Friday, May 08, 2009

महेश मिश्र “विभूति”

महेश मिश्र विभूति (१९४३- )

पटेगना, अररिया, बिहार। पिता स्व. जलधर मिश्र, शिक्षा-स्नातक, अवकाश प्राप्त शिक्षक।


पन्थीसँ

 

तनिक विलमिके सुनिली पन्थी,

अविलम पहुँचब गेहे।

तरुणाईमे कथिक अपेक्षा,

जतबा कहब, बुझब सब नेहे॥

 

अहाँ पन्थी! पथिक बनिकेँ,

जा रहल छी बाटमे।

दृश्य अगणित देखब पन्थी,

भ्रमब नहि जग-हाटमे॥

 

आओत बाढ़ि जे स्नेह-सलिलकेँ,

शपथ, सबल पग राखब।

दुर्बलता जँ व्यापत किञ्चित,

कहू! कोना जल थाहब॥

 

बिनु जल भवसागर की नदिया,

दहब-भसब नहिं बाबू।

दृढ़-सङ्कल्प पतवार पकड़िकेँ,

राखब मन पर काबू॥

 

होयत हँसारति भरि जगमे,

जँ, बुड़ि जाओत नौका।

अस्तु, सोचब गृद्ध दृष्टि लऽ,

नहिं आओत फेर मौका॥

 

पुनः कतबा कहब बाबू?

शुभकामना अछि संगमे।

सफल होऊ , सुफल पाऊ,

शुभ रंग आनू रङ्गमे॥

 

अहाँ पायब सुयश जगमे,

पुलकि पुलकत गात मम्।

पूर्ण पूनम सम जँ देखब,

परम आनन्दित होयब हम॥

 

अछि निवेदन ईशसँ,

सद्बुद्धि दैथि सुजान केँ।

बड़ आश अछि पंथी अहाँसँ,

करहु मुकलित प्राणकेँ॥

सन्तोष (०६.०२.६५)

 

सन्तोष सरितमे नित नहाय,

बल्कल पहिरी तँ लाज न हो।

बेदाग होय कर्तव्य करी,

हाथी नवीश सँ काज न हो॥

 

कहू! व्यर्थ झगड़िके धन अरजी,

सत् कर्म बिना सब काज हो।

एक दिन बिन कैंचाके जगसँ,

प्रस्थान करू, तँ लाज न हो॥

 

भऽ जाय फकीरी ओहिसँ की?

मस्तक ऊँचा सदिकाल रहे।

कहू? भला वो अमीरी की,

लानत जेहि पर कङ्गाल कहे॥

 

भऽ जाय अमीरी वोहिसँ की?

सत् कीर्ति समुज्ज्वल कर्म करू,

निशि दिन सद्भाव निबाहू जँ।

भगवान् भला करता निश्चय,

कहियौन हुनकहि, नहिं काहूसँ॥

 

हुनकर लीला अनदेखल अछि,

फल प्राप्त करै छथि विश्वासी।

सुनितहुँ छथि सबहक परमप्रभु,

कारण; वो छथि घट-घट वासी॥

 

उद् बोधन : ढाढ़स (३१.०७.६३)

 

मत होउ निराश एक झटका पर,

नित कर्मक ध्यान धरू मनमे।

दुनियाँमे एहिना होइतैं छै,

ई सोचि पुनः उतरू रनमे॥

बहुतोंके एहिना मेल एतऽ,

किन्तु; की साहस छोड़ि देलक।?

साहस थीक सम्बल आशाके,

जगमे हारल पुनि लाहु लेलक॥

नभमे देखू वो चन्दाके,

जे पूर्ण विकासक क्रमपर अछि।

एक दिन पूनम परिपूरित भऽ,

पुनि ग्रास ह्रास भऽ जाइत अछि॥

 

नयन निहारि निरखू जगके,

के रहल समान निशि दिन जगमे।?

उत्थान-पतन क्रम कर्मक अछि,

निर्भीक बनूँ, बिचरू महमे॥

 

जी तोड़ि परिश्रम करथि कोय,

फल नीक नाहिं, तँ दोष कोन।

विधना के एहिना लीला छन्हि,

तँ, एकरामे किनको दोष कोन॥?

 

बड़ आश केलहुँ शुभ आशाके,

सम्भव केलहुँ नहिं काज कोन।

फलदाता दरजल नाहिं यदि,

तँ, एकरामे किनको लाज कोन॥?

 

भेटत ओतवहि, जे लिखल अछि,

पाथर परके रेखा बुझियौ।

कर्तव्य करू नित निकक हित,

भेटत निश्चय, भागक लेखा बुझियौ॥

 

श्रम-साध्य मजूरी भेटतैं छै,

ई शास्त्र-पुराण, सुधि जन कहि गेल।

औकतेलासँ भट्टा पाकयऽ?

ई कथ्य युगाब्दक रहि गेल॥

 

वोपदेव इतिहास-पुरुष,

अमर लेख्य पाणिनी तिनकर।

धीर धैर्य धारण करियौ,

यथा भाग भावी जिनकर॥

 

पाण्डव के राज भेटल छीनल,

नल दमयन्तीके याद करू।

सिंहासनारुढ़ सियावर भेला,

वसुदेव कोना आजाद करू॥

 

मधुर स्वप्न (०७.११.६२, रवि श्री विजयादशमी)

 

मधुर स्वप्न की देख रहल छी,

दत्यतासँ सँदूर भऽ के।

चिरनिशा के गर्भमे,

तल्लीनतासँ निकट भऽ के॥

 

दुक्खसँ जँ दूर छी तँ,

कहू कोन उपचार हो।

मूक मुद्रा एना कऽ के,

अति दुःखक नेँ विस्तार हो॥

 

या कहू अन्तर्निहित,

दुःखसँ दुःखी छी मनहि-मन,

से कहू सङ्कोच तजि के,

की स्वप्न देखब छनहि-छन॥

 

मौन रहला पर कोना के,

बुझि सकत पर वेदना।

वेदना के व्यक्त कऽ के,

छाड़ि दी निज कल्पना॥

 

मधुर स्वप्नक की महत्ता,

कहि दियऽ दू शब्दमे।

हम भ्रमित छी दशा लखिके,

किछु कहू, किछु शब्दमे॥?

 

या कहू किछु विसरि गेने छी,

अहाँ निज ख्यालसँ।

मधुर स्वप्नक ज्वलित ज्वाला,

त्यागि दी अन्तरालसँ॥

 

सजनि! पता दी अपन क्लेशक,

विषम वेदना मानस के।

वा बहु भाँति व्यथित छी अपने,

हृदयान्तर्गत तामस से॥

 

कोना वेदना उमड़ल अछि जे,

अगम-अथाह, पता नहिं आय।

अतिशय क्लेशक दुःसह भारसँ,

दबयित छी दयनीय भऽ हाय॥

 

कहू-कहू! मानस के ओझरी,

मधुर स्वप्न के त्यागू आय।

मधुर यदि दुःखदाई हो,

तुरत त्यागी, कथमपि नहिं खाय॥

 

अहाँ बेसुधि, हम ससुधि भऽ

कोना जीवन-रथ चलत।

सामंजस्यानन्दक प्रयोजन,

जीवनक रथ अथ चलत॥

 

सिन्दूर-दानक गीत: “अनुरोध” (१४.०५.६३, सोम)

 

“प्रिय पाहुन सिन्दूर-दान करू”

 

सुन्दर सरस समय शुभ सरसल, सिन्दूर हाथ धरू।

उषा निहारथि कमल हस्तके, अविलम कर्म करू॥...॥

नव निर्मित नगरीमे सिञ्चित किञ्चित ख्याल करू।

विलम छाड़ि, सिन्दुर लऽ करमे, हिय प्रभुनाम धरू॥...॥

दर्शक सब व्याकुल होय निरखय, स्वातीक जल बरसू।

नवजीवनके सृजन करथि प्रभु कर्मक ध्यान धरू॥...॥

कबलौं प्रभु अनुरोध करायब शुभ-शुभ कर्म करू।

मनःपूत मनसाके कऽ के, भवनदमे विहरू॥...॥

शुभ शङ्कर-गौरी मैयाके शुभाशीष हिय मध्य धरू।

विनय “विभूति”क एतवहि प्रभुसँ, युगल जगत् विचरू॥...॥

 

बादरीक आगमन (२६.०५.६३)

 

“नभमण्डलमे पवनक रथपर, कारी-कारी बादरि आयल”।

बिजुरि छटकै, ठनका ठनकै, देखि-सुनि जनमन खूब डेरायल॥

चहु दिशि उमड़ल कारी बादरी, बादरि आबिके जल बरसायल।

प्रलयनाद मेघक सुनि-सुनि, वृद्ध जनी सब नेनहिं नुकायल॥

हकरै बालक वृद्ध जनी सब, लोक कहै सब माल हेरायल।

बाँस-आम गीरल अनगिनती, क्यो कहै हमरो महिंस हेरायल॥

लोक कहै बहु भाँति मनोदुःख, प्रिया कहै मोर प्रिय नहिं आयल।

कामिनी कलपथि, प्रिय नहिं गृह छथि, विजुरिक धुनि-सुनि जियरा डेरायल॥

रोर मचल अछि चहु दिशि जन-जन, एतबहिमे अति जल झहरायल।

त्रिषित भूमि “विभूति”मय भेली, तरु-तृण वो जन-मन हरसायल॥

 

जगक प्रमान (०९.०६.६३)

 

डोली उठल बिन खोलीके दुवारसँ,

घुरि नहिं आओत, प्रमान हे।

 

काँच कचम्बा काटि कुढ़ावोल,

उघल सबटा सामान हे॥

 

श्वेत वस्त्रसँ मृतक सजाओल,

नित प्रति होत जहान हे।

 

अचरज के नेँ बात बुझि ई,

ई थिक ध्रुवक समान हे॥

 

चारि जने मिलि कान्ह लगाओल

गमन करत शमशान हे।

पुत्र-प्रणय के परिचय देता,

करता अग्निक दान हे॥

 

सच् होय अछि “पुत्रार्थे भार्या”

होय छथि पुत्र महान् हे।

 

कहथि “विभूति” बनब विभूति,

एहि थिक जगक प्रमान हे॥

 

“अपटुडेट बलिष्ठ युवकसँ” (१५.१२.१९६२)

 

करू किछु काज बाबू औ,

रतन धन आय पौने छी।

धरा पर अवतरित भऽ के,

एना की मन गमौने छी॥?

 

करू उत्साह किछु मनमे,

चलू सन्मार्गपर निशि-दिन।

चुकाऊ कर्ज माताके-

जे भेटल अछि अहाँके रिन॥

 

बढ़ाऊ डेगके आगू,

समय तँ कटि रहल अछि औ।

पुनः ऋण बढ़ि रहल अछि जे,

सधाउ आय, नेँ राखू शेष तनिको औ॥

 

पड़ल माता कराहति छथि,

दया के बेच देने छी।

तनिक तँ लाज राखू जे,

एना की मन गमौने छी॥?

 

सुयश पायब समाजीसँ,

धवल यश देश व्यापी औ।

पिता-माता सुकीरति लहि,

अभय वरदान देता औ॥

 

“अनुरोध” (२८.०९.१९६२)

 

की कहू? कहलो नेँ जाय अछि,

हिय व्यथित, वाणी सबल नहिं,

बुद्धि व्याकुल, व्याल चहु दिश

ज्वाल ऊरमे बढ़ि रहल अछि।

की कहू? कहलो नेँ जाय अछि॥

 

दशा पातर, हाल दयनीय,

आननक सुकुमारताके।

मौन शब्दातीत मुद्रा;-

से हृदयमे चुभि रहल अछि।

की कहू? कहलो नेँ जाय अछि॥

 

प्राण आकुल, विकल की छी,

व्यथा-ज्वालमे जरि रहल छी,

शूल बज्रक पतित नगसँ

बमरि-झहरिके खसि रहल अछि!

की कहू कहलो नेँ जाय अछि॥

 

हृदय दारुण दुःख सहिके,

मात्र प्राणे शेष बाँचल।

एना विह्वल हाल कऽ के,

व्यथा द्विगुणित दऽ रहल छी॥

की कहू? कहलो नेँ जाय अछि॥

 

चन्द्रमुख-मण्डल सुलोचन,

कच-विकच बेहाल की अछि।

वेदनासँ व्यथित भऽ के,

व्यथित अनका कऽ रहल छी।।

की कहू? कहलो नेँ जाय अछि॥

 

बस आश एक, अनुरोध केवल,

मधु-मधुर मुस्कान के।

हेरि चानक स्वच्छ आभा,

करु मुकुल, विकसित प्राण के॥

 

पुनः मञ्जुल मृदुलाअ के,

हेतु अनुरोधी बनल छी।

मानिनी भऽ मान राखू,

दशा लखि के अति विकल छी॥


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