Tuesday, May 12, 2009

सोनाक पिजरा

सोनाक पिजरा
खौंइछा मे ल’ क’ दूभि धान।
पेटी, पेटार, पौती, समान।
जा रहल आइ छी सासुर हम
अछि कोना अपन लेए बेकल प्राण।

हमरा बिनु माय कोना रहतै।
बाबू केर सेवा के करतै।
नीपत चिनबार कोना भोरे
जाड़क कनकन्नी सँ मरतैं।

अछि केहन देवता के बिधान।
ल’ कोना जाइत अछि संग आन।
एखने उतरल छल साँझ पहिल
भ’ कोना गेल एखने विहान।

छल केहन अबोधक नीक खेल।
कनियाँ पुतरा मे मग्न भेल।
आमक टिकुला लय दौड़ि गेलहुँ
अन्हर बिहारि मे सुन्न भेल।

कखनो फूलक बनि रहल हार।
ल’ एलहुँ बीछि क’ सिंगरहार।
झूठक पूजा, माटिक प्रसाद
भरि गाम टोल देलहुँ हकार।

जे भेल मोन मे केलहुँ बात।
के रोकत जखने भेल प्रात।
भरि खौंछि तोड़ि क’ भागि एलहुँ
ककरो खेतक किछु साग पात।

ई समय कोना क’ बढ़ल गेल।
रहलहुँ हम सूतल निन्न भेल।
नहि भान भेल कहिया अपने
जीवन ओरिया क’ ससरि गेल।

बाबू सँ मा किछु केलक बात।
निशब्द इशारा उठा हाथ।
ल’ अनलथि जा क’ पिया हमर
ललका सिन्दुर पड़ि गेल माथ।

देखलहुँ पाहुन छथि अनचिन्हार।
निशिभाग राति सगरो अन्हार।
भेटल किछु नव श्पर्श पहिल
मन बहकि गेल उतरल श्रृंगार।

किछु सत्य भेल मोनक सपना।
भेटल मुँह बजना मे गहना।
हमहूँ देलियन्हि सर्वस्व दान
ई मोन हृदय जे छल अपना।

अछि केहन विवाहक ई बंधन।
स्नेहक संबंध बनल प्रतिक्षण।
अपरिचित दू टा चलल संग
विश्वासक बान्हल डोर केहन।

संगी साथी सभटा छूटल।
की बिसरि सकब जीवन बीतल।
ओ घर द्वारि आँगन दलान
सभ सँ छल स्नेह कोना टूटल।

कनिते कनिते औरियौन भेल।
पाहुन संग हमर चुमौन भेल।
भगबती घ’र सँ बिदा होइत
दू टा कहुना समदौन भेल।

दृग जल सँ गंगा उतरि गेल।
ममता विधान सँ हारि गेल।
बाबू दलान पर रहथि ठाढ़
मा ओलती मे निष्प्राण भेल।

खोंता मे पक्षी सिहरि गेल।
दाना अहार छल बिसरि गेल।
स्तब्ध भेल छल गाछ पात
पछबा बसात छल द्रवित भेल।

भारक समान किछु छल राखल।
भरि गाँव टोल सौसे कानल।
गामक सीमान धरि बहिना सभ
दौड़ल बताह भ’ छल कानल।

हम प्रात पहुँचलहुँ हुनक गाम।
जे अछि नारी केर स्वर्ग धाम।
नहि रहल एतय पहिलुक परिचय
भेटल हुनके सँ अपन नाम।

कोबर मे बैसल छी अनाथ।
राखथि जे बुझि क’ प्राण नाथ।
क’ देलक बिदा जखने परिजन
दुख केर कहबै किछु कोना बात।

बान्हल चैकठि सँ आब रहब।
दुख सुख कहुना अपने भोगब।
नैहरि सासुर केर मान लेल
कर्तव्यक सभ निर्वहन करब।

अछि उजड़ि गेल ओ पहिल वास।
भेटल अछि सोना कें निवास।
टुटि गेल पांखि, अछि भरल आँखि
पिजरा सँ की देखू अकाश।

3 comments:

  1. Rama Jha10:49 PM

    बहुत नीक भावनाक अभिव्यक्ति।

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  2. स्त्रीक मनोविज्ञान पर आधारित अहाँक कविता सभक कोनो जोड़ नहि।
    महिला 20-25 साल धरि एक परिवारमे रहैत छथि आ फेर एकटा दोसर परिवारक अंग बनि जाइत छथि आ ओतबे तन्मयतासँ कार्य करैत छथि जतेक आन पुरान सदस्य। ई कविता पढ़ि ओहि सभ आ आर बहुत रास, मारते रास घटना सभ मोन पाड्क्ष्ि दैत छी अहाँ। कविक कल्पना यथार्थेपर तँ आधारित रहैत अछि।

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  3. मनीष गौतम2:14 AM

    बड्ड नीक श्रीमान, भावना सँ ओतप्रोत अछि अहाँक कवि मन।

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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

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