Friday, May 08, 2009

डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह ‘मौन’ (1938- )

डॉ प्रफुल्ल कुमार सिंह मौन(1938- )

ग्राम+पोस्ट- हसनपुर, जिला-समस्तीपुर। नेपाल आऽ भारतमे प्राध्यापन। मैथिलीमे . नेपालक मैथिली साहित्यक इतिहास (विराटनगर, १९७२ई.), . ब्रह्मग्राम (रिपोर्ताज दरभंगा १९७२ .), . मैथिलीत्रैमासिकक सम्पादन (विराटनगर, नेपाल १९७०-७३ई.), . मैथिलीक नेनागीत (पटना, १९८८ .), . नेपालक आधुनिक मैथिली साहित्य (पटना, १९९८ .), . प्रेमचन्द चयनित कथा, भाग- आऽ (अनुवाद), . वाल्मीकिक देशमे (महनार, २००५ .) मौन जीकेँ साहित्य अकादमी अनुवाद पुरस्कार, २००४ ., मिथिला विभूति सम्मान, दरभंगा, रेणु सम्मान, विराटनगर, नेपाल, मैथिली इतिहास सम्मान, वीरगंज, नेपाल, लोक-संस्कृति सम्मान, जनकपुरधाम, नेपाल, सलहेस शिखर सम्मान, सिरहा नेपाल, पूर्वोत्तर मैथिल सम्मान, गौहाटी, सरहपाद शिखर सम्मान, रानी, बेगूसराय आऽ चेतना समिति, पटनाक सम्मान भेटल छन्हि। वर्तमानमे मौनजी अपन गाममे साहित्य शोध आऽ रचनामे लीन छथि।


पंचदेवोपासक भूमि मिथिला

हिमालयक पादप्रदेशमे गंगासँ उत्तर, कोशीसँ पश्चिम एवं गण्डकसँ पूर्वक भूभाग सांस्कृतिक मिथिलांचलक नामे ख्यात अछि। मिथिलांचलक ई सीमा लोकमान्य, शास्त्रसम्म्त ओऽ परम्परित अछि। सत्पथब्राह्मणक अंतःसाक्ष्यक अनुसारे आर्यलोकनिक एक पूर्वाभिमुखी शाखा विदेह माथवक नेतृत्वमे सदानीरा (गण्डक) पार कऽ एहि भूमिक अग्नि संस्कार कऽ बसिवास कएलनि, जे विदेहक नामे प्रतिष्ठित भेल। कालान्तरमे एकर विस्तार सुविदेह, पूर्व विदेह, ओऽ अपर विदेहक रूप अभिज्ञात अछि। विदेहक ओ प्राथमिक स्थलक रूपमे पश्चिम चम्पारणक लौरियानन्दनगढ़क पहिचान सुनिश्चित भेल अछि। आजुक लौरियानन्दनगढ़ प्राचीन आर्य राजा लोकनि एवं बौद्धलोकनिक स्तूपाकार समाधिस्थल सभक संगम बनल अछि। कालक्रमे अहि इक्षवाकु आर्यवंशक निमि पुत्र मिथि मिथिलापुत्रक स्थापना कयलनि। प्राचीन बौद्धसाहित्यमे विदेहकँ राष्ट्र (देश) ओऽ मिथिलाकँ राजधानीनगर कहल गेल अछि। अर्थात् मिथिला विदेहक राजधानी छल। मुदा ओहि भव्य मिथिलापुरीक अभिज्ञान एखन धरि सुनिश्चित नहि भेल अछि। तथापि प्राचीन विदेहक सम्पूर्ण जनपदकँ आइ मिथिलांचल कहल जाइछ।

ओऽ मिथिलांचलक भूमि महान अछि, जकर माथेपर तपस्वी हिमालयक सतत वरदहस्त हो, पादप्रदेशमे पुण्यतोया गंगा, पार्श्ववाहिनी अमृत कलश धारिणी गंडक ओऽ कलकल निनादिनी कौशिकीक धारसँ प्रक्षालित हो। एहि नदी मातृक जनपदकेँ पूर्व मध्यकालीन ऐतिहासिक परिवेशमे तीरभुक्ति अर्थात् तिरहुत कहल गेल, जकर सांस्कितिक मूलमे धर्म ओऽ दर्शनक गांभीर्य, कलासभक रागात्मक उत्कर्ष, ज्ञान-विज्ञानक गरिमा ओऽ भाषा-साहित्यक समृद्ध परम्पराक अंतः सलिला अंतर्प्रवाहित अछि। एहि सभक साक्षात् मिथिलाक शैव-शाक्त, वैष्णव, गाणपत्य, सौर (सूर्य) ओऽ बौद्ध-जैनक आस्था केन्द्र एवं ऋषि-मुनिक साधना परम्परामे उपलभ्य अछि। प्रकारान्तरसँ ओहि स्थल सभकँ सांस्कृतिक चेतनाक ऐतिहासिक स्थलक संज्ञा देल जाऽ सकैछ, जकर आइ-काल्हि पर्यटनक दृष्टिसँ महत्व बढ़ि गेल अछि।

मिथिलाक प्रसिद्धि ओकर पाण्डित्य परम्परा, दार्शनिक-नैयायिक चिन्तन, साहित्य-संगीतक रागात्मक परिवेश, लोकचित्रक बहुआयामी विस्तार, धार्मिक आस्थाक स्थल, ऐतिहासिक धरोहर आदिक कारणे विशेष अनुशीलनीय अछि। जनक-याज्ञवल्क्य, कपिल, गौतम, कणाद, मंडन, उदयन, वाचस्पति, कुमारिल आदि सदृष विभूति, गार्गी, मैत्रेयी, भारती, लखिमा आदि सन आदर्श नारी चरित, ज्योतिरीश्वर, विद्यापति, विनयश्री, चन्दा झा, लाल दास आदि सन आलोकवाही साधक लोकनिक प्रसादे एहि ठामक जीवन-जगतमे आध्यात्मिक सुखानुभूति ओऽ सारस्वत चेतनादिक मणिकांचन संयोग देखना जाइछ। मिथिला आध्यात्म विद्याक केन्द्र मानल जाइछ।

आजुक मिथिलांचलक संस्कृति उत्तर बिहारमे अवस्थित वाल्मीकिनगर (भैँसालोटन, पश्चिम चम्पारण) सँ मंदार (बाँका, भागलपुर) धरि, चतरा-वाराह क्षेत्र (कोशी-अंचल, नेपाल) सँ जनकपुर-धनुषा (नेपाल) धरि ओ कटरा (चामुण्डा, मुजफ्फरपुर), वनगाँव-महिषी, जयमंगला (बेगूसराय), वारी-बसुदेवा (समस्तीपुर), कपिलेश्वर-कुशेश्वर-तिलकेश्वर (दरभंगा), अहियारी-अकौर-कोर्थु(मधुबनी), आमी(अम्बिकास्थान, सारण), हरिहरक्षेत्र (सोनपुर, सारण) वैशाली आदि धरि सूत्रबद्ध अछि। एहि सभ धार्मिक तीर्थस्थल सभक परिवेक्षणसँ प्रमाणित होइछ जे मिथिलांचल पंचदेवोपासक क्षेत्र अछि। कालान्तरमे एहिसँ बौद्ध ओऽ जैन स्थल सभ सेहो अंतर्मुक्त भऽ आलोच्य भूभागकेँ गौर्वान्वित कयलनि।

पंचदेवोपासक क्षेत्रक अर्थ भेल- गणेश, विष्णु, सूर्य, शिव ओऽ भगवतीक क्षेत्र। एहिमे सूर्य सर्वप्राचीन देव छथि एवं शिव सर्वप्राचीन ऐतिहासिक देवता छथि। विघ्नांतक गणेशक पूजन प्राथमिक रूपेँ कयल जाइछ एवं मातृपूजनक संदर्भमे भगवती अपन तीनू रूपमे लोकपूजित छथि अर्थात् दुर्गा, काली, महालक्ष्मी एवं सरस्वती। भगवती शक्तिक आदि स्रोत छथि, जनिकामे सृष्टि, पोषण ओ संहार (लय) तीनू शक्ति निहित अछि। मुदा लोकक लेल ओऽ कल्याणकारिणी छथि। धनदेवी लक्ष्मीक परिकल्पना वैष्णव धर्मक उत्कर्ष कालमे भेल छल एवं ओ विष्णुक सेविका (अनंतशायी विष्णु), विष्णुक शक्ति (लक्ष्मी नारायण) एवं देवाभिषिक्त (गजलक्ष्मी) भगवतीक रूपमे अपन स्वरूपक विस्तार कयलनि। ओना तँ लक्ष्मी ओऽ सरस्वतीकँ विष्णुक पर्श्वदेवीक रूपमे परिकल्पना सर्वव्यापक अछि। लक्ष्मी ओऽ गणेशक पूजन सुख-समृद्धिक लेल कयल जाइछ। प्राचीन राजकीय स्थापत्यक सोहावटीमे प्रायः गणेश अथवा लक्ष्मीक मूर्ति उत्कीर्ण अछि।

पंचदेवोपासना वस्तुतः धार्मिक सद्भावक प्रतीक अछि। मिथिलांचलमे एहि पाँचो देवी-देवताक स्वतंत्र विग्रह सेहो प्राप्त होइछ। भारतीय देवभावनाक विस्तारक मूलमे भगवती छथि, जे कतहु सप्तमातृकाक रूपमे पूजित छथि तँ कतहु दशमहाविद्याक रूपमे। सप्तमातृका वस्तुतः सात देवता सभक शक्ति छथि- ब्रह्माणी (ब्रह्मा), वैष्णवी (विष्णु), माहेश्वरी (महेश), इन्द्राणी (इन्द्र), कौमारी (कुमार कार्तिकेय), वाराही (विष्णु-वाराह) ओऽ चामुण्डा (शिव)। एहि सप्तमातृकाक अवधारणा दानव-संहारक लेल संयुक्त शक्तिक रूपमे कयल गेल छल, जे आइ धरि पिण्ड रूपेँ लोकपूजित छथि। मुदा एक फलक पर सप्तमातृकाक शिल्पांकनक आरम्भ कुषाणकालमे भऽ गेल छल। चामुण्डाकेँ छोड़ि सभटा देवी द्विभुजी छथि। सभक एक हाथमे अम्तकलश एवं दोसर अभयमुद्रामे उत्कीर्ण अछि। मिथिलांचलक लोकजीवनमे जनपदीय अवधारणाक अनुसार सप्त मातृकाक नामावली भिन्न अछि। मुदा बिढ्क्षिया माइ (ज्येष्ठा, आदिमाता, मातृब्रह्म) सभमे समान रूपेँ प्रतिष्ठित छथि। यद्य सप्तमातृकाक ऐतिहासिक प्रस्तर शिल्पांकन एहि भूभागसँ अप्राप्य अछि, मुदा दशमहाविद्याक ऐतिहासिक मूर्ति सभ भीठभगवानपुर (मधुबनी) एवं गढ़-बरुआरी (सहरसा)मे उपलभ्य अछि।

छल0 u!नक पत्नी रानी पद्मावती अतिथि-सत्कार, पूजा-पाठक निमित्त ३०० (तीन सए) बीघा जमीन पचाढ़ी स्थानकेँ दानस्वरूप देने छलथिन। मुदा कहल जाइत अछि जे साहेब रामदास ओहि जमीनक दान-पत्रकेँ प्रज्वलित अग्निमे फेकि देलखिन। शिष्य लोकनिकेँ भिक्षाटन वृत्तिसँ आगत-अतिथिक सेवा सत्कार करए पड़ैत छलनि, जाहिसँ ओ लोकनि तंग आबि गेलाह आ फलस्वरूप ओऽ दान-पत्र पुनः महारानीसँ प्राप्त कए चुप-चाप राखि लेलनि, जे एखनहु धरि सम्पत्तिक रूपमे विद्यमान अछि। किछु जमीन भक्त लोकनि वेतियामे सेहो देने छथि। योग्य शिष्य सभ एहि सम्पत्तिकेँ बढ़ाए लगभग हजार बीघा बनाए देलनि। सरकार किछु जमीनपर सिलिंग लगाए देलक, मुदा व्यवस्थापक लोकनि अधिकांश जमीनकेँ वन-विभागकेँ दए गाछ-वृक्ष लगवाए देलनि। अपेक्षाकृत एखनहु ई स्थान समृद्ध अछि।

साहेबरामदास एक सिद्ध पुरुष छलाह आ तेँ हिनकामे चमत्कारिक गुण स्वाभाविक अछि। चमत्कारसँ सम्बन्धित अनेक कथा हिनकासँ जुड़ल अछि, जाहिमे एक चमत्कारक उल्लेख करब हम उचित बुझैत छी, जे हिनक अन्तः साक्ष्यसँ जुड़ल अछि।

राजा नरेन्द्र सिंहक समयमे पटनाक कोनो मुसलमान नवाब मिथिलापर आक्रमण कए देलक। राजा नरेन्द्र सिंहक सेना ओ नवाबक सेनाक बीच घोर संग्राम भेल, जाहिमे अपार धन-जनक क्षति भेल छल, मुदा राजा नरेन्द्र सिंह ओहिमे स्वयं वीरतापूर्वक युद्ध कएलनि आ शत्रु सेनाकेँ पराजित कएल। ओहि समयमे महात्मा साहेब रामदास नरेन्द्र सिंहक विजयी होएबाक कामना स्वरूप श्रीकृष्णसँ प्रार्थना कएलनि-

 

“साहेब गिरधर हरहु नरेन्द्र दुःख,

करहु सुखित मिथिलेशहि रे की”।

 

एहिपर क्रुद्ध भए नवाब हिनका बन्दी बनाए पटनाक कारागारमे बन्द कए देलनि। साहेब रामदास योगबलेँ सभ दिन गंगा-स्नान, संध्या-तर्पण, पूजा-पाठ आदि गंगहि तटपर कएल करथि। कारागारमे रहितहुँ ई क्रम हिनक निरन्तर चलैत रहलनि। लोक सभ हिनका गंगा तटपर सभ दिन देखैत छलनि। नवाबकेँ कोना ने कोना एहि बातक जानकारी भेट गेलनि। नवाबकेँ तँ विश्वास नहि भेलनि तथापि हुनका अपन कर्मचारी सभपर संदेह भेलनि आ ओऽ अपनेसँ कारागारमे ताला लगाए देलनि। तथापि साहेब रामदासक गंगा-स्नानक क्रम नहि टुटलनि। अन्तमे नवाब साहेबरामदासक पएरमे बेड़ी बान्हि कारागारमे ताला लगाए देलनि। साहेबरामदास तत्क्षणहि करुणाद्र भए अपन आराध्य देव श्री कृष्णकेँ पुकारलनि-

 

“अब न चाहिए अति देर प्रभुजी,

अब न चाहिए अति देर।

विप्र-धेनु-महि विकल सन्त जन,

लियो है असुरगण घेरि”।

 

गविते छलाह की पएरक बेड़ी ओ फाटकक ताला आदि सभ टूटिकए खसि पड़ल। नवाब आश्चर्य चकित भए गेल। ओ महात्माजीक पएरपर खसि पड़ल। साहेबरामदाससँ क्षमा माँगलक आ बादमे ससम्मान स्वागत कए मिथिला पहुँचाए देल।

एहि तरहक कएक गोट चमत्कार अछि, जेना राजा राघव सिंहक समयमे राजदरभंगामे प्रेत-बाधाकेँ शान्त करब, माटिक भीतकेँ हाँकब। कृष्णाष्टमी, जन्माष्टमी आदि उत्सवक अवसरपर अधिक साधु-सन्तक भीड़ जुटलाक बादो थोड़बहु सामग्रीमे भोजनक अवसरपर भण्डारामे कोनो कमी नहि होएब आदि कतोक चमत्कारिक घटना सभ अछि, जे हिनकासँ जुड़ल अछि। एहि सिद्ध पुरुषक चमत्कारिक घटनासभसँ लोकक हिनका प्रति कतेक श्रद्धा छल से सहजहि अनुमान कएल जाए सकैत अछि।

साहेबरामदास वैरागी वैष्णव-भक्त-कवि छलाह। पदक रचना करब हिनक साधन छल मुदा साध्य तँ एकमात्र छल भगवान विष्णुक भजन-कीर्तन करब। कहल जाइत अछि जे ओऽ अपनहि पदक रचना कए सभ दिन भगवानक भजन-कीर्तन कएल करथि। ओऽ भक्तिमार्गी छलाह आ तेँ भक्ति-मार्गक सिद्धांतक अनुरूप पदक रचना कएल करथि। भक्ति मार्गक सभ रसक पदरूपमे रचना कएलनि, मुदा प्रधान रस “मधुरं” रस सएह अछि। भगवानक कोनो एक रूपक ओऽ आग्रही नहि, सगुण-निर्गुण दुनू रूपमे मानैत छलाह, जे अपन मनोगत भाव कवितामध्य व्यक्त कएने छथि।

 

“निर्गुण सगुण पुरुष भगवान, बुझि कहु साहेब धरइछ ध्यान”।

“धैरज धरिअ मिलत तोर कन्त, साहेब ओ प्रभु पुरुष अनन्त”।

 

साहेब रामदासक यद्यपि एकमात्र पदावली उपलब्ध अछि, जाहिमे ४७८ टा पद संकलित अछि। मुदा ईएह पदावली हुनक यशकेँ अक्षुण्ण बनाए रखबामे सभ तरहेँ समर्थ अछि। भक्तिक प्रायः सभ विषयपर पदक रचना कएने छथि, यथा- कृष्ण-जन्म, वात्सल्य, वंशीवादन, संयोग-श्रृंगार, रास-लीला, झुलोत्सव आदि। रासलीला परक जेहन पद सभक ई रचना कएने छथि से प्रायः मैथिलीमे आन केओ कवि नहि कएने छथि। हिनक रास-लीला परक पदक विवेचन स्वतंत्र रूपेँ कएल जाए सकैत अछि। कृष्ण-प्रेमक अनन्यता, भक्ति प्रवणता ओ प्रसाद गुण हिनक काव्यक मुख्य गुण कहल जाए सकैत अछि। ऋतुगीत, दिन-रातिक भिन्न-भिन्न समयोपयोगी पदक रचना, जेना-प्राती, सारंग, ललित, विहाग आदिक रचना कएल करथि।

मिथिला पञ्चदेवोपासक सभ दिनसँ रहल अछि। साहेब रामदासक रचनामे सेहो भक्तिक विविध-रूपक दर्शन होइत अछि। कृष्णक तँ ई अनन्य भक्त छलाह मुदा आनो-आन देवी-देवता परक पदक रचना कएने छथि। हिनक हनुमानक फागु परक कविता देखल जाए सकैत अछि। एकरा सन्त लोकनिक फागु सेहो कहल जाए सकैछ-

 

“प्रवल अनिल कपि कौतुक साजल लंका कएल प्रयाण।

कनक अटारी कए असवारी छाड़थि अगनिक वाण॥

जरए लंक कपि खेलए फगुआ, उड़ए गगन अंगार।

धुँआ वाढ़ि अकासहि लागल दिवसहि भेल अन्धार”।

 

हिनक रचित एकटा महादेवक गीत सेहो अछि, जकर उल्लेख डॉ. रामदेव झा अपन “शैव साहित्यक भूमिका” नामक ग्रन्थमे कएने छथि-

 

“ पुछइत फिरइत गौरा वटिया हे राम।

कहु हे माइ, जाइत देखल मोर भंगिया हे राम॥

हाथ भसम केर गोला हे राम।

वरद रे चढ़ि कोन नगर गेल भोला हे राम”॥

 

विरहिणी व्रजाङ्गनाक मनोदशाक एक विलक्षण रूप एहि ठाम सेहो देखल जाए सकैत अछि:

“कमल नयन मनमोहन रे कहि गेल अनेक।

कतेक दिवस भए राखब रे हुनि वचनक टेक॥

के पतिआ लए जाएत रे जहँ वसु नन्दलाल।

लोचन हमर सतओलनि रे छतिआ दए शाल॥

जहँ-जहँ हरिक सिंहासन आसन जेहिठाम।

हमहु मरब हरि-हरि कै मेटि जाएत पीर॥

आदि”

 

मिथिलाक सन्गीत परम्परा अति प्राचीन ओ समृद्ध अछि। संगीतक रचना तँ विद्यापति ओ हुनकहुँसँ पूर्व होइत आएल अछि, मुदा रहस्यवादी संगीत-काव्य-रचना नवीन रूपमे आएल अछि, जकर प्रवर्तक साधु-सन्त लोकनि भेलाह। जाहिमे सन्त साहेब रामदासक स्थान अग्रगण्य अछि। हिनका लोकनिक रचनाक प्रभाव प्रायः सभ वर्गपर पड़ल। हिनक प्रायः सभ कवितामे रागक उल्लेख अछि। अतः एहिपर संगीत-शास्त्रक अनुकूल शोध-कार्य कएल जएबाक आवश्यकता अछि।

साहेब रामदास परम वैरागी सुच्चा साधु छलाह, भक्त छलाह आ तेँ हिनक भाषापर सधुक्करी ओ तत्काल प्रचलित व्रजभाषाक किछु प्रभाव सेहो पड़ल अछि, तथापि हुनक जे पदावली उपलब्ध अछि से मैथिली साहित्यकेँ समृद्ध बनएबामे अपन महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कएने अछि। भक्ति-भावनाक सरलता ओ सहजताक दृष्टिएँ हिनक भाषा सरल ओ सहज अछि। भक्ति-भावना परक एहन कविता मैथिली-साहित्यमे प्रायः दुर्लभ अछि। हिनक भक्ति परक गीत एखनहु मिथिलाक गाम-घरमे बुढ़-बुढ़ानुसक ठोरपर अनुवर्तमान अछि, जकर संकलन करब परम आवश्यक अछि।


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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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