Friday, May 08, 2009

श्री बैकुण्ठ झा

श्री बैकुण्ठ झा

पिता-स्वर्गीय रामचन्द्र झा, जन्म-२४ - ०७ - १९५४ (ग्राम-भरवाड़ा, जिला-दरभंगा), शिक्षा-स्‍नातकोत्तर (अर्थशास्त्र),पेशा-  शिक्षक। मैथिली, हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषा मे लगभग २०० गीत कऽ रचना। गोनू झा पर आधारित नाटक ''हास्यशिरोमणि गोनू झा तथा अन्य कहानी कऽ  लेखन। अहि के अलावा हिन्दी मे लगभग १५ उपन्यास तथा कहानी के लेखन।  सम्‍पादक


नो एंट्री: मा प्रविश

दुनियाँ तँ ई धोखा अछि

उत्तर दक्षिण पूरब पश्चिम

ऊगि रहल पनिसोखा अछि। दुनियाँ...

कौआ कर्र-कर्र करकराय रहल,

आँगनमे धान सुखाय रहल।

पेपर रेडियो टी.वी.पर

नेतहुँ तँ शोर मचाय रहल।

हो जिन्दा मुर्दा गाय-महीश

वृद्धा-पेंशन हो या खरात-

हर ठाम कमीशन खाय रहल,

हँसि-हँसि कय गाल बजाय रहल।

आजुक युग के ई शोभा अछि,

ई मान बराईक नोभा अछि। दुनियाँ..

दुनियाँमे अछि सब चोर-चोर,

जकरा हिस्सा नईं भेंटि रहल-

मचबै सगरो तऽ वैह शोर।

काटय केउ सेन्ह अन्हरियामे,

लूटय तऽ केउ इजोरियामे

केउ ठूसय हीरा वोरियामे

बन्दूक बनैत अछि गोहियामे

अछि सबहक सरदार सिपाही

ऊठय निश्चिन्त ओढ़ढ़ियामे

ईमान जतय घर टाटक अछि

ई महल अटारी पापक अछि

दुनियाँ तँ ई धोखा अछि

पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण

ऊगि रहल पनिसोखा।

 

(१६.०९.९१)

लिखलौं कतेक पत्र कर
जोरि जोरि कऽ

बूझब ओ छल नोरक जगहकेँ छोड़ि-छोड़ि कऽ

लिखलौं...

झहरै तऽ बूँद सावनमे, खुब झूमि-झूमि कऽ

बरसै तऽ नोर नित, कपोल चूमि-चूमि कऽ

लिखलौं...

मुरझाय बन तराग बाग तऽ ओ गृष्ममे,

पावस उमंग घोरि रहल, आईपवनमे,

लिखईत छी पाँति हम, ई कलम बोरि-बोरि कऽ।

लिखलौं कतेक...

भेटत नम बूँद फेर, जखन हिम जे पिघलि जैत,

आओत कोना ओ बाढ़ि औ! सरिता सेहो सुखैत

ई लिखि रहल छी आई, आँखि फोड़ि-फोड़ि कऽ।

लिखलौं कतेक...

तोरि-गेरि-तोरि कऽ

मुहब्बतमे तऽ तरपब भाग्यमे लिखला प्रभुसबके

रही जौं दूर प्रियतमसँ सजाये मौत त ओ थिक। रही...२

यक्षक विरह छल वर्षकेँ जनलक जगत सगरो-

जहाँ वर्षो विरह के बात छै-

वनवास त ओ थिक। जहाँ...२

ई उपवन ओ शिखा पर्वत आ कल-कल बहि रहल सरिता

अगर अली अछि नज उपवनमे त सुन्दरता कतय ओ थिक। मुहब्बत...

चितवन हो यदि चंचल आ तन

यौवनसँ हो भारी

मगर पावसमे पहु परदेश हो

यौवन कहाँ ओ थिक।

मुहब्बत...

परदेश

रुन-झुन बाजय पायल हमर फूजल बान्हल केश

औ मोर पाहुन धेलहुँ योगिन वेश।

डाढ़ि-डाढ़िपर फुद-फुद्दी सभ फुदकि रहल,

खढ़-खढ़केँ समटि बनौने केहन महल

करै परिश्रम मिल कय दुनू नईं छन्हि कोनो क्लेश।औ..

बिजुलीसँ चमकै घर, मुदा अन्हरिया यौ।

टिम-टिम दीप करै छै ओतय अन्हरिया औ

दिन गनैत छी बीति रहल अछि राति कहाँ अछि शेष औ...

सीता शक्ति राम सौम्य जग-प्राण बनल।

पौलनि जगमे नाम घूमि जंगल-जंगल॥

महल त्यागि वनवाश गेलन्हि बना तपस्विन वेश!

औ मोर...

जतबय दुःख हम कहब अहाँ ततबै बुझबै

नहिं पहुँचत जौं पत्र अहाँ नहिंये जनबै

जड़तै तेल कोना नईं घरमे पहु जकर परदेश।

औ मोर...

(२०.१०.९१)

रहि-रहि आँचर उड़ि जाय किया

अहाँ आँचर समटि लजई किया। रहि-रहि..

देखि बागमे सुमन व्यवहार करू,

उठा निज नयनकेँ चारि करू,

अली हर कलीसँ फुस-फुसाय किया। रहि रहि..

चमन छी अहाँ खिलि रहल अय सुमन।

लटसँ लिपटि घूमि चूमन पवन

पड़य जतय नजरि लिपटि जाय किया! रहि रहि...

भार सहय कोना करि केहरि अहाँक

राग माधुरी सुनाबय पायल के झनक

देखि अहाँ के हिरदय जुराय किया।

रहि रहि आँचर..

परदेश गेलहुँ

हमरो छोड़लहुँछोड़लहुँ माय के छोड़ि देलहुँ घरद्वार

परदेश गेलहुँ… 

सोनू-मोनू झगड़ा कय-कय हमरो माथ भुकाय रहल

बहिकिरनी तऽ नईं अछि घरमे, कहू करत के हमर टहल?

बौआ सब बौआय रहल अछि, पढ़तै कथी कपार!

परदेश गेलहुँ..

जन-वन किल्लौल करै छै, कोना जेबै हम दरबज्जा

बौआ दौड़ल छल सड़कपर, गेलहुँ रोटी भेल भुज्जा

माय छथि बूढ़, छी एसगर घरमे कोना उठत ई भार!

परदेश गेलउँ। हमरो...

अहाँ जनै छी लोक केहन अछि, के कऽ देतै हाट-बजार,

साल-साल त बाढ़ि अबै छै,उजरै छै सबके संसार,

हेतै समुद्र आँगन-घर सगरो,के कउ देतै पार!

परदेश गेलउँ। हमरो छोड़लौ...


No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...