Friday, May 08, 2009

डॉ कैलाश कुमार मिश्र

डॉ कैलाश कुमार मिश्र

(८ फरबरी १९६७-) दिल्ली विश्वविद्यालयसँ एम.एस.सी., एम.फिल., मैथिली फॉकलोर स्ट्रक्चर एण्ड कॊग्निशन ऑफ द फॉकसांग्स ऑफ मिथिला: एन एनेलिटिकल स्टडी ऑफ एन्थ्रोपोलोजी ऑफ म्युजिक पर पी.एच.डी.। मानव अधिकार मे स्नातकोत्तर, ४०० सँ बेशी प्रबन्ध -अंग्रेजी-हिन्दी आ मैथिली भाषामे- फॉकलोर, एन्थ्रोपोलोजी, कला-इतिहास, यात्रावृत्तांत आ साहित्य विषयपर जर्नल, पत्रिका, समाचारपत्र आ सम्पादित-ग्रन्थ सभमे प्रकाशित। भारतक लगभग सभ सांस्कृतिक क्षेत्रमे भ्रमण, एखन उत्तर-पूर्वमे मौखिक आ लोक संस्कृतिक सर्वांगीन पक्षपर गहन रूपसँ कार्यरत। यूनिवर्सिटी ऑफ नेब्रास्का, यू.एस.ए. केर फॉकलोर ऑफ इण्डिया विषयक रेफ़ेरी। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालयक पुरस्कारक रेफरी सेहो। सय सँ ऊपर सेमीनार आ वर्कशॉपक संचालन, बहु-विषयक राष्ट्रीय आ अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठीमे सहभागिता। एम.फिल. आ पी. एच.डी. छात्रकेँ दिशा-निर्देशक संग कैलाशजी विजिटिंग फैकल्टीक रूपमे विश्वविद्यालय आ उच्च-प्रशस्ति प्राप्त संस्थानमे अध्यापन सेहो करैत छथि। मैथिलीक लोक गीत, मैथिलीक डहकन, विद्यापति-गीत, मधुपजीक गीत सभक अंग्रेजीमे अनुवाद।

 “रचना” मैथिली साहित्यिक पत्रिकामे “यायावरी” स्तंभक प्रशस्त स्तंभकार श्री कैलास जीक “विदेह” लेल प्रारम्भ कएल गेल ई यायावरी स्तंभ दीर्घ काल तक स्थायी रहत ताहि कामनाक संग प्रस्तुत अछि अहाँ लोकनिक समक्ष ई पहिल खेप। सम्‍पादक


यायावरी

नॉर्थ कछार हिल्स: धरतीक नुकाएल स्वर्ग –डॉ कैलाश कुमार मिश्र

-हमर अंग्रेजीमे लिखल लेख पढ़ि लोक सभ हमरासँ मैथिलीमे लिखबाक हेतु अनुरोध करैत छथि। स्पष्ट कए दी जे अंग्रेजी हमर व्यवसाय केर भाषा थिक। कहियो मिथिलामे नहि रहलहुँ, संस्कृत आ सोतियामी मैथिली नहि तँ पढ़लहुँ आ ने लिखलहुँ। तञि मैथिलीमे लिखक कल्पना जखने करैत छी तँ हाथ काँपय लगैत अछि। तीन वर्ष पूर्व डॉ विश्वनाथ झा अपन त्रैमासिक पत्रिका रचना हेतु लिखबाक लेल भावनात्मक रूपेँ हमरा बाध्य कऽ देलन्हि। डराइत-डराइत हम रचनामे “यायावरी” नामसँ अपन यात्रा-वृत्तान्त लिखनाइ प्रारम्भ केलहुँ। पाँच अंकमे लगातार लिखलाक बाद कार्यक अत्यधिक व्यस्तताक कारणेँ यायावरी लिखनाइ बन्द कऽ देलहुँ। घुमब आ अंग्रेजीमे लिखबसँ समय कहाँ बचैत अछि।

एम्हर नौ-दस माससँ गजेन्द्र बाबू अपन पत्रिकाक हेतु पुनः मैथिलीमे लिखबाक हेतु कहि रहलाह अछि। अतेक चेरियेलन्हि जे अन्ततः यात्रा-वृत्तान्तक “यायावरी” प्रारम्भ कऽ रहल छी। पाठक लोकनिसँ नम्र निवेदन जे हमर लेखक विषय आ वर्णनकेँ पढ़थि आ भाषा-विन्यासक गलतीपर बेशी ध्यान नहि देथि।

यायावरीक प्रारम्भ हम असम केर एक छोट भव्य, रम्य, आकर्षक, कठिन परन्तु अनेक रंग आ उल्लाससँ भरल भूखण्ड, नार्थ कछार हिल्ससँ कऽ रहल छी।

अपन संस्था –इन्दिरा गान्धी राष्ट्रीय कला केन्द्रक सदस्य सचिव डॉ कल्याण कुमार चक्रवर्ती महोदय केर निर्देश एवं कार्यशैलीसँ प्रभावित भऽ हम समस्त उत्तर-पूर्व भारत एवं सिक्किममे विभिन्न क्रियाकलाप प्रारम्भ केलहुँ, जाहिसँ स्थानीय संस्कृति आ विरासत केर रक्षा कएल जा सकय। असममे कार्यक श्रीगणेश हमरा लोकनि “श्रीमंत शंकरदेव कला क्षेत्र” गुआहाटी केर सचिव श्री गौतम शर्माक संग कएल।

 

लगभग ६४ बीघा पहाड़ी धरतीमे बनल श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र बड्ड रमनगर जगह बुझना गेल। जे कियो गुआहाटी घुमए जाथि आ हुनका कलासँ थोरेकबो प्रेम होइन तँ श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र अवश्य जाथि, ई हमर निवेदन। कलाक्षेत्रमे पानिक फब्बारा, फुलबारी, विशाल आ कलात्मक अनेको भवन, दू टा अतिथि गृह, आर्टिस्ट विलेज; कलाकार सभकेँ रहबाक हेतु डॉरमेटरी; संग्रहालय, कला दीर्घा, बच्चा सभक लेल टॉय रेल एवं अन्य व्यवस्था; असम केर इतिहासक सम्बन्धमे “लाइट एण्ड साउंड” कार्यक्रम; पुस्तकालय, शिवसागर जिलाक ऐतिहासिक रंगघर केर रिप्रोडक्शन इत्यादि बरवश कुनो घुमए बलाकेँ मोन मोहि लैत छैक।

असम केर अधिकांश ऑफिस आ घरसभमे लोक अपन जुत्ता-चप्पल आदि घरक बाहरे खोलि प्रवेश करैत छथि। हमहूँ एहि परम्पराक पालन जखन-जखन असम जाइत छे, तखन-तखन करैत छी।

स्पष्ट कऽ दी जे श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र सोलहम शताब्दीक महान वैष्णव सन्त शंकरदेव केर नामपर असम राज्य सरकार, भारत सरकारक आर्थिक सहायतासँ समस्त उत्तर-पूर्व भारत, विशेषरूपेण असम केर संस्कृति, विरासत तथा गौरवक संरक्षण एवं सम्वर्धन करबाक दृष्टिसँ बनल छैक।

शंकरदेव जातिसँ कायस्थ छलाह। श्री बाल्मीकि प्रसाद सिंह जे असम काडर केर आइ.ए.एस.पदाधिकारी छलाह; बादमे भारत सरकारक गृह सचिव भेलाह आ अन्ततः विश्वबैंक केर कार्यकारी निदेशक पदसँ अवकाश प्राप्त कएलन्हि, हमरा कहलाह जे शंकरदेव मैथिल छलाह। हुनकर पितामह मिथिलासँ असम प्रवास कऽ गेलथिन्ह। पञ्जीसँ ईहो पता चलैत छैक, जे शंकरदेव तँ नहि परन्तु हुनकर पिता तीन-चारि बेर मिथिला आयल छलाह। एहि बातक एतय उल्लेख करब केर पर्याय ई जे एहि विषयपर गहन शोध करबाक आवश्यकता थिक। यदि ई बात प्रमाणित भऽ गेल जे शंकरदेव मैथिल छलाह तँ आइ हमरा लोकनि विद्यापतिक मैथिल होएबापर गर्व करैत छी, तहिना शंकरदेवोपर गर्व करब। हमरा हिसाबे तँ प्रबुद्ध मैथिल सभ बिहार सरकारसँ शंकरदेवपर एक गहन शोध करबाक परियोजना प्रारम्भ करबाक हेतु निवेदन करथि। गजेन्द्रजी एहि दिशामे आगाँ बढ़थि तँ नीक बात। संयोगसँ वाल्मीकि बाबू आइ-काल्हि सिक्किम प्रदेशक राज्यपाल थिकाह। हुनकर मदतिसँ परियोजनाक प्रारम्भ कएल जा सकैत अछि। ओऽ हमरा कतेको बेर एहिपर कार्य करक हेतु कहि चुकल छथि। एक समय एहनो छलैक जखन बंगाली सभ विद्यापतिकेँ बंगाली बुझैत छलाह। परन्तु आब प्रमाणित भऽ गेल जे विद्यापति मैथिल छलाह। यदि एहने किछु सबरा परम्परा केर जनक श्रीमंत शंकरदेवक उतेढ़पोथीसँ चलि जाय तँ बुझू जे हमरा लोकनि धन्य भऽ जाएब।

श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्रक सचिव गौतम शर्मा आ सुलझल व्यक्ति छथि। लगभग पचास वर्षक गौर वर्ण आ मध्यम कद-काठीक आकर्षक व्यक्तित्व। स्थिर चित्त। प्रथम दृष्टिमे लागत जे ओहिना कियो छथि। परन्तु मुदा डायनेमिक लोक। कलाक्षेत्रक १२५ आदमी हुनकर इशारापर नचैत रहैत अछि। सदिखान ओऽ अपन सहयोगी सभकेँ परिवारक सदस्य जेकाँ स्नेह करैत छथि।

गौतम शर्माक सहयोगक कारणेँ हमरा लोकनि गुआहाटी आ तेजपुरमे बहुत सफलतापूर्वक अनेक कार्यक्रम कऽ चुकल रही। हमरा लोकनि असम केर किछु एहन क्षेत्रमे ओहि क्षेत्रक संस्कृति आ विरासतपर कार्य करए चाहैत रही, जाहिपर विशेष कार्य नहि भेल हो। शर्माजीसँ पता चलल जे सांस्कृतिक दृष्टिएँ असम प्रदेशकेँ मोटा-मोटी चारि क्षेत्रमे बाँटल जा सकैत अछि:

१.अपर असम

२.लोअर असम

३.बराक घाटी

४.नॉर्थ कछार घाटी

शर्माजीसँ इहो पता चलल जे नॉर्थ कछार हिल्स सांस्कृतिक वैविध्यतासँ भरल अनुपम स्थान थिक, जाहिपर कोनो विशेष कार्य नहि भेलैक अछि। परन्तु ई घाटी उपद्रव, विभिन्न घटना, बन्द आदिक कारणेँ बेशी जानल जाइत अछि। लोक सभ सामान्यतया एतय जाएसँ बचए चाहैत छथि। मुदा सौन्दर्य आ सांस्कृतिक विभिन्नताक कारणे ई थिक असम केर शृंगार-नकमुन्नी।

 

शर्माजीक बात सुनि हमरा मोनमे ई भावना प्रबल भऽ गेल जे नॉर्थ कछार घाटीमे अवश्य कार्य करब।

गौतम शर्मा हमर मनोदशाकेँ बुझैत कहलाह: “कैलाशजी, अगर अहाँ एतए कार्य करए चाहैत छी तँ हम व्यवस्था कए देब। एतए केर जिला अधिकारी आ नॉर्थ कछार घाटी ऑटोनोमस काउन्सिल केर प्रिंसिपल सचिव अनिल कुमार बरुआ हमर मित्र छथि। एस.पी.केँ हम सेहो जनैत छियन्हि। ऑटोनोमस काउन्सिल केर संस्कृति विभागक अधिकारीगण हमरा लग बराबर अबैत रहैत छथि। सभ कियो मदति करताह।

गौतम शर्माक बातसँ हमर मोन प्रसन्न भऽ गेल। तुरतहि डॉ कल्याण कुमार चक्रवर्तीसँ अनुमति लए २३ नवम्बर २००७ ई. सँ ८ दिनक संस्कृति एवं विरासत केर प्रलेखन केर कार्यक्रम नॉर्थ कछार धारी केर मुख्यालय हाफलौंगमे करबाक प्लान बना लेलहुँ। ई कार्यक्रम गौतम शर्माक सहयोगसँ करक छल। तदनुसार पूर्व निर्धारित् योजनाक अनुसार हम २१ नवम्बरकें साँझे दिल्लीसँ सँझुका हवाई-जहाजसँ गोवाहाटी पहुँचि गेलहुँ। गुआहाटीसँ हाफलोंग केर दूरी सड़कमार्गसँ २६१ किलोमीटर छैक। हमरा लोकनि (हम आ शर्माजीक ३ सहयोगी) टाटा सूमो (जीपसँ) २२ नवम्बरक साढ़े चारि बजे प्रातः गुआहाटीसँ हाफलौंगक लेल प्रस्थान कऽ देलहुँ। शर्माजी बड्ड पारिवारिक व्यक्ति छथि। ओऽ पूरा टीमक लोक सभक लेल भोजन, टेन्ट, जलखै, जेनरेटर आदिक व्यवस्था गुआहाटीसँ कए ट्रकमे लादि हॉफलोंग लऽ गेलाह।

 

समय दुर्गापूजाक छलैक। रास्तामे अनेक ठाम स्थानीय युवक सभ हमरा लोकनिकेँ चन्दा लेल रोकैत रहल। एक ठाम हमरा लोकनि केर राशन-पानि आ करीब २५ आदमीसँ भरल बड़का बसक चक्का सड़कक कात माँटिमे धसि गेल। चारि घन्टाक इन्तजारक बाद सेनाक सहायता लए चक्काकेँ दलदलसँ बाहर निकालल गेल। अन्ततः साढ़े एगारह बजे रातिमे हाफलौंग पहुँचलहुँ। मोनमे डर छल। हेबो किएक नहि करैत! हमरा सभकेँ अएबासँ दू दिन पहिने पाँच आदमीक बीच हाफलौंग शहरमे गोलीसँ मारि देल गेल रहैक।

खैर! शर्माजीक प्रयास आ डॉ के.के.चक्रवर्ती जीक असम केर मुख्य सचिव केर नाम लिखल चिट्ठीक कारण हमरा हाफलौंग सर्किट हाउसमे रहबाक व्यवस्था भऽ गेल। सर्किट हाउस शहरक सभसँ ऊँच स्थानपर बनल अंग्रेजी हुकुमतक समयक भव्य मकान छैक। एतएसँ प्रकृति केर अवलोकन तथा समस्त हाफलौंग शहर एवं अगल-बगलक इलाकाकेँ देखल जा सकैत अछि।

हमर कोठरी काफी पैघ आ साफ सुथरा छल। हँ, पानिक कनिक दिक्कत अवश्य छलैक। कपड़ा बदलिते सुति रहलहुँ। भेल जे रातिमे भोजन नहि करब। परन्तु गौतम शर्मा कतऽ मानऽ बला छलाह! कनिकबे कालक बाद एक स्थानीय कलाकारकेँ लए आबि गेलाह। हम शिष्टतावश नहिओ चाहैत बैसि रहलहुँ। शर्माजी कहलन्हि, “जल्दी चलू। भोजन तैयार अछि”। नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस काउन्सिल केर कला एवं संस्कृति विभागक निदेशक श्री लंगथासा सेहो शर्माजीक संग छलथिन्ह। हुनके प्रयाससँ संस्कृति भवन केर प्रांगणमे हमरा लोकनिकेँ कार्यक्रम करबाक अनुमति भेटल छल। लंगथासा उदार आ संस्कृति प्रेमी छथि। स्वयं दिमासा जनजातिक छथि। कहलन्हि “हमरा सभ लेल ई गौरव केर बात थीक जे अहाँ लोकनि दिल्लीसँ आबि एहि इलाकामे जतए कियोक नहि आबए चहैत अछि, अयलहुँ अछि आ हमरा लोकनिक संस्कृति एवं धरोहरक रक्षाक प्रति कृतसंकल्पित छी। एतए तँ ओना असम राइफल्स, सैनिक, पुलिस आदिक जमघट लागल रहैत अछि, परन्तु संस्कृति आ विरासतक चिन्ता ककरा छैक? अहाँ सभकेँ केना धन्यवाद दी”।

हम लंगथासा महोदय दिस तकैत बजलहुँ: “अहाँ सभ यदि चाही तँ हमरा लोकनि एहि क्षेत्रक सांस्कृतिक धरोहरकेँ संरक्षण एवं संवर्धनक हेतु बेर-बेर आएब”।

हमरा बातपर उत्साहित भऽ लंगथासाजी बजलाह: हमरा लोकनि सभ तरहक सहयोग करबाक हेतु तैयार छी। एतय केर तमाम अलगाववादी, सरकार विरोधी जत्था समूह संस्कृति रक्षणक विरोधी नहि थिक। तमाम लोसभ अहाँक निर्णयसँ प्रसन्न अछि। जावत धरि अहाँ सभ एतए रहब तावत धरि अतए कुनो मार-काट नहि हैत। अहाँ जे जाहि तरहक स्थानीय सहयोग चाही, हमरा लोकनि करबाक हेतु तत्पर छी”।

एकर बाद हमरा लोकनि रात्रिक भोजन हेतु विदा भेलहुँ। चटगर भोजन-भात, माछ, दालि, सजमनि केर तरकारी, सलाद, मिठाई, चटनी- केलाक बाद पुनः सर्किट हाउस आबि सुतबाक तैयारीमे लागि गेलहुँ। सुतएसँ पहिने अपन पत्नीकेँ दूरभाषसँ आश्वस्त कए देलियन्हि। जे चिन्ताक कोनो बात नञि। हम एतए ठीक छी”। एकर तुरत बाद सुति रहलहुँ।

अगिला दिन प्रातः पाँच बजे उठि बाहर अएलहुँ तँ मनोरम दृश्य देखि मोन मस्त भऽ गेल। सर्किट हाऊससँ एना बुझना गेल जेना सुरुज अपन लालिमा लए लाल गेन जकाँ उगैत छथि। हरियर जंगल, कलकल करैत छोट परन्तु घुमावदार नदीक प्रभाव, दूरमे बनल जंगलक मध्य आदिवासी सबहक छोट-छोट घर, सभ किछु मनमोहक लगैत छल।

 

किछु कालक बाद गौतम शर्मा सम्वाद पठओलन्हि जे हमरा लोकनिक कार्यक्रम साँझ ६ बजे प्रारम्भ हैत। किछु कालक बाद सत्यकाम आ कुशा महन्त किछु स्थानीय लोक संग हमरा लग आबि कहलन्हि जे खाली समयमे हॉफलौंग आ अगल-बगलक क्षेत्रकेँ देखबाक चाही। हमरा ई विचार नीक लागल। तुरत तैयार भऽ गेलहुँ।

स्थानीय लोकसभसँ पता चलल जे हाफलोंग मूलतः “हंगक्लौंग” सँ बनल छैक जकर अर्थ थीक सम्पन्न आ रत्नगर्भा धरती। बादमे किछु दोसर विद्वान लोकनि कहलन्हि जे “हॉफलौंग” शब्द दिमासा जनजातिक शब्द “हाफलाऊ” (HAFLAU)क विकृत रूप थीक। हाफलाऊ शब्दक अर्थ भेल वाल्मीक पहाड़ी (Ante hill)हाफलौँग शहरक निर्माण अँग्रेज प्रशासन द्वारा १८९५ ई. मे बोराइल रेंजपर एकटा छोट छिन हिल स्टेशनक रूपमे कएल गेलैक। प्रारम्भमे चीर, देवदारक पाँतिसँ लागल गाछ, नौ छेदक गोल्फ कोर्स, छोट परन्तु आकर्षक आ कलात्मक बंगला, हाफलौंग लेक, रेलवेक कर्मचारी सभ लेल स्टाफ क्वार्टर, छोट बजार, रेलवे स्टेशन आदि सुविधाक संग एहि शहरक विकास प्रारम्भ कएल गेलैक।

अंग्रेज सबहक हिम्मतिक प्रशंसा करए पड़त। ३६ खोह (tunnels) कऽ बना रेल लाइन लऽ गेनाइ ओहि जमानामे अर्थात् १८९५-९८ मे की छोट बात छैक? रेलवेक निर्माण कार्यक हेतु ठीकेदार, मजदूर, कर्मचारी, व्यापारी आदि सभ उत्तर-प्रदेश, बिहार, बंगाल आ असम केर अन्य स्थानसँ आनल गेल। पुनः आपसमे वार्तालापक हेतु एक नव तरहक बजारु हिन्दी विकसित कएल गेलैक। एहि हिन्दीकेँ हॉफलौंग-हिन्दी कहल जाइत छैक। ई हिन्दी व्याकरणक निअमक पालन स्वतंत्र भऽ करक अधिकार दैत छैक। हाफलौंग हिन्दी रोमन लिपिमे लिखल जाइत छैक। स्थानीय बुद्धिजीवी लोकनिक कठिन संघर्षक फलस्वरूप आइ-काल्हि हॉफलौंग हिन्दीक मान्यता साहित्य अकादमीसँ भऽ गेल छैक।

नार्थ कछार हिल्स असम केर बहुरंगी चुनरी थीक। एतए निम्नलिखित एगारह जनजातिक लोक रहैत छथि:

 

१. दीमासा (Dimasa or Cachari)

२. ह्मार (Hmar)

३. जेमि नागा (Zeme Naga)

४. कुकी (Kuki)

५. बंइते (Baite)

६. कार्बी (Karbi)

७. खासी अथवा प्नार (Khasi or Pnar)

८. ह्रांगखल (Hrangkhals)

९. वइफी (Vaiphies)

१०. खेलमा (Khelma)

११. रोंगमई (Rongmei)

 

एकर अतिरिक्त अन्य समुदाय जेना कि बंगाली, असमी, नेपाली, मणिपुरी, मुसलमान, देसवाली आदि सेहो एतए रहैत छथि। सभ समुदायक बीच हमरा भावनात्मक एकताक कड़ी बुझना गेल। भारतक अनेकतामे एकताक स्वरूप बुझाएल जेना अपन मनिएचर धारण कए एहि छोट धरामे मोडेल बनि “संगे-संगे चली”, “संगे-संगे खाई”, “संगे-संगे रही” केँ चरितार्थ करैत छल।

स्वतन्त्रता प्राप्तिक बाद भारतक अन्य शहर जकाँ हॉफलौंग सेहो शनैः-शनैः विकसित भऽ रहल अछि। १९७० ई. मे एकरा जिलाक मुख्यालय बना देल गेलैक। आब नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस काउन्सिल केर मुख्यालय, विभिन्न सरकारी विभागक दफ्तर आ मकान, आवासीय परिसर, पार्क, जेहल, खेल परिसर आ मैदान, दू टा रेलवे स्टेशन, सिविल अस्पताल, प्राइमरीसँ हाइयर सेकेण्डरी स्तर केर विभिन्न विद्यालय, सभ सुविधासँ परिपूर्ण सरकारी महाविद्यालय जाहिमे कला, विज्ञान एवं वाणिज्य संकाय केर अधिकांश विषयक पढ़ाई केर सुविधा सहजतासँ उपलब्ध छैक; पानिक सुविधा, डाक, टेलीग्राम, टेलीफोन आदिक सुविधा, बैंक, चर्च, मन्दिर, मस्जिद, पुस्तकालय अनेक तरहक सामाजिक-सांस्कृतिक क्रिया-कलापमे संलग्न संस्था; सिनेमा हॉल, बस स्टेण्ड आदि सुविधासँ भरल अछि।

अगर रेलसँ हाफलौंग आबय चाही तँ गुआहाटीसँ नॉर्थ प्रन्टीयर हिल सेक्शन केर मीटरगेज द्वारा लम्डींगक रस्ते लोअर हाफलौंग स्टेशन आबि सकैत छी। एकर दूरी गुआहाटीसँ २८५ किलोमीटर छैक। सिलचरसँ बदरपुर होइत हिल हाफलौंग स्टेशन केर दूरी ९२ किलोमीटर छैक।

रेलक डिब्बामे बैसि नॉर्थ कछार हिल्स केर नील पहाड़ीक अवलोकन केनाई स्वर्ग केर अवलोकनसँ कम नञि छैक। जीग-जैग (टेढ़-मेढ़) रस्ता नगाँवसँ प्रारम्भ भय समस्त नॉर्थ कछार हिल्सक उत्तरसँ दक्षिण दिशामे जिलाक तीन प्रमुख नदी- माहुर, दीयूंग आ जटिंगा- कऽ संग-संग चलैत रहैत छैक। बुझाएत जेना पानि, रेलक पटरी आ मनुक्खक मोन तीनू आपसमे तालसँ ताल मिला गतिमान भेल होए।

उपरोक्त तीन नदीक अतिरिक्त एहि धरामे चारि छोट-मोट नदी आरो थीक। एहि नदी सबहक नाम छैक: जीनाम, लंगटींग, कोपिली, डिलेयमा। सभसँ पैघ नदी दीयूंग छैक जकर लम्बाई २४० किलोमीटर छैक।

१८६६ मीटर केर ऊँचाई पर अवस्थित थुंगजांग पहाड़ी सभसँ ऊँच स्थान छैक।

नॉर्थ कछार हिल्स पूबसँ असम केर पड़ोसी प्रदेश नागालैण्ड आ मणिपुर; पश्चिममे मेघालय आर कार्बी अंगलौंग जिला; उत्तरमे नगांव आ कार्बी अंगलौंग जिला तथा दक्षिणमे बराक घाटीक कछार जिलासँ घेरल अछि। ४८९० वर्ग किलोमीटर क्षेत्रमे पसरल नॉर्थ कछार हिल्स केर सामान्य ऊँचाई समुद्र तलसँ ३११७ फीट छैक।

नॉर्थ कछार हिल्स जिलामे ६१९ गाम; पाँच प्रखण्ड, दू सब डिवीजन (हाफलौंग आ मइबांग)मे विभक्त अछि।

अतए केर आदिवासी मूल रूपसँ झूम खेती करैत छथि। झूममे एक भागक जंगल-झाड़केँ काटि ओहिमे आगि लगा पुनः खेती कएल जाइत छैक। तीन-चारि वर्षक बादओहि भूमिमे पुनः जंगल झाड़केँ बढ़ए देल जाइत छैक आ जंगल-झाड़सँ भरल जमीनकेँ आगि लगा साफ कय ओहिमे खेती कएल जाइत छैक। एतए १७,२९३ हेक्टेअर जमीन झूम खेतीक रूपमे, टोटल फसल हेतु उपयुक्त जमीन ३६७५८ हेक्टेअर आर बीया रोपए बला समस्त जमीन २९२०५ हेक्टेअर छैक। एहि जनपद केर करीब ४५२९वर्ग किलोमीटर धरती जंगलसँ भरल छैक। ६१०.५१ वर्ग किलोमीटर सुरक्षित आ बाकी हिस्सा राज्य सरकार द्वाराघोषित। तीन सुरक्षित जंगल क्षेत्रक नाम क्रमशः

(क) लांगटींग-मूपा सुरक्षित जंगल (४९७.५५ वर्ग कि.मी.)

(ख) कूरुंग सुरक्षित जंगल (१२४.४२ वर्ग किलोमीटर)

(ग) बोराइल सुरक्षित जंगल (८९.८३ वर्ग किलोमीटर)

ओहि दिन लगभग साढ़े बारह बजे भोजन कयल। तत्पश्चात् नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस हिल्स काउन्सिलक कला एवं संस्कृति विभागक निदेशक लंगथासा महोदय, उप-निदेशक श्री संजय जी दूंग एवं किछु अन्य लोकनि हमरा लग अयलाह आ कहलन्हि जे “चलू अहाँकेँ पहाद्ई दिस लऽ चलैत छी। यदि समय बचत तँ जटींगा पहाड़ी आ गाम सेहो चलब”।

गुआहाटीमे किछु लोक सभ जानकारी देने छलाह जे जटींगा पहाड़ीपर चिड़ै सभ रातिमे रोशनी देखलापर झुण्डक-झुण्डाअबि रोशनीपर प्रहार करैत छञि तथा सामूहिक रूपेण आत्महत्या कऽ लैत छैक। इहो पता चलल छल जे पक्षीशास्त्री लोकनि एहिपर गहन शोधमे बहुत दिनसँ लागल छथि परन्तु एखन धरि कोनो ठोस निष्कर्षपर नहि आबि सकल छथि जे आखिर एकर रहस्य की छकि? आ एकर सत्यता की थिकैक? गुआहाटीमे मोन बना लेने रही जे जटींगा पहाड़ी अवश्य जायब। आइ ई अवसर हमरा लंगथासाजी देलन्हि तँ मोन गद् गद् भऽ गेल। हम तुरत हुनका लोकनिक संग जटींगा गाम जयबाक लेल तैयार भऽ गेलहुँ।

जटींगा पहाड़ी आ गामक रस्तामे विभिन्न प्रकारक बेंतक झाड़ी आ बांस भेटल। नॉर्थ कछार हिल्सक टोटल धरती (४८९००० हेक्टेअर)मे लगभग ३०७९०० हेक्टेअरमे बांस लागल छैक। बांस अनेक प्रकारक अनेक प्रजातिक, असम प्रदेशमे ३३ नस्ल केर बांस होइत छैक, जाहिमे लगभग २० नस्ल वा प्रजाति एहि क्षेत्रमे उपलब्ध छैक। प्रमुख प्रजातिमे काको/ पीछा वा पीछा, जाति, डालू, मूली, हिलजाति, कता, मकालू, काली-सूण्डी, टेराई आदिक नाम सामान्यो मनुक्खक जीभमे रचल-बसल छैक। बांस एहि क्षेत्रक लोकक जीवनक प्रमुख आधार छैक। एकर प्रयोग झोपड़ी, जाफरी, जारनि, पूल आदि बनेबाक लेल कएल जाइत छैक। बांसक कोपड़सँ तरकारी, अचार आदि सेहो बनायल जाइत छैक। बांसकेँ स्थानीय चाऊर, मकई आदिसँ बनल दारु पीबाक हेतु बर्तन (ग्लास-कप)क रूपमे कएल जाइत छैक। जमीनक कटाव रोकबाक हेतु बांसक आधार देल जाइत छैक। एकर अलावे बांसक प्रयोग बर्तन, फर्नीचर, कृषियन्त्र एवं उपकरण, धनुष-वाण, सजेबाक कलात्मक वस्तु, हस्तकला, बत्ती, सीढ़ी इत्यादिमे उपयोग होइत छैक। बादमे हम अनेको वाद्य या लोकवद्य यंत्र देखलहुँ जाहिमे बांसक प्रयोग कएल गेल रहैक।

अन्ततः हमरा लोकनि जटींगा गाम पहुँचलहुँ। ई गाम बोराइल रेंज केर पादगिरि (foothills) पर बसल छैक। ई पहाड़ी तरह-तरहक प्रवासी एवं देशी चिड़ै सबहक विश्राम-स्थली थिकैक। एहि स्थानमे अंग्रेजी मास सितम्बर-अक्टूबरमे चिड़ै सभ अन्हरिया पक्षक रातिमे रोशनीक कोनो स्रोत जेना कि टॉर्च, मशाल आदि देखि झुण्डक-झुण्डमे आबि खसि पड़ैत छैक आ आत्महत्या कऽ लैत छैक। जटींगा गाम हॉफलौंग शहरसँ आठ किलोमीटर केर दूरीपर बसल छैक। लोक सभसँ ज्ञात भेल जे चिड़ै सभ अन्हरिया रातिमे रोशनी देखि झलफलाक खसय लगैत छैक; जकर फायदा उठा कऽ चिड़ैमार सभ बांसक लग्गी अथवा बत्तीसँ चोन्हरायल चिड़ै सभपर प्रहार करय लगैत छैक एवं पकड़ि लैत छैक।

अन्हरिया रातिक संग-संग एक निश्चित वातावरणक भेनाई चिड़ै सबहक सामूहिक आत्महत्याक लेल सेहो कारण बनैत छैक। ई वातावरण छैक हवाक बहबाक दिशा। हवाक दिशा दक्षिण-पश्चिमसँ उत्तर-पूबमे हेबाक चाही। बोराइल पहाड़ीक अगल-बगलमे धूंध आ शीत लागल रहनाई सेहो जरूरी। धूंधमे कनीक झलफलाईत रोशनी हेबाक चाही। एहन स्थितिमे जखन दक्षिण दिशासँ धूँध चलैत छैक तखने चिद्ऐ सभ जटिंगा दिस आगाँ बढ़ैत अछि। सामूहिक आत्महत्या करय बला चिड़ै सभमे लाली चिड़ै (Indian ruddy), कौड़िल्ला (King fisher), भारतीय नौरंग (Indian pitta), हारिल, ब्लैक ड्रोंगो, उजरा बगुला, चितकबरी पौरकी, बटेर आदि प्रमुख छैक।

आश्चर्यक बात ई जे अधिकांश चिड़ै जे कृत्रिम रोशनीक चकाचौंधसँ सामूहिक रूपसँ झुण्डक-झुण्डमे झलफला या चौंधिया कऽ खसैत छैक ओ सभ देशी चिड़ै छैक। प्रवासी चिड़ै सभ संगे ई घटना घटित नहि होइत छैक। स्थानीय लोकसभसँ ईहो पता चलल जे ई प्रवृत्ति समस्त जटींगा पहाड़ीमे नहि भऽ कऽ किछु खास क्षेत्र जे कि मात्र डेढ़ किलोमीटर केर लम्बाई आ २०० मीटर केर चौड़ाईक सीमामे बन्हल छैक।

जटींगा गामक एक पच्चासी बर्षक वृद्ध जे प्नार (खासी) जनजातिक छथि सँ पता चलल जे चिड़ै सबहक जटींगामे कृत्रिम रोशनीसँ सामूहिक आत्महत्याक प्रवृत्ति केर जानकारी सर्वप्रथम १९१४ ई.क आसपास चललैक। भेलैक ई जे एक राति ककरो चारि-पांच बरद जंगल दिस भागि गेलैक। बरदक मालिककेँ भेलैक जे अगर बरदकेँ रातियेमे नहि पकड़ल गेलैक तँ बाघ-शेर सभ खाऽ जेतैक। तञि पाँच आदमी एकटा टोली बना बांसक फट्ठीमे कपड़ा बान्हि ओहिमे मटिया तेल डालि ओकर मशाल बना कऽ तथा हाथमे लालटेन लय बरद सभकेँ ताकक लेल जंगल दिस बिदा भेल। कनीक कालक बाद आश्चर्यजनक ढ़ंगसँ चिड़ै सभ झुण्डमे आबि मशाल लग आबि खसय लगलैक। परन्तु ई लोकनि ओहि चिड़ै सभकेँ नहि पकड़लकैक। यद्यपि ओऽ सभ चिड़ै मांसक प्रयोगमे लाबए जोग रहैक। एकर कारण ई छलैक जे स्थानीय जेमि नागा समुदाय (जनजाति) क लोकक बीच ई भ्रान्ति रहैक जे जटींगा क्षेत्रमे रातिक भूत-प्रेत विचरण चिड़ै बनि करैत रहैत छैक। हुनका लोकनिकेँ तञि डर भेलन्हि जे चिड़ै केँ पकड़लासँ कतहु कोनो अनिष्ट ने भऽ जाए।

१९१७ ई.क आसपास लाखन-सारा नामक एक व्यक्ति कृत्रिम रोशनीसँ झलफलाएल चिड़ै सभकेँ सर्वप्रथम पकड़ि घर अनलाह एवं ओकर मांसकेँ भुजि पका कऽ खयलन्हि। आ ओकर कोनो दुष्प्रभाव हुनका सभकेँ नञि भेलन्हि। एकर बाद चिड़ै सभपर आफत शुरू भऽ गेलैक। लोकसभ अन्हरिया रातिमे कृत्रिम रोशनीक मदतिसँ चिड़ै सभक संहार प्रारम्भ कऽ देलक। हालाँकि जखन अंग्रेज प्रशासनकेँ एहि बातक जानकारी भेटलैक तँ एहि परम्परापर रोक लगा देल गेलैक।

स्वतन्त्रता प्राप्तिक बाद लोक पुनः नुका-चोरा कऽ शिकार करए लगलाह। आब पर्यावरणविद्, पक्षीशास्त्री, पत्रकार एवं अन्य लोकनिक अथक प्रयासक बाद प्रशासन पुनः कृत्रिम रोशनीसँ चिड़ै मारबाक प्रथापर प्रतिबन्ध लगा देलकैक अछि। हम ओहि स्थानपर गेलहुँ। ओतए रंग-बिरंगक चिड़ै सबहक आकर्षक फोटो टांगल रहैक। एक मूल वाक्य नीक लागल। वाक्य ई रहैक: “shoot these birds with your camera, not with bullets:.

घड़ी देखलहुँ तँ साँझ भऽ गेल छल। आब हमरा लोकनि जटींगासँ सोझे सर्किट हाउस आबि गेलहुँ। मुँह हाथ धोलाक बाद कार्यक्रम स्थलीपर पहुँचलहुँ। ओतए पाँच हजार लोक सभ आयल छलाह। सभ जनजाति केर स्त्री-पुरुष, बच्चा सीयान सभ कियो अपन समुदायक परम्परागत रंग-बिरंगक वस्त्र पहिरने सुसज्जित भेल पहुँचल छलाह। प्रशासन केर सहयोग तँ छले। डिप्युटी कमिश्नर, नॉर्थ कछार हिल्स ऑटोनोमस काउन्सिल केर चेअरमेन, सदस्य, प्रमुख सचिव, एस.पी., स्थानीय कॉलेजक शिक्षक एवं छात्र सभ कियो पहुँचल छलाह। स्थानीय पत्रकार सभ सेहो उत्साहित छलाह।

सभ कियो हमरा माध्यमसँ आ गौतम शर्माक माध्यमसँ इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र केर प्रति धन्यवाद दैत छलाह। हम सोचलहुँ जे केहेन विडम्बना छैक। जे क्षेत्र सांस्कृतिक सम्पन्नताक खान थिक ओकर एहेन अपमान! मुख्यधारासँ एहि क्षेत्रकेँ वंचित किएक कएल गेल छैक! हमरा भेल जे समस्त विश्वमे नॉर्थ कछार हिल्ससँ शान्त आर सांस्कृतिक वैविध्यसँ भरल आर कोनो जगह नञि भऽ सकैत अछि। हम अपन भाषणमे बजलहुँ: “हमरा लोकनि अहाँ सभकेँ सिखाबए नहि अएलहुँ अछि। हमरा लोकनि अएलहुँ अछि अहाँ लोकनिकेँ जाग्रत करक हेतु जे अहाँ सभ अपन सांस्कृतिक वैविध्यता तथा गरिमाकेँ बुझू आ एकरा सास्वत राखू। हमरा लोकनि एतए केर सांस्कृतिक विरासतकेँ जानए आ ओकर डॉक्युमेन्टेशन करए आएल छी। अगर अहाँ सबहक सहयोग रहल तँ बेर-बेर आएब। हमर कार्यक्रममे आ एक्शनमे कौमा (,) वा अर्धविराम भऽ सकैत अछि, पूर्ण विराम कखनहुँ नहि हैत”।

लोक सभ हमर बातकेँ सही अर्थमे लेलन्हि। पहिल दिनक कार्यक्रम लगभग साढ़े-नौ बजे राति धरि चललैक।

जखन रातिमे भोजनक उपरान्त विश्राम करए गेलहुँ तँ एक आदमीक देल एक पुस्तक पढ़य लगलहुँ। पुस्तक नॉर्थ कछार हिल्सपर छलैक। ओहि पोथीमे रातु हकमओसा नामक स्थानीय कविकेँ नॉर्थ कछार हिल्सपर लिखल किछु पंक्ति बड्ड उपयुक्त बुझना गेल: पंक्ति यथावत अंग्रेजीमे पाठक लेल लिखि रहल छी:

A harmonious game of hide and seek

Behind the bushes, marshy meadow

Under shadow with clouds view,

Ever ready for worthwhile, cherish at dawn,

The blues make enchanting heart of lovers

Midst of covers white

Changing scene that lively for romance

Beauty and bounty of brooks that flow.

Moments of joy, love to cherish

Insight the harmony game of hide and seek

Behind thick trespasses of white and blue

With narrow path of zig-zag.

The beauty of hills under cover

Orchids, white fall, violet at hills

Every moment thrilled with behalf

Nature disposal at North Cachar Hills


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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

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