Tuesday, April 07, 2009

मिथिला चलीसा- मदन कुमार ठाकुर आ जगदम्बा ठाकुर

मिथिला चलीसा

दाेहा


अति आबस्यक जानी के सुनियाे मिथिला कऽ वास
व्ेादपुराण सब बिधी मिलल लिेखल भाेला लालदास ऽ
पंडित मुर्ख अज्ञानी से मिथिला कऽ इर् राज
पाहॅंुन बन आऐला प्रभु जिनकर चर्चा आज ऽ ऽ
चाेैपाइर्
जय जय मैथिल सब गुन से सागरा ऽ
कर्म बिधान सब गुन छैन आगर ।।
जनक नन्दनी गाम कहाबैन ।
दुर दुर से कइर् जन आबैन ।।
देखैयन सिताराम कऽ स्वम्बर ।
भेला प्रसन्य लगलैन अति सब सुन्दर ।।
प्‍ुालकित झा पंचाग से सिखलाे ।
बिघ्न – बाधा के कहुॅना निपटेलाे ।।
मंत्र उचार केलाे सब दिन थाेरे ।
ग्रह – गाेचर से भेलाे हॅु छुटकाेरे ।।
विद्यापति जी कऽ मान बढ़़ेलैन ।
बनी उगना महादेव जी आयेलैन ।।
जय जय भैरवी गीत सुनाबी ।
सब संकट अपन दुर पराबी ।।
लक्ष्मीश्वर सिंह राज बन ऐला ।
पुन्हः मिथिला कऽ स्वर्ग बनेला ।।
भुखे गरीब रहल सब चंगा ।
सब के लेल ऐला राज दरिभंगा ।।
बन याेगी शंकरा चार्य कहाेलैथ ।
अन्ेाकाे शिव मंठ निर्माण कराेलैथ ।।
धर्म चरा चर रहल सत धीरा ।
जय जय करैत आयल संत फकिरा ।।
जन्म लेलैन लक्ष्मीनाथ सहरसा ।
जिनकर दया से भेल अति सुख वार्षा ।।
साध ु संत के भेष अपनाेलैन ।
फेर गाेस्वामी लक्ष्मीनथ कहाेलैन ।।

मण्डन मिझ्ज् कऽ शास्त्रार्थ कहानी ।
जिनकर घर ताेता बाजल अमर्त वाणी ।।
पत्नीक धर्म निभे लैन विद्वुसी ।
जिनकर महिमा गेलैन तुलसी ।।
आयाची मिझ्ज् कऽ गरीबी कहानी ।
इर्नकर महिमा सब कलैन बखानी ।।
साग खा पेटक केलैन पालन।
हिनकर घर जन्मल सरस्वती के लालन ।।
काली मुर्ख निज बात जब जानी ।
भेला प्रश्न्य उच्चैट भवानी ।।
ज्ञान प्राप्तय काली दास कहाेलैथ ।
फेर मिाथिला कऽ शिक्षा दानी बनेलैथ ।।
गन्नू झा कऽ कृत्या जखन जानी ।
हसैत रहैत छैथ सब नर प्राणी ।।
केहन छलैथ इर् नर पुरूषा ।
केना देलखिन दुर्गा जी के धाेखा ।।
खट्टर काका कऽ इर्हा सम्बानी ।
खाउ चुरा – दही हाेेउ आन्तर्यामी ।।
मिथिला कऽ भाेजन जे नै करता ।
तिनाे लाेक में जगह नै पाेता ।।
साेराठ सभा कऽ महिमा न्यारी ।
गेलैन सब राज आैर नर र् नारी ।।
जानैत छैथ सब कऽ गाेत्र र्मुल बिधान ।
फेर करैत छैथ सब कन्याॅ दान ।।
अमेरिका लंदन सब घर में सिप्टिंाग ।
देखलाे सब जगह मिथिला कऽ पेंटिग।।
हे मैंथिल मिथिल कऽ कृप्पा् निघान ।
रखयाे सब कियाे संस्कृती कऽ मान ।।
छैट परमेश्री कऽ धय्यान धराबैथ ।
चाैठी चन्द्र कऽ हाथ उठाबैथ ।।
जीत वाहन कऽ कथा सुनाबैत ।
फेर मिथिला पाबैन नाम सुनबैथ ।।
स्वर संगीत कऽ ताज उदितनारायण ।
मिथिला कऽ इर् विदित परायण ।।
हाेयत जगत में इर्नकर चर्चा ।
मनाेरंजन कऽ इर् सुख सरिता ।।
शिक्षा कऽ जखन बात चलैया ।
मिथिला युनिभरसिटी जग में नाम कहाया ।।
कम्पुटरिंग छैथ या कियाे टाइर्पिंग रिपाेटर ।
बाज्ैात लिखते छैथ मिथिला कऽ शुद्व अक्षर ।।
जे सब दिन पाठ करत तन र् मन स्ॅा ।
भगवती रक्षा करतैन हुॅन्का तन धन स्ॅा ।।
हे मिथिला के पुर्वज स्वर्ग निवासी ।
लाज बचायब सब अही के आसी ।।

दाेहा


कमला काेसी पैर परैया गंगा करैया जयकार
शत्रू से रखवाला करैया सदा हिमालय पहार


“प्रेम से बाजु मिथिला समाज की जय”


मदन कुमार ठाकुर आ जगदम्बा ठाकुर
पट्टिटाेल , भैरव स्थान
झंझारपुर ़मधुबनी ़बिहार
माे – 9312460150

12 comments:

  1. rachna te nik muda pravas par samasya par migration par seho likhu,
    aab te parangat bhay gel chhi ahan muda vishaya ke kanek vistrit karu

    ReplyDelete
  2. jagdamba ji madan ji, rachna nik achhi, muda nootan vishay par seho likhai jau

    ReplyDelete
  3. मिथिला चलीसा लिखक मिथिला के नबयुबा संग के बहुत निक से सुझेलाओ जे हमर मिथिला कतेक महान अछि
    बहुत बहुत धन्यवाद अछि अपनेक दुन्नु प्राणी के

    ReplyDelete
  4. Anonymous3:03 PM

    बहुत सुन्दर प्रस्तुती मिथिला के वर्णन मिथिला चलीसा लिख के पाठक गन के देलो
    बहुत निक लागल आशा अछि अहिना लिखल करी
    दीपक झा

    ReplyDelete
  5. Anonymous4:31 PM

    मिथिला चलीसा लिखक बहुत निक से सुझेलाओ
    --- MADAN JI AUR JAGDAMBA DIDI
    अति आबस्यक जानी के सुनिय मिथिला क वास
    व्ेादपुराण सब बिधी मिलल लिेखल भाेला लालदास |
    पंडित मुर्ख अज्ञानी से मिथिला कऽ इ राज
    पाहॅंुन बन आऐला प्रभु जिनकर चर्चा आज ||

    ReplyDelete
  6. आशीर्वाद अपनेक सबहक रह तेक त बहुत रास रचना लके हम मैथिल और मिथिला में आयब ---
    जय मैथिल जय मिथिला

    ReplyDelete
  7. नीक लागल दुनू प्राणीक सम्मिलित प्रयास।

    ReplyDelete
  8. Anonymous11:23 AM

    bahut khushi Bhelao Apnaek dunoo baykti ke rachna " MITHILA CHLISA padhi ke '
    manichnd jha

    ReplyDelete
  9. बहुत नीक प्रस्तुति

    ReplyDelete
  10. ARVIND KUMAR7:12 PM

    BAHUT SUNDAR MIRHILA WARNAN , MITHILA CHLISA LIKH KA DARSELO <
    BAHUT - BAHUT DHNYWAD APNEK SAB KE AA SAMAST LEKHAK GAN KE ---

    ReplyDelete
  11. बहुत - बहुत धन्यवाद पाठक गन के जे ओ अपन किमती व्क्त हमर रचना में देलैन , हम अपनेक सबक के अभारी छी ----
    जय मैथिल जय मिथिला

    ReplyDelete
  12. gangadhar6:46 PM

    bahut sundar mithila warnan lagal oho mithila chalisa roop me ,

    ReplyDelete

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...