Friday, May 08, 2009

कुमार मनोज कश्यप

कुमार मनोज कश्यप

जन्‌म : १९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाममे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखनमे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रिय सचिवालयमे अनुभाग अधिकारी पद पर पदस्थापित।सम्‍पादक


हारल मनुक्ख

बरी काल सँ प्रतीक्षा कऽ रहल छलहु बसए के। गामक कोनो बस आबिये नहिं रहल छलै। एक तऽ प्रतीक्षा ओहिना कष्टप्रद, तहु मे जेठक दुपहरिया मे। रौद आ पब्लिक ट्रांसपोर्टक स्थिति ---- खिन्न भऽ गेल मोन। समय बितेबाक आर कोनो साधन नहिं देखि, मोन नहिंयो रहैत ठंढा पिबाक लेल बढि गेलहु सामने के रेस्टोरेंट दिस -- छाँह तऽ भेटबे करत, सँगहि प्रतीक्षा के घड़ी सेहो बितत। बस एबा मे एखन आधा घंटा सँ कम समय नहिंये लगतैक।

रेस्टोरेंट के तजबीज करैत आगू बढल जाईत छलहुँ कि केयो रस्ता रोकलक - जिर्ण, मलिन, बृद्ध नहिंयो रहैत बृद्ध सन - लाठी लेने '' भैया! दू रुपैया हुअय तऽ दऽ दियऽ, ट्रेकर पकड़ि गाम चल जायब। पायरे नहिं गेल भऽ रहल आछ ।'' आबाज मे एकटा संकोचक सँग दयनियता साफ झलकैत छलैक । तखने हमरा आगू मे नाचि गेल भीख माँगबाक नव-नव ढ़ब़ मोन परऽ लागल पढ़ल आ सुनल खिस्सा सभ जे कोना लोक ठका गेल ई सभ ढ़ब पऱ। ओकर याचना के अनसुना करैत हम बढ़ि गेलहुँ रेस्टोरेंट दिस ।

बस अयला पर ख़िडकी कात सीट पर बैसि सुभ्यस्त भेलहुँ। कने काल मे बस चलि पड़ल। रस्ता कात मे सहसा ककरो पर नजरि पड़ि गेल़ चौंकलहुँ - 'ई वैह आदमी तऽ नहिं जे हमरा सँ दू रुपैया मँगैत छल?' दिमाग पर जोर देलहुँ हँ ई तऽ वैह आदमी आछ़़क़हुना- कहुना कऽ डेग बढबैत लगभग घिसियैत जँका --चलल जा रहल आछ गंतव्य दिस। ई दृश्य हमरा विचलित करऽ लागल़ हमर अंतरात्मा कचोटि उठल - 'दू रुपैया! मात्र दू रुपैयाक लेल बीमार - असक्क के पायरे जाय पड़ि रहल छैक आ तों मोन नहियो रहैत दस रुपैया ठंढा पी कऽ बर्बाद कऽ देलह! धिक्कार एहन मनुष्यता के!' अपराध बोध सँ हम आकाश दिस देखैत ओकर शून्यता मे विलिन भेल जा रहल छी। 

थाकल बाट

''सर, हमर मीटरक फाईल कहाँ तक पहुचलई?''

''उपर सँ नहि लौटलै''-बिजली ऑफिसक कर्मचरीक ई चिरपरिचित उत्तर फेर हमर कानमे गेल। उत्तर जेना स्टीरियोटाईप, प्री-रिकोर्डेड, बिना कोनो जाच-पड़ताल, नाम-पता पुछने, पेकल सन। १५ दिन भऽ गेल बिजली ऑफिसक चक्कर लगबैत आ यैह उत्तर सुनैत ।

''अरे ई सभ बड घाघ होईत छई। बिना 'सेवा' के किछु नहि हेतौक। परेशानी सँ बँचैक छहु तऽ सेवा करहि परतौ'' - अपन मित्र प्रभासक ई सलाह कचोटैतो मोन सँ मानहिं परल -विवसतामे। आखिर नोकरी छोड़ि कतेक दिन दौरैत रहब - अनायास, अनर्थक, आश्रत़।

बिजली विभागक कर्मचारी 'सेवा' पबिते झट् दऽ हमरा आदेश-पत्र थम्हा देलक। जेना ओकरा सँपौती अबैत होईक- हमर मोनक आशय ओ पहिने बुझि गेल हो आ आदेश पहिने सँ तैयार रखने हो- हमरा देबाक हेतु। कायल भेलहुँ हम 'सेवा' महिमा सँ। विजयी भाव सँ आदेश-पत्र केँ देखैत हम बाहर निकलि रहल छलहु कि नजरि परल कातमे लटकल बोर्ड पर जाहि पर मोंट आखरमे लिखल छलै -''रिश्वत लेना एवं देना जुर्म है।'' भने लोक पानक पीक फेकि विकृत कऽ देने छलै ओकरा। उपयुक्त चिज उपयुत्त जगह रहक चाही। रस्तामे फेकना भेटल बड़का लग्गा सँ बिजलीक तारमे टोका फंसबैत। हमरा देख कऽ मुस्कियायल ओऽ। लागल जेना हमर मुँह दुसि रहल हो।

भावना

जेठ महिना मे तऽ सूरज जेना भोरे सँ आगि उगलऽ लगैत छैक। दुपहरिया तक तऽ वातावरण ओहिना जेना लोहा गलाबऽ बला भट्ठी। छुट्टी के दिन रह्ने भोर मे देरिये सँ उठलंहु; साईत तहु द्वारे कनिया भानस करबा मे अलसा रहल छलीह। अंततोगत्वा निर्णय भेल - भोजन बाहरे कएल जाय।

घर सँ बाहर निकललहुँ। बाहर एकदम सुनसान - एक्का दुक्का लोक चलैत - सेहो साईत मजबूरीये मे। कियैक निकलत केयो घर सँ एहन समय मे? एहन रौद मे निकलनाई कोनो सजा सँ कम थोड़बे छैक। बड़ मसकत्ति के बाद एक टा रिक्सावला तैयार भेल लऽ जेबाक हेतु। रिक्सावला कि - अधबेसु, कृशकाय, हँपैत़। रेस्टोरेंट पँहुचि भाड़ा पुछलियै। कहलक दस रुपैया। कनिया लड़ि पड़ली ओकरा सँ -''पांच रुपैया के दस रुपैया मंगैत छैंह! हमरा सभ कें बाहरी बुझैत छैं कि? ठक्क नहिंतन! एना जबर्दस्ती सँ बढिया होयतौक जे पौकेट सँ पाई निकालि ले। बजबियौ पुलिस के?'' बेचारा रिक्सावला घबड़ा गेल। पसेना सँ मैल-चिक्कट भेल गमछा सँ अपन मुंह पोछैत, बिना किछु बजने पांचक सिक्का लऽ कऽ चलि गेल बिना किछु बजने़ निरीह।

रेस्टोरेंट मे भोजनोपरांत हमरा दस रुपैया टीप के रुप मे छोड़ैत देखि कनिया बजलिह - '' अपना स्टेटस के तऽ कम-सँ-कम ध्यान राखू। की दसे रुपैया दैत छियई - पाछाँ सँ गरियाओत'' एतबा कहि झट सँ पचासक नोट बिल-फोल्डर मे छोड़ैत हमरा चलबाक ईसारा केलनि। आकस्मात हमरा आंखिक आगाँ रिक्सावलाक चेहरा मूर्तिमान भऽ उठल। तुलना करऽ लगलँह - रेस्टोरेंटक वेटर आ रिक्सावला मे - एकटा वातनुवूलित कक्ष मे भोजन परसैत आ दोसर रौद मे कोंढँ तोरैत। भवनाक अंतर सँ सिहरि उठलँहु हम।

बी०डी०ओ०

ओकर असली नाम की छलैक से तऽ नहिं कहि; मुदा हम सभ ओकरा 'माने' कहि कऽ बजबैत छलियैक। कारण, ओ बात-बात पर 'माने' शब्दक प्रयोग करैत छलीह। से 'माने' ओकर नामे पड़ि गेलई भरि गामक लोक लै। बाल-विधवा, संतानहीन 'माने' हमर घरक सदस्या जकाँ छलीह। हमरा बाद मे बुझवा मे आयल जे 'माने' हमरा ओहिठाम काज करैत छलीह। बृद्धावस्था के कारणे आब काज तऽ नहिंये कऽ सकैत छलीह; हँ दोसर नोकर-चाकर पर मुस्तैद भऽ काज धरि अवश्य करबैत छलीह। 

प्रधान मंत्रीक मधुबनी आगमन के लऽ कऽ लोक मे बेसी उल्लास आ उत्साह छलैक, सभ साक्षात दर्शनक पूण्य उठाबऽ चाहि रहल छल। लोकक एहि ईच्छा के पुरा करबा मे सहयोग दऽ रहल छलाह पार्टी कार्यकर्ता लोकनि जे बेसी-सँ-बेसी लोक के जुटा अपन शक्ति प्रदर्शन करबा लेल मुपत्त सवारी के व्यवस्था केने छलाह। हम मजाक मे 'माने' सँ पुछलियै- '' प्रधान मंत्री मधुबनी मे आबि रहल छथिन। अपन गामक सभ केयो जा रहल अछि देखऽ। अहाँ नहि जायब?''

''के अबैत छथिन?''-माने पुछलनि।

''प्रधान मंत्री।''-हम उत्तर देलियै।

''धुर! ओ कोनो बी०डी०ओ० छथिन जे 'बिरधा-पेलसुम' (वृद्धावस्था पेंसन) देताह। हम अनेरे की देखऽ जाऊ हुनका ?''

हम अवाक रहि गेलंहु माने के उत्तर सँ।

नव-वर्ष

शहरी संस्कृति मे नव-वर्षक बड़ महत्त्व भऽ गेलैक आछ। चारु कात उल्लास, आनंद़ कोनो पाबनि-त्योहार सँ बेसिये। लोक पुरनका बितल साल सँ पिण्ड छोड़ा नवका साल केँ स्वागत करय मे बेहाल़ एहि मे केयो ककरो सँ पाछाँ नहिं रहऽ चाहैछ । धूम-धड़्‌क्का, नाच-गाऩ आई जकरा जे मोन मे आबय कऽ रहल अछि नया सालक स्वागत मोन सँ कऽ रहल आछ । मुदा सब केयो थोड़बे?

शहरक एहि उल्लास के नहि बुझि पाबि; सुकना के सात सालक बेटा पुछिये देलकै ओकरा सँ -'' बाबू, आई कि छियै जे लोक एना कऽ रहल आछ?'' 

''बाऊ, पैघ लोक सभक नया साल आई सँ शुरु भऽ रहल छै; तैं सभ पाबनि मना रहल आछ।''- बाल-मन कें बुझेबाक प्रयास केलक सुकना।

चोट्टहि प्रश्र्नक झड़ी लगा देने छलई छौंड़ा - ''हम सभ नया साल कियैक नहिं मनबैत छी ? हमरा सभक नया साल कहिया एतैक? हम सभ कहिया मनेबई नया साल?''

सुकना एहि अबोध कें कोना बुझबौक जे गरीबक कोनो साल नया नहिं होईत छैक। बोनिहारक सभ सांझ नया साल आ सभ भिनसर पुरान साल जकाँ होईत छैक। बोनिहारी भेटलई तऽ नूने-रोटी सही, परिवारक सभ व्यत्तिक पेट भरलैक ; नहि तऽ भुखले रहि गेल सभ गोटे। एना मे कोन सीमा-रेखा मजूरक लेल नया आ पुरानक भऽ सकैछ़ ज़ँ भऽ सकैछ तऽ एक मात्र मजूरी भेटब़ भेट गेल तऽ नया सालक खुशी; नहि भेटल तऽ पुरान साल सन दुख़ तै सभ सांझ नया साल आ सभ भिनसर पुरान साल।

बाप-बेटा दुनू चुप एक दोसराक मुँह देखि रहल छल़ साईत आँखि आँखिक भाषा बूझि गेल छलैक।

गजल

धज्जी रातुक श्याह आँचर मे, अहल भोर के ताकि रहल छि।

अपन आंगन मे ठाढ़ हम, आई अपने घर के ताकि रहल छि ।

आहत मोनक घायल तड़पन, पेरो आई कनाबऽ आयल।

जतऽ जलन के पीड़ा कम हो, ओहन छाँह के ताकि रहल छी।

दोसरा कें कि दोष देबई हम, अपनो सभ तऽ अंठिये बनला ।

याद ने कोनो बाँचल रहि जाय, ओहन ठौर के ताकि रहल छी।

बगबाहो अपनहिं हाथें, आई कलम-बाग सभ जारऽ आयल।

तड़पन जतऽ तड़पि रहि जायत, ओहने कहर के ताकि रहल छि।

बिसरि गेल जे याद छलै, से सपना कियैक याद दियौलक?

नोर ने ढ़रकय जाहि पलक सँ, एहन आँखि के ताकि रहल छि।

निकलि गेलहुँ अछि सुन्न राह पर, अन्हारेक टा सम्बल केवल।

अपन-आन केयो कतहु नहि, आई ओहन दर के ताकि रहल छि।

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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

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