Sunday, May 24, 2009

ताजमहल-कांचीनाथ झा ‘किरण’







भारतवर्षक महाराज
विश्वविख्यात बल-बिक्रम धन-धर्म
पाण्डव लोकनिक इन्द्रप्रस्थसँ पूर्ब
जै कृष्णक ज्ञान कीर्तिकें देखि
अइ देशक विशाल जनसमुदाय
हुनका मानि लेलक
योगिराज, परमेश्वरक पूर्णावतार
तनिकर मथरहुसँ आगू बढ़ि
आर्यावर्तक हियप्रदेशमे,
जै जमुनाक तीरके देखितहि
मन पड़ि अबैत छै
भगवत गीता केर प्रणयिता कृष्णक बाल विलास
गोप-गोपिका केर संगमे निश्छल खेल विलास
तही जमुना तीरक करेज पर ठाढ़
रे ताजमहल तो की थिके

जकर कोखि
हँटा हिन्दू ललना योधाबाइक शोषित केर प्रभाव
जनमौलक बाप भाइ केर घातक
अगणित मन्दिर-मूर्ति विध्वंसक
भारतभूमिक औरस पुत्रा हिन्दू जातिक द्वेषी
औरंगजेबके
तै मुमताजक गोरिक ऊपर ठाढ़
माथ उठौने सीना तनने खलखल हँसैत
रे ताजमहल तो की थिके?

दूधक समान उज्जर दप-दप
एत्तेक रास शंखमरमर पाथर
ताकि ताकि अनबामे
कते ने नरनारी
बौआइत अपसियाँत होइत
भूख-पियासेॅं व्याकुल तनमन
मरि गेल हएत सोनित बोकरि
कत्ते ने मोती डाहल गेल हएत!
देसक धन-जन मेहनति केर मेघसँ
बनल कलेवर
रे ताजमहल तोॅं की थिकेॅं?

की मुमताजक प्रबल प्रेमवस
साहजहाँ
बताह छल भ’ गेल?
नहि नहि
प्रेम बना दैत अछि मानव मनके
कोमल मधुमय
तैं ने, अनको नेनाकेर
हँसैत मुँहमे दनुफ फूल सन दुद्धा दाँत
देखि, फलकि उठै छै सन्ततिबानक हिरदय?
बताह थिक ओ, जे कहैत अछि तोरा
साहजहाँ केर मुमताजक प्रति दिव्य प्रेम साकार
जँ साहजहाँके मुमताजक
अतिसय पे्रम छलैक
तँ कोना क’ सहलक ओकर मरण आघात?
की देखैक निमित्त बूढ़ रहितहुँ
काराघरमे बन्द
बेटा सबहक मरण देखैत-सुनैत
रहल ओ जीबैत?

निश्चय ओकर हृदयक भीतर
नुकाएल, कोनो अभिलाषा
छल पूर्ण होइत औरंगजेब केर हाथेॅं।
तोहर छलसँ साहजहाँ
अपन जातिकें देने छल उपदेश जे
हिन्दू सभके नहि छै पौरुख ओ अभिमान
राजनीति केर ज्ञान

दै अछि बेटी-बहिन बिआहि मुसलमान केर संग।
किन्तु अपने हिन्दूए अछि बनल रहैत
मोगल समराटक सार ससुर बनि
निसकंटक निश्चिन्त मने अछि राज कैत।
हमर पितामह अकबर छला परम बुधिआर
तहिया हिन्दू केर सहयोग बिना
टिकि न सकै छल साम्राज्य हुनक
ते हिन्दूक बेटीक संग कएल विवाह
मुदा ते छोड़ल की अप्पन मुसलिम धर्म?
हिन्दू मुसलिम केर एकता
हुनकर जँ रहितए लक्ष्य हृदयसँ
तँ स्वयं हिन्दूए बनि जैतथि!
अथवा
भारत भू पर के छल एहन मुसलमान सरगना
जे करितनि विद्रोह?
विद्रोह केनहि की होइतैक?
किऐ न रखलनि नाम
अप्पन बेटा केर
विश्वनाथ?
जगदीश?
हिन्दूके परतारैक लेल
चलौलनि-दीनइलाही नामक
अभिनव धर्म।
पहिरैत छला हिन्दू केर पोशाक
हुनक नीति केर
आब न रहल प्रयोजन।
तैं जोधाबाइक सन्तति रहितहुँ
हम बिआहल मुमताजहिकेॅं।
तीर्थों सभसँ बढ़ि तीर्थ
कृष्णक प्रिय जमुना तट पर
क’ तोहर निर्माण
साहजहाँ अपन पुत्राकेॅं देलक
मन्दिर पर मसजिद बनबैक इसारा
मानव-हृदयक परिचय
ओकर बेटाक काजसँ पाबैक थिक
ई अनुभव अछि बहुत पुरान
औरंगजेबक छल साहजहाँ केर
मनोभाव साकार।

के कहि सकैत अछि
कोन देशमे कहिया
जनमि सकै अछि लोक केहन?
भारत भूमिक मूल निवासी केर सन्ततिमे
आबि सकै छै पौरुख ओ अभिमान
अप्पन पुरुखा केर पराभव झाँपै खातिर
तोड़ि सकै अछि विजेताक स्मारक गढ़, भवन, महल
तैं रे ताजमहल
तोरा बनौलक एत्ते सुन्दर
सम्भव थिक जे तोहर सुनरता देखि
वीर केर हाथ ढील भ’ जाइक
देखि तोहर रूप
भ’ उठए मुग्ध।
मनमे आबि जाइक कलाकार केर हस्त-चातुरी
साहजहाँ केर मुमताजक प्रति प्रेम
मुमताजक सुन्दर सुकुमार शरीर
तँ हाथक तरुआरि
चल जाएत अपनहि मियानमे।
सुन्दरतामे लुबुधुल मानब होइत अछि मौगियाह
तैं रे ताजमहल
तों थिके
मुगल विदेशी बादसाह साहजहाँ केर
प्रभुता-वैभव-नीति निपुणता
हिन्दू जातिक पौरुख ओ अभिमानहीनता
नीतिशून्यता, बुद्धि विकलता
परिभवमय इतिहासपूर्णता केर साक्षी साकार।

2 comments:

  1. neeka laagala kiraNajeeka kavitaa

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  2. कविता पढ़ि
    केओ नीक भविष्यक आस मे
    तीक्ष्ण इतिहासक विध्वंस लेल
    भऽ सकैत अछि उताहुल
    तिरॊहित भऽ सकैत छैक
    ओकरा पर थॊपल-पॊसल संस्कारक मॊलम्मा

    एकटा नीक कविताक प्रस्तुति लेल शुभकामना आ धन्यवाद दैत छिएह्नि
    जितेन्द्र झाजी केँ
    जानकी क आँचरक छाया मे
    जीवैत लॊके केँ
    सदिखन एहन विचार उद्वेलित-प्रभावित करैत रहतै

    ReplyDelete

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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

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