Thursday, May 07, 2009

मिथिलाक लुप्तप्राय गीत-हृदय नारायण झा


कला आ संगीत शिक्षा

हृदय नारायण झा, आकाशवाणीक बी हाइग्रेड कलाकार। परम्परागत योगक शिक्षा प्राप्त।

मिथिलाक लुप्तप्राय गीत



विवाह संस्कारक लुप्तप्राय गीत



मिथिला मे अत्यंत व्यापक रहल अछि विवाह संस्कार गीतक परंपरा । विवाहपूर्वहि सॅ गीतक रीत अछि मिथिलाक लोक जीवन मे । विवाह योग्य कन्याक हेतु जखन सुयोग्य वर खोजऽ लेल पिता आ अन्य संबंधी लोकनि जाइत छथि तखन जे गीत गाओल जाइत अछि से सम्मर ,कुमार ,लगन आदि गीतक नाम सॅ जानल जाइत अछि । एहने एकटा सम्मर के बानगी अछि जकर विषय सीता स्वयंवर सॅ संबंधित अछि । मिथिलाक बेटी रूप मे सर्वमान्य सीताक विवाहक ओ सम्मर एखनहुॅ बीज रूप मे ,लोककण्ठ मे

सुरक्षित किन्तु लुप्तप्राय अछि । से गीत अछि -



जानकि अंगना बहारल धनुखा उठाओल हे । आहे पड़ल पिता मुख दृष्टि पिता प्रण ठानल हे ।।

राजा राज ने भावय भाखथि रानी हे । आहे बेटी बियाहन जोग सुजोग वर खोजह हे ।।

जे इहो धनुखा कॅे तोड़त देव लोक साक्षी हे। आहे राजा हो आ कि रंक ताहि देव जानकि हे ।।

देश हि विदेश केर भूप स्वयंवर आयल हे । आहे धनुखा तोड़ल सीरी राम मंगल धुनि बाजल हे ।।



विवाह सुनिश्चित भेला पर आंगन मे लगनक गीत गेबाक परंपरा रहल अछि । विवाह सॅ पूर्व कन्या क जे कोनो विध बेवहार होइत अछि ताहि मे लगनक गीत स्त्रीगण लोकनि द्वारा समूह मे गाओल जाइत अछि । एहन पारंपरिक गीतक पद आ धुन आबक विवाह संस्कार मे लुप्तप्राय अछि । लोककण्ठ सॅ प्राप्त एहने एकटा गीत अछि -



राजा जनक जी कठिन प्रण ठानल आहो राम रामा । दुअरहि राखल धनुखिया हो राम रामा ।।

जे इहो धनुखा केॅ तोड़ि नराओत आहो राम रामा । सीता केॅ व्याहि लय जाएत आहो राम रामा ।।

देश हि विदेश केर भूप सब आएल आहो राम रामा । धनुखा केॅ छुबि छुबि जाय आहो राम रामा ।।

लंकाधिपति राजा रावण आएल आहो राम रामा । ओ हो रे घुमल आधि बटिया हो राम रामा ।।

मुनि जी के संग दुई बालक आएल आहो राम रामा । धनुखा तोड़ल सीरी राम आहो राम रामा।।



विवाहक संबंध निश्चित कऽ बाबा अबै छथि आ विवाहक दहेज आ अन्य अनुष्ठान सभक चिन्ता मे सोचैत आॅखि मूनि बिछान पर पड़ि रहै छथि । आंगन मे सभक मोन मे विवाह सुनिश्चित हेबाक आनन्द आ उत्साह अछि । इ देखि बेटी केॅ जिज्ञासा होइ छै ओ बाबा सॅ हुनक एहि भावक कारण पुछैत अछि । एहि भावक एकटा ‘ कुमार ‘गीत अछि जाहि मे बाबा आ बेटी विवाहक संबंध मे परस्पर जिज्ञासाक समाधान अछि। पारंपरिक कुमार गीतक से पद आ धुन लुप्तप्राय अछि । ओहने एकटा गीत अछि -

बेटी- नदिया के तीरे तीरे बाजन बाजल किए बाबा सूतह निचिन्त हे ।

बाबा- किछु बाबा सूतल किछु बाबा जागल किछु रे बियाहक सोच हे ।।

के हे सम्हारत एते बरियात , के हे करत कन्यादान हे ।

बेटी -भइया सम्हारत एते बरियात , बाबा करता कन्यादान हे ।।

कथिए बिना बाबा खीरीयो ने होअए ,कथी बिनु होम ने होय हे ।

कथिए बिना इहो सइरा अन्हार भेल , कथी बिनु होमा ने होए हे ।।

बाबा-दूध बिना बेटी खिरीयो ने होअए , घीउ बिनु होम ने होय हे ।

बेटा बिना इहो सइरा अन्हार भेल , धिया बिनु धर्म ने होय हे।।

मिथिलाक विवाह संस्कार मे परिछन गीतक बहुतो पारंपरिक गीत आ धुन लुप्तप्राय अछि। ओहेन किछु

धुनक परिछन गीतक उदाहरण एहि रूपेॅ देखल जा सकइछ । बेटी के लछमी आ जमाय के विष्णु रूप मे व्यक्त करैत पारंपरिक परिछन अछि -

सखी हे लछमी के दुलहा लगइ छनि कोना ? जेना विष्णु उतरि अएला अंगना ।।

सखी हे दुलहा के चानन लगइ छनि कोना ? जेना बिजुरि तरंग छिटकु नभ ना ।।

सखी हे दुलहा के केस लगइ छनि कोना ? जेना साओनक श्याम घटा घन ना ।।

सखी हे दुलहा के हाथ सोभय कंगना । जेना हरि केर हाथ सुदर्शन ना ।।

सखी हे नहूॅ नहॅू दुलहा चलइ छथि कोना । जेना सिंह चलय निरभय वन ना ।।

परिछनक बिध जखन आरंभ होइत अछि तॅ सबसॅ पहिल बिछ होइछ धुरछक अर्थात् दुलहाक स्वागतगीत । एहि मे एक सोहागिन स्त्री माथ पर कलश लऽ कऽ दुलहाक समक्ष ठाढ होइत अछि आ परिछनक डाला सजओने विधकरीक सॅग स्त्रीगण लोकनिक समूह धुरछक के गीत गबइत अछि । ओहि गीत मे दुलहा सॅ जलपूर्ण घट मे द्रव्य अर्पित करबाक संकेत होइत अछि । एहन एक गीत अछि -

सुन्दरि नवेली ठाढ़ि धुरछक गाबथि हे सोहाओन लागे ।

सोना के कलसिया नेने माथ हे सोहाओन लागे ।।

आनन्द बधावा बाजे नृप जनवासा हे सोहाओन लागे ।

दशरथ बिराजथि सुत के साथ हे सोहावन लागे।।

सुनल अवधपति दुलहा के स्वागत सोहाओन लागे ।

कलशा मे देल मानिक सात हे सोहाओन लागे ।।

तखन वशिष्ठ मुनि देल अनुशासन हे सोहाओन लागे ।

करू जाय सिया के सनाथ हे सोहाओन लागे ।।

धुरछक के बाद जे परिछनक बिध होइत अछि ताहि मे अरवा चाउरक पीसल चानन ,सिन्दुर , काजर , ठऽक ,बऽक , बेसन , भालरि ,राई ,लवण आदि विविध उपचार सॅ सजाओल डाला होइत अछि बिध बेबहारक रीत परिछन गीत में व्यक्त होइत अछि । एहने एक परिछन अछि -

सखिया परीछू दुलहा हरषि अपार हे । जेहने सलोनी धीया तेहने कुमार हे ।।

चानन सजाउ सखि ऊॅचे रे लिलार हे । काजर लगाउ सखी नयना किनार हे ।।

निहुछू लवण राई टोनमा जे टार हे । बिहुॅसब चोराबे चित दिअ पान डार हे ।।

लखिये हरैये सुधि बुधियो हमार हे । कनक परीछू खोलि अन्तर दुआर हे ।।

एहन गीत गबइत दुलहा केॅ परीछि क आॅगन विवाहक वेदीक समीप ल जेबाक परंपरा अछि । दुआर सॅ आॅगन में प्रवेश भेला पर दुलहाक आॅगन मे स्वागत होइत अछि शुभकामनाक परिछन गीत सॅ । एहि भावक शुभकामना सॅ भरल परिछन गाबि गाइनि लोकनि दुलहा दुलहिन लेल शुभ शुभ कामना गीत मे व्यक्त करैत छथि । एहन एक गीत अछि -

परीछि लिअ वर केॅ शुभे हो शुभे दूभि अक्षत निछारू शुभे हो शुभे ।।

दधि केसर सम्हारू शुभे हो शुभे लगाउ निल दिठौना शुभे हो शुभे ।।

लागे जइ सॅ नइ टोना शुभे हो शुभे नीहछू लौन राई शुभे हो शुभे ।।

नैन करू आॅजनाइ शुभे हो शुभे फूल माला सजाउ शुभे हो शुभे ।।े

पान बीड़ा पवाउ शुभे हो शुभे घ्राण बासू अतर दय शुभे हो शुभे ।।

गाल सेदू शिला दय शुभे हो शुभे मूज लए मूजिआऊ शुभे हो शुभे ।।

रही लऽ रहियाऊ शुभे हो शुभे धन्य सीता सहेली शुभे हो शुभे ।।

ब्रह्म पाओल घरहि मे शुभे हो शुभे राखु हिय कोबरहि मे शुभे हो शुभे ।।

आब आगॉ लऽ चलियनु शुभे हो शुभे बिध आगॉ करबियनु शुभे हो शुभे ।।



मिथिला मे पर्वतराज हिमालय केॅ राजा , गौरी आ भगवान शिव केॅ जमाय रूप मानि कऽ बेटीक विवाह मे शिव विवाहक परिछन गीतक परंपरा समृ( रहल अछि । शिव विवाहक एक परिछन अछि -

शुभ दिन लगन बियाहन गौरी बनि ठनि दुलहा अएला हे ।

कंठ गरल नर उर सिर माला कंठ नाग लपटएला हे ।। शुभ दिन लगन .....

भाल तिलक शशिपाल लगैला जटा मे गंग बहएला हे ।

बूढ़ बड़द असवार सदासिब डमरू डिमिक बजएला हे ।। शुभ दिन लगन .....

भूत परेत डाकिन साकिन संग जोगिन नाच नचएला हे ।

अन्हरा लुलहा बहिरा लंगरा अगनित भेस सोभएला हे ।। शुभ दिन लगन ......

स्वान सुगर सिर जाल मुखर तन संग बरियतिया लएला हे ।

नगरक लोक सब सुनि सुनि बाजनि कोठा चढ़ि कऽदेखएला हे ।। शुभ दिन लगन .....

बजर परौ बरियात भयंकर सब कोई देखि पड़ैला हे ।

साहस करि सब सखियन संग भए परिछन मैना कएला हे ।। शुभ दिन लगन .....

नाग छोड़ति फुफुकार डेरएला खसति पड़ति घर अएला हे ।

सब बरियतिया हुलसति छतिया सब जन बासा गएला हे ।। शुभ दिन लगन.....

कन्यादानक वैदिक कर्मकाण्डीय विधिक बीच कन्यादानक गीतक परंपरा सेहो नवतुरिया पीढ़ीक बीच लुप्तप्राय अछि । एहन गीत मे शिव पार्वतीक विवाहक कन्यादान गीत गेबाक परंपरा अछि । एहन एक गीत अछि -

देखियनु देखियनु हे बहिना

जनक सुनयना मणिमंडप पर सुता दान दए ना ।।

जनु मएना हिमगिरि पुनि अएला पुण्य सुकृत अयना ।

देखु दुलह दुलहिन के जोड़ी चारू रती मएना ।।

पुलकित तन हुलसैछ मगन मन फूटनि नहि बएना ।

कर पर करतै पर फल अक्षत शंख सुसोहय ना ।।

सदानंद मृदु मंत्र पढ़ावथि करथि लोक विधि ना ।

सियाराम वात्सल्य भाव रस हिय मे उमड़य ना ।।

देखियनु देखियनु हे बहिना ।।

सीता राम विवाहक जे कन्यादान गीत अछि ताहि मे बेटीक वियोगक करूणा भाव व्यक्त अछि । बेटीक प्रति माएक भाव एहन गीत मे व्यक्त होइत अछि । मुदा आबक विवाह मे ई गीत सभ लुप्तप्राय अछि । कन्यादानक एहन एक गीत अछि -

जॅघिया चढ़ाए बाबा बैसला मण्डप पर बाबा करू ने धीया दान हे ।

वर कर कंजतर ललीकर ऊपर ताही मे सोहत फल पान हे ।।

गुरू वशिष्ठ जी मंत्र उचारथि मंत्र पढ़थि सीरी राम हे ।

सब सखियन मिलि मंगल गाबथि फुलबरिसत वहु वार हे ।।

सिसकि सिसकि कानथि मातु हे सुनैना आब बेटी भेल वीरान हे ।

जाहि बेटी लेल हम नटुआ नचओलहुॅ सेहो बेटी भेल मोर वीरान हे ।।

चुपे रहू चुपे रहू मातु हे सुनयना ई थिक जग बेवहार हे ।।



बरियातीक भोजनक समय मे प्रचलित ‘जेवनार ‘ गीत सेहो लुप्तप्राय अछि । परंपरा सॅ ई प्रचलन रहल जे जखन बरियाती भोजन जेमय बैसथि तॅ हुनक स्वागत जेवनार गीत सॅ कएल जाए । एहि गीत मे हास्य विनोदक शब्द ,स्वर आ प्रस्तुति सॅ परिपूर्ण बरियातक भोजन सेहो देखऽ जोग होइत छल । आब ओहन पद सभक गायन लुप्तप्राय अछि । ओहने एकटा ‘जेवनार‘ गीत अछि -

भोर भए मिथिलापति मंदिर समधी जेमन आयो जी ।।

खोआ के गिलाबा बना के बरफी के इटावा जोरायो जी ।

इमरती जिलेबी के जॅगला लगायो गुलजामुन के खंभा लगायो जी ।। भोर भए....

पापड़ के सखी छवनी छवायो निमकी के फाटक बनायो जी ।

दही चीनी के चूना पोतायो रचि रचि महल बनायो जी ।। भोर भए ......

पूड़ी कचैड़ी बिछौना बिछायो मलपूआ के चनमा टॅगायो जी ।

लड्डू के लटकन लटकायो खाजा के झाड़ लगायो जी ।। भोर भए ....

मंदिर मे बइसल समधी जन बाजे आनन्द बधाबा जी ।

छप्पन भोग बत्तीसो बेअंजन भरि भरि सोने के थारी जी ।।

भोर भए मिथिलापति मंदिर समधी जेमन आयो जी ।।

दुलहा मे धैर्य ,विनम्रता आ सहिष्णुताक भाव जगाबऽ लेल ‘डहकन ‘गीतक परंपरा रहल अछि । मान्यता अछि जे मिथिला मे भगवान श्रीराम सेहो विवाह मे मैथिलानीक गारि सुनि कऽ प्रसन्न भेल छलाह तेॅ ई परंपरा निर्बाध प्रचलित रहल । श्री राम लला केॅ जे गारि डहकन मे सूनऽ पड़लनि तकर पद अछि -

राम लला सन सुन्दर वर केॅ जुनि पढ़ियनु कियो गारि हे ।।

केवल हास विनोदक पुछियनु उचित कथा दुई चारि हे ।। राम लला ....

प्रथम कथा ई पुछियनु सजनी गे कहता कनेक विचारि हे ।

गोरे दशरथ गोरे कोशिल्या राम भरत किए कारी हे । । राम लला ....

सुनु सखी एक अनुपम घटना अचरज लागत भारी हे ।

खीर खाय बेटा जनमओलनि अवधपुरी के नारी हे ।। राम लला ....

अकथ कथा की बाजू सजनी हे रघुकुल के गति न्यारी हे ।

साठि हजार पु़त्र जनमओलनि सगरक नारि छिनारी हे ।। राम लला .....

मिथिला मे दुलहा सॅ हॅसी मजाकक परंपरा सेहो डहकन गीत मे अछि । दुलहाक समक्ष विवाहक विविध विध बेवहार सम्पन्न कराबऽ लेल उपस्थित गाइनि लोकनि डहकन गाबि कऽ दुलहा सॅ मजाक करैत छथि आ सब लोक हठाका लगाकऽ एकर आनंद लैत अछि । एहने एक गीत मे दुलहा के संबोधित गाइनि लोकनिक भाव अछि -

दुलहा गारि ने हम दइ छी बेवहार करइ छी । हम्मर बाबा छथि कुमार अहॉ के दाई मॉगइ छी ।।

दुलहा गारि ने हम दइ छी एकटा बात कहइ छी । हम्मर बाबू छथि कुमार अहॉ के माई मॉॅगै छी ।।

दुलहा गारि ने हम दइ छी एक विचार पूछै छी । हम्मर भइया छथि कुमार अहॉ के बहिन मॉगै छी ।।

विवाहक पश्चात् दुलहा दुलहिनक शयन कक्ष कोहबर मे चारि दिन तक रहबाक जे परंपरा अछि तकर पोषण करैत अछि कोहबर गीत । एहि तरहक गीत मेे कोहबरक बिलक्षण वर्णन होइत अछि जे दुलहा दुलहिन मे परस्पर प्रेम भाव केॅ बढ़ाबऽ बला भाव जगबइत अछि । सीता रामक कोहबर गीत मिथिलाक विवाह संस्कार गीत मे विशेष प्रसि( रहल अछि । मुदा आब ई गीत आ धुन लुप्तप्राय अछि । एहने एक गीत अछि -

कंचन महल मणिन के दियरा कंचन लागल केबाड़ रे बने बॉस के कोहबर ।।

गज दन्त सेज आ फूलक बिछौना । रतन के बनल श्रृंगार रे बने बॉस के कोहबर ।।

ताहि पर सूतथि रघुवर दुलहा । सीता दुलहिन संग बाम रे बने बॉस के कोहबर ।।

यों मुख फेरि सोवे रघुवर दुलहा । दुलहिन सोवे करि मान रे बने बॉस के कोहबर ।।

दुलहा दुलहिन अंग परसि परस्पर । हरषि नयन जल छाय रे बने बॉस के कोहबर ।।



मिथिला मे विवाह संस्कारक अभिन्न अंग अछि मधुश्रावणी । एहि पर्व मे नवविवाहिता तेरह दिनक व्रत अनुष्ठान एकभुक्त पूर्वक करैत छथि । नित्य दिन अपराह्ण मे फूल लोढ़ि कऽआनबाब परंपरा अछि । एहि परंपरा मे गाम भरिक नवविवाहिताक टोली फूल लोढ़बाक गीत गावि मनोरंजनपूर्वक व्रत निष्ठाक पालन करैत अछि । नाग नागिनक पूजा कएल जाइत अछि ताहि बीच बिसहाराक गीत गाओल जाइत अछि । ई दूनू तरहक गीत आब लुप्तप्राय अछि । फूल लोढ़ऽ सॅ संबंधित गीत अछि -

दुई चारि सखी सब सामर गोरिया कुसुम लोढै़ लेै चललि मालिन फुलवरिया कुसुम लोढ़ै लए

चलली मालिन फुलबरिया ।।

मॉग मे सिन्दुर सोभे माथे पे टिकुलिया पोरिया पोरिया ना सोभे अॅउठी मुनरिया पोरिया पोरिया ना ।

हाथ मे लेल सखी फूल के चॅगेरिया से रहिया चलइ ना ताके तिरछी नजरिया रहिया चलै ना ।।

फूल लोढ़ऽ के गौरीगीत विशेष प्रचलित रहल अछि । इ गीत परंपरा सॅ आबि रहल अछि आ वर्तमानहु मे प्रचलित अछि मुदा नवतुरिया पीढ़ीक बीच लुप्तप्राय अछि । एहन एक गीत अछि -

गौरी फूल लोढ़ऽ गेली फुलबरिया संग मे सहेलिया ना ।।

केओ सखी आगॉ आगॉ चलली केओ सखी पाछॉ पाछॉ चलली ।

केओ सखी बीचे बीचे गेली फुलबरिया संग मे सहेलिया ना ।।

राधा आगॉ आगॉ चलली सीता पाछॉ पाछॉ चलली ।

गउरी बीचे बीचे चलली फुलबरिया ।। संग मे...

केओ सखी डाली भरि लोढ़लनि केओ फुलडाली भरि लोढ़लनि

केओ सखी लोढ़ि लेलनि भरि फूल डलिया ।। संग मे.....

राधा डाली भरि लोढ़लनि सीता फुलडाली भरि लोढ़लनि

गउरी लोढ़ि लेलनि भरि फूल डलिया ।।संग में.....

केओ सखी कृष्ण वर मॉगलनि केओ सखी राम वर मॉगलनि

केओ सखी मॉगि लेलनि तपसी भिखरिया ।। संग मे.....

राधा कृष्ण वर मॉगलनि सीता राम वर मॉगलनि

गउरी मॉगि लेलनि तपसी भिखरिया संग में सहेलिया ना ।।

मधुश्रावणी पूजा मे पवनइतिन जखन नाग नागिनक पूजा करइ छथि तखन हुनक सुहागक शुभकामना व्यक्त करइत बिषहारा गीत गेबाक परंपरा अछि ।

विषहारा गीत

कथी के घइला बिषहरि कथीके गेरूलि राम कथी केर डोरी सॅ भरब निरमल जल ।।

सोना के घइला विषहरि रूपा के गेरूलि राम रेशमक डोरी सॅ भरब निरमल जल ।।

घइला भरि भरि बिषहरि असरा पुराएब राम एहि पर नाग बाबूू करथि असनान ।।

ओहि पार बिषहरि माइ रोदन पसार राम छोरू छोरू आहे नाग आॅचर हमार ।।

राम रोबइत होयतीह सेवक हमार ।।

लबे लब नबेरिया भइया लबे बॉस खेब राम कोने भइया खेबनहार किये होयती पर ।।

लबे लब नबेरिया भइया लबे बॉस खेब हे भैरव भइयार खेबनहार बिसहरि होयती पार।।

जहिना जुड़ाएलि सुहबे तहिना जुड़ाउ राम तोरो कन्त जीबउ गेे सुहबे लाख बरिस ।।

लुप्तप्राय अछि विवाह संस्कारक समदाउन । समदाउनक गायन बेटीक द्विरागमनक अवसर पर स्त्रीगण लोकनिक समवेत स्वर मे होइत अछि । नवतुरिया पीढ़ीक बीच करूणा प्रधान उदासी ओ समदाउन गीतक पद आ भास प्रायः लुप्तप्राय अछि । दू विभिन्न भासक गीत उल्लेखनीय अछि -

गोर लागूूॅ पैयॉ परूॅ सुरूज गोसइयॉ बेटी केे जनम जुनि देब ।।

बेटी के जनम जुनि देब हे विधाता निरधन कोखि जन्म जुनि देब ।।

निरधन कोखि जन्म जॅओ देब हे विधाता रूप अनूप जुनि देब ।।

रूप अनूप जॅओ देब हे विधाता पुरूख मुरूख जुनि देब ।।

कहरिया भासक एक समदाउन मे सीताक नहिरा सॅ बिछोहक करूणा भाव व्यक्त अछि -

सुभग पवित्र भूमि मिथिला नगरिया । हमरा केॅ कहॉ नेने जाइ छेॅ रे कहरिया ।

बेला ओ चमेली चम्पा मालती कुसुम गाछ । आब कहॉ देखबई हाय रे कहरिया।।

सुन्दर सुन्दर वन सुन्दर सुन्दर घन सुन्दर सुन्दर सब बाट रे कहरिया ।

केरा ओ कदम्ब आम पीपर पलास गाछ । आब कहॉ देखबइ हाय रे कहरिया ।।

किनकर नयना सॅ गंगा नीर बहि गेल किनकर हृदय कठोर रे कहरिया ।

माएक नयना सॅ गंगा नीर बहि गेल बाबू के हृदय कठोर रे कहरिया ।।

केहि मोरा सॉठल पउती पेटरिया । केहि मोरा देल धेनु गाय रे कहरिया ।

माए मोरा सॉठल पउती पेटरिया । बाबू मोरा देल धेनु गाय रे कहरिया ।।

बाबा के मुॅह हम देखबइ कोना आब काकी कोना बिसरब हाय रे कहरिया ।

भाइ भतीजा आओर सखिया सलेहर आब कहॉ देखबई हाय रे कहरिया ।।

आगॉ आगॉ रामचन्द्र पाछॉ भाइ लछुमन पहुॅचि गेल झटपट अवध नगरिया।

महल मे कोसिला रानी आरती उतारए लगली अयोध्या बाजए बधाई रे कहरिया।।

मिथिला के व्यावहारिक लोकगीत मे परस्पर सहयोग एवं श्रम प्रधान गीत ‘लगनी ‘;जॅतसार द्ध गृहस्थीक

अभिन्न अंग रहल अछि । ई गीत जॉत चलबइत दू स्त्रीक स्वर मे गायनक परंपरा रहल अछि । लगनी गीत भक्तिभाव ,करूणा आ व्यवहार प्रधान हेबाक कारणेॅ परस्पर संबंध के समृ( बनेबा मे सहायक अछि । मशीनीकरणक युग मे जॉतक चलन प्रायः बन्द भऽ गेल ,मुदा दूर देहात मे एखनहुॅ कतहुॅ कतहुॅ लोक कण्ठ मे सुरक्षित अछि लगनीक गीत आ एकर भास । राधाकृष्ण भक्ति पर आधारित किछु लगनी गीत साहेबदास पदावली सॅ संकलित कए प्रस्तुत अछि ।

;1द्ध

बसहुॅ वृन्दावन मोर जीवन धन

आ रे कान्हा सुनि सुनि छतिया मोरा सालय रे की ।।

जौं तोहें जएबह हरि जियबइ ने एको घड़ी ।

आ रे कान्हा हमर सपथ तोहि माधव रे की ।।

जाहु जुनि मधुबन तेजि कहुॅ मोहन ।

आ रे कान्हा हमर सपथ तोहि माधव रे की ।।

कंस के जान हॅति दइए अधम गति ।

आ हे राधा साहेब आओत कृष्ण माधव रे की ।।



;2द्ध काहि कहब दुःख वचन ने आबए मुख ।

आ रे उधो धइरज धएलो नहि जाइछ रे की ।।

किए तेजि हरि गेल कुबुजी अधीन भेल ।

आ रे उधो केओ ने कहए एहि गोकुल रे की ।।

शरण धएल जन्हि दुःख न पाओल तनि ।

आ रे उधो सत्य निगम गुण गाओल रे की ।।

कत गुण गएबउ कत नित हम रोएबउ ।

आ रे उधो कओन साहेब हरि आनब रे की ।।



;3

कत दूर मधुपुर जतए बसए माधव । आ रे सजनी वन वन माधव मुरली टेरए रे की ।।

अनबो मे चनन काठी लिखबो मे भाति भाति । आ रे सजनी दुख सुख लिखियो बनाइए रे की ।।

एक अंधियारी राति हरि बिन फाटय छाती । आ रे सजनी कोइली शबदे हिया मोरा सालय रे की ।।

साहेब गुनि गुनि बैसलहुॅ सिर धुनि । आ रे सजनी जगत जीवन नियरायल रे की ।।

मिथिला मे प्रचलित )तुप्रधान गीत मे मलार गीत आ धुन सेहो लुप्तप्राय अछि । मिथिला मे मलार गीतक परंपरा समृ( रहल अछि । वर्तमान मे मलारक ओ गीत आ धुन लुप्तप्राय अछि । मलार गीतक किछु पद साहेबदास पदावली सॅ संकलित प्रस्तुत अछि ।



;1द्ध

अली रे प्रीतम बड़ निरमोहिया ।।

आतुर वचन हमर नहि मानए । परम विषम भेल रतिया ।।

कॉपत देह घाम घमि आवत । ससरि खसत नव सरिया ।।

आवत वचन थिर नहि आनन । बहत नीर दुहू अॅखिया ।।

रमानन्द भामिनि रहूॅ थिर भए । सुख बीच कहू दुःख बतिया ।।



;2द्ध

हे उधो लिखब कओने विधि पाती ।।

अंचल पत्र नयन जल काजर । नख लिखि नहि थिर छाती ।।

चन्द्र किरण बध करत एतय पिय । ओतय रहहु दिन राति ।।

रेशम वसन कनक तन भूषण तेसर पवन जिबघाती ।।

कहथि रमानन्द सुनु विरहिनि तोहे । आओत श्याम विरहाती ।।

हे उधो लिखब कओने विधि पाती ।।



;3द्ध

हे उधो बड़ रे चतुर घटबरबा ।।

दूर सॅ बजओलनि नाव चढ़ओलनि । खेबि लए गेल मॅझधरबा ।।

नाव हिलओलनि मोहि डेरओलनि । कएलनि अजब खियलबा ।।

आॅचर धएलनि मोहि झिकझोरलनि । तोड़लनि गजमोति हरबा।।

सुकविदास कह तुम्हरे दरस को । जुग जुग जीबए घटबरबा ।।



प्रेम ,श्रृंगार आ रति भावक अभिव्यक्ति सॅ परिपूर्ण बटगमनी गीतक परंपरा सेहो लुप्त प्राय अछि । ओना एखनहु मांगलिक अनुष्ठान मे जखन स्त्री गण लोकनिक समूह ग्राम देवता डिहबार,ब्रह्मस्थान , माटिमंगल , आम महु बियाह आदि विधि लेल ढोल पिपही बाजा के संग निकलैत छथि तॅ बाट मे बटगमनी गीत गबइ छथि । मुदा नब पीढ़ीक मैथिल ललनाक बीच ओहि उमंग उत्साह आ प्रगल्भताक अभाव तॅॅॅ अछिए ,ओहन गीतक प्रति उदासीनताक कारणेॅ ओ बटगमनी गीत सभ लुप्त प्राय अछि । ओहने किछु संग्रहित बटगमनी प्रस्तुत अछि ।

स्नेहन , चुम्बन , आलिंगन ,राग आ अनुराग युक्त संभोगक वर्णन नायिकाक उक्ति मे प्रस्तुत बटगमनी अछि -

कॉच कली पहु तोड़थि सजनी गे , लए कोरा बैसाए सजनी गे ।।

अधर सुधा सम पीबथि सजनी गे , यौवन देखि लोभाय सजगी गे ।।

लए भुजपाश बान्हि दुनू सजनी गे, जखन करथि बरजोरि सजनी गे ।।

तखनुक गति की कहिए सजनी गे, पहु भेल कठिन कठोर सजनी गे ।।

नहि नहि जौं हम भाखब सजनी गे , तौ राखिए मन रोख सजनी गे ।।

पति जखन बहुतो दिन पत्नी केॅ विरह मे व्याकुल केलाक बाद अबैत अछि तॅ पति सॅ मिलनक उत्साह

केहन भऽसकैत अछि ? बहुत दिनक बाद परदेश सॅ आएल पति सॅ मिलन हेतु की की तैयारी आ साज श्रृंगार करबाक उत्कंठा होइत अछि , तकर वर्णन करैत बटगमनी अछि -

कतेक दिवस पर प्रीतम सजनी गे आएल छथि पहु मोर सजनी गे ।।

मन दए नेह लगाएब सजनी गे , रचि रचि अंक लगाएब सजनी गे ।।

पहु थिक चतुर सयानहि सजनी गे , हम धनि अंक लगाएब सजनी गे ।।

ई दिन जौं हम काटब सजनी गे , तखन करब बर गान सजनी गे ।।

गाबि सुनेबनि हुनकहुॅ सजनी गे , पहु करता बड़ मान सजनी गे ।।

3 comments:

  1. बहुत नीक प्रस्तुति।

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  2. bahut nik lekh hriday narayan jik

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  3. bad nik shodhparak aalekh

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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