Saturday, April 18, 2009

कथा- चूल्हि - भालचन्द्र झा

कथा- चूल्हि - भालचन्द्र झा



'... चूल्हि आ स्त्री - दुनूक प्रारब्ध एके जकाँ होइत छैक, बुझलहक? जरैत-जरैत जीबइए में दुनूक गुजरि होइत छैक... गै दाई !'
जाबैत जियलै - ई गप्प, माय हमरा सदिखन कहिते रहलै। ई कह' में जे मर्म नुकाएल छलै, से बुझबाक उमिर त' नहिंए रहय, मुदा जाहि तरहैं उसाँस ल' क' माय ई बात कहय, ताहि स' ई त' लागबे करय जे ई गप्प अबस्से कोनो तरहक जीवन-मंत्र हेतैक - अहि तरहक विचार मोन मे आबि आबि जाय।
... आ देखियौ भाग्यक खेला, जे हमर आ चूल्हिक संग कहाँदनि जनमिते देरी कि धरा गेलै।
माइये कहथिन्ह जे हमर जनम अहिना जाड़ स' कनकनाइत राति मे भेलै। हे दाई - जनम त' भ' गेलै, मुदा मुँह स' पहिल केहां निकाल' लेल चुल्हिएक सहारा लेब' पड़लै।
अपन गरमी द' क' चूल्हिए हमरा बचा लेने रहय। आ ताहि लेल वा की, जे घर-आँगनक लोक आओर हमर नामे ध' देलकै चुल्हिया' ...। आब कहियौ त' भला, इहो कोनो रीत भेलै नाम जोड़बाक !
ओ त' धन्यभाग हमर, जे बबा के की फुरेलन्हि आ नामकरणक दिन हमर नाम राखि देलखिन्ह - 'सिया सुन्नरि'।
तैयो घर-आँगन के त' बूझिते छियै ने' ... एक बेर जे कह' लगलै 'च्ुूल्हिया' त' ओ कियो बदलै भला! हे दाई, 'सिया-सुन्नरि'। ई नाम त' मात्र कागजे लेल रहि गेलै।
बबा त' बड्ड खिसियैथिन्ह मुदा लोको सभ थेथर भ' गेल रहै। हुनका सोझा मे त' सभ किओ दम साधि लै, मुदा जखने परोछ भेलाह कि फेर सभके कोनो झरकबाही लागि जाय छलै... चुल्हिया, चूल्हियाक से किलोल मचि जाय जे की कही ... आई त' हँसियो लागि जाइयै । मुदा छोटपन मे हमरा बड़्‌ड खराब लागय, बुझलहुँ की?
आई बैसल-बैसल जहन ओ गप्प सभ मोन पड़ेैयै त' विचार' लागै छी जे वास्तव में, एहन आगांक बिचार करयबला पुरूख पात्र के रहब घर में कतेक जरूरी होई छै। नञि त' घूमैत रहू जनम भरि अपन एहने जरल धनकल सन नाम ल' क' ... चुल्हिया ..पनबसना दाई ... ताबा कुमारी ... चकला देबी ...!!! धुर्र जाउ, अहाँ के हँस्सी लगैय' ...
आ हम सोचै छी जे देखियौ त'। बेटी आओर के एक गोट नीक नामो टा नसीब नञि होई छै अइ समाज मे... तहन आर कथीक आस धरै ओ...? कोन भरोस पर जीबय ओ?
... त' कह' जे लगलहुँ ... जे कनि बूझ' सूझ' जोगर भेलहुँ त' देखियैक जे हमरा घरक चूल्हि जहाँ कनिको करियैलै कि हमर माय ओकरा लीप-पोइत क' ओकरा चिक्कनि चुनमुन बना दैक।
चूल्हि सेहो ओकरा लेखे एकटा नान्हि टाक बच्चे टा रहै। जाहि माया आ ममति स' ओ हमरा आओर के धोबै-पोछै छलै, ओहि स' कम माया ममति नञि देखलियै हम ओकरा चूल्हि लीपैतकाल। आ, कने नीक स' सोचियौ, त' चूल्हि स' जे ओकर सिनेह रहय से अनर्गल नञि छलै ने! यै! जे चूल्हि आजन्म जरि धनकि क' लोग आओरक पेट भरै छै, ओकरे प्रति लोक एतेक कृतघ्न कोना क' भ' जाइत छैक? ... माउगि के ल' क' सेहो अपना समाज मे अहिना होबैत एलैये आई धरि। भरि जिनगी दोसरे लेल जरितहु-धनकितहु बेर पडला पर ओकरो अही चूल्हि जँका कात क' दै छैक लोक आओर। जिबिते जी मुँह में छाउर भरने पड़ल रहैत अछि अपन भनसाघर क एकटा कोन्टा मे...।
धुरि जो। हमहूँ ई कोन जरल धनकल सनक कथा ल' क' बैसि गेलहँु। त'...कहैत जे छलहुँ ...। रसे - रसे ई चूल्हि लीप' पोतक काज हमरे जिम्मा लागि गेल। आ ओहि में हमर मोने सेहो लाग' लागल। बुझलहुँ ! फूसि कियैक बाजब? आहि रे बा। ले बलैय्या के। एकटा बात त' कहब बिसरिए गेलहुँ। हमर माय बड्ड लुरिगर आ तैं अपना लूरि-ढंगक कारणे पूरे परोपट्टा में नामी। सत्यनारायण भगवानक पूजा मे ओ जे अरिपन दै से की कहू। देखितहुँ त' आँखि चोन्हरा जयतियैक। केहनो खरकट्टल बासन कियैक नञि रहौ - से कहै छी जे यदि ओ माँजि दैक त' बर्तन चानी जकां झलमल क' उठै छलै। हे, छठि मे अहिबातक पातिल जे ढेरितै - तँ एहन, जे गाँम के लोक कहै छी, भकचन्ह रहि जाइत छलै। माउगि बला कोनो एहेन लुरि बाँकी नञि छलै, जाहि मे ओ ककरो स' पाछां भ' जइतियैक, कहै छी जे से । सिआइयो-कढ़ाई सीख' लेल परोपट्टाक नवकनिञा सभ के कहै छी जे से सिहंता लागल रहैत छलै जे कहिया ओ हुनकर अंगना मे आबथु आ कहिया ओ सभ हुनका स' अपन मनपसीनक चीज बतुस आओर बनाबय के सीखि लियए।
माय मे बस कमी छलैक त' एकेटा, जे ओ नैहरक बड्ड गरीब छलै ! आ गाँम-घर मे त' बुझले अछि, जे जकरा लग टाका पूँजीक ढेर छै, सएह लोक मातबर कहल जाइत छैक। ओ मनुक्ख मे गनल जाइत छैक। आ कि नञि? लूरि-बेबहार त' बादक गप्प भेलै। टाका पूँजी रहलै त' बींगलो-बताह सभ बुधियार भ' जाइ छै। आ से जे नञि रहलै त' आँखि-कान रहितहु लोक आन्हरे-लांगड़ बुझल जाइ छै।
यै, जौं सच-सच पूछी त' अपना सभ मे माउगि-मनुक्ख स' बियाहदान थोड़बे कएल जाइत छैक? बियाह-दान त' होइत छैक जर-जमीन स', टाका-पूँजी स', किंवा धन-संपत्ति, मान-मरातब स'। माउगि त' ओहि बियाहक उललक्ष्य मे देल गेल एकटा सनेसे (भेंटवस्तु) छैक। से कियैक त' पूँजी-टाका कतबो कियैक नञि रहौक, एकदिन त' खतम भइए जाइत छैक। तहन मोन कोना क' रहतैक जे अई घर मे बियाहो भेल छै ककरो! से बस, माउगि नामक सनेस के देखि क' ई बुझल जाइत रहैत छैक जे अहू घर मे एकटा बियाह भेल छैक। तैं बूझियौ जे माउगि भ' गेलै यादगारक एकटा समान। बुझलहुँ कि नञि। बस अहिना एकटा समान रहै हमर माय।
से कियैक त' हमर दाई जे रहथिन - कहै छी जे बड्ड लोभी। हुनका भगवान संतोषक नामक वस्तु जेना देनेहि नञि रहथिन्ह जिनगी मे। बार रौ बाप। चानी परक तेलो चाट' लेल तैयार रह' बला एहन लोभी स्त्री हम नहीं देखलहुँ आई धरि, से जे कहै छी। ओ त' हमर बाबा जाबति समंगगर रहथिन्ह, ताबति हिनकर जितुए नञि चलैन्हि तैं, वरना हमर माय एहि घर मे अबितियैक भला? बाबा अपना जुतिए माय के पुतोहु बनाक' ल' त' एलखिन, मुदा अँगना मे त' जे हाल ओकर करथिन दाई से दलान पर बैसल ओ बेचारे की जान' गेलथिन्ह। आ गरीबी जे आदमी के सहनशीलता सिखा दैत छै, से त' अहां के बुझले अछि। हमर माय अपन करमक लेख बुझि क' सभकिछु चुपचाप सहन कएने जाइ। ककरा कहितियैक! के रहै ओकर अपन, जकरा कहिक' दू छनक दु:खो बाँटि लितियैक? नैहर बला सभ तँ छौंरी सभके ब्याह-दान करबा क' कहुना क' अपन पतिया छोड़ा लैये ने। तकर बाद त' कहबी छै जे ओ आ ओकर तकदीर। जे जे पा्ररब्ध छै ओकरा लेल, तकरा स' ओकरा सभके कोन सरोकार ।
आ दैबक रचना देखियो, एकरे ओ सभ हिन्दू धर्मक महादान 'कन्यादान' कहै छथि। दानो कर' लेल कन्ये भेटलन्हि भगवानक ई भक्त लोकनि के। बुझलहूँ। ओहि काल मे की अखनो। आस्त्तिकता-नास्तिकताक सवाले नञि! मात्र कर्तव्य दुधारी चलेनाई आ नामे भ' गेलै ई दानक कन्यादान त' अहि मे किओ की क' सकैय'? बेटा के दान कर' के बात नहिं फुरैलनि। हँ, बेटाक बिक्री त' होइते छलै, आइयो होइते छै। ओह, बिक्री नञि, कन्यादान जकाँ एकरो सम्माननीय नाम छै - तिलक दहेज। बेटीक सुख लेल बेटीक भावी घर के खलिहान आ कोठी जकाँ भरि देबाक कर्तव्य बोध ! नञि जानि हम सब कहिया धरि एकरा सभके करमक लेख कहि-कहि के अपना आओर के बहटारैत रहबै।
त' कह' जे लगलहुँ ...
हमरा माय मे आ गाय मे कोनो अंतर नञि रहै, बुझलहँु? सभ लाथे। हम जखन-जखन गाय के नबेद खुआब' जइयै - अकस्माते कहै छी जे हमर ध्यान ओकर आँखि दिस चलि जाय। सदिखन लागय जेना ओहि आँखि में करूणा भरल रहै छै।
करूणा छोड़ि क' जेना दोसर कोनो भाव भगवान भरनैये नञि रहथिन्ह गायक ऑखि मे!
आ एम्हर हमरा माय के आँखि मे सेहो कोनो भय आ करुणाक मिश्रित भाव एहन रचि-बसि गेल रहै जे भय ओकर देहक दोसर नाम भ' गेल रहै आ करुणा आंखिक। जखन देखितियै, जेना डेराएले रहै आ दयनीये बनल रहै। लागै जेना अहि घर मे सदिखन ओ अपना के असुरक्षिते बुझै। आ सरिपहुं अही डरक खातिर ओकरा मे चौबीसो पहर खटैत रहबाक ताकति आबि गेल छलै। कखनो जे बैसल देखितीयै माय के! ओह! कहियो, कखनो, पलखतियो लेल!
हे... मुदा एकटा बात जे कहलहुँ - आँखि बला। सँाचे कहै छी, आँखि कहियो झूठ नञि बाजि सकैयै। अहाँक मोनक छोट स' छोट छीन उथल-पुथल के देखार क' दइत छै ई आँखि। तैं देखै नै छियै जे अइ पुरूष-प्रधान समाज मे नियमे बनि गेल छै जे कोनो माउगि पुरूषक सोझा मे आबि क' ठाढ़ नञि भ' सकैय', ठाढ़ भ' क' नञि रहि सकैये। डर बनले रहै छै आ कि नै। सदिखन तकरा नुकौने रही जे कतहु आँखि मे किओ किछु देखि लेलक, तहन तँ उधारे भ' जायब। कत' नुकाएब अपन ढ़ोंगी स्वरूप...? तैं नियमे बना देलकै धोधक आ नाम द' दैलकै संस्कृति आ परंपराक। यदि संस्कृति आ परंपराक एतबे धेयान रहै छै त' पुरूष पात्र कियैक नञि करै छथि ई सभ' परहेज, पाबनि तिहार, व्रत उपवास, कोखि सेनूर लेल सभ थान-भगवती थान, दुर्गाथान, महावीर थान गोहरबैत, हरतालिकाक निर्जला उपास करैत, बटसाइतक बड़ भगवानक 108 फेरा लगबैत। कहू त' भला जे इहो कोनो नियम भेलै जे पुरूष पात्र अपने त' सांढ़ जँका छुट्टा, अंबड बनल घूमैत रहौक आ माउगि आओर जोताएल रहौक अपन चूल्हा-चौकी मे...।
धुर्र जो, हमहूँ की अनर्गल बात ल' क' बैसि गेलहुँ।
त' कह' लगलहुँ जे हमर माय बेदसा बेदसा भ' भ' क' काम करै। आ हमर दाई जखन अबै त' ओकरा संहारे करबाक पाछू लागल रहैक। कियैक... त' नैहर स' किछु दान-दहेज नञि आनलकै ने, तैं!
आ ताहू पर देखियौ, कतबो राति बीत जाए... तैयो हमर माय दाई के चानि पर तेल रगड़ने, हुनक गोड़ हाथ जाँतने बगैर नञि सूतै। बुझलहुँ। अपन ई कर्तव्य ओ मरितो दम धरि नञि छोड़लकै। आ तैयो ई हडासंखनी के कहै छियै जे करेज नहिं पसिजलै।
आ... ई सभ देख क' हमर एकटा विचार पक्का भ' गेलै जे माउगिक मोजरि ओकर लूरि सँ बेसी कीमती छै ओकर नैहर स' आब' बला बिदाईक समान के। बियाह दान आई काल्हि स्त्री पुरूष मे नञि ने कएल जाई छै। ओ त' कयल जाई छै जर-जमीन सँ... टाका-पूँजी सँ ... धन-दौलति सँ... मान मरजाद सँ... मातबरी स'। ओत' हमर भागक लेख जे हमर बियाह माय के रहिते भ' गेलै। बाबू त' नहिंए रहथिन्ह। सासुर अयलाक बाद कहियो किओ गाम घर से एम्हर-ओम्हर स' आबि जाय, त' माय के समाचार कने-मने बुझि जइयैक। मोन हुअए, जे भरि पोखि हुनका आओर स' गप्प करी। मुदा सासु बीच मे मचिया ल' क' बैसि जातथि। त' जे आएल छल, ओकरा स' भेंट घांट करबाक लेल हम जे भीतर स' छन भर लेल दलानक कोठरी मे आबी त' मात्र औपचारिक हाल-चालि पूछलाक अतिरिक्त कइए की सकै छलहुं। तइयो किओ-किओ सासुक परबाहि नञि क' क' मायक व्यथा बखानिए जाए आ ई सभ सुनिक' त' हमर कोंढि फाटि जाय...। सुनि क' हेहरू भ' भ' क' कान' लागी। बुझलहुँ। आर कइये की सकतियैक? हमहूँ त माउगे रहियै ने ? ओम्हर जेना ओ बन्हाएल... ओहिना एम्हर हम बन्हाएल...। कोनो लाथे कोन्टाबला घर मे चलि जाइ आ मुंह मे अँचरा कोंचि क' खूब... भरि मोन कानी।
कहू त'... जाहि घर मे अपन दु:खो के नुकाए क' भोग' पड़ै... ओकरा घर कहल जेतै। याहि टा होई छै अपन घर? माउगि लेल, माउगक अपन घर लेल, जाहि लेल शास्त्र सम्मत शिक्षा, जे जाहि घर मे डोली उतरौ ताहि घर स' अर्थीए उठौ गै बाउ। एहन एहन घर । मुदा उपाय? थू, एहन अपनापन पर!
हे दाई, अहिना होइते-होइते एक दिन इहो सुनि लेलियैक जे माय अपन असावधानीक कारणे चूल्हि मे जरि क' मरि गेलै...।
अँ ... यै .. जाहि चूल्हि के ओ अपन संतानों स' बढ़िक परिचर्या केलकै, सएह चूल्हि ओकरा जरा देलकै। के पतियेतै एहेन-एहेन कथा पर।
आओर किओ पतियाओ वा नञि, हमरा त' रत्तीयो भरि विश्र्वास नहिं भेलै अइ बात पर।
बूझि त' गेलियै सभ किछु, मुदा जकर हेराई छै, ओकरा बाजब के अधिकार त' नहिंए रहि जाइ छै ने यौ! के सुनतै ओकर आक्रोशक कथा? के बूुझतै ओकर मोनक व्यथा। भीतरे-भीतरे दाँत पर दाँत गस्सा क' क' इहो आघात पचा लेलहुँ...।
बुझा देलियै मोन के जे अहू लाथे जरैत-जरैत जीब' स' त' ओ बचि गेलै। जीबिते में कोन सुख रहै जे मरला स' कम भ' जयतयन्हि ! सोचै छी जे चूल्हियो के नै देखल गेलै ओकर अवस्था। तैं ल' लेलकै ओकरा अपना कोरा में... जेना साीता के अग्नि माता ल' लेने छलीह! सीता त' तइयो घुरा देल गेल छलीह अग्नि द्वारा, मुदा चूल्हि त' धरती माता जकाँ ओकरा अपना मे समेटि लेलकै - सदिखन लेल। सुता देलकै चिर-निद्रा मे...
आ मोनक एकटा गप्प कहू..
आब त' हमरो ओहि चूल्हि स' ऐतेक नेह भ' गेल अछि से की कहू ! कनिको झरकल देखलियै ने कि बस, लीप' लेल बैसि जाइत छियै...।
हर खन लगैत रहैये जे कतहु माय देख लेतै त' की कहतै - देखियो त' कने। एना किओ चूल्हि के राखैए! कहै छी जे जाबति लीपबै नै ताबति कान में जेना माइयेक आवाज गॅूंजैत रहैत अछि - 'हे सिया-सन्ुनरि... कने देखहक त'... केहेन करिया गेल छह चूल्हि... लीप देबहक से नै !' आ हम चाभी लागल मशीन जँका उठै छी... आ नूरा ल' क' चूल्हि के लीप' लागै छी।
अँगना घर में सभ किओ हँसियो उड़बैत छथि जे - ई कतहु बताहि त' नहिं भ' गेलीहए। चूल्हि के किओ एतेक जल्दी-जल्दी लीपय?
मुदा हमरा कनिको रोष नै लगैये लोक आओर अइ हँसी ठट्ठा पर...कियैक त' हम जनैत छी जे माउगि आ चूल्हिक एके प्रारब्ध होईत छै... जरू आ जरि -जरि क' जीबैत रहू। अहीे में ओकरा आओरक बास छै...।'
जे कथा ई सभ किओ नहिं बुझलखिन्ह, सएह कथा कहै छी जे नान्हि टाक हमर छोटकी बेटी अही उमिर मे बुझि गेल छै।
एखने किछु देर भेलै, हमर छोटकी आ ननटुनवा दुनू खेलाई छलै। की से बुझलहुँ ... घर-घर ! दुनू आपस मे खेलौना बाँटे छलै आ हम अहिना कोनियाँ घर मे बैसल-बैसल देखै छलियै जे देखियो की करै जाई छै ओ सभ!
थारी लेलकै ननटुनमाँ त' बाटी लेलकै हमर छोटकी।
लाठी लेलकै ननटुनमा त' चकला-बेलनी लेलकै छोटकी।
ननटुनमाँ पँजिएलकै अपन सन्दूक, तँ छोटकी सम्हारलकै अपन घैल-तमघैल। अहिना करैत-करैत ननटुनमा के हाथ पड़ि गेलै, कहै छी जे चूल्हि पर...। आ ननटुनमाक हाथ पड़लाक देरी से कहै छी जे हमर छोटकी तेहेन ने चील जकाँ झपट्टा मारलकै आ खींच लेलकै चूल्हि के अपना दीस जे हम ताकिते रहि गेलहुँ ओकरा। ओ कह' लागलै ननटुनमा के -'हे... चूल्हि कतहु पुरूष पात्र लेल भेलैये। लेबइये के अछि त' दियासलाई ल' लीय'। अहाँ के काज आओत कतहु, कखनो ! चूल्हि त' मौगी आओरक काज अबै छै ...। अहाँक कोन मतलबि एकरा आओर स' ! ओ सुनि क' जेना सुन्न रहि गेलहँु... बुझलहँु। कतके जल्दी बूझि गेलै हमर ई नन्हकी, अपन ई नान्हिपने में अइ दुनियाँक रीति रेबाज ! यै, आइ ओ एतेक बुझि गेलैये त' भ' सकैये जे प्रारब्ध हेतै त' एकरा स' सावधानो हेबाक रस्ता खोजि लेतै ओ। जतेक अधिकार स' ओ चूल्हि के अपना दिसि क' क' दियासलाई ओकरा दिसि बढ़ा देलकै, भ' सकै छै, तहिना एक दिन ओहि दियासलाइक जरैत तीली अपना दिसि बढैत देखि सएह अधिकार स' ओकरा फँूकि क' मिझा देतै आ जरैत काठी बढ़ब' बलाक गस्सा ओतबे कसि क' पकड़ि लेतै, जतेक कसिक' चूल्हिक परिपाटी ओकरा धएने छै। मुदा एखनि त' चली... उठी। आब नोर त' सुखा गेलै। देखियै, चूल्हि सुखेलै की नहिं...

6 comments:

  1. bhalchandra jik katha padhi bahut prasannata bhel

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  2. Rama Jha8:34 PM

    kathak sabh aaroh avroh sang bahait rahlahu

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  3. मनीष गौतम8:36 PM

    हमरा माय मे आ गाय मे कोनो अंतर नञि रहै, बुझलहँु? सभ लाथे। हम जखन-जखन गाय के नबेद खुआब' जइयै - अकस्माते कहै छी जे हमर ध्यान ओकर आँखि दिस चलि जाय। सदिखन लागय जेना ओहि आँखि में करूणा भरल रहै छै।

    bahut nik prastuti

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  4. bhalchandra jhak kathak prastutik lel dhanyavad

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  5. बड्ड नीक कथा।

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  6. katha hriday ke sparsh kray bala, prastutik lel dhanyavad

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...