Friday, May 08, 2009

परमेश्वअर कापडि

परमेश्‍वर कापडि


अपन अपन माय

सबके नव नेपाल, समृद्ध संघात्मक नेपालक सुन्दर चित्र बनएबाक बेगरता रहनि। उमटुमाएल बहुतो गोटे रहथि धरि चुनुआ बिछुआ, नामीगरामी सातटा कलाकारके अपन बुमि भार देल गेलनि। भार अबधारि सब एहि निहुछल काजमे लागि जाइत
गेला।

केओ धरमुडी, केओ हाथ केओ टाङ्ग, केओ पयर केओ बाहिँहाथ बनाबऽमे तन्मय
गेलाह

देखिते देरि समकेँ सभ अगि बना बनाक अनलनि

आहिरेबा। जखनि जे सबके द्धारा बनाएल नेपाल मायक आगि एकठाम जोडिक देखलनि त ओ आकृति कुरुपे नहि विद्रुप आ राक्षसी लगैत छल। ई चित्र देखिते निर्माणक आग्रही संरचनावादी लोक भडकिक आन्‍दोलन पर उतारु भगेल।

असलमें ई नारी चित्र भेलै कि नहि सेहे विवादक विषय बनि
गेल।

भेल कि रहै त जे पयर बनएने रहथि से रहथि माटिक मूर्तिकार आ पएर एहन सुकोमल माने परी रानीक सुन्‍नर पयरसन रहै। माय माये होइछै। मायक पयर धरती परक लोकक रेहल खेहल आ कर्मठ पयर होएबाक चाही ने से रहबे नहि करए। मुँह जे बनएने रहथि से अमूर्त पेन्‍टिङ्गक रहैक। आँखि किदन त नाक निपत्‍ता। केश दोसरे रङ्गके, पश्‍चिमी कटिङ्गके। फडफरायल ठाढ, किछु लट ओम राएल बेहाल। हाथ धातु मूर्तिकारद्धारा बनाएल रहैक त धर काठ मुर्तिकारद्धारा बनाएल कोकनल, निरस। लगै जेना मेहन जोदर्डो सभ्‍यताक वा पाषणकालक उत्‍खनन कएल गेल हो। तहिना कटि आ ओद्रभाग हिन्‍दी फिल्‍मक आइटम गर्लक कपचि छपटिक ल आएल सनके। बेनङ्गन निर्लज।

बात निर्विवाद छलै जे समरसताके अभावमे ई मूर्तिपूर्णे नहि भेलै। गढनिसब बेमेल बानि उबानि। बेलुरा रहैक।

असफलता पर पछताबा कोनो कलाकारके नहि रहैक। अहँकारी हेठी सबके मनमे। आब ऐ बात पर घोंघाउज कटाउँज होइत होइत अरारि आ मारि पीट धरिक नौबत आबि गेलै। से केना त जेना एखनि नेपालक क्षेत्रीय मुद्दाक बलिधिङ्गरोक विवाद।

काष्‍ठकलाबाला कहथि हपरा के अदुस अधलाह कहत, तेकरा हम बसिलेस पाङ्गि देबै। पेन्‍टर रङ्गकर्मीके अपन हठ हमर सृजनाके चिन्‍ह बुमके एकरा सबके दृष्‍टिए दम नै छन्‍हि। चित्रकारके अपने राग। पाषाणमुर्तिकारक अपने ठक ठक। सब अपन बातके इर बान्‍हि, गिठर पारि अडल जे मायक चित्र हमरे कल्‍पना भावना अनुसार बनए।

सह लहके बाते कोन अपना आगूमे सबके सब अदने, निकम्‍मे बुमथि। घोल घमर्थन, गेङ्ग छेंटके वैचारिक दर्शन कहैत सब हुडफेर फेरने घुमए।

अपना अपनीके सब तानहिबला, सुनबाला निठाहे नइ।

लोकमे सब रङ्गके, सब तौंतके लोक रहैछ ने। ओइमेस एगोटे आगू अएलाह आ थोडथम्‍ह लगबैत कालाकार सहित सबके बम्‍बोधित करैत कहलन्‍हि हमर बात पहिने ध्‍यानस सुनैत जाऊ। बात हम पयरस सुरु करैत छी, मूहँस नहि। पहिने पयरेस एहि दुआरे जे हमरासबके सँस्‍कृतिमे सबसँ पहिने पयरे पूजल जाइत अछि। पयरे चलिक केओ अबैत अछि। पयरेपर केओ ठाढ होइत अछि। पयरै लक्ष्‍मी होइत अछि। आगत अतिथिके पयरे पवित्र मानल जाइत अछि। प्रवेशके पयर देव कहल जाइत अछि। माने पयरे प्रथम अछि। कर्मशील भेने बन्‍दनीय आ ई लक्ष्‍मीपात्र अछि। ताहि दुआरे पयरेस चित्रक निर्माण शुरु हुअओ।


No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...