Monday, April 27, 2009

एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी( सातम कड़ी)



आय भोरे बाबुजी असगर चलि गेलाह। माँ s मोन नहि मानलन्हि जे हमरा कानैत छोरि s जैतथि बाबुजी s गेलाक बाद हमरा अफसोस होयत छलs जे माँ कs हमरा चलते रहय परि गेलैन्ह , आब बच्चा सब के s असगर जाय परतैन्ह


कॉलेज जयबाक खुशी एतबे दिन मे समाप्त s गेल, कियाक से नहि जानि। कॉलेज जाइ अवश्य मुदा जेना कतो आओर हेरायल रहैत छलहुँ।घर आबि s घर मे सेहो एकदम चुप चाप जा अपन कोठरी मे परि रहैत रही। माँ सब सोचथि हम थाकि जायत होयब सुतल छी, मुदा हम घंटो ओहिना परल रहैत रही। हमरा अपनहु आश्चर्य होयत छलs स्कूल गेनाई s हम मोन ख़राब मे सेहो नहि छोरैत रही , फेर हमरा एहि तरहे कियाक भेल जा रहल छलs। काल्हि बाबुजी चलि गेलाह से आओर घर सुन लागैत छलैक ताहि पर कॉलेज जयबाक से मोन नहि होयत छलs कहुना कॉलेज s गेलहुँ मुदा ओहियो ठाम नीक नहि लागल।कॉलेज s आपस अयलाक s बाद नहि जानि मोन जेना बेचैन लागैत छलs हमरा बुझय मे नहि अबैत छल जे एहि तरहे कियाक भs रहल अछि। जहिना हाथ पैर धो s अयलहुं मौसी (जे की हमर काकी सेहो छथि) जलखई s s ठाढ़ रहथि हमरा आगूक जलखई दैत बजलीह जल्दी s पहिने जलखई s लिय। अहाँ सब दिन बहाना s दैत छियैक जे भूख नहि अछि, एतबहि दिन मे केहेन दुब्बर s गेल छी। नीक s खाऊ पीबू नहि s ठाकुर जी अओताह s कहताह एतबहि दिन मे सब हमर कनियाँ के दुब्बर s देलैथ। ठाकुर जी नाम सुनतहि नहि जानि कतय s हमरा मुँह पर मुस्की आबि गेल। बुझि परल जेना फूर्ति आबि गेल हो। मौसी के एकटा नीक मौका भेंट गेलैंह तुंरत माँ के बजा कहय लागलिह "हे बहिन, अहाँ s किछु नय बुझैत छियैक, कुसुम थाकय ताकय किछु नय छथि रोज तीन चारि बेर ठाकुर जी s नाम s नय लेल करू, सब ठीक रहतैक" आब हमरा कोनो दोसर उपाय नहि बुझाइत छल, हम बिना किछु बजने चुप चाप मौसी के हाथ s जलखई s लेलियैन्ह।


सब राति हम काका विविध भारतिक हवा महल अवश्य सुनैत रही। हमरा दुनु गोटे s कार्यक्रम बड़ पसीन छलs सब सुति रहथि मुदा हम दुनु गोटे हवा महल के बाद सुतय लेल जाइत रही। हमरा कतबो पढ़ाई कियाक नहि हो सब दिन काका हमरा हवा महल काल अवश्य बजा लेत छलाह। आइयो हवा महल जहिना शुरू भेलैक मधु के भेजि s हमरा बजा पठेलथि। हवा महल सुनलाक बाद हम अपन कोठरी मे सुतय लेल चलि गेलहुँ काका अपन कोठरी मे।


जहिना कहने रहथि, तहिना सब दिन हिनकर चिट्ठी आबैन्ह ओकर जवाब सब दिन राति मे सुतय काल लिखय चाहि मुदा हिनका हम की सम्बोधन s चिट्ठी लिखियैन्ह हमरा बुझय मे नहि आबति छलs हम पुछबो किनका s करितहुँ हम अपन पहिल चिट्ठी जे हिनका बौआ सँग मुजफ्फरपुर पठौने रहियैन्ह ताहू दिन सोचैत- सोचैत जखैन्ह किछु नय फुरायल छलs s हम हिनका "ठाकुर जी" सम्बोधन s चिट्ठी लिखि पठा देने रहियैन्ह। चिट्ठी पता नहि कोना , हिनकर कोनो दोस्त देख लेने रहथि हिनका कहि देने रहथिन्ह जे अहाँक सारि चिट्ठी बड़ सुन्दर लिखति छथि।इ ओकर चर्च हमरा लग हँसैत हँसैत कयने रहथि। हमरा ओहि दिन अपना पर तामस अवश्य भेल छलs मुदा हमरा बुझले नय छलs जे लोग की संबोधन s घरवाला के चिट्ठी लिखैत छैक। आब s "ठाकुर जी "सम्बोधन s सेहो नहि लिखि सकैत छलहुँ जखैन्ह हम सुतय लेल अयलहुं s सोचिये s आयल छलहुँ जे, किछु s जाय आइ हम चिट्ठी लिखबे करबैन्ह।हमरा अपने बहुत खराप लागैत छलs जे हम एकोटा चिट्ठिक जवाब नहि देने रहियैन्ह। बहुत सोचलाक बाद जखैन्ह हमरा सम्बोधनक कोनो शब्द नहि फुरायल s हम ओहि भाग s छोरि चिठ्ठी लिखय लगलहुँ चिट्ठी में कैयाक ठाम हम लिखिये जे हमरा मोन नहि लागति अछि जल्दी चलि आऊ मुदा फेर हम काटि दियय खैर बिना सम्बोधन वाला चिट्ठी लिखि s हम एकटा किताब मे सोचि s राखि देलियैक जे भोर तक किछु नय किछु फुरा जयबे करत। तखैन्ह लिखि s कॉलेज जाय काल खसा देबैक। पोस्ट ऑफिस हमर घरक बगल मे छलैक।


चिट्ठी लिखलाक बाद हम सोचलहुँ सुति रही मुदा कथि लेल नींद होयत। बड़ी काल तक बिछौना पर परल परल जखैन्ह नींद नहि आयल s उठि s पानि पीबि लेलहुँ फेर बिछौना पर परि s हिनकर देल किताब "साहब बीबी और गुलाम पढ़य" लगलहुँ दू चारि पन्ना पढ़लाक बाद किताबो s मोन उचटि गेल जओं घड़ी दिस नजरि गेल s देखलियैक भोर के चारि बाजति छलs सोचलहुँ आब की सुतब, जाइत छी चिट्ठी पूरा s तैयार s जायब। सोचि जहिना उठि s कलम हाथ मे लेलहुँ कि बुझायल जे कियो केबार खट खटा रहल छथि। हमरा मोन मे जेना एक बेर आयल कहीं s नहि अयलाह। हम जल्दी s आगू बढ़ि s जहिना केबार खोलति छी s ठीके एकटा बैग लेने ठाढ़ छलथि। हम किछु क्षण ओहिना ठाढ़ s हिनकर मुँह ताकैत रही गेलहुँ अचानक मोन परल बिना हिनका s किछु पूछने वा कहने ओहि ठाम तुरन्त भागि गेलहुँ ता धरि काका के छी करैत ओहि ठाम पहुँच गेलाह हमरा भागैत देखि पुछलथि" के छथि"? हम बिना किछु कहने ओहि ठाम s भागि अपन कोठरी मे जा बैसि गेलहुँ। काका हिनका देखैत देरी हा हा ... ठाकुर जी आयल जाओ बैसल जाओ कहैत हिनका घर मे बैसा तुरंत ओहि ठाम s जोर जोर s भौजी भौजी करैत भीतर आबि सब के उठा देलथि। थोरबहि काल मे भरि घरक लोग उठि गेलथि। तुरंत मे चाह पानि सबहक ओरिओन होमय लागल।रांची में s हमर पितिऔत चारि भाई बहिन सेहो रहथि। जाहि महक तीन गोटे हिनका देखनेहो नहि रहथि, मधु टा विवाह मे छलिह। सब हिनका देखय लेल जमा s जाय गेलथि। मौसी s सेहो हिनका पहिल बेर भेंट भेल छलैन्ह। विवाह मे मौसी नहि रहथि नीलू दीदी s विवाह के बाद सोनूक (छोटका बेटा) मोन खराप s गेल छलैन्ह मौसी, सोनू, निक्की पप्पू के राँची छोरि आयल छलथि। हुनका एतबो समय नहि भेंटलैन्ह जे मौसी के फेर अनतथि।


हम अपन कोठरी मे चुप चाप बैसल रही, रतुका बेचैनी आब नहि छलs मुदा हमरा किछु काका नहि बुझाइत छलs जे हम की करी। सोचैत रही जे कॉलेज जाइ या नहि, जयबाक मोन s नहि होयत छलs, ताबैत मौसी हमरा कोठरी मे कुसुम कुसुम करैत हाथ मे चाह लेने घुसलीह। हमरा देखैत कहय लगलीह "अहाँ अहिना बैसल छी, जल्दी s चाह पीबि लिय तैयार s जाऊ। हमरा सुनतहि बड़ तामस भेल, हमरा मोन मे भेल कहू s अखैन्हे अयलाह अछि मौसी हमरा कॉलेज जाय लेल कहैत छथि हम धीरे s कहलियैन्ह हमर माथ बड़ जोर s दुखायत अछि। सुनतहि मौसी के मुँह पर मुस्की आबि गेलैन्ह कहलथि तैयार s जाऊ मोन अपनहि ठीक s जायत, आय कॉलेज नहि जयबाक अछि। सुनतहि हमरा भीतर s खुशी भेल, बुझायल जेना हम यैह s चाहैत रही, जे कियो हमरा कहथि अहाँ कॉलेज नहि जाऊ। हम जल्दी s चाह पीबि तैयार होमय लेल चलि गेलहुँ।


ओना s हमरा तैयार हेबा में बड़ समय लागैत छलs मुदा ओहि दिन जल्दी जल्दी तैयार s गेलहुँ। अपन कोठारी में पहुँचलहुं s मौसी हमरे कोठरी में रहथि किछु ठीक करैत छलिह। हमरा देखैत बाजि उठलिह "बाह आय s अहाँ बड़ फुर्ती s तैयार s गेलहुँ, आब माथक दर्द कम भेल"? हम हुनका दिस देखबो नही केलियैन्ह दोसर दिस मुँह घुमेनहि हाँ कही देलियैन्ह।


काका के विवाहे बेर s हिनका सँग खूब गप्प होयत छलैन्ह। हमर काका बड़ निक हंसमुख व्यक्ति, हिनका s कखनहु कखनहु s हँसी सेहो s लेत छलाह। हिनको काका s गप्प करय में बड़ निक लागैत छलैन्ह। हम तैयार s s पहुँचलहुं ता धरि सब गप्प करिते छलाह। मौसी हमरे कोठरी s काका के सोर पारि हुनका s कहलथि" ठाकुर जी s तैयार होमय लेल कहियोक नहि, थाकल होयताह "।किछुए कालक बाद हमर वाला कोठरी में अयलाह, हम चुप चाप ओहि ठाम बैसल रही। हिनका देखैत देरी हमरा की फुरायल नहि जानि झट दय गोर लागि लेलियैन्ह।गोर लगलाक बाद हम चुप चाप फेर आबि s बैसि रहलियैक। मोन में पचास तरहक प्रश्न उठैत छल।इहो आबि s हमरा लग बैसि रहलाह पुछ्लाह अहाँ कानैत कियाक रही, हमरा देखि s आजु भागि कियाक गेलहुँ। अहाँक बाबुजी जखैन्ह s कहलाह जे अहाँ s कनबाक चलते माँ रही गेलीह, आब एक मास बाद जयतीह, तखैन्ह s हमरो मोन बेचैन छलs अहाँ के बाबुजी के गाड़ी में बैसा सीधे हॉस्टल गेलहुँ ओहिठाम मात्र कपडा s जे पहिल बस भेंटल ओहि s सीधा आबि रहल छी। हिनकर गप्प सुनतहि हमर आँखि डबडबा गेल। हमरा अपनहु नहि बुझल छलs जे हम कियाक भागल रही नहि , जे हमरा कियाक कना जायत छल।

7 comments:

  1. ee bhag seho otabe nik jate pahiluka sabh

    ReplyDelete
  2. सब राति हम आ काका विविध भारतिक हवा महल अवश्य सुनैत रही। हमरा दुनु गोटे कs इ कार्यक्रम बड़ पसीन छलs।

    mon pari delahu pata nahi aai kalhi ee karyakram sabh hoi ye ki nahi,
    aab te tv ke jamana aabi gel

    ReplyDelete
  3. Rama Jha9:08 AM

    ehi ber seho vaih puranka flow barkarar rahal, dhanyavad

    ReplyDelete
  4. मनीष गौतम9:20 AM

    मानव सम्बन्धक नीक अभिव्यक्ति।

    ReplyDelete
  5. ee satam bhag seho pahiluke jeka nik,
    uttam

    ReplyDelete

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...