Friday, May 08, 2009

हृदय नारायण झा

हृदय नारायण झा

आकाशवाणीक बी हाइग्रेड कलाकार। परम्परागत योगक शिक्षा प्राप्त।


लुप्तप्राय मैथिली लोकगीत

प्राती, गोसाउनिक गीत भगवतीगीत झूमरा, सोहर, खेलउना, कुमार, परिछन, चुमान, डहकन, बिषहारा गीत, झूमरि, बटगमनी, मलार चैमासा, लगनी, समदाउन आ एकर अतिरिक्त नदी संस्कृति मे कोशी गीत आदि कतेको मैथिली लोकगीत लुप्तप्राय अछि। जतए कतहु एखनहु लोककण्ठ मे ई गीत सभ बाचल अछि तकरा संग्रहित कऽ ओहि गीतक प्रकाशन आ ओहि धुन कें सुरक्षित रखबाक लेल ओकर आॅडियो वीडियो रूप मे दस्तावेजीकरण करबाक आवश्यकता विचारणीय अछि। संवैधानिक मान्यता प्राप्त भारतीय भाषा बनलाक बाद मैथिलीक संस्कार, रीति रिवाज, पर्व त्योहार ओ) तु पर आधारित गीतक समृ (परंपरा वर्तमान आ भविष्यक पीढ़ी लेल कोना सुरक्षित कएल जाय ई संपूर्ण मैथिली जगतक लेल चिन्ताक विषय बनल अछि। मिथिला महान रहल अछि अपन विशेषताक कारणें। मिथिलाक प्रशंसा में वृहद्विष्णुपुराणक उक्ति अछि

धन्यास्ते ये प्रयत्नेन निवसन्ति महात्मुने। विचरेन्मिथिला मध्ये ग्रामे ग्रामे विचक्षणः।।

सदाम्रवन सम्पन्ना नदीतीरेषु संस्थिता। तीरेषुभुक्तियोगेन तैरभुक्ति रितिस्मृता।।

अर्थात् हे मुनीश्वर! ओ धन्य छथि जे मिथिला में यत्नपूर्वक निवास करइ छथि आ मिथिलाक गामे गाम

घूमइ छथि। ई मिथिला सदैव आमक वन सॅ सम्पन्न नदीक तट पर स्थित अछि आ तीर में भोगक लेल प्रसिद्ध अछि। तेँ तीरभुक्ति अर्थात् तिरहुत नाम सॅ सेहो जानल जाइत अछि मिथिलांचल।

पुराणोक्त कपिलेश्वर, हरिलाखी, पिप्पलीवन, फुलहर, गिरिजास्थान, विलावती, हरित्वेकी, कूपेश्वर; कुशेश्वरस्थान द्ध, सिंहेश्वर, जनकपुर, वनग्राम, सिन्दूरेश्वर, त्रपनायनवन, विषहर, मंगला, मंगलवती विरजा, पापहारिणी, सुखेलीवन आदि तीर्थ सॅ पावन मिथिलाक महिमा वृहद्विष्णुपुराणक मिथिला माहात्म्य में वर्णन कएल गेल अछि।

मिथिलाक लोकगीत में धर्म आ लोक बेवहारक प्रधानता अछि। ब्राह्मवेलाक, पराती, श्रमगीत; लगनीद्ध, गोदना, भगवतीक आवाहन गीत; गहबर मे प्रचलित गीत झूमराद्ध, कोशी संस्कृति में विकसित गीत सहित परंपरागत संस्कार गीतक कतेको प्रकार मिथिलाक नव पीढ़ीक बीच लुप्तप्राय अछि।

ओहि लुप्तप्राय गीत सभक शब्द रचना, धुन, स्वर, लय आ भाव एखनहुॅ सबकें आकर्षित करइत अछि। सब तरहेँ ज्ञान केँ बढ्ऱाब बला, संस्कारक संग रीति नीतिक बोध कराब बला आ सुनबा मे मनोरंजक अछि ओ गीत सभ। एखनहुॅ जतए कतहु परातीक स्वर कान में पड़ैछ मन भाव विभोर भ जाइत अछि। प्रस्तुत अछि साहेबदासक लिखल पराती मौलिक पारंपरिक भास में -

अजहुॅ भजन चित चेत मुगुध मन अजहु भजन चित चेत।।

बालापन तरूणापन बीतल, केस भये सभ सेत मुगुध मन। अजहुॅ।।

जा मुख राम नाम ने आबत, मानहु सो जन प्रेत मुगुध मन। अजहुॅ।।

हरि विमुखी सुख लहत न कबहुॅ, परए नरक के रेत मुगुध मन। अजहुॅ।।

साहेबदास तोहि क्या लागत, राम नाम मुख लेत मुगुध मन अजहुॅ भजन चित चेत।।

परातीक संबंध में श्रेष्ठ जन कहइ छथि - जखन पराती गाओल जाइ छल त एक कोस धरि ओर ध्वनि पहुॅचइत छल। परातीक भास आ भाव लोकसभ के जगा क मंगल विहानक आनन्द दैत छल। ओहि भासक पराती केहन होइत अछि, देखल जाय -

प्राण रहत नहि मोर श्याम बिनु प्राण रहत नहि मोर।।

काहि पुछओ कोई मोहि ने बताबए, कहाॅ गेल नन्द किशोर। श्याम बिनु।।

छल कए गेल छलिक नन्दनन्दन , नैन झझाइछ नोर। श्याम बिनु।।

साध्यौ मौन कानन पशु पंछी, कतहु ने कुहुकए मोर। श्याम बिनु।।

हमहुॅ मरब हुनि बहुरि न आएब, साहेब जीवन दि न थोर। श्याम बिनु प्राण रहत नहि मोर।।

 

मधुबनी में श्री दुर्गास्थान,कोइलख में भद्रकाली, श्री दुर्गाशक्तिपीठ, मंगरौनी में बूढ़ी माई, डोकहर मे

राजराजेश्वरी, जितवारपुर मे सि(काली पीठ, ठाढ़ी मे परमेश्वरी स्थान, खोजपुर में तारामंदिर, सहरसा के वनगाॅव मे उग्रतारा, विराटपुर मे चण्डिका, बदलाघाट मे कात्यायनी, पचगछिया मे श्री कंकाली, पटोरी आ गढ़बरूआरी मे दशमहाविद्या, देवनाडीह मे वनदुर्गा, दरभंगा मे श्यामामंदिर, म्लेच्छमर्दिनी, गलमा मे तारास्थान, पचही मे चामुण्डा, अहल्यास्थान, ककरौल मे शीतला स्थान, पूर्णियां मे पूरनदेवी, अररिया मे दक्षिण कालिका मंदिर, मुजफ्फरपुर मे त्रिपुरसुन्दरी, सखरा मे सखलेश्वरी, उच्चैठ मे छिन्नमस्तिका, चम्पारन मे वैराटी देवी, चण्डी स्थान, सहोदरा स्थान सन कतेको देवी तीर्थ सॅ सम्पन्न मिथिलाक जन जन मे देवी शक्तिक उपासनाक परंपरा समृ( अछि।

मिथिलाक घर घर मे कुलदेवी रूप मे पूजित हेबाक कारणेॅ विविध भावक देवीगीतक परंपरा विकसित भेल। संपूर्ण भारत वर्ष मे मिथिला एकमात्र क्षेत्र अछि जतए भगवती गीतक सर्वाधिक धुन पाओल जाइछ। कोनो मंगल कार्यक आरंभ में गोसाउनिक गीत गेबाक जे परंपरा अछि ओहि मे प्रचलित अधिकांश गीत आ धुन लुप्तप्राय अछि। लोककंठ में एखनहुॅ कतहुॅ कतहुॅ सूनल जा सकैछ एहन किछु गीत। यथा

1. पारंपरिक

 जय वर जय वर दिअ हे गोसाउनि हे मा तारिणी त्रिभुवन देवी।

सिंह चढल मैया फिरथि गोसाउनि हे मा अतिबल भगवती चण्डी।।

 कट कट कट मैया दन्त शबद कएलि हे मा गट गट गिरलनि काॅचे।

घट घट घट मैया शोणित पिबलनि हे मा मातलि योगिन संगे।।

2. 00मदन उपाध्याय

जय जय तारिणी भव भय हारिणी दुरित निवारिणी वर माले।

परम स्वरूपिणी उग्र विभूषिणी दनुज विदूषिणी अहिमाले।।

पितृवन वासिनि खल खल हासिनि भूत निवासिनि सुविशाले।

त्रिभुवन तारिणि त्रिपुर विदारिणि वदन करालिनि अहिमाले।।

शतभख फल दे दिविशत शुभ दे अरिकुल भय दे धननिले।

अति धन धन दे हरि हर जय दे अनुपम वर दे वर शिले।।

मदन विलासिनी विदित विकासिनि कर कृतपाशिनि जगदीशे।

हरिकर चक्रिणि हरिकर वज्रिणि हरिकर शूलिनि परिमिशे।।

रवि शशि लोचिनि कलुष विलोचिनि वर सुख कारिणि शिव संगे।

श्रुति पथ चारिणि महिष विदारिनि क्षितिज विपोथिनि रण संगे।।

अतिशय हासिनि कमल विलासिनि तिमिर विनासिनि वर सारे।

हर हृदि हर्षिणि रिपुकुल घर्षिणि धन रव वरसिनि हे तारे।।

जय जय तारिणि भव भव हारिणि दुरित निवारिनि वर माले।।

3. पारंपरिक

करू भव सागर पार हे जननी करू भवसागर पार।

के मोरा नैया के मोर खेबैया के मोरा उतारत पार हे जननी।।

अहीं मोर नैया अहीं मोर खेबइया अहीं उतारब पार हे जननी।।

के मोरा माता के मोर पिला छथि के मोर सहोदर भाई हे जननी।।

अहीं मोर माता अहीं मोर पिता छी अहीं सहोदर भाई हे जननी।।

4. कालिकान्त

अखिल विश्व के नैन तारा अहीं छी हे जगदम्ब हम्मर सहारा अहीं छी।।

अनल वायु शशि सूर्य सभ मे अहीं मा, नदी के विमल मंजुधारा अहीं छी।।

रज सत्व तम केर उदभव अहीं मा, प्रगट मे तदपि शंभुधारा अहीं छी।।

विपत धार मे सुत जौं डुबि रहल हो तकर हेतु निकटक किनारा अहीं छी।।

विनय कालिकान्तक सुनत आन के मा दया के सकल सृष्टि सारा अहीं छी।।

5. पारंपरिक

सुर नर मुनि जन जगतक जननी हमरो पर होइयौ ने सहाय हे मा।।

जनम जनम सॅओ मुरूख बनल छी, आबहु देहु किछु ज्ञान हे मा।।

केओ ने जगत बीच अपन लखित भेल, हमहुॅ अहींक सन्तान हे मा।।

दुखिया के जिनगी माता देखलो ने जाइए, सुखमय जग करू दान हे मा।।

काम क्रोध लोभ मोह माया जाल बाझलहुॅ, मुक्तिक देहु वरदान हे मा।।

6. पारंपरिक

हे जगदम्ब जगत माता काली प्रथम प्रणाम करै छी हे।।

प्रथम प्रणाम करै छी हे जननी हम त किछु ने जनै छी हे।।

नहि जानी हम पूजा जप तप अटपट गीत गबइ छी हे।

अटपट गीत गबई छी हे जननी हम त किछु ने जनै छी हे।।

विपतिक हाल कहू की अहाॅ के सबटा अहाॅ जनै छी हे।

सबटा अहाॅ जनै छी हे माता,हम त किछु ने जनै छी हे।।

मात पिता हित मित कुल परिजन माया जाल बझल छी हे।

जगतारिणी जगदम्ब अहीें केॅ गहि गहि चरन कहै छी हे।।

7. पारंपरिक

हे अम्बे माता हमरो पर होइयौ सहाय।। हमार जगजननी हमरो पर होइयौ सहाय।।

युग युग सॅ भटकल छी जीवन भॅवर मे आबहुॅ उबारू हे माय।।

दुःखहि जनम बाल यौवन मे पाओल सुख के ने भेटल उपाय।।

अज्ञानी शक्तिहीन लोभी बनल छी,एहन ने जिनगी सोहाय।।

8. महाकवि विद्यापति

आदि भवानी विनय तुअ पाय,तुअ सुमिरइत दुरत दूर जाय।।

सिंह चढ़ल देवि देल परवेश बघछाल पहिरन जोगिन भेष।।

बाम लेल खपर दहिन लेल काति, असुर के बधए चललि निशि राति।।

आदि भवानी विनय तुअ पाय,तुअ सुमिरइत दुरत दूर जाय।।

तुअ भल छाज देवि मुण्डहार, नूपूर शबद करए छनकार।।

भनई विद्यापति कालीकेलि सदा ए रहू मैया दहिन भेलि।। आदि भवानी

9. कवीश्वर चन्दा झा

तुअ बिनु आज भवन भेल रे घन विपिन समान।।

जनु रिधि सिधिक गरूअ गेल रे मन होइछ भान।।

परमेश्वरी महिमा तुअ रे जग के नहि जान। मोर अपराध छेमब सब रे नहि याचब आन।।

जगत जननी काॅ जग कह रे जन जानकि नाम। नहर नेह नियत नित रे रह मिथिला धाम।।

शुभमयी शुभ शुभ सब दिन रे थिर पति अनुराग। तुअ सेवि पूरल मनोरथ रे हम सुलित सभाग।।

 

इ नवो गीत नौ धुन मे अछि। एकर अतिरिक्त कतोक गीत अछि मुदा आबक नब पीढ़ीक बीच एकर परंपरागत शिक्षाक व्‍यवहार नहि देखल जाइछ। परिणामतः फिल्मी गीतक धुन मे भगवती गीत सभक चलन

मैथिली परंपरागत गोसाउनिक गीत भगवती गीतक परंपराक समक्ष अस्तित्वक संकट अछि।

एकर अतिरिक्त गाम गाम मे गहबर बीच भगतक मंडली मे झूमरा गाबक समृद्ध परंपरा रहल अछि। मुदा कालक्रमे इहो परंपरा अस्तित्वक संकट झेलि रहल अछि। नौ सदस्यक समवेत स्वर मे झालि आ माॅडर के संगति मे प्रस्तुत झूमरा गायन सॅ भगवतीक आवाहन होइत अछि आ भगतक शरीर मे देवी

प्रगट होइत छथि। बीज रूप में एखनहुॅ बचल अछि ई परंपरा मुदा लुप्तप्राय अछि। बतहू यादव सन भगत चिन्तित छथि जे हुनक बाद इ परंपरा कोना बाँचत ? हुनकहि सॅ सूनल अछि इ झूमरा गीत

अरही जे वन से मइया खरही कटओलियइ हे मइया खरही कटओलियइ हे।

मइया जी हे बिजुबन कटओलियइ बिट बाँस जगदम्बा रचि रचि महल बनओलियई हे।।

गोड़लागूॅ पैयाॅ पड़ूॅ मइया जगदम्बा आइ मइया गहबर अबियउ हे।

मइया जी हे राखि लिअउ भगत केर लाज जगदम्बा कलजोरि पैयाँ पड़इ छी हे।।

जहिना बलकबा खेलइ माता के गोदिया हे, भवानी माता के गोदिया हे।

मइया जी हे तहिना खेलाबहु जग बीच जगदम्बा आब मइया गहबर अबियउ हे।।

नामो ने जनइ छी मइया पदो ने बूझै छी हे मइया पदो ने बूझै छी हे।

मइया जी हे सेवक बीच कण्ठ लियउ बास जगदम्बा आब मइया लाज रखियौ हे।।

गोड़ लागूॅ पइयाॅ परूॅ आद्या जलामुखी हे मइया अद्या जलामुखी हे।

मइयाजी हे राखि लिअउ अरज केर लाज जगदम्बा सेवक कलजोड़इए हे।।


 


No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...