि, कवि
अपनहु एकरा उपकारे मानने होएताह, ओ सबसँ बेसी तँ ओहि समयक लोक सब--कतोक तँ
ईष्र्यालु समेत भए--इएह कहने होएताह जे महाराज अपन बालसङ्गीतकें धन ओ सम्मान सब
कथूसँ परिपूरित कए देल। परन्तु आइ जखन दुहू महापुरुषक परस्पर सम्बन्धक दिशि दृष्टिपात
करैत छी तँ स्पष्ट प्रतीत होइत अछि जे उपकार तँ विद्यापति कएलथिन्ह शिवसिंहक जे हुनका
अमर कए गेलथिन्ह। राजा जे किछु देलथिन्ह से अनित्य छल, नष्ट भए गेल, लोक बिसरि
गेल, परन्तु कवि जे किछु हुनका दए गेलथिन्ह से नित्य अछि, एखन पर्यन्त ओ ओहिना अछि
वा ई कहू जे जँ जँ लोककें ओहि समयक स्मृति क्षीण भेल जाइत छैक तँ तँ अन्धकारक प्रकाश
जकाँ महाकविक वाणीमे उपनिबद्ध शिवसिंहक कीर्त्ति आओर तीक्षणतासँ आलोकित भए रहल
अछि।



विद्यापतिक रचनामे शिवसिंहक प्रसज़् यावतो वर्णनक संग्रह कए ओकर क्रमबद्ध अध्ययन
एक गोट बड़े रोचक ओ उपादेय विषय होइत परन्तु ताहि हेतु एक गोट क्षीणकाय निबन्ध
पर्याप्त नहि होएत। पुरुष-परीक्षामे अनेक ठाम शिवसिंहक प्रशंसा अछि, स्तुति अछि। कमसँ कम
दू गोट गीत केवल शिवसिंहक वर्णनमे उपलब्ध अछि। परन्तु सबसँ चमत्कारक अछि
विद्यापतिक ओ गीत सब जाहिमे भनितामे शिवसिंहक नामतः उल्लेख अछि। विद्यापतिक भनिता
केवल विधि-रक्षार्थ टा नहि अछि, कवि ओहिमे केवल अपन नाम वा उपाधि अथवा अपन आश्रय
किंवा जनिक प्रमोदार्थ ओहि गीतक रचना भेल तनिक नामक कीर्तन मात्रे कएकें नहि छोड़ि देने

छथि, अपितु ओहिमे बहुधा ओ अपन उक्ति बड़े मार्मिक रूपसँ अभिव्यक्त कएने छथि।
गोविन्ददासहुक रचनामे भनिता एहिना सार्थक अछि, साभिप्राय अछि। हुनक परवर्ती कवि
लोकनि भनिताकें केवल व्यवहार बनाए लेल। ताही कारणें विद्यापति वा गोविन्ददासहुक
भनिताक महत्त्व साधारणतया लोककें आकृष्ट नहि कए सकलक ओ विद्यापतिक भनिताक
स्वतन्त्र रूपसँ अध्ययन एकन पर्यन्त नहि भेल अछि। केवल श्रद्धेय डाक्टर श्रीविमानविहारी
मजुमदार साहेब एकर महत्त्वकें बुझलैन्हि अछि। हुनक एक गोट लेख एहि प्रसज़् बिहार रिसर्च
सोसाइटीक जर्नलमे 1942 मे प्रकाशित भेल छल तथा विद्यापतिक गीतक जे संग्रह ओ
सम्पादित कएल अछि ताहिमे भनिताक क्रमसँ गीतक वर्गीकरण कए एक भनिताक सबटा गीत
ओ एकत्र संगृहीत कए देल अछि तथा ओकर विस्तृत भूमिकामे एहि भनिता सबहिक विचार
सेहो ओ बड़े वैज्ञानिक रीतिसँ कएल अछि। यद्यपि ओ विचार सर्वाशें पूर्ण नहि अछि, केवल
भनिताक विचारक दिग्दर्शन मात्र कराए देल गेल अछि, मुदा एहिमे कोनो सन्देह नहि जे
श्रीमजुमदार साहेब जे काज कएल अछि ताहिसँ विद्यापतिक भनिताक स्वतन्त्र रूपसँ अध्ययन
करबाक केवल सामग्री मात्रे संकलित नहि भेल अछि, अपितु ओकर अध्ययन ओ अनुशीलनक
प्रकार सेहो प्रदर्शित भेल अछि।



ई कथा आब सर्वविदित अछि जे राधाकृष्ण विषयमे सख्यभाव मानि महाप्रभु चैतन्यदेव
विद्यापतिक श्रृङ्गारक गीतकें भक्तिक भावसँ देखथि। महामना ग्रिअरसन साहेबकें एहि गीत
सबमे जतए कतहु माधवक नाम नहिओ अछि तथापि केवल नायकहुसँ परमात्मा एवं राधा किंवा
नायिकासँ जीवात्मा प्रतिभासित होइन्ह। एही देखाउसिमे आब अन्यान्यो कतेक जन विद्यापतिक
श्रृङ्गारक गीतमे मधुर रसक परिपाक मानए लगलाह अछि। परन्तु श्रीमजुमदार साहेब एहि
गीत-सबहिमे भनिताक सज़् शेष पदक समन्वय कए ई देखाओल अछि जे शिवसिंह-नामबला


गीत सबमे जतहु माधव ओ राधाक नाम अछि ततहु कवि हुनका नायक ओ नायिकाक च्र्न्र्द्रड्ढ
क रूपमे, आदर्श जकाँ, देखैत छथि, भक्तिभावसँ नहि। गीत-संख्या 164मे नायिका विलाप करैत
छथि जे "सखि हे कतहु न देखिअ मधाई" ओ भनितामे विद्यापति हुनका आ•ाासन दैत छथिन्ह
जे "लखिमा-देविपति पुरहि मनोरथ आबहि शिवसिंह राजा"। गीतसंख्या 175 मे विरहिणी
नायिकाक मनोरथ जे जखन आओब हरि रहब चरन गहि चान्दे पुजब अरविन्दा। कुसुम सेज
भलि करब सुरत केलि दुहु मन होएत सानन्दा। इत्यादिक अन्तमे ओकरा आ•ाासन दैत कविक
उक्ति भनितामे द्रष्टव्य थिक जे



भनहि विद्यापति सुन वर जउवति अछ तोकें जिवन अधारे।

राजा शिवसिंह रूपनराएन एकादस - अवतारे।।

गीतसंख्या 177 मे

"माधव कठिन - ह्यदय परवासी

तुअ पेयसि मोयँ देखलि वियोगिनि" इत्यादि

सखी नायकसँ नायिकाक विरहावस्थाक करुण वर्णन कए अन्तमे कहैत अछि जे

"राजा शिवसिंह रूपनराएन करथु विरह उपचारे"।।

एहि गीत सबमे मधाइ, हरि वा माधवसँ परमात्मा तँ नहिए अभिप्रेत छथि, साधारण
नायकक द्यन्र्द्रड्ढ "प्रतिनिधि" सेहो नहि, प्रत्युत अभिप्रेत छथि स्पष्टतः राजा शिवसिंह जनिका हेतु
"एकादश अवतारा" विशेषतः विचारणीय थिक। अतएव श्रीमजुमदार साहेब एहि विषयक विचार
तँ कएल निष्पक्ष भावसँ, वैज्ञानिक रीतिसँ, परन्तु निष्कर्ष हुनक आंशिके सत्य प्रकट भेल, पूर्ण
सत्य धरि की तँ ओ नहि गेलाह अथवा वैष्णव सिद्धान्तक संस्कारक प्रभावसँ से कण्ठतः
स्वीकार नहि कएलैन्हि।



मिथिलाक संस्कृति ओ परम्परामे विद्यापतिक श्रृङ्गारक गीत कहिओ भक्ति-भावसँ नहि
देखल गेल। मधुर रसक कल्पनासँ मिथिलाकें कहिओ परिचय नहि। मिथिलामे विद्यापतिक
श्रृङ्गारक गीत विशुद्ध

श्रृङ्गाररसक गीत बुझल जाइत छल ओ एखनहु बुझल जाइत अछि। गीतमे राधा ओ कृष्णक
लीलाक वर्णन अछि तें एकर रसमे कोनो अन्तर नहि बुझल गेल वा मानल गेल। गाथा-सप्तशती
पर्यन्तमे (काव्यमाला 447) "कान्ह"क प्रयोग साधारण नायकक हेतु भेल-अछि ओ मिथिलहिमे
नहि बङ्गालहुमे जे लोकगीत प्रचलित अछि ताहिमे केओ रमणी अपन रसिक स्वामीकें कान्ह,
मधाई प्रभृति शब्दें उल्लेख करैत अछि। एहि परम्परागत संस्कारक पुष्टि हमरा विद्यापतिक
गीतसबसँ, विशेषतः हुनक गीतक भनितासँ होइत रहल अछि, ओ तें अपन सम्पादित पुरुष-
परीक्षाक भूमिकामे हम एहि कथाक प्रतिपादन कएने छी जे विद्यापतिक कुष्ण ओ राधाकें
परमात्मा ओ जीवात्मा तँ नहिए बुझबाक थिक; प्रत्युत हमरा तँ इएह प्रतीत होइत अछि जे
विद्यापति कृष्ण ओ राधाक रूप ओ लीलाक व्याजें शिवसिंह ओ लखिमाक रूप ओ लीलाक
वर्णन कएने छथि, विद्यापतिक कान्ह थिकथिन्ह शिवसिंह ओ राधा थिकथिन्ह लखिमा। हम
बुझैत छी जे एहि प्रसज़् हमर जे दृष्टि अछि से ओएह जे श्रीमजुमदार साहेबक छैन्हि; भेद एतबे
जे हम निस्संकोच पूर्ण सत्यक प्रतिपादन कएल अछि परन्तु श्रीमजुमदार साहेब जेना सशङ्क


रहथि, गेलाह अछि तँ सत्यक दिशामे अवश्य परन्तु पूर्ण सत्य प्रकाश नहि कएल।



परन्तु हमर सम्पादित पुरुषपरीक्षाक भूमिकाक समालोचनामे श्रद्धेय श्रीमजुमदार साहेब
हमर एही कथाक सज़् अपन वैमत्य प्रकट कएल अछि। श्रीमजुमदार साहेब बड़ पैघ विद्वान
छथि, इतिहास विचक्षण छथि ओ विद्यापतिक प्रसज़् हुनक पाण्डित्य देशमे ककरहुसँ न्यून नहि
कहल जाए सकैत अछि, अतएव हमरा अत्यन्त आश्चर्य अछि जे हुनक सदृश निष्पक्ष विचारक
हमर ओहि उक्तिक सज़् अपन वैमत्य प्रकट कएलैन्हि अछि जाहि हेतु हमरा प्रचुर प्रमाण अछि
ततवे नहि, किन्तु जाहि प्रसज़् हमरा सबसँ बेशी बल स्वयं श्रीमजुमदार साहेबक विचारसँ भेटल
छल। तें हम एहि विषयक पुनर्विचारमे प्रवृत्त भेल छी ओ एहिमे हमर विचारसरणि ओएह रहत
जे श्रीमजुमदार साहेबक रहलैन्हि अछि तथा आधार रहत श्रीमजुमदार साहेबहिक संगृहीत ओ
सम्पादित विद्यापतिक गीतावली।



एहि संग्रहमे विद्यापतिक रचित कहि गोट हजारेक गीत अछि जाहिमे प्रायः आधा
भनिता-रहित अछि। नेपालक पोथीक लेखक महोदय तँ भनिताक महत्त्व बुझबे नहि कएलथिन्ह
ओ अन्तमे भनइ विद्यापतीत्यादि लिखि भनिताक अध्ययनक मार्गे अवरुद्ध कए देल। हमरा ई
वि•ाास नहि होइत अछि जे विद्यापतिक कोनो गीत भनिता-विहीन छल, ई केवल लेखकक
अनभिज्ञता ओ अपाटव सूचित करैत अछि जे गीतमे भनिताक पदकें निष्प्रयोजन बूजि ओकरा
छोड़ि देल गेल। तथापि एहि गोट हजारेक गीतमे दू सएसँ किछुए अधिक गीत अछि जाहिमे
भनितामे शिवसिंहक नाम अछि। एहिमे एक सए सत्ताइस गोट गीतमे शिवसिहंक सज़्-सज़्
लखिमाक नाम सेहो अछि तथा सात गोट गीतमे शिवसिंहक सज़्-सज़् हुनक पाँचो अन्यान्य स्त्री,
मधुमति (18) सुषमा सोरम (95) रूपिनि (166) ओ मोदवती (169)क नाम अछि जाहिमे
सुषमाक नामक गीत तीनि गोट (51, 102, 205) अछि ओ चारिम (148) मे सुषमाक सज़्
लखिमाक नाम सेहो अछि। एकर प्रामाणिकता एहीसँ सिद्ध अछि जे पञ्चीमे सेहो शिवसिंहक
छओ गोट विवाह उल्लिखित अछि ओ एहि छबो महादेवीक परिचय उपलब्ध अछि।



ई हमर कहबाक तात्पर्य ने पहिने छल ने एखनहु अछि जे विद्यापतिक सब गीतक
भनिता साभिप्राये अछि अथवा शिवसिंह नामबला सब गीतमे हुनकामे कृष्णत्वक आरोप अछि।
तकर तँ प्रयोजनो नहि अछि। एकहु दु ठाम विद्यापति यदि स्पष्ट शब्दें शिवसिंहकें कृष्ण कहल
अछि अथवा मानल अछि तँ ई कथा सिद्ध भए गेल। ओ से विद्यापति एक दू ठाम नहि अनेक
ठाम, अनेक प्रकारें, अनेक भङ्गिमासँ कहल अछि। केवल कान्ह वा माधव, कन्हाइ वा मधाइ
प्रभृति शब्दक प्रयोगहिसँ हम एकर आरोप नहि मानि लेब, कारण, जे कथा हम पूर्वहुँ कहल
अछि केओ नायिका अपन ह्यदयज़्म स्वामीकें अपन "कान्ह" कहैत अछि, सब रमणीकें अपन

रसिक प्राणे•ार कृष्णाहिक अवतार होइत छथिन्ह। हमरा तँ स्पष्ट शब्दें शिवसिंहमे कृष्णाक
आरोप चाही ओ तकर दृष्टान्त हम एहिठाम श्रीमजुमदार साहेबक संस्करणसँ उपस्थित करैत
छी।



सबसँ पूर्व शिवसिंहक रूप-सौन्दर्यक वर्णन देखल जाए। शिवसिंह

पुहबी नव पचवाने (39)


तीनि भुवन महि अइसन दोसर नहि (50)

रूपे अभिमत कुसुमसायक (92)

पुहविहि अवतरु नव पँचवाने (127)

परतख पँचवाने (139)

जनि ऊगल नवचन्द (113)

मेदिनि मदन समाने (151) इत्यादि शब्दें वर्णित छथि। हुनक रसिकताक वर्णन अछि :-

रतन सनि लखिमा कन्त। सकल कलारस जे गुनमन्त (48)

सकल कला अवलम्ब (104)

रायनि मह रसमन्ता (109)

राय रसिक (122)

केलि कलपतरु सुपुरुष अवतरु नागर कुरुवर रतने (185)

रस आधार (93)

रसवन्ता गुणानिवास (127) इत्यादि।

"सिंह सम शिवसिंह भूपति" (9) सँ हुनक शौर्यक वर्णन कए हुनक वदान्यताक कीर्तन
कएल गेल अछि यथा

महोदार (20)

सकल जन सुजन गति (111)

सकल अभिमत सिद्धिदायक (93) इत्यादि।

ताहि सज़् हिनक पिताक नामक कीत्र्तन--

देवसिंहनरेन्द्रनन्दन (8)

गरुड़नराएननन्दन (52),



हिनक छबो पत्नीक उल्लेख, तिथिक उल्लेखक सज़् हिनक पिताक मृत्यु ओ हिनक
सिंहासनाधिरोहणक वर्णन (8), हिनक विजयक वर्णन (9) इत्यादि सब कथाकें मिलाए
शिवसिंहक व्यक्तित्वक एक गोट सुन्दर चित्र अङ्कित भए जाइत अछि। ताहि सज़् हिनक
शरीरक श्याम वर्ण अनेक ठाम अनेक रूपें कहल अछि, यथा,

राजा शिवसिंह रूपनराएन साम सुन्दर काय (34)

सपन देखल हम शिवसिंह भूप

बतिस वरस पर सामर रूप (920)

जकरा पुरुषपरीक्षमे "चारुपाथोदनील", सजलजलदवर्णसुन्दर, कहल गेल अछि।



एहिसँ स्पष्ट अछि जे शिवसिंह श्यामवर्णक सुन्दर कान्तिक नवयुवक छलाह जनिक रूप
मनोमोहक छल अतएव जखन हुनका रसिकशिरोमणि कहबाक भेलैन्हि तखन विद्यापति एहि
वर्णसाम्यसँ बलित कहबाक भए हुनका श्रृज़्र-रसक अधिष्ठातृ देवता वृन्दावन-विहारी कृष्णहिक
अवतार कहि देल। शिवसिंहकें ओ कहल अछि

परतख देव (180)

कान्हरूप सिरि शिवसिंह (77)

अभिनव कान्ह (101)


अभिनव नागर रूपे मुरारि (90);



जनिका केवल ओएह टा नहि समस्त संसार हरिक सदृश बुझए "हरि सरीसे जगत
जानिअ" (41) ओ तें विद्यापति वारंवार हुनका "एकादस अवतारा" (89, 175, 197) कहि कहि
अपन भक्ति प्रदर्शित करैत छथि तथा हुनक रसिकता, श्रृङ्गार प्रवणता, कामकला-कुशलता
व्यञ्जित करैत छथि। ई सब ततेक स्पष्ट अछि, व्यक्त अछि जे एहि प्रसज़् आओर किछु कहब
व्यर्थ।



तथापि एक गोट गीत आओर विचारणीय थिक। गीत संख्या 35 मे केओ रमणी अपन
स्वप्नक समाचार अपना सखीसँ कहैत अछि।



हरि हरि अनतए जनु परचार।

सपन मोए देखल नन्दकुमार।।



परञ्च भनितामे विद्यपति ओहि नागरीकें बुझबैत कहैत छथिन्ह जे

.................अरे वर जउवति जानल सकल भरमे।

शिवसिंह राय तोरा मन जागल कान्ह-कान्ह करसि भरमे।।

आओर ई वरयुवती स्वप्नमे जे स्वरूप देखल (जकरा ओ नन्दकुमार बुझलक) तकर
वर्णन अछि--

नील कलेवर पीत वसन धर चन्दनतिलक धवला।

सामर मेघ सौदामिनि मण्डित तथिहि उदित शशिकला।।

ओहि स्वरूपकें वरयुवती नन्दकुमार मानल से ओकर भ्रम छल। श्यामवर्ण, पीताम्बर,
•ोतचन्दनतिलक-त्रिपुण्डलसित भाल ओ स्वरूप राजा शिवसिंहक छल। केहन मार्मिक रूपसँ
भ्रान्ति प्रदर्शित अछि, केहन चमत्कारक व्यङ्ग्य स्फुट होइत अछि से सह्यदयसंवेद्य अछि,
कहबाक प्रयोजन नहि।



एकर पुष्टि पुरुष-परीक्षासँ सेहो होइत अछि। ओहिमे शिवसिंह वीर लोकनिमे मान्य,
सुधी लोकनिमे वरेण्य, विद्वान् लोकनिमे अग्रविलेखनीय कहि वर्णित छथि जाहिसँ "वीरः सुधीः
सविद्यश्च" ई जे पुरुषक लक्षण एहि ग्रन्थमे प्रतिपादित अछि ताहि तीनूक प्राशस्त्य हिनकामे
कहल अछि तथा हिनक शौर्यक प्रसज़् कहल अछि जे गौड़े•ारक सज़् युद्धमे ओ से यश अर्जित
कएल जे चारू दिशि कुन्दकुसुम सदृश शुभ्र आलोकित छल। परन्तु सबसँ महत्त्वपूर्ण अछि
ओहि ग्रन्थक तृतीय परिच्छेदक अन्तमे उपलब्ध ओ श्लोक जकरा ग्रन्थसँ कोनो सम्बन्ध नहि,
छैक, केवल शिवसिंहक गुणकीर्तन थिक :-



लक्ष्मीपती सर्वलोकाभिरामौ चन्द्रननौ चारुपाथोदनीलौ।

द्वौ पुरुषौ लक्षणौस्तैरुपेतौ नारायणो रूपनारायणो वा।।



एकर प्रथम दुहु चारणमे चारि गोट पद अछि जे चारि गोट लक्षण थिक ओ श्लोकक


उत्तरार्धमे कहल अछि जे एहि चारू लक्षणसँ युक्त दुइए गोट पुरुष छथि, एक तँ पुरुषोत्तम
नारायण ओ दोसर शिवसिंह रूपनारायण। चारू गोट लक्षण श्लेषसँ युक्त अछि जे दुहूमे
चरितार्थ होइत अछि। यथा नारायण छथि लक्ष्मीक पति ओ शिवसिंह 'लखिमादेइरमाने" वारंवार
वर्णित छथि। दुहू सब लोकमे अथवा सब लोकक हेतु सुन्दर छथि

जे कथा गीतमे "परतख देव" वा "परतख नव पँचवाने" वा "तीनि भुवन महि अइसन दोसर
नहि" शब्दें कहल अछि। चन्द्रमाक सदृश लोकलोचनाह्लादकर दुहूक मुख अछि जे कथा गीतमे
"जनि ऊगल नव चन्द" शब्दें कहल अछि अथवा जे कथा दोसर गीतमे ऊपर प्रदर्शित अछि,
शुभ्रत्रिपुण्डक उपमा चन्द्रमासँ, नवचन्द्रसँ देल गेल अछि। तथा घनश्याम तँ नारायणक नामे
अन्वर्थ थिकैन्हि ओ शिवसिंहक "सामर रूप" "साम सुन्दर काय" एहिसँ अभिव्यक्त अछि।
अतएव पुरुष-परीक्षाक एहि श्लोकसँ ओही कथाक पुष्टि होइत अछि जे भनितामे "हरि सरीसे
जगत जानिअ" "अभिनव नागर रूपें मुरारि" "अभिनव कान्ह" अथवा "एकादश अवतारा" इत्यादि
शब्दें कहल अछि। शिवसिंहक रसिकताक प्रसज़्, तहिना, पुरुष-परीक्षाक विदग्धकथामे
विक्रमादित्यक वैदग्ध्यक कथा कहि अन्तमे विद्यापति कहैत छथि जे "साम्प्रतमपि"--एखनहु,
कलावती कविता अथवा कलावती कामिनीक वेत्ता राजा शिवसिंह छथि--"तां वेत्ति राजा
शिवसिंहदेवः"।



एहि कथाक पुष्टि कीर्त्तिपताकासँ सेहो होइत तथा ओहिसँ सम्भवतः ई कथा निर्विवाद
सिद्ध भए जाइत, परन्तु कीर्त्तिपताका जाहि रूपमे उपलब्ध अछि ताहिसँ कोनो प्रयोजन सिद्ध
नहि भए सकैत अछि। हमरा जे कीर्त्तिपताका उपलब्ध अछि तकर श्रृंज़्र भागमे एक गोट श्लोक
जे हमरा सम्पूर्ण पढ़ल भेल अछि तकर आशय अछि जे रामावतारमे भगवानकें सीता-विश्लोषक
कष्ट भोगए पड़लैन्हि तें कृष्णावतारमे भगवान श्रृङ्गारक मूर्त्ति भए अवतीर्ण भेलाह। से जेहने
द्वापरमे भगवान् कृष्ण, तेहने सम्प्रति अहाँ छी। सत्ये



संसारे भोगसारे स्फुटमवनिभुजां श्रीफलं वा किमन्यत्।



एहि श्लोकक "साम्प्रतं तादृशस्त्वम्" मे "त्वं" सँ ककर अभिप्राय से तँ बुझल नहि होइत
अछि--जे पाठ उपलब्ध अछि ताहिसँ शिवसिंहक धरि नहि--परन्तु एतबा तँ स्पष्टे अछि जे
रसिक राजाकें कृष्णाक अवतार कहब विद्यापतिक हेतु कोनो अभिनव कथा नहि भेल। तें
अन्यथा उपलब्ध-प्रमाणक बल पर कहि सकैत छी जे स्वरूपतः, स्वभावतः, चरित्रतः, शिवसिंहकें
कृष्णक अवतार मानि लेब कनेको अत्युक्ति नहि भेल।



एहि प्रसज़् ई शङ्का नहि कत्र्तव्य थिक जे नररूप शिवसिंहकें नारायणक सदृश कहब,
हुनका भगवानक एगारहम अवतार मानि स्तुति करब अनुचित थिक, मिथ्या-स्तुति थिक, धार्मिक
किंवा नैतिक दृष्टिसँ धृष्टता थिक। शिवसिंह साधारण मनुष्य तँ छलाह नहि, ओ राजा छलाह
ओ मनु कहैत छथि जे "महती देवता होषा नररूपेण तिष्ठति"। स्वयं भगवान् गीतामे कहने छथि
जे :




यद्यत् विभूतिमत् सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।

तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंशसम्भवम्।।



राजा शिवसिंह निश्चय विभूतिमान् छलाह, श्रीमान् छलाह, ऊर्जिततम छलाह। हुनका
"प्रत्यक्ष देव" कहब आर्यजातिक राजत्व-भावनाक अनुकूल बुझबाक चाही, प्रतिकूल तँ कहिओ
नहि, विरुद्ध तँ ओ नहिए भेल। ओ तखन एहि "केलि-कल्पतरु" "रायनि मह रसमन्ता" "सकल
कला अवलम्ब" "पुहुबी नव पँचवाने" शिवसिंहकें यदि कोनहु देवताक अवतार कहबाक भेल,
हुनक चरितक समता कोनहु देवताक लीलासँ देखएबाक भेल तँ कृष्णासँ विशेष सज़्त दोसर
कोन देवता भए सकैत छलाह।



अतएव श्रीमजुमदार साहेब हमर एहि कथासँ सहमत नहि होथु परन्तु हम तँ जतेक एहि
विषयक विचार करैत छी ततेक हमर वि•ाास दृढ़ भेल जाइत अछि जे विद्यापति केवल अपन
गीतहिटामे नहि, अन्यत्रहु शिवसिंहकें कृष्णाक अवतार मानैत छलाह। शौर्यमे, वीर्यमे, चातुर्यमे,
सौन्दर्यमे, वर्णमे, रसिकतामे,

कामिनीमनोमोहकतामे, कामकेलिप्रवणतामे, श्रृङ्गारिकतामे, अनेकधा, विद्यापति दुहूक समता
प्रदर्शित कएने छथि। ई सत्य जे सब गीतमे, सब गीतक भनितामे, ई नहि भेटत; शिवसिंह-
नामबला गीतहुमे सब ठाम एकर

उल्लेख नहि अछि। परन्तु तकर प्रयोजनो नहि छैक। एकहु ठाम यदि एहि कथाक स्पष्ट
उल्लेख अछि तँ कविक भाव व्यक्त भए गेल ओ तखन अन्यत्र तँ व्यङ्ग्यरूपें ओकर उपलब्धि
सुगम भए जाएत। तें हम कहने छी ओ पुनः कहैत छी जे विद्यापतिक श्रृङ्गारक गीतमे जतए
शिवसिंहक नाम छैन्हि ततए यदि माधवक उल्लेख अछिओ तँ माधवसँ हमरा शिवसिंहक प्रतीति
होइत अछि। तथा ई सर्वथा काल्पनिक नहि अछि किन्तु स्वयं विद्यापतिक अनेको गीतक
भनितामे, कए गोट गीतहुमे, ई कथा स्फुट अछि। विद्यापतिक शिवसिंह वस्तुतः रूपनारायण
छलाह तथा विद्यापति हुनका नर-रूपमे नहि, नारायणक रूपमे प्रत्यक्ष-देव मानैत छलाह,
प्रत्यक्ष-देव आनन्दकन्द कृष्णक एकादश अवतार कहि हुनका अमर कए गेल छथि।





4

गोविन्ददास झा



मैथिली-साहित्यक इतिहासमे जे कतोक समस्या अछि जकर समुचित समाधान केवल
मैथिली-साहित्यहिक टा गौरव-ख्यापनक हेतु नहि अपितु इतिहासक सत्यक सबहुँ जिज्ञासु
व्यक्तिक सन्तोषार्थ आवश्यक अछि, ओहिमे सबसँ जटिल अछि गोविन्ददासझाक व्यक्तित्वक
प्रश्न। हमरालोकनि मानैत अएलहुँ अछि, एखनहु बुझैत छी, जे गोविन्ददासझा रैआम ग्रामक
वासी छलाह तथा कात्यायनगोत्रक कुजौली-मूलक भखरौली-शाखाक श्रोत्रिय ब्रााहृण छलाह।
हुनक प्रपितामह महामहोपाध्याय शुचिकर उपाध्याय मिथिलाराज्योपार्जक महामहोपाध्याय
महेशठाकुरक विद्यागुरु ओ सम्बन्धें मौसा छलथिन्ह। गोविन्ददासझा स्वयं महामहोपाध्याय छलाह
ओ अपन छोट भाए रामदासझाक विद्या-गुरु छलाह जे सरस रामक उपनामसँ मिथिलेश


महाराज सुन्दरठाकुरक प्रीत्यर्थ आनन्दविजय नामक मैथिली-गीत-मिश्रित संस्कृत-नाटकक
रचना कएने छथि, महामहोपाध्याय छलाह। सरस रामक शब्दमे गोविन्ददासझाक गर्जनसँ सभ
बादी चुप भए जाथि जाहिसँ सूचित होइत अछि जे ई बड़का शास्त्रार्थी नैयायिक छलाह।
कवी•ार चन्दाझा हिनक काव्यकृतिक नाम "कृष्णलीला" कहैत छथि। हिनका दू गोट विवाह
छल ओ यद्यपि हिनका पुमपत्य नहि छलैन्हि मुदा हिनक एक गोट कन्याक विवाह महाराज
महेशठाकुरक प्रपौत्र, महाराज शुभङ्करठाकुरक पौत्र, रामठाकुरक बालक, रघुनाथ ठाकुरसँ
छल। हिनक समय अनुमानतः 1570 सँ 1640 ईशवीय धरि मानैत छी। गोविन्ददासझाक सबसँ
जेठ भाए, गङ्कादासझा कवि छलाह तथा हुनक दु गोट काव्य, गड़गाभक्ति ओ गड़गाविलासक
उल्लेक कवी•ार चन्दाझा कएने छथि मुदा ने ओ दूहू काव्य ने आने कोनो हुनक रचना उपलब्ध
अछि। गोविन्ददासझाक अव्यवहित छोट भाए हरिदासझा सेहो कवि छलाह तथा हुनक एक
गोट गीत रागतरङ्गिणीमे भेटैत अछि।



परन्तु ई जे परिचय देल अछि से की ओही गोविन्ददासझाक थिक जे बङ्गालक वैष्णव
महाकविमे अग्रगण्य छथि ओ जनिक गीतक एक गोट संग्रह एमहर गोविन्दगीतावलीक नामसँ
श्रीमथुराप्रसादजी दीक्षित प्रकाशित कराओल अछि ओ दोसर संग्रह श्रृङ्गारभजनगीतावलीक
नामसँ स्वर्गीय अमरनाथ बाबू सम्पादित कए हमर साहित्यपत्रमे छपाओल। दीक्षितजी अपन
संग्रहक आधार अथवा मूलक प्रसज़् किछु नहि कहल अछि; अमरनाथ बाबू अपन संग्रह कबी•ार
चन्दाझाक हाथक लिखल संग्रहसँ अपना हाथें उतारिकें प्रकाशित कराओल अछि। कवी•ारक
संग्रहक आधार की से ओ कतहु सूचित नहि कएने छथि परञ्च कवी•ारक परिचय जनिका
ककरहु छैन्हि सबहुँ एकस्वरसँ स्वीकार करताह जे ओ तँ मिथिलाभूमिकें छाड़ि अन्यत्रसँ संग्रह
नहि कएने होएताह, सबटा गीत हुनका मिथिलाहिमे भेटल होएतैन्हि। अपनरामायणक अन्तमे
कवी•ार जे मैथिल कविक सूची देने छथि ताहिमे गोविन्ददासझाक काव्यकृतिक नाम कृष्णलीला
लिखल अछि। ओ कृष्णलीला इएह

गीतावली थिक अथवा एहिसँ भिन्न ओहि नामक दोसरो ग्रन्थ हुनका उपलब्ध भेल छलैन्हि अथवा
जानल छलैन्हि तकर कोनो उल्लेख कतहु नहि भेटल अछि। एहि गीतावलीक विषय-वस्तुकें
देखि सम्भव इएह बूझि पड़ैत अछि जे एही गीतावलीकें ओ कृष्णलीला कहने छथि। मुदा
कवी•ारकें ई गीतावली भलहि मिथिलहिमे भेटल होइन्ह किन्तु एमहर मिथिलादेशमे कवी•ारक
संग्रहसँ अन्यत्र गोविन्ददासक गीत कतहु नहि भेटैत अछि। कए सए कविक गीत मिथिलामे
प्रचलित अछि परन्तु गोविन्ददासक एहि गीत सबमे एको गोट गीत कतहु नहि भेटल अछि।
मिथिलाक गायक-समाजमे, विशेषतः स्त्रीगण मध्य, हजारो गीत प्रचलित अछि परन्तु
गोविन्ददासक गीतक, प्रचार जेना मिथिलामे कतहु नहि हो। ओमहर, बङ्गालक वैष्णव-समाजमे
गोविन्ददासक पद बड़ प्रसिद्ध अछि ओ विद्यापति एवं चण्डीदासक पश्चात् ओतए
गोविन्ददासहिक यश प्रसृत अछि। बङ्गालक कीत्र्तनमण्डली सबमे हिनक पद अत्यन्त प्रसिद्ध
अछि, बड़ लोकप्रिय अछि, तथा कीत्र्तनक गायक लोकनि जे हिनक पद गबैत छथि से अत्यन्त
मधुर, अत्यन्त ललित, अत्यन्त सरस होइत अछि। मिथिलामे प्राचीन गीतक संग्रह तँ प्रकाशित
बड़ थोड़ अछि परन्तु प्रायः प्रत्येक नीक परिवारमे एक गोट गीतक पोथी रहैत आएल अछि
जाहिमे पुरान पुरान गीत सब स्त्रीगणकें सिखबाक हेतु लिखल रहैत अछि। हम स्वयं कए गोट
एहन एहन पुरान गीतक पोथी देखल अछि परन्तु गोविन्ददासक एको गोट गीत हमरा कतहु


उपलब्ध नहि भेल अछि। सत्रहम शताब्दीमे लोचन अपन रागतरङ्गिणीमे बहुतो कविक गीत
राग सबहिक उदाहरणमे उद्घृत कएने छथि परन्तु गोविन्ददासक गीत ओहूमे नहि अछि।
गोविन्दक गीत भेटैत अछि परन्तु ई नाम तँ बड़ प्रसिद्ध अछि। नलचरित-कर्ता गोविन्द ठाकुर,
काव्यप्रदीपकर्ता गोविन्दठाकुर, सोदरपुरिए गोविन्दमिश्र प्रभृति एहि नामक अनेको कवि भए गेल
छथि ओ गोविन्द-भनिताबला गीत सब ओहिमे ककरो भए सकैत अछि। जेना रामदासझा गीतमे
अपन उपमान राम लिखैत छथि तथा ओहिमे विशेषण जोड़ि दैत छथिन्ह सरस, तेना
गोविन्ददास अपनाकें गोविन्द लिखैत छलाह तकर कोनो प्रमाण नहि अछि प्रत्युत एहि
गीतावलीमे सर्वत्र दास-युक्ते गोविन्दक उल्लेख अछि। ओमहर बङ्गालमे एहि तीनि सए वर्षमे
कोनो प्राचीन गीतक संग्रह नहि भेल अछि जाहिमे गोविन्ददासक पद प्रचुरतया नहि भेटए।
फलतः बङ्गाली-लोकनि गोविन्ददासकें बङ्गाली मानैत छथि, हुनका वैष्णव महाजन बुझैत
छथि, हुनक भाषाकें ब्राजबूली कहैत छथि, हुनका मैथिल नहि स्वीकार करैत छथि।



परन्तु भाषा एहि गीतावलीक थिक विशुद्ध मैथिली। ई कथा आब निर्विवाद सिद्ध भए
गेल अछि जे चैतन्य-सम्प्रदायक वैष्णवलोकनिक साहित्यिक भाषा जे ब्राजबूलीक नामसँ परिचित
अछि से केवल मैथिलीक अनुकरणमे एक गोट कृत्रिम भाषा थिक। विद्यापतिक गीतक तेहन
प्रभाव चैतन्यदेव ओ हुनक शिष्यलोकनि पर भेल जे ओ लोकनि विद्यापतिक अनुकरणेमे गीतक
रचना करए लगलाह जाहिमे विद्यापतिक भाव, रीति, शैली ओ छन्द आदिहिकटा अनुकरण नहि
कएल गेल। से तँ वि•ाक साहित्यमे ओनेको ठाम देखल गेल अछि, प्रसिद्ध वस्तु थिक। ओ
लोकनि तँ विद्यापतिक भाषा समेतक अनुकरण कएल, तेहन मधुर, ललित, सरस विद्यापतिक
पद छल। ओ एना भाषान्तरक अनुकरण असाधारण वस्तु भेल जकर दृष्टान्त वि•ाक साहित्यमे
तकलहु उत्तर प्रायः नहि भेटत। ई अनुकरण केहन व्यापक भेल तकर दृष्टान्त इएह पर्याप्त
होएत जे वि•ाकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर पर्यन्त अपन पहिल कवि-कर्म विद्यापतिहिक गीतसँ
अनुप्रमाणित भए, हुनकहि शैली पर, हुनकहि भाषाक अनुकरणमे कएल। परन्तु अनुकरण
अनुकरणे थिक। अन्य-भाषा-भाषी कतहु भाषान्तरकें विनु सिखलें शुद्ध जकाँ प्रयोग कए सकए?
फल भेल जे भाषान्तरभाषी कविलोकनि जखन विद्यापतिक अनुकरणमे मैथिलीमे रचना करए
लगलाह तखन हुनक अपन जे भाषा छलैन्हि से विद्यापतिक भाषा मैथिलीक सज़् मिझराए
गेलैन्हि ओ हुनक गीतक भाषा एक गोट अपूर्व भाषा भए गेल जकरा ने शुद्ध मैथिली कहि
सकैत छी ने भाषान्तर, दुहूक सम्मिश्रणसँ एक गोट कृत्रिम भाषा भए गेल। चैतन्यदेवक वैष्णव
धर्म क्रमशः समस्त उत्तर भारतमे पसरैत गेल। आसामक वैष्णव कवि तँ केवल गीतहिटामे नहि,
नाटकहुमे मैथिलीक अनुकरण कएल ओ ताहि सबमे मैथिलीक सज़् सज़् असमिआ भाषा भिझराए
गेल। तहिना उड़ीसाक कविलोकनि जे गीत रचलैन्हि

ताहिमे ओड़िआ भाषा मिश्रित भए गेल। ओ बङ्गाली वैष्णव कविलोकनिक गीतक भाषा
बज़्लामिश्रित मैथिली भए गेल। एहि सब गीतमे एक अंश, ओ से अंश प्रचुर अछि, मैथिली
रहल, विशुद्ध मैथिली नहि परन्तु मैथिलीक अनुकरण मात्र जकरा हमरालोकनि अशुद्ध मैथिली
कहब; ओ एक अंश रहल तत्तद्भाषाक। क्रमशः लोक इ बिसरि गेल जे ई भाषा मैथिलीक
अनुकरण मात्र थिक। परन्तु भाषा तँ ओ छल तत्तद्देशक भाषासँ भिन्न, अभिनव, ओ जें एहि
सब गीतमे व्रजभूमिमे कृष्णक लीलाक वर्णन अछि तें ई मिश्रित भाषा व्रजबूलीक नामसँ अभिहित
होअए लागल। विद्यापतिक भाषाक अनुकरणसँ एहि कृत्रिम भाषाक सृष्टि भेल ई कथा विस्मृत


भए गेल। परन्तु कतबओ अनुकरण कएल गेल तथापि भाषा एनमेन विद्यापतिक भाषाक सदृश
तँ भेल नहि। इएह कृत्रिम भाषा, अशुद्ध मिथिला-भाषा, भाषान्तरक सज़् मिश्रित मिथिला-भाषा,
बङ्गालक वैष्णव सम्प्रदायक साहित्यिक भाषा भए गेल। परन्तु गोविन्ददासक भाषामे
कृत्रिमताक कनेको भान नहि होइत अछि। एकरा विद्यापतिक भाषाक अनुकरण नहि,
विद्यापतिक भाषा मैथिली सएह मानए पड़त ओ जे उचित थिक विद्यापतिक भाषामे जे कतोक
प्राचीनताक लक्षण सब अछि से सब गोविन्ददासक भाषामे नहि अछि। स्वयं बङ्गाली विद्वान
लोकनि गोविन्ददासक प्रसज़् स्वीकार करैत छथि जे हिनक भाषा एनमेन विद्यापतिक भाषाक
अत्यन्त सदृश अछि। परन्तु स्मरण रहए जे अनुकरण कोनहुना कएल जाएत तँ ओ अनुकरणे
रहत, ओहिमे कृत्रिमता अवश्ये आबि जाएत। शतावधि वा ताहूसँ अधिक वैष्णवलोकनि व्रजबूलीमे
कविता कएने छथि परन्तु ई चमत्कार ओहि व्रजबूलीक कविगण मध्य केवल गोविन्ददासक
भाषामे भेटत जे एहिमे बङ्गालक प्रभाव प्रायः नहि सन अछि। ओना तँ बङ्गीय-साहित्य-
परिषद्सँ प्रकाशित वैष्णव महाजन-पदावलीक गोविन्दगीतावलीमे किछु एहन पाठभेद भेटैत अछि
जाहिमे बज़्लाक प्रभाव परिलक्षित होइत अछि जेना दीक्षितजीक गोविन्द-गीतावलीमे, हिन्दीक।
परन्तु श्रृङ्गारभजनमे, कवी•ारक संगृहीत पदावलीमे, तकर कोनो प्रभाव नहि अछि। भाषा
हिनक विशुद्ध मैथिली थिक, मैथिलीक अनुकरण एकरा कथमपि नहि कहि सकैत छी।



मुदा गोविन्ददासक गीतक भाव-धारा मैथिल परम्पराक अनुसरण नहि करैत अछि।
विद्यापतिसँ लएकें हर्षनाथ धरि मैथिली-गीतक जे परम्परा अछि ताहिमे जे गीत भक्तिक थिक से
छोड़ि शेष सब गीत श्रृङ्गारक थिक। विद्यापतिक गीतमे अधिकमे तँ राधाकृष्णक नामो नहि
अछि तथा जाहिमे नाम अछिओ ताहिमे कृष्ण श्रृङ्गाररसक अधिष्ठातृ देवता-स्वरूप छथि,
परमात्माक रूपमे नहि छथि ओ तें ओहि गीत सबकें भक्तिक उद्रेक नहि, श्रृङ्गारक अभिव्यक्ति
कहैत अएलहुँ अछि, बुझैत अएलहुँ अछि। विद्यापतिक रचित भक्तिहुक गीत अछि यथा नचारी,
गङ्गाक, गोसाञुनिक; हुनक रचित शान्त-रसक गीत सब अछि, हुनक रचित विष्णुपद सेहो
अछि ! परन्तु एहि गीतसबहिक शैली ओहि जातिक गीतक शैलीसँ सर्वथा भिन्न अचि जाहिमे
राधाकृष्णक केलिलीलाक वर्णन अछि जकरा चैतन्यमहाप्रभु ओ हुनक शिष्य लोकनि मधुररसक
काव्य मानैत आएल छथि परन्तु जकरा हमरा लोकनि विशुद्ध श्रृङ्गाररसक गीत मानैत आएल
छी। मिथिलामे विद्यापतिक अनुकरण एहि शताब्दीक प्रारम्भ धरि होइत आएल ओ एहि
सम्प्रदायक अन्तिम महाकवि छलाह हर्षनाथझा। एहि सम्प्रदायमे सएसँ कम कवि नहि होएताह
ओ हुनका लोकनिक रचल हजारो गीत उपलब्ध अछि परन्तु ओहि गीतसँ कहिओ ककरहु
भक्तिक भावना नहि भेलैक अछि। कविलोकनि ओकरा श्रृङ्गाररसक बूझिकें रचल; लोक
ओकरा। श्रृङ्गाररसक गीत बुझलक ओ बुझैत अछि। परन्तु गोविन्ददासक गीत एहि सबसँ भिन्न
अछि। गोविन्ददासक गीत सर्वथा भक्तिमूलक प्रतीत होइत अछि ओ श्रृङ्गार एहिमे केवल
आवरणक काज करैत अछि। एक तँ विनु आत्मसमर्पणक भावना ऐहिक नहि पारमार्थिक प्रतीत
होइत अछि। हुनक कृष्णा "कुलवति युवति बरत भय भञ्जत" थिकथिन्ह। बहुतो गीत तँ शुद्ध
भजन थिक। विद्यापतिक नखशिख-वर्णन ओ गोविन्ददासक स्वरूप-वर्णनक परस्पर तुलना
कएला उत्तर दुहूक भावक भेद स्पष्ट भए जाइत अछि। गोविन्ददास विशुद्ध ओहि मधुर-रसक
कविता रचल जकर प्रचार चैतन्यदेवक सम्प्रदायमे विद्यापतिक अनुकरणमे भेल। तँहि तँ
साहित्यसम्राट् अमरनाथ बाबू गोविन्ददासझाक गीतावलीक नामकरण श्रृङ्गार भजन कएल।




एहि प्रसज़् विद्यापति ओ गोविन्ददासक गीतसबहिक भनिता सेहो भेद जनबैत अछि।
गीतमे भनिता संस्कृतमे तँ जयदेव चलओलैन्हि परन्तु भाषा-कवि लोकनि बहुत दिन पूर्वहिसँ
एकर प्रयोग करैत आएल छथि ओ सहजपन्थी सिद्धलोकनिक चर्यापदहुमे भनिताक पद भेटैत
अछि। एमहर आबिकें तँ भनिताक प्रयोग एकटा व्यवहार भए गेल अछि तथा एकर प्रयोग
कविक अपन नाम, उपाधि ओ ठाम ठाम कविक आश्रयक नामोल्लेख मात्रमे पर्यवसित होइत
गेल अछि; परन्तु विद्यापतिक गीतमे भनिता बहुधा सार्थक रहैत अछि ओ गोविन्ददासक गीतमे
तँ प्रायः सर्वत्र भनिता सार्थक अछि। भनितामे कवि बहुधा अपन उक्ति व्यक्त करैत छथि। गीत
ककरो उक्ति हो--नायकक, नायिकाक अथवा सखीक--परन्तु भनिताक पद गीतक भावक प्रति
कविक अपन ह्यदयक उद्गार-स्वरूप रहैत अछि। विद्यापति भनितामे बराबरि ई जनबैत रहैत
छथि जे हुनक गीत श्रृङ्गार-रसक काव्य थिक, "रस सिङ्गार सरस कवि गाओल" इत्यादि।
विद्यापतिक अन्तरात्मा जेना मनक उमंगमे गाबि उठैत अछिष सुरत रसरंग संसार-सारा।
शिवसिंहकें अपर कामदेव, अभिनव कुसुम-सायक अथवा श्रृङ्गार-रसक अधिष्ठातृ देवता
कृष्णाक "एकादश अवतारा" प्रभृति कहि अनेक प्रकारसँ अपन कविताक उद्बोधनक संकेत
करैत रहैत छथि। परन्तु गोविन्ददासक गीतक भनितामे से नहि भेटैत अछि। हुनक कोनहु
भनितामे श्रृङ्गार-रसक नामो नहि अछि। अपनाकें ओ भगवान्क "नखमणि निछान" कहैत छथि
तथा "गोविन्ददास ह्यदय मणि मन्दिर अविचल मुरति त्रिभंग" कहि अपन भक्त ह्यदयक परिचय
दैत छथि। ओ वारंवार नाना प्रकारें नाना शब्दें अपनाकें भगवल्लीलाक साक्षी मात्र मानैत छथि।
"गोविन्ददास प्रमाण", "गोविन्ददास एक साखि" "गोविन्ददास हेरि भेल भोर", "लुबुधल
गोविन्ददास", "मुगुधल गोविन्ददास" "आनन्द निरखै गोविन्ददास", "हेरइत आनन्द
गोविन्ददास", "गोविन्ददास ह्यदय अवधारल" प्रभृति उक्ति सबसँ स्पष्ट होइत अछि जे ओ
अपनाकें कृष्णक केलिलीलाक द्रष्टा कहैत छथि ओ ओहि लीलाक मानसिक प्रत्यक्ष कए कए
ओकर संकीर्तन करैत छथि, ओ अपनाकें धन्य बुझैत छथि। "गोविन्ददास गुण गाय",
गोविन्ददास प्रशंस", "गोविन्ददास भरम दुरि गेल" इत्यादि शब्दें ओ अपन कविताक रुाोतक
परिचय दैत छथि, अपन मनोभाव व्यक्त करैत छथि। स्पष्ट अछि जे कीर्तन जे थिक भगवानक
नाम, गुण ओ लीलाक वर्णन, गोविन्ददासझाक कवितामे सएह टा अछि। कवी•ार जे हिनक
काव्यकृतिकें कृष्णलीला कहल अछि ताहूसँ इएह कथा पुष्ट होइत अछि। एहि सबमे श्रृङ्गाररस
अज़् थिक, स्थायीभाव अछि भक्ति ओ कतहु कतहु तँ अद्भुत रसहुक निवेश अज़्रूपें स्पष्ट
होइत अछि। श्रृङ्गारमे उत्कट श्रृङ्गार कतहु नहि अछि ओ जेहो श्रृङ्गारक वर्णन अछि ताहूसँ
पाठककें श्रृङ्गारक उद्बोधन नहि होइत अछि, कारण, ई सब वर्णित अछि भगवानक, मनुष्यक
नहि, ओ तें साधारणीकरण जे रसक धर्म थिकैक से एहिमे नहि होअए पबैत अछि। ई बङ्गलक
वैष्णव सम्प्रदायक रीति थिकैक यद्यपि एकर प्रथम प्रयोग हमरा लोकनिकें श्रीमद्भगवतक दशम
स्कन्धमे भेटैत अछि। एहि रूपक श्रृज़्र-रसक नाम वैष्णव-साहित्यमे "मधुररस" कहल अछि।
मिथिलाक जे प्राचीन परम्परा थिकैक जकर आरम्भमे हमरा लोकनिकें विद्यापतिक गीतमे भेटैत
अछि से गोविन्ददासक कवितामे नहि भेटैत अछि प्रत्युत बङ्गाली लोकनि जे रस विद्यापति
समेतक कवितामे पबैत छथि से गोविन्ददासक कवितामे प्रचुरतया भेटैत अछि, सएहटा भेटैत
अछि।




एहि सज़् सज़् गोविन्ददासक गीतक भाषा सेहो किछु विचित्र अछि ! एहिमे कोनो सन्देह
नहि जे ई भाषा थिक विशुद्ध मैथिली, विद्यापतिक गीतक भाषा; ओ विद्यापतिसँ जतबा ओ नवीन
छथि ततबा भाषामे सेहो आधुनिकता अछि। परन्तु गोविन्ददासक गीतक अर्थ ठाम ठाम दुरूह
अछि, कष्टसाध्य तँ प्रायः सर्वत्र अछि। काव्यमे जकरा प्रसाद गुण कहैत छिऐक से हिनक
काव्यमे एकदम नहि रहैत अछि। अर्थक ई दुरूहता कए कारणें अछि, यथा, तद्भव शब्दक
प्रचुरतया प्रयोग करब जाहिमे कतोक शब्द सर्वथा अभिनवरूपें तद्भव बनाओल गेल अछि;
अर्थबोधक हेतु आवश्यक पद यथा क्रियापद तकरा ऊह्र छोड़ि देब; एकहि गीतमे कए व्यक्तिक
उक्ति देब जाहिमे कोन अंश वा कतबा अंश ककर उक्ति तकर कोनो संकेत नहि रहब;
भगवल्लीलाक घटना-विशेष अथवा स्थितिविशेषक वर्णन जे जनसाधारणकें बुझल नहि रहब;
अपनहिसँ अर्थक अनुरूप ध्वनिक

शब्द बनाए ओकर प्रयोग करब इत्यादि। एहि कारणें गोविन्ददासक गीतक रसास्वादन ओहि
प्रकारें नहि भए पबैत अछि जेना आन कविक गीतक रसास्वादन होइत अछि। वस्तुतः अर्थक
वैमल्य गोविन्ददासकें जेना लक्ष्ये नहि रहैन्हि। ई कहब तँ परम अयुक्त होएत जे गोविन्ददासक
गीतमे उत्तम काव्य नहि छैन्हि, ध्वनिक प्रधानता जे उत्तम काव्यक लक्षण थिक से गोविन्ददासक
गीतमे बड़ विन्याससँ सन्निविष्ट अछि; अलङ्कारक चमत्कार जेहन गाविन्ददासक गीतमे अछि
तेहन विद्यापति समेतमे नहि भेटैत अछि। विद्यापतिक कतेक गीत अवश्ये अपूर्व अछि। परन्तु
गोविन्ददासक गीतक जँ अध्ययन करब, ओकर अर्थानुसन्धान करब, तँ प्रतीत होएत जेना ई
सब वस्तु ओहिमे गौण रहए, मुख्य वस्तु गोविन्ददासक गीतमे लक्ष्य रहैन्हि जेना शब्दक
विन्यास। गीत होइत अछि गाओल जएबाक हेतु ओ गीतक धर्म थिक श्रुतिमाधुर्य, कानक तुप्ति।
गोविन्ददासक गीतमे पदक विन्यास शब्दक अर्थहि टाकें दृष्टिमे राखिकें नहि कएल गेल अछि,
प्रत्युत शब्दक जे ध्वनि कानमे पड़त, कणँगोचर होएत, तकरहु दृष्टिमे राखि कएल गेल अछि।
फलतः गोविन्ददासक सब गीत कर्णसुखावह अछि, अत्यन्त मधुर अछि, विनु अर्थक अनुसन्धान
कएनहु केवल सुनलहिटासँ मनकें मुग्ध कए दैत अछि। तें श्रुतिमाधुर्यक हेतु जँ गोविन्ददासकें
शब्दकें तोड़हु पड़लैन्हि, अर्थबोधक निमित्त आवश्यक पदक समावेश नहिओ भए सकलैन्हि,
अपनहि शब्दकें बनबहु पड़लैन्हि, अप्रसिद्ध शब्दक प्रयोग करहु पड़लैन्हि तथापि ओ अर्थक
विमलताक निमित्त श्रुतिमाधुर्यकें नहि त्यागल। श्रुतिमाधुर्यक हेतु प्रसाद गुणक परित्याग करबामे
हुनका कोनो आपत्ति नहि बूझि पड़लैन्हि ! स्पष्ट अछि जे गोविन्ददास अपन गीतक रचना
कीर्तनमण्डलीमे गाओल जएबाक हेतु कएल, काव्य जकाँ पढ़ल जएबाक निमित्त ओ गीत नहि
रचल। तें शब्दक आडम्बरमे, विन्यासमे, चमत्कारमे अर्थ अधिक ठाम ओझाए गेल छैन्हि।
दृष्टान्तक हेतु ओहि गीत सवकें देखि सकैत छी जाहिमे प्रायः प्रत्येक पद एकहि वर्णसँ आरम्भ
भेल अछि। काव्यक दृष्टिसँ ई नेनपन सन लगैत अछि। एकहि वर्णसँ आरम्भ कए पदक
विन्यास कएलासँ समस्त गीतमे अर्थक निर्वाह करब असम्भव सन अछि। परन्तु आश्चर्य तँ ई जे
कठिन तँ अवश्ये अछि, दुरूह समेत अछि परन्तु कष्ट कएकें, माथ दुखाएकें, जखन
गोविन्ददासक गीतक अर्थ लगाएब तखन ओ अर्थ एहन सुन्दर प्रतीत होएत जे मन मुग्ध भए
जाएत। तँहि तँ जे कथा प्रसिद्ध टीकाकार मल्लिनाथ महाकवि भारविक प्रसज़्मे कहल अछि
सएह कथा हमरा गोविन्ददासहुक प्रसज़् समीचीन जँचैत अछि जे गोविन्ददासक गीत नारिकेरक


फलक सदृश अछि जकर मधुर रसक आस्वादनक हेतु नारिकेरक खोइँचाकें कष्टसँ छोड़बए
पड़त, ओकर फलकें फोड़ए पड़त। एहिमे सन्देह नहि जे अर्थक दुरूहता भारवि ओ
गोविन्ददासमे दू कारणें अछि; भारविमे अर्थक गौरव अछि, व्यङ्ग्यक गम्भीरता अछि;
गोविन्ददासमे शब्दक विन्यास अछि, शब्दक आडम्बरमे अर्थक प्रसादगुण विलीन अछि।
विचारला उत्तर एहन सन प्रतीत होइत अछि जे ई गीत सब अपरिपक्कावस्थाक रचना हो
जखन कविकें प्रतिभा तँ पूर्ण छलैन्हि परन्तु रचनाक अभ्यास ओहन परिपक्क नहि भेल छलैन्हि।
अतएव गोविन्ददासक गीतक पदविन्यास हम किछु विचित्र कहल अछि ओ शब्दालङ्कारक
प्राचुर्य ओ प्राशस्त्यसँ स्पष्ट बूझि पड़ैत अछि जे ओ गीतमे गेयधर्मताकें प्रमुखता दए ओकरा
श्रुतिमधुर बनाओल, हुनक सब गीत कीर्तनमणड्लीमे झालि ओ मृदज़्क सज़् गाओल जएबाक
हेतु रचल गेल।

एहि संक्षिप्त विवरणसँ गोविन्ददासक प्रसज़् परस्पर-विरुद्ध प्रमाणापुञ्जक प्रतिपादन
होइत अछि। मिथिलामे गोविन्ददासझा नामक महाकवि प्रसिद्ध छथि परन्तु हुनक गीतक प्रचार
बङ्गालमे अछि। भाषा हुनक मिथिलाक भाषा थिक परन्तु हुनक गीत मिथिलाक परम्पराक नहि,
बङ्गालक वैष्णव सम्प्रदायक जे परम्परा छैक तकर अनुसरण करैत अछि। हुनक गीतमे
आवरण अछि श्रृङ्गारक परन्तु थिक ओ कीर्तन। फलतः गोविन्ददासकें बज़्ली लोकनि बड़गली
कहैत छथि तथा हुनक सब परिचय बज़्लहिमे दैत छथि। परन्तु बज़्लमे एक दू नहि, छओ गोट
कबि गोविन्ददास नामक भए गेल छथि ओ ई कहब बज़्लिओ विद्वानक हेतु कठिन अछि जे
कोन गीत कोन गोविन्ददासक थिक। परन्तु एक गोट गोविन्ददासकें ओहो लोकनि सबसँ
विशिष्ट मानैत छथि जनिक भाषा अन्य गोविन्ददासक भाषासँ भिन्न अछि ओ से विद्यापतिक
भाषाक एतेक अनुरूप कोना भेल तकर आश्चर्य हुनकहु लोकनिकें कम नहि छैन्हि। अतएव
स्पष्ट अछि जे अन्यान्य गोविन्ददास जनिक

भाषा विद्यापतिक भाषाक अनुकरण व्रजबूली थिक जे सब बज़्ली थिकाह परन्तु जे गोविन्ददास
विशुद्ध मैथिलीमे रचल से मैथिल थिकाह। परन्तु ई हमरा लोकनिक वि•ाास थिक ओ एतबहिसँ
तँ ई कथा सिद्ध नहि होइत अछि जे गोविन्ददास जनिक मधुर-रसक पद बज़्लमे एतेक प्रचलित
अछि से मैथिल थिकाह।



एहि प्रसज़् ई स्मरण रहए जे आइसँ साठि-सत्तरि वर्ष पूर्व विद्यापति समेत बज़्ली
लोकनिक दृष्टिमे बज़्ली बुझल जाइत छलाह ओ गोविन्ददासहि जकाँ हुनको सब परिचय
बज़्लहिमे देल जाइत छल। जहिना गोविन्ददासक पद बज़्लमे आदृत अछि तहिना वा ताहूसँ
बेसी विद्यापतिक पद ओतए भक्ति ओ श्रद्धासँ समादृत छल ओ अछि, कारण, स्वयं चैतन्य
महाप्रभु विद्यापतिक पद गाबि गाबि आनन्द-विभोर होथि। परन्तु विद्यापतिक गीत गोविन्ददासक
गीत जकाँ मिथिलामे महिओ अप्रसिद्ध नहि भेल, प्रत्युत समस्त मिथिलामे लाखहु कण्ठसँ
"भनहि विद्यापति" सब दिन गुञ्जित होइत रहल। तथापि एमहर सए डेढ़ सए वर्षसँ बज़्ली
लोकनि विद्यापति मैथिल छलाह से बिसरि गेलाह ओ हुनका बड़ग्र्र्लिी कहए लगलाह। समय
आएल ओ स्वयं बज़्ली लोकनि, सत्यक जिज्ञासु बज़्ली मनीषी लोकनि, स्वीकार कएलैन्हि जे
विद्यापति मैथिल छलाह; प्रमाणसँ सिद्ध कए ई भ्रम दूर कए देलैन्हि जे विद्यापति बज़्ली छलाह।
एहिमे बड़का सहायक भेल मिथिलामे विद्यापतिक गीतक प्रचुर प्रचार ओ विद्यापतिक हाथक
लिखल भागवातक पोथी। गोविन्ददासक ने कोनो हस्तलेख उपलब्ध अछि ने हुनक गीतक कोनो


प्राचीन संग्रहे भेटैत अछि। एहना स्थितिमे यावत् पर्यन्त गोविन्ददासक गीतक बज़्लमे एहि रूपक
व्यापक प्रचार एवं हुनक गीतमे वैष्णव सम्प्रदायक कीर्तनक परम्पराक अनुसृतिक समीचीन एवं
युक्तियुक्त समाधान नहि देल जाए तावत् पर्यन्त जँ बज़्ली लोकनि गोविन्ददासकें बज़्ली मानैत
छथि, हुनका मैथिल स्वीकार नहि करैत छथि, तँ एहिमे आश्चर्य कोन? मैथिली-साहित्यक क्षेत्रमे
ई एक गोट जटिल प्रश्न अछि; इएह थिक गोबिन्ददासक व्यक्तित्वक समस्या। एकर समाधान
प्रत्येक मैथिली-साहित्य-सेवीक हेतु अनुसन्धानक विषय थिक।



परन्तु खेदक विषय थिक जे एहि दिशामे मैथिलक दिशिसँ कोनो काज एखन धरि नहि
भेल अछि, कोनो अनुसन्धान नहि भेल अछि जाहिसँ गोविन्ददासझाक व्यक्तित्वक निर्धारण भए
सकए, एहि गीत सबहिक रचयिता गोविन्ददास मैथिल प्रमाणित होथि। गोविन्ददासक गीतक
अध्ययन भेल अछि परन्तु प्रश्न तँ अछि हुनक व्यक्तित्वक, तथा गीतक अध्ययन ओ व्यक्तित्वक
परिचय दू भिन्न वस्तु भेल। ई कथा सर्वमान्य अछि जे प्रत्येक कृतिक पाछाँमे एक गोट कर्ता
रहैत अछि, प्रत्येक काव्यक पाछाँमे एक गोट मानव कवि रहैत छथि तथा कविक व्यक्तित्वक
परिचय भए गेलासँ हुनक काव्यकृति बुझब सुगम भए जाइत अछि। परन्तु केवल काव्यकृतिक
आधार पर व्यक्तित्वक कल्पना भ्रमसँ शून्य नहि भए सकैत अछि। व्यक्ति होइत अछि देश, काल
ओ समाजक अनुरूप, तीनूक प्रभावसँ युक्त। अतएव कोनहु कविक व्यक्तित्वक परिचयक हेतु
ओहि कविक देश ओ कालक परिचय प्राप्त कए लेब आवश्यक, ओहि समाजक परिचय
आवश्यक जकरा निमित्त कविक कृति भेल। से नहि कए केवल काव्यक आधार पर व्यक्तित्वक
कल्पना करब कतेक भ्रमाह भए सकैत अछि तकर ज्वलन्त दृष्टान्त विद्यापति ठाकुर छथि।
अतएव गोविन्ददासक व्यक्तित्वक परिचयक हेतु हुनक देश, काल ओ समाजक परिचय प्राप्त
करब आवश्यक ओ तखन द्रष्टव्य जे हुनक काव्यकृति तदनुकूल होइत अछि वा नहि। महाकवि
जे छथि से नवयुगक स्पष्टा कहल जाइत छथि परन्तु भविष्यक हेतु नव युगक स्पष्टा होइतहुँ
ओ प्राचीनताक संस्कार लेने अपना युगक सृष्टि होइत छथि। एहि दृष्टिसँ जखन विचार करब
तखन कविक व्यक्तित्वक यथार्थ परिचय होएत ओ व्यक्तिक परिचय भए गेला उत्तर ओहि
व्यक्तिक कृतिक विचार मसीचीन ओ सुसज़्त होएत।



(2)



हम पूर्वहुँ कहि आएल छी जे हमरालोकनि जाहि गोविन्ददासझाकें महाकवि जनैत
छिऐन्हि ओ कुजौली महाकुल-सम्भूत महामहोपाध्याय शुचिकर झाक प्रपौत्र, महोपाध्याय
शिवदासझाक पौत्र, महोपाध्याय कृष्णदासझाक द्वितीय बालक छलाह। म.म. शुचि अपना
समयक प्रसिद्धतम नैयायिक छलाह ओ हुनकहिसँ महामहोपाध्याय महेशठाकुर न्यायशास्त्र पढ़ने
छलाह। म.म. महेशठाकुरक जेठ भाए म.म. भगीरथठाकुर जे मेघठाकुरक नामसँ प्रसिद्ध छथि
ओ कुसुमाञ्जलि पर जलद नामक सुप्रसिद्ध टीकाक रचना कएल, महामहोपाध्याय पक्षधरमिश्रक
शिष्य छलाह परन्तु जखन महेशठाकुर अध्ययनक योग्य भेलाह तावत् पक्षधरक देहान्त भए गेल
छल ओ सम्बन्धें मौसा शुचि उपाध्यायसँ महेशठाकुर पढ़ल। एतावतैव शुचि उपाध्यायक वैदुष्यक
अनुमान कए सकैत छी, कारण, महेशठाकुर केवल मिथिलाराज्यक उपार्जनेटा नहि कएल, ओ
नैयायिको अपूर्व छलाह ओ पक्षधरक आलोक पर जे टीका दर्पण कहि ओ लिखल से


नव्यन्यायक निकष बुझल जाइत अछि। शुचि उपाध्यायक बेटा ओ पौत्र सब नैयायिक छलाह ओ
हुनक प्रपौत्र चारू भाइ नैयायिक छलाह। गोविन्ददासक आओर सब भाइ साहित्यिक सेहो
रहथि। जेठ गङ्गादास ओ छोट हरिदास एवं रामदास सभक काव्यकृतिक उल्लेख भेटैत अछि,
गङ्गादासक कृति तँ उपलब्ध नहि होइत अछि परन्तु हरिदासक गीत राग-तरङ्गिणीमे अचि
ओ रामदासक आनन्दविजय नाटक प्रकाशित अछि। गोविन्ददास नैयायिकक वंशमे प्रादुर्भूत
नैयायिक छलाह ओ मैथिली-साहित्यक सेवा हुनका समयमे हिनक परिवारक सब कएल। प्रायः
ओही समयमे रागतरङ्गिणीकार लोचन सेहो हिनकहि गाममे, रैञाममे, साहित्यिक रचना कएल
ओ से लोचन हिनकहि बाप कृष्णदासक पितिऔत भाए यदुनाथक दौहित्र छलाह, गोविन्ददासकें
सम्बन्धें भागिन छलथिन्ह।



गोविन्ददासक काल प्रायः निर्णित अछि। हिनक कन्याक विवाह महाराज महेशठाकुरक
प्रपौत्र, महाराज शुभङ्करठाकुरक पौत्र, रामठाकुरक बालक रघुनाथठाकुरसँ छल ओ हिनक
बहिनिक विवाह महाराज शुभङ्करठाकुरक जेठ बालक महाराज पुरुषोत्तम ठाकुरसँ छल।
हिनक छोट भाए महामहोपाध्याय रामदासझा अपन आनन्दविजय नाटिका मिथिलाविलासिनीक
ह्यदयमन्दिरक सुन्दरनरेशकें उपहारीकृत कएने छथि तथा गोविन्ददासझाकें ओ "श्रीगोविन्दघनेन
तेन गुरुणा" इत्यादि शब्दें गुरु कहने छथि। महाराज सुन्दरठाकुरक राजत्वकाल 1636 सँ
1652 ई0 अछि ओ ते स्पष्ट अछि जे 1636 ईशबीयक प्रान्तमे गोविन्ददासझा अवश्य जीवित
छलाह परन्तु वृद्ध छलाह अतः हिनक काल सोड़हम शताब्दीक अन्तिम चरणसँ सत्रहम
शताब्दीक चारिम दशक धरि मानब सर्वथा सज़्त अछि। गोविन्ददासझाक जे परिचय
हमरालोकनिकें उपलब्ध अछि ताहि सबसँ इएह हिनक जीवन-काल सिद्ध होइत अछि।



मिथिलाक सांस्कृतिक इतिहासक पर्यालोचनासँ अवगत होइत अछि जे सोड़हम
शताब्दीक अन्त धरि मिथिलाक सांस्कृतिक गौरव ह्यासोन्मुख भए रहल छल। कार्णाट क्षत्रिय
लोकनिक राजत्वकालमे मिथिला जाहि गरिमाकें प्राप्त कएल, ओ जकर परिणाम-स्वरूप
ओइनिबार-वंशक राजत्वकाल मिथिलाक सांस्कृतिक इतिहासमे स्वर्णयुग छल, ओहि गरिमाक
अन्त सोड़हम शताब्दीक अन्त धरि सब दिशि परिलक्षित होइत अछि। ई गौरव मिथिलहिभूमिकें
अछि जे जखन समस्त आर्यावत्र्त विदेशी ओ विधर्मी मुसलमान विजेतागणसँ विजित भए गेल
छल तैओ, प्रायः दू सए वर्ष धरि, मिथिलामे क्षत्रियक राज्य रहल ओ मैथिल लोकनि एहि युगमे
अपन सामाजिक संघटन एहि एहि दूरदर्शिता एवं कुशलतासँ कए लेल जे 1324 ई0 मे जखन
हरिसिंहदेवकें परास्त भए मिथिलाकें त्यागए पड़लैन्हि तथापि मिथिला मुसलमानक शासनमे नहि
आएल प्रत्युत आधिपत्य मुसलमानक छलो तथापि शासन रहल ब्रााहृणक, ओइनिबार-वंशक।
एहि नवीन सङ्घटनमे विद्याक व्यवसाय ओ चरित्रक चारुताकें से महत्त्व देल गेल जे मिथिला
विद्यायक केन्द्र भए गेल ओ आर्यावत्र्तक एहि पूर्वोत्तर भूभागमे सांस्कृतिक नेतृत्व करए लागल।
जाहि महापुरुष लोकनिक जन्मभूमि होएबाक गौरवें मिथिलाक मुख अद्यापि उज्ज्वल अछि से
लोकनि प्रायः सबहुँ एही युगमे प्रादुर्भूत भेल छलाह। नव्यन्यायक प्रवत्र्तक परमगुरु गङ्गेश,

हुनक सुपुत्र वर्धमान, सप्तरत्नाकर चण्डे•ार, सन्मिश्र शङ्कर, पक्षधर, वाचस्पति, जगद्धर,
विद्यापति--सबहुँ एही युगमे अवतार लए मिथिलाकें गौरव प्रदान कएल। शङ्करमिश्र अपन पिता
अयाची भवनाथ मिश्रक प्रसज़् जे कहने छथि जे




यस्यान्तेवासिभिः प्राज्ञैरासमुद्रं वसुन्धरा।

विद्याविनोदव्यसनव्यापारैकपरा कृता।।

(गौरीदिगम्बर प्रहसनमे)

तथा अपन वैशेषिकसूत्रोपस्कारक प्रसज़् जे हुनक उक्ति अछि

श्लाघास्पदं यद्यपि नेतरेषामियं कृतिः स्यादुपहासयोग्या।

तथापि शिष्यैर्गुरुगौरवेण परस्सहरुौः समुपासनीय।।



एहीसँ स्पष्ट अछि जे ताहि दिन मिथिलाक विद्यावैभव कोन रूपक छल। भवनायक
शिष्य लोकनि "आसमुद्र" व्याप्त छलाह; शङ्करमिश्रकें सहरुाक हिसावें शिष्यक गौरव।
ओइनबार महाराज भैरवसिंहक राजत्वकालमे एहि वैभवक उत्कर्ष चरम छल जखन हुनक कएल
जरहटिआ पोखरिक यागमे निमन्त्रित पण्डितमे केवल मीमांसक चौदह सए सुनल जाइत अछि।
एही समयमे शङ्करमिश्र, मक्षधर मिश्र, जगद्धर झा, रुचिपति झा, गोविन्द ठाकुर प्रभृति
विद्धन्मूर्धन्य वत्र्तमान छलाह ओ विद्यापति ठाकुरक देहान्त भेलेटा छल। देश देशसँ छात्रगण जे
अपन अपन विद्याक परिष्कारक निमित्त मिथिला आबथि ताहिमे बज़्ल, उड़ीसा ओ आसामक
विद्यार्थी लोकनि विशेष छलाह। एहि पूर्वाञ्चलसँ मिथिलाकें सांस्कृतिक सम्बन्ध बहुत दिन
पूर्वहुसँ छल, कारण, तन्त्रक प्राधान्य एहि समस्त भूभागकें सांस्कृतिक एक सूत्रमे बन्हने छल।
भाषा ओ लिपिक साम्य सेहो एहि भूभागकें विशेष। बङ्गाल आदिक पण्डित लोकनि जखन
विद्या पढ़ि पढ़ि एतएसँ जाथि तँ ओ लोकनि केवल शास्त्रीय ज्ञाने टा नहि लेने जाथि। अपि तु
विद्यापतिक सुमधुर गीत सेहो अपना कण्ठमे लेने जाथि।इएह भेल विद्यापतिक गीतक बङ्गालमे
एहन व्यापक प्रचारक कारण। विद्यापतिक गीत सूनि सूनि स्वयं चैतन्यदेव मुग्ध भए जाथि, गाबि
गाबि आनन्दविभोर भए जाथि। हुनका एहि गीतमे अद्भुत आध्यात्मिकता भासित होइन्ह। स्त्री
ओ पुरुषक प्रेमकें, विशेषतः परकीयाक प्रेमकें, ओ परमात्माक भक्तिक प्रतीक बुझथि। परन्तु गीत
तँ ई सब छल श्रृङ्गारक ओ श्रृज़्रक माध्यमसँ भक्तिक एहि कल्पनाकें सिद्ध करबाक उद्देश्यसँ
बङ्गालक वैष्णव-समाजमे एक गोट नवीन रसक कल्पना कएल गेल जाहिमे स्थायीभाव हो
भक्ति परन्तु ओकर माध्यम हो श्रृज़्र्दिृड्ढ अन्र्र्र्िििद्यर्ंि श्रृज़्र्दिृड्ढ क़âब्रर्फि,अड़ग हो अङ्गी हो भक्ति।
चैतन्यदेवक महापण्डित ओ महाकवि शिष्य लोकनि सनातन, रूप ओ जीव, सबहुँ, शास्त्रीय
रीतिएँ एहि मधुररसक प्रतिपादन कएल : क्रमशः विद्यापतिक अनुकरणमे हुनकहि शैली पर
हुनकहि भाषामे गीतक रचना होअए लागल। वस्तुतः बङ्गाल, आसाम ओ उत्कलमे
भाषासाहित्यक विकासमे मैथिली गीत-काव्यक अपूर्व प्रभाव अछि। कालक्रमें जखन मिथिलासँ
सम्पर्क क्षीण भए गेल ओ चैतन्यक नव सम्प्रदायक प्रभाव मिथिलामे नहि होअए पओलक तखन
ओहि भाग सबहिक लोक विद्यापतिक मैथिलत्व बिसरि गेल। विद्यापतिकें ओ लोकनि बङ्गाली
बुझए लगलाह, विद्यापतिक भाषाक अनुकरणकें ओ लोकनि तत्तद्भाषाक सज़् मिश्रित मैथिली
बिसरि गेलाह, ओकरा नाम देल ब्राजबूली।



परन्तु पक्षधर मिश्रक सज़्हि जेना मिथिलाक विद्यावभवक अस्त भए गेल। एकर अभिप्राय
ई नहि जे मिथिलामे तकर पश्चात् विद्वान् नहि भेलाह, अथवा मिथिलासँ विद्याक व्यवसाय ऊठि
गेल, अथवा मिथिलामे विद्याक प्रति आदर ओ श्रद्धा नहि रहल। एकर आशय केवल एतबए जे


जेना गङ्गेशक समयसँ लए पक्षधरक समय धरि मिथिला विद्याक केन्द्र छल, जतएसँ शास्त्रीय
आलोक लए लए समस्त आर्यावर्तमे वैदुष्यक प्रसार होइत छल, तेना ओ नहि रहल। प्रवाद
अछि जे नवद्वीपसँ एक जन कनाह पण्डित रघुनाथ नामक मिथिला अएलाह पक्षधर मिश्रसँ
न्यायशास्त्र पढ़ए, परन्तु बुद्धिक तीक्ष्णता, तर्कक प्रौढ़ता ओ शास्त्रीय विवेचनाक

सूक्ष्मतामे ओ पक्षधरकें परास्त कए देल ओ शास्त्रार्थमे विजय प्राप्त कए शिरोमणिक उपाधिसँ
विभूषित घूरिकें नवद्वीप गेलाह। रघुनाथ शिरोमणि गङ्गेशक न्यायशास्त्रकें तर्कक चरम उत्कर्ष
पर आनि देल। पक्षधर मिश्र अपन आलोक नामक टीकामे गङ्गेशक चिन्तामणिक अद्भुत
विवेचना कएल जे न्यायशास्त्रक उत्कर्ष बुझल जाइत छल परन्तु शिरोमणि जे चिन्तामणि पर
दीधिति लिखल ताहिमे ओ पक्षधरक तर्कक दोषकें ताकि ताकि उद्घाटित कएल ओ अपन
सूक्ष्मातिसूक्ष्म तर्कसँ ओहि सबहिक खण्डन कए चिन्तामणिक आशयकें से रूप देल जे
चिन्तामणि-दीधिति तहिआसँ समस्त भारतवर्षसँ नव्यन्यायक चरम सिद्धान्तक रूपमे परिगृहीत
होइत आएल अछि। आलोक लुप्त भए गेल, दीधिति नाययशास्त्रक आकर ग्रन्थ भए गेल।
शिरोमणि नवद्वीपकें नव्यन्यायक केन्द्र बनाए देल ओ हुनक शिष्य परम्परामे एकसँ एक दुर्धर्ष
विद्वन्मूर्धन्य होइत गेलाह जे अपन कृति सबसँ केवल दीधितिहिक सिद्धान्तकें स्पष्ट नहि करैत
गेलाह प्रत्युत न्यायशास्त्रकें सब विद्याक शीर्षस्थानीय बनाए देल। शिरोमणिक कृति 1500
इशबीय धरि सम्पन्न भए गेल छल ओ सए वर्षक भीतरहिं नवद्वीप विद्याक अद्वितीय आगार भए
गेल। शिरोमणिक शिष्य परम्परामे तीनि जन महपण्डित सर्वोपरि विख्यात भेलाह--मथुरनाथ
(1550-1590 धरि) जनिक सब ग्रन्थक प्रतिलिपि करबामे कहल जाइत अछि जे महाभारतक
प्रतिलिपि करबासँ तीनि बर मसय लागत; जगदीश (1550-1610) जनिका समयमे कहल
जाइत अछि नवद्वीपमे चारि हजार विद्यार्थी न्यायशास्त्र पढ़ैत छलाह ओ साढ़े पाँच सए नैयायिक
अध्यापक छलाह, ओ गदाधर (1604 सँ 1709 धरि) जनिका समयमे नवद्वीपक ख्याति-प्रतिपत्ति
चरम सीमा पर प्राप्त भेल ओ अनुमान-खण्डक सूक्ष्मातिसूक्ष्म विचारप्रणाली भारतवर्ष मे यावतो
विद्यासमाजकें अभिभूत कए देलक। न्यायशास्त्रक विवेचनाक पद्धति सब शास्त्रमे चलि गेल,
व्याकरण ओ साहित्य समेतक विचार विनु अनुमान-खण्डक बोलिएँ नहि हो। फलतः विनु
न्यायशास्त्रक अवगति भेलें पण्डित होएब असम्भव भए गेल, पण्डित जकाँ विचार करब सम्भव
नहि रहल। परन्तु न्यायशास्त्रक अवगतिक हेतु अनिवार्य रहल दीधितिक अध्ययन ओ ताहि सज़्
सज़् माथुरी, जगदीशी ओ गादाधरीक। एहि तीनू महानैयायिकक ग्रन्थ पढ़ि पढ़ि आइ चारि सए
वर्षसँ लोक नैयायिक होइत आएल अछि, शास्त्रीय विचारक क्षमता प्राप्त करैत आएल अछि।



एही समयमे चैतन्य महाप्रभुक प्रादुर्भावसँ नवद्वीपक महिमा आओर व्यापक भए उठल।
महाप्रभु शिरोमणिक सहाध्यायी छलाह सेहो कहल जाइत अछि। हुनक ऐहिक लीलाक समय
थिक 1486 सँ 1534 ईशवीय धरि। भक्तिक रुाोत भारतीय संस्कृतिमे ओना तँ बड़ पुरान थिक
ओ श्रीमद्भगवत ओकर स्वरूपाधायक कहल जाइत अछि जाहिमे राधा ओ कृष्णाक प्रेमलीला
भक्तजनक आह्लादक सामग्री रहल अछि, परन्तु चैतन्य तँ कृष्ण-भक्तिक एक गोट नव रुाोत
नवद्वीपमे बहाए देल जे क्रमशः पसरैत पसरैत वृन्दावन धरि पहुँचि गेल। चैतन्य संस्कृतकें छोड़ि
भारतीय भाषाक गीत द्वारा जनमनकें मोहि लेल ओ ताहिमे विद्यापतिक गीत हुनका बड़
सहायक भेल। जन-साधारणमे प्रचारार्थ एहिसँ विशेष उपादेय आओर की होइत? परन्तु
विद्यापति-प्रभृतिक श्रृङ्गारक गीतमे आध्यात्मिक अभिप्राय बुझब जनसाधारणक हेतु सुगम नहि


छल। ताहि हेतु मधुर-रसक कल्पना कएल गेल ओ चैतन्यदेवक कवि-पण्डित शिष्य लोकनि
विशेषतः सनातन गोस्वामी (1484 सँ 1558 ई0) रूप गोस्वामी (1486 सँ 1534 ई0) ओ
हुनक भातिज जीव गोस्वामी संस्कृतमे काव्यहिक टा रचना कए एहि मधुर-रसक धारेटा नहि
बहाओल अपितु शास्त्रीय परिपाटीसँ मधुर-रसक युक्तियुक्त ओ तर्कपूर्ण प्रतिपादन सेहो कएल
जाहिसँ ओ प्रमाणपुष्ट हो, सिद्ध हो। महाप्रभुक सहचर नित्यानन्द लोकविषय भगवन्नामकीर्तनक
परिपाटी चलाओल जाहिसँ सम्पूर्ण नवद्वीप गुञ्जित भए उठल। चैतन्यक एहि नवीन वैष्णव-
धर्मक अभिन्न अज़् भए गेल कीर्तन। जतए कतहु एहि धर्मक प्रचार भेल ततहि कीर्तनक सेहो
प्रचार भेल। बङ्गालमे, आसाममे, उत्कलमे, सर्वत्र भगवन्नामकीर्तनक सज़् सज़् कीर्तनक पद
प्रचलित भए गेल। अनेकानेक कविगण कीर्तनक पद रचए लगलाह जाहि सबमे विद्यापतिक
रचना शैलीक अनुकरण छल, विद्यापतिहिक भाषाक अनुकरणमे सब गीत रचल गेल। समस्त
पूर्वोत्तर भारत गीतमय भए गेल, भाषा-साहित्यक अपूर्व समृद्धि जागि उठल। सोड़हम शताब्दीक
अन्त धरि नवद्वीपमे न्यायशास्त्रीय चर्चाक ध्वनि ओ कीर्तनक पदक ध्वनि इएह सर्वत्र सुनल
जाए।

एही समृद्धिकें दृष्टिमे राखि बङलाक प्रसिद्ध कवि भारतचन्द्र नवद्वीपकें "भारतीय राजधानी
क्षितिर प्रदीप" कहने छथि ओ से प्रशंसोक्ति नहि, यथार्थ वस्तुस्थितिक वर्णन थिक।



एमहर मिथिलामे विद्याक ओ प्रकर्ष नहि रहल। पक्षधरक परोक्ष होइतहिं मिथिलाक
स्थान लए लेलक नवद्वीप। मिथिलामे बहुतो महापण्डित होइत रहलाह परन्तु एक तँ मिथिलामे
एकाङ्गी विद्याक कहिओ व्यवसाय भेल नहि, केवल न्यायशास्त्रहिक अनुशीलन छल नहि,
दोसर नवद्वीपक प्रवर्धमान प्रकर्ष; मिथिलामे क्रमशः विद्याक ह्यास होअए लागल। पक्षधरक
शिष्यलोकनि अनेक छलाह, बड़ विशिष्ट विद्वान, यथा भगीरथ ठाकुर जनिका मेघठाकुर कहि
पण्डित-समाज चिन्हैत छैन्हि अथवा मिथिलाराज्योपार्जक महाराज महेशठाकुर जनिक दर्पण
नामक टीका पक्षधरक आलोककें सुव्यक्त कएल। परन्तु नवद्वीपक महिमामे ई सब डूबि गेल।
शिरोमणि अपन दीधितिमे बराबरि एतबे यत्न कएने छथि जे पक्षधरक आलोकमे दोष प्रमाणित
करी। मिथिलामे तहिअहिसँ पक्षधरक युक्तिकें युक्त सिद्ध करबाक चेष्टा होइत रहल। वासुदेव,
रुचिदत्त, खाँतर, माधव अनेको विद्वान् एकर यत्न कएल। मधुसूदन ठाकुर तँ आलोकक तर्कमे
प्रदर्शित कण्टककें दूर करबाक दीधितिमे देल गेल दोषक ओ मण्डन कएल। 1700 ईशवीयक
अन्तमे मिथिलाक विद्यावैभवक अन्तिम विभूति गोकुलनाथ दीधितिक सकल सिद्धान्तकें युक्तिसँ
खण्डन करैत शिरोमणिक मानक अपनयन करबाक उद्देश्यसँ "सिद्धान्ततत्त्व" नामक ग्रन्थक
रचना कएल। परन्तु ई सब ग्रन्थ जहिना लिखल गेल तहिना रहि गेल। दर्पण समेत आइधरि
प्रकाशमे नहि आएल अछि, कण्टकोद्धार सब पुस्तकालय मात्रमे सुरक्षित अछि, सिद्धान्ततत्त्व
सम्पूर्ण उपलब्ध समेत नहि अछि। परन्तु दीधिति तथा न्यायशास्त्रीय माथुरी, जगदीशी ओ
गादाधरी लाखक संख्यामे प्रकाशित भए समस्त वि•ाकें शास्त्रीय विवेचनाक प्रकार प्रदर्शित कए
रहल अछि। वस्तुतः मैथिल नैयायिकक विचार-सरणि एवं तार्किक युक्तिक अध्ययन समेत नहि
होअए पओलक।



मथिलाक एही ह्यासोन्मुख युगमे गोविन्ददासझा प्रादुर्भूत भेलाह। सोड़हम शताब्दीक
अन्तिम चरणमे हुनक जन्म एक बड़ प्रतिष्ठित नैयायिक महाकुलमे भेल। पक्षधरमिश्रक


मानमर्दनसँ समस्त मैथिल-समाज, विशेषतः पण्डितसमाज, क्षुब्ध ओ सामर्ष छल। तखन
मधुसूदन अपन कण्टकोद्धारक रचना कए स्मर्तव्य भए गेल छलाह। महेशठाकुर मिथिलाराज्यक
उपार्जन कए पण्डितक सम्मानमे धौत-परीक्षाक व्यवस्था कए अन्तमे काशी चल गेलाह। तेजस्वी
नैयायिक मिथिलासँ ऊठि गेल छलाह से तँ कहब असज़्त होएत परन्तु नवद्वीपक प्रवर्धमान
तेजस्विताक समक्ष मिथिलाक तेज मलिन भेल जाइत छल। गोविन्ददासझा कुलक्रमागत
न्यायशास्त्रक अध्ययन आरम्भ कएल ओ एहि उच्च अभिलाषाकें लए आरम्भ कएल जे मैथिलक
मान राखि सकी। परन्तु ताहि हेतु तँ नवद्वीपक प्रतिभाक परिज्ञन आवश्यक छल, कारण, विनु
तकर साक्षात् परिचय प्राप्त कएने ओकर प्रतिस्पर्धाक क्षमता कोना होइत। अतएव नव्यन्यायमे
उत्कर्ष ओ व्युत्पत्तिक समासादनार्थ गोविन्ददासझा निश्चय नवद्वीप जाए ओतहि शास्त्रीय
विवेचनाक परिष्कार कएल। जे आचार्य लोकनि मैथिलक मानमर्दनक सङ्कल्प लए एतेक
ख्याति पओने छलाह तनिक तर्क, युक्ति, प्रतिभा, व्युत्पत्ति, अध्यापन-शैली ओ पाण्डित्य-प्रकर्षक
परिज्ञानक हेतु एहिसँ विशेष उपयुक्त ओ प्रशस्त मार्ग आओर भए की सकैत छल ! तें हमर
अनुमान अछि जे मिथिलासँ जे पण्डित लोकनि मण्डली बनाए बनाए नवद्वीप जाए नव्यन्यायक
अध्ययन सम्पन्न करए लगलाह ताहिमे जँ सर्वप्रथम गोविन्ददासझा नहि छलाह तँ प्रारम्भहिक
कोनहु मण्डलीमे ओ अवश्य छलाह तथा प्रतिभामे निश्चय ओ सबसँ विशिष्ट छलाह। सोड़हम
शताब्दीक अन्तिम दशकमे 1590 सँ 1600 ई0क मध्यमे जखन गोविन्ददासझा बीस पचीस
वर्षक नवयुवक छलाह तखन ओ देशमे न्यायशास्त्रक अध्ययन सम्पन्न कए नवद्वीप गेलाह।
जगद्गुरु मथुरानाथसँ ओ विद्याग्रहण कए सकलाह अथवा नहि से तँ नहि कहि सकैत छी।
जइतहिं ओ जगद्गुरुक अन्तेवासी भए सकल होएताह से तँ ओतेक सम्भव नहि प्रतीत होइत
अछि। परन्तु जगदीश तर्कालङ्कारक अन्तेवासी ओ अवश्य भए गेल होएताह; हुनकहिसँ
न्यायशास्त्र पढ़ि ओ नैयायिक भए देश आपस भेल होएताह।



नवद्वीपमे ताहि दिन विद्यापतिक पद कीर्तनक मण्डली सबमे सब पदक शीर्षस्थानीय
छल; विद्यापति स्वयं चैतन्यदेवकें मुग्ध कएने छलाह। ओही विद्यापतिक देशक प्रतिभावान्
पण्डित, विद्यापतिहिक भाषाक भाषी, कोन सन्देह जे शीघ्रहिं गोविन्ददासझा कीर्तनमण्डली
सबमे सम्मानसँ आहूत होअए लगलाह, सम्मिलित होअए लगलाह। हुनक स्वर मधुर छल,
सङ्गीतक हुनका परिचय छल, प्रायः अभ्यासो छल, कमसँ कम "रसना-रोचन" "श्रवण्-रसायन"
पद-रचनाक प्रतिभा हुनका जन्मसिद्ध छल। मैथिलीमे कविता-रचनाक परम्परा हुनका परिचित
छल। नवद्वीपक वैष्णव-युसमाजमे ई मैथिल-वक सम्मानसँ आहूत होइत गेलाह। क्रमशः ओ पद
सब रचि रचि कीर्तनक मण्डली सबकें गएबाक हेतु देब आरम्भ कएल ओ तेहन रुचिर हुनक
गीत भेल, एहन श्रुतिमधुर जे यावत् गोविन्ददासझा नवद्वीपमे रहलाह, स्वान्तः सुखायसँ अधिक
वैष्णवजनमनोरञ्जनार्थ पदक रचना करैत रहलाह। एही युवक छात्र गोविन्ददासझाक ई सब
पद थिक जकर रचना ओ पाठावस्थामे, नवद्वीपमे, नवद्वीपक विशिष्ट विशिष्ट कीर्तनमण्डली
सबहिक हेतु, नवद्वीपक वैष्णव-सम्प्रदायक अनुरूप शैलीमे कएल परन्तु भाषा छल हुनक अपन,
मिथिलाक, विद्यापतिक अपन, विद्यापतिक अनुकरण नहि जकरा पाछाँ आबि "ब्राजबूली" संज्ञा
देल गेल।



ई अनुमान शुद्ध काल्पनिक नहि थिक, यद्यपि कल्पना कएनहु हमरा एहिमे कोनो क्षति


नहि सुझैत अछि, कारण एहिसँ समस्याक सबटा समाधान भए जाइत अछि। परन्तु हमरा दू
गोट सङ्केत एहन उपलब्ध अछि जाहिसँ एहि रूपक कल्पना करबाक निर्देश भेटैत अछि, जे
एहि अनुमानमे हमरा सहायक होइत अछि। प्रथमतः आनन्दविजय नाटकमे हिनक सबसँ छोट
भाए महामहोपाध्याय रामदासझाक उक्ति जे



यस्मिन् गर्जति रोमदण्डकपटेनायत्नरत्नाङ्कुरा-

नातन्वन्ति वपुर्विदूरखणयो विख्यातसंख्यावताम्।

श्रीगोविन्दघनेन तेन गुरुणा कारुण्यपुण्याम्भिसा।

सिक्तस्यामरशाखिनो नवरसं रामस्य रम्यं फलम्।।



गोविन्ददासक कृपासँ सरस राम ई नाटक रचल परन्तु एहि गोविन्ददासक गर्जन सूनि
प्रख्यात संख्यावान् लोकनिकें रोमाञ्च भए जाइन्ह। स्पष्ट अछि जे एहि प्रशंसोक्तिसँ
गोविन्ददासक व्यक्तित्वक प्रसज़् दू गोट महत्ता सूचित होइत अछि, एक तँ रामदासक कवित्व
हुनक भाइक प्रसादात्। एतावतैव गोविन्ददासक कवित्व-प्रतिभा रव्यापित होइत अछि। दोसर,
गोविन्ददास गर्जनसँ प्रकाण्ड पण्डितलोकनिकें रोमाञ्च होएब। ई गर्जन निश्चय न्यायशास्त्रीय
वादक चित्र उपस्थित करैत अछि, नैयायिकहिक बौलीकें पण्डितक गर्जन कहि सकैत छी।
जाहि युगमे गोविन्ददासझाक प्रादुर्भाव भेल ताहिमे विनु दीधितिकार शिरोमणि ओ हुनक परवत्र्ती
नवद्वीपक महारथीलोकनिक तर्क, युक्ति, ओ वाद-शैलीक अनुसरण कएने केओ वादी पण्डित
"प्रख्यात-संख्यावान्" लोकनिकें रोमाञ्च कराए देथि ई समीचीन कथा नहि प्रतीत होइत अछि।
मिथिलाक जे प्राचीन शास्त्रार्थ-परिपाटी छल अथवा तर्कक प्रकार छल से तँ शिरोमणिसँ परास्त
भए गेल छल;स्वयं पक्षघर तँ शिरोमणीक तर्कसँ पराजित भए गेल छलाह। नवद्वीप
न्यायशास्त्रीय विचारक प्रागल्भ्यमे समस्त भारतवर्षक दिग्विजय कए लेने छल। तेहना स्थितिमे
गोविन्ददासझाक हेतु वा ककरहु हेतु "वादि-मत्तेभ-सिंह"क गौरव ताधरि कोना सज़्त होएत
जाधरि हुनकामे शिरोमणिक सम्प्रदायक प्राशस्त्य, कौशल ओ ओजस्विताक कल्पना नहि कएल
जाए। अतएव हमरा तँ रामदासझाक उक्तिसँ स्पष्ट प्रतीत होइत अछि जे गोविन्ददासझा
नवद्वीपमे दीधितिकारक सम्प्रदायमे अन्तेवासी भए न्यायशास्त्रक अनुशीलन कएने छलाह,
प्रशिक्षण प्राप्त कएने छलाह, ओ काव्यक क्षेत्रमे कृतित्वक प्रतिष्ठा सेहो प्राप्त कएने छलाह।
शुष्क कठोर तर्कक अभ्यासक सज़्-सज़् सुकुमार काव्यक कोमल कल्पना मैथिल
विदून्मूर्धन्यलोकनिक हेतु अभिनव वस्तु नहि थिक। शङ्करमिश्र अपन उज्झट

श्लोकक संग्रह रसार्णवक प्रसज़् कहने छथि जे ई ओहि श्लोकसबहिक संग्रह थिक जकर रचना
हम "तर्काभ्यासपरिश्रान्तस्वान्तविश्रान्तिहेतवे" कएल। तथा प्रसन्नराघवकार जयदेव तँ
तर्ककर्कशविचारचातुरीक सज़् कोमलकान्तपदावलीक रचनाक प्रसज़् दृष्टान्त दैत छथि जे



"यैः कान्ताकुचमण्डले कररुहाः सानन्दमारोपिता-

स्तैः कि मत्तकरीन्द्रकुम्भदलने नारोपणीयाः शराः।।



द्वितीयतः, नवद्वीप जाए न्यायशास्त्रक अध्ययन सम्पन्न करबाक जे परम्परा मिथिलामे
आइ शतावधि वर्ष धरि अनुवत्र्तमान छल ताहूसँ हमरा एहि कल्पनाक निर्देश भेटल अछि।


मिथिलासँ पण्डितलोकनि एमहर दुइए ठाम अध्ययनार्थ जाइत छलाह, काशी ओ नवद्वीप ओ
न्यायक परिष्कारक हेतु यदि कतहु अन्यत्र जाथि तँ नवद्वीपहिं। विदेश केओ एकसर नहि जाथि,
चारि-पाँचजन मीलिकें जाथि ओ अन्तिम मैथिल नैयायिक जे नवद्वीप जाए न्यायशास्त्र सम्पूर्ण
अध्ययन कए आएल छलाह ओ छलाह स्वर्गीय पण्डित नीलाम्बरझा जनिक भागिन छलाह
महामहोपाध्याय बालकृष्णमिश्र जे न्यायशास्त्र आरम्भमे हुनकहिसँ पढ़ल। नीलाम्बरझा आइसँ
सत्तरि-पचहत्तरि वर्ष पूर्व नवद्वीप गेल छलाह। ई परिपाटी कहिआ चलल से तँ ज्ञात नहि अछि
परन्तु जे कथा हम पूर्वहिं कहि आएल छी एकर आरम्भ सोड़हम शताब्दीक अन्त धरि भेल
होएत ई सर्वथा सज़्त बूझि पड़ैत अछि। शिरोमणिक प्रदर्शित पक्षधरक दोषकें सद्युक्ति द्वारा
समुत्सारणक उद्योग किछु दिन धरि मिथिलामे अवश्य भेल परन्तु एहि विषय पर अद्यपर्यन्त
कोनो अनुसन्धान नहि भेल अछि जे एहि कण्टकोद्धार-कार्यमे मैथिल नैयायिक कतेक दुर घरि
सफल भेलाह। गोकुलनाथ अन्तिम मैथिल महापण्डित छलाह जे अपन सिद्धान्त-तत्त्व एही
दृष्टिसँ रचल जे दीधितिक तर्ककें खण्डन कए पक्षधरक मर्यादाकें पुनः स्थापित करी। परन्तु
कालक दोष कही, अथवा प्रतिभाक ह्यास, मिथिलाक तेज दिनानुदिन मलिन होइत गेल ओ
1700 ई0क पश्चात् तँ मिथिलाक न्यायशास्त्र सर्वथा लुप्त भए गेल। परन्तु ई स्थिति सहसा तँ
भेल नहि होएत। विद्याक अर्जनक हेतु लोक, विशेषतः प्रतिभावान छात्र, ओतहि जाएत जतए
अध्यापन सर्वोत्कृष्ट होएत ओ से यश मथुरानाथहिक समयसँ नवद्वीपकें प्राप्त भेल जाहि कारणें
मथुरनाथकें जगद्गुरुक आख्या देल जाइत अछि। तँहि हमर अनुमान अछि जे जगद्गुरुक
यशकें सूनि गोविन्ददासझा 1590क प्रान्तमे नवद्वीप गेलाह ओ ओतहि ओ अपन गीतावलीक
रचना कएल।



(3)



यदि ई कथा सत्य तँ गोविन्ददासक समस्याक समाधान सुगम भए जाइत अछि ओ सब
दृष्टिएँ विचार कएलासँ एकरा छोड़ि दोसर कोनो समाधानो नहि भेटैत अछि जाहिसँ परस्पर
विरुद्ध प्रमाणपुञ्जक सामञ्जस्य भए सकए। देश, काल ओ समाजक जे चित्र हम उपस्थित
कएल अछि से ऐतिहासिक तथ्य थिक, ओ ताहि सज़् एहि कल्पनाकें अथवा एहि अनुमानकें
कोनो विरोध नहि होइत अछि, प्रत्युत गोविन्ददासक रचनाक स्वरूप, शैली एवं प्रचार सब
कथूक सज़्ति एही ऐतिहासिक पृष्ठभूमिमे युक्तियुक्त प्रतीत होइत अछि।



गोविन्ददासक भाषाक प्रसज़् ई छोड़ि दोसर कथा सज़्ते नहि होइत अछि जे ई मैथिलक
कृति थिक, मिथिलाभाषा-भाषीक कृति थिक। मैथिलेतर कतबओ अनुकरण करताह तथापि एहि
रूपें विशुद्ध भाषा नहि लीखि सकताह। कतेक मैथिलेतर कविगण विद्यापतिक भाषाक अनुकरण
कएल अछि परन्तु केओ मिथिलाभाषा नहि लीखि सकलाह, सबमे कृत्रिमताक स्पष्ट चिन्ह
उपलब्ध होइत अछि जाहि कारणें एकगोट भाषान्तरक, व्रजबुलीक, कल्पना करए पड़ल।
गोविन्ददास-भनितासँ युक्त कतेको गीत व्रजबूलीमे अछि ओ बज़्ला-साहित्यक इतिहासमे अनेक
कवि एहि नामक भेटैत छथि, छओ गोट गोविन्ददास बङ्गालमे भेलाह अछि। हुनका

लोकनिक गीतक भाषाक आधार पर ई कहब सुगम अछि ओ सज़्त अछि जे ब्राजबूलीक सबटा
गीत बङ्गीला गोविन्ददासक थिक परन्तु मिथिलाभाषाक गीत मैथिल गोविन्ददासक थिक ! एक


जन बङ्गाली कवि मैथिल जकाँ मिथिलाभाषामे गीतक रचना कएल ताहिसँ विशेष सज़्त तँ ई
मानब अवश्ये होएत जे मैथिल गोविन्ददास एहि गीत सबहिक रचना नवद्वीपमे कएल, जखन
अन्य प्रकारें हुनक नवद्वीपमे अध्ययनक निमित्त ओहि युगमे रहब युक्तियुक्त होइत अछि जाहि
युगमे नवद्वीप न्यायशास्त्रीय विद्या ओ चैतन्यमहाप्रभुक वैष्णवधर्मक चरम उत्कर्ष पर छल।



ओ एहि सब गीतक रचना भेल कीत्र्तनमण्डलीमे झालि ओ मृदज़्क सज़् गाओल जएबाक
हेतु तें गेयधर्मक प्रधानता पूर्णसज़्त। अर्थक विमलतासँ विशेष शब्दक झङ्कार पर ध्यान देल
गेल अछि, श्रुतिमाधुर्यक हेतु शब्दालङ्कारक प्रचुर प्रयोग भेल अछि। कोनहु दोसर मैथिल
कविक गीतमे एहि रूपें शब्दक ध्वनि पर एतेक ध्यान नहि देल गेल अछि; जतेक कीर्तनहुक
पदसँ हम परिचित छी हमरा तँ ब्राजबूलीहुक अन्यान्य कविक रचनामे शब्दक ई झङ्कार नहि
भेटैत अछि। अतएव ई कल्पना करब पूर्ण सज़्त प्रतीत होइत अछि जे गोविन्ददास एहि पद
सबहिक रचना साधारण काव्यक दृष्टिसँ नहि, साधारण गीत जकाँ गाओल जएबाक हेतु नहि,
प्रत्युत कीर्तनमे गाओल जएबाक हेतु कएल। अर्थक विमलता पर तँ तखन ने ध्यान देल जाइत
जखन एकर लक्ष्य होइत कविताक रसास्वादन। साधारण गीत ओ कीर्तनक गीतमे भेद होइत
अछि, ओ गोविन्ददासक गीत कीर्तनक हेतु रचल गेल से एहि गीत सबहिक स्परूपे कहैत
अछि।



गोविन्ददासक काव्यगत जे दोष लक्षित होइत अछि से ओही जातिक दोष थिक जे
एकगोट छात्रक पाठावस्थाक रचनामे होएब स्वाभाविक, विशेषतः जखन ओहि छात्रकें रचनाक
उद्देश्य कविक ख्याति नहि हो किन्तु समाज-विशेषक अनुरञ्जन, जाहि समाजक हेतु ओ
तदनुकूल गीतक रचना करए। गोविन्ददासक काव्यक दोष हुनक प्रतिभाक नहि थिक,
गोविन्ददासक प्रायः सब गीत विद्यापतिक कतोक गीतसँ उच्च कोटिक अछि। ओ दोष हुनक
व्युत्पत्तिक नहि थिक; शब्दक एहन विन्यासी कविक व्युत्पत्तिमे दोषक चर्चा कोन? ओ दोष थिक
हुनक अपरिपक्व काव्यकौशलक, अभ्यासक अभावक, नैयायिकक कठोर परन्तु सूक्ष्म कल्पना-
शक्तिक। प्रसादगुणक अभाव हिनक गीतमे शब्दक आडम्बर ओ ध्वनिक झङ्कारक कारणें अछि
परन्तु से आडम्बर ओ झङ्कार तँ तखन चमकैत जखन ताहि सज़्-सज़् अर्थक निर्मलता सेहो
रहैत। परन्तु अर्थक प्रति गौणताक भाव सूचित करैत अछि जे कवितामे भावाभिव्यक्तिक माध्यम
जे थिक शब्द ताहि पर हुनका पूर्ण अधिकार नहि छल, ओ ओहि रचनाक उद्देश्यक पूर्त्ति हुनका
ओकर गेयधर्मता मात्रमे पूर्ण भए जाइन्ह, जाहिसँ आगाँ जेना हुनका लक्ष्ये नहि हो। नेनपनक
अनेक लक्षण हिनक प्रशस्तहु पदमे स्पष्ट अछि। समस्त गीतमे एकहि वर्णसँ आरम्भ पदक
समावेश करबाक चेष्टा नेनपन नहि तँ की थिक? चित्रकाव्यक स्थान साहित्यशास्त्रमे गौण अछि
ओ एहि एक-वर्णक बहुल प्रयोग अनुप्रासक सीमाकें लाँघि गीतकें चित्र-काव्यत्व प्रदान करैत
अछि। विद्यापतिक एक एक गीतमे नव-नव कल्पनाक समावेश अपूर्व चमत्कारक अछि, परन्तु
गोविन्ददासक समस्त गीतमे एक गोट कल्पनाक साङ्गोपाज़् चित्रण हुनक कल्पनाक प्रौढ़ता,
ओकर सूक्ष्मता, ओकर दृढ़ताक प्रमाण थिक तथा ई कल्पना नैयायिकक मस्तिष्कक धर्म थिक।
आशयक गाम्भीर्य, ध्वनिक सूक्ष्मता, व्यङ्ग्यक दूरत्व सेहो प्रायः अधिक ठाम हिनका गीतमे
अर्थक दुरूहताक कारण अछि; से सब नैयायिकक सूक्ष्म विवेचनाक अभ्यासक परिणाम कहल
जाए सकैत अछि। यदि गोविन्ददासझामे काव्यकलाक परिपक्वता रहैत, जँ ओ आर्थिक


निर्मलताकें लक्ष्य बनाए प्रसाद गुणक दिशि सचेष्ट होइतथि, यदि ओ अर्थबोधक निमित्त
आवश्यक पदक समावेश कए अपन गीतकें सुबोध बनएबाक यत्न करितथि तँ प्रतिभा हुनक
तेहन तीव्र छल, व्युत्पत्ति तेहन चमत्कारक छल, कल्पना हुनक तेहन सूक्ष्म छल, शब्दक ओ
तेहन विन्यासी छलाह, ओ श्रुतिमाधुर्यक ओ ततेक प्रिय छलाह जे ओहन गीतकार भारतीय
भाषामे प्रायः तकलहु नहि भेटैत। परञ्च ओ तँ "रसना-रोचन श्रवण-रसायन" कीर्तनक पदक
रचना मण्डली सबहिक अनुरञ्जनार्थ करैत

रहलाह। कवित्वक यश हुनका हेतु गौण छल, ओ तँ नैयायिकक ख्यातिक भूखल छलाह।
नवद्वीपसँ फिरला उत्तर ओ कविता रचबो कएलैन्हि की नहि ताहिमे सन्देह; हमरा जनैत तँ ओ
नहिए रचलैन्हि।



इएह कारण थिक जे गोविन्ददासक समस्त रचना मधुर-रसक थिक, जाहि मधुर-रसक
कल्पना चैतन्यक विद्वान् शिष्य लोकनि, विशेषतः रूपगोस्वामी, कएलैन्हि। एहि मधुर-रसमे
श्रृङ्गार आवरण मात्र रहैत अछि; ओहि श्रृङ्गारमे अन्तर्निहित रहैत अछि आध्यात्मिकता।
मिथिलामे एकर कहिओ प्रचार नहि भेल परन्तु नवद्वीपक वैष्णवसमाजमे इएह प्रधान रस छल।
गोविन्ददास एहि विषयक अध्ययन कएने छलाह। उज्ज्वलनीलमणि, विदग्धमाधव प्रभृति
रूपगोस्वामीक कृतिक, जीवगोस्वामीक कृतिक, सनातनगोस्वामीक कृतिक, ओ ताहि सज़् सज़्
श्रीमद्भगवतक हिनका पूर्ण अनुशीलन छलैन्हि। हिनक कविताक विशेष अध्ययन कएने ताकि
ताकिकें बहार कएल जाए सकैत अछि जे कोन रूपें गोविन्ददासक गीतमे संस्कृतक वैष्णवकवि
लोकनिक छाया अछि। अनेक गीत तँ सोझे अनुवाद थिक। छाया तँ विद्यापतिहुक गीतमे बराबरि
भेटैत रहैत अछि परन्तु से श्रृङ्गारक गीतक--अमरुशतकक, आर्यासप्तशतीक, गाथासप्तशतीक,
श्रृङ्गारतिलकक, ओ ठाम ठाम गीतगोविन्दक, परन्तु अनुवाद विद्यापति कतहु नहि कएल अछि।
गोविन्ददासझाक प्रसिद्ध गीत (श्रृङ्गारभजनक प्रथम भाग गीत संख्या 49) "कहाँ नख चिन्ह
चिन्हल तोहें सुन्दरि" इत्यादि जे विभासरागक कन्दर्प तालमे अछि से थिक उज्ज्वलनीलमणिक
एहि श्लोकक अनुवाद:-



नखाङ्का न श्यामे घनघुसृणरेखाततिरियं

न लक्षाम्भः क्रूरे परिचिनुगिरेर्गैरिकमिदम्।

धियं धत्से चित्रं हत मृगमदेप्यञ्ञ्डनतया

तरुण्यास्ते दृष्टिः किमिव विपरीतस्थितिरभूत्।।



एहिना श्रृङ्गारभजनक द्वितीयभागक 53म गीत जे धनाश्रीरागमे अछि "सजनि मरण
मानिय बड़ भागि" इत्यादि से रूपगोस्वामीक विदग्धमाधवक एहि श्लोकक अनुवाद थिक :-



एकस्य श्रुतमेव लुम्पति मतिं कृष्णेति नामाक्षरं

सान्द्रोन्मादपरम्परामुपनयत्यन्यस्य वंशीकलः।

एष स्निग्धघनद्युतिर्मनसि मे लग्नः सकृद्वीक्षणात्

कष्टं धिक् पुरुषत्रये रतिरभून्मन्ये मृतिः श्रेयसे।।




श्रृङ्गारभजनक प्रथमभागक गीत संख्या-15, सूहबरागक 'सजनि कि कहब राहिक
सोहागि' इत्यादि रूपगोस्वामीक श्लोकक अनुवाद थिक :-



संकेतीकृतकोकिलादिनिनदं कंसद्विषं कुर्वतो

द्वारोन्मोचनलोलशंखवलयकाणं मुहुःश्रृणवतः।

केयं केयमिति प्रगल्भजरतीवाक्येन दूनात्मनो

राधाप्राज़्णकोणकोलिविटपिक्रोड़े गता शर्वरी।।



गोविन्ददासझाक जे फागुक गीत सब अछि से समेत श्रीमद्भगवतक छाया थिक। केवल
हुनक बरहमासा टा एहन गीत अछि जाहिमे विशुद्ध श्रृङ्गार भेटैत अछि, ने ओहिमे राधा वा
कृष्णक नाम अछि वे आध्यात्मिकताक आभास अछि। आओर गीत सबमे जँ राधाकृष्णक नाम
कतहु नहिओ अछि तथापि

आत्मसमर्पणक भावना ततेक अछि जे ओहिमे आध्यात्मिकताक आरोप सुगम भए जाइत अछि,
विशेषतः जखन ओहि भावक अन्यान्य पदमे मधुर-रसक अभिव्यञ्जन भेटैत अछि। अतएव
वैष्णव-साहित्य-शास्त्रक अनुसरण, वैष्णव-साहित्यक प्रभाव ओ वैष्णव कविक भावानुवाद एहि
कल्पनाकें दृढ़ करैत अछि जे छात्र गोविन्ददासक ई कृति थिक। प्रोढ़ पाण्डित्य प्राप्त कए केओ
एहि रूपें प्रसिद्ध पदक अनुवाद नहि करत; कवित्वक यशक प्रेप्सु एना नहि कए सकैत अछि,
ओ यदि करतो तँ यशस्वी नहि भए सकैत अछि। परन्तु जाहि स्थितिमे, जाहि उद्देश्यसँ, जाहि
समाजक हेतु एहि गीतावलीक रचनाक कल्पना कएल अछि ताहिमे ई सब असज़्त नहि प्रतीत
होइत अछि प्रत्युत इएह पूर्ण सज़्त जँचैत अछि।



ओ तँहि गोविन्ददासझाक गीतक प्रचार मिथिलामे नहि भेल। वस्तुतः मिथिलाक
परम्परामे ई मधुर-रस परिचित नहि छल तें रसिक-समाजमे एकर आस्वादन कोना होइत ओ
साधारण जनक हेतु ई गीत सब ततेक दुरूह छल जे ओहि समाजमे एकर प्रचारक आशा करबे
व्यर्थ। ई सब तँ रचित भेल वैष्णव-जनक हेतु, ओ ताहू समाजमे कीर्तनमण्डलीमे गाओल
जएबाक हेतु। परन्तु ई एक गोट ऐतिहासिक तथ्य थिक जे बङ्गालक कोन कोनमे चैतन्यक
धर्म पसरि गेल, दूर वृन्दावन धरि एकर प्रचार होइत गेल, किन्तु मथिलामे चैतन्यक धर्मक कोनो
प्रभाव नहि पड़ल। मैथिलक मानमर्दनक सङ्कल्प कए शिरोमणि जे साफल्य लाभ कएल
ताहिसँ नवद्वीपक महिमा बढ़ल अवश्य, ओ मिथिलाक तेज मलिन भए गेल, परन्तु मैथिल
पण्डित-समाज एहिसँ सब दिन क्षुब्ध रहल ओ विद्योपार्जनक हेतु मैथिललोकनि नवद्वीप जाथि
तैओ बङ्गालक सज़् सांस्कृतिक सम्बन्ध दिनानुदिन छूटए लागल। गोविन्ददासझा अपन पद
कीर्तनमण्डलीकें देथि ओ तें ओतहि ओकर प्रचार होइत गेल। मिथिलामे यदि ओहि पदसबहिक
प्रतिलिपि अएबो कएल तँ ओ जतहि गेल ततहि पड़ल रहल। एतए ने वैष्णव समाज छल, ने
कीर्तनक मण्डली छल, ने मधुर-रसक परिचय छल। इएह कारण थिक जे गोविन्ददासक रचना
प्रचुरतया बङ्गालमे प्रचरित होइत गेल ओ मिथिलामे एकर कोनो प्रचार नहि भए सकल। स्वयं
हिनक भागिन लोचन हिनकहि गाम रैञाममे पढ़िकें पण्डित भेलाह ओ प्रायः हिनक परोक्ष
भेलाक पर जे रागतरङ्गिणीमे मिथिलामे ख्यातगीतकें उदाहरण दए दए राग-रागिनीक परिचय


लिखल ताहिमे हिनक भाए हरिदासक एकटा गीत अछि परन्तु गोविन्ददासक कोनो गीत नहि
अछि। स्पष्ट जे गोविन्ददासक गीत मिथिलाक ख्यात गीत नहि छल ओ तें एकरा दृष्टान्त देब
लोचनक सङ्कल्पक विरुद्ध छल।



परन्तु मैथिल छात्र गोविन्ददासझाक ई सब रचना थिक ई कथा बङ्गालमे विस्मृत भए
गेल एहिमे कोनो आश्चर्य नहि। गोविन्ददास बङ्गालक लोकप्रिय कीर्तन-पद-कार भेलाह एहिमे
कोनो सन्देह नहि। तें क्रमशः मिथिलाक सांस्कृतिक सम्बन्धक विच्छिन्न भेलाक पर लोककें
एकरा विसरि जाएब जे ई कीर्तनपदकार मिथिलाक छलाह पूर्ण स्वाभाविक छल। ओ लोकनि
जखन विद्यापति समेतकें मैथिल नहि जानि सकैत रहलाह जे अपन गीत मिथिलामे रचल तँ
गोविन्ददासक परिचय बिसरि जएबामे आश्चर्यक अवकाश कतए, कारण, गोविन्ददास तँ
नवद्वीपहिमे गीत रचल। अनेको कवि ओतए गोविन्ददास नामक भेलाह ओ ताहिमे अन्यतमक
सज़् एहि गीत-कारकें एक बूझि ओलोकनि हिनक ओहि रूपक परिचय देल। भाषाक दृष्टिसँ
विचार कएलें मैथिल गोविन्ददासक पृथक्त्व स्पष्ट भए जाइत अछि ओ से गोविन्ददास इएह
छलाह जनिक परिचय एतए देल अछि, ई मिथिलाक परम्परागत वि•ाास निर्मूल नहि।



परन्तु सज़्हि सज़् एहूमे सन्देह नहि जे गोविन्ददासझाक गीत मधुररसक काव्य थिक,
वैष्णव कीर्तनसमाजक हेतु रचित भेल, ओ एकर प्रचार बङ्गालमे भेल। साहित्यमे देश-भेदक
प्रभाव नहि होइत अछि। मिथिलाक कवि मैथिलीमे कविता रचि बङ्गाली समाजकें देल जतए
ओकर आस्वादन भेल, आदर भेल, प्रचार भेल, तें ओ कवि अवश्य बङ्गालक कवि भेलाह।
स्वयं विद्यापति तँ बङ्गालक कवि भेलाह कारण हुनको कविताक आस्वादन, आदर ओ प्रचार
बङ्गालमे भेल। मिथिलाक ई गौरव थिक ओ हमरालोकनिकें

गोविन्ददासझाकें बङ्गालक लोकप्रिय महाकवि स्वीकार करबामे क्षति नहि, गौरवक अनुभव
करबाक चाही। हमरालोकनिकें एतबए प्रतिपाद्य जे गोविन्ददासझा मिथिला-भाषामे कविता रचल
ओ तकर प्रमाण हुनक रचना विद्यमान अछि। तें ऐतिहासिक तथ्यक आधार पर गोविन्ददासझाक
व्यक्तित्वक जे चित्र एतए उपस्थित कएल अछि ताहिसँ परस्पर-विरुद्ध प्रमाणपुञ्जक सामञ्जस्य
जँ सुधी-समाज समीचीन बुझथि तँ एहि पुरान समस्याक समाधान भए जाइत अछि।



.. .. .. ..



5

कवी•ार चन्दाझा



मैथिली-साहित्यक क्षेत्रमे कवी•ार चन्दाझा बड़ उत्कुष्ट ओ यशस्वी कविक रूपमे
सुप्रसिद्ध छथि। अपन रामायणक रचना कए ओ अमर भए गेल छथि, ओ जाधरि एहि भाषाक
अस्तित्व अछि, मिथिलाक सद्म सद्ममे आबालवृद्धवनिता हिनक रामायणक ललित पद गाबि गाबि
हिनक यशःशरीरमे जरामरणक भय नहि आबए देत। परन्तु हिनक कृति केवल रामायण मात्र
नहि अछि। विद्यापतिक पुरुषपरीक्षाक गद्य-पद्यमय अनुवाद कए ई प्रकाशित करओने छथि;
हिनक चारि गोट कविता-संग्रह वाताह्वान, गीतसप्तशती, गीतिसुधा ओ लक्ष्मी•ारविलास


प्रकाशित अछि। हिनक रचित महेशबानीक संग्रह प्रयागसँ स्वर्गीय डा0 अमरनाथ झा प्रकाशित
करओने छथि तथा आओरो महेशबानी तथा अन्यान्य छोट छोट कविताक संग्रह चन्द्रपद्यावलीक
नामसँ राजपण्डित श्रीबलदेव मिश्र प्रकाशित करओने छथि। पचाढ़ी स्थानक संस्थापक महन्थ
साहेबरामदासक कविताक संग्रह ई स्वयं सम्पादित कए प्रकाशित कएने छथि। मैथिली-
साहित्यक क्षेत्रमे सबसँ प्रचुर कृति विद्यापतिक कहल जाइत अछि परन्तु कवी•ारक कृति
हुनकहुसँ कत अधिक प्रचुर अछि ओ केवल प्रचुरतहिक दृष्टिसँ देखलहु उत्तर प्रतीत होएत जे
मैथिली-जगतमे कवी•ारकें केहन प्रमुख स्थान प्राप्य थिकैन्हि।



परन्तु अत्यन्त खेदक विषय थिक जे कवी•ारक प्रसज़् हमरा लोकनिक ज्ञान कतेक
सीमित अछि, हुनक कार्यक महत्त्व हमरा लोकनि कतेक थोड़ जनैत छी, हुनक कृतिक गौरवसँ
हमरा लोकनि कतेक अनभिज्ञ छी। रामायणक तीनि गोट संस्करणक बहार भए चुकल अछि
परञ्च एहि रामायणहुक वैशिष्ट¬क प्रसज़् ओहिमे कोनहुमे किछुओ उल्लेख नहि अछि। काशीसँ
ज्योतिषी श्रीबलदेव मिश्र कविवर चन्दाझा नामक एक गोट महत्त्वपूर्ण समीक्षाक ग्रन्थ लीखि
प्रकाशित करओलें छथि परन्तु ओहूमे साधारण--अत्यन्त साधारण--गपसप छाड़ि कोनो मार्मिक
विषय नहि अछि, कवी•ारक जीवनक कोनो चित्र नहि अछि, रामायणक रचना ओ कोन
आदर्शकें समक्ष राखि कएलैन्हि तकर चर्चो नहि अछि, अन्यान्य रचनाक उल्लेखो बड़ विरल
अछि। डा0 श्रीजयकान्त मिश्र अपन मैथिली-साहित्यक इतिहासमे अनेक ठाम कवी•ारक
रचनाक चर्चा कएल अछि ओ गत शताब्दीक अन्तिम भागकें ओ कवी•ारक युग कहि हिनक
महत्त्वक निर्देश मात्र कएल अछि परन्तु हिनक ओहि महत्त्वक ओहो दिग्दर्शन मात्रो नहि कराए
सकलाह जाहि कारणें ओहि युगकें ओ कवी•ारक युग कहल अछि। मिथिलाक पुरातत्त्वक प्रसज़्
हिनक कएल काजक तँ ओ चर्चो नहि कएलैन्हि अछि। सबसँ आश्चर्य तँ ई जे हिनक जन्म
ओ निधनक तिथिसमेत ओहो नहि दए सकलाह अछि जाहिमे आश्चर्यक कारण इएह जे अपन
जन्मक तिथि धरि तँ कवी•ार स्वयं अपन रचित वाताह्वानक अन्तमे देदए गेल छथि जे



शकाब्दे रामेशाननमुनिनिशानायकमिते

तपोऽच्छे सप्तम्यामधिगुरुदिनं चन्द्रकवितु:

जनुः इत्यादि

अर्थात् शाके 1753 माघशुदि सप्तमी बृहस्पतिकें, तदनुसार 20 जनवरी 1831 ई0 कें,
चन्द्रकविक जन्म भेल छल। वस्तुतः कवी•ारक रामायणक एक मात्र यथार्थ समीक्षा, जाहिसँ
केवल कवी•ारक प्रतिभा ओ हुनक रामायणक महत्त्व नहि प्रख्यापित होइत परन्तु जे हमरा
साहित्यक समीक्षाक एक गोट नव मार्ग प्रदर्शीत करैत ओ हमर समीक्षा साहित्यक एक गोट
अभिनव वस्तु होइत, हमर मित्र श्रीश्रीकृष्ण मिश्रजी स्वदेशमे आरम्भ कएने छलाह परन्तु दू
अङ्कमे ओकर पूर्वरूपमात्र देखलाँमे आएल, तत्पश्चात् स्वदेशक सज़्हिं ओहो पुनि दर्शनपथसँ
विलीन भए गेल ओ नहि जानि श्रीश्रीकृष्ण बाबू ओकरा कहिआ धरि समाप्त कए प्रकाशमे अनैत
छथि। एम्हर आबि डा0 श्रीललिते•ारझा हिन्दीमे कवी•ारक काव्यप्रतिभाक बड़ सुन्दर
विश्लेषणात्मक निबन्ध लिखलैन्हि अछि परन्तु मौलिक अनुसन्धान ओहूमे परिमिते अछि।



तथापि कवी•ारक रामायणक देशमे प्रसिद्ध अछि ओ हुनक कवित्व-ख्याति प्रसृत अछि।


एतए मुख्यतः हमरा कवी•ारक काव्यप्रतिभा विवेचनीय नहि अछि यद्यपि अनुपदहिं ओकरो चर्चा
करबे करब ओ देखाएब जे एहू दिशामे कवी•ारक सेवा कोन रूपें स्तुत्य अछि, अनुकरणीय
अछि। एतए हमरा मुख्यतः देखएबाक अछि जे मिथिला, मैथिल ओ मैथिलीक प्रसज़् अपन दीर्घ
जीवनकालमे कवी•ार कोन रूपें एकसर बराबरि अनुसन्धान करैत रहलाह ओ से कार्य ओ कोन
कोन मार्गें कएल जकरे अनुगमनसँ ओ कार्य एखनहु फलद सिद्ध भए सकैत अछि।



सुधी-समाजकें ई कथा विदिते अछि जे कहबाक प्रायः हमरा प्रयोजन नहि अछि जे
अनुसन्धानक काज--पुरातत्त्वक अनुसन्धानक काज--एक गोट व्यसन थिकैक ओ एक बेरि एहिमे
पड़ला उत्तर ओ एकर रसक आस्वादन भेला उत्तर पुनि एहिसँ मुक्ति भेटब कठिन। छोट छोट
विषय जकरा आन लोक तुच्छ बुझत एक गोट यथार्थ अनुसन्धानीक हेतु अपूर्व महत्त्वक भए
जाइत अछि ओ तकर समाधानक हेतु ओकर चित्त व्याकुल रहैत छैक, समयक महत्त्व जेना
ओकरा हेतु नगण्य भए जाइत छैक। हँ, तखन अनुसन्धानक मार्गमे पूर्णताक आशा करबे
असज़्त। कोनहु प्रसज़् मे यावतो विषयक समुचित समाधान कैएकें सिद्धान्त ख्यापित करब दोष
थिक। ज्ञानक मार्ग कतहु अवरुद्ध नहि छैक, सबटा समाधान भेले ताकए से आवश्यक नहि
छैक। अनुसन्धानक मार्ग प्रदर्शित भए गेलासँ अन्यो व्यक्ति ओहि मार्गक अनुसरण कए कतेक
भ्रमक निराकरण कए सकत, कतेक नव नव समाधान देत, अनुसन्धानक कार्य विकासोन्मुख
रहत, नव नव व्यक्तिकें उत्साह होएत--इत्यादि विषय अनुसन्धान-कार्यक हेतु मूल सिद्धान्त
जकाँ बुझबाक थिक। एहि हेतु आवश्यक छैक जे अनुसन्धानी व्यक्तिकें से साधन प्राप्य रहैक
जाहि द्वारा ओ अपन अनुसन्धानक फल समय समय पर प्रकाशित करओने जाए। हमरा
लोकनिकें से साधन एखनहु नहि अछि, आइसँ साठि सत्तरि वर्ष पूर्व तँ से ककरहु मनःपथहुमे
नहि आएल छलैक।



परन्तु छलाह धरि कवी•ार अनुसन्धानक एहने व्यसनी। पूर्वक समाचार तँ हमरा
निश्चित रूपसँ विदित नहि अछि परन्तु महाराजलक्ष्मी•ारसिंह बहादुरक सभामे जखन ओ
अएलाह तखनुक समाचार हमरा अनेको बेरि अपन मातुल स्वर्गीय म0 म0 डा0 सर
गङ्गानाथझाक मुहसँ सुनल थिक जे कोनरूपें कवी•ारक जीवन केवल मिथिला, मैथिल, ओ
मैथिलीक प्रसज़् अनुसन्धान करैत, एकरे चर्चा करैत, एकरे भावना करैत बितए। हुनक जीवनक
जेना कोनो दोसर लक्ष्ये नहि रहैन्हि। मनोविनोदक हेतु, स्वान्तःसुखाय, ओ कविता रचथि, सेहो
अपन आराध्य देव शिवजीक वन्दनामे, अथवा देशक विकारल दशापर, ओ शेष समय ओ केवल
पुरातत्त्वक अन्वेषण कार्यमे, एकरे चिन्तनामे, एकरे भावनामे बितबथि। आओर की, नेओत पूरए
जाथि ओ सुनथिन्ह जे अमुकक घरमे प्राचीन पोथी छैक तँ बाटसँ फराको रहैक तथापि ओतए
जाए पोथी देखि ओकर सूची बनाए राखि लेथि, कोनहु प्राचीन मन्दिरक नाम सुनथिन्ह तँ
ओतए जाए देवताक दर्शन कए चारू दिशि ताकए

लागथि जे किछु प्राचीन वस्तु तँ ने ओतए छैक। मिथिलाक पुरातत्त्वक विषय तँ ताहि दिन
परम्परया श्रुते छल, लिखित तँ एमहर आबिकें किछु भेल अछि परन्तु से श्रुत विषयक जज़्मे
भण्डार कवी•ार छलाह ओ ताहि प्रसज़् हिनक संलग्नता, मनःप्रवेश ओ ऊहिक भूरि भूरि प्रशंसा
हमरा अपना मामक मुहसँ अनेको बेरि सुनल थिक।



परन्तु अत्यन्त खेदक विषय थिक जे से भण्डार कवी•ार, अधिकतया, अपना सज़्हिं लेने


चल गेलाह। हम कहल अछि अधिकतया, कारण, किछुओ ओ लीखि नहि गेलाह से बात नहि
अछि, कमसँ कम नव नव जे विषय हुनका उपलब्ध होइन्ह से ओ अपन नोट-बहीमे लिखने
जाथि; अपना ऊहिसँ जे विषय ओ बहार करथि सेहो अपना बहीमे लीखि लेथि ; ग्रन्थाकारहु
ओ कए गोट विषय लिखब आरम्भ कएल जे प्रायः नवीन विषयक उपलब्धीक भरोसँ अथवा
कोनहु शङ्काक दुरूहतें अपूर्णें रहि गेल। सेहो सब खिष्टा रूपमे बहीमे अवश्ये लिखल होएत।
परन्तु प्रकाशित धरि ओ बड़ थोड़ विषय कए सकलाह। रामायणमे ओ महाराज महेशठाकुरक
मैथिली गीत ओ सँएतालीस गोट मैथिलीक कविक नाम मात्र दए सकलाह; पुरुषपरीक्षामे
टिप्पणीक रूपमे ओ दश पाँच गोट अपूर्व कथा लीखि गेलाह जे अन्यथा जानल नहि थिक,
साहेबरामदासक गीतक संग्रहक सज़् सज़् ओ पचाढ़ी स्थानक इतिहास दए गेलाह। विद्यापतिक
रचनाक संग्रह समस्त मिथिला घूमि घूमि जे ओ कएल ताहिमे गीत अंश स्वर्गीय नगेन्द्रनाथगुप्त
महाशय प्रकाशित कराओल; गोविन्दासझाक गीतक जे संग्रह कएल से एमहर आबि अमरनाथ
बाबू श्रृङ्गार-भजन-गीतावलीक नामसँ प्रकाशित कराओल। हँ, विद्यापतिक हाथक लिखल
भगवातक पोथी धरिक पता इएह लगाओल, ओकरा ताकि कें बहार कराओल जे भाग्यसँ
दरभंगा राजकीय पुस्तकालय मध्य, आब संस्कृतवि•ाविद्यालय मध्य, सुरक्षित अछि। प्रकाश
रूपमे कवी•ारक कएल पुरातत्वक अनुसन्धान एतबए उपलब्ध अछि। ई थोड़ नहि से अवश्य,
परन्तु हिनक एतबए कृति नहि छैन्हि ओ हमरा स्वयं जे हिनक कतोक लेख हस्तगत भेल अछि,
हिनका प्रसज़् कतोक लिखल भेटल अछि, तथा हिनक उपलब्ध लेखक आधार पर हिनक कएल
अनुसन्धानक विभिन्नता ओ विशालताक जे अनुमान करैत छी ताहिसँ स्पष्ट होइत अछि जे
कवी•ारक कार्यक्षेत्र कतेक विस्तीर्ण छल, हिनक प्रतिभा केहन सर्वतोमुखी छल।



एहि प्रसंग इहो कहब अप्रासंगिक नहि होएत जे कवी•ारक प्रादुर्भाव समुचित समयमे
नहि भेल। महाराज लक्ष्मी•ार सिंह बहादुरक सदृश उदाराशय प्रभु भेटलथिन्ह से हिनक
सौभाग्य अवश्य ओ हुनके उदार गुणग्राहितासँ समुत्साहित भए ई अपनाकें एहि रूपें एहि कार्यमे
संलग्न राखि सकलाह। परन्तु महाराज बहादुर बहुत दिन धरि राज्य नहि कएलैन्हि; ताहूमे
पश्चात हुनक स्वास्थ्य ततेक अधलाह भए गेलैन्हि जे क्रमशः उत्साह क्षीण होअए लगलैन्हि।
रहबो करथि राजधानी मध्य ओ थोड़ काल ओ सार्वजनिक कार्यक संकुलतामे थोड़ समय बचाए
सकथि जखन साहित्यिक चर्चा हो। अतएव कवी•ार आरम्भ तँ कएल बड़ उत्साहसँ ओ
अनुसन्धानक फलक रसास्वाद कए ओहिमे संलग्न रहलाह भरि जन्म, परन्तु हुनका तादृश
केओ पोषक नहि भेटल, सहायक नहि केओ भेल, समर्थक थोड़ लोक भेल, हुनक कार्यक रस
बुझनिहारो बड़ विरल भेल। कवी•ारहिक कार्यसँ मुग्ध भए, हुनकहिसँ प्रोत्साहन पाबि, एहि
शताब्दीक आरम्भमे एतए दड़िभंगामे एक गोट मिथिलानुसन्धान-समितिक सेहो स्थापना भेल
छल जकर प्राण छलाह स्वर्गीय चेतनाथ झा प्रसिद्ध कृष्णजी बाबू ओ मन्त्री छलाह स्वर्गीय बाबू
केशी मिश्र। एकर प्रमुख सदस्य छलाह स्वर्गीय वक्शी जी, गणनाथ बाबू, मुन्शी रघुनन्दन दास,
ओ बाबू तुलापति सिंह साहेब। इहो लोकनि थोड़ काज नहि कएल परन्तु युगे ओ तेहन छल जे
शिक्षितो समाजसँ हिनका लोकनिकें प्रोत्साहन नहि भेटल जकर फलस्वरूप इहो समिति पश्चात्
भग्न भए गेल ओ पाछाँ तँ ई लोकनि अपनहु एकरा "मुर्दा क्लब" कहए लगलाह, कारण,
हिनका लोकनिक संलग्नता पुरान वस्तुक दिशि छल, जीवनक संघर्षसँ ई लोकनि दूर रहैत
छलाह। यदि कवी•ार ततबा पूर्व प्रादुर्भूत भेल रहितथि जे महाराज लक्षमीश्र्वसिहं वहादुरक


राजत्वकालक आदि भागहिमे हिनक अनुसन्धानक फल प्रकाशनीय रहैत अथवा यदि महाराज
बहादूरहिकें से स्वाश्थ्य, अवकाश, ओ अभिनिवेश रहितैन्हि तँ निश्चय ओहन

उदाराशय ओ गुणग्राही प्रभुक ओतए हिनक कार्यक उचित सम्मान होइत, हिनका सहायता
भेटैत, प्रोत्साहन होइत, ओ मिथिलाक स्वरूप आइ दोसर रंगक रहैत, कमसँ कम मैथिलीक
स्नीकृति तँ ताहि दिन भए गेल रहैत ओ जेना हिन्दी हमरा लोकनिक ऊपरमे लादि देल गेल से
धरि तँ नहिए होइत। अथवा यदि कवी•ार पचासो वर्ष पछाति प्रादुर्भूत होइतथि तँ निश्चय
शिक्षाक प्रसारसँ हिनक काजक गुण बुझनिहार बेशी लोक होइत, जनताक दिशिसँ हिनक
काजक समर्थन होइत, हिनक यश एना क्षुण्ण नहि होअए पबितए। परन्तु से तँ भेल नहि।
कवी•ार एकाकी अपन काज करैत रहलाह ओ बड़ थोड़ लोक जे हिनकासँ घनिष्ठ सम्बन्धमे
छल, हिनक प्राप्त छल, सएह टा हिनक कार्यक मर्म बूझि सकल, हिनका प्रोत्साहन दैत रहल।
ओना तँ विशुद्ध अनुसन्धानक मर्म बुझनिहार एखनहु विरले अछि, ताहि दिन तँ सहजहिं गनले
गूथल छल।



ओना तँ कवी•ारक नाम, यश ओ हुनक रामायणक पद सब जहिअहिसँ ज्ञान भेल
तहिअहिसँ सुनैत आएल छी। कवी•ारकें हमरा मातृकसँ बड़ घनिष्ठ सम्पर्क। ओहि युगक प्रायः
बहुतो पैघ पण्डितकें ससे सम्बन्ध, यथा म. म. जयदेवमिश्र, म.म. रज्जेमिश्र, कवी•ार चन्दाझा,
कारण, हमर मातृमातृक गन्धबारि ड¬ौढ़ीसँ बहुतो पण्डितकें पाठावस्थहिसँ जीविका भेटैन्हि तें
कवी•ारसँ हमरा माम लोकनिकें आत्मीयता। रामायणक बहुतो पद तें हमरा अबोधावस्थाहिसँ
अपना माइक मुहसँ सुनल। तथापि कवी•ारक एहि दिशामे कृतित्वक प्रथम आभास हमरा
हिनक रचित महेशबानी-संग्रहक भूमिकामे भेटल जाहिमे हमर माम स्वर्गीय डाक्टर (पछाति
सर) गङ्गानाथझा लिखैत छथि :-



"जाही दिन मिथिलाभूषण कविवर चन्दाझाक मृत्युक समाचार पाओल ताही दिन हम
अपन पूज्यपाद ज्येष्ठ भ्राता स्वर्गीय विन्ध्यनाथ बाबूक ओतए प्रार्थनापत्र पठाओल जे कवी•ारक
गीत ओ मिथिला तथा मैथिल ब्रााहृणक पुरावृत्तक प्रसज़् जे उक्त कवी•ार बहुत लिखने छलाह
तकर संग्रह कराए जाहिसँ ओ सब प्रकाश भए जाए से करैक चाही। हमरा भाइक पत्रोत्तर
आएल जे चन्दाझाक लिखल जे किछु छलन्हि से सब पोथा श्रीमिथिलेशक आज्ञानुसार म.म.
पण्डित परमे•ारझाक "जिम्मा"कएल गेलैन्हि अछि ओ छपएबाक प्रबन्ध करएबाक आज्ञा
भेटलैन्हि अछि। ताही दिनसँ एकर बाट तकैत छी। मिथिला-पुरातत्त्वक विषय कदाचित्
मिथिलातत्त्वविमर्श-रूपें प्रकाशित भेल हो ई सम्भव परन्तु गीतावलीक एखन धरि कतहु पता
नहि।"



ई कथा 1921 क थिक। मिथिलातत्त्वविमर्श पूर्वमे प्रकाशित होअए लागल छल अवश्य,
परञच समग्र तँ इएह चौदह पन्द्रह वर्ष भेलैक अछि छपल अछि। म.म. मुकुन्दझा वक्शीक
इतिहास प्रकाशित भए गेलाक पर एहि मिथिलातत्त्वविमर्शक महत्त्व हमरा हेतु थोड़ रहि गेल
अछि। हमरा वि•ाास अछि जे यदि एकर निर्माण कवी•ारक अनुसन्धानक आधार पर भेल तँ से
कवी•ारक खिष्टाबहीसँ, ओकर टिप्पणी-सबहिक संकलन मात्र कएकें। पूर्णरूपसँ पल्लवित कए
कवी•ार एकरा लिखने नहि छलाह। परन्तु जेहो, कवी•ारक "पोथा" सब की भेल से पता नहि।


हुनक गीतावलीक प्रकाशन राजप्रेससँ एमहर आबि चन्द्रपद्यावलीक नामसँ भेल अछि परञ्च
ओकरो आधार, कवी•ारक पोथा, कतहु दृष्टिपथमे नहि आएल अछि। बूझि पड़ैत अछि जे
जतहि हुनक "पोथा" पड़ल ततहि ओ पड़ले रहि गेल। एकर फल ई भेल जे कवी•ारक यश तँ
विलाइत लागल, समाजक ज्ञानवृद्धिक एक गोट विलक्षण साधन लुप्त भए गेल। एहि "पोथा"
सबमे रज़् विरज़्क वस्तु सज़्हि सज़् भेटत। इतिहास, साहित्य, परिचय, विचार सब कथूक
सम्मिश्रण हिनक अपन रचनाक सज़् सज़् तेनाकें मिझराएल छैन्हि जे सबकें फराक कए प्रकाश
कएला उत्तर ओहिसँ अनेक विलक्षण वस्तुक अवगति भए जाएत। मिथिलाक इतिहासक ई एक
गोट अत्यन्त दुःखद घटना थिक जे कवी•ारक ई "पोथा" सब एहन अनुसन्धानी व्यक्तिक हाथमे
नहि पड़ल जे एहिमे निहित रत्नक सञ्चय करबाक श्रम करितए।



आब बारह वर्षसँ भपर भेलैक, 1950क गप्प थिक, जे कवी•ारक अपन हाथक लिखल
रामायणक

पोथी एवं अन्यान्यो अनेक रचना ओ लेख देश ओ विदेशसँ संगृहीत कए जखन हम एक दिन
स्वर्गीय स्वनामधन्य अमरनाथबाबूकें कहलिऐन्हि तँ ओ बड़े उत्सुकता एवं सन्तोषसँ हमर काजक
विवरण सुनलैन्हि आ कहलैन्हि जे कवी•ारक दू किंवा तीनि गोट पोथा हुनकहु सज़् छैन्हि
जाहिसँ गोविन्दददासक पद सबकें तँ उतारिकें ओ श्रृङ्गार-भजन छपाओल परन्तु ओहिमे
आओरो अनेक विषय छैक जकर सङ्कलन कएलासँ मिथिलाक पुरातत्त्वक कतोक रहस्य
उद्घाटित भए जाएत ओ से ओ ताकिकें हमरा पठाए देताह। अमरनाथबाबू अनेक कार्यमे
अतिव्यस्त रहथि ओ आब तँ एहि लोकमे ओ छथिओ नहि। हम एकरा अपन अकर्मख्यता बुझैत
छी जे ओ पोथा सब हमरा बुतें लेल नहि भेल। परन्तु तावत् हमर साहित्य-गुरु कविशेखर
श्रीबदरीनाथझाजी सएह हमरा कवी•ारक लिखल दू गोट खिष्टाबही देल--इएह डा0 झाक
शब्दमे आब बुझैत छी जे "पोथा" भेल-जे कतोक दिनसँ हुनका सज़् छलैन्हि ओ कतएसँ प्राप्त
भेलैन्हि से हुनकहु स्मरण नहि छैलन्हि। एहिमे एकटामे विद्यापतिक सए डेढ़ेक गीत कवी•ारक
अपना हाथें लिखल अछि जाहिमे शतावधि, विशेषतः नचारी ओ कूट, एखन पर्यन्त अप्रकाशित
अछि। सबसँ महत्त्वक विषय एहि संग्रहमे ई अछि जे ठाम-ठाम एहिमे कवी•ार टिप्पणी लीखि
देने छथिन्ह जे आब पुनि केओ नहि कहि सकैत अछि, तथा कूटक गीत सबहिक अर्थ
लगएबाक सङ्केत अछि। टिप्पणीक एक गोट दृष्टान्त पर्याप्त होएत। मानक प्रसिद्ध गीत
"अरुण पुरुब दिशि बहल सगर निशि"--इत्यादि विद्यापतिक गीतक संग्रहमे देखि अनेक बेरि
मनमे होइत छल जे नगेन्द्रनाथ गुप्तजी एकरा भ्रमसँ विद्यापतिक रचना मानल अछि, ई गीत तँ
पारिजातहरणमे अछि, उमापतिक थिकैन्हि। कवी•ार ई गीत विद्यापतिक भनिताक सज़् अपना
बहीमे लीखि नीचामे टिप्पणी करैत छथि :-



"ई गीत म.म. उमापतिझाक कृत पारिजातहरण नाटकमे उदाह्यत अछि परञ्च शाके
1310क लेख तालीपत्रमे देखल ताहिसौं निश्चित भेल जे कवि विद्यापतिक थिक।"



खेद जे कोन तालीपत्रक लेखमे ई भेटलैन्हि से कवी•ार नहि देलैन्हि परन्तु तैओ एहि
टिप्पणीक कतेक महत्त्व भेल से हम एतए नहि कहए लागब, मैथिली-साहित्यक वेत्ताकें से


कहबाक प्रयोजन नहि अछि। दोसर जिल्दमे रज़्-विरज़्क विषय भरल अछि, अपन खरचओटासँ
लए रचना धरि तथा अनेक ऐतिहासिक व्यवस्था ओ छोट-छोट वात्र्ता एहिमे यत्र-तत्र भरल
अचि। एहिसँ एक गोट मात्र दृष्टान्त एतए देब पर्याप्त होएत। 1891 ई0क 30 दिसम्बरकें
कवी•ार एक मासक फुरसति लए गाम दिशि गेलाह ओ सोनवर्षाक राजासाहेबक ओहिठामसँ
पाता छलैन्हि से नेओत पूरए गेलाह। भरि मासक डाइरी कवी•ार एहि बहीमे लिखलें छथि जे
समस्त पढ़बाक योग्य अछि परन्तु हम ओकर 28 जनवरी 1862 माघ 14 बृहस्पति दिनुक लेख
एतए उद्घृत करैत छी:-



"सोनबरिसासौं श्रीमन्महाराजाज्ञासौं सबारी भेटल। राजीपन्ना आबी, श्रीचण्डीमाताक
दर्शन करी, प्रस्तर एक चौकठि जे पुरान बड़क गाछ मठ बनैक समय काटल गेल छल ताहि
तर उखड़ल जाहि खम्भामे लेख तिरहुता अक्षरमे--


श्रीमन्माहे•ारीवरलब्ध-समस्तप्रक्रियाविराजमान-युद्धेशवंशकुमुदानन्दचन्द्र-
राजश्रीमत्सर्वसिंहदेवारिविजयी ल.सं.200 कतेक छल।"

एहि यात्रामे कतए-कतए वर्ष भरिक पाताक नेओत पूरल, कतए की बिदाइ भेल, कतए
कोन शास्त्रीय चर्चा भेल, कतए कोन कोन तालीपत्रक पोथी देखल, सोनवर्षामे केहन-केहन रम्य
भोजन भेटल इत्यादि विषयक सज़् ई एक गोट शिलालेखक उल्लेख कतेक महत्त्वपूर्ण अछि से
कहबाक प्रयोजन नहि। एहिना कतेक वस्तु एहि पोथामे भरल अछि। अनुमान कए सकैत छी जे
कवी•ारक सबटा पोथाक संग्रह कए सबटामे जे छीटफूट विषय उल्लिखित अछि सबहिक
वर्गीकरण कए सबटा क्रमबद्ध लिखल जाए तँ से कोन रूपक वस्तु

होएत, मिथिला-मैथिल-मैथिलीक पुरातत्त्वक कतेक अन्धकार ताहिसँ दूर भए सकत, कवी•ारक
यश कतेक निर्मल भए देशक अज्ञान-तिमिरकें बिलाए सकत !



प्रथम मैथिलीक क्षेत्रकें लिअ। कवी•ारक अपन रचनाक उल्लेख पूर्वहिं कएल गेल अछि
परन्तु से केवल प्रकाशितक। हुनक कए गोट ग्रन्थ अप्रकाशितो सुनल थिक यथा अहल्याचरित
नाटक। कहल जाइत अछि जे प्रारम्भावस्थामे मिथिला-मिहिरमे ई नाटक छपए लागल छल
परन्तु हम आयासो कएल अछि तथापि से कतहु देखि नहि सकलहुँ। यदि ओ एकर रचना
कएल तँ ओकर लेख कतहु अवश्य होएत, सम्पूर्ण नहिओ भेल होएत तथापि अपूर्ण ओ कोनहु
पोथामे अवश्य होएत। आशा तँ इएह कएल जाए सकैत अछि जे म.म. परमे•ारझाक जिम्मा जे
पोथा सब कएल गेलैन्हि से राजलाइब्रोरीमे हो परन्तु ओतए पचीस वर्षक अवधिमे हमरा
कवी•ारक दू गोट व्यवस्था-पत्र छाड़ि आओर किछु नहि देखलामे आएल। आतएव एहि
नाटकक कोनो पता नहि लगैत अछि। तहिना राजावालीक नाम सेहो सुनलॉमे आएल अछि जँ
एहिमे मिथिलाक राजालोकनिक वर्णन अछि तखन तँ ई मिथिलाक इतिहास भेल। कवी•ारक
एक गोट पोथामे हमरा "मिथिलेतिहास"क प्रारम्भ भेटैत अछि जाहिमे मज़्लाचरणक पश्चात्क
श्लोकमे अछि



सकलगुणनिवासं तीरभुक्तीतिहासं

लिखति सुकृतकर्मा मैथिलश्चन्द्रशर्मा।।




तथा चौपाइसँ आरम्भ कए महाराज जनकक पदवीक हेतु तथा जनक-शब्दार्थक विवेचना
मात्र, मुदा से अंश गद्यमे अछि। एहिसँ भान होइत अछि जे एकर रचना चम्पूक रीतिसँ ओ
करितथि। जँ ओ एहि विषयमे आओर लिखल तँ से कोनहु आन पोथामे होएत। परन्तु एहि
विषयक लेख मिथिलातत्त्व-विमर्शमे आबि गेल हो तँ कोनो आश्चर्य नहि। पुनः सुनैत छी जे
कवी•ार मैथिल-ब्रााहृणक मूलग्रामक वर्णनात्मक निबन्ध लिखने छलाह। मूलग्रामक कहिकें तँ
नहि परन्तु मिथिलाक गामसबहिक परिचय अक्षराक्रमें हिन्दीमे लिखल तीन पत्र मात्र हमरा एक
गोट "पोथा" मे बीचमे राखल भेटल अछि जाहिमे पत्रसंख्या 13-14-15 अछि ओ इजोत, इजरा
बसौली, इजरा कन्दर्प, उमगाम, उफरौली, उसथुआ, ऊटी, ऋगा, एहु, एकमा बभनगामा,
एकमीघाट वागमती नदी, एकहर, ओ ओइनी, बस इएह बारह गोट गामक परिचय अछि।
छीटफूट गामक प्रसज़् लेख अन्यत्रहु भेटल अछि परन्तु क्रमबद्ध इएह तीनि गोट पात भेटल
अछि जाहिमे भाषा हिन्दी ध्यान देबाक थिक। तहिना मैथिलीक छन्दोविषयक कवी•ार विशेषज्ञ
छलाह। एहि प्रसज़् आगाँ चर्चा करैत छी परन्तु ग्रन्थ एहू प्रसज़् कोनो देखलाँमे नहि आएल
अछि।



कवी•ारक रचना, फुटकर गीत, कवित्त, कुण्डलिया प्रभृति अनेको एखन धरि प्रकाशित
नहि भेल अछि। जे "पोथा" प्रकाशमे नहि आएल ताहि मध्यक लिखल रचना पड़ले रहि गेल।
हमर "पोथा" मे तत्समयक देश-दशाक बड़ विलक्षण चित्रण भेटैत अछि। सर्वे सेट्लमेन्टक
समयक हिनक दू गोट कुण्डलिया, हमरा जनैत अप्रकाशित, एतए देखल जाए।



घर घर चिन्ता अन्नको कौन सुनै दुख कान।

ता पै बन्दोवस्त नव भयो चहत भगवान।।

भयो चहत भगवान अमीनी टिट्टी ऐहें।

जमीदार ओ कृषक लोग निर्धन ह्वै जैहें।।

भनत चन्द्र आनन्द कहाँ जिव काँपत थरथर।

भजन भावको छोड़ नापकी चरचा घर घर।।

पटु पटबारी धरमधुज तहसिलदार अमीन।

सत्यधर्मव्रत जगतको इनको दया अधीन।।

इनको दया अधीन तीन वञ्चक नहि होता।

कहीं न लेता घूस स्वामिको स्वत्व न खोता।।

भनत चन्द यह सुखी सदा परवित्तविहारी।

कपट न कागत लिखत होत जो पटु पटबारी।।



एहि दूहू कुण्डलियाक भाषा मिथिलाक हिन्दी थिक। एहिना पुरुषपरीक्षाक भूमिका
हिन्दीमे अछि, रामायणहुमे किछु अंश एही हिन्दीमे अछि, मिथिलाक गामसबहिक परिचय सेहो
एही हिन्दीमे कवी•ार लिखए लागल रहथि। एकर कारण स्पष्ट अछि। कवी•ारक रचना काल
धरि अर्थात् महाराज लक्ष्मी•ारसिंहक राजत्वकालमे हिन्दी एतएक भाषा निर्धारित कए देल गेल
छल। हिन्दी एतए केहन छल तकर प्रमाण हिनके गद्य ओ पद्य अछि परन्तु व्यापकरूपें अपन


रचनाक प्रचार हो तदर्थ कवी•ारकें हिन्दीक शरण लेअए पड़ल। कोट्र्स आफ वाड्र्सहिक
समयमे राजदरभंगाक व्यावहारिक भाषा हिन्दी भए गेल छल। महाराजकुमार बाबू गुणे•ारसिंह
साहेब जे शुभङ्करपुरमे विशाल मन्दिर बनबाओल तकर शिला-लेख हिन्दीमे अछि। व्रजभाषाक
प्रचार राज-दरबारमे पूर्ण छल ओ जे नहिओ जनैत छल सेहो एहि भाषामे बजबाक हेतु वाध्य
होइत छल। भाषाक क्षेत्रमे हमरालोकनिक दुर्दशाक आरम्भे हिनकहि समयसँ होइत अछि ओ जे
कथा हम पूर्वहुँ कहि आएल छी महाराज लक्ष्मी•ारसिंह बहादुरक समयसँ पूर्वक शतावधि वर्ष
मिथिलाक संस्कृतिक हेतु ह्यासक युग छल। हिनके भाषा एहि कथनक ज्वलन्त उदाहरण थिक
जे मिथिलाक भाषा हिन्दी कहब कतेक न्याय्य भेल ओ एखनहु थिक।



ई तँ भेल हिनक अपन रचना। प्राचीन मैथिली-साहित्यक ई केहन ज्ञाता छलाह ओ
ताहि क्षेत्रमे हिनक अनुसन्धान कोन रूपक स्तुत्य छल तकर आभास निम्नलिखित उद्धरणसँ
होएत जे स्वर्गीय नगेन्द्रनाथगुप्तजी अपन विद्यापति-पदावलीक भूमिकामे लिखैत छथि--



"किन्तु यिनि सकलेर अपेक्षा आमार कृतज्ञता-भाजन, याँहार सहायता ना पाइले एइ
ग्रन्थ प्रकाश करा असम्भव हइत, तिनि इहलोक त्याग करिया गियाछेन। स्वर्गीय कवी•ार
चण्डाझा (चन्द्रकवि) विद्यापतिर पदावली सम्बन्धे अद्वितीय तत्त्वविद् एवं अर्थपारदर्शी ओ
मिथिला-भाषाय स्वयं सुकवि छिलेन। यखन आमि पदावलीर सम्पादन आरम्भ करि तखन ताँहार
वयस 75 वत्सर तथापि तिनि असीम उत्साहेर सहित एइ कार्य योगदान करेन। पदावली संग्रह
करा, कठिन शब्दादिर अर्थ प्रभृति सकलइ तिनि करेन। विद्यापतिर भाषाय तिनि आमार
शिक्षागुरु।"



नगेन्द्रनाथ गुप्तहुसँ पूर्व स्वर्गीय शारदाचरणमित्र महाशयक सज़् कवी•ार घुमल छलाह,
विद्यापतिक पद एकत्र कएने छलाह, ओ विद्यापतिक अपना हाथें लिखल भागवतक पोथी
मित्रमहाशयकें देखाए हुनक सन्देह दूर कए देने छलाह जे विद्यापति मैथिल छलाह अथवा
बङ्गाली ! तथापि विद्यापतिक कतेको पद एखनहु कवी•ारक पोथामे भेटल अछि जे अद्यापि
प्रकाशित नहि अछि। परन्तु से केवल विद्यापतिहिक टा कहाँ? गोविन्ददासझाक गीतक प्रथम
सङ्कलयिता इएह थिकाह, महन्थ साहेबरामदासक रचनाक संगृहीता इएह थिकाह से कथा
हम पूर्वहिं कहि आएल छी। पुनि, विद्यापतिक पदावलिहिक टा नहि, विद्यापतिक प्रायः समस्त
रचना हिनका उपलब्ध भए गेल छल। लिखनावलीक प्रकाशन जे स्वर्गीय म.म.डा. गङ्गानाथझा
एतएसँ कराओल ताहिमे हिनके हाथ छल। विद्यापतिक कीर्तिलता नेपालसँ आनि म.म.
हरप्रसादशास्त्री जे बज़्लामे प्रथमहि छपाओल ताहिसँ बीस वर्ष पूर्वहिं 8 फरवरी 1905 ई0कें
कलकत्तामे कवी•ार ओकरा अपना हाथें

लीखि महामना ग्रिअरसनसाहेबकें देल दे सम्प्रति इण्डिआ आफिसक लाइब्रोरीमे अछि ओ जे
देखला उत्तर कीर्तिलताक प्रकाशित संस्करण सब तुच्छ बुझि पड़ैत अछि। हँ, कीर्तिपताकाक
पता हिनका नहि छल ने गोरक्षविजय नाटकक ओ ज्योतिरी•ार ठाकुरक वर्णरत्नाकरक सेहो
दर्शन नहि भेल छल यद्यपि एहू, प्रसज़् एतबा हिनका ज्ञात छल जे हुनक एक गोट गद्यग्रन्थ
खण्डित रूपमे कतहु अछि। लोचनक रागतरङ्गिणीक प्रतिलिपि ई अपना हाथें शाके 1810
पौषकृष्ण पञ्चमी सोमकें ठाढ़ीमे कएने छलाह जे पुस्तक हमरा एखन पर्यन्त हस्तगत नहि भेल


अछि परन्तु ओकर प्रतिलिपि बाबू श्रीगङ्गापतिसिंह साहेबक कएल हमरा सड़ग अछि ओ जकर
उपयोग पटना वि•ाविद्यालयसँ जे रागतरङ्गिणी प्रकाशित भए रहल अछि ताहिमे कएल गेल
अछि। रामायणक अन्तमे जे सँएतालीस गोट मिथिलाभाषाक कविक नाम उल्लिखित अछि
ताहिमे बहुतोक तँ कृतिक नाम समेत देल अछि ओ ताहिमे कए जनक परिचय ठाम ठाम हिनक
लिखल देखि पूर्ण वि•ाास होइत अछि जे ई प्रायः ओहि सब महापुरुषक परिचय जनैत छलाह
ओ सबहिक रचना देखने छलाह, नहि तँ ई नाम सब ओ कोना दितथि। हमरालोकनि एखनहु
ओहिमे कतोकक कोनो पता नहि जनैत छी। डा0 श्रीजयकान्तमिश्रजीक इतिहासमे ओहि सूचीक
कए जनक कोनो परिचय अथवा उल्लेख समेत नहि अछि। एतावतैव सिद्ध अछि जे
वर्णरत्नाकर, कीर्तिपताका ओ गोरक्षविजयक किछु विशेष परिचय छाड़ि कवी•ारक समयसँ
अद्यपर्यन्त मैथिली-साहित्यक इतिहासक अनुसन्धान मध्य कोनो प्रगति नहि भेल अछि। एहि
पचास-साठि वर्षमे हमरालोकनि एहि दिशामे किछुओ नव काज नहि कएल अछि प्रत्युत
कवी•ार जे किछु विनु लिखलें चल गेलाह से ज्ञान नष्टे भए गेल। खेद एतबए जे मैथिलीक
प्राचीन साहित्य जे हिनका उपलब्ध छल से ई प्रकाशित नहि कए सकलाह? परन्तु लिखलो
हिनक की सब अछि से सबटा कहाँ जनैत छी? तथापि जएह प्रकाशित अछि अथवा उपलब्ध
अछि ततबहुसँ ई कहबामे कनेको तारतम्य नहि होइत अछि जे मैथिली-साहित्यक ज्ञाता एहि
शताब्दीमे कवी•ारसँ पैघ दोसर नहि भेल अछि; मैथिली-साहित्यक अनुसन्धान कार्य आइधरि
हिनकासँ अधिक दोसर नहि कए सकल अछि; मैथिली-साहित्यक विकासक मार्गमे हिनकासँ
अग्रसर आइ धरि दोसर नहि रहल अछि।



दोसर विषय अछि मैथिलीक छन्द, जकर ज्ञाता, जकर तत्त्वक वेत्ता एमहर कवी•ारसँ
पैघ दोसर नहि भेल अछि। केवल रामायणमे ओ गीतकें छाड़ि गोट अस्सिएक छन्दक प्रयोग
कएलें छथि जाहिमे संस्कृत ओ प्राकृत दुहूसँ रज़् विरज़्क छन्द सबहिक दृष्टान्त संकलित
अछि। हिन्दी-साहित्यमे कवि केशवदास अपन रामचन्द्रिकामे छन्दक विन्यास देखओलें छथि
परन्तु कवी•ारक विन्यास हुनकासँ विशेष ह्यद्य अछि। केशवदास बड़ शीघ्रतासँ छन्दक परिवत्र्तन
करैत छथि जेना हुनका इएह प्रदर्शित करब इष्ट रहैन्हि जे हम छन्दक कतेक प्रभेद जनैत थी।
कवी•ार अपन रामायणमे मुख्यतः चौपाइक प्रयोग कएलें छथि परन्तु मध्य मध्यमे स्वरभेदक
उद्देश्यसँ आन छन्दक प्रयोग कए ओ अपन पाण्डित्य एहि रूपें प्रदर्शित कएल अछि जाहिमे
कृत्रिमताक भान नहि होइत अछि मुदा ळ्र्ज़्र्•ििं सज़् एहि विषयमे हुनक कौशल ओ उत्कर्ष सेहो
स्पष्ट भए जाइत अछि। एहि विषयमे हिनक पाण्डित्यक प्रकर्ष देखि ई सर्वथा सज़्त बूझि पड़ैत
अछि जे ई मैथिलीक छन्दोविषयक कोनो निबन्ध सेहो लिखने होथि ओ से यदि उपलब्ध होइत
तँ ताहिसँ मिथिला-भाषाक छन्दहिक टा नहि अपितु मैथिल सङ्गीतहुक प्रसज़् बहुत रास रहस्य
प्रकट भए जाइत। मैथिलीक हेतु ई बड़ महत्त्वपूर्ण विषय अछि ओ केवल रामायणहिक छन्दक
आधार पर यदि मैथिल छन्दक मूलतः अध्ययन कएल जाए तँ से एक गोट बड़ विशिष्ट वस्तु
होएत। रामायणमे अनेको ठाम छन्दक उल्लेखक सज़् सज़् भेटैत अछि, मैथिलसङ्गीतानुसारेण,
लोचनशर्ममतानुसारेण, ओ तखन रागक नाम सएह छन्दहुक नाम देल अछि। यथा, चौपाइक
नामान्तरमे मैथिल रागक एहि पंद्रह गोट नामसँ छन्दक सेहो नाम कहल अछि:--पर्वतीय बराड़ी
छन्द, केदार केदारीय, श्रीमालव, सरसासावरी, द्राविड¬ासावरी, शुद्द मलारीय, शंकुकनाटीय
मिथिलागौड़मालव, घनछी शाम्भवी, देवकामोद, मंगलराजविजय, धनछी पञ्चस्वरा, योगिआ


मालव, कामोदनाट, ओ जयकरी। तहिना हरिपदकें श्रीछन्द, नेपाल वराड़ीय, देवराजविजय,
प्रियतमा मालव ओ वसन्त ई पाँच गोट नामान्तर अछि। दोबयकें शुद्ध

कोडारी, रूपक घनाक्षरीकें कानरा राजविजय एवं रूपमालाकें केदारमालवीय सेहो कहल अछि।
मिथिलामे सङ्गीतक परम्परा अपन भिन्ने छल, स्वतन्त्र छल ओ से आइ छओ सए वर्ष सँ आबि
रहल छल। एमहर कतोक दिनसँ से परम्परा टूटि गेल अछि। लोचनक रागतरङ्गिणी ओ
रागसर्वस्व एहि प्रसज़्क प्रायः अन्तिमे ग्रन्थ थिक। रागक आनो ग्रन्थ नेपालमे अछि जकर
अध्ययनसँ सम्भव थिक जे मैथिलसड्गित-शारुाक उद्धार भए सकए। एहिमे कोनो सन्देह नहि
जे कवीश्र्वर रागतरड्गिणीक तत्त्वकें जनैत छलाह ओ तद्द्वारा मैथिल सङ्गीत-शास्त्रक मर्मक
वेत्ता छलाह। हुनक लेखसँ इएह प्रकट होइत अछि जे मैथिली गीतक छन्दक रीति सङ्गीतक
अनुसार छल, रागहिक नामसँ छन्दहुक परिचय भए जाइत छल। परन्तु एकहि छन्दमे पन्द्रह
पन्द्रह गोट रागक समावेश कोना होइत अछि ओ तखन ओकर छन्दहुक पंन्द्रह पंन्द्रह गोट नाम
कोन कार्यक ई विषय समाधेय भए जाइत अछि। सङ्गीतक हम वेत्ता नहि छी अतएव एहि
प्रसज़् किछु कहब अनधिकार चेष्टा होएत। मिथिलाक जे प्राचीन सङ्गीत-परम्परा छल से प्रायः
नष्ट भए गेल ओ तकर पुनरुद्धार कार्यमे जँ कओ तत्पर होएताह तँ हमरा दृढ़ वि•ाास अछि जे
हुनका केवल रामायणहिटासँ नहि अपितु कवी•ारक आनहु आन रचनामे निर्देशित राग ओ
छन्दक उल्लेखसँ ओ तकर विवेचनासँ बड़ उपकार होएतैन्हि।



एवं कवी•ारक यथार्थ प्रतिभा ओ कठोर कर्मठता सबसँ विशेष मैथिलीक साहित्यहिक
क्षेत्रमे द्योतित होइत अछि, कारण, हिनक समस्त कार्य-जातक प्रत्यक्ष फल एही क्षेत्रमे सबसँ
विशेष परिलक्षित होइत अछि। परन्तु हिनक अनुसन्धानक क्षेत्र एतबहि धरि सीमित नहि छल।
मैथिलक इतिहासक, ओकर पुरावृत्तक, सेहो ई पूर्णरूपेण अनुसन्धान करैत रहलाह तथा
महामहोपाध्याय डा0 गङ्गानाथझाजीक जे उक्ति हम आदिअहिमे उद्घृत कएल अछि ताहिसँ
स्पष्ट अछि जे मैथिल ब्रााहृणक पुरावृत्तक प्रसज़् ई बहुत लिखने छलाह। इहो परम्परया श्रुत
अछि जे मैथिलब्रााहृणक मूलग्रामक विचारात्मक निबन्ध जकरा मैथिलब्रााहृणक इतिहास सेहो
कहि सकैत छी कवी•ार लिखने छलाह। मिथिलाक गामक परिचय-विषयक हिनक लेखक तीनि
गोट पात जे हमरा उपलब्ध भेल अछि तकर चर्चा हम पूर्वहिं कएल अछि। ताहिसँ भिन्न एहि
प्रसज़् विशेष किछु प्रकाशमे नहि आएल अछि। रामायणमे कवि लोकनिक उल्लेख परिचयक सज़्
नहि अछि। केवल पुरुषपरीक्षाक अनुवादमे टिप्पणीक रूपमे किछु परिचय भेटैत अछि परञ्च
ताहिसँ ई दृढ़ भए जाइत अछि जे मैथिल ब्रााहृणक इतिहासक अनुसन्धानमे ई ताहि मार्गक
अवलम्बन कएलें छलाह जाही द्वारा ओकर यथार्थ अनुसन्धान भए सकैत अछि। से थिक
मैथिलब्रााहृणक पञ्जी। एहि छओ सए वर्षमे मैथिल ब्रााहृणक परिचय मूलग्रामहिसँ देल जाइत
अछि ओ एमहर हमरा केवल कवी•ारहिक लेखमे ई भेटल अछि जे परिचयमे मूलग्रामक
उल्लेख अवश्य रहैत अछि। उदाहरणार्थ, गोसाञि साहेब-रामदाससँ लए महन्थ वंशीदास धरि
पवाढ़ी स्थानक छबो गोट महन्थक परिचय प्रकाशित अछि। पुरुषपरीक्षामे इन्द्रजालविद्यकथामे
सिम्बलिवनक परिचयमे देल बलिराजगढ़ ओ ताहि सज़् हरिअम्बकुलक भिन्न भिन्न शाखा एवं
तत्तद्कुलोद्वव महापुरुषक वर्णन थोड़मे हिनक एहि विषयक ज्ञान-भण्डारक निदर्शनस्वरूप
बुझबाक थिक। हिनक एक गोट पोथामे एहि प्रसज़् दू गोट बड़ अद्भुत कथा भेटल अछि।
प्रथमतः ई "सुकविचरितामृत" नामसँ प्राचीन मैथिल कविलोकनिक परिचय लिखए लागल


रहथि,कतेक लिखलैन्हि से तँ सब पोथा भेटलहि उत्तर बुझल भए सकैत अछि। हमरा पोथामे
नलचरित-नाटककर्ता गोविन्दक परिचय लिखल अछि। आगाँ प्रायः दोसर पोथामे लिखल भेटए।
परिचयमे "दिघबे" मूलक परिचयमे ई लिखैत छथि:-



"ई वंश दीर्घघोष, दीर्घोदय, दिघबै ब्रााहृण मैथिल छलाह। शाण्डिल्य गोत्र। पटना
राजधानी छल ताहि समयमे दीघबाड़ामे साग्निक ब्रााहृण छलाह, जे गङ्गातटक उत्तर
शालग्रामीक पश्चिम प्रदेश ओ सरयूक पूर्व भागमे अछि, जे देश अद्यपि छपरा--सारनि विख्याति
अछि। तात्पर्य, छपरा नाम षट्परा, षट्कर्मकत्र्ता लोकनिक निवास भूमि। सारनि शब्दार्थ--अरणि
खदिरकाष्ठ-रचित अग्नि उत्पन्नार्थ वस्तु से सहित देश। ताहि ठाम अम्बिका भगवती अधिष्ठात्री
अद्यापि छथि ओ अत्युच्च दुर्गाकार दीर्घबाड़,--अग्निहोत्र स्थान।"



तहिना वररुचिक परिचयक प्रसज़्मे ई लिखैत छथि जे विक्रमादित्यक दायाद भरक्षत्रिय
मिथिलामे आएल ओ कलिगाममे (जे गाम दरिभङ्गासँ कोस तीनिएक पश्चिम अछि) ओकर
केन्द्र छल। बौद्धक आक्रमणसँ कलिगाम छोड़ि ओ सब पूब दिशि पड़ाएल ओ जाहि तप्पा अथवा
परगन्नामे पसरि गेल तकर नाम भेल "भरोड़ा" ओ मिथिलामे जाहि जाहि गाममे ओकर निवास
भेल तकर नाममे "भर" लागल यथा भराठी, भरौली, भड़ोड़ा, भौर, भौड़ा, भराम, भरथुआ,
भरहो इत्यादि। एहि रूपें गामक व्युत्पत्ति कए कए तत्तत् स्थानक प्राचीन इतिहासक ऊहि करब,
हिनक वैशिष्ट¬ अद्भुत छल।



एहि प्रसज़् एक गोट आओर लेख जे हमरा भेटल अछि से अपूर्व महत्त्वक अछि।
भामतीकार वाचस्पति मिश्र दार्शनिक--जनिका वृद्ध वाचस्पति कहैत छिऐन्हि--मैथिल छलाह से
सब मानैत छी परन्तु पञ्जीप्रबन्धसँ बहुत प्राचीन थिकाह तें ने हुनक अपन परिचय भेटैत अछि
ने हुनक आश्रय महाराज नृगक कोनो पता अछि। हिनका प्रज़् कवी•ारक लेख एक गोट पोथामे
एहि रूपें "बड़गाम" गामक परिचयक क्रममे भेटल अछि :-



"कपरौती प्रगन्ना निशङ्कपुरकूड़ा-श्रीचण्डीदेवीसँ डेढ़ कोस पूर्वभाग



बड़गाम

कुण्डलिया

बरसम बरइठ बसनही बेलइठ ओ बड़गाम।

बलिया बड़िवन बथनहा श्रीवाचस्पतिधाम।।

श्रीवाचस्पतिधाम पाठशाला अगद्वारी।

निकट बोआरि बुधाम नाम यह गाम है भारी।।

गुप्तनृपतिको राजकाज यज्ञादिम सत्तम।

भनत चन्द्र नृगभूप भये कलिमे श्रीवर-सम।।



अगद्धारी एक बहुत उच्च डीह मौजे बड़गामसौं उत्तर ऐशान कोन बसनहीसौं नैत्र्र्मृत


कोनमे अछि। पूरा कोस नहि होएत। सएह किंवदन्ती अछि जे वृद्ध वाचस्पतिक पाठशाला
थिक।



ओ वाचस्पति राजा नृगक समय छलाह जे राजा गुप्त-वैद्यवंशी छलाह। ओ प्राचीन
मिथिलामे जतए अग्निहोत्री लोक रहथि ताहि ठामक नाम "बाट" यहन यथा क्रथबाड़, सिंहबाड़,
वसुबाड़ इत्यादि। तथा मङ्गुबाड़। इहो डीह चिह्नित अद्यापि अछि, यद्यपि सह्राद्रि खण्डमे
राजा मङ्गुक कथा अछि से क्षत्री लोकक, मिथिला-देशान्तर्गत नहि अछि।"



एहि लेखमे कुण्डलियाक भाषा हिन्दी दृष्टव्य। स्पष्ट अछि जे कवी•ार गाम सबहिक
परिचय एहिना कुण्डलियामे लिखए चाहैत छलाह जाहिमे नाना मैथिल मनीषीक परिचय
ख्यापित करितथि। एकर प्रचारकें व्यापक बनएबाक हेतु एकर भाषा ओ हिन्दी राखल। कतेक
एहन परिचय ई लिखलैन्हि से बुझल नहि होइत अछि। स्थानक परिचयक हेतु ई तत्प्रान्तीय
ग्रामावलीक उल्लेख करैत छथि जाहिसँ स्पष्ट अछि जे ई ओ सब गाम अपना आँखिएँ देखने
छलाह नहि तँ एहन परिचय नहि दए सकितथि। गामक नामक व्युत्पत्तिक प्रसज़् हिनक ऊहि
यथा "बाड़"कें "बाट"सँ मिलाएब ओ तकरा अर्निहोत्रीक वासस्थान कहब चमत्कारक छल।
परञ्च एहि सज़् अप्रासङ्गिक विषयकें जोड़ि देबाक अभ्यासकें हमरा लोकनि दोष कहब, कारण
"बाट" बला कोनो विषय एतए उपस्थित नहि छल। मुदा एहि रूपक परिचयक सङ्कलन करब,
किंवदन्तीकें एना पड़िकें ताकब

ओ तकर एहि रूपें स्थाननिर्देश करब साधारण अनुसन्धानक काज नहि थिक ! खेद जे एकर
सङ्कलन नहि भए सकल अछि, प्रायः आब भैओ नहि सकत। एहिना महाराज शिवसिंहक
मन्त्री सुप्रसिद्ध कायस्थकुलभूषण कवि अमृतकरक परिचय कवी•ार दैत छथि।



"अमृतकर नामक मैथिल कायस्थ राजा शिवसिंहक मन्त्री छलाह जे चनौर अमरावती
जिला दड़िभङ्गाक निवासी छलाह जनिक निवासस्थान अमीडीहसौं अद्यपि विख्यात अछि। उक्त
डीह महादेइ पोषरिसौं निकटहिं पश्चिम अछि। महादेवीपोषरि तौं मनीगाछीसों दक्षिण पर्वताकार
भीड़सौं दृश्य अछि।"



परन्तु एहि सज़् इहो कहि देब आवश्यक अछि जे परिचयमे कवी•ार अनेक ठाम भ्रम
सेहो कएल अछि ओ एहि दिशामे सर्वप्रथम अनुसन्धानकत्र्ताक हेतु से कोनो आश्चर्यक विषय
नहि। एकर प्रधान कारण ई छल जे पञ्चीक आधार पर मैथिल मनीषीक परिचय संग्रह आरम्भ
तँ ओ कएल परञ्च पञ्जीक विशाल साहित्यक कोनो अंश हुनका उपलब्ध नहि भए सकल ओ
तें ओ ताहि साहित्यक स्वयं अनुशीलन कए परिचयक संग्रह नहि कए सकलाह। केवल
पञ्जीकारक मुहसँ सूनि तखन ओ एहि रूपें एतेक परिचय देल हमरा तँ इएह आश्चर्य प्रतीत
होइत अछि। एहि प्रसज़् एक गोट दृष्टान्त पर्याप्त होएत। नलचरित्रनाटककारकें ई
सोदरपुरमूलक कहैत छथि से भ्रम थिकैन्हि। गोविन्दठाकुर अपन मूल नहि कहलें छथि परञ्च
अपन प्रपितामह धरिक नाम कहलें छथि ओ पञ्जीमे हमरा हुनक परिचय भेटि गेल अछि जे
डा0 श्रीजयकान्त मिश्रजीक इतिहासमे उद्धधृत अछि। सोदरपुर-मूल बड़ प्रसिद्ध अछि ओ से


थिक सिंहाश्रम मूलक शाखा। कवी•ार कहैत छथि जे सिंहाश्रम प्रतिसरामूलक शाखा थिक ओ
प्रतिसरा दीर्घघोषक, जाहि वंशक एक उज्ज्वल मणि वररुचिमिश्र छलाह। ई चारू मूल,
सोदरपुर, सिंहाश्रम, प्रतिसरा ओ दीर्घघोष, शाण्डिल्यगोत्र थिक ओ तें चारू मूलतः एकहि
कुलक शाखा हो ताहिमे कोनो विरोध नहि भए सकैत अछि। एहि कुलमे एक जन महापुरुष
हलायुध भेल छथि ओ हलायुध सोदरमूलक बीजी पुरुष पञ्जीमे कथित छथि। कवी•ार स्वयं ई
कथा नहि कहलें छथि; हमरा हुनक लिखल एहि प्रसज़्क व्यवस्थापत्र सेहो उपलब्ध भेल अछि
ओ वारंवार हुनक पोथा सबमे एहि विषयक चर्चा भेटल अछि; परन्तु कवी•ारक एहि परिचयक
आधार पर सोदरपुरमूलक बीजी पुरुष हलायुधकें ब्रााहृणसर्वस्वकार हलायुध कहब असज़्त।
कवी•ार जाहि हलायुधक परिचय दैत छथि से छलाह शाण्डिल्यगोत्र ओ ब्रााहृणसर्वस्वकार ओही
ग्रन्थक उपोद्धातमे अपनाकें वत्स्यगोत्र कहैत छथि। अतएव केवल नामक साम्यसँ व्यक्तित्वक
निर्धारण भ्रमाह भए जाइत अछि। एकर सबसँ पैघ दृष्टान्त विद्यापति छथि। मिथिलामे एहि
नामक अनेक व्यक्ति भए गेल छथि ओ तीनि गोट विद्यापतिक तँ रचना समेत उपलब्ध अछि।
स्वयं महाराज शिवसिंहक दरवारमे दू गोट विद्यापतिठाकुर छलाह, एक बिसैवार विद्यापतिठाकुर
महाकवि, दोसर निकुतिवार विद्यापतिठाकुर, महाराजक •ाशुर।



परन्तु एहि भ्रम सबसँ कवी•ारक अनुसन्धानक महत्त्व कनेको न्यून नहि होइत अछि !
के मनुष्य भ्रम नहि करैत अछि? अनुसन्धानक क्षेत्रमे पूर्वगामी कार्यकत्र्ताक भ्रम सर्वथा क्षन्तव्ये
होइत अछि, परवत्र्ती कार्यकत्र्ताक ई कत्र्तव्य होइत अछि जे पूर्वक भ्रमकें शोधित करी। हमरा
एतबए प्रतिपाद्य अछि जे मैथिल ब्रााहृणक पुरातत्त्वक प्रसज़् कवी•ार अन्त धरि अनुसन्धान करैत
रहलाह मुदा से कतहु क्रमबद्ध प्रकाशित नहि भए सकल तें एहि विषयक हुनक ख्याति
दिनानुदिन लुप्त भए रहल अछि। यदि हुनक पोथा सबसँ ताकि ताकि एहि विषयक हुनक
सबटा लेख एकत्र कएल जाए तँ नहि क्रमबद्ध तथापि अग्रिमक अनुसन्दिधित्सुक हेतु ओ बड़े
विलक्षण मार्गदर्शक सिद्ध होएत।

परन्तु कवी•ारक ओ ख्याति जे काल बितलहु उत्तर कम नहि भेल अछि ओ प्रायः
जाधरि मिथिलाभाषा रहत ह्यास दिशि नहि होएत ओ थिक हिनक कवित्वक ख्याति। मैथिलीमे
एतेक कविता दोसर नहि केओ रचलक। हिनक रामायण हिनका अमर कए देलक। परन्तु
हिनक कविता मैथिलीक कविताक प्राचीन परम्पराकें

छोड़ि एक गोट नव मार्गक अनुसरण कएलक ओ तें हिनका मैथिलीक कविताक क्षेत्रमे नवयुगक
रुाष्टा कहब कनेको अयुक्ति नहि। परन्तु लोककें से मानबामे विलम्ब भेलैक ओ आरम्भमे जे
हिनका कवी•ार कहए लागल से उपहासक दृष्टिसँ। मिथिलाभाषामे कवी•ार भाटकें कहल
जाइत छल ओ हिनका कवी•ार कहबाक तात्पर्य छलैक जे ई कविता नहि रचैत छथि, फकड़ा
बनबैत छथि। कविवर हर्षनाथझाक कविताक सज़् हिनक कविताक तुलना करब तँ स्पष्ट होएत
जे विद्यापतिक सम्प्रदायक अन्तिम महाकवि हर्षनाथझा अपन कविताक भाषाकें ततेक संस्कृत-
निष्ठ बनाए लेल जे ओ एकवर्गीय भए गेल, केवल पण्डितक बोधगम्य भए रहल। कवी•ार
अपन कविताक भाषाकें जनसाधारणक भाषा राखल जे काज किछु किछु मनबोध कएने छलाह
परन्तु पूर्ण नहि कए सकलाह। वस्तुतः मिथिलाभाषाक साहित्य जनसाहित्यक रूपमे चलल ओ
जन-साहित्यहिक रूपमे ओकर प्रसार ओ प्रचार होएत। वर्गीय बनओने ई भाषा ह्यासोन्मुख भए
जाएत। वस्तुतः कवी•ारक पद्यक भाषा गद्यक भाषासँ भिन्न प्रकारक किञ्चितो नहि अछि।


1905 ई0 मे मैथिली-हितसाधनक नामसँ मैथिली मासिक पत्रक प्रकाशनक आयोजन जखन
जयपुरमे होइत छल तखन कवी•ारकें सहयोग-याचनाक एक गोट पत्र ओतएसँ पण्डित
चन्द्रदत्तझा लिखलें छलथिन्ह। तकर उत्तर कवी•ार 15 जनवरीकें कवितामे देल। एहिमे भाषाक
चमत्कार द्रष्टव्य:- लिखल जाय मिथिला इतिहास--नहि हो ताहिमे शिथिल प्रयास। विषय
विशेष हमहु लिखि देब--स्वप्नहु एक टका नहि लेब। गुणरत्नाकर थिक जयपूर--आग्रह ग्रह नहि
एको क्रूर। पण्डित सभ्यक नियत निवास--बहुत पड़त नहि अनकर आस। पत्र बहुत जन हर्षित
लेत--नियमित मूल्य पूर्व दए देत। मासिक मिथिला पत्र प्रचार--मैथिल भाषें विहित विचार। सभ
तकइत अछि पत्रक बाट--पौषक दिवस रहल अछि खाँट। नमस्कार लिखइत छथि चन्द--सत्वर
लिखब कुशल आनन्द।



इएह थिक हिनक कविताक भाषाक दृष्टान्त ओ हिनक जे कविता देखब सबमे,
रामायणमे, गीत-कवित्तमे, पुरुषरीक्षाक अनुवादमे, भजनमे, शान्तिपदमे, देशदशावर्णनमे,
महेशवानीमे, नचारीमे सर्वत्र इएह भेटत। एहिमे कतहु कतहु नीरसता अवश्य आबि जाइत
छैक, पद शुष्क सन प्रतीत होइत छैक, परञ्च से तँ पण्डिताम जे भाषा संस्कृत-बहुल ताहूमे
कतहु कतहु कृत्रिमताक बोध होअहि लगैत छैक। प्रशंसनीय तँ थिक हिनक कवितामे भाषाक
सरलता, स्वच्छता, कोमलता, ओ तखन फेर व्यज़्य ध्वनि आदिक चमत्कार। एकरा फकड़ा कहू
परञ्च एहन फकड़ो लिखबाक प्रतिभा होइत छैक ओ से कवित्व-प्रतिभा कवी•ारकें प्रचुर मात्रामे
छल।



तहिना प्राचीन परम्पराक अनुसार श्रृङ्गारक कविता सेहो कवी•ार बड़ थोड़
लिखलैन्हि। गीतिसुधामात्रमे किछु तिरहुति ओ नायिका सबहिक वर्णन अछि नहि तँ हिनक
रामायणमे श्रृङ्गार रसक सर्वथा अभाव अछि ओ अन्यान्यो जे सहरुाावधि हिनक पद अछि
ताहिमे गनले गूथल श्रृङ्गारक पद होएत। जेहो श्रृङ्गारक कविता ई लिखल ताहिमे बड़ झापल
कथा अछि, उत्कट श्रृङ्गारक कविता तँ हिनक एखन पर्यन्त दृष्टिगोचर नहि भेल अछि।
उदाहरणार्थ संयोगक,



अषाढ़मे नवीन मेघ-नीलिमा निहारि,

वृथाभिमान सौख्य-हानि चित्तमे विचारि।

लती जकाँ लपट्टि जाउ कन्त गाछ डारि,

परस्पराभिलाष पूर होउ धन्य नारि।।

अथवा वासकसज्जा, यथा

अटारि की अहाँक की अहाँक ई पलज़्,

प्राणनाथसौं विरोध प्रीतिपुञ्ज भज़्।।

की अहाँक ज्ञान की युवत्व जोर अज़्,

शीघ्र गर्व सर्व हारि कन्त अज़् सज़्।।

अथवा सौन्दर्यगर्विता गुप्ता यथा

मदान्ध भृज़् हाथसौं हटाय नै हटैछ,

सुगन्धि-पूर दूरसौं शरीरमे सटैछ।


मुखारविन्द-भ्रान्ति ओठ आबिकें चटैछ,

वृथा कलङ्क अङ्क मोर लोकमे पटैछ।।



एतबहुसँ ई कथा तँ स्पष्ट भए जाइत अछि जे विद्यापतिक समयसँ कविताक जे एक
गोट परम्परा, एके गोट परम्परा आबि रहल छल, तकरा छोड़ि कवी•ार कविताक रचनामे एक
गोट नवीनता आनल जकरा हम आत्माभिव्यक्तिमूलक कहब, स्वानुभूति-प्रकाशन कहब। की
श्रृङ्गारक गीत हो की भगवतीक, गङ्गाक गीत हो वा नचारी, विद्यापति जहिना कहि गेलाह
तहिना कहबाक रीति इएह छोड़ल। आदिमे, यथा विद्यापतिकें, एहिमे अपन ह्यदयक उद्गार,
भावनाक उद्रेक, अनुभूतिक अभिव्यक्ति छलैन्हि, किएक तँ, तावत ई मार्ग हुनका हेतु नवीन छल,
परञ्च क्रम क्रम ई मार्ग ततेक पुरान भए गेल जे कविता कविक भावक अभिव्यक्ति नहि रहल,
कविता रचबाक जे परम्परागत शैली छल तकर अनुसरण मात्र रहि नितान्त कृत्रिम भए गेल।
फलतः पुरान कविलोकनिक कविता सब एकहि रज़्क लगैत अछि भावमे, भाषामे, कल्पनामे,
चमत्कारमे। कवी•ार से मार्ग त्यागि अपन ह्यदयक यथार्थ उद्गार प्रकाश करए लगलाह। देश-
दशाक वर्णनमे चौमासाक भास पर हिनक रचनाक चमत्कार अछि :-



भदइ सुखाएल धान दहाय

गरिब किसान कि करत उपाय

कोना दिन काटत

जिउत कि खाय

बालबचा मिलि करु हाय हाय

ह्यदय जनु फाटत।।1।।

बाँधल छहर ऊँचकै आरि

राति दिना सभ धयल कोदारि

सारि छल उपजल

लेल संहारि

निर्दय कमला किदहुँ विचारि

हारि हिय बैसल ।।2।।

समटु समटु जल कमला माय

करु जनु एहन देवि अन्यान्य

असह दुख होइछ,

आस लगाय

कैलहुँ खरच करजकै खाय

विकल खरच करजकै खाय

विकल जन होइछ।।3।।

बड़ रौदी छल बरिसल पानि

मघ असरेश कयल नहि हानि

चलल छल धन्धा।

कह कवि "चन्द"


अपन बुतै की होयत काज

समय भेल मन्दा ।।4।।



तहिना हिनक शान्तिक पदमे शार्दूलविक्रीड़ित छन्दमे

जे जे वस्तु कमाय हाय धयले नै सज़् जाएत से।

मानू सत्य कथा व्यथा परिहरू क्यो आबि खाएत से।।

छी छी भोग वियोग योग्य गृहिणी आने लोभायत से।

ई जे देह सनेहसौं भरल छी की घूरी आएत से।।

अथवा

देह जरातुर भेल विधि अतिक्रूर भेल

मनोरथ दूर भेल दिवस कटैत छी।

कञ्चुकित साप सनरहित प्रताप सन

पराचीन चाप सन लोकसौं हटैत छी।

एकटा नै दाँत मुख भोजनमे कोन सुख

पाहुन समान भुष सेजमे सटैत छी।

"चन्द्र" भन रामचन्द्रप्रेयसी भरोस तोर

भोर उठि बैसि नाम प्रेमसौं रटैत छी।।



हिनक शत शत पद की वैराग्यक, की भक्तिक, एहिना हिनक मनोगत भावकें, यथार्थ
अनुभूत सुख किंवा दुःखकें व्यक्त करैत अछि ओ ई नवीनता हिनका नवयगुक रुाष्टा बनबैत
अछि। परन्तु छन्दक विषयमे ई पुराने चालि राखल। अधिकांश पद हिनक गीते अछि, किछु
कवित्त अछि ओ ताहिसँ भिन्न संस्कृतक छन्दक बड़ चमत्कारक प्रयोग अछि, नवयुगमे जे
छन्दक प्रसज़् नवीनता देखि पड़ैत अछि से टा हिनकामे ओतेक नहि बढ़ि सकल। कविता ओ
सङ्गीतक परम्परागत सम्मिश्रण हिनकहु मध्य प्रबल रहल ओ ई तँ चौपाई समेतकें रागतालक
संज्ञा दए ताही नामक छन्द ओकर नाम देल।



ओ मुक्तककें छोड़ि प्रबन्ध-काव्यक रचना मिथिला-भाषामे इएह कएल। हिनक रामायण
मैथिलीक प्रथम महाकाव्य थिक ओ योगरूढ़ि अर्थमे नहि तँ यौगिक अर्थमे तँ निश्चये से
कहाओत। हिनकासँ पूर्व मनबोध प्रसिद्ध भाषा-कवि भोलनझा कृष्णजन्मक कथा प्रबन्ध-रुपें
महाकाव्य जकाँ लिखए लगलाह परन्तु ओ बड़ छोट भेल, छुछुन लगैत अछि ओ सर्वत्र एकहि
छन्दमे रहबाक कारणें लगले नीरस लागए लगैत अछि। परन्तु श्रृङ्गार-रसक पुरान परम्पराकें
छोड़ि वात्सल्य-रसक, ओ किछु किछु वीररसक, काव्य जन-भाषामे लीखि ओ मैथिली-काव्यकें
पुनः जनसाहित्यक रूप देल। परन्तु मनबोध प्रसिद्धो तत्सम शब्दक तद्भव रूपमे प्रयोग कए
भाषाकें ततेक प्राकृत बनाओल जे ओ ठाम ठाम कृत्रिम भए गेल अछि ओ नीरस लगैत अछि।
कवी•ार ओही शैलीक अवलम्बन कएल परन्तु भाषाक स्वरूप ओ विकृत नहि कएल। शिष्ट जन
जहिना बजैत छथि कवी•ार तहिना कवितो लिखल। तें हिनक कवितामे ने कतहु भाषाक
कृत्रिमताक भान होइत अछि, ने अर्थक कठिनताक बोध होइत अछि; भाषा ने पण्डितामे अधिक
अछि ने अपशब्दिते, स्वाभाविक अछि।




रामायणक प्रसज़् किछुओ समालोचना एहि छोट निबन्धमे नहि भए सकैत अछि परन्तु
एतबा धरि सूचित कए देब आवश्यक जे कवी•ार अपन रामायणक रचना अथ्यात्म-रामायणक
आधार पर कएल ओ से मूलसँ ततेक अधिक मिलैत अछि जे एकरा अधिकांशतः अध्यात्म-
रामायणक अनुवादो कही तँ दोष नहि। बहुत

स्थल अछि जाहिठाम कवी•ारक वर्णन मौलिक अछि ओ से अंश अद्भुत अछि, सब दृष्टिएँ
अपूर्व अछि--यथा मिथिलावर्णन, लक्ष्मण-परशुराम संवाद, लङ्का-दाह-वर्णन, रावण-अज़्द-संवाद
इत्यादि। परन्तु जतए मूलक अनुसरण अनुवाद जकाँ अछि ततए कृत्रिमताक भान होअए लगैत
अछि, अर्थ ओझराए लगैत अछि, उक्तिमे विच्छित्तिक उत्कर्ष नहि भेटैत अछि। अध्यात्म रामायण
पुराण जकाँ अछि, काव्य नहि थिक, ओ तें ओहि आधार पर लिखल रामायणमे काव्यत्वक
आशा कोना करू। तखन उत्तम काव्य ई ओतहि ओतहि अछि जतए कवी•ार मूलकें त्यागि
अपन प्रतिभासँ मौलिक प्रतिपादन कएल अछि। कवी•ारक रामचन्द्र भगवानक अवतार छथि,
सीता लक्ष्मी-स्वरूपा थिकीह। रामक वृत्तान्त भगवल्लीला। जकाँ स्वरचित वर्णित अछि, काव्यक
गुण जे साधारणीकरण थिकैक से एहिमे नहि घटैत अछि। वाल्मीकिमे ई विषय नहि अछि ओ तें
वाल्मीकिक रामायण काव्य थिक। काव्यक उद्देश्य जे "रामवत् प्रवर्त्तितव्यं" ई कोना चरितार्थ
होएत जँ राम ई•ार छलाह। ई•ार जकाँ मनुष्यक आचरण कोना भए सकैत अछि? तँहि तँ
संस्कृत-साहित्यृ-शास्त्रमे ई•ार-विषया रति, रस नहि, भाव कहबैत अछि।



परन्तु काव्यत्वमे जे हानि अछि, भक्तिमे से लाभ भए जाइत अछि। रामायण भक्ति-काव्य
थिक, भक्तिक उद्रेक थिक, पाठककें भक्तिक उद्बोधन दैत अछि। ई•ारक नाम गुण ओ लीलाक
कीर्तन एहि ग्रन्थक विषय थिक जाहिसँ सीता-रामक महिमा ख्यापित हो। काव्यक जे गुण
थिकैक आनन्द से कवी•ारक रामायणमे ओतेक नहि भेटत, एकर लक्ष्य थिक परमार्थ-साधन।
से एहन सरल ओ सरस रीतिएँ गोस्वामी तुलसीदास जकाँ गेय पदमे रचि कवी•ार
मिथिलाभाषाभाषी जनताकें श्रेयसाधनक एक गोट एहन विलक्षण, एहन चमत्कारक, एहन
मनोरञ्जक कृति दए गेलाह अछि जकर महिमा अनन्त अछि। जेना वाल्मीकि रामचरितक
कीर्तनक प्रसादें आदिकविक ख्याति पाबि अमर छथि, महात्मा तुलसीदासजी समस्त आर्यावर्तमे
घर घर श्रद्धा ओ भक्तिसँ पूजित भए अमर भए गेल छथि, तहिना कवी•ार जानकीक जन्मभूमि
एहि मिथिला-देशमे अमर रहताह। ह्यदय छल हुनक भक्तिसँ ओतप्रोत, जीवनक तुमुल संघर्षमे
अवलम्ब छल हुनक एक गोट मात्र, भगवद्विषय अटल ओ अनन्त भक्ति। कवी•ार किछु
योगाभ्यास सेहो करथि ओ योगी जकाँ स्थिर-प्रज्ञ भए भगवद्भजनमे अपन जीवन यापन कएल।
हुनक शत शत भक्तिक गीत कवित्त इएह द्योतित करैत अछि जे स्वान्तःसुखाय ओ जन्म भरि
भगवद्भजनमे कविता रचैत रहलाह। ओही पुण्यक प्रसादें हुनकासँ एहन रामायण रचित भेल जे
हुनक स्थिर भक्तिक परिचायक अछि ओ लोकविषय भक्तिक प्रचार कए हुनक यशःशरीरमे
जरामरणज भयकें नहि आबए देत। कोनो आश्चर्य नहि जे लोकप्रियतामे हुनक आओर सब
कृतिकें दबाए ई रामायण हुनक अक्षय यशक एक मात्र स्तम्भ रहि गेल अछि। चन्दाझाक नामक
सज़् सज़् रामायणक सहसा उद्धोध हिनक महत्त्वक ज्ञापक थिक।



कवि•ारकें अमरत्व प्रदान करबाक हेतु रामायण पर्याप्त हो, लोकप्रियतामे कवी•ारक


रामायण विद्यापतिक गीतक सदृश बुझल जाओ, मैथिलीक प्रचारमे रामायणक महिमा अपरिमित
हो, परन्तु मैथिली-साहित्यक इतिहासमे कवी•ारक मिथिला, मैथिल ओ मैथिलीक पुरावृत्त्क
अनुसन्धान-कार्य कनेको कम महत्त्वक नहि अछि ओ से ख्याति हिनक अमर रहए ई प्रत्येक
सत्यजिज्ञासुक कत्र्तव्य थिक।



इति



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7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

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"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...