Sunday, April 05, 2009

विदेह ३१ म अंक ०१ अप्रैल २००९ (वर्ष २ मास १६ अंक ३१)-PART- II

विदेह ३१ म अंक ०१ अप्रैल २००९ (वर्ष २ मास १६ अंक ३१)-PART- II


३. पद्य
३.१.कामिनी कामायनी: भाषा
३.२. डॉ. शंभु कुमार सिंह-लोरी
३.३. सतीश चन्द्र झा- तीन टा कविता
३.४. माय (कविता) -मनीष झा "बौआभाई"
३.५.ज्योति- मिठगर राैद
३.६.सुबोध ठाकुर
कामिनी कामायनी: मैथिली अंग्रेजी आ हिन्दीक फ्रीलांस जर्नलिस्ट छथि।

भाषा
बङ दैन्य भाव सॅ
आखर आखर
खिहारि
कल’ जाेरि
करैत छल निहाेरा
विकासक’ नाम प’ त’
छाेङिए देलिए गाम
मुदा नै बिसरू हमरा
हम अहाॅ के आन
अहाॅक शान
अहाॅक पहचान छी ।
पढुआ बाब्ूा भैया नूकैत रहला
काेन तााकि क’ इम्हर उम्हर
कान में तूर ठूॅसि बहिर सेहाे भ’ जायथ
पाॅछा सॅ अंगा खीचैत
दाॅत निपाेरति
फेर कलपै भाखा
जूनि बिसरू हमरा
बाजू
नहि त हम नष्ट भ’ जायब

हम अहाॅक बाबू दादू के भाखा छी
हमरा फेर कत्त पायब
लिपि त’ विलुप्ते प्रायः
असगरे आब हम
ंंमातृभूमि के नाम
आ’ मिथिळा के प्राण छी
बाबू भैया तमसेळाह
कंधा उचकबैत
मुॅह बिचकबैत
कहला
ताेरा बाजि क’ हम गॅमार बनल रहू
धैंंंंंंंम नहि जायत हमर उत्त्धारन
जाे तू गामे घर में नुकाएल रह
सबहक अपमान आ दुत्कानर सह
इर् महानगरि छैक महानगरि
एत्त साहबक भाखा चलै छै
लार्ड मैकाले के
आेहि दुर दुर सॅ
कै बरख धरि पङल रहल बेसुध
हाेश अबीते मातर फेर
धेने रहल पछाेर
परदेशाे में हिम्मत नै छाेङलक
गहिएने रहल
चरण कमल अहि भैया
अहि दीदी आेही मैंया के
आ’ एक दिन ठहक्काङ मारि क’
हॅसि पङल जाेर सॅ
देखू हम त’ अमर बाेली जकाॅ
महानगरि मे पसरि गेलहुॅ
हम गमार कत्त’ हमर साहित्यम विशाळ अछि
आय देशक राजधानी में ठाठ सॅ
अभिजात्यर वर्गक’ मुॅह सॅ निकलि रहल छी
जन मानस में पसरि रहल छी
हम सरिपहुॅ बसि रहल छी ।
मैथिली कविता
रचनाकार : डॉ. शंभु कुमार सिंह


लोरी

तू लोरी गा हम सूति जाएब
माए लोरी गा हम सूति जाएब
लय नहि छौक तँ की
स्वर तँ छौक?
छी भूखल, देह अछि काँपि रहल
ठंढक सँ
ई माया नगरी अछि,
हमरा बसन नहि अछि
तँ की भेल ज’र त’ अछि?
माए! हे देखही..
ओकरा गाड़ीमे
उजरा कुकुर अछि घूमि रहल
खा दूध-भात
ई पशु जाति
किछु खाइत अछि
आ किछु करैत अछि जियान
तू मानव छेँ
करैत छेँ श्रम
दिन रातिक श्रम केर ई फल छौक
तोहर नेना अन्नक लेल बेकल छौक
कलुष-भेद-तम-नियम विषम केर
ई नदी आब नहि बहतैक
हमर जाति
ई कुठाराघात
काल्हिसँ नहि सहतैक
टूटि जेतैक एक्कर विषदंत
भ’ जेतैक काल्हि एक्कर अंत
अछि अस्त्र नहि
मुदा हाथ तँ अछि?
आ फेर उपर ‘हर’ तँ छथि?
तू लोरी गा हम सूति जाएब
माए लोरी गा हम सूति जाएब।

सतीश चन्द्र झा,राम जानकी नगर,मधुबनी,एम0 ए0 दर्शन शास्त्र
समप्रति मिथिला जनता इन्टर कालेन मे व्याख्याता पद पर 10 वर्ष सँ कार्यरत, संगे 15 साल सं अप्पन एकटा एन0जी0ओ0 क सेहो संचालन।

1.नाव आ जीवन


नाव नदी मे चलल सोचि क’
दूर नदी के अंत जतय छै।
देखब आई ठहरि क’ किछु छण
नदी समुद्रक मिलन कतय छै।
छै संघर्ष क्षणिक चलतै जौ
जल धारा विपरीत दिशा मे।
चलब धैर्य सँ भेटत निश्चय
छै आनंद मधुर आशा मे।
कखनो अपने पवन थाकि क’
मंद भेल चुपचाप पलटतै।
फेक देब पतबार अपन ई
जल धारा के दिशा बदलतै।
छोट नाव के एतेक घृष्टता
सुनि क’ भेल नदी के विश्मय।
नाचि रहल अछि जल मे तृणवत
बुझा रहल छै जीवन अभिनय।
की बुझतै ई नाव नदी मे
जीवन पथ धारा अवरोधक।
केना चीर क’ निकलि जाइत अछि
नहि छै भय ओकरा हिलकोरक।
तेज धार छै प्राण नाव के
जीवन छै सागर अथाह जल।
नदी किनारक छाँह मृत्यु छै
जल विहीन जीवन के प्रतिपल।
नहि होइ छै किछु भय जीवन मे
मृत्यु देखि सोझा मे प्रतिक्षण।
अपने चलि क’ नाव मनुख के
सिखा रहल छै जीवन दर्शन।
क्रुद्ध नदी के जल प्रवाह मे
उतरि गेल जे ‘तकरे जीवन’।
भय संघर्ष,निराश,कष्ट सँ
ठहरि गेल ओ ‘जड़वत जीवन’।


2. मौनक शब्द

हेरा गेल अछि शब्द अपन किछु
तैं बैसल छी मौन ओढ़ि क’।
वाणी जड़वत, जिह्वा व्याकुल
के आनत ग’ ह्नदय कोरि क’।
के बूझत ई बात होइत छै
मौन शब्द,वाणी सँ घातक।
राति अमावश के बितला सँ
जेना इजोत विलक्षण प्रातक।
अछि सशक्त जीवन मे एखनो
ई अभिव्यक्तिक सुन्दर साध्न।
एकर चोट छै प्रखर-उचय अग्नि सन
शीतलता चंदन के चानन।
नहि छै आदि -उचयअंत मे समटल
अंतर मे विश्राम वास छै।
आनंदक अतिरेक ह्नदय मे
नव अनुभूतिक महाकाश छै।
अछि अव्यक्त मौन अक्षर सँ
ज्ञान दीप के प्रभा प्रकाशित
दृष्टिबोध् सँ दूर मौन अछि
शब्द अर्थ सँ अपरिभाषित।
वाणी अछि ठहराव झील के
मौन नदी के निश्छल धार।
उठा देत हिलकोर हृदय मे
जखने बान्हब धार किनार।
छै संगीत मधुर स्वर झंकृत
नै छै अर्थ मौन के जड़ता।
कोलाहल सँ दूर मौन के
वाणी सँ छै तिव्र मुखरता।
कतेक विवस अछि शब्द जगत के
वर्तमान के व्यथा देखि क’।
असमर्थ अछि सत् चित्राण मे
की लिखू हम शब्द जोड़ि क’।
3
चुनाव
लागत फेरो पांच साल पर
संगम तट पर कुंभक मेला।
ओहिना फेरो पांच साल पर
राजनीति के पसरत खेला।
रंग बिरंगक चिन्ह बनायेल
टांगल नव नव सुन्दर झंडा।
अछि महान इ पर्व देश के
निकलत बाहर जेलक गुंडा।
छलथि जतेक अनपढ़ उदंड सब
भेटलनि किछु रोजगार गाँव मे
लाठी,ठेंगा,बैनर,झंडा
भेटलनि पार्टी सँ इनाम मे।
चमचम खाधी वस्त्रा देह पर
किछु गमछा मे बान्हल टाका
जोर जोर सँ नारा पढ़ि क’
गढ़ता किछु जीवन के खाका।
बँटि जायत भोटक दुविधा मे
पिता पुत्रा आ भाई सहोदर
डुबत फेरो लाल रक्त सँ
सौंसे धरती फाटत दर दर।
लालच लोभ स्वार्थ मे परि क’
चलतै तेज हवा उन्मादक
छल बल मे ओछरायत जनमत
जड़त आगि सौंसे अवसादक।
लगै कतेक छै नीक कान मे
सुनि क’भाषन नेता मुख सँ।
देखा देत किछु सुन्नर सपना
राज करै अछि अपने सुख सँ।
हमरे मिलि क’ दिअ भोट सब
अछि हमरे दल सभ्य बिचारक।
छी देशक हम असल हितैसी
हम छी बेटा अहीं समाजक।
रहत आब नहि कियो देश मे
दीन,हीन,दुर्बल,बैसारी
सबके शिक्षा, सबके भोजन
सब घुमता घर घर अधिकारी।
छी ! छी ! कतेक झूठ अछि भाषण
मिठगर वाणी , कपट मोन मे।
प्रजातंत्रा अछि भोट दैत छी
सबटा बुझितो अपन मोन मे।
भ जायत जँ प्रजा सुखितगर
के नेता के पाछाँ चलतै ।
गाजा बाजा ढ़ोल बजा क’
नारा जयजयकार लगेतै।
बनत फेर किछु मंत्राी, रंाजा
सबटा दौड़ल दिल्ली भागत।
हैत अनिष्ट एक दिन कहियो
सूतल जनता जहिया जागत।

माय (कविता)

मनीष झा "बौआभाई"

एक-एक क्षण जे बेटा के खातिर
कर जोड़ि विनती करैइयै माय
बिनु अन्न-जल ग्रहण केने बेटा लै
जितियाक व्रत राखैइयै माय
आ एहि तरहें माय हेबाक
कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय


जिन्दगीक रौदा में तपि क'
बेटा के छाहड़ि दैइयै माय
बरखा-बिहाड़ि सन विषम समय में
आँचर स' झाँपि राखैइयै माय
आ एहि तरहें माय हेबाक
कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय


घर में छोट-छिन बात पर में
बाप स' लड़ि लैइयै माय
बाप स' लड़ि बेटा के पक्ष में
फैसला करैइयै माय
आ एहि तरहें माय हेबाक
कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय


बेटा नै जा धरि घर आबय
बाट टुकटुक ताकैइयै माय
ओठंगि के चौकठि लागि बैसल
राति भरि जागैइयै माय
आ एहि तरहें माय हेबाक
कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय


वयस कियैक नै हुऐ पचासक
तहियो बौआ कहैइयै माय
अहू वयस में नज़रि ने लागय
तैं अपने स' निहुछैइयै माय
आ एहि तरहें माय हेबाक
कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय


होय जानकी वा अम्बे के प्रतिमा
सभ रूप में झलकैइयै माय
तीर्थ-बर्थ सब मन के भ्रम छी
घर में जे' कुहरैइयै माय
कर्त्तव्य हमरो ई कहैइयै
घर में नै कलपय ई माय
आ एहि तरहें जन्म देल त'
माय के पद पाबय ई माय
ज्योति
मिठगर राैद
ठिठुरैत ठंढ़ा के झटकारि कऽ
प््राैकृति पहिनलक वसन्तक आवरण
खर पतवार के बहारि कऽ
जाड़क मानू हाेलिका संग भेल दहन
रंर्गबिरंग फूलक छींट सऽ
फगुआ खेलाएत पूरा वतावरण
एहेन मे हर्षित भऽ
सबहक प््रा्शंसा अछि सूर्यके अर्पण
जकर ऊष्मा पाबि कऽ
आयल अछि अतेक सुन्दर परिवर्तन
फागुनक मिठगर राैद सऽ
डेराइत पड़ाइत माघ आऽ अगहन
सुबोध ठाकुर ,सी.ए.। गाम-हैंठी बाली-मधुबनी।

केना होएत मिथिलाक जीर्णोद्धार
सभ मारि रहल चीत्कार
सगरो मचल हाहाकार,
किओ नहि ककरो दुख बुझएवला,
आर नहि करएवला अछि विचार,
सभ मारि रहल चीत्कार
सगरो मचल हाहाकार,

बेटीबाप मथाहाथ दए कानए
बेटावला माला जापए,
दहेज बनल अचि मिथिलाक अलंकार,
सगरो मचल हाहाकार

कहाँ गेल सुन्दर सृजन रचना
कवि विद्यापति केर भैरवी वन्दना
बदलि गेल सभक व्यवहार,
सभ मारि रहल चीत्कार


सभ अपन वर्चस्वक खातिर,
बनल जाइत अछि कुटि दुष्ट शातिर,
कहू एनामे केना होएत मिथिलाक जीर्णोद्धार?
सभ मारि रहल चीत्कार
सगरो मचल हाहाकार।

बालानां कृते- 1. मध्य-प्रदेश यात्रा आ 2. देवीजी- ज्योति झा चौधरी
1. मध्य प्रदेश यात्रा
सातम दिन ः
29 दिसम्बर 1991 ़ रविदिन ः
अपन खानाबदाेशी जीवनके कायम राखैत हमसब आइर् 7ः30 बजे बससऽ ‘खटिया बेरियल’ के लेल विदा भेलहुॅं।करीब 1ः30 बजे दुपहरिया मे आेतय पहुॅंचलहुॅं।कनिये देरक प््राीतीक्षाक बाद एकटा झाेपड़ी जकाॅं ढाबा सदृश रेस्तराॅंमे हमसब भाेजन केलहुॅं।चारिटा बाॅंस पर एकटा टाटक छत बनाआेल गेल छल।नजदीकक ऊॅंच ऊॅंच गाछ सबमे बानर सब छल जे हलचल मचाैने छल। हमर सबहक कतेकाे संगी सबहक टाेपी आ स्वेटर लऽ कऽ भागि गेल।स्वेटर तऽ वापस भेटल मुदा टाेपी नहिं भेटल।करीब 3 बजे दुपहरियामे हमसब सातटा खुजल जीप पर सवार भऽ कऽ ‘कान्हा नेशनल पार्क’ मे प््रा वेश केलहुॅं।
सड़क के आसपास स्वच्छन्द घुमैत छींटदार हिरण चीतल मयूर इत्याभदि झुण्डमे घुमैत देखायल।बन्दर सबतऽ अनगिनत छल।इर् उद्यान प््रामाेजेक्ट टायगर द्वारा संरक्षित छै।अतय बाघ आरक्षित छै।परन्तु हमरा सबके बाघ देखबाक सुअवसर नहिं भेटल।अहि उद्यानक बीचाेबीच एक संग्रहालय छै। अकरा चारिटा दीर्घामे बाॅंटल गेल छै।पहिल दीर्घामे गाैर बाघ चीतल आदि जन्तुआेंके अस्थि कंकाल एवम् जीवाश्म राखल छै।दाेसर तेसर आर चारिम दीर्घा मे क्रमशः पक्षीसबहक पंजा जानवरके सिंग इत्यालदि राखल छै।विभिन्न जानवर सबहक खाद्यप््राघवृति व जीवनक्रियक जानकारी सेहाे देल गेल छैै।इर् सब देखिकऽ घूरैत घूरैत पाॅंच साढ़े पाॅंच बाजिगेल।आब जबलपुर लाैटनाइ सम्भव नहिं छल तैं हमसब ‘मचान कम्पलेक्सै’ नामक हाेटलमे रूकि गेलहुॅं।इर् शहरके हाेटल जकाॅं स्टैण्डर्स वला नहिं छल लेकिन अहि खपड़ैल मकानमे जंगलके नजदीक रहनाइर् बहुत राेमांचक लागल।

2.देवीजी :
देवीजी ः बढ़िया भाेजन
देवीजी विद्यालय पहुॅंचली तऽ देखली जे बच्चा सब खूब हुल्लड़ मचाैने अछि। पता लगलैन जे आे सब प्ला स्टिकके नकली बिस्कुटके एक टा बच्चाके टिफिनमे राखि देलकै आ आे बच्चा आेकरा असली मानिकऽ खाय लगलै।अहि तरहे सब आेकरा अप््राकिल फुल बनाैलक।देवीजी के सेहाे हॅंसी आबि गेलैन। फेर आे सबके कक्षामे जाय कहलखिन। आेतय भाेजने पर बात हाेयर्तहाेयत आे पाैष्टिक आहार दऽ बताबऽ लगलखिन।आे कहलखिन जे बच्चा सबमे शारीरिक व मानसिक विकास सबसऽ बेसी हाेयत छै आऽ अहि समयमे भाेजन पर विशेष ध्यान देबाक चाही।

आे कहलखिन जे मुख्य तः तीन प््रािकारक भाेजन हाेयत अछि। पहिल शरीर बनाबै वला भाेजन जेना कि प््रा ाेटीन। प््राखाेटीन दूध़ दही़ मेवा़ दाल़ि विभिन्न प््रा कारक बीन्स अर्थात काबुली चना़ राजमा इत्यांदिमे प््रा चुर मात्रामे भेटैत छै। दाेसर प््रा कारक भाेजन अछि उर्जा प््राभदायक भाेजन जेना कि काबाेर्हाइड्रेट जे कि तेल़ चीनी़ गुड़़ गहुम़ चाउर इत्यारदि मे भेटैत छै।तेसर तरहक भाेजन अछि शरीर के सुचारू रूपसऽ चलाबैत रहैवला भाेजन जाहिमे विटामिऩ विभिन्न प््राेकारक लवण इत्यारदि आबै छै। अहि के पाबैलेल फल़ साग़ तरकारी सब खेबाक चाही।आे कहलखिन जे बेसी तेल नहिं खाउ। नून हमेशा आयाेडीन वला खाऊ।अहि तरहे बच्चा सबके संक्षिप्तह रूपमे भाेजन के जानकारी देलखिन।
विश्व स्वास्थ्य दिवस 7 अप््राकिल कऽ छल जाहि दिन सन् 1948 इर्सवी मे वर्ल्ड हेल्थ आॅरगनाइजेशन के स्थापना भेल छल। आेहि दिन सब कियाे सामाजिक कल्याणक माेन बनाैलैथ। लाेकक जुटान कऽ गर्भवती महिला सब लेल विशेष रूपसऽ बढ़िया भाेजन आ चिकित्‍साक महत्ता बताैल गेल।ग्रामवासी सऽ बच्चा सबके बिमारी सऽ बचैलेल आवश्यक टीका उचित समय पर जरूर लगाबी से अनुराेध कैल गेल।गरीब सबके भाेजन कराैल गेल।तकर बाद चिकित्सात जगतमे आधुनिक विकासक जानकारी देल गेल। बालिका सब लेल विशेष रूपसऽ सर्विकल कैंसर सऽ बचैके टीका जे अखनाे भारतमे उपलब्ध नहिं अछि तकर जानकारी देल गेल।मुदा विदेशमे अकर प््रासावधान बच्चेमे कैल गेल छै आ पैघाे भेला पर 21 वर्षके आयु तक के लेल उपर्युक्तु टीका उपलब्ध छै।देवीजी के हार्दिक इर्च्छा छलैन जे भारताे मे इर् सुविधा यथाशीघ््रा उपलब्ध हाेइर्।


बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...