Friday, May 08, 2009

कमलानन्द झा

कमलानन्द झा,

हिन्दी विभाग, सी.एम. कॉलेज,दरभंगा


मैथिली समस्याक टोह लैत कथा-संकलन : उदाहरण

पछिला चारि बर्खमे कोनो पैघ आ महत्वपूर्ण प्रकाशनसँ मैथिलीक तीन गोट कथा-संकलनक प्रकाशन मैथिली भाषा लेल एकटा शुभ-संकेत मानल जा सकै'छ। नेशनल बुक ट्रस्टसँ प्रकाशित शिवशंकर श्रीनिवास द्वारा सम्पादित मैथिली कथा संचयन(सन्‌ २००५) आ सन्‌ २००७मे तारानन्द वियोगी द्वारा सम्पादित देसिल बयना(सन्‌ २००७) पाठकक बीच लोकप्रिय भ'ए रहल छल कि प्रकाशन विभागसँ देवशंकर नवीन द्वारा सम्पादित टटका मैथिली कथा-संग्रह उदाहरण छपि क' आबि गेल। प्रसन्नताक बात थिक जे उदाहरणक प्रकाशनसँ प्रकाशन विभागमे साहित्यिक रचनाक प्रकाशनक बाट फूजल, जे स्वागत योग्य अछि।

उदाहरणमे ललितसँ सियाराम सरस धरिकक कुल छत्तीस गोट कथा संकलित अछि। एहि संकलनसँ मैथिली कथा-संसारक परिदृश्य स्पष्ट होइत अछि। संकलनक कतोक कथा समस्त भारतीय भाषासँ कान्ही मिलान लेल तत्पर अछि, जे संकलनकर्त्ताक चयनकौशलक सूचक थिक। श्रेष्ठ कथाकार राजकमल चौधरीक कथा ÷एकटा चम्पाकली एकटा विषधर' घाघ मैथिल समाजक टोप-टहंकारकें अद्भुत रूपें अनावृत्त करैत अछि। सवर्ण मैथिलक गरीबी, ओहि गरीबीसँ उत्पन्न दयनीयता, आ तकर खोलमे दुबकल बेटीक शातिर माइ-बापक घिनौन आचरण घनघोर तनावक संग पाठककें झकझोरैत अछि। दशरथ झा आ हुनकर घरबाली अपन तेरह बर्खक बेटी चम्पाक विवाह बासैठ बर्खक वृद्ध शशि बाबू संग करेबाक षड्यंत्रापूर्ण योजना बनबैत अछि। दुनू प्राणीक गिद्ध दृष्टि शशि बाबूक सम्पति पर टिकल छनि, जकर मलिकाइन विवाहोपरान्त हुनक तेरह वर्षीया चम्पा बनैबाली छनि। अतिशयोक्ति सन लगैबला एहि घटनाक मर्मकें ओएह बूझि सकत जे मिथिलांचलक बहुविवाह प्रथासँ नीक जकाँ परिचित छथि। बीसम-एकैसम विवाहक बाद पति अपन पूर्व पत्नी सभक मुँहो बिसरि जाइ छलाह।

पत्राकारिता दुनियाक महत्वपूर्ण आ सम्वेदनशील पक्षसँ मायानन्द मिश्रक कथा ÷भए प्रकट कृपाला' साक्षात्कार करबैत अछि। मीडिया-तन्त्र पर बनल सार्थक हिन्दी सिनेमा ÷पेज थ्री' जे किओ देखने छथि, से एहि कथाक मर्मकेँ बेसी नीक जकाँ बुझि सकै छथि। शीघ्रतासँ नामी पत्राकार बनि जाएबाक हड़बड़ीके कथामे कलात्मक ढंगसँ उकेरल गेल अछि। कॉरपोरेट दुनियाँक बादशाह श्याम बोगलाक मृत्युक खबरि सबसँ पहिने देबाक होड़ लागल अछि। पत्रकार लोकनिक नजरिमे ओएह सभसँ पैघ खबर अछि, दुनियामे किछु भ' जाउ।

लिलीरे मैथिलीक सशक्त कथालेखिक। छथि। हुनकर कथा ÷विधिक विधान'मे कामकाजी स्त्रीक संघर्षकें यथार्थतः देखबाक, आ यथार्थक मर्मकें कलात्मक कौंध संग उभारबाक सफल चेष्टा अछि। उषाकिरण खान अपन कथा ÷त्यागपत्रा'मे ग्रामीण युवतीक अदम्य जिजीविषाकेँ व्यक्त करबामे पूर्ण सफल नहि भ' सकलीह। घोर आदर्शवादी आ कठोर अनुशासित परिवारमे पालित-पोषित चम्पा कॉलेजमे पढ़' चाहैत अछि, अपन मर्जीसँ विवाह कर' चाहैत अछि। मुदा आजीवन विवाह नहि करबाक घोषणा करैत चम्पा स्वयंकेँ ओही परंपराक केंचुलमे समेटि लैत अछि। चम्पा विवाहक लक्ष्मण रेखा पार करैत ÷और भी ग़म हैं' कें आधार मानि अपन व्यक्तित्वकेँ विस्तृत आयाम नहि द' पबैत अछि। मनमोहन झाक कया फायदा÷फयदा'मे स्त्री जातिक मोलभाव बला प्रवृत्तिक रेखांकन खूब जमल अछि, मुदा वो एहि प्रवृत्तिक वर्णन क' स्त्री जाति कोन पक्षक उद्घाटन करै छथि, से बूझब कठिन। कोनो व्यक्तिक स्वभावमे नीक आ खराब दूनू भाव रहैत अछि। कथाक हेतु कोन तरहक भावक चुनाव कयल जाए, ई महत्वपूर्ण अछि। इएह चुनाव मैथिली कथामे स्त्री चेतनाक दर्शन करा सकैत अछि।

स्त्री चेतनाक दृष्टिएँ प्रदीप बिहारीक कथा ÷मकड़ी' अपेक्षाकृत मेच्योर्ड आ बोल्ड कथा कहल जा सकैछ। बेराबेरी कथानायिका सुनीता दू बेर विवाह करैत अछि, दुनू बेर ओकर पति मरि जाइछ, मुदा ओ जिनगीसँ हारि नहि मानैत अछि। सिलाई मशीन चला क' ओ गुजर-बसर करैत अछि। एतबे नहि, ओ एकटा अनाथ आ बौक बच्चाक लालन-पालनक दायित्व ल' ' अपन व्यक्तित्वकेँ विस्तार दैत अछि। कथामे मोड़ तखन अबैत अछि जखन ओ बौका समर्थ भेला पर सुनीताक स्वीकृतियेसँ सही, ओकरा गर्भाधान क' ' भागि जाइत अछि। सुनीताकें एहि बातक अपराधबोध नहि छै, जे ओ बौका संग किऐ ई कृत्य

केलक, ओ देहक विवशतासँ परिचित अछि, मुदा बौकाक भागि जेबाक दंश ओकरा व्यथित करै छै। देवशंकर नवीनक कथा ÷पेंपी' पति-पत्नीक सम्बन्ध विच्छेदक परिणामस्वरूप बेटीक मनोमस्तिष्क आ व्यक्तित्व पर पड़ैबला कुप्रभाव आ बेहिसाब उपेक्षाभावकेँ करुणापूर्ण ढंगसँ व्यक्त करैत अछि। मुदा एहिमे सभटा दोष स्त्री पर फेकि देब पूर्वाग्रह मानल जा सकैछ। ई सामाजिक सत्य नहि भ' सकैत अछि। वरिष्ठ कथाकार राजमोहन झा अत्यंत कुशलतापूर्वक ÷भोजन' कथाक बहन्ने स्त्रीक बाहर काज करबाक विरोध क' जाइत छथि। राजमोहनजीक दक्षता इएह छन्हि जे ई सभ बात कहिओ क' ओ प्रगतिशील बनल रहै छथि।

राजकमल चौधरीक ÷एकटा चम्पाकली एकटा विषधर', धूमकेतुक ÷भरदुतिया', गंगेश गुंजनक ÷अपन समांग'(ई कथा देसिल बयनामे सेहो संकलित अछि), तारानन्द वियोगीक ÷पन्द्रह अगस्त सन्तानबे' आ अशोकक ÷तानपूरा' एहि संग्रहक श्रेष्ठ कथा मानल जा सकैछ। धूमकेतुक कथा ÷भरदुतिया' व्यक्ति स्वार्थ हेतु भाई-बहिनक पावन पाबनिकँ दुरुपयोग करबैत देखबैत अछि। आजुक मनुख अहू पाबनिकें नहि छोड़लक। ÷पन्द्रह अगस्त सन्तानबे' वियोगीक सफल राजनीतिक कथा कहल जा सकैछ। कथाक ई निष्पति एकदम ठीक लगैत अछि जे सवर्णक पार्टी एहि दुआरे जीतैत रहल जे निम्नजातिक आर्थिक स्थिति बहुत खराब छल। स्वामीक पार्टी दासोक पार्टी होइछ। दोसर पार्टीक मादे सोचब मृत्युकें आमन्त्रण देब छल। आओर नहि किछु तँ' आवास आ रोजगार छीनि बेलल्ला बना देब उच्चवर्गक हेतु बाम हाथक काज छल। दिल्ली-पंजाब प्रवाससँ निम्नवर्गक आर्थिक, सामाजिक स्थितिमे सुधार भेल। परिणामस्वरूप ओहि वर्गमे आत्मसम्मान आ राजनीतिक चेतनाक अंकुरण भेल। भक्तिकाव्यक उन्मेष आ ओहिमे निम्नजातिक कविक बाहूल्यक पृष्ठभूमिमे सुप्रसिद्ध इतिहाकार इरफमान हबीब मुगलकालीन विकास कार्यकेँ लक्षित केलनि अछि। ÷पन्द्रह अगस्त सन्तानबे' कथाक विलक्षणता बिहारमे बनल निम्नजातिक पार्टीक आत्मालोचन थिक। कहबा लेल त' ई पार्टी निम्नजातिक-निम्नवर्गक छल, मुदा अइ पार्टीमे छल, प्रपंच, भ्रष्टाचार, अपराध आओर पाखण्ड पहिनहुँसँ तेजगर और धारदार भ' गेल छल। कथाकारक इएह द्वन्द्व कथाकें गरिमा प्रदान करैछ। चाहक दोकान चलबैबला मुदा बहुत प्रारम्भहिसँ सक्रिय मूल्यपरक राजनीति करैबला हीरा महतोक धैर्य जखन संग छोड़ि दै छनि त' ओ पार्टी प्रमुख बासुदेव महतो पर बिफरैत कहै छथि-- रे निर्लज्जा, एतबो सरम कर! जे कुकर्म करै छैं से अपन करैत रह, लेकिन एना समाजमे नहि कहिहें जे कुकर्मे करब ठीक छिऐ। एतबो रहम कर बहिं...।''

अशोकक कथा ÷तानपूरा' मध्यवर्गीय हिप्पोक्रेसीक घटाटोपकेँ तार-तार क' देबामे पूर्ण सफल भेल अछि। बिना कोनो उपदेश आ नैतिक आग्रहक कथा मध्यवर्गीय कुत्सित मानसिकताक दुर्ग भेदन करैत अछि। कथानायक विनोद बाबूक संगीत-प्रेमकेँ हुनक पिता घोर अभाव आ द्ररिद्रयक बीच जेना-तेना पूरा करैत छथि, मुदा जखन विनोद बाबूक पुत्रा संगीत सिखबाक इच्छा प्रकट करै छनि त' दुनू प्राणीकें साँप सूँघि जाइत छनि। एहि दुआरे नहि, जे हुनका कोनो तरहक अभाव छनि। बल्कि एहि दुआरे जे संगीतक स'ख हुनक बेटाकेँ रुपैया कमबैबला मशीन नहि बना सकत। जे दम्पति कोनो विषय पर कहियो एकमत नहि भेल, एहि विषय पर एकमत भ' पुत्राक एहि अव्यावहारिक स''क कठ मोंकबाक साजिशपूर्ण योजना बनबए लगै छथि।

संग्रहक किछु कथा जेना अवकाश, अयना, खान साहेब, जंगलक हरीन आदि यथार्थक मोहमे शुष्क गद्य बनि क' रहि गेल अछि। एहिमे किछु कथा ततेक सरलीकृत भ' गेल अछि जे ओ नवसाक्षर हेतु लिखल कथा बुझि पडैछ। एहन कथा सभक मूल संरचना इतिवृत्तात्मक अछि। यद्यपि इतिवृत्त कोनो कथाक सीमा नहि होइछ, मुदा जखन कोनो कथा घटनाक स्थूल आ तथ्यात्मक विवरण टा दैछ, कथामे समय वा क्षणक मर्म नहि आबि पबैछ, ' एहन इतिवृत्त निपट गद्य बनि क' रहि जाइछ। यथार्थ कोनो कथाकें विश्वसनीयता देबाक बदलामे ओकरा भीतरसँ संवेदना निचोड़ि अनैत अछि, कथाकें प्रमाणिक बनेबाक फेरमेँ पड़ल नहि रहैत अछि। कथाकार रमेश अपन कथा ÷नागदेसमे अयनाक व्यवसाय'मे अतियथार्थ आ इतिवृत्तक फ्रेमकें तोड़ि प्रतीक वा फैंटेसीक प्रयोगसँ कथा बुनबाक प्रयास त' केलनि, मुदा कथाक विन्यासमे एकरसता आबि गेल। एहि फ्रेम हेतु हमरा लोकनिकेँ राजस्थानी कथाकार विजयदान देथा(दुविधा) आ हिन्दी कथाकार उदय प्रकाश (वारेन हेस्टिंग्स का सांढ़) आदिकेँ पढ़बाक चाही। हिनका लोकनिक कथा यथार्थक फ्रेमकेँ तोड़ियो क' यथार्थ बनल रहल अछि।

मैथिलीमे प्रकाशित उक्त तीनूँ कथा संकलनसँ मैथिली कथाक प्रसार राष्ट्रीय स्तर पर भ' रहल अछि, एहिमे दू मत नहि। मुदा उक्त संकलनकेँ पढ़ि

आम पाठकक राय इएह बनत जे मैथिलीमे कुल इएह तीस-चालीस गोट कथाकार आइ तक भेलाहे। कारण तीनूँ संग्रहमे कथाकारक सूचीमे अद्भुत साम्य अछि। कथा पढ़ि बुझना जाइछ जे कथा चयनमे कथाक अपेक्षा कथाकारकेँ महत्व देल गेल अदि। ई कहब सर्वथा अनुचित जे संकलनक कथाकार महत्वपूर्ण नहि छथि, मुदा अन्य श्रेष्ठ कथाकेँ सेहो प्रकाशमे अएबाक प्रयास हेबाक चाही। हमरा लोकनि ई नीक जकाँ जनै छी जे मैथिलीमे श्रेष्ठ कथाक अभाव नहि अछि। किन्तु प्रकाशनक अभावमे पत्र-पत्रिकाकें छानि मारब कठिनाहे नहि समय-साध्य कार्य थिक। वैद्यनाथ मिश्र यात्रीक पहिचान भने श्रेष्ठ कविक रूपमे छनि, मुदा हुनकर मैथिली कथा ÷चितकबड़ी इजोरिया' ÷रूपांतर' कतोक दृष्टिएं महत्वपूर्ण अछि। रेणुजी सेहो मैथिली कथा लिखलनि अछि। ई दीगर बात थिक जे बादमे ओ हिन्दिए टामे लिखए लगलाह। ÷नेपथ्य अभिनेता' ÷जहां पमन को गमन नहीं' आदि लीकसँ हटि क' लिखल गेल कथा थिक। ÷उदाहरण'मे कथाक प्रकाशन वर्ष आ सन्दर्भक अनुपस्थिति खटकैत अछि। समय-सीमा जनने बिना कोनो कथाक सम्यक मूल्यांकन सम्भव नहि। नवीनजी सदृश दक्ष आ अनुभवी सम्पादकसँ ई आशा नहि कएल जा सकै छल। एहि कमीकेँ पूरा करैत अछि हुनकर चौदह पृष्ठीय भूमिका। सम्पादक मैथिली कथाक सीमा आ सम्भावनाक विस्तृत पड़ताल अपन एहि भूमिकामे केलनि अछि। मैथिली कथाक इतिहासकें बुझबा लेल ई भूमिका निश्चित रूपें रेखांकन योग्य अछि।

उदाहरण

पुस्तकक नाम - उदाहरण

सम्पादक - देवशंकर नवीन

प्रकाशक - प्रकाशन विभाग

सूचना और प्रसारण मन्त्राालय

भारत सरकार

पृष्ठ - २७४

मूल्य - २०० टाका मात्रा

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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