Sunday, July 05, 2009

महाकाव्य-त्वञ्चाहञ्च - गजेन्द्र ठाकुर

त्वञ्चाहञ्च

ई भारत ग्रंथ जयक जाहिमे गान
तखन कहियासँ भेलाह एतुक्का लोक, कर्महीन, संकीर्ण, कोना हारैत गेलाह सैन्यबलसँ आ दर्शनहुसँ, के घोसियाबैत गेल असमानताक पाठ एकर बिच।
के केलन्हि शुरू ई त्वञ्चाहञ्च।


गांधर्व, एकलव्यक वीरतासँ भरल, घृणा-प्रेम, सत्य-असत्यक धरातल,
आह पाराशर पुत्र भगवान व्यास, नमन-नमन शत नमन।
प्रसन्नवदनकेँ लिखबाक कहि बात, वाणी नहि रुकत अहाँक गणेशक शर्त, कविक कल्पनाक ई उत्कर्ष, मुदा बनाओल किएक अहाँ होअए जेना धर्मग्रंथ।
व्यास लेखक होइतहुँ छथि एहिमे एकटा पात्र, केहन नव रस, नव छल वाद !
गणेशक गति अति तीव्र, देखि व्यास कएल श्लोक जटिल। श्लोकक भाष्य बूझि शीघ्र, विघ्नकर्ता लिखताह ई।
श्लोकक जटिलताक लेल ई तर्क !
पुत्र शुकदेव नारदमुनि देवगण गंधर्व राक्षस यक्ष
व्यास शिष्य वैशंपायन आ परीक्षित पुत्र जनमेजयक निस्तार।
पौराणिक सूतजी रहथि, तत मध्य। करि ऋषिसभा नैमिषारण्यमे,महर्षि शौनक अध्यक्ष।
सूतजी कएल शुरु,संहिता सतसहस्त्र।
आइ ई मन कहए अछि, ई सत्य देखी, कविक कल्पना मध्य छल की सीखि परखी। अर्थ केर अनर्थ क्षेपक सभ केलक जे, हर्ष आ श्रमसँ कनेक देखाबी देखी ।

हस्तिनापुर सम्राट शांतुनु, गंग तट भ्रमण करि रहल। युवती बनि देवि गंगा,तट जकर छलि ठाढ़ निश्चल !
तेँ पड़ल होअए नाम हुनकर,
धार गंगाजीक नामपर भए अभिभूत कहल हे सुन्दरि,
करु प्रेम स्वीकार हमर। पत्नी बनि करु राज,
राज्य-धन-प्राण पर।

अछि समर्पण सभ अहाँ पर,
किंतु अछि किछु बंधन हमर। क्यो पूछय नहि परिचय हमर,
नहि करय रोक-टोक हमर कार्य पर।

प्रेम-विह्वल शांतुनु,
करि स्वीकार बंधन सकल। आनल महल मानव-गंगाकेँ,
समय बितल बितिते रहल। भेल बात विचित्र ई जे,
सात पुत्र शांतुनुकेँ भेल। युवती फेकल सभकेँ गंगधारमे,
राजाने किछु पुछि सकल।

कविक छल ई कल्पना ई युवती के अछि,
बुझि परैछ क्षण कोमल, क्षण क्रूर-क्रूरतम जे, अबोध बालक केर प्राणक हेतु विकल !
पूछल राजा शांतनु,
आठम बेर अपनाकेँ नहि रोकि सकल। देलक युवती परिचय सकल,
हम गंग आ ई आठ वसु छल। देलन्हि महर्षि वशिष्ठ शाप तनिका,
मर्त्यलोकक जन्म लेबाक। आठम पुत्रकेँ राखब हम किछु दिन, देवव्रत देब स्वरूप सेवक।
महर्षि वशिष्ठक नन्दिनीकेँ, देखि पत्नी वसु प्रभासक,
मर्त्यलोकक सखी हेतु, प्रयास नन्दिनीक हरणक ।
ऋषि ताकल गौ-देविकेँ, ज्ञान-चक्षुसँ। देलक शाप वसुगणकेँ भय-क्रोधित, कएल प्रार्थना वसु सभ शापित। हमर शाप नहि घूरि सकत परञ्च, सात वसु भय जायत मुक्त तुरत।
प्रभासकेँ रहय परत ततय, किछु दिन धरि मर्त्यलोकक शरण

होयत यशस्वी ई बहुत, घुरि आयल वसुगण गंग लग। हे देवि बनू माता हमरा सभक, दिअ’ मुक्ति तखन आस अहींक।
कवि-कल्प्नाक डोरी देखल,
मानव-गंग केर औचित्य लेल!

शांतुनु भए गेल विरक्त,
छूटि गेल गंगक सानिध्य। समय बीतल तँ गेल ओ एक दिन, तट, धारक समक्ष।

दिव्य बालककेँ ओतए देखल, करि रहल केलि ओतए। रोकि रहल वाणक धारसँ, गंगधारकेँ जतए।
प्रस्तुत भेलीह गंग तखन, सौंपि देल देवव्रतकेँ कहल। महर्षि वशिष्ठ सँ लए शिक्षा, वेद-वेदांगक निखिल। शास्त्र-ज्ञान शुक्राचार्य जेकाँ, शस्त्रमे परशुराम सन।


भेटि गेलन्हि पुत्र तेजस्वी घुरि अएलाह शान्तनु, देवव्रतकेँ बनाएल राजकुमार,
आइ अछि ई सम्भव,
अपन दोसर ठाम पोसलाहा पुत्रकेँ,
करत ई संकीर्ण समाज!
किएक नहि होए देवव्रत सन यशस्वी तखनहु?

कैक वर्ष बीतल एना, पुनि एक दिन आएल,
शान्तनु देखलन्हि यमुना तट तर अद्भुत सुवास,
आबि रहल तरुणी सत्यवती मलाहक बेटी,
आइ जखन गोत्र-मूल, पाइ-कौड़ीक बान्ह,
तहिया राजासँ विवाहक लेल सेहो,
राखल शर्त्त मल्लाहक सरदार।
बनत हमर नातियेटा, हस्तिनापुरक राजा,
तखने होएत ई विवाह।
शान्तनु ई वचन दितथि कोना, से घुरि अयलाह नगर अपन । चिन्ता घून बनि काटए लागल शरीरक कान्तिकेँ।
देवव्रत पूछलन्हि पितासँ, की भेल पिताश्री,
हे पुत्र की कहू, अछि एकटा चिन्ता, की होएत राज्यक
जे होएत होएत युद्धमे किछु अहाँकेँ,
ककर आश,
के बढ़ाओत,
वंश हस्तिनापुरक ।

कुशाग्र बुद्धिक देवव्रत
बुझलन्हि जे बात किछु आर अछि,
पूछलन्हि सारथीसँ सभ गप, गेलथि केवटराज लग,
आ राजपाट त्यागि अएलाह।

केवटराज परञ्च राखल एकटा शंका, की होएत जे अहाँक, पुत्र अहाँक जे छीनि लए, हमर नातिसँ राज्य।

अप्रत्याशित प्रश्नक उत्तर,
सेहो अप्रत्याशित ।
इतिहास बनत, ई प्रतिज्ञा। नहि करब हम विवाह आजन्म, गार्हस्थ्य आश्रम छोड़ब,
रहब आजन्म ब्रह्मचारी, छोड़ब वानप्रस्थ आश्रम, हस्तिनापुर सिंहासनक मात्र रक्षा, करब हम आजन्म।

संन्यास आश्रम सेहो छोड़ब, संतान बूझब हस्तिनापुर सिंहासनकेँ। क्यो नहि छूबि सकत तकरा, हमरा जिबैत-जीबैत।
धन्य-धन्य दिगान्त बाजल, पुष्प वर्षा कएलन्हि देवतागण,
मंचसज्जाक लेल उपयुक्त कवि ब्यासक कथन बुझु एतए।

भीष्म-भीष्म धन्य-धन्य, बाजि उठल लोक सभ।

केवटराज केलन्हि विदा, सत्यवतीकेँ सानन्द। कालांतरमे पुत्र दू, पाओल विचित्रवीर्य आ चित्रांगद ।

बालक दुनू छोटे छल, शांतनुक प्रयाण भेल। चित्रांगदक भीष्म, तखन राज्याभिषेक कएल।

घमंडी से छल एहन की देव की दानव बुझय, की गंधर्व की मानव ककरो नहि टेर करय। आ देह छोड़ल, युद्ध संग गंधर्वक कए|

विचित्रवीर्यक आएल राज्य,

भीष्मकेँ पड़ल सम्हारए, सभटा भार कारण विचित्रवीर्य रहथि छोट।
फेर जखन ओ भेलाह विवाह योग्य,
काशीराजक कन्या सभक स्वयंबरमे,
भीष्म विदा भेलाह काशी, जतए पहुँचल छलाह राजा शल्व, काशीराजक ज्येष्ठ पुत्री, अम्बा छलीह हुनकापर अनुरक्त । अम्बा,अम्बिका,अम्बालिका, दृष्टि फेरल भीष्म दिशि। बढि गेलीह आगू तखन, भीष्म क्रोधित भए दहोदिश, ललकारिकेँ कहलन्हि तखन ओ समस्त राजा सुनि लिअह ई, जे पराजित कए सकी तँ, स्वयंबरक भागी बनू फेर।
सभकेँ हराकए भीष्म जखन, चललाह काशीराजक कन्या समेत। शल्व रथक पाछू पड़ल आ, ललकारल युद्धक लेल।
धनुष-विद्या धनी भीष्मसँ, काशीराजक कन्यासभ कएल प्रार्थना, भीष्म छोड़ल प्राण शल्वक, मुदा अम्बा कहलन्हि भीष्मसँ एकांतीमे, हे गंगेय धर्मज्ञ, हमरा मोनमे अछि एक गोट शंका, मानि लेल सौभ देश राजाकेँ, पति हम अपना हृदय-बिच, धर्मात्मा, महात्मा,भीष्मक निर्णय,
जाथु अम्बा शल्व लग।
कराओल विवाह विचित्रवीर्यक, अम्बा-अम्बालिकाक संग।
शाल्व छलाह वीर,
भीष्म हराओल लोक सभक बिच, जीति लए गेल अहाँकेँ,
एहि अपमानक बाद की ई, बात हमरा स्वीकार हो?
विचित्रवीर्य कहल सेहो अम्बासँ विवाह अक्षत्रियोचित,
अम्बा कहलन्हि भीष्मकेँ
विवाह करू अहाँ हमरासँ।

हरि अनलहुँ, बीतल छह वर्ष हस्तिनापुर-सौभक बीच, भीष्मक प्रतिज्ञा
मुदा बीचमे ठाढ़,
गेलीह युद्धदेव कार्तिकेय लग।
अम्बा भरि उठलीह प्रतिशोधसँ ।
देलन्हि ओ नहि मौलायबला कमलक माला,
हे अम्बे! लिअ ई शस्त्र, जकर गार पहिरायब सैह करत भीष्मकेँ नष्ट। भीष्मक भय परञ्च छल ततेक, नहि तैयार भेल पहिरय ई माला क्यो एक। सुनलन्हि छथि द्रुपद वीर पांचाल, सेहो तैयार नहि भेलाह पहिरए ई माल। घुरलीह अम्बा अंतमे हारि, निराश हताश लटकेलन्हि द्रुपदक महलक द्वारि।

गेलीह ओ तपस्वीक शरण। सभ तपस्वी कए विचार कहलन्हि, जाऊ अहाँ परुशरामक आश्रम।
क्षत्रिय-दमन छथि ओ देथिन्ह दण्ड भीष्मकेँ, जे कष्ट देलन्हि अकारण।
परशुराम लग पहुँचि केलन्हि प्रार्थना, सुना कए अपन अभ्यर्थना। परशुराम कहल शल्व अछि प्रिय हमर,
बात नहि काटत विवाह शल्वसँ करक लेल छी तैयार अहाँ ? अम्बा कहल हम आब विवाह नहि करए चाहैत छी।
अछि हमर आब ई इच्छा मात्र, करू भीष्मसँ युद्ध अहाँ।
परशुराम कए स्वीकार ई प्रार्थना, देलन्हि भीष्मकेँ ललकारा, जितेन्द्रीय,ब्रह्मचारी छलाह दुनू, धनुर्धारी-योद्धा मध्य युद्धघोष बरु।

हारि-जीतक प्रश्न नहि छल ज्योँ, अनिर्णायक युद्ध बनल,
अम्बा हारि कैलाशक दिशि प्रयाण कएल, गेलीह शम्भूक शरणमे।
पाबि वर पुनर्जन्मक बाद, भीष्मक मृत्यु मे होएत अहींक हाथ।
अम्बाक संयमक सेहो छल सीमा, कूदि चितामे पुनर्जन्मक लौलसामे। मृत्यु पाबि जन्म लेल तखन, कन्या बनि द्रुपदक महलमे।
खेल-खेलमे माला पहिरल अपन टाँगल, द्रुपद सोचल होएत एकटा फेर, वैर भीष्मक अएत गऽ झमेल।
निकालि राजमहलसँ कन्याकेँ, जंगल दिशि ओ गेलि तपस्या कएल,
पाओल पुरुष रूप धरल शिखण्डी नाम, ओकरा छल सभटा मोन।

विचित्रवीर्यक राज सेहो चलल बड्ड थोड़ दिन। क्षयक बीमारी छल अल्पायु मे मृत्युक अदिन। धृतराष्ट्रक आ पांडुक जन्मो नहि भेल।
अंबिकाक पुत्र धृतराष्ट्र,अंबालिका पुत्र पाण्डु छल।
विधिक विधान छल, ज्येष्ठ पुत्र अंध भेल, अम्बिका सँ पुत्र धृतराष्ट्र, काल छिनलक आँखि, आ काल बनओलक कहबीक पाँति
अम्बालिका पुत्र पाण्डु, पौण्ड्र रोग ग्रसित तेँ ब्यास देल नाम ई,
आकि हुनकेँ सँ रोगक पड़ल नाम ई।
पौण्ड्र ग्रस्त पाण्डुकेँ राज्य-काज गेल देल ।

अंबिकाक दासीसँ विदुरक भेल जन्म छल। शिक्षा होमय लागल सभक भीष्मक संरक्षणमे, भीष्मकेँ चिंता भेल विवाह कोना होयत गए, धृतराष्ट्रक हेतु ताकल एक कन्याकेँ। शिवक वरदान छल गांधारीके सए पुत्रक, बढ़त वंश शोचल ई प्रयत्न से प्रारम्भ कएल।

गांधार नरेश सुबल भेलाह कथा लेल तैयार जखन, विवाह धृतराष्ट्रक भेल छलीह ओ शकुनिक बहिन।

सुनि पतिक अंधताक गप्प पट्टी बान्हल, आँखि रहितहु नेत्रहीनक जिनगी गुजारल।

सय पुत्रक माता छल दुःशला एक पुत्री, सिंधु नरेश जयद्रथ भेल जिनकर पति।

कृष्णक पिता वासुदेवक बहिन छलि पृथा, शूरसेनक पुत्री छलीह रहलीह जाए मुदा, पिताक पिसियौत कुंतीभोज छल संतानहीन, हुनके स्नेह भेटल पृथा भेलि कुंती पुनि।
कृष्ण-सुदर्शन, बलरामक दीदी भेलीह, सत्कार विप्रवरक करैत छलीह। एहिना एक बेर दुर्वासा देल मंत्र एकटा, पढ़ब मोनसँ देव अएत बजेबनि जिनका।
ब्यासक ई कवित्व मोनक बात कहलक,
वर-मंत्र-पुनर्जन्म सबहक तत्त्व तकलक।

नेनमति बुद्धि छल कुन्तीक, सूर्यकेँ बजाओल,
पुत्र-प्राप्ति भेल से बाधक छल लोकलाज, बहा देल बच्चाकेँ बिच गंगधार।
कौरवक सारथी अधीरथकेँ भेटल ओ, कर्ण राधेय माए राधा पोषित सूतपुत्र पराक्रमी, शरीर कवचयुक्त कान कुंडलसँ शोभित।

पाण्डुक फेर कुंतीसँ विवाह भेल,
मद्रनरेशक पुत्री माद्री दोसर पत्नी भेलि।
पाण्डु युद्ध-कार्य मात्र कएल जीति राज, दूर रहि राज-काज भोगल सुख मात्र !
कुंती-माद्रीक संग वन-विचरण मे रत।
शिकार खेलाइत वनमे,
एक मुनि श्राप देल संतानविहीनताक।
पाण्डुक संतान प्राप्तिक इच्छा देखि कुंती, खोललन्हि दुर्वासाक देल मंत्रक भेद। यमसँ धर्मराज,भीमसेन वायुसँ,
इंद्रसँ अर्जुन कुंतीक पुत्र तीन भेल।

कुंतीक मंत्रसँ माद्रीकेँ भेल पुत्रक आश।
अश्विनद्वय सँ भेल नकुल-सहदेव प्राप्त।
पाण्डुक मृत्यु पंचपाण्डव जन्मक बाद, भेलीह सती पतिक संग माद्री वनहिमे।

पाण्डव ओ कुंतीकेँ बोनसँ हस्तिनापुर,
अनलन्हि नगरमे सभ वनक मुनिवर सभ। पंच पाण्डवक संग आयलि कुंती नगर।

जुमि गेल सभ नर नारी ठाम-ठामे। ऋषि-मुनि वन प्राणीक संगतिमे शील। मुग्धित सुशील पाण्डवकेँ मोन भरि देखि-गुणि।



कृपाचार्यक आचार्यत्वमे शिक्षा, पाबि रहल दुर्योधन कौरव, पाबि सकए छथि हुनके लग रहि, पाण्डव जन सभ शिक्षा ई सभ ।


धृतराष्ट्र सोचि ई तखन कएल, ताहि तरहक व्यवस्था, दुर्योधन-कौरवक संग रहताह
पंच पाण्डव भ्राता।
भीम छलाह बलशाली सभमे, दुर्योधनमे छल इरखा बड़। करए लागल दुर्योधन भीमक, मृत्यु योजना गंगे तट !

जल क्रीड़ाक हेतु गेल लए, तट दुर्योधन पाण्डवकेँ। खाद्य मध्य मिलाओल विष, खोआओल भोजन भीमहिकेँ।
सभ गेल नहाबए गंगमध्य, नशा भीमकेँ आयल,
कात अबैत खसलाह ओतए भीम अड़रा कय ।
दुर्योधन बान्हल लताकुञ्ज सँ । फेकल धारमे ओकरा निश्चिंत, त्रास मुक्त कौरवघुरि आयल। गंग मध्य डँसलक एक नाग, विष कटलक विषकेँ !
से देखू काटत के पाण्डवक भाग।
विषक प्रभाव भेल दूर, भीम चललाह घरकेँ, उठलाह झुमैत होइत मदमस्त, कथा सुनाबए भ्राताकेँ।
युधिष्ठिर घरमे सोचथि, भीम पहुँचि गेल होएताह। नहि देखल घर भीम, माथ पर बल अएलन्हि कनेटा।
तावत भीम झूमि अएलाह, षडयंत्रक कथा सुनाओल । कुंती चिंतित भेलि विदुरसँ, पूछल भेल ई उचित !
विदुर बुझाओल पाण्डव छथि बलशाली किञ्चित। हुनकर दुर्योधन करि पाओत, नहि कोनो अहित।

भीमकेँ जिबैत देखि दुर्योधन-भ्राता, मोन मसोसि रहि गेल ओ दुष्ट दुरात्मा।


कौरव पाण्डव लीन कंदुक खेलि रहल। कंदुक खसल इनारमे नहि निकलि रहल। सोझहि छल एक शिअक बाटे आबि रहल, तेज जकर ओकर महिमा छल गाबि रहल।
बाणक वार पुनि पुनि कएल फेर ऊपरसँ, खेंचि कय निकालल गेंद धनुर्विद्याकौशलसँ।

भीष्मकेँ सुनाएल बालवृन्द कलाकारी ओकर, द्रोण नाम्ना कृपाचार्यक छल जे बहिनि वर।
अश्वत्थामा पुत्र जनिक सहपाठी द्रुपद छल। द्रुपद देल एकवचन राज देब आध हम। देल वचन बिसरलसे राजा बनला उत्तर। अपमानित कएल से फूटि, राजा ओ दंभी। प्रतिशोधक बाट ताकि रहल द्रोण बनि प्रतिद्वन्दी।
निर्धनताक जिनगी जिबैत छलाह घूमि रहल। अश्वत्थामाक संग आजीविकाक ताकिमे पड़ल। हस्तिनापुरक आग्रह छलाह नहि टारि सकल। कृतज्ञताक भारसँ अश्वत्थामा-द्रोण हस्तिनापुरक।
धनुर्विद्याक पाठ शुरु कएल कौरवक आ पाण्डवक। पाठक उपरांत समय आएल छल लक्ष्य भेदक।
परीक्षाक चातुर्यक संगहि कुशलताक रण-कौशलक। लक्ष्य बनल एकटा गोट-बेश ऊँच वृक्ष पर, राखल काठक चिड़ै आँखि जकर लक्ष्य छल।
सभकेँ पूछल द्रोण बाजू की छी देखि रहल? सभ क्यो गाछ वृक्ष पक्षिक संग देखि रहल।

पार्थकेँ पूछल अहाँ छी कथी देखि रहल सकल। माथ पक्षिक अतिरिक्त नहि किछु छी देखल। अर्जुनक बाण पक्षिक शिरोच्छेदन कएलक।
अर्जुन भेलाह प्रिय-स्नेहिल द्रोणक हृदयक।
बीतल समय शस्त्र-प्रदर्शनक छल आएल।
समय बीतल प्रदर्शन-शस्त्रक छल आयल।

भीष्म पूछल द्रोणसँ की-की सिखाओल, युद्ध-कौशल,व्यूह रचना आ शस्त्रकौशल।
प्रदर्शनक व्यवस्था भेल जनक बीचहि,
एकाएकी सभ भेलाह परीक्षित संगहि।
भेल भीम-दुर्योधनक गदा-युद्धक प्रदर्शन। भीष्म-धृतराष्ट्रक हृदय-बिच वातसल्यक, जखन छल द्वंदकबीच अर्जुक बेर आयल। एकानेक बाण-विद्यासँ रंगस्थली गुंजित, घोष अर्जुनक भेल बीचहि कर्ण आएल।
परशुराम शिष्य कर्ण कएलक विनय, कए छी सकैत हम प्रदर्शन सभक जे, विद्या जनैत छथि अर्जुन सकल सभ,
पाबि सह दुर्योधनक, ललकारा देलक, अर्जुन द्वंद हमरासँ लड़ू से प्रथमतः।

कृपाचार्य कहल सारथीपुत्र छी अहाँ, राजकुमारसँ द्वंदक अधिकारी कहाँ?

द्वंदता नहि अहाँसँ फेर बात द्वंदक, द्वंद-युद्धक गप आएल ओना-कोना?

हा ! हा! हा! चित्कार हृदयक,
कर्णक हृदयक चित्कार दुर्योधनेटा सुनलक।
ई सुनि दुर्योधन केलक ई घोषणा, बात ई अछि तँ सभ सुनैत जाऊ, अंग-देशक नृप कर्णकेँ बनबैत छी, योद्धाक परीक्षण करैत अछि बाहु,
ई बाहु ! पकड़ि कर्णक बाहु कहलक ।
अंग देशक नृप कर्णकेँ बनबैत छी।
कहि ई अभिषेक कएल सभागारेमे,
अंकमे लेल कर्ण भेल कृतज्ञ ओकर।
उठि अर्जुन तखन ई बात बाजल, हे कर्ण अहाँ जे क्यो छी, सुनू ई, हम द्रोण शिष्य अर्जुन ई कहए छी, बुझू नहि जे ई वीरताक वरदान टा, नहि भेटल अछि से अहीँक सभटा।
गुरु नहि सिखओलन्हि हारि मानब,
प्रतिद्वंदीसँ द्वंद करब जखन चाहब।
करतल ध्वनिसँ सभागार भेल फेर गुंजित, भीष्म उठि कएल संध्याक आगमन सूचित।
अर्जुनक गर्वोक्ति सुनि कर्णक हृदय छल, मोन मसोसि नृप अंगक गामपर पहुँचल।

शिष्टताक हेतु पाण्डव भेलाह प्रशंसित। भेल एहिसँ दुर्योधनक मोन शंकित। शकुनि दुःशासन छल ओकर भक्त, कर्णसँ भेँट उत्तर ओ भेल आश्वस्त, धृतराष्ट्रकेँ सभक कनफुसकीसँ कए त्रस्त।
पिता छलहुँ अहाँ सिंहासनक अधिकारी, जन्म-अंधताक रोकल राजसँ अहाँकेँ, हमरा तँ नहि अछि एहन लाचारी।
युधिष्ठिरकेँ सभ मानय लागल, सिंहासनक अधिकारी किएक ? अहँक सेहंता की भए पाएल, फलाभूत कोना अहुना ईएह।
युधिष्ठिर ज्येष्ठ हमरासँ अछि, परंतु अछि अहाँक अनुजक पुत्र सएह।
कएल आग्रह जएबाक मेला वारणावतक,
पाण्डवसँक करू। ता सुधारब व्यवस्था सभ, कल्याणकारी कार्य सभसँ, बिसरि जएत पुत्र कुंतीक, जन सकल हस्तिनापुरक।


धृतराष्ट्र मानल सभटा बात, आदेश देल वारणावत जाथु, कुंति देखि मेला-ठेला आउ।
विदुर भेल साकंक्ष भेद ई की, सचर रहब युधिष्ठिर, कहल ई।

विदुरक नीति कएल साकंक्ष, दुर्योधनक काटल सदि प्रपंच।
मंत्री पुरोचनसँ मिलि दुर्योधन, लाखक महल बनबओने छल, विदुर लगेलन्हि एकर पता, संवाद सेहो पठओने छल।
वाहक संदेशक छल कारीगर, निर्माण सुरँगक कएल। लाखक महलक भीतर छल, निर्माण से क्षणहिमे भएल।
पाण्डवकेँ निर्देश भेल छल, खोह सुरँगहिमे सूतइ जाउ,
आगिक पूर्ण शंका से छल, लगिते भीतरसँ बाहर अबै जाउ।

कृष्ण चतुर्दशीक छल ओ दिन, पुरोचन भेल से अतिशय चंचल,
आगि लगाएत आइ ओ छल सँ, युधिष्ठिर छल ई सभ बूझि रहल।
कए सचेत अपन माता-भ्राताकेँ, यज्ञ कएलन्हि ओहि दिन से,
भात-भोज देलन्हि नगरवासीकेँ, पंचपुत्र छलि भीलनी सेहो एक।

आह बेचारी ! कालक मारल वा मारल,
दू गोट द्वन्दतामे तेसर?

कालक सोझाँ ककर चलल जे, सूतलि राति ओतहि सभ तेँ।
पुरोचन सेहो सुतल ओतहि, बाहर दिश छल कोठली एक, आगि लगाओल भीम तखन, बीच रातिमे मौका केँ देखि।

लाक्षागृह छल बन से ओतए, अग्नि देवता अहि केर लेल।

घरक सुड्डाह होइमे लागत, से एकहु क्षण किएक?

नहि बिलमि माता- भ्राता, प्रणामअग्निदेवकेँकए।
निकलि कुंति कालक गालसँ, बचलि दुर्योधनक कुचालिसँ।

पुरोचन अग्नि मध्य से उचिते भेल, किन्तु भीलनि जरलि बेचारी,
पुत्र सहित से सूतल, ककरो बुझना छल नहि गेल ई छल।

नगरवासी बुझलन्हि जे जरलि, कुंती पाँचो पुत्र सभहिक संगे।
नगर शोकसँ भेल शोकाकुल, खबरि हस्तिनापुर ज्योँ गेलेँ।


दुर्योधन छल अति प्रसन्ना आ, धृतराष्ट्र प्रसन्न छल मोने-मोने।
परंतु विदुर सभसँ बेशी प्रसन्न, किएक तँ सत्य बूझि छल गेले।

से ओ कहल भीष्मकेँ सभटा, बात रहस्यक जा कए ओतए।
भीष्मक चिंता दूर कएलन्हि,
ई सभ गप जाय बुझा कए ।

अकाबोन पहुँचैत गेलाह गए, पाण्डव-जन कष्ट उठा कए। नाविक नावक संग प्रतीक्षा, करि छल रहय विकल भए।
कहलन्हि विदुर पठेलन्हि हमरा, आज्ञा दी गंगतट सेवा करबाक।
गंगा पार भेलथि पाण्डव जन, पाछू छूटल कतेक भभटपन।
धृत्राष्ट्रक,दुर्योधन आ शकुनीक, आ दुःशासन कर्ण सबहीक। संग मुदा लागल प्रतिशोध, हस्तिनापुरक छल ई दुर्योग।

नहि जानि जएत कई पथ ई, पथ न जतए छल ओहि वनमे, डेग दक्षिण दिशा दिश दी, गंतव्यक छल नहि ज्ञान कोनो जे !

दैत डेग बढ़ैत आगू, भूखल-पियासल थाकल ठेहिआयल, आह दुर्दशा देखू !

कुंतीक ई दशा देखि, भीमसँ नहि छल गेल रहल, वट-वृक्षक नीचाँ बैसा कए, चढल देखल सजग भऽ।
पक्षी किछु दूर छल ओतए, भीम जाए पहुँचल जलाशय, पानि पीब आनि पियाओल, सुतल सभ कुम्हलाय ओतए।

भीमकेँ नहि गेल देखल, करथि की हूसि मोन होअय, पोखरिक गाछक ऊपर छल राक्षस नाम हिडिंब जेकर।
हिडिंबा बहिनक संग छल, ताकि रहल अपन भोजन। मनुक्ख-गंध सूंघि कए, चलल नर-मांस ताकिमे ओ, हिडिंबे जो मौस-मनुक्खक, आन जल्दी ओतए जाकए। देखि कुंती-पुत्र संग सूतल, दुःखित हिडिंबा छल ताकैत, भीमक हृष्ट-पुष्ट शरीर देखि, ठाढ नेत्रे रहलि ताकए।
धरि धारण रूप सुन्दरीक, कहल भीम जाऊ उठाऊ, अपन माता बन्धुकेँ, दूर सुरक्षित हिनका पहुँचाएब।
मोहित छी हम अहाँ पर, चाह हमरा अछि विवाहक,
मायासँ हम बचाएब, बलवान क्रूर हिडिम्बक मारिक।
भीम कहल हम किए उठाएब, बंधु केँ सुतल अपन, बलवान अछि हिडिंब एहन, बल देखए हमरो तखन।
हिडिम्ब पहुँचल ओतए, हिडिम्बा छलि सुन्दरीक रूप बनओने, भीमसँ करि रहलि छलि गप, क्रोधसँ क्रोधित हिडिम्बकेँ कएने।

ओ दौड़ल हिडिम्बा पर मारक हेतु, भीम पकड़ल बिच्चहिमे, मल्लयुद्ध पसरल ओतए से, विकट द्वंदक हुँकार छल गूँजैत।

वन्यप्राणी भागए लागल आ उठलि कुंती-पांडव ओतए, पहुँचैत गेल दौगैत ओतए, रणभूमि साजल छल जतए। मारि देलक भीम तावत, भेल हिडिम्ब शवरूप यावत।

भीमक वीरतासँ हिडिम्बा भेलि छलि आनंदित, वाकचातुर्यसँ कएने छलि कुंतिकेँ प्रसन्न किंचित्।

युधिष्ठिर सेहो देल स्वीकृति माता कुंतीक विचार जानि, विवाह करि कए रहए लागल, भीम हिडिम्बाकेँ आनि। घटोत्कच उत्पन्न भेल, पिता तुल्य पराक्रम जकर छल।
दिन बीतल पाण्डव वन छोड़ि कए आगाँ जाए लागल, जाएब हिमालय दिशि पुत्रक संग ई हिडिम्बा बाजलि।
घटोत्कच कहल पितु माताक हम सदिकाल संगे रहब, होएत कोनो कार्य अहाँक, बजाबएमे नहि संकोच करब।



जाइत काल ब्यास भेटलाह कुंती कानलि हाक्रोस भए,
भारतक लेखक आएल बनि काव्यक पात्र भए !! ब्यास कहल नहि कानू दिन छोट पैघ होएबे करय। दुःख आकि सुखमे अपना पर नहि छोड़ए अछि नियंत्रण, धर्मपथ पर जे चलए,तकरे कहए छी मनुष्य तखन।
गर्वित सुखे नहि होए, दुःखमे धैर्यक न अवलंब छोड़ए, कुंती आ अहँक पुत्र छथि, तेहन जेहन ई मनुष्य होमए।
ब्यास काव्यक पात्रकेँ देखाए रस्ता सोझ किन्तु,
पात्रक चरित्रमे नहि अड़ाओल अपन आकांक्षा एको रति ।
धन्य तेँ ओ कवि आ ओकर कृति !!



पाण्डवजन पाबि ई संबल, पहिरल मृगचर्म वल्कल, ब्रह्मचारी केर भेष बनाओल, एकचक्री नगर पहुँचल।

रहल बनि अतिथि ओतए, आतिथ्य ब्राह्मणक पाओल, भाइ सभ जाथि आनथि सभ राखथि माताक समक्ष।
कुंती देथि आध-भीमकेँ आधमे शेष सभ मिलि खाथि, भीमक तैयो भूख मेटाइन्हि नहि भुखले ओ रहि जाथि।
भुखले छलाह भीम एक दिन गेलाह नहि भिक्षाटनमे, सुनल घोर कन्नारोहट घरमे, पूछल कारण जानल से।

बकासुर राक्षस ओतए छल नगर बाहर निवास जकर, राजा असमर्थ छल, राक्षस करए अत्याचार बड़-बड़।

छल निकालल समाधान जे सभ परिवारसँ प्रतिदिन एक, कटही गाड़ी भरि अन्न मदिरा मौस, जाथि बहलमान।
बक खाइत छल सभटा भोजन संग बहलमानहुकेँ से, कन्नारोहट मचल छल घर ब्राह्मण परिवारक मध्ये।

पार छल परिवारक आइ सभ परिवार दुःखित छल,
कुंती कहल पाँच पुत्र अछि, भीमक बल सुनाएल। भीमक बलक चर्च सुनि-सुनि कए ब्राह्मण मानल, कृतज्ञ भेल भीमकेँ ओ गाड़ीक संग खोह पठाओल।

खोह राक्षसक ताकि भीम खेलक, छल ओ भुखाएल, तृप्त स्वयं भीम छल देरी सँ अतृप्त बकासुर आएल।
तामसे आक्रमण कएलक किंतु लात-मुक्का मारि कए,
भीम प्राण लेलक ओकरा खींचि नगर द्वार आनि कए।
भेल प्रसन्न सभ जन मनओलक पूजा-पर्व ओतए, कुंती चललीह आर किछु दिन ओहि नगर रहि कए।
सुनल पांचालक स्वयंबरक, कथा पांचालीक द्रुपदक,
एकचक्रा नगरीसँ ढेरक-ढेर ब्राह्मण पहुँचैत ओतए।
पाण्डवजन लए रहल आज्ञा मातृ कुंतीसँ रहथि,
ब्यास पहुँचि कहल जाउ स्वयंबर ओतए देखए !


मार्गमे ऋषि धौम्य भेटलाह छलाह पंडित ज्ञानी, बढ़ल आगू तखन मिलि संकल्पित भऽ सभ प्राणी।

सुनि कथा प्रशंसा यज्ञसँ निकललि याज्ञसेनीक, मत्स्यभेद करताह जे क्यो द्रौपदी वरण करतीह।
स्वयंबरक स्थानक रस्ता तकलन्हि पांचालमे जा कए,
कुम्भकारक घर डेरा देलन्हि विचार कुंतीक मानि कए।

कर्ण आएल छल दुःशासन, दुर्योधनक संग सज्जित, देश-देशक राजा आएल छल रंगभूमि वीरसँ खचित।
तखन आयलि द्रौपदी भाइ धृष्टद्युम्नक संग सुसज्जित, पुष्पमाल लेने आयलि केलनि सभक नजरि आकृष्ट।
बीच स्वयंबरक भूमिक ऊपर मत्स्य एकटा लटकल, ओकर नीचाँ चक्र एकटा तीव्र गतिये छल घूमि रहल।
नीचाँ पानिमे छाह देखि जे चक्रमध्य पातर भुरकी तर, दागि सकत मत्स्य आँखिकेँ पुष्पमाल पड़त तकरे गर।
सभटा राजा हारि थाकि कए भेल विखिन्न थाकल छल, कर्ण देखि जन बाजि उठल सूत पुत्र किए आएल छल?
द्रौपदी बाजलि गाँथियो देत ज्योँ कर्ण मत्स्य-लोचनकेँ, नहि पहिराएब वरमाला नहि करब वरण ओकराकेँ।
विवश कर्णकेँ बैसल देखि ऋषिवेश अर्जुन आएल छल, एकहि शर-संधानसँ बेधल मत्स्य सुयश पाओल छल।
ब्राह्मण-मंडली कएने छल बुझि ओकरा ब्राह्मण जय-जयकार ओतए, क्षत्रिय राजा सभ कएल विरोध, तैयार अर्जुन पुनि संधान कए।
बिद्ध मत्स्य भू खसल भूमि बलराम कृष्ण आगाँ आओल, सभ राजाकेँ बुझाए सुझाए छल सहटाय ओतएसँ हटाओल।

कृष्ण एकांती कहल दाऊ सुनू ई, सुनल छल एक उरन्ती, वारणावत आगि बिच बचल पांडव, बचल छलि कुंती दीदी।

भीम तखने उखाड़ि वृक्ष छल भेल ठाढ़ सहटि अर्जुन कए, कृष्ण कहल हे दाऊ कालचक्र अनलक एतए भीम अर्जुनकेँ।
देखि पराक्रम हतोत्साहित भेल राजा सभ प्रयाण कएने छल, पांडव लए चललाह द्रौपदीकेँ व्यग्र एहि सभसँ ओ भेलि छलि।
अर्जुन खोलि अपन रहस्य, खिस्सासँ द्रौपदीकेँ कएल विह्वल,
धृष्टद्युम्न चुपचाप सुनए छल, घुरि पिताकेँ कथा ई कहलक।
कुम्भकारक घर पहुँचि पांडव कहल देखू की हम सभ आनल, कुंती कहल आनल अछि जे सभ तकरा बाँटू पाँचू पाण्डव !!

कहल अर्जुन हे माता होएत नहि व्यर्थ अहाँक ई बात, संग द्रौपदीक होएत विवाह पाँचू-पाण्डवक संग- साथ।

द्रुपद पठेलन्हि पुरहितकेँ धृष्टद्युम्नक संग ओतए, कुंतीकेँ नोतल आ सभकेँ लए गेल संग अपन । द्रुपद सुनल जे पाँचू-पाण्डव करताह विवाह द्रौपदीसँ, तखनहि ई कथा अछि पूर्वजन्महिक ब्यास आबि सुनाओल!!
भेटल छलन्हि वरदान शिवसँ जे पाँच पति अहाँ पाएब, सुनि सभ द्रौपदी विवाह द्रुपद रीति वैदिक सँ कराओल।

सभ किछु दिन रहल ओतए कुशलसँ द्रुपद केर महलमे, पसरल ई चर्चा सगरो धरि गेल गप हस्तिनापुर महलमे।
लोकलाजसँ बाह्य प्रसन्नता धृतराष्ट्र छल ओतए देखओने, मानि भीष्म-द्रोणक विचार पठाओल समाद अगुतओने।
आनी अनुज पत्नी पुतोहु ओ अनुज पुत्र सभकेँ आदरसँ, दुर्योधनक कर्णक विरोध पर कएल विचार विदुरकेँ बजाकय, शास्त्रानुसार विचार देलन्हि आधा राज्य देबाक ओ जाकए।
विदुरहिकेँ पठाओल धृतराष्ट्र आनए राजमहलसँ द्रुपदक, सभकेँ लए आनल पहुँचल ओ जन ठाढ़ करए स्वागत। धृतराष्ट्र कहल हे युधिष्ठिर गृह कलहसँ ई नीक होयत, जाए खाण्डवप्रस्थ बसाउ नव नगर आध राज लऽ कए।

खाण्डवप्रस्थ अछि बोन एखन पहिने छल राजाक नगरी, मानि युधिष्ठिर गेल ओतए बनाय नव घर द्वार सज्जित।
इन्द्रप्रस्थ छल पड़ल नाम आ तेरह वर्ष धरि केलन्हि राज, यश छल सुशासनसँ आ छल जन-जीवन अति संपन्न।


छल अहिना दिन बीति रहल अएलाह नारद एकदिन जखन, स्वागत भेलन्हि खूब हुनकर ओहो रहथि आनंदित तखन।
देखल शील-गुण पांडवक मुदा कहल द्रौपदीसँ सुनू बात ई, छी पत्नी पांडवक मुदा निवासक निअम किए नहि बनेने छी ?
नारदक बात समीचीन छल से निअम बनेलथि पाँचो गोटे, एक-एक मास रहथु सभ लग द्रौपदी निअम नहि भंग हो !
बारह वर्ष पर्यंत छोड़ए पड़त गृह त्रुटि भेल ज्योँ, पालन निअमक होमए लागल किछु काल धरि ई । कनैत अएलाह विप्र एक अर्जुन पुछलन्हि बात की ?

चोर छल चोरेने गौकेँ हाक्रोस विप्र छल करि रहल, शस्त्र छल गृहमे द्रौपदी संग युधिष्ठिर जे रहि रहल।
विप्रक शापसँ नीक सोचि मूरी झुकेने गेल अर्जुन, शस्त्र आनि छोड़ायल गौकेँ घुरि आएल गृह तखन।

माँगल आज्ञा युधिष्ठिरसँ दिअ गृहत्यागक आज्ञा, निअम भंगक कएल हम अपराध, की बाजल अहाँ ?


अर्जुन ई अपराध लागत जखन पैघक द्वारा होएत, छोट भाए कखनो अछि आबि सकैत बड़ भाय घर।

मुदा निकलि गेलाह अर्जुन आज्ञा लए माता भाएसँ, भ्रमण देश-कोसक करैत पहुँचल हरिद्वार गंग तट, स्नान करैत काल, नजरि छल नाग कान्याक ज्योँ, कोना बचि सकैत पहुँचि गेलाह पातालक निकट।
विवाह प्रार्थना स्वीकारल अर्जुन ई छल वरदान भेटल, जलमे रस्ता बनत चलि सकब अहाँ व्यवधान बिन।

मणिपुर पहुँचि जतए चित्रांगदा राजकन्या छलि रूपवती, विवाहक प्रस्ताव अर्जुनक स्वीकारल मानल राजा सशर्त, दौहित्र होएत हमर वंशज भेल ई विवाह तखन जा कए।

चित्रांगदाक पुत्र भेल बभ्रुवाहन नाम राखल गेल जकर ई, परम प्रतापी पराक्रमी योद्धा बनल बालक पाछू सुनए छी।
फेर ओतएसँ निकलि अर्जुन पहुँचल प्रभास तीर्थ द्वारका निकट,
शस्त्र-प्रदर्शनक आयोजन केलन्हि कृष्ण निकट पर्वत रैवतक।
प्रेम देखि सुभद्रासँ कृष्ण छलाह सुझओने नव उपाय ई, अपहरण करब जीतब युद्ध यादवसँ बनत तखने बात ई।

बनलि सारथी वीर सुभद्रा संग्राम छल बजरल जखन, बुझा-सुझा मेल छल करओने कृष्ण जा कए तखन।
विवाह भेल तदंतर अर्जुन संग सुभद्रा गएलाह पुष्कर, पुरल जखन ई वनवास कृष्णक संग पहुँचल इंद्रप्रस्थ।
देखि नववधू प्रसन्न कुंती आनंद नहि समटा रहल, द्रौपदीसँ पाँच पुत्र, आ अभिमन्यु सुभद्रासँ भेल छल।
बीति छल रहल दिन जखन अएलाह जीर्ण शरीर अग्नि, रोगक निदान छल खांडव वन रहए छल ओ सर्प तक्षक।

इंद्रक अछि मित्र ओ जखन करैत छी जरेबाक हम सूरसार, नहि जरबए दैत छथि इंद्र, करू कृपा अहाँ हे इंद्र अवतार ।
छी प्रस्तुत मुदा अस्त्र अछि नहि हमरा लग ओतेक, इंद्र युद्धक हेतु चाही योग्य शस्त्रक मात्रा जरूरी जतेक।
देल गांडीव धनुष तूणीर अक्षय वरुणक रथ नंदिघोष, चलल डाहबाक हेतु अग्नि पेलाक बाद अर्जुनक तोष।

इंद्र मेघकेँ पठओलन्हि कृष्ण कएल सचेत जे, वायव्यक प्रयोग कएल अर्जुन मेघ बिलाएल से।

तक्षकक मृत्योपरान्त इंद्र भेलाह प्रकट ओतए, माँगल अर्जुन दिव्यास्त्र हुनकासँ मौका देखि कए।

जाऊ शिवक उपासना करू दए सकैत छथि वरदान ओ, छल मय आयल अग्निक कोपसँ बचि लग अर्जुनक ओ।
सेवा करबाक बात छल मोनमे लेने कृतज्ञ छल ओ, बनाऊ सभा भवन अनुपम नहि बनल जे कतहु होऽ।





मय दानव छल कए रहल नव निर्माण, सभा भवनक दिन-राति लागि उत्थान।
स्फटिकसँ युक्त शीसमहल सन कौशल, युधिष्ठिर ओतहि तखन सिंहासन बैसल।
ऋषि नारदक आगमन भेल ओतए जाए, देलन्हि करबाक यज्ञ जे राजसूय कहाय।
बजाओल द्वारकासँ कृष्णकेँ समाद पठाय, कृष्ण कहलन्हि सभा भवनमे आबि कए, जरासंध मगधक नरेश रहत गए यावत,
राजसूय सफल नहि होमय देत तावत।
बंदी बनेलक राजा लोकनिकेँ ओ हराय, आक्रमण ओकर भेल मथुरा पर बड्ड, हारि द्वारका राजधानी बनाओल हम जाए ।

युधिष्ठिर बात सुनैत भेलथि हतास सन, भीम अर्जुन आशा बन्हेलन्हि भ्राता सुन।
क्षत्रिय-धर्म अछि शत्रुकेँ वशमे करए, कृष्ण,अर्जुन-भीम संग राजगृह चलल।

ऋषि वेशधारी राजगीरक प्राचीर लाँघि, पहुँचल सभ सोझे सभा-भवन जी-जाँति।

सत्कार करए चाहलक जरासंध बुझि विप्र, ललकारा देलक किंतु भीम द्वंद-युद्धक शीघ।

दिन बीतल खत्मक नाम नहि लैछ ई युद्ध, कृष्णक संकेत पाबि चीरल ओ शरीर संधिसँ,
भीम तोड़ल शरीर जरासंधक उनटि फूर्त्तिसँ, शरीर फेंकल दुहू दिशि उनटि एम्हर-ओम्हर, मुक्त कएल कारागारसँ बंदी गण राजा सभकेँ।
जरासंध-पुत्र सहदेवकेँ दए मगध राजक गद्दी, आपस भेलाह इंद्रप्रस्थ घुरलाह तीनू व्यक्त्ति।

पूर्व दिशि भीम उत्तर अर्जुन नकुल दक्षिण, सहदेव पश्चिम दिशा दिशि दिग्विजय खातिर।
विजय रथ नहि क्यो रोकि सकल हुनकर, धन-धान्यसँ परिपूर्ण सभ आबि कएल तैयारी, राजसूय यज्ञक भेल राजा सभक इन्द्रप्रस्थमे बजाही।
राजा लोकनि केँ दय समुचित कार्यक भार, भीष्म-द्रोणकेँ यज्ञ-निरीक्षणक देल प्रभार।
कृष्ण विप्र चरण-धोबाक लेलन्हि काज । हस्तिनापुरसँ भीष्म, द्रोणक संग भेल आगमन, धृतराष्ट्र विदुर कृप अश्वत्थामा दुर्योधन दुःशासन।

बीच यज्ञमे उठल छल प्रश्न अग्र-पूजाक, भीष्मक सम्मति युधिष्ठिर पुछलन्हि जाए, भीष्म कहल छथि श्रेष्ठ कृष्ण नृप बीच, सहदेव सुनि वचन चरण पखारय लाग।

चेदिराज शिशुपालसँ सहल नहि भेल, अपशब्द कृष्ण-भीष्मकेँ देबए लागल, दुर्योधन-भ्राता प्रसन्न छल भेल, भीमक क्रोध बढ़ल छल ओ झपटल,
भीष्म रोकि शांत छल ओकरा कएल।

शिशुपालक गारि सुनियो छल कृष्ण प्रशांत, छलाह किएक तँ ओ पिसियौत कृष्णक, दिन बीतल कृष्ण देलथि वचन दीदीकेँ एक, सए अपराध क्षमा हम करब ओकर।
सए गारि सुनलाक उपरांत चलल सुदर्शन, चक्र कएलक चेदिराजक शिरोच्छेद तखन, सभा मध्य शांति – पसरल छल जाए, शिशुपाल पुत्रकेँ चेदिक गद्दी पर बैसाय।

यज्ञक क्रिया निर्विघ्न संपन्न छल भेल, सभ राजाकेँ ससम्मान विदा कएल गेल।
सभा भवनक चामत्कृत्य भेल चर्चित, दुर्योधन-शकुनि भवनकेँ देखल चकित। नीचाँ देखि मृग-मरीचिका बान्हल फाँढ़, पानि नहि छल हसलि द्रौपदी ई जानि, अएना सोँझा पारदरर्शी नहि ई देखल,
ओ चोटिल भीमक अट्टहाससँ विकल।

आँगा स्फटिक फर्श छल जकरा बुझल, पानि भरल भीजल छल सभ हँसल।

अपमानित छल लए युधिष्ठिरसँ आज्ञा, चलल हस्तिनापुर शीघ्रहि सभ भ्राता। क्रोधित हृदय ईर्ष्याक वशमे छल दुर्योधन, शकुनि संग मंत्रणा कए कऽएकटा विचारल, सोझे युद्धमे पांडवकेँ हरेनाइ अछि मोश्किल, सोचि ई दोसर व्यूह रचलन्हि दुष्ट शकुनि।
भव्य सभा भवन एकटा हम सभ बनाएब,
पाण्डव-जनकेँ देखबा लेल सेहो बजाएब, द्यूत खेलक छी महारथी हम गांधारवासी, धृतराष्ट्रकेँ कहि आमंत्रित कराऊ बजाऊ। भवन बनि कए तैयार भेल एके निसासी।

द्यूत खेलक आमंत्रणक हेतु धृतराष्ट्र विचारल। विदुर कहल राजन् खेल करत विनाश सभकेँ,
दुर्योधनक अंधप्रेममे धृतराष्ट्र मुदा नहि मानल।

स्वयं विदुर गेलाह देबए निमंत्रण इंद्रप्रस्थ, पाण्डव जनकेँ अएला पर भेल प्रेम-मिलन। मुदा हृदयक विष बहराइत जल्दी कोना कए, दुर्योधन लए गेलाह युधिष्ठिरकेँ सभा भवनमे।
द्यूतक चर्च सगरय होमए लगल छल ओतए, शकुनि माटि फेंकि कहल युधिष्ठिर भऽ जाए, सकुचाइत छी क्षत्रिय भऽ करए छी अनुचित। युधिष्ठिर तैयार जखने भेलाह, दुःशासन कहल, ई खेल होएत यधिष्ठिर आ दुर्योधनक बिच, मामा शकुनि पास फेंकताह दुर्योधनक दिशिसँ, हुनक हारि जीत मानल जईत दुर्योधनक से, दोसर दिन खेल भेल सभा भवनमे भारतक हे!! सभा भवन दर्शकसँ छल भरल,छल ओतए,
भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, विदुर, धृतराष्ट्र उपस्थित।
पहिने रत्नक बाजी फेर चानी-सोनक लागल, फेर छल सभक अश्व-रथ लागल जुआ पर ।
मुदा जखन तीनू टा बाजी युधिष्ठिर हारल, सौँसे सेना लगाओल दाँव पर ओ अभागल। फेर बेर आएल राज्यक फेर चारू भाँय केर, युधिष्ठिर बाजल नहि बचल लग हमरा लेल।
शकुनि कहल छथि द्रौपदी अहाँक बिचमे। एहि बेर ज्योँ जीतब अहाँ, दए देब हम सभ, भाइ,राज्यसेना,अश्व-रथ,रत्न चानी सोन सभ।

युधिष्ठिर सुनि ई भऽ गेल छल तैयार जखने, हा। धिक्। पापकर्म की भए रहल अछि ई। सभा बिच उठि पड़ल सभक नाद ई सभ। युधिष्ठिर सेहो कहल हम कएलहुँ की ई ?

आनन्द मग्न कौरव छल, मुदा संतप्त एकेटा, दुर्योधन-भ्राता युयुत्सु छल शोकाकुल सएह टा, शकुनि आब एहि सभक बीच, फेकलक पासा, ई बाजी हमर, हुंकारलक शकुनि हारल युधिष्ठिर !!


द्रौपदीकेँ हारि ठकाएल ठाढ़ छल सभा बिच।
भय मदान्ध दुर्योधन कहल हे विदुर,
जाऊ समाचार ई द्रौपदीकेँ जाए सुनाऊ।
छथि ओ हमर दासी झाड़ू-बहारू करथि,
महलमे आबि हमर ई आदेश सुनाऊ।

विदुर कहल औ दुर्योधन घमण्ड छोड़ू,
स्त्रीक जुआरी अहाँ हमरा नहि बुझु।

देखि विदुरक ई रूप पठाओल विकर्णकेँ,
जाऊ दासी द्रौपदीकेँ जाए आनू गए,
विकर्ण ई द्रौपदी लग कहि सुनाओल।

चकित द्रौपदी कहल स्वयंकेँ जे हारल,
युधिष्ठिर कोनाकेँ अधिकार ई पाओल,
अपन हारिक बाद होएत क्यो सक्षम,
दोसरकेँ हेतु जुआमे लगाबए केहन।


ई प्रश्न जखन राखल विकर्ण सभा बीच आबि,
दुर्योधन कहल दुःशासन जाऊ पकड़िकेँ लाऊ।
बुझाओल द्रौपदी दुःशासनकेँ, जखन ने मानल,
भागलि गांधारीक भवन दिशि, दौगल दुःशासन,
खूजल केशकेँ पकड़ि घिसिअओने छल आनल।

हा! भारत ! ब्यास मुदा नहि अहाँ कोनो तथ्य नुकाओल ।
सम्बल उदार भावनाक देल, तुष्टि पाओल!!

सभा भवन महापुरुष नहि थोड़ जतए छल।
भीष्म, विदुर, द्रोण, कृपा लाजक लेल गोँतने,
गारि माथ देखि रहल द्रौपदीक अश्रुपात।
सिंहनादमे भीम तखन ई बाजल,
सूर्य देवतागण रहब साक्षी अहाँ सभ,
हाथसँ दुःशासन केश द्रौपदीकेँ धएने,
उखाड़ि फेंकब हाथ ओकर ओ दूनू।

कौरव भए सँ भीत भेलाह नादसँ भीमक,
दुर्योधन देखल मुदा देखि ई छल बाजल,
जाँघ पर दैत थोपड़ी करैत घृणित इशारा,
द्रौपदीकेँ बैसबा लए ओतए कहैत छल।

गरजि कहल भीम अधम दुर्योधनसँ,
तोहर जाँघकेँ तोडब प्रचण्ड गदासँ।

खिसियाकेँ दुर्योधन देलक ई आज्ञा पुनः ई,
चीर-हरण करू दुःशासन द्रौपदी दासी छी।

द्रौपदी कएलन्हि नेहोरा श्रेष्ठ लोकनिसँ
विनय ई अछि लाज बचाऊ करैत छी विनती।


सभ क्यो झुका माथ अपन ओहि सभामे,
कृष्णा छोड़ल सभ आश सभ दिशासँ,
भक्त्त वत्सल अहाँसँ टा अछि ई आशा,
कोहुना राखू हमर ई लाज अछि प्रत्याशा।

आर्द्र-स्वरसँ छलि रहलि पुकारि द्रौपदी,
गोहाड़ि खसलि सभा-बिच, मूर्च्छित ।

लागल खीचय द्रौपदीक वस्त्र दुःशासन,
सभासद देखल चमत्कार ई प्रतिपल,
यावत रहल खिंचैत वस्त्रकेँ दुःशासन,
बढ़ैत रहल वस्त्र द्रौपदीक तावत तखन।

थाकि-हाँफि बैसल जखन दुःशासन,
कहल भीम सुनू सभ एहि भवनमे,
यावत फाड़ि छाती दुःशासनक ऊष्म रुधिरकेँ,
पीयब, नहि पियास मेटत मृत्यु भेटत नहि।

सुनि प्रतिज्ञा ई सभ भयसँ थड़थड़ाए लागल छल।
धृतराष्ट्र देखि दुर्घटना द्रौपदीकेँ लगमे बजाओल,
सांत्वना दए शांत कएल युधिष्ठिरसँ छल बाजल,
बिसरि जाऊ इन्द्रप्रस्थ सुख-शांतिसँ रहए जाउ,
जे हाड़लहुँ, से बुझू देल हम ठामहि लौटाएल ।

संतोष भेलन्हि पाण्डव-जनकेँ ई सुनि,
कथा धृतराष्ट्रक घुरलाह इन्द्रप्रस्थ पुनि।

दुर्योधन दुःखित मंत्रणा कएल शकुनिसँ,
संग दुःशासन कर्णक मंत्रणा फेर जुआक,
विनाशक हस्तिनापुरक छल बेर खराप।

एहि बेरक निअम राखल हारत जे से करत,
बारह वर्षक वनवास आ एक वर्ष अज्ञातवास।

धृतराष्ट्र दूत पठाओल हस्तिनापुर फेर।
युधिष्ठिर घुरलाह भाएक संग बेर-अबेर,
सुनाओल गेल शर्त्त सभ रोकल एक बेर।

मुदा भाग्यराजक आगाँ ककर अछि चलल,
नहि मानल कएल युधिष्ठिर भाग्यक खेल!


चलि फेर पासा दुर्योधनक, वैह खेरहा,
फेंकि गोटी जिताओल शकुनि ओकरा।

हारि हारल राज्य, पाओल छल बनबास,
युधिष्ठिरक भाग्य चालि कुचालिक जीत,
राज्यक निर्णय जुआक गोटीक संगीत,
की होएत से नञि जानि सुन्न अकास।



धर्मराज सभ हारि,
चलल फेर वैह पथ,
धर्मक आ शान्तिक,
छोड़ि सभ बिसारि।

माता कुन्ती छलि वृद्धा भेलि कहल,
कहल धर्मराज नञि जा सकब अहाँ,
विदुर काक केर घर जा रहब,
जाएब कर्म भोगए हम सभ।

द्रौपदीक पाँचू पुत्र आ पुत्र अभिमन्युक,
सुभद्रा जएतीह अपन नैहर द्वारकापुर।

धौम्य पुरहित संग द्रौपदी आ चारू भाए,
काटब हम संग तेरह वर्षक वनवास जाए।


नगरवासी सुनि गमनक ई समाचार,
कएलन्हि दुर्-दुर दुर्योधनक अत्याचार।

जाएब हमहुँ सभ संग, धर्मराज आइ,
धर्मराज घुराओल सभकेँ बुझाए जाए।

सभ घुरि गेल मुदा, नहि घुरल विप्र जन,
पुरहित कएलन्हि उपासना सूर्यक एहि क्षण।
वैह दैत छथि अन्न-फल समग्र आर्य,
उपासनाक उपरान्त प्रगट भेलाह सूर्य।

देलन्हि अक्षय पात्र नहि कम होएत अन्न,
द्रौपदी सभ विप्रकेँ आ पाण्डवकेँ खोआबथि,
फेर खाथि, सभ अघाथि, नञि होए खतम,
जखन नञि होए खतम पात्रसँ खाद्यान्न।

युधिष्ठिर पहुँचि सरस्वती धारक कात,
काम्यक वनमे कएलन्हि निवास।

एहि बीच सुनैत पाण्डव-प्रशंसा मुँहसँ विदुरक,
धृतराष्ट्र निकालि हटाओल विदुरकेँ दरबार-मध्य।


ओहो आबि लगलाह रहए काम्यकवनमे,
पुनि पठाओल धृतराष्ट्र ओतए संजयकेँ।

पाण्डव-जनक बुझओला उत्तर विदुर,
धृतराष्ट्र सँग गेलाह पुनि दरबार घुरि।

ऋषि-मुनिक सत्संगसँ लैत शिक्षा आ दीक्षा,
अगस्त्यक, ऋषि श्रृंग, अष्टावक्रक, लोपामुद्राक,
सुनैत छलाह कथा सरिता नल दमयन्तीक ।

कृष्ण आबि बुझाओल ब्यास अएलाह !!

ब्यास कहल युद्धक हेतु करू तैय्यारी,
बिनु इन्द्रक अमोघ शिवक पाशुपत्याह,
कोना लड़ब संग भीष्म द्रोण महारथी ?

पाबि युधिष्ठिरक आज्ञा चललाह अर्जुन,
पर्वत कैलास पर पार कए कऽ गंधमदन।
तूणीर आ धनुष हुनकर संगमे छल,
साधु जटाधारी तपस्वी अर्जुनसँ पुछल।

ई छी तपोभूमि शस्त्रक काज नहि कोनो,
अर्जुन कहल हम क्षात्र धर्म कहाँ छोड़ल।

तावत शस्त्र सेहो ताहि द्वारे राखल अछि,
प्रसन्न भए इन्द्र अपन असल रूप धरल।

माँगू वत्स वर हमरासँ प्रसन्न छी हम,
शिक्षाक संग दिव्यास्त्र भेटए एहि क्षण।

अर्जुन अहाँक ई लालसा पूर्ण होएत मुदा,
जाऊ शिवकेँ प्रसन्न कए पाशुपत पाऊ।

फेर देवगण देताह दिव्यास्त्र अहाँकेँ,
ई शस्त्र सभ मानव पर चलाएब अछि वर्जित,
कहू अहाँ पाबि करब की दिव्यास्त्र सभ ई।

शक्त्ति-संचय अछि हमर उद्देश्य मात्र देव,
कौरव छीनल अछि राज्य छलसँ परञ्च,
नहि करब एकर कोनो कुप्रयोग नहि हम।

इन्द्रक अन्तर्धान भेलाक उत्तर अर्जुनक,
शिव तपस्या कठोर छल होमए लागल।

तखन पार्वती संग शिव चललाह तपोभूमि,
अर्जुन पुष्प बीछि रहल छलाह अबैत क्षण,
वाराह वनसँ निकलि कए सम्मुख आएल।

जखनहिँ तूणीर धनुष राखि संधान कएलक,
किरात वराहकेँ लक्ष्य कएने दृष्टि आएल।
दुनू गोटे चलाओल वाण वाराह मारल,
एहि बात पर दुहू गोटे झगड़ा बजारल।

अर्जुनक गप पर जखन ठठाइत किरात,
अर्जुन ओकरा पर तखन वाण चलाओल,
परञ्च देखि नहि घाव कोनो प्रकारक,
अर्जुन किरात पर छल तलवार भाँजल।

मुदा किरातक देहसँ टकाराइत देरी,
भेल अर्जुनक खड्गक टुकड़ी छुबैत देरी।
मल्ल युद्ध शुरू भेल भेल अचेत अर्जुन,
उठल जखन शुरू कएल पूजन कुलदेवक ओ,
पुष्प पहिराए शिवकेँ उठल गर छल ओ माला,
किरातक गरदनि मध्य, देखि साष्टांग कएल तहिखन।

किरात वेशधारी शिव कहल वर माँग अर्जुन,
पाशुपत अस्त्र माँगल, छोड़ब रोकब एकरा सीखल पुनि।

शिव कहल बुझू मुदा ई तथ्य अछि जे,
मनुष्यक ऊपर एकर प्रयोग कखनहु करब नञि।

तखन अर्जुन निकलि गेल इन्द्रलोक दिशामे,
पाबि दिव्य अस्त्रक शिक्षा मारल असुर ओहिसँ।

एक दिनुक गप उर्वशा आयलि करैत याचना प्रेमक,
अर्जुन कहल अहाँ तँ छी अप्सरा गुरु इन्द्रक।

माता तुल्य भेलहुँ ओहि संबंधसँ अहाँ हमर,
आएल छी हम एतए शिक्षा प्राप्तिक लेल शस्त्रक,
तपस्या नृत्यक आ संगीतक करए भोग नहि,
ताहि दृष्टिये अहाँ भेलहुँ हमर माता गुरु दुनु।

उर्वशी तखन देलक ओकरा शाप ई टा,
कामिनीक अहाँ शाप सुनू निर्वीर्य रहब अहाँ ।

वर्ष भरि मुदा किएक तँ कहल माता,
शाप ई पुनि बनत वरदान नुकाए सकब अहाँ।

पाण्डव जन सेहो पाबि रहल ऋषि मुनिसँ शिक्षा,
समाचार देलन्हि नारद अर्जुनक कहल अएत,
लोमश ऋषि आबि समाचार अर्जुनक सुनाएत।

किछु दिनमे लोमश ऋषि अएलाह ओतए,
कहल प्राप्त कए पाशुपत शिवसँ कैलासमे,
अर्जुन देवलोकमे प्राप्त दिव्याशस्त्र कएल,
नृत्य संगीतक शिक्षा अप्सरा गंधर्वगणसँ
लए रहल शिक्षा अर्जुन देवलोकमे सनजम सँ।

तखन ऋषि तीर्थाटन कराऊ हमरा लोकनिकेँ,
लोमश तखन गेलाह नैमिषारण्य पाण्डव संग।
प्रयाग गया गंगासागर पुनि टपि कलिंग पहुँचल,
पच्छिम दिशि प्रभासतीर्थ यादवगण जतए छल।

स्वागत भेल ओतए सुभद्रा मिललि द्रौपदीसँ,
बलराम कृष्णक सांत्वना पाबि बढ़ल आगाँ,
सरस्वती पार कए कश्मीर आ गंधमादन पर्वत,
पार कए चढ़ल पर्वत वर्षा आ शिलापतन बिच।

पहुँचि गेलाह बदरिकाश्रम विश्राम कएल ठहरि।
ओतहि दुःशला पति जयद्रथ काम्यक वनसँ,
छल जा रहल देखल द्रौपदीकेँ असगर ओतए,
पाण्डवगण गेल छल शिकारक लेल तखन।

बैसल कुटीमे विवाह प्रस्ताव देल द्रौपदीकेँ,
नीचता देखि द्रौपदी कठोर वचन जखन कहल,
रथमे लए भागल अपहरण कए दुष्ट जयद्रथ।

आश्रम आबि पाबि समाचार भीम ओकरा पर छुटल,
तखनहि अर्जुन सेहो आएल पाछू जयद्रथक गेल,
युधिष्ठिर कहल प्राणदान देब पति दुःशलाक छी ओ,
जयद्रथ देखल अबैत दुनू भाएकेँ द्रौपदीकेँ छोड़ि भागल,
भीम पटकि बान्हि आनल ओकरा द्रौपदीक सोझाँ,
द्रौपदी अपमानित कए छोड़बाओल ओकरा।

शिवक तपस्या कएल जयद्रथ वरदान माँगल,
जितबाक पाँचू पाण्डवसँ कहल शिव ई,
नहि हारब अहाँ कोनो भाएसँ अर्जुनकेँ छोड़ि।

ब्यास परिश्रमकेँ तपस्याक नाम देल,
आँखि मूनि मुदा ई पश्चात् मञ्चित भेल !!

कर्ण छल तपस्या कए रहल अर्जुनकँ हरएबा लेल,
इन्द्र सोचल शरीरक कवच कुण्डल अछैत ओ,
हारत नहि ककरहुसँ दानवीर पराक्रमी ओ छल।

सोचि ओकरासँ हम माँगब कवच कुण्डल,
देखि ई सूर्य कएलन्हि होऊ सचेत कर्ण,
आबि रहल इन्द्र छद्म वेषमे याचना करत ई,
कवच कुण्डल छोड़ि किछु माँगत नहि ओ।

कहल कर्ण याचककेँ हम नहि नञि कहब प्रण,
प्रण हमर नहि टूटत चाहे जे परिणाम होमए।

तखनहि विप्र वेशमे इन्द्र आबि दुहु वस्तु माँगल,
ठोढ़ पर मर्मक मुस्की कर्णक हाथ शस्त्र आएल,
काटि देहसँ कवच कुण्डल समर्पित कएल तखनहि,
इन्द्र देल वर माँगू छोड़ि ई वज्र हमर आर किछुओ,
अमोघ शक्त्ति माँगल कर्ण इन्द्र देलन्हि कहि कए,
मारत जकरा पर चलत पुनि घुरत लग हमर अएत।


शनैः-शनैः छल बीति रहल बारह वर्ष एहिना,
एक वर्षक अज्ञातवासक विषयमे विचारि रहल,
विचारि युधिष्ठिर रहल भाए आ द्रौपदीक संग,
तखने कनैत खिजैत एकटा विप्र आएल ।

कहल अरणीक लकुड़ी छल कुटीक बाहर टाँगल,
हरिण एक आबि कुरयाबए लागल ओहिसँ,
जाए काल सिंहमे ओझरायल अरिणी ओकर,
विस्मित भागल ओ लए हमर लकुड़ी,
कोना कए होमक अग्नि आनब चिन्तित छी।

विप्रक संग पाँचो भाँए हरिणकेँ खेहारल,
मुदा छल ओ चपल भए गेल ओझल।

वरक गाछक नीचाँ ओ सभ लज्जित पिआसल,
ठेहिआएल बैसल नकुल गेल सरोवर पानि आनए।

एकटा ध्वनि आएल ई चभच्चा हमर छी,
उत्तर हमर प्रश्नक बिनु देने पानि नञि भेटत ई।

नहि कान देल ओहि गप पर हकासल पिआसल,
पानि जखने पिएल अरड़ा कए मृत ओ खसल।

सहदेवक संग सेहो एहने घटना घटल छल,
अर्जुन जखन आएल फेर वैह ध्वनि सुनल ।

शब्दभेदी बाण छोड़ल मुदा नहि कोनो प्रतिफल,
पानि पीबैत देरी ओहो मृत भए खसल छल।

युधिष्ठिर भए चिन्तित भीमकेँ पठाओल ताकए,
पानि पीबि मृत भए नहि घुरल ओतए।

युधिष्ठिर जखन वन बीच सरोवर पहुँचल,
मृत भाए सभकेँ देखि व्याकुल पानिमे उतरल।

वैह ध्वनि आएल उत्तरक बिना प्यासल रहब,
होएत एहि तरहक परिणाम ज्योँ धृष्टता करब।

ई अछि कोनो यक्ष सोचि युधिष्ठिर बाजल,
पुछू प्रश्न उत्तर सम्यक देब शुरू भेल यक्ष।


मनुष्यक संग के अछि दैत? प्रथमतः ई बाजू,
धैर्य टा दैछ संग मनुक्खक सदिखन सोकाजू।

यशलाभक अछि कोन उपाय एकटा?
दान बिनु यश नहि भेटैछ कोनोटा।

वायुसँ त्वरित अछि कोन वस्तु?
मनक आगाँ वायुक गति नहि कतहु ।

प्रवासीक संगी अछि के एकेटा ?
विद्याक इतर नहि संगी एकोटा।
ककरा त्यजि कए मनुक्खकेँ भेटैछ मुक्त्ति?
अहं छोड़ल तखन भेटत विमुक्त्ति।

कोन वस्तुक हराएलासँ नहि होइछ मन दुःखित?
क्रोधक हरएलासँ किए होअय क्यो शोकित।

कोन वस्तुक चोरिसँ होइछ मनुक्ख धनिक?
लोभक क्षति बनबैछ पुष्ट सबहिँ।

ब्राह्मण जन्म, विद्या, शील कोन गप पर अवलम्बित?
शील स्वभाव बिनु ब्राह्मण रहत नहि किछु।

धर्मसँ बढ़ि अछि की जगतमे?
उदार मनसि उच्च पदस्थ सभसँ।

कोन मित्र नहि होइत अछि पुरान?
सज्जनसँ कएल गेल मित्राताक कोना अवसान।

सभसँ पैघ अद्भुत की अछि एहि जगमे?
मृत्यु सभ दिनु देखनहु अछैतो जीवन लालसा,
एहिसँ बढ़ि अद्भुत आश्चर्य अछि की?

प्रसन्नचित्त भए यक्ष कहल युधिष्ठिर कहू,
कोनो एक भाएकेँ हम जीवित कए सकब।

तखन नकुलकेँ कए दिअ जीवित,
सुनि यक्ष पूछल कहब तँ भीम अर्जुन कोनोकेँ,
जीवित करब जकर रण कौशल करत रक्षा।

धर्मराज कहल धर्मक बिना नहि होइछ रक्षा,
कुन्ती पुत्र हम युधिष्ठिर जिबैत छी,
माद्री मातुक पुत्र जिबथु नकुल सैह उचित।

सुनि कहल हिरण वेशधारी यमराज हे पुत्र,
पक्षपात रहित छी अहाँ तेँ सभ भाए जीबथु।

पुत्रकेँ देखि मोन तृप्त भेलन्हि यमक,
पाण्डव गण तखन घुरि द्रौपदीक लग गेलाह।


पूर्ण भेल वनवासक वर्ष बारह अतीत,
एक वर्षक छल अज्ञातवास बड़ कठिन,
दुर्योधनकेँ यदि हुनक संकेतक चलए पता,
पुनि द्वादश वर्षक वनवासक छल प्रथा।

प्रातःकाल सभ विदा भेलाह विराट नगर दिशि,
धर्मराज कंक नाम्ना ब्राह्मण वेश धारित मिलि।
कौड़ी आ चतुरंग गोटीसँ विराटराजक मोन लगाएब,
भीम बनि पाचक नाम वल्लभक पाकशाला सम्हारथि।

विराटक पुत्रीकेँ संगीत नृत्य अर्जुन,
नारी वृहन्नला बनि सिखाबथु,
ग्रंथिक नामसँ नकुल अश्वक करए रखबारि,
सहदेवक नाम तंत्रपाल भेल करथि चरबाहि।

रानीकेँ सजाबथि द्रौपदी नाम धरि सैरन्ध्रीक।
सभ ई सोचि नुकाओल अस्त्र-शस्त्र,
शाखा बिच शमी-वृक्ष एकटा विशाल मध्य।
जखन वेश धरि पहुँचलाह विराट राजा लग,
स्वीकारलन्हि ओ सभटा प्रार्थना स्वतः।

दिन छल बीति रहल मुदा रानी सुदेष्णाक,
भाए छल कीचक दुष्ट देखि सैरन्ध्रीक भेल मुग्ध।
बहिनसँ पूछल कोन देशक राजकुमारी छथि,
कहल बहिन नहि छी निकृष्ट दासी ई।

मुदा कीचक पहुँचि द्रौपदी लग बाजल,
सुन्दरी दास बनाऊ हम मुग्ध पागल।
सैरन्ध्री कहलन्हि, हम विवाहिता एक दासी,
अहाँक पालिता छी नहि पुनि गप ई बाजी।

मुदा कीचक बहिनिसँ पुनि अनुरोध कएलक।
पर्व दिन सुदेष्णा किछु वस्तु अनबा हेतु कहलक,
सैरन्ध्रीकेँ कीचक लग जाए तकरा आनए पठेलक।

मुदा ओतए देखि वासनाक आँखि भागलि,
भीमसँ जाए बाजलि धिक कहलि पाण्डवकेँ ।
भीम बाजल आब जे ओ भेँट होअए,
नाट्यशालामे बजाऊ आध राति सोचब फेर ई,
हमरा की करबाक अछि ओहि दुष्टकेँ ओतए।

कीचक विराटक सेनाक प्रमुख सेहो छल,
सैरन्ध्रीक आमंत्रणकेँ नहि बूझि पहुँचल अभागल।
स्त्री वेष धरने भीम ओतए प्रतीक्षित,
केश पकड़ि पटकल, लात-हाथ मारल कीचककेँ ओतहि।

भोर होइत ई गप पसरि गेल चारू दिशि,
कीचककेँ मारल गंधर्वपति सैरंध्रीक।

सैरन्ध्रीक प्रति भय-श्रद्धा दुनू पसरल,
दुर्योधन छल बुझल अज्ञातवासक कथा,
छल ताकिमे तकबाक पाण्डवक पता,
छी ई द्रौपदी सैरन्ध्रीक भेषमे अभरल।

पाण्डव छद्म-भेष बनओने छथि गांधर्वक,
कीचकसँ अपमानित राजा त्रिगर्त देशक,
मिलि दुर्योधनसँ कए गौ-हरणक विचार
विराट राजसँ ओ लेत बदला आब।

दुर्योधन लए संग भीष्म, द्रोण, कृप, कर्ण,
आक्रमण विराट पर लए अश्वत्थामा संग।
त्रिगर्त राज सुशर्मा घेरि गौ-विराटराजक,
बान्हि विराटकेँ जखन ओ सोझाँ आएल।

ललकारि कएल भीमकेँ सोर युधिष्ठिर-कंक,
वल्लभ-भीम ग्रंथिक-नकुल तंत्रिपाल-सहदेव।
खोलि बन्धन विराटक बान्हि देल सुशर्मन्,
वृहन्नला बनि सारथी पुत्र विराटराज उत्तमक।


रथ आनल रणक्षेत्र उत्तमकुमार भेल घबराएल,
गेल अर्जुन शमी गाछ लग उतारि शस्त्र आएल,
गाण्डीव अक्षय तुणीर आनि परिचय सुनाओल।

उत्तमकुमार बनल सारथी वृहन्नला-अर्जुनक संग,
वेगशाली रथ देखि दुर्योधन पुछल हे भीष्म।

अज्ञातवासक काल भेल पूर्ण वा न वा कहू,
भीष्म कहल पूर्ण तेरह वर्षक अवधि भेल औ।

अर्जुन उतारल अपन रोष कर्ण पुत्र विकर्ण पर,
मारि ओकरा बढ़ल आगाँ कर्णकेँ बेधल सेहो।

द्रोण-भीष्मक धनुष काटल मूर्च्छित कएल सेना सकल,
द्रोण-कृप-कर्ण-अश्वत्थामा-दुर्योधनक मुकुट वस्त्र सभ,
उत्तमकुमार उतारल सभटा गौ लए नगर तखन घुरल।

मूर्च्छा टूटल सभक जखन कहल करब युद्ध पुनः,
भीष्म नहि मनलाह दुर्योधन घुरु बहु भेल आब अः।

उत्तमकुमार नहि करब प्रगट भेद हमर अर्जुन कहल,
विराट भेल प्रसन्न वीरता सुनि उत्तमक आबि घर।

पञ्च पाण्डव द्रौपदीक तखन परिचय हुनका भेटल,
प्रस्ताव कएल पुत्री उत्तराक विवाह अर्जुनसँ करब।

अर्जुन कहल पढ़ेने छी हमर शिष्या अछि ओ रहलि,
पुत्र अभिमन्युसँ होएत विवाहित उत्तरा ई प्रस्ताव छल।

वाह ब्यास वाह, बाल-अमेल विवाह विरोध, की चतुरता कौशल कवित्वक कएल औ।

कृष्ण-बलराम द्वारकासँ बरियाती अभिमन्युक लए अएलाह,
उत्तराक विवाह अभिमन्युक संग भेल बड़ टोप-टहंकारसँ।


छलाह आएल राजा वृन्द अभिमन्युक विवाह पर,
भेल राजाक सभा जतए कृष्ण कएल विनती ओतए।
द्यूत खेल शकुनीक, अपमान द्रौपदीक कएल जे,
दुर्योधन छीनल राज्य युधिष्ठिरक अधर्मसँ से।
बाजू प्रयत्न राज्य-प्राप्तिक कोना होएत वा,
दुर्योधनक अत्याचार सहैत रहथु पाण्डव सतत।

द्रुपद उठि कहल दुराचारी कौरवकेँ सभ जनए छथि,
कर्तव्य हमरा सभक थिक सहाय बनी पाण्डव जनक।

करए लगलाह पांडव युद्धक तैयारी विराट द्रुपदक संग पाबि
लगाए कुरुक्षेत्र लग पांडव रुकलाह शिविर पसारि।

दुर्योधनकेँ जखन लागल खबरि ओहो कएलक तैयारी,
संदेश पठाओल राजा सभकेँ कौरव पांडव तखन,
अपन पक्षमे करबा लेल युद्ध शुरु होएत जखन।

कुरुक्षेत्रक स्थलीमे सभटा जुटान लागल होए शुरू,
यादव गणकेँ पक्ष करबा लए दुर्योधन द्वारका गेल स्वयं।

पहुँचि दुर्योधन गेल देखल कॄष्ण छलाह सुतल ओतए,
अर्जुन सेहो पहुँचल पैर दिशि बैसि गेल ओ ओतए।

कृष्ण जखन उठि देखल अर्जुन छल ओतए,
कहू वत्स की चाही अहाँ आएल छी एतए।

युद्धमे संग अहाँक हमरा चाही हे नारायण,
अर्जुनकेँ बजिते दुर्योधन टोकल अएलहुँ पहिने एतए।

कृष्ण कहल हम शस्त्र नहि उठाएब युद्धमे,
नारायणी सेना चाही वा हमरा करब अहँ पक्षमे।

दुर्योधन नारायणी सेना चुनि भेल संतुष्ट आ,
अर्जुनकेँ नारायण भेटल छल प्रफुल्लित सेहो।

पांडव मामा छलाह शल्य माद्रीक भाए जे,
आबि रहल युद्धक लेल दुर्योधन सुनि गेल ओतए।

रस्तामे व्यवस्था-बात कएल तेहन छल,
शल्य कहल अछि मोन पुरस्कृत करी काज जकर।

दुर्योधन भेख बना जाए रहल छल ओतए,
प्रकट भए माँगल युद्धमे होऊ साहाय्य हमर,
एहि सभ व्यवस्थाक छी हमही निर्माण कएल।

शल्य दए स्वस्ति पहुँचलाह जखन कुरुक्षेत्र,
युधिष्ठिर सुनू छल भेल हमरा संग अतए।
कौरवक पक्षमे युद्ध करबा लए वचन बद्ध,
कहू कोन विध होए साहाय्य अहाँक वत्स।

युधिष्ठिर कहल बनू सारथी कर्णक आ करू,
हतोत्साहित कर्णकेँ गुणगान गाबि पांडवक।

शल्य कौरवक शिविर दिशि चललाह तखन,
युद्ध सन्निकट अछि कृष्ण अएलाह जानि सेहो,
एतए सुनल द्रुपदक पुरहित गेल छल धृतराष्ट्र लग।

संधिक प्रस्ताव पर देलक क्यो नहि टेर ओतए,
दुर्योधन कहल राज्य छोड़ू सुइयाक नोक देखने छी?
नहि भेटत पृथ्वी ओतबो राज्यक तँ छोड़ू बात ई।

ई सुइयाक नोँक भरि पृथ्वीक नहि देबाक बिम्ब छल, दुर्योधनक हठक ई आ धृतराष्ट्रक आकांक्षाक प्रतीक छल।

युधिष्ठिर कहल श्रीकृष्णकेँ आध राज्य छोड़ैत छी,
जाऊ कृष्ण पाँच गाम दुर्योधन देत ज्योँ राखू प्रस्ताव ई,
ओतबहिमे करब हम सभ भाँए माएक संग निर्वाह।

सात्यकीक संग कृष्ण हस्तिनापुरक लेल चलला जखन,
द्रौपदी कहलन्हि देखू केश फुजले अछि ओहिना धरि एखन,
कानि कहल संधि होएत युद्ध बिन खुजले रहत वेणी तखन।

कविक बिम्ब सुइया बराबड़ि जे नहि छोड़त हठ अपन, पाँच गामकेँ तँ बुझत ब्रह्माण्ड ओ हठी सदिखन।

कृष्ण कहल मानत नहि संधिक गप कखनहुँ दुर्योधन,
युद्ध अछि अनिवार्य मनोरथ पूर्ण होएत द्रौपदी अहँक।

कृष्ण जखन गेलाह हस्तिनापुर सभ प्रसन्न छल,
धृतराष्ट्र, दुःशासन-दुर्योधनक संग स्वागत कएल।

मुदा कृष्ण ओतए नहि ठहरि दीदी कुन्तीक लग गेलाह,
विदुरक गृहमे छलीह ओतए गप विस्तृत भेल आब।

कहल कुन्ती दीदी अहाँ जा कए कर्णकेँ परिचए दिअ,
आबि जएत भ्रातृ-पाण्डव लग सत्य ओ जानि कए।


दोसर दिन सभामे पहुँचलाह कृष्ण, छल छल ओतए मुदा,
दुर्योधन विचारल बान्हि राखब कृष्णकेँ अएताह ज्योँ।

भीष्म धृतराष्ट द्रोण कृप कर्ण शकुनि दुःशासन ओतए,
कृष्ण कहल शकुनिक चौपड़ दुर्योधनक दिशिसँ फेकब,
अन्यायपूर्ण छल ओहिना द्रौपदीक अपमान छल करब।

विराट पर आक्रमण पाण्डवकेँ सतेबाक उपक्रम बनल,
आध राज्य ज्योँ दए दी तखनो शान्तिसँ रहि सकैछ सभ।

सभ कएल स्वागत एकर दुर्योधन मुदा क्रोधित बनल,
कृष्णकेँ बन्हबाक आज्ञा देलक भीष्म तमसयलाह बड़।

तेज कृष्णक मुखक देखि कौरव भयसँ छल सिहरल।
दुर्योधन कहल पिता ज्येष्ठ हमर अंध छलाह से राज्य नहि भेटलन्हि,
हुनक पुत्र ज्येष्ठ हम से अधिकार हस्तिनापुर पर अछि सुनलहुँ।

पाण्डव अन्यायसँ लए राज्य करए छथि करैत तैय्यारी युद्धक,
कृष्ण अछि पाछाँ ओकर हम तँ रक्षा राज्यक करए छी।

कृष्ण कहलन्हि तखन पाँच गाम दिअ करबा लए निर्वाह,
मुदा दुर्योधन कहल राज्यक भाग नहि होएत गए आब।

कृष्ण बाजि जे हे दुर्योधन मदान्ध छी बनल अहाँ,
पाण्डवक शक्त्तिक सोझाँ नाश होएत निश्चित बुझू अहाँक।

कुन्ती बादमे गेलीह कर्णकेँ कहल दुर्वासाक मंत्र भेटल,
पढ़ल सूर्यकेँ स्मरण कए पुत्र हमर भेलहुँ अहाँ तखन।

प्रणाम कएल माताकेँ कर्ण तखन बजलीह सुनू ई,
ज्येष्ठ पाण्डव छी अहाँ, राज्य युधिष्ठिर देत अहीकेँ।

जखन नहि मानल कर्ण कुन्ती पुछल मातृऋणसँ,
उबरब कोना, कर्ण बाजल हे माता तखन सुनू ई।

अर्जुनकेँ छोड़ि चारू पाण्डवसँ नहि लड़ब पूर्ण शक्त्तियेँ,
अर्जुनकेँ मारब तखन बनब पुत्र अहीकेँ।

वा मरब हम पुत्र तैयो पाँच टा रहबे करत,
ई प्रतिज्ञा हम करए छी माता कुन्ती अएलीह घुरि।

कृष्ण आबि घुरि पहुँचि शिविर पाण्डवक जखन,
पाण्डव युद्धक कएल प्रक्रिया शुरू ओतए तखन।
सात अक्षौहिणी सेना घोड़ा, रथ, हाथी, सैनिकक,
अर्जुन भीम सात्यिकि धृष्टद्युम्न द्रुपद विराट लग।

कौरव सेहो एगारह अक्षौहिणी सेना कृपाचार्य शल्य भूरिश्रवा,
भीष्म द्रोण कर्ण अश्वत्थामा जयद्रथ कृतवर्मा भगदत्त छल।

धृष्टद्युम्न सेनापति पाण्डवक भीष्म कौरवक बनल,
कर्ण शस्त्र नहि उठेबाक कएल प्रतिज्ञा
भीष्म यावत युद्धक्षेत्रमे रहताह गए।

भीष्म कहल मारब नहि पाण्डवकेँ एकोटा,
सेनाक संहार करब यथा संभव होएत।

ब्यास धृतराष्ट्रक लग गेलाह कहल ब्यासजी सुनू,
अंधत्व भेल वर हमर कुल संहार देखब नहि किएक।

मुदा वीरक गाथा सुनबाक अछि इच्छा बहुत,
ब्यास देल योगसँ दिव्यदृष्टि संजयकेँ कहल,
बैसले-बैसल देखि संजय वर्णन करताह युद्धक,
बाजि ई ब्यास बिदा भए गेलाह ओतएसँ।


भेल भोर रणभूमिमे कौरव-पाण्डव जुटल सेना सहित
आगाँ भीष्म कौरवक आ पाण्डवक अर्जुन-कृष्ण रहथि।

भीष्मक रथक दुहुओर दुःशासन दुर्योधन छलाह,
पार्श्वमे अश्वत्थामा गुरु द्रोणक संग भाग्य आह।

युद्ध कए राज्य पाएब मारि भ्राता प्रियजनकेँ,
सोचि विह्वल भेल अर्जुन गांडीव खसत कृष्ण हमर।

कर्मयोग उपदेश देल कृष्ण दूर करू मोह-भ्रम,
स्वजन प्रति मोह करि क्षात्रधर्मसँ विमुख न होऊ।

अधर्मसँ कौरवक अछि नाश भेल देखू ई दृश्य।
विराटरूप देखि अर्जुन विशाल अग्नि ज्वालमे,
जीव-जन्तु आबि खसथि भस्म होथि क्षणहि,
कौरवगण सेहो भस्म भए रहल छलाह,
चेतना जागल अर्जुनक स्तुति कएल सद्यः।

फलक चिन्ता छोड़ि कर्म करबाक ज्ञानसँ,
आत्मा अमर अछि शोक एकर लेल करब नहि उचित।

युधिष्ठिर उतरि रथसँ भीष्मक रथक दिस गेल,
गुरुजनक आशीर्वाद लए धर्मपालन मोन राखल।

भीष्म द्रोण कृपाचार्य पुलकित विजयक आशीष देल,
धृतराष्ट्र पुत्र युयुत्सु देखि रहल छल धर्मनीति
छोड़ि कौरव मिलल पाण्डव पक्षमे तत्काल,
युषिष्ठिर मिलाओल गर ओकरसँ भेल शंखनाद।
अर्जुन शंख देवदत्त फूकि कएल युद्धक घोषणा,
आक्रमण कौरवपर कए रथ हस्ति घोटक पैदल,
युद्धमे पहिल दिन मुइल उत्तर विराटक पुत्र छल।

भीष्म कएल भीषण क्षति साँझमे अर्जुनक शंख,
बाजि कएल युद्धक समाप्ति भीष्म सेहो बजाओल अपन।

पहिल दिनक युद्धसँ पाण्डव शोकित दुर्योधन हर्षित।
दोसर दिनक युद्ध जखन शुरू भीष्म आनल प्रलय।
कृष्ण एना भए हमर सेना मरत चलू भीष्म लग,
हँ धनञ्जय रथ लए जाइत छी भीष्मक समक्ष।

दुहुक बीच जे युद्ध भेल विकराल छल थरथराएल सकल।
भीम सेहो संहारक बनल भीष्म छोड़ि अर्जुनकेँ ओम्हर दौगल,
सात्यिकीक वाणसँ भीष्मक सहीसक अपघात भेल,
खसल भूमि तखन ओ भीष्मक घोड़ा भागल वेगमान भए,
साँझ भेल शंख बाजल युद्ध दू दिनक समाप्त भेल।

तेसर दिन सात्यिकी अभिमन्यु कौरवपर छूटल,
द्रोणपर सहदेव-नकुल युधिष्ठिर आक्रमण कएल,
दुर्योधनपर टूटल भीम वाण मारि अचेत कएल,
ओकर सहीस दुर्योधनकेँ लए चलल रणक्षेत्रसँ,
कौरव सेना बुझल भागल छल ओ युद्ध छोड़ि कए।

भागि रहल सेनापर भीम कएलन्हि आक्रमण,
साँझ बनि रक्षक आएल दुर्योधन कुपित भएल।

भीष्मकेँ रात्रिमे कहल अहाँक हृदय अछि पक्षमे पांडवक,
भीष्म कहल छथि ओ अजेय परञ्च युद्ध भरि सक करब।

सक भरि युद्ध करबाक बात कहल भीष्म दुर्योधनकेँ,
चारिम दिन कएल आक्रमण प्रबल वेगेँ,
अर्जुन कएल प्रयत्न रोकबाक हुनका व्यर्थ,
पाँचम छठम आ सातम दिन एहिना सेहो बीतल।

आठम दिनक युद्ध भेल घनघोर,
अर्जुनक दोसर पत्नी उलूपीक पुत्र इरावान,
युध्य मध्य मरल अर्जुन भेल अधैर्य।

कएल युद्ध भयंकर भीष्मकेँ नहि टेरल,
दुर्योधन छल चिन्तित कर्णक ठाम गेल,
घुरि भीष्मकेँ कहल अहाँ छी अन्हेर कएल।

एहन रहत तखन बनाएब कर्णकेँ सेनाध्यक्ष,
भीष्म कहल बताह छी अहाँ भेल,
कर्णक वीरता विराटयुद्धमे नहि देखल?

नवम दिनक युद्ध छल भयङ्कर,
अर्जुनक रथकेँ भीष्म वाणसँ तोपल,
कृष्ण-अर्जुन अपघात रथ क्षतिग्रस्त,
घोटक रुकल अर्जुन शिथिल पस्त।

कौरवक उत्साह छल देखबा जोगर,
कृष्ण क्रोधित रथक पहिया लए छूटल,
मारब भीष्म खतम करब ई युद्ध।

अर्जुन पैर पकड़ि कए कहल हे कृष्ण
शस्त्र नहि उठएबाक कएने प्रतिज्ञा छी
लज्जित रथसँ कूदि छी हम आएल,
भीष्म सेहो देखल भए भाव-विह्वल।

रूप तेजमय शस्त्र लेने कृष्ण।
कृष्णक क्रोध भेल जा कए शान्त,
साँझक शंख कएल दिनक युद्धांत।

रातिमे युधिष्ठिर पुछलन्हि हे नन्दक नन्द,
भीष्मक पराजयक अछि की रहस्य,
भीम कहल अर्जुन नहि जानि किएक,
नहि प्रयोग कए रहल दिव्यास्त्र भीष्मपर।

कृष्ण कहलन्हि चलू पाँचू भाँए,
पूछि आबी हुनकहिसँ हुनक उपाय।
सभ पहुँचि पूछल बताऊ हे भीष्म,
अहाँक रहैत नहि हारत कौरव कथमपि।

सत्य धर्म दुहु भए जएत अलोपित,
भीष्म कहल छी देखि रहल भए त्रस्त,
अर्जुन नहि करि रहल प्रयोग दिव्यास्त्र,
मुदा हस्तिनापुरक सिंहासनसँ कटिबद्ध,
हा दुर्भाग्य! असत्यक मर्यादाक रक्षार्थ !

अछि शिखण्डी द्रुपदक पुत्र अहाँक पक्ष,
पूर्वजन्मक स्त्री अछि शिवक कएल व्रत,
हमर वधक लेल अछि सतत प्रतिपल।

द्रुपदक घरमे स्त्रीक रूप जन्म छल लेल,
दानवक वरसँ पुरुष रूप बनि गेल।

गुण स्त्रीत्वक अछि ओकरामे पार्थ,
स्त्रीगण हमर वाणक नहि छथि पात्र।

शिखण्डीकेँ सोझाँ कए जे वाण अहाँ चलाएब,
पूर्ण विवश तखने हम पार्थ भए जाएब।

भए आस्वस्त प्रणाम कए भीष्म पांडवगण,
घुरल दसम दिनुका युद्धक छल आयोजन।

आइ सेहो भीष्मक वाणक भेल बरखा,
मुदा शिखण्डी आएल सोझाँ हुनकर।

राखल अस्त्र भीष्म चलाओल वाण शिखण्डी,
मुदा कोनो नहि जोड़ ओकर वाणक छल किन्तु,
कृष्ण कहल लए अढ़ शिखण्डीक अर्जुन,
भीष्मक देहकेँ गाँथू करू नहि चिन्तन।

अर्जुनक शंका सुनि कहल तखन कृष्ण,
अस्त्र-शस्त्र संग जीतत क्यो नहि भीष्म,
अपनहि छथि ओ उपाय एहन बताओल,
बिनु विलम्ब कए वाण अहाँ चलाऊ।

अर्जुनक वाणक शुरू भेल बरखा,
खसल भीष्म पृथ्वी शय्या छल वाणक,
शरशय्यापर खसैत भीष्मक देरी छल,
युद्ध खतम भेल ओहि दिनक तत्काल।

कौरव पाण्डव जुमि अएलाह समक्ष,
भीष्म कहल दिअ गेरुआ माथतर। अह।

महग गेरुआ लए प्रस्तुत दुर्योधन छल,
ताकल भीष्म अर्जुन दिस अर्जुन भए साकांक्ष,
तीन वाण चलाओल आधार माथक भेल ।
प्यासल भीष्म जलक लेल कहल पुनः ई,
दुर्योधन स्वर्ण-पात्रमे जल अनबाओल,
ताकल भीष्म अर्जुन दिस फेर पार्थ चलाओल,
वाणसँ सोत निकलल जलक ऊपर दिस,
पानि खसल मुख भीष्म भेलाह फेर तिरपित।

सूर्य छथि अखन दक्षिणायणमे जाऊ सभ क्यो,
प्राण त्यागब हम उत्तरायणमे पहुँचल कर्ण सेहो।

करबद्ध प्रणाम कए लए आशीर्वाद ठाढ़ ओतए,
भीष्म कहल हे कर्ण युद्धकेँ रोकू कुन्तीपुत्र अहाँ छी,
अर्जुनकेँ नहि हरा सकब अहँक तुच्छ इच्छा ई।

कोन युद्धमे अर्जुनसँ छी बलशाली देलहुँ प्रमाण?
अहाँ बुझाएब दुर्योधन मानत छी हम जानि।

कर्ण कहल हम सारथीपुत्र दुर्योधनक पाओल सम्मान,
राजा भेलहुँ दुर्योधनक ऊँच उठाओल हमरा,
पाण्डव पौत्र अहाँक रहथि शस्त्र उठाओल किएक?


कौरवगणकेँ अहाँ किएक नहि बुझाओल,
युद्ध बढ़ल अछि आगाँ, कोना हम छोड़ब दुर्योधन मजधार।


दस दिनक युद्ध भेल बाद,
द्रोण बनलाह सेनापति आब।

दुर्योधन कहल करू एक काज,
युधिष्ठिरकेँ पकड़ि करू युद्ध समाप्त।

मुदा अर्जुन अछि ओतए सतत,
दूर हटएबाक करू कोनो अर्थ,
दुर्योधन बजाओल राजा देश त्रिगर्त,
राज सुशर्मा संस्पतक संग चलत,
लए अर्जुनकेँ दूर युधिष्ठिरक।


ओम्हर पाण्डव कएल युधिष्ठिरक रक्ष उपाय,
रक्षक रहत अर्जुन-भीम दुहु ओर दुहु भाए।

होएत किं कारणसँ कनिको दूर ज्योँ क्यो,
नकुल सहदेव सात्यिकी लेत स्थान रिक्त ओ।

द्रोणक संग छल कर्ण अशवत्थामा,
जयद्रथ कृप,कृतवर्मा, कलिंग नरेश।
त्रिगर्तराज सुशर्मा देलक ललकारा,
अर्जुन देखि सतर्क कएल सात्यिकी केँ।

गुरुशिष्य बिच आब शुरु होएत युद्ध,
तीर दुइ टा छोड़ि अर्जुन कएल आरम्भ,
खसल पदपर द्रोणक अर्जुनक ई दुहु वाण।

आह ब्यास प्रणाम !!
कए प्रणाम लए आशीष गुरुक आइ अर्जुन,
भिन्न रीतिक प्रेम नहि छल नुकाएल कहाँ।

कएल आक्रमण पाण्डवपर सोझाँसँ द्रोण पार्श्वसँ कर्ण,
सुशर्माक पाछाँ अर्जुन शल्य आबि गेल लड़बा लए भीमसँ,
कर्ण कएल आक्रमण सात्यिकी छल त्वरित ओतए।

सहदेवसँ भिड़ल शकुनि नकुल टा बाँचल ओतए,
द्रोण बढ़ल सोर भेल पकड़ल द्रोण युधिष्ठिरकेँ,
अर्जुन छोड़ि त्रिगर्त नरेश घुरि आएल जे,
द्रोण छोड़ल आशा पकड़बाक युधिष्ठिर,
साँझ भेल युद्ध बन्दीक शंखनादक बिच।

बारहम दिन सेहो त्रिगर्त सभ देल ललकारा,
मुदा वेगसँ आक्रमण कए अर्जुन कएल संहार,
घुरि बढ़ल देखल भगदत्त छल हाथीपर सवार,
हाथीक-अंकुश फेंकि कएल ओ अर्जुनपर प्रहार,
कृष्ण रोकल अंकुश, अर्जुन लेलक ओकर प्राण, अर्धचन्द्र वाणसँ।

द्रोण बढ़ल युधिष्ठिर दिस सत्यजित रक्षक छल आइ,
मारि अश्वकेँ द्रोणक सत्यजित रथक पहिआ देल काटि।

द्रोणक अर्धचन्द्रवाणसँ सत्यजितक गरदनि खसल अरड़ाए।
युधिष्ठिर मरितहि देखि सत्यजितकेँ घुरल रणसँ अविलम्ब,
अर्जुन नहि पाबि युधिष्ठिर भेल बताह मारल जन अथाह,
द्रोण देखि अर्जुनक ई रूप भेलाह हताश संध्याक शंखक आश।


दिन बितल दुर्योधन कहल हे गुरु द्रोण,
स्नेह अछि अहाँक पाण्डवक प्रति तेँ ई दोष,
द्रोण भेल क्षोभित कहल बनाएब चक्रव्यूह जकर तोड़,
अर्जुनक अतिरिक्त युधिष्ठिरक लग अछि नहि व्योँत।
फेर तेरहम दिनक युद्ध भेल शुरु जखन,
संसप्तक आ त्रिगर्तकेँ पछुआबैत गेल अर्जुन।

तखनहि युधिष्ठिरकेँ पता चल चक्रव्यूहक,
अभिमन्यु देखि चिन्तित काकाकेँ कहल,
गर्भमे सुनल पिता माताकेँ वर्णन सुनबैत छल,
च्क्रव्यूहक छह द्वारकेँ तोड़बाक सभटा,
स्मरण युद्धक वर्णनक विधि बचल नहि कोनोटा।

मुदा सातम द्वारक युद्धक वर्णन सुनल नहि,
माता सुतलि तखने बचल एकेटा द्वार सैह।

कवि ब्यासक पेटमे सीखि अएबाक बिम्ब, शब्दार्थ नहि वीरक अछि ई प्रतीक ।
सोझाँ तखन बढ़ल अभिमन्यु ककरो नहि बुझाएल,
कतए अछि द्वार कतए प्रवेश जयद्रथ रक्षक जतए,
आउ भीम काक ई अछि प्रवेश द्वार पैसब एतहि।

अभिमन्यु कए प्रहार जयद्रथपर वाणसँ गेल भीतर,
भीम दोसर सेनानीकेँ रोकि जयद्रथ ठाढ़ ओतहि।

दोसर द्वारपर द्रोण ठाढ़ जखने वाण चलाबथि,
काटल धनुष द्रोणक व्यूह भेदि बढ़लाह आगू।

तेसर द्वारपर चकित कर्णपर कए वाण बरखा,
बढ़ल चारिम द्वारपर अश्वत्थामा जतए छल,
युद्ध भेल घनघोर एतए मुदा रोकि सकल नहि,
अभिमन्युक रथ बढ़ल दुर्योधन भेल चिन्तित,
कर्ण आब करब की बाजू पराजय बुजाइछ निश्चित।

कर्ण बाजल सभ मिलि सातो महारथी हम सभ,
रोकि सकब एहि बालककेँ नहि क्यो सकत असगर।
सभ रथी आ पुत्र दुर्योधनक नाम लक्ष्मण जेकर,
पहुँचि गेल सातम द्वार पहुँचल अभिमन्यु तावत।

अभिमन्युक सारथी देखि ई दृश्य ओतए कहल,
ई सभ अधर्मी अछि जुटल, कहू तँ रथ घुराएब,
अर्जुन पुत्र हम नहि छोड़ब युद्ध हम एना देखू,
पार्थ-पुत्रक शौर्य रथ घुमाऊ चक्राकार कए अहँ।

तखन लक्ष्मण आएल सोझाँ अभिमन्युक ओतए,
वाणसँ काटल मस्तक लक्ष्मणक, द्रोण कहल, अजेय ई अछि अभेद्य एकर कवच करू प्रहार सिरसि आ
तखनहि सारथि अभिमन्युक खसल टूटि गेल रथ ।
नीचाँ आबि तरुआरि चक्र गदा लए ओतए ओ चलल,
दुःशासनक पुत्रसँ गदा युद्ध भेल दुनू ओतहि खसल ।
पहिने उठि दुःशासनक पुत्र प्रहार कएलक मस्तकपर,
सप्तरथीक बीच खसि पड़ल सुभद्रापुत्र पति उत्तराक।

सुभद्रा उत्तरा पहुँचि गेलीह सातम द्वार विलखैत,
उत्तरा कहलन्हि माता मृत्युक आज्ञा दिअ एतहि।

मुदा गर्भ छल उत्तराक पेटमे सुभद्रा बुझओलन्हि,
ओम्हर त्रिगर्त संसप्तककेँ करि पूर्णरूपेँ संहार,
अर्जुन घुरल सोचैत युधिष्ठिर होथि सुरक्षित ।
सुनि मृत्युक समचार विचल कृष्ण कहल अर्जुन,
कारण मृत्युक अछि मात्र बहनोइ-जयद्रथ,
कए शिवक तपस्या भेटल वर ओकरा ई,
अर्जुन छोड़ि आन पाण्डव नहि जीतताह ओकरा।

प्रथम द्वारपर ठाढ़ ओ रोकल चारू भाँएके ओतहि।
सुनतहि ई अर्जुन कएल वध करब काल्हि सूर्यास्तक पहिने,
जयद्रथक वध करब नहि तँ करब अग्निकेँ समर्पित ठामहि।

चौदहम दिनक युद्ध भेल प्रारम्भ,
शकट-व्यूह द्रोणक झाँपल जयद्रथ ।
द्वारपर व्यूहक प्रहरी द्रोण छलाह ठाढ़,
विकट युद्ध कृष्ण लेल रथ कनछियाह ।
द्रोण ललकारि कहल अर्जुन युद्धसँ रहल छी भागि,
मुदा अर्जुनकेँ आइ छल दोसर धुनि सबारि ।

कृष्ण रथ लए भीतर व्यूहमे पैसलाह,
बेरू पहर चिन्तित युधिष्ठिर पठाओल सात्यिकी भीम,
जाऊ अर्जुनक सहायार्थ कहि दुनू बढल आगाँ ।
भूरिश्रवा कएलक आक्रमण सात्यिकीपर तखन,
वाण अर्जुनक बढ़ल ओकर दिस दुहु हाथ कटल ओकर ।
की कएल अर्जुन अहाँ हम लड़ि रहल छलहुँ सात्यिकीसँ,
हमर हाथ काटल अहाँ अछि कोन न्याय बताऊ फरिछाकेँ।

अर्जुन कहलन्हि अभिमन्युक वध कएल अहाँ सभ कोना,
न्यायक बात करए छी, रक्षा कएल हम सत्यिकीक जेहाँ।

भूरिश्रवा खसल अचेत सात्यिकी काटल मूड़ी भूरिश्रवाक ।
अर्जुन देखि भीम सात्यिकीकेँ भेल चिन्तित घुरल,
युधिष्ठिरक मोन छलन्हि हुनका पड़ल ।

तखने सूर्यास्त भेल अर्जुन उतारि देल गाण्डीव,
चिता छल सोझाँ आगि धहधह,
करैत पाण्डवक आँखि झिलमिल।

बढ़ल अर्जुन बिना शस्त्र-अस्त्र चिता दिस,
बाजल कृष्ण क्षत्रिय अर्जुन लए अस्त्र जाऊ चितामे,
अक्षय तूणीर गाण्डीव नहि त्यागी मृत्यु संग जएत।

मुदा जखने अस्त्र लेलन्हि अर्जुन सूर्य निकलल घटासँ,
सोझाँ छल जयद्रथ अपटी खेतमे मरल ओतहि अर्जुनक हाथेँ।

मुदा कृष्ण कहलन्हि आब दुर्योधन करबाओत कर्णक अमोघ अस्त्रक प्रयोग,
भीमपुत्र घटोत्कचकेँ बजाऊ राक्षसी युद्ध रातिक करत ओ भयङ्कर,
आएल रातिमे घटोत्कच कए बरखा पानि आँकड़-पाथरक तत्क्षण ।
दुर्योधन देखि रूप ई विकराल भागैत कौरव सेनाकेँ देखल,
कर्ण मारू एकरा नहि तँ युद्ध निकलल जाइत अछि सकल।

विवश भए कर्ण छोड़ल अमोघ मरल घटोत्कच तखन,
पाण्डव दुखित भएल छल कर्ण सेहो चिन्तित।

रातिक भेल आक्रमणसँ क्षुब्ध क्रुद्ध कौरव आ द्रोण अएलाह,
युधिष्ठिरक रक्षार्थ एक दिस द्रुपद छल दोसर दिस विराट तकरा।

देखितहि द्रुपदकेँ द्रोणक खून छल खौलि गेल दिव्यास्त्रसँ लेल प्राण,
द्रुपद पुत्र धृष्टद्युम्न पांचाल सेनाक संग आएल बिच बरखाक वाण।

प्रचंड रूप देखि द्रोणक कृष्ण कहल हे युधिष्ठिर अवन्तिराजक हस्ति,
नाम अछि अश्वत्थामा ओकरा मारल अछि भीम सद्यः।

पूछथि द्रोण जे अश्वत्थामा अछि मरि गेल तखन अहँ,
कहू हँ, मरि गेल अछि भीम मारल एखन तुरत।

तखनहि सोर भेल मरबाक अश्वत्थामाक सौँसे,
द्रोण अधीर रथ अगुआए पूछल युधिष्ठिर,
की अछि बात सत्य मरल अश्वत्थामा रणक बिच?
कहल युधिष्ठिर हँ मरल अछि ओ नर नहि, छल ओ कुञ्जर,
मुदा नर युधिष्ठरक कहितहि बजल छल शंख कृष्णक।

शोक-विह्वल द्रोण फेकि शस्त्रार्थ ध्यानमग्न बैसलाह रथपर,
धृष्टद्युम्न काटल हुनक मस्तक खड्गसँ अश्वत्थामा भेल व्याकुल।

छोड़ए लागल दिव्यास्त्र पाण्डवपर अर्जुनकेँ छोड़ि नहि छल क्यो सक्षम,
साँझ धरि अर्जुन-अश्वत्थामा दुहु मध्य होइत रहल ई युद्ध निरन्तर।


रात्रिमे दुर्योधन कएलक प्रण
अर्जुनक मृत्युक भेल आवाहन,
कर्णकेँ सेनापति बनाए कएलन्हि
कौरवक गण सोलहम दिनक युद्धक प्रारम्भ।

कर्णक शंखध्वनिसँ भेल युद्ध शुरू,
कर्णक तापसँ युद्धभूमि स्तब्ध,
नकुल सोझाँ पाबि अपघात कए छोड़ल प्राण
कुन्तीक देल कर्णक वर प्राणदान।

कृष्णक आवाहन अर्जुन अहाँकेँ छोड़ि,
क्यो नञि कए सकत विजय कर्णक ऊपरि,
वेगसँ जे बढ़ल अर्जुन आगाँ भेल शुरु बरखा,
बरखा वाणक कौरवगणक अर्जुनक समक्ष,
मुदा अर्जुनक सोझाँ सभ भेलाह पस्त,
मुदा तखने भेल सोलहम दिनक सूर्यास्त।


रात्रिमे कर्ण कहलन्हि हे मित्र दुर्योधन,
अर्जुनक रथमे होइछ ढेर-रास शस्त्रक अटावेश,
गाण्डीव आ अक्षय तूणीरक नहि कोनो जोड़,
हुनकर अश्वक गति नहि कोनो थोड़, कृष्ण सन सारथी।

शल्य बनथि हमर सारथी यदि, होएताह ओ कृष्णक तोड़,
मुदा शल्य कहलन्हि अछि हमर मुँहपर नहि जोड़,
कर्णकेँ से होए स्वीकार तँ हमरा कोनो हर्ज नहि।

सत्रहम दिनुका युद्ध भेल शुरू कर्णक आक्रमण शुरू,
अर्जुन बढ़ल आगू शल्य कहल भिरू महाप्राक्रमी अर्जुनसँ,
कर्ण देखलन्हि भीमकेँ करैत संहार चलू शल्य ओहि पार,
भीमक रूप आइ प्रचण्ड छोड़ल वाण चीड़ि कवच कर्णक गाँथल देह,
अचेत कर्णकेँ लए भगलाह शल्य रणभूमिक कात-करोट।

देखि ई दृश्य भीम भेलाह आर तीव्र,
दुर्योधन हुनकर सोझाँ पठाओल दुःशासन वीर।

गदा युद्ध दुहुक मध्य छल भेल भयङ्कर,
भीमक मस्तक प्रहार खसल मूर्छित दुःशासन।

भीम हाथ उखाड़ि पीबए लागल छातीक रक्त,
भागल कौरवसेना देखि दृश्य एहि तरहक।

आब सोझाँ-सोझी अर्जुन कर्णक युद्ध आइ शुरू,
कर्ण काटल गांडीवक प्रत्यंचा यावत दोसर चढ़ाबथि,
कएल वाणसँ आक्रमण अर्जुन कोहुना कए प्रत्यंचा चढ़ाए,
वाण-वर्षा अर्जुनका जखन भेल शुरू, कर्ण शल्य भेलाह चोटिल,
कर्णक सहायक सेना भेल नष्ट कर्ण अति व्याकुल।

छोड़ल कर्ण वाण दिव्य अर्जुनपर कृष्ण कएलन्हि अश्वकेँ ठेहुनपर ठाढ़,
अर्जुनक मुकुटकेँ छुबैत ओ अर्जुनक प्राणक संकट भेल पार।

तखनहि कर्णक रथक पहिया धँसल युद्ध मध्य,
कर्णक पुकार कनेक काल वाण नहि चलएबाक धर्मक ई युद्ध,
विराटक गौअक चोरि अर्जुन कहलन्हि आ अभिमन्युकेँ मारैत काल,
धर्म आ धर्मयुद्धक बिसरल छलहुँ अहाँ पाठ ।
प्राणक भिक्षा मँगैत लगितहुँ अछि नहि लाज।
कर्ण उतरि लगलाह रथक पहिया निकालए,
अर्जुनक वाण काटल मस्तक कौरवमे हाहाकार भारी।

दुर्योधनक सभ भाँयकेँ मारने छालाह भीम तावत,
एगारह अक्षौहिणीमे सँ बड़ थोड़ कौरव छल बाँचल,
कृपाचार्य बुझओलन्हि दुर्योधन आबो करू सन्धि,
मुदा ओ कहल हम अहाँ कृतवर्मा अश्वत्थाम आ शल्य अछैत,
सन्धिक गप छी अहाँ करैत।

शल्य बनथि सेनापति युद्ध अठारहम दिन रहत जारी।


शल्यक भेल उद्घोष ओकर बढ़ल पग युधिष्ठिर छल रोकल।
शल्य जखनहि काटल हुनकर एक धनुष,
युधिष्ठिर उठाए दोसर धनुष मारल शल्यक अश्व आ सहीस ।
भेल तखन घमासान युधिष्ठिर लेलन्हि शल्यक प्राण,
सहदेव छुटलाह शकुनि आ ओकर पुत्र उलूकपर,
लेलन्हि बाप-बेटाक प्राण जुआरीक प्राणान्त।

गदा लए दुर्योधन निकलि गेलाह छोड़ि रण,
एकटा सरोवर मध्य छल स्तंभ, नुकाएल ओतए दुर्योधन,
देखलन्हि जाइत हुनका किछु ग्रामीण।

ग्रामीणक चर्च ब्यास केलहुँ कृतार्थ ।
पाण्डवक संग कृष्ण पहुँचलाह ओतए,
किछु ग्रामीण जे देलन्हि पता ओतएक।
भीम देलक ललकारा दुर्योधन निकलि आएल,
तीर्थसँ घुरैत बलराम सेहो पहुँचलाह ओतए।

शिष्य दुर्योधनकेँ दए आशीर्वाद कएल गदा युद्धक शुरुआत,
भीम दुर्योधनक बीच बाझल युद्ध घनघोर,
कृष्ण देल जाँघपर थपकी मोन पाड़ल भीमकेँ ओकर प्रतिज्ञाक,
तोडि जाँघक हड्डी कए मस्तकपर दुर्योधनक गदा-पएरसँ प्रहार ।

भीमक ई कृत्य छुटलाह बलराम ओकरा पर मार-मार,
कृष्ण रोकि दाऊकेँ मोन पाड़ल द्रौपदीक अपमान,
भीमक प्रण।
छोड़ि दुर्योधनकेँ असहाय,
गेलाह सभ पाण्डव भाए।

संध्या समय कृतवर्मा कृपाचार्य आ अश्वत्थामा
पहुँचि देखल दुर्योधनक दुर्दशा आ प्रलाप ।
भीमक पादसँ दुर्योधनक मस्तकपर प्रहार,
सुनि ई कथ्य अश्वत्थामा लेल पाण्डवक वधक व्रत । दुर्योधन कएल अश्वत्थामाक सेनापति रूपमे अभिषेक,
कृतवर्मा कृपाचार्य आ अश्वत्थामा बढ़लाह पाण्डव-शिविर समक्ष।


कृष्ण लए पांचो पांडवकेँ गेलाह कतहु अन्यत्र।
पाण्डव-शिविरक समक्ष एकटा वृक्ष, नीचाँ सुतलाह कृपा आ कृत ।

अश्वत्थामाक आँखिमे निन्नक नञि लेष, देखल एकटा पक्षी अबैत,
ओहि वृक्षपर कौआसभ सुतल मारि रास, केलक ओ पक्षी सभक ग्रास।

देखि ई दृश्य अश्वत्थामा उठाओल कृपाचार्य ओ कृत,
भोरक बाट ताकब नहि सुबुद्धि, ई अधर्म कहल कृप ।

मुदा अश्वत्थाम चलि पड़ल शिविर दिश,
हारि पहुंचल पाछाँ-पाछाँ कृत-कृप,
हम पैसैत छी भीतर शिविर ।

बाहर होइत सभकेँ प्राण लिअ अहाँ दुनू गोटे,
एतए ठाढ़ लग द्वार।
सभ पांचाल धृष्टद्युम्न शिखण्डी समेत,
द्रौपदीक पाँचू पुत्रकेँ बुझि पाण्डव देल मारि,
अश्वत्थामा देल शिविरकेँ आगिसँ जराए।

फेर पहुँचि लए द्रौपदीक पाँचू पुत्रक माथ,
दुर्योधन देखि माँगल भीमक मस्तक,
ओकर मुष्टिकाक प्रहारसँ मस्तक भेल फाँक,
नहि ई नहि भीमक माथ ।

भोरमे देखल द्रौपदीक पाँचू पुत्रक माथ,
कानैत हाक्रोश करैत भेल दुर्योधनक प्राणान्त।


भोरमे कॄष्ण पहुँचलाह पाण्डव-द्रौपदीक संग,
देखि विनाश भीम चलल अश्वत्थामाक ताकिमे,
छल ओ गंग तटपर ब्यासक समक्ष ।

युधिष्ठिर-अर्जुन संग कृष्ण पहुँचल जाए,
पाण्डवक नाशक संकल्प संग अश्वत्थामा छोड़ल ब्रह्मशिरा अस्त्र,
अर्जुनक छोड़ल पाशुपत महास्त्र अग्नि वृष्टि सँ सृष्टिक विनाश,
बीचमे अस्त्र केर अएलाह नारद आ ब्यास ।

वाह ब्यास । महाभारतक लिखनिहार ।
आग्रह करैत जे दुनू गोटे लिअ अपन-अपन अस्त्र सम्हारि,
अर्जुन लेलन्हि अपन अस्त्र सम्हारि मुदा,
अश्वत्थामा कहल नहि घुरि सकत हमर अस्त्र आइ ।
ऋषिक प्रतिकार ब्रह्मशिरासँ होएत उत्तराक गर्भक नाश,
मुदा अश्वत्थामकेँ देमए पड़त मस्तकक मणि,
भेल ओ निर्बल तपस्वी, ब्यासक आश्रममे बिताओल जीवन सकल।


दुर्योधनक पत्नी भानुमति छलि अचेत, गांधारी करथि विलाप,
धृतराष्ट्र मूर्छित विदुरक हाक्रोश, पाण्डव घुरल अश्वत्थामाक मणि संग ।
कृष्ण लेलन्हि लौहक भीमक स्वांग धृतराष्ट्र पहुँचल कुरुक्षेत्र वधू सभक संग।
भीमकेँ गर लगाए कएल ओकरा चूर्ण फेर भीम-भीम कहैत प्रलाप,
कृष्ण कहल नहि कानू हे धृतराष्ट्र, छल ई लौहक भीम मात्र ।

गांधारी देल कॄष्णकेँ शाप,
जेना कएल अहाँ हमर वंशक नाश,
होएत अहूँक कुल नष्ट।
मृतकक दाह संस्कारक संग एक पक्ष समाप्त।


युधिष्ठिरक मोन विखिन्न, छोड़ल राज-पाटक विचार,
ब्यास आबि देलन्हि उपदेश, पलायन नहि अहाँक मार्ग।

धौम्य कए वेद मंत्रक गाण राजतिलक युधिष्ठिरकेँ लगाओल।
फेर पहुँचि भीष्मक समक्ष लेल अनुशासनक शिक्षा,
राजधर्म,लोकधर्म मोक्षधर्मक ज्ञान, प्रजापालन,
उठि प्रदेश जातिक विचारसँ ऊपर, राजाक व्रतक करू परिपालन।


आएल ओ काल जखन सूर्य भेलाह उत्तरायण,
पहुँचलाह युधिष्ठिर संग माता-गांधारी-कुन्ती, धृतराष्ट्र भ्राता मिलि,
अट्ठावन दिनक शर-शय्याक अन्तिम उपदेश आ महाप्रयाण,
चाननक चितापर भीष्मकेँ युधिष्ठिर देल आगि सभ आक्रान्त।


हस्तिनापुरक राज्यमे आएल सुख समृद्धि,
युधिष्ठिरक कौशल कएल आशाक वृद्धि,
उत्तराकेँ तखने भेल मृत-पुत्रक प्राप्ति,
सुभद्रा खसलि कृष्ण लग जाए।

कृष्ण उठाए बालकेँ कहल हम नहि कएल पलायन,
सत्यसँ सम्बन्ध रहल बनल, पराजित शत्रु कए नहि भेलहुँ हिंसक,
यदि ई सत्य तँ बालक जीबि उठथि।
ई सुनितहि शिशु भेल जीवित नाम पड़ल परीक्षित।

फेर कएल युधिष्ठिर यज्ञ अश्वमेध,
सिलेबी अश्वक गरमे स्वर्णपत्र,
जिनका युधिष्ठिरक राज्यसँ परहेज,
से पकड़ि घोटक करथि एकर विरोध।
मुदा घुरि आएल अश्व निष्कंटक,
यज्ञ भेल समाप्त निर्विघ्न।


बरख पन्द्रह बीतल तखन अएलाह ब्यास,
देल उपदेश धॄतराष्ट्र लेल वानप्रस्थ धर्मक ज्ञान,
गांधारी, कुन्ती, विदुर, संजयक संग हिमालय प्रयाण,
विदुर लेलनि वनहिमे समाधि,
दावाग्नि लेलक शेष सभक प्राण।


कृष्ण युद्धक बाद गेलाह द्वारका,
छलथि प्राप्त कएने सम्मान,
मुदा यादव राजकुमार,
करथि विद्वानक अपमान ।

मारि-काटि करथि आपसमे खत्म,
देखि दुखित बलराम प्रभासतीर्थ जाए,
ओतहि लेल दाऊ समाधि,
कृष्ण पहुँचि देखि हुनकर प्राणान्त,
गाछ पकड़ि रहथि ठेहिआए ।

ब्याध जकर छल जरा नाम,
हरिण बुझि पैरक तलवामे मारल वाण,
भेल कृष्णक प्राणान्त ।

सुनि ई समाचार मृत्युक वसुदेवक,
पिता वासुदेव सेहो कएल जीवनक अन्त।


कृष्णक मृत्युक समाचार,
पाण्डवराज युधिष्ठिर देल परीक्षितकेँ राज,
सुभद्रा केँ दए उपदेश,
संग द्रौपदी पहुँचल द्वारका पाँचू भाए।

ओतए डूबल समुद्रमे छल ओ नगरी,
घुमैत फिरैत चललाह हिमालय सभ गोटे।
एक कुकुड़ छल संग चलैत ओतए,
हिमालय वृहदाकार हिमपातक मारि,
द्रौपदी खसलि मरलि, फेर सहदेव,
नकुल अर्जुन भीम खसि मरल फेर-फेर।

आगाँ देवलोकक रथ छल ठाढ़,
इन्द्र कहल चलू असगर सशरीर युधिष्ठिर,
ई कुकुड़ नहि रहए साथ।

युधिष्ठिर नहि मानल घुरि जाऊ इन्द्र,
बिन एकर नहि जाएब ओतए होए स्वर्ग अहि।
छल ओ कुकुड़ यमराज स्वयं,
प्रकट भए देल ओ आशीर्वाद ओतए।


पहुँचि स्वर्ग देखल कौरव गण सभ ओतए,
इन्द्र हमर भ्राता छथि कतए।
तखन एकटा दूत लए गेल हुनका नर्कक द्वारिपर,
द्रौपदी संग पाँचू भाए छलाह ओतए।

कहल युधिष्ठिर हम रहब एतहि हे दूत,
छोड़ि हिनका जाएब नहि कतहु।

इन्द्र यम पहुँचि गेलाह ओतए।
यम कहल यक्ष कुकुड़ बनि हम अहाँ परीक्षा लेल,
आइ एहि तेसर परीक्षामे सेहो अहाँकेँ उत्तीर्ण कएल।

ई अछि देवलोक मुदा सदेह राजाकेँ,
एतुक्का कष्ट देखक लेबाक चाही शिक्षा तेँ,
किछु कालक कष्ट हम अहाँकेँ देल।


छोड़ू ई शरीर लिअ दैवी रूप आब,
कहैत यमक भेल ई परिवर्तन,
कर्ण सेहो ओतए बारह आदित्यक संग,
रत्नजटित सिंहासनपर छल विराजमान,
भारतक युद्धक काव्यक समापन।

त्वञ्चाहञ्च सभ आपसक लड़ाई,
अछि एखनो पसरल ई महामारि।
जाति-धर्म परिवार पुत्र केर मोह,
यावत रहत प्रतिभा पिचाएत आह।
त्वञ्चाहञ्च मचत धृतराष्ट्र जतए करत अराड़ि,
दुर्योधन करत प्रारम्भ युधिष्ठिरक दोष की थोड़?

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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

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