Thursday, May 07, 2009

नाटक- संकर्षण - गजेन्द्र ठाकुर

खण्ड-५
नाटक


संकर्षण

(एक-एक अंकक दू कल्लोल आ दू-दू अंकक तीनटा कल्लोल- माने पाँच कल्लोलक अन्तर्गत आठ अंकक मैथिली नाटक)
पात्र परिचय
संकर्षण- अभिनेता आ खलनायक दुनू- लिकलिक करैत भूत सन कारी रंग, कतेक कारी से ओहि खापड़िकेँ देखि लिअ ततेक।
संकर्षणक बाबू
संकर्षणक कनियाँ
भाष्कर
भाष्करक बाबूजीक संगी
बंगाली बाबू
कलक्टर
कलक्टरक स्टेनो
तीन टा कारी कुकूर- एकर अभिनय तीन गोटे कारी कपड़ा पहिड़ि कऽ सकैत छथि
एकटा हलवाई- मधुरक दोकानक मालिक हिनका लग मिठाई छनबाक कराह, बड़का मोटगर बड़दामी, एकटा मोटगर लाठी आ एक गोटे कर्मचारी रहतन्हि तँ हिनका अभिनयमे सुविधा हेतन्हि।
हलवाई जीक कर्मचारी लुत्ती झा तखन अबस्से
एकटा शिवलिंग-मन्दिर, फेर कनेक उजरा दूध- चूनकेँ घोरि बना सकैत छी।
एकटा पुजेगरी आ बड़ रास भक्त- किछु गोटे दर्शककेँ बजा कए सम्मिलित सेहो कए सकैत छी।
गोनर भाइ
नित्या काका
जयराम
लाल काका
लाल काकी
घटक
दू टा पुलिस आ एकटा ओकर अफसर
एकटा बूढ़ी- ट्रेनक पसिन्जर
चोर बजारक दोकानदार, बजारमे आन दोकानदार आ भीड़-भरक्का



पहिल कल्लोल- पहिल अंक
(गाम।लगक जिला कार्यालय जतए गामक लोकक आँखिमे दुनियाँक सभसँ पैघ हाकिम कलक्टर बैसैत छथि। जकरा अभिनेता-अभिनेत्री कालिदासक “इति शरसंधानं नाटयति” जेकाँ सांकेतिक रूपमे देखा सकैत छथि। बादमे ट्रेनक यात्राक आ दिल्ली नगरक वर्णन सेहो अहिना कऽ सकैत छथि।)
(भाष्कर अपन दलानपर बैसल छथि आकि ओम्हरसँ संकर्षण अबैत छथि।)

संकर्षण: भाष्कर भाइ, सुनलहुँ कोनो काज अटकल अछि।
भाष्कर: हँ भाइ। कलक्टर ऑफिसमे एकटा काज ओझरायल अछि।
संकर्षण: कोनो काज पड़लापर हमरासँ कहब। कलक्टरक ओहिठाम भोर-साँझक बैसारी होइत अछि हमर। घंटाक-घंटा बैसल रहैत छी, आबए लगैत छी तँ रोकि कऽ फेर बैसा लैत अछि, दोसर-दोसर गप सभ शुरू कए दैत अछि।
भाष्कर: ठीक छैक भाइ जी। कोनो जरूरी पड़त तँ कहब। नाम की छन्हि हुनकर सेहो नहि बुझल अछि हमरा।
संकर्षण: बड्ड नमगर नाम छन्हि, भा.प्र.से. प्रशांत। आब भा.प्र.से. केर पूर्ण रूप हुनकासँ के पुछतन्हि, से प्रशांते कहैत छन्हि।
भाष्कर: भारतीय प्रशासनिक सेवाक संक्षिप्त रूप छैक भा.प्र.से., ई हुनकर नामक अंग नहि हेतन्हि।
संकर्षण: अच्छा तँ फेर सैह होयतैक। ताहि द्वारे नेम-प्लेट पर नामक नीचाँमे ई लिखल रहैत छैक, भा.प्र.से.।
भाष्कर: ठीक छैक भाइ जी। कोनो जरूरी पड़त तँ अहाँकेँ कहब।
(संकर्षण चलि जाइत छथि आ भाष्कर सोचए लगैत छथि जे परुकाँ जखन एकटा आन काज संकर्षणसँ पड़ल रहए तँ ओ की कहने रहथि, भाष्कर सोचिते छथि आकि कनेक दूरमे पछुलका गपक वर्णनक लेल नाटकक निर्देशक संकर्षणकेँ मंचपर कनेक दोसर कात बजा लैत छथि।)
भाष्कर: (मोनहि मोन) ईहो कमाल छथि परुकाँ जे काज पड़ल रहए तँ बजैत रहथि जे...
संकर्षण: परुकाँ साल किएक नहि कहलहुँ, ककर-ककर काज नहि करएलहुँ। मुदा एहि बेर तँ कोनो जोगारे नहि अछि। कहियो कोनो काज नहि कहने छलहुँ आ आइ कहलहुँ तँ हमरासँ नहि भऽ पाबि रहल अछि। आ से जानि कचोट भऽ रहल अछि।
(संकर्षण फेर चलि जाइत छथि, भाष्कर सेहो जाइत छथि मुदा तखने संकर्षण फेर अबैत छथि।)
संकर्षण: सत्यार्थीक बाल-बच्चा सभ बड़ टेढ़। कहियो घुरि कए नहि आयल छल भेँट करए। आ आइ काज पड़ल छैक तखन आयल अछि।
(संकर्षण फेर चलि जाइत छथि, भाष्कर तखने अबैत छथि।)

भाष्कर: (एकटा पुरान गप सोचैत- बाबूजीक संगी एक दिन वात्सल्यसँ एक बेर कोनो बङ्गाली बाबूकेँ, भाष्करक सोँझामे एक गोट बड़ नीक गप कहने छलाह।)
भाष्करक बाबूजीक संगी: (मंचक दोसर कात कोनो बंगाली बाबूकेँ भाष्करकेँ देखबैत आ कहैत) देखू दादा। ई छथि भाष्कर। हमर अत्यंत प्रिय मित्र सत्यार्थीक बेटा।
बंगाली बाबू: हुनकर बेटा तँ बड्ड छोट छल।
भाष्करक बाबूजीक संगी: यैह छथि। अहाँ बड्ड दिन पहिने देखने छलियन्हि तखन छोट छलाह, आब पैघ भए गेल छथि। कहैत छलहुँ जे हिनकर पिता हिनका लेल किछु नहि छोड़ि गेलाह। मुदा हमर पिताक मृत्यु १९६० ई. मे भेल छल आ हमरा लेल ओ नगरमे १२ कट्ठा जमीन, एकटा घर आ एकटा स्कूटर ओहि जमानामे छोड़ि गेल छलाह। आ आब ज्योँ ई बच्चा ककरो लग कोनो काजक लेल जायत, तँ एकरा उत्तर भेटतैक जे परुकाँ किएक नञि अएलहुँ आ परोछमे कहतन्हि, जे काज पड़लन्हि तखन आयल छथि।
बंगाली बाबू: ई तँ गलत बात।
भाष्करक बाबूजीक संगी: मुदा एकरा जखन समस्या पड़लैक तखने अहाँकेँ पुछबाक चाही छल, मुदा से तँ अहाँ नहि पुछलियन्हि। आ अहाँक लग आयल अछि, तखन अहाँ उल्टा गप करैत छी। आ ज्योँ ई बच्चा सहायताक लेल नहि जायत आ अपन काज स्वयं कए लेत आ ओहि श्रीमानकेँ से सुनबामे आबि जएतन्हि, तँ उपकरि कए अओताह आ पुछथिन्ह जे काज भऽ गेल आकि नहि। कहलहुँ किएक नहि। आ तखन ई बच्चा कहत जे काज भऽ गेल, भगवानक दया रहल। से दादा क्यो कोनो काजक लेल आबए तँ बुझू जे कुमोनसँ आयल अछि आ समस्या भेले उत्तर आयल अछि आ तेँ ओकर सहायता करू।
(भाष्करक बाबूजीक संगी आ बंगाली बाबू चलि जाइत छथि। भाष्कर सेहो चलि जाइत छथि।)
पहिल कल्लोलक दोसर अंक
(कलक्टरक ऑफिस। कलक्टरक चेम्बर। बाहर स्टेनो बैसल, मंचपर दोसर कातमे स्थान दऽ दियन्हु। भाष्कर कलक्टरसँ किछु गप कऽ रहल छथि। दू टा कुरसी तेना कऽ राखि दियौक जे भाष्कर जी आबथि तँ कलक्टरक मुँह सोझाँ पड़न्हि मुदा भाष्करक पीठ देखा पड़न्हि, मुँह नहि। भाष्कर कोनो काजे कलक्टरक ऑफिस गेल छथि। गपशप भइए रहल छन्हि आकि संकर्षण धरधड़ाइत चैम्बरमे अबैत छथि।)

कलक्टर: (तमसा कए) बाहर जाऊ देखैत नहि छी गप भऽ रहल अछि।
(संकर्षण बाहर रूमसँ निकलि स्टेनोक कक्षमे बैसि रहलाह। १०-१५ मिनटक बाद- जरूरी नहि एतेक काल भाष्कर आ कलक्टर गप करथि, घड़ी देखि १०-१५ मिनट १५ सेकेन्डमे खतम कएल जा सकैत अछि। जखन भाष्कर बाहर निकललाह तँ स्टेनोक रूमसँ संकर्षण बहराइत छलाह। एहि बेर संकर्षणक पीठ भाष्करक सोझाँ छलन्हि आ ताहि द्वारे एहि बेर सेहो दुनू गोटेमे सोझाँ-सोँझी नहि भऽ सकल। तखने पटाक्षेप करबाऊ । पटाक्षेपक बाद गामपर दुनू गोटे पहुँचैत देखल जाइत छथि)
भाष्कर: कहू संकर्षण। कतएसँ आबि रहल छी।
संकर्षण: ओह। की कहू कलक्टर साहेब रोकि लेलन्हि। ओतहि देरी भऽ गेल।
भाष्कर: हुनकर स्टेनोसँ सेहो भेँट भेल रहय?
संकर्षण: नहि। ओना बहरएबाक रस्ता स्टेनोक प्रकोष्ठेसँ छैक। मुदा ओ सभ तँ डरे सर्द रहैत अछि।
(तखन भाष्करकेँ नहि रहल गेलन्हि आ एकटा खिस्सा सुनबए लगलाह ओ संकर्षणकेँ। आब एतए कारी वस्त्र पहिरने तीन टा अभिनेता भों-भों करैत जेना कुकुर होथि, मंचक दोसर कात आबि जाइत छथि।)
भाष्कर: संकर्षण। सुनू, एकटा खिस्सा सुनबैत छी। तीन टा कारी कुकुर छल। एके रङ-रूपक। ओकरा सभकेँ मोन भेलैक जे गरमा-गरम जिलेबी मधुरक दोकान जा कए खाइ। से बेरा-बेरी ओतए जएबाक प्रक्रम शुरू भऽ गेल।
(खिस्सा शुरू होइते भाष्कर आ संकर्षण मंच सँ हटि जाइत छथि। बीच-बीचमे भाष्करक अबाज मंचक पाछाँसँ अबैत अछि।)
भाष्कर: (मंचक पाछाँसँ) पहिने पहिल कुकुर पहुँचल ओहि दोकान पर।
(मधुरक दोकान। मालिक अपन कर्मचारी संगे झाँझसँ जिलेबी छानि रहल छथि। तखने मालिक देखलनि जे कुकुर दोकानमे पैसि रहल अछि, से बटखरा फेंकि कए ओकरा मारलक। पहिल कुकुर-बेचाराकेँ बड़ चोट लगलैक। मुदा जखन घुरि कए गाम पर- माने मंचक दोसर कात अपन दोसर दुनू संगी लग पहुँचल तँ पुछला पर सुनू की कहलक।)
दोसर कुकुर: की भाइ केहन रहल।
तेसर कुकुर: बड्ड अगराइत चलैत आबि रहल छी।
पहिल कुकुर: (पीठपर बटखराक चोटपर हाथ दैत) एह की कहू। बड़ सत्कार भेल। बटखरासँ जोखि कए जिलेबी खएबाक लेल भेटल। बटखरासँ जोखैत गेल, दैत गेल, पैघ बटखरा, छोट बटखरा, सभसँ जोखि-जोखि दैत गेल।
दोसर कुकुर: तखन हमहीं किएक पाछाँ रहब सत्कार कराबएमे।
(आब दोसर कुकुर अपनाकेँ रोकि नहि सकल आ अपन सतकार करएबाक हेतु पहुँचि गेल मधुरक दोकान पर। रूप-रङ तँ एके रङ रहए ओकरा सभक, से मधुरक दोकानक मालिककेँ भेलैक जे वैह कुकुर फेरसँ आबि गेल अछि। ओ पानि गरम कए रहल छल।)
मधुरक दोकानक मालिक: (भरि टोकना धीपल पानि ओहि कुकुरक देह पर फेकैत) देखू ई फेर आबि गेल। पछिला बेर बटखारा फेंकि कए मारलियैक तकर बाद जे आएल तँ यैह टा ने उपाए बाँचल रहए।
(बेचारा कुकुर जान बचा कए भागल। आब गाम पर- माने मंचक दोसर कात पहुँचला पर ओकरा तेसर कुकुर पुछलकैक-)
तेसर कुकुर: केहन सत्कार भेल।
दोसर कुकुर: की कहू। (पीठपर गरम पानिसँ जरल स्थानकेँ छुबैत) गरमा-गरम जिलेबी छानि कए खुएलक। बड़ नीक लोक अछि मधुरक दोकानक मालिक। छनैत गेल आ गरमागरम खुआबैत गेल।
(तेसर कुकुरक मोन लसफसा जाइत छैक। ओ निकलैत अछि अपन सत्कार कराबए लेल।)
तेसर कुकुर: तखन हमहूँ चलैत छी अपन सत्कार कराबए।
(दोकानपर हल्ला भऽ रहल छैक जे शिवलिंग दूध पीबि रहल छथि, सोर भऽ रहल अछि।)
मधुरक दोकानक मालिकक कर्मचारी लुत्ती झा: महादेव भगवान दूध पीबि रहल छथि, चलू ने कनेक अपनो सभ दूध पिया आबी।
मधुरक दोकानक मालिक: सत्ते लुत्ती झा। चलह देखी।
(तेसर कुकुर दोकानमे पैसैत अछि आकि मालिक आ लुत्ती झा सटर खसा दैत छैक। बेचारा बन्न भऽ जाइत अछि। मालिक आ लुत्ती झा मन्दिर पहुँचैत छथि, एकटा लोटामे दूध लऽ कए।)
मधुरक दोकानक मालिक: (मन्दिर लग भीड़ देखैत) एक्के लोटा दूध अछि, तोँ जेबह आकि हम जाइ।
लुत्ती झा: अहीं जाऊ ने। एक्के गप ने छैक।
(मालिक दूध चढ़ा कए देखैत छथि, सभटा दूध नाली बाटे बाहर निकलि जाइत छन्हि।)
मधुरक दोकानक मालिक: (स्वतः सोचैत बाहर निकलैत) भगवान सभक हाथे दूध पीलन्हि मुदा हम जे सभकेँ कहबैक जे हमरा हाथे नहि पीलन्हि तँ सभ कहत जे हम पापी छी तेँ भगवान हमरा हाथे दूध नहि पीलन्हि।
लुत्ती झा: की मालिक। महादेव दूध पीलन्हि।
मधुरक दोकानक मालिक: हँ हौ लुत्ती झा। एतेक प्रतिष्ठित जीवन बिता रहल छी से महादेव सभक हाथे दूध पीलन्हि तँ हमरो हाथे पीलन्हि।
(दुनू गोटे दोकान खोलैत छथि तँ फेरसँ कारी कुकुर देखैत छथि। मालिकक सौँसे देह पित्त लहरि गेलन्हि।)
मधुरक दोकानक मालिक: लुत्ती झा। भागए नहि पाबए ई। दू बेरमे मोन नहि भरलैक। रस्सा ला, लाठी लाबह।
(दुनू गोटे रस्सामे बान्हि कऽ कुकुरकेँ लाठीसँ पुष्ट पिटान पिटैत छथि। फेर बेचारा कोहुना बन्हन छोड़ा कऽ लँगड़ाइत गाम दिस पड़ाइत अछि। ओतए पहिल आ दोसर कुकुर छथि।)
पहिल कुकुर: अहाँकेँ तँ बड्ड काल लागि गेल, की की सत्कार भेल।
दोसर कुकुर: हँ ठीके। बड़ी काल लागल, दोकान तँ बन्न नहि रहए।
तेसर कुकुर: बड्ड सत्कार भेल। आबैये नहि दैत रहथि। कहैत रहथि जे आर खाऊ, आर खाऊ। कोहुना कऽ जान बचा कऽ आएल छी जे आब नहि खाएल जएत, पेट फाटि जएत। (लङराइत) देखैत नहि छी जे चलियो नहि भऽ रहल अछि।
(तीनू कुकुर जाइत छथि आ भाष्कर आ संकर्षण मंचपर अबैत छथि।)
भाष्कर: सुनलियैक संकर्षण ई खिस्सा। से जखन कलक्टर अहांकेँ दबाड़ि रहल छल तखन ओकरा सोझाँ हमही बैसल छलहुँ। हमर पीठ अहाँक सोझाँ छल तेँ अहाँ हमरा नहि देखि सकलहुँ। फेर अहाँ स्टेनोक प्रकोष्ठमे किछु काल बैसलहुँ आ जखन ओतएसँ बाहर निकललहुँ तँ लोक सभकेँ भेल होएतैक, जे अहाँ कलक्टरसँ ओतेक काल धरि गप कए रहल छलहुँ। मुदा कोनो बात नहि। हम ई गप ककरो नहि कहबैक। मुदा आजुक बाद मिथ्या कथनसँ अहाँ अपनाकेँ दूर राखू।
(संकर्षण मुँह गोतने बैसल रहलाह।)

भाष्कर: आउ, मुरहीक भुज्जा बनबैत छी।
(दुनू गोटे भुज्जा फाँकय लगैत छथि।)

दोसर कल्लोल पहिल अंक
(पुरनका गामक दृश्य। जयराम दौगल-दौगल अबैत छथि। संकर्षण सोझाँ छथि।)

जयराम: संकर्षण। नीक भेल भेटि गेलहुँ। नित्या काका लग जाइत रही मुदा ओतए जाइत-जाइत देरी भऽ जएत। ननकिड़बाक मोन बड्ड खराप छैक। बोखार, रद्द-दस्त सभ एक्के-बेर शुरू भऽ गेल छैक।
संकर्षण: धुर बताह, पसीझक काँटक रस पिआ ने दहीं। हम जाइत छी महीँस चरेबाक लेल डीह दिशि। कोनो चिन्ता जुनि करब। जुल्मी दबाइ छैक। एक्के चोटमे सभ बेमारी खतम।
(संकर्षण एक दिस आ जयराम दोसर दिस जाइत छथि। फेर नित्या काका एक दिससँ आ जयराम दोसर दिससँ अबैत छथि।)
नित्या काका: की जयराम? कलम दिससँ की आनि रहल छी।
जयराम: की कहू काका। ननकिड़बाकेँ बोखार, रद्द-दस्त सभ एक्के-बेर शुरू भऽ गेल छैक। संकर्षण कहलन्हि जे पसीझक काँटक रस पिआ देबा लेल सभ बेमारी खतम भऽ जएतैक। सैह आनए लेल गेल रही।
नित्या कक्का: ई संकर्षण बड़ बुरि अछि। परुकाँ पसीझक काँटक रस पोखरिमे दऽ कए सभटा माँछ मारि देने रहए ई। ई जहर बच्चाकेँ पिएबन्हि तँ मोन ठीक नहि होएतन्हि, सोझे प्राण निकलि जयतन्हि। चलह दबाइ-दोकान दिस, दबाइ दिअबैत छिअह।
(दुनू गोटे जाइत छथि आ ओम्हर डीहपर महींसक पीठपर संकर्षण बैसल देखबामे अबैत छथि। दोसर दिससँ एकटा दोसर महिसबार गामपरसँ आबिये रहल छथि।)
संकर्षण: की भाइ, गामेपरसँ आबि रहल छी।
महिसबार: हँ भाइ।
संकर्षण: जयरामक टोलसँ कन्नारोहटो सुनबामे आएल रहए।
महिसबार: कन्नारोहट तँ नहि, मुदा डिहबारक स्थानपर पंचैती बैसल अछि, अहाँकेँ बजाबए लेल हम आएल छी।
(महिसबार संकर्षणकेँ लेने मंचसँ जाइत छथि। फेर पंच सभक लग सभ फेरसँ अबैत छथि आ संकर्षणपर सभ थू-थू करैत छथि। घोँघाउज होइत अछि आ संकर्षणपर दण्ड सेहो लगैत छन्हि।)
संकर्षण: हम अपन घट्टी मानैत छी आ आइ दिनसँ कंठी लऽ रहल छी। दण्ड सेहो काल्हि साँझ धरि दऽ देब।
(पटाक्षेप होइत अछि।)

दोसर कल्लोल दोसर अंक
(संकर्षण भोरे- भोर खेत दिशि कोदारि आ छिट्टा लए बिदा भेल छथि। बुन्ना-बान्नी होइत छल। तखने आरिकेँ तरपैत एकटा पैघ रोहुकेँ देखि कए संकर्षण कोदारि चला देलन्हि। आ रोहु दू कुट्टी भऽ गेल।)
संकर्षण: आरौ तोरी के। आब दोसर काज छोड़ी आ गामपर चली।
(दुनू ट्कड़ीकेँ छिट्टामे राखि माथ पर उठा कए विदा भेलाह संकर्षण गाम दिशि। तकरा देखि हुनकर समवयस्क गोनर भाए गाम पर जाइत काल गामक बाबा दोगही लग ठमकि कए ठाढ़ भए गेलाह।)
गोनर भाइ: (मोनमे सोचैत छथि ) वैष्णव जीसँ रोहु कोना कए लए ली। (प्रत्यक्ष भऽ) यौ संकर्षण भाइ। ई की कएलहुँ। वैष्णव भऽ कए माछ उघैत छी।
संकर्षण: रौ गोनर। हमर बतारी छह मुदा तैयो हम तोहर भाइ कोना भेलियह। तोरा बुझल नहि छह जे जतए तोँ ठाढ़ छह से कहबैत छैक बाबा दोगही। एतए जनमलो बच्चा गामक लोकसँ सम्बन्धमे बाबा होइत अछि।
गोनर भाइ: ठीके कहलहुँ संकर्षण। मुदा हम कहैत रही जे......
संकर्षण: (गप काटैत) रौ माछ खायब ने छोड़ने छियैक। मारनाइ तँ नञि ने।
(अपन सनक मुँह लए गोनर भाइ विदा भए गेलाह। फेर दुनू गोटे मंचसँ जाइत छथि आ फेर अबैत छथि। गोनर झा टेलीफोन डायरी देखि रहल छथि।)
संकर्षण: की देखि रहल छी।
गोनर झा: टेलीफोन नंबर सभ लिखि कए रखने छी, ताहिमे सँ एकटा नंबर ताकि रहल छी।
संकर्षण: आ ज्योँ बाहरमे रस्तामे कतहु पुलिस पूछि देत जे ई की रखने छी तखन।
गोनर झा: ऐँ यौ से की कहैत छी। टेलीफोन नंबर सभ सेहो लोक नहि राखय।
संकर्षण: से तँ ठीक। मुदा एतेक नंबर किएक रखने छी, ई पुछला पर ज्योँ जबाब नहि देब तँ आतंकी बुझि पुलिस जेलमे नहि धए देत?
गोनर झा: से कोना धए देत। एखने हम एहि डायरीकेँ टुकड़ी-टुकड़ी कऽ कए फेंकि दैत छियैक।
(गोनर भाइ ओहि डायरीकेँ फाड़ि-फूड़ि कए फेंकि दैत छथि।)

तेसर कल्लोल
(संकर्षणक बाबू दलानपर बैसल छथि। एक गोट घटक चूड़ा-दही-मधुर सरपेटने जा रहल छथि।)
घटक: मीतक चेहरापर जे पानि छन्हि से लोक नञि देखैत अछि। कारी टुहटुह छथि संकर्षण कारी-खटखट नहि। चन्सगर छथि।
संकर्षणक बाबू: हे एकटा आर मधुर लियौक ने।
घटक: दियौक। यौ लाइन लागि जएत लड़की बलाक। धरफराऊ धरि जुनि।
(ओ घटक जाइत छथि आकि दोसर घटक अबैत छथि आ ओहो इशारामे गप करैत चलि जाइत छथि।)
संकर्षणक माए: हे एकटा कन्यागत अओताह आइ। लाल काकीक फोन आएल छन्हि दिल्लीसँ।
संकर्षणक बाबू: शरबत घोरि कए राखू तखन। कागजी नेबो तँ घटक सभकेँ शरबत पियाबैत-पियाबैत खतम भऽ गेल देखैत छी गाछमे जमीरी नेबो सेहो बाँचल अछि आकि नहि।

(मंचसँ सभ जाइत छथि आ बुझना जाइत अछि जे संकर्षण सासुरसँ आएले छथि, कनेक मोट भऽ गेल छथि। गोनर भाइ रस्तामे भेटि जाइत छथिन्ह।)
गोनर भाइ: मीत यौ, कनिया केहन छथि, पसिन्न पड़लथि ने।
संकर्षण: हँ, हँ जगन्नाथ भाइ। बड़ सुन्दर छथि। हेमामालिनीकेँ देखने छियन्हि? एन-मेन ओहने।
गोनर भाइ: अच्छा।
संकर्षण: मुदा रंग कनेक हमरासँ डीप छन्हि।
(गोनर भाइ मुँह बाबि दैत छथि। दुनू गोटे मंचसँ जाइत छथि आ फेर अबैत छथि। संकर्षण हाथमे लोटा लेने पोखरि दिशि जा रहल छथि तँ गोनर गोबर काढ़ि छथि। बगलमे गोनर भाइक कनियाँ ठाढ़ि रहथिन्ह।)
गोनर भाइ: यौ मीत, हमरे जेकाँ अहूँ सभकेँ भोरे-भोर गोबर काढ़य पड़ैत अछि?
(संकर्षण देखलन्हि जे गोनरक कनिञा सेहो बगलमे ठाढ़ि छलखिन्ह। से एखन किछु कहबन्हि तँ लाज होएतन्हि। से बिनु किछु कहने आगू बढ़ि गेलाह। जखन घुरलाह तँ.........)
संकर्षण: भाइ, पहिने बियाहमे पाइ देबय पड़ैत छलैक, से अहाँकेँ सेहो लागल होएत। ताहि द्वारे ने उमरिगरमे बियाह भेल।
गोनर भाइ: हँ से तँ पाइ लागले छल।
संकर्षण: मुदा हमरा सभकेँ पाइ नहि देबय पड़ल छल आ ताहि द्वारे गोबरो नहि काढ़य पड़ैत अछि, कारण कनियाँ ओतेक दुलारू नहि छथि ने।
(गोनर भाइ मुँह बाबि दैत छथि। दुनू गोटे मंचसँ जाइत छथि आ फेर अबैत छथि।)
गोनर भाइ: सर्दमे गुरसँ खूब लाभ होइत छैक, ई ठेही हँटबैत अछि। गूरक चाह पीब मीत।
मीत भाए: (स्वगत) किछु दिन पहिने गोनर एहि गपक चर्च कएने छलाह जे ओ जोमनी छोड़्ने छलाह तीर्थस्थानमे आ तैँ जोम खाइत छलाह। हरजे की एहिमे। अधिक फलम् डूबाडूबी। (प्रत्यक्ष) परुकाँ जे पुरी जगन्नाथजी गेल छलहुँ, से कोनो एकटा फल छोड़बाक छल से कुसियार छोड़ि देलहुँ। आ कुसियारेसँ तँ गुर बनैत छैक। चुकन्दरक पातर रसियन चीनी बला चाहे ने पिआ दिअ।
(गोनर भाइ मुँह बाबि दैत छथि। दुनू गोटे मंचसँ जाइत छथि आ फेर अबैत छथि। लगैत अछि जे पन्द्रह बरिखक बादक गप अछि। दुनू गोटे उमरिगर भऽ गेल छथि।)
संकर्षण: यौ,लोक सभ यौ लोक सभ। लाल काका बियाह तँ करा देलन्हि मुदा तखन ई कहाँ कहलन्हि जे बियाहक बाद बेटो होइत छैक। जबान बेटा घर छोड़ि भागि गेल। आब की करब ?
गोनर भाइ: हो नहि हो दिल्लीये गेल होएत। सभ ओतहि जाइत अछि भागि कऽ।
संकर्षण: आब बेटाकेँ ताकए लेल आ बेटाक नहि भेटला उत्तर अपना लेल नोकरी तकबाक हेतु हमरो दिल्लीक रस्ता धरए पड़त।
(निर्देशक पाछाँ सँ बजैत छथि- दिल्लीक रस्तामे संकर्षणक संग की भेलन्हि हुनकर बुधियारी आकि कबिलपनी काज अएलन्हि वा नहि, एहि लेल कनेक धैर्य राखए पड़त। कारण ट्रेनक सवारी अछि आ मंच कलाकार उत्साहित छथि मुदा देखिनहार थाकल बुझि पड़ैत छथि। पटाक्षेप होइत अछि।)

चारिम कल्लोल
(ट्रेनक दृश्य। संकर्षण जनकपुरसँ जयनगर अबैत छथि से जनकपुर आ जयनगरक बोर्ड लगा कए मंचित कएल जा सकैत अछि। जयनगर मे ट्रेनपर संकर्षण चढ़ैत छथि । ट्रेन खुजैत अछि आ संकर्षण ट्रेनमे कोनहुना बैसैत छथि।)
एकटा बूढ़ी: (संकर्षणसँ) बौआ कनेक सीट नञि छोड़ि देब।
संकर्षण: माँ। ई बौआ नहि। बौआक तीन टा बौआ।
(बूढ़ी मुँह बाबि लैत छथि। ट्रेन आगाँ बढ़ैत अछि अलीगढ़मे पुलिस आयल बोगीमे। संकर्षणक झोड़ा-झपटा सभ देखए लगलन्हि। चेकिंग किदनि होइत छैक से। ताहिमे किछु नहि भेटलैक ओकरा सभकेँ। हँ खेसारी सागक बिड़िया बना कए संकर्षणक कनियाँ सनेसक हेतु देने रहथिन्ह, लाल काकीक हेतु। मुदा पुलिसबा सभ एहिपर हुनका लोकि लेलकन्हि।)
सिपाही एक: ई की छी।
संकर्षण: ई तँ सरकार, छी खेसारीक बिड़िया।
सिपाहीक अफसर: अच्छा, बेकूफ बुझैत छी हमरा। मोहन सिंह बताऊ तँ ई की छी।
सिपाही दू: गाजा छैक सरकार। गजेरी बुझाइत अछि ई।
सिपाहीक अफसर: आब कहू यौ सवारी। हम तँ मोहन सिंहकेँ नहि कहलियैक, जे ई गाजा छी। मुदा जेँ तँ ई छी गाजा, तेँ मोहन सिंह से कहलक।
संकर्षण: सरकार छियैक तँ ई बिड़िया, हमर कनियाँ सनेस बन्हलक अछि लाल काकीक..........
सिपाही एक: लऽ चलू एकरा जेलमे सभटा कहि देत।
(संकर्षणक आँखिसँ दहो-बहो नोर बहय लगैत छन्हि। मुदा सिपाही छल बुझनुक।)
सिपाही दू: कतेक पाइ अछि सँगमे।
(दिल्लीमे स्टेशनसँ लालकाकाक घर धरि दू बस बदलि कए जाए पड़ैत छैक। से सभ हिसाब लगा कए बीस टाका छोड़ि कए पुलिसबा सभटा लऽ लेलकन्हि। हँ खेसारीक बिड़िया धरि छोड़ि देलकन्हि। पाइक आदान प्रदान भेल। पुलिसबा सभ उतरि गेल। संकर्षण सेहो कनेक कालक बाद दिल्ली स्टेशनपर उतरि गेलाह। फेर मंचपर लाल काका, लाल काकी आ संकर्षण ड्राइंग रूममे बैसल छथि।)
लाल काका: (फोनपर) अच्छा। ई तँ नीक खबरि सुनेलहुँ। मीत तँ रहैत छथि, रहैत छथि की सभटा गप सोचा जाइत छलन्हि आ कोढ़ फाटि जाइत छन्हि। (फोन राखैत) सुनलियै यै। मीतक बेटा गाम पहुँचि गेलन्हि।
लाल काकी: बाह। रच्छ भगवान। मुदा बौआ ई सप्पत खाऊ जे आब पसीझक काँट जेहन हँसी नहि करब। (लाल काका दिस मुँह कए) हिनकर नोकरीक की भेलन्हि।
संकर्षण: नोकरी-तोकरी नहि होयत काकी हमरासँ। सप्पत खाइत छी जे पसीझक काँट बला हँसी आब नहि करब। आब तँ गाम घुरबाक तैयारी करए दिअ।
लाल काकी: दिल्ली तँ घुमि लिअ। लाल किला देखि लिअ।

पाँचम कल्लोल पहिल अंक
(दिल्लीक लाल किलाक पाछूमे रवि दिन भोरमे जे चोर बजार लगैत रहए ताहिमे संकर्षण अपन भाग्यक परीक्षणक हेतु पहुँचैत छथि। संकर्षणकेँ एहि बजारसँ, सस्त आ नीक चीज किनबाक लूरि नहि छन्हि से सभ कहैत छलन्हि। से गामक बुधियार संकर्षण पहुँचलाह एतए।ओहि परीक्षणक दिन, संकर्षणक ओतय पहुँचबाक देरी छलन्हि आकि एक गोटे संकर्षणक आँखिसँ नुका कय किछु वस्तु राखय लागल आ देखिते-देखिते ओतएसँ निपत्ता भय गेल। संकर्षणक मोन ओम्हर गेलन्हि आ ओ ओकर पाछाँ धय लेलन्हि। बड्ड मुश्किलसँ संकर्षण ओकरा ताकि लेलन्हि।)
संकर्षण: की नुका रहल छी ?
चोर बजारक दोकानदार: ई अहाँक बुत्ताक बाहर अछि।
संकर्षण: अहाँ कहू तँ ठीक, जे की एहन अलभ्य अहाँक कोरमे अछि।
चोर बजारक दोकानदार: (झाड़ि-पोछि कय एक जोड़ जुत्ता निकाललन्हि) कोनो पैघ गाड़ी बलाक बाटमे छी जे गाड़ीसँ उतरि एहि जुत्ताक सही परीक्षण करबामे समर्थ होएत आ सही दाम देत।
संकर्षण: दाम तँ कहू।
चोर बजारक दोकानदार: अहाँ कहैत छी तँ सुनू। चारि सए टाका दाम अछि एकर। हँ।
संकर्षण: हमरा लग तँ मात्र तीन सए साठि टाका अछि।
चोर बजारक दोकानदार: हम पहिनहिये ने कहने छलहुँ। कतए घर भेल अहाँक।
संकर्षण: जनकपुर।
चोर बजारक दोकानदार: पड़ोसिया छी तखन तँ। अहाँसँ की लाभ कमाएब। दस टाका तँ डी.टी.सी. बसक किरेजा सेहो लागत। चलू साढ़े तीन सय दिअ।
संकर्षण: चलू आइ काल्हिक युगमे अहाँ सन लोक अछि जे पड़ोसीक कदर करैत अछि।
चोर बजारक दोकानदार: दिल्लीमे सभ अपने लोक अछि। एतए तँ थूको फेकैत छी तँ अपने लोकपर पड़ैत अछि।

पाँचम कल्लोल दोसर अंक
(संकर्षण गाम घुरलाह। जाहि दिनसँ ई जुत्ता आयल, एकरामे पानि नहि लागय देलन्हि। गोनर भाइ आ संकर्षणक मंचपर पदार्पण।)
गोनर भाइ: यौ मीत जुत्ता किएह हाथमे उठेने छी।
संकर्षण: हौ गोनर। पानि कोना लागए देबैक एकरा। पैरक चमड़ा सड़त तँ फेर नवका आबि जएत। मुदा ई सड़ि जएत तखन कतए सँ अएत।
(दुनू गोटे जाइत छथि आ फेर आबि जाइत छथि। संकर्षण जुत्ता सिअबा रहल छथि।)

गोनर भाइ: ई की कऽ रहल छी मीत। एतेक नीक रंग रूपक जुत्ताकेँ सिअबा रहल छी।
संकर्षण: हौ गोनर। बड्ड ठकान ठकेलहुँ। कतओ पानि देखी तँ पैरके सड़ा दैत रही आ एहि जुत्ताकेँ हाथमे उठा लैत छलहुँ। चारिये दिनतँ पहिरने होएब। आइ जुत्ताक पूरा सोल, करेज जेकाँ, अपन एहि आँखिक सोझाँ जुत्तासँ बाहर आबि गेल।
गोनर भाइ: अहाँकेँ के ठकि लेलक। अहाँक नाम तँ बुझनुक लोकमे अबैत अछि।
संकर्षण: मित्र की कहू? क्यो बुझनुक कहैत अछि आकि एहि जुत्ताक बड़ाइ करैत अछि, तँ कोढ़ फाटय लगैत अछि। कोनहुना सिया-फड़ा कय पाइ ऊप्पर करब। बड्ड दाबी छल, जे मैथिल छी आ बुधियारीमे कोनो सानी नहि अछि। मुदा ई ठकान जे दिल्लीमे ठकेलहुँ तँ आब तँ ओतुक्का लोककेँ दण्डवते करैत रहबाक मोन करैत अछि। एहि लालकिलाक चोर-बजारक लोक सभ तँ कतेको महोमहापाध्यायक बुद्धिकेँ गरदामे मिला देतन्हि। अउ जी, भारत-रत्न बँटैत छी, आ तखन एहि पर कंट्रोवर्सी करैत छी। असल भारत-रत्न सभ तँ लालकिलाक पाँछाँमे अछि, से एक दू टा नहि वरन् मात्रा मे।
गोनर भाइ: भारत रत्न सभ!
संकर्षण: आन सभतँ एहि घटनाकेँ लऽ कय किचकिचबैते रहैत अछि, कम सँ कम यौ भजार, अहाँ तँ एहि घटनाक मोन नहि पारू।
(पटाक्षेप)

No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...