Monday, August 31, 2009

पेटार १२

प्रस्तावना


स्वर्ग अर्थात् ‘बहिश्त’ तथा नरक माने दोज़ख़—ई दुनू कतय छैक ? तकर कल्पना आ ताहि लेल उत्सुकता कतेको भावुक मोनकेँ सब दिन सँ चिन्ताग्रस्त कएलक अछि। चारि दशक पहिने ‘जीन-पाल सार्त्रे’ क एकटा नाटक पढ़ने छलहुँ, जतय तीन टा पात्र स्वर्ग केहन होइत अछि ? तकरहि चर्चा करैत कतेको अंक केँ भरि देने छल-- ‘नो एण्ट्री: मा प्रविश!’ केर रचनाक्रम मे भरिसक अवचेतन मोनमे ई बात अवश्य घूमि रहल छल । सैमूअल बेकेटक ‘वेटिंग फॉर गॉडोट’ केर प्रभाव सेहो पड़ल छल, जतय ईश्वरक अथवा कोनो प्राप्य वस्तुक हेतु कतेको गोटेक अंतहीन प्रतीक्षा नाट्यकृतिक इतिहासमे अमिट छाप छोड़ने छल। संगहि संग आर्थर मिलर केर ‘अ स्ट्रेचर नेम्ड डिजाइर’ तथा एडबर्ड अल्बी केर ‘बॉक्स’—इहो दुनू नाटक सँ हम अत्यंत उत्प्रेरित भेल छलहुँ।
कलकत्तामे नाटक मंचन देखैत नेनपन बीतल—संगहि अल्पे वयस सँ मिथिला संघ तथा मैथिली रंगमंच—दनू संस्था द्वारा मंचित नाटक सभमे अभिनय करबाक अवसर, हमरा नाट्यकर्म दिस प्रवृत कएलक। ताहिपर बादल सरकारक ‘एबांग इन्द्रजीत’ आ बरटॉल्ट ब्रीच केर ‘थ्री पेनिस’ ऑपेरा—जकरा बंगलामे नाम देल गेल छल ‘तीन पयसार पाला’ –सन उत्कृष्ट प्रस्तुति देखि कए मोनमे अवश्य ई इच्छा जागल छल जे कहियहुँ –जखन मिथिलाक दर्शककेँ बाढ़ि आ सूखार सँ चैन भेटतन्हि आ ओ सब नाट्य-प्रेमी ‘एब्सट्रैक्ट’ नाटकक रसास्वादन करबाक क्षमता केँ प्राप्त क’ लेताह, अथवा जहिया मैथिलीक सांस्कृतिक जगत मे ‘ऑपेरा’ खेलाबय बला उच्च मानक रंगकर्मी सेहो आबि जेताह, तखनहि भरिसक एहि तरहक उच्च मानक नाटकक रचना आ मंचनक संग अपना केँ जोड़ि सकब। तावत अग्रज नाट्य निर्देशक श्रीकान्त मंडलजीक फरमाइश केँ मानैत एक वा दू टा नारी पात्रक नब्बे मिनटक कम जटिल नाटक लिखैत रही।
2008 धरि अबैत-अबैत ई लागल, जे आब जखन एतेक संख्यामे नीक-नीक मैथिल अभिनेता-अभिनेत्री लोकनि नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) तथा अन्यान्य संस्था सँ प्रशिक्षण प्राप्त कए मंच पर अपन कलाक प्रदर्शन क’ रहल छथि, एतबे नहि मैथिलीमे टेलिवीजन धारावाहिक ‘नैन ने तिरपित भेल’ केर निर्माण, निर्देशन आ प्रदर्शन (हमरहि नाटक ‘प्रत्यावर्तन’ पर आधारित) आरंभ भ’ गेल अछि, आर तँ आर जखन मैथिली मे ई-जर्नल धरि आबि गेल छैक (जाहिमे हमर ई नाटक धारावाहिक रूपेँ प्रकाशित भेल छल— www.videha.co.in केर आर्काइव द्रष्टव्य अछि), तखन बुझि पड़ल जे आब एहि तरहक विषयक रूप-संकल्पना तथा एहन समायोजन केर संग अपनाकेँ जोड़ि सकब। गत वर्षक अंतमे डेढ़ हजार वर्ष पुरान एकटा चीनी ऑपेरा ‘खियान’ जकर उच्चारण ‘शियान’ होयत, केर पुनर्मंचन देखल छलहुँ सेहो भीतरे भीतर काज क’ रहल छल—एहि सभ परिस्थितिक प्रभाव आ प्रेरणाक परिणामस्वरूप ‘नो एण्ट्री: मा प्रविश!’ केर जन्म भेल।
मुदा मिथिलाक लेल ई कोनो नव बात नहि छल। हम सब अपन पौराणिक नाट्य-गौरव केँ बिसरि गेल छी तैँ । जँ नाच-नौटंकी केँ छोड़ियहु देल जाय, मिथिलामे छओ सात सय वर्ष पूर्वहि सँ अनेकों नाटकक रचना भ’ रहल छल जतय गीत-नाद आ नृत्य-नाट्यक समायोजनक प्रमाण भेटि रहल अछि। ई मोन राखहि पड़त, अंग्रेजीमे जखन चौसर साहित्य-सर्जनक जगत केर एकटा उज्ज्वल नक्षत्र छलाह, आ नव-नव प्रतिमानक स्थापना क’ रहल छलाह, तखनहि ‘वर्ण(न) रत्नाकर’क लेल प्रख्यात ज्योतिरीश्वर ठाकुरक वर्णन मे हम सब ई देखैत छी जे ओहि युगमे जखन मैथिली मे लिखल नाटक सब अभिनीत होइत छल, तँ ताहिमे गीत-वाद्यक प्रवीण अबैत छलाह कर्णाट देशसँ, ओ कुशल नृत्यांगना आ नट अबैत छलाह तेलंगाना देशसँ। ताहि युगमे मैथिली नाटकक यश अखिल-भारतीय स्तर धरि प्रचारित भ’ गेल छल। मुदा बीसम शताब्दी अबैत-अबैत हम सब स्तरीय नाटकक रचना आ मंचनक प्रतियोगितामे पछुआ गेल छी (कारण चाहे जे रहल हो)। तैँ एहि नाटकक माध्यमसँ प्रयास कएल गेल अछि जे एकर कथानक एहन हो जाहिसँ मिथिले नहि, अपितु समग्र भारतक पाठक, अभिनेता ओ दर्शककेँ ओ आकर्षित क’ सकय। सब ठामक लोक ‘नो एण्ट्री’ मे एण्ट्री क’ सकैत छथि। आब देखा चाही, कोना आ कहिया धरि ई नाटक अन्यान्य भाषा-संस्कृतिक मंच पर सेहो प्रवेश क’ सकत आ समादृत हैत—ठीक जेना हमर मित्रवर गिरीश कर्नार्ड केर हयवदन आर नाग-मंडल, आ अग्रजप्रतिम नाट्यकार विजय तेंदुलकर क शांतता कोर्ट चालू आहे वा घासीराम कोतवाल केँ कन्नड़ आ मराठी विश्वक बाहरो भेटल छलन्हि। अधिकांश मैथिली नाटक प्रांतीयता आ स्थानीयताक (यद्यपि तकरो आवश्यकता होइत छैक) परिधिमे सीमित अछि, जे हमर सभक नाट्यकर्म केँ हमरे सब धरि सीमित राखि देलक अछि। एमहर जखन हमर मैथिली काव्य संकलन—मध्यमपुरूष एकवचन, (वाणी प्रकाशन, दिल्ली,2006) केर अनुवाद, तमिल भाषा मे छपि कए (‘मुन्नीलइ ओरूमइ’ अदियाल, चेन्नई, 2008) समादृत भेल तखनहि हमर इहो विश्वास सुदृढ़ भ’ गेल जे भरिसक आब हमरा सभक नाटको केँ आन ठाम पहुँचबाक चाही।
अंततः जँ सुधी पाठक, रंगकर्मी आ दर्शक वृन्दकेँ ई नाटक किछु सोचय लेल आ मंचन करबा लेल उत्प्रेरित क’ सकय—ठीक तहिना जेना एकर धारावाहिक-प्रकाशनक हेतु गजेन्द्र ठाकुरजी उत्साहित भेल छलाह आ पुस्तकाकार मुद्रित करबा लेल रूचि प्रकाशनक अधिकारी लोकनि। संगहि इहो आशा अछि जे जँ कतहू ई नाटक अपने सभक अंतःस्थलकेँ छूबि जाय तँ हम अपनाकेँ कृतकृत्य बूझब।

मैसूर
31st अगस्त 2008
उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’

नो एंट्री : मा प्रविश
(चारि अंकीय मैथिली नाटक)


नाटककार
उदय नारायण सिंह ‘नचिकेता’
निदेशक, केंद्रीय भाषा संस्थान, मैसूर

(मैथिली साहित्यक सुप्रसिद्ध प्रयोगधर्मी नाटककार श्री नचिकेताजीक टटका नाटक, जे विगत 25 वर्षक मौनभंगक पश्चात् पाठकक सम्मुख प्रस्तुत भ' रहल अछि।)

पात्र – परिचय

पर्दा उठितहि –
ढोल–पिपही, बाजा–गाजा बजौनिहार–सब
दूटा चोर, जाहि मे सँ एक गोटे पॉकिट–मार आ
एकटा उचक्का
दू गोट भद्र व्यक्ति
प्रेमी
प्रेमिका
बाजार सँ घुरैत प्रौढ़ व्यक्ति
बीमा कंपनीक एजेंट
रद्दी किनै–बेचैबला
भिख-मंगनी
रमणी-मोहन
नंदी–भृंगी
कैकटा मृत सैनिक
बाद मे
नेता आ नेताक दूटा चमचा/कतेको अनुयायी
वाम-पंथी युवा
अभिनेता
यम
चित्रगुप्त
उच्च–वंशीय महिला
अप्सरा/नृत्यांगना-लोकनि

प्रथम कल्लोल




प्रथम कल्लोल

[एकटा बड़का–टा दरबज्जा मंचक बीच मे देखल जाइछ। दरबज्जाक दुनू दिसि एकटा अदृश्य मुदा सक्कत देवार छैक, जे बुझि लेबाक अछि – कखनहु अभिनेता लोकनिक अभिनय–कुशलता सँ तथा कतेको वार्तालाप सँ से स्पष्ट भ’ जाइछ। मंच परक प्रकाश–व्यवस्था सँ ई पता नहि चलैत अछि जे दिन थिक अथवा राति, आलोक कनेक मद्धिम, सुर–संगत होइत सेहो कने मरियल सन।
एकटा कतार मे दस–बारह गोटे ठाढ़ छथि जाहि मे कैकटा चोर–उचक्का, एक-दू गोटे भद्र व्यक्ति मुदा ई स्पष्ट जे हुनका लोकनिक निधन भ’ चुकल छन्हि। एकटा प्रेमी–युगल जे विष-पान क’ कए आत्म-हत्या कैल अछि, मुदा एत’ स्वर्गक (चाही त’ नरकक सेहो कहि सकै छी) द्वार लग आबि कए कने विह्वल भ’ गेल छथि जे आब की कैल जाइक। एकटा प्रौढ व्यक्तित जे बजारक झोरा ल’ कए आबि गेल छथि–बुझाइछ कोनो पथ–दुर्घटनाक शिकार भेल छथि बाजार सँ घुरैत काल। एकटा बीमा कंपनीक एजेंट सेहो छथि, किछु परेशानी छनि सेहो स्पष्ट। एकटा रद्दीबला जे रद्दी कागजक खरीद–बिक्री करैत छल, एकटा भिख-मंगनी–एकटा पुतलाकेँ अपन बौआ (भरिसक ई कहै चाहैत छल जे वैह छल ओकर मुइल बालक अथवा तकर प्रतिरूप) जकाँ काँख तर नेने, आ एक गोट अत्यंत बूढ़ व्यक्ति सेहो छथि, जनिक रमणी–प्रीति एखनहु कम नहि भेल छनि, हुनका हमसब रमणी–मोहने कहबनि।

सब गोटे कतार मे त’ छथि, मुदा धीरजक अभाव स्पष्ट भ’ जाइछ। क्यो-क्यो दोसरो-दोसर लोग केँ लाँघि कए आगाँ जैबाक प्रयास करैत छथि, त’ क्यो से देखि कए शोर करय लागैत छथि। मात्र तीन–चारिटा मृत सैनिक–जे कि सब सँ पाछाँ ठाढ़ छथि, हुनका सबमे ने कोनो विकृति लखा दैछ आ ने कोनो हड़बड़ी। ]

बजार-बला वृद्ध : हे – हे – हे देखै जाउ... देखि रहल छी की नहि सबटा
तमाशा....कोना–कोना क’ रहल छइ ई सब! की ? त’ कनीटा त’ आगाँ बढ़ि जाई !
[एकटा चोर आ एकटा उचक्का केँ देखा कए बाजि रहल छलाह जे सब ओना त’ चारिम तथा पाँचम स्थान पर ठाढ़ छैक, मुदा कतेको काल सँ अथक प्रयास क’ रहल अछि जे कोना दुनू भद्र व्यक्ति आ प्रेमी–प्रेमिका युगलकेँ पार क’ कए कतारक आगाँ पहुँचि जाई!]
बीमा एजेंट : [नहि बूझि पबैत छथि जे ओ वृद्ध व्यक्ति
हुनके सँ किछु कहि रहल छथि कि आन ककरहु सँ। बजार-बला वृद्ध सँ आगाँ छल रद्दी बेचैबला आ तकरहु सँ आगाँ छलाह बीमा बाबू।] हमरा किछु कहलहुँ ?

बाजारी : अहाँ ओम्हर देखब त’ बूझि जायब हम
की कहि रहल छी आ ककरा दय...! [अकस्मात् अत्यंत क्रोधक आवेश मे आबि] हे रौ! की बुझै छहीं...क्यो नहि देखि रहल छौ ? [बीमा बाबू केँ बजारक झोरा थम्हबैत -] हे ई धरू त’! हम देखै छी।
[कहैत शोर करैत आगाँ बढ़ि कए एकटा चोर आ उचक्का केँ कॉलर पकड़ि कए घसीटैत पाछाँ पुनः चारिम-पाँचम स्थान पर ल’ अबैत छथि, ओसब वाद–प्रतिवाद कर’ लगैत अछि -]
चोर : हमर कॉलर कियै धरै छी ?
उचक्का : हे बूढ़ौ ! हमर कमीज, फाड़ि देबैं की ?
बाजारी : कमीजे कियैक ? तोहर आँखि सेहो देबौ
हम फोड़ि ! की बूझै छेँ ? क्यो किछु कहै बाला नहि छौ एत’?
उचक्का : के छै हमरा टोकै–बला एत’? देखा त’ दिय’ ?
बाजारी : (डपटैत) हे, पकड़ त’ एकर टीक!
चोर : आहि रे बा ! हम की कैल जे हमर टीक
धैने छी?
दोसर चोर : (जे कि असल मे पॉकिट–मार छल) हे
हे, टीक छोड़ि दी, नंगड़ी पकड़ि लियह सरबा क’ !
चोर : (गोस्सा सँ) तोँ चुप रह ! बदमाश
नहितन !
पॉकिट-मार : (अकड़ि कए) कियै ? हम कियै नहि
बाजब ?
उचक्का : (वृद्ध व्यक्तिक हाथ सँ अपना केँ छोड़बैत)
ओय खुदरा ! बेसी बड़बड़ैलें त’... (हाथ सँ इशारा करैत अछि गरा काटि देबाक)
पॉकिट-मार : त’ की करबें ?
उचक्का : (भयंकर मुद्रामे आगाँ बढ़ैत) त’ देब
धड़ सँ गरा केँ अलगाय... रामपुरी देखने छह ? रामपुरी ? (कहैत एकटा चाकू बहार करैत अछि अंगा तर सँ।)
चोर : हे, की क’ रहल छी... भाइजी, छोड़ि
दियौक ने !
बच्चा छै... कखनहु–कखनहु जोश मे आबि जाइ छै !
भद्र व्यक्ति 1 : (पंक्तिक आगाँ सँ) हँ, हँ... छोड़ि ने देल जाय !
उचक्का : [भयंकर मुद्रा आ नाटकीयता केँ बरकरार
रखैत पंक्तिक आगाँ दिसि जा कए... अपन रामपुरी चाकू केँ दोसर हाथ मे उस्तरा जकाँ घसैत] छोड़ि दियह की मजा चखा देल जाय ? [एहन भाव–भंगिमा देखि दुनू भद्र व्यक्ति डरै छथि–
प्रेमी–युगल अपनहिमे मगन छथि; हुनका दुनू केँ दुनियाक आर किछु सँ कोनो लेन-देन नहि...] की ?
[घुरि कए पॉकिट–मार दिसि अबैत...
तावत् ई सब देखि बाजारी वृद्धक होश उड़ि जाइत छनि... ओ चोरक टीक/ कॉलर जे कही... छोड़ि दैत छथि घबड़ा कए ] की रौ ? दियौ भोंकि ? आ कि…?
चोर : उचकू–भाइजी ! बच्चा छै... अपने बिरादरीक बुझू...! [आँखि सँ इशारा करै छथि।]
उचक्का : [अट्टहास् करैत] ऐं ? अपने बिरादरीक थिकै ? [हँसब बंद कए- पूछैत] की रौ ? कोन काज करै छेँ?
[पॉकिट-मार डरेँ किछु बाजि नहि पबैत अछि– मात्र दाहिना हाथक दूटा आङुर केँ कैंची जकाँ चला कए देखबैत छैक।]
उचक्का : पॉकिट-मार थिकेँ रौ ? [पुनः हँस’ लागै छथि छूरी केँ तह लगबैत’]
चोर : कहलहुँ नहि भाईजी ? ने ई हमरा सन माँजल चोर बनि सकल आ ने कहियो सपनहुँ मे सोचि सकल जे अहाँ सन गुंडा आ बदमाशो बनि सकत !
उचक्का : बदमाश ? ककरा कहलेँ बदमाश ? आँय !
पॉकिट-मार : हमरा, हुजूर ! ओकर बात जाय दियह ! गेल छल गिरहथक घर मे सेंध देब’... जे आइ ने जानि कत्ते टका-पैसा-गहना भेटत ! त’ पहिले बेरि मे जागि गेल गिरहथ, आ तकर चारि–चारिटा जवान-जहान बालक आ सँगहि आठ–आठटा कुकुर... तेहन ने हल्ला मचा देलक जे पकड़ि कए पीटैत–पीटैत एत’ पठा देलक ! (हँसैत... उचक्का सेहो हँसि दैत अछि) आब बुझु ! ई केहन चोर थिक !
(मुँह दूसैत) हमरा कहैत छथि !
[कतारक आनो-आन लोक आ अंततः सब गोटे हँसय लागैत छथि]
भद्र-व्यक्तित 1 : आँय, यौ, चोर थिकौं ? लागै त’ नहि छी चोर जकाँ...
चोर : किएक ? चोर देख’ मे केहन होइत छैक ?
पॉकिट-मार : हमरा जकाँ...! (कहैत, हँसैत अछि, आरो एक-दू गोटे हँसि दैत छथि।) चललाह भिखारी बौआ बन’... ? की ? त’ हम तस्कर-राज छी ! [कतहु सँ एकटा टूल आनि ताहि पर ठाढ़ होइत... मंचक आन
दिसिसँ भाषणक भंगिमा मे ] सुनू, सुनू, सुनू भाई–भगिनी! सुनू सब गोटे! श्रीमान्, श्रील 108
श्री श्री बुद्धि-शंकर महाराज तस्कर सम्राट आबि रहल छथि! सावधान, होशियार! [एतबा कहैत टूल पर सँ उतरि अपन हाथ-मुँहक मूकाभिनयसँ एहन भंगिमा करैत छथि जेना कि भोंपू बजा रहल होथि... पाछाँ सँ भोंपू – पिपहीक शब्द कनिये काल सुनल जाइछ, जाबत ओ ‘मार्च’ करैत चोर लग अबैत अछि...]
चोर : [कनेक लजबैत] नहि तोरा हम साथ लितहुँ ओहि रातिकेँ, आ ने हमर पिटाइ देखबाक मौके तोरा भैटतिहौक! [कहैत आँखि मे एक-दूइ बुन्न पानि आबि जाइत छैक।]
पॉकिट-मार : आ-हा-हा! एहि मे लजबैक आ मोन दुखैक कोन गप्प? [थम्हैत, लग आबि कए] देखह! आई ने त’ काल्हि-चोरि त’ पकड़ले जाइछ। आ एकबेर जँ भंडा- फोड़ भ’ जाइत अछि त’ बज्जर त’ माथ पर खसबे करत ! सैह भेल... एहि मे दुख कोन बातक ?
उचक्का : (हँसैत) हँ, दुखी कियै होइ छहक?
बाजारी : [एतबा काल आश्चर्य भए सबटा सुनि रहल छलाह। आब रहल नहि गेलनि – अगुआ कए बाजय लगलाह]
हे भगवान! हमर भाग मे छल स्वस्थहि शरीर मे बिना कोनो रोग-शोक भेनहि स्वर्ग मे जायब... तैँ हम एत’ ऐलहुँ, आ स्वर्गक द्वार पर ठ़ाढ छी क्यू मे...! मुदा ई सब चोर–उचक्का जँ स्वर्गे मे जायत, तखन केहन हैत ओ स्वर्ग रहबाक लेल ?
पॉकिट-मार : से कियै बाबा ? अहाँ की बूझै छी, स्वर्ग त’ सभक लेल होइत अछि ! एहि मे ककरहु बपौती त’ नञि।
बाजारी : [बीमा एजेंट केँ] आब बूझू ! आब.... चोर सिखाबय गुण केर महिमा,1
पॉकिट–मारो करै बयान!
मार उचक्का झाड़ि लेलक अछि,
पाट–कपाट त’ जय सियाराम !
[चोर-उचक्का-पॉकिट-मार ताली दैत अछि, सुनि कए चौंकैत भिख-मंगनी आ प्रेमी-युगल बिनु किछु बुझनहि ताली बजाब’ लागैत अछि।]
चोर : ई त’ नीक फकरा बनि गेल यौ!
पॉकिट-मार : एम्हर तस्कर-राज त’ ओम्हर कवि-राज!
बाजारी : (खौंझैत’) कियै ? कोन गुण छह तोहर, जकर बखान करै अयलह एत’?
पॉकिट-मार : (इंगित करैत आ हँसैत) हाथक सफाई... अपन जेब मे त’ देखू , किछुओ बाकी अछि वा नञि...

बाजारी : [बाजारी तुरंत अपन जेब टटोलैत छथि – त’ हाथ पॉकिटक भूर देने बाहर आबि जाइत छनि। आश्चर्य चकित भ’ कए मुँह सँ मात्र विस्मयक आभास होइत छनि।] जा !
[बीमा बाबूकेँ आब रहल नञि गेलनि। ओ ठहक्का पाड़ि कए हँस’ लगलाह- हुनकर देखा–देखी कैक गोटे बाजारी दिसि हाथ सँ इशारा करैत हँसि रहल छलाह।]
चोर : [हाथ उठा कए सबकेँ थम्हबाक इशारा करैत] हँसि त’ रहल छी खूब !
उचक्का : ई बात त’ स्पष्ट जे मनोरंजनो खूब भेल हैतनि।
पॉकिट-मार : मुदा अपन-अपन पॉकिट मे त’ हाथ ध’ कए देखू !
[भिख-मंगनी आ प्रेमी-युगल केँ छोड़ि सब क्यो पॉकिट टेब’ लागैत’ छथि आ बैगक भीतर ताकि-झाँकि कए देख’ लागैत छथि त’ पता चलैत छनि जे सभक पाइ, आ नहि त’ बटुआ गायब भ’ गेल छनि। हुनका सबकेँ ई बात बुझिते देरी चोर, उचक्का, पॉकिट-मार आ भिख-मंगनी हँस’ लागैत छथि। बाकी सब गोटे हतबुद्धि भए टुकुर-टुकुर ताकिते रहि जाइत छथि]
भिख-मंगनी : नंगटाक कोन डर चोर की उचक्का ?
जेम्हरहि तकै छी लागै अछि धक्का !
धक्का खा कए नाचब त’ नाचू ने !
खेल खेल हारि कए बाँचब त’ बाँचू ने !
[चोर-उचक्का–पॉकिट-मार, समवेत स्वर मे जेना धुन गाबि रहल होथि]
नंगटाक कोन डर चोर कि उचक्का !
आँखिएक सामने पलटल छक्का !
भिख-मंगनी : खेल–खेल हारि कए सबटा फक्का !
समवेत-स्वर : नंगटाक कोन डर चोर कि उचक्का ?
[कहैत चारू गोटे गोल-गोल घुर’ लागै छथि आ नाचि- नाचि कए कहै छथि।]
सब गोटे : आब जायब, तब जायब, कत’ औ कक्का ? पॉकिट मे हाथ दी त’ सब किछु लक्खा ! नंगटाक कोन डर चोर कि उचक्का !
बीमा-बाबू : (चीत्कार करैत) हे थम्ह’ ! बंद कर’ ई तमाशा...
चोर : (जेना बीमा-बाबूक चारू दिसि सपना मे भासि रहल होथि एहन भंगिमा मे) तमाशा नञि... हताशा....!
उचक्का : (ताहिना चलैत) हताशा नञि... निराशा !
पॉकिट-मार : [पॉकिट सँ छह-सातटा बटुआ बाहर क’ कए देखा – देखा कए] ने हताशा आ ने निराशा, मात्र तमाशा...ल’ लैह बाबू छह आना, हरेक बटुआ छह आना! [कहैत एक–एकटा बटुआ बॉल जकाँ तकर मालिकक दिसि फेंकैत छथि आ हुनका लोकनि मे तकरा सबटाकेँ बटौर’ लेल हड़बड़ी मचि जाइत छनि। एहि मौकाक फायदा उठबैत चोर–उचक्का-पॉकिट-मार आ भिख-मंगनी कतारक सब सँ आगाँ जा’ कए ठाढ भ’ जाइत छथि।]
रद्दी-बला : [जकर कोनो नुकसान नहि भेल छल ओ मात्र मस्ती क’ रहल छल आ घटनासँ भरपूर आनन्द ल’ रहल छल।] हे बाबू– भैया लोकनि ! एकर आनन्द नञि अछि कोनो जे “भूलल-भटकल कहुना क’ कए घुरि आयल अछि हमर बटुआ”। [कहैत दू डेग बढा’ कए नाचिओ लैत’ छथि।] ई जे बुझै छी जे अहाँक धन अहीं केँ घुरि आयल...मुदा ई बुझियो रहल छी की नञि जे ई सबटा फूसि थिक !
बीमा-बाबू : (आश्चर्य होइत) आँय ? से की ?
बाजारी : (गरा सँ गरा मिला कए) सबटा फूसि ?
भद्र-व्यक्ति 1 : की कहै छी ?
भद्र-व्यक्ति 2 : माने बटुआ त’ भेटल, मुदा भीतर भरिसक ढन–ढन !
रद्दी-बला : से हम कत’ कहलहुँ ? बटुओ अहींक आ पाइयो छैहे! मुदा एखन ने बटुआक कोनो काज रहत’ आ ने पाइयेक!
बीमा-बाबू : माने ?
रद्दी-बला : माने नञि बुझलियैक ? औ बाबू ! आयल छी सब गोटे यमालय... ठाढ़ छी बन्द दरबज्जाक सामने...कतार सँ... एक–दोसरा सँ जूझि रहल छी जे के पहिल ठाम मे रहत आ के रहत तकर बाद...? तखन ई पाइ आ बटुआक कोन काज ?
भद्र-व्यक्ति 1 : सत्ये त’! भीतर गेलहुँ तखन त’ ई पाइ कोनो काज मे नहि लागत !
बाजारी : आँय ?
भद्र-व्यक्ति 2 : नहि बुझिलियैक ? दोसर देस मे जाइ छी त’ थोड़े चलैत छैक अपन रुपैया ? (आन लोग सँ सहमतिक अपेक्षा मे-) छै कि नञि ?
रमणी-मोहन : (जेना दीर्घ मौनता के तोड़ैत पहिल बेरि किछु ढंग केर बात बाजि रहल छथि एहन भंगिमा मे... एहि सँ पहिने ओ कखनहु प्रेमी-युगलक लग जाय प्रेमिका केँ पियासल नजरि द’ रहल छलाह त’ कखनहु भिख-मंगनिये लग आबि आँखि सँ तकर शरीर केँ जेना पीबि रहल छलाह...) अपन प्रेमिका जखन अनकर बियाहल पत्नी बनि जाइत छथि तखन तकरा सँ कोन लाभ ? (कहैत दीर्घ-श्वास
त्याग करैत छथि।)
बीमा-बाबू : (डाँटैत) हे...अहाँ चुप्प रहू! क’ रहल छी बात रुपैयाक, आ ई कहै छथि रूप दय...!
रमणी-मोहन : हाय! हम त’ कहै छलहुँ रूपा दय!
(भिख-मंगनीरमणी-मोहन लग सटल चलि आबै छैक।)
भिख-मंगनी : हाय! के थिकी रूपा ?
रमणी-मोहन : “कानि-कानि प्रवक्ष्यामि रूपक्यानि रमणी च... !
बाजारी : माने ?
रमणी-मोहन : एकर अर्थ कनेक गंभीर होइत छैक... अहाँ सन बाजारी नहि बूझत!
भिख-मंगनी : [लास्य करैत] हमरा बुझाउ ने!
[तावत भिख-मंगनीक भंगिमा देखि कने-कने बिहुँसैत’ पॉकिट–मार लग आबि जाइत अछि।]
भिख-मंगनी : [कपट क्रोधेँ] हँसै कियै छें ? हे... (कोरा सँ पुतलाकेँ पॉकिट-मारकेँ थम्हबैत) हे पकड़ू त’ एकरा... (कहैत रमणी-मोहन लग जा कए) औ मोहन जी! अहाँ की ने कहलहुँ, एखनहु धरि भीतर मे एकटा छटपटी मचल यै’! रमणी-धमनी कोन बात’ कहलहुँ ?
रमणी-मोहन : धूर मूर्ख! हम त’ करै छलहुँ शकुन्तलाक गप्प, मन्दोदरीक व्यथा... तोँ की बुझबेँ ?
भिख-मंगनी : सबटा व्यथा केर गप बुझै छी हम... भीख मांगि-मांगि खाइ छी, तकर माने ई थोड़े, जे ने हमर शरीर अछि आ ने कोनो व्यथा... ?
रमणी-मोहन : धत् तोरी! अपन व्यथा–तथा छोड़, आ भीतर की छैक, ताहि दय सोच ! (कहैत बंद दरबज्जा दिसि देखबैत छथि-)
पॉकिट-मार : (अवाक् भ’ कए दरबज्जा दिसि देखैत) भीतर ? की छइ भीतरमे... ?
रमणी-मोहन : (नृत्यक भंगिमा करैत ताल ठोकि-ठोकि कए) भीतर ? “धा–धिन–धिन्ना... भरल तमन्ना ! तेरे-केरे-धिन-ता... आब नञि चिन्ता !
भिख-मंगनी : (आश्चर्य भए) माने ? की छिकै ई ?
रमणी-मोहन : (गर्व सँ) ‘की’ नञि... ‘की’ नञि... ‘के’ बोल ! बोल- भीतर ‘के’ छथि ? के, के छथि?
पॉकिट-मार : के, के छथि?
रमणी-मोहन : एक बेरि अहि द्वारकेँ पार कयलेँ त’ भीतर भेटती एक सँ एक सुर–नारी,उर्वशी–मेनका–रम्भा... ! (बाजैत बाजैत जेना मुँहमे पानि आबि जाइत छनि-)
भिख-मंगनी : ईः! रंभा...मेनका... ! (मुँह दूसैत) मुँह-झरकी सब... बज्जर खसौ सबटा पर!
रमणी-मोहन : (हँसैत) कोना खसतैक बज्जर ? बज्र त’ छनि देवराज इन्द्र लग ! आ अप्सरा त’ सबटा छथि हुनकहि नृत्यांगना।
[भिख-मंगनीक प्रतिक्रिया देखि कैक गोटे हँस’ लगैत छथि]
पॉकिट-मार : हे....एकटा बात हम कहि दैत छी – ई नहि बूझू जे दरबज्जा खोलितहि आनंदे आनंद !
बाजारी : तखन ?
बीमा-बाबू : अहू ठाम छै अशांति, तोड़-फोड़, बाढ़ि आ सूखा ?
आ कि चारू दिसि छइ हरियर, अकाससँ झहरैत खुशी केर लहर आ माटिसँ उगलैत सोना ?
पॉकिट-मार : किएक ? जँ अशांति, तोड़-फोड़ होइत त’ नीक... की बूझै छी, एत्तहु अहाँ जीवन–बीमा चलाब’ चाहै छी की ?
चोर : (एतबा काल उचक्का सँ फुसुर-फुसुर क’ रहल छल आ ओत्तहि, दरबज्जा लग ठाढ़ छल– एहि बात पर हँसैत आगाँ आबि जाइत अछि) स्वर्गमे जीवन-बीमा ? वाह ! ई त’ बड्ड नीक गप्प !

पॉकिट-मार : देवराज इंद्रक बज्र.. बोलू कतेक बोली लगबै छी?
उचक्का : पन्द्रह करोड़!
चोर : सोलह!
पॉकिट-मार : साढे-बाईस!
बीमा-बाबू : पच्चीस करोड़!
रमणी-मोहन : हे हौ! तोँ सब बताह भेलह ? स्वर्गक राजा केर बज्र, तकर बीमा हेतैक एक सय करोड़ सँ कम मे ?
[कतहु सँ एकटा स्टूलक जोगाड़ क’ कए ताहि पर चट दय ठाढ़ भ’ कए-]
पॉकिट-मार : बोलू, बोलू भाई-सब ! सौ करोड़ !
बीमा-बाबू : सौ करोड़ एक !
चोर : सौ करोड़ दू –
रमणी-मोहन : एक सौ दस !
भिख-मंगनी : सवा सौ करोड़ !
चोर : डेढ़सौ करोड़...
भिख-मंगनी : पचपन –
चोर : साठि –
भिख-मंगनी : एकसठि –
[दूनूक आँखि–मुँह पर ‘टेनशन’ क छाप स्पष्ट भ’ जाइत छैक। ]
चोर : (खौंझैत) एक सौ नब्बै...
[एतेक बड़का बोली पर भिख-मंगनी चुप भ’ जाइत अछि।]
पॉकिट-मार : त’ भाई-सब ! आब अंतिम घड़ी आबि गेल अछि – 190 एक, 190 दू, 190...
[ठहक्का पाड़ि कए हँस’ लगलाह बाजारी, दूनू भद्र व्यक्ति आ रद्दी-बला-]
पॉकिट-मार : की भेल ?
चोर : हँस्सीक मतलब ?
बाजारी : (हँसैते कहैत छथि) हौ बाबू ! एहन मजेदार मोल-नीलामी हम कतहु नञि देखने छी !
भद्र-व्यक्ति 1 : एकटा चोर...
भद्र-व्यक्ति 2 : त’ दोसर भिख-मंगनी...
बाजारी : आ चलबै बला पॉकिट-मार...
[कहैत तीनू गोटे हँस’ लागै छथि]
बीमा-बाबू : त’ एहि मे कोन अचरज?
भद्र-व्यक्ति 1 : आ कोन चीजक बीमाक मोल लागि रहल अछि–त’ बज्र केर !
भद्र-व्यक्ति 2 : बज्जर खसौ एहन नीलामी पर !
बाजारी : (गीत गाब’ लागै’ छथि)
चोर सिखाबय बीमा–महिमा,
पॉकिट-मारो करै बयान !
मार उचक्का झाड़ि लेलक अछि,
पाट कपाट त’ जय सियाराम !
दुनू भद्र-व्यक्ति : (एक्कहि संगे) जय सियाराम !
[पहिल खेप मे तीनू गोटे नाच’-गाब’ लागै छथि। तकर बाद धीरे-धीरे बीमा बाबू आ रद्दी-बला सेहो संग दैत छथि।]
बाजारी : कौआ बजबै हंसक बाजा
भद्र-व्यक्ति 1 : हंस गबै अछि मोरक गीत
भद्र-व्यक्ति 2 : गीत की गाओत ? छल बदनाम !
बाजारी : नाट-विराटल जय सियाराम !
जय सियाराम ! जय सियाराम!
समवेत : मार उचक्का झाड़ि लेलक अछि।
पाट-कपाटक जय सियाराम !
[तावत् नचैत नंदी-भृंगीक प्रवेश होइत छैक। दुनूक नृत्य छलनि शास्त्रीय तथा मुँहमे बोलो तबलेक-]
नंदी : धर-धर–धरणी
भृंगी : मर-झर जरनी
नंदी : डाहक छाँह मे
भृंगी : स्याह विशेष
नंदी : कपटक छट-फट
भृंगी : बगलक दल-दल
नंदी : हुलकि-दुलकि कए
भृंगी : भेल अवशेष !
दुनू गोटे : [एक्कहि संग गबैत-नचैत तरुआरि सँ चहुँदिसि लड़ैत, अगणित मुदा अदृश्य योद्धाक गर काटैत-]
चाम-चकित छी, भान-भ्रमित छी
बेरि-बेरि बदनाम कूपित छी
गड़-गड़ निगड़ ई हर-पर्वत पर
तीन लोक चहुँ धाम कथित छी
कपटक छट-फट त्रिकट विकट कट
नट जट लट-कय अट-पट संशय
नर-जर देहक बात निशेष !
डाहक छाँह मे स्याह विशेष !
[जखन गीत-नाद आ नृत्य समाप्त भ’ जाइत अछि तखन नंदी एकटा टूल पर ठाढ़ भ’ कए सब केँ संबोधित कर’ लागै छथि।]
नंदी : [सभक दृष्टि- आकर्षित करैत]
सुनू सुनू सभटा भाइ-बहीन! नीक जकाँ सुनि लिय’ आ जँ किछु जिज्ञासा हो त’ सेहो पूछि लिय’।
[सब गोटे गोल भ’ कए ठाढ़ भ’ जाइत छथि।]
भृंगी : हम सब जे किछु कहब से अहि लेल कहब जरूरी अछि, जे आब दरबज्जा खोलितहि ओहि पार जैबाक मौका भेटत सबकेँ। मुदा ई जानब जरूरी अछि जे ओहि पार अहाँ लेल की अछि प्रतीक्षा करैत! (बाजैत सभक दिसि देखि लैत छथि।) अहाँ सब जनै छी ,की छैक ओहि पार?
चोर : स्वर्ग!
पॉकिट-मार : नरक!
भिख-मंगनी : अकास!
रद्दी-बला : पाताल!
नंदी : ने क्यो पूरापूरी ठीक बाजल... आ ने क्यो गलते बात कहल !
भृंगी : ई सबटा छैक ओहि पार– एक ठाम, एक्कहि स्थान पर...
नंदी : आब ई त’ अहाँ सभक अपन-अपन कृतकर्मक फल भेटबाक बात थिक... ककरा भागमे की अछि...
बाजारी : (टोकैत) से के कहत ?
नंदी : महाकाल!
भृंगी : ककरहु भेटत ढेर रास काज त’ ककरहु लेल रहत कतेको स्पर्धा...! क्यो समय बीताओत नृत्य-गीत, काव्य-कलाक सङे, आ क्यो एहि सबसँ दूर रहत गंभीर शोध मे लागल !
नंदी : ककरहु लेल रहत पुष्प–शय्या...त’ ककरहु एखनहुँ चलबाक अछि काँट पर दय... !
बीमा-बाबू : से कोना ?
नंदी : देखू ! ई त’ अपन-अपन भाग्य जे एत’ अहाँ-लोकनिमे बहुत कम्मे गोटे एहन छी जे संपूर्ण उमरि जीबाक बाद तखन एत’ हाजिर भेल छी। क्यो बजार सँ घुरैत काल गाड़ी तर कुचलल गेल छी (बाजारी हाथ उठबैत आ कहैत ''हम...हम...'' ) त’ क्यो चोरि करै काल पकड़ा गेलहुँ आ गाम-घरक लोग पीटि-पीटि कए पठा देलक एत’! (चोर ई प्रसंगक आरंभ होइतहि ससरि कए पड़यबाक चेष्टा क’ रहल छल त’ ओकरा दू-तीन गोटे पकड़ि कए ''हे ई थिक ...इयैह... !'' आदि बजलाह) क्यो अतिरिक्त व्यस्तता आ काजक टेनशन मे अस्वस्थ भेल छलहुँ (दुनू भद्र व्यक्ति मात्र हाथ उठबैत छथि जेना स्कूली छात्र सब कक्षामे हाजिरी लगबैत अछि), त’ क्यो रेलक पटरी पर अपन अंतिम क्षण मे आबि पहुँचल छलहुँ (रद्दी बला आ भिख-मंगनी बाजल “जेना कि हम!” अथवा “हमरो त’ सैह भेल छल”। कतेको कारण भ’ सकैत छल।
[बजैत बजैत चारिटा मृत सैनिक मुइलो पर विचित्र जकाँ मार्च करैत करैत मंच पर आगाँ दिस आबि जाइत छथि।]
बीमा-बाबू : [चारू गोटे केँ देखबैत] आ ई सब ?
नंदी : समय सँ पहिनहि, कोनो ने कोनो सीमामे.... घुसपैठीक हाथेँ नहि त’ लड़ाई केर मैदानमे... !
मृत सैनिक : (समवेत स्वरेँ) लड़ाईक मैदानमे... !
बीमा-बाबू : बुझलहुँ ! मुदा...
नंदी : मुदा ई नहि बुझलहुँ जे बीमाक काजकेँ छोड़ि कए
अहाँ एत’ किएक आयल छी?
बीमा-बाबू : हम सब त’ सदिखन नव-नव मार्केटक खोजमे कतहु पहुँचिये जाइ छी, एतहु तहिना बूझू... !
भृंगी : (नंदी सँ) बुझलहुँ नहि ?...आब एतेक रास बीमा कंपनी आबि गेल अछि जे ई बेचारे...
[तावत् नंदी-भृंगीक चारू कात जमा भेल भीड़ ओहि पार पाछाँ दिसि सँ एकटा खलबली जकाँ मचि गेल। पता चलल दुनू प्रेमी आपस मे झगड़ा क’ रहल छल। रास्ता बनाओल गेल त’ ओ दुनू सामने आबि गेल।]
नंदी : (जेना मध्यस्थता क’ रहल छथि) की भेल ?की बात थिक?
हमरो सब केँ त’ बूझ’ दियह!
प्रेमिका : देखू ने... जखन दुनू गोटेक परिवार बिल्कुल मान’ लेल तैयार नञि छल हमरा दुनूक संबंध तखन...
प्रेमी : तखन मिलि कए विचार कैने छलहुँ जे संगहिसंग जान द’ देब...
प्रेमिका : सैह भेल, मुदा….
नंदी : मुदा ?
प्रेमिका : मुदा आब ई कहि रहल छथि...हिनका घुरि जैबाक छनि...
प्रेमी : हँ...हम चाहै छी एक बेर आर जीबाक प्रयास करी। मुदा ई नहि घुर’ चाहै छथि।
प्रेमिका : हँ, हम नञि चाहै छी जे धुरि जाई... !
रमणी-मोहन : (अगुआ कए प्रेमिका लग आबि कए) नञि जाय चाहै छथि त’ रह दियौक ने... हम त’ छीहे ! (कहैत आर आगाँ बढ़बाक प्रयास करैत’ छथि।)
भृंगी : धत् ! (रमणी-मोहन केँ तिरस्कार करैत) अहाँ हँटू त’... ! आ चुप रहू !
नंदी : मुदा ई त’ अहाँ दुनू गोटे हमरा दुनू केँ धर्म-संकट मे पहुँचा देलहुँ।
भृंगी : आ घुरबे कियै’ करब ?
प्रेमी : एक बेर आर प्रयास करी, जँ हमर दुनूक विवाहक लेल ओ लोकनि राजी भ’ जाथि।
भृंगी : ओ – ई बात ?
नंदी : त’ एकर निदान त’ सहजेँ क’ सकै छी हम सब?
प्रेमिका : से कोना ?
भृंगी : किछुओ नहि...बस, छोट-छीन-‘ऐक्सिडेंट’ करबा दिय’ आ ल’ आनू दुनू जोड़ी माय-बाप केँ (एतहि...यमालय मे...)
प्रेमी : नहि-नहि !
प्रेमिका : से कोना भ’ सकै छइ ?
प्रेमी : हम सब नञि चाहब जे हमरा सभक लेल हुनको लोकनिक प्राण हरल जाइन।
नंदी : तखन त’ एक्कहि टा उपाय भ’ सकैत अछि।
प्रेमी-प्रेमिका : (एक्कहि संगेँ) की ? कोन उपाय ?
भृंगी : इयैह...जे अहाँ दुनूक विवाह...
नंदी : एतहि क’ देल जाय...
[सब प्रसन्न भ’ जाइत छथि – स्पष्टतः सभक दुश्चिन्ता दूर भ’ जाइत छनि। प्रेमिका लजा’ जाइत छथि, प्रेमी सेहो प्रसन्न, मुदा कनेक शंकित सेहो-]
भृंगी : खाली इयैह सोच’ पड़त’ जे कन्यादान के करत... !
बाजारी : (आगाँ बढ़ि कए) आ हम त’ छी ने ! (कहैत प्रेमिकाक माथ पर हाथ रखैत छथि; स्नेहक आभास–प्रेमिका झुकि कए हुनक पैर छूबैत छथि।)
भृंगी : बस आब दरकार खाली ढोल-पिपही आ बाजा–गाजा... !
नंदी : सेहो भ’ जेतैक... !
[दुनू हाथ सँ तीन बेर ताली दैत छथि। एकटा कतार सँ ढोल–पिपही-बाजा बजौनिहार सब आबैत छथि आ बाजा-बजब’ लागै छथि। सबटा पात्र हुनके सभक पाछू - पाछू एकटा पंक्ति मे चलैत-नाचैत, आनन्द करैत बाहर चलि जाइत छथि।]
[मंच पर रहि जाइत छैक मात्र बंद विशाल स्वर्ग-द्वार। स्पॉट-लाईट दरबज्जा पर पड़ैत अछि आ अन्हार भ’ कए प्रथम कल्लोलक समाप्तिक घोषणा करैत अछि।]

***
दोसर कल्लोल



दोसर कल्लोल
[पश्चाद्पट मे स्वर्ग-द्वारे लखा दैछ मुदा मंचक एक दिसि द्वारक बाम भागक देबार लग एकटा भाषण देबा जोकर कनेक ऊँच भाषण-मंच आ ताहि पर एकटा माईक देखल जायत। भाषण-मंच पर तीनटा नीक कुर्सी देखल जायत। ओमहर दरबज्जाक सामने आ भाषण-मंचक लग बाईस-चौबीस-टा भाड़ा केर कुर्सी सेहो राखल रहत जाहि पर चारि-टा मृत सैनिक सँ ल’ कए चारि-गोट बाजा बजौनिहार आ प्रथम कल्लोल मे देखल सब गोटे – नंदी– भृंगी केँ ल’ कए चौदहो गोटे बैसल प्रतीक्षा करैत छथि। लगैछ सब क्यो प्रतीक्षा करैत-करैत परेशान भ’ गेल छथि।]
अनुचर-1 : (नेताजी एखनहु धरि नहि आयल छलाह। हुनक दूटा अनुचर मे सँ एक गोटे कहुना माईक पर किछु ने किछु बजबाक प्रयास क’ रहल छल – जाहि सँ लोग ऊबि कए कतहु सरकि ने जाय!) त’ भाई – बहिन सब ! जे हम कहै छलहुँ... आजुक एहि अशांतिमय परिवेश मे एकमात्र बदरीये बाबू छथि जे शांतिक दूत बनि कए मथिले मात्र नहि, समस्त भारतक आतंकवादी, कलेसवादी, उग्रवादी, अत्यूग्रवादी, चंडवादी, प्रचंडवादी सँ ल’ कए सब तरहक विवादीक झगड़ा-विवादकेँ मेटैबाक लेल द्विचक्रयान सँ ल’ कए वायुयान धरि , सभ तरहक वाहन मे अत्यंत कष्ट आ जोखिम उठा कए सफर करैत रहलाह। आ अहिना सब ठाम... सगरे, अपन बातक जादुई छड़ीकेँ चलबैत सभक दुःख- दर्द केँ दूर करैत रहलाह। मिथिलाक महान नेता एक बद्री-विशाल सिंहे छथि जे...
बाजारी : (परेशान भ’ कए) हौ, से सबटा त’ बुझलियह मुदा ई त’ बताब’ जे बद्री बाबू छथि कत’?
बीमा-बाबू : आर कतेक देर प्रतीक्षा करय पड़त ?
अनुचर 2 : (जे भाषण-मंचक कोना पर ठाढ़ रहैत अछि आ बीच-बीच मे उतरि कए बाहर जा कए झाँकि कए देखबाक प्रयास क’ कए घुरि-घुरि आबैत छल।) हे, आब आबिये रहल हेताह !
बाजारी : हे हौ! इयैह बात त’ हम सब बड़ी काल सँ सुनि रहल छियह ! “आब आबिये रहल छथि...”
बीमा-बाबू : आ बैसल बैसल पैर मे बघा लागि रहल अछि...हमरा सँ त’ बेसी देर धरि बैसले नहि जाइत अछि।
अनुचर 1 : (सब केँ शांत करैत) हे...बात सुनू... बात सुनू भाइ-सब ! बैसै जाउ, कने शांत भ’ कए बैसल ने जाइ जाउ!
अनुचर 2 : (बजबाक भंगिमा सँ स्पष्ट भ’ जाइत छनि जे फूसि बाजि रहल छथि-) कनिये काल पूर्व ओ धर्म-शिला हैलिकॉप्टर पर सँ उतरल छथि। आब ओ रास्ता मे छथि– कखनहु पहुँचि सकै छथि... !
अनुचर 1 : आब जखन ओ आबिये रहल छथि, प्रायः पहुँचिये गेल छथि, आजुक समय-समन्वय-सामान्यजन आ चारुकात चलि रहल अनाचार दय बद्री बाबूकेँ की कहबाक छनि, से सुनैत जाय जाउ !
बाजारी : अच्छा त’ कह’ ने कोन नव बात कहब’!
अनुचर1 : ओना अहीं कियैक हम सब चाहै छी जे सब किछु नव हो... ! रास्ता नव हो, ओ पथ जतय पहुँचत से लक्ष्य नव हो, एहन पथ पर सँ चलनिहार हमरा-अहाँ सनक पुरनका जमानाक लोग मात्र नञि – नवीन युगक नवतुरिया सब हो ! पुरातन ग्लानि, पुरना दुःख-दर्द सब, प्राचीने इतिहासक पृष्ठ पर हमसब ओझरायल जकाँ मात्र ठाढ़ नहि रही, किछु नव करी... !
बीमा-बाबू : ई बात त’ ठीके कहि रहल छी।
भद्र व्यक्ति : (दुनू गोटे) ‘ठीक, ठीक ! एकदम ठीक”, आदि।
अनुचर1 : आ इयैह बात बद्री विशाल बाबू सेहो बाजैत छथि-विशाल जनिक हृदय, श्रम-जीवी मनुक्खक लेल जनिक हृदय सँ सदिखन रक्त झरै छनि, जनिका लेल पुरनका लोक, रीति-रेवाज ततबे महत्वपूर्ण जतबा नवयौवनक ज्वार, नवीन पीढ़ीक आशा-आकांक्षा - ई सब किछु। आजुक युग मे वैह एकटा राजनेता छथि जे नव आ पुरानक बीच मे एकटा सेतु बनल स्वयं ठाढ छथि आ ओ सेतु जेना कहि रहल हो---
आउ पुरातन, आऊ हे नूतन।
हे नवयौवन, आऊ सनातन ।।
प्राण-परायण, जीर्ण जरायन।
बज्र-कठिन प्रण गौण गरायन।।
सुतनु सुधनु सुख सँ गायन।
जीर्ण ई धरणी तटमुख त्रायन ।।
अघन सधन मन धन-दुख-दायन।
जाऊ पुरातन, आऊ नवायन।।
[एहन उत्कृष्ट काव्य-पाठ सुनि रद्दी-बला आ भिख-मंगनी प्रशंसा सूचक “वाह-वाह” कहैत ताली बजाब’ लागै’ छथि। त’ हिनका दुनू केँ देखि अनुचर 2 आ नंदी-भृंगी केँ छोड़ि बाकी सब सोटे ताली बजाब’ लागैत छथि।]

चोर : (लगमे बैसल रद्दी-बला केँ) हे... किछु बुझलह एकर कविता कि आहिना ? (रद्दी-बला आँखि उठा कए मात्र देखैत अछि, जिज्ञासा आँखि मे...) हमरा त’ किछु नहि बुझ’ मे आयल।
रद्दी-बला : नव किछु भरि जिनगी कैने रहित’ तखन ने? एहि ठामक माल ओम्हर...आ ओहि ठामक एम्हर... !
भिख-मंगनी : ठीके त’! तोँ कोना बुझबह ?
चोर : पहिल दूटा पाँती त’ बुझिये गेल छलहुँ। मुदा तकर बाद सबटा कुहेस जकाँ अस्पष्ट...एत्तेक नवीन छल जे बुझ’ मे नहि आयल !
अनुचर 2 : हे! के हल्ला क’ रहल छी ?
भिख-मंगनी : हे ई चोरबा कहै छल...
चोर : (डाँटैत) चुप! भिख-मंगनी नहितन... हमरा ‘चोर’ कहैये!
भिख-मंगनी : हाय गौ माय! ‘चोर’ केँ ‘चोर’ नहि कहबै त’ की कहू ? कोन नव नामे बजाऊ ?
अनुचर 1 : (माईक सँ, कनेक स्वर केँ कर्कश करैत) हे अहाँ सब एक दोसरा सँ झगड़ा नहि करु! जे किछु बतिआबक अछि, हमरे सँ पुछू ! (भिख-मंगनी केँ देखा कए) हे अहाँ... (भिख-मंगनी एम्हर-ओम्हर देखैत अछि) हँ, हँ – अही केँ कहै छी ! बाजू...की बाजै छलहुँ ? पहिने बाजू- अहाँ के छी ?
चोर : (बिहुँसैत) भिख-मंग- (वाक्य अधूरे रहि जाइत छनि, कियैक त’ भिख-मंगनी झपटि कए चोरक मुँह पर हाथ ध’ दैत अछि-बाँकी बाजै नहि दैछ।) (तावत् दुनू अनुचर झपटा-झपटी देखि कए, “हे... हे...!” कहैत मना करबाक प्रयास मे अगुआ अबैत अछि।)
भिख-मंगनी : (चोरक मुँह पर सँ अपन हाथ केँ हँटाबैत, ठाढ़ भ’ कए अपन परिचय दैत, कने लजबैत...) हमर नाम भेल ‘अनसूया!’
अनुचर1 : अच्छा, अच्छा! त’ अहाँ अवश्ये श्रमजीवी वर्गक छी...सैह लागैत अछि !
भिख-मंगनी : हँ!
अनुचर 2 : कोन ठाम घर भेल ?
भिख-मंगनी : घर त’ भेल सरिसवपाही...मुदा,
अनुचर 2 : मुदा?
भिख-मंगनी : रहै छलहुँ दिल्ली मे... असोक नगर बस्ती मे...
अनुचर 1 : आ’ काज कोन करैत छलहुँ बहिन ?
भिख-मंगनी : गेल त’ छलहुँ मिथिला चित्रकलाक हुनर ल’ कए, अपन बनायल किछु कृति बेच’ लेल... मुदा,... (दीर्घ-श्वास त्यागि) के जानै छल, जे ओ शहरे एहन छल जत’ कला-तला केर कोनो कदर नहि... अंतत: हमरा कोनो चौराहाक भिख-मंगनी बना कए छोड़ि देलक।
अनुचर 2 : आ-हा-हा,ई त’ घोर अन्याय भेल अहाँक संग। घोर अन्याय... अन्हेर भ’ गेल!
अनुचर 1 : (प्रयास करैत प्रसंगकेँ बदलैत छथि– गला खखाड़ि कए) मुदा ई नहि बतैलहुँ जे अहाँ कह’ की चाहैत छलहुँ ?
भिख-मंगनी : हमरा लागल, अहाँ जे बात कहि रहल छलहुँ ताहि मे बहुत किछु नव छल, तकर अलावे-
रद्दी-बला : हमरा सब केँ त’ बुझ’ मे कोनो दिक्कति नहि भेल, मुदा
अनुचर 2 : मुदा ?
भिख-मंगनी : (चोर केँ देखा कए) हिनकर कहब छनि जे मात्र पहिल दूटा पाँतीक अर्थ स्पष्ट छल, आ तकर बाद...
अनुचर 1 : ओ...आब बुझलहुँ। भ’ सकैछ...ई भ’ सकैछ जे किनको-किनको हमर सभक वक्तव्य कठिन आ नहि त’ अपाच्य लगनि। ई संभव अछि जे हिनका लेल नव-पुरानक संज्ञा किछु आरे...
[बात पूरा हैबाक पूर्वे रद्दी-बला आ भिख-मंगनी हँसि दैत अछि...संगहि उचक्का आ बाजारी सेहो। अनुचर-द्वय बुझि नहि पबैत छथि जे ओसब कियैक हँसि रहल छलाह।] कियैक ? की भेल ? हम किछु गलत कहलहुँ की ?
रद्दी-बला : अहाँ कियैक गलत वा फूसि बाजब?
भिख-मंगनी : अहाँ त’ उचिते कहलियैक।
बाजारी : मुदा हिनका पूछि कए त’ देखू-ई कोन तरहक सेवा मे नियुक्त छथि !
अनुचर 2 : [अनुचर-द्वय बूझि नहि पबैत छथि जे की कहताह।] क.. कियैक?
अनुचर 1 : (चोर सँ) की सब बाजि रहल छथि ई-सब?
[चोर शांत-चित्तेँ उठि कए ठाढ होइत अछि आ भाषण–मंचक दिसि आगाँ बढैत जाइत अछि। अंत मे मंच पर चढ़ि कए बजैत छथि...]
चोर : (अनुचर 1 केँ) जँ ई चाहै छी हमर उत्तर सुनब, आ जँ सत्ते किछु नव सुन’ चाहै छी तखन हमरा कनीकाल माईक सँ बाजै देमे पड़त। (अनुचर-द्वय केँ चुप देखि) कहू की विचार!
अनुचर 1 : (नर्वस भ’ जाइत छथि) हँ-हँ, कियै नञि?
चोर : [माईक हाथ मे पाबि चोर कुर्ता केर आस्तीन आदि समटैत एकटा दीर्घ भाषणक लेल प्रस्तुत होइत छथि।] अहाँ सब आश्चर्यचकित हैब आ भरिसक परेशान सेहो, जे हम कोन नव बात कहि सकब। [अनुचर-द्वय केँ अपन परिचय दैत] आखिर छी त’ हम एकटा सामान्य चोरे, छोट-छीन चोरि करैत छलहुँ, मुदा भूलो सँ ककरहु ने जान नेने छी आ ने आघाते केने छी। चोरि केँ हम अपन कर्म आ धर्म बुझैत छलहुँ – ई जेना हमर ढाल जकाँ छल हमरा कोनो बड़का अपराध सँ बचैबाक! सोचै छलहुँ जे चोरि, माने तस्करता – एकटा ऊँच दर्जा केर कला सैह थिक। सामान्य भद्र व्यक्तिक लेल एतेक सहजे ई काज संभव नहि भ’ सकैत छनि। (दुनू भद्र व्यक्तिकेँ देखा कए) हिनके दुनू केँ देखिऔन ने...त’ हमर बात बूझि जायब।(हँसैत) हिनका दुनूक समक्ष कोनो लोभनीय वस्तु राखि दियनु... तैयहु, इच्छा होइतहु ई लोकनि ओहि वस्तु केँ ल’ कए चम्पत् नहि भ’ सकैत छथि। (गंभीर मुद्रामे) कहबाक तात्पर्य ई जे जेना मिथिला चित्रकला एकटा कला थिक, चोरि करब सेहो चौंसठि कलाक भीतर एकटा कला होइत अछि।

अनुचर 2 : मानलहुँ। ई मानि गेलहुँ जे चौर्यकला एकटा महत्वपूर्ण वृत्ति थिक, मात्र प्रवृत्ति नहि। मुदा...
चोर : (हुनक बात केँ जेना हवा मे लोकि लैत छथि) मुदा ई प्रश्न उठि सकैत अछि जे हम चोरि करिते किएक छी ? विशेष...तखन, जखन कि परिवारमे क्यो अछिये नहि.. तखन एहन कार्य अथवा कलाक प्रयोगक कोन प्रयोजन छल?
बाजारी : ठीक !
चोर : जँ आन-आन वृति सभ दय सोची त’ ई बूझब कठिन भ’ जाइत अछि जे चोरी वा तस्करी कत’ नहि अछि? आजुक संगीतकार पछिलुका जमाना केर गीत-संगीतसँ ‘प्रेरणा’ लैत छथि। तहियौका संगीतकार पुरनका संगीतकेँ नव शरीरमे गबबै छलाह। हुनकर सभक ‘प्रेरणा’ छलनि कीर्तन आ लोक-संगीत। आ कीर्तनिञा लोकनि केँ कथी लेल हिचकिचाहटि हैतनि अपनहु सँ प्राचीन शास्त्रीय संगीत सँ कनी-मनी नकल उतारबामे ? (थम्हैत सभक ‘मूड’ केँ बुझबाक प्रयास करैत) सैह बात सनीमा मे थियेटर मे ... कथा, कविता मे सेहो....!

बाजारी : तोँ कहैत छह आजुक सभटा लेखक कल्हुका साहित्यकारक नकल करैत अछि, आ कल्हुका लोक परसुका कवि लेखकक रचनासँ चोरी करै छल...?
अनुचर 1 : माने चोरि पर चोरि...?
अनुचर 2 : आ चोरिये पर टिकल अछि दुनियाँ ?
बाजारी : हे... ई त’ अन्हेर क’ देलह हौ...!
चोर : अन्हेर कियै हैत ? कोनो दू टा पाँति ल’ लिय’ ने - ‘मेघक बरखा....
बाजारी : ई त’ रवीन्द्रनाथ ठाकुरक कविता भेल, नेना-भुटका सभ लेल लिखल...
भद्र व्यक्ति 1 : (असंतुष्ट स्वरमे) एहिमे चोरी केर कोन बात भेल ?
बाजारी : ओ ककर नकल उतारि रहल छलाह ?
भद्र व्यक्ति 2 : हुनका सन महान कविकेँ चोर कहै छी ?
चोर : (जेना हिनका सभक बात सुनतहि नहि छथि-हाथसँ सभटा बात केँ झारैत...) विद्यापतियेक पाँति लिय—“माधव बहुत मिनती करी तोय !”
उचक्का : एकरा लखे तँ सभ क्यो चोर...
पॉकिट-मार : (हँसैत) आ सबटा दुनियाँ अछि भरल फुसिसँ...सबटा महामाया...
बाजारी : हे एकर बातमे नहि आउ ! (अनुचर द्वयसँ) अहाँसभ कोन नव बात कहै दय छलहुँ...सैह कहु ।
चोर : (उच्च स्वरमे) कोना कहताह ओ नव बात ? विद्यापतिक एहि एक पाँतिमे कोन एहन शब्द छल जे ने अहाँ जानै छी आ ने हम? ‘माधव’... ‘बहुत’... वा ‘मिनती’... अथवा एहन कोन वाक्य ओ बाजैत छलाह जे हुनकासँ पहिनहि क्यो नहि बाजि देने छल ? आ शतेको एहन कवि भेल हेताह जे मेघक बरिसब दय बजने हेताह आ एहन सभटा शब्दसँ गढ़ने हेताह अपन कविता केँ ?
(सभ क्यो एहि तर्क पर कनेक चुप भ’ क’ सोच’ लेल बाध्य भ’ जाइत छथि।)
अनुचर 1 : माने...?
चोर : माने ई जे दुनियाँ मे एहन कोनो वाक्य नञि भ’ सकैछ जकर एकटा बड़का टा अंश आन क्यो कखनहु कतहु कोनो ने कोनो उद्देश्यसँ वा मजबूरीसँ बाजि नञि देने होथि ! भ’ सकैछ अहाँ तीन व्यक्तिक तीनटा बातक टुकड़ी- टुकड़ी जोड़ि कय किछु बाजि रहल होइक ! एहिमे नव कोन बात भ’ सकैछ ?
बाजारी : हम सदिखन नव बात कहबा लेल थोड़े बाजै छी ? हम त’ मोनक कोनो ने कोनो भावनाकेँ बस उगड़ि दैत छी....।
चोर : आ तैँ आइ धरि जे किछु बजलहुँ से सभटा बाजारमे.... माने एहि पृथ्वीक कोनो ने कोनो बाजारमे क्यो ने क्यो अथवा कैक गोटे पहिनहुँ बजने छल ?
अनुचर 1 : तखन अहाँ कह’ चाहै छी जे....
चोर : (पुन: बातकेँ काटैत) ने अहाँ किछु नव बात कहि सकै छी आ ने अहाँ केर नेता...।
(तावत नेपथ्यमे शोर होइत छैक ..”नेताजी अयलाह”, “हे वैह छथि नेताजी” कतय, कतय यौ ! हे देखै नञि छी ? आदि सुनबामे अबैत अछि। क्यो नारा देम’ लागैत अछि---‘नेताजी जिन्दाबाद’ देशक नेता बदरी बाबू जिन्दाबाद, जिन्दाबाद ! आदि सुनल जाइछ। मंचपर बैसल सब गोटामे जेना खलबली मचि गेल होइक। सभ उठि कय ठाढ़ भ’ जाइत छथि। क्यो-क्यो अनका सभक परवाहि कयने बिनु अगुआ ऐबाक प्रयास करैत छथि।
तावत गर मे एकटा गेंदाक माला पहिरने आ कपार पर एकटा ललका तिलक लगौने कुर्ता - पैजामामे सभकेँ नमस्कार करैत नेताजी मंच पर अबैत छथि...पाछू- पाछू पाँच-सात गोटे आर अबैत छथि आ सब मिलि कए एकटा अकारण भीड़क कारण बनि जाइत छथि। “नमस्कार ! नमस्कार ! जय मिथिला... जय जानकी माता..कहैत ओ मंच पर उपस्थित होइत छथि आ बगलहिमे माईक पर चोरकेँ पबैत छथि।
धीरे-धीरे सब क्यो अपन-अपन आसन पर बैसि जाइत छथि, अनुचर दुनू कोना की करताह नेताजीक लेल से बुझि नहि पबैत छथि, कखनहु लोककेँ शांत करैत छथि त’ कखनहु “नेताजी जिन्दाबाद” ! कहि छथि त’ फेरो कखनहुँ हुनक पाछू-पाछू आबि कए कुर्सी आदि सरिआब’ लगैत छथि। अतिरिक्त लोक सभ तावत् बाहर चलि जाइत छथि।)
नेताजी : (अनुचर 1 सँ चोर केँ देखा कए) ई के थिकाह ? (दुनू अनुचर की कहताह से बुझि नहि पबैत छथि।)
चोर : (अपनहि अगुआ कए अपन परिचय दैत) जी, हम एकटा सामान्य कलाकार छी...?
नेताजी : (उठि कए अपन बात कहैत चोर केँ आलिंगन करैत) अरे...अरे.... अहोभाग्य हमर...!
चोर : (अपनाकेँ छोड़बैत) नञि, नञि अहाँ जे बुझि रहल छी से नञि...
नेताजी : माने ?
चोर : हमर कलाकारी त’ बड़ साधारण मानक थीक।
बाजारी : औ नेताजी... अहूँ कोन भ्रम मे पड़ि गेलहुँ ‘चोर’ थिकाह ई.... ‘चोर’! ...(चोर माथ झुका लैत अछि)।
नेताजी : (चौंकैत मुदा अपन विस्मय पर प्रयास क’ कए काबू पाबि) आँय...ताहिसँ की, ई त’ हमरे गाम-घरक पाहुन छथि.... (कनेक ‘मुस्की’ दैत) क्यो जनमे सँ त’ ‘चोर’ नहि होइत अछि....हमर समाजक स्थितिये ककरो चोर त’ ककरो ‘पॉकिट-मार’ आ ककरहु-ककरहु ‘उचक्का’ बना दैत अछि।
(जखन ओ ‘पॉकिट-मार’ आ ‘उचक्का’ दय बजैत छथि तखन एक-एक क’ कए पॉकिट-मार एवं उचक्का उठि कए ठाढ़ भ’ जाइत अछि)
पॉकिट-मार : हुजूर ! हम छी पॉकिट-मार !
उचक्का : हम एकटा उचक्का छी... लफंगा कही त’ सेहो चलि सकैछ… गली-मोहल्लाक ‘दादा’ छी !
नेताजी : (जेना संतुष्ट भेल होथि) वाह ,वाह.... एत’ त’ देखि रहल छी सब तरहक लोक उपस्थित भेल छथि। हमर माथा फोड़ैत काल विरोधी पक्षक नेता ठीके कहने छलाह जे स्वर्ग आ नर्कक बीचमे हमरा अपन संसारक एकटा छोट- छीन सजिल्द संस्करण भेटि जायत....हमरा ऊकडू नञि लागत दुनियाँ छोड़ि कए जायमे...! (थम्हैत) एत त’ देखि रहल छी क्यो बाजारक झोरा नेने छथि त’ क्यो प्रेमक जीवैत पोथा नेने आ क्यो - क्यो रणभूमिसँ सोझे बन्दूक नेने उपस्थित भेल छथि, बस जे किछु कमी अछि से....
[हिनका बाजैत-बाजैत एकटा युवक प्रवेश करैत अछि, हाथमे एकटा ललका झंडा नेने—वामपंथी बातचीत हाव भाव तेहने]
वामपंथी : जे किछु कमी अछि से हम पूरा क’ दैत छी।
(सभ क्यो चौंकि कए हुनका दिसि देखैत छथि)
उचक्का : (जेना चिन्हल लोक होथि) रौ जीतो छीकेँ रौ ? जितेन्दर ?
वामपंथी : (उग्र स्वरमे) जीतो ? के जीतो ? कतहुका जीतो? हम त’ सब दिन हारले लोकक दिसि झुकल छी।
नेता : हँ, हँ से सब त’ ठीके छैक—त’ अहाँ एत’ आउ ने मंच पर ....(वामपंथी युवक प्रसन्न भ’ कए मंच पर चढ़ैत छथि—दुनू अनुचरसँ आप्यायित भ’ कए आर अधिक प्रसन्न होइत छथि।) एत’ सत्ते अहाँ सन् महान युवा नेता केर अभाव खटकि रहल छल अहाँ भने हारल लोकक नेता होइ, अहाँ लोकनिक झंडाक रंग जे हो – लाल कि हरियर, हमरा सभक पीढ़ीक सबटा आशा, अहीं सब छी...
वामपंथी : से सब त’ ठीक अछि, मुदा (चोर केँ देखा क’) ई के थिकाह ?
नेता : ई एकटा पैघ कलाकार थिकाह।
चोर : (टोकैत) हम चोर थिकहुँ सरकार।
वामपंथी : आँय ?
पॉकिट-मार : (भीड़मे ठाढ़ होइत) हम पॉकिट-मार !
उचक्का : (ओहो लगलहि उठि कए ठाढ होइत छथि) आ हम उचक्का !
भिख-मंगनी : (उठि कय) हम भिख-मंगनी !
रमणी मोहन : हम बलात्कारक सजा भोगि रहल छी—जनताक हाथे पीटा क’ एत’ आयल छी।
वामपंथी : (आक्रोश करैत) छी,छी, छी ! एहन सभ लोक छैक एतय... (नेताकेँ पुछैत) आ’ अहाँ चोर-चोट्टा लोकनिक नेता थिकहुँ ? अफसोस अइ.....
नेता : आ- हा-हा ! एतेक अफसोस किएक क’ रहल छी ? जखन दुनियाँ मे हर तरहक लोक होइत छैक, तखन ई स्वाभाविक छैक जे एत्तहु एकर पुनरावृति हैत । आ ईसा मसीह की कहैत छथि ?
अनुचर 1 : चोरीक निन्दा करू !
अनुचर 2 : चोरक नहि !
चोर : ई बात ईसा मसीह नहि कहने छथि.....
अनुचर 1 : तखन ?
अनुचर 2 : की कहने छलाह ?
चोर : पापक त्याग करू, पापीक नहि.....!
वामपंथी : जाय दिअ धार्मिक गप-शप....! (चोर सँ) त’ अहाँ की कह’ चाहै छी ? चोरी पाप नहि थिक ?
चोर : (बिहुँसैत) ‘पाप’ आ पुण्यक चिन्ता वामपंथीक सीमासँ बाहरक गप्प भेल। हम कहै छलहुँ दुनियाँक सबटा जीबैत कवि-कथाकार मुइल कवि-कथाकारक कंधे पर अपन इमारत ठाढ़ करैत छथि....के केहन कलाकारीसँ अनकर बात केँ परोसत तकरे खेल छइ सबटा.....!
अनुचर 1 : ई कहै छथि पीढी-दर-पीढी सब क्यो अनकहि बात आ खिस्सा पर गढैत अछि अपन कहानी.....
अनुचर 2 : कहि छथि—किछु नहि नव अछि एहि दुनियाँमे.... सबटा पुराने बात !

नेता : अर्थात् चोरायब एकटा शाश्वत प्रवृति थिक ।
वामपंथी : नॉन-सेन्स !
नेता : कियैक ? पृथ्वीराज संयुक्ता केँ ल’ कए चम्पत नहि भेल छलाह ? आ अर्जुन चित्रांगदाकेँ ? (युवा केँ माथ डोलबैत देखि) आ किसुन भगवानकेँ की कहबनि ? कतहु ‘माखन’ चोराबैत छथि त’ कतहु ‘कपड़ा लत्ता’…
वामपंथी : (खौंझैत) इयैह भेल अहाँ सब सन नेताक समस्या... अहिना मारल गेल हिन्दुस्तान! मौका भेटतहि ब्रह्मा- विष्णु-महेश केँ ल’ आबै छी उतारि क’ ताखा पर सँ....
बाजारी : (मजाक करैत) हे... आब आबि गेल छी हमहीं सब ताखा पर सँ उतरि स्वर्गक द्वार मे...चलब ओहि पार तँ ई सब भेंट हैबे करताह।
नेता : मानू, आ कि नहि मानू.... छी त’ जाहि देशक लोग तकर नामो मे त’ इतिहासे–पुराण लेपल अछि कि नञि ? ‘भारत’ कही त’ ‘भरत’ क कथा मोन पड़त आ ‘हिन्दुस्तान’ कही त’ ‘हिन्दू’ केँ कोना अलग क’ सकै छी ?
बाजारी : (व्यंग्यक स्वरमे) हे - ई सब अपन देश मे थोड़े ओझरायल रहताह ? ई सब त’ बस बामे कात दैखैत रहैत छथि—ने भारत कहता आ ने हिन्दुस्तान ! ई सब त’ ‘इण्डिया’ कहताह ‘इण्डिया’ !
पॉकिट-मार : (कमर डोला कए दू डेग नाचियो लैत छथि) “आइ लव माइ इण्डिया.... आइ लव माइ इण्डिया” !
वामपंथी : (डपटैत) थम्हू ! (पॉकिट-मार जेना अधे नाचि कए प्रस्तरीभूत भ’ जाइत छथि।) ई सब ‘चीप’ बात कतहुँ आन ठाम जा क’ करू (नेतासँ) देश-प्रेम अहीं सभक बपौती नहि थिक !
नेता : नञि - नञि से हम सब कत’ कहलहुँ ?
अनुचर 1 : हम सब त’ कहि रहल छी— देश-प्रेमो सँ बढि कए भेल अहाँ सब लेखे-विश्व-प्रेम !
अनुचर 2 : ‘यूनिवर्सल ब्रदरहूड’ !
अनुचर 1 : (जेना नारा द’ रहल होथि) दुनियाँक मजदूर ...!
अनुचर 2 : एक हो !
(एकबेर आर नाराकेँ दोहराबैत छथि। तेसर बेर जखन अनुचर 1 कहैत छथि—दुनियाँक किसान तखन उचक्का, पॉकिट-मार, भिख-मंगनी, रद्दीवला अपन-अपन मुट्ठी बन्न कएने सीना तानि कए कहैत छथि ‘लाल सलाम’)
वामपंथी : बंद करू ई तमाशा !
नेता : (हाथसँ इशारा करैत) हे सब गोटे सुनू त’ पहिने ओ की कह’ चाहै छथि....!
वामपंथी : (गंभीर मुद्रामे) अहाँ मस्खरी करू कि तमाशा.... देशक बाहर दिस देखबामे हर्जे की ?
अनुचर 1 : हर्ज कोनो नहि।
वामपंथी : बाहरसँ जँ एकटा हवा केर झोंका आओत त’ अहाँ की खिड़की केँ बन्न क’ कए रखबै ?
अनुचर 2 : कथमपि नहि !
वामपंथी : कार्ल मार्क्स सन महान व्यक्तिक बात हम सब किएक नञि सुनै लै तैयार छी ?
अनुचर 1 : कियै नहि सुनब ?
वामपंथी : दुनियाँक सबटा मजदूर-किसान जँ एक स्वर मे बाजै त’ एहिमे अपराध की ?
अनुचर द्वय : (एक्कहि स्वरमे) कोनो नहि !
वामपंथी : लेनिन जे पथ दैखौलनि, ताहि पर हम सब कियै नञि चलब ?
वामपंथी : इन्कलाब !
अनुचर द्वय : जिन्दाबाद !
वामपंथी : (मुट्ठी तानैत) जिन्दाबाद, जिन्दाबाद !
अनुचर द्वय : (नारा देबाक स्वरमे) इन्कलाब जिन्दाबाद ! (कहैत –कहैत दुनू अनुचर जेबी सँ छोटका सन कैकटा लाल पताका निकालि क’ एक-एकटाकेँ हाथमे धरैत तथा धराबैत मंचक चारूकात नाराबाजी करैत चक्कर काटय लागै छथि। दुनूक पाछाँ - पाछाँ पॉकिट-मार, भिख-मंगनी, उचक्का, रद्दीवला सेहो सब जुटि जाइत छथि, सभक हाथमे छोट-छोट लाल झंडी, सभ क्यो तरह-तरहक नारा दैत छथि। एकटा चक्कर काटि कए जखन ओ सभ पुन: भाषण मंचक लग आबि जाइत छथि। मुदा भाषण- मंचक लग पहुँचि कए नारा केर तेवर दोसरे भ’ जाइत अछि।)
उचक्का : (जेना मजाक करै चाहैत छथि) “हम्मर नेता चेयरमैन माओ”
बाँकी लोग : “बाँकी सब क्यो दूर जाओ !”
चोर : (भाषण मंच पर सँ) एक मिनट ....थम्हू, थम्हू ! (सब क्यो चुप भ’ जाइत छथि, आब वामपंथी युवा आ नेताजी दिसि घुरि कए बाजैत छथि--) इयैह त’ हमहूँ कह चाहैत छलहूँ... ने हमरा लेलिन सँ शिकायत छनि ने चेयरमैन माओ सँ..... दुनू अपन देश, अपन लोगक लेल अनेक काज कयलनि अथक श्रम कयने छलाह भरि जिनगी ; ने गीतासँ शिकायत ने गुरूवाणी सँ दुनू अप्पन अप्पन जगह मे अत्यंत महत्वपूर्ण अछि... मुदा एतबे कहै छलहुँ जे एहिमे सँ क्यो अथवा किछुओ हवा सँ नञि बहि कए आयल छल.... शून्य सँ नहि उगल छलाह क्यो !
(सभ क्यो चुप्प भ’ कए चोरक दलील केँ सुनै छथि आ तकर तर्क केँ बुझक’ प्रयास करैत छथि।) सब एक दोसरासँ जुड़ल छथि । मार्क्स नञि होइतथि त’ भरिसक लेलिनो नञि, आ ओ अयलाह तैं माओ सेहो... प्रत्येक घटनाक पूर्वपक्ष होइ छैक.....
वामपंथी : (हँसैत) माने क्यो ‘ओरिजिनल’ नञि सबटा ‘डुप्लीकेट’, क्यो नहि असली सबटा नकली !
(सभ हँसि दैत छथि)
चोर : हम कत’ कहलहुँ..... ‘सब क्यो नकली, सबटा चोर !’ ई सब त’ अहाँ लोकनि कहि रहल छी। (थम्हैत) हम मात्र कहल, कोनो बात पूर्ण रूप सँ नव नञि होइत अछि... ओहिमे कत्तेको पुरनका प्रसंग रहैत अछि ठूसल !
नेता : (सभक दिसि देखैत) तर्क त’ जबरदस्त देने छथि (वामपंथी युवाक व्यंग्य करैत) नीक-नीक केँ पछाड़ि देने छथि ।
अनुचर 1 : मुदा हिनकर थ्योरीक नाम की भेलनि ?
अनुचर 1 : कोन नामसँ जानल जायत ई....?
नेता : कियै ? ‘चोर पुराण’!
(सब क्यो हँसैत छथि—वामपंथी युवाकेँ छोड़ि—हुनका अपन पराजय स्वीकार्य नञि छनि)
बाजारी : त’ सुनै जाउ हमर गीत....
नेता आ दुनू अनुचर: हँ ,हँ, भ’ जाय...!
बाजारी : (गाबैत छथि आ कनी-मनी अंग संचालन सेहो करैत छथि)
एत’ चोर कोतवाल केँ डाँटै,
गाबै जाय जाऊ चोर-पुरान !
कतबा नव छै कतेक पुरनका,
के छै ज्ञानी के अज्ञान ?
गाबै जाय जाऊ चोर-पुरान !
गर्तक भीतर शर्त्त रहै छइ,
शर्त्तक भीतर भूर पुरान !
नाच नचै छै गीत गबै छइ,
सब केर बाहर भीतर ठान !
गाबै जाय जाऊ चोर-पुरान !
नव त’ किछुओ नञि छइ बौआ,
सबटा जानल छइ पहिचान !
एक-दोसराकेँ जोड़ि दैत अछि,
धोख् धिनक-धिन् चोर पुरान!
गाबै जाय जाऊ चोर-पुरान !
(जखन ओ एकक बाद एक पाँति गाबि रहल छलाह, धीरे-धीरे आनो लोग सब गाबै - नाचै मे अपनाकेँ जोड़ि रहल छलाह। अनुचर 1 कतहु सँ एकटा गेंदा केर माला ल’ क’ चोरक गरा मे पहिरा दैत छथि। अनुचर 2 एकटा थारी मे कर्पूरक दीप बारैत चोरक आरती सेहो क’ दैत छथि भिख-मंगनी आगाँ बढि चोर केँ तिलक सेहो लगा दैत अछि। धीरे-धीरे चोर मंच सँ उतरि कए नचैत-गबैत लोग सभक बीच आबि जाइत अछि—तावत् गीत चलिए रहल छल)
बाजारी : हम छी चोर आ चोर अहूँ छी,
साधु-संत घनघोर अहूँ छी !
च-छ-ज-झ छोर अहीं छी,
नदी किनारक जोर अहीं छी !
झोर बहइ यै करै बखान,
गाबै जाय जाऊ चोर-पुरान !
नऽव तनिक छै दऽ ब तकर गर,
परखि-झरकि कए राख बराबर,
प-फ-ब-म मोर अहीं छी,
अन्हारो केर छोर अहीं छी !
करै छी अहींकेँ कपट-प्रणाम!
गाबै जाय जाऊ चोर पुरान !

[नाचैत-गाबैत, ढ़ोल पिपही बजबैत सब क्यो गोल-गोल घुमै छथि। भाषण मंच पर मात्र नेता आ वामपंथी युवा एक बेरि नचनिहार सभक दिसि आ एक बेरि एक-दोसराक दिसि देखि रहल छलाह धीरे-धीरे प्रकाश मद्धिम भ’ जाइत अछि आ अंतमे कल्लोलक समाप्ति भ’ जाइछ।]

***
तेसर कल्लोल



तेसर कल्लोल
[भाषण - मंचपर नेता आ वामपंथी युवा पूर्ववत ठाढ़ छथि—हुनके दुनू पर प्रकाश पड़ैत छनि। बाकी मंच पर लगइत अछि एखनहु भोरूका कुहेस अछि—सब क्यो अर्ध- जाग्रत अर्ध-मृत जकाँ पड़ल छथि। मात्र चारि टा मृत सैनिक बन्दूक तानने भाषण - मंचक आस - पास पहरा दैत नजरि आबि रहल छलाह। तीनटा स्पॉट लाईट—दूटा भाषण-मंच पर आ एकटा बुलंद दरबज्जा पर पड़ल।]
वामपंथी : (क्षुरधार स्वरमे) एकटा बात साफ-साफ बाजू त’...
नेता : कोन बात ?
वामपंथी : इयैह, ई चोरबा जे किछु बाजि रहल छल...
नेता : से ?
वामपंथी : अहाँ तकर सभटा विश्वास करै छी ? (नेता हँसि दैत छथि। से देखि वामपंथी युवा खिसिया जाइत छथि।) हँसि कियै रहल छी ?
नेता : कियै ? हँसी पर पानंदी छैक की ?
वामपंथी : हँसी पर कियैक रहत पानंदी ? मुदा आर कतेको बात पर पानंदी त’ छैक.. अहाँक पार्टी तकरा मानत तखन ने ?

नेता : हमर पार्टी जकरा मानलक अछि, हमरा ताहि पर कोन आपत्ति ?
वामपंथी : (बातकेँ काटैत) झूठ ! सबटा फूसि !
नेता : से कोना ?
वामपंथी : (तर्क दैत) कियैक ? ई नञि निश्चित भेल जे हमसब बान्हल रहब एकटा बंधन मे ?
नेता : हँ, गठ-बंधन त’ भेल छल, जेना मिलल-जुलल सरकार मे होइ छइ...?
वामपंथी : (व्यंग्य करैत) आ तकर कैकटा असूल सेहो होइत छैक....
नेता : जेना ?
वामपंथी : जेना सबटा महत्वपूर्ण बात पर आपसमे बातचीत क’ कए तखन दुनियाक सामने मुँह खोलब... की ? एहन निश्चय भेल छल वा नञि ?
नेता : हँ...!
वामपंथी : आ ताहि बातपर हमसब सरकार केँ बाहर सँ समर्थन द’ रहल छी... छै कि नञि ?
नेता : बेशक ! ठीके बात बाजि देलहुँ।
वामपंथी : मुदा अहाँ की क’ रहल छी ?
नेता : की ?
वामपंथी : (आर धीरज नञि ध’ पबैत छथि--)
तखन बात-बात पर हमरा सब सँ हँटि कए बिल्कुल आने बात कियै करै लागै छी? सदिखन विरोध कियै करै चाहै छी?
नेता : “वाह रे भैया ! वाह कन्हैया—
जैह कहै छी जतबे टा हो—
सब मे कहि दी ता-ता-थैया ?”
की बुझै छी, अहाँ सबक नाङरि धैने चलत हमर पार्टी ?
वामपंथी : प्रयोजन पड़त त’ सैह करै पड़त !
नेता : हँ ! से हिंछा त्यागिये दी त’ नीक ! की त’ हम सरकार केँ नैतिक समर्थन दै छी ? तकर माने की, इयैह जे अहाँ अंट- संट जैह किछु बाजब, हँ-मे-हँ कह’ पड़त ? (वामपंथी किछु कह’ चाहैत छथि) बात त’ ओ कलाकार लाख टाकाक कहि रहल छल। चोरी करैत छल तैं की ? तर्क त’ ओ ठीके देने छल...झूठ त’ नञि बाजि रहल छल ओ !
वामपंथी : तखन आर की ? चोर उचक्के केँ अपन पार्टी मे राखि लियह।
नेता : कियै ? राजनीति मे एत्तेक बड़का-बड़का चोरी क’ कए कतेको गोटे त’ प्रख्यात भैये गेल छथि। आब हुनका सभक पास हैरैबाक योग्य कतेको वस्तु हेतनि ! मुदा तकरा लेल अहाँ आ अहाँक पार्टी कियै डरै छी ?
वामपंथी : हम सब कियै डरब ? हम सब की सरकार चलबै छी जे डर हैत ?
नेता : (हँसैत) ठीके कहलहुँ ! सब सँ नीक त’ छी अहीं सब-ने कोनो काज करबाक दायित्व ने कोनो हेरैबाक दुश्चिन्ता, मात्र बीच-बीच मे हिनका सवाल पूछू त’ हुनका खेदाड़ि केँ भगाउ ! नहि त’ हमरा सभक पार्टिये केँ खबरदार करै लागै छी...... डरा धमका क’ चाहै छी बाजी मारि ली---
वामपंथी : ई त’ अहाँक सोच भेल। हम सब त’ मात्र सदर्थक आलोचना करैत छी—“कॉन्सट्रक्टिव क्रिटिसिज्म” !
नेता : आ हम सब अहाँ लोकनिक पाछाँ घुरिते फकरा कहै छी—
“वाह रे वामा बम-बम भोले !
दाहिना नञि जो बामा बोलै !
दच्छिन घुरने प्राण रहत नञि !
अंकक जोरो साथ रहत नञि !
कतय चकेवा, सामा डोलै,
“वाह रे वामा बम-बम बोलै !”
वामपंथी : (एसगरे व्यंग्य करैत थपड़ी पाड़ैत छथि) वाह ! कविता त’ नीके क’ लै छी।
नेता : हम सब छी राजनीतिक उपज, हमरा सब बुते सबटा संभव अछि.....
वामपंथी : छी त’ नेता, मुदा भ’ सकैछी....

नेता : (बात केँ जेना लोकि लैत छथि) अभिनेता सेहो !
[कहिते देरी बाहर हल्ला मचै लागैत अछि—जेना उच्च-स्वरमे फिल्मक गीत बाजि रहल हो ; तकरहि संगे तालीक गड़गड़ाहटि, सीटीक आवाज सेहो ।
हो-हल्ला होइत देरी मंचो पर सुस्तायल लोग सबटा मे जेना खलबली मचि गेल हो। सब क्यो हड़बड़ा कए उठैत एक–दोसरा सँ पूछि रहल छथि—‘की भेल, त’ की भेल ?’
तावत एकटा नमहर माला पहिरने एकटा फिल्मी हीरो प्रवेश करैत छथि। पाछाँ-पाछाँ पाँच-दसटा धीया-पुता सब ‘ऑटोग्राफ’क लेल धावित होइत छथि। दू-चारि गोटेक खाता पर गर्वक संग अपन हस्ताक्षर करैत—“बस, आब नञि, बाँकी बादमे....” कहैत अभिनेता मंचक दिसि अगुआ आबैत छथि। आँखिक करिया चश्मा खोलि हाथ मे लैत छथि। मंच परक लोक सब तालीक गड़गड़ाहटि सँ हुनकर स्वागत करैत छथि—तावत् धीया-पुता सभ धुरि जाइछ।]
अभिनेता : (भाषण-मंच पर चढ़ैत) नमस्कार बदरी बाबू, जय सियाराम !
नेता : नमस्कार ! मुदा अहाँ केँ की भेल छल जे एत’ आब’ पड़ल ?
अभिनेता : वैह... जे होइते छैक... अपन ‘स्टंट’ अपनहि क’ रहल छलहुँ मोटर साइकिल पर सवार भ’ कए ....आ कि ऐक्सिडेंट भ’ गेल... आ सोझे एत’ चल अयलहुँ...
नेता : अहो भाग्य हमरा सभक।
अभिनेता : (हाथ सँ हुनक बात केँ नकारबाक मुद्रा दैखबैत) जाय दिअ ओहि बात केँ, (वामपंथी युवा केँ देखा कए) मुदा.. हिनका नहि चिन्हलियनि।
नेता : ओ-हो ! ई छथि नवीन निश्छल ! कॉमरेड हमर सभक समर्थक थिकाह।
अभिनेता : (सलाम ठोकैत) लाल सलाम, कॉमरेड !
वामपंथी : (हाथ जोड़ि कए नमस्कार करैत छथि—ततबा प्रसन्न नहि बुझाइत छथि।) नमस्कार !
नेता : (अभिनेताक परिचय कराबैत) हिनका त’ चिन्हते हैबनि....!
[वामपंथी युवा केँ माथ हिलाबै सँ पहिनहि बाँकी जनता चीत्कार करैत कहैत अछि—“विवेक कुमार!”आ पुनः ताली बजा कए हिनक अभिनन्दन करैत अछि। आभिनेता अपनहु कखनहु झुकि कए, कखनहु आधुनिक भंगिमामे हाथ हिला कए त’ ककरहु दिसि “आदाब” करबाक अभिनय करैत छथि—हुनक हाव-भाव सँ स्पष्ट अछि जे अपन लोकप्रियताक खूब उपभोग क’ रहल छथि।]
वामपंथी : हिनका के नहि जानत ? टी.वी. केर छोट पर्दा सँ ल’ कए फिल्मक पर्दा धरि ई त’ सदिखन लखा दैत छथि---
अभिनेता : (एकाधिक अर्थमे) छी त’ हम सबटा पर्दा पर, मुदा पर्दाफाश करबा आ करैबा लेल नञि... मात्र अभिनय करबा लेल !
वामपंथी : ‘पर्दाफाश’ कियै नञि..
अभिनेता : (वाक्य केँ पूरा नहि करै दैत छथि) हम तँ मात्र सैह बाजै छी जे बात आने क्यो गढ़ैत अछि....
नेता : ठीक ! पर्दाफाश त’ ओ करत जकरा सदिखन किछु नव कहबाक आ नव खबरि बेचबाक ‘टेनशन’ रहल हो ! (‘हेडलाइन’ दैखैबाक लेल दुनू हाथ केँ पसारि कए-) ‘ब्रेकिंग न्यूज’ नवका खबरि, टटका खबरि, हेडलाइन !
अभिनेता : औ बाबू—हम ने नव बात कहै छी आ ने कहि सकै छी... हमर डोरि त’ कथाकार आ निर्देशकक हाथ मे रहैत अछि... ओ कहैत छथि ‘राम कहू’ त’ ‘राम’ कहै छी, कहै छथि ‘नमाज़’ पढ़ू त’ सैह करै छी।
अनुचर 1 : कहल जाइ छनि, बाम दिसि घुरू आ खूब नारा लगाउ....
अनुचर 2 : त’ शोर कर’ लागैत छथि “मानछी ना” “मानबो ना” !
अनुचर 1 : मानब नञि, जानब नञि...
तोरा आर केँ गुदानब नञि...
अनुचर 2 : हम जे चाही मानै पड़त,
नञि त’ राज गमाबै पड़त !
(नेता आ दुनू अनुचर हँसि दैत छथि। अभिनेता सेहो कौतुकक बोध करै छथि)
वामपंथी : (व्यंग्य करैत) माने ई बुझी जे अहाँ जे किछु करै छी, सबटा घीसल-पीटल पुरनके कथा पर....?
अभिनेता : घीसल हो वा पीटल, तकर दायित्व हमर थिक थोड़बे ?
वामपंथी : त’ ककर थिक ?
अभिनेता : तकर सभक दायित्व छनि आन-आन लोकक... हमर काज मे बाँकी सबटा त’ पुराने होइ छइ...कहियहु- कखनहु ‘डायलॉग’ आ गीतक बोल सेहो ...मुदा किछु रहिते छइ नव, नञि त’ तकरा पब्लिक कियै लेत ? (एतबा सुनतहि चोर उठि कए ठाढ़ होइत अछि)

चोर : अरे, इहो त’ हमरहि बात दोहरा रहल छथि...जे...
अनुचर 1 : नव नञि, किछु नञि, किछु नव नञि...
अनुचर 2 : बात पुराने, नव परिचय...
अनुचर 1 : सौ मे आधा जानले बात...
अनुचर 2 : बाँकी सेहो छइहे साथ !
चोर : (दुनूक कविता गढ़बाक प्रयास केँ अस्वीकार करैत आ अपन तर्क केँ आगाँ बढ़बैत) नञि, नञि हम ‘मज़ाक’ नहि करै चाहै छी...इयैह त’ हमहूँ कहै चाहै छलहुँ जे संसार मे सबतरि पुराने बात पसरल अछि...नव किछु होइ छइ... मुदा कहियहु - कखनहु...
बाजारी : (गला खखारि कए...एतबा काल, जागि जैबाक बादो मात्र श्रोताक भूमिकाक निर्वाह क’ रहल छलाह) हँ-हँ, आब मानि लेलियह तोहर बात नव- पुरान दय... मुदा कहै छह ‘संसार’ सँ बाहर निकलू तखन नव-पुरानक सबटा हिसाब बदलि जाइ छइ ?
चोर : हमरा सन चोर की जानत आन ठामक खबरि ?
अनुचर 1 : ठीक !
अनुचर 2 : चोर की जानत स्वर्गक महिमा ?

चोर : जतय हम सब एखन छी, भ’ सकैछ एतहुका नियम किछु आर हो...
अभिनेता : ठीक कहलह हौ ! भ’ सकैछ, एतय ने किछु नव होइ छइ, आ ने कछु पुरान !
नेता : ने क्यो दच्छिन रहि सकैछ आ ने बाम !
चोर : आ ने नेता आ अभिनेताक बीच मे कोनो फर्क रहि जाइछ...
अभिनेता : (हँसैत) ओहुना, हमरा सभक पृथ्वी पर नेता थोड़े कोनो नव बात कहै छथि... खाली हमरे सब पर दोष कियै दै जाइ छइ लोक ?
वामपंथी : आ बिनु अभिनेता भेने कि क्यो नेता बनि सकैत अछि ?
चोर : किन्नहु नञि !
नेता : ओना देखल जाय त’ दुनियाँ मे एखन ‘कॉम्पीटीशन’ बड़ बेसी छैक...सबटा अभिनेता चाहै छइ जे हमहूँ नेता बनि जाइ... हमहूँ कियै नञि देश चला सकै छी ?
चोर : खाली हमरे सभक जाति-बिरादरी छइ जे कखनहु सपनो नञि दोखि सकै छइ नेता बनबाक....चोर- उचक्का-भिखारी- रद्दीवला छी...छलहुँ आ सैह रहि जायब...
वामपंथी : मुदा अहूँ सब केँ मोसकिल होमै वला अछि....
चोर : कियै ?
वामपंथी : कियै त’ चोर नहियो नेता बनि सकय, नेता-लोकनि त’ चोरी करै मे ककरहु सँ पाछाँ नञि होइ छथि। जेम्हरे देखू... सब ठाम ‘स्कैंडल’ एक सँ बढ़ि कए एक...
नेता : (खौंझैत) मोन राखब...अहूँक पार्टीमे गुंडा-बदमाश भरल अछि....सब छटल चोर-उचक्का...(एहि बात पर चोर-उचक्का-भिख-मंगनी आदि सब हँसि दैत छथि।)
अभिनेता : (वामपंथी, नेता केँ किछ कटु शब्द बाजै लगताह से बूझि , तकरा रोकैत) औ बाबू ! हम त’ एत’ नव छी , मुदा हमरा त’ लागैये .... एत’ ने किछु ‘हम्मर’ थीक आ ने कछु अनकर तैं ने चोरीक प्रश्न उठै छइ आ ने सीना जोरीक !
चोर : ठीक...ठीक ! बिल्कुल ठीक कहलहुँ।
(अभिनेताक बात शुरू होइत देरी मंच पर एक गोट उच्च- वंशीय महिला प्रवेश करैत छथि आ अभिनेताक बाद चोर केँ उठि कए ठाढ़ भए बात करैत देखि सोझे चोरेक लग चलि आबै छथि अपन प्रश्न पूछै।)
महिला : (चोर सँ) एकटा बात कहू... एत’ स्वर्गक द्वार त’ इयैह थिक कि नहि ? (बंद दरबज्जा केँ देखा कए)
चोर : आँय !
महिला : स्वर्गक दरबज्जा.... ?
रमणी मोहन : (उत्सुकता देखबैत, उठि कए लग अबैत) हँ-हँ ! इयैह त’ भेल स्वर्गक प्रवेश द्वार !
महिला : (रमणी-मोहन दिस सप्रश्न) त’ एत’ की कोनो क्यू- ‘सिस्टम’ छइ ?
बाजारी : (उठि कए ठाढ़ भ’ जाइत छथि, जेना पुन: कतार बनाबै लेल जुटि जैताह) हँ से त’ छइहे....
[ई बात कहैत देरी जेना ‘भगदड़’ मचि जाइत अछि आ पुनः सब क्यो कुर्सी पर सँ उठि-उठि के कतार मे जुटि जैबाक प्रयास करैत छथि। क्यो-क्यो सबटा कुर्सी केँ तह लगैबाक प्रयास करैत अछि त’ क्यो सबटाकेँ मंचक एक कात हँटा कए कतारक लेल जगह बनैबा मे जुटि जाइत अछि....क्यो हल्ला - गुल्ला आरंभ क’ दैत छथि। नेताजी माईक पर सँ “हे, सुनै जाउ” “शांत भ’ जाउ” आदि कहै छथि, मुदा हुनकर बात सभक हल्ला - गुल्ला मे जेना डूबि जाइत छनि। दुनू अनुचर नेताजीक देखा-देखी कैक गोटे केँ समझाबै - बुझाबैक प्रयास करै छथि, मुदा क्यो नहि तैयार छथि हिनका दुनूक बात मानै लेल। कनेके देर मे मंच पर सँ सब किछु हँटि जाइत अछि आ पुनः एकटा कतार बनि जाइत अछि..... पुनः प्रथमे दृश्य जकाँ कतहु-कतहु जेना संघर्ष चलि रहल होइक गुप्त रूप सँ। भाषणक मंच पर मात्र तीन गोटे छथि—बीच मे अभिनेता, बामा दिसि वामपंथी युवा, आ अभिनेताक दक्षिण दिसि बदरी बाबू.... चारू मृत सैनिक पुनः कतारक लग ठाढ़ छथि। मात्र रमणी- मोहन, महिला आ चोर छथि मंचक बीचो-बीच, सबटा अवाक् भ’ कए देखैत।]
महिला : (चोर सँ) हे, अहाँ सभक एत’ ‘लेडीज’ सभक लेल अलग ‘क्यू’ नहि होइ छैक ?
चोर : अलग ‘क्यू’ ?
रमणी-मोहन : हँ-हँ, कियै नञि ? अहाँ की एकरा सभक संग धक्का-मुक्की करब ? (महिलाक हाथ ध’ कए) आउने—(एकटा पृथक क्यू बनबैत) अहाँ एत’ ठाढ़ भ’ जाउ वी.आई.पी. क्यू थिकै... जेना मंदिर मे नञि होइ छइ ?
चोर : वी. आइ. पी.... एतहु ?
वामपंथी : (भाषण मंच पर सँ उतरैत छथि) बात त’ ई ठीके बजलाह।
अभिनेता : (अधिकतर फुर्ती देखबैत वी.आई.पी. क्यू मे ठाढ़ होइत) ई त’ पृथ्वीक मनुक्खक लेल नव बात नहिये थिक... (चोरसँ) तैं एहिमे आश्चर्य कियै भ’ रहल छह ?
[तावत नेता, हुनक दुनू अनुचर आ वामपंथी युवा मे जेना स्पर्धा भ’ रहल होइक जे के, वी. आई.पी. क्यू मे पहिने ठाढ़ हैताह। एकटा अनुचर रमणी-
मोहनकेँ पकड़ि कए “हे ...अहाँ ओत’ कोना ठाढ़ छी”? कहैत वी. आई. पी. क्यू केर पाछाँ आनि कए ठाढ़ क’ दैत छथि। अभिनेता आ महिला आपस मे गप-शप आ हँसी मजाक करै लागैत छथि। रमणी-मोहन मूड़ी झुकौने क्यू केर अंत मे ठाढ़ रहैत छथि। वामपंथी युवा छलाह अभिनेताक पाछाँ ठाढ़, हुनकर पाछाँ बदरी बाबू आ एकटा अनुचर—जे बदरी बाबूक हाथ आ पीठ मे आराम द’ रहल छल। आ दोसर अनुचर ठीक क’ नेने छल- अपनहि मोने जे दोसर क्यू–साधारण मनुक्ख बाला- तकर देख-रेखक दायित्व तकरे पर छैक। तैं ओहि क्यू मे असंतोष आ छोट-मोट झगड़ा केँ डाँटि-डपटि कए ठीक क’ रहल छल। आ हठात् मंच पर एहि विशाल परिवर्तनक दिसि अवाक भ’ कए देखैत चोर कोनो क्यू मे ठाढ़ नहि रहि कए भाषण-मंचक पासे सँ दुनू कतार दिसि देखि रहल छल।
यम आ पाछू-पाछू चित्रगुप्त प्रवेश करैत छथि। युवक हाथमे एकटा दंड आ माथ पर मुकुट, परिधेय छलनि राजकीय, हाव-भाव सँ दुनू कतार मे जेना एकटा खलबली मचि जाइत अछि। कतेको गोटे “हे आबि गेलाह” वैह छथि, “हे इयैह त’ थिकाह !” आदि सुनल जा रहल छल। चित्रगुप्तक हाथमे एकटा मोट पोथा छलनि जे खोलि-खोलि कए नाम-धाम मिला लेबाक आदति छलनि हुनकर। यमराज प्रविष्ट भ’ कए सर्वप्रथम साधारण मनुक्खक कतार दिसि देखैत छथि आ जेना एक मुहूर्तक लेल ओत’ थम्हैत छथि। सब क्यो शांत भ’ जाइत अछि-सभक बोलती बंद—जे अनुचर कतार केँ ठीक क’ रहल छल—ओहो साधारण मनुक्खक कतारक आगाँ दिसि कतहु उचक्के लग घुसिया कए ठाढ़ भ’ जाइत अछि। यमराज पुनः आगाँ बढ़ैत छथि त’ वी. आई. पी. कतारक पास आबै छथि—ओत’ ठाढ़ सब गोटे हुनका नमस्कार करैत छथि। वामपंथी युवा अभिनेता सँ पूछैत छथि “ई के थिकाह ?” उत्तर मे अभिनेता जो किछु कहैत छथि से पूर्ण रूपसँ स्पष्ट त’ नहि होइछ मुदा दबले स्वरेँ बाजै छथि “चिन्हलहुँ नहि ? “ईयैह त’ छथि यमराज !” वामपंथी युवा घबड़ा कए एकटा लाल सलाम ठोकि दैत छथि आ पुनः नमस्कार सहो करै लागैत छथि। यमराज हिनकर सभक उपेक्षा करैत चोरक लग चलि आबै छथि भाषण मंचक लग मे।]
यमराज : (चोर सँ) अहाँ एतय कियै छी महात्मन् ! (हुनक एहि बात पर, विषेशतया ‘महात्मन् !’ एहि संबोधन सँ जेना दुनू कतार मे खलबली मचि जाइत अछि। एतबा धरि जे चारू मृत सैनिक सँ ल’ कए सब क्यो एक दोसरा सँ पूछै लागैत छथि....“महात्मन् ?” “महात्मा कियैक कहलाह ई ?” “ई सत्ये महात्मा थिकाह की ?” “ई की कहि रहल छथि ? ” त’ क्यो-क्यो उत्तर मे… “पता नहि !” ने जानि कियैक...। भ’ सकैछ… आदि,आदि बाजै लागैत छथि। परिवेश जेना अशांत भ’ जाइत अछि यमराज असंतुष्ट भ’ जाइत छथि) आ ! की हल्ला करै जाइ छी सब ? देखि नहि रहल छी जे हिनका सँ बात क’ रहल छी ? (हुनकर डाँट सुनि दुनू अनुचर ठोर पर आङुर धैने “श्-श्-श्-श् !” आदि कहैत सब केँ चुप कराबैत अछि। हठात् जेना खलबली मचल छलैक तहिना सब क्यो चुपचाप भ’ जाइत छथि।)
चोर : (विह्वल भ’ कए) महाराज !
यमराज : (चोर दिसि घुरैत) हूँ त’ हम की कहि रहल छलहुँ ? (उत्तरक अपेक्षा छनि चित्रगुप्त सँ)
चित्रगुप्त : प्रभु, अपने हिनका सँ आगमनक कारण पूछि रहल छलियनि...
यमराज : (मोन पड़ैत छनि) हँ ! हम कहै छलहुँ (चोर सँ) अहाँ एत’ कियैक ?
चोर : (घबड़ाइत) नञि महाराज, हम त’ कतारे मे छलहुँ....सब सँ पाछाँ... ओ त’ एत’ राजनीति केर बात चलि रहल छल ... आ नेताजी लोकनि आबि गेल छलाह तैं....
यमराज : (आश्चर्य होइत) ‘राजनीति’? ‘नेताजी’? माने ?
(नेताजी घबड़ाबैत गला खखारैत कतार सँ बहिरा कए आगाँ आबि जाइत छथि। पाछाँ-पाछाँ थरथरबैत दुनू अनुचर सेहो ठाड़ भ’ जाइत छथि।)
नेता : (बाजबाक प्रयास करैत छथि साहस क’ कए मुदा गला सँ बोली नहि निकलैत छनि) जी… हम छी ‘बदरी-विशाल’!
चोर : इयैह भेला नेताजी !
(तावत वामपंथी युवा सेहो अगुआ आबै छथि।) आ ईहो छथि नेताजी--- मुदा रंमे कने लाल !
चित्रगुप्त : (मुस्की लैत) हिनकर रंग लाल त’ हुनकर ?
(नेताजी केँ देखाबैत छथि)
चोर : ओ त’ कहैत छथि ‘हरियर’ मुदा...
चित्रगुप्त : (जेना सत्ये जानै चाहै छथि) मुदा ?
चोर : जे निन्दा करै छइ से कहै छइ रंग छनि ‘कारी’!
नेता : नञि, नञि....हम बिल्कुल साफ छी, महाराज, बिल्कुल सफेद....
वामपंथी : (तिर्यक दृष्टिएँ नेता केँ दैखैत) ने ‘हरियर’ छथि आ नञि ‘कार’.... मुदा छनि हिनकहि सरकार ! (अंतिम शब्द पर जोर दैत छथि नेताजी क्रोधक अभिव्यक्ति केँ गीड़ि जाइत छथि)
चित्रगुप्त : बुझलहुँ—ई छथि नेता सरकार, अर्थात् ‘नायक’ आ (अभिनेता केँ देखा) ई छथि ‘अभिनेता’ अर्थात् ‘अधिनायक’ आओर अहाँ छी....
नेता : (वाक्य केँ समाप्त नहि होमै दैत छथि) खलनायक !
(यमराज केँ छोड़ि सभ क्यो हँसि दैत छथि हँसीक धारा कम होइत बंद भ’ जाइत अछि जखन यमराज अपन दंड उठा इशारा करैत छथि सब शांत भ’ जाइत छथि।)
यमराज : (आवाज कम नहि भेल अछि से देखि) देखि रहल छी सब क्यो जुटल छी एत’—नेता सँ ल’ कए अनु-नेता धरि...
चोर : उपनेता, छरनेता, परनेता - सब क्यो !
यमराज : मुदा ई नहि स्पष्ट अछि जे ओ सभ कतार मे ठाढ़ भ’ कए एना धक्का-मुक्की कियै क’ रहल छथि।
अनुचर 1 : (जा कए घेंट पकड़ि कए पॉकिट-मार केँ ल’ आनैत छथि—पाछाँ-पाछाँ उचक्का अहिना चलि आबैत अछि) हे हौ ! बताबह--कियैक धक्का-मुक्की क’ रहल छह ?
पॉकिट-मार : हम कत’ धक्का द’ रहल छलहुँ, हमरे पर त’ सब क्यो गरजैत-बरसैत अछि।
[तावत यमराज (अपन चश्मा पहिरि कए) चित्रगुप्तक खाता केँ उल्टा-पुल्टा कए दैखै चाहैत छथि—अनुचर दुनू भाग- दौड़ कए कतहुँ सँ एकटा ऊँच टूल आनि दैत छथि। टूल केँ मंचक बाम दिसि राखल जाइछ, ताहिपर विशालाकार रजिष्टर केँ राखि कए यमराज देखब शुरू करै छथि। नंदी-भृंगी अगुआ कए हुनक सहायताक लेल दुनू बगल ठाढ़ भ’ जाइत छथि—अनुचर-दुनू केँ पाछाँ दिसि धकेलि कए। नहि त’ अनुचर द्वय केँ मोन छलैक रजिष्टर मे झाँकि कए देखी जे भाग मे की लिखल अछि। मुदा धक्का खा कए अपन सन मुँह बनबैत पुनः नेताजीक दुनू दिसि जा कए ठाढ़ भ’ जाइत छथि। यमराज अपन काज करै लागैत छथि। हुनका कोनो दिसि ध्यान नहि छनि। नंदी अपन जेब सँ एकटा तह लगायल अथवा ‘रोल’ कैल कागज केँ खोलैत छथि आ जेना अपनहि तीनू मे एक-एक क’ कए नाम पढ़ि रहल छथि एत’ उपस्थित लोग सभक आ भृंगी रजिष्टरक पन्ना उल्टाबैत वर्णानुक्रमक अनुसार ओ नाम खोलि कए बहार करैत छथि—तखन यमराज ‘रिकार्ड’ केँ पढ़ै छथि, हिनका तीनू केँ आन कोनो दिसि ध्यान नहि छनि।]
चित्रगुप्त : मुदा ई त’ बताऊ- ओना ओत’ कतार बना कए ठाढ़ कियै छी ?
पॉकिट-मार : हुजूर स्वर्ग जाय चाहै छी....
उचक्का : ई ! लुच्चा नहितन, मोन भेल त’ ‘चलल मुरारी हीरो बनय’.... स्वर्ग जैताह...मुँह त’ देखू !
चित्रगुप्त : (थम्हबैत) जाय दियन्हु हिनकर बात... मुदा ई बताऊ—एत’ कतारक तात्पर्य की ?
चोर : नञि बुझलहुँ...कतार लगायब त’ हमर सभक आदतिये बनि गेल अछि..
पॉकिट-मार : (उचक्का दिसि दैखबैत) आ कतार तोड़ब सेहो....
नेताजी : (जेना आब फुरलनि) ई सब त’ हमर सभक सभ्य समाजक नियमे बनि गेल अछि... धीरज धरी, अपन बेरी आबय तखने अहाँ केँ सेवा भेटत...
अनुचर 1 : चाहे ओ रेलक टिकट हो...
अनुचर 2 : चाहे बिजली-पानिक बिल...
चोर : कतहु फोन करू त’ कहत “अब आप क्यू में हैं”... आ कि बस बाजा बजबै लागत... (पॉकिट-मार टेलिफोनक ‘कॉल होल्डिंग’ क कोनो सुर केँ मुँह सँ बजा दैत छथि।)
चित्रगुप्त : मुदा एत’ कोन सेवाक अपेक्षा छल ?
नेताजी : माने ?
चोर : नञि बुझलियैक ?
अनुचर 1 : अहाँ बुझल ?
अनुचर 2 : जेना ई सब बात बुझै छथि !
चोर : सब बात त’ नहिये बुझै छी—मुदा ई पूछि रहल छथि, एत’ कोन लड्डू लेल कतार मे ठाढ़ छी अहाँ सभ ?
चित्रगुप्त : हम सैह जानै चाहै छलहुँ... कोन बातक प्रतीक्षा करै छलाह ई सब गोटे ?
चोर : (अनुचर 1 केँ) अहाँ बताउ ने कियैक ठाढ़ छलहुँ ?
अनुचर 1 : (तोतराबै लागै छथि) हम..माने...
चोर : (अनुचर 2 सँ) अच्छा त’ अहीं बताउ.... कथी लेल ठाढ़ छी एत’ क्यू मे...?
अनुचर 2 : सब क्यो ठाढ़ छथि तँ हमहूँ ...
अनुचर 1 : हमर सभक महान नेता बदरी बाबू जखन कतार मे ठाढ़ रहि कए प्रतीक्षा क’ सकै छथि, तखन हम सब कियैक नहि ?
चित्रगुप्त : (हुनक बात केँ समाप्त होमै नहि द’ कए) मुदा प्रतीक्षा कथीक छलनि ?
चोर : किनकर प्रतीक्षा ?...सेहो कहि सकै
छी !
पॉकिट-मार : ई सब त’ कहै छलाह—रंभा—संभा...
चोर : (हँसैत) धत् ! मेनका रंभा, उर्वशी...(हँसैत छथि)
चित्रगुप्त : ओ ! त’ प्रतीक्षा करै छलहुँ कखन दरबज्जा खुजत आ अप्सरा सबटा अयतीह ? (हँसैत छथि।)
नेता : (प्रतिवादक स्वरमे) नहि-नहि... हम सब त’ इयैह प्रतीक्षा क’ रहल छलहुँ जे...
अनुचर 1 : .....कखन अपने लोकनि आयब...
अनुचर 2 : .....आ कखन स्वर्गक द्वार खुजत....
नेता : आ कखन ओ घड़ी आओत जखन हम सब स्वर्ग जा’ सकब !

[कहैत-कहैत मंचक परिवेश स्वपनिल बनि गेल आ कैकटा नृत्यांगना/अप्सरा नाचैत-गाबैत मंच पर आबि जाइत छथि.... नृत्य-गीतक संगहि धीरे-धीरे अन्हार भ’ जाइछ।]

***
चतुर्थ कल्लोल


चतुर्थ कल्लोल
[जेना-जेना मंच पर प्रकाश उजागर होइत अछि त’ देखल जायत जे यमराज चित्रगुप्तक रजिष्टर केर चेकिंग क’ रहल छथि। आ बाँकी सब गोटे सशंक चित्र लए ठाढ़ छथि। किछुये देर मे यमराजक सबटा ‘चेकिंग’ भ’ जाइत छनि। ओ रजिष्टर पर सँ मुड़ी उठौने अपन चश्मा केँ खोलैत नंदी केँ किछु इशारा करैत छथि।]

नंदी : (सीना तानि कए मलेट्रीक कप्तान जकाँ उच्च स्वरमे) सब क्यो सुनै....
भृंगी : (आर जोर सँ) सुनू....सुनू...सनू- उ-उ-उ !
नंदी : (आदेश करैत छथि) “आगे देखेगा....! आगे देख !”
(कहैत देरी सब क्यो अगुआ कए सचेत भेने सामने देखै लागैत छथि ; मात्र यमराज आ चित्रगुप्त विश्रान्तिक मुद्रा मे छथि।)
भृंगी : (जे एक-दू गोटे भूल क’ रहल छथि हुनका सम्हारैत छथि---) ‘हे यू ! स्टैंड इरेक्ट... स्टैंड इन आ रो !’ (जे कनेको टेढ़-घोंच जकाँ ठाढ़ो छलाह, से सोझ भ’ जाइत छथि, सचेत सेहो आ लगैछ जेना एकटा दर्शक दिसि मुँह कैने ठाढ़ पंक्ति बना नेने होथि।)
नंदी : (पुनः सेनाकेँ आदेश देबाक स्वर मे) सा-व-धा-न! (सब क्यो ‘सावधान’ अर्थात् ‘अटेनशन’ केर भंगिमा मे ठाढ़ भ’ जाइत छथि।) वि-श्रा-म! (सब क्यो ‘विश्राम’ क अवस्थामे आबि जाइत छथि।)
भृंगी : (दहिना दिसि ‘मार्च’ क’ कए चलबाक आदेश दैत) दाहिने मुड़ेगा--दाहिने मोड़ ! (सभ क्यो तत्क्षण दहिना दिसि घुरि जाइत छथि।)
नंदी : (आदेश करैत) आगे बढ़ेगा ! आ-गे-ए-ए बढ ! (सब क्यो बढ़ि जाइत छथि।) एक-दो-एक-दो-एक-दो-एक ! एक ! एक !
[सब गोटे मार्च करैत मंचक दहिना दिसि होइत यमराज-चित्रगुप्त केँ पार करैत संपूर्ण मंचक आगाँ सँ पाछाँ होइत घुरि बाम दिसि होइत पुनः जे जतय छल तत्तहि आबि जाइत छथि। तखनहि भृंगीक स्वर सुनल जाइछ ‘हॉल्ट’ त’ सब थम्हि जाइत छथि.... नहि त’ नंदी एक - दो चलिये रहल छल।]
चित्रगुप्त : (सभक ‘मार्च’ समाप्त भ’ गेलाक बाद) उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति सँ हम कहै चाहैत छियनि जे एत’ उपस्थित सब क्यो एकटा मूल धारणाक शिकार भेल छथि—सभक मोन मे एकटा भ्रम छनि जे पृथ्वी पर सँ एतय एक बेरि आबि गेलाक मतलबे इयैह जे आब ओ स्वर्गक द्वार मे आबि गेल छथि। आब मात्र प्रतीक्षा करै पड़तनि... धीरज ध’ लेताह आ तकर बादे सभकेँ भेटतनि ओ पुरस्कार जकरा लेल कतेको श्रम ,कतेको कष्ट—सबटा स्वीकार्य भ’ जाइछ।
नेताजी : (आश्चर्य होइत) तखन की ई सबटा भ्रम मात्र छल, एकटा भूल धारणा छल---जे कहियो सत्य भ’ नहि सकैत अछि ?
चित्रगुप्त : ठीक बुझलहुँ आब---ई सबटा भ्रम छल।
नंदी : सपना नहि...
भृंगी : मात्र बुझबाक दोष छल...
वामपंथी : तखन ई दरबज्जा, दरबज्जा नहि छल....किछु आन वस्तु छल....?
चित्रगुप्त : ई दरबज्जा कोनो माया- द्वार नहि थिक....आई सँ कतेको युग पहिने ई खुजतो छल, बंदो होइत छल...!
नेताजी : मुदा आब?
अनुचर 1 : आब ई नञि खुजैत अछि की ?
अनचर 2 : जँ हम सब सामने जा कए तारस्वर मे पुकारि- पुकारि कए कही—‘खुलि जो सिमसिम्’ तैयहु नहि किछु हैत!
नंदी : ई कोनो ‘अलीबाबा चालीस चोर’ क खिस्सा थिक थोड़े…
भृंगी : आ ई कोनो धन-रत्नक गुफा थिक थोड़े !
वामपंथी : त’ ई दरबज्जाक पाछाँ छइ कोन चीज ?
नेता : की छइ ओहि पार ?
अनुचर 1 : मंदाकिनी ?
अनुचर 2 : वैतरिणी ?
अभिनेता : आ कि बड़का टा किला जकर सबटा कोठरी सँ आबि रहल हो दबल स्वरेँ ककरहु क्रन्दनक आहटि...नोर बहाबैत आत्मा सब...!
चोर : आ कि एकटा नदी-किनारक विशाल शमशान - घाट,जतय जरि रहल हो हजारक हजार चिता...हक्कन कानैत आत्मीय जन...?
बाजारी : नहि त’ भ’ सकैछ एकटा बड़का बजारे छइ जतय दिन-राति जबरदस्त खरीद-बिक्री चलि रहल हो।
भिख-मंगनी : इहो त’ भ’ सकैछ जे घुरिते भेटत एकटा बड़का टा सड़क बाट काटैत एकटा आन राजपथक आ दुनूक मोड़ पर हाथ आ झोरा पसारैत ठाढ़ अछि लाखो लोग- भुखमरी, बाढ़ि , दंगा फसाद सँ उजड़ल उपटल लोग....
रद्दीवला : नञि त’ एकटा ब-ड़-की टा केर ‘डम्पिंग ग्राउंड’ जतय सबटा वस्तु व्यवहार क’ क’ कए लोग सब फेकै जाय होइक—रद्दी सँ ल’ कए जूठ-काँट, पुरनका टूटल भाँगल चीज सँ ल’ कए ताजा बिना वारिसक लहास...
प्रेमिका : कि आयातित अवांछित सद्यः जनमल कोनो शिशु...
प्रेमी : कन्या शिशु, हजारोक हजार, जकरा सबकेँ भ्रुणे केँ कोखिसँ उपारि कए फेंकल गेल हो...
वामपंथी : अथवा हजारो हजार बंद होइत कारखानाक बजैत सीटी आ लाखो परिवारक जरैत भूखल-थाकल चूल्हि-चपाटी....
नेताजी : ई त’ अहीं जानै छी जे दरबज्जाक ओहि पार की छइ... हम सब त’ मात्र अन्दाजे क’ सकै छी जे भरिसक ओम्हर हजारोक हजार अनकहल दुःखक कथा उमड़ि-घुमड़ि रहल छइ अथवा छइ एकटा विशाल आनन्दक लहर जे अपनाकेँ रोकि नेने होइक ई देखबाक लेल जे दरबज्जा देने के आओत अगिला बेरि...
चित्रगुप्त : ई सबटा एक साथ छैक ओहि पार, ठीक जेना पृथ्वी पर रचल जाय छइ स्वर्ग सँ ल’ कए नर्क-सबटा ठाम ! जे क्यो नदीक एहि पार छइ तकरा लागै छइ ने जानि सबटा खुशी भरिसक छइ ओहि पार !
नंदी : भरिसक नीक जकाँ देखने नहि हैब ओहि दरबज्जा आ देबार दिसि !
भृंगी : एखनहु देखब त’ ऊपर एकटा कोना मे लटकि रहल अछि बोर्ड—“नो एन्ट्री!”
नेताजी : (आश्चर्य होइत) आँय!
(सब क्यो घुरि कय दरबज्जा दिस दैखैत छथि)
सब क्यो : “नो एंट्री ?”
(प्रकाश अथवा स्पॉट-लाइट ओहि बोर्ड पर पड़ैत अछि)
नेताजी : ई त’ नञि छल पता ककरहु.. नहि त’...
चित्रगुप्त : नहि त?
नेताजी : (विमर्ष होइत) नहि त’....पता नहि....नहि त’ की करितहुँ....
वामपंथी : मुदा आब ? आब की हैत ?
अभिनेता : आब की करब हम सब ?
नेता : आब की हैत ?
(चित्रगुप्त किछु नहि बाजैत छथि आ नंदी-भृंगी सेहो चुप रहैत छथि । एक पल केर लेल जेना समय थम्हि गेल होइक।)
अनुचर 1 : यमराजेसँ पूछल जाइन !
अनुचर 2 : (घबड़ा कए) के पूछत गय ? अहीं जाउ ने ! (केहुँनी सँ ठेलैत छथि।)
अनुचर 1 : नञि-नञि.... हम नञि ? (पछुआ अबैत छथि।)
अनुचर 2 : तखन नेताजीए सँ कहियनि जे ओ फरिछा लेथि !
अनुचर द्वय : नेताजी ! (नेताजीकेँ घुरि कए देखैते देरी दुनू जेना इशारा क’ कए कहैत होथि पूछबा दय।
नेताजी : (विचित्र शब्द बजैत छथि- कंठ सूखि जाइत छनि) ह..ह...!
[नेताजी किछु ने बाजि पबैत छथि आ ने पुछिए सकैत छथि। मात्र यमराजक लग जा कए ठाढ़ भ’ जाइत छथि। यमराज रजिष्टर मे एक बेरि दैखैत छथि, एक बेरि नेताजी दिस]
यमराज : बदरी विशाल मिसर !
नेताजी : (जेना कठघरामे ठाढ़ अपन स्वीकारोक्ति दैत होथि) जी !
यमराज : आयु पचपन !
नेताजी : (अस्पष्ट स्वरेँ) साढ़े तिरपन !
नंदी : असली उमरि बताउ !
भृंगी : सर्टिफिकेट-बला नञि !
नेताजी : जी पचपन !
यमराज : जन्म भाद्र मासे, कृष्ण पक्षे, त्रयोदश घटिका, षड्-त्रिशंति पल, पंचदश विपल... जन्म-राशि धनु...लग्न-वृश्चिक, रोहिणी नक्षत्र, गण-मनुष्य, योनि-सर्प, योग-शुक्ल, वर्ग मार्जार, करण- शकुनि!
[जेना-जेना यमराज बाजैत चलि जाइत छथि—प्रकाश कम होइत मंचक बामे दिसि मात्र रहैत अछि जाहि आलोक मे यमराज आ मुड़ी झुकौने नेताजी स्पष्ट लखा दैत छथि। बाँकी सभक उपर मद्धिम प्रकाश। नंदी यमराजक दंड केँ धैने हुनकर पाछाँ सीना तानि कए ठाढ़ छथि, भृंगी टूल पर पोथीक विशेष पृष्ठ पर आँगुर रखने रजिष्टरकेँ धैने छथि। चित्रगुप्त लगे मे ठाढ़ छथि, यमराजक स्वर मे धीरे-धीरे जेना प्रतिध्वनि सुनल जाइत छनि-एना लागि रहल हो।]
नेताजी : जी !
यमराज : (हुंकार दैत) अहाँ केँ दैखैत छी ‘शश योग’ छैक...(श्लोक पढ़ैत छथि अथवा पाछाँ सँ प्रतिध्वन्त स्वरेँ ‘प्रि रिकॉर्डेड’ उच्चारण सुनल जाइत अछि-)
“भूपो वा सचिवो वनाचलरतः सेनापतिः क्रकूरधीःधातोर्वाद-विनोद-वंचनपरो दाता सरोषेक्षणः।
तेजस्वी निजमातृभक्तिनिरत¬: शूरोऽसितांग सुखी जातः सप्ततिमायुरेति शशके जारक्रियाशीलवान्
अर्थात—नेता बनब त’ अहाँक भागमे लिखल अछि आ सदिखन सेवक आ अनुचर-अनुयायी सँ घेरल रहब सेहो लिखल अछि.... छोट-मोट अन्याय नहि कैने होइ—से नहि...मुदा बहुत गोटे अहाँक नाम ल’ कए अपराध करै जाइ छल—से बात स्पष्ट। वैह जे कतेको जननेता केँ होइ छनि..कखनहु देखियो कए अनठा दैत छलहुँ। बाजै मे बड़ पटु छी से त’ स्पष्टे अछि.. मुदा ई की देखि रहल छी—नुका चोरा कए विवाहक अतिरिक्तो प्रेम करबा दय.. सत्ये एहन किछु चलि रहल अछि की?”
नेता : (स्पष्टत¬: एहन गोपनीय बात सब सुनि कए अत्यंत लज्जित भ’ जाइत छथि। हुनक दुनू बगल मे ठाढ़ दुनू अनुचर अकास दिसि मूड़ी उठा कए एम्हर-ओम्हर देखै लागै छथि जेना ओसब किछु नहि सुनि रहल छथि) नहि...माने ..तेहन किछु नहि..
चित्रगुप्त : (मुस्की दैत) मुदा कनी-मनी...?.नहि?
नेता : हँ, वैह.... बुझू जे...
यमराज : सब बुझि गेलहुँ....
चित्रगुप्त : मुदा ओ कहै छथि हुनकर उमर भेलनि पचपन और शश-योग कहै छइ जीवित रहताह सत्तरि सँ बेसी उमरि धरि तखन ?
यमराज : तखन बात त’ स्पष्ट जे समय सँ पहिनहि अहाँ कोनो घृण्य राजनैतिक चक्रांतक शिकार बनैत एतय पठाओल गेल छी। (मोटका रजिष्टर केँ बन्न करैत छथि--)
नेता : तकर माने ?
यमराज : तकर माने ठीक तहिना जेना एहि चारि गोट सैनिक केँ एत’ ऐबाक आवश्यकता नहि छल... ओहो सब अहीं जकाँ .. माने इयैह जे अहाँ मुक्त छी, घुरि सकै छी राजनीतिक जगत मे... एतय कतारमे ठाढ़ रहबाक कोनो दरकारे नहि...
नेता : आँय ! (कहैत देरी दुनू अनुचर आनन्दक अतिरिक्त प्रकाश करैत हुनका भरिपाँज पकड़ि लैत छथि। संगहि कनेक देर मे नारेबाजी सेहो शुरू क दैत छथि।)
[नेताजीक आगाँ दूटा सैनिक सेहो मंच सँ निष्क्रांत होइत छथि।]
यमराज : (नेताजीक संगहि खिसकि जा रहै चाहै छथि से देखि कए, दुनू अनुचर सँ) अहाँ सभ कत’ जा रहल छी ? (दुनूक पैर थम्हि जाइत छनि।) की ? नहि बाजलहुँ किछु ?

अनुचर 1 : आ.. जी.. हम सब..नेताजी... जा रहल छथि तैं...
यमराज : कोनो तैं-वैं नहि चलत..(घुरि कए) चित्रगुप्त !
चित्रगुप्त : जी ?
यमराज : नीक जकाँ उल्टा-पुल्टा कए, देखू त’ रजिष्टर मे हिनका सब दय की लिखल छनि...
चित्रगुप्त : जी !....(अनुचर 1 केँ देखा कए) राजनीतिक जगतमे बदरी विशाल बाबू जतेक मार-काट कैने- करौने छथि—से सबटा हिनके दुनूक कृपासँ होइ छलनि....
अनुचर 1 : (आपत्ति जताबैत) नहि... माने...
यमराज : (डाँटैत) चोप! कोनो-माने ताने नहि...
चित्रगुप्त : (आदेश दैत) सोझे भुनै केर कड़ाही मे ल’ जा कए फेंकल जाय !
(कहैत देरी नंदी आ भृंगी अनुचर 1 आ अनुचर 2 केँ दुनू दिसि सँ ध’ कए बाहर ल’ जाइत छथि—ओम्हर बाँकी मृत सैनिक मे सँ दू गोटे हिनका ल’ कए आगाँ बढ़ैत छथि आ नंदी-भृंगी अपन-अपन स्थान पर घुरि आबैत छथि।)
प्रेमी युगल : (दुनू आर धीरज नहि राखि पबैत छथि) आ हम सब ?
प्रेमी : हमरा दुनूकेँ की हैत ?
प्रेमिका : ई हमरा कतेको कालसँ घुरि चलबा लेल कहैत छलाह... मुदा हमही नहि सुनि रहल छलियनि !
प्रेमी : की एहन नहि भ’ सकैत अछि जे.....
बाजारी : (आगाँ बढ़ैत) हे.... हिनका दुनू केँ अवश्य एकबेर जिनगी देबाक मौका देल जाइन...
चित्रगुप्त : से कियै ?
बाजारी : देखू...एत त’ हम कन्यादान क’ कए विवाह करबा देलियनि... मुदा वस्तुतः त’ ई दुनू गोटे अपन-अपन परिवारक जे क्यो अभिभावक छथि तनिका सभक आशीर्वाद नहि भेटि सकलनि।
भद्र व्यक्ति 2 : ...आ तैं दुनू गोटे निश्चित कैने छलाह जे जीयब त’ संगहि आ मरब त’ संगहि.. मुदा आब त’ हम सब विवाह कैये देने छी...
बाजारी व्यक्ति : तैं हमरा लगैछ जे दुनू परिवारो आब मानि लेताह...
भद्र व्यक्ति 1 : भ’ सकैछ आब पश्चातापो क’ रहल छथि।
यमराज : बड़ बेस...
चित्रगुप्त : आ जँ एखनहु अक्खड़ दैखौता त’ अहाँ सब हुनका लोकनिकेँ समझा बुझा’ सकबनि कि नहि ?
भद्र व्यक्ति 1,2 : अवश्य...अवश्य !
यमराज : बेस... तखन (नंदी-भृंगीकेँ) एहि दुनू बालक-बालिका आ हिनका दुनूक एतहुका अभिभावक लोकनिकेँ रस्ता देखा दियन्हु...
[नंदी-भृंगी प्रेमी-प्रेमिका आ ओहि तीनू गोटेकेँ (दुनू भद्र व्यक्ति आ बाजारी वृद्धकेँ) रस्ता देखा कए बाहर ल’ जाइत छथि...पाछू-पाछू ढोल-पिपही बजा कए ‘मार्च’ करैत बाहर ल’ जाइत छथि। तखन रहि जाइत छथि जेसब ताहि सबमे सँ अभिनेता अगुआ आबै छथि।]
चित्रगुप्त : (जेना यमराज केँ अभिनेताक परिचय द’ रहल छथि) ई विवेक कुमार भेलाह... (नंदी सँ) पृष्ठ पाँच सौ अड़तीस...
अभिनेता : (आश्चर्य-चकित होइत, चित्रगुप्त सँ) अहाँ केँ हमर पृष्ठो मोन अछि...करोड़ो मनुक्खमे....? ई त’ आश्चर्यक गप्प भेल...
चित्रगुप्त : एहि मे अचरजक कोन बात? एतेक किछु करैत रहैत छी जे बेरि-बेरि ओहि पृष्ठ पर ‘एन्ट्री’ करै-टा पड़ै अछि...तैं.....
नंदी : (जेना घोषणा क’ रहल होथि...) पृ. 538, विवेक कुमार उर्फ.....?
अभिनेता : (टोकैत) हे कथी लय दोसर-दोसर नाम सब लै जाइ छी ? बड़ मोसकिल सँ त’ अपन जाति-पाति केँ पाछाँ छोड़ा सकल.... आ तखन एत्तहु आबि कए....?
चित्रगुप्त : आगाँ बढ़’! नाम छोड़ि दहक !
नंदी : आगाँ रिकार्ड त’ ई कहै अछि जे ओना ई छलाह त’ बड्ड मामूली व्यक्ति, तखन अपन कुशलता सँ, आओर सौभाग्यो सँ, पहुँचि गेल छथि शिखर पर... पाइ बहुत कमौलनि.. (झुकि कए नीक जकाँ रजिष्टर मे सँ पढ़ैत...) दान-ध्यान सेहो कैने छथि... ततबा नहि जतबा क’ सकैत छलाह अनेक महिला सँ हिनक नाम केँ जोड़ल जाइ छनि...अफवाहि केँ अपने पसिन्न करै छथि... एहि मामलामे बदनामे रहलाह... आ तैं पारिवारिक जीवन सुखद नहि छलनि... निःसंतान छथि, पत्नीकेँ त्यागि देताह ताहिसँ पहिनहि वैह छोड़ि कए चलि गेलीह... वस्तुतः पत्नीक कहब छलनि ई असलमे नपुंसक छलाह...
अभिनेता : (नंदी केँ थम्हबैत) की सभक सामने अंट-संट पढ़ि रहल छी पोथासँ ? पत्नी छोड़ि कए चलि गेलीह… नीक कैलीह, एखन सुखी छथि एकटा अधेड़ उमरक नवयुवकक संगे.... मीडिया बला सभसँ पाइ भेटलनि आ कि कहानी बनबै लगलीह... ‘अफसाना’.... जे बिकत बड्ड बेसी।
चित्रगुप्त : से ओ सब जाय दहक ...ई कह आर कोन विशेष बात सभ दर्ज छैक..
भृंगी : (ओहो झुकि कए देखि रहल
छलाह रजिष्टर मे, आब रहल नहि गेलनि---) हिनक जत्तेक मित्र छनि, शत्रुक संख्या ताहिसँ बहुत गुना बेसी छनि।
यमराज : से त’ स्वाभाविके.....
भृंगी : हिनक शत्रुपक्ष कहैत अछि ई नुका–चोरा कए कतेको वामपंथी गोष्ठी केँ मदति करैत छलाह.... बहुतो ताहि तरहक संगठन केँ ....
वामपंथी : (प्रतिवादक स्वरमे) कथमपि नहि... ई सब फूसि बाजि रहल छी अहाँसब....
भृंगी : बाजि कहाँ रहल छी यौ कामरेड? हम त’ मात्र पढ़ि रहल छी--!
वामपंथी : हिनका सन ‘बुर्जोआ’ गोष्ठीक सदस्य कखनहु करत गै मदति कोनो साम्यवादीक ? असंभव !
अभिनेता : कियै? साम्यवाद पर अहींसभक जन्म-सिद्ध अधिकार छै की? आन क्यो ‘साम्य’ क कल्पना नहि क’ सकैत अछि ?
वामपंथी : (व्यंग्यात्मक स्वरें) कियैक नहि ? कल्पनाक घोड़ा पर के लगाम लगा सकैत अछि ?
करू, जतेक मर्जी कल्पना करै जाऊ ! मुदा हम सब छी वास्तविक जगत् मे वास्तव केँ भोगि रहल छी...
अभिनेता : वास्तवमे भोगी छी अहाँ सब, भोगक लालसा मे ‘साम्य’ दय गेलहुँ बिसरि ‘वाद’टा मोन रहल ... वाद-विवाद मे काज मे आबैत अछि....!
चित्रगुप्त : वाद-विवाद सँ काज कोन ? कहबाक तात्पर्य ई जे विवेक कुमार जीक विवेक भरिसक बड़ बेसी काज करैत छनि...तैं.....
यमराज : (गंभीर मुद्रामे) हुम्-म्-म् ! (नंदी सँ) तखन देखै छी विपक्ष सँ बैसी सपक्षे मे सबटा पढ़ि रहल छी...
चित्रगुप्त : तकर अलावे ...ई हिनक अकाल आगमन थिकनि.... स्टंटमैनक बालक छल अस्वस्थ, गेल छल छुट्टी ल’ क’ अपन घर... त’ ई अपनहि स्टंट करै लगलाह...
अभिनेता : (बिहुँसैत) कनियें टा चूक भ’ गेलैक कि पहाड़ी पर सँ खसि पड़लहुँ....
यमराज : कनिये-कनिये भूल-चूक मे बदलि जाइत अछि इतिहास आ पुराण...सबटा पुण्य बहा जाइत अछि तनिके पापसँ ! मुदा जे हो (नंदी सँ) हिनका एखनहुँ अनेक दिन जीबाक छनि.. पठा दियौक पृथ्वी पर...
वामपंथी : (अगुआ कए) आ हम ? हमर की हैत ? (एक बेरि यमराज तँ एक बेरि चित्रगुप्त दिसि देखैत छथि। मात्र भृंगी ससम्मान अभिनेताकेँ बाहर पहुँचाबै जाइत छथि।)
यमराज : अहाँक कथा मे तँ स्वर्ग-नर्क कोनो टा नहि अछि...ने छी हम आ ने चित्रगुप्त...
वामपंथी : जी, से त’...(कहै जाइत छलाह ‘अवश्य !’ मुदा ताहि सँ पहिनहि टोकल जाइत छथि।)
चित्रगुप्त : सैह जखन बात छैक त’ अहाँ अपने विचार करू अपन भविष्य....(पॉकिट सँ एकटा मुद्राकेँ ‘टॉस’ करबाक भंगिमा मे.....) कहु की कहै छी ‘चित’ की ‘पट’?
वामपंथी : हमर विश्वास आ हमर शिक्षा किछु आने तरहक छल, मुदा जे प्रत्यक्ष क’ रहल छी (कहैत देवार.... यमराज... चित्रगुप्त आदि केँ देखाबैत छथि) तकरे अस्वीकार कोना करू ?
यमराज : कियैक ? ईहो त’ भ’ सकैछ जे आँखि धोखा द’ रहल अछि...ई सबटा एकटा दुःस्वप्न मात्र थिक... कल्पलोक मात्र थिक...ई, जतय घुसै जायब त’ देखब बोर्ड पर टांगल अछि---‘नो एन्ट्री’!
वामपंथी : तखन ?
चित्रगुप्त : तखन की ?
वामपंथी : तखन हम की करू ?
यमराज : (गंभीर मुद्रामे) पहिने ई कहू... विषम के थिक ? मनुक्ख कि प्रकृति ?
वामपंथी : दुनू...
यमराज : के कम के बेसी ?
वामपंथी : प्रकृति मे तैयहु कत्तहु ‘प्राकृतिक न्याय’ (नैचरल जस्टिस)
काजक’ रहल अछि, मुदा मनुक्खक स्वभावक आधारे अन्याय पर ठाढ़ अछि...
यमराज : की अहाँक राजनीति एहन अन्याय केँ दूर नहि क’ सकैत अछि ?
वामपंथी : प्रयास करैत अछि...
यमराज : ठीक अछि... तखन हिनको तीनू गोटे केँ नेने जाऊ ! (चोर उचक्का आ पॉकिट-मारक दिसि देखा क’ बाजैत छथि) आ देखू हिनका सब केँ बदलि सकै छी वा नहि ?
वामपंथी : बेस....
[कहैत पॉकिट-मार आ उचक्का हुनका लग चलि आबै छथि। चोर कनेक इतस्ततः करैत छथि आ अंत मे पूछि दैत छथि जाय सँ पूर्व…]
चोर : तखन एहि सँ आगाँ ?
यमराज-चित्रगुप्त-नंदी : (एक्कहि संग) ‘नो एनट्री’...
[कहैत देरी तीनू गोटे केँ साथ ल’ कए वामपंथी युवा वाहर जैबाक लेल उद्यत होइत छथि कि तावत् अभिनेता केँ छोड़ि कए भृंगी घुरि कए मंच पर प्रवेश क’ रहल छलाह।]
यमराज : मा प्रविश....
चित्रगुप्त : कदाचन!
[चारू गोटे एक पलक लेल चौंकैत थम्हैत छथि ....तकर बादे निष्क्रांत होइत छथि। हुनका सभक प्रस्थानक पाछाँ भृंगी आगाँ बढ़ैत छथि यमराजक दिसि।]
यमराज : (भृंगी सँ) की समाचार ?
भृंगी : चारू धाम हल्ला मचल अछि...
यमराज : से की ?
भृंगी : इयैह जे स्वर्गक सबटा नियम केँ बदलल जा रहल अछि....
चित्रगुप्त : जेना ?
भृंगी : जेना कतेको गोटा केँ पृथ्वी पर घुरबाक मौका लागि गेलनि...
नंदी : आ ओमहर धीपल कड़ाही लेने सबटा यमदूत प्रतीक्षा क’ रहल अछि जे कखन पापी-तापी आओत आ कखन ओसब आपन काज क’ सकताह ?
भृंगी : मुदा अहाँ दुनू छी जे.... सबटा बिसरि सब केँ माफी द’ रहल छी...
नंदी : भरिसक अपन भूमिका बिसरि गेल छी हमसब....
यमराज : एकर बाद मोन राखब...आब त‘ क्यो नहि आओत कि ने?
भृंगी : दूर-दूर धरि कत्तहु क्यो नहि...
नंदी : सबतरि फक्का....!
[क्यो नहि नजरि करैत अछि जे भाषण-मंचक लग मे अपना केँ बचौने ठाढ़ि भिख-मंगनी चुप्पे-चाप सबटा बात सुनि रहल छलीह आ उपभोग क’ रहल छलीह...]
चित्रगुप्त : आब हमरा सँ ई नमहर दाढ़ी केँ राखल नहि जाओत....
यमराज : हमरहुँ मुकुटक तर माथ पर पसेना भरल अछि..... (कहैत मुकुट खोलि लैत छथि आ संगहि नंदी आबि कए यमराजक बाहरी पोषाक खोलै लागि जाइत छथि। मुकुट उतारि नकली नमहर केश केँ उतारि, यमराज अंगरक्खा केँ उतारि यमराज स्वाभाविक मनुक्ख जकाँ बनि जाइत छथि....।)
[तखनहि भृंगी जा कए चित्रगुप्तक मुरेठा केँ खोलि मेक-अप बला नकली दाढ़ी उपारै लागि जाइत छथि। यमराज आ चित्रगुप्तक देवत्वक एहि तरहक त्यागक दृश्य केँ देखि भिख-मंगनी हँसि दैत छथि। हुनका पर पहिने ककरहु नजरि नहि छलनि... तैं सब क्यो आश्चर्य होइ छथि। स्पॉट लाइट भिख-मंगनी पर पड़ै छनि। हुनका ओना हँसैत देखि यमराज नंदीक हाथ सँ अपन मुकुट आ पोशाक अपन हाथें ल’ लैत छथि... जेना पुनः सजबाक अक्षम्य प्रयास क’ रहल होथि।]
चित्रगुप्त : (अपन दाढ़ी आ मुकुट हाथ मे धयने) हँसि कियै रहल छी ?
[भिख-मंगनी आर हँसैत छथि... किछु कहि नहि पबैत छथि।]
यमराज : अरे ....! ई त’ बड़ वाचाल छथि...!
नंदी : ने ओ मूक छथि आ ने वाचाल...
भृंगी : (जेना एकांत मे कहि रहल होथि) हमरे बिरादरीक छथि कलाकारे भेलीह !
यमराज : (आँखि मे उत्साह) कोन कला करै छथि ?
भिख-मंगनी : अभिनय त’ नहि करै आबै यै..... एखन त’ आबै यै मात्र भिख मांगैक कला... कोना अपन दुर्दशाकेँ सभक सामने उजागर कैल जाय तकरे कला महाराज !
चित्रगुप्त : तखन त’ अभिनय आबिते छनि...
यमराज : सैह त’ !
भिख-मंगनी : दुर्भागा त’ छीहे आ दुर्दशा त’ अछिए...
कला मात्र ई जे कोना तकरा आँखि-मुँह पर छापि दी जे अहाँ सन-सन दानी किछु देबा लेल बाध्य भ’ जाइ...! ओना ‘अभिनय’ हम नहि क’ सकै छी...
यमराज : ई ‘ओना अभिनय’ की भेल ?
नंदी : जेना ‘हास्य’!
भृंगी : जेना ‘लास्य’!
चित्रगुप्त : (पूछैत) जेना ‘प्रेम’?
नंदी : उर्फ ‘मुहब्बत’!
भृंगी : उर्फ ‘गुदगुदी’...?
भिख-मंगनी : (चौंकैत) नहि बाबा ! ई हमरा सँ नहि हैत...(लास्यक इंगित करैत) ई देखबाक हो त’ ओम्हर देखू....!
[कहैत जेना गाड़ीक ‘हेड लाइट’ नुका नुका कए प्रेम करै बला सब पर पड़ैत अछि, तहिना प्रकाश जा पड़ल रमणी-मोहन आ अंत मे आयल उच्च वंशीय महिला पर, जे दुनू एक दोसराक हाथ मे हाथ देने हँसि-हँसि कए बातचीत क’ रहल छलाह। एतबा काल सँ जे एत’ यमराजक दरबार चलि रहल छलनि, जेना ताहि सँ अवगते नहि होथि। आँखि पर प्रकाश पड़ितहि आँखि चोन्हिया जाइत छनि... बड़ असंतुष्ट होइत छथि.. हड़बड़ा कए ओहि महिलाक हाथ छोड़ि दैत छथि]
रमणी-मोहन : (प्रतिवादक स्वरमे) ... हे के सब छी ओतय ? कियै तंग करै जाइ छी? देखि नहि रहल छी की क’ रहल छी ?
भिख-मंगनी : (जेना बहुत दिनक परिचित होथि तेहने स्वर मे... लग जा कए) की क’ रहल छी ?
रमणी-मोहन : (घबड़ा कए) क्-की करब ? ई इयैह....
यमराज : (पास मे जाय नीक जकाँ उच्च वंशीय महिला केँ देखैत ...) ई के थिकीह ?
रमणी-मोहन : ई न्-न्-निभा थिकीह !
यमराज : निभा के ? (आब रमणी-मोहन दिस देखैत... एतबा काल महिले दिसि देखि रहल छलाह।)
[रमणी-मोहन तोतराबैत छथि... बूझि नहि पबैत छथि जे की उत्तर देबाक चाही। यमराज आ चित्रगुप्त—दुनू केँ आधा मेक-अप उतारल अवस्थामे देखि एक बेरि हँसि कए परिवेश केँ हल्लुक बनैबाक प्रयास करैत छथि त’ एक बेरि गंभीर भ’ कए किछु बजबाक प्रयास करैत छथि। एतबा देर धरि महिलाक कोनो विकार नहि...कखनहुँ अपन नहक ‘पॉलिश’ दिसि देखै छथि त’ कखनहुँ साड़ी केँ ठीक-ठाक करै मे लागै छथि त’ कखनहुँ हाथ सँ अपन केश विन्यास केँ सोझराबै मे जुटि जाइत छथि।]
यमराज : बेस...बेस ! त’ अहाँ के छी ?
भिख-मंगनी : ई छथि ‘रमणी......मोहन’ !
यमराज : एतय की क’ रहल छी ?
रमणी-मोहन : जी, एतय ...(एक बेरि दरबज्जा दिसि देखबैत छथि एक बेरि एत्तेक जे भीड़ छल जेना तकरहि खोज करैत)...कतार मे सब सँ आगाँ ठाढ़ छलियै जे कखन ई दरबज्जा खुजत आ....
नंदी : कतार ?
चित्रगुप्त : कतय गेल कतार ?
भृंगी : सब क्यो भीतर चलि गेला की ?
नंदी : हिनका टपकि कए ?
रमणी-मोहन : आँय?(आश्चर्य होइत छथि)
भिख-मंगनी : से कोना भ’ सकैछ? ई त’ सब सँ आगाँ छलाह... वी.आई.पी. क्यू मे...? नहि ?
रमणी-मोहन : हँ... माने... पता नहि बाँकी सब गोटे कोना...?
नंदी : (व्यंग्य करैत) हिनका पूछि लियन्हु ने...जँ ई किछु बता सकती...
भृंगी : ओ नहि बाजै छथि...(बौक हैबाक संकेत करैत छथि।)
रमणी-मोहन : नहि-नहि, अहाँ जे सोचि रहल छी. से नहि...
नंदी : कोना बुझलहुँ जे ई की सोचि रहल छलाह...?
भिख-मंगनी : नहि... ई बाजै छथि, मुदा हमरा-अहाँ जकाँ सब बात पर नहि। तखनहि बाजै छथि जखन बतिया कए हिनका किछु लाभ भ’ सकै छनि...!
रमणी-मोहन : नहि-नहि, ओ अवश्य बाजै छथि...हमरा सँ त’ कतेक रास बात....
यमराज : जेना?
रमणी-मोहन : जेना...!आब हम कोना कहू जे....? जेना ओ कहै छलीह... आ हम कहै छलियनि...
यमराज : (महिलासँ) की ऐ ? निभाजी ? (महिला आँखि उठा कए यमराज केँ एक बेरि देखि कए नजरि केँ आन दिसि घुरा लैत छथि।) ई त’ किछु नहि कहैत छथि। (रमणी-मोहन सँ कहैत छथि।)
भिख-मंगनी : (हँसि कए) ई अहाँ सँ बात करती थोड़े ? हँ, जँ ई पता चलनि जे अहीं लग अछि एहि विशाल दरबज्जाक चाभी... जँ जानि जैती जे स्वर्गक अप्सरा बनबाक लेल अहीं एकमात्र मदति क’ सकैत छियनि तखनहि बजती ओ !
चित्रगुप्त : आ नहि त’...
भिख-मंगनी : (हँसि दैत छथि) नहि त’.... ई रमणीक हृदयक द्वार थिक बाबू....! सहजें एत्त’ प्रवेश नहि भेटत....हा-हा-हा ‘नो एंट्री’ एत्तहु...
नंदी : मुदा ई बूढ़ौ त’.... (रमणी-मोहन केँ देखबैत छथि। रमणी-मोहन केँ उकरू लागि रहल छनि जे लोग हुनकर उमरि दय बात क’ रहल अछि।)
भृंगी : हँ मुँह त’ देखू... माथ पर त’ मात्र दुइ चारि टा केश छनि.. (रमणी-मोहन पॉकिटसँ कंघी बहार क’ कए केश-विन्यास कर’ लागैत छथि) टकला नहितन...
यमराज : (विरक्त भए) आः थम्ह’ तोँ सभ !
भिख-मंगनी : हँ.. थम्हू ! ई कोनो जेहन-तेहन व्यकति नहि छथि... रमणी-मोहन छथि, जानै छथि रमणीक हृदयक बंद द्वार कोना खुजल जाइत अछि... ईहो कलाकारिये होइ छइ....

चित्रगुप्त : हँ-हँ.. अवश्य...(थम्हैत) महाराज ! (इशारा करैत) अहाँ कने प्रयास करितहुँ त’...भ’ सकैछ...
[यमराज अस्फुट स्वरेँ किछु कहैत छथि आ गला खखारैत छथि। चित्रगुप्त बुझि जाइत छथि जे यमराज ‘पंचशर’ द्वारा आक्रान्त भ’ गेल छथि—मुदा चित्रगुप्त वस्तुतः सब केँ खदेड़ि दैत छथि महिलाक पास सँ] हे ...जाय जाउ त...! एत्त की देखि रहल छी, तमाशा ? ( कहैत जेना आंगन बोहारल जाइत अछि ताहि तरहेँ एक्कहि झटकामे नंदी-
भृंगी-रमणीमोहन-भिख-मंगनी—सबकेँ ल’ कए भाषण-मंच दिसि, मंचक एक कातमे ल’ जाइत छथि। बीच मंच पर रहि जाइत छथि ओ सुसज्जित सुन्दरी उच्चवंशीय महिला आ यमराज। संकोचसँ आ डरैत यमराज एक बेरि पाछाँ घुरि कए चित्रगुप्तक दिसि देखैतो छथि। एक दोसराकेँ उत्तेजना-वश धरैत सब क्यो एकहि संग उत्सुकताक संग कतारमे ठाढ़ जेना झुकि कए देखबाक आ सुनबाक प्रयास क’ रहल छलाह जे ने जानि आब की होइत अछि...। यमराज केँ एक-दू बेरि पाछू घुरि कए देखैत देखि चित्रगुप्त इशारा क’ कए हुनका उत्साह प्रदान करैत छथि।]
यमराज : (मधुर स्वरमे) निभा...! सुनू ने, निभा...
[महिला मुँह उठा कए यमराज दिसि दैखै छथि। आँखिमे जिज्ञासा...]
चित्रगुप्त : (दबले स्वरमे, जेना ‘प्रॉम्प्ट’ क’ रहल होथि) चाभी.. चाभी देखाउ !(यमराज घुरि कए देखै छथि, जेना सुनबाक प्रयास क’ रहल होथि चित्रगुप्तक बातकेँ) दरबज्जा... दरबज्जा ! (स्वर्ग दिसि देखबैत छथि।)
यमराज : (जेना बुझि गेल होथि की कहल जा रहल छनि...आब महिला दिसि घुरैत) देखि रहल छी ? (महिला घुरि कए दरबज्जा दिसि दैखैत छथि आ तकर बाद यमराज दिसि घुरि कए जेना आँखिए सँ पूछि रहल होथि—“हँ देखि त’ रहल छी... तखन कहै की चाहै छी ?”) अहाँ जाय चाहै छी ओहि पार ? (महिला सदर्थक भंगिमामे मूड़ी डोलबैत छथि) एक्कहि उपाय अछि जाहिसँ जा सकै छी ओहि पार... (महिला अविश्वासक भंगिमा करैत हँसि दैत छथि...)
चित्रगुप्त : (आब धीरज नहि राखि सकैत छथि) कियै ? विश्वास नहि होइये ?
नंदी : इयैह त’ छथि ‘यमराज’।
भृंगी : आ इयैह त’ ठीक करै छथि जे----
नंदी : के नर्क मे जाओत...
भृंगी : आ के स्वर्गमे!
महिला : (रमणी-मोहनसँ) सत्ये ? (रमणी-मोहन माथ डोला कए ‘हँ’ कहैत छथि, रमणी मोहने सँ पूछैत छथि---) मुदा ओहि दरबज्जा पर त’ लिखल अछि ‘प्रवेश निषेध’
भिख-मंगनी : मात्र हुनकहि लग छनि चाभी...
चित्रगुप्त : जाहिसँ खुलि सकैत अछि सबटा ताला...
भिख-मंगनी : (यमराजसँ) ओ चाभी त’ देखाउ ! (यमराज मात्र हँसैत छथि) देखाउ ने ! (यमराज पोशाकक भीतरसँ एकटा बड़की टा चाभी बहार करैत छथि।) इयैह लियह ! (कहैत भिख-मंगनी यमराजक हाथसँ प्रायः झपटि कए चाभी ल’ कए महिला केँ दैत छथि।)
महिला : (चाभी हाथमे भेटैते देरी जेना त्रिलोकक सबटा साम्राज्य भेटि गेल होनि एहन भाव भंगिमा देखबैत छथि। रमणी मोहनकेँ इशारा करैत छथि आ एहन दृष्टिएँ बाँकी सब गोटे दिसि देखैत छथि जेना हुनका सबसँ हिनका कोनो परिचये नहि छनि।) चलू ..आब देखै की छी, आब हमरा सब केँ क्यो नहि रोकैबाला... (कहैत रमणी-मोहनक हाथ धैने दरबज्जा दिसि तेजी सँ बढ़ैत पहुँचैत छथि। चाभी रमणी-मोहनक हाथ मे द’ कए कहैत छथि) हे लियह... अहीं खोलू.... क’ दिय सबटा प्रतीक्षा केर अवसान !
[रमणी-मोहन चाभी त’ लैत छथि, मुदा शंकित दृष्टिएँ एक बेरि यमराज आ चित्रगुप्त दिसि देखैत छथि त’ एक बेरि ओहि महिला दिसि, आ कि पुनः नंदी-भृंगी दिसि देखै छथि।]
भिख-मंगनी : (जेना रमणी-मोहनक पौरूष केँ ललकार द’ रहल होथि) आबहु देखि की रहल छी... जोर लगाऊ ने.... (रमणी-मोहन लजा कए आ हड़बड़ा कए चाभी सँ दरबज्जा खोलबाक प्रयास करैत छथि मुदा कोनो लाभ नहि होइत छनि।)
महिला : की भेल ? (उद्विघ्न भए) ठीक सँ कोशिश करू ने ! (रमणी-मोहन पुनः प्रयास करैत छथि।)
भिख-मंगनी : (जोर-जोरसँ हँसैत) बस ! एतबे ताकति छल बाँकी ? एकटा चाभी सँ सामान्य दरबज्जा धरि नहि खोल’ आबै ये ? (हँसैत) छठी केर दूध नहि पीने छी की ? हा- हा- हा!
नंदी : (हँसैत) ई रमणी मोहन पुरूष थिकाह की रमणी ?
[नंदी आ भृंगी सेहो रमणी-मोहनक दुर्दशा देखि हँसीक ‘कोरस’ मे योगदान करै छथि। महिला हड़बड़ा कए रमणी-मोहन सँ चाभी हाथ मे लै छथि।]
महिला : (रमणी-मोहनसँ) हँटू हमरे खोलै दियह !
चित्रगुप्त : थम्हू ! व्यर्थ प्रयास जूनि करू ! ई खोलब अहाँक बुते नहि हैत।
महिला : (असंतोष आ क्षोभ स्वरमे) कियै नहि हैत ?
चित्रगुप्त : कारण ई कोनो साधारण दरबज्जा नहि थिक... ई मोनक दरबज्जा थिक... मात्र चाभीटा सँ ई नहि खोलल जै सकैछ।
महिला : (क्रोधक स्वरमे यमराजसँ) तखन की हमरा ठगबाक लेल चाभी देलहुँ ?
नंदी : एकरा खोलबाक मंतर मनुक्खक मोनक भीतरे होइ छैक।
महिला : (खिसिया कए) ककर मोनक भीतर ? अहाँ सब सन पाजी बदमाशक मोनक भीतर कि हमरा सन पढ़ल-लिखल उच्चवर्गक लोगक मोनक भीतर ?
भृंगी : टेबि कए त’ देखू ‘मोन’ अहाँक भीतर मे एखनहुँ अछि कि रास्ता चलैत ककरहु द’ देने छी ?
[एहि बात पर नंदी आ भिख-मंगनी हँसि दैत छथि।]
भिख-मंगनी : ककरहु भीखमे द’ देने हेतीह....
महिला : हम नै तोरा जकाँ भीख मांगै छी आने भीख दैते छी !
रमणी-मोहन : (अगुआ कए महिला केँ शांत करैत) छोड़ू निभा ! की अहाँ छुच्छे एकरा सब सन लोगक संग मुँह लागै छी....!
नंदी : (रमणी-मोहनक नकल करैत जेना भिख-मंगनीएकेँ निभा मानि कए बाजा रहल होथि) छिः निभा ! की अहुँ अहिना मोनक भीख लेबा-देबा दय बाजि रहल छी ?
भिख-मंगनी : (ढ़ोंग करैत) से कियै ?
नंदी : नहि बुझलहुँ ? (भिख-मंगनी मूड़ी डोला कए इशारासँ ‘नहि’ कहैत छथि) देखू हम छी उच्चवर्गक...(आब भृंगी केँ देखा कए) आ ई थीक निम्न-वर्गक,नीच लोग ! (कहिते देरी भृंगी पीठ झुका कए एना चलै फिरै लागैत छथि जेना संपूर्ण शरीर नीचाँ भ’ गेल होइन।)
भिख-मंगनी : (नवका कथानक केँ उत्साहित करैत) बेल.... आ तकर बाद ?
नंदी : तकर बाद की ? मोन तँ हमरे लग अछि कि नहि ?
भिख-मंगनी : ठीक-ठीक !
नंदी : आ मोन हमर झोरामे एकटा रहत थोड़बे ? रास्ता चलैत कतेको रमणी-मोहन हमरा जुटिते अछि...सभक मोन हमर एहि झोरामे रखने हम घुरैत रहैत छी। (कहि कए नंदी महिलाक चलबाक नकल करैत—जेना कंधा पर एकटा बैग सेहो छनि—ताहि तरहेँ चलैत छथि कैक डेग।)
भृंगी : (चालि पर थपड़ी पाड़ैत) वाह-वाह ! वाह-वाह !
भिख-मंगनी : जखन झोरामे एत्तेक रास मोन अछि त’ द’ कियै नहि दै छी दू चारि टा दाने मे ?
भृंगी : (हँसैत) हे तोरा त’ दाने- ध्यानक सूझत’ !
नंदी : हम छी उच्चवर्गक ! (गर्वसँ चलैत छथि) हम मोन बेचि सकै छी मुदा दान करब ? किन्नहुँ नहि...नैव-नैव च !
महिला : (सभक तिर्यक वाक्य आ मसखरी सँ अप्रसन्न भए) चलू त’ हमरा संग... (रमणी मोहनसँ) एक बेरि आर ‘मोन’ सँ कोशिश करै छी !
[दुनू गोटे दरबज्जाक पास जा कए मनः संयोगि क’ कए हाथ जोड़ि तत्पश्चात चाभी सँ दरबज्जा खोलबाक प्रयास करैत छथि। यमराज केँ छोड़ि सब गोटे जेना एकटा अदृश्य देबार बना कए ठाढ़ भेने सब किछु देखि रहल छथि।]
रमणी-मोहन : (परेशान भ’ कए... अलीबाबाक कथा मोन पड़ैत छनि) खुलि जो सिम-सिम ! (दरबज्जा टस सँ मस नहि होइछ। दुनू गोटे हताश भ’ जाइत छथि।)
[हिनकर दुनूक हालति देखि कए नंदी,भृंगी आ भिख-मंगनी गीत गाबै लागैत छथि।]
नंदी : “गली-गली मे गीत गबै छें,
झोरामे की छौ तोहर बिकाय ?”
भृंगी : “झोरा मे हम्मर सुग्गा- मैना,
सती मांजरी, दच्छिन राय !”
भिख-मंगनी : “की हौ सुग्गा कियै गेलें तों,
हम्मर गाम छोड़ि ओहि अंगिना ?”
नंदी : “माथमे प्रेमक भूत नचै छल,
कहै करेज—मैना,मैना !”
भृंगी : (आगाँ बढ़ैत रमणी-मोहनक लग मे आबि)
“की हे मैना, कियै कटौले,
पंख अपन तों मीतक नाम ?”
भिख-मंगनी : (उत्साहित भए महिलाक चारु दिसि घुरि-घुरि कए नाचैत आ गाबैत छथि---)
“की कहियहु हे, डूब देलहुँ अछि,
बिनु किछु सोचनहि दच्छिन-बाम !”
नंदी : (ओहो वृत्ताकार नृत्यमे योगदान करैत)
“की हौ सुग्गा कत’ छौ चाभी,
कोना तों जैबें स्वर्ग-धाम ?”
भृंगी : “दरबज्जा पर मोन केर ताला,
घुसब मना छैक हिनकर नाम।”
भिख-मंगनी : ‘नो एंट्री’ छै ‘नो एंट्री’ भाइ,
लागै ने अछि ई छइ चैना।’
नंदी : “छइ बसंत, छइ प्रेम अनंत,
तैं कहै करेज मैना,मैना।”
कोरस : ‘नो एंट्री’ छै ‘नो एंट्री’ भाइ,
कहै निभा रमणा- रमणा।’
नंदी : “सबतरि प्रेमक भूत नचै छइ,
कहै करेज हँ-ना, हँ-ना।”
चित्रगुप्त : (अकस्मात् चीत्कार करैत) सा-व-धा-न! (सब क्यो सावधान सब क्यो सावधान भ’ जाइत छथि) वि-श्रा-म! (सब क्यो विश्रांति बला भंगिमामे ठाढ़ भ’ जाइत अछि। सब गोटे निर्वाक आ निर्जीव भ’ जाइत छथि।)
कोरस : (दूरसँ जेना एहन स्वर भासल आबि रहल अछि)

“नो एंट्री’ छइ, ‘नो एंट्री’ भाइ,
मोन नञि लागै, ने चैना !”
“नो एंट्री’ छइ ‘नो एंट्री’ छइ
दरबज्जा पर कर धरना !”
[धीरे-धीरे मंच अन्हार भ’ जाइत अछि।]

***

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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...