Friday, May 08, 2009

श्री विद्यानन्द झा

श्री विद्यानन्द झा
पञ्जीकार (प्रसिद्ध मोहनजी)

जन्म-09.04.1957, पण्डुआ, ततैल, ककरौड़ (मधुबनी), रशाढ़य (पूर्णिया), शिवनगर (अररिया) सम्प्रति पूर्णिया। पिता लब्ध धौत पञ्जीशास्त्र मार्त्तण्ड पञ्जीकार मोदानन्द झा, शिवनगर, अररिया, पूर्णिया|पितामह-स्व. श्री भिखिया झा। पञ्जीशास्त्रक दस वर्ष धरि 1970 .सँ 1979 . धरि अध्ययन,32 वर्षक वयससँ पञ्जी-प्रबंधक संवर्द्धन आऽ संरक्षणमे संलग्न। गुरु- पञ्जीकार मोदानन्द झा। गुरुक गुरु- पञ्जीकार भिखिया झा, पञ्जीकार निरसू झा प्रसिद्ध विश्वनाथ झा- सौराठ, पञ्जीकार लूटन झा, सौराठ। गुरुक शास्त्रार्थ परीक्षा- दरभंगा महाराज कुमार जीवेश्वर सिंहक यज्ञोपवीत संस्कारक अवसर पर महाराजाधिराज (दरभंगा) कामेश्वर सिंह द्वारा आयोजित परीक्षा-1937 . जाहिमे मौखिक परीक्षाक मुख्य परीक्षक .. डॉ. सर गंगानाथ झा छलाह।


॥श्री गणेशाय नमः॥

सृष्टि चक्र”

आदिमे शून्य छल शून्यसँ शान्ति छल।

शून्य केर सत्ता दिग-दिगन्त व्याप्त छल।

शून्यक विधाता शून्यसँ आक्रान्त छल।

शून्यसँ प्रारम्भ भए शून्यहिसँ विराम छल।

 

विधिना विधान कएल रचना संसार कएल।

खेत पथार पोखरि ओ जीवक संचार कएल।

दिति ओ अदितिसँ सृष्टिक विस्तार कएल।

कर्म सभक बान्हि बान्हि धरतीपर आनि धएल।

 

शून्यक विखंडनसँ वृत्तक विस्तार भेल।

पोखरि ओ झांखड़ि पर्वत पहाड़ भेल।

नदी-नद तालाब ओ वनस्पति हजार भेल।

जीव जङ्गम स्थावर ओ गतिमान संसार भेल।

 

चन्द्र सूर्य नक्षत्र ओ वायु वारिद नीर।

धरा-गगन धरि व्याप्त भेल विद्युत ओ समीर।

सभतरि पसरल तेज पुञ्ज चकाचौंध गम्भीर।

तम-तम करइत दिन दुपहरिया नयन भरल ओ नीर।

 

जल चर- थलचर- नभचर नाना।

अप्पन-अप्पन धएलक बाना।

विविध भेष ओ भाषा नाना।

कएलक निज-निज गोत्र बखाना।

 

विष ओ अमृत संग जनमि गेल।

स्नेह-प्रेम-आघात प्रगट भेल।

दोस्त-महिम कुटुम्ब अमरबेल।

चतरि-चतरि चहुँओर पसरि गेल।

 

एक दिशि जनमल चोर-उचक्का।

दोसर दिशि भलमानुष सुच्चा।

सृष्टि हेतु- समधानल सभटा।

प्रभु सभ करथि हुनक ई छिच्छा।

 

गोङ बधिर बजबैका नाङ्गर।

श्वेत-श्याम सत्वर ओ अजगर।

दीर्घकाय ओ दुव्वर पातर।

सभटा रचलैन्हि ओ विश्वम्भर।

 

भूख रचल प्यास रचल।

श्रम ओ संधान रचल।

रोग रचल व्याधि रचल।

औषध अपार रचल।

 

काम भूख दाम भूख वासनाक उग्रभूख।

शान-मान-दान भूख भूखक हजार रूप।

ई भूख ओ भूख भूखक विद्रूप रूप।

भूख मुदा बढ़िते गेल धधकैत विकराल रूप।

 

शाम-दाम-दण्ड भेद शासन कुशासन।

काम-क्रोध-लोभ-मोह विरचल “महाशन”।

राग-द्वेष-प्रेम-वैर पसरल हुताशन।

सृष्टि चक्र चलैत रहल वैदिक ऋचा सन।....।

घर बनल गाम बनल नगर ओ धाम बनल।

जनता जरल सन नेता भगवान बनल।

देशक खेवैया झुठ्ठा बेइमान बनल।

भक्तिक भभटपन पण्डा शैतान बनल।

सृष्टि चक्र चलैत रहल वैदिक ऋचा सन।...

पाद-टिप्पणी: १.वारिद-मेघ २.समधानल-ओरियाकऽ ३.छिच्छा-स्वभाव ४.संधान-अन्वेषण,खोज ५.महाशन-विष्णु ६.हुताशन-अग्नि.


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